Monday, July 22, 2024
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मुगलिया राजनीति में बड़ी चालाकी से सुलहकुल का प्रवेश हुआ!

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Sulahkul politics of Akbar
Sulahkul politics of Akbar

सोलहवीं शताब्दी ईस्वी के मध्य में मात्र साढ़े तेरह वर्ष की आयु में मुगलिया तख्त पर बैठने वाला जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर भले ही अपने पिता हुमायूं के लम्बे राजनीतिक निर्वासनों के कारण विधिवत् पढ़-लिख नहीं सका किंतु वह मुगलिया राजनीति में क्रांतिकारी परिवर्तन करने वाला सिद्ध हुआ।

अकबर का बचपन अपने चाचा कामरान, अस्करी और हिंदाल की मक्कारियों के बीच बीता था। उसने अपने चाचाओं, बुआओं, रिश्तेदारों और अपने ही कुल के शहजादों को बादशाह हुमायूं के खिलाफ भयानक षड़यंत्र रचते हुए देखा था।

अपने चाचाओं के बेरहम आचरणों को देखकर अकबर बहुत कम उम्र में ही यह समझने में सफल रहा था कि बादशाहत एवं सल्तनत के टिके रहने के लिए अपने ही कुल के शहजादों पर आंख मूंदकर भरोसा नहीं किया जा सकता।

अकबर ने अपनी आंखों से देखा कि किस तरह उसका पिता हुमायूं जीवन भर अपने भाइयों के साथ उदारतापूर्ण व्यवहार करता रहा किंतु अंत में उसे अपने भाइयों कामरान, अस्करी और हिंदाल की आंखें फुड़वाकर उन्हें मक्का भिजवाना ही पड़ा।

अकबर जब मात्र साढ़े तेरह साल की उम्र में अपने संरक्षक बैराम खाँ द्वारा हुमायूं के तख्त पर बैठाया गया तब, पहले ही दिन से अकबर ने अपनी उम्र को पीछे छोड़कर समझदारी का दामन पकड़ा जिसे उसने जिंदगी भर नहीं छोड़ा।

इसी समझ के बल पर अकबर सोलहवीं शताब्दी की भारतीय राजनीति को बड़ी गहराई तक प्रभावित करने में सफल रहा। जिस समय पानीपत के मैदान में बैराम खाँ ने अकबर से कहा कि वह बेहोश पड़े विक्रमादित्य हेमचंद्र अर्थात् हेमू की गर्दन उड़ा दे तो अकबर ने निहत्थे एवं बेहोश शत्रु पर वार करने से मना कर दिया।

उस समय तक अकबर ढंग से मुगलों के तख्त पर बैठ भी नहीं पाया था तथा उसके कब्जे में भारत की इंच भर भी जमीन नहीं थी, किंतु अकबर की यह दृढ़ता देखकर उसका संरक्षक बैराम खाँ समझ गया कि अकबर को अपनी अंगुलियों पर नचाना संभव नहीं होगा। 

बैराम खां ने अकबर को उत्तरी भारत का बहुत बड़ा इलाका जीतकर दिया किंतु जैसे ही अकबर युवा हुआ, उसने बैराम खां को उसके पद से हटा दिया क्योंकि अकबर परम्परागत रूप से चले आ रहे, शासन के मध्य एशियाई मानदण्डों को स्वीकार करने को तैयार नहीं था। वह हिन्दुस्तान पर अपनी शर्तों पर शासन करना चाहता था।

अकबर ने अनुभव किया कि चंगेजी, मुगलाई, तुर्की, चगताई, ईरानी, तूरानी तथा उज्बेकी अमीरों एवं शहजादों के बल पर हिंदुस्तान के तख्त पर अधिक समय तक अधिकार नहीं रखा जा सकता है। वे स्वयं इतने महत्वाकांक्षी हैं कि हर समय बादशाह को उखाड़ फैंकना चाहते हैं और अपने-अपने स्वतंत्र राज्य स्थापित करना चाहते हैं। इसलिए अकबर ने भारत के स्थानीय लोगों को शासन में भागीदारी देने का निर्णय लिया ताकि मुगलिया सल्तनत को शासन का नवीन, भरोसेमंद एवं सुदृढ़ आधार प्राप्त हो सके।

बहुत कम आयु में ही अकबर समझ चुका था कि वह हिन्दू शासकों से लड़कर लम्बे समय तक अपनी सल्तनत में बना नहीं रह सकता। उसे किसी न किसी प्रकार से हिन्दू शासकों को अपने अधीन करने का मार्ग ढूंढना था।

अपने इसी विचार के कारण अकबर ने बड़ी ही चालाकी से मुगलिया राजनीति में सुलह-कुल की नीति का प्रर्वत्तन किया। इसकी शुरुआत आम्बेर राज्य से हुई। अकबर के सौभाग्य से आम्बेर के कच्छवाहा राजा भयानक पारिवारिक कलह में डूब गए और उन्होंने अपनी सुरक्षा के लिए अकबर की ओर मैत्री का हाथ बढ़ाया। इतना ही नहीं, इस मैत्री को दृढ़ बनाने के लिए कच्छवाहों ने अपनी राजकुमारी हरखू बाई अथवा हीराकंवर का विवाह अकबर के साथ करना स्वीकार कर लिया।

इस विवाह के दूरगामी परिणाम हुए। अकबर को शक्तिशाली कच्छवाहों का साथ, विश्वास एवं समर्पण मिल गया और कच्छवाहों को अपने ही कुल के विद्रोही राजकुमारों पर नियंत्रण स्थापित करने में सफलता मिल गई।

कच्छवाहों एवं मुगलों की इस मैत्री के कारण अकबर का शासन भारत में हमेशा-हमेशा के लिए जम गया। अब उसे भारत की कोई शक्ति अचानक ही जड़ से उखाड़कर नहीं फैंक सकती थी जिस तरह अकबर के पिता हुमायूं को अफगानों ने उखाड़कर भारत की सीमाओं से बाहर धकेल दिया था।

जब भारत की अन्य स्थानीय शक्तियों ने देखा कि मुगलों से अपनी राजकुमारी के विवाह के बाद कच्छवाओं का राज्य मजबूती से जम गया है तो अन्य स्थानीय शासक भी अकबर से मैत्री करने एवं वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित करने के लिए आगे आए।

कच्छवाहों की राजकुमारी हरखूबाई की कोख से सलीम अर्थात् जहाँगीर का जन्म हुआ। जैसलमेर के शासक हरराज भाटी ने अपनी पुत्री नाथी बाई का विवाह अकबर के साथ कर दिया। जोधपुर के मोटा राजा उदयसिंह ने अपनी पुत्री जगत गुसाईंन का विवाह अकबर के बेटे सलीम के साथ कर दिया। उसकी कोख से खुर्रम अर्थात् शाहजहाँ का जन्म हुआ।

अकबर के पुत्र सलीम का एक विवाह एक पहाड़ी राजा दरिया मल लिबास की पुत्री से करवाया गया। सलीम का एक विवाह जैसलमेर की राजकन्या से हुआ जो मुगल हरम में प्रवेश के बाद मल्लिका-ए-जहाँ कहलाई।

ई.1576 में अकबर ने डूंगरपुर के सीसोदिया राजा आसकरण की पुत्री से विवाह किया। ई.1584 में अकबर ने अपने पुत्र सलीम का विवाह आमेर नरेश भगवंतदास की पुत्री से एवं ई.1586 में बीकानेर नरेश रायसिंह की पुत्री से किया। जब ई.1605 में सलीम जहांगीर के नाम से बादशाह बन गया तब उसका एक विवाह मेड़ता के शासक केशवदास राठौड़ की पुत्री से एवं ई.1608 में आम्बेर नरेश जगतसिंह की पुत्री से सम्पन्न हुआ था। जहांगीर ने रामचंद्र बुंदेला की पुत्री से भी विवाह किया था।

ई.1624 में जहांगीर के पुत्र परवेज का विवाह आमेर के राजा जगतसिंह की पुत्री से हुआ था। अर्थात् आम्बेर के राजा जगतसिंह की एक पुत्री जहांगीर से तथा दूसरी पुत्री जहांगीर से ब्याही गई थी।

हिन्दू राजकुमारियों की कोख से उत्पन्न ये शहजादे आगे चलकर न केवल दिल्ली एवं आगरा में मुगलों के तख्त पर बैठने में सफल रहे अपितु हिन्दुस्तान की अन्य जागीरों के शासक भी बन गए। इस कारण विदेशी आक्रांताओं के रूप में आए मुगलों एवं स्थानीय हिन्दू शक्तियों के बीच मजबूत गठजोेड़ स्थापित हो गया।

न केवल मुगलिया राजनीति में अपितु भारत की मध्यकालीन राजनीति में इतना बड़ा परिवर्तन अकबर से पहले कोई और करने में सफल नहीं हुआ था। इससे पहले भारतीय राजाओं ने मुसलमान शासकों की अधीनता अथवा मित्रता स्वीकार नहीं की थी। अकबर की मैत्री से पहले, भारतीय राजा मुसलमानों से लगातार लड़ते रहे थे और अपनी खोई हुई राज्यसत्ता को प्राप्त करने का प्रयास करते रहे थे। अकबर से मित्रता होने के बाद इन प्रयासों को बंद होने पर अधिक देर नहीं लगी। मेवाड़ के महाराणाओं और दक्खिन के मराठों को इसका अपवाद माना जा सकता है।

अकबर ने सुलह-कुल की नीति के तहत भारतीय राजाओं को मित्रता के बहाने से अधीन बनाया। वही राजा अपनी रियासत पर शासन कर सकता था जो बादशाह की नौकरी स्वीकार करे। यदि कोई राजा अथवा राजकुमार ऐसा नहीं करता था तो उसका राज्य छीनकर उसके किसी भाई अथवा पुत्र को दे दिया जाता था।

जिस तरह अकबर ने अपने हरम में तुर्की, चगताई एवं मुगल औरतों के साथ-साथ भारत के स्थानीय हिन्दू सरदारों की पुत्रियों को जगह दी तथा स्थानीय हिन्दू सरदारों को अजमेर, गुजरात, पंजाब आदि बड़े-बड़े सूबों का सूबेदार बनाया, उसी प्रकार उसने अपने शासन में मुगल अमीरों के साथ-साथ अनेक ऐसे हिन्दू युवकों को अपना मंत्री बनाया जो किसी शासक परिवार से न होकर जन-सामान्य के बीच से आए थे।

अकबर के हिन्दू मंत्रियों में राय पुरुषोत्तम, राय जगन्नाथ, राजा बीरबल, राजा टोडरमल आदि प्रमुख थे। इनमें से कोई कायस्थ था जो कोई वैश्य, जबकि कुछ युवक ब्राह्मण परिवारों में उत्पन्न हुए थे। अकबर किसी भी व्यक्ति को उसकी योग्यता भांपकर मंत्री पद दे देता था और मुगल अधिकारियों के ऊपर स्थापित कर देता था।

किसी शासक परिवार से सम्बन्धित न होने के कारण इन हिन्दू युवकों की निष्ठा केवल अकबर के प्रति रहती थी। वे स्वयं तो कभी विद्रोह करते ही नहीं थे, साथ ही यदि कोई मुगल, तुर्क, चंगेजी  या चगताई अमीर बगावत करता था तो ये हिन्दू मंत्री बड़ी कठोरता से उनका दमन करते थे। इस उपाय से अकबर न केवल अपनी सल्तनत का तेजी से विस्तार कर पाया अपितु उसने दूर-दूर तक फैलते जा रही अपनी सल्तनत पर बड़ी कड़ाई से नियंत्रण स्थापित कर लिया। मुगलिया राजनीति में यह बहुत बड़ा बिंदु क्रांतिकारी मोड़ था।

अकबर की सुलहकुल की नीति उसके निजी जीवन में भी दिखाई देती थी। उसने अपने दिमाग के दरवाजे केवल इस्लाम तक सीमित नहीं कर लिए थे अपितु वह सभी धर्मों के मर्म तक पहुंचना चाहता था। यही कारण था कि उसके दरबार में जेजुइट पादरी से लेकर हिन्दू पण्डित, बौद्ध, जैन, पारसी तथा अन्य धर्मों के विद्वान भी उपस्थित रहते थे।

अकबर इन लोगों को धर्म के सिद्धांतों पर बहस करने के लिए कहता था। अकबर ने इन विद्वानों के बहस-मुसाहिबों को बड़े ध्यान से सुना और शीघ्र ही पता लगा लिया कि सभी धर्मों के मूल में कुछ निश्चित सिद्धांत ही काम कर रहे हैं और वे सिद्धांत मानवता की भलाई के सिद्धांत पर टिके हैं। मुल्ला-मौलवी, पण्डित और पादरी अपने-अपने धर्म को बड़ा बताकर जन-सामान्य को धर्म के मूल तक पहुंचने में बाधा पहुंचाते हैं।

इसलिए अकबर ने दीन-ए-इलाही नामक नया धर्म चलाने का प्रयास किया जिसमें सभी धर्मों के सिद्धांतों को स्थान दिया गया था। विभिन्न धर्मों के लोगों द्वारा अस्वीकृत कर दिए जाने के कारण उसके द्वारा चलाया गया धर्म लोकप्रियता प्राप्त नहीं कर सका और अकबर के मरते ही स्वयं भी मिट गया।

यह एक आश्चर्य की ही बात थी कि मुगलिया राजनीति में अकबर को मुल्ला-मौलवियों का जितना विरोध सहन करना पड़ा, अन्य धर्म के लोगों की ओर से नहीं।

मुगलिया राजनीति में समन्यवादी नीतियों का समावेश करके अकबर ने ई.1556 से ई.1605 तक भारत के विशाल भू-भाग पर सफलता पूर्वक शासन किया तथा अनके बगावतों का सामना करने पर भी उसके राज्य का कोई हिस्सा कभी भी पूरी तरह उसकी सल्तनत से बाहर नहीं निकल सका। इसलिए भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पण्डित जवाहर लाल नेहरू ने अशोक महान् के साथ-साथ अकबर को भी भारत के दो महान् पुत्रों से एक बताया है।

– डॉ. मोहनलाल गुप्ता

देहदान है महादान !

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देहदान है महादान, इसलिए उनका मरने के बाद भी हो रहा है सम्मान। वे मर कर भी कर रहे हैं मानवों की सेवा।

यह धरती विचित्रताओं और महानताओं से भरी पड़ी है। इस धरती पर एक से बढ़कर एक अनूठी वस्तुएं हैं, भावनाएं हैं, विचार हैं और अद्भुत कार्य हैं। आज ऐसे ही एक अनूठे विचार से आपका परिचय होगा। ऐसा अनूठा विचार जहाँ मानव बुद्धि शायद ही कभी पहुंचती है।

यह अनूठा विचार इस मंत्र में समाया है- देहदान है महादान। यह ऐसा मंत्र है जिसे विज्ञान और धर्म का मिलन स्थल कहा जा सकता है।

अखिल भारतीय आयुविर्ज्ञान संस्थान जोधपुर में 6 मई 2018 को देहदान है महादान सम्मान समारोह आयोजित किया गया। यह एक विचित्र समारोह था जिसमें वे लोग उपस्थित ही नहीं थे, जिनकी सेवाओं के सम्मान के लिए यह समारोह आयोजित किया गया था।

इस अनूठे आयोजन की संकल्पना तैयार की थी- प्रसिद्ध समाजसेवी मनोज मेहता ने। समारोह के मुख्य अतिथि थे- राजस्थान राज्य मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष जस्टिस प्रकाशचन्द टाटिया और अध्यक्षता की- राजस्थान उच्च न्यायालय के न्यायाधिपति पी. के. लोहरा ने।

इस समारोह में उन व्यक्तियों के परिवारों को सम्मानित किया गया जिन व्यक्तियों ने मरने से पहले देहदान है महादान संकल्प व्यक्त किया था और अपने परिजनों से अनुरोध किया था कि उनकी देह, मृत्यु के बाद भी मानव जाति की सेवा करती रहे।

भारत में मृत मानव की देह की अंत्येष्टि करना अत्यंत आवश्यक एवं पुण्य का कार्य समझा जाता है। युगों-युगों से यह विश्वास भारत की धर्मप्राण जनता में प्रचलित है कि यदि देह का विधिवत् अग्नि संस्कार न हो तो मृतक की आत्मा को शांति नहीं मिलती है, उसकी आत्मा प्रेत बनकर भटकती रहती है।

भारतीय संस्कृति में मृतक की देह का अंतिम संस्कार करने का अधिकार उसके पुत्रों और पौत्रों को दिया गया है। यदि पुत्र और पौत्र न हों तो मृतक के रक्त सम्बन्धियों में कोई भी पुरुष इस कार्य को करता है।

जबकि रुग्ण मानव देह के उपचार एवं शल्य चिकित्सा की शिक्षा प्राप्त करने के लिए यह आवश्यक है कि डॉक्टर और वैज्ञानिक मानव देह को खोलकर उसका अध्ययन करें।

इस कार्य के लिए मृत व्यक्तियों की देह का उपयोग किया जाता है और काम करते हैं देहदान है महादान मंत्र में विश्वास रखने वाले।

जब मनुष्य ने आधुनिक चिकित्सा विज्ञान की तरफ कदम बढ़ाए तो मृत व्यक्ति की देह को प्राप्त करना अत्यंत दुष्कर कार्य था। इसलिए पंद्रहवीं-सोलहवीं शताब्दी में पश्चिम के वैज्ञानिकों, दार्शनिकों तथा चित्रकारों ने रात के अंधेरों में कब्रिस्तानों में से शव निकाले और चोरी-छिपे उनका अध्ययन किया।

बहुत से वैज्ञानिकों और दार्शनिकों को समाज ने तांत्रिक अथवा मैली क्रियाएं करने वाला घोषित किया और उन्हें जान से मार डाला।

देहदान है महादान मंत्र में विश्वास रखने वाले लोग मानते हैं कि मनुष्य की देह उसकी अपनी है किंतु वह निजी होने पर भी उसकी सम्पत्ति नहीं है।

मनुष्य की मृत देह जीवित न होते हुए भी निजता का अधिकार रखती है। मनुष्य की मृत देह अपवित्र मानी जाती है किंतु देहदान है महादान मंत्र का बल पाकर वह सम्मान पाने की अधिकारी हो जाती है।

वैधानिक रूप से मनुष्य की मृत देह अपने अंतिम संस्कार का अधिकार रखती है। संसार भर में यदि कोई व्यक्ति मनुष्य की देह के ये अधिकार छीनता है अथवा उनका हनन करता है, तो उसे बहुत बुरे व्यक्ति के रूप में देखा जाता है।

यही कारण है कि आज भी भारत जैसे परम्परागत समाज वाले देशों में ही नहीं अपितु आधुनिक समझे जाने वाले अमरीका और यूरोपीय देशों में मृत देह को प्राप्त करना अत्यंत कठिन कार्य है।

वैज्ञानिकों, शोधकर्ताओं एवं चिकित्सा विज्ञान के छात्रों के लिए मनुष्य की मृत देह की आज भी उतनी ही आवश्यकता है जितनी पंद्रहवीं-सोलहवीं शताब्दी में थी। ऐसा लगता है मानो धर्म, कानून और विज्ञान इस बिंदु पर आकर उलझ गए हों। इस उलझन को दूर करता है देहदान है महादान का महामंत्र।

जोधपुर स्थित डॉ. सम्पूर्णानंद आयुर्विज्ञान महाविद्यालय को मृत मानव देह की कमी सदा से रही है। इसलिए जो अध्ययन वास्तविक मानव देह पर किया जाना चाहिए उसके लिए अधिकतर प्लास्टिक डमी का उपयोग किया जाता रहा है किंतु इससे शल्य चिकित्सा की मांग पूरी नहीं होती।

जब वर्ष 2012 में जोधपुर में एम्स खुला तो मृत मानव देह की मांग और अधिक बढ़ गई। इस पर श्री मनोज मेहता ने जन सामान्य को देहदान है महादान का मंत्र दिया तथा उनसे देहदान के संकल्प पत्र भरवाए।

धार्मिक संस्कारों की बाधा को पार करके जब कुछ लोग पीड़ित मानवता की सेवा के उद्देश्य से अपनी मृत्यु के बाद अपनी देह का दान करने के लिए तैयार हुए तो उनके परिवार में विरोध हुआ।

धैर्य पूर्वक प्रयास करने से लोगों ने देहदान के प्रति रुचि दर्शाई। इस जनजागृति का ही परिणाम है कि जोधपुर स्थित एम्स में हर वर्ष मृत मानवों की देह प्राप्त की जा रही हैं।

इस अनूठे समारोह को सम्बोधित करते हुए राजस्थान राज्य मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष जस्टिस प्रकाशचन्द टाटिया ने लोगों को विज्ञान और धर्म का बारीक अंतर समझाया। उन्होंने कहा कि विज्ञान उसे कहते हैं जिसमें सतत रूप से शोधकार्य तथा विकास होता है, इसलिए विज्ञान सदैव अपूर्ण रहता है जबकि धर्म उस विचार को कहते हैं जब वह पूर्णता को प्राप्त कर लेता है।

जिस दिन विज्ञान पूर्णता को प्राप्त कर लेगा, वह भी धर्म बन जाएगा। उन्होंने कहा कि जब हम यह समझ लेते हैं कि देहदान है महादान, तब देहदान धर्म बन जाता है तथा यह विज्ञान के काम को आगे बढ़ाता है।

यदि किसी व्यक्ति को देहदान एवं अंगदान जैसे अत्यंत संवेदनशील मुद्दों पर भ्रम या संदेह है तो हमारा कर्तव्य है कि हम उसके भ्रम एवं संदेह को दूर करें। इन विषयों पर समाज में खुली बहस होनी चाहिए तथा इन विषयों पर भावनाओं में बहकर निर्णय लेने की बजाय सोच-समझ कर निर्णय लिया जाना चाहिए।

हमारे पुराणों में कुछ उदाहरण मिलते हैं जब अंगदान करके देवत्व प्राप्त किया गया। ऋषि दधीचि ने असुरों के नाश के लिए अपनी देह का दान किया, उनके द्वारा दिये गये देहदान है महादान के मंत्र के कारण वे आज भी समाज में पूजे जाते हैं।

राजा हरिश्चंद्र ने भी जीते-जी सर्वस्व दान करके सम्पूर्ण मानव समाज को दान करने की प्रेरणा दी। मृत्यु के बाद भी दान का महत्व समाप्त नहीं हो जाता। समाज में हो रहे गलत काम को रोकना पूरे समाज का धर्म है, किसी भी गलत बात के प्रति मूक दर्शक बने रहना मानव का कर्त्तव्य नहीं है।

उन्होंने सुश्रुत संहिता का उदाहरण देते हुए कहा कि यह विश्वामित्र के पुत्र सुश्रुत द्वारा हजारों साल पहले लिखा गया चिकित्सा शास्त्र है जिसमें शरीर के विभिन्न अंगों के आज होने वाले बहुत से जटिल ऑपरेशन करने की विधि लिखी हुई है तथा उस समय शल्यचिकित्सा में काम आने वाले उपकरणों के चित्र भी दिए गए हैं।

यदि उस काल का मानव शरीर रचना विज्ञान के बारे में नहीं जानता तो इतने जटिल ऑपरेशनों के बारे में कैसे लिख सकता था।

इसलिए निश्चित है कि देहदान है महादान जैसे मंत्र और अंगदान जैसी परम्पराएं हमारी पुरातन संस्कृति का हिस्सा रहे हैं किंतु दुःख की बात है कि समाज के उच्च एवं शिक्षित वर्ग में भी आज ऐसी धारणाएं हैं कि देहदान करने वाले को मोक्ष प्राप्त नहीं होता।

जस्टिस टाटिया ने जोधपुर में मृतदेह के संस्कार के लिए विद्युत चालित शवदाह गृह आरम्भ करने तथा नेत्रदान एवं देहदान जैसे पुण्य कामों को आगे बढ़ाने के लिए समाज सेवी मनोज मेहता के कार्यों की प्रशंसा करते हुए कहा कि आज अन्न, वस्त्र, धन, रक्त, शिक्षा दान करने वाले लोगों की कमी नहीं है किंतु मनोज मेहता की तरह समय का दान करने वाले लोग विरले ही हैं।

समय का दान किए बिना देहदान है महादान का संकल्प पूरा नहीं हो सकता। न ही समाज की सेवा हो सकती है। आज प्रत्येक समाज का व्यक्ति देहदान के लिए आगे आया है, यह इस मंत्र की सबसे बड़ी सफलता है।

समारोह की अध्यक्षता करते हुए राजस्थान उच्च न्यायालय के न्यायाधिपति पी. के. लोहरा ने कहा कि देहदान की परम्परा को आगे बढ़ाए बिना समाज को अच्छे चिकित्सक नहीं मिल सकते।

शरीर को मृत्यु के बाद नष्ट होना ही होता है किंतु देहदान के माध्यम से मनुष्य अपनी मृत्यु के बाद भी समाज की सेवा कर सकता है। उन्होंने मानव सेवा सम्मान समारोह का भव्य आयोजन करने के लिए समाजसेवी मनोज मेहता एवं एम्स के निदेशक डॉ. संजीव मिश्रा की प्रशंसा करते हुए आशा व्यक्त की कि उनके द्वारा देहदान है महादान मंत्र को आगे बढ़ाया जा रहा है।

निदेशक डॉ. संजीव मिश्रा ने समरोह में आए अतिथियों एवं देहदान करने वाले व्यक्तियों के परिवारों का स्वागत करते हुए कहा कि चिकित्सा शिक्षा के अध्ययन के उद्देश्य से मिली हुई देह का उपयोग केवल चिकित्सा शिक्षा में किया जाता है।

देह का किसी भी तरह अपमान नहीं होने दिया जाता और न उसके अंगों का दुरुपयोग होने दिया जाता है। अतः कोई भी परिवार या व्यक्ति निःसंकोच होकर देहदान के लिए आगे आ सकता है।

शरीर रचना विभाग के अध्यक्ष डॉ. सुरजीत घटक ने कहा कि आज का दिन उन लोगों को स्मरण करने का दिन है जिन्होंने अपनी मृत्यु के बाद भी अपनी देह मानवता के कल्याण के लिए समर्पित की। उन्होंने देहदान की प्रक्रिया भी समझाई।

सम्मान समरोह के संयोजक एवं काउंसलर मनोज मेहता ने समारोह को सम्बोधित करते हुए कहा कि पारिवारिक भावनाओं के कारण मनुष्य देहदान है महादान जैसे महामंत्र को भूल जाता है इस कारण अपनी देह को दान करने का निर्णय लेना अत्यंत कठिन होता है किंतु जो लोग मर कर भी पीड़ित मानवता की सेवा करना चाहते हैं, वे देहदान करने के कठिन निर्णय को बड़ी आसानी से ले लेते हैं।

यदि हम चाहते हैं कि हमारा अच्छा इलाज हो तो उसके लिए अच्छे डॉक्टरों की आवश्यकता होगी। हमें अच्छे डॉक्टर तभी मिलेंगे जब हम अस्पतालों एवं मेडिकल कॉलेजों में मृतक व्यक्तियों की देह उपलब्ध कराएंगे। उन्होंने जोधपुर के लोगों द्वारा बड़ी संख्या में देहदान हेतु भरे गए संकल्प पत्रों के लिए उनके परिवार वालों की प्रशंसा की।

 संसार में मनोज मेहता जैसे और भी बहुत से लोग हैं जो देहदान है महादान के पुण्य यज्ञ में अपनी भागीदारी निभा रहे हैं।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

हम सौ साल जिएं पर कैसे !

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हम सौ साल जिएं यह वेदों का मूल मंत्र है। ऋग्वेद में एक ऋचा आती है जिसमें कहा गया है- जीवेम् शरदः शतम् पश्येम् शरदः शतम्, श्रुण्याम् शरदः शतम्, प्रब्रवाम् शरदः शतम्, स्यामदीनाः शरदः शतम्। अर्थात् मैं सौ शरद ऋतुओं तक जीवित रहूँ, देखूं, सुनूं, बोलूं और आत्मनिर्भर रहूं तथा सौ वर्ष के बाद भी ऐसा ही रहूं।

हम सौ साल जिएं, क्या यह संभव है? हाँ यह संभव है। रक्त, मांस और हड्डियों से बना हमारा शरीर, प्रकृति द्वारा लगभग 120 से 140 वर्ष तक जीवित रहने के लिए बनाया गया है। संसार में वैज्ञानिकों द्वारा किसी भी आदमी की अधिकतम आयु 122 वर्ष रिपोर्ट की गई है। इससे अधिक आयु के भी हजारों दावे किए जाते हैं किंतु उनकी सत्यता को सत्यापित नहीं किया जा सका है।

120 से 140 वर्ष तक जीवित रहने के लिए बनाया गया मानव शरीर 50 साल की आयु आते-आते उच्च रक्तचाप, मधुमेह, हाइपर टेंशन आदि बीमारियों से ग्रस्त होकर जीर्ण-शीर्ण होने लगता है और 80 वर्ष की आयु आते-आते हम मृत्यु की प्रतीक्षा करने लगते हैं। ऐसी स्थिति में हम सौ साल जिएं, आम आदमी के लिए इसकी कल्पना करना भी बहुत कठिन है।

भारत में मनुष्य की औसत आयु 68.3 वर्ष है तथा औसत आयु के मामले में भारत का दुनिया के देशों में 123वां स्थान है। एक ओर सिंगापुर, स्विट्जरलैण्ड, मकाओ सार तथा इटली जैसे देश हैं जहाँ मनुष्य की औसत आयु 83 साल है तथा दूसरी ओर लिसोथो में 44 वर्ष, स्वाजीलैण्ड में 49 वर्ष, नाइजीरिया में 52 वर्ष तथा जाम्बिया एवं माली में आम आदमी की औसत आयु 53 साल है।

विश्व के समस्त देशों में औरतों की औसत आयु, पुरुषों की अपेक्षा 3 से 6 साल अधिक है, किसी-किसी देश में तो यह अंतर 11 साल तक है। भारत में भी औरतों की औसत आयु पुरुषों की औसत आयु से 3 साल अधिक है। तो क्या औरतों में जिंदा रहने की क्षमता आदमी से ज्यादा होती है!

आम आदमी होकर भी हम सौ साल जिएं, यह कोई असंभव बात नहीं है। क्योंकि अब वैज्ञानिक शोधों ने यह सिद्ध कर दिया है कि बुढ़ापा एक बीमारी है न कि अनिवार्यता। यह बीमारी हमें अपने पुरखों से आनुवांशिक विरासत में मिलती है।

हम सौ साल जिएं, इसके लिए बुढ़ापा नामक रोग की रोकथाम की जानी आवश्यक है जो कि वर्तमान समय में अ सम्भव सी लगने वाली बात है। फिर भी बुढ़ापे को कुछ समय तक टाला जा सकता है। अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी, फ्रांस जैसे देशों में इस रोग के कारणों और निराकरण के उपायों की शोध बड़े पैमाने पर की जा रही है और सफलता की सम्भावना भी बनी है क्योंकि इस व्याधि की शोध के लिए लम्बे समय की आवश्यकता है। अतः वैज्ञानिकों की भी कितनी ही पीढ़ियाँ लग सकती हैं।

अमेरिका वैज्ञानिक बेरौज ने समुद्री जन्तु रोटीफर को उसके सामान्य प्रवास के जल से 10 डिग्री सेन्टीग्रेड कम ताप वाले पानी में रखा तो उसकी आयु दुगुनी हो गई। सामान्यतः उसकी आयु 18 दिन से अधिक नहीं होती किंतु सामान्य से 10 डिग्री ठण्डे पानी में उसकी औसत आयु 36 दिन हो गई।

हिमालय के योगियों तथा संन्यासियों के लम्बे जीवन का रहस्य भी सीमित आहार एवं निम्न तापमान ही है। जब इसी प्रकार की परिस्थितियां अन्य जीव-जन्तुओं को भी दी गईं तो उनकी आयु भी लम्बी हो गई। जीव-जन्तु कभी भी मनुष्य की भाँति असंयमी जीवन नहीं जीते फिर भी तापमान की गिरावट से उनकी उम्र में वृद्धि होती है।

वैज्ञानिकों द्वारा की गई एक शोध में एक विचित्र निष्कर्ष सामने आया है। इस निष्कर्ष के अनुसार जो कोशिकाएँ शरीर की रक्षात्मक पंक्ति में कार्यरत रहती हैं उन्हीं की बगावत, का परिणाम बुढ़ापा है। क्योंकि रक्षात्मक कोशिकाएँ ही सामान्य कोशिकाओं को खाने लगती हैं। हम सौ साल जिएं इसके लिए रक्षात्मक कोशिकाओं की बगावत को रोकना आवश्यक है।

रक्षात्मक कोशिकाओं की बगावत से आदमी के बाल पकने लगते हैं, झुर्रियाँ पड़ने लगती हैं, नेत्रों की ज्योति मन्द पड़ जाती है, अनेकों उदर विकार पनपते हैं और दन्त क्षय तथा श्रवण शक्ति कम हो जाती है। माँस पेशियाँ कमजोर पड़ जाती हैं। रक्त नलिकाएँ मोटी पड़ जाती हैं और यकृत एवं गुर्दे की कार्यशक्ति भी क्षीण होने लग जाती है।

रक्षात्मक कोशिकाओं की बगावत का स्पष्ट उदाहरण उन लोगों में देखा जा सकता है जो असंयमी हैं और नशा सेवन करते हैं अथवा आलसी और अकर्मण्य हैं। वे ही समय से पहले बूढ़े होते हैं और उन्हीं की इन्द्रियाँ युवावस्था में ही शिथिल पड़ जाती हैं।

भारतीय आयुर्वेद मानव जाति को विगत हजारों सलों से नियमित दिनचर्या जीने का संदेश दे रहा है ताकि हम सौ साल जिएं। आयुर्वेद के प्राचीन आचार्यों के अनुसार आहार-विहार के संयम के साथ ही नियमित भोजन में तुलसी, आँवला, विधारा, अश्वगंधा जैसी औषधियाँ एवं गाय का दूध सेवन करते रहने से रोगों के निकट आने का संकट लम्बे समय तक टाला जा सकता है।

वैदिक यज्ञ-हवन करने वाले ऋषि-मुनि भी हजारों वर्षों से मानव जाति को यह संदेश देते रहे हैं कि यज्ञ-हवन में प्रयुक्त जड़ी-बूटियों के धुएं में वह अमोघ शक्ति है जिससे जीवनी शक्ति पुष्ट होती है अर्थात् रक्षक कोशिकाएँ बगावत नहीं करने पातीं।

मन्त्र विज्ञानियों का निष्कर्ष है कि मन्त्रों की ध्वनि से शरीर की विभिन्न ग्रन्थियों से ऐसा स्राव निकलता है जो कोशिकाओं के असमय क्षरण को रोक देता है और हम सौ साल जिएं, इसके लिए कोशिकाओं को पुष्ट बनाए रखता है।

अमेरिकी ‘आयु-शास्त्र-वैज्ञानिक’ डेंकला के अनुसार आयु नियन्त्रक केन्द्र, हमारे मस्तिष्क में विद्यमान हैं जो आयु बढ़ने के साथ-साथ अधिक सक्रिय होता है। इसकी सक्रियता सामान्य बनाए रहने के लिए आहार-विहार की नियमितता आवश्यक है।

माँस-मदिरा, अनियमित दिनचर्या, क्रोध, भय, चिन्ता आदि कारणों से यह केन्द्र अधिक सक्रिय होने लगता है। इस कारण ऐसे लोगों को असमय ही बुढ़ापा घेरने लगता है।

बुढ़ापे को लम्बे समय तक टालने और अनेक रोगों से छुटकारे के लिए नैसर्गिक जीवन पद्धति का अनुसरण किया जाना चाहिए, जिससे मस्तिष्क पर तनाव और शरीर पर दबाव न पड़े। तब शतायु हो सकने की और निरोग बने रहने की सम्भावना है।

हम सौ साल जिएं, इस उद्देश्य से सुश्रुत संहिता में मनुष्य के स्वास्थ्य की परिभाषा इस प्रकार दी गई है-

समदोषाः समाग्निश्च समधातुमलक्रियः।

प्रसन्नात्मेन्द्रियमनः स्वस्थ इत्यभिधीयते।।

जिस व्यक्ति के तीनों दोष अर्थात् वात, पित्त एवं कफ समान हों, जठराग्नि सम हो अर्थात् न अधिक तीव्र हो और न अति मन्द हो, शरीर को धारण करने वाली सात धातुएं  अर्थात् रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा और वीर्य उचित अनुपात में हों, मल-मूत्र की क्रियाएं  भली प्रकार होती हों और दसों इन्द्रियां  अर्थात् आंख, कान, नाक, त्वचा, रसना, हाथ, पैर, जिह्वा, गुदा और उपस्थ, मन और इन सबकी स्वामी आत्मा, भी प्रसन्न हो, तो ऐसे व्यक्ति को स्वस्थ कहा जाता है। ऐसा व्यक्ति ही हम सौ साल जिएं के वैदिक मंत्र को साकार कर सकता है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

लम्बे जीवन के लिए क्या हमने स्वयं को तैयार किया है!

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Lambe jivan ke liye

लम्बे जीवन के लिए क्या हमने स्वयं को तैयार किया है, यदि हमसे कोई यह प्रश्न पूछे तो हमारा उत्तर क्या होगा? हाँ, ना, या पता नहीं! यदि आप इस प्रश्न का समुचित उत्तर चाहते हैं तो इस आलेख को शुरु से अंत तक ध्यान से पढ़ें। हो सके तो दो-चार या अधिक बार पढ़ें तथा इसमें से महत्वपूर्ण बातों को बिंदुओं के रूप में नोट कर लें और उन्हें आजमाएं।

मानव शरीर 120 से 140 साल तक जीवित रहने के लिए बना है। हमारे शास्त्रों में इच्छामृत्यु से लेकर सैंकड़ों साल की आयु वाले योगियों एवं चिरंजीवी मनुष्यों के उदाहरण उपलब्ध हैं किंतु वैज्ञानिकों के पास अभी तक 122 साल की अधिकतम आयु वाले इंसान का ही प्रामाणिक रिकॉर्ड है।

लम्बे जीवन के फैक्टर्स

वातावरण में उपलब्ध ऑक्सीजन की मात्रा, धरती का तापक्रम, मनुष्य के लिए उपलब्ध भोजन की गुणवत्ता तथा परिश्रम करने के घण्टे, मनुष्य के मन में सुरक्षा का भाव आदि के आधार पर मनुष्यों की आयु का औसत बदल जाता है। यदि हम इन फैक्टर्स को अपने अनुकूल बना लेते हैं तो हम कह सकते है कि हमने लम्बे जीवन के लिए स्वयं को तैयार किया है!

वर्तमान समय में सिंगापुर, स्विट्जरलैण्ड, मकाओ तथा इटली आदि यूरापीय देशों में मनुष्य की औसत आयु 83 साल है जबकि लिसोथो, स्वाजीलैण्ड, नाइजीरिया, जाम्बिया एवं माली आदि गरीब अफ्रीकी एवं एशियाई देशों में मनुष्य की औसत आयु 44 से 53 साल के बीच है।

अतः अमीरी, शिक्षा और ठण्डी जलवायु को लम्बी आयु के लिए अनुकूल माना जा सकता है तथा गरीबी, अशिक्षा एवं गर्म जलवायु को छोटी आयु के लिए जिम्मेदार माना जा सकता है।

भारत एक गर्म जलवायु वाला विकासशील देश है तथा लोगों में शिक्षा का स्तर मध्यम है। वर्ष 1947 में भारत को अंग्रेजों से आजादी मिली, उस समय भारत में मनुष्य की औसत आयु केवल 31 साल थी। वर्तमान समय में भारत में मनुष्य की औसत आयु 68.3 वर्ष है। यह ठण्डे एवं अमीर देशों से लगभग 15 साल कम तथा गर्म एवं निर्धन देशों से लगभग 15 साल अधिक है।

इन सब बातों को यदि तार्किक आधार पर समझा जाए तो कहा जा सकता है कि यदि भारत की शासन व्यवस्था, अर्थव्यवस्था, शिक्षा का स्तर और स्वास्थ्य सुविधाओं में सुधार हो, लोगों को रहने के लिए ठण्डा और शांत वातावरण मिले तथा काम के घण्टों में कमी आए तो एक आम भारतीय की आयु में कम से कम 15 साल तक की वृद्धि की जा सकती है।

शासन व्यवस्था तथा अर्थव्यवस्था में सुधार, शिक्षा एवं स्वास्थ्य सुविधाओं का प्रसार आदि कार्य तो सरकार एवं समाज द्वारा सामूहिक रूप से ही किए जा सकते हैं किंतु कुछ उपाय करके हम स्वयं को लम्बे जीवन के लिए तैयार कर सकते हैं और अपनी औसत आयु में 15 साल अथवा उससे अधिक वर्ष जोड़ सकते हैं।

लम्बे जीवन के लिए बनाए जा सकने वाले मूल मंत्र इस तथ्य में निहित हैं कि शरीर को स्वस्थ्य एवं सक्रिय रखा जाए। स्वस्थ एवं दीर्घायु बनने के लिए जल, वायु, ध्वनि, निद्रा, व्यायाम और अन्न आदि का बेहतर प्रबन्धन करना आवश्यक होता है।

लम्बे जीवन के लिए शयन तथा शैय्या त्याग का समय निश्चित करें

मनुष्य को सामान्यतः रात्रि में 9 से 10 बजे के बीच सो जाना चाहिए तथा 7 से 8 घण्टे की नींद लेकर प्रातः 4 बजे से 6 बजे के बीच उठ जाना चाहिए। यदि जल्दी सोना और जल्दी उठना संभव न हो तो भी 7 से 8 घण्टे की नींद अवश्य लेनी चाहिए।

लम्बे जीवन के लिए जल सेवन का तरीका समझें

सुबह उठते ही कम से कम एक गिलास गर्म पानी पीना चाहिए। रात्रि में पानी कम और दिन में अधिक पीना चाहिए। मल-मूत्र त्यागने तथा स्नान से पहले पानी पीना चाहिए, मल-मूत्र त्यागने तथा स्नान के तुरंत बाद पानी नहीं पीना चाहिए। भोजन करने से तुरंत पहले या तुरंत बाद में पानी नहीं पीना चाहिए। भोजन खाने एवं पानी पीने में कम से कम आधे से पौन घण्टे का अंतर होना चाहिए।

प्रतिदिन 2 से 3 लीटर अर्थात् 6 से 10 गिलास जल पीना चाहिए। एक बार में चौथाई से एक तिहाई लीटर अर्थात् आधे से एक गिलास पानी पीना चाहिए। सुरक्षित स्रोतों से प्राप्त एवं साफ जल ही पिया जाना चाहिए। जल हमेशा घूंट-घूंट करके तथा बैठकर पीना चाहिए।

लम्बे जीवन के लिए स्वच्छ वायु सेवन करें

प्रातःकाल में कम से कम आधा घण्टा साफ वातावरण अर्थात् किसी पार्क, खेत, उद्यान, मैदान आदि में घूमने से शरीर को ऑक्सीजन की अच्छी मात्रा मिलती है। श्वांस पर नियंत्रण करने से शरीर की ऊर्जा के स्तर में वृद्धि होती है। लम्बे जीवन के लिए दिन में कुछ समय लम्बी-लम्बी सांस लेनी चाहिए। या कुछ मिनट के लिए प्राणायाम करना चाहिए।

दिन में जब भी समय मिले, तुलसी, पीपल, बड़, हरी घास एवं फूलदार वनस्पति के निकट रहना चाहिए। जहां वायु में धूल, धुआं, बदबू तथा गर्मी हो, वहाँ अधिक समय नहीं रहना चाहिए।

लम्बे जीवन के लिए हल्का व्यायाम करें

खुले स्थान पर प्रतिदिन दस से पंद्रह मिनट तक अंग संचान अर्थात् हल्का व्यायाम, सूर्य नमस्कार, स्ट्रैचिंग, नाइट्रिक ऑक्साइड डम्पिंग आदि करनी चाहिए। इससे शरीर की मांसपेशियों में रक्त का संचालन बढ़ता है जिससे शरीर में ऑक्सीजन के स्तर में वृद्धि होती है।

लम्बे जीवन के लिए हल्की धूप का सेवन करें

सुबह सूर्य निकलने के साथ ही कम से कम 10-15 मिनट तक हल्की धूप का सेवन करने से शरीर को विशिष्ट प्रकार की ऊर्जा प्राप्त होती है। इससे बहुत से रोग नहीं होते तथा काम करते समय शरीर में थकावट नहीं आती। लम्बे जीवन के लिए इससे अच्छी बात शायद ही कुछ और हो सकती है।

लम्बे जीवन के लिए तेल मालिश करें

धूप सेवन के समय यदि शरीर पर तिल या सरसों के तेल की मालिश करें तो समय का अच्छा उपयोग होगा। इससे मांसपेशियों में रक्त का समुचित संचार होगा। त्वचा की चमक बनी रहेगी एवं उसमें लम्बे समय तक झुर्रियां नहीं पड़ेंगी।

लम्बे जीवन के लिए मेडीटेशन करें

लम्बे जीवन के लिए अपनी दिनचर्या में ईश्वर का ध्यान, पूजा, कीर्तन, किसी भी धार्मिक ग्रंथ का पाठ, मंदिर दर्शन, तीर्थ सेवन, यज्ञ, हवन जैसी गतिविधियों को सम्मिलित करें। इनसे मस्तिष्क एवं शरीर पर प्रतिदिन होने वाले रेडिएशन इफैक्ट्स कम होते हैं। चिंतन संतुलित होता है एवं मनुष्य को शांति का अनुभव होता है।

मनुष्य अपने मन में जितनी अधिक शांति और संतुष्टि का अनुभव करता है, उसकी आयु उतनी ही अधिक बढ़ती है तथा व्यक्ति में निर्णय लेने की क्षमता का विकास होता है। ध्यान करने से रोग और शोक मिटते हैं। ध्यान से शरीर, मन और मस्तिष्क को शांति, स्वास्थ्य और प्रसन्नता का अनुभव होता है। वैदिक यज्ञ-हवन में प्रयुक्त जड़ी-बूटियों के धुएं से मनुष्य की जीवनी शक्ति पुष्ट होती है।

लम्बे जीवन के लिए ध्वनि प्रबंधन करें

मनुष्य की आयु पर ध्वनियों का बहुत प्रभाव पड़ता है। कर्णकटु, कर्कश, तेज आवाज, गाली-गलौच, चीख-पुकार, मशीनों की खड़खड़ जैसी ध्वनियां जीवनी शक्ति को कमजोर करती हैं तथा लम्बे जीवन के लिए घातक हैं। जबकि कर्णप्रिय, सुमधुर एवं धीमी आवाजें जीवनी शक्ति को पुष्ट करती हैं। अतः सितार वादन, बांसुरी वादन, शहनाई वादन, भजन, शबद-कीर्तन, रामधुन जैसी ध्वनियां सुनें। ये लम्बी आयु के लिए अमृत के समान हैं।

ईश्वर को समर्पित मन्त्र-ध्वनियों से शरीर की विभिन्न ग्रन्थियों से ऐसा स्राव निकलता है जो कोशिकाओं के असमय क्षरण को रोक देता है। स्वयं भी धीरे बोलने का अभ्यास करें। मीठी वाणी बोलें, अच्छे शब्दों का प्रयोग करें।

लम्बे जीवन के लिए मुस्कुराएं

मुस्कुराने से हमारी मांसपेशियों का तनाव दूर होता है। जब भी याद आ जाए, मुस्कुराएं। किसी के मिलते ही मुस्कुराकर अभिवादन करने की आदत डालें। बच्चों को देखकर मुस्कुराएं, बीमारों को देखकर मुस्कुराएं। बूढ़ों को देखकर मुस्कुराएं। मुस्कान का मधुर उजाला न केवल आपके जीवन में अपितु दूसरों के जीवन में भी आशा और सकारात्मकता का प्रसार करेगा।

लम्बे जीवन के लिए बच्चों के साथ समय बिताएं

बच्चों की आंखों एवं उनके कण्ठ से निकली ध्वनियों से ऐसी सकारात्मक तरंगें निकलती हैं जो वृद्धावस्था को रोक देती हैं। अतः प्रतिदिन कुछ समय बच्चों के बीच बिताना चाहिए। उनके साथ रहने से हमारे शरीर में ऐसे हार्मोन्स लम्बे समय तक बने रहेंगे जो मनुष्य की लम्बी आयु के लिए आवश्यक हैं।

विशिष्ट वनस्पतियों का सेवन

लम्बी आयु के लिए विशिष्ट वनस्पतियों का सेवन करना लाभकारी होता है। तुलसी के एक पत्ते का नियमित रूप से सेवन करें। पंचामृत बनाकर पीएं। सिर पर चंदन का टीका लगाएं। इनमें रेडिएशन इफैक्ट्स कम करने की शक्ति होती है। तुलसी का पत्ता चबाने से दांत खराब हो जाते हैं इसलिए इसे चाय या सब्जी आदि में डाल कर प्रयोग करें।  नीम एवं गिलोय रक्त शोधक एवं शक्ति वर्धक होते हैं। गर्मियों में नीम के नए पत्ता चबाएं। सर्दी अथवा गर्मी किसी भी मौसम में गिलोय का छोटा सा टुकड़ा तोड़कर खाएं। महिलाओं को शतावरी का नियमित सेवन करना चाहिए।

बच्चों को शंखपुष्पी का शरबत बना कर देना चाहिए। पुरुषों के लिए अश्वगंधा का सेवन शक्तिवर्द्धक होता है। दिन भर में थोड़ी मात्रा आँवला तथा विधारा की भी प्रयुक्त करनी चाहिए।

लम्बे जीवन के लिए भोजन का प्रबन्धन

स्वस्थ मनुष्य को दिन में कम से कम दो बार नाश्ता और दो बार भोजन करना चाहिए। कभी भी एक साथ पेट भरके नहीं खाना चाहिए। लम्बी आयु के लिए अपने भोजन में सब तरह की खाद्य सामग्री शामिल करनी चाहिए। अर्थात् दाल, सब्जी, दही, विभिन्न प्रकार के अनाजों के आटे से बनी चपातियां, अंकुरित अनाज, चावल, सलाद, आदि। इनमें से कभी कुछ तथा कभी कुछ खाना चाहिए। एक साथ सभी चीजें खाने से बचना चाहिए।

घर में बना हुआ शुद्ध, स्वादिष्ट एवं सात्विक भोजन करना चाहिए। फास्ट फूड, जंक फूड, पिज्जा, बर्गर, कोल्ड ड्रिंक, मांसाहार, अण्डा, मछली आदि के सेवन से बचना चाहिए। भोजन तैयार करने में नमक, मिर्च, तेल, खटाई का कम प्रयोग करना चाहिए।

जितनी भूख हो उससे थोड़ा कम भोजन करना चाहिए। अर्थात् भरपेट भोजन नहीं करना चाहिए। संभव हो तो सप्ताह में या पखवाड़े में एक दिन केवल एक समय भोजन करना चाहिए।

खुशबूदार मसाले

जीरा, सौंफ, धनिया, हल्दी, राई, हींग, दाना मेथी, पत्ता मेथी, धनिया पत्ता, करी पत्ता, पुदीना, कलौंजी, प्याज, लहसुन आदि खुशबूदार मसालों का नियमित रूप से प्रयोग करना चाहिए। ये भी लम्बी आयु के लिए अमृत के समान हैं।

फल एवं सलाद का नियमित सेवन

नियमित रूप से कच्ची सलाद तथा फलों का सेवन करना चाहिए। सलाद का सेवन करने से कब्ज नहीं होती तथा फलों का सेवन करने से उच्च रक्तचाप एवं मधुमेह जैसे रोग नियंत्रण में रहते हैं। जीवन भर कम से कम एक फल का प्रतिदिन सेवन करने से कैंसर जैसी बीमारियों से बचा जा सकता है। लम्बी आयु के लिए वयस्क मनुष्य को दिन में लगभग 150 ग्राम फल का प्रयोग करना चाहिए।

दूध-दही एवं घी शरीर के लिए अत्यंत आवश्यक

आजकल डेयरी प्रोडक्ट्स के बारे में तरह-तरह की गलत धारणाएं फैलाई जा रही हैं। लम्बी आयु के लिए हमें अपने भोजन में समुचित मात्रा में दही एवं घी का समावेश अवश्य करना चाहिए। जब तक कोई विशिष्ट समस्या न हो, सुबह के नाश्ते में अथवा रात्रि में सोने से पहले हल्का गर्म दूध अवश्य पीना चाहिए। रात में सोने से पहले दूध पीने से पेट की अम्लीयता कम होती है, खाना जल्दी पचता है तथा नींद अच्छी आती है। दूध दही के सेवन से शरीर को विटामिन ए तथा कैल्शियम की पूर्ति होती है जबकि घी का नियमित प्रयोग करने से जोड़ों के दर्द नहीं होते और जोड़ों का प्रोपर लुब्रिकेशन होता है।

पनीर की जगह खाएं सूखे मेवे

भोजन में पनीर बहुत कम मात्रा में प्रयोग करना चाहिए। यह मुश्किल से पचता है। इसकी जगह सूखे मेवों का सेवन करें। इनमें विशिष्ट प्रकार के ऑयल होते हैं जो हमारे शरीर की विभिन्न प्रकार की मांसपेशियों एवं मस्तिष्क को ऊर्जा देते हैं। एक दिन में एक मुट्ठी सूखे मेवे से अधिक न खाएं।

लम्बे जीवन के लिए अच्छा साहित्य पढ़ें

जीवन में प्रतिदिन कुछ अच्छा पढ़ें। अपनी रुचि का साहित्य पढ़ने से मस्तिष्क को स्फूर्ति मिलती है, साथ ही ज्ञान का भण्डार भी बढ़ता है। यह देखा गया है कि कविता और कहानी मनुष्य की लम्बी आयु के लिए अत्यंत प्रभावकारी हैं। सूर, तुलसी, मैथिलीशरण गुप्त, प्रेमचंद आदि ने लम्बा जीवन जिया।

सोने से पहले धोएं हाथ-पैर

रात्रि में सोने से पहले हाथ-पैर मुंह धोने से शरीर को आराम मिलता है, नींद अच्छी आती है।

स्वयं से पूछें सवाल

प्रतिदिन सोने से पहले स्वयं से कुछ सवाल करें कि आज हमने लम्बी आयु के लिए क्या अच्छा किया और क्या बुरा किया। अगले दिन से अच्छी बातों को करने और बुरी बातों को न करने का संकल्प दोहराएं और ईश्वर को प्रणाम करके सोएं तथा उन्हें एक अच्छे दिन के लिए धन्यवाद कहें। प्रातः आंख खुलने पर ईश्वर को प्रणाम करके बिस्तर छोड़ें तथा ईश्वर से मांगें कि हमारा तथा हमारे परिवार का जीवन लम्बा हो, अच्छा हो तथा सुखी हो।

इस प्रकार करें दिन का विभाजन

इस आलेख में बहुत सारी बातें कही गई हैं जिन्हें सुनने से ऐसा लगता है कि मनुष्य पूरे दिन यही सब करता रहेगा तो फिर काम कब करेगा! इस आलेख में बताई गई दिनचर्या का प्रबंधन करना बहुत आसान है। दिन में आठ घण्टे काम करें, आठ घण्टे निद्रा एवं विश्राम करें तथा आठ घण्टे अपने शरीर, मन एवं रिश्तों को स्वस्थ एवं दीर्घायु बनाने में लगाएं।

एक बार जब हम अपनी दिनचर्या को व्यवस्थित कर लेते हैं तो प्राणायाम, व्यायाम, भ्रमण, धूप सेवन, तेल मालिश आदि कार्यों में एक घण्टे से अधिक समय नहीं लगता है।

लम्बी आयु के लिए इस आलेख को ध्यान से पढ़ने के लिए धन्यवाद। आप इसे यूट्यब चैनल ळसपउचे व Glimps of Indian History by Dr. Mohanlal Gupta पर भी देख सकते हैं। हम चाहते हैं कि संसार में प्रत्येक प्राणी, स्वस्थ, सुखी एवं प्रसन्न रहे। 

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

सोशियल मीडिया कमेण्ट्स से बदलता है हमारा भाग्य !

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इस बात को बहुत कम लोग अनुभव कर पाते होंगे कि सोशियल मीडिया कमेण्ट्स करने से हमारा भाग्य बदलता है।

बहुत से लोग सोशियल मीडिया राइट, कंटेंट क्रिएटर, ब्लॉगर या यूट्यूबर पर कमेंट्स करते हैं। एक ही वीडियो को हजारों लोग लाइक करते हैं तो लगभग 10 प्रतिशत लोग डिस्लाइक करते हैं।

इसी प्रकार लगभग हर वीडियो पर लगभग 90 प्रतिशत लोग पॉजीटिव कमेंटस देते हैं और 10 प्रतिशत लोग नेगेटिव कमेंट्स लिखते हैं।

क्या आप जानते हैं कि ऐसा क्यों होता है ? हमारे द्वारा दिए गए पॉजिटिव और नेगेटिव कमेंट्स का हमारी अपनी जिंदगी पर क्या असर पड़ता है ?

निश्चित रूप से हममें से बहुत से लोग इस बात को जानते हैं। फिर भी जो नहीं जानते हैं उनकी सुविधा के लिए तथा इस बात से जुड़े हुए विविध पक्षों पर विस्तार से चर्चा करने के लिए हमने यह आलेख तैयार किया है।

हमारा व्यक्तित्व हमारे भीतर बह रही पॉजिटिव और नेगेटिव एनर्जी का मिला-जुला परिणाम है। हर व्यक्ति के भीतर दोनों प्रकार की एनर्जी होती है। ये दोनों प्रकार की एनर्जी हमारे व्यक्तित्व को बहुत प्रभावित करती हैं।

प्रकृति ने दोनों प्रकार की एनर्जी हमारे भीतर संतुलित करके सजाई हैं किंतु हमने अपने दुर्भाग्य को बढ़ावा देने के लिए जानबूझ कर इनके संतुलन को बिगाड़ दिया है।

दोनों प्रकार की एनर्जी का संतुलन क्या है, इसे हम इस आलेख के अंतिम भाग में जानने का प्रयास करेंगे। आलेख के आरम्भिक भाग में हम भाग्य को बनाने वाली कुछ महत्वपूर्ण बातों पर चर्चा कर रहे हैं।

आरम्भ से लेकर अंत तक हमारे भाग्य का निर्माण कौन करता है! निश्चित रूप से हमारा व्यक्तित्व। हमारा व्यक्तित्व ही हमसे कर्म करवाता है। उस कर्म से हमारा भाग्य बनता है। हमारा व्यक्तित्व ही दूसरों को प्रसन्न या नाराज करता है।

हमारे व्यक्तित्व के साथ-साथ दूसरे लोगों की प्रसन्नता और नाराजगी भी बहुत गहराई तक हमारे भाग्य को प्रभावित करती है। इसी को लोगों की दुआ लेना अथवा बद्दुआ लेना कहा जाता है।

हमारे भाग्य का निर्माण करने के लिए व्यक्तित्व को सुधारना आवश्यक है और व्यक्तित्व को सुधारने के लिए अपने भीतर की पॉजिटिव और नेगेटिव एनर्जी को संतुलित करना आवश्यक है। भीतर की एनर्जी को संतुलित करने के लिए अपनी सोच को सुधारना आवश्यक है।

सोच को सुधारने के लिए अपने कर्म को सुधारना आवश्यक है और कर्म को सुधारने के लिए अपनी सोच को सुधारना आवश्यक है।

इस प्रकार ये सारी चीजें अर्थात् भाग्य, व्यक्तित्व, सोच, पॉजिटिव एनर्जी, नेगेटिव एनर्जी और हमारा कर्म ये सब एक दूसरे से जुड़े हुए हैं। एक के सुधरने पर बाकी की चीजें अपने आप सुधरने लगती हैं तथा एक के बिगड़ने पर बाकी की चीजें स्वतः खराब होने लगती हैं।

जब हम किसी सोशियल प्लेटफॉर्म पर कमेंट करते हैं तो हम अकेले होते हैं। हम सोचते हैं कि हमें कौन देख रहा है। इसलिए सोशियल मीडिया राइटर, कंटेंट क्रिएटर, ब्लॉगर या यूट्यूबर की तुलना में स्वयं को बड़ा दिखाने की नीयत से हम बिना सोचे-समझे कुछ भी कमेंट कर देते हैं।

जिस वीडियो को हजारों-लाखों लोगों ने लाइक किया है, उसके लिए अच्छी-अच्छी बातें लिखी हैं, उसे भी हम डिसलाइक करते हैं तथा उसके बारे में भद्दे कमेंट लिखते हैं ताकि यूट्यूबर या कंटेंट राइटर का मनोबल तोड़ा जा सके।

कुछ लोगों ने तो नेगेटिव कमेंट्स करने का अभियान सा चला रखा है और कुछ लोग गंदी-गंदी गालियां तक लिखते हैं, इनकी सोच यही होती है कि जिसे हम गालियां लिख रहे हैं, वह न तो हमें गालियां दे सकता है और हमारे घर आकर हमारा गला पकड़ सकता है।

निश्चित रूप से नकारात्मक टिप्पणी, गालियों और डिस्लाइक जैसी प्रतिक्रियाओं का प्रभाव सोशियल मीडिया राइटर, कंटेंट क्रिएटर, ब्लॉगर या यूट्यूबर पर बुरा होता है किंतु क्या हम जानते हैं कि उसका परिणाम और प्रभाव हमारे अपने लिए भी बुरा होता है ?

जब हम किसी के खिलाफ कोई नकारात्मक टिप्पणी करते हैं या गालियां लिखते हैं तो हमारे भीतर नकारात्मक एनर्जी का प्रवाह बहुत तेजी से होता है जिसके कारण हमारे भीतर वात, पित्त और कफ का संतुलन बिगड़ जाता है।

वात, पित्त और कफ का असंतुलन वस्तुतः हमारे भीतर की पॉजिटिव और नेगेटिव एनर्जी के बीच हुए असंतुलन का परिणाम है। इनके बिगड़ने से न केवल हमारा शरीर बीमार पड़ता है अपितु हमारे व्यक्तित्व में सकारात्मक सोच की क्षमता भी कम होती चली जाती है और हम बुरी एनर्जी से घिर जाते हैं जिसका परिणाम बुरे व्यक्तित्व एवं बुरे भाग्य के रूप में हमारे सामने आता है।

जैसा हम सोचते हैं, वैसी ही हमारी शक्ल भी बन जाती है। हमारी आंखें देखकर ही सामने वाले को पता चल जाता है कि हम अच्छे और पॉजिटिव पर्सनैलिटी वाले आदमी हैं या बुरे और नेगेटिव पर्सनैलिटी वाले।

जब सामने वाला व्यक्ति हमें देखकर ही हमारे व्यक्तित्व से नाराज हो जाता है तो निश्चित रूप से हमारा भाग्य सुरक्षित कैसे रह सकता है!

अपने भीतर की पॉजिटिव और नेगेटिव एनर्जी का संतुलन करने के लिए हमें थोड़ा अभ्यास करना होता है।

हम अपनी तरफ से सदैव दूसरों के प्रति नकारात्मक टिप्पणी न करें। यदि कोई हमें नकारात्मक बात कह रहा है तो भी उसे अपनी सहनशक्ति की सीमा तक क्षमा करें। दूसरों को सहने की अपनी शक्ति को बढ़ाएं।

भगवान श्रीकृष्ण ने शिशुपाल की सौ गलतियां माफ करने की सीमा निर्धारित कीं। उसी प्रकार हम भी अपनी सहन सीमा को काफी आगे तक ले जाएं और यदि सामने वाला व्यक्ति तब भी असभ्य व्यवहार करे तो अपनी शक्ति के अनुरूप उसका उपचार भी करें। आपके अंतिम उपचार भी नकारात्मक नहीं हों तो अच्छा है।

अपने अच्छे व्यक्त्वि से ही सामने वाले को अपने अनुकूल करने का प्रयास करें।

जिस प्रकार अच्छे को अच्छा कहना आवश्यक है, उसी प्रकार बुरे को बुरा कहना भी आवश्यक है। ऐसा करने से हमारे भीतर की नेगेटिव एनर्जी का विस्तार नहीं होता अपितु विश्व भर में व्याप्त पॉजिटिव एनर्जी को ताकत मिलती है। इसी को दोनों प्रकार की एनर्जी का संतुलन कहते हैं।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

ब्लॉगिंग का इतिहास करोड़ों की कमाई!

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ब्लॉगिंग का इतिहास बहुत पुराना नहीं है फिर भी इसके बारे में जानना बहुत रोचक है। ब्लॉगिंग का इतिहास दर्शाता है करोड़ों की कमाई!सोशियल मीडिया की दुनिया में तीन शब्द बी-लॉग, वी-लॉग एवं मोटो-व्लॉग B-log, V-log and  Moto-Vlog बहुतायत से प्रयुक्त होते हैं।

ब्लॉग शब्द बाइट तथा लॉग से मिलकर बना हुआ है। जब हम किसी टैक्सट् को लिखकर इलेक्ट्रोनिक प्लेटफॉर्म पर डालते हैं तो उसकी लम्बाई को बाइट्स में नापा जाता है। इसे बी-लॉग अथवा ब्लॉग लिखना एवं ब्लॉगिंग करना भी कहा जाता है।

ब्लॉग में कोई भी व्यक्ति अपने विचारों, सूचनाओं एवं तथ्यों को जनसामान्य की जानकारी के लिए शब्दों में लिखता है।

यह एक तरह का लेख है जिसे इलेक्ट्रोनिक सोशियल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के माध्यम से पाठकों तक पहुंचाया जाता है। ब्लॉग को प्रभावशाली बनाने के लिए इसमें टैक्स्ट के साथ-साथ डायग्राम, फोटो, इमेज, आर्ट-वर्क, ग्राफ एवं टेबल्स आदि का उपयोग किया जाता है।

वी-लॉग अथवा व्लॉग में विचारों, सूचनाओं एवं तथ्यों आदि को वीडियो के रूप में दिखाया जाता है। इस वीडियो में स्क्रीन पर टैक्स्ट, डायग्राम, फोटो, वीडियो क्लिप्स, आर्ट-वर्क, ग्राफ, टेबल्स तथा स्लाइड्स आदि दिखाए जाते हैं तथा बैकग्राउंड में कंटेट पढ़ा जाता है एवं संगीत बजाया जाता है। इसे वैब टेलिविजन भी कहा जाता है।

वी-लॉग में स्क्रीन पर टैक्स्ट, डायग्राम, फोटो, वीडियो क्लिप्स, आर्ट-वर्क, ग्राफ, टेबल्स तथा स्लाइड्स आदि दिखाए जाते हैं तथा बैकग्राउंड में कंटेट पढ़ा जाता है एवं म्यूजिक तथा साउण्ड इफैक्ट्स दिए जाते हैं।

वी-लॉग में स्क्रीन पर टैक्स्ट दिखाने के लिए सामान्यतः पॉवर पॉइंट स्लाइड्स का प्रयोग किया जाता है।

स्लाइड्स को आकर्षक बनाने के लिए एनीमेशन टूल्स का प्रयोग किया जाता है।

वीडियो ब्लॉगिंग का इतिहास बहुत पुराना नहीं है फिर भी यह समय के साथ स्थिर कदमों से आगे बढ़ा है।आजकल मोटो-वीलॉग शूट का भी प्रचलन बढ़ रहा है। जब कोई व्यक्ति मोटर साइकिल पर बैठकर वीडियो शूट करता है तो उस वीडियो ब्लॉग को motovlog अर्थात् मोटरसाइकिल वीडियो ब्लॉग कहा जाता है।

दुनिया भर में बहुत सी वैबसाइट कम्पनियां, लेखकों एवं वीडियो-ब्लागर्स को अपने वीडियो चैनल बनाने से लेकर स्वयं की वीडियो ब्लॉगिंग साइट्स चलाने की सुविधा प्रदान करती हैं।

स्मार्ट फोन में डिजिटल कैमरा जुड़ जाने के बाद वीडियो-लॉगर्स को यह सुविधा भी मिलने लगी है कि वे अपने मोबाइल फोन से वीडियो को सीधे ही अपने चैनल या वीडियो एकाउंट पर अपलोड कर दें।

वीडियो-लॉग का सामान्यतः यूट्यब चैनल के माध्यम से प्रदर्शन किया जाता है। संसार भर में वी-लॉगिंग ने यूट्यूब चैनल के माध्यम से टेलिविजन की दुनिया को बहुत बड़ी चुनौती दी है।

छोटे-छोटे गांव, गली, शहर तथा मुहल्लों में रहने वाले वी-लॉगर्स ने बड़े-बड़े पत्रकारों और फिल्मकारों के छक्के छुड़ा दिए हैं।

वीडियो लोगिंग का इतिहास भी बहुत रोचक है। बी-लॉग, वी-लॉग एवं मोटो-व्लॉग लेखन का कार्य अपेक्षाकृत तेज गति से एवं स्थिरता के साथ बढ़ा। जब से ये प्रचलन में आए हैं। इनकी मांग अथवा प्रचलन कभी नहीं घटा।

न्यूयॉर्क के एक कलाकार सुलिवन ने 1980 के दशक में न्यूयॉर्क सिटी एवं साउथ कैरोलीना के आसपास के दृश्यों को अपने वीडियो कैमरे से शूट करके वी-लॉगिंग की तरफ लोगों का ध्यान खींचा।

जनवरी 2000 में वी-लॉगिंग में एक नया मोड़ तब आया जब एडम कोन्ट्रास नामक एक युवक ने लॉस एंजिलिस तक के लिए अपनी क्रॉस कंट्री के दृश्यों को एक ब्लॉग एण्ट्री के साथ पोस्ट किया। उसने यह वीडियो अपने मित्रों के लिए बनाई थी। यह संसार की सबसे लम्बी पोस्ट थी जो बाद में सर्वाधिक रनिंग वीडियो का रिकॉर्ड बनाने में सफल हुई।

नवम्बर 2000 में एड्रियन माइल्स ने एक वीडियो पोस्ट किया। इसमें एक स्थिर चित्र के ऊपर बार-बार बदलने वाला टैक्स्ट मैसेज था। उसने विश्व में पहली बार अपनी इस कला को वी-लॉगिंग का नाम दिया। वास्तव में यह वीडियो-ब्लॉग का लघु नाम था।

वर्ष 2002 में एक फिल्म निर्माता लुक बॉवमैन ने ट्रॉप्सिम्स डॉट ओआरजी के नाम से एक वीडियो डायरी आरम्भ की जिसमें उसने अपनी यात्राओं के वीडियो दिखाए। इसे संसार की पहली वी-लॉग और वीडियो लॉग साइट कहलाने का सौभाग्य मिला।

वर्ष 2004 में स्टीव गारफील्ड नामक एक युवक ने अपना स्वयं का वीडियो ब्लॉग लाँच किया तथा वर्ष 2004 को उसने ईयर ऑफ वीडियो ब्लॉग घोषित किया। इसके बाद का ब्लॉगिंग का इतिहास दर्शाता है करोड़ों की कमाई!

वर्ष 2005 में वी-लॉगिंग को पूरी दुनिया में लोकप्रियता प्राप्त होने लगी। उसी वर्ष याहू नामक वैबसाइट कम्पनी ने देखा कि उसके वीडियो ब्लॉगिंग समूह में अचानक ही सदस्यों की संख्या नाटकीय ढंग से बढ़ गई है। 

फरवरी 2005 में पहली बार वीडियो शेयरिंग साइट यूट्यूब को लाँच किया गया जो आज संसार की सर्वाधिक लोकप्रिय वीडियो साइट है।

लाँच होने की केवल डेढ़ साल की अवधि में अर्थात् जुलाई 2006 में यूट्यूब संसार की पांचवी सर्वाधिक लोकप्रिय वैब डेस्टीनेशन बन गया। इस प्लेटफॉर्म पर प्रतिदिन 65 हजार नए वीडियो अपलोड किए जाने लगे एवं दुनिया भर में प्रतिदिन लगभग 100 मिलियन वीडियो देखे जाने लगे।

रूस के भूतपूर्व राष्ट्रपति दिमित्री मेदवेदेव्ज ने नवम्बर 2008 में लेटिन अमरीका की यात्रा की तथा इस यात्रा का एक वीडियो ब्लॉग पोस्ट किया।

चार्ल्स ट्रिप्सी नामक एक वीडियो-ब्लॉगर ने एक यूट्यूब चैनल बनाया जिसका नाम Internet Killed Television था। इस यूट्यूब चैनल का नाम गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में दर्ज है। ट्रिप्सी प्रतिदिन कम से कम एक वीडियो-लॉग पोस्ट करता है तथा 3000 से अधिक वीडियो पोस्ट करके वह दुनिया में ऐसा करने वाला पहला व्यक्ति बन गया।

वर्ष 2010 में यूट्यूब ने लॉस एंजिलिस में विडकॉन नाम से एक सम्मेलन आयोजित किया जिसमें दुनिया भर के वी-लॉगर्स ने हिस्सा लिया। इस सम्मेलन से यह स्पष्ट हो गया कि वी-लॉगिंग, टेलिविजन तथा सिनेमा साहित दुनिया भर के मीडिया के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन गया है।

यदि हम वीडियो ब्लॉगिंग का इतिहास देखें तो हमें जानकारी होगी कि किस प्रकार यूट्यूब से प्रेरित होकर इंस्टाग्राम तथा फेसबुक जैसी वैबसाइट्स को भी अपने उपयोगकर्ताओं को वीडियो अपलोड करने एवं लाइव ब्रॉडकास्टिंग करने की सुविधा देनी पड़ी। आज यूट्यूब इण्टरनेट की दुनिया में सर्वाधिक देखी जाने वाली तीन वैबसाइट्स में से एक है।

यूट्यूब चैनल अपने सदस्यों को उनके वीडियो चैनल पर विज्ञापन दिखाने की भी सुविधा देता है जिससे वी-ब्लॉगर्स को अच्छी-खासी आमदनी होती है। इसका अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि वर्ष 2013 में एक वी-लॉगर ने 7,20,000 यूएस डॉलर अर्थात् भारतीय मुद्रा में कहें तो लगभग 5 करोड़ रुपए कमाए। तब से अब तक इस रिकॉर्ड को कई बार तोड़ा जा चुका है तथा दुनिया भर में लोग लाखों डॉलर प्रतिवर्ष की कमाई कर रहे हैं।

इन तथ्यों के आधार पर जाए कि ब्लॉगिंग का इतिहास दर्शाता है करोड़ों की कमाई तो इसमें कोई अतिश्याक्ति नहीं होगी!

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

चौदह माह की बच्ची से बलात्कार

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Rape with a girl child

(9 अक्टूबर 2018 को लिखा गया लेख) चौदह माह की बच्ची से बलात्कार भारत की तमाम राजनीतिक एवं सामाजिक व्यवस्था को कटघरे में खड़ी करती है।

हमाम में नंगे राजनीतिक दल !

इस देश का दुर्भाग्य है कि यहां बलात्कार होते हैं और कुछ माह की बच्चियों से लेकर हर आयु की औरतों से बलात्कार होते हैं। कुछ बलात्कार केवल खबर बनकर रह जाते हैं तो कुछ बलात्कारों की चीखें देश के हर कोने में सुनाई देती हैं। गुजरात में 14 साल की एक बच्ची से बलात्कार हुआ। बलात्कारी बिहार से गुजरात में मजदूरी करने आया था।

इस बलात्कार का बदला लेने के लिए गुजरात विधान सभा के कांग्रेसी विधायक अल्पेश ठाकुर अपने साथियों के साथ लाठियां और सरिये लेकर घरों से बाहर आए। उन्होंने बदला लेने का नया तरीका ईजाद किया। उन्होंने यह कहकर पूरे देश की आत्मा पर ही हमला कर दिया कि यूपी और बिहार के लोग रात की रोटी खाकर गुजरात छोड़ दें।

उन्होंने यूपी तथा बिहार से रोजी-रोटी कमाने आए मजदूरों को रात के नौ बजे से सुबह के नौ बजे के बीच में गुजरात छोड़कर जाने का अल्टीमेटम दिया।

आनन-फानन में पचास हजार गुजराती गुजरात छोड़कर चल दिए। जब ये मजदूर अपने सिरों पर गठरियां लेकर पटना और बनारस के रेल्वे स्टेशनों पर उतरे तो पूरे देश में कोहराम मचना शुरु हो गया।

इस कोहराम की चीखें गुजरात के कांग्रेसी नेताओं के लिए आनंद का विषय बनकर गूंजीं। उनकी तो जैसे पौ बारह हो गई। गुजरात के कांग्रेसियों ने गुजरात सरकार पर असफलता, अकर्मण्यता और निष्क्रियता का आरोप लगा दिया। अर्जुन मोड़वाड़िया ने तो यहां तक कह दिया कि भाजपा ने ही ये हमले करवाए हैं क्योंकि भाजपा का चरित्र दंगे करवाने का रहा है।

महाराष्ट्र कांग्रेेस के अध्यक्ष संजय निरुपम सबसे पहले उछलकर सामने आए। उन्होंने अपने तल्ख बौद्धिक अंदाज में कहा कि मोदीजी यह न भूलें कि उन्हें भी बनारस जाना है। शायद संजय निरुपम खुद भूल गए हैं कि वे बिहार से आते हैं और महाराष्ट्र में बैठे हैं। वे शायद ये भी भूल गए कि कांग्रेस की सबसे बड़ी नेता तो इटली से आती हैं और उन्हें कहीं नहीं जाना है।

कांग्रेस की एक महिला प्रवक्ता ने एक टीवी चैनल पर भाजपा पर दंगे भड़काने का अरोप लगाते हुए कहा कि यदि अल्पेश ठाकुर जिम्मेदार हैं तो अभी तक उन्हें बुक क्यों नहीं किया गया? उनका कहने का अर्थ यह था कि अल्पेश पर बेवजह इल्जाम लगाया जा रहा है, असली मुजरिम तो भाजपा की गुजरात सरकार है।

बिहार से लालू यादव के सुपुत्र जो उपमुख्य मंत्री की कुर्सी भोग चुके हैं, उनकी भी लॉटरी लग गई। उन्होंने भी कांग्रेस के साथ सुर मिलाते हुए कहा कि गुजरात में जो कुछ हुआ उसके लिए नरेन्द्र मोदी की भाजपा सरकार जिम्मेदार है।

कम्युनिस्टों की भी जैसे मुंह मांगी मुराद पूरी हो गई। एक सुर से भाजपा को गरियाते हुए कह रहे हैं कि भाजपा का तो चरित्र ही दंगे-फसाद करवाने का रहा है।

भाजपा के नेता भी इस घटना के पीछे कांग्रेस को दोषी बताते हुए नहीं थक रहे। इस बार तो खैर भाजपाइयों की मजबूरी है किंतु यदि गुजरात में कांग्रेस सत्ता में होती और भाजपा विपक्ष में होती तो दोनों ओर से संवादों की भाषा बदल जाती। हां बातें केवल और केवल यही होतीं।

देश का यह कैसा चरित्र है! क्या हमारी राजनीतिक पार्टियों के नेताओं को समस्याओं के मूल में जाना और उनके निराकरण के लिए गंभीर चिंतन करना आता ही नहीं है! चीख-पुकार तो इस बात पर मचनी चाहिए थी कि इस देश में छोटी बच्चियों से लेकर हर आयु की औरत से बलात्कार कैसे हो जाता है! चिंता तो इस बात पर होनी चाहिए थी कि एक शांतिप्रिय राज्य के लोग अचानक ही दूसरे प्रांतों से आए लोगों पर हमलावर कैसे बन जाते हैं।

हमें इस बात पर भी विचार करना चाहिए कि क्या चौदह माह की बच्ची से बलात्कार जैसी घटनाओं को रोकने के लिए देश की न्यायिक व्यवस्था में भी कोई सुधार करने की आवश्यकता है!

इन दोनों समस्याओं का मूल हमारे सामाजिक एवं आर्थिक ताने-बाने में है। इस सामाजिक एवं आर्थिक ताने-बाने की बात न करके अपने वोटों की चिंता करना सभी राजनीतिक दलों को राजनीति के हमाम में नंगा सिद्ध करता है, और कुछ नहीं।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मानव जाति का डी.एन.ए. क्या अप्सराओं ने बदला !

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मानव जाति का डी.एन.ए.
मानव जाति का डी.एन.ए.

मानव जाति का डी.एन.ए. क्या अप्सराओं ने बदला! पढ़ने-सुनने में यह बात विचित्र सी लगती है किंतु इस बात पर गंभीरता से विचार किए जाने की आवश्यकता है।

संसार में ऐसा कोई देश नहीं होगा जिसमें अप्सराओं के अस्तित्व के बारे में विश्वास नहीं किया जाता। उनके बारे में सामान्य धारणा है कि अप्सराएं लाखों साल से युवा बनी हुई हैं। वे सुंदर और बेहद आकर्षक नारियां है जो स्वर्गलोक में रहती हैं। वे नृत्य एवं गायन में विशेष दक्ष होती हैं तथा मनुष्यों के साथ पत्नी के रूप में रहने धरती पर आती हैं।

हिन्दू पौराणिक ग्रंथों के साथ-साथ बौद्ध ग्रंथों में भी अप्सराओं का उल्लेख किया गया है। जैन ग्रंथ भी अप्सराओं का उल्लेख करते हैं। मुस्लिम संस्कृति में उन्हें जन्नत की हूर कहा जाता है तथा माना जाता है कि जो व्यक्ति धरती पर इस्लाम का कार्य करते हुए शहीद होगा, उसे जन्नत में हूरें प्राप्त होंगी।

यूनानी ग्रंथों में अप्सराओं को ‘निफ’ कहा गया है। इसाई पौराणिक कथाओं में अप्सराओं को ‘एल्फ’ कहकर पुकारा गया है। ईसाई एवं हिन्दू धर्म में मान्यता है कि अप्सराएं धरती के मानवों के साथ कुछ समय के लिए पत्नी के रूप में भी रहती हैं।

इस लेख में हमने भारतीय संस्कृत ग्रंथों में वर्णित उन अप्सराओं चर्चा की है जिन्होंने कुछ राजाओं एवं ऋषियों के साथ पत्नी के रूप में रहकर भारतीय आर्यों का डीएनए बदल दिया।

हालांकि आधुनिक विज्ञान हमें देवताओं की संतान नहीं बताएगा, वह हमें सदैव अफ्रीकी मूल की नीग्रो महिला की संतान के रूप में चित्रित करेगा जो वास्तव में बंदर जाति की मादा थी किंतु भारतीय शास्त्रों के अनुसार हम देवताओं की संतान हैं तथा हमारे शरीर में अप्सराओं के रक्त का भी मिश्रण हुआ है।

भारतीयों का पहला ग्रंथ है- ऋग्वेद। ऋग्वेद से लेकर महाभारत तथा अनेक पुराणों में स्वर्ग तथा उसमें रहने वाले देवी-देवताओं और अप्सराओं का उल्लेख हुआ है। अनेक संस्कृत ग्रंथों के अनुसार धरती पर मानव जाति के जन्म लेने से पहले, हिमालय पर्वत के किसी ठण्डे भाग में देवता नामक जाति रहती थी।

देवत गण ज्ञान-विज्ञान एवं संस्कृति में आज के मानवों से काफी उन्नत थे। वे पलक झपकते ही हजारों मील की यात्रा करते थे। वे अमर थे तथा उनके पास खाने-पीने के लिए अद्भुत वस्तुएं थीं। उनके गले के फूल कभी मुर्झाते नहीं थे।

देवता लोग अपने देश को स्वर्ग कहते थे जैसे आज हम अपने देश को भारत कहते हैं। दिव्य शक्तियों का स्वामी होने के कारण उन्हें ‘देवता’ कहते थे तथा कभी मृत्यु न होने के कारण उन्हें अमर कहते थे। स्वर्ग में रहने के कारण उन्हें ‘सुर’, कहा जाता था तथा उनके शत्रुओं को असुर कहा जाता था। सुरों की स्त्रियां सुरा कहलाती थीं। स्त्री-देवता अथवा देवताओं की स्त्री होने के कारण उन्हें ‘देवी’ कहते हैं।

जिस प्रकार मानव समाज ने प्राचीन काल में मंदिरों में नृत्य एवं कीर्तन करने के लिए देवदासियां नियुक्त की थीं तथा सार्वजनिक मनोरंजन के लिए नगरवधुएं नियुक्त की थीं, उसी प्रकार स्वर्ग नामक देश में देवताओं का मनोरंजन करने के लिए कुछ स्त्रियों को नियुक्त किया गया था जिन्हें अप-सुरा अर्थात् ‘निम्न स्तर की देवी’ कहते थे।

इन्हीं अप-सुराओं को हम अप्सरा कहते हैं। चूंकि ये स्वर्गलोक की स्त्रियां थीं तथा स्वर्गलोक धरती के ठण्डे प्रदेश में स्थित था इसलिए ये अप्सराएं गोरे रंग की, आकार में लम्बी और बहुत सुंदर होती थीं।

जब धरती पर मानव संस्कृति का विकास हुआ और साइबेरिया, तिब्बत अथवा पामीर के पठार के आसपास के ठण्डे प्रदेशों में आर्य जाति का उद्भव हुआ तब देवताओं ने आर्य जाति से सम्पर्क स्थापित किया।

देवताओं ने आर्यों को रथ, विभिन्न प्रकार के अस्त्र-शस्त्र, खेती के लिए उन्नत बीज, गाय, घोड़ा जैसी उपयोगी वस्तुएं प्रदान कीं। आर्यों को संस्कृत भाषा, देवनागरी लिपि तथा ऋग्वेद, यजुर्वेद एवं सामवेद नामक तीन वेद देवताओं से ही प्राप्त हुए।

देवताओं से प्राप्त हुए ज्ञान के कारण आर्यों ने राजन्य नामक व्यवस्था स्थापित की। प्रारम्भिक आर्य, देवताओं के राजा इन्द्र तथा विभिन्न देवताओं की पूजा करते थे ताकि उनसे दिव्य शक्तियां प्राप्त हो सकें। यज्ञ एवं हवनों में भी देवताओं को भाग दिया जाता था।

जब देव जाति एवं मानव जाति में सम्पर्क हो गया तो स्वर्ग के देवी-देवता तथा अप्सराएं भी मानव बस्तियों में आने लगे जिसे वे धरती कहते थे। उनके लम्बे सम्पर्क से मानव जाति का डी.एन.ए. बदलने लगा।

देवी-देवता तथा अप्सराएं सामान्यतः मानव समाज के उच्च वर्ग अर्थात् ऋषि, राजा एवं श्रेष्ठि आदि से सम्पर्क रखते थे। आर्यों की सेवा टहल करने वाले निम्न तबके से उनका सम्पर्क नहीं था जिन्हें तब शूद्र कहा जाता था।

कालांतर में देव जाति अपने भोग-विलास के कारण तथा असुरों से निरंतर होने वाले युद्धों के कारण कमजोर होती चली गई तथा देवताओं से प्राप्त ज्ञान एवं विज्ञान के बल पर आर्य ऋषि एवं राजा इतने शक्तिशाली हो गए कि वे देवासुर संग्रामों में भी भाग लेने लगे। इक्ष्वाकु वंश के कई आर्य राजाओं ने देवासुर संग्रामों में देवताओं की सहायता की।

जब राजा दशरथ जैसे इक्ष्वाकु राजा स्वर्ग में जाते थे तो इन्द्र उन्हें अपने सिंहासन के आधे भाग पर बैठाता था।

स्वर्ग का राजा इन्द्र कोई स्थाई व्यक्ति नहीं था, वह अपने तप के क्षीण होने पर बदल जाता था। इसलिए देवताओं से प्राप्त हुए दिव्य ज्ञान के बल पर कुछ आर्य राजा एवं ऋषि तपस्या करके इन्द्र का स्थान प्राप्त करना चाहते थे। अतः इन्द्र इन राजाओं एवं ऋषियों की तपस्या भंग करने के लिए स्वर्गलोक की अप्सराओं को धरती पर भेजता था। ये अप्सराएं इन राजाओं एवं ऋषियों के साथ पत्नी के रूप में रहकर उनकी तपस्या भंग कर देती थीं।

अप्सराओं द्वारा आर्यों के साथ पत्नी के रूप में रहने का एक कारण और भी था। देवताओं के पास दिव्य शक्तियां थीं जबकि मनुष्य इन दिव्य शक्तियों का स्वामी नहीं था। इस कारण मनुष्य, देवताओं की तुलना में काफी कमजोर था।

इसलिए स्वर्गलोक से कुछ अप्सराओं को आर्य राजाओं के पास भेजा जाता था ताकि वे आर्य राजाओं के सम्पर्क से दिव्य गुणों एवं विशिष्ट शक्तियों से सम्पन्न संतान उत्पन्न कर सकें और अप्सराओं के गर्भ से उत्पन्न मानव, देवासुर संग्राम में देवताओं की सहायता कर सकें।

यही कारण है कि कुछ अप्सराएं धरती पर अकार राजाओं एवं ऋषियों की पत्नी के रूप में रहीं तथा उनके गर्भ से पवनपुत्र हनुमान, बालिपुत्र अंगद, गंगापुत्र भीष्म तथा आचार्य द्रोण जैसे शक्तिसम्पन्न मानवों ने जन्म लिया।

जिस राजा ‘भरत’ के नाम पर हमारे देश का नाम ‘भारत’ हुआ है, उस भरत की माता ‘शकुंतला’ का जन्म स्वर्ग की अप्सरा मेनका के गर्भ से हुआ था, शकुंतला के पिता ऋषि विश्वामित्र थे। अप्सरा का दौहित्र होने से राजा भरत विशिष्ट शक्तियों के स्वामी थे। उन्होंने भारत देश को एकसूत्र में पिरोया तथा एक शक्तिशाली केन्द्रीय राजनीतिक व्यवस्था स्थापित की।

 गंगापुत्र भीष्म ‘गंगा’ नामक अप्सरा के पुत्र थे। कुछ लोग भ्रमवश उन्हें गंगा-नदी का पुत्र कहते हैं। भीष्म को इच्छा मृत्यु का वरदान था।

अप्सराओं और मानवों के पुत्र-पुत्रियां होने के और भी बहुत से उदाहरण मिलते हैं। महर्षि भरद्वाज के पुत्र द्रोणाचार्य का जन्म घृताची नामक अप्सरा के गर्भ से हुआ था। द्रोणाचार्य अपने समय के सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर थे।

महर्षि वेदव्यास के पुत्र शुकदेव का जन्म भी घृताची के गर्भ से हुआ था। भारत की संस्कृति पर शुकदेव का बहुत प्रभाव पड़ा। महर्षि च्वन के पौत्र रूरू का जन्म भी स्वर्ग की अप्सरा घृताची के गर्भ से हुआ था। इस प्रकार मानव जाति का डी.एन.ए. बदलता चला गया।

ऋषि विश्वासु की पुत्री प्रमद्वारा का जन्म स्वर्ग की अप्सरा मेनका के गर्भ से हुआ था। प्रमद्वारा का विवाह घृताची के पुत्र रूरू से हुआ। इनकी कथा देवी भागवत पुराण में मिलती है। कन्नौज नरेश कुशनाभ की सौ पुत्रियों का जन्म घृताची के गर्भ से हुआ था।

माना जाता है कि आज से लगभग चालीस हजार साल पहले जब धरती पर अब तक के अंतिम हिमयुग की समाप्ति हुई और वर्तमान गर्मयुग आरम्भ हुआ तो धु्रवों एवं पहाड़ों की बर्फ पिघल गई जिससे धरती पर जल प्लावन अर्थात् जलप्रलय हुई जिसमें स्वर्गलोक नष्ट हो गया। संभवतः देवता अपने विमानों में बैठकर किसी अन्य ग्रह पर चले गए। यही कारण है कि अब धरती पर न देवता आते हैं, न देवियां और न अप्सराएं।

जलप्लावन के समय देवपुत्र मनु ने आर्य बस्तियों की रक्षा की। इसी कारण हम आज मनुष्य, मानव एवं मनुपुत्र कहलाते हैं।

अतः कहा जा सकता है कि जिस प्रकार देवी-देवताओं ने आर्यों को ज्ञान-विज्ञान दिया, उसी प्रकार अप्सराओं ने मानव जाति का डी.एन.ए. दिया। उन्होंने मनुष्यों की संतानों को जन्म देकर धरती के मनुष्यों में स्वर्गलोक के प्राणियों का डीएनए डाल दिया। संभवतः अप्सराओं के मनुष्यों के साथ पत्नी के रूप में रहने के पीछे यही सबसे बड़ा कारण था।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

हिन्दूधर्म में परकाया प्रवेश की ऐतिहासिकता !

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परकाया प्रवेश - bharatkaitihas.com
परकाया प्रवेश

हिन्दूधर्म में परकाया प्रवेश को अस्वाभाविक घटना समझा जाता है किंतु यह प्राणियों का स्वाभाविक धर्म है। परकाया प्रवेश का अर्थ है एक देह को छोड़कर दूसरी देह में प्रवेश करना। माँ के गर्भ में संतान का शरीर बनता है, वहाँ नवीन आत्मा का निर्माण नहीं होता।

माँ के गर्भ में बनने वाली शिशु देह में हँसने-रोने एवं बोलने वाला जीवात्मा कहाँ से आता है? निश्चित रूप से वह किसी अन्य देह को छोड़कर आता है जिसे इसी प्रकृति प्रदत्त एवं स्वाभाविक प्रक्रिया के द्वारा नवीन शरीर की प्राप्ति हाती है।

परमात्मा, देवगण, योगीजन, सिद्धजन और कुछ अन्य प्रकार के दैवीय अस्तित्वों को मां के गर्भ में बन रहे शिशु-शरीर में प्रवेश करने की अनिवार्यता नहीं है। वे स्वयं अपनी शक्तियों के बल पर इच्छानुसार शरीर का निर्माण कर सकते हैं जिसे योगज शरीर कहा जाता है।

माँ के पेट में बन रहे शिशु में आत्मा प्रवेश नहीं करता, जीवात्मा प्रवेश करता है। वह किसी अन्य स्थान से आकर उस निर्माणाधीन शरीर का स्वामी बनता है।

आत्मा और जीवात्मा में अंतर है। आत्मा, परमात्मा का शुद्ध स्वरूप है जिसे सुख, दुःख, भूख, प्यास, सर्दी, गर्मी, नींद एवं थकान का अनुभव नहीं होता किंतु जीवात्मा को होता है। आत्मा की मृत्यु नहीं होती किंतु जीवात्मा की होती है।

जीवात्मा की मृत्यु और जीवित मनुष्य की मृत्यु में अंतर है। इस अंतर को समझने के लिए जीवात्मा के स्वरूप को समझना जरूरी हो जाता है।

आत्मा से ही जीवात्मा बनता है। आत्मा, परमात्मा का शुद्ध अंश है किंतु जब आत्मा कर्मों के बंधन से संस्कारित हो जाता है तो वह जीवात्मा का रूप ले-लेता है। परमात्मा, आत्मा एवं जीवात्मा का कोई लिंग नहीं है इसलिए उन्हें स्त्री-लिंग या पुल्लिंग दोनों से सम्बोधित किया जा सकता है।

स्त्री देह और पुरुष देह में आकर बैठने वाला जीवात्मा एक ही होता है। वह अपने संस्कारों के आवरण के कारण मोहयुक्त होकर स्त्री-देह या पुरुष-देह का चयन करता है।

जीवात्मा अपने जन्म-जन्मान्तर के संस्कारों के कारण काले, गोरे, अमीर, गरीब, स्वस्थ, रुग्ण आदि प्रकार की देह का चयन करता है। जीवात्मा के ये संस्कार उसके द्वारा किए गए कर्मों से उत्पन्न होते हैं।

यदि पुनर्जन्म संभव है और शाश्वत सत्य है तो परकाया प्रवेश की घटनाएं भी संभव हैं और शाश्वत सत्य हैं।

परकाया प्रवेश की थोड़ी बहुत शक्ति प्रत्येक प्राणी में होती है। यदि हम चींटी को भी कष्ट नहीं पहुंचाना चाहते तो इसका अर्थ है कि चींटी ने किसी न किसी रूप में हमारे भीतर प्रवेश कर लिया है। यह परकाया प्रवेश का सबसे छोटा रूप है जिसमें एक प्राणी केवल संवेदना या भावना बनकर दूसरे प्राणी के मन, बुद्धि एवं हृदय में प्रवेश कर जाता है।

जब यह संवेदना या भावना विराट रूप धर लेती है तो एक प्राणी अपने सम्पूर्ण अस्तित्व के साथ दूसरे प्राणी की देह में प्रवेश कर लेता है।

यहाँ प्रत्येक शब्द पर ध्यान देने की आवश्यकता है। सम्पूर्ण अस्तित्व का अर्थ है संस्कारों से युक्त आत्मा अर्थात् जीवात्मा। इसमें शरीर या देह सम्मिलित नहीं है। एक जीवात्मा किसी अन्य जीवात्मा में प्रवेश नहीं कर सकता है, केवल दूसरी काया अथवा किसी दूसरे प्राणी की काया में प्रवेश कर सकता है।

हमारी इस वीडियो में परकाया प्रवेश की जिस संदर्भ में चर्चा की जानी है वह आदि जगद्गुरु शंकराचार्य द्वारा किए गए परकाया प्रवेश की है। अर्थात् एक जीवात्मा द्वारा एक शरीर में निवास करते हुए ही, अपना शरीर छोडकर, दूसरे जीवित या मृत शरीर में प्रवेश कर जाना।

तंत्र सा‘, ‘मंत्र महार्णव’, ‘मंत्र महोदधि’ आदि तंत्र सम्बधी प्रामाणिक ग्रंथों के अनुसार आकाश तत्त्व की सिद्धि के बाद परकाया प्रवेश सम्भव होने लगता है। खेचरी मुद्रा का सतत् अभ्यास और इसमें पारंगत होना परकाया सिद्धि प्रक्रिया में अत्यन्त प्रभावशाली सिद्ध होता है।

‘व्यास भाष्य’ के अनुसार अष्टांग योग अर्थात यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि के अभ्यास; निष्काम भाव से भौतिक संसाधनों का त्याग और नाड़ियों में संयम स्थापित करके चित्त के उनमें आवागमन के मार्ग का आभास किया जाता है।

चित्त के परिभ्रमण मार्ग का पूर्ण ज्ञान हो जाने के बाद साधक, योगी, तपस्वी अथवा संत पुरूष अपनी समस्त इन्द्रियों सहित चित्त को निकालकर परकाया प्रवेश कर जाते हैं।

‘भोजवृत्ति’ के अनुसार भौतिक बन्धनों के कारणों को समाधि द्वारा शिथिल किया जाता है। नाड़ियों में इन बन्धनों के कारण ही चित्त अस्थिर रहता है। नाड़ियों की शिथिलता से चित्त को अपने लक्ष्य का ज्ञान प्राप्त होने लगता है। इस अवस्था में पहुँचने के बाद योगी अथवा साधक अपने चित्त को इन्द्रियों सहित दूसरे अन्य किसी शरीर में प्रविष्ट करवा सकता है।

जैन धर्म में सूक्ष्मतर शरीर अर्थात् आत्मा को अरूप, अगन्ध, अव्यक्त, अशब्द, अरस, चैतन्य स्वरूप और इन्द्रियों द्वारा अग्राह्य कहा गया है। स्थूल और सूक्ष्म के अतिरिक्त आत्मा को धर्म में संसारी और मुक्त रूप से जाना गया है।

यूनानी पद्धति में परकाया प्रवेश को छाया पुरूष से जोड़ा गया है।

विभिन्न त्राटक क्रियाओं द्वारा परकाया प्रवेश के रहस्य को सिद्ध किया जा सकता है। हठ योगी परकाया प्रवेश सिद्धि में त्राटक क्रियाओं द्वारा मन की गति को स्थिर और नियंत्रित करने के बाद परकाया प्रवेश में सिद्ध होते हैं।

प्राचीन भारतीय ग्रंथ परकाया प्रवेश की घटनाओं का उल्लेख करते हैं जिनमें महाभारत तथा योग वसिष्ठ आदि भी सम्मिलित हैं।

महाभारत के ‘अनुशासन पर्व’ में आई एक कथा के अनुसार एक बार इन्द्र किसी कारण, ऋषि देवशर्मा से कुपित हो गया। इन्द्र ने ऋषि की पत्नी से बदला लेने का निश्चय किया। देवशर्मा के शिष्य ‘विपुल’ को योग दृष्टि से ज्ञात हो गया कि मायावी इन्द्र, गुरु-पत्नी से बदला लेने वाला है। ‘विपुल’ ने सूक्ष्म शरीर से गुरु-पत्नी के शरीर में प्रवेश करके उसे इन्द्र से बचाया।

महाभारत के शान्ति पर्व में वर्णन है कि सुलभा नामक एक विदुषी महिला, अपने योगबल की शक्ति से राजा जनक के शरीर में प्रविष्ट होकर, अन्य विद्वानों से शास्त्रार्थ करने लगी थी। उन दिनों राजा जनक का व्यवहार भी स्वाभाविक नहीं था।

योग वसिष्ठ नामक ग्रंथ में महर्षि वसिष्ठ अपने शिष्य श्रीराम को परकाया प्रवेश की विधि समझाते हुए कहते हैं कि जिस तरह वायु पुष्पों से गंध ख्रींचकर उसका सम्बन्ध घ्राणेन्द्रिय से करा देती है, उसी तरह योगी, रेचक के अभ्यास से कुंडलिनी रूपी घर से बाहर निकलकर दूसरे शरीर में जीव का सम्बन्ध कराते हैं।

‘पातंजलि योगसूत्र’ में सूक्ष्म शरीर से आकाश गमन, एक ही समय में कई शरीर धारण तथा परकाया प्रवेश जैसी अनेक योग विभूतियों का वर्णन है।

बहुत से नाथ योगियों को भी परकाया प्रवेश की विद्या प्राप्त थी। नाथ साहित्य में योगी मछन्दरनाथ का बड़ा आदर है। नाथ साहित्य में उल्लेख मिलता है कि योगी मछन्दरनाथ ने एक बार एक बकरे के शरीर में परकाया प्रवेश किया। एक योगिनी को इस बात का पता चल गया। उसने मछंदरनाथ को उस बकरे के शरीर में ही सीमित कर दिया तथा अपने घर में बांध लिया।

जब कई दिनों तक गुरु वापस नहीं लौटे तो उनके शिष्य गोरखनाथ, मछंदरनाथ को ढूंढने निकले। बहुत से स्थानों का भ्रमण करते हुए गोरखनाथ कामरूप नामक देश में पहुंचे। आज का आसाम एवं बंगाल ही उस काल का कामरूप है।

गोरखनाथ को अपने गुरु मच्छंदरनाथ कामरूप देश के एक गांव में एक रूपसी तांत्रिक युवती के घर में बकरे के रूप में बंधे हुए मिले। गोरखनाथ ने जोर से आवाज लगाई- जाग मछंदर गोरख आया।

गोरख की आवाज सुनकर मछंदर को अपनी सिद्धियां पुनः स्मरण हो गईं और वे संकलप मात्र से बकरे का शरीर त्याग कर फिर से अपने मूल शरीर में आ गए।

‘भगवान् शंकराचार्य के अनुसार यदि सौन्दर्य लहरी के 87वें क्रमांक का श्लोक नित्य एक सहस्र बार जप कर लिया जाए तो परकाया प्रवेश की सिद्धि प्राप्त की जा सकती है।

रानी चूड़ाला द्वारा अपने पति के शरीर में परकाया प्रवेश की घटना बहुत प्रसिद्ध है। इस आख्यान के अनुसार शिखिध्वज नामक एक राजा समाधि में बैठ गए। उनकी रानी चूड़ाला पर उनके शरीर की रक्षा की जिम्मेदारी थी।

चूड़ाला दिन में कुंभ नामक एक व्यक्ति के मृत शरीर में परकाया प्रवेश करके अपने पति के शरीर की रक्षा करती थी और रात्रि में वह मदनिका नामक एक मृत स्त्री के शरीर में प्रवेश करके जीवन-संगिनी के रूप में अपने पति की सेवा करती थी।

ऐसा करते हुए बहुत दिन बीत गए किंतु राजा शिखिध्वज की समाधि नहीं टूटी।  एक दिन चूड़ाला ने अपने पति की नाड़ी परीक्षा की तथा उनके जीव की सही स्थिति का पता लगाया। वह समझ गई कि उसके पति जीवित तो हैं किंतु समाधि की जिस अवस्था में पहुंच गए हैं, वहाँ से उन्हें जगाया जाना संभव नहीं है।

अतः देवी चूड़ाला ने अपने पति के शरीर में परकाया प्रवेश करने का निर्णय लिया। यह एक अनोखी घटना होने वाली थी। ठीक उसी प्रकार की जिस प्रकार देवी सुलभा ने राजा जनक के जीवित रहते ही उनके शरीर में प्रवेश कर लिया था।

चूड़ाला ने शिखिध्वज के शरीर में प्रवेश करके उनकी चेतना को स्पंदित किया और स्वयं बाहर आकर अपने शरीर में प्रवेश कर गई, जैसे कोई चिड़िया अपने घोंसले में घुस जाती है।

बाहर आकर चूड़ाला एक पुष्पाच्छादित वृक्ष के नीचे बैठकर सामगायन करने लगी। चेतना के स्पंदित होते ही राजा शिखिध्वज की समाधि भंग हो गई और सामगायन सुनकर वे जागृत अवस्था में आ गए।

परकाया प्रवेश गृहस्थों के लिए नहीं है, केवल सिद्धों और योगियों के लिए है। यह योगियों का कौतुक मात्र है। परकाया प्रवेश का कोई लाभ नहीं है। न इसकी आवश्यकता है।

न इससे मोक्ष प्राप्त होता है। आत्मा की उन्नति एवं मोक्ष प्राप्ति के लिए निष्काम कर्म एवं नवधा भक्ति ही सर्वश्रेष्ठ मार्ग है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

क्या है भैरवी साधना का रहस्य ?

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mystery of bhairavi sadhna
mystery of bhairavi sadhna

भारतीय तंत्रशास्त्र में भैरवी साधना का रहस्य बताया गया है। इसे बड़ी साधना माना जाता है। तांत्रिक मत के अनुसार ऋग्वेद में सांकेतिक रूप से पंच-चक्रों का उल्लेख हुआ है। इन्हीं पंच-चक्रों में से एक है- भैरवी चक्र। भैरवी चक्र दो प्रकार के होते हैं, एक है चीनाचारा चक्र और दूसरा है शैवमतीय चक्र। चक्र-पूजा हिमालय पर्वत में स्थित चीनाचारा से आरम्भ हुई। यहाँ चीन से आशय हिमाचल प्रदेश के कुल्लू जिले में स्थित एक गांव से है। बहुत काल बाद में चक्रपूजा के साथ पञ्च-चक्रों के अनुकरण में पंच-मकारों को जोड़ा गया।

वामर्माग में पंचमकारों- मद्य, मीन, मांस, मैथुन तथा मुद्रा के माध्यम से साधक की उन्नति का मार्ग ढूंढा गया तथा तंत्र-मंत्र और यंत्र के बल पर सिद्धियों की कामना की गई। इस मत में भैरवी साधना जैसी अनेक साधना पद्धितियों का निर्माण किया गया जिनमें साधक को भैरवी का साहचर्य ग्रहण करना अनिवार्य था।

तंत्र शास्त्र के अनुसार भैरवी के दस प्रकार हैं। तांत्रिक मतों के अनुसार जब भगवान शिव ने दक्ष के यज्ञ में अपना अपमान होते हुए देखा तो शिव वहाँ से जाने लगे। इस पर सती ने दस शरीर धारण करके दसों दिशाओं में शिवजी के जाने का मार्ग अवरुद्ध कर दिया।

इन्हें दशविद्या कहा जाता है। यही दस भैरवियां हैं। इनमें से पाताल भैरवी, शमशान भैरवी तथा त्रिपुर भैरवी अधिक प्रसिद्ध हैं। इनके अतिरिक्त कौलेश भैरवी, रुद्र भैरवी, नित्य भैरवी, चैतन्य भैरवी आदि भी होती हैं। इन सबके ध्यान और पूजन की विधियां अलग-अलग हैं ।

तंत्र सधाना में दीक्षा लेने वाली हर स्त्री को भैरवी कहा जाता है जिसका अर्थ होता है- माँ, शक्ति, शिव की संगिनी। तंत्र ग्रंथों में भगवान शिव भी माँ पार्वती को भैरवी कहकर ही पुकारते हैं। कोई भी तंत्रमार्गी स्त्री ‘भैरवी’ और पुरुष ‘भैरव’ कहकर सम्बोधित किया जाता है।

सनातन मान्यता के अनुसार गुरु-शिष्या के बीच विवाह नहीं हो सकता। इतना ही नहीं, एक ही गुरु से दीक्षित स्त्री-पुरुष परस्पर विवाह नहीं कर सकते क्योंकि वे गुरु भाई और गुरु बहन होते हैं किंतु कौल मत के अनुसार स्त्री-पुरुष के धर्म-गुरु अलग होने से गृहस्थी में तनाव रह सकता है।

इसलिए कौल मार्गियों ने दो विपरीत नियमों को स्वीकार किया। पहला यह कि एक गुरु के शिष्य एवं शिष्याएं आपस में विवाह कर सकते हैं। दूसरा यह कि गुरु भी अपनी शिष्याओं से विवाह कर सकता है।

तंत्र साधना की कुछ मर्यादाएं निश्चित की गईं जिनकी पालना प्रत्येक साधक को करनी अनिवार्य थी। इस मत के अनुसार भैरवी ‘शक्ति’ का ही एक रूप होती है। तंत्र की सम्पूर्ण भावभूमि ‘शक्ति’ पर आधारित है। इस साधना के माध्यम से साधक को इस तथ्य का साक्षात् कराया जाता है कि स्त्री केवल वासनापूर्ति का माध्यम नहीं, वरन् शक्ति का उद्गम भी होती है।

शक्ति प्राप्ति की यह क्रिया केवल सदगुरु ही अपने निर्देशन में संपन्न करा सकते हैं, क्योंकि उन्हें ही अपने किसी शिष्य की भावनाओं एवं संवेदनाओं का ज्ञान होता है। इसी कारण तंत्र के क्षेत्र में स्त्री समागम के साथ-साथ गुरु के मार्गदर्शन की अत्यंत आवश्यकता पड़ती थी।

शक्ति उपासकों के वाम मार्गी मत में पहले मद्य को स्थान मिला। उसके बाद बलि प्रथा आई और माँस का सेवन होने लगा। बाद में इसके भी दो हिस्से हो गए। जो साधक मद्य और माँस का सेवन करते थे, उन्हें साधारण-तान्त्रिक कहा जाता था।

मद्य और माँस के साथ-साथ मीन, मुद्रा, मैथुन आदि पाँच मकारों का सेवन करने वाले तांत्रिकों को सिद्ध-तान्त्रिक कहा जाता था।

साधारण-तान्त्रिक एवं सिद्ध-तान्त्रिक, दोनों ही अपनी-अपनी साधनाओं के द्वारा ब्रह्म को पाने का प्रयास करते थे किंतु जन-साधारण इन सिद्ध-तान्त्रिकों से डरने लगा।

पाँच मकारों के द्वारा अधिक से अधिक ऊर्जा बनाई जाती थी और उस ऊर्जा को कुण्डलिनी जागरण में प्रयुक्त किया जाता था।

कुन्डलिनी जागरण करके सहस्र-दल का भेदन किया जाता था और दसवें द्वार को खोलकर सृष्टि के रहस्यों को समझा जाता था। इस प्रकार वाम साधना में काम-भाव का समुचित प्रयोग करके ब्रह्म की प्राप्ति की जाती थी।

भैरवी साधना में कई भेद हैं। प्रथम प्रकार की साधना में स्त्री और पुरुष निर्वस्त्र होकर एक दूसरे से तीन फुट की दूरी पर आमने सामने बैठ कर, एक दूसरे की आँखों में देखते हुए शक्ति मंत्रों का जाप करते हैं।

लगातार ऐसा करते रहने से साधक के अन्दर का काम-भाव ऊर्ध्वमुखी होकर उर्जा के रूप में सहस्र-दल का भेदन करता है।

वहीं अन्तिम चरण में स्त्री और पुरुष सम्भोग करते हुए, स्वयं को नियंत्रण में रखते हैं। दोनों ही शक्ति-मंत्रों का जाप करते हैं और प्रयास करते हैं की स्खलन न हो।

पुरुष के लिए स्खलन पूर्णतः वर्जित होता है क्योंकि स्खलन से उसकी शक्ति नष्ट हो जाती है। यदि यह आरम्भिक चरणों में हो जाए तो पुरुष साधक की शक्ति का कम ह्रास होता है किंतु साधना के मध्य अथवा अंतिम चरणों में ऐसा हो तो साधन की शक्ति नष्ट हो जाती है तथा साधाना भंग हो जाती है।

एक चक्र के भेदन के बाद ऐसा होने पर बहुत हानि नहीं होती परन्तु किसी चक्र के पास पहुंचकर स्खलन होने पर शक्ति का क्षरण होता है।

इस प्रक्रिया में गुरु की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। जब काम का आवेग चढ़ता है तो साधक उसे नियंत्रित नहीं कर सकता है। अतः गुरु ही साधक को बताता है कि कैसे उसे नियंत्रित करके ऊपर की और मोड़ा जाए।

इसमें भैरवी का स्खलन होने पर भी, साधक की साधना पर बहुत अंतर नहीं पड़ता क्योंकि साधक को प्राप्त होने वाली शक्ति भैरवी के माध्यम से ही प्राप्त होती है, अतः भैरवी स्वयं सिद्ध होती जाती है।

सहस्र-दल का भेदन करने के लिए आज तक जितने भी प्रयोग हुए हैं, उन सभी प्रयोगों में इसे सबसे अनूठा माना जाता है।

ऐसे साधक को साधना के तुरन्त बाद दिव्य ध्वनियाँ एवं ब्रह्माण्ड में गूंज रहे दिव्य मंत्र सुनाई पड़ते हैं। साधक को दिव्य प्रकाश दिखाई देता है। साधक के मन में कई महीनों तक दुबारा काम-भाव की उत्पत्ति नहीं होती।

 प्रत्येक साधना में कोई न कोई कठिनाई अवश्य होती है, उसी प्रकार इस साधना में स्वयं पर नियंत्रण रखना सबसे बड़ी कठिनाई है।

धीरे-धीरे भैरवी-साधना, काम-वासना पूर्ति का माध्यम बन कर रह गई। साधक गण, सहस्र-दल भेदन को भूल गए और परम पिता-परमात्मा को भी। इस कारण भैरवी-साधना व्यभिचार-साधना बन गई।

तांत्रिकों की मान्यता है कि जब तक साधक के पास सही मंत्र एवं दीक्षा नहीं होगी, तब तक साधक चाहे कितना भी अभ्यास करे भैरवी साधना का रहस्य बताया जानना असंभव है। भैरवी-तंत्र के अनुसार भैरवी ही गुरु है और गुरु ही भैरवी का रूप है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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