Sunday, January 18, 2026
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अकबर का रणथंभौर अभियान – लोहे एवं पत्थरों के भारी गोले बरसाने लगा अकबर (89)

 चित्तौड़ दुर्ग का अभियान पूरा करने के ठीक एक साल बाद अकबर (AKBAR) ने एक विशाल सेना लेकर रणथम्भौर दुर्ग  (Ranthambhor Fort) घेरने का निश्चय किया। यह अकबर का रणथंभौर अभियान कहलाता है। उस समय रणथंभौर दुर्ग मेवाड़ के महाराणा उदयसिंह (Maharana Udaisingh) के अधीन था और पृथ्वीराज चौहान का वंशज राव सुरजन हाड़ा (Rao Surjan Hada) रणथंभौर दुर्ग का दुर्गपति था।

ई.1527 में खानवा के युद्ध (Battle of Khanwa) में घायल होने के बाद महाराणा सांगा (Maharana Sangramsingh) ने इसी रणथंभौर दुर्ग में आकर विश्राम किया था। महाराणा सांगा की एक रानी का नाम कर्मवती (Rani Karmavati) था जो महाराणा विक्रमादित्य तथा महाराणा उदयसिंह की माता थी।

रानी कर्मवती रणथंभौर के इसी हाड़ा राजवंश की राजकुमारी थी। इस कारण हाड़ा राजवंश मेवाड़ के सर्वाधिक विश्वसनीय एवं समर्पित राजवंशों में से माना जाता था।

21 दिसम्बर 1568 को बादशाह अकबर अगारा से दिल्ली के लिए रवाना हुआ। दिल्ली पहुंचकर वह हुमायूँ (HUMAYUN) की कब्र पर गया तथा कुछ दरवेशों की दरगाहों पर उपस्थित हुआ।

10 फरवरी 1569 को बादशाह रणथंभौर पहुंच गया। इस प्रकार चित्तौड़ दुर्ग जीतने के एक वर्ष बाद, फरवरी 1569 में अकबर का रणथंभौर अभियान आरम्भ हुआ। चित्तौड़ अभियान की तरह रणथंभौर अभियान में भी अकबर ने स्वयं रणक्षेत्र में मौजूद रहकर अपनी सेना का नेतृत्व करने का निर्णय लिया।

मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूंनी लिखता है कि शहंशाह अकबर ने किले पर भारी गोलाबारी करवाई। उसने चित्तौड़ की तरह यहाँ भी साबातें बनवाईं ताकि अकबर की सेना किले की दीवारों तक पहुंच सके।

मुल्ला बदायूंनी लिखता है कि लगभग सात-आठ सौ कहारों ने पंद्रह तोपों तथा तोप के दो-तीन क्विंटल तक भारी गोलों को अपने शारीरिक बल से रन नामक पहाड़ी पर पहुंचा दिया। यह पहाड़ी इतनी तीखी थी कि चढ़ाई में चींटी के पैर भी फिसल जाएं। जब गोलाबारी आरम्भ हुई तो बादशाह की सेना ने पहले ही दिन रणथंभौर दुर्ग के भीतर के भवनों को नष्ट कर दिया। इस प्रकार अकबर का रणथंभौर अभियान बड़ी भीषणता के साथ आरम्भ हुआ।

मुल्ला बदायूंनी लिखता है कि राव सुरजन हाड़ा (Rao Surjan Hada) ने जब चित्तौड़ दुर्ग (Chittor Fort) की बर्बादी और किले की रक्षक सेना के अप्रभावी रहने को याद किया, अपने भविष्य को देखा, तो अपने पुत्रों, दूदा एवं भोज को कुछ जमींदारों की मध्यस्थता से शहंशाह को सलाम करने भेजा एवं बादशाह से शरण मांगी।

तब हुसैन कुली खाँ (HUSAIN KULI KHAN) अर्थात् खानेजहाँ रणथंभौर दुर्ग (Ranthambhore Fort) में आया और उसने राव सुरजन को आश्वस्त किया तथा उसे शहंशाह के दरबार में ले आया।

मुल्ला बदायूंनी ने इस दुर्ग पर अकबर (AKBAR) का अधिकार होने का वर्णन बहुत संक्षेप में किया है जबकि अकबर के दरबारी लेखक अबुल फजल (ABUL FAZAL) का विवरण बदायूंनी के विवरण से अधिक विस्तृत एवं अधिक स्पष्ट है।

अबुल फजल लिखता है कि राव सुरजन हाड़ा ने बादशाह के आने की सूचना पाकर अपने दुर्ग को दृढ़ बना लिया तथा इसमें खाद्य सामग्री भरकर लड़ाई के लिए तैयार हो गया।

बादशाह अकबर ने अपने शिविर में से जो एक घाटी में लगा हुआ था बाहर निकलकर और पहाड़ी पर चढ़कर दुर्ग को देखा और समझ लिया कि उसको जीतने के लिए क्या उपाय सोचें जाएं।

अकबर (AKBAR) की आज्ञा से बख्शियों ने इस पहाड़ी के सब ओर तोपों के मोर्चे लगा दिए। अपार सेना ने इस को घेर लिया। दुर्ग में जाना और वहाँ से बाहर आना बंद कर दिया गया। तोपें निरंतर चलने लगीं। दुर्ग की चौतरफा घेराबंदी अकबर का रणथंभौर अभियान की रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा थी।

अबुल फजल लिखता है कि जब रणथंभौर का घेरा चल रहा था, तब मेहंदी कासिम खाँ मक्का से लौटकर आया। उसका चित्त किंचित् विक्षिप्त हो गया था। इसलिए वह गढ़ा से जहाँ का वह शासक था, बिना इजाजत ही चल दिया।

वह लज्जित होकर हज गया तथा वहाँ से ईरान होते हुए कांधार आया और वहाँ से रणथंभौर आकर उसने बादशाह के प्रति अधीनता प्रकट की और उसे इराकी घोड़े भेंट किए। बादशाह ने उसका कृपा-पूर्ण स्वागत किया। उसे खिलअत प्रदान की, सरकार लखनऊ की जागीर प्रदान की तथा उसे भी रणथंभौर के मोर्चे पर नियुक्त कर दिया।

जब बादशाह अकबर की सेना बहुत दिनों तक तोपों से गोलाबारी करती रही और उसका कोई परिणाम नहीं निकला तो बहुत-कुछ विचार करने पर यह विदित हुआ कि साबात के उपयोग के बिना दुर्ग नहीं जीता जा सकता।

इसलिए कासिम खाँ और मीर बहर्रू को आदेश दिया गया कि साबात तैयार करें। राजा टोडरमल को भी साबात के निर्माण की देखभाल करने के लिए नियत किया गया। तब रन की घाटी के निकट एक बड़ा ऊंचा साबात तैयार हो गया। इसके लिए संग-तराशों, लोहारों और खातियों ने बड़ा परिश्रम किया। थोड़े ही समय में साबात किले के बराबर ऊंचा हो गया।

हमने चित्तौड़ दुर्ग के मोर्चे में बादशाह द्वारा बनवाए गए दो मंजिला कोठरियों वाले साबात की चर्चा की थी। वह साबात एक लम्बी सुरंग या छतदार बरामदे जैसा था जिसके भीतर हाथी पर बैठा हुआ सवार अपने हाथ में भाला लेकर चल सकता था।

रणथंभौर में बनाए गए साबात की रचना किसी बरामदे जैसी नहीं थी, अपितु एक ऊँचे चबूतरे या प्लेटफॉर्म या टीले जैसी थी जिस पर चढ़ने के लिए सीढ़ियां भी बनाई गई थीं। इस साबात को इतना ऊंचा बनाया गया था कि उस पर तोपें लगाकर वहाँ से किले के भीतर गोले बरसाए जा सकें।

किसी भी समकालीन लेखक ने यह स्पष्ट नहीं किया है कि अकबर ने रणथंभौर में कितने साबात बनवाए थे। इस तरह के साबात ईसा के जन्म से लगभग 325 साल पहले भारत पर आक्रमण करने वाले सिकंदर ने भी बनवाए थे जिनके ऊपर खड़े होकर सिकंदर के सैनिक दुर्ग की दीवार पर चढ़ जाते थे और फिर रस्सी बांधकर दुर्ग के भीतर उतर जाते थे।

अबुल फजल लिखता है कि जब बादशाह के आदेश से बनाए जा रहे साबात दुर्ग की ऊंचाई तक पहुंच गए तो पत्थरों और लोहे के गोले फेंकने वाले बड़े-बड़े यंत्र ऊपर चढ़ाए गए।

जहाँ बदायूंनी ने लिखा है कि इन यंत्रों को सैनिकों ने अपने शरीर की ताकत से चढ़ाया था, वहीं अबुल फजल (ABUL FAZAL) बैलों का उल्लेख करते हुए लिखता है कि ऐसा एक यंत्र 400 बैलों से खींचा जाता था। यह सात मन का पत्थर फेंक सकता था और 30 मन लोहे का गोला चला सकता था।

अबुल फजल ने लिखा है कि जब ये यंत्र साबात पर जमा दिए गए तब शहंशाह ने गोलियां और तोपें चलाने का हुक्म दिया। जब ये गोले दुर्ग पर जाकर गिरने लगे तो दुर्ग की प्राचीरों में दरारें पड़ गईं और मकान ढेर हो गए।

अबुल फजल ने लिखा है कि 19 मार्च 1569 को अकबर (AKBAR) ने अपने मंत्रियों से कहा कि यदि दुर्ग रक्षक आज हमारी अधीनता प्रकट करने के लिए नहीं आएंगे तो भी कल तक दुर्ग अपना हो जाएगा। इस प्रकारअकबर का रणथंभौर अभियान पूरे जोश के साथ चलता रहा।

✍️ – डॉ. मोहनलाल गुप्ता की पुस्तक तीसरा मुगल जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर (Teesra Mughal Jalaluddin Muhammad Akbar) से।

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