गुजराती अमीर (Gujrati Nobles)) अकबर से बगावत करने पर उतारू थे। अकबर (Akbar) ने उन्हें जौ के दानों की तरह काट डाला।
मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूंनी ने मुंतखब उत तवारीख (historical chronicle) में लिखा है कि जिस समय अकबर अहमदाबाद (Ahmedabad) के निकट पहुंचा, दुश्मन की सेना (enemy army) असावधानी की नींद में सो रही थी। जब उन्होंने बिगुल (bugle sound) की आवाज सुनी तो शत्रु के सैनिक असमंजस में पड़कर घोड़ों पर चढ़ने को दौड़े।
मुहम्मद हुसैन मिर्जा (बागी नेता (rebel leader)) दो-तीन और घुड़सवारों के साथ दरिया किनारा (river bank) भाग आया ताकि समझ सके कि माजरा क्या है! हुआ यह कि तुर्क सुमान कुली भी दो-तीन घुड़सवारों के साथ इस ओर से दरिया किनारे गया हुआ था।
मुहम्मद हुसैन मिर्जा ने उससे पूछा- ‘हुजूर यह कैसी फौज है?’
उसने जवाब दिया- ‘शाही फौज (Royal Army)!’
मिर्जा ने कहा- ‘मेरे सेवकों ने मुझे आज ही बताया है कि उन्होंने चौदह दिन पहले अकबर को फतेहपुर सीकरी (Fatehpur Sikri) में छोड़ा था। यदि यह शाही फौज है तो हमेशा साथ रहने वाले हाथी (war elephants) कहाँ हैं?’
इस पर सुमान कुली ने कहा- ‘चार सौ कोस नौ दिन में हाथी कैसे तय कर सकते हैं?’
तब हुसैन मिर्जा ने इख्तियार-उल-मुल्क (Ikhtiyar-ul-Mulk) के साथ पांच हजार घुड़सवार किला (fort) की ओर भेजे ताकि खान-ए-आजम बाहर निकल कर गुजराती (Gujaratis) पर आक्रमण नहीं कर सके।
उधर अकबर की शाही फौज (Mughal Army) ने आनन-फानन में दरिया पार कर लिया। मुहम्मद हुसैन मिर्जा ने पहले ही अनुमान लगा लिया था कि अकबर की सेना साबरमती नदी (Sabarmati River) को पार करने में विलम्ब नहीं करेगी।
इस कारण मुहम्मद हुसैन मिर्जा के पंद्रह सौ सैनिकों ने शाही सेना के हरावल (vanguard) पर हमला किया। यहीं पर बागी मिर्जाओं की तरफ से मुहम्मद कुली खाँ और तर खाँ दीवाना भी अपनी सेनाओं के साथ नियुक्त थे।
मुहम्मद हुसैन मिर्जा के सैनिकों ने अबीसीनियन (Abyssinians) और अफगान (Afghans) ने साथ मिलकर अकबर की सेना के बायें पक्ष पर धावा बोला जो वजीर खाँ (Wazir Khan) की कमान में था।
मुल्ला बदायूंनी लिखता है कि दोनों ओर से नौजवान युद्धरत हुए तथा जौ के दाने की तरह साफ कर दिए गए।
इतनी घमासान जंग (battle) हुई कि यह पीढ़ियों तक याद रखी जाएगी। जब शहंशाह ने देखा कि उसकी फौज का हरावल बिखर गया है तो वह जोर से चिल्लाया- ‘या मुईन (Ya Muin, war cry)!’ उन दिनों मुगल (Mughals) में यही यलगार लगाई जाती थी।
अकबर ने एक मजबूत हमला (attack) करके दुश्मन की पंक्तियों को तोड़ दिया तथा उन्हें अस्त-व्यस्त कर दिया। बहुत से सिर हवा में उड़ गए। सैफ खाँ कोका दुश्मन के व्यूह (battle formation) में कूद पड़ा और उस भंवर में फंस गया जिसमें से वह कभी बाहर नहीं निकल सका।
मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूंनी ने लिखा है कि मुहम्मद हुसैन मिर्जा ने वह सब किया जो एक मनुष्य साहस के साथ कर सकता है, फिर भी वह जख्मी तक नहीं हुआ। अंत में उसकी भावना स्वयं ही थक गई तथा उसका घोड़ा जख्मी हो जाने से वह जंग का मैदान (battlefield) से भाग गया।
मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूंनी ने लिखा है कि मुहम्मद हुसैन मिर्जा ने वह सब किया जो एक मनुष्य साहस के साथ कर सकता है, फिर भी वह जख्मी तक नहीं हुआ। अंत में उसकी भावना स्वयं ही थक गई तथा उसका घोड़ा जख्मी हो जाने से वह जंग का मैदान (battlefield) से भाग गया।
उसका रास्ता एक कांटेदार झाड़ी ने रोका। उसका इरादा घोड़े को कुदा देने का था, ऐसे में दुर्भाग्य से उसके घोड़े की लगाम एक झाड़ी में अटक गई और घोड़े की काठी खींचते हुए उसे जमीन पर गिरा दिया।
गदाई अली (Turk soldier) नामक एक तुर्क, जो तेजी से मुहम्मद हुसैन मिर्जा का पीछा कर रहा था, धरती पर गिरे हुए मुहम्मद हुसैन मिर्जा पर तेजी से कूदा और उसे बंदी (captured) बनाकर शहंशाह के पास ले आया।
मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूंनी लिखता है कि अकबर ने अपनी स्वाभाविक दयालुता (mercy) और अपने अच्छे स्वभाव के कारण मुहम्मद हुसैन मिर्जा को डांट-फटकार लगाने के बाद उसे रायसिंह (Raisingh, Rajput commander) के सुपुर्द कर दिया।
अबुल फजल (Abul Fazl, historian) ने लिखा है कि रायसिंह को सीकरी (Sikri, royal harem guard) में हरम की रक्षा के लिए नियुक्त किया गया था जबकि मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूंनी ने रायसिंह को युद्ध का मैदान (battlefield) में मौजूद दिखाया है।
मुल्ला बदायूंनी ने लिखा है कि इस दौरान वजीर खाँ (Wazir Khan) अबीसीनियनों और गुजरातियों से निबट रहा था और आमने-सामने की लड़ाई में अपना पैतृक जौहर (valor) दिखा रहा था। जब दुश्मनों ने मुहम्मद हुसैन मिर्जा और शाह मिर्जा की हार की सूचना सुनी तो उन्होंने जंग का मैदान (battlefield) से पीठ दिखाई।
विजय की संभावना से ज्यादा जान प्यारी समझ कर वे तेजी से भाग गए। इसी समय अकबर के सेनापति खान-ए-कलाँ (Khan-e-Kalan, Mughal general) ने शेर खाँ फुलादी (Sher Khan Fuladi) के बेटों को पूरी तरह परास्त कर दिया। इस प्रकार मैदान दुश्मनों से पूरी तरह खाली हो गया।
मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूंनी ने इस युद्ध में अकबर के सिपाहियों की तुलना उन दर्जियों (tailors) से की है जो युद्ध के मैदान में शत्रु सैनिकों को अपनी तलवार (swords) से काटते हैं तथा तीर (arrows) से उनके शरीर सिलते हैं। वह लिखता है कि विजय के बाद शहंशाह मैदाने जंग (battlefield) के पास की पहाड़ी (hill) पर चढ़ा और जंगजुओं के भुजबल (strength) का अंदाजा लगाने में व्यस्त हो गया।
तब अचानक इख्तियार-उल-मुल्क (Ikhtiyar-ul-Mulk) जिसे खाने-आजम (Khan-e-Azam) को शहंशाह के साथ मिलने से रोकने के लिए नियुक्त किया गया था, मिर्जाओं की पराजय की सूचना सुनकर अपने मोर्चे से हट गया और अपने पांच हजार घुड़सवारों के साथ खुले मैदान में आ गया।
एक बार फिर से दोनों पक्षों में तेज संघर्ष (conflict) आरम्भ हो गया। शहंशाह ने अपनी टुकड़ियों को तीरों की बौछार (arrow volley) करने के आदेश दिए।
इख्तियार-उल-मुल्क से आगे चल रही टुकड़ी ने ‘या मुईन (Ya Muin, war cry)‘ का नारा लगाया और धूल पर लम्बे हो गए अर्थात् मृत्यु को प्राप्त हुए। हुसैन खाँ (Husain Khan) लड़ने वालों में आगे था इसलिए शहंशाह ने अना खंजर (ceremonial dagger) उसे भेंट कर दिया।
इख्तियार-उल-मुल्क के घोड़े की लगाम टूटने से वह एक रास से ही भाग खड़ा हुआ। जब तक कि उसका घोड़ा कांटों वाली झाड़ी में न गिर गया जैसे गधा (donkey) कीचड़ में गिरता है।
अकबर के तुर्क सिपाही (Turkish soldiers) इख्तियार-उल-मुल्क के पीछे चल रहे थे। उन्होंने इख्तियार-उल-मुल्क को घेर लिया। सोहराब बेग तुर्कमान (Sohrab Beg Turkmen) ने झपट कर इख्तियार-उल-मुल्क को पकड़ लिया।
इख्तियार-उल-मुल्क ने सोहराब बेग से कहा- ‘तुम तुर्कमान लगते हो जो पवित्र अली (Ali) और उसके साथियों के अनुयायी हैं। मैं बुखारा (Bukhara) का सैयद हूँ, मुझे छोड़ दो।’
सोहराब बेग ने जवाब दिया- ‘मैं तुम्हें कैसे छोड़ दूँ, तुम इख्तियार-उल-मुल्क हो। मैं तुम्हें पहचानता हूँ और काफी देर से तुम्हारा पीछा कर रहा हूँ।’
इसके बाद सोहराब बेग घोड़े से नीचे उतरा और उसने इख्तियार-उल-मुल्क का सिर (head) उसके धड़ (torso) से अलग कर दिया। कोई मुगल सैनिक (Mughal soldier) इख्तियार-उल-मुल्क का घोड़ा ले गया। इसलिए सोहराब बेग ने इख्तियार-उल-मुल्क का सिर एक कपड़े से ढंका और शाबाशी (reward) पाने के लिए बादशाह के पास ले गया।
इसी समय इख्तियार-उल-मुल्क का पैदा किया बवंडर (chaos) थम गया। रायसिंह (Raisingh) के सेवकों ने मुहम्मद हुसैन मिर्जा को हाथी से उतारा तथा उसे बल्लम (spear) के एक ही वार से बिना अस्तित्व वाले संसार में भेज दिया।
अकबर ने इख्तियार-उल-मुल्क तथा मुहम्मद हुसैन मिर्जा के सिर (heads) आगरा किला (Agra Fort) के बाहर लटकाने के लिए भेज दिए।
✍️ – डॉ. मोहनलाल गुप्ता की पुस्तक तीसरा मुगल जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर (Third Mughal Jalaluddin Muhammad Akbar) से।



