Wednesday, June 29, 2022

रणमल द्वारा मेवाड़ राज्य की रक्षा

रणमल के सम्बन्ध में भी विभिन्न ख्यातों में परस्पर विरोधी और असत्य बातें मिलती हैं। उनमें से अधिकांश बातें इतिहास की कसौटी पर खरी नहीं उतरतीं। फिर भी ज्ञात सामग्री के आधार पर निर्विवाद रूप से कहा जा सकता है कि रणमल ने अपने पिता के जीवित रहते ही पिता का राज्य त्याग दिया और वह नागौर से चलकर नाडोल के निकट धणला गांव में जाकर ठहरा जहाँ सोनगरा चौहान राज्य करते थे। उसने चौहानों से युद्ध करके उन्हें परास्त किया।

मेवाड़ की शरण में

रणमल कुछ दिनों तक धणला में रहकर चित्तौड़ के महाराणा लाखा के पास चला गया जो कि रणमल का बहनोई भी था। चूण्डा की बहिन हंसाबाई का विवाह महाराणा लाखा से इस शर्त पर हुआ था कि यदि हंसा बाई की कोख से पुत्र उत्पन्न होता है तो वही मेवाड़ का शासक बनेगा। यद्यपि इस विवाह के समय महाराणा लाखा का पुत्र चूण्डा युवा था किंतु चूण्डा के कहने पर महाराणा लाखा ने यह शर्त मान ली तथा हंसाबाई से विवाह कर लिया। जब रणमल महाराणा लाखा के पास रहने आया तो लाखा ने उसे चालीस गांवों के साथ धणला गांव भी जागीर में दिया जहाँ से रणमल ने चौहानों को मार भगाया था। कुछ समय में ही रणमल, महाराणा लाखा का विश्वासपात्र बन गया तथा मेवाड़ की सेनाओं का नेतृत्व करने लगा। उसने अजमेर पर विजय प्राप्त करके अजमेर को मेवाड़ राज्य में सम्मिलित कर दिया। इससे लाखा, रणमल से अत्यधिक प्रसन्न हो गया।

मेवाड़ की राजनीति में प्रवेश

1421 ई. में राणा लाखा की मृत्यु होने पर उसका 12 वर्षीय पुत्र मोकल मेवाड़ की गद्दी पर बैठा। उसका जन्म रणमल की बहन हंसाबाई की कोख से हुआ था। मोकल की अल्पायु के कारण स्वर्गीय महाराणा लाखा का बड़ा पुत्र चूण्डा उसका अभिभावक बना और उसने मोकल के नाम पर मेवाड़ का शासन चलाया। कुछ ही समय में हंसाबाई और चूण्डा के बीच अविश्वास पनपने लगा। हंसाबाई को संदेह होने लगा कि अवसर मिलने पर चूण्डा मेवाड़ के सिंहासन को हस्तगत कर लेगा। जब दोनों के बीच विवाद बढ़ने लगे तो चूण्डा मेवाड़ छोड़कर माण्डू के सुल्तान की सेवा में चला गया। इस घटना में, हंसाबाई और उसके भाई रणमल की भूमिका के सम्बन्ध में ख्यातों में परस्पर-विरोधी विवरण मिलते हैं। मेवाड़ के अनेक ख्यातकारों तथा वीर विनोद के लेखक श्यामलदास के अनुसार चूण्डा, माण्डू जाते समय राघवदेव के अतिरिक्त, अन्य सभी भाईयों को अपने साथ ले गया। राघवदेव को मोकल एवं पैतृक राज्य मेवाड़ की सुरक्षा के निमित्त चित्तौड़़ छोड़ गया। चूण्डा के जाने के बाद मेवाड़ राज्य में रणमल की स्थिति सर्वोपरि हो गई। उसने महाराणा मोकल की निष्ठापूर्वक सेवा की और महाराणा के विरुद्ध उठने वाले विद्रोहों का दमन किया। रणमल के बढ़ते हुए प्रभाव से सिसोदिया सामन्त घबरा उठे और उन्हें लगने लगा कि एक दिन मेवाड़ पर राठौड़़ों की सत्ता स्थापित हो जायेगी। अतः उन्होंने रणमल का विरोध करना आरम्भ कर दिया। रणमल को भी अपने नेतृत्व में राठौड़़ सैनिकों की एक शक्तिशाली सेना खड़ी करनी पड़ी, जिसका व्यय मेवाड़ राज्य को उठाना पड़ा।

सौतेले भाई को राजतिलक

1423 ई. में रणमल के पिता राव चूण्डा की, नागौर के युद्ध में मृत्यु हो गई। यह सूचना मिलने पर रणमल मेवाड़ से मण्डोर आया तथा पिता को दिये हुए वचन के अनुसार उसने अपने सौतेले भाई कान्हा का राजतिलक किया। इसके बाद रणमल, मेवाड़ न जाकर मारवाड़ राज्य के सोजत गांव में रहने लगा। भाटियों ने रणमल के पिता चूण्डा को मारा था इसलिये रणमल भाटियों का क्षेत्र लूटने लगा। भाटियों ने सुलह करने के लिये अपने चारण भुज्जा संढ़ायच को रणमल के पास भेजा। भुज्जा के यशगान करने से रणमल प्रसन्न हो गया। इस पर भाटियों ने अपनी कन्या रणमल से ब्याह दी। इसके बाद रणमल ने भाटियों का क्षेत्र लूटना बंद कर दिया। इसी भटियाणी रानी की कोख से रणमल के बड़े पुत्र जोधा का जन्म हुआ।

रणमल को मण्डोर राज्य की प्राप्ति

राव सत्ता के छोटे भाई रणधीर ने, रणमल को मण्डोर राज्य पर अधिकार करने के लिये उकसाया। उसका तर्क था कि रणमल को मण्डोर पर अधिकार कर लेने का पूरा अधिकार है क्योंकि चूण्डा ने राज्य कान्हा को दिया था न कि सत्ता को। रणमल ने रणधीर का अनुरोध स्वीकार कर लिया तथा 1427 ई. में मेवाड़ की सेना की सहायता से मण्डोर पर आक्रमण किया। सत्ता के पुत्र नरबद ने रणमल का सामना किया किंतु नरबद परास्त हो गया। रणमल ने मण्डोर पर अधिकार कर लिया। मण्डोर पर अधिकार कर लेने के बाद रणमल, मण्डोर को अपनी राजधानी बनाकर राज्य करने लगा। रणमल का राज्य मण्डोर से लेकर पाली, सोजत, जैतारण और नाडौल तक था। रणमल ने झाबर में कचरा सींधल, जेतारण में तोगा सींधल, बगड़ी में चरडा सींधल तथा सोजत में नाढ़ा सींधल को मारा। सींधलों से निबटकर रणमल ने केल्हण भाटी को मारकर बीकमपुर को लूटा और बिहारी पठान हसन खाँ से जालोर छीन लिया। (केल्हण भाटी की पुत्री कोडमदे से रणमल का विवाह हुआ जिसके गर्भ से जोधा का जन्म हुआ।) राव रणमल ने गंगा स्नान के उद्देश्य से तीर्थ यात्रा की तथा गया तीर्थ में जाकर बहुत से दान-पुण्य किये।

रणमल के लौट जाने पर मेवाड़ की दुर्दशा

रणमल के मण्डोर चले जाने के बाद मेवाड़ राज्य की दुर्दशा होने लगी। मोकल यद्यपि युवा हो गया था किंतु शासन का बहुत सा काम अब भी हंसाबाई करती थी। चूण्डा जैसा प्रतापी राजकुमार, अपने अन्य भाइयों एवं मेवाड़ी सरदारों के साथ, माण्डू के सुलतान की सेवा कर रहा था जो कि चित्तौड़ का शत्रु था। मेवाड़ की कमजोरी भांप कर मालवा के सुल्तान होशंगशाह ने मेवाड़ राज्य के अधीन स्थित गागरोण दुर्ग पर आक्रमण किया। दुर्ग का रक्षक अचलदास खींची, जो मोकल का संबंधी भी था, लड़ता हुआ मारा गया और गागरोण पर होशंगशाह का अधिकार हो गया। नागौर के मुस्लिम शासक फिरोजखाँ से भी मोकल का संघर्ष हुआ, जिसमें मेवाड़ को पराजय का सामना करना पड़ा। बून्दी के हाड़ाओं ने भी मेवाड़ की सीमाओं का अतिक्रमण किया और माण्डलगढ़ तक का क्षेत्र अधिकृत कर लिया। गोड़वाड़ के क्षेत्र में सिरोही के शासक ने अव्यवस्था फैला दी। इस प्रकार, मोकल के शासनकाल में मेवाड़ के प्रभुत्व एवं प्रभाव में कमी आने लगी। ऐसी स्थिति में गुजरात के सुल्तान अहमदशाह ने मेवाड़ पर आक्रमण कर दिया। उसने डूंगरपुर, केलवाड़ा और देलवाड़ा के क्षेत्रों में भारी लूटमार की। महाराणा मोकल उसका सामना करने के लिए सेना सहित चित्तौड़़ से रवाना हुआ। 1433 ई. में जब वह जीलवाड़ा क्षेत्र में पड़ाव डाले हुए था तो उसके दो चाचाओं- चाचा और मेरा, जो कि महाराणा क्षेत्रसिंह की अवैध सन्तान थे, ने महाराणा मोकल की हत्या कर दी।

पुनः मेवाड़ की ओर

अपने भांजे मोकल की हत्या का समाचार सुनते ही रणमल ने अपने सिर से साफा उतार कर फेंटा बांध लिया और प्रतिज्ञा की कि जब तक हत्यारों को मार न डालूंगा, सिर पर पगड़ी नहीं बाँधूंगा। रणमल अपने 500 सिपाहियों को अपने साथ लेकर चित्तौड़ के लिये रवाना हो गया। चाचा तथा मेरा कोटड़ा अथवा पई के पहाड़ों में भाग गये और मेरों की सुरक्षा में रहने लगे। रणमल ने मेरों को महाराणा की सेवा में रखवाकर, उनकी सहायता से पहाड़ों के बीच छिपे हुए चाचा व मेरा को मार डाला तथा 6 वर्ष के बालक कुंभकर्ण (महाराणा कुम्भा, 1433-1468 ई.) को मेवाड़ की गद्दी पर बैठाया। कुम्भा का शासन निष्कंटक बनाने के लिये रणमल ने मेवाड़ के विद्रोही सरदारों को मेवाड़ से निकाल कर अपने विश्वास के बहुत से राठौड़़ों को महत्त्वपूर्ण पदों पर नियुक्त कर दिया।

रणमल का चरमोत्कर्ष

कुम्भा के 12-13 वर्ष की आयु होने तक रणमल ही मेवाड़ राज्य का वास्तविक शासन चलाता रहा। उसने अनेक युद्ध अभियानों में मेवाड़ की सेना का नेतृत्व किया तथा सारंगपुर (मालवा), नागौर, गागरौन, नराणा (जयपुर), खाटू, चाटसू (जयपुर) आदि युद्ध अभियानों में विजय प्राप्त की। 1435-36 ई. में रणमल ने मेवाड़ की ओर से बूंदी पर आक्रमण किया। बूंदी के शासक बेरीसाल ने आत्मसमर्पण कर दिया और माण्डलगढ़ क्षेत्र मेवाड़ को वापस लौटा दिया। बेरीसाल ने कुम्भा की अधीनता तथा उसे वार्षिक कर चुकाना स्वीकार किया। बूदी के हाड़ओं का दमन रणमल की शक्ति का चरमोत्कर्ष था।

रणमल की हत्या

रणमल द्वारा राठौड़़ सरदारों को मेवाड़ राज्य में महत्त्वपूर्ण पद दे दिये जाने से सिसोदिया सरदारों में रणमल के विरुद्ध असंतोष पनप गया और वे कुम्भा के कान भरने लगे कि रणमल सिसोदियों का राज्य हड़पना चाहता है। कुछ समय बाद रणमल को कुम्भा के चाचा राघवदेव पर संदेह हो गया कि वह कुम्भा को हटाने का षड़यंत्र कर रहा है। इसलिये रणमल ने राघवदेव को छल से दरबार में बुलवाया तथा कुम्भा के सामने ही राघवदेव की हत्या करवा दी। इस घटना के बाद कुम्भा का मन रणमल से फिर गया तथा उसने रणमल के विरुद्ध अपने वंश के सिसोदिया गुट का समर्थन करना आरम्भ कर दिया। कुम्भा ने अपने पिता के हत्यारों के साथियों- महपा और अक्का को क्षमा कर दिया तथा उन्हें चित्तौड़़ लौटने की अनुमति दे दी। वे लोग मांडू से लौट आये और महाराणा की सेवा करने लगे। इसके बाद कुम्भा का ताऊ चूण्डा भी मेवाड़ लौट आया।

थोड़े दिनों में ही अक्का ने कुम्भा का विश्वास जीत लिया। उसने कुम्भा को विश्वास दिलाया कि रणमल अपनी सैन्य-शक्ति के सहारे मेवाड़ का सिंहासन हड़पना चाहता है। मेवाड़ के सरदारों ने रणमल की प्रेयसी दासी भारमली को अपनी ओर मिला लिया। भारमली ने कुम्भा से कह दिया कि रणमल, मेवाड़ पर अधिकार करना चाहता है। इस पर कुम्भा ने अपने आदमियों को रणमल की हत्या करने की सहमति दे दी। भारमली ने एक रात रणमल को खूब शराब पिलाई। जब रणमल बेसुध हो गया तब सिसोदिया सरदारों ने रणमल को उसी की पगड़ी से पंलग पर बांध दिया। इसके बाद महपा और उसके साथियों ने रणमल को मौत के घाट उतार दिया। रणमल की हत्या होने के पश्चात् महाराणा कुम्भा ने मण्डोर राज्य पर भी अधिकार कर लिया। वि.सं. 1496 (1439 ई.) के राणपुर के शिलालेख में कुम्भा की मण्डोर विजय का उल्लेख है। अतः इस तिथि से पूर्व ही रणमल की हत्या हुई होगी। रेउ ने रणमल की हत्या की तिथि 2 नवम्बर 1438 बताई है।

रणमल का व्यक्तित्व

रणमल भीमकाय, पितृ-भक्त एवं वीर व्यक्ति था। पिता के कहने से उसने राज्य पर अधिकार छोड़ दिया था किंतु अपने पिता के हत्यारों से वैर निकालने में कोई कमी न रख छोड़ी। रणमल ने जीवन भर सक्रिय रहकर अपने लिये उस युग की राजनीति में स्थान बनाये रखा। उसने न केवल अंधे एवं मदिरा में मत्त रहने वाले सत्ता से अपने पिता का राज्य वापिस छीना अपितु उसका विस्तार भी किया। रणमल ने अपने राज्य में निश्चित वजन के बाट जारी किये। बहन हंसादेवी ने उसे दुर्दिनों में सहारा दिया था इसलिये उसने मेवाड़ राज्य की आजीवन सेवा की। रणमल ने न केवल अपने भांजे की हत्या का बदला लिया अपितु मारवाड़ छोड़कर मेवाड़ जा रहा ताकि अपनी बहिन के वंशजों का राज्य सुरक्षित रख सके। परिस्थिति वश उसे मेवाड़ की राजनीति में पूरी तरह से संलग्न हो जाना पड़ा। उस युग में यह कोई भी कैसे सहन कर सकता था कि सिसोदियों के राज्य में सिसोदियों के स्थान पर राठौड़़ों को उच्च पद दिये जायें। इस कारण 12 साल के कुम्भा ने रणमल की ओर से आशंकित होकर, रणमल की हत्या करने के लिये अपनी सहमति दे दी तथा रणमल के पैतृक राज्य पर भी अधिकार कर लिया।

मरुस्थल की राजनीति में रणमल का स्थान

सीहा के मरुस्थल में आने से लेकर रणमल तक, राठौड़़ों में तीन राजा सर्वाधिक प्रभावशाली हुए- मालानी, चूण्डा तथा रणमल। इनमें से मालानी निःसंदेह, अत्यंत प्रभावशाली हुआ किंतु उसके वंशज शीघ्र ही नेपथ्य में चले गये तथा मालानी के भाई वीरमदेव के वंशज चूण्डा और रणमल मरुस्थल की राजनीति में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाने आगे आ गये। चूण्डा का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण कार्य यह था कि उसने राठौड़़ शक्ति का केन्द्र खेड़ तथा महेवा के स्थान पर मण्डोर कर दिया तथा पूरी तरह स्वतंत्र मण्डोर राज्य की स्थापना की। उसने नागौर, मोहिलों के कुछ क्षेत्र, डीडवाना, सांभर, अजमेर, तथा नाडौल पर भी अधिकार कर लिया। इसलिये मरुस्थल की राजनीति में चूण्डा एक प्रभावशाली राजा हुआ किंतु वह अजेय नहीं था। न वह अपने राज्य का ढंग से संगठन कर सका। वह अपने सरदारों को भी प्रसन्न नहीं रख सका। वह रणमल जैसे वीर पुत्र का भी महत्त्व नहीं समझ सका और उसे अपने जीते जी ही दूर कर दिया तथा अंत में शत्रुओं द्वारा घेर कर मार डाला गया। 

रणमल ने मेवाड़ की राजनीति में प्रथम बार में लगभग 4 वर्ष तक तथा दूसरी बार में लगभग 6 वर्ष तक प्रमुख भूमिका निभाई। मारवाड़ में भी उसकी कुछ भूमिका अवश्य थी। रणमल का राज्य मण्डोर से लेकर पाली, सोजत, जैतारण और नाडौल तक फैल गया। उसने जालोर के पठान शासक को भी मारा किंतु रणमल के युद्ध अभियानों का लाभ मारवाड़ की बजाय मेवाड़ को अधिक मिला। रणमल के मेवाड़ में रहने के दौरान, मेवाड़ की सेना द्वारा सारंगपुर (मालवा), नागौर, गागरौन, नराणा (जयपुर), माण्डलगढ़, बूंदी, खाटू, चाटसू (जयपुर) आदि सफल युद्ध अभियान आयोजित किये गये। इनमें से अधिकांश अभियानों में रणमल की महत्त्वपूर्ण भूमिका थी। मेवाड़ की राजनीति में अधिक रुचि लेने के कारण वह मारवाड़ राज्य का ढंग से निर्माण नहीं कर सका। यहाँ तक कि उसने अपने पुत्रों के लिये एक अत्यंत कमजोर राज्य छोड़ा जिसे कुम्भा ने बड़ी सरलता से अपने अधीन करके 15 साल तक दबाये रखा। इस प्रकार मरुस्थल की राजनीति में रणमल अधिक प्रभावी भूमिका नहीं निभा सका।

रणमल की संतति

जोधपुर राज्य की ख्यात के अनुसार रणमल के चौबीस पुत्र हुए। दयालदास की ख्यात, वीर विनोद तथा टॉड कृत राजस्थान में भी कुछ अंतर के साथ रणमल के चौबीस पुत्रों के नाम दिये गये हैं। रेउ ने रणमल के 26 पुत्रों की सूची दी है- 1. अखैराज, 2. जोधा, 3. कांधल, 4. चांपा, 5. लाखा, 6. भाखरसी, 7. डूंगरसी, 8. जैतमाल, 9. मंडला, 10. पाता, 11. रूपा, 12. कर्ण, 13. सांडा, 14. मांडण, 15. ऊदा, 16. वेरा, 17. हापा, 18. अड़वाल, 19. जगमाल, 20 नाथा, 21. करमचन्द, 22. सींधा, 23. तेजसी, 24. सायर, 25. सगता, 26. गोयन्द।

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