Sunday, January 18, 2026
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राव सुरजन हाड़ा के समक्ष नौकर बनकर उपस्थित हुआ अकबर (91)

जब कुंवर मानसिंह (Kunwar Mansingh) ने अकबर (AKBAR) को राव सुरजन हाड़ा (Rao Surjan Hada) की शर्तें सुनाईं तो अकबर को इन शर्तों पर विश्वास नहीं हुआ। इस पर मानसिंह अकबर को नौकर के रूप में अपने साथ रणथंभौर दुर्ग में ले गया ताकि अकबर अपने कानों से राव सुरजन हाड़ा की शर्तें सुन सके।

अकबरनामा और आइने अकबरी के विवरण

21 मार्च 1569 को मुगल बादशाह अकबर ने रणथंभौर दुर्ग पर अधिकार कर लिया। मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूंनी, अकबर के दरबारी लेखक अबुल फजल (ABUL FAZAL) तथा ब्लॉकमैन ((HEINRICH BLOCHMANN)) द्वारा अनूदित आईने अकबरी के आधार पर हमने विगत कड़ियों में अकबर की रणथंभौर विजय का प्रकरण लिखा था। इन लोगों द्वारा लिखे गए विवरण हिन्दू लेखकों द्वारा लिखे गए विवरणों से मेल नहीं खाते।

हिन्दू लेखकों के विवरण

डॉ. मथुरालाल शर्मा ने कोटा राज्य का इतिहास में लिखा है कि चित्तौड़ विजय से उत्साहित होकर ई.1569 के आरम्भ में बादशाह ने रणथंभौर दुर्ग विजय की तैयारी की। वह एक बार पहले भी विफल हो चुका था। इसलिए खूब सेना सजाई गई। चित्तौड़ विजय के अनुभव से भी काम लिया गया।

रणथंभौर दुर्ग का घेरा

 चारों ओर सुरंग खोदे गए और खाइयों में बारूद भरा गया। वी. ए. स्मिथ ने अकबर AKBAR : The Great Mughal में लिखा है कि उसे अनुमान था कि घेरा बहुत लम्बा चलेगा।

सूर्यमल्ल मीसण ने वंश भास्कर में लिखा है कि कुछ मास तक घेरा जारी रहा। अकबर (AKBAR) इस दुर्ग को तोड़ने के लिये आगरा से भारी भरकम तोपें खींच कर लाया। इन तोपों को खींचने के लिये बैलों की 100-100 जोड़ियां जोती गईं। इन तोपों से 30-30 मन के गोले दुर्ग की प्राचीरों पर बरसाये गये।

लगभग एक माह तक राव सुरजन हाड़ा वीरता पूर्वक अकबर का सामना करता रहा। रणथंभौर दुर्ग के लिये यह पहला अवसर था जब उसने तोप के गोलों का स्वाद चखा था।

जब तोपखाना अप्रभावी रहा तो बादशाह ने दुर्ग की दीवार की ऊंचाई तक साबात बनवाया जहाँ से पत्थर फैंकने की चर्खियों की सहायता से 30 मन भार के लोहे के गोले तथा 60 मन भार के पत्थर के गोले दुर्ग पर फैंके गये।

प्रत्येक चर्खी का संचालन 200 जोड़ी बैल करते थे जो पहाड़ी पर बड़े वेग से भागते थे और चर्खी से छूटा हुआ लोहे या पत्थर का गोला दुर्ग के अन्दर जाकर गिरता था। इससे दुर्ग की एक दीवार टूट गई और उसके अन्दर स्थित कुछ भवन भी नष्ट हो गये।

राजा भगवंतसिंह का प्रस्ताव

वंश भास्कर में लिखा है कि कुछ मास तक घेरा जारी रहा परंतु राव सुर्जन वीरतापूर्वक सामना करता रहा। तब भगवन्तसिंह कछावे (Raja Bhagwant Singh Kachchhwaha) ने अकबर से कहा कि रणथंभौर को जीतना चित्तौड़ जैसा सरल कार्य नहीं है। वहाँ देवयोग से जयमल मारा गया, अन्यथा कई साल तक घेरा जारी रखना पड़ता। अब यहाँ राव सुर्जन की चाही हुई शर्तें मंजूर करके युक्ति-पूर्वक दुर्ग पर अधिकार करना चाहिए।

राव सुर्जन से संधि की बात

वंश भास्कर में लिखा है कि बादशाह ने यह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया और मानसिंह ने राव सुर्जन से संधि की बात चलाई।

राव सुर्जन ने सात शर्तें पेश कीं और कहा कि यदि इनको स्वीकार कर लिया जावे तो रणथंभौर दुर्ग समर्पित कर दिया जाएगा। जब अकबर को ये शर्तें सुनाई गईं तो उसको विश्वास नहीं हुआ और उसने कहा कि तुम हिन्दू, हिंदुओं को ही चाहते हो और हमको धोखा देकर कल्पित बात कहते हो।

तब मानसिंह बादशाह को नौकर का वेष धारण करवा कर अपने साथ  सुर्जन के पास गढ़ के अंदर ले गया और उसके सामने शर्तों की बातें होने लगीं। मानसिंह ने सुर्जन से कहा कि इस विषय में हठ न करो और बादशाह का आदेश अपने सिर पर धारण करो।

इस पर राव सुर्जन ने क्रुद्ध होकर अपनी मूँछ पर हाथ रक्खा और कहा कि इस दुर्ग पर आपका अधिकार तभी हो सकता है जब सम्पूर्ण हाड़ा कुल नष्ट हो जाए या मेरे पुरातन-कुल-धर्म की रक्षा हो सके, ऐसी शर्तें आप स्वीकार कर लें।

इस विषय में सविस्तार बातचीत हो चुकने के बाद मानसिंह और अकबर वापस आए और बादशाह ने  शर्तें लिखकर भिजवा दीं। महाकवि सूर्यमल्ल मीसण ने वंश भास्कर में इस संधि का रोचक वर्णन किया है।

राव सुरजन हाड़ा की शर्तें

इन शर्तों में राव सुरजन हाड़ा द्वारा रखी गई समस्त सात शर्तें शमिल थीं। केवल एक शर्त अकबर (AKBAR) द्वारा जोड़ी गई थी। राव सुरजन की शर्तें इस प्रकार थीं-

1. बादशाह को लड़की नहीं दी जायेगी।

2. नौरोजा में बून्दी की रमणियां नहीं जायेंगी।

3. बून्दी नरेश अटक नदी के पार नौकरी करने नहीं जायेगा।

4. शाही महल के दरवाजे तक बून्दी वालों का नक्कारा बजता रहेगा।

5. बून्दी के घोड़ों पर दाग नहीं लगेंगे।

6. बून्दी राज्य में जजिया नहीं लगेगा।

7. बून्दी के राजा किसी अन्य आर्य राजा के नेतृत्व में नहीं लड़ेंगे।

8. बून्दी राज्य में मंदिर नहीं तोड़े जायेंगे।

9. जैसे मुगलों का राज्य दिल्ली है, वैसे हाड़ों की राजधानी बून्दी मानी जायेगी।

रणथंभौर पर अकबर का अधिकार

अकबर (AKBAR) द्वारा जोड़ी गई शर्त इस प्रकार थी- दीवाने आम तथा दीवाने खास में बून्दी नरेश शस्त्र लेकर नहीं जायेगा। संधि हो जाने के पश्चात् 21 मार्च 1569 को राव सुरजन हाड़ा, बादशाह की सेवा में उपस्थित हुआ। उसने बादशाह को दुर्ग की चाबियां सौंप दीं तथा महाराणा की सेवा छोड़कर अकबर (AKBAR) की सेवा स्वीकार कर ली।

देश का दुर्भाग्य

यह देश के लिये बहुत दुर्भाग्य का दिन था। यदि रणथंभौर का दुर्गपति बादशाह अकबर की सेवा में नहीं गया होता तो मेवाड़ के महाराणाओं ने निश्चित रूप से भारत का इतिहास बदल दिया होता। आगे चलकर बूंदी के चौहानों ने मुगलों की जैसी सेवा की, वैसी सेवा तो आम्बेर के कच्छवाहों ने भी नहीं की। इसके बाद 18वीं सदी तक यह दुर्ग मुगलों के अधीन बना रहा।

हिंदुओं को हिंदुओं से ही नष्ट करवाओ

डॉ मथुरालाल शर्मा ने लिखा है कि अकबर ने दस शर्तें स्वीकार करते हुए यह भी आदेश दिया कि रणथंभौर की एवज में राव सुर्जन सात परगने ले सकता है। बादशाह ने मानसिंह के माध्यम से कहलवाया कि यदि और अधिक राज्य की आवश्यकता है तो वह गोंडवाना को विजय कर सकता है।

उस समय तक गोंडवाना पर अकबर का अधिकार नहीं हुआ था। वंश भास्कर के अनुसार राव सुर्जन अकबर (AKBAR) की इस कूटनीतिक चाल को नहीं समझ सका कि बादशाह हिंदुओं को हिंदुओं से ही नष्ट करवाना चाहता है। इसलिए राव ने बादशाह से कहलवाया कि पहले गोंड राज्य को जीतकर बादशाह को भेंट करूंगा, तब मैं बादशाह से सात परगने लूंगा।

रणथंभौर दुर्ग से बहुमूल्य वस्तुओं का निष्कासन

वंश भास्कर लिखता है कि सब बातें निश्चित हो जाने पर राव सुर्जन ने किले में से अपनी सबसे बहुमूल्य सम्पत्ति अर्थात् भगवान विष्णु की दो प्रतिमाएं और दो तोपें निकालीं तथा किला अकबर (AKBAR) के सुपुर्द कर दिया।

 दुर्ग से निकाली गई दोनों प्रतिमाएं बूंदी में स्थापित की गईं जिनमें से एक प्रतिमा बारां के कल्याणराय मंदिर में भेज दी गई। दुर्ग से निकाली गई दो तोपों में से एक का नाम धूलधाणी था और दूसरी का कड़क बीजली।

रणथंभौर दुर्ग पर मुसलमानों के अधिकार

मथुरालाल शर्मा ने लिखा है- ‘इससे पहले मुहम्मद गौरी, इल्तुतमिश और अल्लाउद्दीन खिलजी ने रणथंभौर दुर्ग के स्वामियों को मारकर दुर्ग पर अधिकार किया था, किंतु ऐसा पहली बार हुआ था कि किसी विदेशी आक्रांता ने रणथंभौर के स्वामी के जीवित रहते ही दुर्ग पर अधिकार किया था।’

✍️ – डॉ. मोहनलाल गुप्ता की पुस्तक तीसरा मुगल जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर (Teesra Mughal Jalaluddin Muhammad Akbar) से।

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