Tuesday, October 26, 2021

10. औरंगज़ेब की मक्कारी

औरंगज़ेब जब ऑक्सस के तट पर पहुँचा तो अब्दुल अजीज, दनदनाती तोपें लेकर उसका सामना करने के लिए तैयार था। भयानक ऑक्सस नदी के तट पर खड़े लाखों क्रूर उजबेकों को बंदूकों और तोपों के साथ सन्नद्ध देखकर औरंगज़ेब के सेनापतियों के होश उड़ गए। वहाँ का जलवायु ऐसा न था कि मुगलों के सेनापति कुछ माह भी वहाँ रह सकते।

इसलिए सेनापतियों ने शहजादे को सलाह दी कि दिल्ली और आगरा से इतनी दूर ऑक्सस नदी के तट पर उजबेकों से सामना करते हुए मर जाने में किसी तरह की भलाई नहीं है। बादशाह हुजूर काबुल छोड़कर आगरा लौट चुके हैं। आपको भी यहाँ न रुककर दिल्ली या आगरा में चलकर रहना चाहिए अन्यथा शहजादा दारा शिकोह मुगलों के तख्त को हथिया लेगा और आप यहाँ उजबेकों से लड़ते ही रह जाएंगे।

औरंगज़ेब दुनिया में अपनी तरह का एक ही उदाहरण था। वह सलीके और सादगी से रहने वाला, शराब, वेश्या और जुए जैसे दुर्व्यसनों से दूर रहने वाला, कायदों का पाबंद और पांचों वक्त नमाज पढ़ने वाला जबर्दस्त लड़ाका था। वह अक्सर युद्ध के मैदानों में घोड़े से उतर कर नमाज पढ़ने बैठ जाता ताकि लोग उसे खुदा का बंदा समझ कर उससे खौफ खायें। बाहर से ऐसा धर्मशील दिखाई देने वाला औरंगज़ेब भीतर से पूरा मक्कार और एक नम्बर का धूर्त था।

उसे अपने सेनापतियों और सलाहकारों की बात तुरंत समझ में आ गई। वह तो स्वयं इसी उलझन में था कि बादशाह सलामत, लगातार औरंगज़ेब को आगरा और दिल्ली से दूर रख रहे हैं जबकि दारा शिकोह ने कभी आगरा से बाहर निकलकर देखा तक नहीं।

शाहजहाँ द्वारा अपने बड़े पुत्र दारा शिकोह को केवल एक बार कांधार के मोर्चे पर भेजा गया था और उस मोर्चे पर मुगलों की शर्मनाक हार हुई थी। दारा के तीनों छोटे भाइयों और उनकी पक्षधर शहजादियों ने दारा के विरुद्ध शाहजहाँ के कान भरे थे, फिर भी शाहजहाँ अपने बड़े पुत्र दारा शिकोह को अपने वारिस के रूप में देखता था और उसे अपने से दूर करने को तैयार नहीं था।

शाहजहाँ ने अपने दूसरे पुत्र शाहशुजा को राजधानी से हजारों मील दूर बंगाल में नियुक्त कर रखा था। शाहजहाँ का चौथा तथा सबसे छोटा पुत्र मुराद, गुजरात तथा मालवा का शासक था। इस प्रकार अपने तीनों छोटे भाइयों को राजधानी से दूर करके दारा निष्कंटक राज्य भोग रहा था। इतना ही नहीं, दारा ने इन नियुक्तियों के माध्यम से पूरा प्रबंध किया था दारा के तीनों छोटे भाई कभी भी आपस में न मिल सकें। यह बात औरंगज़ेब को कांटे की तरह सालती थी तथा चौबीसों घण्टे बेचैन किए रहती थी।

वैसे भी औरंगज़ेब की दृष्टि में हिन्दुस्तान की सरसब्ज सरजमीं छोड़कर उजाड़ पहाड़ी इलाकों के लिए जान गंवाना एक बेतुकी सी बात थी। औरंगज़ेब के मन में अपने बाप शाहजहाँ के विपरीत, अपने दादा-परदादा के सपनों को पूरा करने के लिए भावुकता नहीं थी। उसकी निगाह में गंगा-जमना के उपजाऊ मैदान और दक्षिण भारत की सोने, चांदी तथा हीरे-जवाहरात की खानों के सामने ट्रांस-ऑक्सियाना के नुकीले, पथरीले और बर्फीले पहाड़ कुछ भी नहीं थे। इसलिए उसने अब्दुल अजीज से तलवार बजाने का निश्चय त्याग दिया और उसके समक्ष संधि का प्रस्ताव भेजा।

अब्दुल अजीज तो यही चाहता था। उसने मांग रखी कि मुगल, बलख पर फिर से बादशाह नजर मुहम्मद का और बुखारा पर अब्दुल अजीज का अधिकार स्वीकार कर लें और फिर कभी ट्रांस-ऑक्सियाना की तरफ मुँह नहीं करें। यदि मुगल ऐसा करते हैं तो उन्हें बलख से लूटी गई सम्पत्ति अपने साथ ले जाने दिया जायेगा तथा हिन्दुस्तान को लौटती हुई मुगल सेना के साथ कोई छेड़खानी नहीं की जायेगी। औरंगज़ेब ने इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया। यह एक ऐसी संधि थी जिसमें मुगलों को कुछ मिलना नहीं था, अपितु खोना ही खोना था किंतु ट्रांस-अक्यिाना से निकलने की बेसब्री में औरंगज़ेब और उसके सेनापतियों ने इस संधि को स्वीकार कर लिया।

जब आगरा में ये समाचार पहुँचे तो शाहजहाँ ने अपना सिर पीट लिया। वह जब से बलख को जीत कर लौटा था, अपने तख्ते ताउस पर बैठकर फूला नहीं समाता था। वह बार-बार चांदी के उन सिक्कों को मंगवाकर देखता जो उसने बलख विजय के उपलक्ष्य में, बलख में लूटी गई चांदी से ढलवाये थे। इन सिक्कों को देखकर उसे महाराजा रूपसिंह का चेहरा याद हो आता। महाराजा रूपसिंह सचमुच ही मुगलिया सल्तनत का वफादार दोस्त सिद्ध हुआ था जिसने बलख, बुखारा और समरकंद जैसे वे समस्त दुर्गम क्षेत्र शाहजहाँ के कदमों में डाल दिए थे जिन पर शाहजहाँ के पुरखे शताब्दियों तक राज करते आए थे।

 पिछले कुछ महीनों से बादशाह बेसब्री से ट्रांस-ऑक्सियाना के मोर्चे से अच्छे समाचारों के आने की प्रतीक्षा कर रहा था किंतु जब उसे औरंगज़ेब की तरफ से यह संदेश मिला कि वह ऑक्सस नदी के तट पर अब्दुल अजीज से संधि करके वापस आगरा लौट रहा है तो उसने अपना माथा पीट लिया।

जो बाजी महाराजा रूपसिंह ने बड़ी कठिनाई से जीती थी, उसे शहजादे औरंगज़ेब की बेसब्री ने उलट दिया था। अब यह कदापि उचित नहीं रह गया था कि शहंशाह, महाराजा रूपसिंह को शाह अब्बास की सेना के हाथों मरने के लिए बुखारा के मोर्चे पर डटे रहने के लिए कहे। बादशाह ने उसी दिन अपने संदेश वाहक बुखारा के लिए रवाना किए और महाराजा रूपसिंह को आदेश भिजवाया कि एक क्षण भी गंवाये बिना बलख को खाली करके आगरा लौट आएं।

महाराजा रूपसिंह को जब बादशाह का यह फर्मान मिला कि वह बलख खाली करके आगरा लौट आए तो महाराजा के आश्चर्य का पार न रहा। बादशाह के आदेश से वह लगभग दो सालों से उजबेकों का संहार कर रहा था। शाहजहाँ ने उसे बलख का स्वतंत्र शासक घोषित किया था। इस कारण महाराजा को आगरा लौटने की शीघ्रता नहीं थी। अब वह स्वयं उस क्षेत्र का शासक था और उसे वहीं रहकर उजबेकों को मुगलिया सल्तनत का नागरिक बनकर रहने की आदत डालनी थी।

इन दो सालों में उसके भय से हजारों दुर्दांत उजबेक सरदार अपने परिवारों को लेकर दुर्गम पहाड़ियों और जंगलों में भाग गए थे। हजारों उजबेकों ने मुगलों की प्रजा बनकर रहना स्वीकार कर लिया था। फिर भी बादशाह का आदेश पाकर महाराजा रूपसिंह एक बार फिर से आगरा को लौट पड़ा।

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