Monday, September 20, 2021

प्रस्तावना

अकबर के राज्यारोहण के समय राजस्थान में ग्यारह रियासतें थीं जिनमें से मेवाड़, बांसवाड़ा, डूंगरपुर तथा प्रतापगढ़ पर गुहिल, जोधपुर एवं बीकानेर पर राठौड़, जैसलमेर एवं करौली पर यादव, आम्बेर पर कच्छवाहे तथा बूंदी एवं सिरोही रियासतों पर चौहान राजपूत शासन करते थे। मुगल शासक, राजपूतों द्वारा शासित इस क्षेत्र को राजपूताना कहते थे।

मुगलों ने इन राज्यों के राजकुमारों में वैमनस्य उत्पन्न करके, कोटा, अलवर, भरतपुर, धौलपुर, किशनगढ़ तथा शाहपुरा नामक छोटे-छोटे नवीन राज्यों का गठन करवाया ताकि राजपूत वंशों की एकता को तोड़कर उन्हें सफलतापूर्वक अपने अधीन रखा जा सके।

अकबर के जीवन के अंतिम हिस्से में, जयपुर एवं जोधपुर रियासतों के मध्य में 858 वर्गमील क्षेत्रफल वाली किशनगढ़ रियासत ने जन्म लिया। किशनगढ़ रियासत अपनी पड़ौसी रियासतों की तुलना में कितनी छोटी थी इसका अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि किशनगढ़ रियासत की तुलना में जोधपुर रियासत लगभग 41 गुनी और जयपुर रियासत लगभग 18 गुनी बड़ी थी।

 इतनी बड़ी रियासतों के बीच छोटी सी रियासत को सुरक्षित रख पाना, किशनगढ़ के राजाओं के लिए बहुत बड़ी चुनौती थी। इसलिए किशनगढ़ के राजाओं ने मुगलों से गहरी दोस्ती स्थापित की।

जहाँ जयपुर, जोधपुर, बीकानेर, जैसलमेर तथा डूंगरपुर आदि राज्यों की राजकुमारियाँ दोस्ती के नाम पर मुगलों के महलों में जा पहुँची थीं, वहीं किशनगढ़ ने अपनी राजकुमारियां मुगल शहजादों को नहीं दीं। फिर भी किशनगढ़ के राजा, अपनी तलवार के बल पर मुगलिया सल्तनत के दाएं हाथ बन गए और उनका रुतबा जयपुर तथा जोधपुर के राजाओं के बराबर हो गया।

शाहजहाँ के समय किशनगढ़ राज्य पर राजा रूपसिंह का शासन था। वह भगवान श्रीकृष्ण का अनन्य भक्त था। वह तलवार का धनी, वचन का पक्का और अदम्य साहस का स्वामी था।

यह शाहजहाँ का सौभाग्य था कि उसे बीकानेर के महाराजा कर्णसिंह, जोधपुर के राजा जसवंतसिंह और किशनगढ़ के राजा रूपसिंह की सेवाएं प्राप्त हुईं तथा शाहजहाँ की चहेती बेगम मुमताज महल के पेट से दारा शिकोह जैसे श्रेष्ठ पुत्र का जन्म हुआ किंतु यह शाहजहाँ का परम दुर्भाग्य था कि उसी मुमताज के पेट से औरंगजेब, शाहशुजा और मुरादबक्श जैसे कुलघाती शहजादों का भी जन्म हुआ जिन्होंने शाहजहाँ और उसके दोस्तों को दुर्भाग्य के सागर में डुबो दिया।

इस उपन्यास को इसी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर लिखा गया है। महाराजा रूपसिंह जीवन भर शाहजहाँ के लिए लड़ता रहा। जब उसके शहजादों में मुगलिया तख्त हासिल करने के लिए खूनी युद्ध हुआ तब अकेला रूपसिंह ही शाहजहाँ के पास एकमात्र विश्वसनीय दोस्त बचा था।

शाहजहाँ ने रूपसिंह को जीवन भर बलख और बदखशां की पहाड़ियों में भयानक उजबेकों और ईरानियों के विरुद्ध झौंके रखा किंतु जब शाहजहाँ के अपने शहजादे नंगी तलवारें लेकर लाल किले की तरफ बढ़ने लगे तब शाहजहाँ ने अपनी राजधानी को महाराजा रूपसिंह की सुरक्षा में दे दिया। उसने महाराजा रूपसिंह को वली-ए-अहद अर्थात् युवराज दारा शिकोह का संरक्षक नियुक्त किया और दारा शिकोह ने महाराजा रूपसिंह को अपनी सेनाओं का प्रधान सेनापति बनाया।

रूपसिंह केवल तलवार का ही धनी नहीं था। वह ईश्वर का बहुत बड़ा भक्त भी था। उसकी असली पहचान इसी रूप में होनी चाहिए। उसने भगवान को समर्पित करके इतने मार्मिक पद लिखे हैं, जो किसी भक्त के हृदय में से ही निकल सकते हैं। कहते हैं कि एक बार महाराजा रूपसिंह देह की सुध-बुध खोकर भगवान श्रीकृष्ण की पूजा में बैठा रहा और उसकी प्रतिष्ठा की रक्षा करने के लिए भगवान श्रीकृष्ण स्वयं उसके स्थान पर शाहजहाँ के समक्ष रूपसिंह के वेश में उपस्थित हुए।

ऐसे भक्त इस संसार में बिरले ही हुए हैं जिनकी लाज बचाने के लिए भगवान स्वयं आए हैं। इस दृष्टि से महाराजा रूपसिंह भक्तराज प्रहलाद, गजेन्द्र, महारानी द्रौपदी, मीरांबाई तथा नरसी मेहता आदि भक्तों के समकक्ष ठहरता है।

जिस समय शामूगढ़ के मैदान में महाराजा रूपसिंह अकेला ही औरंगज़ेब के हाथी पर रखी अम्बारी की रस्सियां काट रहा था, उस समय यदि दारा शिकोह ने किंचित् भी पौरुष दिखाया होता तो औरंगज़ेब के उसी क्षण टुकड़े-टुकड़े कर दिए गए होते। भारत का इतिहास दूसरी तरह से लिखा गया होता और देश को औरंगज़ेब जैसे धूर्त एवं मानवता के शत्रु बादशाह का 49 साल लम्बा दुर्भाग्यपूर्ण शासन नहीं भोगना पड़ता।

महाराजा रूपसिंह तो शामूगढ़ के मैदान में, भारत भूमि को दुर्भाग्य से बचाने के प्रयास में अपने कर्त्तव्य की बलिवेदी पर न्यौछावर हो गया किंतु वह भारत की भावी पीढ़ियों के लिए अनुकरणीय उदाहरण भी छोड़ गया।

भारत की वर्तमान पीढ़ी, महाराजा रूपसिंह को लगभग पूरी तरह भूल चुकी है। प्रस्तुत उपन्यास में भारतीय इतिहास के एक वास्तविक धीरोदात्त नायक को उसके वास्तविक जीवन-प्रसंगों के आधार पर स्मरण करने का प्रयास किया गया है।

सुधि पाठकों को इस गुमानाम महाराजा की वास्तविक कहानी पढ़ने को मिले तथा देश की वर्तमान एवं भावी पीढ़ियाँ भी उस कहानी से लाभान्वित हों, इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए यह उपन्यास लिखा गया है। उपन्यास होते हुए भी इसमें इतिहास की पवित्रता की रक्षा की गई है। आशा है यह उपन्यास अपने उद्देश्यों में सफल होगा।

63, सरदार क्लब योजना, जोधपुर

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