मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूंनी ने अपनी पुस्तक मुंतख़ब-उत-तवारीख़ (Muntakhab-ut-Tawarikh) में बादशाह अकबर तथा शेख सलीम चिश्ती की निकटता का विस्तार से उल्लेख किया है। इस लेख में बदायूंनी द्वारा किए गए उल्लेखों के आधार पर अकबर तथा शेख सलीम चिश्ती के सम्बन्धों का वर्णन किया गया है।
रणथंभौर विजय के बाद अकबर (AKBAR) ने राव सुर्जन (RAO SURJAN) को गोंड राज्य पर आक्रमण करने का आदेश दिया और स्वयं अजमेर चला गया। अबुल फजल (ABUL FAZAL) लिखता है कि शहंशाह जब तक अजमेर में ठहरा, वह प्रतिदिन दरगाह में जाया करता था।
आम्बेर दुर्ग में एक मस्जिद
फिर अपनी राजधानी की ओर रवाना हुआ। मार्ग में जब अकबर आमेर में उतरा तो कच्छवाहा राजा भगवानदास ने उसका स्वागत किया और अकबर को एक भोज दिया तथा उसे अच्छी-अच्छी भेंटें अर्पित कीं।
राजा भारमल ने बादशाह के लिए आम्बेर दुर्ग में एक मस्जिद बनवाई जो आज भी देखी जा सकती है। अकबर को प्रसन्न करने के लिए भारमल ने यद्यपि इस मस्जिद को मुगल शैली में बनाने का प्रयास किया किंतु आम्बेर में मुगलिया शैली के जानकार शिल्पी नहीं थे।
इस कारण इस मस्जिद पर हिन्दू स्थापत्य की छाप स्पष्ट दिखाई देती है। मस्जिद को बाहर से लाल रंग से पोतकर लाल बलुआ पत्थर से निर्मित होने का आभास दिया गया है क्योंकि अकबर (AKBAR) ने लगभग सभी भवन लाल रंग के पत्थर से बनवाए थे।
इस मस्जिद के प्रवेश द्वार को फारसी शैली के ईवान की तरह बनाने का प्रयास किया गया किंतु उसके ऊपर पत्थर की नक्काशी मुगलिया नक्काशी की जगह हिन्दू अलंकरण की तरह दिखाई देती है।
आम्बेर दुर्ग परिसर में आज भी अच्छी स्थिति में खड़ी इस मस्जिद के मुख्य द्वार के दोनों तरफ तीन-तीन मेहराब बनाए गए हैं तथा मुख्य द्वार के दोनों तरफ एक-एक गुम्बद बनाया गया है।
ये गुम्बद भी फारसी एवं मुगलिया शैली के गुम्बदों के स्थान पर मंदिर के गर्भगृहों के ऊपर बनने वाले शिखरनुमा निर्माण अधिक जान पड़ते हैं जो कि बंद कमल पुष्प की तरह दिखाई देते हैं।
इस भवन के सामने एक-एक पतली मीनार बनाई गई है जो मुगल शैली से बिल्कुल भी मेल नहीं खाती। बादशाह ने इसी मस्जिद में नमाज पढ़ी। वह अपने जीवन काल में दो-तीन बार आम्बेर आया।
कुछ दिन आमेर में रुकने के बाद बादशाह आगरा के लिए चल दिया। मार्ग में उसे दरबार खाँ की मृत्यु की खबर मिली जिससे बादशाह को बड़ा दुःख हुआ।
कुत्ते की कब्र के नीचे
दरबार खाँ की वसीयत के अनुसार उसे उसके स्वामिभक्त कुत्ते की कब्र के नीचे की ओर दफनाया गया जहाँ दरबार खाँ ने अपने लिए पहले से ही एक गुंबद बनवा लिया था।
राव सुरजन द्वारा हिन्दू राजाओं का दमन
11 मई 1569 को अकबर आगरा पहुंच गया और बंगाली महल में गया जिसका निर्माण हाल ही में हुआ था। उधर राव सुरजन ने गोंड के राजा (GOMD RAJA) पर आक्रमण किया। गोंडों के राजा ने कुछ समय तक तो प्रतिरोध किया किंतु बाद में उसने आत्समर्पण कर दिया। राव सुरजन ने गोंडों की राजधानी बारीगढ़ में बादशाह अकबर (AKBAR) का अधिकार स्थापित करके वहाँ पर अपनी विजय के उपलक्ष्य में सूरजपोल (SURAJPOL) नामक दरवाजा बनवाया। गोंड का राजा राव सुरजन की बात मानकर अकबर के दरबार में चलने को राजी हो गया। राव सुरजन उसे दिल्ली ले गया तथा उसे बादशाह के समक्ष प्रस्तुत किया। अकबर राव सुरजन के इस कार्य से बड़ा प्रसन्न हुआ और उसने सुरजन को पांच हजार सवारों का मनसब दिया। इस प्रकार राव सुरजन ने अकबर के समक्ष गोंड राज्य जीतने का जो भरोसा दिया था, उसे पूरा किया। वंश भास्कर के अनुसार राव सुर्जन बादशाह से अनुमति लेकर बूंदी गया और उसने बूंदी के निकटवर्ती 26 परगने बूंदी राज्य में मिलाए। बादशाह ने राव सुरजन को बनारस के पास भी 26 परगने प्रदान किए। अकबर ने राव सुर्जन को बनारस (BANARAS) और चुनार (CHUNAR) का हाकिम नियत कर दिया।
कालिंजर का पतन
कालिंजर (KALIANJAR) हिन्दुओं के प्रसिद्ध दुर्गों में से था। यह वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बांदा जिले में स्थित है। अगस्त 1569 में अकबर ने मजनू खाँ काकशाह को इस दुर्ग पर आक्रमण करने भेजा।
कालिंजर के दुर्गपति रामचन्द्र ने शत्रु का सामना किया परन्तु जब उसे चित्तौड़ तथा रणथम्भौर के पतन की जानकारी मिली तब उसका साहस भंग हो गया और उसने समर्पण कर दिया। अकबर (AKBAR) ने रामचन्द्र से कालिंजर का दुर्ग लेकर उसे इलाहाबाद के निकट एक जागीर दे दी। मजनू खाँ काकशाह को कालिंजर का दुर्गपति नियुक्त किया गया।
इस समय तक बादशाह के कई पुत्र उत्पन्न हो चुके थे किंतु वे सब शैशव अवस्था में ही मर जाते थे। इसलिए अकबर शेखुल इस्लाम अर्थात् सूफी दरवेश शेख सलीम चिश्ती से मिलने सीकरी गया। मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूंनी ने अपनी पुस्तक मुंतखब उत् तवारीख में लिखा है कि अकबर बादशाह अपनी एक गर्भवती बेगम को सलीम चिश्ती के मकान में छोड़ आया ताकि उसे दरवेश का आर्शीवाद प्राप्त हो सके।
मुल्ला लिखता है कि अकबर ने सीकरी की पहाड़ी पर शेख के निवास के पास एक भव्य मस्जिद का निर्माण करवाया तथा एक नए दुर्ग की आधारशिला रखी।
अबुल फजल लिखता है कि अकबर बादशाह ने सीकरी में पत्थर की एक ऊंची व काफी बड़ी मस्जिद बनवाई, इतनी बड़ी कि उसे पहाड़ का एक हिस्सा कहा जा सकता है। यह इतनी दुर्लभ थी कि संसार में शायद ही कहीं दिखाई दे।
लगभग पांच साल में यह मस्जिद बनकर तैयार हुई। अकबर ने इस स्थान को फतहपुर नाम दिया। अकबर ने उसमें गुसलखाने एवं दरवाजे आदि भी बनवाए। बादशाह अकबर के अमीरों ने भी इस मस्जिद में मीनारें, बरामदे एवं भव्य महल बनवाए। मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूंनी ने इस मस्जिद के बनवाए जाने पर कविता लिखी, जो इस प्रकार है-
यह किला इस्लाम का गुम्बद है
अल्लाह इसके बनवाने वाले को कीर्ति दे।
गेब्रियल ने तारीख इस प्रकार दी
ऐसा जमीन पर नहीं देखा गया।
जन्नती काबा जन्नत से उतरकर आ गया।
अकबर के दरबारी अशरफ खाँ ने इस मस्जिद की तारीफ करते हुए लिखा- ‘यह मक्का मस्जिद के बाद दूसरी है।’
मुल्ला बदायूंनी ने अकबर (AKBAR) तथा शेख सलीम चिश्ती की निकटता का उल्लेख करते हुए लिखा है कि- ‘शेख ने शहंशाह को अपने घर में बने हुए सभी कमरों में जाने की अनुमति दे दी। इस कारण अकबर किसी भी कमरे में कभी भी चला जाता था।’
इस पर शेख के बच्चे और भतीजे नाराज होकर शेख से शिकायत करते कि बादशाह के बार-बार हमारे कमरों में आने के कारण हमरी बेगमें हमसे परायी होती जा रही हैं।
इस पर शेख उत्तर देता कि संसार में औरतों की कमी नहीं है, मैंने तुम लोगों को अमीर बनाया है, दूसरी बेगमें ले आओ, क्या फर्क पड़ता है?’
शेख के घर की इस स्थिति पर चुटकी लेते हुए मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूंनी ने लिखा है कि या तो महावत से दोस्ती मत करो, या फिर मकान हाथी के अनुकूल बनाओ!
✍️ – डॉ. मोहनलाल गुप्ता की पुस्तक तीसरा मुगल जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर (Teesra Mughal Jalaluddin Muhammad Akbar) से।




