Friday, August 12, 2022

5. मसाला द्वीपों से व्यापार के लिए यूरोप में प्रतिस्पर्द्धा

भारत में गुप्त काल एवं उससे पहले भी ईस्ट-इण्डीज द्वीपों के साथ व्यापार होता आया था। 16वीं शताब्दी ईस्वी में जब भारत में मुगल शासन की स्थापना हुई, तब भी यह व्यापार बिना किसी बड़ी बाधा के किया जा रहा था। भारतीय निर्यात की मुख्य वस्तुएँ, सूती कपड़ा, अनाज, तेल के बीज, ज्वार, चीनी, चावल, नील, सुगंधित पदार्थ, सुगन्धित लकड़ी तथा पौधे, कर्पूर, लवंग, नारियल, विभिन्न जानवरों की खालें, गेंडे तथा चीते की खाल, चंदन की लकड़ी, अफीम, काली मिर्च तथा लहसुन थे। ये उत्पाद यूरोपीय देशों के साथ-साथ जावा, सुमात्रा, बोड़ा, मलाया, बोर्नियो, अकनि, पेगु, स्याम, बेटम आदि पूर्वी देशों को जाते थे। उस काल में भारत से अफीम पेगु (लोअर बर्मा), जावा, चीन, मलाया, फारस एवं अरब देशों को भेजी जाती थी। जिस काल में भारत में मुगल शासन अपनी जड़ें जमा रहा था, उसी काल में यूरोप के छोटे-छोटे देशों में पूर्वी द्वीप समूह के मसाला द्वीपों से व्यापार करने की प्रतिस्पर्द्धा अपने चरम पर पहुंच रही थी।

यूरोपीय देशों में समुद्रों पर वर्चस्व के लिए प्रतिस्पर्द्धा

15वीं शताब्दी के अन्तिम दशक में यूरोप के विभिन्न देशों ने सुदूर देशों के समुद्री मार्गों का पता लगाने का अभियान चलाया ताकि उनके साथ व्यापार किया जा सके। इस अभियान में यूरोप का एक छोटा देश पुर्तगाल सबसे आगे रहा। पुर्तगालियों ने फारस की खाड़ी में होरमुज से लेकर मलाया में मलक्का और इण्डोनेशिया में मसाला द्वीपों तक समस्त समुद्र तट पर अधिकार कर लिया। अपना व्यापारिक दबदबा बनाए रखने के लिए वे अन्य यूरोपीय देशों से जबर्दस्त युद्ध करते रहे। वे समुद्र में डाका डालने तथा लूटपाट करने में तनिक भी नहीं हिचकिचाते थे। उन्नीसवीं सदी के एक प्रसिद्ध ब्रिटिश इतिहासकार ने लिखा है- ‘पुर्तगालियों ने सौदागरी को ही अपना मुख्य पेशा बना लिया किंतु अँग्रेजों और डचों की तरह उन्हें भी अवसर मिलते ही लूटपाट करने में कोई आपत्ति नहीं हुई।’

पुर्तगाल अत्यंत छोटा देश था। सोलहवीं शताब्दी में उसकी जनसंख्या केवल 10 लाख थी। इसलिए पुर्तगाल लम्बे समय तक फारस की खाड़ी से लेकर पूर्वी मसाला द्वीपों पर अपना व्यापारिक दबदबा बनाए नहीं रख सका। सोलहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में इंग्लैण्ड, नीदरलैण्ड एवं फ्रांस ने स्पेन तथा पुर्तगाल के एकाधिकार के विरुद्ध संघर्ष छेड़ दिया। इस संघर्ष में स्पेन तथा पुर्तगाल को बर्बाद होना पड़ा। पुर्तगाल तथा स्पेन आपस में भी लड़ते रहे। ई.1580 में पुर्तगाल पर स्पेन का अधिकार हो गया।

डच लोग हॉलैण्ड नामक छोटे से यूरोपीय देश में रहा करते थे। यह देश यूरोप में जर्मनी तथा बेल्जियम के बीच स्थित था। बाद में उन्होंने अपने देश का नाम बदलकर नीदरलैण्ड कर लिया। ये लोग लम्बे समय से पूर्वी द्वीपों के मसालों का व्यापार करते थे। डचों को पूर्वी देशों के मसाले, पुर्तगाल में खरीदने पड़ते थे जिन्हें वे उत्तरी यूरोप में बेचते थे। जब स्पेन ने पुर्तगाल पर अधिकार कर लिया तब डचों को पूर्वी द्वीपों के मसालों का व्यापार करने के लिए परम्परागत मार्ग छोड़कर, नये मार्ग खोजने की आवश्यकता हुई। ई.1602 में डचों ने भारत तथा ईस्ट-इण्डीज द्वीपों से व्यापार करने के उद्देश्य से डच ईस्ट इण्डिया कम्पनी का गठन किया।

पुर्तगाल पर अधिकार कर लेने के कारण समुद्रों में स्पेन की तूती बोलने लगी थी किंतु ई.1588 में अँग्रेजों ने आर्मेडा नामक स्पेनिश जहाजी बेड़े को हरा कर स्पेनिश नौसैनिक श्रेष्ठता को भंग कर दिया। इस विजय ने अँग्रेजों और डच सौदागरों (नीदरलैण्ड वासियों) को भारत आने के लिए उत्तमाशा अंतरीप के मार्ग का प्रयोग करने तथा पूर्व में साम्राज्य की स्थापना के लिए प्रतियोगिता में भाग लेने में समर्थ बना दिया। अंत में डचों ने इण्डोनेशिया पर और अँग्रेजों ने भारत, श्रीलंका तथा मलाया पर अधिकार कर लिया। भारत में पुर्तगालियों के अधिकार में गोआ, दमन और ड्यू के अतिरिक्त कुछ नहीं रहा। फ्रांस भी पुर्तगाल, नीदरलैण्ड, स्पेन तथा इंग्लैण्ड की तरह समुद्री रास्तों पर अपना दबदबा स्थापित करने के प्रयास करता रहता था किंतु फ्रांस देश के भीतर ही अशांति से गुजर रहा था इसलिए वह इस स्पर्द्धा में पीछे रह गया। ई.1604-19 के मध्य फ्रांस की सरकार ने दो बार फ्रेंच ईस्ट इंडिया कम्पनी स्थापित की किन्तु ये कम्पनियाँ असफल रहीं। लुई चौहदवें के शासनकाल में उसके मंत्री कालबर्ट ने ई.1644 में तीसरी बार फ्रेंच ईस्ट इंडिया कम्पनी की स्थापना की। इस कम्पनी को भारत तथा ईस्ट-इण्डीज देशों में व्यापार के साथ-साथ उपनिवेश स्थापित करने तथा ईसाई धर्म का प्रसार करने का काम सौंपा गया।

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मसाला द्वीपों के लिए पुर्तगालियों एवं डचों में संघर्ष

पुर्तगालियों ने ई.1511 में मलक्का पर अधिकार कर लिया तथा शीघ्र ही वे ईस्ट-इण्डीज द्वीपों पर अपना दबदबा स्थापित करने में सफल हो गए। हॉलैण्ड (नीदरलैण्ड) के डच व्यापारियों को ईस्ट-इण्डीज देशों के मसाले पुर्तगाल के बाजारों से खरीदने पड़ते थे किंतु जब ई.1580 में पुर्तगाल पर स्पेन ने कब्जा जमा लिया और ई.1588 में स्पेन को इंग्लैण्ड ने पीट दिया तब डच लोगों ने सीधे ही ईस्ट-इण्डीज देशों की तरफ कदम बढ़ाने आरम्भ किए। ई.1602 में हॉलैण्ड में डच ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थापना हुई। वे भारत के साथ-साथ दक्षिण-पूर्व एशिया के मसाला बाजारों में प्रवेश करने के उद्देश्य से आए थे। शीघ्र ही डच लोग पुर्तगालियों पर हावी होने लगे। उन्होंने ई.1605 में अम्बोयाना पर सत्ता स्थापित कर ली तथा ई.1619 में जकार्ता जीतकर इसके खंडहरों पर ”बैटेविया” नामक नगर बसाया। ई.1639 में उन्होंने भारत में गोवा पर घेरा डाला और इसके दो साल बाद, ई.1641 में पुर्तगालियों से मलक्का भी छीन लिया। ई.1658 में डचों ने सीलोन की अंतिम पुर्तगाली बस्ती पर अधिकार जमा लिया। डचों ने भारत के गुजरात प्रांत में कोरोमंडल समुद्र तट, बंगाल, बिहार तथा उड़ीसा में अपनी व्यापारिक कोठियां खोलीं। डच लोग मुख्यतः मसालों, नीम, कच्चे रेशम, शीशा, चावल एवं अफीम का व्यापार करते थे। ई.1759 में हुए ”वेदरा के युद्ध” में अंग्रेजों से हार के बाद डचों का भारत में अंतिम रूप से पतन हो गया किंतु वे ईस्ट-इण्डीज द्वीपों पर अपना दबदबा बनाए रखने में सफल रहे।

इण्डोनेशिया पर डच ईस्ट इण्डिया कम्पनी का राज्य

 18वीं शताब्दी के मध्य में जावा माताराम मुस्लिम राजवंश को अपने क्षेत्र एवं शक्ति डच ईस्ट इण्डिया कम्पनी के समक्ष समर्पित करने पड़े। ई.1749 में डच ईस्ट इण्डिया कम्पनी जावा की वास्तविक शासक शक्ति बन गई।

डचों द्वारा मसाला द्वीपों का शोषण

डचों ने दक्षिण-पूर्वी एशियाई द्वीपों का भयानक शोषण किया। 16वीं से 18वीं शताब्दी की अवधि में हॉलैण्ड (नीदरलैण्ड) यूरोप का सर्वाधिक धनी देश माना जाता था। इण्डोनेशिया के लोग सदियों से चावल की खेती करते आए थे जो कि उनका मुख्य आहार था किंतु डचों ने उन्हें पकड़कर दास बना लिया और उनसे गन्ना एवं कॉफी की खेती करवाने लगे ताकि वे अंतर्राष्ट्रीय बाजार में अधिक लाभ अर्जित कर सकें। इस कारण इन द्वीपों पर अनाज की कमी हो गई और भुखमरी फैल गई।

इण्डोनेशियाई द्वीपों पर नेपोलियन बोनापार्ट का शासन

ई.1789-99 के बीच फ्रांस में नेपोलियन बोनापार्ट के समय राजनीतिक एवं सामजिक क्रांति हुई। फ्रांस के नए सम्राट नेपोलियन बोनापार्ट ने इण्डोनेशिया सहित पूर्वी एशिया एवं मध्य एशिया के बहुत से द्वीपों पर अधिकार कर लिया तथा इण्डोनेशिया में फ्रांस की प्रभुसत्ता स्थापित हो गई।

इण्डोनेशियाई द्वीपों पर इंगलैण्ड का शासन

ई.1811 में ब्रिटेन ने नेपोलियन बोनापार्ट से इण्डोनेशिया छीन लिया। इंग्लैण्ड भी केवल 8 वर्ष तक इण्डोनेशिया पर अधिकार बनाए रख सका। ई.1819 में आयोजित वियेना कांग्रेस में हुए निर्णय के अनुसार इंग्लैण्ड ने इण्डोनेशिया के द्वीप हॉलैण्ड (डचों) को सौंप दिए।

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