Saturday, April 4, 2026
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अजेय चित्तौड़ अकबर की आंखों में चुभता था जैसे रावण की आंखों में अयोध्या (77)

 अजेय चित्तौड़ दुर्ग (Invincible Chittorgarh Fort) महाभारत काल से गंभीरी नदी के तट पर अपना गर्वोन्नत भाल ऊंचा किए खड़ा था। इसने बैक्ट्रिया से आए यूनानी योद्धाओं के आक्रमणों को अपनी आंखों से देखा था। प्रत्येक विदेशी आक्रांता की आंखों में चित्तौड़ का दुर्ग चुभता था।

अकबर (Akbar) की आंखों में भी अजेय चित्तौड़ दुर्ग वैसे ही चुभता था जैसे रावण की आंखों में अयोध्या चुभती थी और कंस की आंखों में नंदगांव चुभता था। मुगलों के आगमन के समय अयोध्या के रघुवंशियों के वंशज अजेय चित्तौड़ दुर्ग पर राज्य करते थे जिन्हें गुहिल, राणा एवं सिसोदिया कहा जाता था।

चित्तौड़ दुर्ग की सेनाओं ने महाराज खुमांण के नेतृत्व में आठवीं शताब्दी ईस्वी में खलीफाओं (Khalifa) की उन सेनाओं को मार डाला था जिन्होंने सिंध के मरुस्थल (Desert of Sindh) को पार करके भारत भूमि पर पहला आक्रमण किया था।

उसी समय से चित्तौड़ दुर्ग विदेशी आक्रांताओं की आंखों की किरकिरी बना हुआ था। चौदहवीं शताब्दी ईस्वी में दिल्ली के सुल्तान अल्लाउद्दीन खिलजी ने तथा सोलहवीं शताब्दी ईस्वी में गुजरात के सुल्तान बहादुरशाह ने चित्तौड़ का दुर्ग जलाया था किंतु दो बार भस्म होने के बाद भी चित्तौड़ का दुर्ग पूरी आन, बान और शान के साथ अपनी ही राख से उठ खड़ा हुआ था और भारत माता के शत्रुओं पर आंख तरेरता रहता था।

महाराणा कुंभा (Maharana Kumbha) और महाराणा सांगा (Maharana Sanga) ने उत्तर भारत के मुस्लिम शासकों में कसकर मार लगाई थी इसलिए अजेय चित्तौड़ दुर्ग भारत के सभी मुस्लिम शासकों के निशाने पर था। अकबर के दादा बाबर (BABUR)  ने ई.1526 में चित्तौड़ के महाराणा सांगा को खानवा के मैदान में पराजित अवश्य किया था किंतु वह चित्तौड़ दुर्ग नहीं ले सका था।

खानवा (Khanwa) के मैदान में बड़ी संख्या में महाराणा सांगा के नेतृत्व में लड़ने गए हिन्दू राजाओं एवं सैनिकों का संहार हुआ था। राजपूताने में शायद ही कोई ऐसा राजवंश था जिसके वीरों ने इस युद्ध में अपने प्राणों की आहुति न दी हो।

डूंगरपुर के राजा उदयसिंह, अंतरवेद के माणिकचंद चौहान और चंद्रभाण चौहान, रत्नसिंह चूण्डावत, झाला अज्जा, रामदास सोनगरा, परमार गोकलदास और खेतसी आदि अनेक हिन्दू राजा इस युद्ध में काम आये। राजस्थान के बहुत से गांवों में आज भी उन सती स्त्रियों के चबूतरे मिलते हैं जिनके पति खानवा के युद्ध में मातृभूमि की रक्षा करते हुए काम आए थे।

ई.1528 में राणा सांगा के निधन के बाद मेवाड़ की सामरिक शक्ति को जबर्दस्त धक्का लगा तथा राजपूताने में हिन्दू राजाओं का संघ बिखर गया। इस दौरान मुगल शक्ति भी हिचकोले खाती रही।

भारत में मुगल शासन की नींव डालने वाला बाबर (BABUR)  तो खानवा और चंदेरी के युद्ध जीतने के बाद बहुत कम समय तक जीवित रह पाया और उसके पुत्र हुमायूँ (HUMAYUN) को बिहार एवं गुजरात के अफगानों ने तंग किए रखा तथा उसे लम्बी अवधि के लिए भारत भूमि से दूर रखा।

 इस कारण राजपूताने के हिंदू राजाओं को कुछ संभलने का अवसर मिल गया। इसी काल में जोधपुर में मालदेव जैसे प्रबल राजा का उदय हुआ किंतु शेरशाह सूरी ने मारवाड़ राज्य की कमर तोड़ दी। उसके पुत्र राव चंद्रसेन ने अपनी जन्मभूमि की स्वतंत्रता के लिए आजीवन संघर्ष किया।

राव मालदेव (Rao Maldev) और चंद्रसेन (Chandrasen of Marwar) की तरह अजेय चित्तौड़ ने भी अपनी स्वतंत्रता के लिए अथक संघर्ष किया। महाराणा सांगा का पुत्र रत्नसिंह अपने पिता की तरह एक प्रबल राजा एवं दुराधर्ष योद्धा था किंतु दुर्भाग्य से वह केवल तीन साल ही शासन करके ई.1531 में मृत्यु को प्राप्त हुआ।

रत्नसिंह के बाद सांगा का दूसरा पुत्र विक्रमादित्य मेवाड़ का शासक हुआ किंतु वह अयोग्य था। उसने अपने निजी सेवकों के साथ-साथ राजदरबार में सात हजार पहलवानों को रख लिया जिनकी शक्ति पर उसे मेवाड़ के सामंतों से भी अधिक विश्वास था।

अपने छिछोरेपन के कारण वह सरदारों की दिल्लगी उड़ाया करता था जिससे अप्रसन्न होकर मेवाड़ी सरदार अपने-अपने ठिकानों में चले गये और राज्य-व्यवस्था बहुत बिगड़ गई।

इस स्थिति का लाभ उठाने के लिये गुजरात के सुल्तान बहादुरशाह (Bahadurshah of Gujrat) ने मेवाड़ पर दो अभियान किये। बहादुरशाह ने चित्तौड़ दुर्ग के कई दरवाजों पर अधिकार कर लिया तथा दुर्ग को बारूद से उड़ाने की धमकी देने लगा।

राजमाता कर्मवती ने मुगल बादशाह हुमायूँ से सहायता मांगी किंतु हुमायूँ (HUMAYUN) ने कर्मवती की सहायता नहीं की। इस पर राजमाता कर्मवती ने बहादुरशाह को चित्तौड़ दुर्ग की अपार सम्पदा देकर दुर्ग को नष्ट होने से बचाया किंतु कुछ ही दिन बाद बहादुरशाह फिर से आ धमका।

राजमाता कर्मवती ने मेवाड़ के सरदारों को पत्र लिखा- ‘अब तक तो अजेय चित्तौड़ राजपूतों के हाथ में रहा, पर अब उसके हाथ से निकलने का समय आ गया है। मैं किला तुम्हें सौंपती हूँ। चाहे तुम रखो चाहे शत्रु को दे दो। मान लो तुम्हारा स्वामी अयोग्य ही है। तो भी जो राज्य वंश-परम्परा से तुम्हारा है, वह शत्रु के हाथ में चले जाने से तुम्हारी बड़ी अपकीर्ति होगी।’

राजमाता का यह पत्र पाकर मेवाड़ के सरदार अपनी-अपनी सेनाएं लेकर चित्तौड़ आ गये। महाराणा विक्रमादित्य तथा उसके छोटे भाई कुंवर उदयसिंह को दुर्ग से बाहर भेज दिया गया। दोनों पक्षों में हुए युद्ध में मेवाड़ की पराजय हो गई तथा कई हजार राजपूत सैनिक काम आए।

दुर्ग में स्थित हिन्दू स्त्रियों ने राजमाता कर्मवती (Rakmata Karmawati) के नेतृत्व में जौहर किया। राजमाता कर्मवती को चित्तौड़ के इतिहास में हाड़ी रानी के नाम से भी जाना जाता था।

जैसे ही हुमायूँ (HUMAYUN) को ज्ञात हुआ कि चित्तौड़ दुर्ग का पतन हो गया तो वह बहादुरशाह के विरुद्ध कार्यवाही करने के लिये आगे बढ़ा। बहादुरशाह चित्तौड़ दुर्ग में आग लगाकर भाग गया तथा एक नाव-दुर्घटना में समुद्र में डूब कर मर गया।

इस पर मेवाड़ के सरदारों ने पांच-सात हजार सैनिकों को एकत्रित करके चित्तौड़ दुर्ग पर अधिकार कर लिया। महाराणा विक्रमादित्य तथा कुंवर उदयसिंह भी दुर्ग में आ गये।

मेवाड़ की शक्ति को भारी क्षति पहुंची थी किंतु महाराणा विक्रमादित्य में कोई सुधार नहीं हुआ। मेवाड़ी सामंत पुनः नाराज होकर अपने ठिकानों में चले गए। इन परिस्थितियों का लाभ उठाकर ई.1537 में दासीपुत्र बनवीर (बनवारी) ने महाराणा विक्रमादित्य की हत्या कर दी।

उस समय विक्रमादित्य की आयु 19 वर्ष थी। उसके कोई पुत्र नहीं था और उसके छोटे भाई उदयसिंह की आयु 15 वर्ष थी। बनवीर ने कुंवर उदयसिंह (Kunwar Udai singh) की भी हत्या करनी चाही किंतु उदयसिंह की धाय पन्ना गूजरी उदयसिंह को लेकर चित्तौड़ से भाग गई। इससे उदयसिंह के प्राण बचे।

कुंभलमेर (कुंभलगढ़) के महाजन किलेदार आशा देपुरा ने मेवाड़ी सरदारों को एकत्रित करके ई.1540 में कुंवर उदयसिंह को फिर से अजेय चित्तौड़ का स्वामी बनावाया। जब ई.1543 में शेरशाह सूरी ने चित्तौड़ पर आक्रमण किया, उस समय चित्तौड़ में इतनी शक्ति नहीं थी कि वह शेरशाह सूरी (Shershah Suri) की सेना का सामना कर सके।

इसलिए उदयसिंह ने चित्तौड़ दुर्ग की चाबियां शेरशाह सूरी को भिजवा दीं। शेरशाह, चित्तौड़ आया तथा खवास खाँ के छोटे भाई मियां अहमद सरवानी को वहाँ छोड़कर स्वयं लौट गया।

जब कुछ ही दिनों बाद शेरशाह सूरी की मृत्यु हो गई तो चित्तौड़ के सामंतों ने शेरशाह के प्रतिनिधि को मार भगाया और चित्तौड़ का दुर्ग एक बार फिर से स्वतंत्र होकर अपने शत्रुओं की आंखों में चुभने लगा।

जब अकबर ने चित्तौड़ के लिए प्रस्थान किया, तब महाराणा उदयसिंह चित्तौड़ का स्वामी था। इस समय चित्तौड़ स्वतंत्र अवश्य था किंतु ई.1526 से लेकर ई.1567 तक चित्तौड़ इतने अधिक वीरों को खो चुका था कि उसमें इतनी शक्ति नहीं रह गई थी कि वह अकबर (Akbar) जैसे प्रबल शत्रु का सामना कर सके।

अजेय चित्तौड़ इस बार शत्रु को अपनी चाबियां सौंपने वाला नहीं था। वह शत्रु को चित्तौड़ी आन-बान और शान का परिचय देना चाहता था।

✍️ – डॉ. मोहनलाल गुप्ता की पुस्तक तीसरा मुगल जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर (Teesra Mughal Jalaluddin Muhammad Akbar) से।

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