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वक्त की दगा (117)

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जब महावतखाँ को खानखाना की कैद के समाचार मिले तो वह दूने उत्साह से भरकर खुर्रम की ओर दौड़ा। महावतखाँ को लगा कि भाग्य ने उसके लिये एक साथ दो-दो सफलतायें पाने का अवसर उपस्थित कर दिया है।

खुर्रम की हालत तो उसी समय पतली हो गयी थी जब उसकी सेनाएं खुर्रम को छोड़कर परवेज से जा मिली थीं किंतु जब खानखाना को कैद कर लिया गया तो खुर्रम की रही सही ताकत भी जाती रही।

महावतखाँ ने चारों ओर से खुर्रम को घेर लिया। उसके हाथी-घोड़े छीन लिये। धीरे-धीरे घेरा उस मुकाम पर पहुँच गया, जहाँ से महावतखाँ किसी भी दिन खुर्रम के डेरे पर आ धमक सकता था।

इस पर खुर्रम ने लानतुल्ला को महावतखाँ से संधि की बात चलाने के लिये भेजा। लानतुल्ला का वास्तविक नाम तो अब्दुल्लाखाँ फिरोज जंग था, उसे जहाँगीर ने लानतुल्ला की उपाधि दी थी। तब से वह लानतुल्ला ही कहलाता था।

लानतुल्ला का मित्र राव रतन हाड़ा इस समय महावतखाँ के लश्कर में था। लानतुल्ला ने उसी के माध्यम से संधि की बात चलाई। महावतखाँ ने लानतुल्ला से कहा- ‘यदि तेरी जगह खानखाना आकर संधि की बात करे और सब कौल करार करे तो मैं संधि करूं।’

लानतुल्ला ने यह बात जाकर खुर्रम को कह सुनाई। खुर्रम को पक्का विश्वास हो गया कि महावतखाँ और खानखाना में कोई न कोई सटपट[1]  अवश्य है। फिर भी अपना बुरा वक्त जानकर खुर्रम ने नीचे दबना ही मुनासिब समझा और खानखाना तथा दाराबखाँ को बाइज्जत अपने सामने पेश करने के आदेश दिये।

लानतुल्ला ने खानखाना और दाराबखाँ की हथकड़ियाँ और बेड़ियाँ कटवाईं तथा उन्हें नहला धुलाकर भर पेट भोजन करवाया। जब बाप बेटों को खुर्रम के सामने पेश किया गया तो खुर्रम ने अपने स्थान से खड़े होकर उनका स्वागत किया और उन्हें अपने आसन पर बैठाते हुए कहा- ‘मेरे लिये तो आज ईद हुई।’

खानखाना समझ गया कि खुर्रम का कोई न कोई स्वार्थ खानखाना से अटक गया है तभी इतनी लल्लो-चप्पो कर रहा है। उसने खुर्रम को सम्बोधित करके  कहा-

‘बिगरी बात बने नहीं, लाख करौ किन कोय।

रहिमन फाटे दूध को मथे न माखन होय।’

खानखाना का यह भाव देखकर खुर्रम उसके पैरों में गिर गया- ‘आप बड़े हैं, हर तरह से इज्जत पाने के योग्य हैं, मेरे गुनाह मुआफ करें। मुसीबत में अपने ही काम आते हैं।’

खानखाना ने खुर्रम की बजाय अपने पुत्र दाराबखाँ की ओर देखकर हँसते हुए कहा-

‘रहिमन प्रीति न कीजिये, जस खीरा ने कीन।

ऊपर से तो दिल मिला,  भीतर फाँकें  तीन।’

खानखाना की हँसी खुर्रम के कलेजे को चीर गयी फिर भी वह अपनी ही तरह का अकेला मक्कार था। वह जानता था कि खानखाना आसानी से चिकनी चुपड़ी बातों में नहीं आयेगा। उसने कुरान पर हाथ रखकर कसम खाई- ‘मुझे अपने किये पर बेहद अफसोस है। आगे से हमेशा खानखाना की मर्यादा का ख्याल रखा जायेगा। मैं अपने आप को आपके हवाले करता हूँ। मेरी इज्जत आबरू आपके हाथ में है।’

खानखाना ने कुरान को चूमते हुए कहा-

‘रहिमन खोजे ऊख में, जहाँ रसन की खानि।

जहाँ गाँठ तहँ रस नहीं यही प्रीति में हानि।’[2] 

जब खानखाना किसी भी तरह सीधे मुँह बात करने को तैयार नहीं हुआ तो खुर्रम ने अपने हरम की सारी औरतों को अपने डेरे में बुलवा कर खानखाना के पैरों में डाल दिया- ‘ये सब आपकी बेटियाँ हैं। यदि आप चाहते हैं कि हरामी महावतखाँ इन्हें बेइज्जत करके लूटकर ले जाये तो बेशक आप मेरी मदद न करें।’

खुर्रम का यह बाण सही निशाने पर लगा। पौत्री का शोक विह्वल मुँह देखकर खानखाना पसीज गया। उसके नेत्रों से आंसुओं की धार बह निकली। उसने कहा- ‘बोल शहजादे, इस बूढ़े रहीम से तू क्या चाहता है। रहीम जान देकर भी तेरी इच्छा पूरी करेगा।’

  – ‘ऐसा कुछ करो खानखाना कि मेरे और बादशाह के बीच बात अधिक न बिगड़े और मुझे अधिक न भटकना पड़े।’

खानखाना के आदेश पर लानतुल्ला को महावतखाँ के पास भेजा गया और कहा गया कि वह इधर से खानखाना नदी के कराड़ पर आता है। वहाँ से महावतखाँ नदी के कराड़ पर पहुँचे। दोनों जने बीच नदी में नाव पर बैठ कर सुलह सफाई की बात करेंगे।

अभी लानतुल्ला डेरे से बाहर निकला ही था कि लाल मुहम्मद ने आकर सूचना दी- ‘बादशाही कुमुक नदी पार करके शहजादे के डेरों की ओर बढ़ रही है।

लाल मुहम्मद का संदेश सुनते ही खानखाना डेरे से बाहर निकला। नदी के तट पर महावतखाँ की नावों की हलचल थी और खुर्रम की सेना में चारों ओर भगदड़ मची हुई थी। जिस खानखाना के मैदान में मौजूद रहते हुए कोई सिपाही कभी मोर्चा छोड़कर नहीं भागा था, आज वही सिपाही बिना लड़े ही भाग रहे थे। सिपाही तो उस वक्त तक खानखाना की रिहाई के बारे में जानते तक न थे। वे तो यही समझ रहे थे कि खानखाना हथकड़ी-बेड़ियों में जकड़ा हुआ अपने डेरे में पड़ा है।

एकाएक ही विचित्र स्थिति उत्पन्न होने से खुर्रम की दशा खराब हो गयी। उसके सामने खुसरो का चेहरा घूमने लगा। खुर्रम ने सोचा कि यदि मैं बादशाही सेना के हाथ लग गया तो मेरी भी वही दशा होगी जो एक जमाने में खुसरो की हुई थी। उस समय खुसरो की दुर्दशा करवाने में मैं शामिल था और इस बार मेरी दुर्दशा करने में परवेज और शहरयार पीछे न रहेंगे। यदि जहाँगीर ने किसी तरह रहम करके छोड़ भी दिया तो मलिका नूरजहाँ उसे किसी भी तरह जीवित नहीं छोड़ेंगी।

इन सब बातों पर विचार करते-करते खुर्रम इतना अधीर हुआ कि किसी तरह का मुकाबला न करके चुपचाप भाग खड़ा हुआ। किसी तरह उसने दाराबखाँ को हरम की औरतें लेकर आने के लिये कहा। घबराहट और जल्दबाजी में अपने पलायन की सूचना उसने खानखाना को भी नहीं दी। ऐसी भगदड़ मची कि दाराबखाँ भी बिना यह जाने कि खानखाना कहाँ है, हरम की औरतों को लेकर खुर्रम के पीछे भाग खड़ा हुआ।

महावतखाँ को चढ़कर आया देखकर खानखाना ने उससे मुकाबला करने की तैयारी की किंतु समय इतना कम था कि तलवार हाथ में लेकर घोड़े पर सवार होने के अतिक्ति कुछ नहीं किया जा सकता था।

 खुर्रम और दाराबखाँ को अपने पास न पाकर खानखाना ने मुकाबले का इरादा त्याग दिया। मैदान की स्थिति यह थी कि गिनेचुने सिपाही ही उसके चारों ओर खड़े रह गये थे। खानखाना न तो मोर्चा छोड़कर भाग सकता था और न मुकाबला कर सकता था। आज से पहले खानखाना ने किसी के सामने समर्पण भी नहीं किया था किंतु वक्त ने आज वह समय भी ला दिया।

इस तरह एकाकी छोड़ दिये जाने पर खानखाना घोड़े से नीचे उतर गया। उसने अपनी प्यारी तलवार निज सेवक फहीम[3]  के हाथ में दे दी। जूते उतार दिये और स्वयं नंगे पाँव महावतखाँ की ओर चल दिया। फहीम ने कहा- ‘मालिक! महावतखाँ विश्वास के योग्य नहीं है। दगा अवश्यंभावी है।’

खानखाना ने पलट कर कहा- ‘किसी महावतखाँ की औकात नहीं जो खानखाना से दगा करे। दगा तो वक्त ने की है और आगे भी जो करेगा, वक्त ही करेगा।’

– ‘इससे तो बेहतर है कि हथियार पकड़कर बादशाह के हुजूर में चलें।’

– ‘जब बादशाह के नाम पर नूरजहाँ के सामने घुटने टिकाने हैं तो तू यह मान ले कि महावतखाँ ही बादशाह है। तू यह मान ले कि शहजादा परवेज ही बादशाह है। तू यह क्यों नहीं समझता कि बादशाह जहाँगीर नहीं, बादशाह तो वक्त है, जो सबसे ज्यादा क्रूर और दगाबाज है।’

खानखाना का जवाब सुनकर फहीम आँखों में आँसू भर कर खानखाना के पीछे-पीछे चला।

-अध्याय 117, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक


[1] सांठगाँठ। जहाँगीर नामे में स्वयं बादशाह जहाँगीर ने इसी शब्द का प्रयोग किया है।

[2] जो गन्ना रस की खान है, उसमें भी जहाँ-जहाँ गाँठ होती है, रस नहीं होता। प्रेम में भी जहाँ गाँठ पड़ जाती है, वहाँ रस नहीं रहता।

[3] फहीम एक राजपूत युवक था। वह खानखाना का निज सेवक तथा विश्वासपात्र था। वह खानखाना के गुणों पर रीझकर खानखाना की सेवा में रहता था।

उड़ावे फहीम (118)

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खानखाना अब पूरी तरह दो हिस्सों में बंट गया। उसका बेटा दाराबखाँ, बेटे शाहनवाजखाँ की पुत्री और दाराबखाँ के बेटे खुर्रम के पास थे और पोता मनूंचहर तथा स्वयं खानखाना परवेज के पास थे।

ऐसी स्थिति में खानखाना के लिये कहीं ठौर न बची थी। जाये तो जाये कहाँ? उसने खुर्रम के निज मंत्री भीम सिसोदिया को पत्र लिखा कि यदि खुर्रम मेरे बेटों-पोतों को छोड़ दे तो मैं बादशाही लश्कर को दक्खिन से हटाकर आगरा भेज दूँ। नहीं तो बहुत मुश्किल पड़ेगी।

इस पर भीम सिसोदिया ने लिखा- ‘अभी तो पाँच-छः हजार लोग खुर्रम के लिये अपनी जान झौंकने के लिये शेष हैं। जब तू हमारे पास आयेगा तब तेरे बेटे को मारकर तेरा हिसाब किया जायेगा।’

खानखाना समझ गया कि मुगलिया सल्तनत की गंदी सियासत पूरी तरह से खानखाना के परिवार को खत्म करके ही दम लेगी। इधर परवेज खानखाना से पूरी सेवा लेगा और अंत में उसे नष्ट कर देगा। उधर खुर्रम दाराबखाँ से पूरी सेवा लेगा और जब दाराबखाँ उसके काम का न रहेगा तो खुर्रम उसे नष्ट कर देगा। खानखाना यह बात दाराब और मनूंचहर को समझाना चाहता था किंतु उन तक पहुँचने या उन तक अपना संदेश पहुँचाने का कोई उपाय न था।

कुछ दिनों बाद खबर आयी कि खुर्रम ने गोलकुण्डा होते हुए उड़ीसा के रास्ते बंगाल पर अमल जमा लिया है और दाराबखाँ को वहाँ का सूबेदार नियुक्त किया है। यह सुनकर परवेज ने बुरहानपुर से बंगाल जाने की तैयारी की और मनचूहर को खानपुर थाने का हाकिम बना दिया। यह देखकर खानखाना ने अपना माथा पीट लिया।

खुर्रम को उदयपुर के राणा अमरसिंह के पुत्र भीमसिंह की सेवाएं मिल जाने से खुर्रम के हौंसले बुलंद थे। वह बंगाल को जीतने के बाद बिहार की ओर बढ़ा और उसे दबाने के बाद निरंतर आगे बढ़ता हुआ इलाहाबाद तक चढ़ आया।

परवेज ने खानखाना के आधे परिवार को अपनी तरफ और आधे परिवार को खुर्रम की तरफ देखकर खानखाना का विश्वास नहीं किया। उसने खानखाना को कैद करने का निर्णय लिया।

जब परवेज के आदेश पर महावतखाँ के आदमी नंगी तलवारें लेकर खानखाना के डेरे की तरफ बढ़े तो फहीम ने तलवार खींच ली। फहीम को अकेले ही लड़ने के लिये आया देखकर महावतखाँ ने कहा- ‘तू अपनी जान व्यर्थ ही गंवाता है। तुझे क्या भय है?’

– ‘आप किस इरादे से नंगी तलवारें लेकर मेरे स्वामी के डेरे पर आये हैं, यह जाने बिना मैं आपको डेरे में प्रवेश नहीं करने दूंगा।’

– ‘शहजादे का हुक्म है कि बदकार खानखाना को गिरफ्तार करके हथकड़ी बेड़ी लगायी जाये।’

– ‘लेकिन क्यों? क्या गुनाह है मेरे स्वामी का?’

– ‘फहीम! महावतखाँ को अपना काम करने दो।’ खानखाना ने कहा। वह डेरे के बाहर शोर होता हुआ सुनकर निकल आया था।

– ‘मेरी देह में प्राणों के रहते यह बदजात मेरे स्वामी को छू भी नहीं सकता।’ फहीम ने ताल ठोकी।

– ‘गुस्ताख सिपाही! शहजादे की मंशा पूरी होने में रोड़ा बनता है। तेरा सिर कलम किया जायेगा।’ महावतखाँ ने चीख कर कहा।

– ‘तुम क्या मेरा सिर कलम करोगे, मैं स्वयं ही अपने स्वामी पर कुरबान हो जाऊंगा।’ इतना कहकर फहीम शेर की तरह उछला और अपनी तलवार का भरपूर वार महावतखाँ पर किया। महावतखाँ अचानक ही उसके वार कर देने से घोड़े से गिर पड़ा। तलवार उसकी भुजा पर निशान बनाती हुई निकल गयी। यदि वह जरा सा भी चूक जाता तो उसकी भुजा उसके शरीर से अलग हो जाती।

– ‘मारो नमक हराम को।’ महावतखाँ चिल्लाया। दसियों तलवारें फहीम पर छा गयीं। कुछ देर बाद फहीम का शव ही धरती पर पड़ा दिखायी दिया। फहीम ने अपने स्वामी पर न्यौछावर होकर उस कहावत को नया ही अर्थ दे दिया जो उन दिनों खानखाना के दूसरे चाकरों द्वारा फहीम से ईष्या रखे जाने के कारण कही जाती थी- ‘कमावे खानखाना उड़ावे मियाँ फहीम।’ सच ही तो था, खानखाना ने अब तक जो भी यश और पुण्य अर्जित किया था फहीम ने अपनी जान न्यौछावर करके खानखाना की कीर्ति को दूर-दूर तक फैला दिया।

-अध्याय 118, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक

जागत व्हैगो भोर (119)

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जब मौत सिर पर मण्डराने लगी तो रहीम ने हँस कर कहा- करम हीन रहिमन लखो, धँसो बड़े घर चोर। चिंतत ही बड़ लाभ के, जागत व्हैगो  भोर।

फहीम के गिरते ही खानखाना गिरफ्तार कर लिया गया। उसका डेरा परवेज के डेरे के पास लगाया गया। खानखाना के डेरे के बाहर सामान्य सिपाहियों और छोटे ओहदेदारों के स्थान पर महावतखाँ जैसे सेनापति पहरा देते थे ताकि खानखाना कैद से न भाग छूटे।

खानखाना की ओर से निश्चिंत होकर परवेज ने बनारस के पास खुर्रम को जा घेरा। इस समय खुर्रम के पास सात हजार सैनिक थे जबकि परवेज के पास चालीस हजार सैनिक थे। खुर्रम ने मैदान छोड़कर भाग जाने की योजना बनायी किंतु भीम सिसोदिया ने उसे भागने के बजाय रण में जूझ मरने की सलाह दी।

खुर्रम आधे मन से लड़ने के लिये तैयार हुआ। शीघ्र ही परवेज की सेना ने खुर्रम की सेना को मार भगाया। परवेज की ताकत देखकर खुर्रम मैदान छोड़कर  भाग खड़ा हुआ किंतु भीम सिसोदिया ने मैदान छोड़ने से मना कर दिया। उसने इस युद्ध में ऐसी तलवार चलाई कि देखने वालों ने दाँतों तले अंगुली दबा ली।

जब ये समाचार जहाँगीर को प्राप्त हुए तो जहाँगीर ने महावतखाँ को सात हजारी जात और सात हजारी सवार का मनसबदार बनाया। खानखाना के तुमन तौग भी महावतखाँ को सौंप दिये गये और उसका दर्जा खानखाना के बराबर कर दिया गया।

इतने वर्षों की निष्ठा का यही परिणाम अब्दुर्रहीम को प्राप्त हुआ कि वह तो खानखाना से कैदी हो गया और महावतखाँ जैसा अदना आदमी खानखाना हो गया। महावतखाँ यह समाचार सुनाने अब्दुर्रहीम के डेरे में गया। उसने कहा- ‘अब तू अकेला खानखाना न रहा। मैं भी खानखाना हूँ।’

नियति की ऐसी करनी देखकर खानखाना ने उससे कहा-

‘उरग, तुरंग, नारी नृपति, नीच जाति, हथियार।

रहिमन  इन्हें  सँभारिये,  पलटत लगै ने  बार।’

– ‘अब्दुर्रहीम! तू मौलवियों की तरह दूसरों को तो बहुत इल्म बाँटता फिरता है। जो तू ऐसा ही ज्ञानी है तो फिर तू इस दुर्दशा को क्यों पहुँचा?

रहीम ने कहा-

‘करम हीन रहिमन लखो, धँसो बड़े घर चोर।

चिंतत ही बड़ लाभ के, जागत व्हैगो  भोर। ‘[1]

रहीम का उक्ति सुनकर महावतखाँ ठहाका लगा कर हँसा। उसने कहा- ‘किस मिट्टी का बना है तू जो इस मुसीबत में भी परिहास करता है!’

-अध्याय 119, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक


[1] महावतखाँ! तू रहीम को भाग्यहीन ही जान जो बड़े घर में चोरी करने के लिये घुस गया और यह सोचते-सोचते सवेरा हो गया कि आज तो बड़ा लाभ हुआ। अर्थात् कुछ प्राप्त किये बिना ही पकड़ा गया।

मन उचाट (120)

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खुर्रम ने दाराबखाँ को रोहतास से दक्षिण के मोर्चे पर जाने के आदेश दिये। दाराबखाँ रोहतास से निकल कर लगभग सौ कोस ही आगे गया होगा कि उसे अब्दुर्रहीम के कैदी हो जाने के समाचार मिले।

अब्दुर्रहीम को दुबारा कैदी बनाये जाने पर दाराबखाँ को मुगलों से घृणा हो गयी। उसके फरिश्ते जैसे निर्दोष और पाक दामन बाप को पहले तो खुर्रम ने और अब परवेज ने कैद कर लिया था। दोनों ही बार अब्दुर्रहीम का दोष क्या था?

उस बार खुर्रम ने अब्दुर्रहीम पर दोष धरा था कि अब्दुर्रहीम महावतखाँ से मिल गया है। जबकि महावतखाँ ने अब्दुर्रहीम की ओर से जाली पत्र लिखकर खुर्रम के आदमियों के हाथों पकड़वाया और खुर्रम ने उस पत्र को असली जानकर अब्दुर्रहीम तथा दाराबखाँ को कैद में डाल दिया।

इस बार परवेज ने अब्दुर्रहीम पर दोष धरा कि उसका पुत्र दाराबखाँ खुर्रम की सेवा में है इसलिये अब्दुर्रहीम को खुला छोड़ना मुगलों के हित में नहीं है। अब्दुर्रहीम स्वतंत्र रहे तो इसलिये कि उसमें मुगलों का हित है! अब्दुर्रहीम बंदी रहे तो इसलिये कि उसमें मुगलों का हित है! क्या मुगलों का हित ही सर्वोपरि है? जिस अब्दुर्रहीम के दमखम पर यह मुगलिया सल्तनत खड़ी हुई, उस अब्दुर्रहीम का अपना हित-अनहित कुछ नहीं?

यदि दाराबखाँ खुर्रम की सेवा में था तो इसमें अब्दुर्रहीम का क्या दोष था? जब अब्दुर्रहीम खुर्रम के पक्ष में था तब मनूंचहर भी तो परवेज के पास था! उस समय परवेज ने मनूंचहर को दण्डित क्यों नहीं किया? क्या केवल इसलिये कि तब अब्दुर्रहीम को कमजोर करने के लिये मनूंचहर को अपने पक्ष में रखा जाना मुगलों के हित में था!

 खुर्रम ने भी तो जहाँगीर से बगावत की! उसका दण्ड जहाँगीर को तो नहीं दिया जा सकता! उसी तरह दाराबखाँ के बागी हो जाने का दण्ड अब्दुर्रहीम को क्यों?

दाराबखाँ इन्हीं सब बातों पर बारम्बार विचार करता हुआ फिर से अपने कुटुम्ब को एक जगह एकत्र करने और इस बिखराव से बाहर निकलने के उपाय के बारे में सोचता ही था कि खुर्रम का संदेश वाहक उसकी सेवा में उपस्थित हुआ और कहा कि खुर्रम ने उसे गढ़ी में बुलाया है।

दाराबखाँ यह आदेश सुनकर चकरा गया। कहाँ तो उसे रोहतास[1]  से खानदेश जाने के आदेश दिये गये थे और कहाँ अब उसे बीच मार्ग से ही उल्टी दिशा में बंगाल बुलाया जा रहा है!

दाराबखाँ को लगा कि जिस प्रकार परवेज ने अब्दुर्रहीम के साथ छल किया, उसी प्रकार खुर्रम भी दाराबखाँ के साथ छल करना चाहता है। अवश्य ही दाल में कुछ काला है। अतः खुर्रम के पास जाना उचित नहीं है।

दाराबखाँ को ज्ञात था कि इस समय परवेज भी बंगाल पर धावा करने की तैयारी में है। इसलिये बेहतर होगा कि दक्षिण को न जाकर बंगाल ही चला जाये ताकि परवेज से मिलकर खानााना को छुड़ाने के प्रयास किये जायें।

दाराबखाँ ने खुर्रम के संदेशवाहक से कहा कि शहजादे को कहना कि शहजादा खुद तो गढ़ी में बैठा है किंतु बंगाल के दूसरे इलाकों में इस समय जमींदारों का विद्रोह हो रहा है, उसे दबाना जरूरी है। इसलिये मैं जमींदारों का विद्रोह दबाने के लिये जाता हूँ जब अवसर होगा तो मैं शहजादे की सेवा में गढ़ी में हाजिर हो जाऊंगा।

खुर्रम ने दाराबखाँ को न आते देखकर दाराबखाँ के बेटे को पकड़ कर अब्दुल्लाहखाँ की देखरेख में रख दिया और स्वयं उड़ीसा के रास्ते दक्षिण को चल दिया।

परवेज ने भी बंगाल पर अधिकार करके महावतखाँ को बंगाल में नियुक्त किया और स्वयं खुर्रम के पीछे दक्षिण को प्रस्थान कर गया।

-अध्याय 120, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक


[1] रोहतास पूर्वी उत्तर प्रदेश में है।

शहीदी तरबूज (121)

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अब्दुर्रहीम ने थाली पर से कपड़ा हटाया तो उसकी आँखें पथरा गयीं। अपने पौत्र दाराब खाँ का कटा हुआ सिर छाती से लगाते हुए उसने कहा – यह शहीदी तरबूज  है। खास बेल पर ही लगता है।

खुर्रम का नौकर अब्दुल्लाहखाँ एक नम्बर का हरामी था। वह कई सालों से अब्दुर्रहीम से अदावत रखता था। जब अब्दुर्रहीम का पोता उसके शिकंजे में आ गया तो उसने अब्दुर्रहीम से बदला लेने को यही उचित अवसर समझा।

जब खुर्रम काफी दूर पहुँच गया तो अब्दुल्लाहखाँ ने एक रात को दाराबखाँ के बेटे की हत्या कर दी। अब तो दाराबखाँ के पास परवेज के पास लौट जाने के अतिरिक्त कोई चारा न रहा।

उधर जब महावतखाँ ने बंगाल को लूटना आरंभ किया तो बंगाल के जमींदारों ने दाराबखाँ को अपना प्रतिनिधि बनाकर परवेज के पास भेजने का विचार किया। दाराबखाँ ने इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया।

जब दाराबखाँ परवेज के पास पहुँचा तब तक परवेज दक्षिण के लिये कूच कर चुका था। इस पर दाराबखाँ महावतखाँ के पास हाजिर हुआ। महावतखाँ ने दाराबखाँ को तो कैद कर लिया और जहाँगीर को समाचार भिजवाया। जहाँगीर ने कहा कि उस धोखेबाज को जीवित रखने में क्या लाभ है? उसका सिर काटकर हमारे पास भेज दो।

जिस दिन बादशाह की चिट्ठी महावतखाँ के पास पहुँची, उसी दिन महावतखाँ ने दाराबखाँ का सिर गर्दन से अलग कर दिया। इसके बाद उस कटे हुए तरबूज को थाली में सजा कर कीमती रेशम से ढंकवाया और स्वयं उस थाली को लेकर अब्दुर्रहीम के डेरे में पहुँचा।

– ‘लो अब्दुर्रहीम! तरबूज खाओ।’ महावतखाँ ने रेशमी कपड़े से ढंकी हुई थाली अब्दुर्रहीम के सामने बढ़ाई।

– ‘आज अवश्य ही कोई अनहोनी होने वाली है जो तू अपने हाथों में मेरे लिये थाली धर कर लाया है।’ अब्दुर्रहीम ने थाली हाथ में लेते हुए कहा।

जैसे ही अब्दुर्रहीम ने थाली का कपड़ा हटाना चाहा तो महावतखाँ ने अब्दुर्रहीम का हाथ पकड़ कर कहा- ‘अब्दुर्रहीम! तूने ऐसा क्यों कहा?’

रहीम ने क्षणभर अपनी बूढ़ी आँखों से मक्कार महावतखाँ की ओर देखा और फिर मुस्कुराकर बोला-

‘गुरुता फबै रहीम कहि, फबि आई है जाहि।

उर पर कुच नीके लगैं, अनत बतौरी आहि। ‘[1]

अब्दुर्रहीम का जवाब सुनकर महावतखाँ तिलमिला कर रह गया। उसने कहा- ‘बूढ़े शैतान! तुझ पर खुदा की मार। मैं तेरी तरह शाइरी तो नहीं करता किंतु इतना अवश्य जानता हूँ कि इस तरबूज में तुझे तेरी शाइरी का जवाब जरूर मिल जायेगा।’

अब्दुर्रहीम ने थाली पर से कपड़ा हटाया तो उसकी आँखें पथरा गयीं। दाराबखाँ का सिर छाती से लगाते हुए उसने कहा- ‘यह शहीदी तरबूज  है।[2] खास बेल पर ही लगता है।’

अब्दुर्रहीम का यह जवाब सुनकर महावतखाँ अपना स्याह पड़ गया चेहरा लेकर वहाँ से चला गया। जाते-जाते खानखाना के वचन उसके कानों में पड़े-

‘अधम वचन काको फल्यो, बैठि ताड़ की छाँह।

रहिमन  काम  ने आय है, ये नीरस जग माँह।। ‘[3]

 इसके बाद फिर कभी महावतखाँ का साहस अब्दुर्रहीम से बदतमीजी करने का नहीं हुआ।

-अध्याय 121, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक


[1] बड़प्पन उसी को शोभा देता है, जो बड़प्पन धारण कर सकता है। स्तन यदि हृदय के स्थान पर कहीं और लगा दिये जायें तो वे फोड़े कहलाते हैं।

[2] तरबूज की एक किस्म का नाम भी शहीदी है। इसका स्वाद शहद की तरह मीठा होता है।

[3]  दुष्ट वचन किसी को अच्छा परिणाम नहीं देता है। जैसे कि ताड़ के पेड़ से छाया नहीं मिलती। दुष्ट वचन और ताड़ के पेड़ किसी काम के नहीं होते।

क्षमादान (121)

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अब्दुर्रहीम अपने शिष्य जहाँगीर के चरणों में गिरकर रोता रहा तो जहाँगीर ने उसे क्षमादान दे दिया। उसने खानखाना को फिर से पुराना ओहदा, पदवी, अख्तियार और खिलअत देकर उसका बहुत मान-सम्मान किया।

तीन वर्ष लगातार भागते-भागते खुर्रम थक गया। उसका स्वास्थ्य गिर गया। उसके विश्वस्त आदमी मर गये और सेना भी छीज कर अत्यल्प हो गयी। यहाँ तक कि वह अब दक्खिनियों की दया पर ही निर्भर रह गया। अतः उसने जहाँगीर को चिट्ठी भिजवाई कि मुझे अपने किये पर अफसोस है। मुझे मुआफ किया जाये।

इस पर जहाँगीर ने खुर्रम को लिखा कि यदि तू अपने बेटे दारा शिकोह तथा औरंगजेब को मेरी सेवा में भेज दे और रोहतासगढ़ व आसेर के किले समर्पित कर दे तो तेरे सब अपराध क्षमा कर दिये जायेंगे तथा तुझे बालाघाट का क्षेत्र दे दिया जायेगा।

खुर्रम ने रोहतासगढ़ तथा आसेर के किले बादशाह को समर्पित कर दिये और अपने दोनों बेटे तथा दस लाख रुपये का नजराना जहाँगीर की सेवा में भेज दिये।

खुर्रम के समर्पण कर देने से वे सब कारण ही समाप्त हो गये जिनके कारण अब्दुर्रहीम को बंदी बनाया गया था। अतः जहाँगीर ने अब्दुर्रहीम को अपने दरबार में पेश करने का आदेश दिया।

जब अब्दुर्रहीम जहाँगीर के सामने पेश हुआ तो उसके मन की अवस्था बड़ी विचित्र हो गयी। यह वही दरबारे आम था जिसमें कभी वह सिंह की तरह गर्दन उठा कर प्रवेश करता था। यह वही दरबार था जिसमें जब अब्दुर्रहीम बोलता था तो हवा में सहस्रों गुलाबों की सुगंध व्याप्त हो जाती थी। यह वही दरबार था जिसके वायुमण्डल में हजारों लोग हाथ उठा-उठा कर अब्दुर्रहीम की जय-जयकार बोलते थे किंतु आज वे सारे दृश्य विलुप्त हो चुके थे।

अकबर के युग के बहुत से पुराने दृश्य चित्रों की भांति रहीम के नेत्र पटल पर उभर आये। राजा टोडर मल, तानसेन, बीरबल, अबुल फजल, फैजी और भी जाने कितने-कितने लोग उसे स्मरण हो आये। जाने कहाँ गया वह अकबर जो उस पर मेहरबानियाँ लुटा कर स्वयं को धन्य समझता था।

रहीम की बूढ़ी देह में सिहरन सी हुई। पाषाण हृदय समय ने वह समूचा युग ही निगल लिया था। अब्दुर्रहीम का समस्त वैभव कठोर समय के हाथों पराभव में बदल गया था।

पुरानी स्मृतियां और आज की स्थिति इस प्रकार आपस में गड्ड-मड्ड हुई कि रहीम के बूढ़े नेत्रों से जल की अविरल धारा बहने लगी। उसकी गर्दन झुक गयी। आत्मग्लानि का भाव उसकी चेतना पर छा गया। उसका मन हुआ कि धरती फट जाये तो वह उसमें समा जाये। अब किस सुख की आशा में वह यहाँ आया है! क्यों नहीं उसने दरबार में आने से मना कर दिया!

शोक और ग्लानिबोध से ग्रस्त अब्दुर्रहीम बादशाह के सामने पहुँच कर धरती पर गिर गया और फूट-फूट कर रोने लगा। यह वही बादशाह था जिसके वैभव और साम्राज्य में वृद्धि के लिये अब्दुर्रहीम ने अपना समूचा जीवन और अपनी तीन पीढ़ियाँ नष्ट कर दी थीं। यह वही बादशाह था, रहीम जिसका शिक्षक रहा था। यह वही बादशाह था जिसके बेटों ने रहीम के बेटों और पोतों के प्राण हर लिये थे। यह वही बादशाह था जिसके शहजादों खुर्रम और परवेज ने रहीम को अपराधी घोषित करके छोटे आदमियों के हाथों अपमानित करवाया था।

बहुत देर तक अब्दुर्रहीम धरती पर पड़ा हुआ रोता रहा। पूरा दरबार सकते में था। यहाँ तक कि गुलामों के पंखों से निकलने वाली हवा में भी सरसराहट न रही। इधर तो अब्दुर्रहीम अपनी दुर्दशा पर रोता था और उधर जहाँगीर सोचता था कि इसने मेरे प्रति जो अपराध किये हैं, उसी की ग्लानि से उपजे दुःख के कारण यह रोता है।

जहाँगीर का पाषाण हृदय पसीज उठा। उसने अब्दुर्रहीम से कहा- ‘अब तक जो कुछ हुआ है, वह दैव संयोग से हुआ है। न मेरे वश में कुछ था और न तेरे वश में। तू अधिक सोच-संताप न कर।’

अब्दुर्रहीम इस पर भी धरती से नहीं उठा। जहाँगीर के संकेत पर बख्शियों ने उसे उचित जगह पर ले जाकर खड़ा किया। खानखाना को फिर से पुराना ओहदा, पदवी, अख्तियार और खिलअत देकर उसका बहुत मान-सम्मान किया गया।

उसी दिन रहीम ने एक अंगूठी बनवाई जिस पर यह लेख लिखवाया- ”जहाँगीर की महरबानी ने खुदा की मदद से, मुझको जिन्दगी और खानखानी दुबारे दी है।”

अपने हाथ में अंगूठी पहनते हुए रहीम ने आकाश की ओर दृष्टि उठाकर कहा-

”जो रहीम करिबो हुतो, ब्रज को इहै हवाल।

तौ काहे कर पर धर्यौ,  गोवर्धन गोपाल। ”[1]

-अध्याय 122, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक


[1]  हे ईश्वर जब तुझे ब्रज को इसी तरह दुखी करना था तो क्यों तूने गोवर्धन उठा कर इसकी रक्षा की?

चित्रकूट की ओर (123)

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– ‘शहंशाहे आलम! गुलाम की दरख्वास्त है कि मुझे कुछ दिनों के लिये चित्रकूट जाने की इजाजत दी जाये।’ खानखाना ने जहाँगीर के सामने उपस्थित हो कर निवेदन किया।

– ‘क्यों अतालीक बाबा? यहाँ किसी किस्म की तकलीफ है आपको?’ जहाँगीर ने अपने स्वभाव के विपरीत स्वर कोमल ही रखा जाने क्यों आज उसे अपने मरहूम बाप अकबर का स्मरण हो आया। वह सदैव ही बैरामखाँ को अतालीक बाबा कहकर पुकारा करता था।

– ‘आपकी बादशाहत में तो दुखी भी दुखी नहीं रहे जहाँपनाह, फिर मैं तो जन्म का ही सुखी हूँ।’ वाक्य पूरा करते हुए खानखाना का गला भर आया। बादशाह चाह कर भी नहीं जान सका कि खानखाना के वाक्य का सही अर्थ क्या है! वह प्रशंसा कर रहा है कि व्यंग्य! वह मुँह उठाकर खानखाना की ओर ताकता ही रह गया।

– ‘मेरे पास किसी जागीर को संभालने का भार नहीं है, न ही मैं इस स्थिति में हूँ कि कोई जागीर संभाल सकूं। अब मैं सत्तर साल का बूढ़ा हो गया हूँ, कुछ दिन शांति से चित्रकूट में गुजारना चाहता हूँ।’

– ‘यदि आपको जागीर की आवश्यकता है, तो वह भी मिल जायेगी। अधीर क्यों होते हैं?’

– ‘जागीरों से अब जी भर गया जहाँपनाह। अब तो कुछ दिनों के लिये चित्रकूट में ही जाकर बैठने की इच्छा है।’

– ‘किंतु अभी मुगलिया सल्तनत को आपकी सेवाओं की आवश्यकता है।’

– ‘जब कभी मुगलिया सल्तनत अथवा बादशाह सलामत को मेरी आवश्यकता होगी, मैं तत्काल ही शहंशाह की सेवा में हाजिर हो जाऊंगा।’

– ‘हम समझ सकते हैं खानखाना! तुम अपने बेटों और पोतों के गम में गाफ़िल हो। कुछ दिन के लिये छुट्टी मना आओ। तुम्हारा जी बहल जायेगा।’

– ‘जी बहलाने का अब कुछ सामान इस धरती पर न रहा शहंशाह। अब इजाजत बख्शिये। खु़दा ने ज़िन्दगी बख्शी तो फिर कभी बादशाह सलामत के हुजूर में पेश होऊंगा।’ बादशाह को कोर्निश बजाकर खानखाना महल से बाहर आ गया।

यद्यपि जहाँगीर ने अपनी ओर से अब्दुर्रहीम का मान-सम्मान ही किया था किंतु अब खानखाना के लिये इस मान-सम्मान का अर्थ ही क्या था? क्या बादशाह उसके बेटे और पोते वापिस लौटा सकता था जो मुगलिया सियासत की गंदी दलदल में समा गये थे? उनके असमय मारे जाने का यदि कोई कारण था तो यही कि या तो वे बादशाह के लिये लड़ते हुए मारे गये थे या फिर उन्हें शहजादों ने मार डाला था।

जिस मुगलिया सल्तनत को अब्दुर्रहीम के बाप बैरामखाँ, स्वयं अब्दुर्रहीम और उसके बेटों पोतों सहित चार-चार पीढ़ियों ने अपने रक्त से सींच कर पुष्पित-पल्लवित किया था, वही मुगलिया सल्तनत एक-एक करके बैरामखाँ के पूरे वंश को निगल गयी थी। यही कारण था कि अब्दुर्रहीम को अब मुगलों से नफरत हो गयी थी।

यद्यपि अब भी खानखाना के आदमी और कबूतर पूरी मुगलिया सल्तनत की कचहरियों, अदालतों, चबूतरों, गली कूँचों और बाजारों में फैले हुए थे जो पल-पल की खबर उस तक पहुँचाते थे किंतु अब उन सूचनाओं का कोई अर्थ नहीं रह गया था। अब तो वह एक पल के लिये भी बादशाह और शहजादों का मुँह नहीं देखना चाहता था। वह नहीं चाहता था कि फिर से कोई मनसब, जागीर या खिलअत देकर उसे मुगलिया सियासत का मोहरा बनाया जाये।

अब्दुर्रहीम के न चाहने पर भी जहाँगीर ने उसे फिर से खानखाना बना दिया था तथा पुराना वाला सात हजारी जात और सात हजारी सवार का मनसब दे दिया था। इतना होने पर भी जहाँगीर ने उसकी पुरानी जागीरें बहाल नहीं की थीं। इससे यह पद हास्यास्पद हो गया था।

इसीलिये अब्दुर्रहीम ने खानखाना के बंधन में न बंध कर, अपने आप को मुगलों से मुक्त कर लेने का निर्णय लिया था। फिर से खानखाना बनाये जाने पर वह जहाँगीर के प्रति आभार व्यक्त करने के बाद चित्रकूट के लिये चल देना चाहता था। जो आँसू उसने जहाँगीर के दरबार में गिराये थे, उनका शेष हिस्सा वह चित्रकूट की पावन भूमि में बहाना चाहता था।

अंततः वह दिन भी आया जब अब्दुर्रहीम सब कुछ समेट-समाट कर चित्रकूट के लिये चल दिया। वह समेटना भी क्या था! एक विचित्र सी चेष्टा थी। आगरा और दिल्ली में खानखाना की बनवाई हुई जो हवेलियाँ थी, वे सब हवेलियाँ उसने अपने आश्रितों, सम्बंधियों और नौकरों-चाकरों को दे दीं। दिल्ली में बैरामखाँ की बनवाई हुई हवेली उसने बेटी जाना के हवाले कर दी। घर का सारा सामान सेवकों और भिखमंगों में बांट दिया। यह सब-कुछ ऐसा ही था जैसे कोई गरुड़ पक्षी अपने सोने का पिंजरा काट कर मुक्त आकाश में विचरने के लिये उड़ चले।

मुँह अंधेरे ही वह बैलगाड़ी में बैठ गया। बेटी जाना बेगम उसके सामने बैठी थी। कड़वे तेल की कुप्पी के क्षीण प्रकाश में बेटी के कातर मुँह और डबडबायी हुई आँखों को देखकर खानखाना ने अपना मुँह बैलगाड़ी से बाहर निकाला और गाड़ीवान से बोला- ‘चलो मियाँ! चित्रकूट चलो।’

सचमुच ही पंछी अपना पिंजरा काट कर चित्रकूट के लिये उड़ चला था। वर्षों की साध पूरी होने जा रही थी। उसका मन दो हिस्सों में बंट गया था। एक हिस्सा बेटे पोतों के मारे जाने के कारण जार-जार रोता था तो दूसरा हिस्सा चित्रकूट की ओर चल देने के लिये उतावला था।

चबूतरों की मुंडेरों पर बैठै उसके सैंकड़ों कबूतर और गली-कूँचों में घूमते उसके विश्वस्त खबरची जो पल-पल की खबर लाकर खानखाना को देते थे, खानखाना के कूच का हाल तभी जान सके जब वह शहर से काफी दूर हो गया।

-अध्याय 123, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक

सब भाड़ में (124)

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रहीम ने भाड़ में घास झौंकते हुए रीवां नरेश को जवाब दिया कि जिस रहीम के सिर पर विशाल मुगलिया सल्तनत का भार था उस रहीम ने सल्तनत का भार सब भाड़ में झौंक दिया है।

रीवां नरेश की आँखें फटी की फटी रह गयीं। उन्हें विश्वास नहीं हुआ कि जो दृश्य वे अपनी आँखों से देख रहे हैं वह सत्य भी हो सकता है! उन्होंने देखा कि ठीक अब्दुर्रहीम के जैसा दिखने वाला एक खान भाड़ झौंक रहा था। क्या यह सचमुच अब्दुर्रहीम ही है!

रीवां नरेश आज ही चित्रकूट आये थे और इस समय अपने आदमियों के साथ मंदाकिनी के किनारों की हरियाली देखने के लिये निकले थे। उन्होंने सुना तो था कि इन दिनों अब्दुर्रहीम चित्रकूट में है किंतु वह इस दशा में होगा, इसकी तो कल्पना भी नहीं की जा सकती थी।

एक दिन रीवां नरेश ने जिस अब्दुर्रहीम के संकेत मात्र पर हजारों योद्धओं को प्राण न्यौछावर करते देखा था, आज वही अब्दुर्रहीम नितांत एकाकी हो इस तरह जीवन यापन कर रहा था! एक दिन हिन्दुस्थान का बड़े से बड़ा आदमी जिसकी जय-जयकार से आकाश गंुजा देता था, आज वही अब्दुर्रहीम अपना समस्त वैभव खोकर नीच आदमी का दास हो गया था! एक दिन जिस अब्दुर्रहीम को दोनों हाथों में तलवार लेकर रण में बिजली गिराते हुए देखा था, वही अब्दुर्रहीम आज अपने दोनों हाथों से भाड़ झौंक रहा था!

बहुत से पुराने चित्र स्मृतियों के आगार से निकल कर रीवां नरेश की आँखों के समक्ष जीवति हो उठे। कहाँ वह वैभव और कहाँ यह दैन्य? नहीं! यह अब्दुर्रहीम नहीं हो सकता! किंतु अपनी आंखों का वे क्या करें? दिखने में तो यह अब्दुर्रहीम जैसा ही है।

रीवां नरेश घोड़े से उतर गये। मन की बेचैनी बढ़ गयी। कैसे पूछा जाये? कहीं सचमुख अब्दुर्रहीम ही हुआ तो! और यदि नहीं हुआ तो! दोनों ही स्थितियों में पूछना उचित नहीं। काफी देर सोच विचार के बाद रीवां नरेश को एक उपाय सूझ गया। वे भाड़ झौंकने वाले खान के ठीक पास जाकर खड़े हो गये। खान अपने काम में लगा रहा। जैसे कि उसने किसी को अपने पास आकर खड़े होते हुए देखा ही नहीं। रीवां नरेश की बेचैनी और भी बढ़ गयी। जब किसी तरह भी रहा न गया तो अवसर पाकर धीरे से बोले-

‘जाके सिर अस भार, सो कस झौंकत भार अस?’[1]

रीवां नरेश की आशा के विपरीत खान ने भाड़ में सूखी घास झौंकते हुए उत्तर दिया-

‘रहिमन उतरे पार, भार झौंकि सब भार में।’[2]

  – ‘अब्दुर्रहीम! मेरे मित्र!’ रीवां नरेश ने लपक कर खान को गले लगा लिया।

खान ने धीरे से अपने आप को छुड़ाते हुए कहा-

‘ये रहीम दर दर फिरैं मांगि मधुकरी खाहिं,

यारों यारी छांड़ दो वे रहीम  अब  नाहिं।’[3]

  – ‘किंतु अब्दुर्रहीम! आप यहाँ! इस दशा में?’ रीवां नरेश ने उसे फिर से गले लगाते हुए कहा।

खानखाना ने मुस्कुराकर कहा-

‘चित्रकूट में रमि रहे, रहिमन अवध नरेस।

जा पर विपदा परत है, सो आवत एहि देस।’[4]

  – ‘ऐसी भी कहीं विपदा होती है खानखाना? आपके मित्र हैं, हितैषी हैं, शुभचिंतक हैं, आप पर प्राण न्यौछावर करने वाले हैं। देश-कोष सब लुटाने वाले हैं। वे सब किस लिये हैं?’

अत्यंत शांत स्वर में अब्दुर्रहीम ने कहा-

‘रहिमन  विपदा  हू  भली,  जो  थोरे  दिन  होय।

हित अनहित या जगत में , जानि परत सब कोय।।’[5]

  – ‘किंतु क्यों? विपदा क्यों?’ रीवां नरेश का मन चीत्कार कर उठा।

खानखाना ने कहा-

‘अन्तर दाव लगी रहै, धुआँ न प्रगटै सोइ।

कै जिय आपन जानहीं, कै जिहि बीती होई।’[6]

  – ‘किंतु इस तरह जीवन से उदासीन हो जाना, इस तरह की विरक्ति को पहुँच जाना? क्यों आखिर क्यों?’ रीवां नरेश प्रश्नों पर प्रश्न किये जा रहे थे और खानखाना बड़ी चतुराई से उन्हें टालता जा रहा था-

‘तैं रहीम मन आपुनो, कीन्हों चारु चकोर।

निसि बासर लागो रहै कृष्ण चंद्र की ओर।।’ [7]

रीवां नरेश समझ गये। यह इस तरह अपने मन रूपी कवच से बाहर नहीं आयेगा। अतः वे बहुत अनुनय विनय करके खानखाना को अपने डेरे पर ले गये। बहुत दिनों के बाद उन्हें अकस्मात् पाकर रीवा नरेश को अपार हर्ष हुआ था किंतु उसकी दुर्दशा को देखकर वे बहुत दुखी थे। खानखाना के स्वभाव से वे बहुत अच्छी तरह परिचित थे इसलिये इतना साहस न हुआ कि रहीम को अपने साथ रीवां चलने के लिये कह सकें। देर रात तक रीवां नरेश इधर उधर की बातें करते रहे और भोजन आदि के उपरांत उसे विदा किया।

पूरी रात रीवां नरेश बेचैन रहे। कोई मार्ग नहीं सूझता था कि कैसे वे अपने अत्यंत स्वाभिमानी मित्र का हित साधन करें। अगले दिन बहुत जल्दी ही वे अपने घोड़े पर सवार होकर फिर से चित्रकूट दर्शन के लिये निकल गये।

मार्ग में एक जगह उन्हें भीड़ दिखायी दी। इतनी सुबह किस बात की भीड़ हो गयी, यह देखने के लिये जब वे आगे बढ़े तो उनके आश्चर्य का पार न रहा। उन्होंने देखा कि अब्दुर्रहीम भिखारियों को चने बांट रहा है। रीवां नरेश को अत्यंत उत्सुकता पूर्ण निगाहों से अपनी ओर ताकता देखकर रहीम ने कहा-

‘रहिमन दानि दरिद्रतर तऊ जांचिबे जोग,

ज्यों सरितन सूखा परे कुआँ खनावत लोग।’[8] 

डेरे पर पहुँच कर रीवां नरेश ने एक लाख रुपया अब्दुर्रहीम को भिजवाया। बेटों और पोतों की मृत्यु के बाद अब्दुर्रहीम का मन अब संसार से उचाट हो गया था। उसे धन की आवश्यकता नहीं थी और जिस चीज की आवश्यकता थी, वह कोई दे नहीं सकता था। फिर भी उसने जाने क्या सोच कर एक लाख रुपया रख लिया।

-अध्याय 124, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक


[1] जिसके सिर पर पूरे साम्राज्य का भार था, वह इस तरह भाड़ क्यों झौंक रहा है?

[2] अपने सिर का सारा भार भाड़ में झौंक कर रहीमदास पार उतर गये हैं।

[3] ये रहीम अब दर-दर फिरते हैं और भीख मांगकर खाते हैं। मित्रो! अब मित्रता त्याग दो। अब वे रहीम नहीं रहे।

[4] चित्रकूट में अवध नरेश श्रीरामजी ने निवास किया। जिन पर विपदा आती है, वे इसी देश चले आते हैं।

[5] विपदा अच्छी है जो थोड़े दिन ही रहती है किंतु संसार में हितैषी अथवा अपकारी की पहचान करवा देती है।

[6] हृदय में अग्नि लगी रहती है, उसका धुआँ दिखाई नहीं देता। इसे या तो वह जानता है जिसके हृदय में अग्नि लगी हुई है, या फिर वह जिसके ऊपर कभी ऐसी विपदा आई है।

[7]  हे रहीम! तूने अपना मन सुंदर चकोर पक्षी के समान कर लिया है जो सदैव ही कृष्ण रूपी चंद्र की ओर लगा रहता है।

[8]  यदि दानी निर्धन हो जाये तो भी उसे जांचा जाना चाहिये जिस प्रकार नदी के सूख जाने पर लोग उसके तल में कुआँ खोदकर पानी निकालते हैं।

गोद लिये हुलसी फिरै (125)

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गुसाईंजी ने वृद्ध ब्राह्मण के हाथों से चिट्ठी लेकर पढ़ी तो उनके नेत्रों से आंसुओं की धारा बह निकली। खानखाना ने उसमें लिखा था- गोद लिये हुलसी फिरै तुलसी सो सुत होय।

– ‘तुलसी बाबा! ई बूढ़ा विप्र तोहरे शरण में आइ बा। हमार रक्षा आप न करिहैं तो कवन करे?’ एक बूढ़ा ब्राह्मण गुसाईंजी के पैरों में लोट गया।

– ‘ई विप्र देवता का करथें? हमइ नरक का मार्ग सुझावत हये का? चला उठा अब बेर ना करा।’

– ‘आप नरक में जाब्य, चित्रकूटौ नरकइ भहई जाब्य बाबा। तोहरे लिए का नरक, का सरग! हमरे लिए त इअहि जनम नरक होई गबा।’

– ‘ऐसन काहें घिघियात हो बामन देवता? कछु काम होई तो कहा।’

– ‘हम का बताई बाबा। तू अपनइ आँखी से देखि ल, ई हमारी बिटिया विआहई लायक होई गई बा। एकर विहाह करावई के बा।’

– ‘हम त खुद गिरस्थीदार नाइ हइ त तोहार का मदद करिवई?’

– ‘बाबा! हँसी ना करा। गरीब बामन क बेटी हउ। एकर हाँथ पीला होइ जात त हम चैन से मरित।’

– ‘साफ-साफ बतावा विप्रवर। का चाहथ्य?’

– ‘कछु धन से मदद होइ जात त हम एकाह ब्याहि देइत।’

– ‘धन! हमरे पास महाराज धन कहाँ बा?’ धन बये तो केहू राजा महराजा क दुआर देखा। तुलसी की कुटिया में तो एक सेर अनाज न मिली।’

– ‘हमइ ई सब नाहिं पता बाबा। हम सुने रहे कि ताहरे हाँथ में बड़ी शक्ति बा। कछु मंतर फेरा और दुइ-चार सेर कंचन बनाइद।’

निर्धन ब्राह्मण का दुखड़ा सुनकर गुसाईंजी दुविधा में पड़ गये। बड़ी देर तक सोचते रहे कि क्या किया जाये। अंततः उन्हें एक उपाय सूझ ही गया। उन्होंने कागज कलम उठाई और एक चिट्ठी खानखाना के नाम लिख दी।

– ‘विप्र होऽऽ!’ गुसाईं जी ने कुटिया के बाहर ऊंघ रहे ब्राह्मण को जगाया।

– ‘हाँ महराज!’

– ‘ई ल चिठिया।’

– ‘ई चिठिया क का होये महराज?’

– ‘ई चिठिया से बहुत कुछ होये, तनिक जतन करइ पड़े।’

– ‘का महराज, कउन जतन करइ पड़े? 

– ‘एका मंदाकिनी पार पर रहिइ वाले अब्दुर्रहीम खानखाना के पास लइजा। कहि दिह्य तुलसी दिये हैं।’

– ‘ लेकिन गुसाईंजी, ऐसे हमार का काम होये?’ बूढ़े ने विचलित होकर पूछा।

– ‘तनिक धैर्य रखा देवता। जा बिलम्ब जिनि करा।’

बूढ़ा ब्राह्मण गुसाईंजी को प्रणाम करके चला गया। जब वह किसी तरह पूछता-पूछता खानखाना की कुटिया तक पहुँचा तो संध्या होने में कुछ ही समय शेष रह गया था। खानखाना ने चिट्ठी हाथ में लेकर बांची-

”सुर तिय, नर तिय, नाग तिय, सब चाहत अस होय।”

बस केवल इतने ही अक्षर लिखे हुए थे उसमें। कुछ समझ में न आया। क्या चाहते हैं तुलसी बाबा? उसने दृष्टि ऊपर उठा कर कहा- ‘का हो देवता! ऊ बाहेर के बैठा बा?’

– ‘हमार बिटिया प्रभु।’

– ‘तनिक ओका इन्हाँ लिआवा।’

– ‘चला बिटिया। तनिक इहाँ आइके खानजू के परनाम करा।’

विप्र दुहिता ने धरती पर माथा टेक कर दूर से ही खानखाना को परनाम किया। खानखाना को अपने सवाल का जवाब मिल गया। उन्होंने रीवां नरेश के यहाँ से आई एक लाख रुपयों की पोटली निकाली और विप्र देवता के चरणों में धर दी- ‘ अऊर कछु सेवा होई ते कहा।’

– ‘अब कवनऊ साध बाकी नाइ बा खानजू। बिटिया क हाँथ पिअर होइ जाये त तोहरे साथ बैठिके माला जपब।’

– ‘एक काम हमरउ करा?’

– ‘एक काही के, दुई कहा न, सेवक सेवकाई न करे तो का करे?’ बूढ़े का रोम-रोम खानखाना के प्रति आभारी था।

– ‘ई चिट्ठिी तुलसी बाबा के दइ देह्य।’

बूढ़े ब्राह्मण ने उसी दिन गुसाईंजी की सेवा में उपस्थित हो सब विवरण कह सुनाया और खानजू की चिठिया उनके हाथ में रख दी। गुसाईंजी ने चिट्ठी को पढ़ा तो उनके नेत्रों से आंसुओं की धारा बह निकली। उसमें लिखा था- ”गोद लिये हुलसी फिरै, तुलसी सो सुत होय।”[1]


[1] इस पंक्ति के दो अर्थ हैं- पहला तो ये कि यह कन्या अपनी गोद में तुलसीदासजी जैसा गुणी बेटा लेकर प्रसन्नता पूर्वक विचरण करे। दूसरा अर्थ यह कि माता हुलसी, अपने पुत्र तुलसी को गोद में लिये घूमें। इसके तुलसीदास जैसा बेटा हो। (तुलसीदासजी की माता का नाम हुलसी था।)

-अध्याय 125, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक

बादशाह का अपहरण (126)

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आखिर वही हुआ जो नूरजहाँ चाहती थी, खुर्रम अपने बाप की नजरों में गिर गया। खुसरो पहले ही मर चुका था और जहाँदार वैसे भी किसी काम का न था। इस प्रकार शहरयार के बादशाह के तख्त तक पहुँचने के मार्ग में आने वाली तीन बाधायें स्वतः हट चुकी थीं। अब केवल परवेज बचा था जिसे शहरयार के हित में या तो मर जाना चाहिये था या फिर अपने दोनों भाईयों की तरह बादशाह से बगावत कर अपने बाप की नजरों से गिर जाना चाहिये था।

नूरजहाँ अब इसी कार्य में जुट गयी। उसने परवेज और महावतखाँ की सम्मिलित ताकत तोड़ने के लिये जहाँगीर से आदेश दिलवाया कि परवेज तो खानजहाँ लोदी के संरक्षण में गुजरात में रहे और महावतखाँ बंगाल चला जाये। महावतखाँ और परवेज दोनों ने ही इस आदेश को अंगीकार नहीं किया।

वे दोनों ही खुर्रम की ओर से भयभीत थे इसलिये एक साथ रहना चाहते थे। इधर खानखाना भले ही बादशाह से क्षमा पाकर फिर से मिली खानखाना की उपाधि ठुकरा कर चित्रकूट चला गया था किंतु अब भी वह परवेज और महावतखाँ के लिये किसी प्रबल शत्रु से कम नहीं था।

जब महावतखाँ बंगाल नहीं गया तो नूरजहाँ ने महावतखाँ को दरबार में तलब किया। महावतखाँ यदि मुगलिया सल्तनत में आज की तारीख में किसी से डरता था तो केवल नूरजहाँ से। उसकी इतनी हिम्मत नहीं हो सकी कि वह नूरजहाँ के सामने पेश हो सके इसलिये वह चुपचाप बंगाल को खिसक गया और मन ही मन नूरजहाँ तथा उसके भाई आसिफखाँ से निबटने की योजना बनाने लगा।

जब महावतखाँ दरबार में उपस्थित नहीं हुआ तो नूरजहाँ ने महावतखाँ के समधी को बुलवाया और सरे आम पीटकर कैद में डाल दिया। उस पर यह आरोप लगाया कि उसने मामूली आदमी होने के बावजूद बिना बादशाही हुक्म के महावतखाँ जैसे बड़े आदमी की बेटी से अपने बेटे की शादी की। यह एक अजीब अभियोग था जो उससे पहले किसी और आदमी पर नहीं लगा था।

जब महावतखाँ को ये समाचार पहुँचे तो वह भड़क गया। वह बंगाल जाने की योजना अधर में छोड़कर अपने पाँच हजार जंगी राजपूत सैनिकों के साथ पंजाब को चला गया जहाँ इन दिनों जहाँगीर प्रवास कर रहा था। वह कोई कदम उठाने से पहले बादशाह से मिल लेना चाहता था।

नूरजहाँ के संकेत पर बादशाह ने महावतखाँ से रूपयों का हिसाब मांगा। जब महावतखाँ ने जो हिसाब दिया, बादशाह उससे संतुष्ट नहीं हुआ और उसने महावतखाँ के साथ कठोरता बरती। इससे कुपित होकर महावतखाँ विद्रोही हो गया और एक दिन जब बादशाह भट नदी पार कर रहा था, महावतखाँ ने अवसर पाकर अपने राजपूत सैनिकों के बल पर जहाँगीर का अपहरण कर लिया और उसे हाथी पर सवार करके अपने डेरे पर ले गया।

महावतखाँ ने अपनी ओर से सब योजना ठीक-ठाक बनायी थी किंतु एक चूक उससे हो गयी। बादशाह हाथ लगते ही उसने नूरजहाँ को छोड़ दिया जो कुछ ही दूरी पर पड़ाव डाले हुए थी। नूरजहाँ को जब इस अपहरण का समाचार लगा तो वह उल्टे पैरों नदी पार करके अपने डेरे पर चली गयी।

अगले दिन वह आसिफखाँ के नेतृत्व में महावतखाँ से लड़ने के लिये आयी किंतु महावतखाँ के राजपूतों ने उसे भगा दिया। किसी तरह नदी में गोते खाती हुई वह फिर से अपने डेरे में लौट गयी। आसिफखाँ ने भाग कर अटक के किले में शरण लेनी चाही किंतु महावतखाँ ने उसे पकड़ लिया।

महावतखाँ बड़ा ही दुष्ट निकला। वह बादशाह को उसी हालत में काबुल ले गया और खानखाना को संदेश भिजवाया कि जिसने तुझे खानखाना बनाया था वह तो मेरी कैद में है जो तू वाकई में खानखाना है तो अपने बादशाह को छुड़ाकर ले जा।

महावतखाँ ने आगरे के सूबेदार को आदेश भिजवाये कि यदि बादशाह की सलामती चाहते हो तो दाराशिकोह और औरंगजेब को नजरबंद करके लाहौर ले आओ।

जब खुर्रम ने ये समाचार सुने तो उसने महावतखाँ के विरुद्ध चढ़ाई करने का मानस बनाया किंतु इस समय उसके पास मात्र पाँच सौ राजपूत सैनिक थे जो अकस्मात ही राजा भीमसिंह के बेटे किशनसिंह की मृत्यु हो जाने से बिखर गये थे। अतः अपने आप को हर तरह से निरुपाय पाकर खुर्रम ने ठठ्ठे की राह पकड़ी।

-अध्याय 126, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक

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