Tuesday, October 26, 2021

5. भाग्य की विडम्बना

किशनगढ़ रियासत के संस्थापक महाराजा किशनसिंह की हत्या हुए अभी कुल तेरह साल ही हुए थे। इस संक्षिप्त अवधि में उसके तीन पुत्र- सहसमल, जगमालसिंह और भारमल मृत्यु के मुख में समा चुके थे। इन तीनों की मृत्यु केवल छः माह की संक्षिप्त अवधि में ही हुई। अपने भाई सहसमल की भांति जगमालसिंह भी निःसंतान ही मृत्यु को प्राप्त हुआ था। इस कारण स्वर्गीय महाराजा किशनसिंह का चौथा और सबसे छोटा पुत्र हरिसिंह बाईस साल की आयु में किशनगढ़़ का शासक हुआ।

शाहजहाँ ने अपने इस ममेरे भाई को एक हजार जात तथा आठ सौ सवारों का मनसब देकर अपनी चाकरी में रख लिया। वह भी प्राण-प्रण से मुगल साम्राज्य की सेवा में लग गया।

शाहजहाँ अय्याश किस्म का बादशाह था। उसकी नौ बेगमें और अनगिनत चहेतियां थीं जिनसे उसे ढेरों औलादें हुई थीं। उसकी तीसरी बेगम मुमताज महल के पेट से चौदह औलादें जन्मी थीं। वह औलाद जन्मते-जन्मते ही मरी थी किंतु शाहजहाँ की अधिकांश औलादें जवान होने से पहले ही मर गई थीं।

समय आने पर शाहजहाँ के चार पुत्रों, दारा शिकोह, शाह शुजा, औरंग़ज़ेब और मुराद बख्श ने जवानी की दहलीज पर पैर रखा। शाहजहाँ को उनकी आँखों में अपने बाप शाहजहाँ के तख्ते ताउस, कोहिनूर हीरे तथा दिल्ली के लाल किले की लालसा तड़पती हुई दिखाई देती तो वह आने वाले भविष्य का विचार करके कांप जाता। इसलिए जब शाहजहाँ को  शासन करते हुए छः साल हो गए तो उसने अपने बड़े पुत्र दारा शिकोह को सल्तनत का वली-ए-अहद घोषित कर दिया ताकि शहजादों के बीच की प्रतिस्पर्द्धा को कम किया जा सके।

शाहजहाँ की चार बेटियां, पुरहुनार बेगम, जहांआरा बेगम, रोशनारा बेगम और गौहरा बेगम भी अब जवान हो गई थीं। अकबर के समय से मुगल शहजादियों के विवाह की परम्परा समाप्त कर दी गई थी ताकि मुगलिया खानदान के जंवाई, बागियों के साथ मिलकर सल्तनत की जड़ें न खोद सकें। इस कारण मुगल शहजादियों को मालूम था कि उन्हें पूरा जीवन इसी लाल किले में बिताना है इसलिए उन्होंने भी अपने भाइयों के साथ मुगलिया राजनीति के खूनी खेल में भाग लेना आरम्भ कर दिया था। हालांकि वे अपना खेल छिपे तौर पर खेलती थीं।

शाहजहाँ की चारों शहजादियाँ भी अपने भाइयों के साथ मिलकर अपने बाप शाहजहाँ के तख्ते ताउस, कोहिनूर हीरे तथा दिल्ली के लाल किले की मालकिन बनने का ख्वाब देखा करती थीं। इसलिए चारों बहनों ने एक-एक भाई का दामन पकड़ लिया था। जहांआरा ने दारा शिकोह से, रोशनआरा ने औरंगज़ेब से, गौहर आरा ने मुराद से और पुरहुनार बेगम ने शाहशुजा से राजनीतिक सांठ-गांठ कर ली थी। प्रत्येक बहिन चाहती थी कि उसके पक्ष का भाई अगला बादशाह हो। इसलिए प्रत्येक शहजादी ने अपने पक्ष के भाई को बादशाह बनाने के लिए राजनीतिक शतरंज की गोटियां बिछानी आरम्भ कर दीं।

इस कारण शाहजहाँ अपने बड़े पुत्र दारा शिकोह के अतिरिक्त और किसी को भी अपनी राजधानी दिल्ली में नहीं रहने देता था। उसने प्रत्येक शहजादे के साथ कुछ मुस्लिम अमीर तथा कुछ हिन्दू राजा नियुक्त कर दिए थे ताकि शहजादों को नियंत्रण में रखा जा सके।

1639 ईस्वी में शाहजहाँ ने किशनगढ़ नरेश हरिसिंह को शहजादे शाहशुजा के साथ विद्रोहियों को दबाने के लिए बंगाल की तरफ भेजा। इस युद्ध में महाराजा हरिसिंह ने भारी बहादुरी दिखाई जिससे प्रसन्न होकर बादशाह ने अगले ही साल उसे शहजादे दारा शिकोह के साथ कांगड़ा का विद्रोह दबाने के लिए भेजा।

इस प्रकार पूरे सोलह साल तक महाराजा हरिसिंह मुगलों के लिए लड़ाइयाँ करता रहा। वह एक अच्छा चित्रकार था और युद्ध के मोर्चे पर भी अवसर मिलते ही अपनी तूलि, रंग और कागज लेकर बैठ जाता था। अंत में 1644 ईस्वी में वह काबुल के मोर्च पर क्षत्रिय धर्म का निर्वहन करते हुए निःसंतान ही चिरनिद्रा में सो गया।

महाराजा किशनसिंह की हत्या हुए अब उन्तीस साल बीत चुके थे। उसके चारों ही पुत्र मृत्यु के सुखदायी अंक में सो चुके थे जिनमें से पहले, दूसरे और चौथे पुत्र को राजसिंहासन पर बैठने का सुख मिला था किंतु संतान का सुख उनके भाग्य में नहीं था, वे निःसंतान ही मरे। 

तीसरा पुत्र भारमल ही एकमात्र ऐसा राजकुमार था जिसे राजगद्दी पर बैठने का सौभाग्य तो नहीं मिला किंतु किशनगढ़ रियासत का वंश चलाना इसी राजकुमार के भाग्य में लिखा था। इस राजकुमार के चौदह वंशजों ने पूरे तीन सौ तीन साल तक किशनगढ़ रियासत पर शासन किया। भाग्य की विडम्बना संभवतः इसी को कहते हैं।

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2 COMMENTS

  1. Bahut hi Rochak jankari hai.. abhi tak main sirf Shahjahan aur Mumtaz Mahal ke alawa Tazmahal kaise aur kitne samay main bana uske baad Shahjahan ka kya hua ye jankari bhi kahi na kahi se kuch lekh padh kar prapt hui thi
    lekin uske poorv ki jo shahjahan ki aur Any santano ke bare main aap ke is lekh ko padh kar hi jaan paya…aap ka Dhanyabaad hume Itihase se avgat karane ke liye…

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