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अतिथि की विदाई (29)

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अतिथि की विदाई

अतिथि की विदाई की बात सुनकर रानी मृगमंदा हतप्रभ रह गई। उसे लगा कि रानी मृगमंदा के द्वारा ऩिऋित के माध्यम से दिए गए विवाह का प्रस्ताव सुनकर ही प्रतनु यहाँ से जाना चाहता है।

घटनायें इतनी अप्रत्याशित गति से घटित हुईं कि निर्ऋति प्रतनु के प्रतिज्ञाबद्ध होने तथा सैंधव नृत्यांगना के प्रति अनुरक्त होने की सूचना रानी मृगमंदा को नहीं दे पायी। जब गुल्मपतियों के समक्ष रानी मृगमंदा को अपना प्रस्ताव वापस लेना पड़ा तो निऋति के पश्चाताप का पार न रहा।

क्यों चूक गयी वह रानी मृगमंदा को समय रहते सूचित करने से कि अतिथि सैंधव हम नागकन्यओं से नहीं वरन् किसी सैंधव नृत्यांगना के प्रति अनुरक्त है! यदि रानी मृगमंदा को समय रहते यह सूचना मिल गयी होती तो उन्हें लज्जित नहीं होना पड़ता, रानी मृगमंदा गुल्मपतियों के समक्ष यह प्रस्ताव ही नहीं रखतीं।

निऋति को इस बात पर भी आश्चर्य और क्षोभ था कि कैसे रानी मृगमंदा ने निऋति और हिन्तालिका से विमर्श किये बिना गुल्मपतियों के समक्ष विवाह करने की घोषणा कर दी! और तो और रानी मृगमंदा ने शिल्पी प्रतनु से भी विमर्श नहीं किया। यह एक लज्जाजनक अध्याय था जो नाग-राजकुल के साथ सदा-सर्वदा के लिये जुड़ गया था।

कहीं इस स्थिति के लिये स्वयं निऋति ही तो उत्तरदायी नहीं! उसने ही कहाँ हिन्तालिका द्वारा दी गयी सूचना पर विश्वास किया था कि शिल्पी प्रतनु सैंधव नृत्यांगना से विवाह करने के लिये फिर से लौट कर सैंधव पुर मोहेन-जो-दड़ो जायेगा! निऋति ने तो सोचा था कि अपने पुर से निष्कासित शिल्पी कुछ भी क्यों न कहे, अब वह लौट कर कहीं नहीं जा सकेगा और प्रस्ताव करने पर नागकुमारियों के साथ विवाह करने के लिये अपनी स्वीकृति दे ही देगा।

जाने कितने समय तक निऋति विचारों के प्रवाह में डूबती-उतरती रही,। उसे तो यह भी पता नहीं चला कि कब सूर्यदेव दक्षिण दिशा को त्यागकर दुर्ग की पश्चिमी प्राचीर पर आ बैठे! एक बार दृष्टि ऊपर उठी तो देखा, कक्ष का प्रकाश धीरे-धीरे क्षीण होता जा रहा है। एक अंधेरा है जो न जाने कहाँ-कहाँ से निकल कर कक्ष में समाता जा रहा है।

निऋति ने अनुभव किया कि धुएँ जैसा अंधेरा उसकी नसों में भी भरता जा रहा है। जिससे उसका चिंतन प्रवाह रुद्ध होकर एक ही स्थान पर ठहर सा गया है। क्या सोच रही है वह ? क्या सोचना चाहती है ? उसने अपने आप से प्रश्न किये किंतु उत्तर में केवल धुआँ ही धुआँ दिखाई दिया उसे। सेविका ने दीपाधार पर रखे दीप में स्नेहक भर कर वर्तिका को प्रज्वलित कर दिया किंतु निऋति उसी प्रकार विचारों की अवरुद्ध तरंगों के साथ हिचकोले खाती रही।

जाने कितनी देर तक और यही स्थिति रहती किंतु अचानक रानी मृगमंदा ने निऋति के कक्ष में प्रवेश किया। रानी मृगमंदा काफी उत्तेजित थी और लगभग हांफती हुई चली आ रही थी। अतः कक्ष में प्रवेश करते ही बोलीं- ‘ सुना तुमने निऋति! वह जा रहा है। ऐसे कैसे जा सकता है वह ? क्या हमें कोई अधिकार नहीं उसे रोक सकने का?’

निऋति अपने विचारों में इतनी गहरी उतरी हुई थी कि उसने न तो रानी मृगमंदा का कक्ष में आना लक्ष्य किया और न रानी मृगमंदा के शब्द उसके कानों तक पहुँचे।

निऋति को निश्चल बैठे देखकर रानी मृगमंदा ठिठकी।

  – ‘अब तुम्हें क्या हुआ निऋति ?’

निऋति की ओर से फिर भी कोई उत्तर नहीं आया देखकर रानी मृगमंदा ने उसका स्कंध हिलाया।

  – ‘क्या सोच रही हो निऋति ?’

  – ‘अरे आप कब आयीं ? मुझे तो ज्ञात ही नहीं हुआ।’ निऋति रानी मृगमंदा का स्पर्श पाकर आसन से उठ खड़ी हुई। उसने रानी मृगमंदा का अभिवादन किया और आसन ग्रहण करने का अनुरोध किया।

  – ‘लगता है सूचना तुम तक पहले ही पहुँच गयी है, इसीलिये उदास होकर बैठी हो।’

  – ‘कौनसी सूचना ?’ निऋति ने चैंक कर पूछा।

  – ‘शिल्पी प्रतनु के जाने की सूचना।’

  – ‘क्या! शिल्पी चला गया ?’

  – ‘नहीं अभी गया नहीं किंतु जाना चाहता है।’

  – ‘ कब ? अभी ?’

  – ‘अभी नहीं, कल प्र्रातः होते ही चले जाना चाहता है। तुम रोको उसे निऋति। हिन्तालिका कह रही थी कि वह केवल तुम्हारी ही बात मानता है।’ रानी मृगमंदा ने कातर होकर निऋति के हाथ पकड़ लिये।

  – ‘जाते हुए को कौन रोक सकता है बहिन! फिर वह हमारा लगता ही क्या है ? किस अधिकार से हम उसे यहाँ रोक सकते हैं ?’

  – ‘किस अधिकार से रोक सकते हैं ? किसी भी अधिकार से रोको उसे! हिन्तालिका कह रही थी कि तुम रोक सकती हो उसे।’

  – ‘इस समय कहाँ है वह ?’

  – ‘अतिथि शाला में है। हिन्तालिका उसके पास है।’

  – ‘आप यहाँ बैठें। मैं उसे और हिन्तालिका को यहीं बुलाकर लाती हूँ। हम तीनों मिलकर उसे समझाते हैं।’ निऋति रानी मृगमंदा को वहीं छोड़कर अतिथिशाला की तरफ दौड़ती सी चली गयी। विचारों का एक तीव्र आवेग उसके हृदय में उमड़ आया।

क्या सचमुच वह जा रहा है! क्या किसी भी तरह रोका नहीं जा सकता उसे! अनायास एक दिन वन प्रांतर में विचरण करते हुए मिल जाने वाला अनजान अतिथि क्या इतने दिनों के सानिध्य के पश्चात भी सचमुच अतिथि ही रहा! बात ही बात में रानी मृगमंदा के प्रश्नों के रहस्य को तोड़ कर रख देने वाला यह विलक्षण शिल्पी क्या अपने हृदय पर अनुराग भरी छैनी की एक भी चोट का अनुभव नहीं कर पाया!

रानी मृगमंदा की रक्षा के लिये अपने प्राणों पर खेलकर गरुड़ों का प्रवाह रोक देने वाला दृढ़ सैंधव क्या आज स्वयं ही हमारे प्राणों का हरण करके चला जायेगा! निऋति और हिन्तालिका को शिल्पकला के अनूठे प्रयोगों से परिचित करके क्या आज वह स्वयं ही जीवन से समस्त कलाओं का हरण करके चले जाना चाहता है ?

निऋति को अपनी गति पर नियंत्रण पाना पड़ा। उसने देखा कि हिन्तालिका और शिल्पी प्रतनु इसी ओर आ रहे हैं।

  – ‘कहाँ जा रही हो निऋति ?’ प्रतनु ने पूछा।

  – ‘आपही की सेवा में उपस्थित होने जा रही थी अतिथि महाशय।’ निऋति ने कतिपय रूक्ष स्वर में उत्तर दिया।

  – ‘ किस प्रयोजन से ?’

  – ‘रानी मृगमंदा आपको स्मरण कर रही हैं।’

  – ‘हम तो स्वयं ही रानी मृगमंदा की सेवा में जा रहे हैं।’ हिन्तालिका ने उत्तर दिया।

निऋति उन्हें साथ लेकर अपने कक्ष में पहुँची। रानी मृगमंदा ने अपने स्थान पर खड़े होकर अतिथि का स्वागत किया। बहुत देर तक चारों प्राणी बिल्कुल मौन बैठे रहे। कोई कुछ नहीं बोला। आश्चर्य चकित था प्रतनु भी अपने मौन पर। क्यों नहीं वह कुछ बोल पाता!

इतना तो पूछ ही सकता है कि रानी मृगमंदा किस आशय से उसे स्मरण कर रही थीं! किंतु नहीं प्रतनु की जिह्वा जैसे शब्दों का उच्चारण करना ही भूल गयी। अंत में निऋति ने मौन भंग किया- ‘ हमारी रानी मृगमंदा जानना चाहती हैं कि क्या आपका लौट जाना अत्यंत आवश्यक है ?’

  – ‘हाँ, मेरा जाना अत्यंत आवश्यक है।’ प्रतनु की जिह्वा में जैसे शब्द पुनः लौट आये।

  – ‘हम क्या करें कि आप अपना निर्णय बदल लें ?’

  – ‘आपको ऐसा करने की आवश्यकता ही क्या है ?’

  – ‘प्रश्न आवश्यकता का नहीं इच्छा का है।’

  – ‘आपके लिये यह केवल इच्छा का प्रश्न है जबकि मेरे लिये यह प्रश्न किसी के जीवन मरण से जुड़ा हुआ है।’

  – ‘क्या यह निश्चित है कि आप सैंधव नृत्यांगना रोमा की रक्षा करने में सफल हो जायेंगे ? आप असफल भी तो हो सकते हैं ?’

  – ‘मैं मानता हूँ कि मेरा संकल्प इतना बड़ा है कि संभवतः मैं उसमें सफल नहीं होऊं किंतु क्या मुझे प्रयास भी नहीं करना चाहिये ?’ प्रतनु ने उलट कर प्रश्न किया।

  – ‘क्या लाभ ऐसे प्रयास का जबकि असफलता निश्चित जान पड़ती है।’ निऋति ने हार नहीं मानी।

  – ‘जिस प्रकार सफलता निश्चित नहीं है, उसी प्रकार असफलता भी निश्चित नहीं है किंतु मुख्य बात सफलता और असफलता की नहीं, मुख्य बात है देवी रोमा के दिये गये वचन की, वह मेरी प्रतीक्षा करेंगी। मुझे जाना ही होगा।’

  – ‘मुख्य बात है देवी रोमा को दिये गये वचन की।’ निऋति ने मुँह बिगाड़ कर प्रतनु की नकल की, ‘और हमारे प्रति तुम्हारी कोई मुख्य बात है ही नहीं!’ एक तो वह है जिसके कारण तुम्हें मोहेन-जो-दड़ो से निष्कासित किया गया और एक हम हैं जिन्होंने तुम्हें सिर आँखों पर बिठाया। एक तरफ वो है जो केवल दो घड़ी तुम्हारे साथ रही और एक हम हैं जो इतने दिन से तुम्हारी सेवा कर रही हैं। फिर भी तुम्हारी मुख्य बात नृत्यांगना रोमा के साथ ही रही। तब हमें क्या लाभ हुआ तुमको अपना अतिथि बनाकर ?’

  – ‘मैं मानता हूँ कि मुझे अतिथि बनाकर तुम्हें कोई लाभ नहीं हुआ किंतु निऋति! संसार में लाभ हानि की गणना ही तो मनुष्य को सुख नहीं देती! मैं स्वीकार करता हूँ कि मैं केवल तुम्हारे साथ ही नहीं अपितु रानी मृगमंदा और हिन्तालिका के साथ भी अन्याय कर रहा हूँ किंतु मेरे सामने और कोई उपाय भी तो नहीं है। मैंने देवी रोमा को जो वचन दिया था, वह यहाँ आने से पहले दिया था। यदि मुझे पता होता कि आगे चलकर ऐसी परिस्थितियाँ मेरे सामने आयेंगी तो मैं देवी रोमा को कोई आश्वासन नहीं देता। इस पर भी यदि तुम कहो कि मुझे यहीं रुक जाना चाहिये और देवी रोमा को अनंत काल तक के लिये प्रतीक्षा करने के लिये छोड़ देना चाहिये तो मैं यहीं रुकने को प्रस्तुत हूँ।’ प्रतनु ने समर्पण कर दिया।

  – ‘नहीं-नहीं! निऋति तुम्हें यह कदापि नहीं कहना चाहिये कि शिल्पी प्रतनु को अतिथि बनाकर हमें कोई लाभ नहीं हुआ। हमने इन्हें किसी लाभ की प्रत्याशा में अतिथि नहीं बनाया था। इसके उपरांत भी शिल्पी प्रतनु ने विपत्ति काल में हम पर कितना बड़ा उपकार किया है, हमें यह भी तो नहीं भूलना चाहिये। मेरा पूरा विश्वास है कि शिल्पी प्रतनु हम से भी उतना ही अनुराग रखते हैं जितना देवी रोमा से। यदि वे यहाँ से चले जाना चाहते हैं तो वह भी कत्र्तव्य के वशीभूत होकर। हमें उनके मार्ग की बाधा नहीं बनना चाहिये।’

इसके बाद कोई कुछ नहीं बोला। मानो रानी मृगमंदा ने निर्णय सुना दिया। हिन्तालिका की आँखों में पानी भर आया। उसने रानी मृगमंदा और अतिथि प्रतनु को प्रणाम किया और वह कक्ष से बाहर चली गयी। निऋति ने भी रोष से पैर पटकते हुए उसका अनुसरण किया। कक्ष में केवल दो प्राणी रह गये।

एक तो शिल्पी प्रतनु और दूसरी रानी मृगमंदा। थोड़ी देर तक दोनों मौन रहे। चुप्पी का एक-एक पल पहाड़ जितना भारी हो जाता है। कई बार मनुष्य को लगता है कि इस पहाड़ को तिल भर सरका देना भी उसके वश में नहीं है।

समय कम था, रानी मृगमंदा को लगा कि चुप्पी का यह पहाड़ यदि आज नहीं खिसका तो फिर कभी नहीं खिसकेगा। अतः किंचित् संकोच के साथ क्षमा याचना करते हुए बोली- ‘ यदि निऋति ने अतिथि की मर्यादा का उल्लंघन किया हो तो मैं उसकी ओर से क्षमा याचना करती हूँ ।’

  – ‘नहीं-नहीं। उसने किसी मर्यादा का उल्लंघन नहीं किया। जो कुछ भी वह कह गयी है, प्रेम और राग के वशीभूत होकर ही तो! मैं इतना हृदयहीन तो नहीं जो शब्दों में छिपे प्रेम की ऊष्मा का अनुभव नहीं कर सकूँ! ‘

  – ‘अतिथि यह हमारा दुर्भाग्य रहा कि हम आपका प्रेम न पा सके।’ रानी मृगमंदा के शब्दों में घनघोर निराशा थी।

  – ‘यह आपका नहीं, मेरा दुर्भाग्य है। मैं ही आप तीनों को न अपना सका।’

  – ‘हमें आप सदैव स्मरण रहेंगे अतिथि।’

  – ‘ मैं भी प्राण रहते आप तीनों की स्मृति अपने से विलग न कर सकूंगा।’

  – ‘सैंधव नृत्यांगना देवी रोमा को हमारा प्रणाम………।’ रानी मृगमंदा का गला  रुंध गया, वह अपनी बात पूरी नहीं कर सकी। अतिथि की विदाई का क्षण सचमुच बहुत पीड़ा दायक है।

– अध्याय 29, मोहनजोदरो की नृत्यांगना, ऐतिहासिक उपन्यास, लेखक – डॉ. मोहनलाल गुप्ता

पिशाच (30)

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पिशाच

प्रतनु ने अपने नेत्र पूरी तरह खोल दिये। श्वान-मुखी मादा पिशाच की पूर्णतः निर्वस्त्र वीभत्स देह प्रतनु की देह पर पूरी तरह झुकी हुई थी। उसने अपनी दोनों हथेलियाँ प्रतनु के शरीर पर ही टिका रखी थीं जिससे उसके लटकते हुए वीभत्स स्तन प्रतनु के शरीर को स्पर्श कर रहे थे।

उषा के आगमन के साथ ही रानी मृगमंदा, निर्ऋति तथा हिन्तालिका से विदा लेकर प्रतनु सीधा मोहेन-जो-दड़ो की ओर बढ़ा। उष्ट्र के न होने से उसे यह मार्ग पैदल ही पार करना था। अतः इस बार की यात्रा में समय भी अधिक लगने की संभावना थी।

दीर्घ समय तक नागलोक में निवास करने के कारण प्रतनु उस मार्ग को बिल्कुल भूल चुका था जिस पर चलता हुआ वह मोहेन-जो-दड़ो से यहाँ तक पहुँचा था। फिर भी उसका विचार था कि दिशा का अनुमान करके तथा अतिरिक्त सावधानी रखकर वह पहले की अपेक्षा कुछ न्यूनाधिक समय में मोहेन-जो-दड़ो तक पहुँच सकता था।

प्रारंभ का अधिकतर मार्ग पर्वतीय उपत्यकाओं में था जहाँ कदम-कदम पर नदी नाले और झरने उसके सहचर थे। आगे का मार्ग नितांत मैदानी क्षेत्र में था जहाँ सघन वनावली का प्रसार था। पूरे मार्ग में जल और आहार की कमी नहीं थी। प्रतनु ने अनुभव किया कि इस मार्ग पर दिन में यात्रा करना अधिक सुगम्य था। रात्रि में वन्य पशुओं के खतरे के कारण उसे किसी ऊँचे वृक्ष की स्थूल शाखाओं पर आश्रय लेना पड़ता था। फिर भी वह अपनी यात्रा प्रातः शीघ्र ही आरंभ कर देता था और संध्या समय में विलम्ब तक चलता रहता था।

नागलोक से निकल कर छः दिन तक वह बिना किसी बाधा के चलता रहा। सातवें दिन मध्याह्न के पश्चात घनघोर बादल छा गये और देखते ही देखते मूसलाधार वर्षा होने लगी। चारों ओर से घिर कर आये श्यामवर्णी बादलों ने जैसे क्रोधित होकर उस भू-क्षेत्र को घेर लिया जिससे घनघोर अंधेरा छा गया।

लगता था वरुण अपने बादल रूपी शकटों को पूरी तरह भर कर लाया था और समस्त जल यहीं बरसा देना चाहता था। वर्षा की बूंदो के प्रहार से बचने के लिये सघन वृक्ष को खोजता हुआ प्रतनु मार्ग भटक गया और दिशा बदल कर दक्षिण के स्थान पर पश्चिम में बढ़ गया। ऐसी विकट वर्षा प्रतनु ने अपने जीवन में पहले कभी नहीं देखी थी।

सहस्रों जल धारायें बह निकलीं। जिन्हें पार कर आगे बढ़ना कठिन हो गया। काफी देर तक प्रतनु एक विशाल वृक्ष के नीचे आश्रय लिये रहा। जब वर्षा पूरी तरह थम गयी तो उसने अपनी यात्रा पुनः आरंभ की।

वर्षा थम जाने के बाद भी सूर्यदेव दिखाई नहीं दिये किंतु बादलों से छनकर आने वाले प्रकाश में प्रतनु किसी तरह आगे बढ़ता रहा। रात्रि में भी आकाश की यही स्थिति रही। लगता था चंद्रमा सहित समस्त नक्षत्र वर्षा काल जानकर भीग जाने के भय से गगन विहार के लिये आये ही नहीं। बहुत प्रयास के उपरांत भी जब प्रतनु दिशा निर्धारण करने तथा आगे चल सकने में समर्थ नहीं हुआ तो उसने हार-थक कर एक वट वृक्ष का आश्रय लिया किंतु तब तक वह मार्ग भटक कर काफी दूर तक चल चुका था।

यहाँ मृगमंदा के मायावी उपवन की भांति अशोक, बकुल, चम्पक, शिरीष, पुन्नाग, अरिष्ट तथा कुरबक के वृक्ष नहीं थे। कुरण्ट, नवमालिका, सिन्धुवार और कुन्द पुष्पों के गुल्म भी नहीं थे। यहां करवीर के मनोहारी सुगंधित झाड़ भी नहीं थे जिनके निकट बनी चैकियों पर बैठकर रानी मृगमंदा की अनुचरियाँ नागस्वरम्, वाण, वेणु, मृदंग और आघाटि वादन करतीं थीं। इस निर्जन वन में चारों ओर नीलगिरि, अश्वत्थ और वटवृक्षों की भरमार थी जिनकी सघनता के कारण वन दुरूह हो गया जान पड़ता था।

नीलगिरी का वृक्ष मनुष्य तो मनुष्य पक्षियों तक के आश्रय के लिये भी श्रेयस्कर नहीं होता। अश्वत्थ पर आश्रय लेना उसने उचित नहीं समझा। उसने सुना था कि अश्वत्थ पर अशरीरी जीवों का वास रहता है जो रात्रि में अधिक सक्रिय रहते हैं। वटवृक्ष पर आश्रय करने में दो समस्याएं हैं एक तो वटवृक्ष पर चढ़कर बैठना संभव नहीं दूसरे वट पर सर्प आदि भी आश्रय ले लेते हैं।

सब बातों पर विचार करने के उपरांत प्रतनु ने वटवृक्ष के नीचे ही आश्रय लेना अधिक उचित समझा। कुछ खोजने पर उसे वृक्ष की विशाल जटाओं से बन गयी कोटर जैसी एक आकृति दिखाई दे गयी। उसी कोटर में प्रतनु को छिपकर बैठने के लिये पर्याप्त स्थान मिल गया, जिससे कि प्रतनु के निद्रा में होने पर कोई वन्य पशु अचानक उस पर आक्रमण न कर दे। कोटर में आश्रय लेने से यह लाभ भी हुआ कि वटपत्रों से गिरती बूंदों और शीत से भी प्रतनु का बचाव हो गया। ग्रीष्म होने के कारण उसके साथ रोमयुक्त मेष-चर्म भी नहीं था जो शीत से प्रतनु का बचाव करता।

पर्याप्त रात्रि हो जाने के उपरांत भी वृक्षों पर बैठे पक्षियों की फड़फड़ाहट समाप्त नहीं हो रही थी। सघन वर्षा के कारण कई पक्षी अपने डेरों पर नहीं लौटे थे जिनकी प्रतीक्षा में उनके साथी पक्षी व्याकुल होकर पंख फड़फड़ाते हुए तीव्र शब्द उत्पन्न कर रहे थे। बहुत से पक्षी अपने वृक्षों को ढूंढते हुए एक वृक्ष से दूसरे वृक्ष तक उड़ रहे थे। लगता था आज की रात वन सोयेगा नहीं।

प्रतनु ने अनुभव किया कि सर्वत्र व्याप्त निविड़ अंधकार में रह-रह कर उत्पन्न होती पक्षियों की चीखें और उनकी अकुलाहट भरी फड़फड़ाहट ही वातावरण को भयावह बना देने के लिये पर्याप्त थी किंतु यहाँ तो प्रकृति ने भयावहता में अभिवृद्धि के अनेक उपाय रच रखे थे। रह-रह कर वायु के झौंके वृक्षों को झकझोर जाते। वृक्षों की टहनियाँ पवन से रगड़ खाकर सांय-सांय करने लगतीं और वृक्ष-पत्रों पर अटके जल-बिन्दु पर्वतों से बहकर आने वाली जल धाराओं में गिरकर टप-टप की रहस्यमयी ध्वनि उत्पन्न करते।

ऐसे में चिच्चिक और वृषारव भला कैसे पीछे रहते! प्रतनु को रानी मृगमंदा द्वारा नागों के संगीत वाद्ययंत्र आघाटि के सम्बन्ध में कही गयी उक्ति का स्मरण हो आया- ”जब चिच्चिक वृषारव के प्रत्युत्तर में बोलता है, तब अरण्यानी आघाटि की भांति ध्वनि करता हुआ पूजित होता है।”

चिच्चिक और वृषारव तो वही हैं किंतु यहाँ उनके परस्पर संवाद से आघाटि के स्वर उत्पन्न नहीं हो रहे। यहाँ तो वे वन की भयावहता में वृद्धि करने के उपकरण बने हुए हैं।प्रतनु को लगा कि इस समय वन में जो कुछ भी सजीव अथवा निर्जीव रचना उपस्थित है वह पूरे मनोयोग से वन की भयावहता में वृद्धि करने में योग दे रही है।

वन की भयावहता में वृद्धि करने के लिये ही सहस्रों-सहस्र झिंगुर, दादुर और पपीहे शक्ति भर जोर लगाकर चीख रहे हैं। दूर ही कहीं श्रृगालों का गुल्म हुआँ-हुआँ करके चिल्ला रहा है। बीच-बीच में हिंस्रक वन्यपशुओं की चिंघाड़ भी वन को झिंझोड़ रहीं है। अपनी प्रकृति के विरुद्ध प्रतनु को अनजाने भय ने घेर लिया।

आकाश में नक्षत्र उपस्थित होते तो प्रतनु उन्हें ताकते रहकर समय व्यतीत कर सकता था किंतु घनघोर अंधकार के कारण आकाश विकराल कज्जल के वितान में परिवर्तित हो गया प्रतीत होता था जिसके आर-पार कुछ दिखाई नहीं देता था। खद्योतों के उड़-उड़ कर एक वृक्ष से दूसरे वृक्ष तक जाने के उपक्रम में यदा-कदा जो क्षीण प्रकाश उत्पन्न होता था उसमें दैत्याकार वृक्ष और भी भयावह दिखाई देते थे।

प्रतनु ने अनुभव किया कि इस वट वृक्ष पर चमगादड़ों का बड़ा डेरा था जो विकराल रात्रि के निविड़ अंधकार से उत्साहित होकर दुगुने-चैगुने वेग से शब्द करती हुई मण्डरा रहीं थीं। चमगादड़ों की भांति उल्लूकों की भी आज बन आई थी, उनके उत्साह का पार न था। वे रह-रह कर अशुभ चीत्कार करते थे। वटवृक्ष की कोटर में बैठा प्रतनु प्रातः होने की प्रतीक्षा में आंखें फाड़-फाड़ कर अपनी चेतना पर हावी होते अंधकार और भय से लड़ता रहा।

पहले की यात्राओं में उष्ट्र उसके साथ रहा था जिससे वह अपने आप को निपट एकाकी एवं असहाय अनुभव नहीं करता था। एकांत के क्षणों में वह मूक पशु भी बहुत बड़ा सम्बल सिद्ध होता था जिससे वह कुछ पूछ तो नहीं सकता था किंतु कुछ कह तो सकता था।

सचमुच ही इस विकट वन की घनघोर अंधेरी रात्रि में प्रतनु को न तो सैंधव नृत्यांगना रोमा, न नागों की रानी मृगमंदा, न निर्ऋति और न हिन्तालिका, किसी का स्मरण नहीं आया। स्मरण आया तो केवल मात्र वह उष्ट्र जिसके अभाव में वह अपने आप को निपट एकाकी, नितान्त असहाय और दयनीय अनुभव कर रहा था। जाने उस उष्ट्र का क्या हुआ होगा! निश्चय ही वह अब तक वन्यपशुओं का भोजन बन चुका होगा।

संभवतः रात्रि के अंतिम प्रहर में अथवा उससे कुछ पूर्व उसकी आँख लगी। जाने कितनी देर तक वह सोता रहा, प्रतनु को अनुमान नहीं हुआ। जब उसकी नींद खुली तो वह विचित्र और भयावह दिखाई देने वाले प्राणियों से घिरा हुआ था। उनके मुख श्वान के सदृश दिखाई देते थे। वे पूर्णतः निर्वस्त्र थे।

उनकी देह कज्जल के सदृश काली और अन्य प्रजाओं की अपेक्षा कहीं अधिक विशाल और पतली थी। सिर के बाल मेष ऊष्ण की भांति अत्यंत पतले, विरल और लम्बे थे तथा घुंघरुओं की तरह वलयकार होकर सिर से ही चिपके हुए थे। उनके हाथों में नुकीले काष्ठ दण्ड थे। [1]  सबसे आगे खड़ा हुआ प्राणी उनका मुखिया जान पड़ता था।

झटके से उठ बैठा प्रतनु। किन लोगों के बीच आ गया वह! कौन हैं ये लोग! उसे घेर कर क्यों खड़े हैं! कहीं ये पिशाच तो नहीं! प्रतनु ने सुना था कि घने एवं दुर्गम वन प्रांतरों में जहाँ अन्य प्रजाओं का आवागमन नहीं है, पैशाचिक प्रजायें रहती हैं। तो क्या वह पिशाचों की भूमि में आ पहुँचा है। प्रतनु ने अनुभव किया कि पीड़ा से उसका हाथ दर्द कर रहा है। संभवतः वीभत्स दिखाई देने वाले श्वान मुखी पिशाचों ने प्रतनु को जगाने के लिये किसी नुकीली चीज से कोंचा था।

प्रतनु को उठा हुआ देखकर वे लोग विचित्र भाषा में चीख-चीख कर बोलने लगे। संभवतः प्रतनु को कुछ आदेश दे रहे थे। प्रतनु नहीं जानता था कि यह कौनसी भाषा है और किस क्षेत्र की प्रजा द्वारा बोली जाती है। प्रतनु ने अनुभव किया कि भले ही वे पिशाच हों अथवा अन्य कोई प्रजा किंतु वे प्रतनु से भयभीत तो किंचित् मात्र भी नहीं हैं। संभवतः इसका कारण यह था कि वीभत्स दिखाई देने वाले प्राणी स्वयं को संख्या बल में अधिक जानकर सुरक्षित अनुभव कर रहे थे।

प्रतनु वटवृक्ष की हवा में लटकती जड़ों में बनी कोटर से बाहर आया। जैसे ही वह कोटर से बाहर निकला, विचित्र और वीभत्स दिखाई देने वाले उन श्वान मुखी पिशाचों ने प्रतनु को कसकर दबोच लिया और उसके हाथ-पैर एक मजबूत लता की सहायता से एक मोटे काष्ठ दण्ड से बांध दिये।

असहाय होकर रह गया प्रतनु। काष्ठ दण्ड को दो पिशाचों ने अपने कंधे पर इस तरह रख लिया मानो मृत-पशु का शव ढोकर ले जा रहे हों। प्रतनु ने विरोध करना चाहा तो पिशाचों के मुखिया ने उसे नुकीली काष्ठ से कोंचा। प्रतनु असह्य पीड़ा से कराह उठा। उसने समझ लिया कि इन वीभत्स प्राणियों का प्रतिरोध करना उसके लिये संभव नहीं।

रास्ते भर पिशाच परस्पर वार्ता में निमग्न रहे थे, एक पल को भी चुप नहीं रहे थे। उनकी कोई बात प्रतनु के पल्ले नहीं पड़ी थी किंतु वे बार-बार मुखिया दिखाई देने वाले पिशाच को टिमोला कह कर पुकार रहे थे। प्रतनु ने अनुमान किया कि या तो उस पिशाच का नाम टिमोला है या फिर ये पिशाच ‘मुखिया’ अथवा ‘राजा’ जैसे किसी शब्द के लिये टिमोला शब्द काम में लाते हैं।

काफी देर तक घुमावदार मार्गों पर चलते रहने के बाद वीभत्स पिशाच अत्यंत सघन वृक्षों से घिरे एक भूखण्ड में पहुँचे, जहाँ उनके जैसे सैंकड़ों पिशाच मौजूद थे। प्रतनु ने अनुमान लगाया कि यह स्थान ही श्वान-मुखी पिशाचों का पुर है। आश्चर्य से जड़ होकर रह गया प्रतनु इस पुर को देखकर।

इस तरह के आवास भी कोई प्रजा अपने निवास के लिये बना सकती है, सोचा भी नहीं जा सकता था। उसने देखा कि सघन वनावली में काष्ट एवं वनस्पति की सहायता से बनी हुई अत्यंत भद्दी झौंपड़ियाँ इधर-उधर छितरी हुई थीं जिनकी छत पृथ्वी से कुछ ही ऊपर उठी हुई थी। इन झौंपड़ियों में कोई भी प्राणी सीधा खड़ा होकर प्रवेश नहीं कर सकता था।

कुछ ही पलों में पूरी बस्ती को सूचना हो गयी कि टिमोला किसी विचित्र प्राणी को बांध कर लाया है। इस सूचना से झौंपड़ियाँ हिलने सी लगीं। प्रतनु ने देखा कि वीभत्स आकृति वाले श्वान मुखी स्त्री, पुरुष और बच्चे झौंपड़ियों से रेंग-रेंग कर बाहर निकलने लगे। थोड़ी ही देर में वे सैंकड़ों की संख्या में प्रतनु को घेर कर खड़े हो गये।

प्रतनु को देखकर वे अत्यंत ही विचित्र ध्वनि उत्पन्न करते थे जो शृगालों की हू-हू से काफी साम्य रखती थी। वीभत्स चेहरे वाले पुरुषों ने प्रतनु के वस्त्रों को कौतूहल से टटोल-टटोल कर फाड़ डाला। थोड़ी ही देर में वह भी पिशाचों की तरह पूरी तरह से निर्वस्त्र था। प्रतनु ने अनुमान लगाया कि अब वह किसी तरह से यहाँ से भाग जाने में सफल हो भी जायेगा तो बिना वस्त्रों के सभ्य समाज में नहीं जा सकेगा।

वीभत्स चेहरों वाली स्त्रियों ने प्रतनु को छूकर देखा। उनके खुरदरे हाथ प्रतनु को अपने कोमल गात पर काँटें जैसे अनुभव हो रहे थे। उनके श्वानमुखी चेहरों से वीभत्सता टपक रही थी। कुछ स्त्रियाँ तो प्रतनु के माँस का आस्वादन करने को इतनी उतावली थीं कि उनकी जिव्हा बाहर निकल आई और उनसे लार टपकने लगी। एक मादा पिशाच ने तो सचमुच ही अपने श्वान जैसे तीक्ष्ण दंत प्रतनु की देह में गड़ा दिये। रक्त के कुछ बिन्दु प्रतनु की कोमल देह पर छलछला आये जिन्हें उस मादा पिशाच ने अत्यंत आतुरता से चाट लिया। अदम्य पीड़ा से चीख पड़ा वह।

प्रतनु के स्वादिष्ट रक्त का स्वाद पाकर तो मादा पिशाच नियंत्रण से बाहर हो गयी। उसने फिर से अपने तीक्ष्ण दंत प्रतनु की देह में गड़ा दिये। अन्य पिशाचों ने उसे बलपूर्वक वहाँ से हटाया। प्रतनु समझ गया कि वह जिन नर-भक्षी पिशाचों के हाथ लग गया है उनसे छुटकारा पाना कठिन है। इनके हाथ लग जाने का अर्थ है साक्षात् मृत्यु को प्राप्त कर लेना।

पिशाचों के बच्चों को तो प्रतनु के रूप में क्रीड़ा की नवीन सामग्री प्राप्त हो गयी प्रतीत होती थी। वे उस पर कंकर, मिट्टी के ढेले और काष्ठ खण्ड उठा-उठा कर फैंकते और प्रतनु के चेहरे पर उत्पन्न होने वाले पीड़ा के भावों को देखकर आनंदित होते। जब तक सूर्य अस्ताचल को नहीं पहुँच गया, यही क्रम चलता रहा। अंत में जब पीड़ा सहन शक्ति से बाहर हो गयी तो प्रतनु मूच्र्छित हो गया।

जाने कब तक मूच्र्छित रहा वह! जब चेतना लौटी तो अपने आप को जीवित पाकर उसे आश्चर्य हुआ। उसने देखा आकाश में चंद्रमा नक्षत्रों सहित विहार करने आ गया था। जिसका क्षीण प्रकाश सघन वृक्षों की पत्तियों से छन-छन कर प्रतनु की निर्वस्त्र देह और देह पर बने व्रणों पर पड़ रहा था। वरुण का कोप शांत हो जाने से यद्यपि आज की रात्रि विगत रात्रि की तरह भयावह नहीं थी किंतु जितने भय और कष्ट में वह आज था आज से पहले किसी भी रात्रि में नहीं रहा था।  अब भी उसके दोनों हाथ और दोनों पैर पूरी मजबूती से काष्ठ दण्ड से बंधे थे, वह अपने स्थान से यव भर भी नहीं हिल सकता था।

प्रतनु ने अनुमान किया कि श्वान-मुखी पिशाचों के लिये वह पशु से अधिक महत्व नहीं रखता था। अंतर था तो केवल इतना कि वे उसे तुरंत न खाकर अवसर विशेष पर अथवा समारोह पूर्वक खाना चाहते थे क्योंकि प्रतनु उनके लिये ऐसा पशु था जिसका मांस उन्हें यदा-कदा ही खाने को मिलता था। यह भी संभव था कि कुछ विशिष्ट पिशाचों द्वारा ही उसका भक्षण किया जाये क्योंकि प्रतनु की देह में इतना मांस उपलब्ध नहीं था जिससे सैंकड़ों पिशाचों का उदर भर सके। संभवतः इसी कारण अब तक उसे मारा नहीं गया था।

प्रतनु का अनुमान सही था। रात्रि भर वह उसी काष्ठ दण्ड से मृत पशु की भांति बंधा रहा। पिशाचों की प्रजा में विशिष्ट महत्व रखने वाले शक्तिशाली टिमोला और उसके साथ हर विपत्ति में साथ रहने वाले कतिपय बलिष्ठ पिशाच ही स्वयं को नर-मांस भक्षण के योग्य समझते थे किंतु अन्य पिशाचों के दांत भी प्रतनु के विशिष्ट मांस पर थे। सारे पिशाच उसके कोमल मांस का स्वाद लेना चाहते थे।

पिशाचों की प्रजा का नियम भी यही था कि जब कोई शिकार पकड़ा या मारा जाता था तो उसे समस्त पिशाच प्रजा अपना भक्ष्य बनाती थी किंतु इस शिकार की बात और थी। इसका सुस्वादिष्ट मांस टिमोला अकेले ही खाना चाहता था किंतु अपने बलिष्ठ अनुचरों को कुपित न कर सकने के कारण वह उन्हें इसमें से कुछ भाग देने को तैयार था किंतु यदि समस्त पिशाच प्रजा साधारण शिकार की तरह प्रतनु को खाने बैठ गयी तो टिमोला और उसके साथियों के हाथ क्या आयेगा!

टिमोला और उसके साथियों ने अन्य पिशाचों का ध्यान प्रतनु की तरफ से हटाने  के लिये अगले दिन एक योजना बनाई। टिमोला ने अपने बलिष्ठ साथियों को वन से अधिक से अधिक संख्या में पशुओं का शिकार करके लाने को कहा ताकि अन्य पिशाचों को उनके भक्षण में लगा कर वे प्रतनु को अपने लिये बचा लें।

दिन का तीसरा प्रहर समाप्ति पर था कि टिमोला के बलिष्ठ साथी अपने मजबूत स्कंधों पर वन्य पशुओं के शव ढो-ढोकर लाने लगे। महिष,[2]  शूकर,[3]  हरिण, शशक [4] आदि वन्य पशुओं को प्रस्तरों और नुकीले काष्ट से मारा गया था। उनकी क्षत-विक्षत देह से रक्त की धारायें बह रही थीं। प्रतनु ने देखा कि कुछ पिशाच विशालाकाय कछुओं को अपनी पीठ पर लादे हुए हैं। कुछ पिशाचों के हाथों में बड़े-बड़े मत्स्य लटकाये हुए हैं तो कुछ के हाथों में कछुओं के बड़े-बड़े अण्डे भी लगे हुए हैं।

बड़ी मात्रा में पशु-मांस और कछुओं के अण्डों को देखकर पिशाचों के पुर में उत्सव का सा वातावरण उत्पन्न हो गया। कुछ बलिष्ठ पिशाच नारियल और ताड़ के ऊँचे वृक्षों पर चढ़ गये और वहां से ढेरों नारियल तोड़-तोड़ कर नीचे फैंकने लगे। कुछ पिशाचों ने ताड़-वृक्षों पर पहले से लटकाये गये विशालाकाय कछुओं के खोलों को सावधानी पूर्वक नीचे उतारा। ये खोल ताड़-रस से पूर्णतः भरे हुए थे।

टिमोला और साथियों ने आज ताड़-रस भी भारी मात्रा में पेड़ों से उतरवाया। यह समस्त सामग्री एक विशाल गड्ढे के पास रख दी गई। शाम होते ही एक गड्ढे में शुष्क काष्ठ खण्ड भरकर अग्नि लगाई गई। सैंकड़ों पिशाच खड्ड में प्रज्वलित अग्नि को घेर कर नाचने और विभिन्न पशुओं के मांस को भून-भून कर खाने लगे। शीघ्र ही ताड़ी अपना प्रभाव पिशाचों पर दिखाने लगी और वे परस्पर गाली-गलौच करते हुए झगड़ने लगे। एक दूसरे के हाथ से मांस खण्ड छीनकर खाते हुए पिशाच अत्यंत वीभत्स और अशुभ दृश्य उत्पन्न कर रहे थे।

पिशाचों ने अपने पैरों में नारियल के खोल बांध रखे थे जिनमें तेज आवाज उत्पन्न करने वाले कंकड़ भरे हुए थे। अचानक कुछ पिशाचों ने गायन आरंभ किया-

ओगराई आयाहि ऽ ऽ ऽ वोईतोया ऽ ऽ  [5]

तोया ऽ ऽ इ ग्रणानोह व्यदा तो या ऽ ऽ इ ।

तोया ऽ ऽ इ नाइहोतासा ऽ ऽ   ऽ ऽ ऽ

त्सा इबा ऽ ऽ   ऽ ऽ ऽ   ऽ ऽ ऽ ऽ औहोबा हीं ऽ ऽ   ऽ ऽ ऽ   ऽ ऽ ऽ ऽ षी।

पहले तो प्रतनु की समझ में कुछ नहीं आया किंतु कुछ ही क्षणों में कुछ शब्द उसके मानस पटल पर प्रत्यय [6] बनाने लगे। चैंक पड़ा प्रतनु पिशाचों के गायन को सुनकर। ऐसा ही, हाँ ठीक ऐसा ही गायन तो प्रतनु ने नाग कन्याओं के तूर्य आयोजन के समय सुना था। तो क्या नागों और पिशाचों के मध्य किसी प्रकार का सम्पर्क है!

आशा की एक किरण प्रतनु के हृदय में उदित हुई और अगले ही पल बुझ गयी। भला पिशाचों और नागों के मध्य किसी प्रकार का सम्पर्क कैसे हो सकता है! कहाँ नागों की अत्यंत विकसित सभ्यता और कहाँ अत्यंत हीन स्तर पर विद्यमान पिशाच!

जाने कहाँ पिशाचों ने नागों का यह गायन सुना और उसे पैशाचिक शैली में ढालकर अपना लिया। निऋति ने बताया था कि नागों में भी यक्षों, गंधर्वों और आर्यों के समान साम गायन की परम्परा है। कौन जाने पिशाचों ने यह गायन नागों से न सुनकर यक्षों, गंधर्वों अथवा आर्य सामगायकों से सुना हो और उसे स्मरण रख लिया हो।

 प्रतनु ने अनुभव किया कि पिशाचों की नृत्य और गायन कला पूरी तरह अविकसित होने के उपरांत भी पैशाचिक गायन में स्तोभाक्षरों  [7] ‘हाऊ – – –  हाऊ’ और ‘नोनि – – – नोनि’ का प्रयोग बड़े पैमाने पर हुआ है। ठीक वैसे ही जैसा कि सैंधव गायक ‘हुम् ऽ ऽ ऽ हाँ, हुम् ऽ ऽ ऽ हाँ’ तथा  ‘अ ऽ र ऽ र ऽ र ऽ ‘ किया करते हैं।

नागों की अति उन्नत गायन कला में भी ‘सं – – –  नि – ध – – – प – । सं – – –  नि – ध – – – प – ‘ स्तोभाक्षर उपस्थित हैं। यह दूसरी बात है कि सैंधव गायक तथा नाग गायक स्तोभाक्षरों का प्रयोग अत्यल्प मात्रा में करते हैं जबकि पिशाचों में स्तोभाक्षर ही मुख्य गायन पद है तथा साथ ही अत्यंत कर्कश भी। यही कारण है कि पिशाचों के स्तोभाक्षर आनंद के स्थान पर भय में वृद्धि कर रहे हैं।

आग की लपटों में चमकते पिशाचों के श्वान मुख अत्यंत भयावह दिखाई पड़ रहे थे। यह खड्ड प्रतनु से कुछ दूर पड़ता था फिर भी आग के प्रकाश में वहाँ चल रही प्रत्येक गतिविधि प्रतनु को स्पष्ट दिखाई दे रही थी। ऐसा वीभत्स दृश्य प्रतनु ने अपने जीवन में पहले कभी नहीं देखा था।

जीवन से पूर्णतः निराश हो चले प्रतनु के स्मृति पटल पर शर्करा के तट पर बसा अपना पुर, पुर में रहने वाली अपनी माँ, सिंधु तट पर बसी राजधानी मोहेन-जो-दड़ो, मोहेन-जो-दड़ो में रहने वाली नृत्यांगना रोमा, पर्वतीय प्रदेश में पुष्पित-पल्लवित नागों का विवर, विवर में निवास करने वाली रानी मृगमंदा, निऋति और हिन्तालिका स्थिर प्रतिमाओं की भांति उभरने लगे।

प्रतनु को लगा कि ये सब उपक्रम अब उसके लिये व्यर्थ हो चले हैं। अब कभी वह मोहेन-जो-दड़ो नहीं लौट सकेगा। नृत्यांगना रोमा प्रतीक्षा ही करती रह जायेगी उसकी। न तो वह कभी अपने अपमान का प्रतिकार कर सकेगा और न रोमा को किलात के चंगुल से मुक्त करा सकेगा। उसके निश्चय यहीं तिरोहित हो जायेंगे।

अचानक प्रतनु को अपनी देह पर कोई खुरदरा स्पर्श अनुभव हुआ। उसने घबरा कर नेत्र खोल दिये। भय से प्रतनु का रक्त शिराओं में ही जम गया। उसने देखा कि कोई मादा आकृति उसकी देह पर झुकी हुई है और अपनी थूथन आगे करके श्वानों की भांति कुछ सूंघने का प्रयास कर रही है। प्रतनु को लगा कि यह वही मादा पिशाच है जो दिन में उसका मांस खाने को आतुर थी और जिसे बड़ी कठिनाई से अलग ले जाया गया था। प्रतनु को लगा कि जीवन का अंतिम क्षण आ पहुँचा है।

प्रतनु ने भय से नेत्र बंद कर लिये और अपने माता-पिता को स्मरण करने लगा जिन्हें वह बचपन से ही अत्यंत प्रेम करता आया है। प्रतनु को अपने माता-पिता दो अलग-अलग ध्येयों को पूरा करते हुए जान पड़ते थे। माता उसकी देह का पोषण करती थी और दिवस-रात्रि इसी उपक्रम में लगी रहती थी।

जबकि पिता उसके मस्तिष्क का पोषण करते रहते थे और सदैव उसे नयी-नयी जानकारियाँ देते रहते थे। प्रतनु की तर्क शक्ति, विलक्षण शिल्प प्रतिभा और सृष्टि सम्बन्धी ज्ञान उसके पिता की ही देन थी। आज जीवन के अंतिम क्षणों में उन दोनों की ही दयालु प्रतिमाओं का स्मरण हो आया प्रतनु को।

प्रतनु की देह पर झुकी हुई मादा पिशाच मोएट थी। वह अपने साथियों की दृष्टि बचाकर इस तरफ चली आयी थी। मोएट जानती थी कि टिमोला और उसके साथियों ने आज का सारा आयोजन पिशाचों का ध्यान इस नर मांस की तरफ से हटाने के लिये किया है।

पिछली बार भी ऐसा ही हुआ था। वह तो ठीक था कि मोएट ने टिमोला और उसके साथियों की चाल को समझ लिया था इसलिये वह ताड़-रस पीकर बेसुध नहीं हुई थी और उसने टिमोला के साथ बैठकर नर मांस का आस्वादन किया था। आज भी वह नर मांस के पास इसी आशा में आ बैठी थी कि जब सारे पिशाच बेसुध हो जायेंगे तब टिमोला अपने साथियों के साथ इधर आयेगा। तब वह भी उनके साथ नर-मांस प्राप्त कर सकेगी। नर-मांस को इतने निकट और अकेला देखकर वह स्वयं पर नियंत्रण नहीं रख सकी थी किंतु टिमोला के भय से उसका भक्षण न करके गंध से ही तृप्त होने का प्रयास कर रही थी।

जब काफी देर तक प्रतनु को अपनी देह पर दांतों का अनुभव नहीं हुआ तो उसने फिर से नेत्र खोले। मादा पिशाच अब भी उसके निकट बैठी हुई उसकी देह को सूंघ रही थी। प्रतनु को लगा कि जिस प्रकार सैंधव शिशु अपने भोजन की गंध प्राप्त कर आनंदित होते हैं, उसी प्रकार यह नर-भक्षी मादा उसे त्रयम्बक [8] के समान सूंघ-सूंघ कर तृप्ति का अनुभव कर रही है। संभवतः टिमोला के भय से वह प्रतनु की देह में दांत नहीं गड़ा रही है।

प्रतनु ने अपने नेत्र पूरी तरह खोल दिये। श्वान-मुखी मादा पिशाच की पूर्णतः निर्वस्त्र वीभत्स देह प्रतनु की देह पर पूरी तरह झुकी हुई थी। उसने अपनी दोनों हथेलियाँ प्रतनु के शरीर पर ही टिका रखी थीं जिससे उसके लटकते हुए वीभत्स स्तन प्रतनु के शरीर को स्पर्श कर रहे थे।

घृणा से झुरझुरी सी हो आई प्रतनु को। नर-मांस की गंध को पूरी तरह अपने फैंफड़ों में भर लेने के लिये मोएट की थूथन बार-बार विस्तृत और संकुचित हो रही थी। अपने फैंफड़ों को फुला-फुलाकर नरभक्षी मादा पूरी तरह तन्मय होकर प्रतनु की देह को सूंघ रही थी। उसकी समस्त चेतना उसकी घ्राण शक्ति में समा गयी प्रतीत होती थी।

जाने कितनी देर तक यह क्रम और चलता किंतु मोएट को कुछ पिशाचों ने प्रतनु के निकट बैठा हुआ देख लिया। वे अत्यंत अशुभ चीत्कार करते हुए मोएट की ओर दौड़े। मोएट को जाने क्या सूझा, उसने निकट पड़े तीक्ष्ण धार युक्त प्रस्तर से प्रतनु के हाथों का बंधन काट दिया और तेजी से चीत्कार करती हुई सघन वृक्षों के झुरमुट में विलीन हो गयी। मानो कहना चाह रही हो कि यदि मैं इसे नहीं खा सकूंगी तो तुम्हें भी नहीं खाने दूंगी। मोएट के चीत्कार का प्रत्युत्तर चीत्कार से ही देते हुए बीसियों पिशाच उसके पीछे दौड़े।

पिशाचों का चीत्कार सुनकर अग्नि के चारों ओर नाचते-झगड़ते पिशाच कुछ पलों के लिये स्थिर हो गये। उन्होंने समझा कि कोई वन्य पशु आ पहुँचा है। इसलिये वे सब तीक्ष्ण नोक युक्त काष्ठ दण्ड उठाये हुए उसी दिशा में दौड़े जिस दिशा में मादा नरभक्षी का पीछा करते हुए अन्य पिशाच दौड़े थे। अग्नि खड्ड के पास ताड़-रस पीकर बेसुध हुए पिशाच ही रह गये थे।

प्रतनु की देह का पोर-पोर पीड़ा से अवसन्न हो रहा था और उसमें इतनी शक्ति शेष नहीं रही थी कि वह इस अवसर का लाभ उठाये किंतु यदि वह इस समय चूक जाता है तो फिर शायद ही प्राण बचाने का अवसर मिले। व्यतीत होने वाले हर पल के साथ उसकी देह की शक्ति कम ही होनी थी।

यदि कुछ करना है तो अभी अन्यथा कभी नहीं। प्रतनु ने देखा कि पिशाचों की दृष्टि उस पर नहीं हैं। वे अपने ही गुल-गपाड़े में लगे हुए हैं। प्रतनु ने साहस किया और अपने पैरों के बंधन भी खोल डाले। लगातार बंधे रहने के कारण हाथों में शोथ [9] हो आई थी जिससे बंधन खोलने में काफी कठिनाई हुई उसे।

बंधनों से मुक्त होकर प्रतनु ने खड़े होने का उपक्रम किया किंतु पैरों में शोथ हो जाने के कारण खड़ा नहीं हो सका। वह फिर से धरती पर गिर पड़ा। कुछ पल वैसे ही पड़ा रहा। उसने फिर से खड़े होने का प्रयास किया किंतु परिणाम वही रहा। घण्टों तक बंधे रहने के कारण रक्त ने अवरुद्ध होकर पैरों की तरफ प्रवाह ही बंद कर दिया था। प्रतनु फिर से निराश होकर गिर गया। कुछ पलों तक वह घनघोर निराशा के पंक में डूबा हुआ निढाल होकर पड़ा रहा।

कैसी विचित्र स्थिति थी! मस्तिष्क था जो शरीर को बचाना चाहता था किंतु शरीर था कि स्वयं को बचाने के लिये किंचित् भी साथ नहीं दे रहा था। अकेला मस्तिष्क प्राण बचाने में असमर्थ था। प्राण-रक्षा के लिये आवश्यक था कि मस्तिष्क और शरीर दोनों का समन्वय हो किंतु इस स्थिति में मस्तिष्क को ही कोई उपाय करना था, उसी पर यह दायित्व आन पड़ा था कि वह शरीर के अवरोध को दूर करे। अचानक एक उपाय उसके मस्तिष्क में आया। वह खड़ा नहीं हो सकता, भाग नहीं सकता किंतु सर्प की तरह रेंग तो सकता है!

प्राण-रक्षा का यही एक मात्र उपाय बचा था। प्रतनु ने सर्प की तरह रेंगना आरंभ किया। यह उपाय भी सरल सिद्ध नहीं हुआ फिर भी किसी तरह वह कुहनियों के बल घिसटता हुआ रेंगने लगा। उसने पिशाचों के दौड़कर जाने की विपरीत दिशा पकड़ी। वह चाहता था कि पिशाचों के लौट आने से पहले किसी ऐसे स्थान तक पहुँच जाये जहाँ वह अपने आप को कुछ देर तक पिशाचों की दृष्टि से छिपा सके और बाद में पैरों में रक्त प्रवाह आरंभ हो जाने पर वहाँ से यथा शक्ति वेग से भाग जाये।

प्रतनु काफी देर तक घिसटता रहा। अचानक उसने अनुभव किया कि घिसटने के कारण हुए मांसपेशियों के संचालन से पैरों में रक्त संचार होने लगा है और पैरों की शक्ति लौट रही है। उसने फिर से खडे़ होने का प्रयास किया। इस बार वह खड़े होने में सफल हो गया। एक दो कदम डगमगाने के बाद वह चल पाने में भी सक्षम हो गया।

कुछ ही दूर चल पाया होगा प्रतनु कि उसे सामने से श्वानमुखी पिशाचों का समूह लौटता हुआ मिला। चार पिशाचों ने मोएट को कसकर पकड़ रखा था किंतु मोएट थी कि उनके वश में नहीं आ रही थी। इस कारण पिशाचों का सारा ध्यान मोएट की ही तरफ लगा हुआ था। प्रतनु ने पिशाचों से बचने के लिये वृक्षों की ओट ली।

चीत्कार करते हुए पिशाच उसके सामने से निकल गये। प्रतनु ने मन ही मन मादा पिशाच का धन्यवाद ज्ञापित किया जो उसके लिये वरदान सिद्ध हुई थी। पिशाचों की भूमि से दूर जाते हुए प्रतनु के मन से जैसे-जैसे प्राणों का भय दूर होता गया, भोजन और वस्त्रों की चिंता सताने लगी।

– अध्याय 30, मोहनजोदरो की नृत्यांगना, ऐतिहासिक उपन्यास, लेखक – डॉ. मोहनलाल गुप्ता


[1] मोहेन-जो-दड़ो और हड़प्पा से भी पुरानी सभ्यता दक्षिणी बिलोचिस्तान में अनेक स्थानों पर खोद निकाली गयी है जिसे कुल्ली सभ्यता कहते हैं। यहां पर आज तक ब्राहुई भाषा बोली जाती है, जो कि द्रविड़ भाषा परिवार से है। यूनानियों ने इसे गैड्रोसिया अर्थात काले मानवों का देश कहा है। संभव है कि इन लोगों ने ब्राहुई भाषा बाद में सीखी हो।

[2] भैंसा।

[3] सूअर।

[4] खरगोश।

[5] ऋग्वेद में यह गीत ऋचा के रूप में इस प्रकार से मिलता है- अगृ आ याहि वीतये गृणानो हव्यदातये नि होता सत्सि वर्हिषि ( 6. 16. 10)

[6] किसी भी वस्तु का मन में प्रकट होने वाला स्वरूप।

[7] गायन के समय प्रयुक्त होने वाले निरर्थक अक्षर जिनका उपयोग गायन का सौंदर्य बढ़ाने के लिये होता है।

[8] खरबूजे जैसा एक फल जिस पर तीन धारियाँ बनी हुई होती हैं।

[9] सूजन।

अश्वारोहियों से भेंट (31)

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अश्वारोहियों से भेंट

पिशाचों के बीच से पूर्णतः निर्वस्त्र अवस्था में प्राण बचाकर भागे प्रतनु की अश्वारोहियों से भेंट हुई तो प्रतनु को अपने प्राण फिर से संकट में प्रतीत होने लगे।

बाल-बाल बचा प्रतनु। आर्यों का एक अश्वारोही दल काफी तीव्र गति से घोड़े फैंकता हुआ उन्हीं सघन वृक्षों के नीचे आकर रुका जिनकी छाया में प्रतनु विश्राम कर रहा था। वह तो ठीक था कि प्रतनु ने कुछ दूर से ही उन्हें देख लिया था। संख्या में वे छः-सात थे।

तीव्र वेग से संचालित होने के कारण उनके अश्वों के क्षुर मृदा पर प्रचण्ड आघात करते हुए चले आ रहे थे। क्षुरों के आघात से प्रकम्पित हुई मृदा आकाश में विलम्बित होकर एक बड़ा सा गोला बना रही थी। यह गोला दूर से ही उनके चले आने की सूचना दे रहा था। सूर्य रश्मियों का स्पर्श पाकर रह-रह कर चमकते हुए उनके शिरस्त्राण और अस्त्र-शस्त्र धूलि के मोटे आवरण में से भी अपनी विकरालता का परिचय दे रहे थे।

प्रतनु के पास इतना समय नहीं था कि वहाँ से भाग खड़ा होता। ऐसा नहीं था कि पिशाचों द्वारा पकड़े जाने के बाद उसका आत्मविश्वास हिल गया था और अब वह अपरिचित व्यक्तियों का सामना करने में असमर्थ था किंतु इस निर्वसन अवस्था में ग्लानिवश वह किसी के समक्ष उपस्थित होने की स्थिति में नहीं था।

बुद्धि आपात् काल में ऐसे-ऐसे उपाय सुझा देती है जिनके बारे में प्रतनु जैसा व्यक्ति कभी सोच भी नहीं सकता। वह एक नातिदीर्घ [1] वृक्ष पर चढ़ गया। निर्वस्त्र प्रतनु स्वयं को पूरी तरह असहाय पा रहा था। उसे पिशाचों के चंगुल से निकले हुए तीन दिन हो चले थे। उदर पूर्ति हेतु वृक्षों की उदारता फलों के रूप में तथा नदियों की उदारता जल के रूप में उपलब्ध थी किंतु वस्त्र का प्रबंध अब तक नहीं हो पाया था। प्रतनु की इच्छा हुई कि वह इन आर्य अश्वारोहियों के समक्ष उपस्थित होकर उनसे वस्त्र की याचना करे।

याचना! इस विचार से ही सन्न रह गया प्रतनु। याचना का विचार उसके मस्तिष्क में आया कैसे! ठीक है कि प्रतनु बिना पण्य के कर्पास के वस्त्रों का प्रबंध नहीं कर सकता किंतु यदि उसके पास पण्य होते तो भी तो वह किस पणि के पास वस्त्र क्रय करने जाता! वस्त्रों का प्रबंध तो उसे बिना पण्य और बिना याचना के ही करना था। ऐसा ही उसने निश्चय किया था।

प्रतनु ने सोचा था कि किसी पशु को मारकर चर्म प्राप्त कर लेगा। यद्यपि अपने जीवन में उसने किसी पशु का वध नहीं किया था, न ही वह जानता था कि किसी पशु का वध कर पाना और उससे चर्म प्राप्त कर पाना उसके जैसे व्यक्ति के लिये उतना सहज नहीं है जितना वह समझ रहा है तथापि ऐसा विचारने के अतिरिक्त उसके पास उपाय ही क्या था!

लाख चेष्टा करके भी प्रतनु न तो किसी पशु को पकड़ पाया था और न किसी पशु का वध कर पाया था। जब भी वह किसी पशु को देखता तो उसके वध के लिये प्रस्तर उठाता किंतु प्रस्तर का प्रहार करने से पहले ही उसके हाथ कांपने लगते और वह पशु को अपनी पकड़ से दूर जाने तक देखता ही रह जाता। पशु इतने उदार नहीं थे कि अपना चर्म उतार कर स्वयं प्रतनु को दे देते।

पत्तों की ओट से प्रतनु ने देखा कि आर्य अश्वारोहियों ने वल्गायें त्यागकर अश्वों को वृक्षों से बांध दिया। कृष्णायस से बने शिरस्त्राण और भाले वृक्षों के समीप रखकर समस्त आर्य सरिता के जल में उतर पड़े। सरिता को स्पर्श करने से पूर्व उन्होंने वरुण को नमन किया और सरिता का जल अपने नेत्रों और हृदय से लगाया। भली भांति निमज्जित होने के पश्चात् वे सूर्य को अघ्र्य देकर फिर से उन्हीं वृक्षों के नीचे आ बैठे और अश्वों की पीठ पर लदा भुना हुआ यव और मधु निकाल कर भोजन का उपक्रम करने लगे।

भुने हुए यव की गंध और मधु की उपस्थिति देखकर प्रतनु के मुंह में पानी भर आया। प्रतनु को लगा जाने कितने युग व्यतीत हो चले थे भुने हुए यव और मधु ग्रहण किये हुए। प्रतनु ने देखा कि भोजन सामग्री अपने समक्ष रखकर समस्त आर्य अश्वारोही पूर्व दिशा में मुख करके बैठ गये हैं और दोनों हाथ जोड़कर एवं नेत्र बंद करके प्रार्थना कर रहे हैं।

यद्यपि वह आर्यों को मन ही मन अपना शत्रु मानता आया है किंतु आर्यों के मंत्र अच्छे लगे उसे। सधे हुए शब्द, सधी हुई वाणी और सधे हुए भाव। भले ही सैंधवों ने कितनी ही अच्छी प्रार्थनायें बना ली हों किंतु आर्यों के मंत्रों का सा माधुर्य उनमें नहीं।

   – ‘ऊँ शन्नो देवीर भिष्टयेट्टापो भवन्तु पीतये। शंयोरभिस्रवन्तु नः।’ [2] आर्य सुरथ ने जल हाथ में लेकर उसे धरित्री पर छोड़ दिया।

प्रतनु की उपस्थिति से अनभिज्ञ आर्य भोजन ग्रहण करने लगे। उन्हें ज्ञात नहीं था कि कई दिनों से भूखा और निर्वस्त्र प्रतनु टकटकी बांध कर उन्हें देख रहा है अन्यथा पूर्णानन्द के अभिलाषी आर्य पथिक, क्षुधित और पीड़ित प्रतनु को आनंदित किये बिना स्वयं भोजन ग्रहण नहीं करते।

 प्रतनु ने देखा कि आर्य अश्वारोहियों के मुख मण्डल पर सामान्यतः दिखाई देने वाले दर्प के स्थान पर चिंता व्याप्त है।

  – ‘आर्य! मार्ग की विश्रांति के कारण भोजन में तृप्ति देने की क्षमता कई गुणा बढ़ क्यों जाती है ?’ आर्य सुनील ने राजन् सुरथ को सम्बोधित किया।

  – ‘क्योंकि तृप्ति देने की क्षमता भोजन में नहीं अतृप्ति के भाव में होती है।’ राजन् सुरथ ने उत्तर दिया।

  – ‘इसका अर्थ यह हुआ कि यात्रा से अतृप्ति का भाव उत्पन्न होता है! ‘

  – ‘यात्रा से नहीं, यात्रा से उत्पन्न हुई विश्रांति से अतृप्ति का भाव उत्पन्न होता है।

  – ‘इसका अर्थ तो यह भी हुआ कि अभाव में ही भाव का सर्जन होता है।’

  – ‘निःसंदेह! अभाव का अनुभव नहीं हो तो भाव का निर्माण कैसे होगा! किंतु भोजन के समय गरिष्ठ वार्तालाप अनुचित है आर्य।’ राजन् सुरथ ने आर्य सुनील को टोका।

राजन् सुरथ की वर्जना पाकर समस्त आर्य अश्वारोही मौन धारण करके यव और मधु ग्रहण करने लगे। भोजन समाप्ति पर उद्विग्न आर्य सुनील ने पुनः राजन् सुरथ से प्रश्न किया। आर्य सुनील के लिये अधिक समय तक मौन रह पाना संभव नहीं होता- ‘राजन्! जिस प्रकार असुरों ने सोम का हरण कर लिया है, क्या एक दिन वे यव, शालि और मधु का भी हरण कर लेंगे ?’

  – ‘असुरों को रोका नहीं गया तो वे किसी भी सीमा तक जाकर कोई भी अपकृत्य कर सकते हैं आर्य।’ राजन् सुरथ ने उत्तर दिया।

  – ‘असुरों को रोकने के समस्त प्रयास निष्फल सिद्ध हुए हैं। ऐसा क्यों है ?’

  – ‘क्योंकि हमने केवल आसुरी शक्तियों को दमित करना चाहा है, आसुरि प्रवृत्तियों को नहीं।’

  – ‘आसुरि शक्तियों का दमन हम अपने अस्त्र-शस्त्रों से कर सकते हैं किंतु आसुरि प्रवृत्तियों का दमन आर्यों द्वारा किया जाना कैसे संभव है ? चित्त-वृत्ति और स्वभाव तो दैवकृत होते हैं।’ आर्य सुनील के लिये आर्य सुरथ के उत्तर उलझा देने वाले ही होते हैं।

  – ‘आसुरि प्रवृत्तियों के दमन के लिये आवश्यक है असुरों में श्रेष्ठ भावों और श्रेष्ठ प्रवृत्तियों का संचरण करना। हमें आर्यों की सनातन शुचि और विद्या का प्रसार असुरों में भी करना होगा। इसके लिये उनमें ऋषि परम्परा आरंभ करनी होगी।’

  – ‘असुरों में ऋषि परम्परा आरंभ करने के प्रयास महर्षि उषनस् [3] तथा ऋचीक और्व [4] ने भी तो किये थे किंतु श्रेष्ठ ऋषि होने पर भी वे असुरों को कोई श्रेष्ठ परम्परा नहीं दे सके। उसके बाद आर्यों को अपने प्रयास बन्द कर देने पड़े।’ आर्य सुनील ने कहा।

  – ‘कोई भी अकेला प्रयास इस दिशा में पर्याप्त नहीं होगा। आसुरि शक्तियों को शमित करने और आसुरि प्रवृत्तियों को दमित करने के प्रयास साथ-साथ चलाने होंगे। यह एक सतत और दीर्घ काल तक चलने वाली प्रक्रिया है। इसके लिये ही तो हमने आर्यों को संगठित करने का अभियान आरंभ किया है।’ आर्य सुरथ ने प्रत्युत्तर दिया।

  – ‘आर्यों को संगठित करने की आपकी योजना तो मुझे अच्छी लगती है किंतु उसके सफल होने में संदेह दिखायी देता है।’ आर्य सुनील ने आशंका व्यक्त की।

  – ‘ऐसा क्यों आर्य ?’ आर्य सुरथ को किंचित आश्चर्य हुआ। ऐसा आज तक नहीं हुआ था कि आर्य सुनील ने स्पष्ट रूप से उनकी योजना के विफल हो जाने की आशंका व्यक्त की हो।

  – ‘हम लोग जिस किसी भी आर्य-जन में आपकी योजना को लेकर गये हैं, वहाँ किसी भी जन से हमें विशेष समर्थन प्राप्त नहीं हुआ। समस्त आर्य-जन संगठन के विचार का तो स्वागत करते हैं किंतु वे अपनी-अपनी स्वतंत्रता को लेकर चिंतित हैं।’

  – ‘प्रत्येक नये कार्य के आरंभ में कुछ न कुछ कठिनाइयाँ आती ही हैं। यदि हम इन प्रारंभिक कठिनाइयों पर विजय प्राप्त कर लें तो आगे के मार्ग स्वयं ही खुल जायेंगे।’ राजन् सुरथ ने आर्य वीरों को सांत्वना देते हुए कहा।

  – ‘यदि आर्य जनों ने यही हठ पकड़े रखा तो हमारे समक्ष और कौन सा उपाय रह जायेगा ?’ आर्य अतिरथ ने पूछा।’

  – ‘यदि उन्होंने अपना हठ पकड़े रखा तो उन्हें बलपूर्वक संगठित करना होगा ………।’ राजन् सुरथ ने दृढ़ता पूर्वक उत्तर दिया किंतु वे अपनी बात पूरी करते, उससे पहले ही आर्य अतिरथ बोल पड़े- ‘ यदि अंत में बल का ही उपयोग करना है तो अभी क्यों नहीं! समय व्यर्थ करने का क्या लाभ ?’

आर्य अतिरथ योजना बनाने और उसके क्रियान्वयन में समय व्यर्थ करने में कम विश्वास करते हैं, तत्काल कार्यवाही करने में उनका अधिक विश्वास है। उनका मानना है कि आर्यों ने असुरों की समस्या को व्यर्थ ही इतना बढ़ा-चढ़ा हुआ मान रखा है। यदि असुरों के विरुद्ध तत्काल सैन्य अभियान छेड़ दिया जाये तो असुरों को सहज में ही नष्ट किया जा सकता है।

आर्य सुरथ ने आर्य अतिरथ की बात का कोई उत्तर नहीं दिया। उनका ध्यान कहीं और चला गया था। इस समय वे धरती पर रखे जल पात्र में बनती परछाईयों को सचेत होकर देख रहे थे। शीघ्र ही उन्हें विश्वास हो गया कि नाति-दीर्घ वृक्ष पर पत्तों के बीच कोई वानर बैठा है और टकटकी बांध कर उन्हें देखे जा रहा है।

आर्य सुरथ ने दृष्टि ऊपर उठाई। थोड़े से प्रयास के बाद उन्होंने पेड़ पर चढ़े हुए प्रतनु को देख लिया। वानर के स्थान पर निर्वसन मानव को घने पत्तों के बीच छिपा हुआ देखकर आश्चर्य हुआ उन्हें। कौन हो सकता है यह! कहीं कोई असुर या पिशाच तो नहीं! उन्होंने भाला हाथ में लेकर, प्रतनु को नीचे आने के लिये ललकारा।

प्रतनु को लगा कि यदि वह तत्काल वृक्ष से नीचे नहीं उतरा तो निश्चित रूप से आर्य-दल का मुखिया भाले का प्रहार करेगा। वह चुपचाप नीचे उतरने लगा। वृक्ष से नीचे उतरते हुए निर्वसन प्रतनु की ग्लानि का कोई पार नहीं था। जिन प्राणियों ने उसे निर्वसन किया था वह तो स्वयं भी निर्वसन थे, उनमें देह-गोपन का कोई भाव नहीं था।

वे असभ्य और बर्बर थे तथा उनसे प्रतनु की कोई शत्रुता भी नहीं थी किंतु इस समय जिन व्यक्तियों के समक्ष उसे निर्वसन उपस्थित होना पड़ रहा है वे स्वयं निर्वसन नहीं हैं। इनमें देह के गोपन का भाव पूरी तरह परिष्कृत है। इतना ही नहीं, इन्हें तो वह अपना शत्रु मानता आया है। शत्रु के समक्ष इस हेय अवस्था में! प्रतनु के शोक का पार न था। 

वृक्ष से उतरते ही प्रतनु को आर्यों ने अपने तीक्ष्ण शस्त्रों की परिधि में ले लिया।

  – ‘कौन है तू ?’ आर्य सुरथ ने प्रश्न किया।

  – ‘एक पथिक! ‘

  – ‘असुर है ?’

  – ‘सैंधव हूँ।’

  – ‘निर्वस्त्र और भयभीत क्यों है ?’

  – ‘निर्वस्त्र अवश्य हूँ, भयभीत नहीं।’

  – ‘तो यही बता निर्वस्त्र क्यों है ?’

  – ‘परिस्थिति वश।’

  – ‘कैसी परिस्थिति ?’

  – ‘पथ भ्रमित हो पिशाचों की भूमि में पहुँच गया था, उन्हीं पिशाचों ने वस्त्र नष्ट कर दिये। किसी तरह प्राण सुरक्षित लेकर आया हूँ।’

  – ‘वृक्ष पर क्यों चढ़ा हुआ था।’ पथिक को सभ्य समाज से सम्बन्धित जानकर राजन् सुरथ ने उसे वस्त्र प्रदान किया।

  – ‘अपनी हीन अवस्था को शत्रु से छिपाने के लिये।’ प्रतनु ने राजन् सुरथ द्वारा दिया गया वस्त्र सावधानी से देह पर लपेटते हुए कहा। कर्पास निर्मित साधारणवस्त्र को पाकर उसे ऐसा अनुभव हो रहा था मानो बहुत बड़ी सम्पदा हाथ लग गयी हो।

  – ‘शत्रु!’ आर्य सुनील ने जिज्ञासा व्यक्त की।

  – ‘क्या तुम्हारा कोई शत्रु यहाँ भी उपस्थित है ?’ आर्य सुरथ ने सतर्क होते हुए पूछा।

  – ‘हाँ।’

  – ‘कौन है तुम्हारा शत्रु ?

  – ‘आर्य सैंधवों के शत्रु नही हैं क्या ?’

  – ‘आर्यों और सैंधवों के मध्य कोई शत्रुता नही है। आर्य तो किसी के शत्रु नहीं हैं।’

  – ‘क्यों ? क्या आर्य असुरों के शत्रु नहीं हैं ?’

  – ‘तुम्हारी ही बात मान ली जाये तो भी तुम्हें इससे क्या ? तुम तो असुर नहीं हो! ‘

  – ‘आर्य असुरों के शत्रु हैं और सैंधव असुरों के मित्र हैं। इसी से आर्य सैंधवों के शत्रु हैं।’

  – ‘मित्र का शत्रु स्वयं का शत्रु समझा जाये यह व्यक्तिगत व्यवहार में तो उचित है किंतु जब प्रश्न दो प्रजाओं का हो तो यह किंचित् मात्र भी आवश्यक नहीं कि मित्र का शत्रु, अपना भी शत्रु हो।’

  – ‘क्या आर्यों ने सरस्वती के तट पर स्थित सैंधवों के प्राचीन पुर नष्ट नहीं किये ?’

  – ‘तुम मगन [5] की बात कर रहे हो! ‘

  – ‘हाँ। मैं कालीबंगा की ही बात कर रहा हूँ।’

  – ‘कालीबंगा क्या ?’

  – ‘जिसे तुम मगन कहते हो, वह हमारा कालीबंगा था।’

  – ‘क्या तुम मगन के निवासी हो ?’

  – ‘नहीं। मेरे माता-पिता वहाँ के निवासी थे। मेरा जन्म तो शर्करा के तट पर हुआ।’

शर्करा! विचार में पड़ गये आर्य सुरथ। उन्होंने सुना था कि सरस्वती की एक क्षीण शाखा द्रुमकुल्य में विलीन होने से पूर्व शर्करा के नाम से विख्यात है। उसके तट पर ईक्षु के विशाल क्षेत्र हैं। असुरगण उसी शर्करा को हाकरा कहते हैं।

  – ‘देखो युवक! हो सकता है तुम्हारा कथन सही हो किंतु आर्यों और द्रविड़ों के मध्य यदि अतीत में कोई विवाद अथवा यु़द्ध हुआ है तो उसका अर्थ यह कदापि नहीं हो जाता कि प्रत्येक आर्य और प्रत्येक सैंधव भी व्यक्तिशः एक दूसरे के अनिवार्य शत्रु हो गये हैं। हमारी और तुम्हारी कोई शत्रुता नहीं। तुम चाहो तो हम मित्र हो सकते हैं।’

  – ‘यदि मैं अपने पुर और अपनी प्रजा के शत्रुओं से मित्रता स्थापित करूंगा तो मैं पुर और प्रजा से विश्वासघात करूंगा।’

  – ‘विश्वासघात तो उस अवस्था में होता है जब तुम शत्रु से मिलकर अपने पुर और प्रजा को हानि पहुँचाओ। हमसे तुम्हें अथवा तुम्हारे पुर और प्रजा को कोई हानि नहीं होगी। 

प्रतनु को लगा कि आर्यों का मुखिया सही कह रहा है। इस समय आर्यों द्वारा शत्रुता का कोई कृत्य नहीं किया जा रहा है। इस समय वे शत्रु नहीं है अपितु मित्रता के अभिलाषी हैं।

आर्य सुरथ ने अनुभव किया कि यह जो कोई भी हो किंतु आर्यों को हानि पहुँचाने की स्थिति में नहीं है अपितु विपन्न अवस्था में होने के कारण सहायता प्राप्त करने का अधिकारी है। उन्होंने प्रतनु को एक और वस्त्र तथा भोजन प्रदान किया। प्रतनु को भी उनसे वस्त्र और भोजन प्राप्त करना अनुचित नहीं लगा। यदि अनुचित लगा होता तो भी आपात्काल में प्रतनु के समक्ष इसके अतिरिक्त कोई उपाय नहीं था।

आर्यों ने प्रतनु की यात्रा का विवरण आदि से अंत तक पूरा सुना। उन्हें यह सैंधव युवक साहसी और बुद्धिमान के साथ-साथ प्रशंसनीय भी जान पड़ा। साहस और बुद्धि के बल पर ही उसने शर्करा के तट से मेलुह्ह [6] तथा नागलोक तक की यात्रा की थी। साहस के बल पर ही उसने गरुड़ों के विरुद्ध नागों की सहायता की थी। इसी अदम्य साहस के बल पर ही वह अपने प्राणों को सुरक्षित लेकर पिशाचों के चंगुल से भाग निकलने में सफल हुआ था।

इस विपन्न अवस्था में भी उसका विवेक पूर्णतः जाग्रत था और वह सैंधवों के पुजारी किलात से प्रतिकार लेने के लिये मेलुह्ह जा रहा था। आर्य प्रजा की ही भांति सैंधवों में भी आत्माभिमान की इतनी उच्च परम्परा है यह जानकर आर्यों को संतोष  हुआ था किंतु साथ ही उन्हें यह जानकर कष्ट भी हुआ कि देव पूजन के नाम पर सैंधवों में इतनी विकृति उपस्थित है।

बहुत समय तक आर्य दल सैंधव प्रतनु से वार्तालाप करता रहा। विचित्र नागलोक का विवरण जानकर आर्यों को सुखद आश्चर्य हुआ। उन्हें यह ज्ञात था कि पश्चिमोत्तर की पर्वत शृंखलाओं में आर्यों से ही निकली दो शाखाओं-नागों और गरुड़ों की बस्तियाँ हैं जिनमें दीर्घ काल से संघर्ष होता आया हैं।

ठीक वैसा ही जैसा आर्यों और असुरों में। नाग अपने विज्ञान के बल पर और गरुड़ अपनी शक्ति के बल पर समरांगण में एक दूसरे के समतुल्य हो जाते हैं। इसी कारण उनमें चिरकाल से कोई परिणामकारी युद्ध नहीं हो पाता। राजन् सुरथ को एक बार पुनः पुष्टि हो गयी कि अब भी वे दोनों प्रजायें संघर्ष रत हैं।

आर्य सुरथ ने प्रस्ताव किया कि यदि प्रतनु चाहे तो आर्यों का एक अश्व उसे दिया जा सकता है किंतु प्रतनु ने आर्यों से और सहायता प्राप्त करने से विनम्रता पूर्वक अस्वीकार कर दिया।

जब प्रतनु अश्वारोहियों से भेंट पूरी करके अपने गंतव्य के लिये पुनः आरंभ हुआ तो उसके मन में राजन् सुरथ के प्रति विनम्रता एवं सम्मान का भाव जाग्रत हो चुका था। विपन्न अवस्था में पड़े अपरिचत सैंधव पथिक के लिये इतना उदार भाव रखने वाले आर्य निश्चित रूप से शत्रुता करने के योग्य नहीं है।

– अध्याय 31, मोहनजोदरो की नृत्यांगना, ऐतिहासिक उपन्यास, लेखक – डॉ. मोहनलाल गुप्ता


[1] कम ऊँचा।

[2] सबको प्रकाशित और सबको आनंदित करने वाले सर्वव्यापी ईश्वर ! मनोवांछित आनन्द और पूर्णानन्द देने के लिये आप हमारे लिये कल्याणकारी हों। हे परमेश्वर! आप हम पर सुख की सदा वृष्टि करें।

[3] शुक्राचार्य ।

[4] शुक्राचार्य की वंश परंपरा में और्व ऋषि हुए। और्व के बहुत बाद में इसी वंश में च्यवन ऋषि हुए। इसी वंश में आगे चलकर जमदग्नि तथा परशुराम आदि श्रेष्ठ ऋषि हुए। मिश्र के पिरामिड से प्राप्त एक मुद्रा पर ऋषि च्यवन की जानकरी मिली है। अनुमानतः 1000 ईस्वी पूर्व के काल का कांसे का बना एक तरकश ईरान में मिला है जिसपर वरुण, मित्र, इंद्र, पर्जन्य आदि वैदिक देवताओं से सम्बन्धित गाथा को व्यक्त किया गया है। वैदिक ऋषि च्यवन का जीवनवृत्तांत भी इस तूणीर पर उत्कीर्ण है।

[5] मेसोपोटामिया के विभिन्न स्थलों से प्राप्त कीलाक्षर लिपि युक्त मृत्पट्टिकाओं में मगन से ताम्बा मंगवाये जाने का उल्लेख है। सैंधव सभ्यता का कालीबंगा नगर राजस्थान के खेतड़ी ताम्र क्षेत्र के अत्यंत निकट था अतः पर्याप्त संभव है कि उस काल में कालीबंगा के धातुकर्मी खेतड़ी से ताम्बा प्राप्त कर उसकी विविध सामग्री तैयार करके अन्य सभ्यताओं को निर्यात करते हों। इसी कारण मगन का साम्य कालीबंगा से किया गया है।

[6] मोहेन-जो-दड़ो।

पुनः मोहेन-जो-दड़ो में (32)

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पुनः मोहेन-जो-दड़ो - www.bharatkaitihas.com
संसार की सबसे प्राचीन धातु निर्मित अश्वारोही प्रतिमा

मोहेन-जो-दड़ो से प्रतनु के निष्कासन की अवधि समाप्त होने में अभी कुछ दिन शेष थे। नियमानुसार वह दो वर्ष से पूर्व पुनः मोहेन-जो-दड़ो में प्रवेश नहीं कर सकता था किंतु उसमें इतना धैर्य नहीं रह गया था कि वह नगर से बाहर रुककर अवधि पूर्ण होने की प्रतीक्षा करे।

जिस समय प्रतनु मोहेन-जो-दड़ो के नगरद्वार पर पहुँचा, वरुण सिंधु तट पर नहीं पहुँचा था किंतु एक-दो दिन में ही उसके सिंधु तट पर पहुँचने की संभावाना थी। वरुण के आगमन पर ही मोहेन-जो-दड़ो के पशुपति महालय में वार्षिक महोत्सव मनाया जाता है जिसमें मातृदेवी को गर्भवती करने के लिये चन्द्रवृषभ नृत्य का आयोजन होता है।

इस समय मोहेन-जो-दड़ो में उसी वार्षिकोत्सव की तैयारियाँ चल रही थीं। दो वर्ष पूर्व के अनेक दृश्य प्रतनु के स्मृति पटल पर सजीव हो उठे। दो वर्ष पूर्व की भांति इस वर्ष भी अनेक सैंधव पुरों से सैंधवों के गुल्म पशुपति महालय के वार्षिक समारोह में भाग लेने के लिये मोहेन-जो-दड़ो पहुँच चुके थे।

मोहेन-जो-दड़ो से प्रतनु के निष्कासन की अवधि समाप्त होने में अभी कुछ दिन शेष थे। नियमानुसार वह दो वर्ष से पूर्व मोहेन-जो-दड़ो में प्रवेश नहीं कर सकता था किंतु उसमें इतना धैर्य नहीं रह गया था कि वह नगर से बाहर रुककर अवधि पूर्ण होने की प्रतीक्षा करे। वह जानना चाहता है कि रोमा कैसी है! इस बीच कुछ अप्रत्याशित तो नहीं घटित हो गया है! अतः उसने पणि का छद्म वेश धारण किया और छद्म नाम से ही नगर में प्रवेश किया।

रोमा तक पहुँचने के लिये प्रतनु को विशेष प्रयास नहीं करना पड़ा। वृद्धा दासी वश्ती उसे पण्य-वीथि [1] में विचरण करती हुई मिल गई। जब उसने वृद्धा वश्ती का अभिवादन किया तो वश्ती पणिवेशधारी प्रतनु को पहचान नहीं सकी। एकांत पाकर प्रतनु ने उसे अपना परिचय दिया।

दो वर्ष पुरानी घटनायें वृद्धा वश्ती के मानस पटल पर सजीव हो उठीं। वश्ती ने मोहेन-जो-दड़ो में व्यतीत हुए दो वर्षों के समस्त समाचार प्रतनु को कह सुनाये। प्रतनु को यह जानकर संतोष हुआ कि रोमा न केवल सुरक्षित है अपितु प्रतनु की ही प्रतीक्षा कर रही है।

वश्ती ने बताया कि किलात और रोमा के बीच का द्वन्द्व अब काफी उग्र रूप ले चुका है। किलात ने रोमा को चेतावनी दी है कि यदि वह किलात के समक्ष समर्पण नहीं करती है तो उसे धर्मद्रोही होने का दण्ड भुगतने के लिये तैयार रहना चाहिये। रोमा ने किलात को वचन दिया है कि वह पशुपति के वार्षिक समारोह के दिन चन्द्रवृषभ आयोजन के पश्चात् किलात के समक्ष समर्पण करेगी।

किलात यह जानकर धैर्य धारण किये हुए है कि पशुपति के वार्षिक समारोह में अब कुछ दिन ही रहे हैं किंतु जैसे-जैसे दिवस व्यतीत होते जाते हैं, रोमा की उद्विग्नता बढ़ती जाती है। उसे विश्वास है कि प्रतनु पशुपति के वार्षिक समारोह तक लौट आयेगा और किलात से रोमा की मुक्ति का कोई न कोई उपाय ढूंढ निकालेगा।

वश्ती की बात सुनकर प्रतनु की शिराओं में रक्त की गति बढ़ गई। उसे लगा कि शिराओं का रक्त न केवल शिराओं से हृदयस्थल तक तीव्र गति से भाग रहा है अपितु उतनी ही तीव्रता से हृदय स्थल से शिराओं तक भी लौट रहा है। अब तक तो सब कुछ अस्पष्ट और धुंधला सा था। लक्ष्य के स्पष्ट नहीं होने से उत्साह भी मृतप्रायः था। अब लक्ष्य स्पष्ट है किंतु लक्ष्य वेधन का उपकरण! वह कहाँ है ?

 प्रतनु जानता है कि लक्ष्य पूर्ति हेतु आशा और उत्साह ही सर्वाधिक वांछित उपकरण हैं। इन्हीं के बल पर वह अब तक के समस्त संघर्ष का परिणाम अपने पक्ष में करता आया है किंतु यह कैसी विकट परिस्थिति है! लक्ष्य समक्ष है, लक्ष्य वेधन हेतु आशा एवं उत्साह रूपी उपकरण भी उपलब्ध है किंतु समय की अत्यल्पता संघर्ष के उपकरण को भोथरा बना रही है।

प्रतनु के आग्रह पर वृद्धा वश्ती पर्याप्त रात्रि व्यतीत हो जाने पर नृत्यांगना रोमा को लेकर उसी भवन में पहुँची जिसमें वह रोमा को दो वर्ष पहले लेकर आई थी। कक्ष में पहुँच कर जब रोमा ने श्वेत कर्पास से निर्मित अंशुक से स्वयं को प्रकट किया तो धक् से रह गया प्रतनु। क्या दो वर्ष सचमुच ही व्यतीत हो गये!

दो वर्ष! कम नहीं होता दो वर्ष का अंतराल। विशेषकर तब जबकि परिचय का अवसर केवल दो घड़ी ही रहा हो। प्रतनु को यह अंतराल दो वर्षों की अवधि से युक्त न लगकर कई युगों की अवधि से आपूरित लगा। क्या-क्या नहीं देखा उसने इन दो वर्षों में! मोहेन-जो-दड़ो से नागों के मायावी विवर तक की यात्रा।

रानी मृगमंदा के अटपटे प्रश्न। रानी मृगमंदा, निर्ऋति तथा हिन्तालिका की मिश्रित प्रतिमा का रहस्य-भंग। रानी मृगमंदा, निर्ऋति तथा हिन्तालिका का सानिध्य। नाग कुमारियों द्वारा तूर्ण का आयोजन और उसमें रानी मृगमंदा द्वारा आघाटि वादन के समय चिच्चिक और वृषारव के परस्पर संवाद के माध्यम से प्रणय निवेदन।

नाग-गरुड़ युद्ध के पश्चात् रानी मृगमंदा द्वारा गुल्मपतियों के समक्ष प्रतनु से विवाह का प्रस्ताव और प्रतनु द्वारा अस्वीकार। रानी मृगमंदा का समर्पण। नागों के विवर से पिशाचों की भूमि और वहाँ मुखिया टिमोला से लेकर मादा पिशाच मोएट। पशुचर्म की आशा में पशुओं पर प्रहार करने के लिये प्रतनु के हाथों में थमे प्रस्तर खण्ड। आर्य अश्वारोहियों से भेंट। समस्त दृश्य प्रतनु के मस्तिष्क में चित्र के सदृश उभर आये।

इन समस्त उपक्रमों में पूरी तरह निरत रहते हुए भी प्रतनु के समक्ष एक ही लक्ष्य रहा है- निर्वासन अवधि के उस पार खड़ी रोमा। रोमा ही उसका एक मात्र लक्ष्य रही है। रोमा के लिये ही वह शर्करा से चलकर पहली बार मोहेन-जो-दड़ो आया था और आज वह पुनः उसी की आशा में दुबारा आया है।

कहाँ-कहाँ भटकता नहीं फिरा है वह रोमा के लिये! जब कभी वह रानी मृगमंदा, निर्ऋति अथवा हिन्तालिका के निकट होता था, उसे रोमा का स्मरण हो आता था। यहाँ तक कि जब मादा पिशाच मोएट ने उसे बंधनमुक्त किया था उस समय भी उसे रोमा का ही स्मरण हो आया था।

आज जबकि पशुपति महालय की प्रधान नृत्यांगना, सैंधव सभ्यता की अनिंद्य-अप्रतिम सुंदरी, सर्व-भावेन सामथ्र्यवान महादेवी रोमा उसके सामने है, उसे रानी मृगमंदा के साथ व्यतीत हुए क्षणों का स्मरण हो रहा है। क्यों होता है ऐसा ? प्रतनु कुछ समझ नहीं पाता।

उसे रोमा द्वारा दो वर्ष पूर्व की भेंट में कहे गये शब्दों का स्मरण हो आया- ‘जहाँ रोग जन्म लेता है वहीं उसकी औषधि भी होती है। प्रकृति का यही नियम है।’ यहीं, इसी रोमा को देखकर तो उसके हृदय में अनुराग का रोग उत्पन्न हुआ था। निश्चय ही रोमा ही उस रोग की औषधि है।

विगत भेंट का एक-एक दृश्य स्मरण हो आया प्रतनु को। रोमा की इसी बात पर तो प्रतनु ने अपने हृदय में नृत्यांगना के प्रति नवीन भाव के संचरण का अनुभव किया था कि जहाँ रोग जन्म लेता है वहीं उसकी औषधि भी होती है। प्रतनु ने यह भी अनुभव किया था कि उस दिन रोमा के लिये उसके मन में उत्पन्न हुआ आकर्षण नितान्त काल्पनिक आकर्षण नहीं था, जो उसके हृदय में मोहेन-जो-दड़ो आने से पहले केवल रोमा के नृत्य और सौंदर्य की ख्याति को सुनकर उपजा था।

वह रूप जनित आकर्षण भी नहीं था जो पशुपति उत्सव में रोमा को देखकर उपजा था। वह तो कोई और ही नवीन भाव था। प्रतनु ने अनुभव किया था कि वह संभवतः आत्मीयता का भाव था जो प्रत्युपकार की भावना से उपजा था।

नहीं-नहीं! गलत सोचा था प्रतनु ने। वह आत्मीयता का भाव तो था किंतु नितान्त प्रत्युपकार की भावना से उत्पन्न नहीं हुआ था। प्रत्युपकार कैसा! प्रत्युपकार तो सकारण है और आत्मीयता अकारण। ठीक ही तो कहा था तब नृत्यांगना रोमा ने- ‘आत्मीयता का कोई कारण नहीं होता। आत्मीयता तो स्वयं ही कारण है और स्वयं ही परिणाम।’ प्रतनु को लगा कि इन दो वर्षों के अंतराल में रोमा द्वारा कहा गया एक-एक शब्द स्वयं-सिद्ध हो गया है।

उस दिन अश्रुपूरित आँखों से रोमा ने यह भी कहा था कि आत्मीयता का अनुभव आज नहीं कर रहे हो किंतु कल करने लगोगे। कितना सही कहा था रोमा ने! उस दिन प्रतनु ने रोमा के प्रति जो कुछ भी अनुभव किया था, उसका कारण भले ही शरण में आई रमणी के प्रति सदाशयता रहा हो अथवा रोमा द्वारा प्रतनु के शिल्प लाघव की प्रशंसा करने के लिये रोमा के प्रति उत्पन्न आभार किंतु उस दिन की आत्मीयता और आज की आत्मीयता में अन्तर है।

वह क्या था जो प्रतनु को मायावी नागलोक के सम्पूर्ण वैभव, रानी मृगमंदा और उसकी सखियों के समर्पित प्रेम से दूर भगा कर यहाँ पुनः मोहेन-जो-दड़ो में खींच लाया था! वह कौनसा आकर्षण था जिसने प्रतनु को पिशाचों के बीच भी प्रत्यक्ष मृत्यु-मुख से निकल भागने के लिये प्रेरित किया था!

क्या यह केवल आत्मीयता का ही भाव था! अथवा कुछ और! आत्मीयता तो उसे रानी मृगमंदा और उसकी सखियों से भी थी। वह भी संभवतः आत्मीयता का ही भाव था जो उसने आर्य अश्वारोहियों के मुखिया के प्रति अनुभव किया था। आत्मीयता जैसा ही कोई भाव उसके मन में अपने उस उष्ट्र के प्रति भी था जो दीर्घ यात्रओं में उसका एकमात्र सहचर रहा था।

यहाँ तक कि आत्मीयता तो उसने क्षण भर के लिये घृणित देह वाली मादा पिशाच मोएट से भी अनुभव की थी जिसने उसे अनायास प्राणदान दिया था। नहीं-नहीं उसके मन में रोमा के प्रति नितांत आत्मीयता नहीं है, कुछ और भी है जो उसे सम्पूर्ण मन प्राण और चेतना के साथ उसे आकर्षित करता है।

प्रतनु ने देखा कि कर्पास अंशुक से विलग होकर रोमा उसी की ओर बढ़ी चली आ रही है। रोमा ने अपनी दोनों भुजायें फैला रखी हैं। वह उन्माद की अवस्था में है। प्रतनु ने भी अपनी भुजायें फैला दीं। अगले क्षण सैंधव सभ्यता की अनिंद्य-अप्रतिम सुंदरी दिव्य नृत्यांगना रोमा उससे ऐसे लिपट गयी जैसे कोई आलम्ब आकांक्षिणी सुकोमल वल्लरी दृढ़ वृक्ष के चारों ओर लिपट जाती है।

जाने कितना समय उसी अवस्था में व्यतीत हो गया। जैसे चंचरीक कमलिनी के प्रणय आग्रह से आबद्ध होकर उसकी सुकोमल पांखुरियों में बेसुध होकर ठहर जाता है, उसी तरह प्रतनु रोमा की भुजाओं में लिपट कर रह गया। दासी वश्ती के खंासने से व्यवधान पाकर वे दोनों प्रणयी, अदृश्य प्रणय लोक से पुनः स्थूल वर्तमान में लौटे।

मौन ही रहा यह अभिसार। दोनों ही ओर से कोई शब्द नहीं, कोई संवाद नहीं। जाने जीवन में ऐसा क्यों होता है कि जब बहुत कुछ बोलने की इच्छा होती है, मनुष्य वहाँ कुछ भी नहीं बोलता! यह भी कितनी विचित्र बात है कि सर्वाधिक प्रभावी संप्रेषण मौन रह कर ही हो पाता है।

शब्द तो सीमित अर्थ ही लिये हुए होते हैं। फिर अभी तक सिंधु सभ्यता उन बहुत सारे शब्दों की रचना कहाँ कर पाई है जिनके माध्यम से मानव मन के सारे भाव संप्रेषित हो जायें! प्रतनु ने अनुभव किया कि सिंधु सभ्यता ही क्या संसार की कोई भी सभ्यता अभी तक बहुत सारे शब्दों से वंचित है। कौन जाने मानव कभी आगे भी पूरे शब्दों की रचना कर पायेगा या नहीं!

– अध्याय 32, मोहनजोदरो की नृत्यांगना, ऐतिहासिक उपन्यास, लेखक – डॉ. मोहनलाल गुप्ता


[1] वह गली जिसमें व्यापार होता हो अर्थात् हाट।

किलात से भेंट (33)

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किलात से भेंट

शिल्पी प्रतनु और नृत्यांगना रोमा ने सावधानी से कई बार काल गणना की और आश्वस्त हो जाने पर कि प्रतनु के निष्कासन की दो वर्ष की अवधि पूर्ण हो गयी है, प्रतनु ने आज ही किलात से भेंट करने का निर्णय लिया। पशुपति महालय के प्रातःकालीन पूजन के पश्चात् प्रतनु किलात की सेवा में उपस्थित हुआ।

किलात का अनुशासन पाकर अनुचर प्रतनु को किलात के कक्ष तक ले गया। प्रतनु ने देखा कि दो वर्ष पहले उसके द्वारा बनायी हुई देवी रोमा की प्रतिमा ज्यों की त्यों कक्ष के उसी कोने में रखी है, जहाँ उसने उसे पिछली बार देखा था। किलात एक ऊँचे आसन पर बैठा हुआ था। प्रतनु ने पृथ्वी पर जानु रखकर पशुपति महालय के प्रधान पुजारी किलात को प्रणिपात किया।

  – ‘युवक तुम्हारे पुनः मोहेन-जो-दड़ो आगमन से मैं प्रसन्न हूँ। तुम जैसे प्रतिभाशाली शिल्पी को मैं इतना कठोर दण्ड नहीं देना चाहता था किंतु देवी रोमा के संतोष के लिये ऐसा करना आवश्यक हो गया था।’ किलात को आशा नहीं थी कि दो वर्ष के पश्चात् यह युवा शिल्पी पुनः मोहेन-जो-दड़ो में लौटकर आयेगा। एक तरह से वह प्रतनु को देखकर चैंका ही था।

  – ‘आप सैंधव सभ्यता के संरक्षक हैं, आप जो भी करें आपके लिये सर्वथा उचित है। जो व्यतीत हो गया है मैं उस पर अब चर्चा नहीं करना चाहता। इस समय तो मैं विशेष प्रयोजन से आपकी सेवा में उपस्थित हुआ हूँ।’ प्रतनु ने अपने शब्दों को न चाहते हुए  भी कोमल बनाये रखना उचित समझा।

  – ‘यदि मैं तुम्हारे किंचित् भी कार्य आ सकूँ, तो मुझे प्रसन्नता होगी। तुम निर्भय होकर अपना मंतव्य मुझसे कह सकते हो। तुम्हारे प्रपितामह ने सैंधवों की बड़ी सेवा की है।’

  – ‘मैं यही आशा लेकर आपकी सेवा में आया हूँ। मैं स्वामी से प्रार्थना करता हूँ कि पशुपति महालय की मुख्य नृत्यांगना देवी रोमा को मुझे अर्पित कर दिया जाये।’ निःसंकोच होकर प्रतनु ने अपनी बात किलात के समक्ष कही।

  – ‘यह क्या कह रहे हो युवक ? क्या तुम देवी रोमा से रुष्ट हो उससे प्रतिकार लेना चाहते हो ?’

  – ‘नहीं! मैं देवी रोमा से किंचित् भी रुष्ट नहीं। न ही मैं उनसे कोई प्रतिकार लेना चाहता हूँ। मेरा उनसे अनुराग है। इसी कारण उनका प्रत्यर्पण [1] चाहता हूँ। विवाह करूंगा मैं उनसे। ‘

  – ‘क्या तुम्हें पशुपति महालय की नृत्यांगनाओं के प्रत्यर्पण नियमों की जानकारी है ?’

 – ‘मुझे कुछ-कुछ जानकारी है स्वामी।’

  – ‘सर्व प्रथम तो उस देवांगना की स्वीकृति प्राप्त करना आवश्यक है, जिसका कि प्रत्यर्पण चाहा जा रहा है। क्या देवी रोमा अपने प्रत्यर्पण के लिये सहमत होंगी ?’

  – ‘देवी रोमा अपने प्रत्यर्पण के लिये सहमत हैं स्वामी।’

  – ‘मिथ्या बोलते हो तुम। रोमा कभी भी तुम्हारे लिये अपने प्रत्यर्पण हेतु प्रस्तुत नहीं हो सकती।’ शिल्पी की बात सुनकर बुरी तरह चैंका किलात।

  – ‘आप चाहें तो देवी से उनकी सहमति की पुष्टि कर सकते हैं।’ किलात के स्वर में उत्तेजना आ जाने पर भी प्रतनु संयत ही बना रहा।

उसी समय किलात ने अपना अनुचर देवी रोमा के आवास की ओर दौड़ाया। किलात को लगा कि वह किसी षड़यंत्र में घिर गया है। यह चतुर शिल्पी अकारण ही रोमा के प्रत्यर्पण की मांग नहीं कर सकता। कहीं न कहीं, कोई न कोई अभिसंधि[2] अवश्य हुई है। संभवतः यही कारण रहा है कि रोमा ने किसी न किसी उपाय से अब तक स्वयं को किलात से दूर बनाये रखा है। अन्यथा पशुपति महालय की किसी भी नृत्यांगना ने इतना दुःसाहस कभी नहीं किया कि वह किलात के एक आदेश पर स्वयं को प्रस्तुत न करे।

  – ‘दासी रोमा स्वामी के चरणों में प्रणाम निवेदन करती है।’ रोमा ने नतजानु हो किलात का अभिवादन किया। रोमा को देखकर किलात अपने विचारों से बाहर आया।

  – ‘देवी! क्या तुम इन्हें पहचानती हो ?’

  – ‘हाँ स्वामी! ये वही शिल्पी प्रतनु हैं जिन्होंने मातृदेवी के वेश युक्त मेरी प्रतिमा का शिल्पांकन किया था।’

  – ‘बिल्कुल ठीक पहचाना तुमने। ये वही शिल्पी हैं किंतु ये तुम्हारे प्रत्यर्पण की मांग कर रहे हैं।’

  – ‘पशुपति महालय की नृत्यांगनाओं के प्रत्यर्पण हेतु निवेदन करना सैंधवों का अधिकार है स्वामी।’ रोमा ने दृष्टि झुकाकर उत्तर दिया।

रोमा का प्रत्युत्तर सुनकर जैसे आकाश से गिरा किलात। उसका अनुमान सही था। इन दोनों के बीच कोई न कोई अभिसंधि अवश्य है।

  – ‘क्या तुम शिल्पी प्रतनु के लिये स्वयं के प्रत्यर्पण हेतु प्रस्तुत हो ?’

  – ‘हाँ स्वामी! प्रत्येक स्त्री के मन में यह अभिलाषा होती है कि वह गृहस्थी बसाये। महालय की नृत्यांगनाओं में कोई विरली ही होती है, जिसे यह अवसर प्राप्त होता है। पशुपति की अनुकम्पा से मुझे यह अवसर मिला है। मैं इस अवसर को खोना नहीं चाहूंगी।’

  – ‘क्या शिल्पी तुम्हारे प्रत्यर्पण के लिये पशुपति महालय को पर्याप्त स्वर्णभार प्रस्तुत कर सकेगा!’

  – ‘हाँ स्वामी! शिल्पी प्रतनु मेरे प्रत्यर्पण के लिये पर्याप्त स्वर्णभार प्रस्तुत कर सकेंगे।’

  – ‘कितना ? कितना स्वर्णभार ?’ किलात को विश्वास ही नहीं हुआ। दो वर्ष के निर्वासन काल में एक शिल्पी कितना स्वर्ण भार जुटा सकता है!

  – ‘आप आदेश करें स्वामी! कितना स्वर्णभार पशुपति के चरणों में अर्पित करना हेागा शिल्पी प्रतनु को मेरे प्रत्यर्पण के लिये!’ रोमा ने दर्प के साथ दृष्टि उठाकर किलात से पूछा। किलात ने अनुभव किया कि यह प्रश्न नहीं है, चुनौती है।

  – ‘किंतु जो प्रश्न शिल्पी प्रतनु द्वारा पूछा जाना चाहिये, वह प्रश्न तुम क्यों पूछ रही हो ? स्वर्णभार शिल्पी द्वारा समर्पित किया जाना है न कि तुम्हारे द्वारा!’

रोमा को इस प्रश्न की आशंका पहले ही थी। इसीलिये उसने रात्रि में ही अपने समस्त स्वर्ण आभूषण शिल्पी प्रतनु के निवास पर पहुँचा दिये थे।

  – ‘प्रश्न भले ही मेरे द्वारा किया गया हो किंतु स्वर्णभार शिल्पी ही अर्पित करेंगे।’ रोमा ने प्रत्युत्तर दिया।

  – ‘ठीक है मैंने माना कि तुम प्रत्यर्पण के लिये प्रस्तुत हो और तुम्हारे प्रत्यर्पण के लिये यह शिल्पी पर्याप्त स्वर्णभार भी पशुपति को समर्पित कर सकता है किंतु प्रत्यर्पण के लिये यही दो बातें पर्याप्त नहीं हैं। महालय के प्रधान पुजारी को भी सहमत करना आवश्यक है कि वह महालय की नृत्यांगना का प्रत्यर्पण करे। शिल्पी प्रतनु ने मेरी सहमति नहीं ली है।’

  – ‘आपकी सहमति के लिये ही तो मैं यहाँ प्रस्तुत हुआ हूँ स्वामी।’ शिल्पी प्रतनु ने शब्दों को विनम्र ही बनाये रखा।

  – ‘किंतु मैं अपनी सहमति देने से मना करता हूँ। अब तुम जा सकते हो युवक।’ किलात ने आवेश से लगभग चीखते हुए अपनी बात पूरी की।

  – ‘किंतु आप देवी रोमा का प्रत्यर्पण करना क्यों नहीं चाहते ?’

  – ‘तुम मुझसे यह प्रश्न नहीं कर सकते युवक। पशुपति महालय के प्रधान पुजारी को क्या करना है और क्या नहीं, इसका निर्णय वे स्वयं लेते हैं और उसका कारण किसी को स्पष्ट नहीं करते।’

  – ‘किंतु जब प्रश्न स्वयं मुझसे ही जुड़ा है तो मुझे सैंधव होने के नाते यह अधिकार है कि मैं यह जान सकूं कि आप देवी रोमा का प्रत्यर्पण केवल मुझे ही नहीं करेंगे अथवा किसी को भी नहीं करेंगे ? ‘

  – ‘मैं तुम्हारे किसी प्रश्न का उत्तर देने के लिये बाध्य नहीं हूँ।’

  – ‘तो फिर मुझे आपको बाध्य करना होगा।’

  – ‘तुझमें इतनी सामथ्र्य क्योंकर है उद्दण्ड युवक ?’

  – ‘एक सैंधव होने के नाते मेरी यह सामथ्र्य है स्वामी।’ प्रतनु ने निर्भीक होकर उत्तर दिया।

किलात के विस्मय का पार न रहा। शिल्पी के आत्म विश्वास का आधार क्या है। क्या सचमुच यह इतना शक्तिशाली है कि मुझे विवश कर सके! क्या इसे किसी शक्तिशाली संगठन का बल प्राप्त है! अथवा यूँ ही यौवन के प्रवाह में मिथ्या प्रलाप कर रहा है! शिल्पी के चेहरे का दर्प बता रहा है कि कुछ न कुछ शक्ति इसके पास अवश्य है अन्यथा इसका ऐसा साहस कदापि न होता कि मुझे महालय में खड़े होकर चुनौती दे सके। दीर्घ आयु का सेवन कर चुका किलात इतना अनुभव तो रखता ही है कि परिस्थिति की वास्तविकता को समझे।

किलात ने उत्तर दिया- ‘ठीक है युवक! सैंधव होने के नाते तुम्हें अधिकार है कि तुम अपने स्वामी से प्रश्न करो किंतु मैं तुम्हारे प्रश्नों का उत्तर चन्द्रवृषभ आयोजन के बाद दूंगा।’

  – ‘उचित है स्वामी, मैं चन्द्रवृषभ तक प्रतीक्षा कर लूंगा।’ प्रतनु ने किलात को नतजानु हो प्रणाम किया और महालय से बाहर हो गया। इसी के साथ किलात से भेंट पूरी हुई।

– अध्याय 33, मोहनजोदरो की नृत्यांगना, ऐतिहासिक उपन्यास, लेखक – डॉ. मोहनलाल गुप्ता


[1] एक वस्तु के बदले दूसरी वस्तु प्राप्त करना अथवा देना।

[2] बुरा समझौता, षड़यंत्र, कुचक्र।

नृत्यांगना की घोषणा (34)

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नृत्यांगना की घोषणा

मोहेन-जो-दड़ो के वातावरण में आज सनसनी है। पुरवासियों में इतनी सनसनी और इतनी उत्तेजना तो उस दिन भी नहीं थी जिस दिन देवी रोमा की निर्वसना प्रतिमा किसी अज्ञात शिल्पी ने नगर के मुख्यमार्ग पर लाकर रख दी थी। जिसने भी नृत्यांगना की घोषणा के बारे में सुना अवसन्न रह गया। भला यह कैसे संभव है! ऐसा पहले तो कभी नहीं हुआ!

कैसे देवी रोमा यह घोषणा कर सकती हैं कि वे चन्द्रवृषभ आयोजन में मातृदेवी के रूप में तभी उपस्थित होंगी जब शिल्पी प्रतनु चन्द्रवृषभ के रूप में उपस्थित हो! कैसे संभव है यह! युगों-युगों से पशुपति महालय की मुख्य नृत्यांगना प्रजनक देव को प्रसन्न करने के लिये मातृदेवी बनकर नृत्य करती आयी है और पशुपति महालय के प्रधान पुजारी चन्द्रवृषभ बनकर मातृदेवी को गर्भवती बनाते आये हैं। फिर यह नयी रीत कैसी!

और यह शिल्पी प्रतनु! कौन है शिल्पी प्रतनु! जितने मुँह उतनी बातें! किसी ने कहा शिल्पी प्रतनु कालीबंगा के प्रख्यात शिल्पी वितनु का प्रपौत्र है। किसी ने कहा जिस शिल्पी ने दो वर्ष पहले मातृदेवी के वेश में नृत्यरत देवी रोमा की अद्भुत प्रतिमा बनाई थी, यह वही शिल्पी है। किसी ने कहा कि यह शिल्पी तो शर्करा के तट पर स्थित ऐलाना का सैंधव है जो प्रतिवर्ष बड़ी संख्या में मातृदेवी की प्रतिमायें बनाकर पणियों को बेचा करता है। किसी ने कहा कि शिल्पी प्रतनु तो सैंधव है ही नहीं, वह तो असुर है।

सुनने वाले इन सब बातों को नकार देते हैं। एक बूढ़े सैंधव ने कहा- ‘अरे भई। तुम सब लोगों की तो मति मारी गयी है। कालीबंगा के जिस शिल्पी वितनु ने कुछ वर्ष मोहेन-जो-दड़ो में रहकर पशुपति तथा मातृदेवी की प्रतिमायें बनायीं थीं वह तो आर्यों के आक्रमण में कालीबंगा में ही मारा गया था। उसके परिवार का तो वर्षों से कुछ पता ही नहीं। उसके पुत्र और पौत्रों के बारे में भी तो कुछ सुनने में आता ?’

पशुपति महालय में काम करने वाली एक सैंधव वृद्धा ने कहा-‘ जाने मोहेन-जो-दड़ो निवासी कब सत्य संभाषण करना सीखेंगे! जिस शिल्पी ने देवी रोमा की निर्वसना प्रतिमा बनाई थी उसे तो स्वामी किलात ने राजधानी से निष्कासित कर दिया था। अब भला वह कैसे फिर से पुर में प्रवेश कर सकता है ?’

एक प्रौढ़ सैंधव जिसने शिल्पी प्रतनु की एक झलक देखी थी, दूसरे सैंधवों को चुनौती देता हुआ बोला- ‘अरे मैं पूरे विश्वास के साथ कह सकता हूँ कि यह वही शिल्पी है जिसने दो वर्ष पहले देवी रोमा की प्रतिमा बनायी थी।’

  – ‘किंतु उस शिल्पी को तो स्वयं देवी रोमा ने ही स्वामी किलात के समक्ष अभियोग प्रस्तुत करके पुर से निष्कासित करवाया था। अब भला वे उसके साथ नृत्य करने की घोषणा क्यों करेंगी ? वह भी मातृदेवी के वेश में ?’

प्रौढ़ सैंधव निरुत्तर हो गया। सचमुच, इस बात का क्या अर्थ हो सकता है! यह तो संभव ही नहीं कि निष्कासन की अवधि में देवी रोमा और शिल्पी प्रतनु का कोई सम्पर्क रहा हो। फिर कैसे इन दोनों में मेल हो गया!

जहाँ पुरानी पीढ़ी देवी रोमा की घोषणा से चिंतित है वहीं सैंधव युवकों के रक्त में नवीन उत्साह का संचार हो गया है। वे तो स्वंय ही इस बात के पक्षधर नहीं थे कि बूढ़ा किलात चन्द्रवृषभ नृत्य करने का एकमात्र अधिकारी समझा जाये। क्यों नहीं यह अधिकार सैंधव युवकों को प्राप्त हो जाता!

वर्षों तक प्रयास करने के बाद भी वे इस परम्परा को बदलने में सफल नहीं हो पाये थे किंतु अब स्वयं देवी रोमा ने ही अपनी ओर से घोषणा करके परम्परा को बदल डालने का निश्चय किया है, तो युवकों को लगा, एक अवरुद्ध मार्ग के खुलने का समय आ गया है। उन्होंने रोमा की घोषणा का समर्थन किया।

नगर से आ रही इन सूचनाओं से किलात की चिन्ता का पार नहीं है। उसे पुर में प्रचारित रोमा की घोषणा का पता चल गया है। उसे यह भी ज्ञात हो गया है कि बहुत से नागरिक रोमा की घोषणा का समर्थन कर रहे हैं, उनमें भी विशेषकर सैंधव युवाओं का कहना है कि चन्द्रवृषभ के वेश में हर बार महालय का प्रधान पुजारी ही क्यों उपस्थित हो! क्यों नही यह अवसर युवकों को भी मिले!

कुछ समझ नहीं पाता महान् किलात। क्यों नृत्यांगना रोमा स्वामी-द्रोह पर उतर आयी है! क्यों सैंधव युवक युगों से चली आ रही ‘धर्म-व्यवस्था’ को भंग करने पर उतारू हैं! क्यों एक क्षुद्र शिल्पी ने शर्करा के तट से आकर राजधानी के नागरिक जीवन में हलचल पैदा कर दी है! क्यों उसे अपनी किसी भी ‘क्यों’ का उत्तर नहीं मिल पाता!

किलात ने चाहा था कि वह चन्द्रवृषभ आयोजित होने के पश्चात शिल्पी की शक्ति के वास्तविक केन्द्र का पता लगाकर उससे निबट लेगा किंतु यह तो एक नयी समस्या खड़ी हो गयी। रोमा ने पूरे नगर में यह घोषणा करवा दी कि वह चन्द्रवृषभ आयोजन में तभी उपस्थित होगी जब चन्द्रवृषभ के वेश में किलात नहीं, शिल्पी प्रतनु होगा।

अन्यथा वह नृत्य ही नहीं करेगी। किलात को लगा कि मोहेन-जो-दड़ो वासी भले ही पशुपति महालय के प्रमुख पुजारी किलात में कितनी ही श्रद्धा क्यों न रखते हों, वे देवी रोमा का नृत्य देखने की अभिलाषा नहीं त्याग सकते। इस कारण किलात देवी रोमा के स्थान पर किसी और देवदासी को मातृदेवी की भूमिका में नहीं उतार सकता।

क्या करे स्वामी किलात और क्या न करे ? कोई मार्ग नहीं सूझता। यदि वह शिल्पी प्रतनु को चन्द्रवृषभ के रूप में मातृदेवी के साथ नृत्य करने की स्वीकृति देता है तो अगले वर्ष से अन्य युवक भी चन्द्रवृषभ बनने का अधिकार मांगेगे। यदि वह रोमा की घोषणा को अस्वीकार कर देता है तो युवा सैंधव विद्रोह करने को उतारू हो जायेंगे।

क्या वह शिल्पी को ललकारे कि उसे पुरवासियों के समक्ष नृत्य करके अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करनी होगी! तभी उसे पशुपति महालय के वार्षिक आयोजन में मातृदेवी के साथ नृत्य करने दिया जायेगा। नहीं-नहीं! इससे तो एक तुच्छ शिल्पी को महान् किलात की समकक्षता करने का अवसर मिल जायेगा।

सामान्य सैंधव भी सोचने लगेंगे कि महान् किलात को चुनौती दी जा सकती है! यदि नृत्यकला में कहीं युवा शिल्पी ही श्रेष्ठ नर्तक सिद्ध हुआ तो! फिर किलात किस प्रकार सैंधव सभ्यता का प्रमुख पुजारी बना रहा सकेगा! यदि नृत्यांगना और शिल्पी को धर्मद्रोह के अपराध में कारावास में डाल दिया जाये तो!

किलात को लगा कि नृत्यांगना को नहीं तो शिल्पी को तो बंदी बना लेना ही उचित है। यदि इसी समय वह नगर रक्षकों को शिल्पी के आवास पर भेज कर खोज करवाये तो अवश्य ही रोमा के आभूषण उसके निवास से मिल जायेंगे। किलात का अनुमान था कि रोमा ने मुख्य नृत्यांगनाओं द्वारा वर्षों से संचित समस्त आभूषण शिल्पी को दे दिये होंगे ताकि उन्हें पशुपति के समक्ष स्वर्णभार के रूप में अर्पित करके वह रोमा का प्रत्यर्पण करवा ले।

वे आभूषण रोमा के तो नहीं हैं! वे महालय की सम्पत्ति हैं। कितना अच्छा हो कि ये आभूषण शिल्पी के निवास से प्राप्त किये जा सकें। सारी व्याधि स्वतः ही दूर हो जायेगी किंतु . . . . . किंतु यदि किलात का अनुमान मिथ्या निकला तो! किलात का आत्मविश्वास डगमगा गया। यदि रोमा के आभूषण शिल्पी प्रतनु के पास नहीं पाये गये तो!

तब तो नृत्यांगना रोमा और शिल्पी प्रतनु को अच्छा अवसर प्राप्त हो जायेगा। वे दोनों मिलकर पुरवासियों में मेरे विरुद्ध असंतोष फैलाने में सफल हो जायेंगे। फिर क्या किया जाये! अपने आप पर खीझ हो आती है उसे, क्यों अप्रिय क्षणों में वह अपने आप को इतना निर्बल पाता है!

क्यों नहीं है उसे अपनी शक्तियों पर विश्वास! क्यों नहीं वह सामना कर सकता उसके संकेत मात्र पर नत्य करने वाली क्षुद्र नृत्यांगना और छैनी  चलाकर उदर पोषण करने वाले तुच्छ शिल्पी का! क्या सैंधव सभ्यता के महान् पुजारी सर्वशक्तिमान किलात में इतना ही बल है कि कोई भी सैंधव युवक किसी भी पुर से चला आये और उसकी समस्त सत्ता को ललकारने लगे!

क्रोध, खीझ और बेचैनी से मुक्ति पाना चाहता है किलात। वह इन सब बातों का अभ्यस्त नहीं। वह तो केवल संकेत भर करने का अभ्यस्त है। जब-जब जो-जो उसने चाहा तब-तब वो-वो उसे बिना मांगे ही मिल गया किंतु इस बार ऐसा क्यों नहीं है! महान् पुजारी है वह सैंधव सभ्यता का।

महान् पुजारी! हुंह! ये हैं महान पुजारी धर्मात्मा किलात् जो अपनी असीम शक्तियों से सम्पूर्ण सैंधव सभ्यता का संरक्षण करते हैं। महाअसुर-वरुण तथा उनके दोनों नेत्र सूर्य और चन्द्र भी जिसकी आज्ञाओं का अनुसरण करते हैं ऐसे शक्तिशाली महान् किलात की यह दशा कि वह चाहे और उसे न मिले! उसके भीतर का आलोड़न तीव्र हो जाता है, क्या नहीं कर सकता वह!

वह चाहे तो सप्त सिंधुओं में जल प्रवाहित हो और वह न चाहे तो सप्त सिंधु रेत की सरितायें बन कर रह जायें। वह चाहे तो मातृदेवी गर्भवती हो और वह न चाहे तो मातृदेवी गर्भवती न हो। वह चाहे तो रोमा नृत्य करे और वह न चाहे तो रोमा नृत्य न करे। वह चाहे ही क्यों कि रोमा नृत्य करे! प्रसन्नता से उछल ही पड़ा किलात। वह चाहे ही क्यों कि रोमा नृत्य करे! इतनी सी बात उसके मस्तिष्क में पहले क्यों नहीं आयी! केवल इतनी सी बात!

जिस रूप और कला के बल पर उस क्षुद्र नृत्यांगना को इतना अभिमान है कि वह महान् किलात को चुनौती दे सके, वह रूप और कला उसके पास रहें ही क्यों ? क्या किलात से विमुख रहकर वह रूपसम्पन्न और कलायुक्त रह सकती है ? नहीं, कदापि नहीं। उसे त्यागने होंगे रूप और नृत्य। समस्त अभिमान विगलित हो जायेगा उसका। फिर शिल्पी प्रतनु को भी उसकी इच्छा नहीं रह जायेगी। तब वह उन दोनों से एक-एक करके निबट लेगा किंतु . . . . फिर किंतु बीच में आ गया था।

क्यों आ जाता है यह किंतु बार-बार हर समाधान के बीच में! नहीं आने देगा इस किंतु को वह बीच में। फिर उलझ जाता है किलात। उसने तो रोमा का समर्पण चाहा था न कि उसका विनाश। नृत्यांगना को विनष्ट करने में उसकी विजय नहीं है। विजय उससे समर्पण करवाने और उसे भोगने में है। यह तभी संभव है जब उसकी रूप सम्पदा सुरक्षित रहे . . . किंतु उसकी कला! उसे तो नष्ट होना ही चाहिये। नृत्यांगना की शक्ति का वास्तविक केन्द्र उसकी कला में है न कि उसके सौंदर्य में।

ऐसा लगता था कि किलात किसी निर्णय पर पहुंच चुका था, वह भी बिना किसी ‘किंतु’ के। वह आघात करेगा नृत्यांगना की शक्ति के केन्द्र पर। अभिचार [1] का प्रयोग करेगा वह नृत्यांगना पर। शिल्पी द्वारा बनायी गयी वही प्रतिमा रोमा के लिये अभिशाप बन जायेगी जिसके बल पर वह सैंधव प्रजा में रहस्यमयी आकर्षण और कौतूहल का पात्र बना हुआ है।

किलात की आँखों की चमक बढ़ती जा रही है। इससे तो एक साथ दो उद्देश्यों की प्राप्ति होगी। एक ओर तो नृत्यांगना शक्तिहीन होकर स्वयं ही किलात के चरणों में आ गिरेगी और दूसरी ओर शिल्पी प्रतनु स्वयं अपनी ही दृष्टि में अपराधी हो जायेगा। जिस कला पर उन दोनों को इतना अभिमान है, उसी कला के लिये पश्चाताप करेंगे वे।

किंचित् झटके से उठा किलात अपने स्थान से और नृत्यांगना रोमा की मातृदेवी के वेश में खड़ी प्रतिमा पर क्रूर दृष्टि डालता हुआ कक्ष से बाहर निकल गया। उसे इसी समय कई महत्वपूर्ण कार्य निबटाने थे।

– अध्याय 34, मोहनजोदरो की नृत्यांगना, ऐतिहासिक उपन्यास, लेखक – डॉ. मोहनलाल गुप्ता


[1] जादू-टोना, मैली विद्या।

चतुरंगिणी (35)

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चतुरंगिणी

चैथा अंग पदाति सैनिकों का था। यह अंग चतुरंगिणी का सबसे बड़ा और सबसे मुख्य अंग था। शेष अंग एक तरह से इसी अंग की सहायता के लिये संगठित किये गये थे।

राजन् सुरथ ने ऊँची टेकरी पर चढ़कर चतुरंगिणी[1] का अवलोकन किया। चारों दिशायें आर्य सैनिकों से आप्लावित थीं। राजन् सुरथ तथा सेनप सुनील ने आर्य वीरों की चतुरंगिणी सैन्य संयोजित करने में दिवस-निशि परिश्रम किया था। प्रत्येक अंग का मुखिया ऐसे वीर को चुना गया था जो उस अंग के लिये सर्वश्रेष्ठ सिद्ध हुआ था। चारों अंगों के मुखियाओं को सेनप सुनील के अधीन रखा गया था।

पहला अंग हस्ति सैनिकों का था। इस अंग के सैनिक हस्ति पर आरूढ़ होकर सबसे आगे चलते थे तथा युद्ध के मैदान में सबसे पहले धंसते थे। आर्य अतिरथ को इसी अंग का मुखिया बनाया गया था। इस अंग को पुर पर आक्रमण के लिये विशेष रूप से दक्ष किया गया था।

युद्ध क्षेत्र में भारी सैनिक सामग्री ढोने का काम भी इसी अंग को दिया गया था। हस्ति सैन्य के लिये गहन वन प्रांतर में रहने वाली प्रजाओं से हस्ति प्राप्त करने में आर्यों को सर्वाधिक समय लगा था। फिर भी बहुत कम प्रशिक्षित हस्ति उपलब्ध हो पाये थे। इसक उपरांत भी जब हस्ति सैन्य सब तरह से सुसज्जित होकर चतुरंगिणी में सम्मिलित हुआ तो आर्य वीरों का मनोबल काफी बढ़ गया।

दूसरा अंग रथाति सैनिकों का था। इस अंग में हस्ति दल की अपेक्षा अधिक सैनिक थे। ये सैनिक रथ में बैठे रहने के कारण शत्रु-सैन्य के मध्य धंसने में विशेष रूप से उपयोगी थे। सैनिकों के लिये धनुष, बाण, असि तथा तूणीर आदि ढोने का काम भी इसी अंग पर छोड़ा गया था। तीसरा अंग अश्वारूढ़ सैनिकों का था।

यह अंग सर्वाधिक तीव्र वेग से चल सकने में सक्षम होने के कारण शत्रु सैन्य पर अचानक धावा करने में विशेष उपयोगी था। युद्ध क्षेत्र में युद्ध सम्बन्धी सूचनायें एक अंग से दूसरे अंग तक पहुँचाने का कार्य भी इसी अंग को प्रदान किया गया था। समस्त प्रमुख आर्य वीर इसी अंग में सम्मिलित किये गये थे। चैथा अंग पदाति सैनिकों का था। यह अंग चतुरंगिणी का सबसे बड़ा और सबसे मुख्य अंग था। शेष अंग एक तरह से इसी अंग की सहायता के लिये संगठित किये गये थे।

राजन् सुरथ की योजना यह थी कि चतुरंगिणी को साथ लेकर सबसे पहले अन्य आर्य-जनों की यात्रा की जाये और उन जनों के आर्यवीरों को चतुरंगिणी में सम्मिलित किया जाये। इससे जनों में एक्य-सूत्र [2] स्वतः ही स्थापित हो जायेगा और वे कालांतर में एक आर्य जनपद में बंध जायेंगे।

जो आर्यजन इस चतुरंगिणी का विरोध करें उनसे समरांगण में निबटा जाये। जब चतुरंगिणी में सैनिकों की विपुल संख्या हो जाये तब यह चतुरंगिणी असुरों के पुरों पर आक्रमण कर उन्हें नष्ट करे तथा असुरों को सरिताओं के तट से दूर मरुस्थल की ओर धकेल दे। आर्य सुरथ ने यह भी योजना बनाई थी कि जैसे-जैसे सप्त सिंधु क्षेत्र की सलिलाओं के  पवित्र तट असुरों से मुक्त होते जायें वैसे-वैसे उन क्षेत्रों में आर्य जन स्थापित किये जायें ताकि असुर पुनः उन क्षेत्रों में प्रवेश न करें। 

ऋषियों, ऋषिपत्नियों तथा अन्य आर्यों ने राजन् सुरथ और सेनप सुनील के इस विशेष सैन्य संगठन को देखकर मुक्तकण्ठ से सराहना की। निश्चित् ही उनका उपक्रम और उनकी योजना अद्भुत है। सुसंगठित सैन्यशक्ति एवं सुनियोजित रणनीति ही प्रबल असुरों को सरिताओं के तट से दूर निर्जन मरुस्थल में धकेल सकती है।

ऋषिश्रेष्ठ सौम्यश्रवा ने आगे बढ़कर राजन् सुरथ के मस्तक पर तिलक अंकित किया और सिर पर अक्षत [3] डालकर आर्य सैन्य की विजय कामना की। दुंदुभि के तुमल नाद के साथ चतुरंगिणी ने अपने दिव्य शस्त्रों का संचालन किया। सूर्य रश्मियों में चमकते हुए अस्त्र-शस्त्रों को देखकर लगता था जैसे सहस्रों सूर्य एक साथ निकल आये हैं। शस्त्र संचालन करते हुए ही चतुरंगिणी ने प्रस्थान किया।

सबसे आगे दो अश्व चल रहे थे जिन पर राजन् सुरथ तथा सेनप सुनील आरूढ़ थे। उनके दोनों पार्श्वों में दो सैनिक पीतवर्णी  [4] ध्वज लेकर चल रहे थे। आर्या पूषा ने इस ध्वज में पीत पृष्ठ भूमि पर श्वेत रंग से सूर्य अंकित किया था। उनके पीछे एक रथ था जिसमें जन के पुरोहित ऋषिश्रेष्ठ सौम्यश्रवा विराजमान थे। उनके एक ओर हस्ति पर आरूढ़ आर्य अतिरथ तथा दूसरी ओर आर्य सुमति चल रहे हैं। उनके पीछे सबसे पहले हस्ति सैन्य, उसके पश्चात् अश्व सैन्य, उसके पीछे रथ सैन्य और सबसे अंत में पद सैन्य पंक्ति बद्ध होकर चली।

राजन् सुरथ की योजना हर तरह से सोच-विचार कर बनायी गयी थी। प्रत्येक संभावित समस्या का हल पहले से ही खोजने का प्रयास किया गया था। सैनिकों के लिये भोजन सामग्री जुटाने के लिये पहले से ही अन्य सैनिक निर्धारित कर दिये गये थे ताकि अन्य सैनिक निंश्चित रह कर युद्ध में सन्नद्ध रह सकें।

चतुरंगिणी को विदा देने आये तृत्सु-जन के रत्नियों, वृद्धों, ऋषियों, आर्य ललनाओं और बालकों ने अपने मन में नवीन चेतना, नवीन उत्साह, नवीन संभावनायें और नवीन कल्पनाओं को अंकुरित होते हुए अनुभव किया। स्वजनों को युद्ध क्षेत्र के लिये प्रस्थान करते हुए देखकर विछोह का कष्ट भी उनके शंका पूरित हृदयों में था किंतु इसके लिये वे अपने आप को कई दिवस पूर्व तैयार कर चुके थे। मंथर गति से आगे बढ़ती हुई चतुरंगिणी अपने पीछे धूलि का बड़ा सा वृत्त छोड़ती हुई नेत्रों से ओझल हो गयी तो आर्य स्त्री-पुरुष फिर से अपनी पर्णशालाओं को लौटे।

राजन् सुरथ उनके लिये भी एक बड़ा कार्य छोड़ गये थे। राजन् की अनुपस्थिति में जन की सुरक्षा के विशेष प्रबंध किये गये थे। वृद्ध पूषण को पुरप नियुक्त करके उन्हें जन के रक्षण का भार दिया गया था। पुरप की सहायता के लिये एक लघु सैन्य भी जन में रखा गया था।

जब तक यह चतुरंगिणी पुनः लौट कर आये, आर्यों को पुरप पूषण के नेतृत्व में जन के चारों ओर दीर्घ भित्ति का निर्माण करके एक पुर का निर्माण करना था। वृद्ध आर्यों ने अनुभव किया कि वे पुर निर्माण की नवीन परम्परा को स्वीकार करने जा रहे थे। एक ऐसी परम्परा जो आर्यों की नहीं थी, असुरों की थी किंतु इसे स्वीकार कर लेना वर्तमान समय की आवश्यकता थी।

– अध्याय 35, मोहनजोदरो की नृत्यांगना, ऐतिहासिक उपन्यास, लेखक – डॉ. मोहनलाल गुप्ता


[1] जिस सेना में पैदल सैनिकों के साथ हाथी, घोड़े तथा रथों पर सवार सैनिक हों उसे चतुरंगिणी अर्थात् चार अंगों वाली सेना कहते हैं।

[2] एकता का सूत्र।

[3] न टूटा हुआ चावल।

[4] पीले रंग का।

अमंगल की आशंका (36)

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अमंगल की आशंका

अमंगल की आशंका पुरवासियों के मन में घर कर गयी है। यदि मातृदेवी गर्भवती न हुई तो! वह एक क्षुद्र शिल्पी से कैसे गर्भवती होना स्वीकार करेगी!

मोहेन-जो-दड़ो वासी एक बार फिर उत्तेजित हैं। इस बार युवकों की अपेक्षा बड़े बूढ़ों में अधिक बेचैनी है। देवी रोमा द्वारा प्रचारित घोषणा के एक दिन बाद स्वामी किलात ने भी पुर में आज्ञा प्रचारित की है कि पशुपति महालय के वार्षिक आयोजन में इस बार शिल्पी प्रतनु चन्द्रवृषभ बनकर मातृदेवी को गर्भवती बनायेंगे।

क्षुब्ध हैं बड़े-बूढ़े, एक क्षुद्र युवक मातृदेवी को गर्भवती बनायेगा! केवल इसलिये कि देवदासी ऐसा चाहती है! क्या यह पातक  नहीं है! कहाँ से लायेगा क्षुद्र शिल्पी इतनी शक्ति! मातृदेवी सम्पूर्ण सृष्टि का सृजन करती है। क्या उसे गर्भवती करने का अनुष्ठान इतना सरल है! महान शक्तियों का पवित्र स्वामी ही मातृदेवी को गर्भवती बनाने की क्षमता रखता है।

बड़े-बूढ़ों की उत्तेजना निराशा का पर्यायवाची मात्र है, तभी तो वे अंत में यह कहकर मौन धारण कर लेते हैं कि किया क्या जा सकता है ? स्वयं स्वामी ने ही यह आज्ञा प्रचारित की है। संभवतः अपनी प्रसन्नता से नहीं, देवी रोमा के विचित्र हठ से रुष्ट होकर। एक अनिष्ट की आशंका घर कर गयी है पुरवासियों के मन में। अब क्या होगा! यदि मातृदेवी गर्भवती न हुई तो! जब वह महापराक्रमी चन्द्रवृषभ के वश में नहीं आती तो एक क्षुद्र शिल्पी से कैसे गर्भवती होना स्वीकार करेगी!

सप्त सिंधुओं के तटों पर स्थित सुदूर पुरों से आने वाले सैंधवों के शटक पिछले कुछ दिनों में बड़ी संख्या में मोहेन-जो-दड़ो में एकत्र हो गये हैं। उन्हें मोहेन-जो-दड़ो में घटित घटनाओं के सम्बन्ध में जानकारी नहीं है किंतु वे पुर के वातावरण में एक विचित्र सा अंतर अनुभव कर रहे हैं। कुछ बातें जन-सामान्य के वाग्विलास में से छन-छन कर अलग-अलग कलेवर में उन तक पहुँच रही हैं। सूचनाओं की इसी तलछट से एक आशंका उनके मन में भी समा गयी है कि कुछ अमंगल घटित हो सकता है।

जिस दिन स्वामी किलात की आज्ञा पुर में प्रचारित हुई उसी संध्या वरुण सिंधु तट पर प्रकट हुआ। वरुण इस बार कतिपय विलम्ब से आया था किंतु अपने शकटों में जाने कितना जल भरकर लाया था! रात्रि के अंतिम प्रहर तक वर्षा होती रही। वर्षा भी कैसी! अत्यंत वेगवती, अत्यंत विकराल!

आरंभ में आकाश से जल की बड़ी-बड़ी बूंदे झरीं जो देखते ही देखते मोटी जल-धाराओं में बदल गयीं। सिंधु वासियों ने आश्चर्य से देखा आकाश से जल बूंदें नहीं, विशाल धारायें निकल कर धरती पर गिर रही हैं। लगता था आकाश मार्ग से सिंधु उतर आई है। नभ और थल तक केवल जल दिखाई देने लगा।

अत्यधिक वर्षा होने से, अन्य पुरों से आकर खुले आकाश के नीचे डेरा जमाये बैठे सैंधवों ने अतिथि शालाओं में शरण लेनी चाही किंतु वे तो पहले से ही पूरी तरह जन-पूरित थे। अतः बाहर से आये सैंधवों ने पुरवासियों से शरण देने का अनुरोध किया। उदार सैंधव नागरिकों ने अपने आवास अतिथियों के लिये खोल दिये। मध्य रात्रि में जलधाराओं का स्थान हिमखण्डों ने ले लिया। विकराल शीत से कंपकंपा उठा मोहेन-जोदड़ो।

यदि अंतिम प्रहर से कुछ पूर्व वर्षा थम न गयी होती तो वार्षिक आयोजन एक दिन के लिये स्थगित करना पड़ता। रात्रि भर वर्षा थमने की प्रतीक्षा में थके हुए नागरिक अतिथि सैंधवों के साथ अपने अलसाये नेत्रों को मसलते हुए, नगर के विशाल स्नानागारों में पवित्र होकर सूर्योदय से पूर्व सिंधु पूजन के लिये उपस्थित हुए।

जो भी सैंधव सिंधु तट पर पहुँचा, उसके आश्चर्य का पार न रहा। उन्होंने सिंधु को घनघोर गर्जन करते हुए पाया। ऐसा लगता था मानो कोई मादा सिंह क्षुब्ध होकर दहाड़ रही हो। वह भयानक वेग से प्रवाहित हो रही थी। उसी से घनघोर शब्द उत्पन्न हो-हो कर चारों दिशायें आप्लावित हो रही थीं।

नक्षत्रों के क्षीण प्रकाश में सिंधु तट का दृश्य देखकर सैंधव समुदाय हतप्रभ रहा गया। आकाश को छू लेने वाली ऊँची तरंगों से आप्लावित सम्पूर्ण सिंधु तट विकराल रूप धारण कर चुका था। लगता था ये तरंगें अभी आगे बढ़कर पुर में प्रवेश कर जायेंगी और सब कुछ बहा ले जायेंगी। भयावह आशंका से सैंधवों के हृदय कांप गये। मातृदेवी ही जानें आज क्या होने को है! क्यों आज रुद्र कुपित होकर अपनी विकराल जटायें फैलाये मोहेन-जोदड़ो तक चला आया है!

किसी तरह धूप, दीप, पुष्प, और दिव्य वनस्पतियों से सिंधु माता का पूजन किया गया। माता सिंधु से सैंधवों की कुशलता और समृद्धि की प्रार्थनायें की गयीं और फिर शंका पूरित हृदयों से नदी में दीप प्रवाहित कर समस्त सैंधव पुनः पुर को लौट आये।

सूर्योदय की प्रथम किरण के साथ प्रधान महालय के विशाल ताम्र-घण्ट पर काष्ठ का आघात हुआ और महालयों में अभिषेक एवं पूजन अनुष्ठान आरंभ हुआ। सैंकड़ों घण्ट, घड़ियाल और शंख बज उठे। मोहेन-जो-दड़ो के समस्त महालयों में स्थापित देव-प्रतिमाओं को सप्त सिंधुओं के पवित्र जल से अभिषिक्त किया गया।

मुख्य मातृदेवी-महालय एवं मुख्य पशुपति-महालय में स्थापित प्रतिमाओं को मधु, दुग्ध, फलों के रस एवं चन्दन आदि से चर्चित किया गया। समस्त देव प्रतिमाओं को पत्र, पुष्प और वनस्पतियों से सजाया गया, उन्हें नये शृंग धारण करवाये गये। देव प्रतिमाओं के सम्मुख यव, धान्य, इक्षु, फल, दुग्ध, मधु, आसव, पर्क एवं सुरा अर्पित किये गये। चारों दिशाओं से आती मंगल ध्वनियों के बीच सैंकड़ों पुजारियों ने समस्त दैवीय विधान, प्रजनन देवी और प्रजनक देव के अभिषेक, अनुष्ठान एवं पूजन सम्पन्न करवाये।

विविध पुरों से आये नर-नारी अपने साथ कई प्रकार के श्रेष्ठ पदार्थ मातृदेवी एवं पशुपति को अर्पित करने के लिये लाये थे। रात्रि की वर्षा में बहुत सी सामग्री भीग कर खराब  हो गयी किंतु फिर भी जो उत्तम सामग्री बची थी वह भी इतनी विपुल मात्रा में थी कि उसी से मोहेन-जो-दड़ो के समस्त महालय भर गये।

बहुत से नर-नारियों ने शरीर के वस्त्र, आभूषण और केश देवताओं को अर्पित किये। मंदिरों के बाहर शंख, कौड़ी, घोंघे, हस्तिदंत, मृत्तिका, शृंग, स्वर्ण, रजत, ताम्र एवं कांस्य आदि विविध सामग्री से निर्मित आभूषण, गोमेद, अमेजन तथा वैदूर्य के ढेर लग गये। विपुल सामग्री पुजारियों द्वारा  नागरिकों में प्रसाद के रूप में वितरित कर दी गयी। मातृदेवी को चैड़े फल के खाण्डे से अज अर्पित किये गये। इस अनुष्ठान के पूरा होने तक दोपहर हो चली।

होने को तो समस्त अनुष्ठान वैसे ही हो रहे थे जैसे कि हर वर्ष हुआ करते थे किंतु आज किसी भी आयोजन में स्वामी किलात सम्मिलित नहीं हुए। वृद्ध सैंधवों ने आँखे फाड़-फाड़ कर देखा किंतु पशुपति महालय के प्रधान पुजारी किलात किसी भी अनुष्ठान में दिखायी नहीं दिये। समस्त अनुष्ठान महालय के अन्य पुजारी करवा रहे थे। ऐसा पहले कभी नहीं हुआ।

बूढ़ों ने इसका एक ही अर्थ लगाया कि स्वामी रुष्ट हैं। जब सैंधवों के संरक्षक, अदृश्य शक्तियों के स्वामी स्वयं महान किलात ही सैंधवों से रुष्ट हो जायें तो सैंधवों का रक्षण कौन करेगा! कहाँ हैं स्वामी किलात! यह प्रश्न सैंकड़ों वृद्ध सैंधवों ने सैंकड़ों अन्य वृद्ध सैंधवों से किया किंतु किसी के पास इस प्रश्न का उत्तर नहीं था। अज्ञात अमंगल की आशंका वृद्ध हृदयों में व्याप्त हो गयी।

– अध्याय 36, मोहनजोदरो की नृत्यांगना, ऐतिहासिक उपन्यास, लेखक – डॉ. मोहनलाल गुप्ता

जयघोष (37)

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जयघोष

सेनप सुनील ने पुर की प्राचीर पर खड़े होकर अपना विकराल खड्ग मुक्त भाव से आकाश में लहराया और उच्च स्वर में जयघोष किया- ‘कृण्न्वतो विश्वम् आर्यम्।’ समस्त आर्य वीरों ने सेनप सुनील का जयघोष सुनकर हर्षध्वनि की और जो जहाँ स्थित था, वहीं से उसने अपने शस्त्र हवा में लहराये।

आर्य चतुरंगिणी कई दिनों से असुरों के इस पुर को घेर कर खड़ी थी किंतु असुरों की रक्षण व्यवस्था इतनी प्रबल थी कि आर्य उसे भेद पाने में स्वयं को असमर्थ पा रहे थे। सरस्वती के त्वरित प्रवाह की भांति चलने वाला आर्यों का चतुरंगिणी रूपी नद यहाँ आकर ठहर सा गया था। जिस चतुरंगिणी के प्रवाह में असुरों के शत-शत पुर रेत के ढूह के समान तिरोहित हो गये थे उसी विजयी चतुरंगिणी के समक्ष असुरों का यह पुर दुर्गम चुनौती बनकर खड़ा था।

जैसे ही आर्य सैन्य पुर पर आघात करने के लिये आगे बढ़ता वैसे ही प्राचीर पर खड़े असुर बाणों एवं प्रस्तरों की सघन वर्षा करके उसका मार्ग अवरुद्ध कर देते। विपुल प्रयास करके भी आर्य सैनिक पुर के निकट नहीं पहुँच पाये थे। दिवस पर दिवस व्यतीत होते जा रहे थे किंतु न तो राजन् सुरथ, न सेनप सुनील और न ही आर्य अतिरथ इस कठिनाई से निकलने का कोई मार्ग ढूंढ पा रहे थे।

जन के पुरोहित के रूप में समरांगण में उपस्थित ऋषिश्रेष्ठ सौम्यश्रवा की भी चिंता का कोई पार न था। वे प्रतिदिन अग्नि, इन्द्र, मित्र तथा वरुण आदि देवों का आह्वान कर राजन् सुरथ को विजयी होने का आशीर्वाद देते थे किंतु आशीर्वाद था कि फलीभूत होता दिखायी नहीं देता था।

 क्या इस अभियान पर यहीं विराम लग जायेगा! कठिनाइयों के कितने समुद्र पार करके आर्य वाहिनी इस स्थिति तक पहुँच पायी थी! अब तक तो हर कठिनाई का अंत एक बड़ी सफलता में हुआ था किंतु क्या अब और कोई सफलता आर्यों के भाग्य में नहीं लिखी है! कितना समय तो उन्हें असुरों के विरुद्ध अभियान चलाने के लिये आर्य-जनों से समर्थन एवं सैनिक जुटाने में लग गया था!

यह एक सुखद संयोग ही था कि राजन् सुरथ भरत, जह्नु, अनु और भृगु आदि जिस किसी भी आर्य-जन में अपनी चतुरंगिणी लेकर पहुँचे, उनका उत्साह से स्वागत हुआ। एक भी जन ऐसा नहीं था जिसने आर्य सुरथ की योजना का विरोध किया हो। राजन् सुरथ के प्रयास से प्रत्येक जन ने अपना राजन् बनाया तथा अपने जन के वीरों को अपने राजन् के नेतृत्व में चतुरंगिणी के साथ विदा किया।

प्रत्येक आर्य जन से राजन् सुरथ को कुछ न कुछ अतिरिक्त सहयोग अवश्य मिला। किसी जन से अश्व तो किसी जन से रथ। किसी जन से सैनिक तो किसी जन से अस्त्र-शस्त्र। उसी का परिणाम था कि जैसे-जैसे चतुरंगिणी आगे बढ़ी उसका आकार भी बढ़ता गया था।

जब आर्य सुरथ और सेनप सुनील को विश्वास हो गया कि अब वे असुरों से युद्ध करने में सक्षम हैं तो उन्होंने आर्य भूमि से बाहर निकल कर असुरों के पुरों पर आक्रमण करने का निश्चय किया। इसी के साथ आरंभ हुआ असुरों को मरुस्थल की ओर धकेलने का महाअभियान। असुरों के पुर टूटते गये और चतरुंगिणी आगे बढ़ती रही। एक के बाद एक सरिता का तट और एक के बाद एक असुरों का पुर। आर्यों की विजय पताका सब ओर फहरायी गयी।

बहुत से आर्यों ने अपनी छाती पर व्रण खाये। बहुत से आर्य-वीरों के अंग भंग हो गये। बहुत से आर्यों ने अपने प्राण गंवाये किंतु असुरों को सप्तसिंधु प्रदेश से खदेड़ने का कार्य निरंतर आगे बढ़ता रहा। सिंधु नद के महाप्रवाह की भांति चतुरंगिणी आगे बढ़ती रही। अब तक कोई आसुरि शक्ति चतुरंगिणी का मार्ग नहीं रोक पायी थी किंतु अस्किनी के तट पर स्थित असुरों का यह दुर्ग अचानक ही चतुरंगिणी का मार्ग रोक कर खड़ा हो गया।

कुछ आर्यवीरों ने राजन् सुरथ को सुझाव दिया कि अब तक पर्याप्त संख्या में असुरों को सप्तसिंधु प्रदेश से निष्कासित किया जा चुका है। अतः इस पुर को छोड़कर चतुरंगिणी पुनः परुष्णि के तट पर स्थित अपने जन को लौट जाये और आर्य जनों को संगठित करने  तथा आर्य-जनपदों की स्थापना करने का कार्य आरंभ किया जाये।

राजन् सुरथ सहमत नहीं हैं इस सुझाव से। उनकी मान्यता है कि यदि असुरों का यह पुर नष्ट नहीं किया जा सका तो अब तक के सारे प्रयास निष्फल हो जायेंगे। जिन असुरों को सप्तसिंधु प्रदेश से बाहर खदेड़ा गया है, वे आर्यों की इस पराजय की सूचना पाकर फिर से लौट आयेंगे। ऋषिश्रेष्ठ सौम्यश्रवा और सेनप सुनील को लगा कि राजन् सुरथ ठीक कहते हैं। परिणाम चाहे जो भी हो इस पुर को तो टूटना ही होगा।

कई दिनों के चिंतन के पश्चात् राजन् सुरथ ने एक योजना तैयार की। विगत रात्रि में आयोजित समिति में इस योजना पर विस्तार से चर्चा की गयी। योजना अच्छी थी और सभी को विश्वास था कि यदि कुछ अप्रत्याशित नहीं घटा तो यह सफल रहेगी।

योजना के अनुसार आर्य अतिरथ की हस्ति सेना ऊषा के आगमन से बहुत पहले असुरों के पुर की ओर चल दी। पर्याप्त अंधकार होने के कारण विशालाकाय हस्ति भी दूर से देखे नहीं जा सकते थे। इसलिये यह सैन्य बिना किसी व्यवधान के पुर की ओर चलता ही चला गया। हस्तियों की ओट में अश्वारूढ़ सैन्य था जिसका संचालन स्वयं राजन् सुरथ कर रहे थे।

योजना के अनुसार यदि असुर हस्तियों को पुर तक पहुँचने से पहले ही देख लेते तो भी हस्ति सेना को तब तक बाणों की वर्षा झेलनी थी जब तक कि अश्वारूढ़ सैनिक ठीक प्राचीर के निकट तक नहीं पहुँच जाते। पदाति सैन्य को अश्वसेना के पीछे रखा गया ताकि जब तक अश्वसेना पुर में धंसारा करे तब तक पदाति सैन्य पीछे से पहुँच कर उनकी सहायता के लिये उपलब्ध हो जाये। रथ सैन्य शिविर में रहा तथा यत्र-तत्र अग्नि प्रज्वलित कर यह भ्रम बनाये रहा कि अभी आर्य सैन्य शिविर में ही है।

 आर्य सुरथ की योजना का पहला भाग अक्षरशः सफल रहा था। प्राचीर पर सन्नद्ध असुर सैन्य आर्यों के युद्ध शिविर में प्रज्वलित अग्नि पर ही दृष्टि गड़ाये रहा और अंधकार में तेजी से अग्रसर होते हस्तिसैन्य को नहीं देख पाया। जैसे ही सूर्य की प्रथम किरण धरित्री पर गिरी तो आर्यों के विशाल सैन्य को प्राचीर के ठीक निकट देख कर असुरों का रक्त जम गया। कहाँ से प्रकट हुआ यह विशाल सैन्य! गगन मार्ग से चला आया अथवा धरित्री फोड़ कर निकला! 

असुरों ने पत्थर और बाणों की वर्षा आरंभ की किंतु अश्वारोही आर्यों की टुकड़ी विशालाकाय हस्तियों की ओट में पुर के मुख्य द्वार पर जा अड़ी। आर्य अतिरथ ने हस्तियों की एक पूरी पंक्ति ही मुख्य द्वार पूर हूल दी। विशालाकाय हस्तियों का प्रबल आघात पाकर मुख्य द्वार चरमरा कर टूट गया और आर्य अश्वारोही हहराती लपटों के समान पुर में प्रवेश कर गये। ठीक यही वह समय था जब पदाति सैनिकों की पंक्तियाँ भी पुर में जा पहुँचीं।

पुर का द्वार टूटा हुआ जानकर असुर प्राचीरों से नीचे उतर आये। दोनों पक्षों में घमासान मच गया। दो प्रहर दिवस जाते-जाते असुरों के रक्त तथा मज्जा की कीच से विशाल क्षेत्र सन गया। असुर और अधिक विरोध नहीं कर सके। बचे हुए असुरों ने अपने शस्त्र त्यागकर पराजय स्वीकार कर ली। सेनप सुनील ने पुर की प्राचीर पर खड़े होकर अपना विकराल खड्ग मुक्त भाव से आकाश में लहराया और उच्च स्वर में जयघोष किया- ‘कृण्न्वतो विश्वम् आर्यम्।’

समस्त आर्य वीरों ने सेनप सुनील का जयघोष सुनकर हर्षध्वनि की और जो जहाँ स्थित था, वहीं से उसने अपने शस्त्र हवा में लहराये। आर्य अतिरथ ने अपने विशालाकाय हस्ति पर खड़े होकर आर्यों की सूर्य-पताका लहरायी। चिर-प्रतीक्षित विजय प्राप्त हो चुकी थी। आज की विजय आर्यों के लिये बड़ी विजय थी। इसी के साथ उन्होंने कुभा[1] सुवास्तु [2] तथा क्रुमु [3] के तट असुरों से मुक्त करवा लिये थे।

आर्य सुरथ ने युद्ध में मृत आर्यों का अग्नि संस्कार तथा मृत असुरों का शवाधान करवाया। पराजित असुरों ने आर्य भूमि छोड़कर मरूस्थल के लिये तत्काल प्रस्थान करना स्वीकार कर लिया।

– अध्याय 37, मोहनजोदरो की नृत्यांगना, ऐतिहासिक उपन्यास, लेखक – डॉ. मोहनलाल गुप्ता


[1] काबुल।

[2] स्वात।

[3] कुर्रम।

चन्द्रवृषभ (38)

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चन्द्रवृषभ

भूदेवी को गर्भवती बनाने वाले चन्द्रवृषभ  की भूमिका में शिल्पी प्रतनु यथा समय उपस्थित हुआ। आज उसके लिये कठिन परीक्षा की घड़ी थी।

विगत वर्षों की भांति इस वर्ष भी मोहेन-जोदड़ो वासियों एवं सैंधव प्रदेश के विभिन्न भागों से आये सैंधवों की सुविधा के लिये पशुपति महालय परिसर में विशाल वितान बनाया गया था जो रात्रि में हुई भारी वर्षा के कारण कुछ क्षतिग्रस्त हो गया था किंतु मध्याह्न होने तक चतुर सैंधव कर्मकारों ने उसे पुनः समुचित रूप दे दिया है।

दीर्घ वितान के नीचे अलग-अलग दर्शक दीर्घायें बनायी गयी हैं। अनुष्ठान और पूजनकर्म से निवृत्त होकर सैंधव पाण्डाल में पहुँचने आरंभ हो गये। चंचल शिशुओं, उत्सुक रमणियों और उत्साही युवाओं के साथ चिंतित सैंधव वृद्ध भी मन में आशंकाओं के घुमड़ते घनघोर बादल लेकर आ बैठे। जाने कब क्या अनहोनी घटित हो!

उनके मस्तिष्क में विगत दिनों से उथल-पुथल मचा रही उत्तेजना यहाँ आकर चरम पर पहुँच गयी लगती थी। उन्होंने देखा कि विशिष्ट जनों के लिये बने पाण्डाल में महालयों के पुजारी और पणि आकर बैठ गये हैं। सैंधव सभ्यता के महान् स्वामी किलात के लिये बना आसन रिक्त है।

सूर्य देव अब भी स्थूलकाय कृष्णवर्णी बादलों की ओट में थे। यह ज्ञात करना संभव नहीं था कि इस समय वे आकाश के किस कोण में विराजमान हैं। जब दीर्घ प्रतीक्षा के पश्चात् भी सूर्य देव के दर्शन नहीं हुए तो अनुमान से उन्हें आकाश के ठीक मध्य में स्थित हुआ मानकर पशुपति महालय के विशाल ताम्रघण्ट पर काष्ठ प्रहार किया गया और मृदंग वादक मयाला ने मृदंग पर थाप दी। सहस्रों घुंघरू झन्कृत हो उठे। मयाला की लम्बी और पतली अंगुलियाँ विद्युत की गति से मृदंग पर आघात करने लगीं-

थक्किट     धिक्क्टि     थोंक्क्टि     नक्टि    तथक्टि

धिद्धिक्क्टि  थों   थोंक्टि  नंनाक्टि  त्तताथक्क्टि  किटक्टि

द्धि  द्ध  धि  कि ट क्टिक्टि।  थों थों थों थों  क्टि  क्टि

कि कि नं नाँ नाँ क्टि क्टि क्टि। त्तत्त तथक्क्टि किटक्टिक्टि।

झांझ, मृदंग, शंख और नूपुरों की मिश्रित ध्वनि से साम्य बैठाती हुई सैंकड़ों नृत्यांगनायें पंक्तिबद्ध होकर महालय के विशाल आगार से निकलने लगीं। शुभ्र वसना सैंधव-बालाओं ने मंच का एक वलय पूर्ण किया और विद्युत की तरह लहराती हुई नृत्यांगना रोमा मंच पर अवतरित हुईं।

रोमा के शीश, मस्तक, कर्ण, कण्ठ, कटि, बाहु, और करतल-पृष्ठों से लेकर जंघाओं, पैरों, सुचिक्कण वर्तुलों, पुष्ट नितम्बों और क्षीण कटि के डमरू मध्य में पीत-अयस से निर्मित विविध आभूषण सुशोभित हैं किंतु अभी वह समय नहीं आया जब नृत्यांगना अथवा उसके आभूषण दर्शकों को दिखाई दें । इस पर भी नृत्यांगना की उपस्थिति दर्शकों को चिन्ता के अथाह समुद्र से बाहर खींच लाने में समर्थ सिद्ध हुई।     

सैंधव समुदाय अपनी दुश्चिंताओं को विस्मृत कर केवल और केवल वर्तमान में स्थित हो गया।

पशुपति को समर्पित नृत्यमयी स्तुति के पश्चात् रोमा और उसकी सखियों ने पारंपरिक चन्द्रवृषभ  नृत्य आरंभ किया। भूदेवी को गर्भवती बनाने वाले चन्द्रवृषभ  की भूमिका में शिल्पी प्रतनु यथा समय उपस्थित हुआ। आज उसके लिये कठिन परीक्षा की घड़ी थी। ठीक वैसी ही जब गरुड़ों के आक्रमण के समय उपस्थित हुई थी। ठीक वैसी ही जब पिशाचों से घिर जाने के समय उपस्थित हुई थी। अथवा ठीक वैसी ही जब नग्न अवस्था में ही अचानक आर्य अश्वारोहियों से घिर जाने पर हुई थी।

 देवी रोमा ने प्रतनु से विचार-विमर्श किये बिना घोषणा कर दी कि वह वार्षिक समारोह में तभी नृत्य करेगी जब प्रतनु चंद्रवृषभ के रूप में उपस्थित रहेगा तो संकट में पड़ गया प्रतनु। कहाँ चन्द्रवृषभ नृत्य का निष्णात कलागुरु किलात और कहाँ नृत्यकला से नितांत अनभिज्ञ शिल्पी प्रतनु! कहीं कोई जोड़ ही नहीं।

कैसे कर सकेगा वह सैंधव वासियों को संतुष्ट! क्या वे प्रतनु को चन्द्रवृषभ के रूप में स्वीकार कर पायेंगे!  उसने रोमा से अनुरोध किया कि वह अपनी घोषणा को वापस ले-ले और स्वामी से क्षमा याचना कर ले ताकि जन-सामान्य की सहानुभूति रोमा व प्रतनु के साथ बनी रहे।

हठी रोमा! वह भला कब पीछे मुड़ने वाली थी! उसने प्रतनु की एक न मानी। जो घोषणा हो गयी, सो हो गयी। लाभ हानि की गणना करनी उसे नहीं आती। वह तो बस प्रतनु के साथ ही नृत्य करेगी, अन्य किसी के साथ नहीं। ऐसे संकट में प्रतनु को रानी मृगमंदा की स्मृति हो आयी।

उस दिन जब रानी मृगमंदा ने उसे नृत्यकला सिखाने का हठ कर लिया था, तब बहुत संकोच हुआ था उसे। उसे कब पता था कि नृत्यकला की आवश्यकता तो उसे मोहेन-जो-दड़ो पहुँचते ही  होगी। नागों के उस लोक में रहते हुए, तूर्ण के पश्चात् अन्य अवसरों पर भी प्रतनु ने निऋति और हिन्तालिका के साथ नृत्य किया था जिससे अब उसे नृत्य करने में संकोच नहीं रह गया था। फिर भी नागों के नृत्य करने के ढंग और सैंधवों के नृत्य करने के ढंग में बड़ा अंतर है। चन्द्रवृषभ के लिये तो कठिन अभ्यास आवश्यक है।

प्रतनु ने देवी रोमा से कहा कि जब उसने घोषणा की है तो वही उसे चंद्रवृषभ नृत्य भी सिखाये। रोमा को भला यह कब अस्वीकार था! ‘प्रिय’ को शिष्य के रूप में पाकर तो जैसे वह निहाल हो गयी। उसने नृत्यकला के सारे रहस्य शिथिल करके प्रतनु के समक्ष प्रकट कर दिये। दिन भर के अभ्यास के पश्चात प्रतनु ने अनुभव किया कि यह उतना कठिन नहीं है जितना कि वह समझता रहा है।

वह रोमा द्वारा बतायी गयी मुद्राओं का अनुसरण करने का प्रयास करने लगा। अन्त्ततः वह संध्या भी आ गयी जब वरुण प्राची [1] से प्रकट हुआ। प्रतनु प्राण-पण से अभ्यास में जुटा रहा। उधर आकाश में वरुण घनघोर ताण्डव करते रहे और इधर प्रतनु देवी रोमा से नृत्य की एक-एक मुद्रा सीखता रहा। सृष्टि के समस्त व्यापारों से अनभिज्ञ दोनों प्रणयी यह जान ही नहीं सके कि कब वह काल-रात्रि बीती और कब दिन निकला ।

प्रतनु मंच पर प्रकट हुआ। मन में बरबस प्रवेश कर गये दैन्य को त्याग कर उसने अपने शीश पर बंधे दीर्घकाय शृंग तथा पीठ पर बंधे सुकोमल कर्पास कूबड़ को हिलाया। क्षण भर के लिये उसने मंच पर मातृदेवी के वेश में उपस्थित रोमा को देखा और उसी अद्भुत तीव्रता से पद संचालन करने लगा जिस अद्भुत तीव्रता का परिचय किलात दिया करता था।

सैंधव समुदाय श्वांस रोके बैठा रहा। स्वामी किलात के स्थान पर क्षुद्र शिल्पी चंद्रवृषभ बनकर मातृदेवी को गर्भवती बनाने जा रहा है, कहीं अनिष्ट इसी समय तो नहीं घट जायेगा! जैसे-जैसे समय व्यतीत होता गया, जनसमुदाय आश्वस्त होता गया कि कहीं कुछ अनिष्ट नहीं घट रहा।

अनुरागी प्रतनु को चन्द्रवृषभ के वेश में मंच पर उपस्थित हुआ देखकर रोमा की देह में मानो तड़ित् का संचार हुआ। वह द्रुत गति से वाद्यों के साथ लय बैठाते हुए नृत्य की अत्यंत जटिल मुद्राओं का प्रदर्शन करने लगी। पद लालित्य एवं हस्त लाघव का ऐसा बेजोड़ संगम रोमा के नृत्य में आज से पहले कभी नहीं देखा गया था।

दर्शकों ने अपने हृदय कस कर पकड़ लिये। कलहंसिनी की क्षीण ग्रीवा के सदृश्य लहराती हुई रोमा की भुजायें आठों दिशाओं में आनंद के नवीन वलय निर्मित कर रही थी। नृत्यांगना की देह पर विभूषित मेखलाओं तथा नूपुरों से निकलती हुई सुमधुर ध्वनियाँ संगीत के नवीन प्रमिमान स्थापति कर रही थीं।

उल्लास से नृत्यलीन मातृदेवी के गर्भाधान का दृश्य पूरे कौशल के साथ दर्शाया गया। चंद्रवृषभ ने अनुनय से मातृदेवी को प्रसन्न करना चाहा किंतु मातृदेवी प्रसन्न नहीं हुई। चंद्रवृषभ ने मातृदेवी को ना-ना प्रकार के प्रलोभन दिये किंतु मातृदेवी ने उनकी ओर देखा तक नहीं।

चंद्रवृषभ कुपित हुआ और अपने विशाल शृंगों से मातृदेवी पर आघात करने दौड़ा किंतु मातृदेवी भयभीत नहीं हुई, उसने चन्द्रवृषभ का सिर काट दिया। चंद्रवृषभ अपने वास्तविक स्वरूप में प्रकट हुआ और पशुपति के रूप में दिखाई दिया। मातृदेवी अपना समस्त गर्व त्यागकर पशुपति के सम्मुख विनीत हुई। पशुपति ने सृष्टि की रचना हेतु मातृदेवी को गर्भवती होने का आदेश दिया जिसे मातृदेवी ने सहर्ष स्वीकार कर लिया।

मंच पर नृत्यलीन नृत्यांगनाओं के गुल्म में क्षण भर को अदृश्य रह कर पशुपति प्रजनक देव के रूप में तथा मातृदेवी प्रजनन देवी के रूप में प्रकट हुए। जैसे ही प्रजनन देवी ने प्रजनक देव के साथ रमण के लिये पहला पद आगे बढ़ाया, ठीक उसी क्षण नृत्यांगना रोमा लड़खड़ा कर मंच पर गिर गयी। सैंधवों को जैसे काठ मार गया। यह कैसा व्यवधान था! स्वयं रोमा भी कुछ समझ न सकी। उसने उठने का प्रयास किया किंतु उसके पैरों ने जैसे कार्य करना बंद कर दिया। विपुल प्रयास करने पर भी वह खड़ी न हो सकी।

मातृदेवी के गर्भाधान का अनुष्ठान अपूर्ण रह गया। सृष्टि के निर्माण हेतु दोनों आद्यशक्तियाँ रमण न कर सकीं। मातृदेवी गर्भवती नहीं हुईं। मातृदेवी के गर्भ से नदी-पर्वत, वनस्पति, पशु-पक्षी, सर्प-मत्स्य, मृग-सिंह, नर-नारी प्रकट नहीं हुए। सैकड़ों सैंधव अपने स्थान पर खड़े होकर उत्तेजना से चिल्लाने लगे।

महान शक्तियों के स्वामी किलात ही मातृदेवी को गर्भवती कर सकते हैं। एक क्षुद्र सैंधव द्वारा मातृदेवी को गर्भवती बनाने का प्रयास पातक है। तभी तो आज चन्द्रवृषभ मातृदेवी को गर्भवती नहीं बना सका। स्वामी किलात कहाँ हैं ? उन्हें बुलाओ, वे ही मातृदेवी को गर्भवती बना सकते हैं। यदि मातृदेवी गर्भवती नहीं हुई तो सम्पूर्ण सैंधव सभ्यता नष्ट हो जायेगी।

प्रतनु ने चन्द्रवृषभ का सिर उतार कर एक तरफ रख दिया और रोमा को उठाने का प्रयास करने लगा। रोमा के पैरों में लेशमात्र भी शक्ति नहीं रही। उसके पैर मिट्टी के लोथ की तरह निर्जीव हो गये थे। शिल्पी का मन हा-हा-कार कर उठा। क्या वह कठिन परीक्षण में असफल सिद्ध होने जा रहा था!

अचानक मंच के मध्य पर विकरा वेशधारी किलात प्रकट हुआ। उसे देखते ही रोष से चिल्लाते हुए सैंकड़ों कण्ठ मौन हो गये। सैंधव सभ्यता का महान स्वामी किलात उनके मध्य उपस्थित था, जो उन्हें सर्वनाश से बचा सकता था। अब उन्हें किसी बात का भय नहीं था। जो उत्साही युवक किलात के स्थान पर शिल्पी द्वारा नृत्य किये जाने के पक्ष में थे, उन्हें अपनी भूल पर पश्चाताप था।

बड़े-बूढ़ों का कहना सत्य था, मातृदेवी को केवल महान स्वामी ही गर्भवती बना सकता है। प्रतनु ने देखा, किलात के चेहरे पर क्रूर मुस्कान खेल रही है। वह विजय गर्व से अपनी स्थूल गर्दन को पूरी तरह उन्नत करके खड़ा है। किलात ने उच्च स्वर में आदेश दिया- ‘दोनों पापियों को बंदी बना लिया जाये।’

  – ‘महान् स्वामी किलात की जय।’ सैंकड़ों कण्ठों से निकला हुआ जयघोष दूर-दूर तक फैल गया। नगर रक्षकों ने आगे बढ़कर शिल्पी प्रतनु और महालय की प्रमुख नृत्यांगना रोमा को रस्सियों में जकड़ लिया।

  – ‘पापियों को दण्ड दो। मातृदेवी की मर्यादा भंग करने वालों को दण्ड मिलना ही चाहिये।’ सहस्रों कण्ठ फिर से चिल्लाने लगे। चारों और रोष का लावा फूट पड़ा।

राजनीति के चतुर खिलाड़ी किलात ने परख लिया कि यही वह अवसर है जब अपने शत्रु पर भरपूर वार किया जाये। अपनी दोनों भुजायें हवा में उठाकर उसने सैंधवों को शांत होने का संकेत किया और बोला- ‘मातृदेवी को पातकी शिल्पी की बलि चाहिये।’

क्षण भर के लिये पाण्डाल में सन्नाटा छा गया। अचानक एक वृद्ध सैंधव चिल्लाया- ‘मातृदेवी यदि पातकी की बलि चाहती हैं तो फिर देर किस बात की है!’

  – ‘हाँ-हाँ, मातृदेवी को प्रसन्न करने के लिये पातकी शिल्पी की बलि चढ़ा देना ही उचित है।’ सहस्रों कण्ठों ने प्रौढ़ सैंधव का समर्थन किया।

ठीक उसी समय सैंधवों ने देखा कि महालय की वृद्धा दासी वश्ती मंच पर खड़ी हो कर सैंधवों को सम्बोधित करके चिल्ला रही है किंतु उसकी आवाज लोगों तक पहुँच नहीं पा रही। दासी की बात सुनने के लिये सैंधव समुदाय मौन हो गया। दासी वश्ती बुरी तरह हांफती हुई बोली- ‘सत्य वह नहीं है जो आप लोगों को बताया गया है। सत्य कुछ और ही है। यदि आप सत्य जानना चाहते हैं तो मेरे साथ महालय में चलिये और सत्य के दर्शन अपनी आँखों से कर लीजिये।’

  – ‘मिथ्या प्रलाप करती है यह वृद्धा दासी। रक्षको! इसे भी बंदी बना लो।’ स्वामी किलात ने उच्च स्वर में कहा। नगर रक्षक रस्सियाँ लेकर आगे बढ़े।

  – ‘नहीं-नहीं वृद्धा की बात सुने बिना उसे बंदी बनाया जाना उचित नहीं है।’ अनेक सैंधव चिल्ला उठे। नगर रक्षक वहीं ठहर गये।’

  – ‘मैं कहता हूँ, बंदी बना लो इस विक्षिप्त दासी को।’ किलात ने फिर नगर रक्षकों को निर्देश दिया।

  – ‘नहीं! वृद्धा की बात सुने बिना इसे बंदी नहीं बनाया जा सकता।’ अनेक युवक कूद कर मंच पर जा चढ़े, बोलो माता, आप क्या कहना चाहती हैं, किस सत्य के दर्शन करवाना चाहती हैं ?

  – ‘स्वामी किलात ने नृत्यांगना रोमा के साथ छल किया है। अभिचार किया है उस पर।’

  – ‘छल! अभिचार!’ सैंकड़ों लोग एक साथ चिल्लाये।

  – ‘हाँ-हाँ, छल! अभिचार! आप चलिये मेरे साथ। आपको विश्वास हो जायेगा।’

  – ‘हाँ-हाँ, चलकर देखना चाहिये, वृद्धा क्या दिखाना चाहती है!’ एक युवा सैंधव ने वृद्धा का समर्थन किया।

किलात का श्यामवर्णी चेहरा पूरी तरह काला पड़ गया। कुछ युवकों ने उसे घेर लिया ताकि वह भाग नहीं सके। मातृदेवी के वेश में अनावृत्त पड़ी रोमा लज्जा और संकोच से धरती में गढ़ी जा रही थी। प्रतनु ने उसे अपना उत्तरीय प्रदान किया जिसे रोमा ने अपनी देह पर लपेट लिया। कुछ युवकों ने नृत्यांगना रोमा को सहारा दिया। रोमा ने देखा कि इस बार वह किंचित् प्रयास से उठकर खड़ी हो गयी है। क्या चमत्कार है यह! कहीं वश्ती सत्य ही तो नहीं कह रही! कहीं स्वामी किलात ने किसी तरह का अभिचार तो नहीं किया था उस पर! सहस्रों सैंधव नर-नारी वृद्धा वश्ती के पीछे चल पड़े।

सैंधवों ने पशुपति महालय में जाकर देखा तो उनके नेत्र विस्फरित हो गये। शिल्पी प्रतनु द्वारा दो वर्ष पहले बनायी गयी प्रतिमा के दोनों पाँव टूटे पड़े हैं। चारों ओर रक्त, लालपुष्प, लालचूर्ण, यव, मद्य आदि अभिचार सामग्री बिखरी पड़ी है। लगता था जैसे रात्रि भर कोई यहाँ मलिन अनुष्ठान करता रहा है।

– ‘नहीं ऽ ऽ ऽ ऽ!’ अपनी खण्डित प्रतिमा को देखते ही अदम्य पीड़ा से चीख पड़ी रोमा। यह कैसा दण्ड है स्वामी! दण्डित करना था तो आप मुझे करते! इस प्रतिमा से तो आपकी कोई शत्रुता नहीं थी! यह प्रतिमा तो सैंधवों की शिल्पकला के चरम पर पहुँचने की घोषणा थी,, युगो-युगों तक स्मरण रखी जाने वाली कला प्रतिरूप थी।

तुमने इसे नष्ट कर दिया! ऐसा क्यों किया स्वामी!’ रोमा विक्षिप्त होकर प्रलाप कर उठी। जिस अदम्य पीड़ा को वह इस समय अनुभव कर रही थी, इतनी पीड़ा तो उसे मंच पर लड़खड़ा कर गिरते समय भी नहीं हुई थी। वह धरती पर गिर गयी और फूट-फूट कर रोने लगी।

परिस्थितियों को परिवर्तित हुआ देखकर नगर रक्षकों ने शिल्पी प्रतनु के बंधन खोल दिये। वह धरती पर गिरी हुई रोमा को चुप करने का प्रयास करने लगा किंतु रोमा लगातार करुण क्रंदन किये जा रही थी। सैंधववासी हत्बुद्धि हो उसे देखने लगे।

रुदन के कारण रोमा की हिचकियाँ बंध गयी। विपुल देर तक रुदन करते रहने के पश्चात् वह पुनः खड़ी हुई और किलात को सम्बोधित करके कहने लगी- ‘दुष्ट किलात तू कैसा स्वामी है! तू तो निर्मम वधिक है। तू सैंधवों का रक्षक कैसे हो सकता है! मुझ पर अभिचार करके और शिल्पी प्रतनु की बलि चढ़ाने का प्रयास करके तूने एक नहीं कई अपराध किये हैं। अपनी वासना की पूर्ति के लिये तूने दो प्रणयी आत्माओं के साथ छल किया है, उन्हें अलग करने की कुत्सित चेष्टा की है। मुझसे नृत्यकला छीनी है।     

सैंधवों का शिल्प-गौरव नष्ट किया है। मातृदेवी के गर्भाधान का अनुष्ठान भंग किया है। युगों-युगों से चला आ रहा विश्वास तोड़ा है। तू सैंधवों का संरक्षक नहीं तू तो उन्हें नष्ट करने वाला पिशाच है।’

रोमा का प्रलाप रुकने का नाम नहीं लेता था। ऐसा लगता था मानो वर्षों से संचित पीड़ा आज उसके रोम-रोम से निकल कर बह जाना चाहती हो।

  – ‘अपनी जिस शक्ति पर तुझे इतना अभिमान है, उस शक्ति के कारण ही तू नष्ट हो जायेगा। नष्ट हो जायेगी तेरी समस्त सत्ता जिसमें दो प्रणयी आत्माओं को मिलने नहीं दिया जाता। नष्ट हो जायेगा यह मोहेन-जो-दड़ो जहाँ कलाकारों से उनकी कला छीन ली जाती है। नष्ट हो जायेगी सैंधव सभ्यता, जहाँ नारी को निर्वस्त्र कर नृत्य करने पर विवश किया जाता है।

नष्ट हो जायेंगे चहुन्दड़ो, पेरियानो, सुत्कोटड़ा झूंकरदड़ो, अमरी और ऐलाना, जहाँ से प्रतिवर्ष सहस्रों की संख्या में नागरिक निर्वसना देवबालाओं का नृत्य देखने आते हैं। सैंधव सभ्यता के समस्त पुरों में शृगाल, श्वान और चमगादड़ नृत्य करेंगे। जिस मातृदेवी के साथ तूने अपघात किया है वह मातृदेवी छोड़ेगी नहीं तुझे। मातृदेवी के कोप से सप्त सिंधुओं का जल सैंधव सभ्यता के प्रत्येक नगर में जा घुसेगा और सारी सभ्यता मिट्टी के टीलों में बदल जायेगी।

यह एक प्रणयी आत्मा का श्राप है, एक नृत्यांगना का श्राप है। जा तू नष्ट हो जा, अपने समस्त वैभव और अपनी शक्तियों के साथ। जा नष्ट हो जा अपने समस्त दंभ और अपनी सत्ता के साथ।’ 

किलात पर घृणायुक्त दृष्टि डालकर रोमा ने मुँह फेर लिया और शिल्पी प्रतनु का हाथ पकड़ कर बोली- ‘आओ शिल्पी हम कहीं और चलें। यह पुर तुम्हारे रहने के योग्य नहीं।’ किलात के भ्रष्ट हो जाने से वह धर्म के बंधन से मुक्त हो गयी थी। अब उसके प्रत्यर्पण के लिये शिल्पी को स्वर्णभार अर्पित करने की आवश्यकता नहीं रही थी। रोमा को जाते हुए देखकर सैंधवों की चेतना जैसे लौट आयी।

  – ‘किलात ने सैंधवों के साथ छल किया है। किलात के कारण ही मातृदेवी के गर्भाधान का अनुष्ठान अधूरा रह गया। किलात को दण्ड मिलना चाहिये।’ सैंकड़ों सैंधव युवकों ने किलात को घेर लिया।

  – ‘मातृदेवी को शिल्पी की नहीं किलात की बलि चाहिये। एक युवक चिल्लाया।’

  – ‘हाँ-हाँ, मातृदेवी को किलात की बलि चाहिये।’ सैंकड़ों कण्ठ एक साथ चिल्लाये।

किलात ने जो सोचा था, उसका ठीक विपरीत हो गया था। स्थिति उसके हाथ से निकल गयी थी। सैंकड़ों सैंधव महान् किलात की बलि देने के लिये आतुर होकर चिल्ला रहे थे- ‘स्वामी को अभी ले चलो, मातृदेवी महालय में। इसने मातृदेवी को गर्भवती नहीं होने दिया, मातृदेवी इसकी बलि लेकर ही संतुष्ट होंगी।’

कुछ युवकों ने किलात को पशु की तरह धकेल दिया और उसे मातृदेवी के मुख्य मंदिर की ओर ले चले। अभी वे कुछ ही दूर चल पाये होंगे कि सामने से कुछ नगर रक्षक दौड़ते हुए आये। ये वे नगर रक्षक थे जो नगर प्राचीर के बाहर नियुक्त रहते हैं। वे अत्यंत वेग से दौड़े चले आ रहे थे। भय से सफेद पड़े हुए उनके चेहरे बता रहे थे कि उन्होंने साक्षात् मृत्यु के ही दर्शन कर लिये हैं।

  – ‘सावधान नागरिको! रुक जाओ, आगे मत जाओ। सिंधु का जल अप्रत्याशित रूप से बढ़ रहा है। सिंधु किसी भी क्षण प्राचीर तोड़कर पुर में प्रवेश कर सकती है। तुरंत सुरक्षित स्थान पर चले जाओ अन्यथा . . . ।’ नगर रक्षक अपनी बात पूरी कह भी नहीं पाया था कि उनके पीछे सिंधु का जल उत्ताल तरंगों पर उछलता-कूदता वहीं आ पहुँचा।

समस्त सैंधव स्वामी किलात को छोड़कर विपरीत दिशा में मुड़े किंतु सिंधु तो जैसे रोमा का आह्वान पाकर ही पुर में घुसी थी! एक प्रबल हुंकार के साथ सिंधु की गगनचुम्बी लहरें आगे बढ़ीं और समस्त सैंधवों को अपनी लपेट में ले लिया।

विपुल जल के वलय में घिर गये प्रतनु ने किसी तरह रोमा को पकड़ा किंतु इस प्रयास में वह बहुत सारा जल पी गया। उसने देखा, रोमा जल में डुबकिया लेने लगी है। प्रतनु के अपने फैंफड़ों में भी जल समाता जा रहा था। कुछ ही क्षणों में उसकी आँखों में अंधेरा उतर आया। क्षण भर के लिये प्रतनु को रानी मृगमंदा, निर्ऋति और हिन्तालिका का स्मरण हो आया।

वह जल के तीव्र वेग में बहा चला जा रहा था रोमा अब भी उसकी पकड़ में थी। उसने रोमा की देह के चारों ओर अपने बाहु कसकर लपेट लिये किंतु कुछ ही क्षणों बाद उसकी पकड़ रोमा की कलाई से शिथिल हो गयी। अब चारों ओर केवल जल ही जल दिखायी देता था। सिंधु के जल से उत्पन्न सैंधव सिंधु में ही समा गये प्रतीत होते थे।

– अध्याय 38, मोहनजोदरो की नृत्यांगना, ऐतिहासिक उपन्यास, लेखक – डॉ. मोहनलाल गुप्ता


[1] पूर्व दिशा।

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