चित्तौड़ का गर्व धूल में मिलाने के बाद बादशाह अकबर (AKBAR THE GREAT) ने बंगाल, बिहार तथा उड़ीसा में अपनी सेनाएं भेजीं तथा स्वयं रणथंभौर पर अभियान करने चल दिया। वह भारत विजय के अपने अभियान को बड़ी तेजी से कार्यान्वित करना चाहता था।
चित्तौड़गढ़ हाथ से निकल जाने के बाद महाराणा उदयसिंह (MAHARANA UDAISINGH) कुछ समय के लिए कुम्भलगढ़ में रहा किंतु कुछ समय बाद महाराणा अपने बचे हुए हिन्दू सैनिकों के साथ उदयपुर पहुँचा और उसने अपने अधूरे पड़े महलों को पूरा कराया।
ई.1572 के आरम्भ में महाराणा उदयसिंह गोगूंदा (GOGUNDA) आया। 15 फरवरी 1572 को गोगूंदा में ही महाराणा उदयसिंह का निधन हुआ जहाँ उसकी छतरी बनी हुई है। चित्तौड़ दुर्ग के पतन से महाराणा की शक्ति इतनी अधिक क्षीण हो चुकी थी कि वह चित्तौड़ को दुबारा लेने का प्रयास नहीं कर सका।
उधर अकबर (AKBAR) भी अजमेर होता हुआ आगरा चला गया। अकबर जयमल (JAIMAL) और फत्ता (FATTA) को तो अपने अधीन नहीं कर सका किंतु आगरा पहुंचकर उसने हाथियों पर चढ़ी हुई जयमल और फत्ता की पाषाण प्रतिमाएं बनवाकर आगरा दुर्ग के द्वार पर खड़ी करवाईं।
औरंगजेब के शासन काल में जब फ्रैंच यात्री बर्नियर (Bernier) भारत आया था, तब भी ये मूर्तियां वहीं पर खड़ी थीं। बर्नियर की यात्रा के छः साल बाद औरंगजेब ने इन मूर्तियों को तुड़वा दिया।
जिस वर्ष अकबर (AKBAR) ने चित्तौड़ का किला जीता, अर्थात् ई.1568 में बंगाल के शासक सुलेमान ने अकबर (AKBAR) की अधीनता स्वीकार कर ली। उसने अकबर (AKBAR) के नाम का खुतबा पढ़वाया, अकबर (AKBAR) के नाम के सिक्के ढलवाए तथा खानखाना मुनीम खाँ से भेंट करके उससे संधि कर ली।
वस्तुतः बंगाल का शासक सुलेमान उड़ीसा के हिन्दू राजा को मारकर उसका राज्य हड़पना चाहता था, इसलिए उसने मुनीम खाँ से दोस्ती कर ली ताकि जब सुलेमान उड़ीसा के हिन्दू राज्य पर हमला करे तो मुगल सेना, सुलेमान के विरुद्ध कोई कार्यवाही न करे।
जब खानखाना मुनीम खाँ बंगाल के शासक सुलेमान से संधि करके लौट गया तब सुलेमान ने उड़ीसा के राजा के साथ छल करके उसके राज्य पर अधिकार कर लिया। सुलेमान की इस कार्यवाही पर मुगलों ने कोई आपत्ति नहीं की।
पाठकों को स्मरण होगा कि अकबर ने बादशाह बनते समय संकल्प लिया था कि वह सम्पूर्ण भारत को अपने अधीन करेगा। इस कारण जिस दिन से उसने बादशाहत संभाली थी, उसी दिन से अकबर इस दिशा में काम कर रहा था।
यदि हम उसके दरबारियों एवं समकालीन लेखकों द्वारा लिखे गए विवरणों को पढ़ें तो हम जान पाएंगे कि अकबर (AKBAR) ने अपने जीवन में तीन ही काम किए।
पहला यह कि वह जीवन भर अफगानियों एवं राजपूतों के राज्यों को अपने अधीन करने में लगा रहा। दूसरा यह कि जब तक उसके शरीर में दम रहा, वह जंगलों में जाकर शिकार खेलता रहा और तीसरा यह कि वह जीवन भर पराई औरतों को पाने के लिए तरह-तरह के उपाय करता रहा।
जब औरतों से उसका जी भर जाता तो वह शिकार खेलने चल देता था, जब शिकार से जी भर जाता तो वह युद्ध करने चला जाता था। जब युद्ध करने से जी भर जाता तो फिर से औरतों की तलाश में लग जाता था।
चित्तौड़ से लौटने के बाद अकबर (AKBAR) लगभग नौ माह तक अपने रनिवास में व्यस्त रहा। वर्ष 1568 के अंत में अकबर ने महाराणा उदयसिंह के दूसरे सबसे सुदृढ़ दुर्ग रणथंभौर पर अभियान करने का विचार किया।
दिल्ली से निकटता तथा मालवा और मेवाड़ के मध्य स्थित होने के कारण AKBAR के लिए यह आवश्यक हो गया था कि रणथंभौर पर अभियान करे तथा इस दुर्ग पर अधिकार जमाये।
मान्यता है कि रणथंभौर दुर्ग को सातवीं शताब्दी ईस्वी में चंद्रवंशी राजा रंतिदेव ने बनवाया था। अधिकतर विद्वान इस दुर्ग को नौवीं शताब्दी ईस्वी में चौहानों द्वारा निर्मित मानते हैं।
रणथंभौर का दुर्ग अरावली पर्वतमाला से घिरा हुआ एक पार्वत्य दुर्ग है। यह दुर्ग जिस पहाड़ी पर बना हुआ है, उसकी समुद्र तल से ऊँचाई 1578 फुट है। दुर्ग लगभग 500 फुट ऊंचा है। दुर्ग की परिधि लगभग 12 किलोमीटर तथा कुल क्षेत्रफल लगभग 11.45 वर्ग किलोमीटर है।
यह दुर्ग विषम आकार वाली सात पहाड़ियों से घिरा हुआ है। बीच-बीच में गहरी खाइयां और नाले हैं। ये सारे नाले चम्बल एवं बनास नदियों में जाकर मिलते हैं। रणथंभौर दुर्ग ऊंचे गिरि शिखर पर बना हुआ है। अपने निर्माण के समय यह दुर्ग घने जंगलों से घिरा हुआ था।
अबुल फजल (ABUL FAZAL) ने लिखा है कि यह दुर्ग पहाड़ियों के बीच में स्थित है। इसीलिए इस दुर्ग के बारे में कहा जाता है कि इस दुर्ग ने कवच धारण कर रखा है जबकि अन्य दुर्ग नंगे हैं। वह लिखता है कि यह दुर्ग रण नामक ऊँची पहाड़ी पर स्थित है जिसके कारण इस दुर्ग का नाम रणतःपुर है जिसका अर्थ होता है- ‘रण की घाटी में स्थित नगर।’
इस दुर्ग का प्रचलित नाम रणथंभौर है जो रण तथा थंभ नामक दो पहाड़ियों के नाम पर है। रण उस पहाड़ी का नाम है जो किले से ठीक नीचे स्थित है तथा थंभ उस पहाड़ी का नाम है जिस पर यह दुर्ग स्थित है।
अजमेर के चौहान शासक पृथ्वीराज चौहान की रानी रखल देवी ने इस दुर्ग के जैन मंदिर में स्वर्ण कलश चढ़ाया था। 12वीं शताब्दी के जैन लेखक सिद्धसेन सूरी ने इस दुर्ग को प्रमुख जैन तीर्थों में गिना है। मुहम्मद गौरी से लड़ने के लिये युद्ध पर जाने से पहले सम्राट पृथ्वीराज चौहान ने इसी दुर्ग में अपनी सेना एकत्रित की थी।
ई.1192 में तराईन की लड़ाई में पृथ्वीराज चौहान का राज्य समाप्त हो गया किंतु उसके बाद भी यह दुर्ग चौहानों के अधिकार में बना रहा। ई.1226 में दिल्ली के सुल्तान इल्तुतमिश ने एक विशाल सेना लेकर रणथंभौर पर अभियान किया।
मिनहाज उस् सिराज ने लिखा है कि अल्लाह की रहमत से ई.1226 में रणथंभौर के उस मजबूत किले पर सुल्तान इल्तुतमिश का अधिकार हो गया, जिसे लेने में 70 बादशाह असफल हो गए थे।
रणथंभौर पर अभियान में असफल होने वाले 70 बादशाह कौनसे थे, इसके बारे में मिनहाज कुछ भी सूचना नहीं देता है। फिर भी मिनहाज के इस कथन से इस बात का आभास हो जाता है कि दिल्ली के मुसलमानों को रणथंभौर पर आसानी से जीत नहीं मिल सकी थी।
जब ई.1236 में इल्तुतमिश की मृत्यु हो गई तो पृथ्वीराज चौहान के वंशजों ने रणथंभौर पर अभियान किया। इल्तुतमिश के उत्तराधिकारी सुल्तान रुकनुद्दीन फीरोजशाह एवं उसकी माता शाह तुर्कान, रणथंभौर दुर्ग में फंसी हुई तुर्की सेना को कोई सहायता नहीं भेज सके।
इस कारण दिल्ली की तुर्की सेना रणथंभौर दुर्ग में फंस गई। कुछ माह बाद जब इल्तुतमिश की पुत्री रजिया दिल्ली की सुल्तान बनी तो उसने राजपूतों से समझौता करके अपने सैनिकों को रणथंभौर दुर्ग से बाहर निकाला।
जिस समय हम्मीरदेव चौहान इस दुर्ग का शासक था उस समय 12 मार्च 1291 को दिल्ली के सुल्तान जलालुद्दीन खिलजी ने रणथंभौर दुर्ग पर आक्रमण किया किंतु जब वह इस दुर्ग को नहीं जीत पाया तो यह कहकर दिल्ली लौट गया कि- ‘जलालुद्दीन खिलजी ऐसे दस किलों को मुसलमान के एक बाल के तुल्य भी नहीं समझता।’
ई.1301 में दिल्ली के सुल्तान अल्लाउद्दीन खिलजी ने रणथंभौर की ओर अभियान किया और दुर्ग रक्षकों को रिश्वत खिलाकर अपनी सेना को दुर्ग में घुसाने में सफल हो गया।
दुर्ग का पतन होता देखकर राजा हम्मीर देव चौहान की रानियों एवं दुर्ग में रहने वाली महिलाओं ने जौहर किया। आज रणथंभौर एक बार फिर इतिहस के उसी मुहाने पर आ खड़ा हुआ था। अकबर (AKBAR) की सेनाएं रणथंभौर के लिए चल पड़ीं।
✍️ – डॉ. मोहनलाल गुप्ता की पुस्तक तीसरा मुगल जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर (Teesra Mughal Jalaluddin Muhammad Akbar) से।



