सैयद मूसा और मोहिनी की प्रेम-कथा मुगलों के इतिहास में कोई स्थान नहीं रखती किंतु इस कथा से इतना तो ज्ञात होता ही है कि अकबर के समय में भी मुसलमान शोहदे हिन्दू लड़कियों को अपने प्रेम जाल में फंसा कर उन्हें घर से भगा ले जाते थे।
बादशाह अकबर (AKBAR) ने फतेहपुर सीकरी की पहाड़ी पर एक विशाल मस्जिद तथा किले का निर्माण करवाया। बादशाह द्वारा आगरा को छोड़कर सीकरी पर ध्यान केन्द्रित करने का कारण संभवतः यह था कि सीकरी के सूफी दरवेश शेखुल इस्लाम अर्थात् सलीम चिश्ती से अकबर के सम्बन्ध काफी प्रगाढ़ हो गए थे।
इस कारण बादशाह आगरा छोड़कर फतेहपुर सीकरी में रहने लगा। जिस समय अकबर रणथंभौर के अभियान पर जा रहा था, उस समय आगरा के लाल किले में एक ऐसी घटना घटित हुई जिसका उस काल की राजनीति में अधिक महत्व नहीं है किंतु यह घटना सोलहवीं शताब्दी ईस्वी में आगरा में लाल किले के भीतर के सामाजिक जन-जीवन पर किंचित् प्रकाश डालती है। संभवतः इसीलिए मुल्ला कादिर ने इस घटना का प्रमुखता से वर्णन किया है।
सैयद मूसा और मोहिनी की प्रेम-कथा
मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूंनी ने अपनी पुस्तक मुंतखब उत् तवारीख में लिखा है कि कालपी का शासक सैयद मूसा शहंशाह अकबर (AKBAR) को सलाम करने के लिए आया। वह एक हिन्दू सुनार की पत्नी मोहिनी पर मोहित हो गया। उसका रूप भी सौ टका टंच सोने जैसा था। उसके शुद्ध दृष्टि-जाल ने सैयद को एक प्रेमी की तरह आकृष्ट किया और दोनों ओर से प्रेम बंधन मजबूती के साथ पैदा हो गया।
सैयद मूसा और मोहिनी के चर्चे
कुछ ही दिनों में सैयद मूसा और मोहिनी का यह प्रसंग इतना चर्चित हो गया कि आगरा की गली-गली में उनकी बात होने लगी। जब रणथंभौर का अभियान शुरु हुआ तो सैयद मूसा पीछे रुक गया। अर्थात् वह बादशाह के साथ रणथंभौर अभियान पर नहीं गया। उसने आगरा के किले के अंदर अपनी प्रेमिका के घर के आसपास जमना किनारे एक मकान किराए पर ले लिया।
यह मकान मीर सैयद जलाल मुवक्किल के घर के पास था। सैयद और मोहिनी का मसला पागलपन के स्तर तक पहुंच गया। सैयद मूसा और मोहिनी की दूरी दो साल चार महीने तक रही, फिर भी वे एक-दूसरे को देखकर संतोष कर लेते। एक-दो बार जब सैयद अपने विश्वसनीय साथियों के साथ प्रेमिका के घर के बाहर गया तो या तो चौकीदारों के हाथों पड़ गया या उसकी जाति के सुनारों के हाथों आ गया।
मोहिनी के परिवार वालों ने सैयद की पिटाई कर दी और मोहिनी को घर से बाहर निकलने पर रोक लगा दी। इस कारण दो साल और चार महीने तक वे दूर से ही एक दूसरे को देखकर संतोष कर लेते।
मोहिनी का सयैद को निमंत्रण
एक रात उस मोहक महिला ने सैयद को रात के समय मकान की छत पर आने के लिए संकेत किया। इस पर सैयद ने रात के समय एक मजबूत कमंद मोहिनी के घर की छत पर फेंकी और नट की तरह उस पर चढ़ गया। इस प्रकार पूरी रात उन्होंने पवित्र प्यार में बिताई। सैयद मूसा के भाई सैयद शाही को जब इस घटना के बारे में ज्ञात हुआ तो उसने एक कविता लिखी जो इस प्रकार थी-
हृदय में इच्छाओं का कितना भी उबाल आ रहा हो
शालीनता ने सावधान किया, संयमित रहो।
आंखों के आगे जीवन जल का अथाह सागर है
किंतु आपके पीने के लिए एक बूंद भी नहीं।
उनके हृदय दावानल में सीमांत तक जले
किंतु उनके होठ उच्च आदर्श पालन में सिले रहे।
पूर्णतः एकांत का एक स्थान, और दो प्रेमी प्रेमरत
उनके हृदय एकाकार शरीर फिर भी विलग।
यह कविता बहुत लम्बी है, इसका अंत इन शब्दों से हुआ है-
सैंकड़ों प्रेम स्पर्शों एवं फुसलावों के साथ अंततः
उन्होंने हजारों रहस्यों के द्वार खोले
और जब देखा कि प्रभात निकट है
उन्होंने एक दूसरे से अलविदा कहा।
मोहिनी का गृहत्याग
मुल्ला बदायूंनी लिखता है कि विदाई के समय में कुछ ऐसा हुआ कि प्रेमिका ने नींद के आगोश से उठते हुए अपने घर-मकान को अलविदा कह दिया, और लोकलाज छोड़ अपने प्रेमी सैयद के साथ चल पड़ी जैसे चांदनी चांद के साथ और आदमी की छाया आदमी के साथ। सैयद मूसा और मोहिनी की यह कथा आगरा से फतहपुर तक फैल गई और लोग इसे चटखारे लेकर सुनाने लगे।
मोहिनी ने सैयद से कहा कि मैं जीवन भर तुम्हारे साथ प्रेम-बंधन में रहना चाहती हूँ। हमारे बारे में किसी को पता नहीं चलेगा यदि हम थोड़ी सावधानी रखते हुए छत से नीचे उतर जाएं और सुबह होने से पहले दूर निकल जाएं।
इस पर सैयद उस मोहिनी को अपने साथ लेकर सुनार के घर से निकल गया और अपने घर न जाकर अपने एक मित्र के घर में छिप गया। तीन दिनों तक सैयद मूसा और मोहिनी उस घर में छिपे रहे। अंत में सुनार के घर वालों ने उस स्त्री को ढूंढ लिया।
मोहिनी की गृहवापसी
मुल्ला लिखता है कि सैयद मूसा के घर को महिला के सम्बन्धियों ने अंगूठी की तरह घेर लिया और मूसा पर कई आरोप लगाए। पहले तो उस महिला ने अपने परिवार के साथ वापस लौटने से इन्कार कर दिया किंतु महिला के पिता ने कहा कि यदि तू वापस घर नहीं चलेगी तो हम सैयद की शिकायत हाकिम से करेंगे। हाकिम सैयद को फांसी पर चढ़ा देगा। इस पर महिला को सैयद के जीवन की चिंता हुई और वह अपने पिता के साथ उसके घर चली गई।
मुल्ला बदायूंनी लिखता है कि उस महिला ने अपने घर वालों को सुनाने के लिए एक कहानी बनाई कि मैं उस रात को जब गहरी नींद में थी, तब एक रूपवान पुरुष ने जिसको सपने में भी किसी ने न देखा होगा, मुझे हाथ पकड़कर ले गया और मैं सपनों के संसार से कल्पना लोक में चली गई और मेरी नींद जाग में बदल गई। तब मैंने उसके सिर पर एक रत्नजड़ित मुकुट देखा। उसके सीने पर दो प्रकाश-पंख थे।
उसने मुझ पर मंत्रों का उच्चारण किया जैसे कोई तांत्रिक करता है। उसने मुझे अपनी सुंदरता से मोहित कर दिया और मुझे अपने पंखों में समेट लिया। इसके बाद वह मुझे किसी ऐसे नगर में ले गया जैसा नगर परियों की कहानियों में होता है।
उसने मुझे एक ऊंची मीनार में रख दिया जिसमें हर प्रकार की अजीब और अजनबी चीजें रखी हुई थीं। हर कोने में परीजादों की टुकड़ियां तैयार थीं।
मुल्ला बदायूंनी लिखता है कि बेवकूफ हिंदुओं ने इस खूबसूरत धोखे पर विश्वास कर लिया। अच्छा होता कि यदि वे इस मसले को छिपाकर रखते किंतु उन्होंने उस खूबसूरत मोहिनी को लोहे की जंजीरों से बांध दिया और ऊपर के कमरे में ताला-चाबी में बंद कर दिया।
इस कारण इस बात की खबर लाल किले में रहने वाले प्रत्येक आदमी को हो गई। लोग चटखारे लेकर यह बात एक-दूसरे को बताने लगे।
मोहिनी का सैयद मूसा को संदेश
एक दिन किसी तरह उस मोहिनी ने सैयद के पास अपनी एक दूती के माध्यम से संदेश भिजवाया कि मैं हजारों परेशानियों और प्रताड़नाओं के बीच बहाने बना-बनाकर और स्पष्टीकरण दे-देकर अपने निंदकों से बच रही हूँ।
जब सैयद को मोहिनी से मिलने की आशा नहीं रही तो वह शहंशाह अकबर (AKBAR) से मिलने के लिए रणथंभौर के लिए रवाना होने की तैयारी करने लगा।
मोहिनी का फिर से गृहत्याग
जब मोहिनी को यह ज्ञात हुआ तो उसने फिर से अपनी दूती को सैयद के पास भेजकर कहलवाया कि तुम शाम के समय भिखारी के भेस में मेरे घर भीख मांगने के लिए आना। उस समय मैं तुम्हें भीख देने के लिए बाहर आउंगी और तुम्हारे साथ निकल जाउंगी।
सैयद ने मोहिनी को ले भागने की तैयारी की और शाम के समय भिखारी का भेस धरकर मोहिनी को भगा लाया। तीन दिनों तक शहर में छिपे रहने के बाद सैयद मूसा और मोहिनी फतहपुर और बिवाना की तरफ रवाना हो गए।
शिवकानपुर के काजी की बदमाशी
सैयद मूसा और मोहिनी जब मार्ग में थे, तब उस औरत के रिश्तेदारों ने उन दोनों को घेर लिया। मुल्ला बदायूंनी लिखता है कि पहलवान जमाल का दस्ता जो उस समय पुलिस काजी था, आ गया। सैयद ने तलवार लेकर सिपाहियों का सामना किया किंतु घायल होने पर बंदी बना लिया गया।
औरत उसके घर वालों को सौंप दी गई किंतु सैयद को कालपी के निकट शिवकानपुर की जेल में बंद कर दिया गया। वहाँ का काजी पहलवान जमाल, सैयद मूसा का मित्र था।, पहलवान जमाल ने सैयद से कहा कि तू चिंता मत कर मैं स्वयं उस औरत को आगरा से लेकर आता हूँ।
पहलवान जमाल एक घोड़े पर चढ़कर आगरा गया और मौका पाकर उस औरत को घोड़े पर बैठाकर ले आया। जब पहलवान मोहिनी को घोड़े पर चढ़ा रहा था तो मोहिनी के घर वालों ने उसे देख लिया।
वे भी पहलवान के घोड़े के पीछे भागे। अंत में पहलवान का घोड़ा एक नहर के किनारे कीचड़ में जाकर अटक गया। उसकी पीठ पर मोहिनी और पहलवान जमाल काजी का बोझ था।
इसलिए वह कीचड़ में से पैर नहीं निकाल पाया। इस पर मोहिनी जानबूझ कर घोड़े से नीचे गिर पड़ी और पहलवान से बोली कि मेरा जो होगा, सो होगा, तू भाग कर अपनी जान बचा। मेरे प्रेमी से कहना कि मैंने लाख चाहा किंतु भाग्य ने नहीं चाहा इसलिए मैं तुझे नहीं पा सकी।
सैयद मूसा और मोहिनी की मृत्यु
पहलवान भाग गया और मोहिनी फिर से अपने पिता के घर आ गई। जब सैयद ने यह समाचार सुना तो दुःख के कारण उसके प्राण-पंखेरू उड़ गए। सैयद मूसा और मोहिनी की यह करुण गाथा अंततः कब्रगाह तक जा पहुँची।
उसकी लाश कब्रगाह में दफना दी गई। उधर मोहिनी फिर से जंजीरों में बांध दी गई। वह अपनी दूती की सहायता से जंजीरें खोलकर पागलों की तरह घर से निकल भागी और सैयद की कब्र पर जा पहुंची। वह कब्र पर सिर पटक-पटक कर रोने लगी। मोहिनी के घर वालों ने उसे ऐसी हालत में देखा तो वे मोहिनी को अपने साथ लिए बिना चुपचाप अपने घर लौट गए।
अल्लाह मुझे प्रेम के दर्द में रहने देगा
अंत में मोहिनी का क्या हुआ, इस पर मुल्ला बदायूंनी ने कुछ नहीं लिखा है किंतु इस लम्बे प्रकरण का अंत इन शब्दों के साथ किया है- ‘मुझे अल्लाह से आशा है, वह मुझे प्रेम के दर्द में रहने देगा और इसी दर्द में मरने देगा।’
आज भी मर रही हैं मोहिनियाँ
सैयद मूसा और मोहिनी की प्रेम-कथा आज भी भारत में कश्मीर से कन्याकुमारी तक घटित होती हुई देखी जा सकती है। आज भी सैंकड़ों मोहिनियां प्रतिवर्ष सैयद मूसाओं के प्रेम में पागल होकर अपना और अपने परिवार वालों का जीवन बरबाद करती हैं।
✍️ – डॉ. मोहनलाल गुप्ता की पुस्तक तीसरा मुगल जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर (Teesra Mughal Jalaluddin Muhammad Akbar) से।



