Monday, September 26, 2022

ब्रिटिश-भारत में साम्प्रदायिक समस्या के मुख्य कारण (2)

सर सैयद अहमदखाँ का अलीगढ़ आन्दोलन

1857 की क्रांति के असफल रहने के बाद अँग्रेजों के साथ सामंजस्य के प्रश्न पर मुस्लिम समाज में दो वर्ग उभर कर सामने आये। एक वर्ग तो वह था जो किसी भी कीमत पर ब्रिटिश सत्ता से समझौता अथवा सहयोग करने के विरुद्ध था तथा हिंसात्मक साधनों से ब्रिटिश सत्ता को उखाड़ फेंकना चाहता था।

इसके विपरीत दूसरा वर्ग ब्रिटिश सत्ता की स्थिरता चाहता था तथा मुस्लिम समुदाय के विकास के लिए पश्चिमी शिक्षा को महत्त्वपूर्ण मानता था। पहले वर्ग का प्रतिनिधित्व सैयद अहमद बरेलवी ने किया, जबकि दूसरे वर्ग की विचारधारा ने अलीगढ़ आन्दोलन को जन्म दिया, जिसका नेतृत्व सर सैयद अहमद खाँ ने किया। सैयद अहमद का जन्म 17 अप्रैल 1817 को दिल्ली में हुआ।

ई.1846 से 1854 तक वे ईस्ट इंडिया कम्पनी के अधीन दिल्ली के सदर अमीन रहे। ई.1855 में उनका बिजनौर स्थानान्तरण हो गया। ई.1857 की क्रांति के समय वह बिजनौर में थे। उन्होंने क्रांति के समय बहुत से अँग्रेजों के प्राण बचाये। इससे उन्हें अँग्रेजों की सद्भावना प्राप्त हो गई। इस सद्भावना का उपयोग उन्होंने भारतीय मुसलमानों के हितों के लिये किया।

उस समय भारतीय मुसलमान अपने अतीत की यादों में खोये हुए थे और अँग्रेजों के साथ उनके सम्बन्ध अच्छे नहीं थे। मुसलमानों में अँग्रेजी शिक्षा के प्रति धार्मिक और सांस्कृतिक उदासीनता थी। सैयद अहमद खाँ ने अपने जीवन के प्रमुख दो उद्देश्य बनाये- पहला, अंग्रेजों एवं मुसलमानों के सम्बन्ध मधुर बनाना और दूसरा, मुसलमानों में आधुनिक शिक्षा का प्रसार करना। उन्होंने मुसलमानों को समझाया कि ब्रिटिश सरकार के प्रति वफादार रहने से ही उनके हितों की पूर्ति हो सकती है तथा अँग्रेज अधिकारियों को समझाया कि मुसलमान हृदय से अँग्रेजी शासन के विरुद्ध नहीं हैं। अँग्रेजों की थोड़ी सी सहानुभूति से वे सरकार के प्रति वफादार हो जायेंगे।

अँग्रेजों ने भी मुसलमानों के प्रति उदारता का रुख अपनाना उचित समझा, क्योंकि हिन्दुओं में बढ़ती हुई राष्ट्रीयता के विरुद्ध वे मुस्लिम साम्प्रदायिकता का उपयोग कर सकते थे। अतः सर सैयद अहमदखाँ को अपने प्रथम उद्देश्य में शीघ्र ही सफलता मिल गई। वास्तविकता यह थी कि सर सैयद अहमद ने स्वयं को मुस्लिम कुलीन वर्ग के हित-चिंतन तक ही सीमित रखा था।

जब उन्होंने मुसलमानों को हिन्दुओं से पृथक करने तथा उनमें हिन्दुओं के प्रति घृणा फैलाने का कार्य आरम्भ किया, तब अँग्रेजों ने सर सैयद का ऐसा प्रचार किया जैसे वे समस्त मुस्लिम-सम्प्रदाय के एक-मात्र उन्नायक हों। भारत के अनपढ़ एवं संकीर्णतावादी मुसलमानों ने सर सैयद अहमदखाँ का साथ दिया परन्तु जागृत एवं प्रगतिशील मुसलमानों ने ई.1885 में स्थापित कांग्रेस को अपना समर्थन दिया तथा सर सैयद की राष्ट्र-विरोधी एवं भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन को शिथिल करने की नीति का समर्थन नहीं किया।

सैयद अहमद खाँ ने अपने दूसरे उद्देश्य की पूर्ति के लिए अपने विचारों और कार्यक्रमों का केन्द्र अलीगढ़ को बनाया। अलीगढ़ से किये गये समस्त प्रयासों को समग्र रूप से अलीगढ़ आन्दोलन कहा जाता है। अलीगढ़ आन्दोलन ने मुसलमानों की शिक्षा के लिए महत्त्वपूर्ण कार्य किया। ई.1875 में सर सैयद अहमदखाँ ने अलीगढ़ में मोहम्मडन एंग्लो ओरियंटल कॉलेज की स्थापना की।

उत्तर प्रदेश के गवर्नर म्यूर ने इस कॉलेज को भूमि प्रदान की। जनवरी 1877 में लॉर्ड लिटन ने इस कॉलेज का उद्घाटन किया। इस प्रकार, आरम्भ से ही इस संस्था पर अंग्रेजों की विशेष कृपा-दृष्टि रही। लॉर्ड लिटन को दिये गये स्मृति-पत्र के अनुसार इस कॉलेज ने ब्रिटिश ताज के प्रति नवचेतना लाने और मुसलमानों को संगठित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। अलीगढ़ आन्दोलन के विचारों को प्रचारित करने के लिए सर सैयद ने ई. 1886 में ऑल इंडिया मुहम्मडन एजुकेशनल कांग्रेस की स्थापना की।

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से अन्तर स्पष्ट करने के लिए ई.1890 में इसका नाम बदलकर ऑल इंडिया मुहम्मडन एजुकेशन कांफ्रेंस किया गया। अलीगढ़ कॉलेज का मुख्य उद्देश्य मुस्लिम युवाओं में पाश्चात्य शिक्षा का प्रसार करना था किन्तु शीघ्र ही वहाँ का मुख्य काम राष्ट्रविरोधी और साम्प्रदायिक वातावरण तैयार करना हो गया। वहाँ से प्रकाशित अलीगढ़ इन्स्टीट्यूट गजट शैक्षणिक विषयों पर ध्यान केन्द्रित न करके राजनीतिक क्रिया-कलापों की खिल्ली उड़ाने और गाली-गलौच करने लगा।

यद्यपि कांग्रेस की स्थापना ब्रिटिश अधिकारियों के प्रोत्साहन एवं सहयोग से हुई थी तथापि जब कांग्रेस उनके द्वारा निर्देशित मार्ग पर न जाकर, ब्रिटिश शासन की आलोचना का मंच बन गई तो ब्रिटिश नौकरशाही का रुख कांग्रेस-विरोधी हो गया। सैयद अहमद खाँ ने कांग्रेस का विरोध आरम्भ से ही किया था। जब ब्रिटिश शासकों का रुख कांग्रेस के विरुद्ध होने लगा तो सैयद अहमद ने कांग्रेस पर हमला और भी तेज कर दिया। उन्होंने मुसलमानों को कांग्रेस से दूर रखने का प्रयास किया।

ई.1887 में सर सैयद ने कहा- ‘कांग्रेस में हिन्दू, बंगालियों के साथ मिलकर अपनी शक्ति बढ़ाना चाहते थे जिससे वे मुसलमानों के धर्म-विरोधी कार्यों को दबा सकें।’ सर सैयद अहमद मुसलमानों के ऐतिहासिक महत्त्व का बखान करके हिन्दुओं तथा मुसलमानों में गहरी खाई उत्पन्न करना चाहते थे ताकि मुसलमानों को पृथकतावादी राजनीति के लिये तैयार किया जा सके।

उन्होंने इस बात का प्रचार करना आरम्भ किया कि यदि प्रतिनिधि मूलक जनतांत्रिक सरकार बन गई और ब्रिटिश शासन का अन्त हो गया और सत्ता भारतीयों को हस्तांतरित कर दी गई तो हिन्दू, मुसलमानों पर शासन करेंगे। उन्होंने प्रतियोगी परीक्षाओं के समकालिक करने की कांग्रेस की मांग को मुसलमानों के हितों के विरुद्ध बताया, क्योंकि शिक्षा के क्षेत्र में मुस्लिम समुदाय काफी पिछड़ा हुआ था।

ई.1887 में उन्होंने मुसलमानों के पिछड़ेपन को लेकर लिखा- ‘जितना अनुभव और जितना विचार किया जाता है, सबका निर्णय यह निकलता है कि अब भारत के मुसलमानों को भारत की अन्य कौमों से समानता कर पाना असम्भव सा लगता है। बंगाली तो अब इतना आगे बढ़ गये कि यदि बंगाल, हिन्दुस्तान और पंजाब के मुसलमान पंख लगाकर भी उड़ें तो उनको पकड़ नहीं सकते। भारत की हिन्दू कौमों ने भी उन्नति करके मैदान में मुसलमानों को बहुत पीछे छोड़ दिया है। यदि मुसलमान दौड़कर भी चलें तो भी उनको पकड़ नहीं सकते।’

इस प्रकार सैयद अहमद ने भारत की राजनीति में साम्प्रदायिक रंग घोल दिया। उन्होंने मुसलमानों के हितों की राजनीति करने के नाम पर जिन उपायों एवं वक्तव्यों का सहारा लिया, वे राष्ट्रीय जीवन के मार्ग को अवरुद्ध करने वाले सिद्ध हुए। उनकी साम्प्रदायिक राजनीति के दो हथियार थे-

(1) ब्रिटिश राज्य के प्रति अटूट स्वामि-भक्ति और

(2) मुसलमानों की पृथक् राजनीति।

अलीगढ़ आन्दोलन ने जिस मुस्लिम बौद्धिक जागरूकता का विकास किया उससे भारतीय मुसलमानों को अपनी अलग पहचान स्थापित करने में सहायता मिली। इसी कारण आगे चलकर उन्हें राजनैतिक रूप से संगठित होने का अवसर मिला।

………… लगातार (3)

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