Sunday, January 18, 2026
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अकबर की रणथंभौर विजय – रणथंभौर दुर्ग की सोने-चांदी की चाबियां अकबर के पास आ गईं (90)

मुगल बादशाह अकबर की रणथंभौर विजय ने ही मुगलों के लिए सम्पूर्ण राजपूताने की विजय का वास्तविक मार्ग खोला। अकबर की रणथंभौर विजय ने राजपूत राजाओं को स्पष्ट संदेश दे दिया कि अब अकबर को रोक पाना कठिन है।

 डॉ. आशीर्वादी लाल श्रीवास्तव का विवरण

 डॉ. आशीर्वादी लाल श्रीवास्तव ने लिखा है कि लगभग डेढ़ माह तक अकबर (AKBAR) रणथम्भौर दुर्ग  (Ranthanhor Fort) पर घेरा डाले पड़ा रहा। इस दौरान दोनों ही पक्षों को अपार जन-धन की हानि हुई। वे लिखते हैं कि रणथंभौर का पतन किस प्रकार हुआ, इस सम्बन्ध में दो मत हैं।

कर्नल टॉड के अनुसार सुरजनराय ने ऐसा प्रबल प्रतिरोध किया कि अकबर (AKBAR) को यह निश्चय करना पड़ा कि इस संघर्ष को अधिक दिनों तक नहीं चलाना चाहिए और हाड़ा सरदार को समझा-बुझाकर किला उससे ले लेना चाहिए।

अकबर की रणथंभौर विजय के सम्बन्ध में दूसरा मत अकबर के दरबारी लेखक अबुल फजल (ABUL FAZAL) एवं मुल्ला बदायूंनी का है। उनके अनुसार राव सुरजन हाड़ा ने अपने सर्वनाश से घबराकर रणथंभौर का किला बादशाह को समर्पित कर दिया।

अबुल फजल का विवरण

अकबर के दरबारी लेखक अबुल फजल ने लिखा है कि दुर्ग नष्ट होते देखकर राव सुरजन का दिल बैठ गया। उसने दरबारियों के द्वारा बीच-बचाव करवाया और अपने पुत्रों दूदा तथा भोज को बादशाह के दरबार में भेजकर संधि की बात करनी चाही।

दोनों राजकुमारों ने मुगल बादशाह के उच्च अधिकारियों के माध्यम से बादशाह से भेंट की तथा अपने पिता द्वारा किए गए अपराधों की क्षमा मांगी।

इस पर बादशाह अकबर ने राव सुरजन को क्षमा कर दिया तथा दोनों राजकुमारों को खिलअत पहना कर वापस अपने पिता के पास भेज दिया। राव सुरजन ने अपनी प्रतिष्ठा की रक्षा करने के लिए बादशाह से प्रार्थना की कि एक दरबारी उसको ले जाए और से मिलवा दे।

अकबर (AKBAR) ने सुरजन की यह प्रार्थना स्वीकार कर ली और हुसैन कुली खाँ (HUSAIN KULI KHAN) अर्थात् खानेजहाँ को इस काम के लिए नियुक्त किया।

अबुल फजल लिखता है कि जब हुसैन कुली खाँ रणथंभौर दुर्ग के समीप पहुंचा तो राव सुरजन ने बाहर आकर उसका स्वागत किया और फिर वह सबको अपने निवास स्थान पर ले गया।

22 मार्च 1569 को राव सुरजन दुर्ग से बाहर आकर शाही दरबार में हाजिर हुआ और उपयुक्त भेंटों के साथ उसने दुर्ग की चाबियां जो सोने और चांदी की बनी हुई थीं, बादशाह को अर्पित कर दीं।

अबुल फजल लिखता है कि बादशाह द्वारा सुरजन के साथ कृपापूर्ण व्यवहार किया गया जिससे उसको शांति हो गई और वह स्वयं को सुरक्षित समझने लगा।

राव सुरजन ने कुछ दरबारियों द्वारा बादशाह से कहलवाया कि मैं तीन दिन दुर्ग में रहकर अपने कुटुंब आदि को बाहर ले आऊंगा और तत्पश्चात दुर्ग शाही सेवकों को सुपुर्द करके मैं राजधानी आगरा के लिए रवाना हो जाऊंगा। मेरे पुत्र बादशाह के साथ रहेंगे।

अबुल फजल (ABUL FAZAL) लिखता है- ‘बादशाह ने राव सुरजन के इस प्रस्ताव को स्वीकार करके उसे वापस किले में जाने की अनुमति दे दी। सुरजन ने तीन दिन पश्चात् रणथंभौर दुर्ग अकबर के सेनानायक मिहतर खाँ के सुपुर्द कर दिया। सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी को इस दुर्ग को जीतने में एक वर्ष लगा था परंतु अकबर की रणथंभौर विजय एक महीने में पूरी हो गई।

अगले दिन शहंशाह ने कुछ अंगरक्षकों के साथ किले का मुआइना किया। जब उसने रणथंभौर दुर्ग में प्रवेश किया तो अल्लाह हू अकबर (AKBAR) के नारों से आकाश गूंज उठा।’

जब शहंशाह द्वारा रणथंभौर की व्यवस्था कर दी गई तो खानेजहाँ और मुजफ्फर खाँ को दाहिने मार्ग से राजधानी की ओर प्रस्थान करने को कहा गया और शहंशाह अपने घनिष्ठ दरबारियों के साथ अजमेर-दरगाह की यात्रा पर रवाना हो गया।

मार्ग में वह प्रतिदिन शिकार करता था। अंत में वह अजमेर पहुंच गया और ख्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह में गया और वहाँ के लोगों में रुपए उछाले।

मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूंनी का विवरण

बदायूंनी के विवरण की चर्चा हम पिछली कड़ी में विस्तार से कर चुके हैं। मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूंनी लिखता है कि अकबर (AKBAR) की रणथंभौर विजय पर मौलाना शीरी ने एक कविता लिखी जिसमें उसने लिखा कि जब शहंशाह के सौभाग्य से काफिरों की मजबूती ले ली गई, तब शीरी ने उसकी तारीफ दी- ‘काफिरी तोड़ बादशाह’।

अर्थात् शीरी ने अकबर को पाप को नष्ट करने वाले बादशाह की उपाधि दी।

अकबर की रणथंभौर विजय पर शाह फतहउल्लाह शीराजी के भाई मीर फारिगी ने भी एक कविता लिखी जिसमें उसने कहा-

जब विजय का गुलाब

शाह की फतह वाले बाग में खिला

तो तारीख का ऐलान करने वाले ने कहा

उन्होंने किला जल्दी ही ले लिया।

ब्लॉकमैन का विवरण

ब्लॉकमैन द्वारा अनूदित आईने अकबरी के अनुसार 21 मार्च 1569 को सुरजन हाड़ा, अकबर (AKBAR) की सेवा में उपस्थित हुआ। उसने अकबर को दुर्ग की चाबियां सौंप दीं तथा महाराणा की सेवा छोड़कर अकबर की सेवा स्वीकार कर ली।

अकबर ने सुर्जन हाड़ा को गढ़कण्टक (गढ़कटंगा) का दुर्गपति बना दिया और बनारस तथा चुनार के सूबे भी उसे दे दिए। मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूंनी एवं अबुल फजल (ABUL FAZAL) द्वारा लिखे गए ये विवरण हिन्दू लेखकों द्वारा लिखे गए विवरणों से मेल नहीं खाते।

अकबर ने मुगल सल्तनत में रणथंभौर के नाम से एक सरकार का गठन किया। इस सरकार में 73 महाल थे और 60,24,196 बीघा 11 बिस्वा भूमि थी। इस सरकार की कुल राजस्व आय 8,98,245 दम्म थी। अकबर (AKBAR) ने रणथंभौर दुर्ग में शाही टकसाल भी स्थापित की और इसे जगन्नाथ कच्छवाहा को जागीर में दे दिया।

✍️ – डॉ. मोहनलाल गुप्ता की पुस्तक तीसरा मुगल जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर (Teesra Mughal Jalaluddin Muhammad Akbar) से।

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