Tuesday, October 26, 2021

महाराणा राजसिंह द्वारा औरंगजेब से संघर्ष (2)

जोधपुर के निर्वासित राजकुमार अजीतसिंह को शरण

ई.1678 में जिस समय जोधपुर महाराजा जसवंतसिंह की मृत्यु हुई, उस समय  जोधपुर राज्य के साथ मेवाड़ महाराणा राजसिंह का सम्बन्ध मैत्रीपूर्ण था। जब औरंगजेब ने मारवाड़ को खालसा कर लिया तथा राठौड़ सरदारों ने स्थान-स्थान पर संघर्ष करना आरम्भ कर दिया तब राणा राजसिंह ने जोधपुर की राजनीति में कोई रुचि नहीं दिखाई। जब राठौड़ों के उपद्रव ने गंभीर रूप ले लिया तो औरंगजेब ने स्वयं उनके दमन के लिये दिल्ली से प्रस्थान करने का विचार किया।

यह समाचार पाकर जब राठौड़ सरदारों ने सिंघवी दयालदास तथा राठौड़ गोपीनाथ को राणा के पास भेजकर उससे अजीतसिंह को आश्रय देने की प्रार्थना की तो महाराणा ने अजीतसिंह को आश्रय देना स्वीकार कर लिया। इस प्रकार जोधपुर तथा मेवाड़ का पारस्परिक सम्बन्ध पुनः मैत्रीपूर्ण हो गया। फलस्वरूप अगले लगभग पौने दो वर्ष तक जोधपुर के विद्रोही राठौड़ एवं उदयपुर के सिसोदिया राजपूत एक दूसरे के सहयोगी बने रहे और उन्होंने सम्मिलित रूप से स्थान-स्थान पर शाही सैनिकों का सामना किया, शाही अधिकारियों पर आक्रमण किया और शाही चौकियों एवं रसद को लूटा।

औरंगजेब का मेवाड़ पर आक्रमण

बादशाह ने फरमान लिखकर महाराणा से अजीतसिंह को मांगा परंतु महाराणा ने उस पर ध्यान नहीं दिया। औरंगजेब ने पुनः दो बार फरमान भेजकर अपनी आज्ञा का पालन करने के लिये लिखा परंतु महाराणा ने अजीतसिंह, औरंगजेब को सौंपना स्वीकार नहीं किया। इस पर 3 सितम्बर 1679 को औरंगजेब ने महाराणा पर आक्रमण करने के लिये दिल्ली से अजमेर की ओर प्रस्थान किया। उसी दिन शहजादे अकबर को अजमेर में पहले पहुंचने के लिये पालम कस्बे से रवाना किया। बादशाह 13 दिन में अजमेर पहुंचा और आनासागर के महलों में ठहरा। 

महाराणा राजसिंह द्वारा पहाड़ों में गमन

औरंगजेब की सेनाओं के आने से पहले, महाराणा राजसिंह अपने सामंतों के साथ अपनी सेना लेकर पहाड़ों में चला गया। देवीमाता के पहाड़ों में पचास हजार भील महाराणा की सेवा में उपस्थित हुए। महाराणा ने उन्हें आदेश दिया कि 10-10 हजार के समूह में घाटों और नाकों का बंदोबस्त कर शत्रु का रास्ता रोको और उसकी रसद तथा खजाना लूटकर हमारे पास पहुंचाओ।

यहाँ से महाराणा भोमट पहुंचा जहाँ मारवाड़ और मेवाड़ के सरदारों के परिवारों को रखा गया तथा उनकी रक्षा का भार स्वयं महाराणा ने अपने ऊपर लिया। मेवाड़ की सेना में 20 हजार सवार और 25 हजार पैदल सिपाही थे। महाराणा ने उदयपुर आदि नगरों एवं कस्बों की प्रजा को भी पहाड़ों में बुला लिया।

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मुगलों एवं गुहिलों में भिड़ंत

औरंगजेब द्वारा 27 अक्टूबर 1679 को तहव्वरखां तथा हसनअलीखां के नेतृत्व में महाराणा के विरुद्ध सेनाएं रवाना की गईं। तहव्वरखां का काम मांडल आदि परगनों पर अधिकार करना और हसनअलीखां का काम महाराणा से युद्ध करने का था। औरंगजेब स्वयं भी एक विशाल सेना और और यूरोपीय अधिकारियों की अध्यक्षता में एक तोपखाना लेकर उदयपुर के लिये रवाना हुआ तथा मांडल होता हुआ देबारी पहुंचा।

देबारी में मेवाड़ की सेना ने औरंगजेब का मार्ग रोका। दोनों पक्षों में हुए युद्ध के पश्चात् औरंगजेब ने देबारी घाटे पर अधिकार कर लिया। इसके बाद औरंगजेब ने हसनअलीखां को महाराणा के पीछे पहाड़ों में भेज दिया।

औरंगजेब द्वारा उदयपुर के मंदिरों को नष्ट किया जाना

औरंगजेब ने शहजादा मुहम्मद आजम, खानेजहां, रुहल्लाखां और इक्का ताजखां आदि सेनापतियों को लेकर उदयपुर पर आक्रमण किया। उसने उदयपुर को बिल्कुल खाली पाया। औरंगजेब ने उदयपुर के जगदीश मंदिर को तोड़ने के आदेश दिये। वहाँ बीस माचातोड़ सैनिक, मंदिर की रक्षा के निमित्त मरने का निश्चय करके ठहरे हुए थे। उनमें से एक-एक व्यक्ति कई-कई शत्रु सैनिकों को मारकर मरता था।

वे एक-एक करके ही लड़ते थे और एक के मरने पर दूसरा लड़ने आता था। इस प्रकार उन बीस माचातोड़ सैनिकों ने बहुत से मुगल सैनिकों को मारकर वीरगति प्राप्त की। इसके बाद ही मुगलों द्वारा जगदीश मंदिर में तोड़फोड़ की जा सकी। औरंगजेब ने उदयसागर की पाल पर स्थित तीन मंदिरों को गिरवाया।

औरंगजेब की सेना में भय

हसनअलीखां को जब महाराणा के पीछे पश्चिमोत्तर के पहाड़ी प्रदेश में गये कई दिन हो गये और उसका कोई समाचार नहीं आया तो औरंगजेब की सेना में भय छा गया। महाराणा के भय से कोई भी सेनापति हसनअलीखां का समाचार लेने के लिये उसके पीछे जाने का साहस नहीं करता था। अंत में बादशाह के निर्देश से तुराकी मीर शिहाबुद्दीन कुछ चौकीदारों के साथ चला और दो दिन बाद हसनअलीखां का पता लगाकर लौटा।

बादशाह ने उसे इनाम-इकराम दिया तथा उसके पद में भी वृद्धि कर दी।  कुछ दिनों बाद हसनअलीखां लौटकर आया और उसने बादशाह से कहा कि उदयपुर के बड़े मंदिर के अतिरिक्त उसके आसपास के प्रदेश के 172 मंदिर गिरवा दिये गये हैं। 22 फरवरी 1680 को बादशाह देबारी से चित्तौड़ के लिये रवाना हुआ जहाँ उसने 63 मंदिर गिरवाये। 

मेवाड़ की सेना अवसर पाते ही मुगलों पर आक्रमण करके उसे क्षति पहुंचा रही थी, राठौड़ों के थानों से भी सेनाएं आकर मुगलों को मार रही थी। भीलों ने भी मुगलों की नाक में दम कर रखा था। इस प्रकार मुगल तिहरी मार खा रहे थे। अतः उदयपुर में पार पड़ती न देखकर औरंगजेब ने वहाँ से अपनी सेना हटा ली और शहजादे अकबर को बहुत से अधिकरियों के साथ चित्तौड़ में नियुक्त करके स्वयं अजमेर लौट गया। उसके लौट जाने से हिन्दुओं ने अपनी गतिविधियां और तेज कर दीं। मुगलों को भारी हानि उठानी पड़ी और उनमें महाराणा का आतंक छा गया।

महाराणा पहाड़ों से निकलकर बदनोर तक पहुंच गया जिससे अकबर को अजमेर से सम्बन्ध टूट जाने की आशंका हुई। अंत में हसनअलीखां ने बीमार होने का बहाना किया और पहाड़ों में जाने से मना कर दिया। शाही सेना को अपनी रक्षा के लिये अपने पड़ाव के चारों ओर दीवार खड़ी करनी पड़ी। इसी माह महाराणा ने अकबर पर अचानक आक्रमण करके उसे बहुत हानि पहुंचाई। कुंवर भीमसिंह ने भी मुगलों पर अचानक आक्रमण करके कई थानों को नष्ट कर दिया।

बादशाह की मेवाड़ को उजाड़ देने की आज्ञा का पालन नहीं हो सका क्योंकि मुगल अधिकारी आगे बढ़ने से इन्कार करते थे। मेवाड़ में मुगल सेना भूखों मरने लगी और रसद काफी पहरे के साथ ही अजमेर से भेजनी पड़ती थी। अकबर का प्रयत्न बिल्कुल निष्फल होने पर औरंगजेब उससे बहुत नाराज हुआ। उसने 26 जून 1680 को अकबर को चित्तौड़ से हटाकर मारवाड़ भेज दिया और उसकी जगह शहजादे आजम को नियुक्त किया।

इसके बाद औरंगजेब ने शहजादा आजम को देबारी के मार्ग से, मुअज्जम को राजनगर से और अकबर को देसूरी के मार्ग से मेवाड़ में प्रवेश कर एक साथ धावा बोलने के आदेश दिये किंतु तहव्वरखां तथा शहजादा अकबर घाटी में प्रवेश नहीं करना चाहते थे। अतः औरंगजेब को उन पर कड़ा दबाव बनाना पड़ा।

महाराणा का निधन

माना जाता है कि मेवाड़ के कुछ सामंत नहीं चाहते थे कि महाराणा राजसिंह द्वारा औरंगजेब के विरुद्ध युद्ध जारी रखा जाए। अतः जिस प्रकार महाराणा सांगा को खानवा युद्ध के बाद उसके ही कुछ सरदारों ने विष दे दिया था, संभवतः महाराणा राजसिंह को भी उसके कुछ सरदारों ने भोजन में विष दे दिया। अतः 22 अक्टूबर 1680 को महाराणा राजसिंह का आकस्मिक निधन हो गया।  उसका निधन न केवल मेवाड़ के लिये अपितु सम्पूर्ण भारतीय राजनीति के लिये सर्वाधिक दुर्भाग्यपूर्ण था।

तत्कालीन राजनीति में राजसिंह की स्थिति

राजसिंह के शासन काल में मेवाड़ ने फिर से अपनी वही प्रतिष्ठा प्राप्त कर ली जो प्रतिष्ठा उसे महाराणा संग्रामसिंह, महाराणा कुम्भा और महाराणा प्रतापसिंह के समय प्राप्त थी। महाराणा राजसिंह ने राष्ट्रीय राजनीति में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। औरंगजेब के समय में मुगल राज्य को, भारत के दो सर्वाधिक शक्तिशाली राजा- मारवाड़ नरेश जसवंतसिंह तथा आंबेर नरेश जयसिंह मित्र के रूप में उपलब्ध थे तो मेवाड़ महाराणा राजसिंह तथा मराठा नेता छत्रपति शिवाजी प्रबल शत्रुओं के रूप में विद्यमान थे।

उस काल की अधिकांश राजनीति इन्हीं राजाओं के चारों ओर केन्द्रित थी। यह देश का दुर्भाग्य था कि मारवाड़ नरेश जसवंतसिंह तथा आंबेर नरेश जयसिंह ने, उत्तराधिकार के युद्ध में दारा शिकोह के स्थान पर औरंगजेब का साथ दिया तथा महाराणा राजसिंह ने भी दारा को सहायता देने से मना कर दिया एवं उत्तराधिकार के युद्ध में विजय की ओर बढ़ रहे औरंगजेब के साथ मैत्री सम्बन्ध स्थापित कर लिये।

यदि दारा को हिन्दू राजाओं की सहायता मिली होती तो देश को औरंगजेब जैसा कट्टर एवं मानवता का शत्रु बादशाह न देखना पड़ता। हिन्दू राजाओं के इस गलत निर्णय का कारण यह माना जा सकता है कि दारा ने कभी भी राजधानी दिल्ली से बाहर निकलकर युद्ध के मैदानों में अपनी उपस्थिति नहीं दी थी इसलिये उसे हिन्दू राजाओं के साथ काम करने एवं उनसे मैत्री सम्बन्ध स्थापित करने का अवसर नहीं मिला।

जबकि औरंगजेब निरंतर युद्धों में रहा जहाँ उसे राजपूत राजाओं के साथ काम करने तथा मैत्री सम्बन्ध बनाने का दीर्घ अवसर प्राप्त हुआ। संभवतः यही कारण था कि जयपुर, जोधपुर तथा मेवाड़ के राजाओं ने औरंगजेब को ही सहायता उपलब्ध कराई।

हिन्दू राष्ट्र का प्रतीक

राजकुमारी चारुमति से विवाह कर उसके धर्म की रक्षा करने, जजिया का विरोध करने, ब्रजक्षेत्र की कृष्ण प्रतिमाओं को अपने राज्य में स्थापित करने एवं औरंगजेब के विरुद्ध कठोर संघर्ष आरम्भ करने के कारण महाराणा राजसिंह, हिन्दू राष्ट्रीय चेतना तथा भारतीय स्वातंत्र्य संघर्ष का अमर प्रतीक बन गया। बीसवीं शताब्दी में भारत का राष्ट्रगान ‘वंदे मातरम्’ लिखने वाले बंगला उपन्यासकार बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने महाराणा राजसिंह को नायक बनाकर ‘राजसिंह’ शीर्षक से एक उपन्यास की रचना की जिसने बीसवीं शताब्दी में भारतीय युवा पीढ़ी को आत्म गौरव की अनुभूति करवाई।

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