Saturday, June 19, 2021

4. चौहानों ने चार सौ साल तक तुर्कों को भारत में नहीं घुसने दिया!

गूवक (प्रथम) के बाद उसका पुत्र चंद्रराज (द्वितीय) अजमेर का शासक हुआ। उसके बाद गूवक (द्वितीय) अजमेर का राजा हुआ। इस काल तक चौहानों की प्रतिष्ठा इतनी बढ़ गई थी कि गूवक (द्वितीय) की बहिन कलावती का विवाह प्रतिहार शासक भोज (प्रथम) के साथ हुआ।

गूवक (द्वितीय) के बाद चंदनराज अजमेर की गद्दी पर बैठा। चंदनराज ने दिल्ली के निकट तंवरावटी पर आक्रमण किया तथा तंवरावटी के तोमर राजा रुद्रेन अथवा रुद्रपाल का वध कर दिया। तब से दिल्ली के तोमर शासक, अजमेर के चौहानों के अधीन सामंत हो गए।

हर्षनाथ मंदिर से मिले एक लेख के अनुसार चौहान नरेश चंदनराज की रानी रुद्राणी जिसे आत्मप्रभा भी कहते हैं, यौगिक क्रिया में निपुण थी और बड़ी शिवभक्त थी। वह पुष्कर में प्रतिदिन एक हजार दीपक अपने इष्ट महादेव को अर्पित करती थी।

इस शिलालेख से इस बात का अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है कि इस काल में पुष्कर की झील भी उनके अधिकार में आ चुकी थी। इस प्रकार इस काल में चौहानों के अधिकार में कम से कम चार बड़ी झीलें थी जिनमें से लूणकरणसर, डीडवाना तथा सांभर की झीलें खारे पानी की थीं जिनसे नमक बनता था। पुष्कर की झील मीठे पानी की थी तथा इस पर अधिकार होना बड़े गर्व की बात थी। पुष्कर को भारत के समस्त तीर्थों का प्रमुख माना जाता है।

पृथ्वीराज विजय के अनुसार चंदनराज का उत्तराधिकारी वाक्पतिराज (प्रथम) हुआ जिसे बप्पराज भी कहा जाता है। हर्षनाथ लेख में उसे महाराज कहा गया है जो उसकी राजनीतिक स्थिति का सूचक है। जब राष्ट्रकूटों ने प्रतिहारों को जर्जर कर दिया तो ग्यारहवीं शताब्दी ईस्वी में वाक्पतिराज चौहान ने प्रतिहारों को परास्त कर उनके कई क्षेत्र अपने राज्य में मिला लिये।

इस कारण उसके राज्य की दक्षिणी सीमा विंध्याचल पर्वत तक जा पहुँची। वह एक महान योद्धा था। उसने 188 युद्ध जीते। इन विजयों के कारण  वाक्पतिराज (प्रथम) का राज्य अत्यंत समृद्ध हो गया था।

इस रोचक इतिहास का वीडियो देखें–

राजा तंत्रपाल ने वाक्पतिराज पर आक्रमण किया किंतु तंत्रपाल बुरी तरह परास्त हुआ। वाक्पतिराज के तीन पुत्र थे। सिंहराज, लक्ष्मणराज तथा वत्सराज। वाक्पतिराज की मृत्यु के बाद ई.950 में सिंहराज उसका उत्तराधिकारी हुआ। लक्ष्मणराज नाडौल के पृथक राज्य का स्वामी हुआ जिसे लखनसी भी कहते थे।

सिंहराज महान राजा हुआ। उसके काल में तोमरों ने राजा लवण की सहायता से सिंहराज के राज्य पर आक्रमण किया किंतु तोमर पराजित हो गये। राजा लवण को प्राचीन पुस्तकों में सलबन भी लिखा गया है। सिंहराज ने राजा लवण को बंदी बना लिया। इस पर प्रतिहार शासक स्वयं चलकर सिंहराज के पास आया और उसने सिंहराज से प्रार्थना करके लवण को मुक्त करवाया।

सिंहराज के बारे में कहा जाता है कि उसकी कैद में उतनी ही रानियां थीं जितनी उसके महल में थीं। इस उक्ति का आशय इस बात से है कि सिंहराज ने बड़ी संख्या में शत्रु राजाओं को मारकर उनकी रानियों को बंदी बना लिया था।

सिंहराज अपनी उदारता के लिये भी उतना ही प्रसिद्ध था जितना कि सैन्य अभियानों के लिये। हम्मीर महाकाव्य कहता है कि जब उसके अभियान का डंका बजता तो कर्नाटक का राजा उसकी चापलूसी करने लगता। माही एवं नर्बदा के बीच स्थित दोआब क्षेत्र में स्थित लाट का राजा अपने दरवाजे उसके लिये खोल देता। तमिल प्रदेश का चोल नरेश कांपने लगता, गुजरात का राजा अपना सिर खो देता तथा बंगाल में स्थित अंग के राजा का हृदय डूब जाता।

सिंहराज लगातार मुसलमानों से लड़ता रहा। एक युद्ध में उसने मुसलमानों के सेनापति हातिम का वध किया तथा उसके हाथियों को पकड़ लिया। एक अन्य अवसर पर उसने, सुल्तान हाजीउद्दीन के नेतृत्व में अजमेर से 25 किलोमीटर दूर जेठाना तक आ पहुँची मुस्लिम सेना को खदेड़ दिया। सिंहराज ई.956 तक जीवित रहा। हर्ष अभिलेख के अनुसार हर्ष मंदिर का निर्माण उसके काल में ही पूरा हुआ। इस अभिलेख में चौहानों की तब तक की वंशावली दी गई है।

सिंहराज के बाद उसा पुत्र विग्रहराज (द्वितीय) चौहानों की गद्दी पर बैठा। विग्रहराज (द्वितीय) प्रतापी शासक हुआ। शक्राई लेख में उसे महाराजाधिराज लिखा गया है। उसने अपने राज्य का बड़ा विस्तार किया।

अजमेर का राज्य प्राचीन काल से सपादलक्ष (अर्थात् एक लाख तथा चौथाई लाख) कहलाता था। इससे अर्थ यह लिया जाता है कि अजमेर राज्य में सवा लाख नगर एवं गांव थे। सम्पूर्ण पूर्व एवं दक्षिणी राजपूताना, मारवाड़ का काफी बड़ा हिस्सा तथा उत्तर में भटनेर तक का क्षेत्र इस राज्य में सम्मिलित था। संस्कृत का सपादलक्ष ही हिन्दी भाषा में श्वाळक (सवा लाख) बन गया जिसमें नागौर, अजमेर तथा सांभर आते थे। विग्रहराज (द्वितीय) ने प्रतिहारों की अधीनता त्याग दी और पूर्ण रूप से स्वतंत्र हो गया।

विग्रहराज (द्वितीय) ने ई.973 से ई.996 के बीच की अवधि में गुजरात पर आक्रमण किया। गुजरात का शासक मूलराज अपनी राजधानी खाली करके कच्छ में भाग गया। इस पर विग्रहराज अपनी राजधानी अजमेर लौट आया। उसने दक्षिण में अपना राज्य नर्बदा तक बढ़ा लिया। उसने भरूच में आशापूर्णा देवी का मंदिर बनवाया।

हम्मीर महाकाव्य के अनुसार विग्रहराज (द्वितीय) ने गुजरात के राजा मूलराज का वध किया। यहाँ से चौहानों तथा चौलुक्यों का संघर्ष आरंभ हुआ जिसका लाभ अफगानियों ने उठाया। विग्रहराज (द्वितीय) के बाद दुर्लभराज (द्वितीय) तथा उसके बाद गोविंदराज (द्वितीय) अजमेर के शासक हुए।

ई.1008 में जब अफगानी आक्रांता महमूद गजनवी ने पंजाब के शासक आनंदपाल पर आक्रमण किया तब उज्जैन, कलिंजर, ग्वालियर, कन्नौज, दिल्ली तथा अजमेर के राजाओं ने एक संधि की तथा मुस्लिम आक्रमणों के विरुद्ध एक संघ बनाया। राजा आनंदपाल की सहायता के लिये हिन्दू औरतों ने अपने आभूषण गलाकर बेच दिये तथा उससे प्राप्त धन इस संघ की सहायता के लिये भेजा।

अजमेर के शासक गोविंदराज (द्वितीय) ने महमूद गजनवी को परास्त किया। पृथ्वीराज विजय में लिखा है कि गोविंदराज को वैरीघट्ट की उपाधि दी गयी थी।

इस प्रकार अजमेर के चौहानों ने सातवीं शताब्दी से लेकर ग्यारहवीं शताब्दी के प्रारम्भ तक अरब एवं अफागानी आक्रांताओं से डट कर लोहा लिया। इस काल में चौहान इतने शक्तिशाली हो गए थे कि न तो भारत के हिन्दू शासक और न अरब और अफगान के मुस्लिम आक्रांता ही चौहानों के समक्ष टिक पाते थे।

फिर भी भारत पर दुर्भाग्य की काली आंधी गहराती जा रही थी और कोई भी हिन्दू राजा उसके खतरे को गंभीरता से नहीं ले रहा था। अगली कड़ी मे देखिए- अजमेर के राजा वीर्यराम चौहान ने महमूद गजनवी को युद्ध में घायल करके भगा दिया!

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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