शेर खाँ से मिली पराजय के बाद भारत से हुमायूँ का पलायन मुगलों के इतिहास की सबसे बड़ी शर्मनाक घटना है। हुमायूँ का पलायन उसकी स्वयं की विफलता तो थी ही, उससे भी अधिक वह उसके भाइयों की गद्दारी थी
हुमायूँ का पलायन
सिंध प्रवास
हुमायूँ ने हिन्दाल के साथ लाहौर से प्रस्थान कर सिन्ध में प्रवेश किया परन्तु दोनों भाई वहाँ अधिक दिनों तक एक साथ नहीं रह सके। हुमायूँ का हिन्दाल के धर्मगुरु की कन्या हमीदा बानू के साथ प्रेम हो गया जिसके साथ उसने 31 अगस्त 1541 को विवाह कर लिया। इससे हिन्दाल हुमायूं से अप्रसन्न हो गया और उसका साथ छोड़कर कन्दहार चला गया।
हुमायूँ के साथियों की संख्या धीरे-धीरे घटने लगी। इसलिये हुमायूँ का सिन्ध में रहना खतरे से खाली नहीं रहा। हुमायूँ ने मारवाड़ के शासक राजा मालदेव के यहाँ जाने का निश्चय किया परन्तु जब वह जोधपुर के निकट पहुँचा तब उसे यह ज्ञात हुआ कि मालदेव शेरशाह से मिल गया है और हुमायूँ को कैद कर लेने का वचन दे चुका है। इस सूचना से हुमायूं आतंकित हो उठा और वहाँ से जैसलमेर होता हुआ अमरकोट की तरफ भाग खड़ा हुआ।
अमरकोट प्रवास
22 अगस्त 1542 को हुमायूँ अत्यंत दयनीय दशा में अमरकोट पहुँचा। अमरकोट के राणा ने हुमायूँ का स्वागत किया और उसे हर प्रकार से सहायता देने का वचन दिया। हुमायूूँँ लगभग डेढ़ महीने तक अमरकोट में रहा। यहीं पर 14 अक्टूबर 1542 को हमीदा बानू की कोख से अकबर का जन्म हुआ। कई महीने तक सिन्ध में भटकने के बाद हुमायूँ ने जुलाई 1543 में कन्दहार के लिए प्रस्थान किया।
भारत से निष्कासन
हुमायूँ अभी कन्दहार के मार्ग में था कि उसे सूचना मिली की मिर्जा अस्करी, कामरान की आज्ञा से उसे कैद करने आ रहा है। इस पर हुमायूँ ने अपने नवजात शिशु को अपने विश्वसनीय आदमियों के संरक्षण में छोड़कर अपनी पत्नी तथा बाईस स्वामिभक्त अनुचरों के साथ दिसम्बर 1543 में गजनी के मार्ग से फारस के लिए प्रस्थान कर दिया। इन स्वामिभक्त सेवकों में बैरमखाँ भी था। अस्करी ने हुमायूँ को चुपचाप चले जाने दिया तथा उसका पीछा नहीं किया। इस प्रकार हुमायूँ भारत की सीमाओं से बाहर चला गया।
फारस प्रवास
हुमायूँ ने मार्ग में ही एक पत्र फारस के शाह तहमास्प को भिजवाकर अपने फारस आने की सूचना भिजवाई। इस पर तहमास्प ने अपने अफसरों तथा सूबेदारों को आदेश भिजवाया कि हुमायूं का फारस राज्य में हर स्थान पर राजसी स्वागत किया जाय। फलतः जब हुमायूँ सीस्तान पहुँचा तब वहाँ के गवर्नर ने हुमायूँ का बड़ा स्वागत किया।
हुमायूँ सीस्तान से हिरात तथा नशसीमा होता हुआ फारस पहुँचा। जुलाई 1544 में हुमायूँ फारस के शाह तहमास्प से मिला। फारस में हुमायूँ अधिक प्रसन्न नहीं रहता था। हुमायूँ एक सुन्नी मुसलमान था परन्तु फारस का शाह शिया था। इसलिये एक शिया की शरण में रहना हुमायूँ के लिए पीड़ाजनक था।
हुमायूँ को पारसीकों जैसे कपड़े पहनने पड़ते थे तथा उन्हीं की तरह व्यवहार करना पड़ता था। शाह का भाई भी हुमायूँ से वैमनस्य रखने लगा। कुछ लोगों ने हुमायूँ के विरुद्ध तहमास्प के कान भरने आरम्भ किये इससे वह हुमायूं से अप्रसन्न हो गया। यहाँ तक कि हुमायूँ की जान खतरे में पड़ गई। इस स्थिति में शाह की एक बहिन ने हुमायूँ की बड़ी सहायता की।
शाह द्वारा सैनिक सहायता
तहमास्प की बहिन ने तहमास्प को हुमायूँ की सहायता करने के लिये तैयार किया ताकि हुमायूँ फिर से अपने खोये हुए राज्य को प्राप्त कर सके। शाह ने हुमायूँ को शाहजादे मुराद की अध्यक्षता में 13 हजार अश्वारोही दिये ताकि हुमायूँ कन्दहार पर आक्रमण कर सके।
इस सहायता के बदले में हुमायूँ से यह वचन लिया गया कि वह शाह की बहिन की लड़की से विवाह करेगा और जब फारस की सेना कन्दहार, गजनी तथा काबुल जीत कर हुमायूं को सौंप देगी, तब हुमायूँ कन्दहार फारस के शाह को लौटा देगा। इसके अतिरिक्त अन्य कोई धार्मिक, साम्प्रदायिक अथवा राजनीतिक शर्त नहीं रखी गई।
हुमायूँ की भारत वापसी
कंदहार पर अधिकार
हुमायूँ ने फारस के शाह की सेना के साथ भारत के लिए प्रस्थान किया। उसने सबसे पहले कन्दहार पर आक्रमण किया। कंदहार की सुरक्षा कामरान ने मिर्जा अस्करी को सौंप रखी थी। कन्दहार का घेरा लगभग पाँच माह तक चला। 3 सितम्बर 1545 को अस्करी ने कन्दहार का दुर्ग हुमायूँ को समर्पित कर दिया।
फारस के शहजादे ने हुमायूँ से यह माँग की कि वह कन्दहार को, कन्दहार से प्राप्त कोष तथा अपने भाई अस्करी के साथ फारस के शाह को समर्पित कर दे। वे लोग मिर्जा अस्करी को कैद करके शाह के पास भेजना चाहते थे। हुमायूँ ने फारस के शहजादे की प्रथम दो मांगें तो स्वीकार कर लीं परन्तु तीसरी माँग अस्वीकार कर दी क्योंकि इससे बाबर के परिवार की प्रतिष्ठा पर बहुत बड़ा धक्का लगता।
इस पर हुमायूँ का फारस वालों से झगड़ा हो गया। हुमायूं ने फारस वालों को वहाँ से मार भगाया और कन्दहार पर अधिकार स्थापित कर लिया। हुमायूँ ने फारस के शाह को प्रसन्न करने के लिए शिया मुसलमान बैरमखाँ को कन्दहार का गवर्नर बना दिया।
फारस वालों से झगड़ा
कुछ इतिहासकारों ने कन्दहार प्रकरण में हुमायूँ पर विश्वासघात करने का आरोप लगाया है परन्तु यह आरोप उचित नहीं हैं। हुमायूँ ने शाह को इस शर्त पर कन्दहार देने का वचन दिया था कि शाह हुमायूँ को काबुल, गजनी तथा बदख्शाँ जीतने में सहायता करेगा। इसलिये जब तक इन तीनों स्थानों पर हुमायूँ का अधिकार नहीं होता तब तक फारस के द्वारा हुमायूँ से कन्दहार माँगना उचित नहीं था।
फारस के शासक शिया थे जबकि कन्दहार की जनता सुन्नी थी। इस कारण फारस के शिया मुसलमान कन्दहार के सुन्नी मुसलमानों पर अत्याचार करते थे। इसलिये कन्दहार की जनता उन्हें घोर घृणा की दृष्टि से देखती थी। ऐसी स्थिति में कन्दहार फारस वालों को सौंपना उचित नहीं था। इतना ही नहीं, जब तक हुमायूँ अफगानिस्तान की विजय में संलग्न था तब तक के लिए फारस के शाह द्वारा हुमायूँ के परिवार को दुर्ग में रहने की अनुमति नहीं दी गई।
इससे हुमायूँ को बड़ी पीड़ा हुई। हुमायूँ को एक सुरक्षित आधार की आवश्यकता थी जहाँ से वह अपने युद्धों का संचालन कर सकता। उसकी इस आवश्यकता की पूर्ति कन्दहार ही कर सकता था। अतः हुमायूँ का फारस के शाह को कन्दहार नहीं देना सर्वथा उचित था।
काबुल तथा बदख्शाँ पर अधिकार
हुमायूँ ने कन्दहार को आधार बनाकर काबुल की ओर ध्यान दिया। उन दिनों हिन्दाल काबुल में था। वह कामरान का साथ छोड़कर हुमायूँ से आ मिला। कामरान के अन्य साथी भी कामरान का साथ छोड़कर हुमायूँ की तरफ आ गये। इससे कामरान भयभीत हो गया और काबुल से सिन्ध भाग गया।
नवम्बर 1545 में हुमायूँ ने काबुल में प्रवेश किया जहाँ पर वह अपने तीन वर्षीय बालक अकबर से मिला। हुमायूँ ने बदख्शाँ पर भी अधिकार कर लिया। यहाँ पर हुमायूँ बीमार हो गया। कुछ लोगों ने उसकी मृत्यु की अफवाह उड़ा दी। जब कामरान को यह सूचना मिली तो वह सिन्ध से चला आया और उसने फिर से काबुल पर अधिकार कर लिया।
स्वस्थ हो जाने पर हुमायूँ ने बदख्शाँ छोड़ दिया और काबुल का घेरा डाल दिया। कामरान ने हुमायूं तथा उसके अनुयायियों के परिवारों पर घोर अत्याचार किया तथा उन्हें तोप से उड़ाने के लिये दीवार पर लटका दिया गया। हुमायूँ के पुत्र अकबर को भी दीवार से लटका दिया गया परन्तु उसे समय पर पहचान लिया गया और तोप का मुँह फेर कर उसकी जान बचाई गई।
अप्रैल 1547 में हुमायूँ ने पुनः काबुल पर अधिकार कर लिया परन्तु कामरान ने संघर्ष जारी रखा। इन्हीं संघर्ष के दौरान एक रात को मिर्जा हिन्दाल को मार डाला गया। अन्त में कामरान घक्कर प्रदेश को भाग गया। वहाँ के शासक ने कामरान को पकड़कर हुमायूँ को समर्पित कर दिया। समस्त अमीरों की राय थी कि कामरान की हत्या करवा दी जाय परन्तु हुमायूँ इसके लिए तैयार नहीं हुआ।
इसलिये उसे अन्धा कर देने का निश्चय किया गया। दिसम्बर 1551 में कामरान को अन्धा कर दिया गया। इसके बाद उसे अपनी पत्नी तथा नौकर के साथ मक्का जाने की आज्ञा दे दी गई जहाँ 5 अक्टूबर 1557 को कामरान की मृत्यु हो गई। मिर्जा अस्करी को भी मक्का जाने की अनुमति दे दी गई।
भारत पर पुनर्विजय
अब बाबर के चार पुत्रों में से एक, हिन्दाल मारा जा चुका था, दो पुत्र कामरान तथा अस्करी मक्का जा चुके थे। इस कारण भारत में अब बाबर के पुत्रों में से अकेला हुमायूँ बचा था। उसे अपने भाइयों के विरोध से पूरी तरह छुटकारा मिल चुका था। उसके पास एक सुसज्जित तथा सुदृढ़ सेना थी।
हुमायूँ के अमीर भी उसके आज्ञाकारी बन गये थे। इसलिये उसने भारत को फिर से जीतने का निश्चय किया। भारत की परिस्थितियाँ अब हुमायूं के अनुकूल हो गई थीं क्योंकि शेर खाँ की मृत्यु हो चुकी थी तथा उसके निर्बल उत्तराधिकारियों के शासन में अफगान राज्य पतनोन्मुख हो चला था।
12 नवम्बर 1554 को हुमायूँ ने काबुल से प्रस्थान किया। 31 दिसम्बर को वह सिन्धु नदी के तट पर पहुँचा जहाँ बैरमखाँ भी उससे आ मिला। हुमायूँ ने सिन्धु नदी को पार करके बिना किसी कठिनाई के रोहतास दुर्ग पर अधिकार कर लिया। 24 फरवरी 1555 को हुमायूँ लाहौर पहुँच गया और आसानी से उस पर अधिकार कर लिया। लाहौर से हुमायूं की सेनाएँ आगे बढ़ीं। 15 मई 1555 को मच्छीवारा नामक स्थान पर अफगानों एवं मंगोलों में बड़ा युद्ध हुआ जिसमें हुमायूँ विजयी रहा।
23 जून 1555 को सरहिन्द के मैदान में मुगल तथा अफगान सेनाओं में भीषण संग्राम हुआ। इस युद्ध में भी अफगान सेना परास्त हो गई और हुमायूँ को पूर्ण विजय प्राप्त हो गई। सरहिन्द की विजय ने हुमायूँ के लिये दिल्ली का द्वार खोल दिया। वह समाना के मार्ग से दिल्ली की ओर बढ़ा। 20 जुलाई 1555 को हुमायूँ ने सलीमगढ़ दुर्ग में प्रवेश किया जो हुमायूँ के ‘दीनपनाह’ के चारों ओर बनाया गया था। इस प्रकार हुमायूँ ने अपने पूर्वजों के खोये हुए साम्राज्य को पुनः प्राप्त कर लिया।
हुमायूँ के अन्तिम दिवस
यद्यपि हुमायूँ ने दिल्ली पर अधिकार कर लिया था परन्तु अभी उसका कार्य पूरा नहीं हुआ था। पंजाब की जनता उससे सन्तुष्ट नहीं थी। सिकन्दर सूरी परास्त होकर शिवालिक की पहाड़ियों में चला गया था और अपनी शक्ति को पुनः संगठित करने में लगा हुआ था। अन्य प्रान्तों में भी अफगान सरदार बड़े शक्तिशाली थे और बिना संघर्ष किये हुमायूँ की अधीनता स्वीकार करने को तैयार नहीं थे।
इसलिये भारत विजय का कार्य अभी अपूर्ण ही था किंतु अब उसके सामने उस प्रकार की कठिनाइयाँ नहीं थी जिस प्रकार की उसके प्रारम्भिक जीवन में थीं। अब उसे बहाहुरशाह अथवा शेरशाह जैसे प्रबल शत्रुओं एवं अपने इर्ष्यालु भाइयों का सामना नहीं करना था। उसके अमीर भी उसके प्रति स्वामिभक्त बन गये थे और विश्वासघात की अधिक सम्भावना नहीं थी।
भंयकर मुसीबतों का सामना करने से हुमायूँ में दृढ़ता आ गई थी और उसका अनुभव भी बढ़ गया था। प्रशासकीय क्षेत्र में उसे किसी नई रचना की आवश्यकता नहीं थी क्योंकि शेरशाह ने बड़ी ही व्यवस्थित शासन व्यवस्था की स्थापना कर दी थी। इसलिये भारत विजय के कार्य को पूरा करना हुमायूँ के लिए असाध्य कार्य नहीं था।
हुमायूं की मृत्यु
24 जनवरी 1556 को हुमायूँ शीतल वायु का आनन्द लेने के लिए अपने दिल्ली स्थित पुस्तकालय की छत पर गया। शाम को जब वह नीचे उतर रहा था और सीढ़ी के दूसरे डण्डे पर था कि उसे अजान की आवाज सुनायी दी। वह जहाँ था वहीं पर बैठ गया परन्तु उसका पैर फिसल गया और वह सिर के बल गिर पड़ा। उसके सिर में गम्भीर चोट लगी जिसके कारण रविवार 26 जनवरी 1556 को हुमायूँ की मृत्यु हो गई। उसकी इच्छा के अनुसार उसे काबुल में दफनाया गया।
मूल आलेख – मुगल सल्तनत की अस्थिरता का युग
हुमायूँ का पलायन एवं भारत वापसी



