Thursday, February 26, 2026
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कातर निगाहें (28)

बैराम खाँ एक ऐसा स्वामिभक्त था जिसके हृदय में निजी अभिमान का अंशमात्र भी नहीं होता और जो अपने स्वामी की कातर निगाहें देखने के बजाय मर जाना अधिक पसंद करता है, भले ही स्वामी कितना ही मक्कार और बदजात क्यों न हो!

कामरान ने एक माह तक बैराम खाँ को अपने पास रखा उसने हुमायूँ से मेल करने का आश्वासन दिया किंतु मन में मैल बनाये रहा। इस समय वह बैराम खाँ के साथ बदसलूकी नहीं कर सकता था क्योंकि मिर्जा अस्करी उसकी कैद में था। बहुत सोच-विचार कर उसने अपनी फूफी खानजादा बेगम को भी बैरामखाँ के साथ कर दिया ताकि खानजादा बेगम हुमायूँ से मिर्जा अस्करी के लिये क्षमादान मांग सके।

कामरान से विदा लेकर बैराम खाँ कांधार लौटा। उस समय तक बैरामखाँ का संदेश पाकर हुमायूँ भी हिन्दुकुश पर्वत पार करके कांधार आ गया था और काबुल से बैराम खाँ के लौटने की प्रतीक्षा कर रहा था।

बरसों बाद फूफी को जीवित देखकर हुमायूँ बहुत प्रसन्न हुआ। फूफी खानजादा बेगम ने घड़ियाली आँसू बहाते हुए हुमायूँ से मिर्जा अस्करी के प्राणों की भीख मांगी तथा चंगेजखाँ और तैमूर के वंशज को सामान्य अपराधियों की भांति न मारने की प्रार्थना की। हुमायूँ तो पहले से ही तैयार बैठा था। अब उसे फूफी का समर्थन भी मिल गया था।

जब बैराम खाँ मिर्जा अस्करी की गर्दन में तलवार डालकर उसे हुमायूँ के सामने लाया तो बाबर की औलाद को इस हालत में देखकर हुमायूँ का दिल दहल गया। उसने सहारे के लिये अपने दोनों ओर नजरें दौड़ाईं उसके एक ओर चगताई[1]  और एक ओर कजलबाश[2]  अमीर अपने-अपने दरजे से परा[3]  बांधकर खड़े थे। किसी अमीर की हिम्मत न हुई कि वह बैरामखाँ के खिलाफ एक भी शब्द कह सके।

हारकर हुमायूँ ने कातर दृष्टि से बैरामखाँ की ओर देख कर कहा- ‘मैं जानता हूँ कि यह तुम्हारा अपराधी है और तुमने इसे गिरफ्तार किया है किंतु मेरी आज्ञा है कि मिर्जा अस्करी के गले में से तलवार निकाल दी जाये।’

बैराम खाँ ने स्वामिभक्ति दिखाई और बिना किसी हील-हुज्जत के तत्काल आदेश का पालन किया। गले में से तलवार निकलते ही मिर्जा अस्करी ने हुमायूँ को आदाब बजाया और नौ-नौ आँसू बहाता हुआ हुमायूँ के पैरों में बैठ गया। हुमायूँ ने अपने धूर्त भाई को गले से लगा लिया।

आँखों में आँसू भरकर हुमायूँ ने फिर बैराम खाँ की ओर देखा- ‘अपने अपराधी के लिये तुम क्या सजा मुकर्रर करते हो खानका?’

बैराम खाँ तो जानता था कि अस्करी के भाग्य का यही फैसला होने वाला है किंतु संभवतः हुमायूँ नहीं जानता था कि बैरामखाँ एक ऐसा स्वामिभक्त था जिसके हृदय में निजी अभिमान का अंशमात्र भी नहीं होता और जो अपने स्वामी की कातर निगाहें देखने के बजाय मर जाना अधिक पसंद करता है, भले ही स्वामी कितना ही मक्कार और बदजात क्यों न हो!

बैराम खाँ ने पूरे सम्मान के साथ हुमायूँ को आदाब बजाया और चुपचाप दरबार से बाहर हो गया। जाने क्यों उसे ऐसा लगा कि उसने मिर्जा अस्करी की नहीं अपितु बालक अकबर की जान बख्शी है। फूफी नमक हराम अस्करी को अपने साथ कामरान के पास ले गयी।

-अध्याय 28, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक


[1] मुगल, चंगेजखां के वंशज।

[2] ईरानी लाल टोपी वाले। तुर्की भाषा में कजलवास का अर्थ होता है लाल टोपी वाले।

[3] पंक्ति।

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