Saturday, June 22, 2024
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75. बलबन ने बंगाल के शासक तुगरिल खाँ को लखनौती के बाजार में फांसी पर चढ़ा दिया!

बलबन ने चालीसा मण्डल भंग कर दिया, सीमांत दुर्गों के शासकों को पकड़कर जेल में बंद कर दिया तथा दरबार में उपस्थित नहीं होने वाले सीमांत प्रदेश के शासक शेर खाँ सुंकर को जहर देकर मरवा दिया। इन सब उपायों से बलबन ने मुस्लिम अमीरों पर मजबूती से नियंत्रण स्थापित कर लिया।

बलबन ने विगत सुल्तान नासिरुद्दीन के प्रधानमंत्री रहते हुए नमक की पहाड़ियों में रहने वाले खोखर हिन्दुओं के विरुद्ध कठोर कार्यवाही की थी, तब से वहाँ पर शांति व्याप्त थी किंतु बलबन के सुल्तान बनने के बाद इस क्षेत्र के हिन्दू फिर से सिर उठाने लगे। इन दिनों नमक की पहाड़ी को ‘जूद का पहाड़’ कहते थे। बरनी ने बलबन के इस अभियान का कारण तो नहीं बताया है किंतु लिखा है कि बलबन ने उन विद्रोहियों पर आक्रमण किया तथा उनके असंख्य घोड़े लूटकर दिल्ली लौट आया।

बलबन के शासन काल के अंतिम वर्षों में एक बार फिर से नमक की पहाड़ी के क्षेत्र में हिन्दुओं ने सिर उठाया इसलिए बलबन के बड़े पुत्र मुहम्मद को इस क्षेत्र में सैनिक अभियान करना पड़ा। उसने दमरोला के शासक को जजिया देने का आदेश दिया किंतु दमरोला के शासक ने इस आदेश को मानने से मना कर दिया। बलबन का पुत्र मुहम्मद मुल्तान से सेना लेकर दमरौला पहुंचा। मुहम्मद ने दमरौला राज्य में स्थित कई पहाड़ी किलों को नष्ट कर दिया तथा सांबह नामक कस्बा पूरी तरह उजाड़ दिया। अंत में दमरौला के पहाड़ी राजा ने मुहम्मद की अधीनता स्वीकार कर ली तथा जजिया देना स्वीकार कर लिया।

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ई.1279 में बलबन बीमार पड़ा। इस समय तक वह काफी वृद्ध हो गया था। इन दिनों पश्चिमोत्तर सीमा पर मंगोलों के आक्रमण भी बढ़ गए थे। बलबन के दोनों पुत्र मुहम्मद तथा बुगरा खाँ इन आक्रमणों को रोकने में व्यस्त थे। इस स्थिति का लाभ उठाकर बंगाल के सूबेदार तुगरिल खाँ ने स्वयं को स्वतन्त्र शासक घोषित कर दिया और सुल्तान मुगसुद्दीन की उपाधि धारण की। उसने अपने नाम की मुद्राएं भी चलाईं और अपने नाम से खुतबा भी पढ़वाया। बलबन ने तुगरिल के विरुद्ध कई बार सेनाएँ भेजीं परन्तु सफलता प्राप्त नहीं हुई। अन्त में बलबन दिल्ली का प्रबन्ध कोतवाल फखरूद्दीन को सौंपकर, अपने पुत्र बुगरा खाँ तथा एक विशाल सेना के साथ बंगाल के लिए चल दिया। लगभग छः वर्ष के लगातार प्रयासों के बाद बलबन का लखनौती पर अधिकार हो सका।

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तुगरिल खाँ अपने कुछ साथियों के साथ जाजनगर के जंगलों में भाग गया। बड़ी खोज के बाद तुगरिल खाँ को पकड़ा जा सका। उसे लखनौती के बाजार में सरेआम सूली पर लटकाया गया तथा उसका सिर काटकर नदी में फेंक दिया गया। उसकी स्त्रियों तथा बच्चों को कैद कर लिया गया। सुल्तान ने तुगरिल के साथियों तथा सम्बन्धियों को बड़ा कठोर दण्ड दिया। लखनौती में तीन दिन तक निरन्तर हत्याकाण्ड चलता रहा। विद्रोहियों का दमन करने के उपरान्त बलबन ने बंगाल का शासन प्रबन्ध अपने पुत्र बुगरा खाँ को सौंप दिया। उसने शहजादे को चेतावनी दी कि यदि वह दुष्टों के कहने में आकर विद्रोह करेगा तो उसकी वही दशा होगी जो तुगरिल की हुई थी।

बलबन के शासन काल की घटनाओं को देखते हुए यह निश्चयपूर्वक कहा जा सकता है कि यद्यपि बलबन ने राज्य-विस्तार नहीं किया तथापि सल्तनत को शत्रुओं एवं विद्रोहियों से सुरक्षित रखने के लिये जो कुछ किया जाना चाहिए था, वह भलीभांति किया गया। बलबन ने सल्तनत की सुरक्षा के लिए सुसंगठित सेना की व्यवस्था की तथा सेना को अनुभवी एवं राज-भक्त मलिकों के हाथों में सौंपा। सेना में हाथियों और घोड़ों की संख्या में वृद्धि की गई और सैनिकों को जागीर के स्थान पर नकद वेतन देने पर जोर दिया गया।

बलबन के काल में प्रान्तीय गवर्नर तथा स्थानीय हाकिम अपने सैनिकों को नकद वेतन न देकर भूमि ही दिया करते थे। बलबन ने सेना को इमादुलमुल्क के नियन्त्रण में रख दिया जो योग्य तथा कर्त्तव्य-परायण अमीर था। उसे ‘दीवाने आरिज’ अर्थात् सैन्य सचिव बनाया गया। इमादुल्मुल्क ने सेना का अच्छा प्रबन्ध किया और उसमें अनुशासन स्थापित किया। बलबन ने घोड़ों को दाग लगवाने की प्रथा आरम्भ की और सैनिकों को अनुशासित बनाने के लिये उनका वेतन बढ़ा दिया। उसने अश्वसेना तथा पैदलसेना का समुचित संगठन किया। यद्यपि बलबन तथा इमादुल्मुल्क ने सेना में बड़े परिवर्तन नहीं किए परन्तु अच्छे वेतन एवं कठोर अनुशासन से सेना में नई स्फूर्ति का संचार हुआ।

बलबन के शासन काल में विद्रोहों के फूट पड़ने तथा मंगोलों के आक्रमण का सदैव भय लगा रहता था। इसलिये बलबन ने पुराने दुर्गों का जीर्णोद्धार करवाया। उसने सीमावर्ती प्रदेश में उन मार्गों पर नये दुर्गों का निर्माण करवाया जिन मार्गों से होकर मंगोल भारत पर आक्रमण किया करते थे। इन दुर्गों में योग्य तथा अनुभवी सेनापतियों के नेतृत्व में सशस्त्र सेनाएँ रखी गईं। सेनाओं को अच्छे शस्त्र उपलब्ध करवाए गए। इस प्रकार बाह्य आक्रमणों को रोकने एवं आंतरिक विद्रोहों का दमन करने के लिये बलबन ने समुचित व्यवस्था की।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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