यह कोई व्यंग्य नहीं है, एक नंगी सच्चाई है कि इस देश के दलितों, जनजातियों, पिछड़ों, अतिपिछड़ों, अन्य पिछड़ों आदि कमजोर वर्गों पर कोई तो अत्याचार कर रहा है। केवल इन पर ही नहीं, इस देश के युवाओं, महिलाओं, बच्चों, सवर्णों, बेरोजगारों पर भी कोई न कोई अत्याचार अवश्य कर रहा है।
कौन है वह अत्याचारी। क्या आपने उसका चेहरा देखा है?
कमजोर वर्गों पर अत्याचार करने वाले को आपने नहीं देखा ना! मैंने देखा है। इससे पहले कि मैं आपको उस अत्याचारी का चेहरा दिखाऊँ, आपको मेरी बात ध्यान से सुननी और समझनी होगी। मेरी इस बात में कुछ तथ्य हैं और कुछ तर्क। मैं तथ्यों एवं तर्कों के आधार पर आपको उस अत्याचारी का चेहरा दिखाना चाहता हूँ किंतु इन तथ्यों और तर्कों तक पहुंचने में कोई जल्दबाजी भी नहीं करना चाहता।
कमजोर वर्गों पर अत्याचार एक संवेदनशील मुद्दा है और इससे केवल भारत वर्ष का ही नहीं, हिन्दू समाज का ही नहीं, सम्पूर्ण मानवता का ही नहीं, सम्पूर्ण विश्व का अस्तित्व बनता और बिगड़ता है।
कमजोर वर्गों पर अत्याचार के सम्बन्ध में तर्कों और तथ्यों से पहले, मैं आपको दो-तीन छोटी-छोटी कहानियों का स्मरण कराना चाहता हूँ, क्योंकि कहानियों के माध्यम से बड़ी से बड़ी बात आसानी से समझी जा सकती है। मैं आपको पहले से ही सुनी-सुनाई कोई झूठी कहानियां नहीं सुनाउंगा, अपितु उन कहानियों के पीछे छिपी सच्चाइयों तक ले जाने का प्रयास करूंगा।
झूठी कहानी कोई भी हो, मन को तसल्ली तो देती है किंतु झूठी कहानियों की नंगी सच्चाई यह है कि झूठी कहानियां बनाने, झूठे दर्शन गढ़ने और झूठे सिद्धांत बनाने से बुरे आदमी का ही लाभ होता है और प्रत्येक सच्चे आदमी का नुक्सान होता है।
झूठे आदमी का नुक्सान तो सच्ची कहानी से होता है न कि किसी झूठी कहानी से।
संसार भर में हजारों सालों से प्रचलित एक झूठी कहानी तो यह है कि शेर जंगल का राजा होता है! हम सचमुच ही जीवन भर इस सिद्धांत पर विश्वास करके चलते हैं कि शेर जंगल का राजा होता है, लेकिन इस झूठी कहानी से शेर का कोई लाभ नहीं होता, गीदड़ों का लाभ होता है। वास्तव में शेर कहीं का राजा नहीं होता। वह भी दूसरे जानवरों की तरह ही एक सामान्य और हिंसक जानवर होता है जो पेट की आग बुझाने के लिए जंगल में भटकता रहता है।
जंगल की क्रूर सच्चाई यह है कि शेर तब तक ही राजा है जब तक उसका सामना खरगोश और हिरण जैसे निरीह जानवरों से हेता है। शेर तब तक ही राजा है जब तक कि जंगल के छोटे-छोटे दुष्ट प्राणी एक साथ मिलकर उस पर हमला नहीं कर देते। इन दुष्ट जानवरों में भेड़िए, लक्कड़बग्घे, जंगली कुत्ते और कमजोर माने जाने वाले सियार तथा गीदड़ भी हो सकते हैं।
हाँ, सच यही है कि 10-12 भेड़िए, लक्कड़बग्घे, जंगली कुत्ते और या गीदड़ योजना बनाकर आते हैं और जंगल के राजा को घेरकर मार डालते हैं। जंगल में और भी शेर, बाघ, चीते, तेंदुए दूर खड़े इस दृश्य को देख रहे होते हैं किंतु वे जंगल के राजा की सहायता करने नहीं आते। क्योंकि उन तथाकथित राजाओं को पता है कि वे इन छोटे समझे जाने वाले दुष्ट जानवरों का कुछ भी नहीं बिगाड़ सकते, क्योंकि वे हमेशा झुण्ड में रहकर हमला करते हैं।
दूसरी ओर भेड़िए, लक्कड़बग्घे, जंगली कुत्ते, सियार और गीदड़ जानते हैं कि जंगल के राजा की सहायता करने के लिए कोई नहीं आएगा।
इसके विपरीत जब कोई शेर किसी जंगली भैंसे पर आक्रमण करता है तो तुरंत ही 10-20 जंगली भैंसे दौड़ते हुए आते हैं और उस आक्रमणकारी शेर को घेर लेते हैं, यदि शेर तुरंत ही वहाँ से भाग नहीं जाता, तो तुरंत ही मारा जाता है।
क्या इस कहानी से कुछ स्पष्ट होता है कि जंगल में कमजोर वर्गों पर अत्याचार कौन कर रहा है?
अब एक और झूठी कहानी की चर्चा करते हैं जिसमें कहा गया है- सिंहन के लेहंड़े नहीं, हंसन की नहीं पाँत। लालन की नहीं बोरियाँ, साधु न चलें जमात।
अर्थात् शेरों के कभी झुंड नहीं होते, हंस कभी कतार बाँधकर नहीं उड़ते, कीमती रत्नों की कभी बोरियां नहीं भरी जातीं और सच्चे साधु कभी भीड़ या जमात बनाकर नहीं चलते। ये सभी अपनी अपनी श्रेष्ठता में अकेले ही काफी हैं।
यहाँ हमारी दूसरी कहानी में छिपा झूठ इस रूप में सामने आता है कि सिंह केवल इसीलिए गीदड़ों और जंगली कुत्तों के द्वारा मारे दिए जाते हैं क्योंकि वे झुण्ड में नहीं होते। जब शेरों को पेट की आग सताती है, तब वे भी झुण्ड बनाते हैं और तब वे हाथी तक का शिकार कर लेते हैं, भेड़िए, लक्कड़बग्घे और गीदड़ कभी भी शेरों के झुण्ड पर हमला नहीं करते। दूर से ही निकल जाते हैं।
हंस भी इसी कारण आकाश में सुरक्षित रूप से रहकर यात्रा कर पाते हैं क्योंकि वे कतार बांध कर उड़ते हैं, जैसे ही वे कतार से अलग हुए, वे रास्ता भटक जाते हैं और कोई बाज आकर उनका शिकार कर लेता है।
रत्न अर्थात् कीमती वस्तुएं बोरियों अर्थात् तिजोरियों में बंद करके रखे जाते हैं तो ही सुरक्षित रह पाते हैं। इसी प्रकार साधु भी अपनी जमात में ही सुरक्षित रह पाता है अन्यथा उसका वही हाल होता है जो पालघर में दो साधुओं और उनके एक साथी का हुआ था।
भारत की स्थिति भी कुछ ऐसी ही है। भारत के लोगों ने कई तरह की झूठी कहानियां बना ली हैं जैसे कि हम कभी विश्वगुरु थे। निश्चित रूप से हम वेदों में प्रकट हुए ज्ञान के बल पर यह कह रहे थे किंतु भारत के वेदों को दुनिया के कितने लोगों ने माना और अपनाया? क्या कभी विश्वगुरु रहा भारत कमजोर वर्गों पर अत्याचार करता है।
क्या हम किसी व्यक्ति से यह पूछने का साहस कर सकते हैं कि भारत ऐसा कैसा विश्वगुरु था जिसके चलते दुनिया भर के मजहबों ने जन्म लिया और वे न केवल विश्वगुरु पर अपितु पूरी दुनिया पर तलवार लेकर टूट पड़े!
सच तो यह है कि विश्वगुरु होने वाली कहानी झूठी है। यह झूठी कहानी भारत के लोगों की रक्षा न तब कर सकी और न अब कर सकेगी।
भारत के लोगों की एक झूठी कहानी यह भी है- अनेकता में एकता। सच्चाई यह है कि अनेकता में कभी एकता नहीं होती। एकता में ही एकता होती है। इसीलिए वेदों में कहा गया है-
सं गच्छध्वं सं वदध्वं सं वो मनांसि जानताम्। देवा भागं यथा पूर्वे संजानाना उपासते।।
अर्थात्- वेदों का ऋषि समाज से कहता है कि तुम सब एक साथ चलो, एक साथ बोलो और तुम्हारे मन एक समान होकर ज्ञान प्राप्त करें। जिस प्रकार प्राचीन काल में देवता एकमत होकर अपना-अपना भाग ग्रहण करते थे, वैसे ही तुम भी अपनी एकता बनाए रखो।
समानो मन्त्रः समितिः समानी समानं मनः सह चित्तमेषाम्। समानं मन्त्रमभि मन्त्रये वः समानेन वो हविषा जुहोमि।।
कुछ समय पहले भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी एक भाषण में इस वेदमंत्र को उद्ध्त कियाा था। इसका अर्थ यह कि ऋषि समाज का आह्वान करता है कि तुम सबके विचार समान हों, तुम्हारी सभा (संगठन) एकतापूर्ण हो, तुम्हारे मन और चित्त एक हों। मैं तुम्हें समान विचार से अभिमन्त्रित करता हूँ और समान श्रद्धा के साथ तुम्हारी आहुति स्वीकार करता हूँ।
समानी व आकूतिः समाना हृदयानि वः। समानमस्तु वो मनो यथा वः सुसहासति।।
अर्थात् तुम सबका संकल्प एक जैसा हो, तुम्हारे हृदय एक समान हों और तुम्हारा मन एक हो, जिससे तुम्हारा पारस्परिक संगठन और सहयोग पूर्णतः सुदृढ़ हो सके।
ऋषियों ने ये मंत्र क्यों लिखे। इसलिए लिखे क्योंकि वे जानते थे कि यदि हम एक नहीं हुए तो बुरे विचारों वाले लोग, मक्कार लोग, दुष्ट लोग, हिंसक लोग हमें मारकर नष्ट कर देंगे। वेदों में एक भी मंत्र ऐसा नहीं है जो भारत के लोगों को कमजोर वर्गों पर अत्याचार करने के लिए उकसाता है।
हमारा दुर्भाग्य यह रहा कि ऋषियों ने हमें ये मंत्र तो दिए जिनके बल पर हमने स्वयं को विश्वगुरु मान लिया किंतु हम इन मंत्रों को जीवन में उतारने में सफल नहीं रहे। हम कभी एक नहीं रह सके। कभी एक साथ नहीं चल सके। हमने स्वयं को अपने-अपने स्वार्थों और मनसिक कुंठाओं की अलग-अलग गुफाओं में बंद कर लिया।
यही कारण था कि दुनिया भर के भेड़ियों, जंगली कुत्तों, लक्कड़भग्गों और गीदड़ों ने स्वयं को शेर मानने वाले विश्वगुरु पर बार-बार हमले किए और हम एक जुट होकर उनका सामना करने की बजाय स्वयं को विश्वगुरु बताकर उन्हें डराने का प्रयास करते रहे।
हम समझ ही नहीं पाए कि भेड़ियों, जंगली कुत्तों, लक्कड़भग्गों और गीदड़ों को शेर के गौरव, गरिमा और महिमा से कुछ लेना-देना नहीं होता। उनके लिए सबसे बड़ा मंत्र पेट की भूख है, मन की आग है, दिमाग की अशांति है। लाल खून की प्यास है और पीले सोने की भूख है।
अब हम कुछ रहस्यमय गुफाओं की बात करते हैं जिनका निर्माण 1947 में आजादी मिलने के बाद हुआ और पूरे भारतीय समाज को बंद कर दिया गया है। इन गुफाओं में दलितों, पिछड़ों और अन्य पिछड़ों पर ही नहीं भारत के प्रत्येक नागरिक पर अत्याचार किया जा रहाहै। क्या ही अच्छा हो यदि हम इन गुफाओं की बात करने से पहले पश्चिमी विद्वान प्लेटो द्वारा लिखे गए गुफा के सिद्धांत की चर्चा करते हैं। इस सिद्धांत से कमजोर वर्गों पर अत्याचार की धारणा का कुछ स्पष्टीकरण मिल सकता है!
प्लेटो हमें एक ऐसी गुफा की कल्पना करने को कहते हैं जहाँ कुछ लोग बचपन से ही जंजीरों में बंधे हैं। वे कैदी गुफा में बनी केवल एक दीवार की ओर ही देख सकते हैं जो आके से बंद है किंतु अर्द्धपारदर्शी है। जंजीरों में बंधे इन लोगों को पीछे मुड़कर दूसरी दीवार देखने की छूट नहीं है जिसमें एक लम्बा सा मार्ग खुला हुआ है जिससे होकर गुफा से बाहर जाया जा सकता है।
जंजीरों में बंधे हुए कैदी जिस दीवार की तरफ देखते हैं, उस दीवार के दूसरी तरफ आग जल रही है। आग और कैदियों के बीच एक संकरा रास्ता है जहाँ से कुछ दुष्ट लोग तरह-तरह के पशु-पक्षियों की आकृतियों के खिलौने लेकर गुजरते हैं। जब वे घोड़े की आकृति का खिलौने लेकर निकलते हैं तो कैदियों को मुर्गे की आवाज सुनाते हैं। घोड़े की यह आकृति सदैव काले रंग की होती है।
जब वे दुष्ट लोग मुर्गे की आकृति लेकर चलते हैं तो उस समय कैदियों को घोड़े की आवाज सुनाई देती है।
जीवन भर इन्हीं दृश्यों को देखकर गुफा में बंद कैदी दीवार पर उभरने वाली उन आकृतियों की परछाइयों को ही असली दुनिया मान लेते हैं। वे मानते हैं कि घोड़ा केवल काला होता है और उसकी आवाज मुर्गे जैसी होती है। मुर्गा भी केवल काला होता है और उसकी आवाज घोड़े की हिनहिनाहट जैसी होती है। इन कैदियों के लिए दुनिया में केवल दो ही रंग हैं एक घोड़े और मुर्गे का अर्थात् काला और दूसरा आग का अर्थात् लाल।
इन कैदियों में से कुछ बुद्धिमान कैदी भी होते हैं जो तरह-तरह के तर्क-वितर्क और दर्शन के आधार पर व्याख्या करते रहते हैं कि घोड़े और मुर्गे का रंग काला होने पर भी उनकी आवाजें अलग-अलग क्यों हैं? आग का रंग लाल ही क्यों है, दुनिया में केवल काला और लाल रंग ही क्यों है? बहुत से कैदियों ने यह भी व्याख्या की है कि घोड़ा ऐसे क्यों बोलता है और मुर्गा वैसे क्यों बोलता है। गुफा में बंद ये लोग इतने बुद्धिमान हो चुके हैं कि वे ये भी बताते हैं कि इन रंगों और आवाजों से गुफा में बंद कर दिए गए कैदियों का कितना भला हो रहा है!
अचानक एक दिन एक कैदी किसी तरह अपनी जंजीर तोड़ देता है और गुफा में पीछे की ओर बने मार्ग से चलता हुआ गुफा के बाहर निकल जाता है। गुफा से बाहर निकलकर वह हैरान रह जाता है।
जब वह गुफा से बाहर असली दुनिया और चमकीले सूरज को देखता है। उसकी आँखें चौंधिया जाती हैं, लेकिन धीरे-धीरे उसकी आंखें खुलती हैं और वह हरे रंग के पत्ते, लाल, पीले और सफेद रंग के फूल, नीले रंग का आकाश और बिना रंग का पानी देखता है। वह काले घोड़ों के साथ-साथ भूरे, सफेद और नीले रंग के घोड़े भी देखता है। वह काले रंग के मुर्गों के साथ-साथ लाल, भूरे, पीले और सफेद रंग के मुर्गे भी देखता है। उसे घोड़ों की हिनहिनाहटें सुनकर आश्चर्य होता है और वह जान जाता है कि यह मुर्गे की आवाज नहीं है। मुर्गे की आाज सुनकर भी जान जाता है कि यह घोड़े की आवाज नहीं है।
वह व्यक्ति जान जाता है कि दुनिया में केवल दो ही रंग नहीं हैं, दो ही आवाजें नहीं हैं, दो ही प्रकार के प्राणी नहीं हैं। दुनिया बहुत बड़ी है और यहाँ प्रत्येक वस्तु कई प्रकार की है।
गुफा से बाहर आया व्यक्ति यह सोचकर दुखी हो जाता है कि आजतक कुछ लोगों को गुफा में बंद करके तथा जंजीरों में बांधकर इसलिए रखा गया है तथा उन्हें दीवार के पीछे जलती हुई आग और चलती हुई परछाइयां इसलिए दिखाई जाती रही हैं ताकि उन लोगों को बेवकूफ बनाकर असली दुनिया देखने से रोका जा सके और कुछ दुष्ट लोगों के स्वार्थ पूरे किए जा सकें।
वह आदमी समझ जाता है कि असली दुनिया गुफा में से दिखने वाली आग और परछाइयों से कहीं अधिक सुंदर और वास्तविक है।
वह आदमी वापस उसी गुफा में लौटकर अन्य कैदियों को वास्तविक दुनिया के बारे में बताता है। गुफा के कैदी पहले तो उसका मजाक उड़ाते हैं और उसे पागल समझने लगते हैं किंतु जब गुफा में लौटकर आया आदमी अपनी बात बार-बार दोहराता है तो गुफा के कैदी उसे पीटते हैं। अंत में उसकी जान ले लेते हैं। क्योंकि गुफा में बंद आदमी कभी भी अपने दिमाग में बन चुकी गुफाओं से बाहर आने को तैयार नहीं होते।
आज से ढाई हजार साल पहले प्लेटो द्वारा लिखा गया यह रूपक आज भी जीवित है। आज भी उस गुफा में बंद लोग मानते हैं कि उनका जो दोस्त बेड़ियां तोडकर गुफा से बाहर गया था, वही है जो कमजोर वर्गों पर अत्याचार करता है। जब से हमारा देश आजाद हुआ है, तब से हमें अलग-अलग तरह की गुफाओं में बंद करके कमजोर वर्गों पर अत्याचार करने वालों की अलग-अलग परछाइयां दिखाई जा रही हैं।
इन गुफाओं की रक्षा अलग-अलग रंग के कपड़े पहनने वाले लोगों द्वारा की जा रही है। वास्तव में इन गुफाओं के रक्षकों ने ही इन गुफाओं का निर्माण किया है।
कुछ लोगों को दलित नामक एक गुफा में बंद कर दिया गया है और उसमें बंद लोगों से कहा जा रहा है कि सवर्ण जातियों ने हजारों सालों से तुम पर अत्याचार किए हैं। हम तुम्हें उनके अत्याचारों से मुक्त करवाएंगे। इस गुफा के बाहर कुछ लोग हाथी पर बैठे हैं तथा पूरी मुस्तैदी से ध्यान रख रहे हैं कि इस गुफा में बंद आदमी कभी गुफा से निकलकर सच्चाई को न जान लें।
दूसरी गुफाओं में कुछ लोगों को सामाजिक रूप से पिछड़ा, कुछ को आर्थिक रूप से पिछड़ा, कुछ को अतिपिछड़ा तो कुछ को अन्य-पिछड़ा आदि कहकर बंद कर दिया गया है। उन्हें समझाया जा रहा है कि तुम्हारा जीवन केवल आरक्षण से सुधर सकता है और तुम्हें न्याय केवल हम ही दिलवा सकते हैं। इस गुफा का निर्माण एक ऐसे प्रधानमंत्री ने किया था जो फैज टोपी लगाता था। इसलिए इस गुफा की रक्षा करने वाले लोग भी फैज टोपी पहनते हैं। उसने कमजोर वर्गों पर अत्याचार करने के नाम पर देश में एक नए तरह का अत्याचार लाद दिया।
भारत की आजादी के बाद, छः प्रकार की अलग-अलग धार्मिक एवं मजहबी पहचान वाले लोगों को अल्पसंख्यक नामक गुफा में बंद कर दिया गया है। इस गुफा के बाहर कुछ हरी टोपियां हाथों में पत्थर लिए खड़ी हैं ताकि गुफा की रक्षा भली भांति की जा सके।
एक गुफा में बंद लोगों को कहा जा रहा है कि तुम सवर्ण हो, सरकार दूसरी गुफाओं में बंद लोगों के पक्ष में कानून बनाकर सवर्णों का अर्थात् तुम्हारा हक छीन रह है। इस गुफा की रक्षा करने के लिए गुफा के बाहर कोई नहीं खड़ा।
एक गुफा में देश की समस्त महिलाओं को बंद कर दिया गया है और उन्हें समझाया जा रहा है कि पुरुषों ने हजारों सालों से महिलाओं को घर में कैद करके रखा है और उन पर भयानक अत्याचार किए हैं। इस गुफा की रखवाली कुछ मोटी-ताजी ताकतवर महिलाएं करती हैं ताकि गुफा में बंद महिलाएं गुफा से बाहर आकर पुरुषों के बारे में सच्चाई न जान जाएं।
एक गुफा में देश के युवाओं को बंद कर दिया गया है तथा उन्हें समझाया जा रहा है कि तुम तो जेन-जी हो। तुम पर देश के बूढ़े-बुजुर्ग अत्याचार कर रहे हैं। घरों से निकलो और सरकार पर टूट पड़ो। इस गुफा की रखवाली कुछ युवा लड़के कर रहे हैं।
देश में नित नई गुफाएं बन रही हैं जिनमें कमजोर वर्गों पर अत्याचार के नाम पर उन-उन लोगों को ले जाकर बंद किया जा रहा है जिन पर कभी कोई अत्याचार नहीं हुआ।
कुछ समय पहले एक गुफा का नाम अजगर अर्थात् अहीर, जाट, गूजर और राजपूत रखा गया था। उसी दौरान एक और गुफा बनाई गई थी जिसके बाहर लिखा गया था- तिलक, तराजू और तलवार, इनको मारो जूते चार।
हाल ही में एक गुफा का नाम पीडीए अर्थात् पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक रख दिया गया है। इस गुफा के बाहर कुछ आदमी नीली टोपी पहनकर खड़े हैं ताकि गुफा में बंद लोग बाहर न आ जाऐ।
इन सारी गुफाओं को देखकर लगता है कि इस देश में आजादी के बाद न केवल कमजोर वर्गों पर अत्याचार हो रहे हैं अपितु हर वर्ग के लोगों पर इतने अत्याचार हो रहे हैं जितने आजादी से पहले भी नहीं रहे होंगे।
इन सारी गुफाओं से थोड़ी ही दूरी पर बुरी तरह से कन्फ्यूज्ड लोगों की एक भीड़ खड़ी है। इस भीड़ ने अपने हाथों में कमल के फूल ले रखे हैं और पीली टोपियां लगा रखी हैं। इस भीड़ में शामिल लोगों को पता ही नहीं है कि उन्हें गुफा में बंद लोगों का करना क्या है। उन्हें कौनसी गुफा में बंद लोगों की रक्षा क्यों और कैसे करनी है! इसलिए कभी एक गुफा की तरफ देखकर कहते हैं कि हमें केवल इसी गुफा की रक्षा करनी है और कभी कहते हैं कि नहीं हमें तो सभी गुफाओं की रक्षा करनी है ताकि प्रत्येक व्यक्ति अपनी-अपनी गुफा में ढंग से बंद रहे तथा घोड़े की आकृति के साथ मुर्गे की आवाज सुनता रहे।
मेरी बात लगभग पूरी हो चुकी है, अब आप स्वयं ही समझ गए होंगे कि भारत में दलितों, पिछड़ों और अन्य पिछड़ों पर कौन अत्याचार कर रहा है!
हम पर कोई अत्याचार नहीं कर रहा। हम सबने स्वयं को अपने-अपने स्वार्थों की गुफाओं में बंद कर लिया है। यह हमारा देश है, हम किसी के बहकावे में आकर अपने देश को बर्बाद न करे। जातियों के बंधन से बाहर निकलें। सामाजिक रूढ़ियों के बंधन से बाहर निकलें। अपने-अपने दिमाग में बन चुकी गुफाओं से बाहर निकलें।
बात केवल इतनी नहीं है कि यह हमारा देश, यह हमारी आने वाली पढ़ियों का भी देश है। उनके लिए सुरक्षित और सुंदर देश बनाना ही हमारे जीवन का लक्ष्य होना चाहिए। नेताओं के बहकावे में आते रहेंगे तो देश को बर्बादी की ओर ले जाएंगे। हमारा एक ही लक्ष्य है- सर्वे भवंतु सुखिनः और यह तब तक प्राप्त नहीं होगा जब तक हम स्वयं को केवल और केवल भारतवासी नहीं समझेंगे। हम उन वैदिक ऋषियों की ओर एक बार तो देखें जो सबके सुख की कामना करते थे। हिंसा छोड़ें, अपने आसपास प्रेम और शांति स्थापित करें।
काश क्या कभी वह दिन भी आएगा जब हम कमजोर वर्गों पर अत्याचार के नाम पर बनाई गई सारी की सारी गुफाओं के लोग एक साथ अपनी अपनी गुफाओं को तोड़ डालेंगे और खुले आकाश में चमकते हुए सत्य के प्रकाश का दर्शन कर सकेंगे।
-डॉ. मोहनलाल गुप्ता



