Wednesday, July 28, 2021

गुहिलों का मुस्लिम शासकों से संघर्ष

आठवीं शताब्दी ईस्वी से मुस्लिम आक्रांता, भारत भूमि पर आक्रमण कर रहे थे तथा भारत में छोटे-छोटे मुस्लिम राज्यों की स्थापना होती जा रही थी। 8वीं से 12वीं शताब्दी ईस्वी के बीच पंजाब, सिंध, दिल्ली, अजमेर, कन्नौज, बनारस, हांसी, सिरसा, समाना, भटिण्डा, नागौर, सांभर तथा कोहराम आदि क्षेत्रों पर मुसलमानों का शासन हो गया। थार के मरुस्थल से लेकर गुजरात तथा मालवा में भी मुसलमान प्रांतपति शासन करने लगे। मुस्लिम आक्रमणों की इस आंधी में हिन्दुओं के छोटे-छोटे राज्य मिट्टी के कमजोर दियों की भांति फड़फफड़ाने लगे जिनमें से कोई दिया अभी बुझ जाता था तो कोई दिया, कुछ समय बाद। ऐसी विकराल आंधी के समक्ष भी मेवाड़ के गुहिल पूरे आत्मविश्वास के साथ टिके रहे। कई बार ऐसे अंधड़ भी आये जिनमें गुहिलों का दीपक बुझता हुआ सा प्रतीत हुआ किंतु इन अंधड़ों के समक्ष, स्वातंत्र्य देवी के आराधक गुहिल, कई बार हारे अवश्य, थके नहीं।

गुहिलों तथा मुसलमानों के बीच प्राचीनतम लड़ाई का उल्लेख ‘खुमांण रासो’[1] में मिलता है जिसके अनुसार खलीफा अलमामूं ने खुमांण के समय में चित्तौड़ पर आक्रमण किया। चित्तौड़ की सहायता के लिये काश्मीर से सेतुबंध तक के अनेक हिन्दू राजा आये तथा खुमांण ने शत्रु को परास्त कर चित्तौड़ की रक्षा की। अब्बासिया खानदान का अलमामूं, ई.813 से 833 के बीच बगदाद का खलीफा हुआ।[2] इधर चित्तौड़ में ई.812-836 तक खुमांण चित्तौड़ का राजा हुआ। अतः चित्तौड़ पर खलीफा की सेना का अभियान ई.813 से 833 के बीच किसी समय हुआ होगा। इस युद्ध के परिणाम के सम्बन्ध में खुमांण रासो के अतिरिक्त अन्य किसी स्रोत से जानकारी प्राप्त नहीं होती किंतु अवश्य ही इस युद्ध में गुहिलों की विजय हुई होगी क्योंकि खुमांण को गुहिलों के इतिहास में इतनी प्रसिद्धि मिली कि मेवाड़ के गुहिलों को खुमांण भी कहा जाने लगा। यदि राजा खुमांण परास्त हुआ होता तो उसे यह विराट गौरव कतई प्राप्त नहीं हुआ होता।

गुहिलों की मुसलमानों से लड़ाई का दूसरा उल्लेख ई.1192 में तराइन के द्वितीय युद्ध के समय मिलता है जब चितौड़ का राजा सामंतसिंह, पृथ्वीराज चौहान की तरफ से लड़ते हुए युद्धक्षेत्र में ही मृत्यु को प्राप्त हुआ।[3] चीरवा से प्राप्त शिलालेख में नागदा नगर के टूटने एवं भूताला में तलारक्ष (नगररक्षक) योगराज के ज्येष्ठ पुत्र पमराज का, सुल्तान[4]  से हुई लड़ाई में मारे जाने का उल्लेख है।[5] इस लड़ाई का विवरण नाटक ‘हंमीरमदमर्दन’ में भी मिलता है। भूताला की लड़ाई के समय जैत्रसिंह[6] , चित्तौड़ का राजा था। इस युद्ध में मुसलमान पराजित होकर भाग गये।

चीरवे तथा घाघसे के शिलालेखों के अनुसार म्लेच्छों का स्वामी भी, जैत्रसिंह का मानमर्दन न कर सका। रावल समरसिंह के आबू के शिलालेख में जैत्रसिंह को तुरुष्क रूपी समुद्र का पान करने के लिये अगस्त्य के समान बताया है।[7] गुहिल शासक समरसिंह[8] के आबू पर्वत के शिलालेख में लिखा है- सिंधुकों (सिंधवालों) की सेना का रुधिर पीकर मत्त बनी हुई पिशाचियों के आलिंगन के आनन्द से मग्न होकर पिशाच लोग रणखेत में अब तक श्रीजैत्रसिंह के भुजबल की प्रशंसा करते हैं। [9] इससे स्पष्ट है कि सिंध क्षेत्र से भी मुसलमानों ने मेवाड़ पर आक्रमण किया जिसमें मेवाड़ ने विजय प्राप्त की। इसके बाद मेवाड़ के राणाओं को निरंतर मुसलमानों से युद्ध करने पड़े। चौदहवीं शताब्दी के आगमन तक चित्तौड़ के गुहिल, मुसलमानों को अपने राज्य से दूर रखने में सफल हुए। गुहिलवंश के राजाओं को चित्तौड़ दुर्ग पर शासन करते हुए 550 वर्ष से अधिक समय हो गया था जब अलाउद्दीन खिलजी ने ई.1303 में चित्तौड़ के राजा रत्नसिंह पर आक्रमण करके उसे मार दिया।[10] रत्नसिंह की रानी पद्मिनी के नेतृत्व में हिन्दू ललनाओं ने जौहर किया। अलाउद्दीन ने चित्तौड़ को तो अधीन कर लिया परंतु जिस पद्मिनी के लिये उसने इतना संहार किया था, उसकी तो चिता की अग्नि ही उसके नजर आई।[11] यह चित्तौड़ का पहला शाका था। रत्नसिंह के साथ ही चित्तौड़ की रावल शाखा का अंत हो गया। लगभग 23 वर्ष तक चित्तौड़ दुर्ग पर खिलजियों का अधिकार रहा। इस अवधि में से प्रथम 9 वर्ष तक खिलजी का पुत्र खिज्रखां चित्तौड़ दुर्ग पर नियुक्त रहा। इसके बाद 14 वर्ष तक खिलजियों की ओर से मालदेव सोनगरा एवं उसका पुत्र नियुक्त रहे। ई.1326 के आसपास गुहिलों की सीसोद जागीर की राणा शाखा के राणा हम्मीर ने चित्तौड़ दुर्ग पर अधिकार कर लिया। [12]

सीसोद के राणा, चित्तौड़ को पाकर महाराणा बन गये। गुहिलों की महाराणा शाखा में एक से बढ़कर एक प्रतापी राजा हुआ जिसने भारत भूमि पर चढ़ कर आये शत्रुओं से लोहा लिया तथा हिन्दू धर्म एवं संस्कृति की रक्षा की। महाराणा क्षेत्रसिंह (ई.1364-1382) प्रतापी राजा हुआ। वह इतिहास में ‘खेता’ के नाम से प्रसिद्ध है। खेता ने मालवा के सुल्तान अमीशाह का विनाश किया। क्षेत्रसिंह ने अपनी तलवार के बल से युद्ध में अमीशाह को जीता, उसकी अशेष यवन सेना को नष्ट किया और उसका सारा खजाना तथा असंख्य घोड़े अपनी राजधानी में ले आया।[13]  क्षेत्रसिंह ने चित्रकूट (चित्तौड़) के निकट यवनों की सेना का संहार कर उसको पाताल पहुँचाया।[14] मालवा का स्वामि शकपति उससे ऐसा पिटा कि स्वप्न में भी उसी को देखता था। सर्परूपी उस राजा (क्षेत्रसिंह) ने मेंढक के समान अमीशाह को पकड़ा था। [15] क्षेत्रसिंह ने अमीसाहिरूपी बड़े सांप के गर्वरूपी विष को निर्मूल किया। [16]

महाराणा लक्षसिंह ( ई.1382-1419 )[17] के शासन काल में मेवाड़ राज्य के जावर क्षेत्र में चांदी की खान निकल आई।[18] इस खान से कई शताब्दियों तक निकाली गई चांदी एवं सीसे से मेवाड़ राज्य, धरती भर के राजाओं में सर्वाधिक धनी राज्यों में से एक बन गया। इसी धन के बल पर महाराणा अपनी प्रजा का पालन करते रहे और अपने शत्रुओं से सफलता पूर्वक लड़ते रहे। महाराणा मोकल (ई.1419-1433)[19] ने ई.1428 में उत्तर के मुसलमान नरपति पीरोज (नागौर के शासक फीरोजखां) पर चढ़ाई कर लीलामात्र से युद्ध क्षेत्र में उसके सारे सैन्य को नष्ट कर दिया। [20] पातसाह अहमद (गुजरात का सुल्तान अहमदशाह) भी रणखेत छोड़कर भागा। [21]

महाराणा कुम्भकर्ण ( ई.1433-68), मेवाड़ का सर्वाधिक प्रतिभा सम्पन्न राजा हुआ। वह ‘कुम्भा’ के नाम से प्रसिद्ध है। उसने मालवा के सुल्तान महमूद खिलजी (प्रथम) को पराजित किया। महमूद की सेना में एक लाख घुड़सवार तथा 1400 हाथी थे। [22] कुम्भा, ने सारंगपुर में असंख्य मुसलमान स्त्रियों को कैद किया, महम्मद का महामद छुड़वाया, उसके सारंगपुर नगर को जलाया और अगस्त्य के समान अपने खंग रूपी चुल्लू से वह मालव समुद्र को पी गया। [23] कुम्भा, महमूद को पकड़कर चित्तौड़ ले आया और छः माह तक कैद में रखकर बिना कुछ लिये, उसे मुक्त कर दिया।[24] कुंभा ने महमद खिलची (महमूद खिलजी) को युद्ध में जीता।[25] अपने कुलरूपी कानन के सिंह राणा कुंभकर्ण ने सारंगपुर[26], नागपुर[27], गागराण (गागरौन), नराणक(नारायणा), अजयमेरु[28], मण्डोर[29], मंडलकर (माण्डलगढ़), बूंदी, खाटू[30], चाटसू आदि सुदृढ़ और विषम किलों को लीलामात्र से विजय किया, अपने भुजबल से अनेक उत्तम हाथियों को प्राप्त किया और म्लेच्छ महीपाल (सुलतान) रूपी सर्पों का गरुड़ के समान दलन किया। प्रचण्ड भुजदण्ड से जीते हुए अनेक राजा उसके चरणों में सिर झुकाते थे। प्रबल पराक्रम के साथ ढिल्ली (दिल्ली)[31] और गुर्जरात्रा (गुजरात)[32] के राज्यों की भूमि पर आक्रमण करने के कारण वहाँ के सुल्तानों ने छत्र भेंट कर उसे ‘हिन्दु सुरत्राण’ का विरुद प्रदान किया। [33]

24 मई 1503 को महाराणा संग्रामसिंह चित्तौड़ की गद्दी पर सुशोभित हुआ। वह अपने युग का सबसे प्रबल हिन्दू शासक था। उसकी सेवा में अनेक हिन्दू राजा रहते थे। कई हिन्दू राजा, सरदार, मुसलमान अमीर, शहजादे आदि उसकी शरण में रहते थे। जिस समय वह मेवाड़ की गद्दी पर बैठा, उस समय दिल्ली में लोदी वंश का शासन था। सांगा ने दिल्ली सल्तनत के कई क्षेत्र, अपने राज्य में सम्मिलित कर लिये किंतु सुल्तान सिकंदर लोदी, सांगा के विरुद्ध कुछ न कर सका। ई.1517 में लोदी की मृत्यु होने पर उसका पुत्र इब्राहीम लोदी दिल्ली का सुल्तान हुआ। उसने उसी वर्ष सांगा पर आक्रमण किया। सांगा ने हाड़ौती की सीमा पर स्थित खातोली गांव के निकट इब्राहीम लोदी की सेना में मार लगाई। इब्राहीम लोदी तो युद्ध क्षेत्र से जान बचाकर भाग गया किंतु उसका एक शहजादा, सांगा के हाथों पकड़ा गया जिसे बाद में सांगा ने छोड़ दिया। इस युद्ध में सांगा का बायां हाथ तलवार से कट गया और घुटने में एक तीर लगने से वह सदा के लिये लंगड़ा हो गया।[34]

ई.1518 में सुल्तान इब्राहीम लोदी की सेना ने पुनः मेवाड़ पर आक्रमण किया। दोनों पक्षों में धौलपुर के निकट लड़ाई हुई। महाराणा ने सुल्तान की सेना को युद्ध के मैदान से भाग जाने पर विवश कर दिया तथा भागती हुई सेना का बयाना तक पीछा किया। इस युद्ध के परिणाम स्वरूप मालवा का कुछ भाग, दिल्ली सल्तनत से निकल कर मेवाड़ राज्य को मिल गया।[35] ई.1519-20 की अवधि में माण्डू के सुल्तान महमूद (द्वितीय) तथा गुजरात के सुल्तान मुजफ्फर की सेनाओं ने अलग-अलग तथा सम्मिलित रूप से सांगा पर कई बार आक्रमण किये किंतु सांगा ने हर बार उन्हें परास्त किया। सांगा ने उनके राज्यों के अनेक हिस्से अपने राज्य में मिला लिये, उन्हें बंदी बनाया तथा उनसे भारी धन वसूल किया।

ई.1526 में मध्य एशिया के समरकंद एवं फरगना के शासक बाबर ने भारत पर आक्रमण किया तथा अपने तोपखाने के बल पर लोदी सल्तनत का अंत कर दिया। ई.1527 में बाबर, महाराणा सांगा की ओर अग्रसर हुआ। भारत के बहुत से प्रांतीय मुस्लिम शासक बाबर की तरफ हो लिये। सांगा ने भी अपने मित्र राजाओं को लड़ाई में भाग लेने के लिये आमंत्रित किया। आम्बेर का राजा पृथ्वीराज, ईडर का राजा भारमल, मेड़ता का राजा वीरमदेव, डूंगरपुर का रावल उदयसिंह, देवलिया का रावत बाघसिंह, बीकानेर का राजकुमार कल्याणमल, जोधपुर का राजा गांगा[36], सांगा का भतीजा नरसिंहदेव, अंतरवेद से चंद्रभाण चौहान और माणिकचंद चौहान, तथा अनेक प्रसिद्ध सरदार- दिलीप, रावत रत्नसिंह कांधलोत (चूंडावत), रावत जोगा सारंगदेवोत, नरबद हाड़ा मेदिनीराय, वीरसिंह देव, झाला अज्जा, सोनगरा रामदास, परमार गोकुलदास, खेतसी आदि अपनी-अपनी सेनाएं लेकर आये। अलवर का शासक हसनखां मेवाती और इब्राहीम लोदी का पुत्र महमूद लोदी भी सांगा की तरफ आ गये। इस प्रकार सांगा की सेना में बहुत बड़ी संख्या में सैनिक हो गये। [37]

युद्ध आरम्भ होने से पहले हुई झड़पों में महाराणा के सैनिकों ने बाबर के सैनिकों में ऐसी मार लगाई कि बाबर की सेना में महाराणा का आतंक फैल गया किंतु झूठी कस्में खाकर बाबर किसी तरह अपनी सेना को खानवा के मैदान में खींच लाया। 27 मार्च 1527 को मुगलों ने अपने तोपखाने से, राजपूत सेना पर गोलों तथा जलते हुए बारूद की वर्षा आरम्भ कर दी। दुर्भाग्य से महाराणा, युद्ध के आरंभ में ही घायल होकर अचेत हो गया तथा उसकी सेना नेतृत्वविहीन हो गई। इस कारण कुछ ही देर चले युद्ध में बाबर की तोपें और बंदूकें जीत गईं तथा हिन्दुओं के तीर-कमान, तलवारें और भाले हार गये। महाराणा के सरदार, उसे रणक्षेत्र से निकालकर सुरक्षित स्थान पर ले गये। उदयसिंह, हसनखां मेवाती, माणिकचंद चौहान, चंद्रभाण चौहान, रत्नसिंह चूण्डावत, झाला अज्जा, रामदास सोनगरा, परमार गोकलदास, रायमल राठौड़, रत्नसिंह मेड़तिया और खेतसी आदि इस युद्ध में मारे गये।[38] इस युद्ध में सांगा हार गया तथा बाबर का आगरा एवं दिल्ली पर अधिकार पक्का हो गया। अब उसे भारत में चुनौती देने योग्य कोई शक्ति शेष नहीं बची थी।

संग्रामसिंह के बाद रत्नसिंह (ई.1528-31), मेवाड़ का महाराणा हुआ। मालवा के सुल्तान महमूद ने अपने सेनापति शरजहखां को मेवाड़ का इलाका लूटने के लिये भेजा। महाराणा ने भी मालवा पर चढ़ाई कर दी और संभल को लूटता हुआ सारंगपुर तक पहुँच गया। इस पर शरजहखां लौट गया और महमूद भी उज्जैन से माण्डू चला गया।[39] जब महाराणा खरजी की घाटी पहुँचा तो गुजरात का सुल्तान बहादुरशाह महाराणा की सेवा में उपस्थित हुआ। सुल्तान ने महाराणा को 30 हाथी एवं बहुत से घोड़े भेंट किये तथा महाराणा और उसके सरदारों को 1500 जरदोरी खिलअतें प्रदान की। महाराणा ने अपने कुछ सरदार, बहादुरशाह के साथ कर दिये और स्वयं चित्तौड़ लौट आया। [40] बहादुरशाह ने माण्डू जाकर, महमूद का राज्य, गुजरात राज्य में मिला लिया तथा महमूद को कैद करके ले गया। [41]

रत्नसिंह के बाद विक्रमादित्य (ई.1531-36) मेवाड़ का महाराणा हुआ। दुर्भाग्य से वह अयोग्य राजा था उसमें रघुवंशियों तथा गुहिलों जैसा प्रताप न था। उसने अपने सेवकों के साथ, दरबार में सात हजार पहलवानों को रख लिया जिनके बाहुबल पर उसको अधिक विश्वास था और अपने छिछोरेपन के कारण वह सरदारों की दिल्लगी उड़ाया करता था, जिससे अप्रसन्न होकर वे अपने-अपने ठिकानों में चले गये और राज्यव्यवस्था बहुत बिगड़ गई।[42] इस स्थिति का लाभ उठाने के लिये ई.1532 में गुजरात के सुल्तान बहादुरशाह ने मेवाड़ पर दो अभियान किये। महाराणा विक्रमसिंह, चित्तौड़ की रक्षा में असमर्थ था इसलिये राजामाता कर्मवती ने बहादुरशाह को विपुल धन एवं अमूल्य वस्तुएं देकर चित्तौड़ दुर्ग को बचाया। 24 मार्च 1533 को बहादुरशाह ये सब वस्तुएं लेकर चित्तौड़ से लौट गया।[43] कुछ समय बाद बहादुरशाह फिर चित्तौड़ पर चढ़कर आया। महाराणा विक्रमादित्य तथा कुंवर उदयसिंह को दुर्ग छोड़कर जंगलों में चले जाना पड़ा। दुर्ग में स्थित हिन्दू ललनाओं ने राजमाता कर्मवती के नेतृत्व में जौहर किया। [44] हजारों हिन्दू सैनिकों ने बहादुरशाह की सेना से लड़ते हुए प्राण गंवाये। बहादुरशाह ने चित्तौड़ का दुर्ग जलाकर राख कर दिया। यह चित्तौड़ दुर्ग का दूसरा शाका था।[45] जब हुमायूं को ज्ञात हुआ कि चित्तौड़ का पतन हो गया तो वह बहादुरशाह के विरुद्ध कार्यवाही करने के लिये आगे बढ़ा।[46] बहादुरशाह का सेनापति रूमीखां गुप्तरूप से हुमायूं से मिल गया।[47] मंदसौर के निकट हुमायूं तथा बहादुरशाह की सेनाओं के बीच युद्ध हुआ। बहादुरशाह पराजित होकर माण्डू भाग गया। हुमायूं ने उसका पीछा किया जिससे बहादुरशाह माण्डू से चांपानेर और खम्भात होता हुआ दीव के टापू में पुर्तगालियों के पास गया जहाँ से लौटते समय नाव उलटने से समुद्र में ही डूबकर मर गया। [48]

जब चित्तौड़ दुर्ग में स्थित बहादुरशाह की सेना को सुल्तान के मरने की सूचना मिली तो वे दुर्ग छोड़कर भाग गये। मेवाड़ के सरदारों ने पांच-सात हजार सैनिकों को एकत्रित करके चित्तौड़ दुर्ग पर अधिकार कर लिया। महाराणा विक्रमादित्य तथा कुंवर उदयसिंह भी दुर्ग में आ गये। ई.1537 में विक्रमादित्य का छोटा भाई उदयसिंह, चित्तौड़ का महाराणा हुआ।[49] उसके समय में ई.1543 में शेरशाह सूरी ने चित्तौड़ के विरुद्ध अभियान किया। इस समय महाराणा उदयसिंह में इतनी शक्ति नहीं थी कि वह शेरशाह का मार्ग रोक सके। इसलिये जब शेरशाह, चित्तौड़ से केवल 12 कोस दूर रह गया तो उदयसिंह ने उसे चित्तौड़ दुर्ग की चाबियां भिजवा दीं। शेरशाह, चित्तौड़ आया तथा खवासखां के छोटे भाई मियां अहमद सरवानी को वहाँ छोड़कर स्वयं लौट गया। [50]


[1] खुमांणरासो नामक ग्रंथ, दलपति विजय ने ई.1712 के लगभग लिखा। यह प्राचीन ख्यातों के आधार पर लिखा गया है। इस कारण इसे अधिक विश्वसनीय नहीं माना जाता।

[2] जेम्स टॉड, एनल्स एण्ड एण्टिक्विटीज ऑफ राजस्थान (विलियम क्रुक द्वारा सम्पादित), भाग-1, पृ. 282; ओझा, पूर्वोक्त, भाग-1, पृ. 118-20.

[3] अनेक ख्यातों में इस राजा का नाम समरसिंह (समरसी) लिखा गया है जिसके आधार पर पृथ्वीराज रासो तथा राजप्रशस्ति महाकाव्य में भी यही नाम दोहरा दिया गया है किंतु समरसिंह इस युद्ध के लगभग 80 साल बाद (ई.1273 से 1302 के बीच) हुआ। अनुमान है कि तराइन की दूसरी लड़ाई में लड़कर काम आने वाला राजा सामंतसिंह (सामंतसी) था जो पृथ्वीराज चौहान का समकालीन था। मिलता-जुलता नाम होने से, ख्यातों में गलती से सामंतसी को समरसी (समरसिंह) लिखा दिया गया।

[4] हंमीरमदमर्दन नाटक में इस आक्रांता का नाम हंमीर (अमीर) तथा मीच्छ्रीकार (अमीरशिकार) लिखा है। अनुमान होता है कि यह कुतुबुद्दीन ऐबक का गुलाम अल्तमश था जिसे ऐबक ने अमीरशिकार के पद पर नियुक्त किया था।

[5]  भूताला, मेवाड़ की प्राचीन राजधानी नागदा के निकट स्थित एक छोटा सा गांव है।

[6] इस राजा के शिलालेख ई.1213 से ई.1253 तक के मिले हैं।

[7] रावल समरसिंह का आबू शिलालेख।

[8]  इस राजा के शिलालेख ई.1273 से ई.1302 के बीच की अवधि के मिले हैं।

[9] इंडियन एंटिक्वेरी, वोल्यूम 16, पृ. 349-50; भावनगर प्राचीन शोध संग्रह, पृ. 25, उद्धृत ओझा, पूर्वोक्त, पृ. 164-65.

[10] मुहणोत नैणसी की ख्यात, पत्र 3, पृ. 2; अमीर खुसरो, तारीखे अलाई, उद्धृत, ओझा, पूर्वोक्त, पृ. 181.

[11] जेम्स टॉड, पूर्वोक्त, जिल्द-1, पृ. 310-11.

[12] ओझा, पूर्वोक्त, पृ. 233-34.

[13] शृंगी ऋषि शिलालेख, ई.1428; उद्धृत, ओझा, पूर्वोक्त, पृ. 250.

[14] महाराणा कुम्भा की कीर्तिस्तम्भ प्रशस्ति, श्लोक 22.

[15] कुम्भलगढ़ की प्रशस्ति, श्लोक 200-202; यही श्लोक एकलिंग महात्म्य में संख्या 100 एवं 106 पर दिये गये हैं किंतु उनका क्रम बदला हुआ है।

[16] एकलिंग मंदिर के दक्षिण द्वार की महाराणा रायमल के समय की ई.1488 की प्रशस्ति।

[17] शिलालेखों एवं ताम्रपत्रों के आधार पर महाराणा लक्षसिंह का निधन ई.1419 से 1421 के बीच होना अनुमानित है।

[18] ओझा, पूर्वोक्त, पृ. 260.

[19]  महाराणा मोकल ई.1419 से 1421 के मध्य किसी समय गद्दी पर बैठा।

[20] चित्तौड़ दुर्ग में लगा महाराणा मोकल का शिलालेख, श्लोक 51; एपिग्राफिया इण्डिका, वोल्यूम. 2, पृ. 417.

[21] शृंगी ऋषि का लेख, श्लोक 14.

[22] ओझा ने इस संख्या में संदेह व्यक्त किया है।

[23] कुम्भलगढ़ की प्रशस्ति, श्लोक 268-69.

[24] श्यामलदास, वीर विनोद, भाग-1, पृ. 320; नैणसी की ख्यात, पत्र 108, पृ. 2.

[25] एकलिंग महात्म्य, राजवर्णन अध्याय, श्लोक 156.

[26]  सारंगपुर मालवा में है। यहाँ कुंभकर्ण ने माण्डू के सुलतान महमूदशाह खिलजी (प्रथम) को परास्त किया।

[27] मारवाड़ में स्थित नागौर, यहाँ महाराणा ने फीरोजखां को परास्त किया।

[28] महाराणा ने मुसलमानों से अजमेर छीन लिया।

[29] राठौड़ों के मण्डोर राज्य पर महाराणा कुम्भा का 15 साल तक अधिकार रहा।

[30] संभवतः जयपुर राज्य का खाटू।

[31] उस समय दिल्ली पर सैयद मुहम्मदशाह का शासन था।

[32] उस समय गुजरात पर अहमदशाह (प्रथम) का शासन था।

[33] राणकपुर जैन मंदिर का शिलालेख ई.1439; एन्युअल रिपोर्ट ऑफ दी आर्कियालॉजिकल सर्वे ऑफ इण्डिया, ई.1907-08, पृ. 214-15.

[34] श्यामलदास, पूर्वोक्त, भाग-1, पृ. 354; हरबिलास शारदा, पूर्वोक्त, पृ. 56.

[35] ओझा, पूर्वोक्त, पृ. 353.

[36] इस युद्ध में गांगा स्वयं नहीं गया था। उसने अपने 4000 सैनिक, मेड़ता के राजा वीरमदेव की अध्यक्षता में भेजे थे। वीरमदेव के भाई रायमल और रत्नसिंह इसी युद्ध में काम आये थे।

[37] किसी भी ग्रंथ में विश्वसनीय संख्या उपलब्ध नहीं होती है। बाबर ने सांगा के पक्ष के सैनिकों की संख्या 2,22,000 लिखी है जबकि बाबर अपनी सेना की संख्या के बारे में मौन है।

[38] तुजुके बाबरी, एच. बैवरिज कृत अंग्रेजी अनुवाद, पृ. 573; श्यामलदास, पूर्वोक्त, भाग-1, पृ. 366.

[39] मुहम्मद कासिम फरिश्ता, तारीखे फरिश्ता (जॉन ब्रिग्ज कृत अंग्रेजी अनुवाद-हिस्ट्री ऑफ दी राइज ऑफ दी मुहम्मदन पॉवर इन इण्डिया), जि. 4, पृ. 264-65; मुंशी देवीप्रसाद, महाराणा रतनसिंघजी का जीवनचरित्र, पृ. 50-51.

[40]  बेले, हिस्ट्री ऑफ गुजरात, पृ. 347-50; फरिश्ता, पूर्वोक्त, पृ. 266-67.

[41] बेले, पूर्वोक्त, पृ. 352-53.

[42] ओझा, पूर्वोक्त, पृ. 394.

[43] बेले, पूर्वोक्त, पृ. 371-72.

[44]  श्यामलदास, पूर्वोक्त, भाग-2, पृ. 31.

[45] ओझा, पर्वोक्त, पृ. 399.

[46]  अनेक लेखकों ने इस बात को बहुत बढ़ा-चढ़ाकर लिखा है कि राजमाता कर्मवती ने हुमायूं को राखी भेजी तथा हुमायूं कर्मवती की रक्षा के लिये आया। कर्मवती ने राखी अवश्य भेजी थी किंतु हुमायूं, चित्तौड़ की रक्षा के लिये नहीं अपितु इसलिये ग्वालियर आकर बैठ गया था कि जब बहादुरशाह तथा चित्तौड़ में से किसी एक पक्ष का पतन हो जाये तो शेष बचे दूसरे पक्ष से हुमायूं सरलता से निबट सके। यह भी सत्य है कि जब बहादुरशाह को ज्ञात हुआ कि कर्मवती, हुमायूं से सहायता प्राप्त करने का प्रयास कर रही है तो बहादुरशाह ने हुमायूं को पत्र लिखकर चेतावनी दी कि इस समय मैं जेहाद पर हूँ अगर तुम हिन्दुओं की सहायता करोगे तो खुदा के सामने क्या जवाब दोगे?

[47] बेले, पूर्वोक्त, पृ. 383-84.

[48] बेले, पूर्वोक्त, पृ. 386-97.

[49]  श्यामलदास, पूर्वोक्त, भाग-2, पृ. 60-63.

[50] अब्बास खाँ सरवानी, तारीखे शेरशाही; एच. डब्लू. इलियट, हिस्ट्री ऑफ इण्डिया, जि. 4, पृ. 406.

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