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मेवों के सिर के बदले बलबन ने चांदी के सिक्के दिए (72)

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मेवों के सिर - www.bharatkaitihas.com
मेवों के सिर के बदले बलबन ने चांदी के सिक्के दिए

प्रत्येक अफगान सैनिक सौ-सौ मेवों के सिर काटकर लाया। मल्का को भी उसके परिवार के 250 सदस्यों के साथ बंदी बनाया गया। बलबन ने मल्का से 142 घोड़े तथा 30 हजार टंके छीन लिए।

बलबन ने सल्तनत को मजबूती देने के लिए विद्रोहियों एवं अपने विरोधियों को दण्ड देने में कोई संकोच नहीं किया। एक ओर तो उसने मुस्लिम अमीरों पर कड़ाई से शिकंजा कसा तो दूसरी ओर विद्रोही हिन्दू जनता का क्रूरता से दमन किया।

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यद्यपि ई.1175 में मुहम्मद गौरी के भारत पर प्रथम आक्रमण से लेकर ई.1266 में बलबन के सुल्तान बनने तक गजनी के मुसलमानों द्वारा उत्तरी भारत के हिन्दू राजाओं का दमन करते हुए लगभग 100 साल का समय हो चुका था तथापि हिन्दू राजाओं, सरदारों तथा भूमिपतियों को नियन्त्रित रखना किसी समस्या से कम नहीं था। रजिया से लेकर नासिरुद्दीन के काल तक दो-आब, राजपूताना, बुन्देलखंड, बघेलखंड और मालवा में राजपूतों के कई स्वतन्त्र राज्य स्थापित हो गए थे। जियाउद्दीन बरनी ने इस काल की दिल्ली सल्ततन की दुर्दशा का वर्णन करते हुए लिखा है कि- ‘सुल्तान शम्सुद्दीन की मृत्यु के पश्चात् 30 वर्ष की संक्षिप्त अवधि में शम्सुद्दीन के पुत्रों की अनुभवशून्यता के कारण तथा शम्सी गुलामों द्वारा सुल्तान से प्रभुत्व छीन लिए जाने के कारण, सल्तनत में रहने वाले हिन्दू अभिमानी, अवज्ञाकारी एवं उद्दण्ड हो गए थे। जबकि सुल्तान शम्सुद्दीन के पुत्र इधर-उधर लोगों का सहारा ढूंढते, प्रत्येक सहायक का आश्रय लेते और अपने स्वार्थ के अनुसार जीवन व्यतीत करते थे। उलिल अम्री का भय जिसके आधार पर संसार तथा राज्य की शोभा निर्भर करती है, हिन्दुओं के हृदय से निकल चुका था।’

सल्तनत की सुरक्षा के लिए इन विद्रोही हिन्दू सरदारों एवं हिन्दू जनता का दमन करना नितान्त आवश्यक था। अतहर अब्बास रिजवी ने अपनी पु़स्तक ‘तुर्ककालीन भारत’ में जियाउद्दीन बरनी के हवाले से लिखा है- ‘बलबन ने राजपूताने तथा अन्य क्षेत्रों के शक्तिशाली हिन्दुओं से व्यर्थ में छेड़छाड़ न करने और उनके प्रति आक्रमण नीति की अपेक्षा अपने राज्य को मंगेालों से बचाने के प्रयत्न को ही श्रेयस्कर समझा।’

बलबन ने दिल्ली के निकटवर्ती क्षेत्रों में निवास करने वाले मेवों, दो-आब के हिन्दू विद्रोहियों, कटेहर के हिन्दुओं तथा अवध क्षेत्र के हिन्दुओं का बड़ी क्रूरता से दमन किया। बलबन की इस नीति के सबसे पहले शिकार मेव हुए। उस काल में भरतपुर, अलवर, मथुरा एवं गुड़गांव के क्षेत्र में हिन्दुओं की मेव जाति निवास करती थी। माना जाता है कि वे मीणों में से ही निकले थे किंतु विद्रोही प्रवृत्ति के होने के कारण उन्होंने दिल्ली के चारों ओर लूटमार मचा रखी थी। इस कारण व्यापारियों का दिल्ली से बाहर निकलना असंभव सा हो गया था।

जियाउद्दीन बरनी (ई1285-1357) ने मेवों के विषय पर दिल्ली के सुल्तानों से नाराजगी व्यक्त करते हुए लिखा है- ‘सुल्तान शम्सुद्दीन के बड़े पुत्रों की युवा-अवस्था, असावधानी, मदिरापान और भोग विलासिता एवं सुल्तान शम्सुद्दीन के छोटे पुत्र नासिरुद्दीन की अयोग्यता के कारण दिल्ली के निकट के मेव बड़े शक्तिशाली बन बैठे थे। वे प्रायः रात्रि में नगर पर धावा बोल देते और घरों को तहस-नहस कर डालते। वे जन साधारण को बहुत कष्ट पहुंचाते।’

गियासुद्दीन बलबन (ई.1266-86) के शासनकाल में मेव हिन्दू थे और आगे चलकर फीरोजशाह तुगलक (ई.1351-88) के शासन काल में अर्थात् चौदहवीं सदी के उत्तरार्ध में मुसलमान बने। बलबन कालीन मुस्लिम लेखकों ने मेव लोगों के क्षेत्र को ‘मेव-कोहपाया’ लिखा है।

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उस काल में दिल्ली के नागरिकों को मेवों के उत्पात के भय से रात में नींद नहीं आती थी। दिल्ली के आसपास के मेवों की लूटमार के भय से पश्चिमी दिशा के द्वार शाम की नमाज के पश्चात् बंद कर लिए जाते था। किसी को इस बात का साहस नहीं होता था कि शाम की नमाज के बाद घर से बाहर निकल सके।

बहुत से मेव शाम की नमाज के पश्चात् ही ‘हौजेरानी’ अर्थात् सुल्तान के महल के निकट पहुंच जाते। भिश्तियों, पानी भरने वाली दासियों को परेशान करते और उन्हें नंगा कर देते। उनके कपड़े छीन लेते। आस-पास के मेवों के कारण दिल्ली में हलचल मच गई थी।

जियाउद्दीन बरनी ने लिखा है- ‘मल्का नामक मेव के नेतृत्व में मेवों ने हांसी की तरफ से सेना के लिए ले जाए जाने वाले शाही गल्ले को भूतों के समान झपट कर ऊंटों एवं गुलामों को छीन लिया और उन्हें कोहपाया से लेकर रणथंभौर तक के हिन्दुओं में बांट दिया। उस काल में रसद सामग्री को गल्ला कहा जाता था।’

बलबन उस समय तो मेवों के विरुद्ध कुछ नहीं कर सका क्योंकि वह मंगोलों से उलझा हुआ था किंतु जब मंगोल सिंध छोड़कर भाग गए तो बलबन ने 10 हजार सैनिकों के साथ कोहपाया के मेवों के विरुद्ध भयानक अभियान किया। बलबन की सेना में 3 हजार अफगान लड़ाके थे जिन्होंने तेजी से आगे बढ़कर मेवों को सफाया करना आरम्भ किया।

बलबन ने अपने सैनिकों को आदेश दिया कि वे मेवों के सिर काटकर लाएं, प्रत्येक सिर के बदले चांदी के दो टंके दिए जाएंगे। मिनहाज उस् सिराज ने लिखा है- ‘प्रत्येक अफगान सैनिक सौ-सौ मेवों के सिर काटकर लाया। मल्का को भी उसके परिवार के 250 सदस्यों के साथ बंदी बनाया गया। बलबन ने मल्का से 142 घोड़े तथा 30 हजार टंके छीन लिए।’

हौजेरानी के निकट बहुत से मेवातियों को हाथी के पैरों तले कुचला गया, कुछ को काट डाला गया तथा कुछ की खाल खिंचवा कर भूसा भरवा दिया गया। बलबन की सेना ने मेवों के नगरों तथा गाँवों को जलाकर उन जंगलों को साफ कर दिया जिनमें वे शरण लिया करते थे। इस प्रकार बलबन ने दिल्ली के चारों ओर के मार्ग निरापद कर दिए।

बलबन के अत्याचारों से भी मेवों का हौंसला नहीं टूटा तथा कुछ ही वर्षों में वे दिल्ली तक धावे मारने लगे। उस समय तक बलबन बहुत बूढ़ा हो चुका था और मेवों के विरुद्ध पहले जैसी कार्यवाही करने में सक्षम नहीं रहा था!

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

बलबन की क्रूरता (73)

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बलबन की क्रूरता - www.bharatkaitihas.com
बलबन की क्रूरता

बलबन की क्रूरता के आगे तैमूरलंग और नादिरशाह की तलवारों की चमक फीकी पड़ गई। बलबन ने नागरिक बस्तियों में आग लगवा कर उन्हें नष्ट कर दिया।

गंगा-यमुना के दो-आब क्षेत्र के लोग युगों से स्वातंत्र्यप्रिय थे। इस क्षेत्र के राजा भले ही  गजनी के आक्रांताओं से युद्धों में हार गए थे किंतु इस क्षेत्र की हिन्दू प्रजा अपेक्षाकृत सम्पन्न होने के कारण मुस्लिम सैनिकों का विरोध करती थी और कर चुकाने से मना करती थी। दिल्ली के सुल्तानों ने दो-आब के विद्रोहों को दबाने के कई प्रयास किए थे किंतु ये लोग अवसर पाते ही सिर उठा लेते थे।

बलबन ने दो-आब के विद्रोहियों को दण्ड देने के लिए मेवात में की गई कार्यवाही से भिन्न प्रकार की नीति अपनाई। इसका कारण यह था कि मेवात के लोग लुटेरी प्रवृत्ति के थे जबकि गंगा-यमुना के लोग सम्पन्न थे। इस कारण गंगा-यमुना के लोगों को दबाना आसान नहीं था।

इसलिए बलबन उनके स्त्री-बच्चों को पकड़कर दिल्ली ले आया। सुल्तान द्वारा की गई इस कार्यवाही के कारण दो-आब के अधिकांश लोग स्वतः ही शांत होकर बैठ गए। बलबन ने दो-आब को कई खण्डों में विभक्त करके इन खण्डों में अफगान सैनिकों की छावनियाँ स्थापित कर दीं। बलबन की क्रूरता किसी अन्य क्रूर सुल्तान या बादशाह की क्रूरता से कम नहीं थी।

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जिस समय बलबन दो-आब में विद्रोहियों का दमन कर रहा था, उन्हीं दिनों कटेहर (रूहेलखण्ड) में उत्पात आरम्भ हो गया। बदायूं तथा अमरोहा के मुस्लिम गवर्नर कटेहर के हिन्दुओं का दमन करने में विफल रहे। इस पर बलबन स्वयं एक विशाल सेना लेकर कटेहर गया। उसने दिल्ली से रवाना होते समय सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित किया कि वह शिकार खेलने के लिए जा रहा है। इसके बाद वह दो रात और तीन दिन में तेजी से चलता हुआ गंगा नदी पार करके अचानक ही कटेहर में प्रविष्ट हुआ।

बलबन ने पांच हजार धनुर्धारी अश्वारोहियों को आगे करके कटेहर को घेर लिया। इन धनुर्धारियों ने कटेहर-वासियों पर अंधाधुंध तीरों की बरसात कर दी जिससे बड़ी संख्या में नागरिक मारे गए। बलबन की क्रूरता का कोई हिसाब नहीं था।

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बलबन ने नागरिक बस्तियों में आग लगवा कर उन्हें नष्ट कर दिया। उनकी स्त्रियों तथा बच्चों को बन्दी बना लिया और 7 वर्ष से अधिक आयु वाले लड़कों एवं पुरुषों की नृशंसतापूर्वक हत्या कर दी। डॉ. अशोकुमार सिंह ने लिखा है कि- ‘इस भीषण नरसंहार के आगे तैमूर एवं नादिरशाह की रक्तपिपासु तलवार की चमक भी फीकी पड़ जाए।’ इस भीषण नरमेध से कटेहर का विद्रोह शान्त हो गया तथा जब तक दिल्ली सल्तनत अस्तित्व में रही, कटेहर (रूहेलखण्ड) में विद्रोह नहीं हुआ। अब बलबन अवध के हिन्दू विद्रोहियों के विरुद्ध कार्यवाही करने के लिए रवाना हुआ। बलबन ने अपनी सेना के साथ कम्पिल तथा पटियाली में छः-छः महीने तक अपना शिविर लगाया। उसने कम्पिल, पटियाली, भोजपुर तथा जलाली में नए किले एवं मस्जिदें बनवाईं। इन किलों में अफगानी सैनिकों को नियुक्त कर दिया और उन्हें उन्हीं क्षेत्रों में बड़े भूखण्ड दे दिए ताकि इन अफगानी सैनिकों के परिवार वहीं पर रहकर हिन्दू विद्रोहियों का मुकाबला कर सकें। इस कार्यवाही के बाद इस क्षेत्र में कुछ समय के लिए शांति हो गई। बलबन की इस कार्यवाही की प्रशंसा करते हुए जियाउद्दीन बरनी ने लिखा है- ‘हिन्दुस्तान के मार्ग खुले हैं तथा लुटेरे डाकुओं का अंत हो चुका है।’

बरनी के विपरीत बरनी के ही समकालीन विदेशी यात्री इब्नबतूता ने इन प्रदेशों में की गई यात्राओं के संस्मरणों में जलाली के खतरनाक मार्ग और वहाँ के हिन्दू लुटेरों के बारे में भयाक्रांत वर्णन किया है। इससे स्पष्ट होता है कि बलबन द्वारा अवध के क्षेत्र में जो शांति स्थापित की गई थी, वह अल्पकालिक सिद्ध हुई।

जिन दिनों बलबन भारत के हिन्दुओं को कुचलने में लगा हुआ था, उस काल में मंगोलों ने अवसर पाकर सिन्धु नदी के पूर्वी प्रदेश पर अधिकार कर लिया। पंजाब का अधिकांश भाग भी उन्हीं के अधीन चला गया।

जियाउद्दीन बरनी लिखता है कि व्यास नदी ही अब दिल्ली सल्तनत की पश्चिमी सीमा थी और नदी के उस-पार का सम्पूर्ण प्रदेश मंगोलों के अधिकार में था। बलबन के लिये यह संभव नहीं था कि वह पंजाब से मंगोलों को निष्कासित कर सके। इसलिये उसने मंगोलों को व्यास-रावी के दो-आब में रोके रखने की व्यवस्था की।

बलबन ने लाहौर के दुर्ग की मरम्मत करवा कर उसमें एक बड़ी सेना रख दी। ई.1271 में बलबन स्वयं लाहौर गया और उसने उन किलों की मरम्मत करवाई जिन्हें मंगोलों ने नष्ट-भ्रष्ट कर दिया था।

बलबन ने सीमान्त प्रदेश को तीन भागों में विभक्त कर दिया और प्रत्येक भाग में एक अधिकारी नियुक्त किया। एक क्षेत्र में तातार खाँ को, दूसरे में शहजादे मुहम्मद को और तीसरे में शहजादे बुगरा खाँ को नियुक्त किया। इन समस्त क्षेत्रों में चुने हुए सैनिक रखे गए। राजधानी दिल्ली में भी एक विशाल सेना सदैव विद्यमान रहती थी।

मंगोलों ने कई बार व्यास को पार करके आगे बढ़ने का प्रयत्न किया किंतु बलबन के सेनापतियों ने उनके समस्त प्रयत्न निष्फल कर दिए। मुसलमान लेखकों ने बलबन की क्रूरता का कोई उल्लेख नहीं किया है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

बलबन का चित्तौड़ अभियान (74)

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बलबन का चित्तौड़ अभियान

बलबन ने रजिया सुल्ताना की तरह राजस्थान के बड़े हिन्दू राजाओं से दूर ही रहने की नीति अपनाई किंतु बलबन का चित्तौड़ अभियान इसका अपवाद था। बलबन का चित्तौड़ अभियान गुजरात तक पहुंचने के लिए हुआ था।

गियासुद्दीन बलबन द्वारा दिल्ली के निकट रहने वाले मेवों, गंगा-यमुना दो-आब के किसानों और अवध तथा कटेहर के हिन्दुओं के विरुद्ध क्रूरता पूर्वक कार्यवाही करके राज्य में शांति स्थापित करने का प्रयास किया गया किंतु शीघ्र ही उसने अनुभव किया कि चालीसा मण्डल के अमीरों तथा मुस्लिम प्रांतपतियों के विरुद्ध भी कठोर कार्यवाही किए जाने की आवश्यकता है।

बलबन ने अनुभव किया कि सुल्तान की निरंकुशता के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा तुर्की अमीर थे जिनका नेतृत्व चालीसा मण्डल के हाथों में था। प्रमुख तुर्की अमीरों के इस मण्डल ने पूर्ववर्ती सुल्तानों को अपने हाथों की कठपुतली बना लिया था। बलबन ने सुल्तान तथा उसके उत्तराधिकारियों का भविष्य सुरक्षित करने के लिये चालीस सरदारों के इस मण्डल को नष्ट करने का निश्चय किया।

बलबन ने अपने व्यक्तिगत सेवकों का नया दल बनाया और उन्हें ऊँचे पदों पर नियुक्त किया। उसने रक्त की शुद्धता तथा तुर्कों की श्रेष्ठता को आधार बनाकर उन लोगों को दरबार से निकाल बाहर किया जिन्होंने हिन्दू-धर्म का परित्याग करके और इस्लाम ग्रहण करके राज्य में ऊँचे पद प्राप्त कर लिये थे।

बलबन ने ऐसे लोगों को भी हटा दिया जिनके वंश के विषय में किसी प्रकार का सन्देह था। उसने चालीसा मण्डल के अमीरों में से जो दुर्बल तथा अयोग्य हो गए थे, उन्हें गुजारा-भत्ता देकर घर बैठा दिया। अमीरों की विधवाओं तथा उनके बच्चों के लिए भी गुजारा-भत्ता निश्चित कर दिया।

बलबन ने केवल युवकों को ही राज्य की सेवा में रखा और कार्य तथा योग्यता के अनुसार उनका वेतन निश्चित किया। चालीसा मण्डल की समाप्ति बलबन की सबसे बड़ी सफलता कही जा सकती है जिसके कारण वह लगभग 21 साल तक दिल्ली पर निर्विघ्न शासन कर सका।

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दिल्ली के चालीसा मण्डल के अमीरों पर नियन्त्रण करने के उपरान्त बलबन ने सल्तनत के मुस्लिम प्रान्तपतियों की ओर ध्यान दिया। उसने विद्रोही प्रांतपतियों को नष्ट कर दिया। शम्सी सरदारों में उन दिनों सबसे अधिक प्रबल शेर खाँ सुंकर था जो सीमान्त प्रदेश का शासक था। बलबन की ‘शम्सी विरोधी नीति’ से वह अत्यन्त शंकित तथा आतंकित हो गया और सुल्तान से मिलने के लिए दिल्ली नहीं आया।

बलबन ने शेर खाँ सुंकर को दरबार में उपस्थित होने के लिये आदेश भेजा। शेर खाँ चार वर्ष तक आनाकानी करता रहा। अन्त में बलबन ने उसे विष दिलवाकर उसकी हत्या करवा दी। बलबन ने शेर खाँ के स्थान पर बंगाल के हाकिम तातार खाँ को और तातार खाँ के स्थान पर तुगरिल बेग को बंगाल का सूबेदार नियुक्त कर दिया।

सीमान्त प्रदेश के दुर्गों के शासकों में परस्पर विद्वेष था। बलबन ने उन्हें यह आरोप लगाकर बंदीगृह में डाल दिया कि उन्होंने अपने कार्य में असावधानी बरती है। अवध का इक्तादार अमीन खाँ बंगाल के आक्रमण में विफल होकर लौटा तो बलबन ने उसे मृत्युदण्ड देकर उसका शव अयोध्या के फाटक पर लटकवा दिया।

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इसी प्रकार अवध के इक्तादार हैबात खाँ को अपने एक गुलाम की हत्या कर देने के अपराध में बलबन ने उसे 500 कोड़े लगावाये। सुल्तान के आदेश से बदायूं के सूबेदार मलिक बकबक को जनसाधारण के सम्मुख कोड़ों से पीटा गया क्योंकि उसने एक गुलाम को कोड़ों से पीट-पीटकर मार डाला था। बलबन ने रजिया सुल्तान की ही भांति प्रबल हिन्दू राजाओं से दूर रहने की नीति अपनाई ताकि वह अपने अमीरों पर कड़ाई से नियंत्रण रख सके, मंगोलों के विरुद्ध पूरी शक्ति झौंक सके और मेवों, गंगा-यमुना के दो-आब के विद्रोही किसानों, कटेहर के हिन्दू विद्रोहियों, अवध के विद्रोही हिन्दू सामंतों तथा बंगाल के विद्रोही मुस्लिम शासकों के विरुद्ध कार्यवाही कर सके। बलबन जानता था कि यदि उसने इतने सारे शत्रुओं के रहते बड़े राजपूत राजाओं से भी छेड़खानी की तो वह अपने किसी भी शत्रु का दमन नहीं कर पाएगा तथा उसका राज्य लड़खड़ा जाएगा। बलबन पूरी जिंदगी इसी नीति पर चलता रहा किंतु उसका चित्तौड़ अभियान इसका अपवाद था। उसने ई.1267-68 में चित्तौड़ के विरुद्ध अभियान किया। तत्कालीन लेखक  ऐसामी ने इस अभियान का उल्लेख तो किया है किंतु इसके परिणामों का उल्लेख नहीं किया है।

इससे प्रतीत होता है कि बलबन का चित्तौड़ अभियान विफल रहा तथा चित्तौड़ के गुहिलों ने एक बार फिर दिल्ली सल्तनत के सुल्तानों में कसकर मार लगाई थी।

पाठकों को स्मरण होगा कि चित्तौड़ का शासक रावल जैत्रसिंह भी इल्तुतमिश में तगड़ी मार लगा चुका था जिसके कारण इल्तुतमिश ने राजस्थान और गुजरात की तरफ देखना बंद कर दिया था।

बलबन के चित्तौड़ अभियान का वास्तविक कारण यह था कि बलबन वस्तुतः गुजरात पर अभियान करना चाहता था ताकि वहाँ की सम्पदा लूटकर सल्तनत की आर्थिक स्थिति सुधार सके। दिल्ली से गुजरात जाने के लिए चित्तौड़ होकर जाना सुगम था, इसलिए बलबन को चित्तौड़ पर अभियान करना पड़ा किंतु चित्तौड़ के रावल समरसिंह ने बलबन की सेना में कसकर मार लगाई और उसे दिल्ली की तरफ भाग जाने पर विवश कर दिया।

संभवतः इसी अभियान को इसामी ने बलबन का चित्तौड़ अभियान लिखा जबकि रावल समरसिंह के आबू शिलालेख में इसे म्लेच्छ सेना का गुजरात अभियान लिखा गया है। संभवतः इसी पराजय के बाद बलबन ने यह नीति अपनाई कि वह राजपूताने के राजपूत राजाओं से उलझने की बजाय अपनी सल्तनत के उन हिस्सों पर मजबूती पर शिकंजा कसे, जो कुतुबुद्दीन ऐबक एवं इल्तुतमिश के समय में दिल्ली सल्तनत के अधीन हो चुके थे।

इस काल में चंदेल इतने शक्तिशाली नहीं थे फिर भी बलबन ने कई बार अपनी सेना कालिंजर के दुर्ग पर भेजी किंतु बलबन की सेना चंदेलों पर विजय प्राप्त नहीं कर सकी तथा कालिंजर दुर्ग हिन्दुओं के पास बना रहा। नरवर के जज्वपेल शासक भी बलबन से लड़ते रहे तथा बलबन की सेना नरवर के राजपूतों पर भी निर्णायक विजय प्राप्त नहीं कर सकी।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

तुगरिल खाँ को फांसी पर चढ़ा दिया बलबन ने (75)

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तुगरिल खाँ - www.bharatkaitihas.com
तुगरिल खाँ को फांसी पर चढ़ा दिया बलबन ने

तुगरिल खाँ अपने कुछ साथियों के साथ जाजनगर के जंगलों में भाग गया। बड़ी खोज के बाद तुगरिल खाँ को पकड़ा जा सका। उसे लखनौती के बाजार में सरेआम सूली पर लटकाया गया तथा उसका सिर काटकर नदी में फेंक दिया गया। उसकी स्त्रियों तथा बच्चों को कैद कर लिया गया।

बलबन ने चालीसा मण्डल भंग कर दिया, सीमांत दुर्गों के शासकों को पकड़कर जेल में बंद कर दिया तथा दरबार में उपस्थित नहीं होने वाले सीमांत प्रदेश के शासक शेर खाँ सुंकर को जहर देकर मरवा दिया। इन सब उपायों से बलबन ने मुस्लिम अमीरों पर मजबूती से नियंत्रण स्थापित कर लिया।

बलबन ने विगत सुल्तान नासिरुद्दीन के प्रधानमंत्री रहते हुए नमक की पहाड़ियों में रहने वाले खोखर हिन्दुओं के विरुद्ध कठोर कार्यवाही की थी, तब से वहाँ पर शांति व्याप्त थी किंतु बलबन के सुल्तान बनने के बाद इस क्षेत्र के हिन्दू फिर से सिर उठाने लगे।

इन दिनों नमक की पहाड़ी को ‘जूद का पहाड़’ कहते थे। बरनी ने बलबन के इस अभियान का कारण तो नहीं बताया है किंतु लिखा है कि बलबन ने उन विद्रोहियों पर आक्रमण किया तथा उनके असंख्य घोड़े लूटकर दिल्ली लौट आया।

बलबन के शासन काल के अंतिम वर्षों में एक बार फिर से नमक की पहाड़ी के क्षेत्र में हिन्दुओं ने सिर उठाया इसलिए बलबन के बड़े पुत्र मुहम्मद को इस क्षेत्र में सैनिक अभियान करना पड़ा। उसने दमरोला के शासक को जजिया देने का आदेश दिया किंतु दमरोला के शासक ने इस आदेश को मानने से मना कर दिया।

बलबन का पुत्र मुहम्मद मुल्तान से सेना लेकर दमरौला पहुंचा। मुहम्मद ने दमरौला राज्य में स्थित कई पहाड़ी किलों को नष्ट कर दिया तथा सांबह नामक कस्बा पूरी तरह उजाड़ दिया। अंत में दमरौला के पहाड़ी राजा ने मुहम्मद की अधीनता स्वीकार कर ली तथा जजिया देना स्वीकार कर लिया।

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ई.1279 में बलबन बीमार पड़ा। इस समय तक वह काफी वृद्ध हो गया था। इन दिनों पश्चिमोत्तर सीमा पर मंगोलों के आक्रमण भी बढ़ गए थे। बलबन के दोनों पुत्र मुहम्मद तथा बुगरा खाँ इन आक्रमणों को रोकने में व्यस्त थे। इस स्थिति का लाभ उठाकर बंगाल के सूबेदार तुगरिल खाँ ने स्वयं को स्वतन्त्र शासक घोषित कर दिया और सुल्तान मुगसुद्दीन की उपाधि धारण की। उसने अपने नाम की मुद्राएं भी चलाईं और अपने नाम से खुतबा भी पढ़वाया।

बलबन ने तुगरिल खाँ के विरुद्ध कई बार सेनाएँ भेजीं परन्तु सफलता प्राप्त नहीं हुई। अन्त में बलबन दिल्ली का प्रबन्ध कोतवाल फखरूद्दीन को सौंपकर, अपने पुत्र बुगरा खाँ तथा एक विशाल सेना के साथ बंगाल के लिए चल दिया। लगभग छः वर्ष के लगातार प्रयासों के बाद बलबन का लखनौती पर अधिकार हो सका।

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तुगरिल खाँ अपने कुछ साथियों के साथ जाजनगर के जंगलों में भाग गया। बड़ी खोज के बाद तुगरिल खाँ को पकड़ा जा सका। उसे लखनौती के बाजार में सरेआम सूली पर लटकाया गया तथा उसका सिर काटकर नदी में फेंक दिया गया। उसकी स्त्रियों तथा बच्चों को कैद कर लिया गया। सुल्तान ने तुगरिल के साथियों तथा सम्बन्धियों को बड़ा कठोर दण्ड दिया। लखनौती में तीन दिन तक निरन्तर हत्याकाण्ड चलता रहा। विद्रोहियों का दमन करने के उपरान्त बलबन ने बंगाल का शासन प्रबन्ध अपने पुत्र बुगरा खाँ को सौंप दिया। उसने शहजादे को चेतावनी दी कि यदि वह दुष्टों के कहने में आकर विद्रोह करेगा तो उसकी वही दशा होगी जो तुगरिल की हुई थी। बलबन के शासन काल की घटनाओं को देखते हुए यह निश्चयपूर्वक कहा जा सकता है कि यद्यपि बलबन ने राज्य-विस्तार नहीं किया तथापि सल्तनत को शत्रुओं एवं विद्रोहियों से सुरक्षित रखने के लिये जो कुछ किया जाना चाहिए था, वह भलीभांति किया गया। बलबन ने सल्तनत की सुरक्षा के लिए सुसंगठित सेना की व्यवस्था की तथा सेना को अनुभवी एवं राज-भक्त मलिकों के हाथों में सौंपा। सेना में हाथियों और घोड़ों की संख्या में वृद्धि की गई और सैनिकों को जागीर के स्थान पर नकद वेतन देने पर जोर दिया गया।

बलबन के काल में प्रान्तीय गवर्नर तथा स्थानीय हाकिम अपने सैनिकों को नकद वेतन न देकर भूमि ही दिया करते थे। बलबन ने सेना को इमादुलमुल्क के नियन्त्रण में रख दिया जो योग्य तथा कर्त्तव्य-परायण अमीर था। उसे ‘दीवाने आरिज’ अर्थात् सैन्य सचिव बनाया गया।

इमादुल्मुल्क ने सेना का अच्छा प्रबन्ध किया और उसमें अनुशासन स्थापित किया। बलबन ने घोड़ों को दाग लगवाने की प्रथा आरम्भ की और सैनिकों को अनुशासित बनाने के लिये उनका वेतन बढ़ा दिया। उसने अश्वसेना तथा पैदलसेना का समुचित संगठन किया। यद्यपि बलबन तथा इमादुल्मुल्क ने सेना में बड़े परिवर्तन नहीं किए परन्तु अच्छे वेतन एवं कठोर अनुशासन से सेना में नई स्फूर्ति का संचार हुआ।

बलबन के शासन काल में विद्रोहों के फूट पड़ने तथा मंगोलों के आक्रमण का सदैव भय लगा रहता था। इसलिये बलबन ने पुराने दुर्गों का जीर्णोद्धार करवाया। उसने सीमावर्ती प्रदेश में उन मार्गों पर नये दुर्गों का निर्माण करवाया जिन मार्गों से होकर मंगोल भारत पर आक्रमण किया करते थे।

इन दुर्गों में योग्य तथा अनुभवी सेनापतियों के नेतृत्व में सशस्त्र सेनाएँ रखी गईं। सेनाओं को अच्छे शस्त्र उपलब्ध करवाए गए। इस प्रकार बाह्य आक्रमणों को रोकने एवं आंतरिक विद्रोहों का दमन करने के लिये बलबन ने समुचित व्यवस्था की।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

बलबन का राजत्व सिद्धान्त (76)

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बलबन का राजत्व सिद्धान्त - www.bharatkaitihas.com
बलबन का राजत्व सिद्धान्त

दिल्ली सल्तनत के इतिहास में बलबन का राजत्व सिद्धान्त बहुत प्रसिद्ध है। यह देखकर आश्चर्य होता है कि एक अनपढ़, क्रूर तुर्की गुलाम राजत्व के ऐसे ऊचे आदर्श एवं सिद्धांत गढ़ पाया जैसे बड़े-बड़े बादशाह नहीं गढ़ पाते हैं।

गियासुद्दीन बलबन ने सल्तनत को स्थाई, सुल्तान को प्रभावशाली तथा सरकार को मजबूत बनाने के लिये कुछ आदर्शों का का निर्माण किया। इन आदर्शों को ही भारत के इतिहास में बलबन का राजत्व सिद्धान्त कहते हैं। यद्यपि बलबन एक खान के घर पैदा हुआ तथा उसका बचपन गुलाम के रूप में बीता तथापि बलबन का यौवन सुल्तानों के सान्निध्य में बीता था।

इस कारण बलबन सुल्तान एवं सल्तनत की कमजोरियों एवं शक्तियों दोनों के बारे में अच्छी तरह जानता था। इसी कारण वह राजत्व के सिद्धांतों का निर्माण कर सका। बलबन ने राजत्व के सिद्धांतों की जानकारी अपने बड़े शहजादे मुहम्मद को एक आदेश के रूप में दी।

बलबन का राजत्व सिद्धान्त इस मूलमंत्र पर आधारित था कि सुल्तान इस पृथ्वी पर अल्लाह का प्रतनिधि है और उसके कार्यों से सर्वशक्तिमान अल्लाह की मर्यादा दिखाई देनी चाहिये। उसका मानना था कि सुल्तान को रसूल की विशेष कृपा प्राप्त रहती है जिससे अन्य लोग वंचित रहते हैं। अल्लाह शासन का भार उच्च-वंशीय लोगों को ही प्रदान करता है।

बलबन का राजत्व सिद्धान्त राजपद को अत्यन्त पवित्र समझता था। बलबन ने सुल्तान के पद को प्रतिष्ठित तथा गौरवान्वित करने के लिये कई कदम उठाए। उसका कहना था कि रसूल के अतिरिक्त अन्य कोई पद इतना गौरवपूर्ण तथा प्रतिष्ठित नहीं होता जितना सुल्तान का।

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बलबन में उच्च-वंशीय भावना इतनी प्रबल थी कि वह निम्न-वंश के व्यक्तियों को राज्य में कोई उच्च पद प्रदान नहीं करता था और न उनकी भेंट अथवा उपहार स्वीकार करता था। दिल्ली का जखरू नामक अत्यन्त समृद्धशाली व्यापारी लाखों टंक की भेंट के साथ सुल्तान के दर्शन करना चाहता था परन्तु सुल्तान उसे दर्शन देना अपनी प्रतिष्ठा के विरुद्ध समझता था। फलतः सुल्तान ने उसकी प्रार्थना को अस्वीकार कर दिया। सुल्तान तथा उसके पद की मर्यादा को बढ़ाने के लिए बलबन ने अपने दरबार को ईरानी ढंग पर संगठित किया।

बलबन सुल्तान के स्वेच्छाचारी तथा निरंकुश शासन में विश्वास करता था। उसकी दृढ़़ धारणा थी कि स्वेच्छाचारी तथा निरंकुश शासक ही राज्य को सुसंगठित एवं सुरक्षित करके अपनी रियाया को अनुशासन में रख सकता है। बलबन ने अपने सम्पूर्ण शासनकाल में इस सिद्धान्त का अनुसरण किया और अमीरों तथा उलेमाओं की शक्ति एवं प्रभाव को नष्ट करके स्वयं असीमित सत्ता का केन्द्र बन गया।

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बलबन का राजत्व सिद्धान्त इस आदर्श पर टिका हुआ था कि प्रत्येक सुल्तान को अपना गौरव उन्नत बनाए रखना चाहिए। बलबन ने अपने जीवनकाल में इस सिद्धान्त का अनुसरण किया और स्वयं को गौरवान्वित बनाए रखा। उसने दरबार में मद्यपान करके आने तथा हँसी-मजाक करने पर रोक लगा दी। वह स्वयं भी अत्यन्त गम्भीर रहा करता था और साधारण लोगों से बात नहीं किया करता था। बलबन की धारणा थी कि सुल्तान को कर्त्तव्य-परायण होना चाहिए और सदैव प्रजा-पालन का चिन्तन करना चाहिए। उस काल में प्रजा अर्थात् रियाया से आशय केवल मुस्लिम प्रजा से होता था, शेष लोग काफिर थे जिन्हें रियाया बनाए जाने की आवश्यकता थी! बलबन का मानना था कि सुल्तान को आलसी अथवा अकर्मण्य नहीं होना चाहिए। उसे सदैव सतर्क तथा चैतन्य रहना चाहिए। बलबन अपने विरोधियों तथा विद्रोहियों का क्रूरता से दमन करने में विश्वास करता था। चालीसा मण्डल के अमीरों, विद्रोही हिन्दू सामन्तों, मेवातियों, बंगाल के शासक परिवार के सदस्यों, चोरों-डकैतों तथा षड़यंत्रकारियों के कुचक्रों को उसने कठोरता से कुचला। बलबन उच्च नैतिक स्तर में विश्वास रखता था। उसे दुष्ट तथा अशिष्ट लोगों से घृणा थी। वह ऐसे लोगों की संगति कभी नहीं करता था। सुल्तान बनने क बाद उसने मद्यपान करना बंद कर दिया था और राज्य में मदिरा के क्रय-विक्रय पर रोक लगा दी।

बलबन का राजत्व सिद्धान्त इस आदर्श पर भी टिका हुआ था कि सुल्तान को प्रजा के नैतिक स्तर को ऊँचा उठाना चाहिए और अपराधी का दमन बड़ी कठोरता से करना चाहिए। इस सिद्धान्त की पालना में प्रायः क्रूरता भी हो जाती थी।

बलबन का दरबार सम्पूर्ण एशिया में अपने ऐश्वर्य एवं गौरव के लिए प्रसिद्ध था। बलबन के दरबार को विविध प्रकार से सजाया गया। सुल्तान महंगे एवं सुन्दर वस्त्र पहन कर दरबार में आता था। अमीर, मलिक एवं अन्य दरबारी भी करीने से वस्त्र पहनकर ही दरबार में आ सकते थे।

सुल्तान के अंगरक्षक प्रज्वलित अस्त्रों तथा आकर्षक वस्त्रों से अंलकृत होकर, पंक्तियाँ बनाकर सुल्तान के पीछे खड़े रहते थे। प्रत्येक व्यक्ति को चाहे वह कितना ही बड़ा क्यों न हो, दरबार में पूर्ण अनुशासन रखना पड़ता था। दरबार में हँसना, बातें करना तथा बिना अदब के खड़े होना मना था। सुल्तान स्वयं भी दरबार में नहीं हँसता था। इस कारण दूसरों को हँसने का साहस नहीं होता था।

दिल्ली में उन दिनों उलेमाओं का बोलबाला था। शक्तिशाली होने के कारण उनका चारित्रिक पतन हो गया था। जियाउद्दीन बरनी के अनुसार उलेमा न तो ईमानदार थे और न उनमें धार्मिकता रह गई थी। फिर भी बलबन इन उलेमाओं का आदर-सत्कार करता था और तब तक भोजन नहीं करता था जब तक कि कम से कम एक दर्जन उलेमा उसके पास नहीं बैठे हों परन्तु उसने उलेमाओं के दुर्गुणों के कारण उन्हें सल्तनत की राजनीति से अलग कर दिया।

प्रोफेसर हबीबुल्लाह ने इसे बलबन की सबसे बड़ी भूल माना है। उन्होंने लिखा है- ‘बलबन का सबसे बड़ा दोष यह था कि उसने मुसलमानों के प्रभाव को राजनीति और शासन में स्वीकार नहीं किया।’

बलबन को फारसी कला तथा फारसी साहित्य से प्रेम था। वह फारसी साहित्य एवं फारसी साहित्यकारों का आश्रयदाता था। कवि अमीर खुसरो को बलबन की विशेष कृपा प्राप्त थी। मंगोलों के अत्याचारों से आतंकित होकर दिल्ली आने वाले फारसी कवियों को बलबन का आश्रय प्राप्त होता था।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

कुरूप किंतु भाग्यवान बलबन ने दिल्ली सल्तनत को मजबूती प्रदान की (77)

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कुरूप किंतु भाग्यवान बलबन ने दिल्ली सल्तनत को मजबूती दी

कुरूप किंतु भाग्यवान बलबन दिल्ली का सुल्तान था। उसने दिल्ली सल्तनत को मजबूती प्रदान की। वह अपने समस्त पूर्ववर्ती सुल्तानों से अधिक प्रतिभावान था। वह जितना अधिक कुरूप था, उतना ही अधिक क्रूर भी था।

गियासुद्दीन बलबन का एक गुलाम पृष्ठभूमि से ऊपर उठकर एक विशाल सल्तनत का स्वामी बन जाना एक अलग बात थी और सल्तनत में राजत्व के सिद्धांत रूपी प्राण फूंक देना बिल्कुल अलग बात थी किंतु बलबन ने ये दोनों कार्य सफलता-पूर्वक कर दिखाए थे।

कुरूप किंतु भाग्यवान बलबन का जन्म ई.1200 में तुर्किस्तान के उस क्षेत्र में हुआ था जो अब कजाकिस्तान कहलाता है। सैंकड़ों साल तक यह क्षेत्र चीन के अधीन था, उसके बाद रूस के अधीन हुआ तथा अब एक अलग स्वतंत्र मुस्लिम देश है। उस काल में एक योद्धा के लिए 87 वर्ष की आयु प्राप्त करना बहुत ही कठिन बात थी किंतु बलबन ने 87 वर्ष की आयु पाई। उसने अपनी इच्छा के अनुसार अपना जीवन जिया किंतु उसके उसके जीवन के कुछ हिस्से अच्छे नहीं निकले।

जब हम बलबन के जीवन का विश्लेषण करते हैं तो पाते हैं कि कुरूप किंतु भाग्यवान बलबन एक ऐसा मनुष्य था जिसने परिस्थितियों के क्रूर हाथों से स्वयं को बचाकर परिस्थितियों को अपनी गुलाम बना लिया था। बलबन का शरीर मजबूत था किंतु उसकी कद काठी सुंदर नहीं थी। उसका कद छोटा और रंग काला था।

उसके चेहरे पर चेचक के दाग थे। उसकी भद्दी सूरत के कारण इल्तुतमिश ने उसे खरीदने से मना कर दिया था। तब बलबन ने विनम्र भाव से कहा था- ‘जहाँपनाह जहाँ आपने इतने गुलाम अपने लिये खरीदे हैं, तो अल्लाह के लिये मुझे खरीद लीजिये।’ बलबन के शब्दों से प्रभावित होकर इल्तुतमिश ने बलबन को खरीदा था किंतु उसकी कुरूपता के कारण उसे भिश्ती का काम सौंपा गया।

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बलबन का पिता खान था किंतु बलबन का बचपन गुलाम के रूप में बीता। उसे बुखारा, गजनी तथा दिल्ली जैसे शहरों में बेचा गया जहाँ भाग्य के उत्कर्ष के लिये अनेक मार्ग खुले हुए थे। यह बलबन के भाग्य का ही प्राबल्य था कि उसे ख्वाजा जमालुद्दीन तथा इल्तुतमिश जैसे योग्य मालिकों ने खरीदा। इससे बलबन के उत्कर्ष के मार्ग खुल गए। उसे शिक्षित होने तथा राजकृपा प्राप्त करने का अवसर मिला। भाग्य के बल पर वह निरंतर आगे बढ़ता चला गया।

सुल्तान इल्तुतमिश की कृपा से बलबन मलिक बना किंतु सुल्तान रुकुनुद्दीन फीरोजशाह का विरोध करने के कारण बलबन को जेल में बंद कर दिया गया। रजिया ने बलबन पर कृपा की किंतु बलबन ने रजिया के साथ विश्वासघात करके उसे मरवा दिया क्योंकि बलबन एक औरत का सुल्तान बनना अल्लाह के आदेश के खिलाफ मानता था।

सुल्तान मसूदशाह के काल में बलबन पर पुनः शाही-कृपा हुई और उसे ‘अमीरे हाजिब’ के पद पर नियुक्त किया गया। बलबन ने मसूदशाह से भी विद्रोह किया तथा उसके स्थान पर नासिरुद्दीन महमूद को सुल्तान बनाने में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। इस प्रकार नैतिकता के स्तर पर बलबन भी उतना ही गिरा हुआ था जितना कि उस काल के अन्य तुर्की अमीर गिरे हुए थे।

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बलबन में कूटनीति से काम लेने की क्षमता थी। जब सुल्तान नासिरुद्दीन ने बलबन को प्रधानमंत्री के पद से हटाकर हांसी भेज दिया तो बलबन ने विद्रोह का मार्ग न अपनाकर सुल्तान का आदेश स्वीकार कर लिया तथा भाग्य को अपने पक्ष में होने की प्रतीक्षा करने लगा। जब भाग्यवश बलबन को पुनः दिल्ली में बुलाकर पुराने पद पर बहाल किया गया तो बलबन सुल्तान को पूरी तरह से अपने पक्ष में करने के लिये अपनी पुत्री का विवाह सुल्तान से कर दिया। इससे दरबार में अन्य कोई अमीर उसे चुनौती देने योग्य नहीं रहा। इस प्रकार सुल्तानों को बनाते-बिगाड़ते वह स्वयं भी सुल्तान बन गया। जीवन के इन अनुभवों ने उसे परिपक्व बना दिया। जब हम बलबन के शासनकाल की समग्र समीक्षा करते हैं तो हम पाते हैं कि दिल्ली सल्तनत के समक्ष कुतुबुद्दीन ऐबक के समय से जो समस्याएँ चली आ रही थीं, वे समस्त समस्याएं बलबन के समय भी विद्यमान थीं। पश्चिमोत्तर सीमांत क्षेत्र में खोखरों का उपद्रव, पश्चिमोत्तर सीमा पर मंगोलों के आक्रमण, दिल्ली के निकट मेवातियों के उत्पात, गंगा-यमुना के दो-आब में हिन्दुओं के विद्रोह, राजपूताना, रूहेलखंड, बुंदेलखंड तथा बघेलखंड में हिन्दू सरदारों के विद्रोह, बंगाल के गवर्नरों के विद्रोह, तुर्की अमीरों के षड़यंत्र आदि बहुत सी ऐसी समस्याएँ थीं जो पूरे गुलामवंश के शासन के दौरान बनी रहीं।

बलबन इनमें से केवल षड़यंत्रकारी अमीरों की समस्या का स्थायी समाधान ढूंढ सका था, शेष समस्याएं कुछ समय के लिए दब अवश्य गईं किंतु बलबन के मरते ही फिर से उठ खड़ी हुईं।

बलबन ने राजपूत शासकों की तरफ से आँखें मूंदने की ठीक वैसी ही विचित्र नीति अपनाई थी जैसी कि इल्तुतमिश तथा रजिया ने मंगोलों के प्रति अपनाई थी। रजिया ने यही नीति राजपूतों के सम्बन्ध में भी अपनाई थी। संभवतः इसी कारण इल्तुतमिश और रजिया सल्तनत के भीतर की समस्याओं पर ध्यान दे पाए थे। बलबन ने मंगोलों पर तो कड़ी कार्यवाही की किंतु राजपूतों के सम्बन्ध में उसने रजिया की नीति का अनुसरण किया।

कुरूप किंतु भाग्यवान बलबन ने केवल एक बार चित्तौड़ पर आक्रमण करके पराजय का स्वाद चखा और समझ गया कि अभी दिल्ली सल्तनत ने इतनी शक्ति प्राप्त नहीं की है कि वह राजपूताना के राजपूतों से सीधे भिड़ सके। संभवतः बलबन इस बात को भी जानता था कि चौहान सम्राट पृथ्वीराज को मुहम्मद गौरी ने जिस धोखे से मारा था, वह धोखा हिन्दू राजाओं के साथ बार-बार नहीं दोहराया जा सकता। इस काल के हिन्दू राजा अधिक सतर्क थे।

इसीलिए यह कहा जाता है कि कुरूप किंतु भाग्यवान बलबन की सैनिक उपलब्धियाँ उतनी बड़ी नहीं थीं जितनी कि शासकीय उपलब्धियाँ हैं।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

शहजादा बुगरा खाँ सल्तनत छोड़कर भाग गया (78)

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शहजादा बुगरा खाँ सल्तनत छोड़कर भाग गया

बलबन ने शहजादा बुगरा खाँ को अपना उत्तराधिकारी बनाना चाहा किंतु शहजादा बुगरा खाँ अपने पिता के कठोर स्वभाव से डरकर लखनौती भाग गया। इस पर बलबन ने अपने बड़े पुत्र मुहम्मद के पुत्र कैखुसरो को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया।

शरीर से कुरूप किंतु भाग्यवान बलबन ने लड़खड़ाती हुई दिल्ली सल्तनत को अपनी बुद्धि, परिश्रम एवं लगन के बल पर मजबूत आधार प्रदान किया। बलबन ने जो नीतियां बनाईं, उसके भाग्य से उसके पक्ष में परिणाम देने वाली सिद्ध हुईं किंतु उसके जीवन के अंतिम दो वर्ष भयानक दुःखों से भर गए जिन्होंने उसे असीम कष्ट दिया। 

ई.1285 में मंगोलों ने तिमूर खाँ के नेतृत्व में भारत पर आक्रमण किया। शहजादे मुहम्मद ने मंगोलों का रास्ता रोका। मंगोल तो पराजित होकर भाग गए किंतु शहजादा मुहम्मद युद्ध में मारा गया। शहजादे की मृत्यु से बलबन को करारा आघात लगा। बलबन उसे सल्तनत के भावी और योग्य सुल्तान के रूप में देखता था किंतु जब शहजादा अचानक ही मृत्यु को प्राप्त हुआ तो बलबन ने रोगशैय्या पकड़ ली और दो साल के भीतर ई.1287 के मध्य में बलबन इस असार संसार से चला गया।

बलबन की शासन व्यवस्था स्वेच्छाचारी एवं अत्यधिक केन्द्रीभूत थी जिसमें शासन की सारी शक्तियाँ सुल्तान में केन्द्रित थीं। सुल्तान कोई भी महत्त्वपूर्ण कार्य अपने राज्याधिकारियों अथवा पुत्रों पर पूर्ण रूप से नहीं छोड़ता था। इससे शासन के समस्त कार्यों में सुल्तान का परामर्श एवं आज्ञा प्राप्त करना आवश्यक हो गया।

ऐसा शासन सुल्तान के कठोर एवं दृढ़निश्चयी स्वभाव पर ही निर्भर करता है तथा योग्य सुल्तान के समय ही ढंग से चल पाता है किंतु जैसे ही अयोग्य सुल्तान का शासन होता है, ऐसी शासन व्यवस्था बिखरने लगती है तथा मंत्रियों एवं प्रांतीय गवर्नरों का नेतृत्व करने वालों का अभाव हो जाता है।

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बलबन के लिये सुल्तान तथा सल्तनत का हित सर्वोपरि था। इसलिये वह अपने सगे-सम्बन्धियों को दण्डित करने में भी संकोच नहीं करता था। वह किसी की भी मनमानी सहन नहीं करता था। बलबन ने बदायूं के सूबेदार मलिक बकबक और अवध के इक्तादार हैबात खाँ को उनके गुलामों के साथ दुर्व्यवहार करने के अपराध में कठोर दण्ड दिए। इससे लोगों में सुल्तान का भय बैठ गया। वे अपने गुलामों के साथ दुर्व्यवहार करने का साहस नहीं करते थे।

सल्तनत में अपराधों तथा अत्याचारों का पता लगाने के लिये बलबन ने एक मजबूत गुप्तचर विभाग का गठन किया। ये गुप्तचर सुल्तान को समस्त प्रकार के अत्याचारों तथा अन्यायों की सूचना देते थे। अपराध के सिद्ध हो जाने पर सुल्तान द्वारा अपराधी को बिना किसी पक्षपात के दण्ड दिया जाता था।

बलबन ने समस्त प्रान्तों तथा जिलों में गुप्तचर रखे जिनके माध्यम से बलबन को राजधानी तथा अन्य प्रान्तों की महत्त्वपूर्ण घटनाओं, अमीरों के कुचक्रों, षड़यंत्रों एवं विद्राहों की सूचनाएँ मिलती थीं। गुप्तचरों को अच्छा वेतन मिलता था और उनकी निष्ठा का परीक्षण होता रहता था। कर्त्तव्य-भ्रष्ट गुप्तचर को कठोर दण्ड दिया जाता था।

बलबन का उत्कर्ष दिल्ली सल्तनत के लिए एक युगांतरकारी घटना थी जिसने न केवल भारत अपितु मध्यएशिया तक के राजनीतिक घटनाक्रम को प्रभावित किया था। उसने दिल्ली सल्तनत को स्थायित्व प्रदान किया। विद्रोहियों का दमन किया तथा सल्तनत में शांति व्यवस्था स्थापित की।

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जियाउद्दीन बरनी ने लिखा है कि जब बलबन सुल्तान बना तब लोगों के हृदय से राज का भय निकल चुका था और देश की बड़ी दुर्दशा हो रही थी। बलबन ने बड़ी दृढ़़ता से अंशाति तथा कलह को दबाकर विद्रोहियोें का दमन किया और सुल्तान की सत्ता तथा धाक को फिर से स्थापित किया। उसने अपराधियों, विरोधियों एवं षड़यंत्रकारियों को कठोर दण्ड देकर सल्तनत के प्रत्येक व्यक्ति को शाही-आज्ञाओं का पालन करने के लिए बाध्य किया। बलबन ने भविष्य में आने वाले संकटों का सामना करने के लिए दूरदृष्टि से काम लिया। उसने सीमांत प्रदेशों की सुरक्षा के लिये नए दुर्ग बनवाये एवं पुराने दुर्गों की मरम्मत करवाकर वहाँ सेनाएं नियुक्त कीं। उसने अयोग्य लोगों को सेवा से हटा दिया। बूढ़े अमीरों के स्थान पर उनके युवा-पुत्रों को सेवा में रखा। बलबन ने अपने जीवन-काल में ही अपने योग्य पुत्र मुहम्मद को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया परन्तु दुर्भाग्यवश बलबन के जीवन काल में ही शहजादे मुहम्मद की युद्धक्षेत्र में मृत्यु हो गई। इसके बाद बलबन ने अपने छोटे पुत्र शहजादा बुगरा खाँ को अपना उत्तराधिकारी बनाना चाहा किंतु वह अपने पिता के कठोर स्वभाव से डरकर लखनौती भाग गया। इस पर बलबन ने अपने बड़े पुत्र मुहम्मद के पुत्र कैखुसरो को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया।

बलबन के चरित्र एवं कार्यों का मूल्यांकन करते हुए डॉ. ईश्वरी प्रसाद ने लिखा है- ‘बलबन का चालीस वर्षों का क्रियाशील जीवन मध्यकालीन भारत के इतिहास में अनूठा है। उसने राजपद के गौरव को बढ़ाया और लौह तथा रक्त की नीति का अनुसरण करके शान्ति तथा सुव्यवस्था स्थापित की। बलबन ने अपनी वीरता तथा दूरदर्शिता से मुस्लिम राज्य को विपत्ति काल में नष्ट होने से बचाया, मध्ययुगीन भारतीय इतिहास में वह सदैव एक महान् व्यक्तित्व रहेगा।’

प्रो. हबीबुल्ला का मत है- ‘बलबन ने बड़ी सीमा तक खिलजी राज्य-व्यवस्था की पृष्ठभूमि का निर्माण किया।’

अवध बिहारी पाण्डेय के अनुसार- ‘यदि हम बलबन के कार्य को एक शब्द में व्यक्त करना चाहें तो वह है-सुदृढ़ीकरण। यही उसकी नीति का मूल मंत्र था।’

डॉ. आर्शीवादी लाल श्रीवास्तव में लिखा है- ‘बलबन ने तुर्की सल्तनत की रक्षा का सुचारु प्रबन्ध किया और उसे नया जीवन प्रदान किया। यही उसका सबसे महान् कार्य था। उसने सुल्तान की प्रतिष्ठा का पुनरुत्थान किया। यह उसकी दूसरी सफलता थी। राज्य में सर्वत्र पूर्ण शांति और व्यवस्था की स्थापना करना उसका महत्त्वपूर्ण कार्य था। उस युग में तुर्की सल्तनत को जिन कठिनाइयों और संकटों का सामना करना पड़ा, उनको देखते हुए यह मानना पड़ेगा कि बलबन की सफलताएं साधारण कोटि की नहीं थीं।’

वस्तुतः इतिहासकारों ने बलबन का मूल्यांकन मुस्लिम प्रजा एवं मुस्लिम शासन की दृष्टि से किया है। यदि भारत की हिन्दू जनंसख्या की दृष्टि से देखा जाए जो कि उस काल में 95 प्रतिशत थी, बलबन का शासन क्रूरताओं, मक्कारियों, हिंसक युद्धों और रक्तपात से परिपूर्ण था।

उसके काल में हिन्दुओं को बुरी तरह से लूटा गया, मेवों को कुचला गया, गंगा-यमुना के दो-आब में हिन्दू परिवारों को बुरी तरह से सताया गया तथा अवध में हिन्दुओं की बड़ी संख्या में हत्याएं की गईं। जब हम बलबन के शासन का मूल्यांकन करते हैं तो हमें ये बातें भी निःसंकोच, निर्भय तथा पक्षपात रहित होकर लिखनी चाहिए किंतु दुर्भाग्य से साम्यवादी चिंतन से ग्रस्त भारतीय इतिहासकार ऐसा नहीं कर सके।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

कैकुबाद ने पिता को पैरों में गिराकर सलाम करवाया (79)

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कैकुबाद ने पिता को पैरों में गिराकर सलाम करवाया

जब बुगरा खाँ अपने पुत्र सुल्तान कैकुबाद के समक्ष उपस्थित हुआ तो बुगरा खाँ ने अन्य अमीरों की तरह धरती पर माथा रगड़कर सुल्तान की जमींपोशी की तथा सुल्तान के पैर पकड़कर उसकी पैबोशी की।

दिल्ली के सुल्तान गियासुद्दीन बलबन ने अपने बड़े शहजादे मुहम्मद की मृत्यु हो जाने के कारण अपने द्वितीय पुत्र बुगरा खाँ को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त करना चाहा किंतु बुगरा खाँ अपने पिता के कठोर स्वभाव से डरकर चुपचाप दिल्ली छोड़कर लखनौती चला गया। इस पर बलबन ने शहजादे मुहम्मद के पुत्र कैखुसरो को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया।

ई.1287 में बलबन की मृत्यु के बाद दिल्ली के कोतवाल मलिक फखरूद्दीन ने कैखुसरो को सुल्तान नहीं बनने दिया तथा कैखुसरो के विरुद्ध षड्यन्त्र रचकर बुगरा खाँ के पुत्र कैकुबाद को तख्त पर बैठा दिया ताकि सुल्तान कैकुबाद उसके हाथों की कठपुतली बनकर रह सके। जिस समय कैकुबाद तख्त पर बैठा, उस समय उसकी अवस्था केवल सत्रह वर्ष थी। वह रूपवान तथा सरल प्रकृति का युवक था। उसका पालन-पोषण तथा शिक्षा-दीक्षा बलबन ने अपने निरीक्षण में करवाए थे।

तत्कालीन इतिहासकारों ने लिखा है- ‘कैकुबाद ने कभी मद्य का सेवन नहीं किया था और न कभी रूपवती युवती पर उसकी दृष्टि पड़ी थी। उसका अध्ययन अत्यन्त विस्तृत था और उसे साहित्य से अनुराग था। उसे योग्य शिक्षकों द्वारा विभिन्न विषयों एवं कलाओं की शिक्षा दी गई थी। इस शिक्षा के प्रभाव से कैकुबाद कभी अनुचित कार्य नहीं करता था। उसके मुँह से कभी अपशब्द नहीं निकलते थे।’

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कैकुबाद के रूप में दिल्ली सल्तनत को अच्छा शासक मिलने की आशा थी किंतु तख्त पर बैठते ही उसे दुष्ट लोगों ने घेर लिया जिससे वह समस्त शिक्षाओं को भूलकर भोग-विलास में लिप्त हो गया। उसके दरबारियों ने उसका अनुसरण करना आरम्भ किया। भोग-विलास में संलग्न रहने के कारण सुल्तान ने शासन की बागडोर कोतवाल फखरूद्दीन के भतीजे मलिक निजामुद्दीन के हाथों में सौंप दी जो फखरूद्दीन का दामाद भी था। मलिक निजामुद्दीन ने सुल्तान को हर तरह से कमजोर कर दिया।

मलिक निजामुद्दीन अत्यंत दुष्ट प्रकृति का स्वामी था, उसने सत्ता हाथों में आते ही, कैखुसरो को जहर देकर मार डाला जिसे बलबन ने दिल्ली सल्तनत का भावी सुल्तान नियुक्त किया था। जब सल्तनत के प्रमुख वजीर खतीर ने निजामुद्दीन का विरोध किया तो निजामुद्दीन ने वजीर को भी जहर देकर मरवा दिया।

जब बंगाल में रह रहे बुगरा खाँ को अपने पुत्र कैकुबाद के दुराचरण के समाचार मिले तो वह अपने पुत्र को दुष्ट निजामुद्दीन से बचाने के लिये एक सेना लेकर दिल्ली के लिये रवाना हुआ। इस पर मलिक निजामुद्दीन ने सुल्तान कैकुबाद को उकसाया कि वह भी सेना लेकर अपने पिता का मार्ग रोके क्योंकि उसकी नीयत ठीक नहीं है।

कैकुबाद दुष्ट निजामुद्दीन की बातों में आ गया तथा सेना लेकर आगे बढ़ा। जब बुगरा खाँ को पता लगा कि कैकूबाद युद्ध करने की नीयत से आ रहा है तो बुगरा खाँ ने अपने पुत्र सुल्तान कैकुबाद को संदेश भिजवाया कि वह युद्ध नहीं करना चाहता है, वह तो अपने सुल्तान से मिलना चाहता है। इस समय तक कैकुबाद अयोध्या तक पहुंच चुका था। उसने मलिक निजामुद्दीन से सलाह मांगी कि क्या करना चाहिए!

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इस पर निजामुद्दीन ने कैकुबाद को सलाह दी कि वह बुगरा खाँ को संदेश भिजवाए कि यदि बुगरा खाँ, सुल्तान से मिलने के लिए आना चाहता है तो उसे भी सुल्तान के समक्ष वैसे ही जमींपोशी करनी होगी, जैसे अन्य अमीर करते हैं। मलिक निजामुद्दीन की योजना थी कि बुगरा खाँ इस शर्त को मानने से इन्कार कर देगा किंतु बुगरा खाँ अनुभवी व्यक्ति था। उसने अपने पुत्र की इस शर्त को स्वीकार कर लिया। इस पर कैकुबाद के समक्ष और कोई उपाय नहीं रहा कि वह अपने पिता बुगरा खाँ से मिले। जब बुगरा खाँ सुल्तान के समक्ष उपस्थित हुआ तो बुगरा खाँ ने अन्य अमीरों की तरह धरती पर माथा रगड़कर सुल्तान की जमींपोशी की तथा सुल्तान के पैर पकड़कर उसकी पैबोशी की। यह देखकर कैकुबाद ग्लानि से भर गया। वह तख्त से उतरकर अपने पिता के चरणों में गिर गया और रोने लगा। बुगरा खाँ ने उसे भोग-विलास से दूर रहने के लिये कहा तथा भोग-विलास के दुष्परिणामों के बारे में समझाया। बुगरा खाँ ने उसे यह सलाह भी दी कि वह मलिक निजामुद्दीन को उसके पद से हटा दे। कैकुबाद ने पिता की इन सारी सलाहों को मान लिया। बुगरा खाँ ने मलिक निजामुद्दीन की हत्या करवाकर उससे मुक्ति पा ली। इसके बाद बुगरा खाँ बंगाल चला गया।

पिता के चले जाने के बाद कैकुबाद दिल्ली आ गया और फिर से भोग-विलास में डूब गया। इसके बाद मलिक कच्छन और मलिक सुर्खा नामक तुर्की अमीरों ने शासन पर वर्चस्व स्थापित कर लिया।

इस पर सुल्तान कैकुबाद ने मंगोलों के विरुद्ध लगातार युद्ध जीत रहे अपने सेनापति जलालुद्दीन खिलजी को दिल्ली बुलवाकर उसे आरिज-ए-मुमालिक अर्थात् सेना का निरीक्षक नियुक्त किया तथा उसे शाइस्ता खाँ की उपाधि दी।

तुर्की अमीरों को सुल्तान का यह निर्णय अच्छा नहीं लगा क्योंकि वे खिलजियों को तुर्क नहीं मानते थे। इस नियुक्ति के कुछ दिनों बाद अत्यधिक शराब के सेवन से कैकुबाद को लकवा मार गया। इस पर तुर्की अमीरों ने उसके अल्पवयस्क पुत्र क्यूमर्स को गद्दी पर बैठा दिया। इस प्रकार कैकुबाद ई.1287 से 1290 तक ही शासन कर सका।  

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

गुलाम वंश का अंत (80)

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गुलाम वंश का अंत

खिलजियों ने सुल्तान कैकुबाद को लातों से मारकर यमुनाजी में फैंक दिया! इसी के साथ दिल्ली सल्तनत से गुलाम वंश का अंत हो गया। अमीरों ने कैकुबाद के अल्पवयस्क पुत्र क्यूमर्स को सुल्तान बना दिया।

बलबन के पोते कैकुबाद को दिल्ली पर शासन करते हुए तीन साल ही हुए थे कि अत्यधिक शराब पीने के कारण उसे लकवा मार गया तथा अमीरों ने कैकुबाद के अल्पवयस्क पुत्र क्यूमर्स को सुल्तान बना दिया।

पाठकों को स्मरण होगा कि लकुआ मारने से कुछ समय पहले ही पूर्व सुल्तान कैकुबाद ने मंगोलों के विरुद्ध लगातार युद्ध जीत रहे सेनापति जलालुद्दीन खिलजी को दिल्ली बुलाकर उसे आरिज-ए-मुमालिक अर्थात् सेना का निरीक्षक नियुक्त किया था और उसे शाइस्ता खाँ की उपाधि दी थी।

कैकुबाद खिलजियों के माध्यम से तुर्की अमीरों पर नियंत्रण रखता था। इस कारण कैकुबाद के शासनकाल में दिल्ली सल्तनत की राजनीति में खिलजियों का बोलबाला हो गया था जबकि दिल्ली के अमीर उन्हें तुर्क नहीं मानते थे।

कैकुबाद को लकवा होने के बाद तुर्की अमीरों ने गैर-तुर्की सरदारों को जान से मार डालने की योजना बनाई। इस सूची में जलालुद्दीन खिलजी का नाम सबसे ऊपर था। जलालुद्दीन खिलजी को तुर्की अमीरों के षड़यंत्र का पता चल गया। वह तुरंत दिल्ली से बाहर, बहारपुर नामक स्थान पर चला गया जो कि दिल्ली से अधिक दूर नहीं था।

तुर्की अमीरों ने जलालुद्दीन खिलजी को फिर से दिल्ली में लाने का षड़यंत्र किया।

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तुर्की अमीरों की तरफ से मलिक कच्छन, जलालुद्दीन खिलजी को बुलाने उसके शिविर में गया। जलालुद्दीन खिलजी मलिक कच्छन की मीठी बातों में नहीं आया तथा खिलजियों ने मलिक कच्छन की हत्या कर दी। इसके बाद जलालुद्दीन खिलजी के पुत्र दिल्ली में घुस गए और महल में घुसकर शिशु सुल्तान क्यूमर्स को उठा लाए। इस पर मलिक सुर्खा तथा अन्य तुर्की अमीरों ने खिलजियों का पीछा किया किंतु वे भी मार दिए गए।

इस घटना के कुछ दिन बाद खिलजी पुनः दिल्ली में घुसे। खिलजी मलिक ने कीलूगढ़ी के महल में घुसकर लकवे से पीड़ित सुल्तान कैकूबाद को लातों से पीट-पीट कर मार डाला तथा उसका शव एक चादर में लपेटकर यमुनाजी में फैंक दिया। इसके बाद जलालुद्दीन खिलजी शिशु सुल्तान क्यूमर्स का संरक्षक तथा वजीर बनकर शासन करने लगा।

जलालुद्दीन खिलजी ने कुछ दिनों तक परिस्थितियों का आकलन किया तथा परिस्थितियाँ अपने अनुकूल जानकर कुछ ही दिनों बाद क्यूमर्स को कारागार में पटक दिया और 13 जून 1290 को दिल्ली के तख्त पर बैठ गया।

इस प्रकार भारत पर लगभग 90 वर्ष के दीर्घकालीन शासन के बाद अपमानपूर्ण ढंग से इल्बरी तुर्कों के शासन का अंत हुआ। जलालुद्दीन खिलजी ने कुछ समय पश्चात् शिशु सुल्तान क्यूमर्स की भी हत्या कर दी। इसी के साथ दिल्ली सल्तनत से गुलाम वंश का भी अंत हो गया।

दिल्ली के तख्त से गुलाम वंश की विदाई एक स्वाभाविक घटना थी। आश्चर्य इस बात पर नहीं होना चाहिए कि बलबन के मरते ही केवल तीन साल में उसके वंश का अंत हो गया, आश्चर्य इस बात पर होना चाहिए कि बलबन के अयोग्य वंशज तीन साल तक उसके तख्त पर टिके कैसे रहे!

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तुर्की शासकों में न तो उत्तराधिकार का कोई निश्चित नियम था और न कोई भी अमीर सुल्तान के प्रति निष्ठा रखता था। अतः प्रत्येक सुल्तान की मृत्यु के बाद उत्तराधिकार के लिए संघर्ष आरम्भ हो जाता था। इस संघर्ष का राज्य की शक्ति पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ता था। इस संघर्ष से सुल्तान का पद कमजोर हो जाता था और अमीर तथा मलिक अधिक ताकतवर बन जाते थे। तुर्की वंश के सुल्तानों के शासन का आधार स्वेच्छाचारी सैनिक शासन था जिसकी नींव सदैव निर्बल होती है। यह सैनिक-अंशाति का युग था। किसी रचनात्मक सुल्तान के स्थान पर कोई युद्धप्रिय सेनापति ही दिल्ली सल्तनत पर शासन कर सकता था। अब तक के तुर्की शासकों ने भारत के बहुसंख्यक हिन्दुओं से कोई तारतम्य स्थापित नहीं किया था। वे हिन्दुओं की तो कौन कहे उन मुसलमानों को भी अपने से नीचा समझते थे जो हिन्दू से मुसलमान बन गए थे। दूसरी ओर हिन्दू राजवंश अपनी खोई हुई स्वतन्त्रता को भूले नहीं थे और उसे प्राप्त करने के लिए सदैव सचेष्ट रहते थे। वे प्रायः विद्रोह कर देते थे। फलतः हिन्दुओं की सहायता तथा सहयोग गुलाम वंश के सुल्तानों को नहीं मिल सका।

गुलाम सुल्तानों के शासन काल में भारत की पश्चिमोत्तर सीमा पर मंगोलों के आक्रमणों की झड़ी लगी हुई थी जिसके कारण सुल्तान का ध्यान उसी ओर लगा रहता था और वह सल्तनत में ऐसी संस्थाओं का निर्माण करने में सफल नहीं हो पाता था जो सल्तनत के साथ-साथ सुल्तान एवं उसके वंश को भी स्थायित्व दे सके। विद्रोहों को दबाने के लिए प्रान्तीय शासकों के नेतृत्व में विशाल सेनाएं रखनी पड़ती थीं। विद्रोही हाकिम इन सेनाओं का उपयोग प्रायः सुल्तान के विरुद्ध करने लगते थे।

बलबन के दुर्भाग्य से उसके उत्तराधिकारी निर्बल तथा अयोग्य थे। उन्होंने तुर्की अमीरों का प्रभाव कम करने के लिए खिलजियों को दिल्ली में बुलाकर बहुत बड़ी भूल की। जब तुर्की सरदारों ने खिलजियों को नष्ट करने का षड़यंत्र रचा तो खिलजियों ने न केवल प्रभावशाली तुर्की अमीरों को मार डाला अपितु सुल्तान से भी छुटकारा पाकर उसकी सल्तनत हड़प ली।

बहुत से इतिहासकारों ने यह प्रश्न उठाया है कि गुलाम वंश के शासकों में सबसे सफल सुल्तान कौन था? इस प्रश्न के उत्तर में कुतुबुद्दीन ऐबक, इल्तुतमिश, रजिया, नासिरुद्दीन एवं बलबन के नाम लिए जाते हैं। वस्तुतः इन सभी सुल्तानों ने दिल्ली सल्तनत को सीमित स्थायित्व दिया था।

सुल्तान के रूप में कुतुबुद्दीन ऐबक तथा रजिया के शासन काल लगभग चार-चार साल से भी कम रहे फिर भी उनकी सैनिक उपलब्धियां उल्लेखनीय थीं। इल्तुतमिश ने 25 साल, उसके पुत्र नासिरुद्दीन ने 19 साल तथा बलबन ने 21 साल शासन किया था। इनमें से नासिरुद्दीन एक कमजोर शासक था तथा शासन की वास्तविक शक्ति बलबन के हाथों में थी।

सुल्तान के रूप में इल्तुतमिश एवं बलबन ने सल्तनत को न केवल सुरक्षित रखा अपितु उसे मजबूती भी प्रदान की। अतः कुतुबुद्दीन ऐबक, इल्तुतमिश, रजिया सुल्तान एवं बलबन में से किसी एक को सफल बताना, अन्य तीन सुल्तानों के प्रति अन्याय होगा।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

जलालुद्दीन खिलजी हिन्दुओं के ढोल नगाड़े सुनकर खून के आंसू रोता था (81)

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जलालुद्दीन खिलजी हिन्दुओं के ढोल नगाड़े सुनकर खून के आंसू रोता था

सुल्तान जलालुद्दीन खिलजी अफगानिस्तान के खिलजी कबीले का तुर्क था। वह कट्टर मुसलमान था जो हिन्दुओं के ढोल-नगाड़े सहन करने को तैयार नहीं था। वह भारत के समस्त हिन्दुओं को मुसलमान बनाना चाहता था।

दिल्ली सल्तनत के तुर्की अमीरों ने जलालुद्दीन खिलजी को मारने का षड़यंत्र इसलिए रचा था क्योंकि तुर्की अमीरों की दृष्टि में जलालुद्दीन खिलजी ‘तुर्क’ नहीं था। मुस्लिम इतिहासकारों निजामुद्दीन अहमद, बदायूंनी तथा फरिश्ता ने खिलजियों के वंश की उत्पत्ति के बारे में अलग-अलग बातें लिखी हैं।

‘तारीखे फखरुद्दीन मुबारकशाही’ के लेखक फखरुद्दीन ने 64 तुर्की कबीलों की एक सूची दी है जिसमें खिलजी कबीला भी सम्मिलित है। विन्सेट स्मिथ के विचार में खिलजी लोग अफगान अथवा पठान थे परन्तु यह धारणा सर्वथा अमान्य हो गई है। सर हेग के विचार में खिलजी मूलतः तुर्क थे परन्तु बहुत दिनों से अफगानिस्तान के गर्मसीर प्रदेश में रहने के कारण उन्होंने अफगानी रीति-रिवाज ग्रहण कर लिए थे। इस कारण दिल्ली के तुर्क खिलजियों को तुर्क नहीं मानते थे।

‘हिस्ट्री ऑफ खिलजीज’ के लेखक डॉ. किशोरी शरण लाल ने इस्लामी इतिहासकारों की बातों का निष्कर्ष निकालते हुए यह मत प्रस्तुत किया है कि खिलजी भी तुर्की थे जो 10वीं शताब्दी ईस्वी के पहले, तुर्किस्तान से आकर अफगानिस्तान के खल्ज प्रदेश में बस गए थे। उन्होंने अफगानी रीति रिवाजों को अपना लिया था।

उपरोक्त तथ्यों को देखते हुए यही मानना उचित प्रतीत होता है कि खिलजी मूलतः तुर्क थे जो कालान्तर में तुर्किस्तान से चलकर अफगानिस्तान की हेलमन्द घाटी तथा लमगाम प्रदेश के गर्मसीर क्षेत्र में आकर बस गए थे। दो सौ साल तक अफगानिस्तान में रहने के कारण उनका रहन-सहन पठानों जैसा हो गया था। अफगानिस्तान में खल्ज नामक गाँव से वे खिलजी कहलाये। अधिकांश भारतीय इतिहासकारों की भांति लगभग समस्त विदेशी इतिहासकारों ने भी खिलजियों को तुर्क माना है।

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भारत में आने वाले अधिकांश खिलजी या तो तुर्क आक्रांताओं के साथ उनके सैनिकों के रूप में भारत आए थे या फिर मंगोलों के आक्रमण से त्रस्त होकर उन्हें अफगानिस्तान छोड़कर भारत आना पड़ा था और उन्होंने तुर्की अमीरों तथा सुल्तानों की सेवा करना स्वीकार कर लिया था।

भारत में खिलजी राजवंश का संस्थापक जलालुद्दीन खिलजी 70 वर्ष की आयु में ई.1290 में दिल्ली के तख्त पर बैठा। इससे पहले वह अनेक वर्षों तक बलबन तथा कैकुबाद के लिए भारत की पश्चिमोत्तर सीमा पर मंगोलों के विरुद्ध युद्ध करता रहा था।

जलालुद्दीन खिलजी का राजगद्दी संभालना मामलुक राजवंश अर्थात् गुलाम वंश के अंत और अभिजात्य वर्ग के वर्चस्व का द्योतक था। जलालुद्दीन खिलजी कट्टर मुसलमान था जो मुजाहिद-ए-सबीलिल्लाह अर्थात् अल्लाह की राह में संघर्षरत योद्धा के रूप में स्वीकारा जाना चाहता था। जलालुद्दीन खिलजी भारत में इस्लामिक नियम एवं कानून लागू करने में अपनी असमर्थता को लेकर दुःखी रहता था।

अपने इस दुःख को व्यक्त करते हुए एक दिन उसने अपने दराबर में कहा था- ‘हम सुल्तान महमूद से अपनी तुलना नहीं कर सकते…… हिन्दू…… हर दिन मेरे महल के नीचे से गुजरते हैं, अपने ढोल और तुरही बजाते हुए और यमुना नदी में जाकर मूर्ति पूजा करते हैं।’

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जलालुद्दीन खिलजी का वास्तविक नाम मलिक फीरोज खिलजी था। वह ‘खिलजी’ कबीले का तुर्क था। अपनी युवावस्था में जलालुद्दीन अपने कुटुम्ब सहित भारत चला आया और दिल्ली के सुल्तानों के यहाँ नौकरी करने लगा। जलालुद्दीन ने सर्वप्रथम नासिरूद्दीन महमूदशाह अथवा बलबन के शासन काल में सेना में प्रवेश किया था। बलबन के जिन सेनापतियों को सीमा प्रदेश की रक्षा के लिए नियुक्त किया गया था उनमें से जलालुद्दीन खिलजी भी एक था। कैकुबाद के शासनकाल में जलालुद्दीन शाही अंगरक्षकों के अध्यक्ष के उच्च पद पर पहुँच गया। बाद में वह समाना का गवर्नर नियुक्त कर दिया गया। वह योग्य सेनापति था। सीमान्त प्रदेश में कई बार उसने मंगोलों के विरुद्ध युद्ध में सफलता प्राप्त की। इस प्रकार उसने सैनिक तथा शासक दोनों रूपों में ख्याति प्राप्त कर ली थी। इसलिए सुल्तान कैकुबाद ने उसे शाइस्ता खाँ की उपाधि दी। जब सेना के अमीर मलिक तुजाकी की मृत्यु हो गई तो कैकुबाद ने जलालुद्दीन खिलजी को सेना-मंत्री के उच्च पद पर नियुक्त कर दिया। दिल्ली दरबार में मंत्री होने के साथ-साथ वह समस्त भारत में बिखरे हुए विशाल खिलजी कबीले का प्रमुख भी था। इस कबीले के लोग इख्तियारुद्दीन-बिन-बख्तियार खिलजी के समय बंगाल में शासन कर चुके थे।

जब सुल्तान कैकुबाद को लकवा हो गया तब तुर्की अमीरों ने जलालुद्दीन खिलजी की हत्या करने का षड़यंत्र रचा। इस पर जलालुद्दीन खिजली दिल्ली में घुसकर शिशु सुल्तान क्यूमर्स को उठा ले गया। जब तुर्की अमीरों ने उसका पीछा किया तो खिलजियों ने तुर्की अमीरों को मार डाला।

कुछ दिनों बाद जब खिलजियों ने कैकुबाद के महल में घुसकर उसे लातों से मार डाला तब जलालुद्दीन खिजली, शिशु सुल्तान क्यूमर्स को पुनः दिल्ली ले आया तथा उसका संरक्षक बनकर शासन करने लगा। कुछ ही दिनों बाद जलालुद्दीन ने शिशु सुल्तान क्यूमर्स को कारागार में डाल दिया तथा स्वयं दिल्ली का स्वतंत्र सुल्तान बन गया।

जलालुद्दीन का यह कार्य ठीक वैसा ही था जैसा बगदाद के तुर्की गुलामों ने अपने स्वामियों अर्थात् बगदाद के खलीफाओं के साथ किया था, जैसा गजनी की तुर्की अमीरों ने अपने स्वामियों अर्थात् मुहम्मद गौरी के पुत्रों के साथ किया था, जैसा दिल्ली के तुर्की अमीरों ने अपने स्वामियों अर्थात् रजिया सुल्तान और बहरामशाह के साथ किया था। तुर्की कबीलों में सत्ता प्राप्त करने का कोई भी तरीका उचित माना जाता था। नैतिकता और अनैतिकता के प्रश्न उन्हें परेशान नहीं करते थे।

इस तथ्य से यह अनुमान लगाया जा सकता है कि सत्ता प्राप्त करने के लिए तुर्की अमीर कितने भूखे थे और वे किसी भी शरणदाता, स्वामी एवं संरक्षक से गद्दारी करने में संकोच नहीं करते थे।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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