Home Blog Page 120

महाराज रघु

0

महाराज रघु ने यक्षराज कुबेर से ब्राह्मणकुमार के लिए कर प्राप्त किया!

अयोध्या के इक्ष्वाकु वंश के पुराण-प्रसिद्ध राजा दिलीप के पुत्र राजा रघु हुए। वे अत्यंत प्रतापी एवं सत्यनिष्ठ राजा थे। अनेक पुराणों में राजा रघु की कथा मिलती है जिनके अनुसार राजा दिलीप को नंदिनी गाय की सेवा करने के प्रसाद के रूप में राजा रघु एवं रानी सुदक्षिणा को पुत्र के रूप में प्राप्त हुए थे।

जब रघु छोटे बालक थे, तब उनके पिता महाराज दिलीप ने अश्वमेध यज्ञ किया। देवराज इन्द्र ने यज्ञ के अश्व को पकड़ लिया। इस पर राजकुमार रघु ने इन्द्र से युद्ध किया तथा इन्द्र को पराजित करके यज्ञ का अश्व छुड़ा लिया।

जब राजा रघु राज्यसिंहासन पर बैठे तो उन्होंने दिग्विजय करके चारों दिशाओं में कौशल राज्य का विस्तार किया। दिग्विजय के पश्चात् राजा रघु ने अपने कुल गुरु वसिष्ठ की आज्ञा से विश्वजित यज्ञ किया और उसमें अपनी संपूर्ण संपत्ति दान कर दी।

ठीक उसी समय विश्वामित्र का शिष्य कौत्स वहाँ आया। वह अपने गुरु को चौदह करोड़ स्वर्ण मुद्राएं दक्षिणा में देने के लिए राजा रघु से याचना करने आया था।

राजा रघु ने ब्राह्मण कुमार का स्वागत किया तथा उससे कहा- ‘आज मैं कृतार्थ हुआ! आप-जैसे तपोनिष्ठ, वेदज्ञ ब्रह्मचारी के स्वागत से मेरा गृह पवित्र हो गया। आपके गुरुदेव श्री वरतन्तु मुनि अपने तेज़ से साक्षात अग्निदेव के समान हैं। उनके आश्रम का जल निर्मल एवं पूर्ण तो है? वहाँ वर्षा ठीक समय पर तो होती है? आश्रम के नीवार समय पर तो पकते हैं? आश्रम के, मृग एवं तरु पूर्ण रूप से प्रसन्न तो हैं?’

पूरे आलेख के लिए देखिए यह वी-ब्लॉग-

महाराज रघु के कुशल-प्रश्न शिष्टाचार मात्र नहीं थे। उनका तात्पर्य यह ज्ञात करने से था कि राजा रघु के राज्य में इन्द्र, वरुण, अग्नि, वायु, पृथ्वी आदि देवी-देवता अपने दायित्वों का निर्वहन ढंग से कर रहे हैं अथवा नहीं!  पुराणों में आए विवरण के अनुसार यदि कोई देवी-देवता राजा रघु के राज्य में अपने दायित्व का निर्वहन नहीं करते थे तो राजा रघु उन्हें दण्ड देकर अनुशासित कर सकते थे। राजा रघु यह सहन नहीं कर सकते थे कि उनके राज्य में तपोमूर्ति ऋषियों के आश्रम में देवी-देवता किसी तरह का विघ्न उत्पन्न करने का साहस करें।

ब्राह्मण कुमार कौत्स ने कहा- ‘आप-जैसे धर्मज्ञ एवं प्रजावत्सल नरेश के राज्य में सर्वत्र मंगल होना स्वाभाविक है। ऋषियों के आश्रमों में भी सर्वत्र कुशलता है।’

TO PURCHASE THIS BOOK, PLEASE CLICK THIS PHOTO

कौत्स ने देखा कि महाराज के शरीर पर एक भी आभूषण नहीं है। चक्रवर्ती राजा होने पर भी महाराज रघु ने ब्राह्मण कुमार को मिट्टी के पात्रों में अर्घ्य एवं पाद्य निवेदित किया था। कौत्स समझ गया कि महाराज यज्ञ पूर्ण होने पर अपना सर्वस्व दान कर चुके हैं। राजमुकुट और राजदण्ड के अतिरिक्त राजा के पास कुछ नहीं है। इसलिए कौत्स ने चौदह करोड़ स्वर्ण मुद्राएं प्राप्त करने की अभिलाषा का उल्लेख नहीं किया।

राजा ने पूछा- ‘हे ब्राह्मण कुमार आपका अध्ययन पूर्ण हो गया होगा। अब आपके गृहस्थाश्रम में प्रवेश करने का समय है। कृपा करके मुझे कोई सेवा बताएं। मैं इसमें अपना सौभाग्य मानूँगा।’

ब्राह्मण कुमार ने कहा- ‘हे राजन्! मैंने अपने गुरु से चतुर्दश विद्याओं का अध्ययन किया है। अध्ययन पूर्ण होने पर मैंने अपने गुरु से आग्रह किया कि वे गुरु-दक्षिणा माँगें। गुरु विद्याध्ययन काल में मेरे द्वारा आश्रम में की गई सेवा से ही सन्तुष्ट थे परन्तु मेरे बार-बार आग्रह करने पर उन्होंने चौदह कोटि स्वर्ण-मुद्राएँ माँगीं क्योंकि मैंने उनसे चतुर्दश विद्याओं का अध्ययन किया है। हे नरेन्द्र! आपका मंगल हो। मैं आपको कष्ट नहीं दूँगा। पक्षी होने पर भी चातक सर्वस्व अर्पित करके सहज शुभ्र बने घनों से याचना नहीं करता। आप अपने त्याग से परमोज्ज्वल हैं। मैं आपसे कोई याचना नहीं करूंगा, आप मुझे अनुमति दें।’

ब्राह्मण कुमार की बात सुनकर राजा चिंतित हुए। उन्होंने कहा-‘ हे ब्राह्मण कुमार आप कृपा करके अयोध्या पधारे हैं। अतः थोड़ा अनुग्रह और करें एवं तीन दिन मेरी अग्निशाला में चतुर्थ अग्नि की भाँति सुपूजित होकर निवास करें!  रघु के यहाँ से सुयोग्य वेदज्ञ ब्राह्मण निराश लौट जाए, यह मैं कैसे सह सकता हूँ।’

ब्राह्मण कुमार कौत्स को महाराज रघु की प्रार्थना स्वीकार करनी पड़ी और वह अयोध्या राज्य की यज्ञशाला में ठहर गया। अतिथि की इच्छा पूर्ण किए बिना राजा रघु को अपने भवन में प्रवेश करना अनुचित जान पड़ा। इसलिए उन्होंने अपने अनुचरों से कहा- ‘मैं आज रात रथ में ही शयन करूँगा। उसे शस्त्रों से सुसज्जित कर दो! यक्षराज कुबेर ने हमारे राज्य को कर नहीं दिया है। इसलिए मैं कल प्रातः होते ही कुबेर पर आक्रमण करने जाउंगा।’

जब राजा रघु ने दिग्विजिय यात्रा की थी और उसके बाद यज्ञ किया था, तब दोनों ही अवसरों पर भारत भर के समस्त नरेश अयोध्या को कर दे चुके थे तथा राजा रघु कर में प्राप्त सम्पूर्ण कोष ब्राह्मणों एवं निर्धनों को दान कर चुके थे किंतु दिग्पाल कुबेर ने अयोध्या को कर नहीं दिया था। अन्य समस्त देवता स्वर्ग में रहते थे इसलिए राजा रघु उनसे तो कर नहीं मांग सकते थे किंतु कुबेर स्वर्ग में नहीं रहता था। उसकी राजधानी अलकापुरी में थी जो हिमालय पर स्थित थी। इस कारण वह अयोध्या राज्य का अंग थी। इस नाते कुबेर को चाहिए था कि वह अयोध्या के चक्रवर्ती सम्राट को कर दे। कुबेर से कर वसूलने का निश्चय करके महाराज रघु रथ में ही सो गए ताकि अगली प्रातः अलकापुरी पर आक्रमण के लिए प्रस्थान कर सकें।

अगली प्रातः महाराज रघु ब्रह्ममुहूर्त में उठे और अपने शस्त्र संभालने लगे। जैसे ही महाराज ने शंख ध्वनि की, वैसे ही अयोध्या राज्य के कोषाध्यक्ष ने आकर राजा को सूचित किया कि महाराज आज प्रातः ब्रह्म मुहूर्त में जब मैं कोषागार में कुबेर की पूजा करने गया तो वहाँ अचानक ही स्वर्ण की वर्षा होने लगी।

महाराज रघु समझ गए कि कुबेर ने अयोध्या का कर चुका दिया है। महाराज रघु ने उसी समय ब्राह्मण कुमार कौत्स को बुलाकर उससे कहा कि यह समस्त धन यक्षराज कुबेर ने आपके निमित्त दिया है। अतः आप इस द्रव्य को स्वीकार करें।

कौत्स ने कहा- ‘राजन्! मैं ब्राह्मण हूँ। मधुकरी से प्राप्त कण ही मेरी विहित वृत्ति है। गुरु दक्षिणा की चौदह कोटि स्वर्ण मुद्राओं से अधिक एक भी मुद्रा का स्पर्श मेरे लिये लोभ तथा पाप है।’ इस प्रकार ब्रह्मचारी कौत्स ने चौदह कोटि स्वर्ण मुद्रा स्वीकार कर लीं और राजा को आशीर्वाद देकर वहाँ से चला गया। राजा ने शेष मुद्राएं ब्राह्मणों को दान कर दीं।

महाराज रघु ने दीर्घकाल तक भारत की प्रजा का पालन किया। वे इक्ष्वाकु कुल में सर्वश्रेष्ठ राजा माने गए इसलिए इक्ष्वाकु कुल को रघुवंश कहा गया। रामायण, महाभारत एवं लगभग समस्त पुराणों में महाराज रघु का उल्लेख किया गया है। महाकवि कालिदास ने अपने प्रसिद्ध ग्रंथ ‘रघुवंशम्’ की रचना इन्हीं महाराज रघु को केन्द्र में रखकर की है।

रघु के पुत्र अज, अज के पुत्र दशरथ और दशरथ के पुत्र राम अयोध्या के नरेश हुए। रघु के वंशज होने के कारण ही राम को राघव, राघवेन्द्र, रघुवर, रघुवीर, रघुनाथ, रघुकुल भूषण आदि सम्मानजनक शब्दों से विभूषित किया जाता है।

राजा अज

0

राजा अज ने जंगल में लकड़ियां काटकर गुरु दक्षिणा चुकाई!

अज का अर्थ होता है जिसका जन्म नहीं हुआ हो। इसीलिए प्रजापति ब्रह्मा को अज कहा जाता है। पौराणिक काल में अज नामक कई राजा हुए हैं। इनमें सर्वाधिक विख्यात ईक्ष्वाकु वंश का राजा अज था। वह महाराज रघु का पुत्र था।

विष्णु पुराण सहित अनेक पुराणों में महाराज अज की कथा मिलती है। बहुत से पुराणों में राजा अज के विवाह की घटना का उल्लेख मिलता है। इस उल्लेख के अनुसार एक बार किसी देश के राजा भोजराज ने अपनी राजकुमारी इंदुमती के विवाह के लिए स्वयंवर का आयोजन किया। जब राजकुमार अज को इस स्वयंवर की सूचना मिली तो वे भी अपने पिता की आज्ञा से इस स्वयंवर में भाग लेने के लिए राजा भोजराज की राजधानी में गए।

राजकुमार अज ने स्वयंवर में राजकुमारी इंदुमति को जीत लिया एवं इंदुमति ने प्रसन्नता पूर्वक राजा अज का वरण किया। राजकुमार अज अपनी रानी को लेकर अपने पिता की राजधानी अयोध्या लौट आए। जब महाराज रघु ने देखा कि उनका पुत्र वयस्क हो गया है एवं उसका विवाह भी हो गया है तब महाराज रघु ने वानप्रस्थ आश्रम में प्रवेश करने का निश्चय किया।

सूर्यवंशी इक्ष्वाकुओं में यह परम्परा थी कि वे अपने जीवन का तीसरा काल आरम्भ होने  पर अर्थात् प्रौढ़ावस्था आने पर अपना राजपाट अपने पुत्र अथवा योग्य उत्तराधिकारी को सौंपकर स्वयं रानी सहित वनप्रांतर में चले जाते थे और वहीं पर ईश आराधना एवं आध्यात्मिक चिंतन करते थे।

जब वनवासी राजा वृद्ध होते थे तो वे सन्यास आश्रम में प्रवेश करके पुनः मानव समाज में लौटते थे और अपने द्वारा वानप्रस्थ आश्रम के दौरान अर्जित ज्ञान को जन साधारण में बांट देते थे और देशाटन करते हुए ब्रह्मलीन होते थे।

महाराज रघु ने भी प्रौढ़ावस्था आने पर अपना राज्यपाट अपने पुत्र अज को सौंप दिया तथा स्वयं रानी सहित वन में चले गए। पुराने राजा के वानप्रस्थाश्रम में प्रवेश करने के पश्चात् कुलगुरु महार्षि वसिष्ठ ने रघुवंशी राजकुमार अज का राज्यभिषेक किया। अज से ही ईक्ष्वाकुओं को रघुवंशी कहे जाने की परम्परा आरम्भ हुई। महाराज अज ने अपने पूर्वजों की परम्परा के अनुसार राज्य का धर्म पूर्वक पालन किया।

पूरे आलेख के लिए देखिए यह वी-ब्लॉग-

एक बार राजा अज ने गुरु वसिष्ठ को अपने महल में आमंत्रित किया तथा उनसे एक यज्ञ सम्पन्न करवाया। यज्ञ पूर्ण होने के बाद राजा अज ने गुरु से प्रार्थना की कि वे यज्ञ की दक्षिणा मांगें।

गुरु वसिष्ठ ने कहा- ‘हम दक्षिणा अवश्य लेंगे किंतु महाराज अज! आप हमें दक्षिणा में क्या देना चाहते हैं!’

राजा अज ने कहा- ‘महाराज! कौशल राज्य सामर्थ्यवान एवं सम्पन्न राज्य है, अपने कुलगुरु की प्रत्येक इच्छा पूरी कर सकता है, आप स्वयं ही अपनी इच्छा बताएं।’

इस पर गुरु वसिष्ठ ने कहा- ‘महाराज! राज्य की सम्पत्ति प्रजा द्वारा चुकाए गए कर से उत्पन्न होती है। इस सम्पत्ति में से राजा को अपनी निजी आवश्यकताएं पूरी करने का पूरा अधिकार होता है। इस नाते आप हमें राज्यकोष में से जो चाहे दे सकते हैं किंतु महाराज इस बार हम आपकी प्रजा द्वारा चुकाए गए कर से दक्षिणा नहीं लेंगे। हमारी इच्छा है कि आप अपने परिश्रम से एक दिन में जो धन अर्जित करें, वह सम्पूर्ण धन हमें गुरु दक्षिणा के रूप में प्रदान करें।’

TO PURCHASE THIS BOOK, PLEASE CLICK THIS PHOTO

राजा अज ने सोचा कि मैं तो अत्यंत सामर्थ्यवान राजा हूँ, अतः एक दिन में अधिक से अधिक धन अर्जित कर लूंगा ताकि गुरु वसिष्ठ उस धन से संतुष्ट हो जाएं। इसलिए राजा अज ने महर्षि की इस इच्छा को स्वीकार कर लिया तथा महर्षि से एक दिन की प्रतीक्षा करने को कहा। महर्षि वसिष्ठ तो राजा के महल में ठहर गए और राजा अज उसी समय अपना महल एवं राज्य छोड़कर निकटवर्ती राज्य में चले गए।

राजा अज अपने ही राज्य में परिश्रम करके धन अर्जित नहीं कर सकते थे। क्योंकि वे जिसके पास भी काम मांगने जाते तो वह राजा पर अनुग्रह करके उन्हें अधिक से अधिक राशि देने का प्रयास करता जो कि राजा के परिश्रम से धर्म-पूर्वक अर्जित की गई राशि नहीं होती। इसलिए राजा अज अपने राज्य से बाहर निकल गए और साधारण श्रमिक का वेश बनाकर निकटवर्ती राज्य में पहुंचे। महाराज अज ने उस नगर के बड़े-बड़े श्रेष्ठियों के पास जाकर उनसे एक दिन के लिए काम देने की प्रार्थना की किंतु इस अपरिचित नगर में उन्हें किसी ने कोई काम नहीं दिया। इस पर राजा अज निकटवर्ती वन में चले गए और दिन भर सूखे वृक्ष काटकर उनकी लकड़ियां एकत्रित करते रहे।

संध्याकाल में राजा ने वे लकड़ियां वन के निकट स्थित नगर में लाकर बेच दीं। एक श्रेष्ठि ने उस समस्त सूखी लकड़ियों के लिए राजा अज को केवल एक साधारण मुद्रा प्रदान की। राजा अपने पूरे दिन के गहन परिश्रम का इतना तुच्छ पारिश्रमिक देखकर बहुत निराश हुए। फिर भी गुरु को दिए वचन के अनुसार राजा अज एक साधारण मुद्रा लेकर अपनी राजधानी अयोध्या पहुंचे और उन्होंने अत्यंत कष्ट के साथ वह मुद्रा गुरु के चरणों में रख दी।

महर्षि वसिष्ठ ने अपने चरणों में रखी हुई एक साधारण मुद्रा एवं राजा के म्लान मुख को देखा तो सारी स्थिति समझ गए। उन्होंने मुद्रा लेकर अपने कमण्डल में रखते हुए कहा- ‘राजन! यह धन आपने अपने परिश्रम से अर्जित किया है। आज से पहले किसी भी राजा ने अपने कुलपुरोहित को स्वयं द्वारा अर्जित धन दक्षिणा में नहीं दिया होगा। इस दक्षिणा को पाकर मैं अत्यंत प्रसन्न हूँ।’

यह कथा यहीं समाप्त होती है तथा देखने में अत्यंत साधारण प्रतीत होती है किंतु वस्तुतः इस कथा के माध्यम से हमारे ऋषियों ने समस्त भारतवासियों को अपने परिश्रम से धन अर्जित करने एवं उस धन से अपने परिवार का पालन करने का उपदेश दिया है।

इस घटना के कुछ दिन बाद राजा अज रानी इन्दुमती के साथ उद्यान में घूम रहे थे। तभी आकाश मार्ग से जा रहे देवर्षि नारद की वीणा से लिपटी हुई देवलोक की एक पुष्पमाला गिर पड़ी और नीचे धरती पर आकर रानी इन्दुमती के कण्ठ में जा पड़ी। इस माला के प्रहार से रानी इन्दुमती की उसी क्षण मृत्यु हो गई।

महाराज अज को रानी की मृत्यु से अत्यंत शोक हुआ। तभी देवर्षि नारद वहाँ प्रकट हुए। उन्होंने राजा को बताया कि रानी इन्दुमति का धरती पर इतना ही जीवन था। उन्हें पुनः स्वर्ग में बुला लिया गया है। राजा अज को देवर्षि नारद की यह बात सुनकर बहुत आश्चर्य हुआ। इस पर देवर्षि नारद ने राजा अज को रानी इन्दुमती के पूर्व जन्म की कथ सुनाई।

देवर्षि ने कहा- ‘एक बार देवराज इन्द्र ने तृणविन्दु नामक ऋषि की तपस्या भंग करने के लिए हरिणी नामक एक अप्सरा को भेजा था। इस पर ऋषि ने हरिणी को मानवी के रूप में जन्म लेने का शाप दे दिया। हरिणी के अनुरोध करने पर ऋषि तृणविंदु ने उसे शाप से छूटने का उपाय भी बता दिया तथा कहा कि जब देवर्षि नारद की वीणा पर लिपटी हुई माला तेरे गले में गिरेगी तब तुझे मानवी रूप से मुक्ति मिलेगी। आज संयोगवश मेरे आकाश गमन के समय मेरी वीणा से लिपटी हुई पुष्पमाला गिर पड़ी और हरिणी शाप मुक्त होकर पुनः स्वर्ग में जा पहुंची। इसलिए अज को रानी इन्दुमति की मृत्यु का शोक नहीं करना चाहिए।’

देवर्षि नारद की बात सुनकर अज ने धैर्य धारण किया। उस समय राजकुमार दशरथ छोटे बालक थे। अतः राजा अज ने अपने पुत्र का बहुत ध्यान से लालन-पालन किया तथा उन्हें समुचित शिक्षा दिलवाई। इस प्रकार पत्नी के वियोग में राजा के आठ वर्ष बीत गए। राजा अज ने देखा कि राजकुमार दशरथ सब प्रकार से प्रजा का पालन करने योग्य हो गए हैं तो राजा ने अपना राजपाट दशरथ को दे दिया और स्वयं तपस्या करते हुए पंचत्त्व में विलीन हो गए।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

रानी कैकेयी

0

रानी कैकेयी ने देवासुर संग्राम में राजा दशरथ के प्राणों की रक्षा की!

राजा दशरथ ईक्ष्वाकु वंशी राजा अज के पुत्र थे एवं त्रेता युग में कौशल राज्य के राजा थे जिसकी राजधानी अयोध्या थी। राजा दशरथ का उल्लेख विभिन्न पुराणों, महर्षि वाल्मीकि द्वारा रचित रामायण एवं भगवान वेदव्यास द्वारा रचित महाभारत में हुआ है।

दशरथ का शाब्दिक अर्थ होता है दस रथ अथवा दस रथों का स्वामी। वाल्मीकि रामायण के 5वें सर्ग में अयोध्या पुरी का वर्णन किंचित् विस्तार से किया गया है। वाल्मीकि रामायण के अनुसार सरयू नदी के तट पर बसे इस नगर की स्थापना राजा विवस्वान के पुत्र वैवस्वत मनु द्वारा की गई थी।

दर्शकों को स्मरण होगा कि वैवस्वत मनु ही वर्तमान मनवन्तर के मनु हैं। इसका अर्थ यह हुआ कि अयोध्या नगरी वर्तमान मानव सभ्यता में धरती पर बसने वाली सबसे प्राचीन नगरी है। तब से लेकर अयोध्या में मनु के वंशज ही राजा होते आए थे जिन्हें इक्ष्वाकु राजा, सूर्यवंशी राजा एवं रघुवंशी राजाओं के नाम से सम्बोधित किया जाता था। ईक्ष्वाकु वंश की परम्परा के अनुसार राजा दशरथ परम प्रतापी एवं वीर थे।

रघुवंशी राजा दशरथ की तीन रानियां थीं- कौशल्या, सुमित्रा और कैकेयी। महारानी कौशल्या वर्तमान छत्तीसगढ़ प्रांत के कौशल प्रदेश के राजा भानुमान की राजकुमारी थीं। वाल्मीकि रामायण, रामचरित मानस तथा अनेकानेक प्राचीन संस्कृत नाटकों में कौशल्या का उल्लेख राजा दशरथ की सर्वप्रमुख रानी एवं राजकुमार रामचंद्र की माता के रूप में मिलता है किंतु आनन्द-रामायण में दशरथ एवं कौशल्या के विवाह का वर्णन विस्तार से हुआ है।

विभिन्न पुराणों में दशरथ और कौशल्या को कश्यप और अदिति का अवतार बताया गया है। रामचरित मानस सहित कुछ ग्रंथों में दशरथ और कौशल्या को स्वायंभू-मनु एवं शतरूपा का अवतार बताया गया है। जैन साहित्य में कौशल्या का वर्णन अलग ढंग से मिलता है। मुनि गुणभद्र कृत उत्तर-पुराण में कौशल्या की माता का नाम सुबाला तथा पुष्पदत्त के ‘पउम चरिउ’ में कौशल्या का दूसरा नाम अपराजिता बताया गया है।

पूरे आलेख के लिए देखिए यह वी-ब्लॉग-

लगभग समस्त पौराणिक ग्रंथों एवं रामायण में महारानी कौसल्या को अपने पति की आज्ञाकारिणी बताया गया है जो पति के प्रत्येक निर्णय को चुपचाप स्वीकार करती है किंतु महर्षि वेदव्यास रचित अध्यात्मरामायण में कौसल्या को अपने अधिकारों के प्रति सचेष्ट तथा राम को वन जाने से रोकते हुए चित्रित किया गया है।

महाराज दशरथ की दूसरी रानी सुमित्रा थीं। वे मगध नरेश की पुत्री थीं जो अयोध्या का अधीनस्थ सामंत था। सामंत पुत्री होने के कारण रानी सुमित्रा का स्तर महारानी कौसल्या की अपेक्षा नीचा था।

महाराज दशरथ की तीसरी रानी कैकेई केकय नरेश की कन्या थी। महाराज दशरथ ने केकय नरेश को परास्त करने के पश्चात् संधि की शर्त के रूप में कैकेई से विवाह किया था। इस विवाह के समय राजा दशरथ की उम्र कैकेई की अपेक्षा काफी अधिक थी। इसलिए कैकेई ने वृद्ध नरेश के साथ विवाह करने से पहले एक शर्त रखी कि कैकेई के गर्भ से जो पुत्र उत्पन्न होगा, वही अयोध्या राज्य का उत्तराधिकारी होगा।

TO PURCHASE THIS BOOK, PLEASE CLICK THIS PHOTO

इस प्रकार ये तीनों रानियां आर्य राजाओं की पुत्रियां होते हुए भी अलग-अलग स्तर के राजाओं की पुत्रियां थीं तथा राजमहल में उनके सम्मान भी उन्हीं के अनुरूप थे। महारानी कौसल्या एक स्वतंत्र राजा की पुत्री थीं, इसलिए उनका सम्मान सर्वोच्च था। रानी सुमित्रा एक अधीनस्थ सामंत की पुत्री थीं इसलिए उनका सम्मान तीनों रानियों में सबसे कम था। रानी कैकेई एक पराजित राजा की पुत्री थीं किंतु उनका सम्मान सुमित्रा की अपेक्षा इसलिए अधिक था क्योंकि वह राजा की सबसे प्रिय और सबसे चहेती रानी थी।

यद्यपि सार्वजनिक रूप से जब राजा के साथ रानी को भी विराजमान होता था तो महारानी कौसल्या ही पटरानी होने के कारण महाराज के साथ विराजमान होती थीं तथापि यदि महाराज कभी अपने राज्य से बाहर जाते तो रानी कैकेई उनके साथ जाती थी। सुमित्रा की अधिकार सीमा केवल महल के भीतर तक थी। अधिकारों का यह अंतर पुत्र-कामेष्ठि यज्ञ के समय स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। इक्ष्वाकुवंशी राजाओं की कथाओं को पढ़ने से अनुमान होता है कि इस वंश के राजाओं को पुत्र की प्राप्ति सहज रूप से नहीं होती थी जिसके कारण इक्ष्वाकुवंशी राजाओं को तपस्या एवं यज्ञ आदि करके पुत्र प्राप्ति हेतु प्रयास करना पड़ता था।

ठीक यही स्थिति महाराज दशरथ के साथ भी थी। उनकी तीन रानियां थीं, आयु भी पर्याप्त हो चुकी थी किंतु उनके कोई पुत्र नहीं था।

इसलिए कुलगुरु वसिष्ठ के परामर्श पर महाराज दशरथ ने श्ृंगी ऋषि को बुलवाकर पुत्र-कामेष्ठि यज्ञ करवाया। यज्ञ के पूर्ण होने पर स्वयं अग्निदेव अपने हाथों में खीर का पात्र लेकर प्रकट हुए। उन्होंने खीर का वह पात्र राजा दशरथ को दिया और कहा कि वे इस खीर को अपनी रानियों को खिला दें।

इस पर राजा दशरथ ने खीर का आधा भाग पटरानी कौसल्या को दे दिया। शेष आधे भाग के दो भाग किए। उनमें से एक भाग रानी कैकेई को दिया। इस प्रकार खीर का जो चौथाई भाग बचा, उसके दो भाग करके एक-एक भाग पुनः कौसल्या एवं कैकेई के हाथों पर रख दिए। कौसल्या एवं कैकेई की स्वीकृति लेकर राजा दशरथ ने वे दोनों छोटे भाग रानी सुमित्रा को दे दिए।

अग्निदेव की कृपा से महारानी कौसल्या के गर्भ से स्वयं श्री हरि विष्णु का अवतार हुआ जिन्हें ‘राम’ कहा गया। वे त्रेता युग में भगवान श्री हरि विष्णु के तीसरे अवतार थे। त्रेता में पहला अवतार वामन के रूप में हुआ था जिन्होंने धरती एवं स्वर्ग को राक्षसों से मुक्त करवाकर उनके राजा बलि को पाताल लोक में रहने के लिए भेजा था।

दूसरा अवतार भगवान परशुराम के रूप में हुआ था जिन्होंने हैहय क्षत्रियों का विनाश करके धरती को उनके अत्याचारों से मुक्त करवाया था। तीसरा अवतार भगवान श्रीराम के रूप में हुआ जिन्होंने रावण तथा उसके पुत्रों का वध करके ऋषि-मुनियों को अभय प्रदान किया।

रानी कैकेई के गर्भ से राजकुमार भरत का जन्म हुआ। उनके लिए कहा जाता था कि साक्षात धर्म  ही मानव-देह में उपस्थित हुआ है। उन्हें भगवान विष्णु के सुदर्शन चक्र का अवतार माना जाता था। रानी सुमित्रा के दो पुत्र हुए- लक्ष्मण एवं शत्रुघ्न। लक्ष्मण को शेषनाग का एवं शत्रुघ्नजी को भगवान के हाथ में धारण किए जाने वाले शंख का अवतार माना जाता है।

वाल्मीकि रामायण में अयोध्या काण्ड के अन्तर्गत अध्याय 7 से 42 तक कैकेयी से सम्बन्धित कथा का विस्तार से वर्णन हुआ है। इसके अनुसार देवासुर एक बार देवराज इन्द्र तथा दण्डकारण्य में रहने वाले असुर शंबर के बीच भीषण युद्ध हुआ। देवताओं ने अयोध्या नरेश दशरथ को अपनी सहायता करने के लिए बुलाया। इससे पहले भी इक्ष्वाकु वंशी राजा देवासुर संग्रामों में देवों की सहायता करने के लिए जाते रहे थे।

राजा दशरथ अपनी रानी कैकेई को अपने साथ लेकर युद्ध क्षेत्र में गए। रानी कैकेई शस्त्र एवं रथ संचालन में निपुण थी। उसने महाराज के रथ पर रहकर महाराज के शरीर की रक्षा की तथा जब महाराज के रथ का धुरा टूट गया तब कैकेई ने अपना हाथ उस धुरे में फंसा दिया ताकि महाराज रथ पर टिके रहकर युद्ध कर सकें।

जब असुरों ने महाराज को शस्त्रों के प्रहार से घायल कर दिया तब कैकेई राजा दशरथ के रथ को युद्ध क्षेत्र से बाहर निकाल लाई तथा महाराज को सुरक्षित रूप से अयोध्या ले आई। युद्ध समाप्त होने पर जब महाराज दशरथ को कैकेयी के इस कौशल का पता लगा, तो उन्होंने प्रसन्न होकर कैकेयी को दो वर माँगने के लिए कहा। कैकेयी ने उन वरों को यथासमय माँगने के लिये रख छोड़ा।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

राजा दशरथ की रानियाँ

0

प्राणमय, अन्नमय ओर मनोमय कोश की प्रतीक हैं राजा दशरथ की रानियाँ !

विभिन्न पुराणों में आई हुई कथाओं में वर्णित ईक्ष्वाकु वंशी राजाओं को मानव देह धारी होने के साथ-साथ प्राकृतिक शक्तियों के रूप में देखा जाता है। उदाहरण के लिए राजा सगर के साठ हजार पुत्रों की कथा, राजा धुंधुमार द्वारा धुंधु राक्षस के संहार की कथा, राजा भगीरथ द्वारा गंगाजी को धरती पर लाकर समुद्र को जल से भरने की कथा। ये सब कथाएं धरती पर होने वाली विशाल प्राकृतिक घटनाओं की ओर संकेत करती हैं।

इसी तरह ईक्ष्वाकु वंशी राजा दशरथ की तीनों रानियों को कुछ दार्शनिकों ने प्राणमय, अन्नमय और मनोमय कोश का प्रतीक सिद्ध करने का प्रयास किया है। इन प्रतीकों के विस्तार में जाने से  पहले हमें उन पांच कोषों के बारे में जानना होगा जिनके भीतर प्रत्येक प्राणी निवास करता है।

जब माया के प्रेरणा से आत्मा परमात्मा से अलग होकर शरीर धारण करती है तो उसे सबसे पहले माया द्वारा निर्मित आनंदमय कोष रूपी शरीर की प्राप्ति होती है। जब आनंदमय कोष में रहने वाला आत्मा माया के प्रभाव से कुछ ज्ञान प्राप्त कर लेता है तो उसे एक नया शरीर प्राप्त होता है जिसे विज्ञानमय कोष कहते हैं।

विज्ञानमय कोष आनंदमयकोष के ऊपर लिपट जाता है। इस विज्ञानमय कोष को जब माया के प्रभाव से सुख-दुख की अनुभूति होने लगती है तो उसे एक नया शरीर प्राप्त होता है जिसे मनोमय कोष कहते हैं। यह मनोमय कोष विज्ञानमय कोष के चारों ओर लिटप जाता है।

जब माया के प्रभाव से मनोमय कोष में सुख और दुख की अनुभूतियों का विस्तार होता है तो प्राणमय कोष की रचना होती है तथा यह प्राणमय कोष मनोमय कोष के चारों ओर लिटप जाता है। जब माया की इच्छा से प्राणमय कोष को भोग करने की इच्छा होती है तो उसे एक नया शरीर प्राप्त होता है जिसे अन्नमय कोष कहते हैं। यह प्रत्येक प्राणी का सबसे बाहरी शरीर होता है जिसका निर्माण अन्न से होता है।

पूरे आलेख के लिए देखिए यह वी-ब्लॉग-

इस प्रकार हमारे बाहरी शरीर अर्थात् अन्नमय कोष के भीतर प्राणमय कोष, प्राणमय कोष के भीतर मनोमय कोष, मनोमय कोष के भीतर विज्ञानमय कोष एवं विज्ञानमय कोष के भीतर आनंदमय कोष स्थित होता है।

इस प्रकार परमात्मा के अंश के रूप में विलग हुए आत्मा पर माया का आवरण चढ़ता चला जाता है तथा वह परमात्मा को पूरी तरह भूलकर इन पांचों कोषों के माध्यम से ना-ना प्रकार के भोग विलास करने में जुटा रहता है।

जब जीवात्मा अपने समस्त बाह्याडम्बरों का विनाश करके परमात्मा में विलीन होता है तो उसके पांचों शरीरों को एक एक करके मरना पड़ता है। सबसे पहले अन्नमय कोष मरता है। उसके बाद प्राणमय कोष मरता है। उसके बाद मनोमय कोष मरता है और उसके बाद विज्ञानमय कोष मरता है और सबसे अंत में मनुष्य का सबसे सूक्ष्म शरीर अर्थात् आनंद कोष नष्ट होता है, इसके बाद आत्मा पुनः परमात्मा में मिल जाता है।

TO PURCHASE THIS BOOK, PLEASE CLICK THIS PHOTO

विभिन्न दार्शनिकों द्वारा प्रस्तुत दार्शनिक विवेचनाओं के अनुसार राजा दशरथ भोग में लिप्त जीवात्मा के प्रतीक हैं। इसलिए रामचरित मानव में सुमंतजी जब राजा दशरथ को प्रणाम करते हैं तो जयजीव कहकर शीश झुकाते हैं। प्रत्येक मनुष्य की दस इन्द्रियां होती हैं- पांच ज्ञानेन्द्रियां तथा पांच कर्मेन्द्रियां। आँख, कान, नाक, जीभ और त्वचा को ज्ञानेन्द्रियां कहा जाता है। तथा हाथ, पैर, मुंह, गुदा और लिंग को कर्मेन्द्रिय कहा जाता है। इन दस इंद्रियों को समुच्चय को ही दशरथ कहा गया है। इन दस रथों पर सवार जीवात्मा अर्थात् दशरथ भोग विलास करता है।

दार्शनिकों के अनुसार महारानी कौसल्या दशरथ रूपी जीवात्मा की ज्ञान-शक्ति की प्रतीक हैं एवं उनका वर्ण क्षत्रिय है। वे हानि-लाभ की चिंता नहीं करती, केवल कर्त्तव्य निर्वहन ही उनका अभीष्ट है। रानी कैकेयी इच्छा-शक्ति की प्रतीक है, उसका वर्ण वैश्य है, इस कारण वह हानि-लाभ की चिंता करती है। रानी सुमित्रा राजा दशरथ रूपी जीवात्मा की की क्रिया-शक्ति का प्रतीक है, उसका वर्ण शूद्र है।

शूद्र अन्नमय कोश का, वैश्य प्राणमय कोश का और क्षत्रिय मनोमय कोश का प्रतीक है। इन तीनों कोषों के भीतर छिपकर राजा दशरथ रूपी विज्ञानमय कोष एवं आनंदमय कोष निवास करता है।

राजा दशरथ को कैकेयी सबसे अधिक प्रिय है क्योंकि प्राणमय कोश मनोमय और अन्नमय दोनों कोषों का भरण-पोषण करता है। प्राणमय कोष के बिना मनोमय कोष और अन्नमय कोष जीवित नहीं रह सकते। दशरथ रूपी विज्ञानमय कोश ऊर्ध्वमुखी होकर, शुद्ध ब्रह्म रूपी आनंदमय कोष को अर्थात् श्रीराम को सिंहासन पर आसीन करना चाहता है, कौसल्या रूपी मनोमय कोष इस कार्य में विज्ञानमय कोष की सहायता करता है तथा सुमित्रा रूपी अन्नमय कोष इस कार्य की मौन स्वीकृति देता है किन्तु प्राणमय कोश रूपी कैकेयी जिसके पास मन्थर गति से चलने वाली मन्थरा दासी रूपी बुद्धि है, इस कार्य में विघ्न उत्पन्न करती है क्योंकि कैकेयी मन के एकाङ्गी विकास को स्वीकार नहीं करती, अपितु चाहती है कि परब्रह्म रूपी राम का लाभ सारे जगत् को मिले।

प्राणमय कोष की प्रतीक रानी कैकेयी को कैकेयी नाम देना सार्थक ही है। संस्कृत साहित्य में ध्वनि के एक विशेष प्रकार को ‘केकय’ कहा जाता है। यह ध्वनि समस्त ध्वनियों में सर्वश्रेष्ठ मानी जाती है। मन में अनेक प्रकार की इच्छा रूपी ध्वनियां उत्पन्न होती हैं किंतु रानी कैकेई ने राजा राजा दशरथ रूपी विज्ञानमय कोष और कौसल्या रूपी मनोमय कोष के भीतर विशेष ध्वनि उत्पन्न की कि रामजी को अयोध्या के सिंहासन पर बैठने के स्थान पर जगत् के कल्याण के लिए वन-गमन करना चाहिए ताकि असुरों का नाश हो सके।

पुराणों में रानी कैकेयी को अश्वपति की कन्या भी कहा गया है। यहाँ अश्वपति से तात्पर्य इन्द्रिय रूपी अश्वों के स्वामी अर्थात् मन से है।

व्यक्तित्व के सर्वांगीण विकास को चाहने वाली शक्ति अर्थात् कैकेयी के साथ सदैव विद्यमान रहने वाली व्यक्तित्व-विकास की स्मृति को ही कथा में मन्थरा नाम दिया गया है। चूंकि यह स्मृति शिथिल रूप में विद्यमान रहती है और केवल परिस्थिति विशेष अर्थात् आत्मज्ञान के अनुचित विनियोग अर्थात् राम के राज्याभिषेक को देखकर ही प्रकट होती है। इसलिए इस शिथिलता अथवा मन्दता के कारण इसे मन्थरा कहा गया है।

भले ही कुछ दार्शनिकों ने दशरथ को दस इन्द्रियों का प्रतीक; रानियों को प्राणमय, मनोमय एवं अन्नमय कोषों का प्रतीक एवं मंथरा को बुद्धि विशेष का प्रती बनाकर यह सुंदर रूपक खड़ा कर दिया है किंतु हमारी दृष्टि में दार्शनिक आधार पर  की गई यह विवेचना भारतीय जन मानस में प्रचलित धारणा से मेल नहीं खाती। भारतीय जन मानस में राजा दशरथ एवं माता कौसल्या को श्रीराम के प्रेम का प्रतीक माना गया है जो एक क्षण के लिए भी श्रीराम को अपनी आंखों से दूर नहीं करना चाहते एवं कैकेई तथा मंथरा को दुर्बुद्धि का प्रतीक माना गया है जो रामजी को राजतिलक से वंचित करके उन्हें वन में भेजने का षड़यंत्र करती हैं। यही कारण है कि सदियों से भारत में कोई भी व्यक्ति अपनी पुत्रियों के नाम कैकेई अथवा मंथरा नहीं रखता।

हम यह भी स्पष्ट कर देना चाहते हैं कि आत्मा के पांच कोषों में निवास करने एवं इन पांचों कोषों को त्यागकर परमपिता परमात्मा में विलीन हो जाने की अवधारणा को हम गलत नहीं ठहरा रहे। हम तो केवल इतना कह रहे हैं कि महारानी कौशल्या, सुमित्रा एवं कैकई को इन कोषों के रूप में देखने का जो दार्शनिक रूपक खड़ा किया गया है, वह उचित नहीं जान पड़ता। यह तो ऐसा ही प्रयास है जैसे किसी का नाम पर्वतसिंह रख दिया जाए और फिर कहा जाए कि उसका नाम पर्वतसिंह इसलिए रखा गया क्योंकि वह वास्तव में एक विशाल पहाड़ था।

गोस्वामी तुलसीदासजी ने भी राम चरित मानस में रानी कैकेई और दासी मंथरा के कृत्य को निंदनीय ही माना है तथा उन्हें अपयश की पिटारी कहा है।

श्रीराम कितने पुराने हैं

0

ईक्ष्वाकु वंशी श्रीराम कितने पुराने हैं ? इस प्रश्न का उत्तर आज तक नहीं दिया जा सका है! धार्मिक, ऐतिहासिक एवं पुरातात्विक साक्ष्य श्रीराम का कालखण्ड अलग-अलग समय पर निर्धारित करते हैं! हिन्दू धर्म ग्रंथराजा रामचंद्र को पौने दो करोड़ साल पुराना बताते हैं!

 ईक्ष्वाकु वंशी राजा दशरथ के चार पुत्र हुए। बड़े पुत्र रामचंद्र अपने शील, सौंदर्य एवं शक्ति के कारण सम्पूर्ण अयोध्यावासियों के प्रिय थे। राजा रामचंद्र अयोध्या के 64वें ईक्ष्वाकुवंशी राजा थे। वे भी त्रेता युग में हुए।

इतिहासकार अब तक श्रीराम का जीवनकाल निश्चित नहीं कर पाए हैं। रामायण मीमांसा के रचनाकार स्वामी करपात्रीजी, पण्डित ज्वालाप्रसाद मिश्र, श्रीराघवेंद्रचरितम् के रचनाकार श्रीभागवतानंद गुरु आदि के अनुसार श्रीराम अवतार श्वेतवाराह कल्प के सातवें वैवस्वत मन्वन्तर के चौबीसवें त्रेता युग में हुआ था जिसके अनुसार श्रीरामचंद्र का काल लगभग पौने दो करोड़ वर्ष पूर्व का है। ये सभी विद्वान अपने मत के समर्थन में विचार पीयूष, भुशुण्डि रामायण, पद्मपुराण, हरिवंश पुराण, वायु पुराण, संजीवनी रामायण एवं अन्य पुराणों से प्रमाण देते हैं।

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार भगवान राम का जन्म त्रेता युग में हुआ। हिन्दू मान्यताओं के अनुसार त्रेता युग की कुल अवधि 12 लाख 96 हजार वर्ष थी। इस युग में भगवान विष्णु के तीन अवतार- वामन, परशुराम एवं श्रीराम हुए। इनमें से राम तीसरे थे जो कि विष्णु के सातवें अवतार थे। इसके बाद द्वापर युग आया जिसकी अवधि 8 लाख 64 हजार वर्ष रही।

द्वापर के बाद ई.पू. 3 हजार 102 में कलियुग आरम्भ हुआ। यदि भगवान श्रीराम को त्रेता के अंतिम खण्ड में माना जाए तो उनका जन्म आज से कम से कम 8 लाख 69 हजार 119 वर्ष पहले हुआ। वैज्ञानिक इस तिथि को स्वीकार नहीं करते क्योंकि तब तक धरती पर मानव सभ्यता विकसित नहीं हुई थी। कतिपय वैज्ञानिक शोधों के अनुसार भगवान राम का जन्म ई.पू. 5 हजार 114 अर्थात् आज से लगभग 7 हजार वर्ष पूर्व हुआ।

पूरे आलेख के लिए देखिए यह वी-ब्लॉग-

वाल्मीकि रामायण की रचना का काल आज से लगभग 2800 वर्ष पुराना माना जाता है। इस ग्रंथ में पहली बार रामकथा का परिपक्व स्वरूप उभर कर सामने आया। इससे पहले भी रामकथाओं के अनेक ग्रंथ थे, वे अब नष्ट हो गए हैं। महर्षि वाल्मीकि ने उन ग्रंथों एवं हिन्दू जनमानस में प्रचलित कथाओं के आधार पर रामायण नामक ग्रंथ की रचना की। आज हमारे पास रामकथा को बताने वाला सबसे पुराना ग्रंथ यही है। इसमें श्रीराम के जीवन से जुड़े स्थलों का वर्णन किया गया है।

अब तक प्राप्त प्राचीनतम उल्लेख के अनुसार आज से लगभग 2 हजार साल पहले अर्थात् प्रथम शताब्दी ईस्वी में उज्जैन के राजा शकारि विक्रमादित्य ने इक्ष्वाकुओं की राजधानी अयोध्या की यात्रा की तथा रामायण में वर्णित स्थान पर पहले से ही स्थित मंदिर का भव्य नवनिर्माण करवाया।

जब पांचवी शताब्दी ईस्वी के प्रारम्भ में चीनी यात्री फाह्यान अयोध्या आया तो उसने अयोध्या में कुछ बड़े बौद्ध मंदिरों को देखा। उसने अयोध्या के किसी हिन्दू मंदिर का उल्लेख नहीं किया है। इससे प्रतीत होता है कि इस काल तक बौद्धों ने हिन्दुओं के प्राचीन मंदिरों को तोड़ डाला था। अथवा बौद्ध होने के कारण फाह्यान को हिन्दू मंदिरों का उल्लेख करने में कोई रुचि नहीं थी।

TO PURCHASE THIS BOOK, PLEASE CLICK THIS PHOTO

सातवीं शताब्दी ईस्वी में जब ह्वेसांग अयोध्या आया, तब तक अयोध्या में बड़ी संख्या में बौद्ध एवं जैन मंदिर बन चुके थे। वह भी बौद्ध था तथा उसने भी अयोध्या के किसी हिन्दू मंदिर का उल्लेख नहीं किया है। ऑस्ट्रिया के एक पादरी फादर टाइफैन्थेलर ने सत्रहवीं शताब्दी में अयोध्या की यात्रा की तथा लगभग 50 पृष्ठों में अयोध्या यात्रा का वर्णन किया। इस वर्णन का फ्रैंच अनुवाद ई.1786 में बर्लिन से प्रकाशित हुआ।

फादर टाइफैन्थेलर ने लिखा है- ‘अयोध्या के रामकोट मौहल्ले में तीन गुम्बदों वाला ढांचा है जिसमें काले रंग की कसौटी के 14 स्तम्भ लगे हुए हैं। इसी स्थान पर भगवान श्रीराम ने अपने तीन भाइयों सहित जन्म लिया। जन्मभूमि पर बने मंदिर को बाबर ने तुड़वाया। आज भी हिन्दू इस स्थान की परिक्रमा करते हैं और साष्टांग दण्डवत करते हैं।’

ई.1889-91 में अलोइज अंटोन नामक इंग्लिश पुरातत्वविद् की देख-रेख में अयोध्या का पुरातात्विक सर्वेक्षण किया गया जिसमें उसने अयोध्या के निकट तीन टीले देखे जिन्हें मणिपर्वत, कुबेरपर्वत तथा सग्रीवपर्वत कहा जाता था। ब्रिटिश पुरातत्ववेत्ता कनिंघम ने माना है कि इन टीलों के नीचे बड़े बौद्ध मठों के अवशेष हैं जिनका उल्लेख ह्वेसांग ने किया था। स्वतंत्रता के पश्चात् अयोध्या नगर में हुई खुदाइयों में अयोध्या में मानव सभ्यता को ईसा से 1,700 वर्ष पूर्व अर्थात् आज से 3,700 वर्ष पूर्व पुरानी माना गया।

निश्चय ही इसके पूर्व की सभ्यता नष्ट हो गई होगी क्योंकि रामसेतु पुल की कार्बन डेटिंग से इस तथ्य की पुष्टि हो चुकी है कि मानव निर्मित इस सेतु का निर्माण आज से लगभग सात हजार साल पहले हुआ था। अर्थात् अयोध्या में निश्चित रूप से आज से सात हजार साल पहले भी सभ्यता रही होगी जो काल के प्रवाह में नष्ट हो चुकी होगी।

अतः हम इसी निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि इक्ष्वाकुवंशी राजकुमार रामचंद्र का जन्म आज से लगभग सात हजार साल पहले हुआ था।

हिन्दू धर्म के प्राचीन ग्रंथों में हुए उल्लेखों के अनुसार अयोध्या में श्रीराम के जीवन से जुड़े स्थलों पर तीन मंदिर बनाए गए। पहला मंदिर श्रीराम की जन्मभूमि पर था जिसे ‘जन्मस्थानम्’ कहा जाता था। दूसरा मंदिर ‘त्रेता के ठाकुर’ कहलाता था जहाँ भगवान ने अपनी लौकिक देह का त्याग किया। तीसरा मंदिर ‘स्वर्गद्वारम्’ कहलाता था जहाँ भगवान की लौकिक देह का अंतिम संस्कार किया गया।

सात हजार वर्ष की अवधि में अयोध्या ने जाने कितनी करवटें ली होंगी किंतु हिन्दुओं को राजा रामचंद्र से जुड़े तीनों मंदिर जन्मस्थानम्, त्रेता के ठाकुर एवं स्वर्गदारम् याद रहे। अयोध्या के धार्मिक महत्व के कारण ही बौद्धों एवं जैनों ने भी अयोध्या को अपनी गतिविधियों का प्रमुख केन्द्र बनाया किंतु धार्मिक संकीर्णता के चलते उन्होंने अपने ग्रंथों में श्रीराम से सम्बद्ध मंदिरों का उल्लेख नहीं किया।

ईस्वी 1526 में मुगल बादशाह बाबर ने भारत पर आक्रमण किया। ई.1528 में बाबर ने अपने सेनापति मीर बाकी को आदेश दिया कि वह अयोध्या का ‘जन्मस्थानम्’ नामक मंदिर तोड़ दे ताकि अयोध्या की धार्मिक पहचान मिटाई जा सके। कुछ हिन्दू राजाओं ने हँसवर के राजगुरु देवीनाथ पांडे के नेतृत्व में मीर बाकी पर आक्रमण किया। इस युद्ध में 1,74,000 हिन्दू सैनिकों ने प्राणों की आहुति दी। युद्ध में विजय प्राप्त करके मीर बाकी ने राम जन्मभूमि मंदिर को तोड़ डाला तथा उसके स्थान पर एक मस्जिदनुमा ढांचा बना दिया।

इस मस्जिदनुमा ढांचे को खड़ा करने में राम जन्मभूमि मंदिर के भग्नावशेषों को काम में लिया गया जिसमें काले रंग के कसौटी पत्थर के चौदह स्तम्भ भी सम्मिलित थे जिन पर हिन्दुओं के धार्मिक चिह्न उत्कीर्ण थे। मीर बाकी ने इस ढांचे के सामने एक शिलालेख अंकित करवाया जिसमें इस स्थल का ‘फरिश्ते का जन्म स्थान’ के रूप में उल्लेख किया।

चूंकि यह काम मुगल आक्रांता बाबर के सेनापति मीर बाकी ने किया था, इसलिए मुसलमानों ने इस ढांचे को बाबरी मस्जिद कहा। मुगल दस्तावेजों में इसे ‘मस्जिद जन्मस्थानम्’ कहा जाता रहा। जब भारत के छठे मुगल बादशाह औरंगजेब ने ई.1669 में उत्तर भारत के समस्त मंदिरों को तोड़ने के आदेश दिए तो उसकी सेनाओं ने अयोध्या में भगवान श्रीराम के दो मंदिरों ‘त्रेता के ठाकुर’ तथा स्वर्गद्वारम् को भी नष्ट कर दिया।

इसके बाद पूरे पांच सौ सालों तक हिन्दू अयोध्या के जन्मस्थानम् मंदिर को फिर से प्राप्त करने के लिए संघर्ष करते रहे। नवम्बर 2019 में भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने अयोध्या का जन्मस्थानम् मंदिर स्थल फिर से हिन्दुओं को लौटा दिया है और अब इस स्थान पर एक भव्य मंदिर बनाने की तैयारियां चल रही हैं।

भरत तुम मनुष्यों के राजा बनो, मैं जंगली पशुओं का सम्राट बनूंगा (26)

0
भरत - bharatkaitihas.com
भरत तुम मनुष्यों के राजा बनो, मैं जंगली पशुओं का सम्राट बनूंगा

जब श्रीराम ने भरत से यह कहा कि तुम मनुष्यों के राजा बनो और मैं जंगली पशुओं का सम्राट बनूंगा तो इस बात में कई गुप्त संदेश छिपे हुए थे। उनके कहने का आशय यह था कि अब मैं जंगल में घुसकर वहाँ निवास करने वाले नरभक्षी राक्षसों का अनुशासन करंगा अर्थात् उन्हें नष्ट करूंगा।

पिछली कड़ी में हमने चर्चा की थी कि ईक्ष्वाकु वंशी राजाओं की उज्जवल परम्परा में अयोध्या नरेश राजा दशरथ के चार पुत्र हुए जिनमें सबसे बड़े रामचंद्र थे। इस कड़ी में हम उन राजकुमारों के त्याग और उच्च आदर्श के प्रतिमान स्थापित करने की चर्चा करेंगे।

राजा रदशरथ के बड़े पुत्र अपने शील, सौंदर्य एवं शक्ति के कारण सम्पूर्ण अयोध्यावासियों के प्रिय थे। रामचंद्र का विवाह मिथिला के राजा सीरध्वज की बड़ी पुत्री सीता से हुआ जो राजा सीरध्वज द्वारा खेत में हल चलाते समय भूमि को फाड़कर प्रकट हुई थी।

राजा दशरथ के पुत्र लक्ष्मण का विवाह राजा सीरध्वज की दूसरी पुत्री उर्मिला से हुआ था। दशरथ के पुत्र भरत का विवाह मिथिला के राजा सीरध्वज के छोटे भाई कुशध्वज की पुत्री माण्डवी से एवं शत्रुघ्न का विवाह कुशध्वज की छोटी पुत्री श्रुतकीर्ति से हुआ।

जब राजा दशरथ ने अपनी वृद्धावस्था का विचार करके अपने बड़े पुत्र रामचंद्र को राज्य देना चाहा तो रानी कैकेई ने देवासुर संग्राम में राजा दशरथ के प्राण बचाने के पुरस्कार के रूप में मिले दो वरदानों का उपयोग करते हुए अपने पुत्र भरत के लिए राजसिंहासन और कौसल्या नंदन रामचंद्र के लिए 14 वर्ष का वनवास मांग लिया।

राजकुमार रामचंद्र की रानी सीता एवं अनुज लक्ष्मण ने भी रामचंद्र के साथ वन में जाने का निर्णय लिया। रामचंद्र के वनवास के दौरान घटित घटनाओं से ईक्ष्वाकु वंशी राजाओं की शुभ्र परम्पराओं का इतिहास प्राप्त होता है। राजकुमार रामचंद्र ने 14 वर्ष की अवधि का उपयोग वनवासी ऋषियों एवं तपस्वियों का सानिध्य प्राप्त करने एवं ऋषियों को दुख देने वाले असुरों का संहार करने में किया।

पूरे आलेख के लिए देखिए यह वी-ब्लॉग-

राम, लक्ष्मण एवं सीता अयोध्या से निकलकर गंगा-यमुना के संगम स्थल अर्थात् प्रयाग में स्थित भरद्वाज ऋषि के आश्रम पर गए तथा उनसे पूछा- ‘हमें वनवास की अवधि में कहाँ निवास करना चाहिए!’

ऋषि भरद्वाज ने उनसे अनुरोध किया- ‘आप यहीं रह जाइए। गंगा-यमुना के संगम पर स्थित तीर्थराज प्रयाग अत्यंत सुखकारी एवं पुण्य स्थल है।’

इस पर राम ने कहा- ‘यह स्थान अयोध्या के निकट है इसलिए अयोध्यावासी यहाँ आते रहेंगे और मेरे एकांतवास में विघ्न उत्पन्न करेंगे।’

इस पर महर्षि भरद्वाज ने उन्हें चित्रकूट पर्वत पर जाकर निवास करने की सलाह दी। कुछ समय पश्चात् भरतजी अयोध्यावासियों को लेकर चित्रकूट पहुंचे तथा श्रीराम से अयोध्या लौट चलने का अनुरोध करने लगे तो राम ने पिता के वचनों का सम्मान रखने के लिए 14 वर्ष तक वन में ही रहने का संकल्प व्यक्त किया तथा अनुज भरत से कहा कि वह पिता के वचनों का पालन करते हुए अपना राज्याभिषेक करवा ले तथा अपने स्वर्गीय पिता दशरथ को, माता कैकेई को दिए हुए वचन रूपी ऋण से मुक्त करवाए।

वाल्मीकि रामायण में कहा गया है कि श्रीराम ने अपने अनुज भरत से कहा- ‘पुत्र अपने माता-पिता को पुत् नामक नर्क से मुक्ति दिलवाता है, इसलिए उसे पुत्र कहा जाता है। वही पुत्र है जो पितरों की सब ओर से रक्षा करता है। चूंकि हम राजा दशरथ के पुत्र हैं इसलिए हमें अपने पिता की मुक्ति के लिए उनके वचनों एवं आदेशों का पालन करना चाहिए। उन्होंने तुम्हें राज्य करने और मुझे वन में जाने का आदेश दिया था।’

राम ने कहा- ‘हे भरत! तुम शत्रुघ्नजी तथा समस्त ब्राह्मणों को साथ लेकर अयोध्या को लौट जाओ! मैं भी अब लक्ष्मण और सीता को लेकर दण्डकारण्य में प्रवेश करूंगा। भरत! तुम स्वयं मनुष्यों के राजा बनो और मैं जंगली पशुओं का सम्राट बूंगा। अतुलित बुद्धि वाले शत्रुघ्नजी तुम्हारी सहायता में रहें ओर सुविख्यात सुमित्राकुमार लक्ष्मण मेरे प्रधान मित्र हैं, हम चारों पुत्र अपने पिता राजा दशरथ के सत्य की रक्षा करें। तुम विषाद मत करो।’

TO PURCHASE THIS BOOK, PLEASE CLICK THIS PHOTO

जब श्रीराम ने भरत से यह कहा कि तुम मनुष्यों के राजा बनो और मैं जंगली पशुओं का सम्राट बनूंगा तो इस बात में कई गुप्त संदेश छिपे हुए थे। उनके कहने का आशय यह था कि अब मैं जंगल में घुसकर वहाँ निवास करने वाले नरभक्षी राक्षसों का अनुशासन करंगा अर्थात् उन्हें नष्ट करूंगा। आगे चलकर जब खर और दूषण श्रीराम पर आक्रमण करते हैं तो श्रीराम इस बात को दूसरे शब्दों में कहते हैं- ‘हम छत्री मृगया बन करहीं। तुम्ह से खल मृग खोजत फिरही।’ अर्थात् हम क्षत्रिय राजकुमार हैं और इस वन में तुम्हारे जैसे पशुओं का ही वध करते फिर रहे हैं। राजकुमार भरत ने श्रीराम के आदेश को स्वीकार लिया और उनसे कहा कि आपके आदेशानुसार मैं अयोध्या लौट जाउंगा तथा आप भी पिता के वचनों का सम्मान करते हुए चौदह वर्ष तक वन में रहें किंतु अयोध्या के राजा आप ही हैं। मैं आपकी चरण पादुकाओं को शीश पर धरकर तथा उन पादुकाओं से आदेश लेकर राजकाज करूंगा एवं चौदह वर्ष बीतने पर जब आप अयोध्या लौटेंगे, तब आपका राज्यतिलक होगा तथा आप अयोध्यावासियों के राजा बनकर उन्हें सुख देंगे। इतना कहकर कैकेई नंदन भरत ने श्रीराम की पादुकाएं अपने शीश पर रख लीं और अयोध्यावासियों को साथ लेकर पुनः अयोध्या लौट गए।

अलग-अलग लेखकों द्वारा लिखी गई सम्पूर्ण रामकथाओं को यदि सार रूप में ग्रहण करें तो उनसे कुछ निश्चित प्रतिमान स्पष्ट होते हैं। इक्ष्वाकुवंशी चारों राजकुमारों ने अपने-अपने स्तर पर त्याग और उच्च आदर्श के प्रतिमान स्थापित किए। उन्होंने स्वयं के हित का चिंतन नहीं करके समाज के समक्ष राजाओं एवं राजकुमारों द्वारा किए जाने वाले आचरण को व्याख्यायित किया।

श्रीराम ने पिता दशरथ द्वारा श्रीराम की विमाता कैकेई को दिए गए वचनों का सम्मान करते हुए न केवल राज्य ही छोड़ा अपितु चौदह वर्ष तक वनवास में रहना उचित समझा। दूसरे पुत्र भरत ने राज्य पर ज्येष्ठ पुत्र के अधिकार को नैसर्गिक मानते हुए स्वयं राजा बनना स्वीकार नहीं किया तथा चौदह वर्ष तक अयोध्या के बाहर नंदीग्राम में रहना और वहीं से राज्यकार्य करना उचित समझा।

दशरथ के तीसरे पुत्र लक्ष्मण ने अपनी विमाता कौसल्या के पुत्र को अपना स्वामी मानकर उनके साथ वन में जाना स्वीकार किया। यहाँ तक कि अपनी पत्नी को भी अपने साथ नहीं लिया। राजा दशरथ के चौथे पुत्र शत्रुघ्नजी ने अपने तीनों भाइयों को चौदह साल तक अयोध्या से अनुपस्थित जानकर अयोध्यावासियों का रक्षण एवं पोषण किया।

उन्होंने राज्य की तरफ आंख उठाकर भी नहीं देखा। इक्ष्वाकु राजाओं एवं राजकुमारों की इस उच्च परम्परा में अयोध्या के राजमहल की रानियों ने भी एक से बढ़कर एक उच्च आदर्श प्रस्तुत किए। रानी सीता महलों का सुख छोड़कर पति के साथ वनों में भटकती फिरीं किंतु उनके लिए यह कोई त्याग नहीं था, पति के साथ रहने का सुख था। गोस्वामी तुलसीदासजी ने भगवान श्रीराम के वनवास की स्थिति को स्पष्ट करते हुए लिखा है- ‘रामु लखन सीता सहित सोहत परन निकेत। जिमि बासव बस अमरपुर सची जयंत समेत।’

अर्थात्- लक्ष्मणजी और सीताजी सहित श्री रामचन्द्र, पर्णकुटी में ऐसे सुशोभित हैं, जैसे अमरावती में इन्द्र अपनी पत्नी शची और पुत्र जयंत सहित बसता है। अर्थात् उनके लिए वन में निवास करना किसी महासुख से कम नहीं है। लक्ष्मणजी की रानी उर्मिला ने 14 साल की दीर्घ अवधि का पति वियोग सहना स्वीकार किया तथा अपनी तीनों विधवा सासों की सेवा-सुश्रुषा की। भरतजी 14 साल तक नंदीग्राम में रहते रहे किंतु रानी माण्डवी अयोध्या में अपनी सासों की सेवा करती रही।

श्रुतकीर्ति ने भी परिवार की मर्यादा और शील का अनुकरण किया। जब तक राम लौटकर नहीं आए, किसी भी भाई ने दाम्पत्य सुख नहीं भोगा। चौदह साल बाद जब राम-लक्ष्मण एवं सीता अयोध्या लौट आए तथा श्रीराम का राज्यतिलक हुआ, उसके बाद ही चारों भाईयों की रानियों ने दो-दो पुत्रों को जन्म दिया।                                  

महर्षि जाबालि को कड़ी फटकार लगाई वनवासी राम ने (27)

0
महर्षि जाबालि - bharatkaitihas.com
महर्षि जाबालि को कड़ी फटकार लगाई वनवासी राम ने

हमने पिछली कड़ी में उल्लेख किया था कि दशरथ नंदन श्रीराम ने चित्रकूट में अपने अनुज भरत को यह समझाने का प्रयास किया कि पुत्रों को अपने मृत पिता के वचनों का पालन करके उसे ऋण से मुक्त करवाने का प्रयास करना चाहिए एवं अपने समस्त पितरों की रक्षा एवं मुक्ति का प्रयास करना चाहिए। इसलिए तुम्हें अयोध्या लौट जाना चाहिए और मुझे वन में जाना चाहिए। वाल्मीकि रामायण में लिखा है कि वहाँ महर्षि जाबालि बैठे हुए समस्त वार्तालाप सुन रहे थे।

महर्षि जाबालि ने श्रीराम से कहा कि आप श्रेष्ठ बुद्धि वाले एवं तपस्वी हैं किंतु आपको गंवार मनुष्य की तरह ऐसा निरर्थक विचार मन में नहीं लाना चाहिए। इस संसार में कौन पुरुष किसका बंधु है, और किससे किसको क्या पाना है! जीव अकेला ही जन्म लेता है और अकेला ही नष्ट हो जाता है। अतः श्रीराम! जो मनुष्य किसी को अपना माता या पिता समझकर उसके प्रति आसक्त होता है उसे पागल के समान समझना चाहिए! क्योंकि कोई किसी का कुछ भी नहीं है।

जैसे कोई मनुष्य दूसरे गांव को जाते समय बाहर धर्मशाला में एक रात के लिए ठहर जाता है और दूसरे दिन उस स्थान को छोड़कर आगे के लिए प्रस्थान कर जाता है, इसी प्रकार माता, पिता, भाई, घर और धन ये मनुष्यों के आवास मात्र हैं! हे रघुवंश कुलभूषण! इनमें सज्जन पुरुष आसक्त नहीं होते हैं।

अतः नरश्रेष्ठ आपको पिता का राज्य छोड़कर इस दुःखमय, नीचे-ऊंचे, तथा बहुकण्टकीर्ण वन के कुत्सित मार्ग पर नहीं चलना चाहिए। आप समृद्धिशालिनी अयोध्या में राजा के पद पर अपना अभिषेक करवाइए। वह नगरी प्रोषितभर्तृका नारी की भांति एक वेणी धारण करके आपकी प्रतीक्षा कर रही है।

जैसे देवराज इन्द्र स्वर्ग में विहार करते हैं, उसी प्रकार आप बहुमूल्य राजभोगों का उपभोग करते हुए अयोध्या में विहार कीजिए। राजा दशरथ आपके कोई नहीं थे और आप भी उनके कोई नहीं हैं। राजा पराए थे और आप भी पराए हैं। इसलिए मैं जो कहता हूँ, आप वही कीजिए।

पिता जीव के जन्म में निमित्तकारण मात्र होता है। वास्तव में ऋतुमती माता के द्वारा गर्भ में धारण किए हुए वीर्य और रज का परस्पर संयोग होने पर ही मनुष्य का जन्म होता है।  राजा को जहाँ जाना था, वहाँ चले गए। यह प्राणियों की स्वाभाविक स्थिति है। आप तो व्यर्थ में कष्ट उठा रहे हैं।

पूरे आलेख के लिए देखिए यह वी-ब्लॉग-

जो जो मनुष्य प्राप्त हुए अर्थ का परित्याग करके धर्म परायण हुए हैं, उन-उन लोगों के लिए मैं शोक करता हूँ, दूसरों के लिए नहीं। वे इस जगत् में धर्म के नाम पर केवल दुःख भोगकर मृत्यु को प्राप्त हो गए हैं। अष्टका आदि जितने श्राद्ध हैं, उनके देवता पितर हैं। श्राद्ध का दान पितरों को मिलता है, यही सोचकर लोग श्राद्ध में प्रवृत्त होते हैं किंतु विचार करके देखिए तो इसमें अन्न का नाश ही होता है। भला, मरा हुआ मनुष्य क्या खाएगा!

यदि यहाँ किसी मनुष्य द्वारा खाया हुआ अन्न मृत व्यक्ति के शरीर में चला जाता है तो परदेश में जाने वाले व्यक्ति के लिए श्राद्ध ही कर देना चाहिए। उसको रास्ते के लिए भोजन देना उचित नहीं है। देवताओं के लिए यज्ञ और पूजन करो, दान दो, यज्ञ की दीक्षा ग्रहण करो, तपस्या करो और घर-द्वार छोड़कर संन्यासी बन जाओ इत्यादि बातें बताने वाले ग्रंथ चालाक मनुष्यों ने दान की ओर लोगों की प्रवृत्ति कराने के लिए ही बनाए हैं।

अतः महामते! आप अपने मन में यह निश्चय कीजिए कि इस लोक के सिवा कोई दूसरा लोक नहीं है। जो प्रत्यक्ष राज्यलाभ है, उसका आश्रय लीजिए, परोक्ष पारलौकिक लाभ को पीछे धकेल दीजिए। सत्पुरुषों की बुद्धि जो सब लोगों के लिए राह दिखाने वाली होने के कारण प्रमाणभूत है, उसे आगे करके, भरत के अनुरोध से आप अयोध्या का राज्य ग्रहण कीजिए।’

TO PURCHASE THIS BOOK, PLEASE CLICK THIS PHOTO

महर्षि जाबालि का यह वचन सुनकर सत्यपराक्रमी श्रीरामचंद्र ने अपनी संशयरहित बुद्धि के द्वारा श्रुतिसम्मत सद्युक्ति का आश्रय लेकर कहा- ‘हे विप्रवर! आपने मेरा प्रिय करने की इच्छा से जो बात कही है, वह कर्त्तव्य जैसी दिखाई देती है किंतु वह करने योग्य नहीं है। वह पथ्य के समान दिखाई देती हुई भी पथ्य नहीं है। जो पुरुष धर्म अथवा वेद की मर्यादा को त्याग देता है, वह पाप कर्म में प्रवृत्त हो जाता है। उसके आचार और विचार दोनों ही भ्रष्ट हो जाते हैं। इसलिए वह कभी भी सत्पुरुषों में सम्मान नहीं पाता है। मनुष्य का आचार ही यह बताता है कि कौन पुरुष उत्तम कुल में उत्पन्न हुआ है और कौन अधम कुल में, कौन वीर है और कौन व्यर्थ ही स्वयं को वीर पुरुष मानता है, कौन पवित्र है और कौन अपवित्र। आपने जो आचार बताया है उसे अपनाने वाला पुरुष वास्तव में अनार्य होगा। वह बाहर से पवित्र दिखने पर भी भीतर से अपवित्र होगा! आपका उपदेश चोला तो धर्म का पहने हुए है किंतु वास्तव में अधर्म है। यदि मैं इसे स्वीकार करके वेदोक्त शुभकर्म छोड़ दूं और धर्मविहीन कर्म में लग जाऊं तो कर्तव्य-अकर्तव्य का ज्ञान रखने वाला कौन समझदार मनुष्य मुझे श्रेष्ठ समझकर आदर देगा? यदि मैं अपनी की हुई प्रतिज्ञा तोड़ दूँ तो फिर मुझे किस साधन से स्वर्ग की प्रािप्ति होगी?

आपके बताए हुए मार्ग पर चलकर यह सम्पूर्ण जगत् स्वेच्छाचारी हो जाएगा और अनाचरण करने लगेगा। सत्य का पालन ही राजाओं का दयाप्रधान धर्म है। सनातन आचार है। सत्य में ही सम्पूर्ण लोक प्रतिष्ठित है। संसार में सत्य ही धर्म की पराकाष्ठा है और वही सबका मूल कहा जाता है। झूठ बोलने वाले से सब लोग वैसे ही डरते हैं जैसे सांप से।

सत्यमेवेश्वरो लोके सत्ये धर्म सदाश्रितः। सत्यमूलानि सर्वाणि सत्यान्नास्ति परं पदं।। अर्थात्- जगत् में सत्य ही ईश्वर है। धर्म सदैव सत्य का आधार लेकर खड़ा रहता है। सत्य ही सबकी जड़ है। सत्य से बढ़कर दूसरा कोई परम पद नहीं है। दान, यज्ञ, होम, तपस्या ओर वेद, इन सबका आधार सत्य ही है। इसलिए सबसको सत्य-परायण होना चाहिए। संसार में अलग-अलग तरह के मनुष्य होते हैं।

एक मनुष्य समस्त लोक का पालन करता है, एक मनुष्य सम्पूर्ण कुल का पालन करता है, एक मनुष्य नर्क में डूबता है और एक स्वर्ग में प्रतिष्ठित होता है। मैं सत्यप्रतिज्ञ हूँ और सत्य की शपथ खाकर पिता के सत्य का पालन स्वीकार कर चुका हूँ। मैं पिता के आदेश का किसलिए पालन नहीं करूं? मैं इस सत्य रूपी धर्म को समस्त प्राणियों के लिए हितकर और सब धर्मों में श्रेष्ठ समझता हूँ।

मनुष्य अपने शरीर से जो पाप करता है, पहले मन के द्वारा कर्तव्य रूप से निश्चित करता है। फिर जिह्वा की सहायता से उस पाप को वाणी द्वारा दूसरों से कहता है। तत्पश्चात् दूसरों के सहयोग से उसे शरीर द्वारा सम्पन्न करता है। इस तरह एक ही पाप कायिक, वाचिक और मानसिक भेद से तीन प्रकार का होता है।

पृथ्वी, कीर्ति, यश और लक्ष्मी ये सब सत्यवादी पुरुष को पाने की इच्छा रखती हैं और शिष्ट पुरुष सत्य का ही अनुसरण करते हैं। अतः मनुष्य को सदा सत्य का ही सेवन करना चाहिए। मैंने पिताजी के सामने वन में रहने की प्रतिज्ञा की है। अब उनकी आज्ञा का उल्लंघन करने के लिए मैं भरत की बात कैसे मान लूं? गुरु के समक्ष की गई वह प्रतिज्ञा अटल है। किसी तरह तोड़ी नहीं जा सकती। मैं वन में ही रहकर बाहर-भीतर से पवित्र होकर नियमित भोजन करूंगा और पवित्र फल, मूल एवं पुष्पों द्वारा देवताओं और पितरों को तृप्त करता हुआ प्रतिज्ञा का पालन करूंगा।

इस कर्मभूमि को पाकर जो शुभ कर्म हो, उसका अनुष्ठान करना चाहिए। क्योंकि अग्नि, वायु तथा सोम भी कर्मों के ही फल से अपने पदों के भागी हुए हैं। जैसे चोर दण्डनीय होता है, उसी प्रकार वेदविरोधी बुद्ध भी दण्डनीय है।  नास्तिक तथागत एवं नास्तिक चार्वाक को भी इसी कोटि में समझना चाहिए।

जिस प्रकार चोर को राजा से दण्ड दिलवाया जाता है, उसी प्रकार नास्तिक को राजा से दण्ड दिलवाना चाहिए, किसी भी विद्वान ब्राह्मण को कभी भी किसी नास्तिक से बात तक नहीं करनी चाहिए। जो धर्म में तत्पर रहते हैं, सत्पुरुषों का साथ करते हैं, तेज से सम्पन्न हैं, जिनमें दान रूपी गुण की प्रधानता है, जो कभी किसी प्राणी की हिंसा नहीं करते हैं तथा मल-संसर्ग से रहित हैं, ऐसे श्रेष्ठ मुनि ही संसार में पूजनीय होते हैं।’

जब श्रीराम ने रोषपूर्वक ये बातें कहीं तो महर्षि जाबालि ने हाथ जोड़कर कहा- ‘रघुनंदन न तो मैं नास्तिक हूँ और न नास्तिकों की बात ही कहता हूँ। परलोक आदि कुछ भी नहीं है, ऐसा मेरा मत नहीं है। मैं अवसर देखकर आस्तिक और नास्तिक हो जाता हूँ। इसलिए मैंने नास्तिकों जैसी बातें कहीं ताकि आप अयोध्या का राज्य स्वीकार कर लें। मेरा मंतव्य केवल आपको अयोध्या लौट जाने के लिए सहमत करना है। मैं इसी को सबसे बड़ा धर्म समझता हूँ।’

महर्षि वाल्मीकि ने श्रीराम को ईक्ष्वाकुओं की परम्परा बताई (28)

0
महर्षि वाल्मीकि - bharatkaitihas.com
महर्षि वाल्मीकि ने श्रीराम को ईक्ष्वाकुओं की परम्परा बताई

आज हमें रामकथा का प्राचीनतम स्वरूप महर्षि वाल्मीकि द्वारा लिखित रामायण में मिलता है। इस ग्रंथ में श्रीराम का चित्रण मर्यादा पुरुषोत्तम के रूप में किया गया है।

जब भगवान श्रीराम ने जाबालि ऋषि से रोषपूर्ण बातें कहीं तो गुरु वसिष्ठ ने श्रीराम को बताया कि जाबालि ऋषि नास्तक नहीं हैं। वे तो आपसे केवल इतना चाहते हैं कि आप जंगलों के दुख भोगने की बजाय अध्योध्या को लौट जाएं। आपका अयोध्या लौट जाना उचित है क्योंकि ईक्ष्वाकुओं की यह परम्परा रही है कि राजा का ज्येष्ठ पुत्र ही अगला राजा होता है। मैं आपको ईक्ष्वाकुओं की उज्जवल परम्परा के बारे में बताता हूँ।

महर्षि वाल्मीकि ने श्रीराम को स्वयंभू ब्रह्मा के प्रकट होने से लेकर उनके द्वारा वाराह रूप धारण करके धरती को समुद्र से बाहर निकालने, ब्रह्मा से मरीचि नामक ऋषि के उत्पन्न होने और मरीचि से कश्यप, कश्यप से मनु एवं मनु से ईक्ष्वाकु के उत्पन्न होने की जानकारी दी।

महर्षि वसिष्ठ ने कहा कि राजा ईक्ष्वाकु द्वारा अयोध्या की स्थापना की गई। तब से लेकर राजा दशरथ तक जितने भी राजा हुए हैं, वे सब अपने पिता के ज्येष्ठ पुत्र थे। आप भी राजा दशरथ के ज्येष्ठ पुत्र हैं, इसलिए आपको चाहिए कि आप अपने कुलगुरु का अर्थात् मेरा आदेश मानकर अयोध्या लौट चलें और अयोध्या का राज्य संभालें। चूंकि आपकी माताएं, समस्त ऋषिगण, ब्राह्मण एवं पुरजन भी यही चाहते हैं इसलिए आपको सत्पुरुष के पथ का त्याग करने वाला नहीं समझा जाएगा।

गुरु के आग्रह पर भी श्रीराम ने अपने निश्चय का त्याग नहीं किया तथा अपने स्वर्गीय पिता दशथ के वचनों का मान रखने के लिए वन में प्रवास करने का निर्णय अपरिवर्तित रखा।

ईक्ष्वाकु वंशी राजकुमार श्रीराम के इस एक निर्णय ने उनके सम्पूर्ण व्यक्त्तिव को अलौकिक बना दिया। महर्षि विश्वामित्र श्रीराम को उनके बाल्यकाल में ही अरण्यवासी ऋषियों की समस्याओं से परिचित करवा चुके थे। अतः निश्चय पूर्वक कहा जा सकता है कि श्रीराम ने अपने दीर्घकालीन अरण्य-प्रवास के दौरान वनवासी ऋषियों के सान्निध्य के प्रभाव से कुछ नए संकल्प लिए होंगे तथा आर्य संस्कृति को नष्ट करने वाली आसुरि शक्तियों के संहार का बीड़ा उठाया होगा।

पूरे आलेख के लिए देखिए यह वी-ब्लॉग-

अपने वन-प्रवास की अवधि में श्रीराम ने अनेक राक्षसों को मारा जो ऋषियों को यज्ञ हवन करने, आर्य जीवन शैली का विकास करने एवं अरण्यों में एकांतवास करने में विघ्न उत्पन्न करते थे। इनमें से कुछ घटनाओं की चर्चा हम आगामी कथाओं में करेंगे।

आज हमें रामकथा का प्राचीनतम स्वरूप महर्षि वाल्मीकि द्वारा लिखित रामायण में मिलता है। इस ग्रंथ में श्रीराम का चित्रण मर्यादा पुरुषोत्तम के रूप में किया गया है। यही कारण है कि जब महर्षि वाल्मिीकि श्रीराम को इक्ष्वाकुवंशी राजाओं का परिचय देते हैं तो इस वंश की उत्पत्ति का उल्लेख प्रजापति ब्रह्मा से आरम्भ करते हुए भी वे इक्ष्वाकुवंशी राजाओं के साथ उन चमत्कारी विवरणों का उल्लेख नहीं करते हैं, जिनका उल्लेख रामायण के बाद लिखे गए पुराणों में किया गया है।

महर्षि वाल्मीकि राजा सगर द्वारा सगर-पुत्रों से समुद्र खुदवाने का उल्लेख तो करते हैं किंतु पुत्रों की संख्या साठ हजार नहीं बताते। फिर भी वाल्मीकि रामायण में बहुत सी ऐसी बातें हैं जो दिव्य, अतीन्द्रिय एवं अलौकिक जान पड़ती हैं। इसका कारण यह है कि वाल्मीकि रामायण का स्वरूप भी विगत तीन हजार सालों में पूरी तरह बदल चुका है।

TO PURCHASE THIS BOOK, PLEASE CLICK THIS PHOTO

आज जो महर्षि वाल्मीकि द्वारा लिखित रामायण हमारे सामने है, उस पर पुराणों का व्यापक प्रभाव दिखाई देता है। यहाँ तक कि वाल्मीकि रामायण के अयोध्या काण्ड के 109वें अध्याय में तथागत बुद्ध को चार्वाकों के समान ही दण्डनीय चोर कहा गया है। जबकि महर्षि वाल्मीकि की रामायण की रचना तो महात्मा बुद्ध से सैंकड़ों साल पहले की है। ऐसी स्थिति में तथागत बुद्ध का उल्लेख वालमीकि कृत रामायण में होना ही नहीं चाहिए था किंतु जैसा कि हमने पहले कहा, वाल्मीकि रामायण का जो वर्तमान स्वरूप हमारे सामने हैं, उसमें बहुत सी बातें पौराणिक काल में जोड़ी गई हैं। मूल वाल्मीकि रामायण में निश्चित रूप से श्रीराम के चरित्र में शील, सौंदर्य एवं शौर्य का अप्रतिम समन्वयन किया गया होगा किंतु श्रीराम में अतीन्द्रिय अथवा अलौकिक शक्तियों का आरोपण नहीं किया गया होगा। ऐसा निश्चय ही रामायण की मूल रचना के बहुत बाद में किया गया होगा। रामायण के बाद महर्षि वेदव्यास कृत महाभारत ही ऐसा ग्रंथ है जिसमें रामकथा का विस्तार से वर्णन मिलता है। इस रामकथा को अलग ग्रंथ के रूप में भी देखा जाता है तथा अध्यात्म रामायण कहा जाता है। चूंकि महाभारत का काल आते-आते श्री हरि विष्णु के अवतारों की अवधारणा पुष्ट हो चुकी थी इसलिए अध्यात्म रामायण में श्रीराम को विष्णु अवतार के रूप में चित्रित किया गया है।

वेदव्यास कृत अध्यात्म रामायण के अध्ययन से स्पष्ट होता है कि इस ग्रंथ पर वाल्मीकि रामायण का प्रभाव है किंतु उस पर उन पुराणों का भी प्रभाव है जिन्होंने राम को अवतारी पुरुष घोषित करने का साहस दिखाया था।

ऐसा अनुमान किया जाता है कि प्राचीनतम पुराणों की रचना वाल्मीकि रामायण के लगभग पांच सौ साल बाद हुई। ब्रह्माण्ड पुराण तथा मत्स्य पुराण सबसे पुराने हैं। इनमें भी श्रीराम का उल्लेख है। हरिवंश पुराण में रामकथा संक्षेप में लिखी गई है।

आज से लगभग डेढ़ हजार साल पहले लिखे गए विष्णु पुराण में भी रामकथा का उल्लेख हुआ है। आज से लगभग सात सौ साल पहले लिखे गए भागवत पुराण में सीता को लक्ष्मीजी का अवतार बताया गया है। गरुड़ पुराण एवं स्कंद पुराण में श्रीराम का अवतारी स्वरूप और अधिक स्पष्ट हुआ।

इस प्रकार लगभग एक हजार वर्षों की दीर्घ अवधि में रचित विविध पुराणों में श्रीराम का अवतारी स्वरूप पुष्ट होता चला गया। इन ग्रंथों में भगवान के अवतारी स्वरूप को पुष्ट करने वाली अनेक नवीन कथाएं जोड़ दी गईं जिनसे भगवान के दुष्ट-हंता स्वरूप के साथ-साथ क्षमा एवं दया के सागर तथा भक्त-वत्सल स्वरूप का भी दर्शन होता है।

पुराणों के रचना काल में भगवान श्री हरि विष्णु के विविध स्वरूपों की पूजा प्रचलित हुई जिनमें नृसिंह एवं वाराह पूजा अधिक लोकप्रिय थीं। आज से लगभग डेढ़ हजार साल पहले मगध के गुप्त सम्राटों के काल में उत्तर भारत में वाराह पूजा एवं दक्षिण भारत में नृसिंह पूजा सर्वाधिक प्रचलित थी। गुप्त सम्राटों के बाद के कालों में श्री हरि विष्णु के श्रीराम एवं श्रीकृष्ण स्वरूपों की भक्ति एवं पूजा की लोकप्रियता बढ़ने लगी।

पुराणों के रचना काल में वामन भगवान एवं श्री परशुराम को भी निष्ठापूर्वक श्री हरि विष्णु के अवतार के रूप में प्रतिष्ठा दी जाती रही किंतु उनके अलग से मंदिर बहुत कम बने। उन्हें  प्रायः श्री हरि विष्णु के विविध अवतारों के मंदिरों में दशावतारों के रूप में ही प्रतिष्ठित किया जाता रहा।

गोस्वामी तुलसीदासजी ने आज से लगभग साढ़े चार सौ वर्ष पहले रामचरित मानस की रचना की। इस ग्रंथ में श्रीराम को भगवान श्रीहरि विष्णु के लौकिक अवतार के रूप में चित्रित किया गया एवं उनके शत्रुनाशक एवं भक्त-वत्सल स्वरूप का इतना मनोहारी चित्र प्रस्तुत किया गया कि ‘श्रीराम-भक्ति’ ने ‘विष्णु-भक्ति’ के समस्त स्वरूपों को बहुत पीछे छोड़ दिया। केवल ‘कृष्ण-भक्ति’ ही श्रीराम-भक्ति के बराबर खड़ी रह सकी। भगवान के अन्य अवतारों एवं स्वरूपों की पूजा का प्रचलन बहुत कम हो गया।

गोस्वामी तुलसीदासजी द्वारा रचित रामचरित मानस की ख्याति के पश्चात् श्रीराम के अवतारी पुरुष होने का विश्वास इतना पुष्ट हो गया कि उस काल में कदाचित् ही ऐसा कोई हिन्दू बचा था जो श्रीराम को लौकिक पुरुष मानता हो या जिसे श्रीराम के विष्णु का अवतार होने पर संदेह हो! इक्ष्वाकुवंशी राजकुमार श्रीराम के अवतारी पुरुष बनने की प्रक्रिया को समझने के लिए हमें विभिन्न पुराणों के साथ-साथ दक्षिण भारत की विभिन्न भाषाओं में रचित रामकथाओं एवं अलावार संतों द्वारा रचि साहित्य का अध्ययन करना होता है।

जयंत की आंख फोड़कर उसे जीवित छोड़ दिया श्रीराम ने (29)

0
जयंत - bharatkaitihas.com
जयंत की आंख फोड़कर उसे जीवित छोड़ दिया श्रीराम ने

राजकुमार भरत द्वारा अयोध्यावासियों को अपने साथ लेकर अयोध्या लौट जाने के बाद भी राम, लक्ष्मण एवं सीता कुछ दिनों तक चित्रकूट में निवास करते रहे। वाल्मीकि रामायण, अध्यात्म रामायण, नरसिंह पुराण, पद्म पुराण तथा गोस्वामी तुलसीदास कृत रामचरित मानस में श्रीराम के चित्रकूट प्रवास के दौरान घटित इंद्र के पुत्र जयंत की कथा का उल्लेख किया गया है।

इस कथा के अनुसार एक दिन इन्द्र का पुत्र जयंत चित्रकूट आया। उसने सुना था कि राम कोई साधारण पुरुष नहीं हैं, वे तीनों लोकों के स्वामी स्वयं श्री हरि भगवान विष्णु हैं और वे राक्षसों का संहार करने के लिए अरण्य वन में प्रवेश करने वाले हैं। इसलिए जयंत ने श्रीराम के बल को देखने का निश्चय किया।

गोस्वामी तुलसीदासजी ने लिखा है कि इन्द्रपुत्र जयंत ने अपने अहंकार के कारण ऐसा प्रयास किया मानो कोई मंदबुद्धि चींटी समुद्र की थाह पाना चाहती हो। जयंत ने कौए का रूप धरकर माता सीता के चरण पर चौंच मारकर उन्हें घायल कर दिया।

जब सीताजी के चरण से रक्त बहने लगा तो श्रीराम ने एक सरकण्डा उठकार अपने धनुष पर तीर की भांति चढ़ाया और उसे जयंत पर छोड़ दिया। मंत्र से प्रेरित वह ब्रह्मबाण जयंत की ओर दौड़ा। जयन्त ने जब भगवान के तीर को अपनी ओर आते हुए देखा तो जयंत अपने प्राण बचाने के लिए भागने लगा।

जयंत अपना वास्तविक रूप धरकर अपने पिता इन्द्र के पास गया। इन्द्र ने उसे श्रीराम का विरोधी जानकर उसे अपने पास नहीं रखा। इससे जयंत के हृदय में अत्यधिक भय उत्पन्न हो गया। वह ब्रह्मलोक एवं शिवलोक में भी गया किंतु वहां भी उसे अभय नहीं मिला। श्रीराम विमुख होने के कारण समस्त देव उसके विरुद्ध हो गए।

जयंत शोक से व्याकुल होकर ब्रह्माण्ड भर में भागता फिरा किंतु कहीं से अभयदान नहीं मिला। जब देवर्षि नारद ने जयन्त को व्याकुल देखा तो उन्हें दया आई। उन्होंने जयंत को समझाया कि तू श्रीराम की शरण में जा, वही तुझे इस कष्ट से उबार सकते हैं।

पूरे आलेख के लिए देखिए यह वी-ब्लॉग-

इस पर जयंत पुनः चित्रकूट पहुंचा और श्रीराम के चरण पकड़कर अत्यंत आर्त स्वर में कहने लगा- ‘हे शरणागत हितकारी, मेरी रक्षा कीजिए। आपके अतुलित बल और आपकी अतुलित प्रभुता को मैं मन्दबुद्धि जान नहीं पाया था। अपने कर्म से उत्पन्न हुआ फल मैंने पा लिया। हे प्रभु! मेरी रक्षा कीजिए। मैं आपकी शरण में आया हूँ।’

जयंत की आर्तपुकार सुनकर श्रीराम ने जयंत को एक आंख से काना करके छोड़ दिया। हमने यह कथा रामचरित मानस में आए वर्णन के अनुसार दी है। रामचरित मानस में यह प्रसंग अरण्यकांड में लिखा गया है जबकि वाल्मीकि रामायण एवं अध्यात्म रामायण में जयंत का प्रसंग सुन्दरकांड में वर्णित है।

TO PURCHASE THIS BOOK, PLEASE CLICK THIS PHOTO

वाल्मीकि रामायण में जयंत रूपी कौआ सीता माता के शरीर के उपरी भाग में अर्थात् छाती में चोंच मारता है जबकि वेदव्यासजी रचित अध्यात्म रामायण, तुलसीदासजी द्वारा रचित रामचरित मानस एवं अज्ञात लेखक द्वारा लिखित आनंद रामायण में कौआ सीता माता के पैर के अंगूठे में चौंच मारता है। इन चारों ही ग्रंथों में यह घटना चित्रकूट में ही दर्शाई गई है। आनन्द रामायण में भी यह प्रसंग दिया गया है और यह रामचरित मानस से मेल खाते हुए भी थोड़ी सी भिन्नता लिए हुए है। रामचति मानस में कौआ सीता माता के चरण पर एक बार प्रहार करता है किंतु आनंद रामायण में कौआ कई बार चोंच मारता है। वाल्मीकि रामायण में यह कथा थोड़े अंतर के साथ मिलती है। वाल्मीकि रामायण में वर्णित जयंत कथा को पढ़ने से लगता है कि यह एक भक्त ने नहीं लिखी है, अपितु किसी सामान्य साहित्यकार ने लिखी है जो कथा में रोमांच पैदा करने के लिए उसे अनावश्यक रूप से कामुक एवं शृंगारिक बनाता है। वाल्मीकि रामायण में आई जयंत की कथा में सीता माता के कपड़ों को अत्यंत अस्त-व्यस्त दिखाया गया है एवं उनके भय का वर्णन भी एक साधारण नारी के भय के समान किया गया है। वाल्मीकि का कौआ सीता माता की छाती में चोंच से प्रहार करके उन्हें बुरी तरह घायल कर देता है।

कुछ ग्रंथों ने इस कथा को और भी चमत्कारिक बनाने का प्रयास किया है तथा इस कथा को श्रीराम की बाल-लीला से आरम्भ किया है जिसके अनुसार एक दिन श्रीराम बाल लीला करते हुए लक्ष्मणजी एवं हनुमानजी के साथ पतंग उड़ा रहे थे। जब यह पतंग उड़ते-उड़ते इंद्रलोक में पहुची तो इंद्र-पुत्र जयंत की पत्नी ने वह अद्भुत पतंग पकड़ ली।

श्रीराम ने हनुमानजी से कहा- ‘देखो पतंग किसने पकड़ी?’

पतंग को ढूंढते हुए हनुमानजी इंद्रलोक पहुंच गए। उन्होंने जयंत की पत्नी से कहा- ‘पतंग छोड़ दीजिए।’

जयंत की पत्नी बोली- ‘मैं उस बालक के दर्शन करूंगी जिसकी पतंग इतनी सुन्दर है। तभी पतंग छोड़ूंगी।’

हनुमानजी ने यह बात धरती पर लौटकर श्रीराम को बताई। श्रीराम ने हनुमानजी से कहा- ‘आप जयंत की पत्नी से जाकर कहें कि उसे मेरे दर्शन चित्रकूट में होंगे।’

हनुमानजी ने जयंत की पत्नी से यह बात कही तो उसने पतंग छोड़ दी। जब श्रीराम वनवास की अवधि में चित्रकूट में निवास कर रहे थे तब उन्होंने एक बार पूर्णिमा की रात में एक स्फटिक शिला पर बैठकर सीता माता का शृंगार किया। उसी समय जयंत की पत्नी अपनी सखियों के साथ रघुनाथजी के दर्शन करने आई। वह श्रीराम का रूप देखकर प्रसन्न हुई। उसने श्रीराम की स्तुति की और इच्छित वर मांगकर देवलोक को चली गई।

जब इंद्र के पुत्र जयंत को इस घटना की जानकारी मिली तो उसने प्रतिज्ञा की कि मैं इस श्रीराम से बदला लूंगा क्योंकि उसने मेरी पत्नी को मोहित किया है। इस प्रतिज्ञा की पूर्ति लिए ही जयंत ने कौआ बनकर सीता माता के चरणों पर चोंच से प्रहार किया था।

इन कथाओं के अनुसार श्रीराम ने इन्द्र के पुत्र जयंत की एक आंख इसलिए फोड़ दी थी क्योंकि उसने सीता माता को बुरे भाव से देखा थाा। इन कथाओं में यह मान्यता भी प्रतिपादित की जाती है कि तभी से कौए की एक ही आंख होती है।

अनसूया हजारों साल बूढ़ी थी

0
अनसूया - bharatkaitihas.com
अनसूया हजारों साल बूढ़ी थी

ऋषि भरद्वाज ने श्रीराम एवं सीता से हजारों साल बूढ़ी अनसूया का परिचय करवाया!

जब दशरथ नंदन भरत अयोध्यावासियों को चित्रकूट से अयोध्या ले गए तो राजकुमार रामचंद्र ने लक्ष्मण एवं सीताजी को अपने साथ लेकर चित्रकूट छोड़ दिया और गहन दण्डकारण्य में प्रवेश किया। उन्होंने अरण्य में रहकर तपस्या करने वाले ऋषियों के आश्रमों में जाकर उनका सानिध्य प्राप्त करने लगे। उनका उद्देश्य वन में रहने वाले ऋषियों एवं मुनियों को अभय प्रदान करना एवं मनुष्यभक्षी राक्षसों का संहार करना था।

वाल्मीकि रामायण के अनुसार राम, लक्ष्मण तथा सीता चित्रकूट से चलकर अत्रि ऋषि के आश्रम पहुंचे। महर्षि अत्रि वैदिक ऋषि थे जिनका उल्लेख सप्तऋषि के रूप में होता है। ऋग्वेद में इनका उल्लेख बार-बार होता है। वेदों के बहुत से मंत्र अत्रि ऋषि द्वारा लिखे गए थे। अतः श्रीरामचंद्र के काल में अत्रि ऋषि की आयु हजारों वर्ष की रही होगी।

वाल्मीकि रामायण एवं गोस्वामी तुलसीदासजी कृत रामचरित मानस में ऋषि अत्रि की पत्नी अनसूया का उल्लेख अत्यंत श्रद्धा के साथ किया गया है। अनसूया को पौराणिक काल की सोलह सतियों मे से एक माना जाता है। वे मुनि कर्दम की पुत्री थीं जिन्हें प्रजापति कर्दम भी कहा जाता है।

अनसूया की माता का नाम देवहूति था। प्रजापति कर्दम एवं देवहूति की 9 कन्याएं हुईं जिनमें से एक अनसूया थीं। अनसूया की पति-भक्ति अर्थात सतीत्व का तेज इतना अधिक था कि जब देवगण आकाश में विचरण करते थे तो उन्हें अनसूया का तेज अनुभव होता था।

जिस समय श्री राम अत्रि ऋषि के आश्रम में पहुंचे, उस समय सती अनसूया अत्यंत वृद्ध होने के कारण शिथिल हो चुकी थीं। उनके शरीर में झुर्रियां पड़ गई थीं तथा सिर के बाल सफेद हो गए थे। अधिक हवा चलने पर हिलते हुए कदली वृक्ष के समान उनके सारे अंग निरंतर कांप रहे थे।

पूरे आलेख के लिए देखिए यह वी-ब्लॉग-

अत्रि ऋषि ने रामचंद्र से अपनी अत्यंत वृद्ध हो चुकी पत्नी अनसूया का परिचय करवाया। ऋषि ने कहा- ‘हे राम! ये मेरी पत्नी अनुसूया हैं। एक बार दस वर्षों तक वृष्टि नहीं हुई तथा सारा संसार गर्मी से जलने लगा तब अनसूया ने अपने तप के प्रभाव से यहाँ कंद-मूल उत्पन्न किए तथ मंदाकिनी की पवित्र धारा बहाई।

इसके बाद इन्होंने दस हजार वर्षों तक तपस्या करके अपने उत्तम व्रतों के प्रभाव से ऋषियों के समस्त विघ्नों का निवारण किया था। हे राम! मेरी पत्नी अनुसूया ने देवताओं के कार्य के लिए एक बार अत्यंत उतावली होकर दस रात के बराबर एक ही रात बनाई थी। ये अनसूया देवी तुम्हारे लिए माता की भांति पूजनीया हैं। ये सम्पूर्ण प्राणियों के लिए वंदनीया तपस्विनी हैं क्रोध तो इन्हें कभी छू भी नहीं सका। राजकुमारी सीता को देवी अनसूया का आश्रय ग्रहण करना चाहिए।’

ऋषि के आदेश पर जब सीता ने अनसूया के निकट जाकर अपना परिचय दिया तो अनसूया बहुत प्रसन्न हुईं तथा अनसूया ने सीताजी को पतिव्रता धर्म का उपदेश दिया जिसका वर्णन महर्षि वाल्मीकि ने रामायण में एवं गोस्वामी तुलसीदासजी ने रामचिरित मानस में किया है।

TO PURCHASE THIS BOOK, PLEASE CLICK THIS PHOTO

इस उपदेश को ‘सतीधर्म’ अर्थात् सत्य पर दृढ़ रहने का धर्म भी कहा जाता है। यहाँ सती शब्द का अर्थ सत्य-निष्ठा पर दृढ़ रहने से है न कि आग में जलने से। सती धर्म को ‘पतिव्रता धर्म’ भी कहा जाता है। इस उपदेश का सार यह है कि पति एवं पत्नी एक दूसरे के पूरक हैं, प्रतिद्वंद्वी नहीं हैं। अतः वे एक-दूसरे के अनुकूल आचरण करें तथा एक दूसरे के मित्र बन कर रहें। देवी अनसूया ने सीताजी को अखंड सौंदर्य की एक औषधि भी प्रदान की। इन्हीं अनसूया ने एक बार अपने तपोबल से ब्रह्मा, विष्णु एवं महेश को छोटे बच्चों में परिवर्तित कर दिया था। कुछ पुराणों में आई इस कथा के अनुसार एक बार ब्रह्माणी, लक्ष्मी और गौरी में विवाद छिड़ा कि सर्वश्रेष्ठ पतिव्रता कौन है? तीनों देवियां अपने-अपने सतीत्व और पवित्रता की चर्चा कर रही थीं। तभी नारदजी वहाँ आए। उन्होंने मुनि अत्रि की पत्नी अनुसूया के असाधारण पातिव्रत्य के बारे में उन्हें बताया और कहा कि उनके समान पवित्र और पतिव्रता स्त्री तीनों लोकों में कोई नहीं है। तीनों देवियों के मन में अनसूया से ईर्ष्या हुई और उन्होंने अपने-अपने पति से कहा कि वे अनसूया के पातिव्रत्य धर्म की परीक्षा लें। इस पर ब्रह्मा, विष्णु एवं महेश ब्राह्मणों का वेश धरकर अत्रि-आश्रम पहुँचे। उस समय अत्रि ऋषि आश्रम में नहीं थे।

अनसूया ने अतिथियों का बड़े आदर से स्वागत किया। तीनों ने अनसूयाजी से कहा कि हम आपसे तभी भिक्षा लेंगे जब आप अपने सभी वस्त्रों को उतार कर भिखा दें। कुछ ग्रंथों के अनुसार तीनों देवताओं ने अनसूयाजी से कहा कि वे उन्हें अपना दूध पिलाएं।

इस पर अनसूयाजी ने अपनी दिव्य शक्ति से जान लिया कि ये धरती के प्राणी नहीं हैं अपितु स्वयं प्रजापति ब्रह्मा, विष्णु और महेश हैं। अनसूया ने उसी समय भगवान श्री हरि विष्णु का स्मरण करके संकल्प लिया कि यदि मैंने पति के समान कभी किसी दूसरे पुरुष को न देखा हो, यदि मैं सदा मन, वचन और कर्म से पति की आराधना में ही लगी रही हूँ तो मेरे सतीत्व के प्रभाव से ये तीनों अतिथि नवजात शिशु बन जाएं। अनसूयाजी के संकल्प से तीनों अतिथि शिशु बनकर उनकी गोद में खेलने लगे।

माता अनसूया ने इन तीनों शिशुओं को स्तनपान कराया, दूध-भात खिलाया तथा अपनी गोद में सुलाया। तीनों देवता गहरी नींद में सो गए। उसी समय भगवान शिव के वाहन नंदी बैल, भगवान श्री हरि विष्णु के वाहन गरुड़जी एवं ब्रह्माजी के वाहन राजहंस आश्रम के द्वार पर आकर एकत्रित हो गए। अत्रि ऋषि के आश्रम का यह दृश्य देखकर देवर्षि नारद, देवी लक्ष्मी, सरस्वती और पार्वती भी वहाँ आ गईं। नारद ने विनयपूर्वक अनसूया से कहा- ‘माते! इनके पतियों को इन्हें सौंप दीजिए।’

अनसूया ने तीनों देवियों को प्रणाम करके कहा- ‘हे माताओ! झूलों में सो रहे शिशु यदि आपके पति हैं तो इन्हें आप ले जा सकती हैं। जब तीनों देवियों ने झूले में झांककर देखा तो वहाँ एक जैसे चेहरे के तीन शिशु गहरी निद्रा में सोए हुए थे। नारद ने उन देवियों से पूछा- ‘क्या महान् पतिव्रता होने पर भी आप अपने पति को पहचान नहीं सकतीं?’

इस पर तीनों देवियों ने एक-एक शिशु को उठा लिया। इस पर तीनों देवता अपने वास्तविक स्वरूप में प्रकट हो गए। तब ज्ञात हुआ कि देवी सरस्वती ने शिवजी को, देवी लक्ष्मी ने ब्रह्माजी को और देवी पार्वती ने विष्णुजी को उठा लिया है। इस पर तीनों देवियों ने माता अनसूया से क्षमा याचना की और उन्हें बताया कि यह सब उनकी परीक्षा लेने के लिए किया गया था।

प्रजापति ब्रह्मा, विश्व पालक विष्णु एवं विश्व के रक्षक शिव ने देवी अनसूया से कहा कि आप हमसे वरदान मांगें। त्रिदेव की बात सुनकर माता अनसूया बोलीं- ‘हे प्रभु! आप तीनों मेरी कोख से जन्म लें।’

कालान्तर में माता अनुसूया के गर्भ से भगवान दतात्रेय रूप में भगवान श्री हरि विष्णु का, चन्द्रमा के रूप में ब्रह्मा का तथा दुर्वासा के रूप में भगवान शिव का जन्म हुआ। कुछ ग्रंथों के अनुसार ब्रह्माजी के अंश से चंद्रमा का, श्री हरि विष्णु के अंश से भगवान दत्तात्रेय का तथा भगवान शिव के अंश से महर्षि दुर्वासा का जन्म हुआ।

वाल्मीकि रामायण से लेकर विविध पुराणों एवं रामचरित मानस में देवी अनसूया का जो वर्णन आया है, उसके अनुसार अनसूया की कथा किसी महान् प्राकृतिक शक्ति का ही मानवीकरण है जो बिना वर्षा के वनस्पति उत्पन्न करती है तथा ब्रह्मा, विष्णु एवं महेश को शिशु रूप में बदल सकती है, जिसके गर्भ से चंद्रमा, भगवान दत्तात्रेय एवं दुर्वासा जैसी महान विभूतियां जन्म लेती हैं।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

- Advertisement -

Latest articles

सगुण-निर्गुण अंतर्द्वन्द्व में फंसी कबीर की राम-भक्ति - bharatkaitihas.com

सगुण-निर्गुण अंतर्द्वन्द्व में फंसी कबीर की राम-भक्ति

0
हिन्दू सनातन धर्म परम्परा (Sanatan Dharma Tradition) में सगुण-निर्गुण अंतर्द्वन्द्व उपनिषदों के काल से ही दिखाई देने लगता है। कबीर की रामभक्ति भी इसी...
काशी नामकरण का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य - bharatkaitihas.com

काशी नामकरण का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य

0
काशी (Kashi) को पुराणों] धर्मशास्त्रों, विविध हिन्दू ग्रंथों, इतिहास ग्रंथों  तथा लोकपरंपरा में अनेक नामों से पुकारा जाता है। इसके प्रमुख नाम निम्नलिखित हैं— काशी...
तिरुक्कुरल विश्व साहित्य का गौरव - bharatkaitihas.com

तिरुक्कुरल : विश्व साहित्य का गौरव

0
तिरुक्कुरल (Thirukkural) केवल एक पुस्तक नहीं है, बल्कि यह जीवन जीने की एक संपूर्ण संहिता है। इसे 'तमिल वेद' और 'विश्व नीतिशास्त्र' के रूप...
डिजिटल क्रांति www.bharatkaitihas.com

डिजिटल क्रांति और भविष्य की तैयारी

0
चारों ओर डिजिटल क्रांति का शोर है किंतु हमारे पास भविष्य की क्या तैयारी है! क्या हमने कभी इस पर गंभीरता से विचार किया...
वॉयनिच मैन्युस्क्रिप्ट : नीले पानी में नहाती औरतों का रहस्य - www.bharatkaitihas.com

वॉयनिच मैन्युस्क्रिप्ट : नीले पानी में नहाती औरतों का रहस्य

0
वॉयनिच मैन्युस्क्रिप्ट एक ऐसी पहेली, जिसे द्वितीय विश्व युद्ध के दिग्गज कोड-ब्रेकर्स से लेकर आज के सबसे एडवांस आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और सुपर कंप्यूटर्स...