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तैमूर लंग ने भटनेर में दस हजार हिन्दुओं को मार डाला (147)

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तैमूर लंग ने भटनेर में दस हजार हिन्दुओं को मार डाला

तैमूर लंग को ज्ञात था कि दिल्ली का तुगलक वंश अत्यन्त दुर्बल है जिसके कारण भारत में राजनीतिक अराजकता तथा भ्रष्टाचार का प्रकोप है। तैमूर लंग भारत की इस कमजोरी का लाभ उठाना चाहता था। साथ ही वह भारत की समृद्धि से भी अवगत था और भारत की अथाह सम्पदा को लूटकर अपनी राजधानी समरकंद को समृद्ध करना चाहता था।

तुगलक सुल्तानों की अदूरदर्शिता के कारण दिल्ली सल्तनत पतन के गर्त में चली गई तथा तुगलक वंश का विनाश हो गया। तुगलक वंश के नष्ट हो जाने में तैमूर लंग के आक्रमण ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

तैमूर लंग का जन्म ई.1336 में मध्यएशिया में समरकंद से 50 मील दूर मावरा उन्नहर प्रांत के ‘कैच’ नगर में हुआ था। उसके पिता का नाम अमीर तुर्क अथवा अमीर तुर्गे था जो तुर्कों के बरलस कबीले की गुरकन शाखा का नायक था। इस कबीले को तुर्को-मंगोल कबीला भी कहा जाता था क्योंकि इस कबीले के लोगों में तुर्कों एवं मंगोलों के रक्त का मिश्रण हुआ था।

अमीर तुर्गे ने तैमूर की शिक्षा-दीक्षा की समुचित व्यवस्था की। तैमूर ने कुरान के अध्ययन के साथ-साथ घुड़सवारी, तलवारबाजी तथा युद्धकला में महारथ हासिल कर ली। अल्पआयु में ही वह एक छोटे भूभाग का शासक बना दिया गया।

तैमूर लंग ने अपनी ‘आत्मकथा’ में लिखा है कि उसका हृदय बारह या चौदह वर्ष की आयु से ही स्वतंत्रता की भावना से ओत-प्रोत हो गया था। एक तुर्की सामन्त का पुत्र होने के कारण तैमूर लंग परम्परागत रूप से चगताई वंश के सरदार के अधीन था। संयोग से तैमूर तथा उसके स्वामी में अनबन हो गई।

फलतः तैमूर को कई तरह की यातनाएं सहन करनी पड़ीं और उसे सुरक्षित स्थान की खोज में इधर-उधर भटकना पड़ा। एक बार जब शत्रु उसका पीछा कर रहे थे, तब तैमूर की एक टांग टूट गई और वह लंगड़ा हो गया, तभी से वह तैमूर लंग कहलाने लगा।

ई.1369 में 33 वर्ष की अवस्था में तैमूर को अपने शत्रुओं पर विजय प्राप्त हो गई। ई.1370 में उसने तुर्क सरदारों का एक सम्मेलन आयोजित किया जिसमें तुर्क सरदारों ने तैमूर लंग को अपना सरदार चुन लिया। ई.1370 में तैमूर ने समरकंद पर अधिकार कर लिया और वहाँ का शासक बन गया।

समरकंद हाथ में आते ही तैमूर ने अपने राज्य को विशाल सल्तनत में बदलने का निर्णय लिया। कुछ ही समय में उसने ख्वारिज्म, फारस, मेसोपोटामिया आदि कई ऐतिहासिक देशों पर विजय प्राप्त कर ली और उसका साम्राज्य चंगेज खाँ के साम्राज्य जितना विस्तृत हो गया। इसके बाद तैमूर ने भारत पर आक्रमण करने का निश्चय किया।

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‘जफरनामा’ में तैमूर लंग द्वारा भारत पर आक्रमण किए जाने के कारणों का उल्लेख किया गया है। पाठकों की सुविधा के लिए बताना समीचीन होगा कि सिक्ख-गुरु गोविंदसिंह ने ई.1706 में औरंगजेब को फारसी भाषा में एक विस्तृत पत्र लिखा था, जिसे जफरनामा कहा जाता है। इसका हिन्दी में अर्थ होता है- ‘विजयपत्र’। इस पत्र में इतिहास की कुछ घटनाओं का प्रसंगवश उल्लेख हुआ है।

जफरनामा कहता है- ‘तैमूर लंग ने कुरान का अच्छा अध्ययन किया था। वह इस्लाम को भारत में फैलाने के लिए, भारत पर आक्रमण करने की योजनाएं बनाने लगा। वह भारत पर विजय प्राप्त करके काफिरों का नाश करना और इस्लामिक जगत में अपना नाम कमाना चाहता था। वह मूर्ति-पूजकों पर विजय प्राप्त करके गाजी की उपाधि प्राप्त करना चाहता था।’

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तैमूर लंग को ज्ञात था कि दिल्ली का तुगलक वंश अत्यन्त दुर्बल है जिसके कारण भारत में राजनीतिक अराजकता तथा भ्रष्टाचार का प्रकोप है। तैमूर लंग भारत की इस कमजोरी का लाभ उठाना चाहता था। साथ ही वह भारत की समृद्धि से भी अवगत था और भारत की अथाह सम्पदा को लूटकर अपनी राजधानी समरकंद को समृद्ध करना चाहता था। उन दिनों मुल्तान के शासक सारंग खाँ तथा तैमूर के पोते पीर मोहम्मद में संघर्ष चल रहा था। पीर मोहम्मद काबुल का गर्वनर था। उसने सारंग खाँ से ‘कर’ मांगा किंतु सारंग खाँ ने कर देने से इन्कार कर दिया। इस पर पीर मोहम्मद ने मुल्तान पर आक्रमण किया। पीर मुहम्मद ने सिन्धु नदी को पार करके छः माह में उच्च तथा मुल्तान पर अधिकार कर लिया। अपने पोते पीर मुहम्मद की इस सफलता ने भी तैमूर लंग को भारत पर आक्रमण करने के लिए प्रेरित किया। तैमूर ने अप्रैल 1398 में 92,000 घुड़सवार सेना के साथ समरकन्द से प्रस्थान किया और सितम्बर 1398 में सिंधु नदी को पार करके मुल्तान पहुंच गया। जब तक तैमूर मुल्तान पहुंचता, तब तक तैमूर के पोते पीर मोहम्मद ने मुल्तान से आगे बढ़कर सिंध के पश्चिमी भाग को रौंद कर उस पर अधिकार कर लिया।

तैमूर ने मुल्तान से चलकर लाहौर पर आक्रमण किया तथा लाहौर के गर्वनर मुबारक खाँ को हरा दिया। चिनाब नदी के पास पीर मोहम्मद तथा तैमूर लंग की सेनाएं एक दूसरे से आ मिलीं। यहाँ से यह सम्मिलित सेना तुलुम्बा की ओर बढ़ी। उसने तुलुम्बा के शासक जसरथ को परास्त किया जो कि खोखरों का सरदार था। इसके बाद तैमूर लंग पाक-पतन, दीपालपुर तथा अजोधन आदि नगरों को लूटता हुआ पानीपत के मार्ग से भटनेर की ओर बढ़ा।

इस समय राव दुलीचंद भटनेर का शासक था। भटनेर दुर्ग के चारों ओर भटनेर नगर बसा हुआ था जिसके चारों ओर मिट्टी की ईंटों का एक ऊंचा परकोटा बना हुआ था। दीपालपुर तथा अजोधन आदि के सैंकड़ों लोग भागकर भटनेर नगर में शरण लिए हुए थे। जब तैमूर लंग ने भटनेर की प्राचीर पर आक्रमण किया तो भटनेर के लोगों ने भटनेर की सेना के साथ मिलकर तैमूर लंग का मार्ग रोका। कुछ ही दिनों में भटनेर की नगर-प्राचीर टूट गई तथा हिन्दू सैनिकों ने नगर की प्राचीर छोड़कर भटनेर के किले में मोर्चा संभाला।

जब राव दुलीचंद की सेना किले को बचाने में असमर्थ सिद्ध होने लगी तो राव दुलीचंद ने अपने पुत्र को तैमूर से संधि करने के लिए भेजा। 9 नवम्बर 1398 को राव दुलीचंद का पुत्र तैमूर के समक्ष उपस्थित हुआ। तैमूर ने संधि करने से मना कर दिया। इस पर राव दुलीचंद का पुत्र दुर्ग में लौट आया। तैमूर लंग ने दुर्ग पर हमले तेज कर दिये तथा भटनेर नगर के लोगों की हत्याएं करनी आरम्भ कर दीं।

राव दुलीचंद का एक भाई पूर्व में ही मुसलमान बना लिया गया था। उसका असली नाम तो अब ज्ञात नहीं है किंतु मुसलमान बनने के बाद उसे कमालुद्दीन कहा जाता था। वह भी इस घेरे में अपने भाई दुलीचंद की तरफ से लड़ रहा था किंतु जब तैमूर की सेनाएं किले पर हावी होने लगीं तो कमालुद्दीन ने तैमूर के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया तथा तैमूर के समक्ष प्रस्ताव भिजवाया कि वह अपने कुछ लोगों को किले में भेज दे ताकि उन्हें अमानी का धन दिया जा सके। अमानी के धन का तात्पर्य उस धन से है जो पराजित राजा और प्रजा की जान बख्शने के लिए विजेता शत्रु को समर्पित की जाती थी।

जब तैमूर लंग के आदमी अमानी का धन लेने किले के भीतर गए तो किले में रह रहे लोगों ने अमानी का धन देने से मना कर दिया। जब तैमूर के आदमी किले से खाली हाथ लौट आए तो तैमूर क्रोध से भर गया। उसने अपनी सेना को आदेश दिया कि वे किले को तोड़ डालें।

इस पर तैमूर के सैनिक रस्सियों तथा सीढ़ियों की सहायता से दुर्ग की दीवारों पर चढ़ने लगे। किले के भीतर रह रहे लोगों ने अपने बच्चों एवं स्त्रियों को घरों में बंद करके उनमें आग लगा दी तथा युद्ध के लिए तैयार हो गए।

‘ मुलफुजात ए तैमूरी ’ एवं ‘जफरनामा’ में लिखा है कि छः दिन तक चले भयानक संघर्ष में दस हजार हिन्दू मारे गए। तैमूर की सेना को दुर्ग से विपुल अन्न, धन एवं वस्त्र प्राप्त हुए।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

एक लाख हिन्दुओं की हत्या कर दी तैमूर लंग ने (148)

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एक लाख हिन्दुओं की हत्या कर दी तैमूर लंग ने

तैमूर लंग ने एक लाख हिन्दुओं को बंदी बना लिया था। इतने सारे बंदियों के रहते वह दिल्ली पर आक्रमण नहीं कर सकता था। इसलिए उसने अपनी सेना को आदेश दिया कि एक लाख हिन्दुओं की हत्या कर दी जाए।

तैमूर लंग की सेना ने भटनेर के किले पर अधिकार करके दस हजार हिन्दुओं को मौत के घाट उतार दिया। इसके बाद वह सरस्वती नामक नगर पर चढ़ बैठा। इस कुछ ग्रंथों में ‘सरसुति’ भी कहा गया है। वहाँ तैमूर ने कई हजार हिन्दुओं को पकड़कर बलपूर्वक मुसलमान बनाया। इसके बाद वह फतेहाबाद, अहरोनी, कैथल तथा पानीपत होते हुए लोनी की तरफ बढ़ा।

10 दिसम्बर 1398 को तैमूर लंग ने यमुना नदी पार की तथा वह लोनी में घुस गया। उन दिनों मैमून नामक एक हिन्दू सरदार लोनी के किले का शासक था। तैमूर ने उसके समक्ष प्रस्ताव भेजा कि यदि वह आत्मसमर्पण कर दे तो उसके प्राण बक्श दिए जाएंगे किंतु मैमून ने लड़ते हुए मरने को श्रेयस्कर समझा।

तैमूर ने किले के चारों ओर सुरंगें खुदवा दीं। इस पर किले के भीतर रह रहे लोगों ने अपने परिवारों के सदस्यों को जीवित ही अग्नि में जला दिया और स्वयं भी तलवारें हाथ में लेकर मरने-मारने को तैयार हो गए। 11 दिसम्बर 1398 को तैमूर ने लोनी के किले पर विजय प्राप्त कर ली तथा किले में मौजूद प्रत्येक हिन्दू को तलवार के घाट उतार दिया। इसके बाद तैमूर ने किले में आग लगवा दी।

अब तैमूर लंग दिल्ली की ओर बढ़ा। तैमूर की दृष्टि में यह उसके जीवन का निर्णायक युद्ध होने वाला था। वह भविष्य की आशंका से भयभीत था। दिल्ली की प्रबल सेना के समक्ष उसकी सेना चींटी की तरह मसली जा सकती थी।

इसलिए जब तैमूर दिल्ली के निकट पहुंचा तो उसने अपनी सेना को दिल्ली के बाहर ही पड़ाव डालने का आदेश दिया ताकि दिल्ली पर आक्रमण करने की तैयारी की जा सके। तैमूर लंग को अनुमान था कि तुगलकों की विशाल सेना के रहते दिल्ली में घुसना आसान नहीं होगा।

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इस समय तक तैमूर लंग ने भारत के एक लाख हिन्दुओं को बंदी बना लिया था। इतने सारे बंदियों के रहते वह दिल्ली पर आक्रमण नहीं कर सकता था। इसलिए उसने अपनी सेना को आदेश दिया कि समस्त हिन्दू-बंदियों का कत्ल कर दिया जाये।

‘मुलफुजात ए तैमूरी’ के हवाले से इलियट ने लिखा है- ‘तैमूर को संदेह था कि यदि दिल्ली की सेना से होने वाले युद्ध में तैमूर की पराजय हो जाती तो तैमूर के शिविर में बंदी बनाकर रखे गए एक लाख हिन्दू, तैमूर की पराजय का समाचार सुनकर ही अपने बंधन तोड़ देते, हमारे डेरों को लूट लेते और शत्रु से जा मिलते। इस प्रकार उनकी संख्या और शक्ति बढ़ जाती।’

मध्यएशिया से आए बर्बर तुर्कों ने तैमूर के आदेश पर एक लाख हिन्दुओं की हत्या कर दी गई। एक लाख निर्दोष एवं निरीह हिन्दुओं के सिर काटकर यमुनाजी में फैंक दिए गए जिससे यमुनाजी का जल लाल हो गया। हजारों शव यमुनाजी के तट पर बिखर गए, जिन पर कई महीनों तक गिद्ध एवं चील आदि मांसभोजी पक्षी मण्डराया करते थे। इन एक लाख लोगों की तैमूर लंग से कोई शत्रुता नहीं थी, वे हाथों में हथियार लेकर तैमूर की सेना से लड़ने के लिए नहीं आए थे।

मार डाले गए हिन्दुओं का अपराध केवल इतना था कि वे शांति-प्रिय थे और उन्हें लड़ना नहीं आता था। वे किसान थे, जुलाहे थे, पशुपालक थे, कुम्हार, लुहार और सुथार थे, व्यापारी थे, पोथीधारी ब्राह्मण थे। वे अपना-अपना काम करके पेट भरते थे, किसी को लूटने, लड़ने-मारने के लिए कहीं नहीं जाते थे।

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जैसे जंगल में भूखा शेर निरीह हिरणों का शिकार किया करता है, वैसे ही मध्यएशिया से आए बर्बर और खूनी लड़ाकों ने भारत के इन निरीह लोगों को काट डाला। शांति पाने की आशा करना मानव-मन की सबसे श्रेष्ठ इच्छा है किंतु प्रकृति का विधान ऐसा है कि केवल शांति की आशा पालने से शांति नहीं मिलती, उसके लिए मूल्य चुकाना पड़ता है। जो समुदाय अपने देश, अपने समाज तथा मानव-मूल्यों के लिए संघर्ष नहीं करता, उसे जीने का अधिकार नहीं मिलता। उसे शांति नहीं मिलती। ये निरीह लोग जिनके शव काटकर यमुनाजी में बहा दिए गए थे अथवा जंगल में पड़े सड़ रहे थे, शांति के आकांक्षी थे किंतु शांति कैसे मिलती है, उसकी प्रक्रिया से परिचित नहीं थे। भारत के लोगों ने सदियों से केवल इतना ही सीखा था कि हर व्यक्ति के लिए एक अलग काम होता है। युद्ध करना क्षत्रियों का काम है, किसानों, जुलाहों, लुहारों, सुथारों, व्यापारियों, ब्राह्मणों एवं चरवाहों को युद्ध से भला क्या काम है? यह नीति तब तक तो ठीक थी, जब तक कि भारत के ही क्षत्रिय राजा परस्पर लड़ते थे। वे एक दूसरे के महलों, किलों, सोने के सिक्कों एवं दासियों को छीनते थे किंतु जब मध्यएशिया के आक्रांताओं ने भारतीय राजाओं के साथ-साथ भारतीय प्रजा को भी अपने निशाने पर लिया, तब शांति की यह नीति अप्रासंगिक हो गई।

इस काल में आवश्यकता इस बात की थी कि हिन्दूकुश पर्वत से लेकर यमुनाजी के तट तक विस्तृत हरे-भरे मैदानों में रहने वाले लोग हाथों में हथियार लेकर लड़ते किंतु उन्हें युद्ध हेतु तत्पर करने के लिए किसी प्रबल नेतृत्व की आवश्यकता थी किंतु भारत के तत्कालीन शासकों में इतनी योग्यता नहीं थी कि वे जनता का नेतृत्व कर सकें।

वे तो जनता को भेड़-बकरियों की तरह हांकना जानते थे, यही कारण था कि उस काल की जनता भेड़-बकरियों की तरह व्यवहार करती थी और अपनी गर्दन शत्रु की तलवार के नीचे धर देती थी। यही कारण था कि तैमूर लंग के सिपाहियों ने भारत के एक लाख मनुष्यों को भेड़-बकरियों की तरह ही काट डाला था। एक लाख हिन्दुओं की हत्या करके भी उनके मन से काफिरों के प्रति घृणा का भाव नहीं गया।

कुछ इतिहासकारों ने लिखा है कि 18 दिसम्बर 1398 को तैमूर लंग तथा दिल्ली की सेना के बीच संघर्ष हुआ। दिल्ली की सेना में 10 हजार अश्वारोही, 40 हजार पैदल सिपाही तथा 125 हाथी थे। इस युद्ध में दिल्ली की सेना आसानी से परास्त हुई तथा भाग खड़ी हुई।

जब दिल्ली की सेना भाग खड़ी हुई तो तुगलक सुल्तान, सेनापति एवं प्रधानमंत्री शतरंज के मोहरों की तरह बेजान होकर रह गए। अब उन्हें भी भागने के अतिरिक्त और कुछ नहीं सूझा। वे भी सिर पर पैर रखकर चोरों की तरह अलग-अलग दिशाओं में भाग गए। उन्हें भय था कि कहीं तैमूर के सिपाही उन्हें देख न लें किंतु तैमूर तो इस घटना पर स्वयं हैरान था।

उसने इस दृश्य की कल्पना नहीं की थी, इसलिए वह अपनी सेना को इन भगोड़ों के पीछे नहीं दौड़ा सका। संभवतः उसकी आवश्यकता ही नहीं थी। जब तुगलक दिल्ली छोड़कर ही भाग रहे थे, तब इस बात से क्या अंतर पड़ता था कि वे जियें या मरें!

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

दिल्ली का कत्लेआम करवाया तैमूर लंग ने (149)

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दिल्ली का कत्लेआम करवाया तैमूर लंग ने

तैमूर लंग की सेना ने दिल्ली का कत्लेआम करके मानवता के माथे पर कालिख पोत दी। कोई भी मनोवैज्ञानिक इस गुत्थी का हल नहीं बता सकता कि कैसे कोई मनुष्य मजहब के नाम पर किसी दूसरे धार्मिक विश्वास वाले लोगों को पशुओं की तरह काटकर खुदा का शुक्रिया अदा कर सकता है!

तैमूर लंग की सेना ने पंजाब से पकड़े गए एक लाख हिन्दुओं की हत्या दिल्ली के बाहर करवा दी ताकि तैमूर की सेना इन बंदियों के बोझ से मुक्त हो जाए। जब तैमूर की सेना ने दिल्ली को घेर लिया तो दिल्ली के सुल्तान नासिरुद्दीन महमूद तुगलक तथा प्रधानमंत्री मल्लू इकबाल खाँ को तैमूर लंग से लड़ने के लिए बाहर आना पड़ा किंतु वे शीघ्र ही युद्ध के मैदान से भाग छूटे।

दिल्ली का सुल्तान नासिरुद्दीन महमूद तुगलक गुजरात की ओर एवं प्रधानमंत्री मल्लू इकबाल खाँ बरान की ओर भाग गया। अब दिल्ली की रक्षा करने वाला कोई नहीं था। दिल्ली के किले और महल वीरान पड़े थे एवं दिल्ली की जनता अपने सिरों पर मण्डरा रही मौत की छायाओं को स्पष्ट अनुभव कर रही थी। हजारों लोग पहले ही दिल्ली छोड़कर भाग चुके थे किंतु बहुत से लोग इतने सौभाग्यशाली नहीं थे कि दिल्ली से भाग सकते, इसलिए अपने घरों में छिपकर अपने संभावित दुर्भाग्य पर आंसू बहा रहे थे।

दिल्ली में रहने वाले हजारों गुलामों, हिंजड़ों और वेश्याओं को इस बात से कोई अंतर नहीं पड़ता था कि वे दिल्ली में रहकर तैमूर लंग की गुलामी करें या सुल्तान के पीछे भागकर तुगलकों की गुलामी करें। इसलिए वे दिल्ली में ही डटे रहे। उनके लिए दुनिया का प्रत्येक स्थान उतना ही बुरा था जितनी कि दिल्ली! उन वीर एवं साहसी हिन्दुओं की संख्या भी कम नहीं थी जो तैमूर के सैनिकों का सिर काटकर यमुनाजी में बहा देने के लिए दिल्ली में डटे हुए थे!

तैमूर लंग को दिल्ली के तुगलकों एवं तुर्की अमीरों की कुछ बड़ी कमजोरियों के बारे में समरकंद में ही जानकारी मिल गई थी किंतु उसने कभी स्वप्न में भी नहीं सोचा था कि दिल्ली में तैमूर लंग को बिना कोई युद्ध किए ही प्रवेश मिल जाएगा। 27 दिसम्बर 1398 को तैमूर ने दिल्ली में प्रवेश किया। उसने फीरोजशाह तुगलक की कब्र के पास खड़े होकर इस अप्रत्याशित जीत के लिए अल्लाह को धन्यवाद दिया।

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उसी दिन तैमूर के सैनिकों का एक दल दिल्ली नगर के द्वार पर शहर से माल एवं रसद एकत्रित करने के लिए पहुंचा। सीरी, जहांपनाह और प्राचीन दिल्ली में हिंदुओं के झुण्ड भी एकत्रित हो गए और तैमूर के सैनिकों का विरोध करने लगे। बहुत से हिन्दुओं ने अपने परिवारों को आग में जला दिया एवं हथियार लेकर लड़ने के लिए आ गए। 27, 28 एवं 29 दिसम्बर 1398 को सीरी एवं जहांपनाह में भयानक रक्तपात मचा। अंत में हिन्दुओं को भागकर प्राचीन दिल्ली में चले जाना पड़ा। 30 दिसम्बर को तैमूर के तुर्की सैनिक भी प्राचीन दिल्ली आ पहुंचे। प्राचीन दिल्ली के हिन्दू योद्धा जामा मस्जिद में एकत्रित हो गए। संभवतः वह जामा मस्जिद वर्तमान जामा मस्जिद से अलग थी। तैमूर के सैनिकों का नेतृत्व अमीरशाह मलिक तथा अली सुल्तान तवाची कर रहे थे। उन्होंने जामा मस्जिद को घेर लिया। दोनों तरफ से मारकाट होने लगी और तब तक चलती रही जब तक कि जामा मस्जिद में मौजूद प्रत्येक हिन्दू का सिर कटकर धरती पर नहीं गिर गया। दिल्ली का कत्लेआम आरम्भ हो गया। तैमूर के सैनिकों ने हिन्दुओं के कटे हुए सिरों का एक बुर्ज बनाया जो आकाश तक पहुंचाया गया। हिन्दुओं के कटे हुए शरीर मांसभोजी पक्षियों के भोजन बन गए।

अब तैमूर के सैनिक दिल्ली की बस्तियों में घुस गए तथा लोगों को पकड़-पकड़कर बंदी बनाने लगे। जिन लोगों ने विरोध किया, उन्हें वहीं मार दिया गया। असंख्य स्त्रियों तथा पुरुषों को गुलाम बनाया गया। कई हजार शिल्पी और यंत्रकार शहर से बाहर लाये गए और युद्ध में सहायता देने वाले खानों, अमीरों एवं अफगानों में बांट दिये गए।

जफरनामा के अनुसार- ‘दिल्ली की शहरपनाह तथा सीरी के महल नष्ट कर दिए गए। हिन्दुओं के सिर काटकर उनके ऊँचे ढेर लगा दिए गए और उनके धड़ हिंसक पशु-पक्षियों के लिए छोड़ दिए गए …… जो निवासी किसी तरह बच गए वे बंदी बना लिए गए।’

पश्चिमी इतिहासकार लेनपूल ने लिखा है- ‘इस लूट के पश्चात् तैमूर लंग का प्रत्येक सिपाही धनवान हो गया तथा उन्हें बीस से दो सौ तक गुलाम अपने देश ले जाने को मिले।’

स्वयं तैमूर लिखता है- ‘काबू के बाहर हो मेरी सेना पूरे शहर में बिखर गई और उसने लूटमार तथा कैद के अतिरिक्त और कुछ परवाह न की। यह सब अल्लाह की मर्जी से हुआ है। मैं नहीं चाहता था कि नगरवासियों को किसी भी प्रकार की तकलीफ हो, पर यह अल्लाह का आदेश था कि नगर नष्ट कर दिया जाये।’

तैमूर पंद्रह दिन तक दिल्ली में रहा। पंद्रह दिन तक दिल्ली का कत्लेआम चलता रहा। 2 जनवरी 1399 को वह मेरठ होते हुए गंगा किनारे पहुंचा तथा तुगलुकपुर की तरफ बढ़ा। जब वह तुगलुकपुर से केवल दस मील दूर रह गया तब उसे सूचना मिली कि मार्ग में एक स्थान पर कुछ हिन्दू एकत्रित हो रहे हैं। थोड़ा ही चलने पर उसे 48 नावों में सवार हिन्दू मिले जो हथियार लेकर तैमूर लंग से युद्ध करने आए थे। दोनों पक्षों में सशस्त्र युद्ध एवं रक्तपात हुआ। सभी हिन्दू मारे गए। तैमूर ने उनके बच्चों एवं स्त्रियों को बंदी बना लिया।

तैमूर की सेना ने तुगलुकपुर में अपना शिविर लगाया। रात्रि में तैमूर को समाचार मिले कि गंगाजी के दूसरे किनारे पर हिन्दुओं का एक समूह पुनः एकत्रित हो गया है। अगली प्रातः 13 जनवरी 1399 को तैमूर ने एक हजार सैनिकों के साथ गंगाजी को पार किया। थोड़ी ही देर में तैमूर के अमीर सैयद ख्वाजा तथा जहान मलिक भी पांच हजार सैनिक लेकर आ पहुंचे। इन सैनिकों ने हिन्दुओं पर आक्रमण किया। अंततः समस्त हिन्दू सैनिक मारे गए।

यहाँ से तैमूर की सेना हरिद्वार की ओर बढ़ी। जब उसकी सेना हरिद्वार से केवल 2 कोस दूर रह गई, तब तैमूर को सूचना मिली कि बड़ी संख्या में हिन्दू एकत्रित होकर तैमूर पर आक्रमण करने की तैयारी कर रहे हैं। इसलिए तैमूर ने उसी स्थान पर शिविर लगवा दिया तथा उसी दिन रविवार को दोपहर की नमाज पढ़ने के बाद उसने हरिद्वार के निकट एकत्रित हुए हिन्दुओं पर आक्रमण किया। इस युद्ध में भी समस्त हथियारबंद हिन्दू मार डाले गए। सायंकाल की नमाज से पूर्व यह कार्य पूरा कर लिया गया।

अगले दिन सोमवार का सूर्य निकलने से पहले ही हजारों सशस्त्र हिन्दुओं ने तैमूर लंग का शिविर घेर लिया। यह सूचना मिलते ही तैमूर के सैनिकों ने भी कमर कस ली। दोनों पक्षों में भीषण युद्ध हुआ जिसमें हजारों हिन्दू मारे गए। यजदी ने लिखा है- ‘जैसे ही तैमूर की सेना ने तकबीर अर्थात् युद्धघोष किया, काफिर पहाड़ों में भाग गए।’

मुलफुजात-ए-तैमूरी मेंलिखा है- ‘मुसलमानों ने उनका पीछा कर उनकी हत्याएं कीं तथा अत्यधिक धन-सम्पत्ति प्राप्त की।’

इस प्रकार स्थान-स्थान पर भारत के हिन्दुओं तथा तैमूर के तुर्कों में भीषण संग्राम हुआ। इन युद्धों में लाखों हिन्दू मारे गए। तैमूर की सेना द्वारा बड़ी संख्या में स्त्रियों तथा बच्चों को गुलाम बनाया गया। हरिद्वार में उसने प्रत्येक घाट पर गाय की हत्या करवाई।

लेनपूल लिखता है- ‘दिल्ली का कत्लेआम के यथार्थ उत्सव के उपरांत धर्म के सैनिक तैमूर ने अल्लाह को धन्यवाद दिया और समझा कि उसका भारत आने का उद्देश्य पूरा हुआ।’

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

शिवालिक क्षेत्र पर आक्रमण करके तैमूर ने लाखों हिन्दुओं को मार दिया (150)

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शिवालिक क्षेत्र पर आक्रमण करके तैमूर ने लाखों हिन्दुओं को मार दिया

दिल्ली में कत्लेआम करने के बाद तैमूर लंग ने शिवालिक क्षेत्र पर आक्रमण किया। पहाड़ों के हिन्दुओं ने तैमूर की सेना का दृढ़ता से मुकाबला किया किंतु तैमूर की बर्बर सेना ने लाखों हिन्दुओं को मार दिया।

तैमूर लंग की सेना को दिल्ली से लेकर मेरठ, तुगलुक नगर, सहारनपुर एवं हरिद्वार आदि अनेक स्थानों पर हिन्दुओं का सशस्त्र विरोध झेलना पड़ा जिसमें कई लाख हिन्दू मारे गए। इनमें सैनिक एवं असैनिक दोनों प्रकार के हिन्दू सम्मिलित थे। यद्यपि कई लाख की संख्या बड़ी लगती है किंतु विभिन्न लेखकों द्वारा प्रदत्त विवरण से यह संख्या सही प्रतीत होती है।

15 जनवरी 1399 को तैमूर की सेना ने शिवालिक के पहाड़ी क्षेत्र में प्रवेश किया। जब तैमूर ने शिवालिक क्षेत्र पर आक्रमण किया तब इस पहाड़ी प्रदेश में सर्वप्रथम राय बहरोज ने मुस्लिम सेना का प्रतिरोध किया। कुछ ग्रंथों में बहरोज का नाम ब्रह्मदेव मिलता है। वह आसंतीदेव वंश का शासक था जो कि कुमायूं पर्वतीय क्षेत्र के प्राचीन कत्यूरी वंश की एक शाखा थी।

जिस समय तैमूर लंग ने कुमायूं प्रदेश में प्रवेश किया, उस समय आसंतीदेव राजवंश का शासन था। उत्तरांचल में प्रचलित लोककथाओं के अनुसार कुमायूं क्षेत्र पर जियारानी का शासन था जो कि राजा बहरूज अथवा ब्रह्मदेव की माता थी। जियारानी के बचपन का नाम मोलादेवी था। वह हरिद्वार के पुण्ढीर राजा अमरदेव की पुत्री थी तथा उसका विवाह कुमायूं के राजा पृथ्वीपाल से हुआ था। जियारानी स्वयं युद्धक्षेत्र में रहकर युद्ध करती थी। उसने रानीबाग में तैमूरलंग की सेना से मुकाबला किया जिसमें जियारानी विजयी रही।

शिवालिक क्षेत्र पर आक्रमण के समय तैमूर लंग एवं हिन्दुओं के बीच हुए युद्धों का वर्णन ‘मुलफुजात-ए-तैमूरी’ नामक ग्रंथ में भी मिलता है। कुमायूं में प्रचलित लोककथा में उपलब्ध विवरण तथा ‘मुलफुजात-ए-तैमूरी’ नामक ग्रंथ में उपलब्ध विवरण में पर्याप्त अंतर है।

यद्यपि कुछ लोग अबु तालिब हुसैनी को ‘मुलफुजात ए तैमूरी’ का लेखक मानते हैं किंतु इस ग्रंथ को आत्मकथा की शैली में लिखा गया है जिसमें दिए गए तथ्यों के आधार पर लगता है कि इस ग्रंथ का मूल लेखक तैमूर लंग स्वयं था। यह ठीक वैसा ही ग्रंथ प्रतीत होता है, जैसा कि बाबर द्वारा लिखित तुजुक-ए-बाबरी अथवा बाबरनामा।

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‘मुलफुजात-ए-तैमूरी’ के अनुसार राय बहरोज अर्थात् ब्रह्मदेव के पास बड़ी सेना थी। इस क्षेत्र में ऊंची, तंग तथा दृढ़ घाटियां थीं। इसलिए वह पहाड़ों के राजाओं में सबसे ऊंचा ही नहीं अपितु हिन्दुस्तान के अनेक राजाओं में बड़़ा माना जाता था। तैमूर ने लिखा है कि मेरे आगमन को सुनकर राय बहरोज ने अपनी स्थिति सुदढ़ कर ली। उस प्रदेश के सारे दुष्ट राय, उसके पास एकत्रित हो गए थे। इन आदमियों को अपने सैनिकों, घाटियों एवं स्थानों का बड़ा अभिमान था। इसलिए राय बहरोज अचल रहा और उसने लड़ने का निर्णय किया।

19 जनवरी 1399 को तैमूर लंग एवं बहरोज की सेनाओं के बीच संघर्ष हुआ। मुलफुजात ए तैमूरी में लिखा है- ‘शैतान जैसे हिन्दू लोग घात करने के लिए छिपे हुए थे। उन्होंने मेरे सैनिकों पर आक्रमण किया परन्तु मेरे सैनिकों ने बाणों की वर्षा करके उनसे बदला लिया और तलवारें निकालकर उन पर टूट पड़े और रास्ता चीरते हुए घाटी में पहुंच गए। वहाँ पर हिन्दुओं से डट कर लड़ाई हुई। वीरतापूर्वक लड़ते हुए मेरे सैनिकों ने तलवारों, चाकुओं और खंजरों से शत्रुओं का वध किया। इतने लोग मारे गए कि रक्त की धाराएं बहने लगीं।’

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मुस्लिम सैनिकों ने हिन्दू स्त्रियों एवं बच्चों को बंदी बनाने के अतिरिक्त लूट का काफी माल एकत्रित किया। इस प्रकार तैमूर का शिवालिक क्षेत्र पर आक्रमण काफी विध्वंसक सिद्ध हुआ। 24 जनवरी 1399 को तैमूर लंग शिवालिक एवं कोका पर्वत के मध्य में पहुंचा। यहाँ पर राय रतनसेन के नेतृत्व में हिन्दुओं ने तैमूर लंग की सेना का मार्ग रोका। ‘मुलफुजात ए तैमूरी’ के अनुसार यह घाटी बहरोज की घाटी की अपेक्षा अधिक ऊँची और संकरी थी और राव रतनसेन की सेना भी बहरोज की सेना से अधिक बड़ी थी। तैमूर ने अपनी सेना को रतनसेन की सेना पर आक्रमण करने का निर्देश दिया। यजदी के अनुसार गाजियों द्वारा लगाए गए तकबीर के नारों (इस्लाम के युद्धघोष) के पर्वत में गूंजने से पूर्व ही वे काफिर भाग खड़े हुए। जबकि ‘मुलफुजात ए तैमूरी’ में लिखा है कि हिन्दू सैनिक तैमूरी सैनिकों के आक्रमण के पश्चात् ही युद्ध क्षेत्र से भागे। इस युद्ध में हजारों हिन्दू मारे गए, हजारों पकड़े गए तथा लूट का माल बड़ी मात्रा में तैमूर के सैनिकों के हाथ लगा। 25 जनवरी 1399 को तैमूर नगरकोट के मार्ग पर चला। यहाँ भी हिन्दुओं ने तैमूर की सेना का सामना किया किंतु यहाँ भी तैमूर पूर्ण रूपेण विजयी रहा। किसी भी मुस्लिम स्रोत में तैमूर की सेना द्वारा नगरकोट के किले पर विजय प्राप्त करने का उल्लेख नहीं मिलता।

इससे प्रतीत होता है कि नगरकोट क्षेत्र के हिन्दुओं ने तैमूर लंग का सामना नगरकोट की पहाड़ियों में किसी अन्य स्थान पर किया होगा।

शिवालिक क्षेत्र पर आक्रमण के दौरान तैमूर को मार्ग में स्थान-स्थान पर हिन्दू प्रतिरोध का सामना करना पड़ा। जफरनामा तथा मुलफुजात ए तोमूरी के अनुसार एक महीने के भीतर अर्थात् 25 जनवरी से 23 फरवरी 1399 तक तुर्की सेना शिवालिक पर्वत तथा कोका पर्वत के मध्य में रही, तदुपरांत वह जम्मू पहुंची।

इस बीच काफिरों, मुशिकों और अग्निपूजकों से 20 युद्ध हुए। इस अवधि में हिन्दुओं के 7 बड़े किलों पर अधिकार किया गया। मुलफुजात ए तोमूरी में लिखा है कि इसी क्षेत्र के अन्य हिन्दू शासकों में एक देवराज नामक शासक भी था जिसने तैमूर की सेना से संघर्ष किया था।

23 फरवरी 1399 को तैमूर की सेना जम्मू के निकट पहुंची। इस क्षेत्र के हिन्दुओं ने अपने परिवार के सदस्यों को अग्निदेव को सौंप दिया तथा स्वयं तैमूर से लड़ने के लिए आए। अंततः 27 फरवरी को तैमूर की सेना जम्मू में घुसी। मुलफुजात ए तैमूरी के अनुसार उन दुष्टों अर्थात् जम्मू के हिन्दुओं ने अपने स्त्रियों तथा बालकों को पर्वतों पर भेज दिया।

उनका राय, काफिर तथा जाहिल हिन्दुओं का समूह लेकर मरने-मारने के लिए उद्धत था। वह पर्वत के दृढ़ स्थान पर खड़ा हो गया। अंततः 28 फरवरी 1399 को चिनाब नदी के तट पर दोनों पक्षों में तुमुल संघर्ष हुआ। इस युद्ध में राय आहत हुआ तथा बंदी बना लिया गया।

तैमूर लंग ने जम्मू के राय से बलपूर्वक इस्लाम स्वीकार करवाया। 2 मार्च 1399 तक तैमूर जम्मू में रहा। 3 मार्च को वह चिनाब नदी पार करके सिंधु नदी की तरफ चला गया। स्वदेश जाने से पूर्व उसने खिज्र खाँ सैयद को मुल्तान तथा दीपालपुर का गवर्नर बना दिया। इस प्रकार भारत के काफिरों को मारकर, उन्हें मुसलमान बनाकर, उनकी औरतों और बच्चों को गुलाम बनाकर, उनकी धन-सम्पत्ति को लूटकर 19 मार्च 1399 को तैमूर ने सिंधु नदी पार कर ली तथा अपने देश समरकन्द चला गया।

बहुत से लोगों का मानना है कि तैमूर लंग को हरिद्वार से लेकर शिवालिक की पहाड़ियों के बीच स्थानीय हिन्दू शक्तियों ने परास्त किया किंतु यह बात सही प्रतीत नहीं होती। यह सही है कि हिन्दुओं ने स्थान-स्थान पर तैमूर की सेना का प्रतिरोध किया किंतु तैमूर को पराजित करने में हिन्दुओं को कोई बड़ी सफलता मिली हो, इसका कोई प्रामाणिक उल्लेख नहीं मिलता है।

मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से हिन्दुओं को तैमूर के विरुद्ध सफलता का मिलना उतना महत्त्वपूर्ण नहीं था जितना कि हिन्दुओं द्वारा अपना मनोबल ऊंचा बनाए रखकर मातृभूमि की स्वतंत्रता के लिए स्वयं को प्रस्तुत करना। स्वाभिमान की कसौटी पर दिल्ली से लेकर जम्मू तक के हिन्दू पूरी तरह खरे उतरे थे।

तैमूर लंग तो भारत से चला गया किंतु अपने पीछे बर्बादी के गहरे घाव छोड़ गया। उसके अभियान में दो विलक्षण बातें हुईं। पहली तो यह कि उत्तर भारत के हजारों हिन्दुओं ने पहली बार बिना किसी राजा के नेतृत्व के स्वयं को अपनी इच्छा से युद्ध के लिए समर्पित किया। दूसरी विलक्षण बात यह हुई कि तैमूर ने दिल्ली सल्तनत की कमर तोड़ दी जिसके कारण अब उत्तर भारत के हिन्दू राजा अपने स्वतंत्र राज्यों की स्थापना के लिए नए सिरे से प्रयास आरम्भ कर सकते थे।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

तैमूर लंग का विध्वंस (151)

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तैमूर लंग का विध्वंस

तैमूर लंग का विध्वंस भारतीयों का मनोबल तोड़ गया। बहुत दिनों तक लोग एक दूसरे से आँख नहीं मिलाते थे! उनकी आंखों के सामने उनकी माता, बहिनों एवं पुत्रियों का बलात्कार हुआ था। उनके बच्चों को आग में झौंक दिया गया था। उनके सगे-सम्बन्धी तैमूर की सेना द्वारा गुलाम बनाकर मध्यएशिया ले जाए गए थे।

तैमूर का भारत आक्रमण, मध्यकालीन भारतीय इतिहास में एक महत्त्वपूर्ण घटना मानी जाती है। वह उस तेज तूफान की तरह आया जो अपने मार्ग में पड़ने वाली हर वस्तु को उजाड़ देता है। वह जिस तेजी से भारत में घुसा, उसी तेजी से वापस चला गया। उसके इस अभियान में लाखों हिन्दू मार डाले गए और लाखों हिन्दू गुलाम बनाकर मध्यएशिया को ले जाये गए। तैमूर के सैनिकों द्वारा लाखों गायें काट कर खाई गईं। तीर्थों की पवित्रता भंग की गई। स्त्रियों के सतीत्व लूटे गए। खेतों और घरों को आग के हवाले कर दिया गया तथा बड़ी संख्या में हिन्दुओं को मुसलमान बनने पर विवश किया गया।

इस आक्रमण से भारत में इतने बड़े परिवर्तन हुए कि हम इसे भारत में नये युग का आरम्भ करने वाला कह सकते हैं। इस आक्रमण का न केवल राजनीतिक दृष्टिकोण से वरन् सामाजिक तथा आर्थिक दृष्टिकोण से भी बहुत बड़ा महत्त्व है। इस आक्रमण से तैमूर के वंशज भारत के घनिष्ट सम्पर्क में आ गए।

तैमूर ने पंजाब अपने राज्य में मिला लिया और खिज्र खाँ को उस प्रान्त का शासन चलाने के लिए गर्वनर नियुक्त कर दिया। जब तक खिज्र खाँ जीवित रहा, तब तक वह समरकन्द की अधीनता में कार्य करता रहा। तैमूर की मृत्यु के उपरान्त उसका साम्राज्य छिन्न-भिन्न हो गया और खिज्र खाँ के उत्तराधिकारी स्वतंत्रता पूर्वक पंजाब में शासन करने लगे।

तैमूर के वंशज कभी इस बात को नहीं भूले कि कभी पंजाब उनके साम्राज्य का अंग था। इसलिए उनकी दृष्टि सदैव पंजाब पर लगी रहती थी। आगे चलकर जब बाबर ने पंजाब पर आक्रमण किया तब उसने दावा किया कि पंजाब पर उसके पूर्वज तैमूर का अधिकार था। तैमूर के आक्रमण से तुगलक साम्राज्य के प्रान्तपति दिल्ली से स्वतंत्र हो गए। ख्वाजाजहाँ ने जौनपुर में, दिलावर खाँ ने मालवा में तथा मुजफ्फर खाँ ने गुजरात में अपना स्वतंत्र राज्य स्थापित कर लिया। तैमूर के आक्रमण ने तुगलक वंश पर ऐसा घातक प्रहार किया कि थोड़े ही दिनों में उसका अन्त हो गया और दिल्ली में एक नये तुर्की राजवंश की स्थापना हुई।

तैमूर के आक्रमण का भारत पर सांस्कृतिक प्रभाव भी हुआ। भारत के विभिन्न प्रांत छोटे-छोटे राज्यों में बंटकर दिल्ली की छाया से मुक्त हो गए और स्वतंत्रतापूर्वक अपनी संस्कृति का सृजन तथा संवर्धन करने लगे। इस प्रकार मालवा, गुजरात, बंगाल, जौनपुर तथा बहमनी राज्यों में शिल्पकला की वृद्धि हुई। साहित्यिक क्षेत्र में जौनपुर की विशेष रूप से उन्नति हुई। जौनपुर मुस्लिम-साहित्यकारों तथा इस्लामिक विद्वानों का केन्द्र बन गया।

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गुजरात तथा बहमनी राज्यों में भी जौनपुर की भांति मुस्लिम साहित्य की विपुल उन्नति हुई। तैमूर भारत की भव्य शिल्प-कला से अत्यधिक प्रभावित हुआ था और उसने भारतीय कारीगरों को अपने साथ ले जाकर समरकन्द में कई मस्जिदें एवं भवन बनवाये। इससे भारतीय भवन निर्माण कला को विदेशी भूमि पर नया क्षेत्र तथा नया वायुमण्डल प्राप्त हुआ।

भारतीय भवन निर्माण कला ने मध्यएशिया को स्थापत्य कला के सम्मिश्रण से नया स्वरूप प्रदान किया और लगभग सवा-सौ वर्षों के उपरान्त पुनः विदेश से अपनी मातृ-भूमि में इसका प्रत्यागमन हुआ। भारत में इसका अपने नये स्वरूप में मुगल बादशाहों के आश्रय में विकास हुआ जो अपने चरम पर पहुँच गया।

तैमूर के आक्रमण का भारत पर आर्थिक प्रभाव भी पड़ा। इस आक्रमण ने भारत की आर्थिक व्यवस्था नष्ट-भ्रष्ट कर दी। तैमूर के मार्ग में जितने समृद्ध नगर तथा गांव पड़े, सब नष्ट हो गए क्योंकि आक्रमणकारी जिधर से निकलते, गांवों को लूटते, उजाड़ते, जलाते तथा लोगों की हत्याएं करते जाते थे।

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लाखों लोगों के शव खुले में पड़े हुए सड़ते रहे जिससे उत्तर भारत में भांति-भांति के रोग फैल गए। जनता की पीड़ा का कहीं अन्त नहीं था। कृषि तथा व्यापार नष्ट-भ्रष्ट हो गया और अकाल पड़ गया। इससे मानवों एवं पशुओं की मृत्यु हुई। आक्रमणकारी भारत की अपार सम्पत्ति लूटकर अपने देश ले गए और जनता में ऐसा भय और आंतक फैल गया कि लम्बे समय तक उत्तर भारत में हा-हाकार मचा रहा। तैमूर के आक्रमण और तबाही से उत्तरी भारत में भारतीय समाज का ताना-बाना हिल गया। तैमूर लंग का विध्वंस लोगों का मनोबल तोड़ देने वाला सिद्ध हुआ। वे स्वयं को परास्त और निस्तेज अनुभव करने लगे। उन्होंने अपनी आँखों के सामने अपनी बहिन बेटियों की इज्जत लुटते देखी। अपने पुत्रों और भाइयों के कटे हुए सिरों के ढेर देखे। अपनी गायों को शत्रुओं द्वारा खाये जाते हुए देखा। उन्होंने अपने खेतों और घरों को जलते हुए देखा। वे एक दूसरे से आँख मिलाने लायक नहीं रहे। चारों तरफ ऐसी भयानक बर्बादी मची कि हिन्दू जाति उस बर्बादी से फिर कभी उबर ही नहीं सके। वह दीर्घकाल के लिए निर्धन और पराजित हो गई। भारत के हिन्दू लम्बे समय तक विदेशी आक्रांताओं से न कोई युद्ध लड़ सके न किसी के समक्ष दृढ़ता पूर्वक खड़े हो सके।

भारत में जो मुसलमान मुहम्मद गौरी के समय से रह रहे थे, उनमें विजेता होने का भाव था और वे हिन्दू प्रजा को अपने से नीचे के स्तर का समझते थे किंतु तैमूर की सेना ने भारत में रह रहे मुसलमानों को भी नहीं बख्शा तथा उनका भी कत्लेआम मचाया। तैमूर लंग का विध्वंस देखकर कुछ समय के लिए भारत के हिन्दू तथा मुसलमान एक ही धरातल पर खड़े हुए दिखाई दिए। सुप्रसिद्ध इतिहासकार किशोरी शरण लाल ने लिखा है कि इस आक्रमण से हिन्दुओं तथा मुसलमानों में एकता की भावना उत्पन्न हुई किंतु यह बात सही प्रतीत नहीं होती।

तैमूर लंग का विध्वंस इतना भयानक था कि दिल्ली से तुगलकों की सत्ता ही समाप्त हो गई। सुल्तान नासिरुद्दीन महमूद, अपने वजीर मल्लू इकबाल खाँ के भय से कन्नौज की तरफ भाग गया तथा दिल्ली पर वजीर मल्लू इकबाल खाँ का शासन स्थापित हो गया।

कुछ दिन बाद मल्लू इकबाल खाँ ने पंजाब के प्रांतपति खिज्र खाँ सैयद के विरुद्ध अभियान किया जिसे तैमूर लंग ने भारत में अपना गवर्नर नियुक्त किया था। खिज्र खाँ सैयद ने मल्लू खाँ को मार दिया। इससे दिल्ली का तख्त खाली हो गया और एक अफगान सरदार दौलत खाँ लोदी ने दिल्ली को अपने अधिकार में ले लिया।

ई.1412 में सुल्तान नासिरुद्दीन महमूदशाह तुगलक की मृत्यु हो गई तथा ई.1414 में खिज्र खाँ सैयद ने दिल्ली पर अधिकार करके दिल्ली में एक नए शासक वंश की स्थापना की जिसे भारत के इतिहास में सैयद वंश कहा जाता है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

खिज्र खाँ दिल्ली पर शासन करने लगा (152)

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खिज्र खाँ - www.bharatkaitihas.com
खिज्र खाँ दिल्ली पर शासन करने लगा

तैमूर लंग द्वारा पंजाब के सूबेदार के रूप में नियुक्त खिज्र खाँ सैयद ने ई.1414 में दिल्ली पर अधिकार करके दिल्ली में एक नए शासक वंश की स्थापना की जिसे भारत के इतिहास में सैयद वंश कहा जाता है

ई.1398-99 में किए गए तैमूर लंग के भारत अभियान के भारतीय समाज पर गहरे सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक एवं राजनीतिक प्रभाव पड़े थे। उसके इस अभियान के कारण भारत की केन्द्रीय शक्ति का पराभव हो गया।

पाठकों को स्मरण होगा कि जिन दिनों तैमूर लंग ने दिल्ली सल्तनत पर आक्रमण किया था, उन दिनों दिल्ली सल्तनत पर दो सुल्तानों का शासन था। मरहूम सुल्तान फीरोजशाह तुगलक का एक पोता नासिरूद्दीन महमूद दिल्ली में अपना दरबार लगाता था तो फीरोजशाह तुगलक का एक अन्य पोता नसरत खाँ फीरोजाबाद में अपना दरबार लगाता था।

दिल्ली सल्तनत के दोनों सुल्तानों में से किसी में इतनी शक्ति नहीं थी कि वह तैमूर लंग का सामना करे किंतु जब तैमूर पंजाब से सीधा दिल्ली आ धमका तो नासिरूद्दीन महमूद को तैमूर से युद्ध करना पड़ा किंतु नासिरूद्दीन महमूद हारकर गुजरात भाग गया। जब तैमूर लंग दिल्ली को तहस-नहस करके मेरठ होता हुआ हरिद्वार की तरफ चला गया तो नसरतशाह फीरोजाबाद से दिल्ली आ गया और अपना दरबार दिल्ली में लगाने लगा।

कुछ ही समय बाद दिल्ली के पुराने सुल्तान महमूद नासिरूद्दीन के मन्त्री मल्लू खाँ ने नसरतशाह को दिल्ली से मार भगाया। इस पर सुल्तान नासिरूद्दीन महमूद फिर से दिल्ली लौट आया और अय्याशियों में डूब गया किंतु मल्लू खाँ ने उसे दिल्ली में नहीं टिकने दिया। इस पर नासिरूद्दीन महमूद कन्नौज चला गया और वहीं पर अपना दरबार लगाने लगा।

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ई.1405 में मल्लू इकबाल खाँ तैमूर लंग द्वारा पंजाब में नियुक्त सूबेदार खिज्र खाँ से युद्ध करता हुआ मारा गया। इस पर दिल्ली का पुराना सुल्तान नासिरूद्दीन महमूद फिर से दिल्ली आ गया तथा अय्याशियों में डूब गया। इस कारण ई.1412 में दौलत खाँ नामक एक अमीर ने दिल्ली पर अधिकार कर लिया। उसी वर्ष अर्थात् ई.1412 में सुल्तान महमूद नासिरूद्दीन की मृत्यु हो गई तथा दिल्ली के तुगलक वंश का अन्त हो गया।

तैमूर लंग द्वारा पंजाब के सूबेदार के रूप में नियुक्त खिज्र खाँ सैयद ने ई.1414 में दिल्ली पर अधिकार करके दिल्ली में एक नए शासक वंश की स्थापना की जिसे भारत के इतिहास में सैयद वंश कहा जाता है।

सैयद लोग स्वयं को पैगम्बर मुहम्मद का वंशज बताते हैं किंतु कहा जाता है कि खिज्र खाँ पैगम्बर मुहम्मद का वंशज नहीं था। उसे बुखारा के फकीर सैयद जलाल ने एक बार सैयद कहकर पुकारा था, तभी से खिज्र खाँ सैयद कहलाने लगा। ख्रिज खाँ के सैयद कहलाये जाने का एक अन्य कारण भी बताया जाता है जिसके अनुसार उसके चरित्र में सैयदों की समस्त विशेषताएँ विद्यमान थीं। वह दयालु, साहसी, विनम्र, वचनपालक तथा इस्लाम में निष्ठा रखने वाला था। ये सब गुण पैगम्बर तथा उनके वंशजों में पाये जाते हैं। इसलिए खिज्र खाँ को भी सैयद कहा गया।

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चूंकि दिल्ली सल्तनत के इस नये राजवंश की स्थापना खिज्र खाँ सैयद ने की, इसलिए इस वंश का नाम सैयद वंश पड़ गया। खिज्र खाँ के परिवार के बारे में जानकारी नहीं मिलती किंतु ऐसा प्रतीत होता है कि वह बचपन में ही अपने परिवार से बिछड़ गया था इसलिए मुल्तान के गवर्नर मलिक नसीरूल्मुल्क दौलत ने उसका पालन पोषण किया था। नसीरूल्मुल्क की मृत्यु के उपरान्त खिज्र खाँ को मुल्तान का गवर्नर बनाया गया। ई.1398 में सरग खाँ ने मुल्तान पर आक्रमण करके खिज्र खाँ को कैद कर लिया परन्तु खिज्र खाँ कैद से निकल भागा और ई.1398 में जब तैमूर लंग भारत आया तो खिज्र खाँ ने तैमूर लंग की नौकरी कर ली। जब तैमूर दिल्ली तथा उत्तर-भारत के बहुत बड़े प्रदेश को नष्ट-भ्रष्ट करके भारत से समरकंद जाने लगा तो उसने खिज्र खाँ को भारत में अपना प्रतिनिधि बनाया तथा उसे दीपालपुर तथा मुल्तान का गवर्नर बना दिया। तैमूर के लौट जाने के बाद दिल्ली सल्तनत की दशा उत्तरोत्तर बिगड़ती चली गई। ई.1412 में जब दौलत खाँ ने दिल्ली पर अधिकार किया तब खिज्र खाँ ने दौलत खाँ पर आक्रमण कर दिया। 23 मई 1414 को खिज्र खाँ ने दौलत खाँ को मार दिया तथा स्वयं दिल्ली के तख्त पर बैठ गया। उसने स्वयं को स्वतंत्र शासक घोषित नहीं किया। अपितु वह समरकंद के सुल्तान के प्रतिनिधि के रूप में दिल्ली पर शासन करने लगा।

खिज्र खाँ के दिल्ली के तख्त पर बैठते समय दिल्ली सल्तनत की स्थिति डावाँडोल थी। सल्तनत की शक्ति के समस्त आधार टूट चुके थे। सेना लगभग समाप्त हो चुकी थी। कोष रिक्त हो गया था। प्रान्तपति एक-एक करके स्वतंत्र हो रहे थे। राजधानी दिल्ली की दशा भी अस्त-व्यस्त थी। प्रबल सुल्तान के अभाव में अमीरों के दल परस्पर लड़ रहे थे।

दो-आब में विद्रोह की आग भड़क रही थी और हिन्दू-सरदार कर देना बन्द कर रहे थे। मालवा, गुजरात, नागौर तथा जौनपुर के राज्य स्वतन्त्र होकर अपने पड़ौसियों के साथ संघर्ष कर रहे थे। कुछ गवर्नर तो दिल्ली सल्तनत की सीमाओं में भी धावा बोल देते थे। मेवातियों में बड़ा असन्तोष था। उन्होंने भी दिल्ली को कर देना बन्द कर दिया था।

उत्तरी सीमा पर स्थित खोखर जाति मुल्तान तथा लौहार में लूटमार कर रही थी। सरहिन्द में भी उपद्रव मचा हुआ था। इस प्रकार दिल्ली सल्तनत पूरी तरह डांवाडोल एवं छिन्न-भिन्न थी। इन्हीं परिस्थितियों में खिज्र खाँ ने दिल्ली सल्तनत का शासन अपने हाथों में लिया।

खिज्र खाँ ने सल्तनत में शान्ति तथा सुव्यवस्था स्थापित करने के प्रयत्न किए। उसने पंजाब को दिल्ली से मिलाकर सल्तनत को फिर से संगठित करने का कार्य आरम्भ किया। वह पंजाब तथा दो-आब के विद्रोहों को दबाने में सफल रहा। दो-आब में कटेहर का विद्रोह बड़ा भयानक था। इस विद्रोह को दबाने के लिए खिज्र खाँ को चार बार सेनाएँ भेजनी पड़ीं।

ई.1414 में खोर, कम्पिला तथा साकित के विद्रोह का बड़ी कठोरता के साथ दमन किया गया। इसके पाँच वर्ष बाद कटेहर में पुनः उपद्रव आरम्भ हो गया परन्तु यह विद्रोह भी शान्त कर दिया गया। इसके बाद खिज्र खाँ को इटावा की ओर ध्यान देना पड़ा। यहाँ पर एक राजपूत सरदार ने विद्रोह का झण्डा खड़ा कर दिया। विद्रोहियों को चारों ओर से घेर लिया गया और उन्हें दिल्ली सल्तनत के आधिपत्य को स्वीकार करने के लिए बाध्य किया गया।

दो-आब में शान्ति स्थापित करने के लिए कई बार सेनाएँ भेजनी पड़ीं। पंजाब में स्थायी शांति स्थापित नहीं की जा सकी। ई.1417 में मलिक तुर्कान ने सरहिन्द को घेर लिया परन्तु उसे परास्त करके दिल्ली के अधीन किया गया। इसके दो वर्ष बाद ई.1419 में सरंग खाँ ने विद्रोह का झण्डा खड़ा किया परन्तु अन्त में वह भी परास्त कर दिया गया।

ई.1421 में खिज्र खाँ मेवात के अभियान पर गया। वहाँ उसने विद्रोहियों के एक दल को नष्ट किया। इसके बाद वह ग्वालियर की ओर गया। वहाँ के हिन्दू राजा ने खिज्र खाँ सैयद को कर देने का वचन दिया। इसके बाद खिज्र खाँ दिल्ली के लिए रवाना हुआ। अभी वह मार्ग में ही था कि गंभीर रूप से बीमार पड़ गया और 20 मई 1421 को उसकी मृत्यु हो गई।

डॉ. ईश्वरी प्रसाद की मान्यता है कि जीवन में पर्याप्त विश्राम न मिलने के कारण ही सुल्तान खिज्र खाँ की इतनी जल्दी मृत्यु हो गई। फरिश्ता ने लिखा है कि वह योग्य तथा उदार शासक था किंतु उसमें चरित्र का अभाव था।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

सैयद वंश दिल्ली पर शासन नहीं कर सका (153)

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सैयद वंश दिल्ली पर शासन नहीं कर सका

तैमूर लंग ने खिज्र खाँ सैयद को मुल्तान तथा दीपालपुर का गवर्नर नियुक्त किया था। ई.1414 में खिज्र खाँ ने दिल्ली पर अधिकार कर लिया तथा स्वयं को समरकंद का प्रतिनिधि घोषित करके दिल्ली का सुल्तान बन गया। खिज्र खाँ ने दिल्ली में सैयद वंश की स्थापना की। ई.1421 में खिज्र खाँ बीमार पड़ा और मर गया।

मुबारकशाह

खिज्र खाँ ने मरते समय, अपने पुत्र मुबारक खाँ को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया। वह मुइजुद्दीन मुबारकशाह के नाम से दिल्ली के तख्त पर बैठा। वह सैयद वंश का दूसरा सुल्तान था। उसने समरकंद से अपना सम्बन्ध विच्छेद कर लिया और स्वतन्त्रतापूर्वक दिल्ली में शासन करने लगा। उसने अपने नाम की मुद्राएँ चलवाईं और अपने नाम का खुतबा पढ़वाया।

सुल्तान मुबारकशाह ने सल्तनत में अनुशासन लाने के लिए अमीरों की शक्ति कम करने के प्रयास किये। वह प्रायः अमीरों का एक जिले से दूसरे जिले में स्थानांतरण कर देता था। इससे किसी अमीर का किसी एक स्थान में अधिक प्रभाव नहीं बढ़ने पाता था परन्तु इससे अमीरों की शासन पर पकड़ ढीली पड़ने लगी और उनमें सुल्तान के प्रति असन्तोष भी बढ़ने लगा।

अपने पिता खिज्र खाँ की भाँति मुबारकशाह का जीवन भी पंजाब तथा दो-आब में विद्रोहों का दमन करने में व्यतीत हुआ। पंजाब में सबसे भयानक विद्रोह जसरथ खोखर का था। कटेहर, मेवात, इटावा, ग्वालियर तथा कालवी में भी विद्रोह हुए परन्तु समस्त जगह विद्रोहों को सफलतापूर्वक दबा दिया गया।

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ई.1433 में काबुल के शासक शेख अली ने पंजाब पर आक्रमण किया। उसने लाहौर को लूटा और बहुत से स्थानों पर अधिकार कर लिया। आक्रमणकारी शीघ्र ही मुल्तान तक पहुँच गए। सुल्तान मुबारकशाह भी एक सेना लेकर आक्रमणकारियों का सामना करने के लिए आगे बढ़ा और उन समस्त जिलों पर फिर से अधिकार कर लिया जो विद्रोहियों के अधिकार में चले गए थे।

मुबारकशाह ने दो हिन्दुओं को अपने दरबार में अमीर नियुक्त किया। दिल्ली सल्तनत के इतिहास में इससे पहले कभी भी हिन्दुओं को अमीर नहीं बनाया गया था। सुल्तान के इस कदम से मुस्लिम अमीरों को बड़ी चिढ़ हुई और वे सुल्तान मुबारकशाह के शत्रु हो गए। अंततः प्रधानमन्त्री सरवर-उल-मुल्क ने षड्यन्त्र रचकर 20 फरवरी 1434 को सुल्तान मुबारकशाह की हत्या करवा दी। उस समय सुल्तान यमुनाजी के किनारे स्थित मुबारकबाद का निरीक्षण कर रहा था।

मुहम्मदशाह

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मुबारकशाह का कोई पुत्र नहीं था, इसलिए उसने मुहम्मद मीन फरीदी नामक एक लड़के को गोद ले रखा था। मुबारकशाह की मृत्यु के उपरान्त यही दत्तक पुत्र मुहम्मदशाह के नाम से दिल्ली के तख्त पर बैठा। मुबारकशाह सैयद वंश का तीसरा सुल्तान था। प्रधानमन्त्री सरवर-उल-मुल्क ने सल्तनत की शक्ति अपने हाथों में रखने का प्रयत्न किया। उसने खान-ए-जहाँ की उपाधि धारण की और अपने समर्थकों को सल्तनत में उच्च पद देने आरम्भ किये। इससे तुर्की अमीरों में असंतोष बढ़ने लगा। अंत में दिल्ली के तुर्की एवं भारतीय अमीरों ने कमाल-उल-मुल्क के नेतृत्व में विद्रोह का झण्डा बुलंद किया। सुल्तान मुहम्मदशाह पहले से ही प्रधानमंत्री सरवर-उल-मुल्क से अप्रसन्न था। इसलिए सुल्तान ने भी विद्रोही अमीरों का साथ दिया। यह सूचना मिलने पर प्रधानमंत्री सरवर-उल-मुल्क ने स्वयं को सीरी के दुर्ग में बंद कर लिया। सुल्तान की सेना ने किला घेर लिया तथा वजीर को बंदी बनाकर मौत के घाट उतार दिया। सरवर-उल-मुल्क से छुटकारा पाकर सुल्तान मुहम्मदशाह ने कमाल-उल-मुल्क को अपना प्रधानमन्त्री बना लिया किंतु इससे भी सल्तनत में शांति स्थापित नहीं हो सकी। कुछ अन्य महत्त्वाकांक्षी अमीरों को सरवर-उल-मुल्क की जगह कमाल-उल-मुल्क के प्रधानमंत्री बनने से कुछ भी हासिल नहीं हुआ। इसलिए वे फिर से विद्रोह करने पर उतारू हो गए।

इब्राहिम शर्की नामक एक अमीर ने विद्रोह का झण्डा बुलंद किया तथा कुछ परगनों पर अधिकार कर लिया। दिल्ली में सुलग रहे असंतोष का लाभ उठाते हुए ग्वालियर के राय ने दिल्ली को कर देना बन्द कर दिया। मालवा के शासक महमूद खिलजी ने दिल्ली सल्तनत पर आक्रमण कर दिया।

इस पर दिल्ली के सुल्तान मुहम्मदशाह ने लाहौर तथा सरहिन्द के सूबेदार बहलोल खाँ लोदी को मालवा पर आक्रमण करने के आदेश दिए। बहलोल लोदी ने खिलजी की सेना में कसकर मार लगाई और उसे भगा दिया। इस पर सुल्तान ने बहलोल लोदी को खानेजहाँ की उपाधि दी तथा उसे अपना पुत्र कहकर पुकारा।

दरबार में इतना बड़ा सम्मान मिलने से बहलोल लोदी की महत्त्वाकांक्षाओं ने विस्तार लेना आरम्भ किया। अब वह सुल्तान बनने की सोचने लगा। नमक की पहाड़ी क्षेत्र के शासक जसरथ खोखर ने बहलोल खाँ लोदी को दिल्ली का तख्त छीनने के लिए प्रोत्साहित किया। बहलोल खाँ लोदी ने अपनी सेना लेकर राजधानी दिल्ली पर आक्रमण किया किंतु दिल्ली की सेना ने बहलोल खाँ लोदी को परास्त कर दिया। इन विद्रोहों के कारण दिल्ली सल्तनत पुनः कमजोर हो गई। इन्हीं परिस्थितियों में ई.1445 में सुल्तान मुहम्मदशाह की मृत्यु हो गई।

सैयद वंश का अंतिम सुल्तान अल्लाउद्दीन आलमशाह

मुहम्मदशाह की मृत्यु के उपरान्त अमीरों ने उसके पुत्र अल्लाउद्दीन आलमशाह को दिल्ली का सुल्तान बनाया। अल्लाउद्दीन आलमशाह सैयद वंश का चौथा सुल्तान था। नया सुल्तान अयोग्य था। वह शासन-कार्य की उपेक्षा करता था। कुछ दिनों बाद वह दिल्ली की राजनीति से तंग आकर ई.1451 में बदायूँ चला गया और वहीं पर रहने लगा। दरबारियों तथा अमीरों ने सुल्तान के इस कदम का विरोध किया परन्तु सुल्तान अल्लाउद्दीन आलमशाह ने उनकी एक नहीं सुनी। इस कारण सुल्तान अल्लाउद्दीन आलमशाह तथा वजीर हमीद खाँ के बीच बुरी तरह से ठन गई।

बहलोल खाँ लोदी का दिल्ली पर अधिकार

सुल्तान ने वजीर हमीद खाँ को मरवाने का प्रयत्न किया। इस पर हमीद खाँ सतर्क हो गया तथा उसने बहलोल खाँ लोदी को अपनी सहायता के लिए दिल्ली बुलवाया। बहलोल लोदी ने वजीर का निमंत्रण स्वीकार कर लिया तथा 19 अप्रेल 1451 को दिल्ली के तख्त पर बैठ गया। इस प्रकार अल्लाउद्दीन आलमशाह सैयद वंश का चौथा और अंतिम सुल्तान सिद्ध हुआ। सुल्तान बनने के बाद बहलोल लोदी ने सबसे पहला काम यह किया कि दुष्ट वजीर हमीद खाँ को जेल में बंद करवा दिया ताकि बहलोल लोदी निष्कंटक होकर दिल्ली पर शासन कर सके।

बदायूं में निवास कर रहे सुल्तान अल्लाउद्दीन आलमशाह को दिल्ली के समस्त समाचार मिल रहे थे किंतु मन मसोसकर बैठे रहने के अतिरिक्त वह कुछ नहीं कर सका। उसके पास इतनी सेना नहीं थी कि वह फिर से दिल्ली पर अधिकार कर सकता। इसलिए वह बदायूं में रहकर रंगरलियों में डूबा रहा। बहलोल लोदी ने भी अपने पुराने स्वामी को छेड़ना उचित नहीं समझा। ई.1478 में सुल्तान अल्लाउद्दीन आलमशाह की बदायूं में ही मृत्यु हुई।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

बहलोल लोदी दिल्ली का सुल्तान बन गया (154)

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बहलोल लोदी - www.bharatkaitihas.com
बहलोल लोदी दिल्ली का सुल्तान बन गया

ई.1451 में दिल्ली का सुल्तान अल्लाउद्दीन आलमशाह सैयद दिल्ली छोड़कर बदायूं चला गया तथा लाहौर एवं सरहिंद के सूबेदार बहलोल लोदी ने दिल्ली के तख्त पर अधिकार कर लिया। इसके साथ ही दिल्ली से सैयद वंश की सदा के लिए विदाई हो गई तथा दुर्दांत लोदी दिल्ली के राजनीतिक मंच पर भूमिका निभाने आ गए।

लोदियों को अफगान तथा पठान भी कहा जाता था। ये लोग उस पर्वतीय प्रदेश के निवासी थे जो भारत तथा ईरान के बीच में मुल्तान तथा पेशावर से लेकर पश्चिम में सुलेमान पर्वत तथा गजनी तक फैला हुआ है। यहाँ के लोग लम्बे कद, गोरे रंग तथा बलिष्ठ शरीर के होेते थे। कठिन जीवन जीने के कारण ये लोग बड़े लड़ाका तथा दुःसाहसी प्रवृत्ति के होते थे तथा कई कबीलों में विभक्त थे।

इनमें से कुछ कबीले इज्राइल के लोगों की संतान माने जाते हैं किंतु वे स्वयं को यहूदी न मानकर मुसलमान ही मानते हैं। इन कबीलों में किसी विशेष कबीले की प्रमुखता नहीं थी। पशुपालन तथा घोड़ों का व्यापार इन कबीलों का मुख्य व्यवसाय था।

इनकी आर्थिक दशा अच्छी नहीं थी इसलिए ये अपने धनी पड़ौसियों को लूटते थे। बहुत से अफगान जीवन यापन करने के लिए तुर्क सुल्तानों की सेना में भर्ती हो जाते थे। भारत के तुर्क सुल्तान उन्हें अपनी सेना में तो भर्ती करते थे किंतु हेय दृष्टि से देखे जाने के कारण उन्हें शासन में उच्च पद नहीं देते थे।

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भारत में प्रथम अफगान साम्राज्य की स्थापना बहलोल लोदी ने की थी। बहलोल के पिता का नाम मलिक काला था जो दौराबा का शासक था। जब बहलोल अपनी माता के गर्भ में था तब एक दिन घर की छत गिर पड़ी और उसकी माता छत के नीचे दबकर मर गई। मलिक काला ने तुरन्त अपनी स्त्री का पेट चिरवा कर बच्चे को बाहर निकलवा लिया। बच्चे का नाम बहलोल रखा गया।

कुछ समय बाद एक युद्ध में मलिक काला की भी मृत्यु हो गई। इस प्रकार बहलोल बचपन में ही माता-पिता की छत्रछाया से वंचित हो गया। उसका पालन-पोषण उसके चाचा सुल्तानशाह ने किया जो सरहिन्द का गर्वनर था। बहलोल की प्रतिभा से प्रभावित होकर सुल्तानशाह ने उसे अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया। इस प्रकार सुल्तानशाह की मृत्यु के उपरान्त बहलोल सरहिन्द का गवर्नर बन गया। उसने स्वयं को दिल्ली साम्राज्य से स्वतन्त्र घोषित कर दिया।

सैयद वंश के सुल्तानों के समय में बहलोल लोदी की शक्ति में बहुत वृद्धि हुई। सुल्तान अल्लाउद्दीन आलमशाह के शासनकाल में प्रधानमन्त्री हमीद खाँ ने बहलोल लोदी को दिल्ली का तख्त लेने के लिए आमन्त्रित किया। इस प्रकार ई.1451 में बहलोल लोदी दिल्ली का सुल्तान बन गया। बहलोल लोदी वीर तथा साहसी सुल्तान था। दिल्ली के तख्त पर बैठते ही उसने अपनी स्थिति को सुदृढ़ बनाने के लिए मन्त्री हमीद खाँ को कारागार में डाल दिया। बहलोल ने शासन के प्रमुख पदों पर अपने विश्वस्त अफगान अधिकारियों को नियुक्त किया।

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बहलोल लोदी ने अपने अधीनस्थ सरहिंद तथा लाहौर के क्षेत्र भी पुनः दिल्ली सल्तनत में मिला लिए तथा इस क्षेत्र में किलों की रक्षा के लिए योग्य अफगान सेनापतियों को नियुक्त किया। दिल्ली के निकटस्थ प्रान्तों तथा जिलों में भी उसने अत्यन्त विश्वासपात्र अफगानों को नियुक्त किया। इस प्रकार शासन के प्रमुख पदों पर तुर्कों की जगह अफगान छा गए। दिल्ली में अपनी स्थिति मजबूत करने के बाद बहलोल लोदी ने पंजाब को संगठित और सुव्यवस्थित किया। इसके बाद बहलोल ने जौनपुर के शर्की शासक पर आक्रमण किया। बहलोल को जौनपुर के विरुद्ध कठिन संघर्ष करना पड़ा किंतु अंत में उसने जौनपुर पर अधिकार कर लिया और अपने पुत्र बारबकशाह को वहाँ का सूबेदार नियुक्त किया। बहलोल लोदी दिल्ली सल्तनत के साधारण अमीर की हैसियत से ऊपर उठकर सुल्तान बना था, इसलिए उसने सुल्तान बनने के बाद भी अन्य अमीरों से बराबरी का व्यवहार किया। वह अक्सर कहा करता था कि मैं भी दिल्ली सल्तनत के अन्य अमीरों में से एक हूँ। वैसे भी अफगानी अमीरों में सुल्तान को स्वामी नहीं समझा जाता था। जब कोई अफगान अमीर सुल्तान बहलोल लोदी से नाराज हो जाता था तो सुल्तान अपनी तलवार तथा पगड़ी निकाल कर उस अमीर के सामने रख देता था और कहता था कि यदि आपको मैं अयोग्य लगता हूँ तो आप मेरे स्थान पर किसी दूसरे अमीर को सुल्तान चुन लें।

सुल्तान की यह बात सुनकर असंतुष्ट अमीरों का क्रोध कम हो जाता था।

जौनपुर पर प्रभुत्व स्थापित कर लेने से बहलोल लोदी की शक्ति बहुत बढ़ गई। उसने कालपी, धौलपुर तथा अन्य स्थानों पर भी अधिकार कर लिया। बहलोल ने ग्वालियर के विद्रोही हिन्दू राजा पर आक्रमण कर दिया और उसे कर देने के लिए बाध्य किया। ग्वालियर से लौटने के बाद ई.1489 में बहलोल लोदी ज्वर से पीड़ित हो गया तथा उसकी मृत्यु हो गई। इस प्रकार वह ई.1451 से ई.1489 तक अर्थात् 38 वर्ष तक दिल्ली पर शासन कर सका।

तत्कालीन मुस्लिम इतिहासकारों के अनुसार बहलोल लोदी वीर तथा साहसी सेनानायक था। वह दिल्ली में लोदी वंश की सत्ता का संस्थापक था। उसका व्यक्तिगत जीवन बहुत अच्छा था। वह विश्वसनीय, स्वामिभक्त, उदार तथा दयालु व्यक्ति था। इस्लाम में उसकी बड़ी निष्ठा थी। वह दम्भ तथा आडम्बर से दूर रहता था। उसे सज-धज तथा ठाठ-बाट का शौक नहीं था। वह कभी किसी भिक्षुक को निराश नहीं करता था।

यद्यपि बहलोल स्वयं विद्वान् नहीं था परन्तु विद्वानों का आदर करता था और उन्हें प्रश्रय देता था। वह न्यायप्रिय शासक था। उसने दिल्ली सल्तनत के खोये हुए गौरव को एक बार फिर बढ़ाया तथा प्रांतीय शासकों को अपने अधीन करके उत्तरी भारत में राजनीतिक एकता स्थापित की।

बहलोल लोदी की मृत्यु के बाद उसका पुत्र सिकन्दर लोदी दिल्ली का सुल्तान हुआ। उसके बचपन का नाम निजाम खाँ था। सिकन्दर लोदी की माता एक सुनार स्त्री थी। सिकंदर लोदी का बचपन अपने पिता के साथ प्रायः दिल्ली में ही बीता था। वह रूपवान् तथा साहसी युवक था। अपने पिता के जीवन काल में वह अनेक उच्च पदों पर काम कर चुका था।

सिकंदर लोदी सरहिन्द के शासक के रूप में प्रांतीय शासन का, अपने पिता की अनुपस्थिति में राजधानी में रहकर केन्द्रीय शासन का तथा युद्ध के मैदान में रहकर सैन्य नेतृत्व का अनुभव प्राप्त कर चुका था। ई.1489 में बहलोल लोदी की मृत्यु के बाद अमीरों तथा सरदारों ने निजाम खाँ को सिकन्दर खाँ के नाम से दिल्ली के तख्त पर बैठा दिया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

सिकंदर लोदी भारत का सुल्तान बन गया (155)

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सिकंदर लोदी - www.bharatkaitihas.com
सिकंदर लोदी भारत का सुल्तान बन गया

ई.1489 में बहलोल लोदी की मृत्यु हो गई तथा उसका पुत्र निजाम खाँ, सिकंदर लोदी के नाम से दिल्ली का सुल्तान हुआ। वह हेमा नामक सुनार स्त्री के पेट से उत्पन्न हुआ था। सिकंदर का चेहरा बहुत सुंदर था और वह अपने चेहरे की सुन्दरता बनाये रखने के लिए दाढ़ी नहीं रखता था।

अब्दुल्ला ने ‘तारीखे दाऊदी’ में लिखा है कि जब निजाम खाँ छोटा बालक था, तब उसकी सुंदरता से प्रेरित होकर शेख हसन नामक एक मौलवी उससे प्रेम करने लगा। शहजादे को मौलवी के रंग-ढंग अच्छे नहीं लगे इसलिए शहजादे ने एक दिन मौलवी को पकड़ लिया तथा उसे आग के पास ले जाकर उसकी दाढ़ी जला दी।

कुछ इतिहासकारों के अनुसार पूर्व सुल्तान बहलोल लोदी के कई पुत्र थे तथा बहलोल ने मृत्यु से पहले अफगानी कबीलों के रिवाज के अनुसार अपनी सल्तनत को अपने पुत्रों में विभाजित कर दिया था, जबकि कुछ इतिहासकारों के अनुसार जब बहलोल लोदी मृत्यु-शैय्या पर था तो उसकी चहेती स्त्री हेमा अपने पति के साथ युद्ध-शिविर में थी। बहलोल लोदी ने हेमा के पुत्र सिकंदर को अपना उत्तराधिकारी बनाया।

इस पर सिकंदर के चचेरे भाई ईसा खाँ ने हेमा को गालियां देते हुए यह कहा कि एक हिन्दू सुनार स्त्री का पुत्र अफगानों का सुल्तान नहीं बन सकता। ईसा खाँ चाहता था कि बहलोल लोदी अपने बड़े पुत्र बारबकशाह को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त करे जो कि जौनपुर का गवर्नर था तथा जिसकी माता सुन्नी मुसलमान थी।

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ईसा खाँ द्वारा सुल्तान की स्त्री को गालियां दिए जाने पर कई अफगान सरदार ईसा खाँ तथा बारबक शाह से नाराज हो गए तथा बहलोल लोदी की मृत्यु के बाद मिलौली गांव में हुई एक सभा में अफगान सरदारों ने मृत सुल्तान बहलोल लोदी की इच्छा को स्वीकार करते हुए उसके पुत्र निजाम खाँ को नया सुल्तान चुन लिया। खानखाना फारमूली ने निजाम खाँ के चयन में बड़ी भूमिका निभाई।

17 जुलाई 1489 को जलाली गांव में निजाम खाँ का राज्याभिषेक किया गया। वह सिकंदरशाह लोदी के नाम से दिल्ली सल्तनत का सुल्तान हुआ। इस पर मृत सुल्तान बहलोल के पुत्र बारबकशाह और बहलोल के भतीजों हुमायूं आजम एवं ईसा खाँ ने अफगान अमीरों के निर्णय का विरोध करते हुए बगावत का झण्डा बुलंद किया। सिकंदर लोदी के चाचा आलम खाँ आदि कुछ अन्य अमीरों ने बागियों का अनुसरण किया क्योंकि उन्हें भी यह सहन नहीं था कि एक हिन्दू औरत के पेट से उत्पन्न लड़का अफगानी अमीरों पर राज करे।

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इस कारण सिकंदरशाह की स्थिति डांवाडोल हो गई किंतु उसने धैर्य से काम लेते हुए अपने सैनिकों को पक्ष में लेने का प्रयास किया तथा सैनिकों को चार महीनों का वेतन पुरस्कार के रूप में दे दिया। सिकंदर लोदी ने अपने पक्ष के अमीरों को अपने दरबार में बुलाकर उन्हें सुंदर वस्त्र एवं आकर्षक पद देकर सम्मानित किया। सिकंदरशाह के बड़े भाई बारबकशाह ने स्वयं को जौनपुर का स्वतंत्र शासक घोषित किया। पाठकों को स्मरण होगा कि पूर्व सुल्तान बहलोल लोदी ने बारबक शाह को जौनपुर का गवर्नर नियुक्त किया था। सिकंदर लोदी ने अपने बड़े भाई बारबकशाह को प्रेम से समझाने का प्रयास किया किंतु जब बारबक शाह नहीं माना तो सुल्तान ने उसका दमन करके उसे बंदी बना लिया तथा जौनपुर को फिर से दिल्ली सल्तनत के अधीन कर लिया। अब सिकंदर शाह ने अपने चाचा आलम खाँ पर आक्रमण किया। आलम खाँ ने पराजित होने के बाद सुल्तान के समक्ष उपस्थित होकर क्षमा याचना की। सिकंदर लोदी ने आलम खाँ को क्षमा कर दिया तथा उसे इटावा का सूबेदार नियुक्त कर दिया। अब सिकंदरशाह ने अपने चचेरे भाई ईसा खाँ से निबटने का बीड़ा उठाया।

ईसा खाँ ने मरहूम सुल्तान बहलोल लोदी के सामने सिकंदर लोदी की माँ को गालियां दी थीं। इसलिए सिकंदर लोदी ईसा खाँ को भलीभांति दण्डित करना चाहता था। जब सुल्तान की सेना ने ईसा खाँ पर आक्रमण किया तो ईसा खाँ ने भी एक सेना लेकर सुल्तान का सामना किया। दोनों पक्षों में हुए भयानक युद्ध के बाद ईसा खाँ युद्धक्षेत्र में घायल होकर भाग गया। कुछ दिनों बाद उसकी मृत्यु हो गई।

सिकंदर लोदी का चचेरा भाई हुमायूं आजम कालपी का शासक था। उसने भी सिकंदर को सुल्तान बनाए जाने का विरोध किया तथा सिकंदर लोदी द्वारा बारबकशाह को बंदी बनाए जाने के बाद स्वयं को दिल्ली का सुल्तान घोषित कर दिया। सुल्तान सिकंदरशाह लोदी की सेनाओं ने हुमायूं आजम को युद्ध में परास्त करके उससे कालपी छीन ली।

बयाना का हाकिम भी हुमायूं आजम की सहायता कर रहा था। सिकंदर लोदी ने उससे बयाना छीन लिया तथा खानखाना फारूखी को बयाना का गवर्नर बना दिया। इसी प्रकार कुछ अन्य विरोधी अमीरों को भी सिकंदर लोदी ने युद्ध में हराकर उन्हें भलीभांति दण्डित किया। अपने विरोधियों को पूर्णतः परास्त करने में सिकंदर शाह को तीन साल का समय लग गया।

सल्तनत के बागियों से निबटकर सिकंदर लोदी ने अफगान अमीरों पर शिकंजा कसने का निर्णय लिया। पूर्व-सुल्तान बहलोल लोदी अफगानी कबीलों की परम्परा के अनुसार अपने अमीरों को बराबरी का सम्मान प्रदान करता था किंतु सिकन्दर लोदी ने अफगान सरदारों से समानता की अफगानी कबीलों की परम्परा का परित्याग करके, तुर्की सुल्तानों एवं हिन्दू राजाओं की परम्परा ‘सुल्तान अथवा राजा ही सर्वश्रेष्ठ है’, नीति का अनुसरण किया।

सिकन्दर लोदी ने अमीरों को अपने सामने खड़े रहने की व्यवस्था लागू की, ताकि उनके ऊपर सुल्तान की महत्ता प्रदर्शित हो सके। पूर्व सुल्तान बहलोल लोदी अपने अमीरों के साथ एक कालीन पर बैठता था जबकि सिकंदर लोदी सिंहासन पर बैठा करता था और उसके अमीर उसके सामने विनम्रता पूर्वक खड़े रहते थे।

सिकंदर लोदी ने नियम बनाया कि जब किसी अमीर अथवा प्रांतपति के पास शाही फ़रमान भेजा जाए तो अमीर अपने घर से बाहर आकर एवं गवर्नर अपने शहर से छः मील आगे आकर आदर के साथ शाही फरमान का स्वागत करे। ऐसा नहीं करना सुल्तान के प्रति अनादर माना जाता था और ऐसे अमीर को दण्डित किया जाता था।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

सिकंदर लोदी का शासन (156)

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सिकंदर लोदी का शासन - www.bharatkaitihas.com
सिकंदर लोदी का शासन

दिल्ली सल्तनत का सुल्तान बनने के बाद सिकंदर लोदी को अगले तीन साल अपने विरोधियों को नष्ट करने में लगाने पड़े। इसके बाद उसने अफगान अमीरों को अनुशासन में बांधने का प्रयास किया। सिकंदर लोदी का शासन प्रबंधन तथा अमीरों पर नियंत्रण ये एक-साथ चलते रहे।

अफगान अमीर अपनी उच्छृंखल प्रवृत्ति के कारण किसी का भी अनुशासन स्वीकार नहीं करते थे। पूर्व-सुल्तान बहलोल लोदी ने सुल्तान की स्थिति ‘समस्त अमीरों में प्रथम’ अर्थात् ‘फर्स्ट अमांग ऑल मिनिस्टर्स’ की निर्धारित की थी। अतः अफगान अमीर, सुल्तान की उपस्थिति में भी निःशंक होकर हंसी-ठट्ठा करते थे। सिकंदर लोदी को अमीरों की यह प्रवृत्ति पसंद नहीं थी।

एक बार जब सिकंदर लोदी जौनपुर में युद्ध-अभियान पर था, अमीरों के बीच चौगान खेलने का मुकाबला हुआ। खेल-खेल में अमीरों के बीच झगड़ा हो गया तथा अमीर एक दूसरे को गालियां देने लगे। इस पर सुल्तान आग-बबूला हो गया। उसने एक अमीर को उसी समय कोड़े लगवाए, दूसरे अमीर को भी सबके सामने कठोर दण्ड दिया। उसने अमीरों को चेतावनी दी कि वे सुल्तान की इज्जत करना सीखें।

इस पर कुछ अमीरों ने सिकंदर लोदी से विद्रोह करके उसके भाई फतह खाँ को सुल्तान बनाने का निर्णय लिया। सिकंदर लोदी को अमीरों की इस कारस्तानी का पता चल गया तथा उसने 22 अमीरों को अपने दरबार से निकाल दिया और उनमें से कइयों को कठोर दण्ड दिए। इससे अमीरों में सुल्तान का भय व्याप्त हो गया।

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उस काल में अमीरों को केवल दण्ड एवं नियम के सहारे अपने वश में रख पाना संभव नहीं था। इसलिए सिकंदर लोदी अपने अमीरों को धन देकर संतुष्ट करता रहता था। तत्कालीन मुस्लिम इतिहासकारों ने लिखा है कि सुल्तान को धन का तनिक भी मोह नहीं था। इसलिए जब सुल्तान को कहीं से धन मिल जाता था तो वह उस धन को अपने अमीरों में बांट देता था।

गियासुद्दीन बलबन एवं अल्लाउद्दीन खिलजी के समय में दिल्ली सल्तनत में राजस्व व्यवस्था को चुस्त बनाने का प्रयास किया गया था तथा उसमें कठोरता का समावेश किया गया था। सिकंदर लोदी का शासन भी उनकी नीति का अनुसरण था। सिकंदर लोदी ने सल्तनत की राजस्व व्यवस्था में कठोरता का समावेश किया। सल्तनत के जागीरदारों को नियमित रूप से केन्द्रीय सरकार के पास राजस्व का लेखा भेजना अनिवार्य कर दिया गया। हिसाब में गड़बड़ी पाए जाने पर जमींदारों को कड़ी सजा दी जाती थी।

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सिकंदर लोदी का पिता बहलोल लोदी जमींदारी प्रथा का पोषक था। सिकंदर लोदी का शासन भी जमींदारी व्यवस्था पर आधारित था। उसने जमींदारों को सल्तनत का आधार बनाया जो स्थानीय किसानों से भू-राजस्व-कर वसूल करके केन्द्रीय शासन तक पहुंचाते थे। बहलोल लोदी ने जमींदारों को मजबूत बनाया तथा उन्हें सदैव प्रसन्न रखने का प्रयत्न किया परन्तु सिकन्दर लोदी जमींदारी प्रथा का घोर विरोधी था। सिकंदर लोदी का मानना था कि जमींदार न केवल जनता पर अत्याचार करते हैं अपितु जनता से वसूल किए गए कर में से चोरी भी करते हैं। इसलिए सिकंदर लोदी ने जमींदारों से भू-राजस्व-कर का हिसाब देने के लिए कहा। हिसाब में गड़बड़ी पाए जाने पर सुल्तान ने कई जमींदारों को पदच्युत कर दिया तथा उनके स्थान पर सीधे ही केन्द्रीय सरकार की ओर से राजस्व वसूलने वाले अधिकारियों की नियुक्ति की। इससे जमींदारों में बड़ा असन्तोष फैला और कुछ जमींदार सुल्तान सिकंदर लोदी के विरुद्ध षड्यन्त्र रचने लगे। सुल्तान को इस षड्यन्त्र का पता लग गया। इसलिए सुल्तान ने बहुत से जमींदारों को पकड़कर बड़ी क्रूरता के साथ दण्डित किया। जब सिकंदर लोदी ने जौनपुर के प्रांतपति बारबक शाह को बंदी बना लिया तो जौनपुर के जमींदारों ने जौनपुर के पुराने प्रांतपति हुसैनशाह को अपना खोया हुआ राज्य पुनः प्राप्त करने के लिए प्रोत्साहित किया।

हुसैनशाह न केवल अपनी खोई हुई सूबेदारी पर अधिकार करना चाहता था अपितु वह अपने पुराने अपमान का भी बदला लेना चाहता था। एक बार पूर्व-सुल्तान बहलोल लोदी ने हुसैनशाह की बेगम को पकड़ लिया था, इसलिए हुसैनशाह बहलोल के पुत्र सिकंदर से उस अपमान का बदला लेना चाहता था।

हुसैनशाह उन दिनों बिहार में रहता था। वह एक विशाल सेना लेकर जौनपुर की तरफ बढ़ा। दिल्ली की सेना भी हुसैनशाह का मार्ग रोकने के लिए आगे बढ़ी। बनारस के निकट दोनों सेनाओं में युद्ध हुआ। इस युद्ध में हुसैनशाह की पराजय हो गई। वह जान बचाकर बंगाल की राजधानी लखनौती की ओर भाग गया और वहीं पर गुप्त रूप से अपना जीवन बिताने लगा। सिकन्दर लोदी ने जौनपुर में अपने कृपापात्र व्यक्ति को सूबेदार नियुक्त कर दिया।

जब सुल्तान ने बिहार को दिल्ली सल्तनत में मिला लिया तो बंगाल का सुल्तान अल्लाउद्दीन हुसैनशाह अत्यंत क्रोधित हुआ। उसने सिकंदरशाह के विरुद्ध सेना भेजी किंतु अंत में दोनों पक्षों में बिना किसी युद्ध के ही समझौता हो गया। बंगाल के सुल्तान ने सिकंदर लोदी को वचन दिया कि वह सिकंदर लोदी के शत्रुओं को बंगाल में शरण नहीं देगा। सिकंदर लोदी ने भी बंगाल के सुल्तान को वचन दिया कि वह भी भविष्य में बंगाल पर आक्रमण नहीं करेगा।

सिकन्दर लोदी ने अफगान सरदारों एवं अमीरों को नियन्त्रण में रखने का हर संभव प्रयास किया और उनके स्वतन्त्र होने के समस्त प्रयासों को विफल किया। सिकंदर लोदी अपने अमीरों से सदैव शंकित रहता था इसलिए अमीरों तथा उनके सेवकों की नियुक्त स्वयं करता था जिनमें से बहुत से लोग सुल्तान की तरफ से गुप्तचरी करते थे। कुछ इतिहासकारों ने लिखा है कि पूरी कड़ाई बरतने के बाद भी सिकंदर लोदी अमीरों को नियंत्रित नहीं कर सका।

सिकन्दर लोदी के समय में विद्रोह करने वाली हिन्दू-शक्तियों को बलपूर्वक दबाया गया और उन पर कड़ा नियन्त्रण रखा गया। सिकन्दर लोदी ने राज्य की आय पर सल्तनत का जैसा नियन्त्रण स्थापित किया, उससे पूर्व केवल अल्लाउद्दीन खिलजी तथा बलबन के समय में ही देखा गया था। सिकंदर ने सरकारी धन हड़पने का प्रयास करने वाले प्रांतपतियों, जमींदारों तथा राजस्व वसूली अधिकारियों को कठोर दण्ड दिए। जबकि इससे पहले कोई भी सुल्तान ऐसा कदम किसी मजबूरी में ही उठाता था।

सिकंदर लोदी ने विद्रोहियों एवं अपराधियों को भी कठोर दण्ड दिए जिसके कारण सल्तनत में अपराध एवं विद्रोह घट गए। तत्कालीन इतिहासकारों ने लिखा है कि उसके शासनकाल में सड़कें सुरक्षित थीं। लोगों को चोरों तथा डाकुओं का भय नहीं था।

सल्तनत के प्रत्येक अंग पर शिकंजा कसने के लिए सिकन्दर लोदी ने मजबूत गुप्तचर विभाग की व्यवस्था की। इससे उसे अमीरों एवं अधिकारियों की गुप्त कार्यवाहियों, बागियों अपराधियों तथा आक्रमणकारियों की गतिविधियों की सूचना समय रहते ही मिल जाती थी। इस प्रकार सिकंदर लोदी का शासन अपने पूर्ववर्ती सुल्तानों से बेहतर था किंतु हिन्दू प्रजा पर अत्याचारों में कोई कमी नहीं आई।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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काशी (Kashi) को पुराणों] धर्मशास्त्रों, विविध हिन्दू ग्रंथों, इतिहास ग्रंथों  तथा लोकपरंपरा में अनेक नामों से पुकारा जाता है। इसके प्रमुख नाम निम्नलिखित हैं— काशी...
तिरुक्कुरल विश्व साहित्य का गौरव - bharatkaitihas.com

तिरुक्कुरल : विश्व साहित्य का गौरव

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तिरुक्कुरल (Thirukkural) केवल एक पुस्तक नहीं है, बल्कि यह जीवन जीने की एक संपूर्ण संहिता है। इसे 'तमिल वेद' और 'विश्व नीतिशास्त्र' के रूप...