Friday, August 12, 2022

4. औरंगजेब और सवाई जयसिंह

जयसिंह का मनसब

जब राजा भारमल ने अकबर की अधीनता स्वीकार की थी तब उसे प्रारम्भ में ही पांच हजार का मनसब दिया गया था। राजा मानसिंह तथा मिर्जा राजा जयसिंह को सात हजार तक के मनसब दिये गये किंतु औरंगजब ने रामसिंह, बिशनसिंह और जयसिंह को बहुत ही कम मनसब देकर उन्हें आजीवन नीचा दिखाया। औरंगजेब ने जयसिंह को 2000 जात व सवार का मनसब दिया।

दक्षिण से बुलावा

जयसिंह के राज्यभिषेक के कुछ दिनों बाद ही औरंगजेब ने उसे दक्षिण में पहुंचने के आदेश भिजवाने आरम्भ कर दिये परन्तु जयसिंह सेना की भर्ती की आड़ लेकर लगभग डेढ़ वर्ष तक आमेर में ही बना रहा ताकि अपने राज्य की आन्तरिक व्यवस्था को ठीक कर सके। आमेर राज्य के नरूका सामन्तों की गतिविधियों से कुछ क्षेत्रों में जबर्दस्त अशान्ति फैली हुई थी। अतः जयसिंह ने नरूका सामन्तों का दमन कर उन क्षेत्रों में शान्ति और व्यवस्था स्थापित की। इसके बाद उसने सैनिक व्यवस्था तथा राज्य की शासन-व्यवस्था में आवश्यक सुधार किये। 17 नवम्बर 1700 को औरंगजेब ने अपने भाले-बरदार आमेर भेजे ताकि वे जयसिंह को दक्षिण के मोर्चे पर लिवा लावें। जयसिंह ने उन्हें भी आमेर में ही अटका लिया। मार्च 1701 में उसने श्योपुर के गौड़ राजा उत्तमराम के भतीजे उदितसिंह की पुत्री से विवाह कर लिया।

दक्षिण के मोर्चे पर

अंततः जयसिंह ने बुरहानपुर जाने के लिये आमेर से प्रस्थान किया किंतु मार्ग में भारी वर्षा के कारण खानदेश से आगे नहीं बढ़ सका। उस समय औरंगजेब मराठों के विरुद्ध भयानक संघर्ष में उलझा हुआ था। उसने मुगल सल्तनत के समस्त साधन इस संघर्ष में झौंक रखे थे। वह चाहता था कि जयसिंह तत्काल मोर्चे पर पहुंचे किंतु जयसिंह लगातार विलम्ब करता जा रहा था। इसलिये 13 सितम्बर 1701 को औरंगजेब ने धैर्य खोकर राजा जयसिंह (द्वितीय) के मनसब में 500 की कमी कर दी। इस पर जयसिंह भागकर अक्टूबर माह में ही शहजादे बेदारबख्त की सेना में पहुंच गया। जब औरंगजेब ने देखा कि जयसिंह अपने कच्छवाहों को लेकर आ गया है तो औरंगजेब ने उसे शाहजादे बेदारबख्त के साथ पन्हाला दुर्ग की रक्षा के लिये नियुक्त कर दिया तथा स्वयं कोंकण प्रदेश में खेलना दुर्ग की ओर बढ़ गया।

खेलना की विजय

कुछ दिनों बाद औरंगजेब ने शहजादे बेदारबख्त तथा राजा जयसिंह को अपने पास बुला लिया और खेलना दुर्ग की विजय का काम सौंपा। खेलना का चट्टानी दुर्ग मुगलों की गोलाबारी के समक्ष अजेय खड़ा था। मराठे इस दुर्ग की दीवारों से मुगलों के ऊपर भारी पत्थर बरसाते थे जिससे मुगल सैनिक दुर्ग के निकट जाने का साहस नहीं कर पा रहे थे। बेदारबख्त को कोंकणी द्वार के सामने बनी खन्दकों की रक्षा का भार सौंपा गया। बेदारबख्त तथा जयसिंह ने दुर्ग के सामने की पहाड़ी से मोर्चा संभाला। 14 फरवरी 1702 को जयसिंह ने अपने एक उप-सेनापति को कोंकणी द्वार की खिड़की के निकट की मराठा चौकी पर अधिकार करने भेजा। कच्छवाहा सैनिकों की यह टुकड़ी खतरनाक चट्टानों और कंटीली झाड़ियों के बीच रास्ता बनाते हुए मराठा चौकी तक पहुंच गई। इस प्रयास में जयसिंह के बहुत से सैनिक मारे गये किंतु चौकी पर कच्छवाहों का अधिकार हो गया। अब यहाँ से कोंकणी द्वार केवल 15 जरीब रह गया था। 11 मई 1702 को कच्छवाहों ने कोंकणी दुर्ग पर प्रबल प्रहार किया तथा बारली बुर्ज पर अधिकार करके आम्बेर राज्य का झण्डा फहरा दिया। औरंगजेब के लिये यह बहुत बड़ी विजय थी। उसने प्रसन्न होकर 13 मई 1702 को जयसिंह को पुनः 2000 का मनसब बहाल कर दिया जिसमें एक हजार दो अस्पा सवार थे।

औरंगजेब की मक्कारी

खेलना विजय के बाद सितम्बर 1702 में औरंगजेब ने शहजादे बेदारबख्त को औरंगाबाद का सूबेदार तथा खानदेश का नायब सूबेदार नियुक्त किया। 23 नवम्बर 1702 को ये लोग औरंगाबाद पहुंचे। बेदारबख्त ने राजा जयसिंह को खानदेश की सुरक्षा का काम सौंपा। फरवरी 1703 में नीमा सिंधिया खान देश में घुस आया और उसने खरगांव में भारी लूटपाट की। उस समय जयसिंह के पास बहुत कम सेना थी तथा मराठों ने टिड्डियों की भांति आकर अचानक धावा बोला था। इसलिये जयसिंह उनके विरुद्ध कुछ नहीं कर सका। औरंगजेब ने नाराज होकर जयसिंह के मनसब में 500 की कमी कर दी।

देवलघाट के निकट आवा गांव में कूचक खाँ मुगलों की तरफ से थानेदार नियुक्त था। मई 1703 में नीमा सिंधिया ने उस पर हमला किया। बेदारबख्त ने राजा जयसिंह को थानेदार कूचक खाँ की सहायता करने के लिये भेजा। जयसिंह ने मराठों पर जबर्दस्त आक्रमण किया तथा बहुत से मराठा सैनिकों को काट फैंका। मराठों से निबटकर राजा जयसिंह औरंगाबाद आ गया किंतु उसे सूचना मिली कि मराठों ने शहजादे बेदारबख्त को फरदापुर की घाटी में घेर लिया। जयसिंह तुरंत फरदापुर के लिये रवाना हुआ और शहजादे को सुरक्षित निकाल लाया। शीतकाल आरम्भ होते ही नीमा सिंधिया बरार में घुसकर लूटपाट करने लगा। इस पर बेदारबख्त ने फिर से राजा जयसिंह को नीमा के पीछे भेजा। इस बार जयसिंह को अच्छी सफलता मिली। इस कारण 28 जनवरी 1704 को उसका मनसब फिर से 2000 कर दिया गया।

1705 ई. में शहजादे बेदारबख्त को मालवा का सूबेदार बनाया गया। बेदारबख्त ने राजा जयसिंह को मालवा की व्यवस्था करने भेजा। जयसिंह ने बंगाल से वसूली गई मालगुजारी को सुरक्षित रूप से दक्षिण के मोर्चे तक पहुंचाने के व्यापक प्रबंध किये। इससे प्रसन्न होकर शहजादे ने बादशाह से अनुशंसा की कि जयसिंह को मालवा का नायब सूबेदार नियुक्त किया जाये। औरंगजेब ने इसे ‘जायज़ नेस्त’कहकर अस्वीकार कर दिया। औरंगजेब किसी हिन्दू राजा को सूबेदार तो क्या, फौजदार भी नहीं बनाना चाहता था। जयसिंह से तो वह व्यक्तिगत शत्रुता बांध बैठा था। उसने फरमान जारी किया कि जयसिंह मसनद पर न बैठकर ज़मीन पर सूजनी बिछाकर बैठा करे। जब आमेर की राजमाता ने औरंगजेब से प्रार्थना की कि जयसिंह को नगाड़े रखने की अनुमति दी जाये तो औरंगजेब ने उस प्रार्थना को भी अस्वीकार कर दिया। जब शहजादे बेदारबख्त ने जयसिंह को नगाड़े रखने की अनुशंसा स्वीकार करने का अनुरोध किया तब भी औरंगजेब अपने निर्णय पर अटल रहा।

बेदारबख्त ने औरंगजेब के पास दो बार अनुशंसा भिजवाई कि जयसिंह को सेना का व्यय चलाने के लिये चाटसू, दौसा, मोअज्जामाबाद और रेवाड़ी के परगने दे दिये जायें किंतु औरंगजेब ने शहजादे को उत्तर भिजवाया कि जब उसका (जयसिंह का) बाप साँसनी अभियान में दस-बारह हजार की सेना झौंक सकता था तो खजाने और इलाके का स्वामी होकर जयसिंह ऐसा क्यों नहीं कर सकता ! जब यह अनुशंसा दुबारा भिजवाई गई तो औरंगजेब ने उसे ‘ख़म ख़म अस्त’ कहकर ठुकरा दी। औरंगजेब की ऐसी बेरुखी देखकर भी जयसिंह ने हिम्मत नहीं हारी। उसने खुशहाल सिंह से झिलाय का दुर्ग छीन लिया। उन्हीं दिनों मुगल अधिकारी मलारना से मालगुजारी वसूल नहीं कर सके। इस पर औरंगजेब ने मलारना का परगना भी इजारे पर जयसिंह को दे दिया।

बादशाह की अनुमति न मिलने पर भी बेदारबख्त ने मालवा की व्यवस्था का भार जयसिंह को सौंप दिया। जयसिंह ने मालवा प्रान्त की शासन व्यवस्था को सफलतापूर्वक चलाया। उसने अपनी प्रशासनिक क्षमता तथा सैनिक योग्यता का परिचय देकर मुगल व्यवस्था में विशिष्ट स्थान बना लिया। इस दौरान उसे मुगलों एवं मराठों की युद्ध-पद्धतियों को समझने तथा उनसे सम्पर्क बढ़ाने का अवसर मिला। कुछ अवसरों पर उसने मुगलों और मराठों के बीच मध्यस्थता की जिससे उसे शाहू तथा अन्य मराठा सरदारों से मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध बनाने में सफलता मिली। ये मैत्री सम्बन्ध आगे चलकर उसके लिये लाभप्रद सिद्ध हुए। इस अवधि में जयसिंह को मुगलों की निर्बलता का अध्ययन करने का भी अवसर मिला। इन अनुभवों ने उसे राजनैतिक परिपक्वता प्रदान की।

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