Monday, July 22, 2024
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शिवाजी लाल किले में

शिवाजी लाल किले में वैसे ही निर्भीक दिखाई दिए जैसे रावण की सभा में कभी अंगद और हनुमान दिखाई दिए थे। अंतर केवल इतना था कि आज राक्षसराज की सभा में राजा का दूत नहीं खड़ा था, स्वयं राजा खड़ा था। औरंगजेब ने सिद्ध कर दिया कि औरंगजेब का कपट कभी कम नहीं होगा और मराठों की वीरता कभी मंद नहीं पड़ेगी।

जब तक शाहजहाँ जीवित रहा, औरंगजेब अपने राज्यारोहण का उत्सव दिल्ली के लाल किले में मनाता रहा किंतु जब 22 जनवरी 1666 को आगरा के लाल किले में औरंगजेब के दुर्भाग्यशाली पिता शाहजहाँ की बंदी अवस्था में मृत्यु हो गई तो उसके बाद औरंगजेब ने अपने राज्यारोहण का उत्सव आगरा के लाल किले में मनाने का निश्चय किया।

औरंगजेब इस उत्सव को यादगार बनाना चाहता था इसलिए उसने भारत भर से मुस्लिम सूबेदारों एवं हिन्दू राजाओं को आगरा पहुंचने के निर्देश दिए। उसने आम्बेर नरेश मिर्जाराजा जयसिंह से कहा कि यदि वह छत्रपति शिवाजी को इस उत्सव में शामिल होने के लिए राजी कर सके तो आपके लिए यह एक बड़ी उपलब्धि होगी।

अपनी शक्ति के घमण्ड में चूर दुष्ट औरंगजेब समय रहते यह नहीं समझ सका कि शिवाजी लाल किले में न आए तो ही अच्छा है।

मिर्जाराजा जयसिंह कुछ ही दिन पहले शिवाजी के हाथों बीजापुर की लड़ाई में परास्त हो गया था। इसलिए मिर्जाराजा जयसिंह ने शिवाजी को प्रसन्न करके आगरा ले जाने की योजना बनाई ताकि औरंगजेब की नाराजगी को दूर किया जा सके।

मिर्जाराजा जयसिंह ने छत्रपति से भेंट की तथा उनसे आगरा चलने का अनुरोध किया ताकि शिवाजी और औरंगजेब के बीच बरसों से चली आ रही शत्रुता को दूर किया जा सके और दक्खिन में शांति स्थापित की जा सके। पहले तो शिवाजी ने आगरा चलने से मना कर दिया किंतु जब जयसिंह ने कहा कि इस यात्रा का सम्पूर्ण व्यय एवं प्रबन्ध बादशाह की तरफ से किया जाएगा तथा शिवाजी की सुरक्षा की समूची गारण्टी महाराजा जयसिंह की होगी तो शिवाजी आगरा चलने पर सहमत हो गए।

शिवाजी ने अपनी माता जीजाबाई से विचार-विमर्श करके अपने 8 वर्षीय पुत्र सम्भाजी के साथ आगरा जाने का निर्णय लिया। 5 मार्च 1666 को शिवाजी ने अपने 200 चुने हुए अंगरक्षकों तथा 4000 सैनिकों की एक टुकड़ी के साथ रायगढ़ से आगरा के लिए प्रस्थान किया। शिवाजी की याात्रा के लिए शाही-खजाने से एक लाख रुपया दिया गया तथा पूना से आगरा तक के मुगल सूबेदारों को आज्ञा दी गई कि वे मार्ग में स्थान-स्थान पर शिवाजी का स्वागत करें।

पूरे आलेख के लिए देखें यह वी-ब्लॉग-

जब शिवाजी महाराष्ट्र से रवाना होकर आगरा जा रहे थे तो हिन्दू प्रजा में शिवाजी को देखने की होड़ मच गई। जब से शिवाजी ने अफजल खाँ को मारा था, शाइस्ता खाँ की अंगुली काटी थी, कर्तलब खाँ का सर्वस्व छीनकर जीवित छोड़ा था, फजल खाँ, रूस्तमेजा तथा सिद्दी जौहर की सेनाओं में कसकर मार लगाई थी तथा सूरत का बंदरगाह लूटा था, तब से भारत की जनता में शिवाजी के बारे में कई रहस्य और रोमांच भरे किस्से विख्यात हो चुके थे। भारत की जनता शिवाजी को हिन्दुओं एवं भारत भूमि के उद्धारक के रूप में देखती थी और मानती थी कि एक दिन शिवाजी दुष्ट औरंगजेब का भी विनाश करेंगे।

शिवाजी आगरा नहीं जाना चाहते थे किंतु मिर्जाराजा जयसिंह के दबाव में उन्होंने आगरा जाने का निर्णय ले लिया था। अब वे इस समय एवं श्रम का उपयोग हिन्दू जनता को अपने उद्देश्य एवं शक्ति का दर्शन कराने में करना चाहते थे। वे हिन्दुओं कोे बताना चाहते थे कि मुगल सर्वशक्तिमान नहीं हैं, उन्हें परास्त किया जा सकता है। आवश्यकता केवल अपने भीतर के बल को जगाने की है!

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शिवाजी ने अपने दल को भव्य रूप से व्यवस्थित किया। शिवाजी के दल में सबसे आगे एक विशाल हाथी चलता था जिस पर एक महावत गेरुए रंग का एक ध्वज फहराता हुआ चलता था। हाथी के पीछे शिवाजी के अंगरक्षकों की टुकड़ी होती थी जिनके बीच में शिवाजी की पालकी होती थी।

शिवाजी की भव्य पालकी पर सोने-चांदी के पतरे चढ़े हुए थे। इस अंगरक्षक दल के चारों ओर शिवाजी के सिपाही रहते थे और अंत में बची हुई सेना चलती थी। हर थाने एवं मुकाम पर मुगल थानेदार, सूबेदार और सरकारी कर्मचारी शिवाजी की सेवा में उपस्थित होकर उनका स्वागत करते थे। सैंकड़ों वर्षों से पददलित हिन्दू जनता शिवाजी के दर्शनों के लिए दीवानी हुई जा रही थी।

हर कोई शिवाजी को अपनी आंखों से देखना चाहता था। शिवाजी ने जनता की छटपटाहट को पहचाना और जनता को समुचित सम्मान दिया। जो लोग, शिवाजी के दर्शन करना चाहते थे, उन्हें शिवाजी से मिलने का पूरा अवसर दिया जाता था।

इस प्रकार शान से चलता हुआ, हिन्दू प्रजा के हृदयों को जीतता हुआ और मुगलों में भय उत्पन्न करता हुआ जीजा का पुत्र और समर्थ गुरु रामदास का शिष्य शिवा 12 मई 1666 को आगरा नगर के मुख्य द्वार पर पहुंच गया। जब शिवाजी का जुलूस आगरा पहुंचा तो समूचे आगरा में धूम मच गई।

हजारों लोग आगरा शहर के प्रवेश द्वार से लेकर लाल किले तक के मार्ग के दोनों तरफ आकर खड़े हो गए। जगह-जगह स्वागत द्वार बनाए गए। जनता जैसे भूल ही गई कि वह औरंगजेब की प्रजा है न कि छत्रपति शिवाजी की। ये सारे समाचार औरंगजेब तक पहुंचाए जा रहे थे जिन्हें सुन-सुनकर औरंगजेब मन ही मन कुढ़ रहा था।

औरंगजेब इतनी बड़ी सल्तनत का एकच्छत्र स्वामी था किंतु जनता ने कभी भी उसका ऐसा स्वागत-सत्कार नहीं किया था किंतु एक छोटे से जमींदार के स्वागत में जनता सड़कों पर बिछ गई थी जो दूर देश का रहने वाला था और जिसे आगरा में किसी ने आज से पहले देखा भी नहीं था। औरंगजेब को बार-बार लग रहा था कि उसने शिवाजी को आगरा में बुलाकर गलती की किंतु अब कुछ नहीं हो सकता था, अब तो शिवाजी आगरा में घुस चुके थे और अपने भगवा झण्डे के साथ लाल किले की तरफ बढ़ रहे थे।

मिर्जाराजा जयसिंह का पुत्र रामसिंह कच्छवाहा, शिवाजी को उसी दिन दरबारे आम में बादशाह के समक्ष प्रस्तुत करना चाहता था किंतु आगरा में प्रवेश के समय शिवाजी के स्वागत-सत्कार में काफी समय लग गया, तब तक औरंगजेब दरबारे आम से उठकर, दरबारे खास में जाकर बैठ गया। एक तरह से औरंगजेब का दरबारे आम में शिवाजी से भेंट नहीं करना ठीक ही रहा क्योंकि अवश्य ही वहाँ उपस्थित जनता औरंगजेब का भय भूलकर छत्रपति की जय-जयकार करने लगती जो कि औरंगजेब के जीवन में सबसे बुरा दिन होता।

अगले दिन शिवाजी लाल किले में उपस्थित हुए। औरंगजेब के बख्शी असद खाँ ने शिवाजी को दरबारे खास में बादशाह के समक्ष प्रस्तुत किया। शिवाजी का किसी भी तरह आगरा चले आना, औरंगजेब की बहुत बड़ी विजय थी किंतु वह शिवाजी के स्वागत-सत्कार से जल-भुन गया था।

इसलिए औरंगजेब पहली ही भेंट में शिवाजी का मानमर्दन करके उन्हें अपनी शक्ति का परिचय दे-देना चाहता था। उस कुटिल अभिमानी बादशाह को एक हिन्दू राजा का अपमान करने के सौ तरीके आते थे तथा वह दुष्टता का कोई अवसर हाथ से नहीं जाने देता था।

शिवाजी ने बादशाह को एक हजार मोहरें तथा दो हजार रुपए नजर किए तथा 5000 रुपए निसार के तौर पर दिए। शिवाजी के नौ वर्षीय पुत्र सम्भाजी ने औरंगजेब को पांच हजार मोहरें और एक हजार रुपए नजर किए एवं 2 हजार रुपए निसार के तौर पर प्रस्तुत किए। औरंगजेब ने उन उपहारों की तरफ देखा तक नहीं। उसने शिवाजी एवं सम्भाजी से एक भी शब्द नहीं कहा तथा न ही शिवाजी की कुशल-क्षेम पूछी। बख्शी ने शिवाजी को ले जाकर पांच हजारी मनसबदारों की पंक्ति में महाराजा जसवंतसिंह के पीछे ले जाकर खड़ा कर दिया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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