Sunday, January 18, 2026
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चित्तौड़ से पलायन कर गए हजारों राजपूत परिवार (87)

जब अकबर ने चित्तौड़ दुर्ग पर अधिकार करके उसमें रहने वाले तीस हजार हिन्दुओं का कत्लेआम करवाया तो  हजारों राजपूत परिवार चित्तौड़ को स्वतंत्र कराने का संकल्प लेकर गाड़ियों में बैठकर चित्तौड़ से पलायन कर गए!

 24 फरवरी 1568 को चित्तौड़ दुर्ग पर अधिकार करने के बाद अकबर (AKBAR) ने दुर्ग में कत्लेआम के आदेश दिए। अबुल फजल (ABUL FAZAL) लिखता है कि अकबर के आदेश से तीस हजार लोग मार दिए गए तथा इतने ही बंदी बना लिए गए।

कहा नहीं जा सकता कि चित्तौड़ दुर्ग में काम आए आठ हजार चित्तौड़ी सैनिकों की संख्या तथा जौहर में प्राण देने वाली स्त्रियों एवं बच्चों की संख्या इन 30 हजार में सम्मिलित है, अथवा उनसे अलग है! कई लोग शंका करते हैं कि एक दुर्ग में आखिर कितने लोग आ सकते हैं!

ज्ञातव्य है कि चित्तौड़ का दुर्ग लगभग 8 किलोमीटर लम्बे और 2 किलोमीटर चौड़े पहाड़ पर बना हुआ है। इस दुर्ग का क्षेत्रफल लगभग 280 हैक्टेयर है। यह भारत का विशालतम दुर्ग है। इस दुर्ग में आज भी एक नगर बसा हुआ है।

अकबर से हुई लड़ाई के समय दुर्ग में लगभग 8 हजार सैनिक तैनात थे। उनके परिवार के सदस्यों की संख्या अलग थी। अबुल फजल ने लिखा है कि जब दुर्ग का पतन होने लगा था, तब आसपास के क्षेत्रों से रहने वाले 40,000 किसान भी दुर्ग की रक्षा के लिए आ गए थे।

अकबर (AKBAR) ने दुर्ग में इन्हीं में से तीस हजार मनुष्यों का कत्ल करवाया था क्योंकि दुर्ग में रहने वाले सैनिकों एवं उनके परिवारों के सदस्यों में से तो अधिकांश लोग या तो साका के अंतर्गत अपने प्राण दे चुके थे, या दुर्ग छोड़कर जा चुके थे।

चित्तौड़ के इस युद्ध में एक भूला-बिसरा पन्ना उन लोगों का भी है जो दुर्ग पर विदेशियों का अधिकार होते देखकर वहाँ से अपने परिवारों को साथ लेकर निकल गए थे। चित्तौड़ से पलायन करते समय उन्होंने प्रण लिया कि वे तब तक धरती पर अपना घर नहीं बनाएंगे जब तक चित्तौड़ स्वतंत्र नहीं हो जाएगा।

चित्तौड़ तो जहांगीर (JAHANGIR) के शासन काल में पुनः स्वतंत्र होकर महाराणा के पास आ गया किंतु इन लोगों की गाड़ियां कभी चित्तौड़ दुर्ग में नहीं लौटीं। हजारों राजपूत परिवारों की चित्तौड़ से पलायन की ऐतिहासिक परिणति यह है कि साढ़े पांच सौ साल बीत जाने पर भी उनके वंशज बैलगाड़ियों में बैठे हुए आज भी पूरे देश में घूम रहे हैं।

युद्धकर्म छूट जाने पर इन लोगों ने लुहार का काम पकड़ लिया और वे एक स्थान से दूसरे स्थान तक घूमने लगे। समय बीतने के बाद वे गाड़िया लुहार कहलाने लगे। आज भी राजस्थान की गाड़िया लोहार एक ऐसी अनोखी घुमक्कड़ जाति है, जो अपना घर नहीं बनाती, एक स्थान पर टिक कर नहीं रहती। यह जीवनशैली चित्तौड़ से पलायन की देन है।

बैलगाड़ी ही इनका चलता-फिरता घर है। इनका जीवन इसी बैलगाड़ी में पूरा होता है। जन्म, विवाह और मृत्यु सभी-कुछ बैलगाड़ी में होते हैं। यह परंपरा चित्तौड़ से पलायन की स्मृति को जीवित रखती है।

गाड़िया लोहारों में मान्यता है कि जब वे युद्ध के बाद अपने घरों को लौट रहे थे, तब मार्ग में इन्हें एक रथ पर बैठे भगवान मिले। भगवान के रथ की धुरी टूट गयी थी। इन लोगों ने भगवान के रथ की धुरी जोड़ दी। तब भगवान ने उन्हें वरदान दिया कि तुम्हें लोहे के काम में पराजित नहीं होना पड़ेगा।

तभी से गाड़िया लोहार पीढ़ी-दर-पीढ़ी यही कार्य करते आ रहे हैं। ये लोग लोहे को पीटकर आजीविका चलाते हैं। पुरुष आग से गर्म लोहे को निकालकर एरन पर रखते हैं और स्त्रियां घन (भारी हथौड़े) से चोट करती हैं।

ये लोहे के तरह-तरह के सामान और औजार भी बनाते हैं जिनमें चिमटा, हंसिया, खुरपी, कुल्हाड़ी, करछली आदि होते हैं। इन लोगों की गाड़ियाँ बहुत कलात्मक ढंग से बनी होती हैं। गाड़ी के विविध हिस्सों में पीतल के गोल कलात्मक पतरे कील से जड़े रहते हैं।

गाड़ी के पहिये भी भव्य और भारी होते हैं जो किसी ऐतिहासिक रथ के पहिए की तरह दिखते हैं। इनकी गाड़ी का रंग गहरा काला होता है ताकि इनकी सुंदर बहू-बेटियों को किसी की बुरी नजर नहीं लगे।

गाड़िया लुहार पुरुष धोती और बंडी पहनते हैं जबकि महिलाएं कलात्मक पहनावा पहनती हैं। वे गले में चांदी का कड़ा, हाथों में भुजाओं तक कांच, लाख, सीप एवं तांबे की चूड़ियां, नाक में लंबी नथ, पांव में चांदी के भारी कड़े, कानों में पीतल या सीप की बालियां पहनती हैं।

 सिर पर आठ-दस तरह की चोटियां गूंथती हैं जिनमें कौड़ियों की माला जैसी गुंथाई भी होती है। महिलाएं अपने पैरों की लंबाई से आधा फुट छोटा छींटदार लहंगा पहनती हैं। कमर में कांचली पहनती हैं तथा अपने शरीर पर गोदने गुदवाती हैं जिसे गाड़िया लुहारों का पहचान-चिन्ह भी माना जाता है।

Teesra Mughal Jalaluddin Muhammad Akbar - www.bharatkaitihas.com
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ये लोग कई प्रतिज्ञाओं का पालन करते हैं। सिर पर टोपी नहीं पहनते, पलंग पर नहीं सोते, घर नहीं बनाते, दिया नहीं जलाते, कुएं से पानी नहीं भरते, बड़ी नली का हुक्का काम में नहीं लेते, कमर में काले रंग के अतिरिक्त अन्य किसी रंग का नाड़ा नहीं बांधते, अन्य जाति की स्त्री से विवाह नहीं करते, स्वजन की मृत्यु पर विलाप नहीं करते, एक से अधिक कंघा नहीं रखते। कंघा टूटने पर उसे जमीन में गाढ़ते हैं। नया कंघा कुलदेवी की तस्वीर के समक्ष रखकर पवित्र करते हैं। ये लोग माचिस से कभी आग नहीं जलाते, बल्कि इनकी अंगीठी में सुलगते कोयले के कुछ टुकड़े हमेशा पड़े रहते हैं। इनमें मान्यता है, नई आग जलाने से पुरखों की आत्माएं कष्ट पाती हैं। ये लोग प्रायः कुत्ते पालते हैं। विवाह होने पर नवदम्पत्ति अपने जीवन की पहली रात गाड़ी में गुजारते हैं तथा प्रण लेते हैं कि वे अपनी भावी संतान को चलती बैलगाड़ी में जन्म देंगे, ताकि उसमें भी घुमक्कड़ संस्कार समा सकें। इन लोगों में विवाह के तरीके अनोखे होते हैं। दुल्हन पाने के लिए दूल्हे को एक से दस किलो तक चांदी दुल्हन के पिता को भेंट करनी होती है। इनके विवाह में मोरपंख का बड़ा महत्व है। अग्नि के चारों ओर फेरे लेने के उपरांत दुल्हन अपने पति को एक मोरपंख भेंट करती है चित्तौड़ से पलायन के साढ़े पाँच सौ साल बाद भी इतिहास का यह भूला-बिसरा पन्ना सड़कों पर चलता.फिरता दिखाई देता है।

अबुल फजल लिखता है कि जब चित्तौड़ का घेरा शुरू हुआ था तो अकबर (AKBAR) ने संकल्प लिया था कि चित्तौड़ दुर्ग को जीतने के बाद वह ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह की पैदल यात्रा करेगा। इसलिए 28 फरवरी 1568 को अकबर ने वापसी के नगाड़े बजवाए और तपते हुए मरुस्थल में जब बड़ी ही गर्म लू चल रही थी तो उसने पैदल यात्रा करना शुरू कर दी।

 अबुल फजल ने चाटुकारिता की समस्त सीमाएं लांघकर फरवरी के महीने में चित्तौड़ और अजमेर के बीच में तपता हुआ मरुस्थल दिखाया है और वहाँ गर्म लूओं का बहना दिखाया है। न तो इस क्षेत्र में मरुस्थल है, न वह फरवरी के महीने में तपता है और न भारत के किसी भी भूभाग में फरवरी के महीने में लूएं चलती हैं।

इस क्षेत्र में फरवरी का महीना आज भी काफी ठण्ठा होता है। आज से पांच सौ साल पहले फरवरी का महीना और भी अधिक ठण्डा रहा होगा!

अबुल फजल (ABUL FAZAL) लिखता है कि अपने वायदे के अनुसार पूरे रास्ते पैदल चलकर रमजान माह की सातवीं तारीख को अकबर (AKBAR) अजमेर पहुंच गया। वहाँ वह ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती की दरगाह पर गया। खैरात बांटी, अच्छे और नेक काम किए तथा दस दिन बाद सवार होकर राजधानी के लिए चल पड़ा।

✍️ – डॉ. मोहनलाल गुप्ता की पुस्तक तीसरा मुगल जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर (Teesra Mughal Jalaluddin Muhammad Akbar) से।

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