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जौहर (112)

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जौहर

पूरी मुगल सेना में हड़कम्प मचा हुआ था। जिसे देखो वही कुछ न कुछ नवीन सूचना बांटने में लगा हुआ था। जितने मुँह उतनी बातें। कोई कहता था कि खानखाना मलिक अम्बर के सामने समर्पण करने जा रहा है। कोई कहता था कि खानखाना ने जौहर करने का फैसला किया है। हालांकि जौहर हिन्दू स्त्रियों द्वारा किया जाता था न कि मुसलमान पुरुषों द्वारा।

कोई कहता था कि बादशाह की कुमुक अहमदाबाद तक आ गयी है, इसलिये खानखाना उस कुमुक की प्रतीक्षा तक चुपचाप बैठा है। इतनी सारी बातों के बावजूद कोई भी सैनिक यह कहने की स्थिति में नहीं था कि इन सारी बातों में से कौन सी बात सही है।

इन चर्चाओं को विराम तभी लगा जब शाम के समय खानखाना ने पूरी फौज को एकत्र कर आधिकारिक रूप से घोषणा की कि यदि एक माह के भीतर बादशाही कुमुक नहीं आती है तो खानखाना के सिपाहियों को जौहर करने के लिये तैयार रहना चाहिये। आगे का निर्णय सिपाहियों को करना था कि उनमें से कौन खानखाना का साथ निभाना चाहता है और कौन मोर्चा छोड़कर भागना चाहता है।

हालांकि यह सभी जानते थे कि खानखाना की सेना अपने शत्रुओं और लुटेरों से इस कदर घिर गयी है कि मोर्चे पर से निकल भागना किसी के लिये संभव नहीं है। यहाँ तक कि स्वयं खानखाना के लिये भी नहीं। यदि ऐसा हो पाता तो खानखाना जौहर करने की घोषणा ही क्यों करता!

जब मलिक अम्बर रहमानदाद को मारने में सफल हो गया और दाराब खाँ लाख चाहकर भी मलिक अम्बर को नहीं पकड़ सका तो मलिक अम्बर के हौंसले बुलंद हो गये। उधर उसे यह खबर भी मिली कि बादशाह स्वयं तो कश्मीर में जा बैठा है और उसके दूसरे अमीर-उमराव कोट कांगड़े की लड़ाई में बुरी तरह फंस गये हैं। यह सूचना पाकर मलिक अम्बर ने खुल्लमखुल्ला बगावत कर दी।

मलिक अम्बर ने खुर्रम के साथ की हुई सारी संधियों को तोड़ डाला। उसे देखकर दूसरे दक्खिनियों ने भी मुगलों से विद्रोह कर दिया। खानखाना बहुत प्रयास करता था किंतु वह मलिक को दबा नहीं पाता था। शहनवाजखाँ और रहमानदाद के न रहने से खानखाना की ताकत बहुत घट गयी थी।

खानखाना ने बादशाह को बहुत सी चिठ्ठियाँ भिजवाईं कि कुछ सेना भिजवाई जाये किंतु बादशाह की ओर से कोई जवाब नहीं आया। ऐसा नहीं था कि बादशाह तक चिठ्ठियाँ पहुँची नहीं, चिठ्ठियाँ पहुँची किंतु बादशाह उनका जवाब देने की स्थिति में नहीं रहा था। मेवाड़, कश्मीर और कोट कांगड़े में सेनाएं इस कदर उलझ गयीं थीं कि किसी भी तरह से खानखाना को कुमुक भिजवाया जाना संभव नहीं था। यही कारण था कि जहाँगीर खानखाना को जवाब भिजवाने की बजाय चुप लगा जाना ही अधिक उचित समझ रहा था।

उधर दक्खिनियों ने खानखाना को खदेड़ना आरंभ किया और उसका पीछा करते हुए बुरहानपुर तक चले आये। बुरहानपुर में खानखाना बुरी तरह घिर गया। दक्खिनियों ने रसद की आपूर्ति काट दी। जिससे मुगल सेना के पशु घास और चारे के अभाव में मरने लगे। यहाँ तक कि आदमियों के भी भूखों मरने की नौबत आ गयी।

एक-एक करके सारे प्रदेश हाथ से निकलते जा रहे थे और मुगल सिपाहियों की संख्या घटती जा रही थी। खाने-पीने का सुभीता न देखकर बहुत से सिपाही खानखाना को छोड़कर दक्खिनियों से जा मिले थे। मुगलों की घटती हुई ताकत को देखकर लुटेरों की फौज मुगल सेना के चारों ओर इकट्ठी हो गयी। ये लुटेरे मौका पाते ही मुगलों के डेरे में घुस जाते और उनका माल-असबाब लूट कर भाग खड़े होते।

इस तरह सब काता-कूता कपास होते हुए देखकर खानखाना का मस्तिष्क सुन्न हो जाता था। वह एक ऊँची टेकरी पर घोड़ा खड़ा करके उस पर चढ़कर अपनी बूढ़ी आँखों से घण्टों तक उत्तर दिशा की ओर ताका करता था और किसी भी क्षण कुमुक आने की उम्मीद करता था किंतु वहाँ से कुमुक तो दूर किसी पत्र तक का जवाब नहीं आया।

साठ हजार दक्खिनियों का मुकाबला मुगलों के छः-सात हजार सिपाही किसी भी तरह नहीं कर सकते थे। एक जमाना वह भी था जब खानखाना मुठ्ठी भर सिपाहियों को लेकर मुजफ्फरखाँ जैसे प्रबल शत्रु से जा भिड़ा था और उसके छक्के छुड़ा दिये थे किंतु वक्त के थपेड़ों ने खानखाना के शरीर और मन में इतना दम न छोड़ा था। यहाँ तक कि बराड़ और खानदेश भी उसके हाथ से निकल गये। ये वे क्षेत्र थे जिन्हें खानखाना ने सत्रह साल पहले अपने अधीन किया था।

स्थितियाँ जब एक-दम असह्य हो गयीं तो खानखाना ने जहाँगीर को अंतिम पत्र लिखा कि यदि एक माह में आगरा से कुमुक नहीं भेजी गयी तो मेरे पास हिन्दू वीरों की तरह जौहर करने के अतिरिक्त और कोई उपाय न बचेगा। मैं अपने हरम की औरतों को आग में जला कर स्वयं अपने बेटों-पातों और सिपाहियों सहित शत्रु से जूझता हुआ मृत्यु को प्राप्त होऊंगा। मुगलिया सल्तनत को यही मेरी अंतिम सहायता होगी। शत्रुओं के हाथों अपमानित होने की अपेक्षा तो रण में जूझते हुए मर जाना अधिक श्रेयस्कर है।

खानखाना का पत्र पाकर जहाँगीर के हाथों से तोते उड़ गये। वह एकदम से बेचैन हो उठा। उसने तुरंत ही अपना संदेशवाहक खानखाना को दौड़ाया कि खुर्रम के आने से पहले कोई कदम न उठाये। उसने कोट कांगड़ा के मोर्चे पर फतह हासिल होने का जश्न मना रहे खुर्रम को संदेश भिजवाया कि जिस तरह तुम्हारे दादा जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर ने किसी जमाने में खानेआजम कोका को गुजरातियों के शिकंजे से छुड़ाया था, तुम भी उसी तरह तेज गति से बुरहानपुर पहुँच कर खानखाना को छुड़ाओ और यह शुभ समाचार मुझे तुरंत ही भिजवाओ।

जहाँगीर ने अपनी स्वयं की भी लगभग सारी सेना कोकाखाँ के साथ दक्खिन के मोर्चे पर भिजवा दी। खुर्रम ताबड़तोड़ कूच करता हुआ बुरहानपरु पहुँचा। उसने दक्खिनियों में कसकर मार लगाई और खानखाना को उनके शिकंजे से बाहर निकाला। खुर्रम की प्रबलता देखकर मलिक अम्बर ने पुनः दीनता दिखाते हुए मुगलों के अधिकार वाले पुराने क्षेत्र खुर्रम को समर्पित कर दिये।

-अध्याय 112, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक।

आधा सेर कबाब (113)

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जहाँगीर ने अपने अमीरों से कहा कि मैंने अपना सारा राज्य नूरजहाँ को दे दिया है। अब मुझे क्या चाहिये? कुछ भी तो नहीं, सिवाय एक सेर शराब और आधा सेर कबाब के!

किसी समय ईरान में मिर्जा गयास बेग नामक आदमी रहता था। वह था तो मिर्जाओं के वंश में से किंतु उसकी माली हालत बहुत खराब थी। एक दिन ऐसा भी आया कि घर में ठीक से खाने को न रहा। जब उसने सुना कि मलिक मसूद नामक व्यापारी अपने काफिले के साथ हिन्दुस्थान जा रहा है तो गयास बेग भी उसके साथ हो लिया।

विकट रेगिस्तानी मार्ग में गयास बेग की औरत असमत बेगम ने एक पुत्री को जन्म दिया जिसका नाम मेहरून्निसा रखा गया। ईरान से भारत तक के लम्बे सफर में अनेक बाधायें आयीं। कभी रेतीली आंधियों से मुकाबला हुआ तो कभी डाकुओं से। कभी पीने के पानी की कमी से जूझना पड़ा तो कभी पशुओं की महामारी से। फिर भी किसी तरह यह काफिला हिन्दुस्थान पहुँच गया। मलिक मसूद ने गयास बेग को अकबर के दरबार में नौकरी दिलवा दी।

गयास बेग उद्यमी व्यक्ति था। उसने अपनी सेवा और स्वामिभक्ति से अकबर और उसके सेनापतियों को प्रसन्न कर लिया और उन्नति करता हुआ तीन सौ सवारों का मनसबदार बन गया।

मेहरून्निसा का ईरानी खून हिन्दुस्तान की जलवायु में अच्छा रंग लाया और शीघ्र ही वह एक सुंदर युवती में परिवर्तित हो गयी। एक दिन जब शहजादे सलीम की दृष्टि मेहरून्निसा पर पड़ी तो वह उसे पाने के लिये आतुर हो गया। यह तब की बात है जब मेहरून्निसा ने यौवन की दहलीज पर पहला कदम ही रखा था और उधर सलीम के हरम में औरतों की संख्या आठ सौ से ऊपर जा पहुँची थी।

गयास बेग तथा असमत बेगम की पहुँच सीधे अकबर तथा उसकी बेगमों तक थी इसलिये बिना विवाह किये मेहरून्निसा को पाना संभव नहीं था। सलीम ने अपनी माता तथा अन्य बेगमों से कहा कि मेहरून्निसा का विवाह मुझसे कर दिया जाये किंतु अकबर इस विवाह के लिये राजी नहीं हुआ। सलीम की इच्छा के विपरीत अकबर ने स्वयं रुचि लेकर मेहरून्निसा का विवाह अपने नौकर अलीकुली से कर दिया और सलीम हाथ मलता ही रह गया।

जब सलीम जहाँगीर के नाम से तख्त पर बैठा तो उसके मन में मेहरून्निसा को पाने की ललक फिर से जागी। एक बार मेहरून्निसा के पति अलीकुली ने अकेले ही एक शेर को मारा। इस पर जहाँगीर ने उसे शेर अफगन की उपाधि दी और उसे बर्दवान का फौजदार नियुक्त कर दिया।

जब शेर अफगन बर्दवान पहुँच गया तो जहाँगीर ने बंगाल के सूबेदार कुतुबुद्दीन को आदेश दिया कि शेर अफगन विद्रोह की तैयारियां कर रहा है, इसलिये उस पर निगाह रखी जाये। कुतुबुद्दीन ने शेरअफगन को गिरफ्तार करने का प्रयास किया किंतु इस संघर्ष में दोनों ही मारे गये। शेर अफगन के मारे जाने पर जहाँगीर ने मेहरून्निसा और उसकी बेटी को अपने पास बुलवा लिया। कुछ दिनों बाद जहाँगीर ने मेहरून्निसा से विवाह कर लिया और अपनी नयी बेगम का नाम रखा- नूरमहल।

मेहरून्निसा भाग्य के इस तरह पलटा खाने से बहुत दुखी हुई किंतु शीघ्र ही उसे पता लग गया कि यह उसका अपकर्ष नहीं था अपितु भाग्योत्कर्ष के कारण ही ऐसा हुआ था। वह जितनी सुंदर थी, उससे कहीं अधिक बुद्धिमती थी। वह जितनी कोमलांगी थी, उससे कहीं अधिक कठोर हृदया थी।

वह जितनी मधुर भाषिणी थी उससे कहीं अधिक चतुरा थी। धीरे-धीरे वह जहाँगीर की प्रीतपात्री बन गयी। जहाँगीर उसके सौंदर्य पाश में ऐसा बंधा कि सारे महत्वपूर्ण निर्णय उसी से पूछकर करने लगा। कुछ ही दिनों बाद जहाँगीर को लगने लगा कि उसने मेहरून्निसा को नूरमहल की उपाधि देकर उसके साथ न्याय नहीं किया है इसलिये जहाँगीर ने नूरमहल को नयी उपाधि दी- नूरजहाँ।

कुछ ही दिानों में नूरजहाँ का नूर जहाँगीर के हरम से निकल कर उसके दरबार और पूरे देश में फैलने लगा। उसके पिता मिर्जा गयास बेग को एत्मादुद्दौला की तथा भाई को आसफखाँ की उपाधि मिली। अब वे दोनों बादशाह के दरबार में सर्वप्रमुख व्यक्ति हो गये।

अब नूरजहाँ ही जागीरें, मनसब और उपाधियाँ बाँटने लगी। वह बादशाह का चिह्न धारण करके महल के झरोखे में बैठ जाती। उसने अपने नाम से सिक्के ढलवाये तथा वह विधवा औरत से साम्राज्ञी बन गयी। शाही फरमानों में जहाँगीर के साथ नूरजहाँ का भी नाम लिखा जाने लगा। जिस फरमान में नूरजहाँ का नाम नहीं होता था, उसे राजकीय कर्मचारी नहीं मानते थे।

एक दिन ऐसा भी आया जब जहाँगीर ने अपने अमीरों से कहा कि मैंने अपना सारा राज्य नूरजहाँ को दे दिया है। अब मुझे क्या चाहिये? कुछ भी तो नहीं, सिवाय एक सेर शराब और आधा सेर कबाब के!

-अध्याय 113, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक।

भेड़िये का बच्चा (114)

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जहाँगीर के पाँच बेटे थे- खुसरो, परवेज, खुर्रम, जहाँदार और शहरयार। खुसरो पहले ही बादशाह द्वारा आँखें फुड़वाकर मरवाया जा चुका था। अब परवेज ही सबसे बड़ा था और वही बादशाह को सबसे प्रिय था लेकिन नूरजहाँ के भाई आसफ अली की बेटी का विवाह खुर्रम के साथ हो जाने से नूरजहाँ परवेज के पक्ष में न थी जिससे परवेज का प्रभाव घट गया था।

खुर्रम अत्यंत महत्वाकांक्षी, सत्ता लोलुप और दुराग्रही व्यक्ति था। नूरजहाँ का सहारा मिल जाने से अब तक उसी को अपनी प्रतिभा प्रदर्शन के सर्वाधिक अवसर मिले थे। यही कारण था कि अब तक सर्वाधिक लड़ाईयाँ खुर्रम ने ही लड़ी थीं और सर्वाधिक सफलतायें भी उसी ने अर्जित की थीं।

जब नूरजहाँ ने अपने पेट से उत्पन्न अपने पूर्व पति शेरअफगन की बेटी का विवाह जहाँगीर के सबसे छोटे बेटे शहरयार से कर दिया तो नूरजहाँ की रुचि खुर्रम में न रही। वह चाहती थी कि खुर्रम के स्थान पर शहरयार को सफलतायें प्राप्त हों और वही बादशाह के उत्तराधिकारी के रूप में स्थापित हो लेकिन शहरयार नितांत निकम्मा और अयोग्य आदमी था। जब वह उद्यम ही नहीं करता था तो सफलतायें कहाँ से मिलतीं!

जब खुर्रम बादशाह से बहुत सा मान सम्मान और सेना पाकर दक्षिण को गया और खानखाना को दक्खिनियों के चंगुल से छुड़ाने के बाद एक के बाद एक करके सफलताओं के झण्डे गाढ़ने लगा तो नूरजहाँ को अच्छा नहीं लगा। उसने खुर्रम का प्रभाव घटाने के लिये दिल्ली, आगरा और पंजाब सूबों की सर्वश्रेष्ठ जागीरें शहरयार को प्रदान कर दीं। खुर्रम को बहुत ही घटिया और अनुपजाऊ जागीरें दी गयीं किंतु दक्खिन में होने से उसे इस परिवर्तन का ज्ञान न हो सका।

जब ईरान का शाह अब्बास सफवी कांधार पर चढ़कर आया तो जहाँगीर ने खुर्रम को आदेश भिजवाया कि वह खानखाना को लेकर शाह ईरान का रास्ता रोके तथा कांधार की रक्षा करे।

जब खुर्रम खानखाना को साथ लेकर दक्षिण से पश्चिमी सूबों में आया तो उसे ज्ञात हुआ कि दिल्ली, आगरा और पंजाब सूबों की सर्वश्रेष्ठ जागीरें शहरयार को दे दी गयी हैं तो खुर्रम मांडी में ही ठहर गया और बादशाह को संदेश भिजवाया कि वह वर्षा ऋतु की समाप्ति के बाद कांधार जायेगा।

नूरजहाँ यही चाहती थी कि खुर्रम कोई गलती करे। उसने तत्काल मुगल सेनापतियों को संदेश भिजवाया कि वे खुर्रम को वहीं छोड़कर बादशाह की सेवा में कश्मीर चले आयें तथा बादशाह की ओर से खुर्रम को लिखवाया कि अब खुर्रम यहाँ न आये। मालवे, दक्खन और खानदेश के सूबे उसे इनायत किये जाते हैं, वहीं कहीं जाकर रहे। 

खुर्रम बादशाह के पत्र पाकर और भी भड़क गया। उसने अपने सेनापति सुंदर ब्राह्मण को आदेश दिया कि आगरा पर धावा करे। खानखाना को खुर्रम के साथ देखकर विक्रमाजीत सुंदर ब्राह्मण अपनी सेना लेकर आगरा पर चढ़ दौड़ा। उसने आगरे के कई नामी अमीरों के घर लूट लिये और बहुत सा धन लाकर खुर्रम को अर्पित किया। बादशाह यह समाचार पाते ही आगरा की ओर रवाना हुआ।

खानखाना और उसका पुत्र दाराबखाँ भी खुर्रम के साथ थे। उन्हें भी बादशाह की सेवा में हाजिर होने के आदेश दिये गये किंतु नियति खानखाना के सामने आकर खड़ी हो गयी। एक ओर बादशाह जहाँगीर था जिसके हजार अहसान खानखाना पर थे तो दूसरी ओर शहजादा खुर्रम जो खानखाना के मरहूम बेटे शाहनवाजखाँ की बेटी का पति था। खानखाना दुविधा में फंस गया। वह कोई भी निर्णय लेने की स्थिति में न रहा।

बेटी जाना के विधवा हो जाने के बाद पौत्री ही अब उसके स्नेह का केंद्र थी किंतु जहाँगीर उस यतीम पौत्री के सुख को भी छीन लेना चाहता था। सब कुछ भाग्य के भरोसे छोड़कर खानखाना ने खुर्रम के साथ ही रहना ठीक समझा।

इसी बीच नूरजहाँ के इशारे पर शहरयार ने जहाँगीर से निवेदन किया कि जब खुर्रम कांधार के मोर्चे पर जाने को तैयार नहीं है तो मुझे भेजा जाये। जहाँगीर ने शहरयार को कांधार जाने की अनुमति दे दी। जब कुछ दिनों बाद जहाँगीर को सूचना मिली कि शहरयार हार गया और शाह ईरान ने कांधार पर अधिकार कर लिया तो बादशाह बुरी तरह तिलमिला गया। वह किसी न किसी पर अपना क्रोध उतारने का अवसर ढूंढने लगा। शीघ्र ही उसे यह अवसर प्राप्त हो गया।

जब जहाँगीर ने देखा कि अन्य सेनापति तो खुर्रम को छोड़कर जहाँगीर की सेवा में उपस्थित हो गये हैं किंतु खानखाना तथा उसके बेटे-पोते खुर्रम के ही साथ हैं तो वह खानखाना पर बड़ा कुपित हुआ। उसने खानखाना को लिखा कि तेरा तो पूरा शरीर ही नमक हरामी से बना हुआ है।

सत्तर वर्ष की उम्र में तूने बादशाह से विद्रोह करके अपना मुँह काला किया तो दूसरों को क्या दोष दूँ? तेरे बाप ने भी अपनी अंतिम अवस्था में मेरे बाप से विद्रोह किया था। तू भी अपने बाप का अनुगामी होकर हमेशा के लिये कलंकित हुआ। भेड़िये का बच्चा आदमियों में बड़ा होकर भी अंत में भेड़िया ही बनता है।’

खानखाना समझ गया कि भाग्य रथ का पहिया उल्टा घूम चुका है। उस आयु में बादशाही कोप को झेल पाना खानखाना के बूते के बाहर की बात थी।

-अध्याय 114, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक।

दादा-पोते (115)

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मुगलिया राजनीति की खूनी चौसर पर अब दादा.पोते एक-दूसरे का सिर उतारने के लिए आमने-सामने ख़ड़े थे। एक तरफ था अब्दुर्रहीम खानखाना तो दूसरी ओर उसका पोता मनूंचहर!

खानखाना के समझाने पर खुर्रम ने बादशाह के पास क्षमा याचना की कई अर्जियाँ भिजवाईं किंतु बादशाह ने उन पर कोई विचार नहीं किया। जो भी वकील अर्जी लेकर बादशाह के सामने हाजिर होता था, बादशाह उसी को कैद कर लेता था। नूरजहाँ की सलाह पर जहाँगीर ने बंगाल से परवेज को बुलाया और उसे खुर्रम पर आक्रमण करने के लिये भेजा। परवेज विशाल सेना लेकर खुर्रम तथा खानखाना के पीछे लग गया।

इस समय खुर्रम के पास बीस हजार सिपाही थे जबकि परवेज के पास चालीस हजार सिपाही थे। फिर भी खानखाना का खुर्रम की ओर होना ही जीत की निशानी थी।

जब परवेज चाँद के घाटे से उतर कर मालवे में आया तो खानखाना के मरहूम पुत्र शाहनवाजखाँ का बेटा मनूंचहर खुर्रम का साथ छोड़कर परवेज के पास चला गया। खानखाना के लिये यह बड़ा झटका था। खानखाना की समझ में नहीं आ रहा था कि जीवन के रंगमच पर आखिर ईश्वर ने उसके लिये क्या भूमिका निश्चित की है। वह किसके लिये लड़े और किससे लड़े? यदि युद्ध के मैदान में उसका सामना मनूंचहर से हो गया तो खानखाना क्या करेगा? तलवार उठायेगा या गिरा देगा?

इस नवीन परिस्थिति में खानखाना के लिये एक तरफ खुर्रम और एक तरफ परवेज न रह गये अपिुत उसके लिये तो यह ऐसी लड़ाई हो गयी थी जिसमें एक तरफ उसकी पौत्री थी तो दूसरी ओर पौत्र।

खानखाना पशोपेश में पड़ गया लेकिन फिर भी उसने नियति के निर्णय को स्वीकार कर लिया कि वह जिस स्थान पर खड़ा था, उसी स्थान पर रहे अतः उसने खुर्रम का साथ नहीं छोड़ा। जब परवेज और खुर्रम की सेनाएं आमने-सामने हुई तो खुर्रम की सेना खुर्रम को छोड़कर परवेज से जा मिली। इससे खुर्रम खानखाना तथा दाराबखाँ को अपने साथ लेकर किसी तरह नर्मदा पार करके दक्खिन को भाग गया। दादा-पोते एक-दूसरे का सिर काटने से बच गए।

-अध्याय 115, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक।

षड़यंत्र (116)

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– ‘क्या बात है लाल मुहम्मद?’

– ‘हुजूर कहते हुए जुबान कटती है। जान बख्शी जाये तो कुछ हिम्मत करूं।’

– ‘बिना किसी डर के अपनी बात कहो, लाल मुहम्मद। तुम हमारे भरोसेमंद हो।’

शहजादे खुर्रम से आश्वासन पाकर लाल मुहम्मद ने अपनी जेब से एक चिट्ठी निकाली और खुर्रम की ओर बढ़ा दी।

– ‘यह क्या है?’ खुर्रम ने चिट्ठी एक साँस में पढ़ डाली।

– ‘हुजूर! खानखाना का मुखबिर यह चिट्ठी लेकर शहजादे परवेज के पास जाता था। किसी तरह मेरे हाथ पड़ गया।’

– ‘वह मुखबिर कहाँ है?’

– ‘वह मेरे डेरे में कैद है।’

– ‘उसे मेरे सामने हाजिर किया जाये।’

थोड़ी ही देर बाद लाल मुहम्मद, खानखाना के मुखबिर को लेकर खुर्रम के डेरे में हाजिर हुआ।

– ‘क्या तुझे इस चिट्ठी के साथ पकड़ा गया है?’

मुखबिर ने कोई जवाब नहीं दिया।

– ‘सच कह नहीं तो जीभ खींच लूंगा।’

मुखबिर ने इस पर भी जुबान नहीं खोली तो खुर्रम ने तलवार उठाई। यह देखकर मुखबिर खुर्रम के पैरों में गिर पड़ा- ‘मेरी जान बख्शी जाये हुजूर।’

– ‘क्यों बख्शी जाये तेरी जान?’

– ‘मैं तो गुलाम हूँ। कुसूरवार तो कोई और है।’

– ‘तो कुसूरवार का नाम बता।’

– ‘चिट्ठी लिखने वाले का नाम चिट्ठी के नीचे दर्ज है।’

– ‘मैं तेरे मुँह से सुनना चाहता हूँ।’

– ‘जिसका नाम चिट्ठीके नीचे लिखा है, उसी ने मुझे यह चिट्ठी दी थी।’

– ‘खानखाना ने?’

– ‘हाँ हुजूर।’

– ‘सच कहता है?’

– ‘हाँ हुजूर।’

– ‘किसके पास ले जा रहा था?’

– ‘महावतखाँ के पास।’

– ‘लाल मुहम्मद! इस नामुराद को कैद में रख और खानखाना को मेरे सामने हाजिर कर।’

थोड़ी ही देर में खानखाना शहजादे के डेरे में था।

– ‘यह क्या है?’ खुर्रम ने खानखाना की ओर चिट्ठी बढ़ाई।

खानखाना खुर्रम के हाथ से खत लेकर उत्सुकता से पढ़ने लगा।

– ‘हुजूर जरा जोर से पढ़िये ताकि मैं भी सुन सकूं।’ खुर्रम ने व्यंग्य से कहा।

– ‘जो सौ आदमी नजरों में मेरी देखभाल नहीं रखते होते तो बेचैनी से कभी का उड़कर वहाँ पहुँच जाता।’ खानखाना ने पढ़ा।

– ‘यह क्या है शहजादे?’ खानखाना ने खुर्रम से पूछा।

– ‘यही तो हम जानना चाहते हैं हुजूर कि यह क्या है?’ शहजादे के शब्द तल्खी और व्यंग्य से पूरी तरह लबरेज थे।

– ‘जब तक यह पता न लगे कि यह चिट्ठी किसने और किसे लिखी है, तब तक इसके बारे में कोई भी अनुमान नहीं लगाया जा सकता।’

– ‘अब ज्यादा होशियारी मत दिखाइये खानखाना। यह चिट्ठी आपने लिखी है और दुष्ट महावतखाँ को लिखी है। यह भी जान लीजिये कि आपका जो मुखबिर यह चिट्ठी लेकर महावतखाँ को देने जा रहा था, उसी ने हमें यह सब बताया है।’ अपनी बात पूरी करते-करते खुर्रम की आँखों में खून उतर आया।

– ‘यह सरासर गलत है। मेरे विरुद्ध कोई साजिश हुई है।’

– ‘लाल मुहम्मद! इस बूढ़े शैतान को हथकड़ी-बेड़ी लगा दे और तब तक मत छोड़ जब तक मैं खुद तुझे ऐसा करने का हुक्म न दूँ।’

खुर्रम का ऐसा आदेश सुनकर खानखाना ने लम्बी सांस छोड़ते हुए कहा-

‘रहिमन सीधी चाल सों, प्यादा होत वजीर।

फरजी साह न हुइ सकै, गति टेढ़ी तासीर।’[1]

खर्रुम ने एक न सुनी। उसके आदेश से खानखाना के हाथों में हथकड़ियाँ और पैरों में बेड़ियाँ डाल दी गयीं तथा उसे उसी के डेरे में कैद कर दिया गया। थोड़ी ही देर बाद दाराबखाँ को भी हथकड़ियों बेड़ियों सहित खानखाना के डेरे में लाकर बंद किया गया। अपने बूढ़े बाप को इस हालत में देखकर दाराबखाँ फूट-फूट कर रोने लगा। दाराबखाँ ही एकमात्र बेटा था जो अब तक खानखाना का साथ निभा रहा था। खानखाना ने उसे दिलासा देते हुए कहा-

‘रहिमन चुप ह्नै बैठिये देखि दिनन को फेर।

जब नीके दिन आइहैं बनत न लगिहैं बेर।’

-अध्याय 116, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक।


[1]  सीधे-सीधे चलने वाला प्यादा भी वजीर बन जाता है किंतु टेढ़ी चाल चलने वाला वजीर कभी भी बादशाह नहीं बन सकता। क्योंकि टेढ़ी चाल की तासीर ही ऐसी है।

वक्त की दगा (117)

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जब महावतखाँ को खानखाना की कैद के समाचार मिले तो वह दूने उत्साह से भरकर खुर्रम की ओर दौड़ा। महावतखाँ को लगा कि भाग्य ने उसके लिये एक साथ दो-दो सफलतायें पाने का अवसर उपस्थित कर दिया है।

खुर्रम की हालत तो उसी समय पतली हो गयी थी जब उसकी सेनाएं खुर्रम को छोड़कर परवेज से जा मिली थीं किंतु जब खानखाना को कैद कर लिया गया तो खुर्रम की रही सही ताकत भी जाती रही।

महावतखाँ ने चारों ओर से खुर्रम को घेर लिया। उसके हाथी-घोड़े छीन लिये। धीरे-धीरे घेरा उस मुकाम पर पहुँच गया, जहाँ से महावतखाँ किसी भी दिन खुर्रम के डेरे पर आ धमक सकता था।

इस पर खुर्रम ने लानतुल्ला को महावतखाँ से संधि की बात चलाने के लिये भेजा। लानतुल्ला का वास्तविक नाम तो अब्दुल्लाखाँ फिरोज जंग था, उसे जहाँगीर ने लानतुल्ला की उपाधि दी थी। तब से वह लानतुल्ला ही कहलाता था।

लानतुल्ला का मित्र राव रतन हाड़ा इस समय महावतखाँ के लश्कर में था। लानतुल्ला ने उसी के माध्यम से संधि की बात चलाई। महावतखाँ ने लानतुल्ला से कहा- ‘यदि तेरी जगह खानखाना आकर संधि की बात करे और सब कौल करार करे तो मैं संधि करूं।’

लानतुल्ला ने यह बात जाकर खुर्रम को कह सुनाई। खुर्रम को पक्का विश्वास हो गया कि महावतखाँ और खानखाना में कोई न कोई सटपट[1]  अवश्य है। फिर भी अपना बुरा वक्त जानकर खुर्रम ने नीचे दबना ही मुनासिब समझा और खानखाना तथा दाराबखाँ को बाइज्जत अपने सामने पेश करने के आदेश दिये।

लानतुल्ला ने खानखाना और दाराबखाँ की हथकड़ियाँ और बेड़ियाँ कटवाईं तथा उन्हें नहला धुलाकर भर पेट भोजन करवाया। जब बाप बेटों को खुर्रम के सामने पेश किया गया तो खुर्रम ने अपने स्थान से खड़े होकर उनका स्वागत किया और उन्हें अपने आसन पर बैठाते हुए कहा- ‘मेरे लिये तो आज ईद हुई।’

खानखाना समझ गया कि खुर्रम का कोई न कोई स्वार्थ खानखाना से अटक गया है तभी इतनी लल्लो-चप्पो कर रहा है। उसने खुर्रम को सम्बोधित करके  कहा-

‘बिगरी बात बने नहीं, लाख करौ किन कोय।

रहिमन फाटे दूध को मथे न माखन होय।’

खानखाना का यह भाव देखकर खुर्रम उसके पैरों में गिर गया- ‘आप बड़े हैं, हर तरह से इज्जत पाने के योग्य हैं, मेरे गुनाह मुआफ करें। मुसीबत में अपने ही काम आते हैं।’

खानखाना ने खुर्रम की बजाय अपने पुत्र दाराबखाँ की ओर देखकर हँसते हुए कहा-

‘रहिमन प्रीति न कीजिये, जस खीरा ने कीन।

ऊपर से तो दिल मिला,  भीतर फाँकें  तीन।’

खानखाना की हँसी खुर्रम के कलेजे को चीर गयी फिर भी वह अपनी ही तरह का अकेला मक्कार था। वह जानता था कि खानखाना आसानी से चिकनी चुपड़ी बातों में नहीं आयेगा। उसने कुरान पर हाथ रखकर कसम खाई- ‘मुझे अपने किये पर बेहद अफसोस है। आगे से हमेशा खानखाना की मर्यादा का ख्याल रखा जायेगा। मैं अपने आप को आपके हवाले करता हूँ। मेरी इज्जत आबरू आपके हाथ में है।’

खानखाना ने कुरान को चूमते हुए कहा-

‘रहिमन खोजे ऊख में, जहाँ रसन की खानि।

जहाँ गाँठ तहँ रस नहीं यही प्रीति में हानि।’[2] 

जब खानखाना किसी भी तरह सीधे मुँह बात करने को तैयार नहीं हुआ तो खुर्रम ने अपने हरम की सारी औरतों को अपने डेरे में बुलवा कर खानखाना के पैरों में डाल दिया- ‘ये सब आपकी बेटियाँ हैं। यदि आप चाहते हैं कि हरामी महावतखाँ इन्हें बेइज्जत करके लूटकर ले जाये तो बेशक आप मेरी मदद न करें।’

खुर्रम का यह बाण सही निशाने पर लगा। पौत्री का शोक विह्वल मुँह देखकर खानखाना पसीज गया। उसके नेत्रों से आंसुओं की धार बह निकली। उसने कहा- ‘बोल शहजादे, इस बूढ़े रहीम से तू क्या चाहता है। रहीम जान देकर भी तेरी इच्छा पूरी करेगा।’

  – ‘ऐसा कुछ करो खानखाना कि मेरे और बादशाह के बीच बात अधिक न बिगड़े और मुझे अधिक न भटकना पड़े।’

खानखाना के आदेश पर लानतुल्ला को महावतखाँ के पास भेजा गया और कहा गया कि वह इधर से खानखाना नदी के कराड़ पर आता है। वहाँ से महावतखाँ नदी के कराड़ पर पहुँचे। दोनों जने बीच नदी में नाव पर बैठ कर सुलह सफाई की बात करेंगे।

अभी लानतुल्ला डेरे से बाहर निकला ही था कि लाल मुहम्मद ने आकर सूचना दी- ‘बादशाही कुमुक नदी पार करके शहजादे के डेरों की ओर बढ़ रही है।

लाल मुहम्मद का संदेश सुनते ही खानखाना डेरे से बाहर निकला। नदी के तट पर महावतखाँ की नावों की हलचल थी और खुर्रम की सेना में चारों ओर भगदड़ मची हुई थी। जिस खानखाना के मैदान में मौजूद रहते हुए कोई सिपाही कभी मोर्चा छोड़कर नहीं भागा था, आज वही सिपाही बिना लड़े ही भाग रहे थे। सिपाही तो उस वक्त तक खानखाना की रिहाई के बारे में जानते तक न थे। वे तो यही समझ रहे थे कि खानखाना हथकड़ी-बेड़ियों में जकड़ा हुआ अपने डेरे में पड़ा है।

एकाएक ही विचित्र स्थिति उत्पन्न होने से खुर्रम की दशा खराब हो गयी। उसके सामने खुसरो का चेहरा घूमने लगा। खुर्रम ने सोचा कि यदि मैं बादशाही सेना के हाथ लग गया तो मेरी भी वही दशा होगी जो एक जमाने में खुसरो की हुई थी। उस समय खुसरो की दुर्दशा करवाने में मैं शामिल था और इस बार मेरी दुर्दशा करने में परवेज और शहरयार पीछे न रहेंगे। यदि जहाँगीर ने किसी तरह रहम करके छोड़ भी दिया तो मलिका नूरजहाँ उसे किसी भी तरह जीवित नहीं छोड़ेंगी।

इन सब बातों पर विचार करते-करते खुर्रम इतना अधीर हुआ कि किसी तरह का मुकाबला न करके चुपचाप भाग खड़ा हुआ। किसी तरह उसने दाराबखाँ को हरम की औरतें लेकर आने के लिये कहा। घबराहट और जल्दबाजी में अपने पलायन की सूचना उसने खानखाना को भी नहीं दी। ऐसी भगदड़ मची कि दाराबखाँ भी बिना यह जाने कि खानखाना कहाँ है, हरम की औरतों को लेकर खुर्रम के पीछे भाग खड़ा हुआ।

महावतखाँ को चढ़कर आया देखकर खानखाना ने उससे मुकाबला करने की तैयारी की किंतु समय इतना कम था कि तलवार हाथ में लेकर घोड़े पर सवार होने के अतिक्ति कुछ नहीं किया जा सकता था।

 खुर्रम और दाराबखाँ को अपने पास न पाकर खानखाना ने मुकाबले का इरादा त्याग दिया। मैदान की स्थिति यह थी कि गिनेचुने सिपाही ही उसके चारों ओर खड़े रह गये थे। खानखाना न तो मोर्चा छोड़कर भाग सकता था और न मुकाबला कर सकता था। आज से पहले खानखाना ने किसी के सामने समर्पण भी नहीं किया था किंतु वक्त ने आज वह समय भी ला दिया।

इस तरह एकाकी छोड़ दिये जाने पर खानखाना घोड़े से नीचे उतर गया। उसने अपनी प्यारी तलवार निज सेवक फहीम[3]  के हाथ में दे दी। जूते उतार दिये और स्वयं नंगे पाँव महावतखाँ की ओर चल दिया। फहीम ने कहा- ‘मालिक! महावतखाँ विश्वास के योग्य नहीं है। दगा अवश्यंभावी है।’

खानखाना ने पलट कर कहा- ‘किसी महावतखाँ की औकात नहीं जो खानखाना से दगा करे। दगा तो वक्त ने की है और आगे भी जो करेगा, वक्त ही करेगा।’

– ‘इससे तो बेहतर है कि हथियार पकड़कर बादशाह के हुजूर में चलें।’

– ‘जब बादशाह के नाम पर नूरजहाँ के सामने घुटने टिकाने हैं तो तू यह मान ले कि महावतखाँ ही बादशाह है। तू यह मान ले कि शहजादा परवेज ही बादशाह है। तू यह क्यों नहीं समझता कि बादशाह जहाँगीर नहीं, बादशाह तो वक्त है, जो सबसे ज्यादा क्रूर और दगाबाज है।’

खानखाना का जवाब सुनकर फहीम आँखों में आँसू भर कर खानखाना के पीछे-पीछे चला।

-अध्याय 117, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक।


[1] सांठगाँठ। जहाँगीर नामे में स्वयं बादशाह जहाँगीर ने इसी शब्द का प्रयोग किया है।

[2] जो गन्ना रस की खान है, उसमें भी जहाँ-जहाँ गाँठ होती है, रस नहीं होता। प्रेम में भी जहाँ गाँठ पड़ जाती है, वहाँ रस नहीं रहता।

[3] फहीम एक राजपूत युवक था। वह खानखाना का निज सेवक तथा विश्वासपात्र था। वह खानखाना के गुणों पर रीझकर खानखाना की सेवा में रहता था।

उड़ावे फहीम (118)

0

खानखाना अब पूरी तरह दो हिस्सों में बंट गया। उसका बेटा दाराबखाँ, बेटे शाहनवाजखाँ की पुत्री और दाराबखाँ के बेटे खुर्रम के पास थे और पोता मनूंचहर तथा स्वयं खानखाना परवेज के पास थे।

ऐसी स्थिति में खानखाना के लिये कहीं ठौर न बची थी। जाये तो जाये कहाँ? उसने खुर्रम के निज मंत्री भीम सिसोदिया को पत्र लिखा कि यदि खुर्रम मेरे बेटों-पोतों को छोड़ दे तो मैं बादशाही लश्कर को दक्खिन से हटाकर आगरा भेज दूँ। नहीं तो बहुत मुश्किल पड़ेगी।

इस पर भीम सिसोदिया ने लिखा- ‘अभी तो पाँच-छः हजार लोग खुर्रम के लिये अपनी जान झौंकने के लिये शेष हैं। जब तू हमारे पास आयेगा तब तेरे बेटे को मारकर तेरा हिसाब किया जायेगा।’

खानखाना समझ गया कि मुगलिया सल्तनत की गंदी सियासत पूरी तरह से खानखाना के परिवार को खत्म करके ही दम लेगी। इधर परवेज खानखाना से पूरी सेवा लेगा और अंत में उसे नष्ट कर देगा। उधर खुर्रम दाराबखाँ से पूरी सेवा लेगा और जब दाराबखाँ उसके काम का न रहेगा तो खुर्रम उसे नष्ट कर देगा। खानखाना यह बात दाराब और मनूंचहर को समझाना चाहता था किंतु उन तक पहुँचने या उन तक अपना संदेश पहुँचाने का कोई उपाय न था।

कुछ दिनों बाद खबर आयी कि खुर्रम ने गोलकुण्डा होते हुए उड़ीसा के रास्ते बंगाल पर अमल जमा लिया है और दाराबखाँ को वहाँ का सूबेदार नियुक्त किया है। यह सुनकर परवेज ने बुरहानपुर से बंगाल जाने की तैयारी की और मनचूहर को खानपुर थाने का हाकिम बना दिया। यह देखकर खानखाना ने अपना माथा पीट लिया।

खुर्रम को उदयपुर के राणा अमरसिंह के पुत्र भीमसिंह की सेवाएं मिल जाने से खुर्रम के हौंसले बुलंद थे। वह बंगाल को जीतने के बाद बिहार की ओर बढ़ा और उसे दबाने के बाद निरंतर आगे बढ़ता हुआ इलाहाबाद तक चढ़ आया।

परवेज ने खानखाना के आधे परिवार को अपनी तरफ और आधे परिवार को खुर्रम की तरफ देखकर खानखाना का विश्वास नहीं किया। उसने खानखाना को कैद करने का निर्णय लिया।

जब परवेज के आदेश पर महावतखाँ के आदमी नंगी तलवारें लेकर खानखाना के डेरे की तरफ बढ़े तो फहीम ने तलवार खींच ली। फहीम को अकेले ही लड़ने के लिये आया देखकर महावतखाँ ने कहा- ‘तू अपनी जान व्यर्थ ही गंवाता है। तुझे क्या भय है?’

– ‘आप किस इरादे से नंगी तलवारें लेकर मेरे स्वामी के डेरे पर आये हैं, यह जाने बिना मैं आपको डेरे में प्रवेश नहीं करने दूंगा।’

– ‘शहजादे का हुक्म है कि बदकार खानखाना को गिरफ्तार करके हथकड़ी बेड़ी लगायी जाये।’

– ‘लेकिन क्यों? क्या गुनाह है मेरे स्वामी का?’

– ‘फहीम! महावतखाँ को अपना काम करने दो।’ खानखाना ने कहा। वह डेरे के बाहर शोर होता हुआ सुनकर निकल आया था।

– ‘मेरी देह में प्राणों के रहते यह बदजात मेरे स्वामी को छू भी नहीं सकता।’ फहीम ने ताल ठोकी।

– ‘गुस्ताख सिपाही! शहजादे की मंशा पूरी होने में रोड़ा बनता है। तेरा सिर कलम किया जायेगा।’ महावतखाँ ने चीख कर कहा।

– ‘तुम क्या मेरा सिर कलम करोगे, मैं स्वयं ही अपने स्वामी पर कुरबान हो जाऊंगा।’ इतना कहकर फहीम शेर की तरह उछला और अपनी तलवार का भरपूर वार महावतखाँ पर किया। महावतखाँ अचानक ही उसके वार कर देने से घोड़े से गिर पड़ा। तलवार उसकी भुजा पर निशान बनाती हुई निकल गयी। यदि वह जरा सा भी चूक जाता तो उसकी भुजा उसके शरीर से अलग हो जाती।

– ‘मारो नमक हराम को।’ महावतखाँ चिल्लाया। दसियों तलवारें फहीम पर छा गयीं। कुछ देर बाद फहीम का शव ही धरती पर पड़ा दिखायी दिया। फहीम ने अपने स्वामी पर न्यौछावर होकर उस कहावत को नया ही अर्थ दे दिया जो उन दिनों खानखाना के दूसरे चाकरों द्वारा फहीम से ईष्या रखे जाने के कारण कही जाती थी- ‘कमावे खानखाना उड़ावे मियाँ फहीम।’ सच ही तो था, खानखाना ने अब तक जो भी यश और पुण्य अर्जित किया था फहीम ने अपनी जान न्यौछावर करके खानखाना की कीर्ति को दूर-दूर तक फैला दिया।

-अध्याय 118, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक।

जागत व्हैगो भोर (119)

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जब मौत सिर पर मण्डराने लगी तो रहीम ने हँस कर कहा- करम हीन रहिमन लखो, धँसो बड़े घर चोर। चिंतत ही बड़ लाभ के, जागत व्हैगो  भोर।

फहीम के गिरते ही खानखाना गिरफ्तार कर लिया गया। उसका डेरा परवेज के डेरे के पास लगाया गया। खानखाना के डेरे के बाहर सामान्य सिपाहियों और छोटे ओहदेदारों के स्थान पर महावतखाँ जैसे सेनापति पहरा देते थे ताकि खानखाना कैद से न भाग छूटे।

खानखाना की ओर से निश्चिंत होकर परवेज ने बनारस के पास खुर्रम को जा घेरा। इस समय खुर्रम के पास सात हजार सैनिक थे जबकि परवेज के पास चालीस हजार सैनिक थे। खुर्रम ने मैदान छोड़कर भाग जाने की योजना बनायी किंतु भीम सिसोदिया ने उसे भागने के बजाय रण में जूझ मरने की सलाह दी।

खुर्रम आधे मन से लड़ने के लिये तैयार हुआ। शीघ्र ही परवेज की सेना ने खुर्रम की सेना को मार भगाया। परवेज की ताकत देखकर खुर्रम मैदान छोड़कर  भाग खड़ा हुआ किंतु भीम सिसोदिया ने मैदान छोड़ने से मना कर दिया। उसने इस युद्ध में ऐसी तलवार चलाई कि देखने वालों ने दाँतों तले अंगुली दबा ली।

जब ये समाचार जहाँगीर को प्राप्त हुए तो जहाँगीर ने महावतखाँ को सात हजारी जात और सात हजारी सवार का मनसबदार बनाया। खानखाना के तुमन तौग भी महावतखाँ को सौंप दिये गये और उसका दर्जा खानखाना के बराबर कर दिया गया।

इतने वर्षों की निष्ठा का यही परिणाम अब्दुर्रहीम को प्राप्त हुआ कि वह तो खानखाना से कैदी हो गया और महावतखाँ जैसा अदना आदमी खानखाना हो गया। महावतखाँ यह समाचार सुनाने अब्दुर्रहीम के डेरे में गया। उसने कहा- ‘अब तू अकेला खानखाना न रहा। मैं भी खानखाना हूँ।’

नियति की ऐसी करनी देखकर खानखाना ने उससे कहा-

‘उरग, तुरंग, नारी नृपति, नीच जाति, हथियार।

रहिमन  इन्हें  सँभारिये,  पलटत लगै ने  बार।’

– ‘अब्दुर्रहीम! तू मौलवियों की तरह दूसरों को तो बहुत इल्म बाँटता फिरता है। जो तू ऐसा ही ज्ञानी है तो फिर तू इस दुर्दशा को क्यों पहुँचा?

रहीम ने कहा-

‘करम हीन रहिमन लखो, धँसो बड़े घर चोर।

चिंतत ही बड़ लाभ के, जागत व्हैगो  भोर। ‘[1]

रहीम का उक्ति सुनकर महावतखाँ ठहाका लगा कर हँसा। उसने कहा- ‘किस मिट्टी का बना है तू जो इस मुसीबत में भी परिहास करता है!’

-अध्याय 119, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक।


[1] महावतखाँ! तू रहीम को भाग्यहीन ही जान जो बड़े घर में चोरी करने के लिये घुस गया और यह सोचते-सोचते सवेरा हो गया कि आज तो बड़ा लाभ हुआ। अर्थात् कुछ प्राप्त किये बिना ही पकड़ा गया।

मन उचाट (120)

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खुर्रम ने दाराबखाँ को रोहतास से दक्षिण के मोर्चे पर जाने के आदेश दिये। दाराबखाँ रोहतास से निकल कर लगभग सौ कोस ही आगे गया होगा कि उसे अब्दुर्रहीम के कैदी हो जाने के समाचार मिले।

अब्दुर्रहीम को दुबारा कैदी बनाये जाने पर दाराबखाँ को मुगलों से घृणा हो गयी। उसके फरिश्ते जैसे निर्दोष और पाक दामन बाप को पहले तो खुर्रम ने और अब परवेज ने कैद कर लिया था। दोनों ही बार अब्दुर्रहीम का दोष क्या था?

उस बार खुर्रम ने अब्दुर्रहीम पर दोष धरा था कि अब्दुर्रहीम महावतखाँ से मिल गया है। जबकि महावतखाँ ने अब्दुर्रहीम की ओर से जाली पत्र लिखकर खुर्रम के आदमियों के हाथों पकड़वाया और खुर्रम ने उस पत्र को असली जानकर अब्दुर्रहीम तथा दाराबखाँ को कैद में डाल दिया।

इस बार परवेज ने अब्दुर्रहीम पर दोष धरा कि उसका पुत्र दाराबखाँ खुर्रम की सेवा में है इसलिये अब्दुर्रहीम को खुला छोड़ना मुगलों के हित में नहीं है। अब्दुर्रहीम स्वतंत्र रहे तो इसलिये कि उसमें मुगलों का हित है! अब्दुर्रहीम बंदी रहे तो इसलिये कि उसमें मुगलों का हित है! क्या मुगलों का हित ही सर्वोपरि है? जिस अब्दुर्रहीम के दमखम पर यह मुगलिया सल्तनत खड़ी हुई, उस अब्दुर्रहीम का अपना हित-अनहित कुछ नहीं?

यदि दाराबखाँ खुर्रम की सेवा में था तो इसमें अब्दुर्रहीम का क्या दोष था? जब अब्दुर्रहीम खुर्रम के पक्ष में था तब मनूंचहर भी तो परवेज के पास था! उस समय परवेज ने मनूंचहर को दण्डित क्यों नहीं किया? क्या केवल इसलिये कि तब अब्दुर्रहीम को कमजोर करने के लिये मनूंचहर को अपने पक्ष में रखा जाना मुगलों के हित में था!

 खुर्रम ने भी तो जहाँगीर से बगावत की! उसका दण्ड जहाँगीर को तो नहीं दिया जा सकता! उसी तरह दाराबखाँ के बागी हो जाने का दण्ड अब्दुर्रहीम को क्यों?

दाराबखाँ इन्हीं सब बातों पर बारम्बार विचार करता हुआ फिर से अपने कुटुम्ब को एक जगह एकत्र करने और इस बिखराव से बाहर निकलने के उपाय के बारे में सोचता ही था कि खुर्रम का संदेश वाहक उसकी सेवा में उपस्थित हुआ और कहा कि खुर्रम ने उसे गढ़ी में बुलाया है।

दाराबखाँ यह आदेश सुनकर चकरा गया। कहाँ तो उसे रोहतास[1]  से खानदेश जाने के आदेश दिये गये थे और कहाँ अब उसे बीच मार्ग से ही उल्टी दिशा में बंगाल बुलाया जा रहा है!

दाराबखाँ को लगा कि जिस प्रकार परवेज ने अब्दुर्रहीम के साथ छल किया, उसी प्रकार खुर्रम भी दाराबखाँ के साथ छल करना चाहता है। अवश्य ही दाल में कुछ काला है। अतः खुर्रम के पास जाना उचित नहीं है।

दाराबखाँ को ज्ञात था कि इस समय परवेज भी बंगाल पर धावा करने की तैयारी में है। इसलिये बेहतर होगा कि दक्षिण को न जाकर बंगाल ही चला जाये ताकि परवेज से मिलकर खानााना को छुड़ाने के प्रयास किये जायें।

दाराबखाँ ने खुर्रम के संदेशवाहक से कहा कि शहजादे को कहना कि शहजादा खुद तो गढ़ी में बैठा है किंतु बंगाल के दूसरे इलाकों में इस समय जमींदारों का विद्रोह हो रहा है, उसे दबाना जरूरी है। इसलिये मैं जमींदारों का विद्रोह दबाने के लिये जाता हूँ जब अवसर होगा तो मैं शहजादे की सेवा में गढ़ी में हाजिर हो जाऊंगा।

खुर्रम ने दाराबखाँ को न आते देखकर दाराबखाँ के बेटे को पकड़ कर अब्दुल्लाहखाँ की देखरेख में रख दिया और स्वयं उड़ीसा के रास्ते दक्षिण को चल दिया।

परवेज ने भी बंगाल पर अधिकार करके महावतखाँ को बंगाल में नियुक्त किया और स्वयं खुर्रम के पीछे दक्षिण को प्रस्थान कर गया।

-अध्याय 120, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक।


[1] रोहतास पूर्वी उत्तर प्रदेश में है।

शहीदी तरबूज (121)

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अब्दुर्रहीम ने थाली पर से कपड़ा हटाया तो उसकी आँखें पथरा गयीं। अपने पौत्र दाराब खाँ का कटा हुआ सिर छाती से लगाते हुए उसने कहा – यह शहीदी तरबूज  है। खास बेल पर ही लगता है।

खुर्रम का नौकर अब्दुल्लाहखाँ एक नम्बर का हरामी था। वह कई सालों से अब्दुर्रहीम से अदावत रखता था। जब अब्दुर्रहीम का पोता उसके शिकंजे में आ गया तो उसने अब्दुर्रहीम से बदला लेने को यही उचित अवसर समझा।

जब खुर्रम काफी दूर पहुँच गया तो अब्दुल्लाहखाँ ने एक रात को दाराबखाँ के बेटे की हत्या कर दी। अब तो दाराबखाँ के पास परवेज के पास लौट जाने के अतिरिक्त कोई चारा न रहा।

उधर जब महावतखाँ ने बंगाल को लूटना आरंभ किया तो बंगाल के जमींदारों ने दाराबखाँ को अपना प्रतिनिधि बनाकर परवेज के पास भेजने का विचार किया। दाराबखाँ ने इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया।

जब दाराबखाँ परवेज के पास पहुँचा तब तक परवेज दक्षिण के लिये कूच कर चुका था। इस पर दाराबखाँ महावतखाँ के पास हाजिर हुआ। महावतखाँ ने दाराबखाँ को तो कैद कर लिया और जहाँगीर को समाचार भिजवाया। जहाँगीर ने कहा कि उस धोखेबाज को जीवित रखने में क्या लाभ है? उसका सिर काटकर हमारे पास भेज दो।

जिस दिन बादशाह की चिट्ठी महावतखाँ के पास पहुँची, उसी दिन महावतखाँ ने दाराबखाँ का सिर गर्दन से अलग कर दिया। इसके बाद उस कटे हुए तरबूज को थाली में सजा कर कीमती रेशम से ढंकवाया और स्वयं उस थाली को लेकर अब्दुर्रहीम के डेरे में पहुँचा।

– ‘लो अब्दुर्रहीम! तरबूज खाओ।’ महावतखाँ ने रेशमी कपड़े से ढंकी हुई थाली अब्दुर्रहीम के सामने बढ़ाई।

– ‘आज अवश्य ही कोई अनहोनी होने वाली है जो तू अपने हाथों में मेरे लिये थाली धर कर लाया है।’ अब्दुर्रहीम ने थाली हाथ में लेते हुए कहा।

जैसे ही अब्दुर्रहीम ने थाली का कपड़ा हटाना चाहा तो महावतखाँ ने अब्दुर्रहीम का हाथ पकड़ कर कहा- ‘अब्दुर्रहीम! तूने ऐसा क्यों कहा?’

रहीम ने क्षणभर अपनी बूढ़ी आँखों से मक्कार महावतखाँ की ओर देखा और फिर मुस्कुराकर बोला-

‘गुरुता फबै रहीम कहि, फबि आई है जाहि।

उर पर कुच नीके लगैं, अनत बतौरी आहि। ‘[1]

अब्दुर्रहीम का जवाब सुनकर महावतखाँ तिलमिला कर रह गया। उसने कहा- ‘बूढ़े शैतान! तुझ पर खुदा की मार। मैं तेरी तरह शाइरी तो नहीं करता किंतु इतना अवश्य जानता हूँ कि इस तरबूज में तुझे तेरी शाइरी का जवाब जरूर मिल जायेगा।’

अब्दुर्रहीम ने थाली पर से कपड़ा हटाया तो उसकी आँखें पथरा गयीं। दाराबखाँ का सिर छाती से लगाते हुए उसने कहा- ‘यह शहीदी तरबूज  है।[2] खास बेल पर ही लगता है।’

अब्दुर्रहीम का यह जवाब सुनकर महावतखाँ अपना स्याह पड़ गया चेहरा लेकर वहाँ से चला गया। जाते-जाते खानखाना के वचन उसके कानों में पड़े-

‘अधम वचन काको फल्यो, बैठि ताड़ की छाँह।

रहिमन  काम  ने आय है, ये नीरस जग माँह।। ‘[3]

 इसके बाद फिर कभी महावतखाँ का साहस अब्दुर्रहीम से बदतमीजी करने का नहीं हुआ।

-अध्याय 121, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक उपन्यास चित्रकूट का चातक।


[1] बड़प्पन उसी को शोभा देता है, जो बड़प्पन धारण कर सकता है। स्तन यदि हृदय के स्थान पर कहीं और लगा दिये जायें तो वे फोड़े कहलाते हैं।

[2] तरबूज की एक किस्म का नाम भी शहीदी है। इसका स्वाद शहद की तरह मीठा होता है।

[3]  दुष्ट वचन किसी को अच्छा परिणाम नहीं देता है। जैसे कि ताड़ के पेड़ से छाया नहीं मिलती। दुष्ट वचन और ताड़ के पेड़ किसी काम के नहीं होते।

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