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तुगलक की सांकेतिक मुद्रा को जनता ने विफल कर दिया (129)

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तुगलक की सांकेतिक मुद्रा - www.bharatkaitihas.com
तुगलक की सांकेतिक मुद्रा

चौदहवीं शताब्दी ईस्वी में मुहम्मद बिन तुगलक ने सोने-चांदी के सिक्कों के स्थान पर ताम्बे के सिक्के चलाए। इसे तुगलक की सांकेतिक मुद्रा कहा जाता है। लोगों ने अपने घरों में ताम्बे के सिक्के ढाल लिए तथा उनके बदले में राजकोष से सोने-चांदी के सिक्के ले लिए।

मुहम्मद बिन तुगलक ने दक्षिण भारत में स्थाई अधिकार बनाए रखने के लिए अपनी राजधानी को दिल्ली से देवगिरि स्थानांतरित कर दिया किंतु लोगों के असहयोग के कारण उसे अपनी राजधानी को फिर से दिल्ली में लाना पड़ा।

इस योजना से राज्यकोष का बहुत सा धन व्यय हो गया क्योंकि इस कार्य के लिए दिल्ली से देवगिरि तक सड़कों का निर्माण एवं मरम्मत कार्य करवाए गए तथा देवगिरि में बहुत से महलों, मकानों, गलियों एवं बाजारों आदि का निर्माण करवाया गया।

राजकोष के रीत जाने पर सुल्तान ने सोने-चांदी की मुद्राओं के स्थान पर ताँबे की संकेत मुद्राएँ चलाईं। तुगलक की सांकेतिक मुद्रा का विचार मन में आने से पहले मुहम्मद बिन तुगलक ने भिन्न-भिन्न प्रकार की मुद्राएँ ढलवाईं थीं जो कला की दृष्टि से बड़ी सुन्दर थीं। उसने दीनार नामक स्वर्ण मुद्रा चलाई तथा अदली नामक रजत-मुद्रा का पुनरुद्धार किया।

अब ऐसी मुद्राएं ढालने के लिए सुल्तान के पास पर्याप्त सोना-चांदी नहीं था। इसलिए उसने ताँबे की संकेत मुद्राएँ चलाईं। इतिहासकारों का मानना है कि उन दिनों न केवल भारतवर्ष में, अपितु सम्पूर्ण विश्व में चाँदी की कमी अनुभव की जा रही थी। चाँदी की मुद्रा के अभाव में लोगों को व्यापार तथा लेन-देन में बड़ी असुविधा हो रही थी। इस असुविधा को दूर करने के लिए ही मुहम्मद तुगलक ने ताँबे की मुद्रा चलाने की योजना बनाई थी। कहा जा सकता है कि तुगलक की सांकेतिक मुद्रा का चलन वैश्विक परिदृश्य के दबाव में हुआ।

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कुछ इतिहासकारों के अनुसार मुहम्मद तुगलक की सांकेतिक मुद्रा इसलिए चलाई गई क्योंकि उसे नई योजनाएँ बनाने का व्यसन था। वह सदैव नई-नई योजनाओं की कल्पना किया करता था। कुछ इतिहासकारों के अनुसार मुहम्मद बिन तुगलक सांकेतिक मुद्रा चलाकर ख्याति प्राप्त करना चाहता था। वह अपने नवीन कृत्यों द्वारा अपनी बुद्धिमत्ता का परिचय देना चाहता था तथा इतिहास में अपना नाम अमर करना चाहता था।

कुछ इतिहासकारों के अनुसार रिक्त कोष को भरने के लिए तुगलक की सांकेतिक मुद्रा की योजना बनाई गई। विद्रोहों को दबाने, अकाल-पीड़ितों की सहायता करने, नई योजनाओं को कार्यान्वित करने, नवीन भवनों का निर्माण करने तथा मुक्त-हस्त से पुरस्कार देने से राजकोष रिक्त हो गया था और सुल्तान बड़े आर्थिक संकट में पड़ गया था। इस आर्थिक संकट को दूर करने के लिए सुल्तान ने संकेत मुद्रा के चलाने की योजना बनाई।

कुछ इतिहासकारों के अनुसार मुहम्मद बिन तुगलक अस्थिर विचारों का व्यक्ति था। जब उसने देखा कि चीन, फारस आदि देशों में संकेत मुद्रा का प्रचलन है, तब उसने भी अपने राज्य में संकेत मुद्रा चलाने की आज्ञा दी।

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कुछ इतिहासकारों के अनुसार मुहम्मद बिन तुगलक विश्व-विजय की कामना से प्रेरित था और इस ध्येय की पूर्ति के लिए उसे एक विशाल सेना की आवश्यकता थी जिसके व्यय के लिए धन आवश्यक था। अतः तुगलक की सांकेतिक मुद्रा की योजना गई। प्रारम्भ में लोगों को संकेत मुद्रा से बड़ी सुविधा हुई परन्तु बाद में लोगों को आशंका हुई कि सरकार ने चाँदी की मुद्राओं का अपहरण करने के लिए यह योजना चलाई है। सरकार जनता से चाँदी की मुद्राएँ लेकर अपने राजकोष में भर लेगी और इनके स्थान पर ताँबे की मुद्राएँ प्रयुक्त होंगी। इस आशंका का परिणाम यह हुआ कि लोगों ने चाँदी तथा सोने की मुद्राओं को छिपा दिया तथा केवल ताँबे की मुद्राओं को व्यवहार में लाने लगे। स्वर्णकारों ने अपने घरों में टकसालें बना लीं और ताँबे की नकली मुद्राएं ढालने लगे। जियाउद्दीन बरनी ने लिखा है कि प्रत्येक हिन्दू का घर टकसाल बन गया। इसका परिणाम यह हुआ कि ताम्बे की मुद्राओं में अत्यन्त दु्रतगति से वृद्धि होने लगी। लोगों की ऐसी मनोवृत्ति हो गई कि देने के समय वे ताँबे की मुद्रा देना चाहते थे और लेने के समय चाँदी अथवा सोेने की मुद्रा प्राप्त करने का प्रयत्न करने लगे। इस मनोवृत्ति का व्यापार पर बुरा प्रभाव पड़ा। व्यापारियों ने तांबे की मुद्रा के बदले सामान देना बन्द कर दिया।

ऐसी स्थिति में सरकार का हस्तक्षेप करना अनिवार्य हो गया। फलतः सुल्तान ने यह आदेश निकाल दिया कि संकेत मुद्रा का प्रयोग बन्द कर दिया जाय और जिसके पास ताँबे की मुद्राएँ अर्थात् तुगलक की सांकेतिक मुद्रा हो, उनके बदले में वे सोने-चाँदी की मुद्राएँ ले लें। इस घोषणा का परिणाम यह हुआ कि सरकारी खजाने में ताँबे की मुद्राओं के ढेर लग गए तथा राजकोष से रहा-सहा सोना-चांदी भी निकल गया।

जब सुल्तान को इस बात की जानकारी हुई तो उसने अपनी सेना को आदेश दिया कि वह लोगों के घरों की तलाशी ले तथा जहाँ कहीं भी सोने-चांदी की मुद्राएं मिलें, उन्हें छीनकर शाही खजाने में जमा करवा दे। इस आदेश की तत्काल पालना हुई।

तुगलक के हजारों सैनिक दिल्ली की गलियों में छा गए। उन्होंने घर-घर जाकर तलाशी ली। लोगों को मारा-पीटा और सड़कों पर घसीटा गया ताकि वे धरती में छिपाई गई सोने-चांदी की मुद्राओं के बारे में बता दें। बहुत से लोग मार डाले गए और किसी के पास कुछ नहीं बचा। जनता फिर से कंगाल हो गई।

मुस्लिम प्रजा की बजाय हिन्दू प्रजा को इन अत्याचारों का अधिक शिकार होना पड़ा क्योंकि मुस्लिम प्रजा के पास कहने के लिए था कि उन्हें यह धन सुल्तानों द्वारा ईनाम के रूप में दिया गया जबकि हिंदुओं को तो धन संग्रहण करना मना था!

इतिहासकारों ने मुहम्मद बिन तुगलक द्वारा चलाई गई संकेत मुद्रा की तीव्र आलोचना की है और उस पर पागल होने का आरोप लगाया है परन्तु वास्तव में यह योजना मुहम्मद बिन तुगलक के पागलपन की नहीं, वरन् उसकी बुद्धिमता की परिचायक है। चीन तथा फारस में पहले से ही संकेत मुद्रा चल रही थी। आधुनिक काल में भी पूरे विश्व में संकेत मुद्रा का प्रचलन है।

चौदहवीं शताब्दी के भारत में संकेत मुद्रा का असफल हो जाना अवश्यम्भावी था क्योंकि साधारण जनता के लिए चांदी और ताँबे में बहुत अंतर था। वह संकेत मुद्रा विनिमय के महत्त्व को नहीं समझ सकी। यह योजना इसलिए भी असफल हो गई क्योंकि सरकार ने सुनारों को ताम्बे की मुद्रा ढालने से नहीं रोका।

सुल्तान को चाहिए था कि वह टकसाल पर राज्य का एकाधिकार रखता और ऐसी व्यवस्था करता जिससे लोग अपने घरों में तुगलक की सांकेतिक मुद्रा को नहीं ढाल पाते। अतः हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि सुल्तान की योजना गलत नहीं थी अपितु उसके कार्यान्वयन का ढंग गलत था तथा लोगों ने नकली मुद्राएं ढाल कर इस योजना को विफल कर दिया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

कराजल पर हमला कर दिया मुहम्मद बिन तुगलक ने (130)

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कराजल पर हमला - www.bharatkaitihas.com
कराजल पर हमला

सुंदर कराजली औरतें पाने के लिए मुहम्मद बिन तुगलक ने कराजल पर हमला कर दिया किंतु मुहम्मद और उसके सैनिक उन सुंदर औरतों को छू भी नहीं पाए।

मुहम्मद बिन तुगलक के शासन काल में भारत में घट रही घटनाओं के समाचार मध्यएशिया तक भी पहुंच रहे थे। दो-आब में कर बढ़ा देने तथा राजधानी के परिवर्तन से भारत की जनता में जो असंतोष उत्पन्न हो रहा था, उससे प्रोत्साहित होकर ई.1328 में मंगोलों ने तरमाशिरीन के नेतृत्व मेंं भारत पर आक्रमण कर दिया।

मंगोल सिंध नदी को पार करके दिल्ली के निकट आ गए। मुहम्मद बिन तुगलक ने मंगोलों से युद्ध करने के स्थान पर उन्हें बहुत-सा धन देकर उनसे अपना पीछा छुड़ाया।

मुहम्मद बिन तुगलक की मंगोलों को धन देने की नीति की तीव्र आलोचना की गई है। इससे मंगोलों को सुल्तान की दुर्बलता का पता लग गया और उनका भारत पर आक्रमण करने का प्रलोभन बढ़ गया परन्तु वास्तविकता यह है कि सुल्तान उन दिनों ऐसी परिस्थिति में नहीं था कि मंगोलों का सामना कर सके। सुल्तान के पास सल्तनत को नष्ट-भ्रष्ट होने तथा पराजय से बचाने का कोई दूसरा उपाय नहीं था।

मंगोलों से दोस्ती हो जाने के कुछ बरसों बाद मुहम्मद बिन तुगलक ने खुरासान पर विजय प्राप्त करने की योजना बनाई थी। इस योजना का सबसे बड़ा कारण मुहम्मद बिन तुगलक की महत्त्वाकांक्षा थी। इस समय सम्पूर्ण भारत दिल्ली सल्तनत के अधीन था और और अब मुहम्मद बिन तुगलक विदेश विजय का गौरव प्राप्त करना चाहता था।

सुल्तान के दरबार में उन दिनों कुछ खुरासानी अमीर रहते थे जिन्होंने सुल्तान को खुरासान की शोचनीय दशा के बारे में जानकारी देकर खुरासान पर आक्रमण करने के लिए प्रोत्साहित किया। इन दिनों खुरासान में अबू सईद नामक बादशाह का शासन था। वह अल्पवयस्क तथा दुराचारी था।

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अबू सईद के अमीर उससे असन्तुष्ट होकर षड्यन्त्र रच रहे थे तथा उसका संरक्षक अमीर चौगन राज्य को छीनने का प्रयास कर रहा था। अबू सईद ने चौगन की हत्या करवा दी। इससे खुरासान में बड़ी गड़बड़ी फैल गई और चौगन के पुत्र अपने पिता की मृत्यु का बदला लेने का अवसर ढूँढने लगे। खुरासान के विभिन्न प्रान्तों में भी गड़बड़ी फैली हुई थी। इन परिस्थितियों में सुल्तान के लिए खुरासान विजय की योजना बनाना अस्वाभाविक नहीं था।

मुहमद बिन तुगलक ने अपनी इस योजना को कार्यान्वित करने के लिए एक विशाल सेेना तैयार की। इन सैनिकों को एक वर्ष का वेतन पहले से ही दे दिया परन्तु परिस्थितियाँ बदल जाने से सुल्तान को खुरासान योजना त्याग देनी पड़ी।

योजना को त्यागने का पहला कारण यह था कि मिस्र के राजा ने खुरासान के सुल्तान अबू सईद से मैत्री कर ली और मुहमद बिन तुगलक की सहायता करने से इन्कार कर दिया।

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खुरासान आक्रमण की योजना को त्यागने का दूसरा कारण यह था कि इन्हीं दिनों चगताई अमीरों ने विद्रोह करके तरमाशिरीन को तख्त से उतार दिया जिससे अबू सईद को अपने राज्य की पूर्वी सीमा की ओर से आक्रमण की आंशका नहीं रह गई। तीसरा कारण यह था कि ऐसे दूरस्थ प्रदेश में हिन्दूकुश पर्वत के उस पार सेना तथा रसद भेजना और अपने सहधर्मियों से युद्ध करके विजय प्राप्त करना सरल कार्य नहीं था। इतिहासकारों द्वारा मुहमद बिन तुगलक की इस योजना की तीव्र आलोचना की गई है। आलोचकों का कहना है कि मार्ग की कठिनाइयों को ध्यान में नहीं रखते हुए ऐसे सुदूरस्थ देश की विजय की योजना बनाना पागलपन था परन्तु मुहमद बिन तुगलक के समर्थकों का कहना है कि यदि खुरासान से भारत पर आक्रमण करना सम्भव है, तब भारत से खुरासान पर आक्रमण करना क्यों सम्भव नहीं है। आलोचकों के अनुसार दो-आब के अकाल, राजधानी के परिवर्तन तथा संकेत मुद्रा की योजना विफल हो जाने से राज्य भयानक आर्थिक संकट में था, तब इस प्रकार की योजना बनाना मूर्खता ही थी परन्तु ऐसी कामनाएँ, अल्लाउद्दीन खिलजी भी कर चुका था। वास्तव में सुल्तान की योजना तर्कहीन नहीं थी। सम्भवतः परिस्थितियों के कारण ही मुहम्मद ने इस योजना को त्याग दिया था।

ई.1337 में मुहम्मद बिन तुगलक ने नगरकोट पर विजय प्राप्त करने का प्रयास किया, जो हिमाचल प्रदेश के काँगड़ा जिले में स्थित है। नगरकोट का दुर्ग एक पहाड़ी पर स्थित था और अभेद्य समझा जाता था। मुहम्मद बिन तुगलक ने एक लाख सैनिकों के साथ नगरकोट के किले पर आक्रमण कर दिया और उस पर विजय प्राप्त कर ली परन्तु सुल्तान ने फिर से वह किला वहाँ के राय को लौटा दिया और दिल्ली चला आया।

फरिश्ता का कहना है कि सुल्तान ने चीन तथा हिमाचल पर विजय प्राप्त करने की योजना बनाई। हिमाचल विजय की योजना चीन अभियान को सरल बनाने के लिए की गई थी। जियाउद्दीन बरनी का कहना है कि सुल्तान ने कराजल के पर्वतीय प्रदेश पर विजय प्राप्त करने की योजना बनाई जो चीन तथा हिन्द के मार्ग में स्थित है।

बरनी का कहना कि मुहमद बिन तुगलक ने कराजल पर हमला करने की योजना को इस उद्देश्य से बनाया था जिससे वह खुरासान पर सरलता से विजय प्राप्त कर सके परन्तु चंूकि कराजल खुरासान के मार्ग में नहीं पड़ता, अतः बरनी का मत अमान्य है।

हजीउद्दबीर का कहना है चूंकि कराजल की स्त्रियाँ अपने रूप तथा अन्य गुणों के लिए प्रसिद्ध थीं, इसलिए मुहमद बिन तुगलक उनसे विवाह करके उन्हें अपने रनिवास में लाना चाहता था। इसी ध्येय से उसने कराजल पर हमला करने की योजना बनाई थी। हजीउद्दबीर का मत भी अमान्य है क्योंकि तत्कालीन इतिहासकारों के अनुसार मुहमद बिन तुगलक का आचरण बड़ा पवित्र था।

अधिकांश इतिहासकारों की धारणा है कि मुहमद बिन तुगलक ने हिमाचल प्रदेश के कुछ विद्रोही सरदारों को दिल्ली सल्तनत के अधीन करने के लिए कराजल पर हमला करने की योजना बनाई थी। फरिश्ता का कहना है कि सुल्तान ने चीन से धन लूटने के लिए यह योजना बनाई थी। अनुमान है कि मुहमद ने तराई प्रदेश के किसी सरदार को दबाने के लिए हिमाचल पर आक्रमण किया था।

कराजल पर हमला करने के आरम्भ में मुहमद बिन तुगलक की सेना को अच्छी सफलता मिली परन्तु जब वर्षा ऋतु आरम्भ हुई तब मुहम्मद की सेना का पतन आरम्भ हो गया। वर्षा के कारण रसद का पहुँचना कठिन हो गया। इस भयानक परिस्थिति में शत्रु ने मुहमद बिन तुगलक की सेना पर आक्रमण कर दिया और उसे नष्ट-भ्रष्ट कर दिया।

कहा जाता है कि केवल दस सैनिक इस दुःखद घटना को सुनाने के लिए दिल्ली लौट सके। इतनी बड़ी क्षति होने पर भी मुहमद बिन तुगलक को अपने ध्येय में सफलता प्राप्त हो गई। चूंकि उस पहाड़ी सरदार के लिए पहाड़ के निचले प्रदेश में सुल्तान से विरोध करके बने रहना संभव नहीं था इसलिए उसने मुहमद बिन तुगलक की अधीनता स्वीकार कर ली।

कुछ इतिहासकारों ने मुहमद बिन तुगलक की कराजल पर हमला करने की योजना की बड़ी आलोचना की है और उसे पागल कहा है परन्तु इसमें पागलपन की कोई बात नहीं थी। पर्वतीय प्रदेश में जन-धन की क्षति होना स्वाभाविक था। अंग्रेजों को भी अफगानिस्तान एवं नेपाल में बड़ी क्षति उठानी पड़ी थी।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

बागी अमीरों का दमन करने के लिए उनकी खाल में भूसा भरा गया (131)

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बागी अमीरों का दमन

अफगानिस्तान में मंत्रियों को अमीर कहा जाता था। मुहम्मद बिन तुगलक के अमीरों ने बड़ी संख्या में विद्रोह किए। बागी अमीरों का दमन करने के लिए मुहम्मद बिन तुगलक ने उनकी खाल में भूसा भरवा कर देश भर में घुमाया।

पिछली कड़ी में हमने चर्चा की थी कि मुहम्मद बिन तुगलक ने करांचल, हिमाचल, नगरकोट एवं चीन पर आक्रमण करके अपनी सेनाओं को बहुत बड़ी क्षति पहुंचाई तथा ये योजनाएं असफल हो गईं जिससे सल्तनत की वास्तविक शक्ति को बहुत बड़ा आघात पहुंचा। इस कारण सल्तनत में चारों ओर विनाश के लक्षण दिखाई देने लगे।

इतिहासकारों के अनुसार मुहम्मद तुगलक के शासन काल के अन्तिम 16 वर्ष विपत्ति भरे थे। इस अवधि में सल्तनत के विभिन्न भागों में विद्रोह उठ खड़े हुए। ये विद्रोह अत्यन्त व्यापक क्षेत्र में विस्तृत थे। यदि एक विद्रोह उत्तर में होता तो दूसरा दक्षिण में और यदि एक विद्रोह पश्चिम में होता तो दूसरा सुदूर पूर्व में।

इससे सेना के संचालन में बड़ी कठिनाई होती थी। मुहम्मद बिन तुगलक के समय में चौंतीस विद्रोह हुए जिनमें से 27 दक्षिण भारत में हुए। इन विद्रोहों के कारण सल्तनत बिखरने लगी और कई स्वतन्त्र राज्यों की स्थापना हो गयी। बागी अमीरों का दमन करना आवश्यक हो गया।

सबसे पहला विद्रोह ई.1327 में मुहम्मद बिन तुगलक के चचेरे भाई वहाबुद्दीन गुर्शस्प ने किया जो गुलबर्गा के निकट सागर का सूबेदार था। शाही सेना ने इस विद्रोह को दबा दिया। मुहम्मद बिन तुगलक ने गुर्शस्प की खाल में भूसा भरवाकर उसे भारत के कई शहरों में प्रदर्शित करवाया और उसके शरीर का मांस चावल के साथ पकाकर उसके परिवार के पास खाने के लिए भेजा।

दूसरा विद्रोह ई.1328 में मुल्तान के सूबेदार बहराम आईबा उर्फ किश्लू खाँ ने किया। स्वयं मुहम्मद बिन तुगलक ने इस विद्रोह का दमन किया। बहराम आईबा का वध कर दिया गया। लाहौर का सूबेदार अमीर हुलाजू एक शक्तिशाली अमीर था। उसने भी मुहमद बिन तुगलक के विरुद्ध विद्रोह किया तथा शाही सेना द्वारा मारा गया।

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मुहम्मद बिन तुगलक के विरुद्ध तीसरा विद्रोह ई.1335 में मदुरा के गवर्नर जलालुद्दीन एहसान शाह ने किया। इस समय दो-आब में अकाल था और प्रजा में असन्तोष फैला हुआ था। इससे लाभ उठाकर जलालुद्दीन ने विद्रोह कर दिया। सुल्तान ने अपने प्रधानमन्त्री ख्वाजाजहाँ को इस विद्रोह का दमन करने के लिए भेजा परन्तु वह धार से वापस लौट आया।

अब मुहमद बिन तुगलक ने स्वयं दक्षिण के लिए प्रस्थान किया। जब सुल्तान तेलंगाना पहुँचा, तब वहाँ बड़े जोरों का हैजा फैल गया और मुहमद बिन तुगलक के बहुत से सैनिक मर गए। फलतः सुल्तान ने बागी अमीरों का दमन बीच में ही छोड़कर दिल्ली लौटने का निश्चय किया और एहसान शाह स्वतन्त्र हो गया।

एहसान शाह के विद्रोह का प्रभाव सल्तनत के अन्य भागों पर भी पड़ा। उत्तर तथा दक्षिण भारत में यह अफवाह फैल गई कि सुल्तान की मृत्यु हो गई है। फलतः ई.1335 में दौलताबाद के सूबेदार मलिक हुशंग ने विद्रोह कर दिया। सुल्तान की उस पर विशेष कृपा रहती थी परन्तु वह बड़ा महत्त्वाकांक्षी व्यक्ति था। अतः अवसर पाकर उसने विद्रोह कर दिया। अन्त में उसे भाग कर हिन्दू सरदारों के यहाँ शरण लेनी पड़ी। हालांकि मुहम्मद तुगलक बागी अमीरों का दमन करता था, उन्हें क्षमा नहीं करता था किंतु उसने मलिक हुशंग को क्षमा कर दिया।

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मुहमद बिन तुगलक की मृत्यु की सूचना पाकर उत्तर में एहसान शाह के पुत्र सैयद इब्राहिम ने भी विद्रोह कर दिया। इब्राहिम, सुल्तान का बड़ा विश्वासपात्र था। अन्त में उसने आत्म-समर्पण कर दिया। फिर भी उसकी हत्या करवा दी गई। इन दिनों पूर्वी बंगाल में बहराम खाँ शासन कर रहा था। उसके अंगरक्षक फखरूद्दीन ने ई.1337 में उसकी हत्या कर दी और स्वयं पूर्वी बंगाल का शासक बन गया। दिल्ली सल्तनत की दुर्दशा देखकर उसने स्वयं को बंगाल का स्वतन्त्र शासक घोषित कर दिया और अपने नाम की मुद्राएँ चलाने लगा। इस प्रकार मुहमद बिन तुगलक की असमर्थता के कारण बंगाल भी स्वतंत्र हो गया। बंगाल के विद्रोह की सफलता देखकर कड़ा के सूबेदार निजाम भाई ने भी विद्रोह कर दिया। ई.1338 में उसकी जीवित खाल खिंचवा ली गई। अलीशाह दिल्ली सल्तनत का एक उच्च अधिकारी था। उसे मुहमद बिन तुगलक ने दक्षिण में मालगुजारी वसूल करने के लिए गुलबर्गा भेजा परन्तु उसने गुलबर्गा के हाकिम की हत्या करके शाही खजाने पर अधिकार कर लिया। इसके बाद उसने बीदर पर भी अधिकार कर लिया। कुतलुग खाँ ने उसे परास्त करके बन्दी बना लिया। कुछ दिनों बाद उसका वध कर दिया गया।

आइन-उल-मुल्क अवध तथा जफराबाद का गवर्नर था। उसने दिल्ली सल्तनत की बड़ी सेवाएँ की थी। एक बार मुहमद बिन तुगलक दक्षिण के गवर्नर कुतलुग खाँ ख्वाजा के काम से असन्तुष्ट हो गया। इसलिए उसने कुतलुग खाँ ख्वाजा को वापस बुला लिया। सुल्तान ने आइन-उल-मुल्क को दक्षिण का गवर्नर नियुक्त करके उसे अपने परिवार के साथ दक्षिण जाने की आज्ञा दी।

यद्यपि आइन-उल-मुल्क के लिए यह बड़े गौरव की बात थी परन्तु उसे लगा कि सुल्तान ने उसे अवध से हटाने के लिए ऐसा किया है। इसलिए उसने विद्रोह कर दिया। उसका विद्रोह सबसे भयानक था। फिर भी शाही सेना ने उसे परास्त करके बंदी बना लिया। जब वह सुल्तान के सामने लाया गया तो सुल्तान ने उसकी सेवाओं तथा उसकी विद्वता को देखते हुए उसे क्षमा कर दिया।

मुहमद बिन तुगलक को विपत्ति में देखकर शाहू अफगान लोदी ने मुल्तान के सूबेदार को कैद करके स्वयं को मुल्तान का स्वतन्त्र शासक घोषित कर दिया। विद्रोह की सूचना पाते ही मुहमद बिन तुगलक ने दिल्ली से मुल्तान के लिए प्रस्थान किया।

इसकी सूचना पाते ही शाहू अफगान मुल्तान छोड़कर पहाड़ों में भाग गया और सुल्तान के पास एक प्रार्थना पत्र भेजकर क्षमादान की याचना की। बागी अमीरों का दमन करने का निश्चय त्यागकर मुहमद बिन तुगलक दिपालपुर से ही दिल्ली लौट आया।

सुल्तान के एक लाख सैनिक करांचल के अभियान में मारे जा चुके थे। उसके हजारों सैनिकों को हिन्दुओं ने अन्य अभियानों में मार डाला था, इसलिए अब उसमें इतनी शक्ति नहीं बची थी कि वह पहाड़ों में जाकर शाहू अफगान का पीछा करे।

अब वे दिन लद चुके थे जब सुल्तान अमीरों की खाल में भूसा भरवाकर उन्हें पूरे भारत में घुमा सके। यदि सुल्तान शाहू अफगान के पीछे जाता तो दिल्ली सल्तनत मुट्ठी में बंद रेत की तरह उसके हाथों से फिसल जाती। यह भी संभव था कि पहाड़ों में स्वयं मुहम्मद का भी वही हाल होता जो करांचल के अभियान में उसकी सेना का हो चुका था।

इसलिए सुल्तान ने दिपालपुर से ही लौटने में भलाई समझी किंतु सुल्तान का यह निर्णय खतरे की किसी घण्टी से कम नहीं था। दिल्ली सल्तनत की कमजोरी पूरे देश के समक्ष आ गई जिसके दूरगामी परिणाम हुए।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

विजयनगर तथा चित्तौड़गढ़ स्वतंत्र हो गए (132)

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विजयनगर तथा चित्तौड़गढ़ स्वतंत्र हो गए

जिस समय मुहम्मद बिन तुगलक अपनी अमीरों एवं प्रांतीय शासकों की बगावतों को कुचलने में लगा हुआ था, उस समय अवसर पाकर विजयनगर तथा चित्तौड़गढ़ के हिन्दू राज्य स्वतंत्र हो गए। विजयनगर तथा चित्तौड़गढ़ के ये दो बड़े राज्य दिल्ली के मुसलमानों तथा प्रांतीय मुस्लिम शासकों से कई सौ साल तक लड़ते रहे।

मुहम्मद बिन तुगलक की सेनाओं के कमजोर पड़ते ही देश भर में अनेक मुस्लिम गवर्नरों ने सुल्तान से विद्रोह करने आरम्भ कर दिए। इनमें से बहुत से विद्रोह कुचल दिए गए किंतु कुछ अमीर अपने स्वतंत्र राज्य खड़े करने में सफल हो गए। इनमें तेलंगाना, बंगाल तथा गुलबर्गा प्रमुख थे।

जब मुस्लिम गवर्नर बड़ी संख्या में विद्रोह करने लगे तो हिन्दुओं ने भी नए सिरे से भाग्य आजमाने का निर्णय लिया। ई.1336 में हरिहर तथा बुक्का नामक दो भाइयों ने विजय नगर राज्य की स्थापना की। हरिहर तथा बुक्का, तेलंगाना के काकतीय राजा स्वर्गीय प्रताप रुद्रदेव (द्वितीय) के सम्बन्धी थे और दिल्ली में बन्दी बना कर रखे गए थे।

ई.1335 में तेलंगाना के हिन्दुओं ने विद्रोह का झण्डा खड़ा कर दिया। इस गम्भीर स्थिति में सुल्तान ने हरिहर तथा बुक्का की सहायता से वहाँ पर शान्ति स्थापित करने का प्रयास किया। उसने हरिहर को उस क्षेत्र का शासक और बुक्का को उसका मन्त्री बनाकर भेज दिया। वहाँ पहुँचकर हरिहर ने अपनी शक्ति संगठित कर ली और विजयनगर के स्वतन्त्र राज्य की स्थापना कर ली।

आगे चलकर विजयनगर साम्राज्य अपनी समृद्धि तथा उच्च सांस्कृतिक वैभव के कारण संसार भर में प्रसिद्ध हुआ। विजयनगर साम्राज्य ने कई शताब्दियों तक दक्षिण में हिन्दू धर्म की पताका को लहराए रखा। उन दिनों काकतीय राजा प्रताप रुद्रदेव (द्वितीय) का पुत्र कृष्ण नायक वारांगल का राजा था।

दक्षिण के विद्रोहों को सफल होते हुए देखकर उसे भी बड़ा प्रोत्साहन मिला। ई.1343 में उसने मुसलमानों के विरुद्ध एक संघ बनाया। ये लोग वारांगल, द्वारसमुद्र तथा कोरोमण्ड तट के समस्त प्रदेश को दिल्ली सल्तनत से स्वतन्त्र करने में सफल हुए। इस कारण दक्षिण में देवगिरि तथा गुजरात ही दिल्ली सल्तनत के अधिकार में रह गए।

उन्हीं दिनों सुनम तथा समाना के जाटों, भट्टी राजपूतों एवं पहाड़ी सामंतों ने विद्रोह किये। मुहमद बिन तुगलक ने इन विद्रोहों में कड़ा रुख अपनाया तथा विद्रोहियों के नेताओं को पकड़ कर बलपूर्वक मुसलमान बनाया। दिल्ली सल्तनत में आरम्भ हुई बगावतों की आंधी से शताधिकारी मुसलमान भी नहीं बच सके। उन दिनों कुछ विदेशी अमीरों को शताधिकारी कहा जाता था। वे लोग प्रायः एक शत सैनिकों के नायक हुआ करते थे और एक शत गाँवों में शान्ति रखने तथा कर वसूलने का उत्तरदायित्व निभाते थे।

इस रोचक इतिहास का वीडियो देखें-

दिल्ली के सुल्तान के प्रति इनकी कोई विशेष श्रद्धा नहीं थी और वेे सदैव अपनी स्वार्थ-सिद्धि में संलग्न रहते थे। जब मुहमद बिन तुगलक ने उन्हें अनुशासित बनाने का प्रयत्न किया, तब उन लोगों ने विद्रोह कर दिया। इस विद्रोह का दमन करने, मुहमद बिन तुगलक को स्वयं दक्षिण जाना पड़ा।

उसने विद्रोहियों को परास्त करके उन्हें तितर-बितर कर दिया। पाठकों को स्मरण होगा कि अल्लाउद्दीन खिलजी ने ई.1303 में चित्तौड़ के रावल रतनसिंह को छल से मारकर गुहिलों के चित्तौड़ राज्य को समाप्त कर दिया था तथा अपने पुत्र खिज्र खाँ को चित्तौड़ का शासक नियुक्त किया था। ई.1313 में खिज्र खाँ चित्तौड़ छोड़कर दिल्ली चला गया।

इस पर अल्लाउद्दीन खिलजी ने जालोर के स्वर्गीय चौहान राजा कान्हड़देव के भाई मालदेव सोनगरा को चित्तौड़गढ़ दुर्ग पर नियुक्त किया। मालदेव सात साल तक चित्तौड़ का किलेदार रहा। ई.1322 के लगभग चित्तौड़ दुर्ग में ही उसका निधन हुआ। उसके बाद उसका पुत्र जैसा अर्थात् जयसिंह चित्तौड़ का दुर्गपति हुआ। उ

न दिनों गुहिलों की एक शाखा सीसोद में जागीरदार के रूप में शासन कर रही थी जो राणा कहलाते थे। जब ई.1336 में विजयनगर साम्राज्य की स्थापना हो गई तथा ई.1337 में मुहम्मद बिन तुगलक के एक लाख सिपाही करांचल के अभियान में मार डाले गए तो सीसोद के राणाओं ने भी अपने पुराने राज्य का उद्धार करने का निश्चय किया।

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ई.1338 में एक दिन राणा हमीर के सैनिकों ने अचानक चित्तौड़ दुर्ग पर धावा बोल दिया। दुर्ग में स्थित सोनगरा सिपाही संभल नहीं पाए और राणा हम्मीर के सैनिकों ने तुगलक तथा चौहान सैनिकों को पकड़-पकड़कर रस्सियों से बांध दिया। दुर्गपति जैसा किसी तरह भाग निकलने में सफल हो गया। इसके बाद राणा के सैनिकों ने शत्रु सैनिकों के शरीरों के साथ बड़े-बड़े पत्थर बांध दिए और उन्हें दुर्ग की दीवारों से नीचे गिरा दिया। देखते ही देखते दुर्ग पर सिसोदियों का अधिकार हो गया। चित्तौड़ से निकाल दिये जाने के बाद जैसा दिल्ली पहुंचा तथा सुल्तान को सारी परिस्थिति से अवगत करवाया। सुल्तान मुहम्मद बिन तुगलक ने जैसा को एक सेना देकर पुनः चित्तौड़ के लिये रवाना किया। इस बीच राणा हमीर पूरी तैयारी कर चुका था। उसने अपने सम्पूर्ण संसाधन झौंककर दुर्ग की मरम्मत करवा ली तथा चित्तौड़ के पुराने विश्वस्त राजाओं एवं जागीरदारों को दुर्ग की रक्षा के लिए बुला लिया। इन तैयारियों एवं श्रेष्ठ रणनीति के कारण राणा हम्मीर की सेना दिल्ली की सेना पर भारी पड़ गई। दिल्ली की सेना न केवल परास्त हुई अपितु सिसोदियों द्वारा लगभग पूरी नष्ट कर दी गई। इस प्रकार ई.1303 में छल-बल से की गई रावल रत्नसिंह की पराजय का बदला ई.1338 में ले लिया गया।

चित्तौड़ दुर्ग में महावीर स्वामी के मंदिर में महाराणा कुम्भा के समय का एक शिलालेख लगा है जिसमें राणा हमीर को असंख्य मुसलमानों को रणखेत में मारकर कीर्ति संपादित करने वाला कहा गया है।

इस विजय से राणा हमीर का हौंसला बढ़ गया। उसने एक-एक करके मेवाड़ राज्य के समस्त पुराने क्षेत्रों पर अधिकार कर लिया। इसके बाद उसने जीलवाड़ा, गोड़वाड़, पालनपुर तथा ईडर पर भी अधिकार कर लिया। राणा हमीर ने मेवाड़ी भीलों के एक बड़े दल को मारा तथा हाड़ौती के मीणों के विरुद्ध कार्यवाही करके हाड़ा देवीसिंह को बूंदी का राज्य दिलवाया। हाड़ा राजपूत रणथंभौर के चौहानों से ही निकले थे।

मुहम्मद बिन तुगलक के शासन काल के ठीक मध्य में गुहिलों के साम्राज्य की पुनर्स्थापना हो गई और कुछ ही वर्षों में छोटी सी सीसोद जागीर का जागीरदार हमीर, चित्तौड़ का पराक्रमी महाराणा बन गया।

इस प्रकार विजयनगर तथा चित्तौड़गढ़ के हिन्दू राज्य चौदहवीं शताब्दी ईस्वी में लगभग एक साथ ही अस्तित्व में आ गए। इनमें से विजयनगर नया राज्य था जबकि चित्तौड़गढ़ तो लगभग सात सौ साल पुराना राज्य था।

विजयनगर तथा चित्तौड़गढ़ के हिन्दू राज्यों की स्थापना होने से अन्य हिन्दू राजाओं एवं राजकुमारों को भी अपने राज्य फिर से स्वतंत्र करने एवं नए राज्य स्थापित करने की प्रेरणा मिली।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

दक्षिण भारत के शियाराज्य विजयनगर के शत्रु हो गए (133)

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दक्षिण भारत के शियाराज्य विजयनगर के शत्रु हो गए

विजयनगर के अस्तित्व में आने के बाद दक्षिण भारत में बहमनी शिया राज्य की स्थापना हुई जो कुछ समय बाद पाँच शिया राज्यों में टूट गया। दक्षिण भारत के शियाराज्य विजयनगर के हिन्दू राज्य के कट्टर शत्रु हो गए।

देश भर में हिन्दू राजाओं ने दिल्ली सल्तनत के विरुद्ध विद्रोह करके अपने राज्य स्वतंत्र करवा लिए जिनमें विजयनगर एवं चित्तौड़गढ़ प्रमुख थे। इसके बाद दक्षिण भारत में स्वतंत्र मुस्लिम राज्यों की स्थापना के लिए नए सिरे से विद्रोह आरम्भ हुए। इनमें ‘सादा अमीर’ अर्थात् विदेशी मुसलमान सबसे आगे थे। उन्होंने ई.1347 में दौलताबाद के किले पर अधिकार कर लिया तथा इस्माइल अफगान नामक एक वृद्ध अमीर को दक्कन अर्थात् दक्षिण भारत का सुल्तान घोषित कर दिया। इस्माइल अफगान अय्याश किस्म का आदमी था।

उन्हीं दिनों हसन गंगू नामक एक विदेशी अमीर कुछ विद्रोहियों के साथ राजधानी दिल्ली छोड़कर दक्षिण भारत की ओर भाग गया। उसने इस्माइल अफगान को सुल्तान के पद से हटा दिया और 3 अगस्त 1347 को स्वयं दक्कन का सुल्तान बन गया। हसन गंगू ने गुलबर्गा को अपनी राजधानी बनाया। उसने जफर खाँ की उपाधि धारण की तथा अल्लाउद्दीन बहमनशाह के नाम से सुल्तान की गद्दी पर बैठा। उसके राज्य को बहमनी सल्तनत कहा गया। वह स्वयं को ईरान के शाह बहमन बिन असफन्द यार का वंशज बताता था।

फरिश्ता के अनुसार अल्लाउद्दीन बहमनशाह का असली नाम हसन था और वह दिल्ली के गंगू नामक ब्राह्मण ज्योतिषी का नौकर था। इस ज्योतिषी का सुल्तान मुहम्मद बिन तुगलक के पास आना-जाना था। एक बार हसन को ब्राह्मण गंगू के खेत में स्वर्ण मुद्राओं से भरा कलश प्राप्त हुआ। हसन ने वह कलश खेत के स्वामी अर्थात् गंगू ब्राह्मण को सौंप दिया।

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हसन की इस ईमानदारी से प्रसन्न होकर गंगू ब्राह्मण ने हसन को आशीर्वाद दिया कि एक दिन वह राजा बनेगा। कहा जाता है कि ब्राह्मण ने उससे वचन भी लिया कि जब वह राजा बने तो मुझे अपना प्रधानमंत्री नियुक्त करे।

गंगू ब्राह्मण ने हसन की ईमानदारी का उल्लेख सुल्तान मुहम्मद बिन तुगलक से भी किया। इस पर सुल्तान ने हसन को अपनी सेना में बड़ा पद दे दिया। हसन ने उस ब्राह्मण के प्रति श्रद्धा प्रकट करने के लिए अपना नाम हसन गंगू रख लिया। उस ब्राह्मण की कृपा और सुल्तान के स्नेह के कारण हसन गंगू दिल्ली सल्तनत की राजनीति में ऊँचा चढ़ने लगा।

फरिश्ता के अनुसार जब हसन दक्कन का सुल्तान बन गया तो उसने अपने पुराने स्वामी गंगू ब्राह्मण के प्रति सम्मान प्रकट करने के लिए बहमनशाह की उपाधि धारण की तथा अपने राज्य का नाम ‘ब्राह्मणी’ अथवा बहमनी रखा।

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कुछ इतिहासकार फरिश्ता द्वारा दिए गए इस मत को स्वीकार नहीं करते। उनके अनुसार हसन गंगू एक धर्मांध सुल्तान था, हिन्दुओं के प्रति उसका व्यवहार असहिष्णुतापूर्ण था इसलिये यह संभव नहीं है कि उसने अपने राज्य का नाम ब्राह्मणी राज्य रखा हो। मेजर हेग ने फरिश्ता द्वारा दिए गए इस मत को अस्वीकार करते हुए लिखा है कि हसन ने कभी अपना नाम ब्राह्मणी नहीं रखा। उसकी मुद्राओं, मस्जिद के शिलालेखों तथा ग्रन्थों में भी उसका नाम बहमनशाह मिलता है। आधुनिक इतिहासकारों की धारणा है कि हसन गंगू फारस के शाह बहमन बिन असफन्द यार का वंशज था। इस कारण उसका वंश बहमनी कहलाया। यह अवधारणा ही अधिक सही प्रतीत होती है। बहमनी सल्तनत दक्षिण भारत का पहला स्वतंत्र मुस्लिम राज्य था। हसन गंगू ने गुलबर्गा को अपनी राजधानी बनाया तथा उसका नाम बदलकर अहसानाबाद कर दिया। वह एक धर्मांध शासक सिद्ध हुआ और सुल्तान बनते ही उसने विजयनगर साम्राज्य से शत्रुता कर ली। उसने अपने पड़ौसी राज्यों पर आक्रमण करके उत्तर में बाणगंगा से लेकर दक्षिण में कृष्णा नदी तक अपने राज्य का विस्तार कर लिया तथा राज्य को गुलबर्गा, दौलताबाद, बरार और बीदर नामक चार प्रांतों में विभक्त किया जिन्हें अतरफ कहा जाता था। प्रत्येक अतरफ में एक सूबेदार की नियुक्ति की गई।

4 फरवरी 1358 को हसन गंगू की मृत्यु हो गयी। वह एक कट्टर मुस्लिम एवं धर्मान्ध शासक सिद्ध हुआ। उसके उत्तराधिकारी भी दक्षिण के हिन्दू राज्यों के साथ प्रेमभाव से नहीं रह सके और विजयनगर साम्राज्य से निरंतर युद्ध करके उसे नष्ट करने का प्रयास करते रहे।

ई.1347 से ई.1527 तक बहमनी सल्तनत में 14 शासक हुए। इनमें से मुहम्मद (द्वितीय) नामक सुल्तान को छोड़कर शेष समस्त सुल्तान क्रूर और धर्मान्ध थे। इस कारण सल्तनत में हिंसा, क्रूरता और षड़यंत्र अपने चरम पर रहते थे।

अन्त में बहमनी राज्य पाँच शिया राज्यों- बीजापुर, गोलकुण्डा, बरार, बीदर और अहमदनगर में विभाजित हो गया। दक्षिण भारत के शियाराज्य पारस्परिक द्वेष एवं संघर्ष के कारण कमजोर होते चले गए। ये पांचों मुस्लिम राज्य हमेशा लड़ते रहते थे किंतु विजयनगर साम्राज्य को नष्ट करने के लिए एक साथ होकर लड़े और इन्होंने विजयनगर साम्राज्य नष्ट कर दिया।

ई.1526 में मुगल आक्रांता बाबर के भारत पर आक्रमण के समय दक्षिण भारत के शियाराज्य भारी अराजकता से त्रस्त थे। अकबर के शासन काल में अहमद नगर तथा बरार को और औरंगजेब के समय में बीदर, बीजापुर तथा गोलकुण्डा को मुगल सल्तनत में मिला लिया गया।

मुगलों ने दक्षिण भारत के शियाराज्य नष्ट क्यों किए? इसकी भी एक रोचक पहेली है! बहमनी राज्य का संस्थापक गंगू हसन बहमनशाह ईरान से आया हुआ शिया मुसलमान था। इस कारण बहमनी राज्य के टूटने पर बने ये पांचों राज्य भी शिया राज्य थे। जबकि मुगल बादशाह सुन्नी मुसलमान थे। वे नहीं चाहते थे कि भारत में एक भी शिया राज्य अस्तित्व में रहे। इस कारण मुगल सल्तनत इन पांचों शिया राज्यों को निगल गई।

ई.1351 में मुहमद बिन तुगलक को गुजरात में तगी नामक अमीर द्वारा विद्रोह किए जाने की सूचना मिली। उसके विद्रोह को दबाने के लिए सुल्तान मुहम्मद बिन तुगलक ने स्वयं एक सेना के साथ गुजरात के लिए प्रस्थान किया।

जब तगी ने सुना कि सुल्तान स्वयं एक सेना लेकर आ रहा है तो तगी जूनागढ़ से सिन्ध की ओर भाग गया। जूनागढ़ का पुराना नाम गिरिनार था। मुहम्मद बिन तुगलक उसका पीछा करते हुए थट्टा पहुँचा। 20 मार्च 1351 को मुहम्मद बिन तुगलक की अचानक मृत्यु हो गई।

बदायूनी ने लिखा है- ‘सुल्तान को उसकी प्रजा से तथा प्रजा को सुल्तान से मुक्ति मिल गई।’

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुहम्मद बिन तुगलक को पागल घोषित कर दिया मुल्ला-मौलवियों ने (134)

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मुहम्मद बिन तुगलक को पागल घोषित कर दिया मुल्ला-मौलवियों ने

मुहम्मद बिन तुगलक के जीवन काल में ही दक्षिण भारत में हसन गंगू नामक एक ईरानी अमीर ने बहमनी सल्तनत की स्थापना कर ली जो आगे चलकर पांच शिया राज्यों में विभक्त हो गया। दक्षिण भारत के शियाराज्य हर समय आपस में लड़ते रहते थे किंतु विजयनगर के हिन्दू राज्य से लड़ने के लिए एक झण्डे के नीचे एकत्रित हो जाया करते थे।

मुहम्मद बिन तुगलक नहीं चाहता था कि भारत में दिल्ली के प्रबल सुन्नी राज्य के अतिरिक्त और किसी भी मजहब या धर्म का कोई राज्य खड़ा रहे किंतु मुहम्मद की कुछ योजनाओं ने न केवल दिल्ली सल्तनत के खजाने को क्षति पहुंचाई थी अपितु सल्तनत की सेना का भी नाश कर दिया था। इस कारण मुल्ला-मौलवियों ने मुहम्मद बिन तुगलक को पागल घोषित कर दिया।

मुहम्मद बिन तुगलक आज से लगभग सात सौ पहले के भारत का शासक था। उस समय के सुल्तानों का कार्य राजकोष में सोना-चांदी भरने, विधर्मियों को बलपूर्वक मुसलमान बनाने, अपने राज्य की सीमाओं का विस्तार करने तथा अपने विरोधियों को समाप्त करने तक सीमित होता था किंतु मुहम्मद बिन तुगलक ने इन कार्यों के साथ-साथ कुछ ऐसी योजनाएं बनाईं जो सफल होने पर दूरगामी परिणाम दे सकती थीं किंतु उनके असफल होने पर राज्य नष्ट हो सका था।

सल्तनत के अमीर एवं सेनापति साधारण बुद्धि के थे तथा मुल्ला-मौलवी धर्मांध थे। वे मुहम्मद बिन तुगलक की योजनाओं को समझ नहीं पाए, इस कारण उन्होंने सुल्तान से सहयोग नहीं किया और उसकी लगभग समस्त बड़ी योजनाएं विफल हो गईं। परिणामतः राज्य के कोष, सेना एवं सीमा तीनों ही सिमट गए।

मुल्ला-मौलवियों ने मुहम्मद बिन तुगलक की प्रत्येक योजना के लिए उसे पागल घोषित किया। जब हम मुहम्मद बिन तुगलक की योजनाओं की बारीकियों में जाते हैं तो हमें उसका व्यक्तित्व प्रतिभा, महत्त्वाकांक्षा और दुर्भाग्य का अनोखा सम्मिश्रण दिखाई देता है।

मुहम्मद बिन तुगलक की प्रतिभा ने उसे नई योजनाएं बनाने के लिए प्रेरित किया, उसकी अदम्य महत्त्वाकांक्षाओं ने उसे पिता और भाई की हत्या जैसे क्रूर कर्म करने के लिए प्रेरित किया और उसके दुर्भाग्य ने उसकी प्रत्येक योजना को विफल कर दिया।

इस रोचक इतिहास का वीडियो देखें-

उस काल में सल्तनत के मंत्री प्रायः मुल्ला-मौलवी और उलेमा हुआ करते थे, उनका दृष्टिकोण संकुचित होता था और वे राज्य को अपने हिसाब से चलाना चाहते थे जिसमें दूसरे धर्म वालों के लिए जगह नहीं होती थी। मुहम्मद को यह बात पसंद नहीं थी, इसलिए वह मुल्ला-मौलवियों की सलाह की उपेक्षा करता था।

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यदि कोई मुल्ला-मौलवी, मुफ्ती या काजी जनता पर अत्याचार करता हुआ पाया जाता था तो सुल्तान उस मुल्ला-मौलवी को दण्डित करता था। यहाँ तक कि उन्हें सरेआम कोड़ों से पिटवाता था! चौदहवीं शताब्दी के इस्लामी राज्य में मुल्ला-मौलवियों को कोड़ों से पिटते हुए देखना किसी अजूबे से कम नहीं था। सुल्तान ने मुल्ला-मौलवियों एवं उलेमाओं को न्याय करने के अधिकार से वंचित कर दिया जिसे वे अपना एकाधिकार समझते थे। इस कारण राज्य में उलेमाओं का वर्चस्व समाप्त हो गया और वे सुल्तान के विरोधी होकर उसकी निंदा करते थे। जियाउद्दीन बरनी जो कि स्वयं एक उलेमा था, वह सुल्तान मुहम्मद बिन तुगलक का इतना विरोधी था कि उसने अपनी पुस्तक में सुल्तान के काल की घटनाओं को पूरी तरह बिगाड़कर लिखा। मुहम्मद बिन तुगलक के दुर्भाग्य से उसके शासन काल में दो-आब में लम्बा दुर्भिक्ष पड़ा। इस कारण सुल्तान अपना दरबार सरगद्वारी नामक स्थान पर ले गया और वहाँ पर ढाई वर्ष तक रहकर अकाल-पीड़ितों की सहायता करता रहा। उसने किसानों को लगभग 70 लाख रुपये तकावी के रूप में बँटवाये तथा बड़ी संख्या में कुएँ खुदवाए। मुहम्मद बिन तुगलक में महान् आदर्शवाद के साथ नृशंसता, अपार उदारता के साथ निर्दयता तथा आस्तिकता के साथ-साथ घोर नास्तिकता मौजूद थी। कुछ इतिहासकारों ने उसे विभिन्नताओं का सम्मिश्रण कहा है।

इब्नबतूता लिखता है-

‘मुहम्मद दान देने तथा रक्तपात करने में सबसे आगे है। उसके द्वार पर सदैव कुछ दरिद्र मनुष्य धनवान होते हैं तथा कुछ प्राणदण्ड पाते देखे जाते हैं। अपने उदार तथा निर्भीक कार्यों और निर्दय तथा हिंसात्मक व्यवहारों के कारण जन-साधारण में उसकी बड़ी ख्याति है।

यह सब होते हुए भी वह बड़ा विनम्र तथा न्यायप्रिय है। धार्मिक अवसरों के प्रति उसकी बड़ी सहानुभूति है। वह इबादत बड़ी सावधानी से करता है और उसका उल्लंघन करने पर कठोर दण्ड की आज्ञा देता है। उसका वैभव विशाल है और उसका आमोद-प्रमोद साधारण सीमा का उल्लंघन कर गया है किन्तु उसकी उदारता उसका विशिष्ट गुण है।’

इब्नबतूता से ठीक उलट जियाउद्दीन बरनी ने लिखा है-

‘सुल्तान की शारीरिक तथा मानसिक शक्तियाँ असीम गुण-सम्पन्न नहीं समझी जा सकतीं। उसकी साधारण दयालुता, सैयदों एवं इस्लाम-भक्त मुसलमानों को मृत्यु-दण्ड देने की उत्कण्ठा तथा उसकी आस्तिकता गर्म एवं ठण्डी साँस लेने के समान प्रतीत होती हैं। यह एक ऐसा रहस्य है जो बुद्धिभ्रम उत्पन्न कर देता है।’

डॉ. ईश्वरी प्रसाद ने लिखा है- ‘ऊपर से देखने पर हमें प्रतीत होता है कि मुहम्मद विरोधी तत्त्वों का आश्चर्यजनक योग था किन्तु वास्तव में वह ऐसा नहीं था। गवेषणात्मक दृष्टि से देखने पर ये विभिन्नताएँ निर्मूल सिद्ध हो जाती हैं। वह मध्यकालीन शासकों में सर्वाधिक विद्वान् तथा प्रतिभाशाली था।

उसकी योजनाएँ, उसकी बुद्धिमत्ता तथा उसके व्यापक दृष्टिकोण की परिचायक हैं। उसकी विफलताएँ, उसकी मूर्खता की परिचायक नहीं हैं। उसके विचार तथा सिद्धान्त गलत नहीं थे। उसे विफलता कर्मचारियों की अयोग्यता तथा प्रजा के असहयोग के कारण मिलती थी।

सुल्तान के आदर्श ऊँचे थे। उसने अपने आदर्शों को क्रियात्मक रूप में बदले का प्रयास किया। उसकी योजनाएँ विपरीत परिस्थितियों के कारण असफल रहीं परन्तु अनुकूल परिस्थितियों में उनकी सफल कार्यान्विती हो सकती थी।’

एल्फिन्सटन पहला इतिहासकार था जिसने सुल्तान में पागलपन का कुछ अंश होने का लांछन लगाया। परवर्ती यूरोपीय इतिहासकारों हैवेल, इरविन, स्मिथ तथा लेनपूल ने भी एल्फिन्स्टन के इस मत का अनुमोदन किया परन्तु आधुनिक इतिहासकार इस मत को स्वीकार नहीं करते।

यद्यपि बरनी तथा इब्नबतूता ने सुल्तान के कार्यों की तीव्र आलोचना की है तथापि उस पर पागलपन का लांछन नहीं लगाया है।

गार्डिनर ब्राउन ने लिखा है- ‘उसके समय के किसी भी व्यक्ति ने इस बात की ओर संकेत नही किया है कि वह पागल था। उसके व्यावहारिक तथा सक्रिय चरित्र से यह पता नहीं लगता कि वह कोरा-काल्पनिक था।’

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

हिन्दू खतरे में थे ! हिन्दुओं के चोटी, पोथी और मूर्ति भी खतरे में थे (135)

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हिन्दू खतरे में थे

मुहम्मद बिन तुगलक के काल में हिन्दू खतरे में थे। उनकी चोटी, पोथी और मूर्तियाँ भी खतरे में थीं। उत्तर भारत में सुन्नी शासक तथा दक्षिण भारत में शिया शासक हिन्दुओं को निरंतर नष्ट कर रहे थे किंतु इस काल में हिन्दू जाति भी वीरता पूर्वक मुसलमानों से संघर्ष कर रही थी।

मुहम्मद बिन तुगलक में विभिन्न प्रकार के विरोधी गुणों का मिश्रण था किंतु वह पागल नहीं था। उसकी योजनाएं समय से आगे थीं तथा आधुनिक युग में उसकी बहुत सी योजनाओं को अमल में लाया जाता है किंतु उसके स्वार्थी अमीर एवं लालची मुल्ला-मौलवी सुल्तान की किसी भी योजना को पूरा नहीं होने देते थे।

मुहम्मद बिन तुगलक भारत के देशी अमीरों की अयोग्यता के कारण अपनी सल्तनत में विदेशी अमीरों को उच्च पद देता था। इस कारण देशी अमीर सुल्तान के विरोधी हो गए। हालांकि विदेशी अमीर भी पूरी तरह धोखेबाज थे और अवसर मिलते ही बगावत कर देते थे। जब लालची मौलवियों को सुल्तान के सिपाही सरेआम कोड़ों से मारते थे तब वे सब एक स्वर में सुल्तान को इस्लाम-विरोधी कहने लगते थे।

जियाउद्दीन बरनी ने लिखा है- ‘मुहम्मद बिन तुगलक अपने युवाकाल में नास्तिक लोगों के सम्पर्क में आया था इस कारण वह इस्लाम का विरोधी हो गया था

…… नास्तिक एवं अहंकारी होने के कारण सुल्तान मुहम्मद बिन तुगलक अल्लाह एवं इस्लाम में बहुत कम विश्वास करता था

…… मैं सुल्तान के पास सत्रह साल तथा तीन महीने रहा और हमेशा उससे कमीने तथा निम्नकुल की निंदा सुना करता था किंतु अपने शासन के अंतिम वर्षों में मुहम्मद ने उन्हीं कमीनों तथा नीचकुल के लोगों को अपनी सल्तनत में उच्च पदों पर आसीन किया।

…… सुल्तान के शरीर एवं मस्तिष्क के अनिश्चित साधन समझ के परे थे। उसमें अपार उदारता थी तो सैयदों को मारने की इच्छा भी।’

जियाउद्दीन बरनी ने अपनी पुस्तकों में मुहम्मद के जिस चरित्र को दिखाने का प्रयास किया है, वास्तविकता उससे कोसों परे है। मुहम्मद इस्लामी दर्शन, गणित, ज्योतिष तथा भौतिक विज्ञान का गंभीर ज्ञाता था। वह फारसी साहित्य तथा काव्य का भी अच्छा ज्ञान रखता था। उसे सुलेखकला, कलित कलाओं और विशेषकर संगीत से अत्यधिक प्रेम था। स्वयं बरनी ने कई स्थानों पर मुहम्मद के उच्च चरित्र की प्रशंसा की है। इब्नबतूता की पूरी पुस्तक मुहम्मद बिन तुगलक की प्रशंसा से भरी पड़ी है।

इस रोचक इतिहास का वीडियो देखें-

मुहम्मद बिन तुगलक को न केवल सिकंदरनामा, अबू मुस्लिम नामा, तारीखे महदी आदि ग्रंथों का ज्ञान था अपितु उसे कुरान याद था।

इतिहासकार हरिशंकर शर्मा ने लिखा है- ‘जिस समय मुहम्मद बिन तुगलक अपनी राजधानी दिल्ली से देवगिरि ले जा रहा था और खुरासान पर आक्रमण की योजना बना रहा था, उन दिनों मुहम्मद धार्मिकशोध भी कर रहा था। अंत में निराशा के साथ उसने यह भी व्यक्त किया था कि मानव ने मूर्तिपूजक होना पसंद किया होता। उसका हिन्दुओं के साथ अनुराग था, इसकी पुष्टि उसके संस्कृत भाषा के प्रति प्रेम तथा हिन्दू महात्माओं के संसर्ग से भी होती है।’

हरिशंकर शर्मा की यह बात सही प्रतीत नहीं होती क्योंकि जब हम मुहम्मद बिन तुगलक के शासनकाल की घटनाओं को देखते हैं तो मुहम्मद बिन तुगलक हिन्दुओं के प्रति दुराग्रहपूर्ण रवैये के साथ शासन करता हुआ दिखाई देता है। उसने हिन्दुओं से पचास प्रतिशत तथा मुसलमानों से 10-15 प्रतिशत कर लिया। हिन्दुओं पर जजिया एवं तीर्थकर जारी रखे। उन्हें घोड़े पर बैठने, नवीन वस्त्र धारण करने, सम्पत्ति रखने के अधिकार नहीं दिए तथा सांकेतिक मुद्रा के प्रकरण में हिन्दुओं के समस्त धन का अपहरण करने का कार्य किया।

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मुहम्मद बिन तुगलक के शासन काल में दो-आब के हिन्दुओं पर इतने अधिक अत्याचार किए गए कि हजारों हिन्दू अपने घर छोड़कर जंगलों में भाग गए। ऐसे लोगों को पकड़कर मार डाला गया, उनके घरों में आग लगाई गई तथा उनकी स्त्रियों से बलात्कार किए गए। हिन्दू लेखकों ने मुहम्मद बिन तुगलक को संभवतः इस आधार पर हिन्दुओं के प्रति अनुरक्त बता दिया है क्योंकि एक बार उसने यह निष्कर्ष प्रस्तुत किया था कि काश मानव ने धर्म के रूप में मूर्तिपूजक होना पसंद किया होता। संभवतः डॉ. ईश्वरी प्रसाद ने मुहम्मद बिन तुगलक का मूल्यांकन केवल इस आधार पर किया है कि उसने मुल्ला-मौलवियों को पिटवाया था तथा मुल्ला-मौलवियों ने धार्मिक कट्टरता के चलते मुहम्मद के अच्छे कामों का भी विरोध किया था। वास्तविकता यह थी कि मुहम्मद मुस्लिम प्रजा के प्रति ही पूरी तरह उदार था और हिन्दू प्रजा का खून चूसने में उसने कोई कसर नहीं छोड़ी। इसलिए जिस प्रकार यह नहीं कहा जा सकता कि मुहम्मद नास्तिक था, उसी प्रकार यह भी नहीं कहा जा सकता कि वह श्रेष्ठ शासक था। जियाउद्दीन बरनी ने लिखा है कि मुहम्मद बिन तुगलक को कुरान याद थी, इब्नबतूता ने लिखा है कि वह नित्य नमाज पढ़ता था।

फरिश्ता कहता है कि मुहम्मद बिन तुगलक दया से शून्य था। इब्नबतूता लिखता है कि वह रक्तपात में सबसे आगे था। डॉ. मेहदी हुसैन ने लिखा है कि सुल्तान में विरोधी गुण विद्यमान थे। बरनी तथा इब्नबतूता दोनों ने लिखा है कि उसके महल के सामने सदैव कुछ लाशें पड़ी रहती थीं। लेनपूल ने लिखा है कि उसमें संतुलन का पूर्ण अभाव था। ऐसे क्रूर शासक के राज्य में निश्चित रूप से हिन्दू खतरे में थे !

यदि केवल इन्हीं तथ्यों पर विचार कर लिया जाए तो यह सिद्ध हो जाएगा कि मुहम्मद न तो इस्लाम का विरोधी था, न नास्तिक था, न उसे हिन्दू धर्म से प्रेम था, न वह अच्छा इंसान था। राज्य पाने के लिए अपने स्नेही पिता एवं निर्दोष अनुज को मारने वाला शासक न तो अच्छा इंसान हो सकता है और न अच्छा राजा।

उसे अच्छा व्यक्ति सिद्ध करने के लिए कुछ लेखक इतना नीचे गिर गए कि उन्होंने सुल्तान गयासुद्दीन तुगलक के शामियाने के गिर जाने का वर्णन करते हुए लिखा है- ‘बलाए आसमानी वर जमीनान नाजिलशुद्ध’ अर्थात् आकाश से धरती पर बिजली गिर गई। किसी भी मुस्लिम लेखक ने यह लिखने का साहस नहीं किया कि फरवरी के महीने में आसामन से बिलजियां नहीं गिरा करतीं, गयासुद्दीन पर उसका पुत्र मुहम्मद बिन तुगलक ही बिजली बनकर गिरा था।

सुल्तान मुहम्मद बिन तुगलक दिल्ली सल्तनत की बहुसंख्यक हिन्दू जनता के लिए उतना ही क्रूर था जितने कि दिल्ली सल्तनत के अन्य सुल्तान थे और उसका राज्य उतना ही बुरा था, जितना कि अन्य सुल्तानों के काल में बुरा रहा था। निश्चित रूप से हिन्दू खतरे में थे !

अन्य सुल्तानों की तरह मुहम्मद बिन तुगलक भी हिन्दुओं के तन पर लंगोटी, सिर पर खपरैल तथा थाली में सूखी रोटी भी नहीं छोड़ना चाहता था। ऐसा सुल्तान पागल हो या न हो, आस्तिक हो या न हो, नास्तिक हो या न हो, क्या अंतर पड़ता है! हिन्दुओं की चोटी, पोथी और मूर्ति मुहम्मद के काल में उसी तरह खतरे में थीं, जिस तरह दिल्ली सल्नतत के अन्य सुल्तानों के समय में थीं।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

फीरोजशाह तुगलक और ख्वाजाजहाँ ! (136)

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फीरोजशाह तुगलक और ख्वाजाजहाँ

यद्यपि मुहम्मद बिन तुगलक की मृत्यु के बाद दिल्ली तख्त के दो दावेदार उठ खड़े हुए- फीरोजशाह तुगलक और ख्वाजाजहाँ ! यह तुर्की अमीरों पर निर्भर करता था कि वे किसे सुल्तान बनाएं !

यद्यपि मुहम्मद बिन तुगलक ने अपने चचेरे भाई फीरोजशाह तुगलक को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया था तथापित मुहम्मद बिन तुगलक का अमीर ख्वाजाजहाँ दिल्ली का सुल्तान बनना चाहता था किंतु अन्य अमीरों ने ख्वाजाजहाँ को अस्वीकार करके फीरोजशाह को ही दिल्ली के तख्त पर बैठा दिया।

मुहम्मद बिन तुगलक के राज्य में न केवल हिन्दू खतरे में थे अपितु हिन्दुओं की चोटी, पोथी और मूर्ति भी खतरे में थी। उनके तन पर लंगोटी, सिर पर खपरैल और थाली में सूखी रोटी भी सुरक्षित नहीं थी। फिर भी मुल्ला-मौलवी सुल्तान मुहम्मद बिन तुगलक से संतुष्ट नहीं थे क्योंकि बेईमान मुल्ला-मौलवियों और बागी अमीरों की खाल उतारने में भी सुल्तान पीछे नहीं रहता था।

मुल्ला-मौलवियों के असहयोग के कारण मुहम्मद बिन तुगलक की लगभग सभी बड़ी योजनाएं विफल हो गईं तथा सल्तनत की सेना, सीमा और खजाना तीनों ही सीमित हो गए थे। इन्हीं परिस्थितयों में तगी नामक विद्रोही अमीर का पीछा करते हुए 20 मार्च 1351 को सिन्ध प्रदेश के थट्टा में मुहम्मद बिन तुगलक की अचानक मृत्यु हो गई।

मुहम्मद बिन तुगलक के कोई पुत्र नहीं था। इसलिए प्रधानमन्त्री ख्वाजाजहाँ ने दिल्ली का तख्त हड़पने की नीयत से एक अल्पवयस्क बालक को सुल्तान का पुत्र घोषित कर दिया और स्वयं उसका संरक्षक बन गया किंतु दिल्ली के अमीरों को ख्वाजाजहाँ की यह कार्यवाही पसंद नहीं आई और उन्होंने नये सुल्तान का मनोनयन करने के लिए अमीरों की एक सभा बुलाई। उस समय मुहम्मद बिन तुगलक का चचेरा भाई फीरोज तुगलक शाही खेमे में उपस्थित था।

शेख नासिरूद्दीन अवधी नामक एक अमीर ने फीरोज तुगलक का नाम प्रस्तावित किया। विचार-विमर्श के उपरान्त अमीरों की समिति ने इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया। फलतः फीरोज को मुहम्मद बिन तुगलक का उत्तराधिकारी घोषित कर दिया गया। इस पर भी फीरोजशाह तुगलक और ख्वाजाजहाँ के बीच उत्तराधिकार का प्रश्न सदा के लिए नहीं सुलझा। ख्वाजाजहाँ अब भी मुहम्मद बिन तुगलक के भांजे को सुल्तान बनाने के प्रयास करता रहा।

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इस प्रकार मुहम्मद बिन तुगलक के बाद फीरोजशाह तुगलक दिल्ली के तख्त पर बैठा। फरोजशाह का जन्म ई.1309 में हुआ था। उसके पिता का नाम सिपहसालार रजब तुगा तथा माता का नाम बीबी नैला था। सिपहसालार रजब तुगा, सुल्तान मुहम्मद बिन तुगलक का भाई था और बीबी नैला, पूर्वी पंजाब में दिपालपुर के भट्टी सूबेदार रणमल की अत्यंत सुंदर पुत्री थी।

एक बार गाजी तुगलक ने इस लड़की को देखा और भट्टी सूबेदार से कहा कि वह इस लड़की का निकाह शहजादे रजब तुगा से कर दे किंतु भट्टी सूबेदार ने ऐसा करने से मना कर दिया। इस पर गाजी तुगलक ने रणमल भट्टी पर आक्रमण करके जबर्दस्ती इस लड़की को प्राप्त कर लिया तथा उसका निकाह अपने छोटे पुत्र रजब तुगा से कर दिया। इसी लड़की की कोख से फीरोज तुगलक ने जन्म लिया था। राजपूत स्त्री का पुत्र होते हुए भी फीरोज कट्टर सुन्नी मुसलमान था और उसे हिन्दुओं से घृणा थी। मुहम्मद बिन तुगलक फीरोज को अपना उत्तराधिकारी बनाना चाहता था।

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कुछ इतिहासकारों ने लिखा है कि फीरोजशाह तुगलक दीन की खिदमत में अर्थात् इस्लाम की सेवा में अपना जीवन व्यतीत करना चाहता था। उसे राज्य की बिल्कुल आकांक्षा नहीं थी। इसलिए उसने अमीरों के प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया और मक्का जाने की इच्छा प्रकट की परन्तु अमीरों के दबाव के कारण तथा सल्तनत के हित में उसने राज्य की बागडोर ग्रहण करना स्वीकार कर लिया। 22 मार्च 1351 को 42 वर्ष की आयु में थट्टा के निकट शाही खेमे में उसका राज्याभिषेक हुआ। यद्यपि अमीरों, सरदारों तथा उलेमाओं ने फीरोज तुगलक को विधिवत् सुल्तान निर्वाचित कर लिया और वह निर्विरोध दिल्ली के तख्त पर बैठ गया परन्तु उसका मार्ग पूर्णतः निरापद नहीं था। सल्तनत का प्रधानमन्त्री ख्वाजाजहाँ, फीरोज को सुल्तान बनाने के पक्ष में नहीं था। वह खुदाबन्दजादा के अल्पवयस्क पुत्र को जो कि सुल्तान मुहम्मद बिन तुगलक का भान्जा था, सुल्तान का पुत्र घोषित करके उसके अधिकारों का समर्थन कर रहा था। मुहम्मद बिन तुगलक की मृत्यु के समय शाही खेमा राजधानी दिल्ली से सैंकड़ों मील दूर युद्ध के मैदान में था जिसे अफरा-तफरी के वातावरण में शत्रुओं द्वारा नष्ट कर दिए जाने की पूरी आशंका थी।

फीरोज के तख्त पर बैठने के समय सल्तनत की अधिकांश प्रजा तुगलकों के शासन से असंतुष्ट थी और आर्थिक संकट से घिरी हुई थी। नए सुल्तान के लिए यह समस्या अत्यन्त भयानक तथा घातक थी। राज्य के हित में इसका सुलझना नितान्त आवश्यक था अन्यथा दिल्ली सल्तनत का विनाश हो सकता था।

मुहम्मद बिन तुगलक की योजनाओं की विफलताओं एवं विद्रोहों के कारण राज्य की आर्थिक दशा खराब हो चुकी थी। ख्वाजाजहाँ ने भी अमीरों का समर्थन प्राप्त करने के लिए काफी धन लुटा दिया था। इससे सरकारी कोष लगभग रिक्त हो गया।

फीरोज के सामने असंतुष्ट तुर्की अमीरों, मुल्ला-मौलवियों तथा उलेमाओं को प्रसन्न करके उन्हें अपने नियंत्रण एवं विश्वास में लेने की समस्या भी थी। मुहम्मद बिन तुगलक की नीति से अमीर तथा उलेमा अत्यन्त अप्रसन्न हो गए थे। इसलिए वह नीति अब चलने वाली नहीं थी। फीरोज तुगलक ने मौलवियों पर धन की बरसात करके उन्हें संतुष्ट कर लिया। 

फीरोज के सामने विद्रोही प्रान्तों की भी विकट समस्या थी। जिन प्रान्तों ने विद्रोह कर दिया था, उन्हें पराजित करके फिर से सल्तनत के अधीन करना आवश्यक था।

फीरोज की अगली समस्या शासन तंत्र को सुव्यवस्थित करने की थी। मुहम्मद बिन तुगलक ने भारतीय अमीरों की अयोग्यता को देखते हुए विदेशी अमीरों को शासन में उच्च अधिकार दिए थे किंतु फीरोज को तुर्की अमीरों एवं भारत के अमीरों ने मिलकर सुल्तान बनाया था इसलिए उसे दोनों ही खेमों में संतुलन स्थापित करके उच्च अधिकारी चुनने थे।

यद्यपि फीरोज तख्त पर बैठ गया था परन्तु भविष्य में चलकर खुदाबन्दजादा के अल्पवयस्क पुत्र के कारण कठिनाई उत्पन्न हो सकती थी जिसे ख्वाजाजहाँ सुल्तान बनाना चाहता था। इसलिए फीरोजशाह ने अपनी स्थिति को सुदृढ़ बनाने के लिए ख्वाजाजहाँ की हत्या करवा दी और खुदाबन्दजादा के अल्पवयस्क पुत्र को भी अपने मार्ग से हटा दिया। इस कारण इस समस्या से सदा के लिए छुटकारा मिल गया।

यदि अमीरों में सुल्तान के विषय में झगड़ा चलता रहता तो निःसंदेह शाही खेमा दो भागों में बंट जाता, ऐसी स्थिति में शत्रुओं द्वारा उनके विनाश की पूरी संभावना थी किंतु चूंकि ख्वाजाजहाँ तथा उसके द्वारा घोषित अल्पवयस्क सुल्तान की हत्या हो गई इसलिए शाही खेमा एक जुट बना रहा और सुरक्षित राजधानी लौट आया।

ख्वाजाजहाँ ने राजकोष का जो धन लोगों में बांट दिया था, फीरोज ने उस धन को वापस लेने का प्रयत्न नहीं किया। इससे लोगों की प्रसन्नता की सीमा न रही और वे सुल्तान के समर्थक बन गए। जिन लोगों पर सरकार का कर्जा था, फीरोज ने उस कर्जे को भी माफ कर दिया। इससे भी बहुत से लोग नये सुल्तान के कृतज्ञ बन गए।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

फीरोजशाह तुगलक उलेमाओं की कठपुतली बन गया (137)

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फीरोजशाह तुगलक उलेमाओं की कठपुतली बन गया

मुहम्मद बिन तुगलक की मृत्यु के बाद राज्य के प्रधानमंत्री ख्वाजाजहाँ ने मुहम्मद के अवयस्क भांजे को मुहम्मद का दत्तक पुत्र घोषित करके उसे सुल्तान बना दिया किंतु सल्तनत के अमीरों ने मुहम्मद के 42 वर्षीय चचेरे भाई फीरोजशाह तुगलक को सुल्तान मनोनीत किया। इस पर फीरोजशाह तुगलक ने प्रधानमंत्री ख्वाजाजहाँ तथा उसके द्वारा घोषित अवयस्क सुल्तान की हत्या कर दी तथा असंतुष्ट मुल्ला-मौलवियों पर धन की बरसात करके उन्हें अपने पक्ष में कर लिया।

फीरोजशाह तुगलक का खजाना खाली था फिर भी उसने बचे-खुचे खजाने को अंसतुष्ट लोगों पर लुटाकर सल्तनत में शांति स्थापित करने का प्रयास किया। उसने जनता पर लगाये जा रहे ढेर सारे करों में से 24 करों को हटा दिया।

फीरोजशाह तुगलक ने अमीरों तथा उलेमाओं से परामर्श और सहायता लेकर शासन करना आरम्भ किया। फीरोज इस्लाम में दृढ़ आस्था रखता था इसलिए उसने इस्लाम आधारित शासन का संचालन किया। इससे अमीर एवं उलेमा सुल्तान से संतुष्ट रहने लगे किंतु इसका दुष्परिणाम यह हुआ कि फीरोजशाह तुगलक कुछ ही दिनों में उलेमाओं के हाथों की कठपुतली बन गया।

फीरोज कट्टर सुन्नी मुसलमान था। इसलिए उसने न्याय व्यवस्था कुरान के नियमों के आधार पर की। वह अपराधियों को दण्ड देने में संकोच नहीं करता था परन्तु उसने दण्ड विधान की कठोरता को हटा दिया और अंग-भंग करने के दण्ड पर रोक लगा दी। प्राणदण्ड भी बहुत कम दिया जाता था।

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फीरोजशाह तुगलक ने उन 24 करों को हटा लिया जिनसे प्रजा को कष्ट होता था। उसने कुरान के नियमानुसार जनता पर खिराज, जकात, जजिया तथा खाम नामक चार कर जारी रखे। युद्ध में मिला लूट का सामान सेना तथा राज्य में फिर उसी अनुपात में बंटने लगा जैसे कुरान द्वारा निश्चित किया गया है, अर्थात् बीस प्रतिशत सुल्तान को और अस्सी प्रतिशत सेना को।

सुल्तान की इस नीति का अच्छा परिणाम हुआ। व्यापार तथा कृषि दोनों की उन्नति हुई। वस्तुओं के मूल्य कम हो गए और लोगों की आवश्यकताओं की पूर्ति होने लगी। सुल्तान की आय में वृद्धि हो गई और सुल्तान के पास फिर से धन एकत्रित हो गया।

सुल्तान की उदारता के कारण कई बार दण्ड के भागी लोग भी दण्ड पाने से बच जाते थे। शरीयत के नियमों के अनुसार न्याय किया जाता था। मुफ्ती कानून की व्याख्या करता था। फीरोज तुगलक के काल में न्याय उतना पक्षपात पूर्ण तथा कठोर नहीं था जितना मुहम्मद बिन तुगलक के शासन काल में था।

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सल्तनत के शासन को सुचारू रीति से संचालित करने के लिए फीरोजशाह तुगलक ने योग्य तथा अनुभवी व्यक्तियों की नियुक्तियाँ की। उसने मलिक-ए-मकबूल को सुल्तान के नायब अर्थात् प्रधानमंत्री के पद पर नियुक्त किया और उसे ‘खान-ए-जहाँ’ की उपाधि प्रदान की। मलिक-ए-मकबूल तेलंगाना का ब्राह्मण था तथा उसने कुछ ही दिनों पहले इस्लाम स्वीकार किया था। उसने जीवन भर फीरोज के प्रति वफादारी का प्रदर्शन किया जिसके कारण फीरोज को शासन चलाने में कभी कठिनाई का सामना नहीं करना पड़ा। सल्तनत में भूमि-कर की समुचित व्यवस्था करने के लिए फीरोज तुगलक ने ख्वाजा निजामुद्दीन जुनैद को नियुक्त किया। सुल्तान ने मलिक गाजी को ‘नायब आरिज’ के पद पर नियुक्त करके सेना के संगठन के कार्य सौंपा। मलिक गाजी शहना को सार्वजनिक निर्माण विभाग का कार्य दिया गया। इस प्रकार फरोज तुगलक ने शासन को सुचारू रीति से संचालित करने का प्रयास किया। सुल्तान फीरोज तुगलक ने दिल्ली के तख्त पर अपने अधिकार को पुष्ट बनाने के लिए स्वयं को खलीफा का नायब घोषित कर दिया। उसने खुतबे तथा मुद्राओं में खलीफा के नाम के साथ-साथ अपना नाम भी खुदवाया।

दिल्ली के सुल्तानों में फीरोजशाह तुगलक पहला सुल्तान था जिसने खलीफा से सनद प्राप्त किए बिना ही खलीफा का नाम खुतबे में लिखवाया तथा स्वयं को खलीफा का नायब घोषित किया।

फीरोज में उच्च कोटि की धार्मिक कट्टरता थी। चूंकि उलेमाओं के अनुरोध पर वह तख्त पर बैठा था, इसलिए वह समस्त कार्य उनकी सहायता तथा परामर्श से करता था। इस प्रकार फीरोजशाह तुगलक ने इस्लाम आधारित शासन की स्थापना की। उसके शासन में हिन्दुओं की स्थिति वैसी ही दयनीय बनी रही तथा मुसलमानों को न्याय एवं भूराजस्व आदि में मिलने वाली रियायतें उसी प्रकार मिलती रहीं।

श्रीराम शर्मा ने लिखा है- ‘फीरोज न तो अशोक था न अकबर जिन्होंने धार्मिक सहिष्णुता की नीति का अनुसरण किया था, वरन् वह औरंगजेब की भांति कट्टरपंथी था।’

फीरोजशाह तुगलक की शासननीति का एक मुखौटा यह भी था कि विरोधी तत्वों को संतुष्ट रखने के लिए वह अमीरों एवं मुल्ला-मौलवियों से सलाह लेने का दिखावा करता था किंतु वास्तविकता यह थी कि अन्य मध्यकालीन मुसलमान शासकों की भांति फीरोज का शासन भी स्वेच्छाचारी तथा निरंकुश था। वह मुल्ला-मौलवियों के कहने से ऐसे आदेश देता था जिससे हिन्दू जनता पर अत्याचार होते थे और मुल्ला-मौलवी संतुष्ट होते थे किंतु अन्य नीतिगत मामलों में सुल्तान सभी निर्णय स्वयं करता था। वह अकेला ही राज्य की सर्वोच्च शक्तियों का स्वामी था और वही प्रधान सेनापति भी।

सुल्तान के नीचे उसका नायब (प्रधानमन्त्री) था जो सुल्तान को महत्त्वपूर्ण कार्यों में परामर्श देता था। फीरोज का नायब खान-ए-जहाँ मकबूल योग्य व्यक्ति था। वह सुल्तान के साथ युद्धस्थल में जाता था और कभी-कभी सुल्तान की अनुपस्थिति में दिल्ली के शासन का भार उसी के ऊपर रहता था। महत्त्वपूर्ण विषयों में सलाह लेने के लिए सुल्तान दरबार का आयोजन करता था तथा अमीरों से परामर्श लेता था।

अब तक के सुल्तान राजकोष की पूर्ति जनता पर कर बढ़ाकर करते थे जिनके कारण कर इतने अधिक बढ़ाए जा चुके थे कि उन्हें और नहीं बढ़ाया जा सकता था। इसलिए फीरोजशाह तुगलक ने कर बढ़ाने के स्थान पर व्यापार, कृषि एवं जागीरदारी व्यवस्था को चुस्त बनाने का प्रयास किया जिससे राजस्व में वृद्धि हो तथा सुल्तान के प्रति असंतोष भी नहीं बढ़े। उसके प्रयासों से लोगों की आय बढ़ी जिससे सरकार के कोष में भी धन की पर्याप्त आमदनी हुई।

मुद्रा की समस्या सुलझाने का कार्य मुहम्मद तुगलक के काल में ही आरम्भ हो गया था परन्तु पूरा नहीं हो सका था। फीरोज ने इस अधूरे कार्य को पूर्ण करने का प्रयत्न किया। उसने छोटे-छोटे मूल्य की मुद्राएं चलाईं जिनका प्रयोग छोटे व्यवसायों में हो सकता था। फीरोजशाह तुगलक धातु की शुद्धता पर विशेष रूप से ध्यान देता था परन्तु अधिकारियों की बेइमानी के कारण मुद्रा सम्बन्धी सुधार में विशेष सफलता नहीं मिली।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

फीरोज तुगलक का शासन (138)

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फीरोज तुगलक का शासन

फीरोज तुगलक का शासन इस्लाम के सिद्धांतों पर चलता था जिसमें अपराधियों एवं विधर्मियों को कठोर दण्ड दिया जाता था और विधर्मियों के लिए कठोर कर-व्यवस्था लागू की गई थी।

फीरोज तुगलक को मुल्ला-मौलवियों की कृपा से सुल्तान का तख्त प्राप्त हुआ था, इसलिए वे दीन का मुखौटा लगाकर तथा सल्तनत के कार्यों में मुल्ला-मौलवियों की सलाह लेने का दिखावा करके जनता पर शासन करने लगा।

मुल्ला-मौलवियों ने सुल्तान फीरोज को बताया कि उसके पूर्ववर्ती सुल्तान मुहम्मद बिन तुगलक ने जनता पर इतने अत्याचार किए थे कि अल्लाह कभी भी पूर्ववर्ती सुल्तान को माफ नहीं करेगा। फीरोज तुगलक को मुहम्मद बिन तुगलक के प्रति बड़ी श्रद्धा थी। इसलिए फीरोज ने मुहम्मद बिन तुगलक के पापों का प्रायश्चित करने का निश्चय किया।

सुल्तान ने अपनी सेना को आदेश दिए कि जिन व्यक्तियों को मुहम्मद बिन तुगलक ने प्राण दण्ड दिया था, अथवा जिन्हें अंग-भंग की सजा दी थी, उनसे तथा उनके परिवार वालों से सुल्तान के लिए क्षमापत्र प्राप्त किये जाएं तथा उन्हें एक सन्दूक में बन्द करके मुहम्मद बिन तुगलक की कब्र के सिरहाने रखा जाए। इस कार्य के लिए सुल्तान ने पीड़ित परिवारों को धन देने के आदेश भी दिए ताकि मरहूम सुल्तान को कयामत के बाद मिलने वाला परलोक सुधर जाए।

सुल्तान के आदेश से उसकी सेना ने घर-घर जाकर लोगों से पूछताछ की कि उनके किसी सम्बन्धी को विगत सुल्तान के अत्याचारों का सामना तो नहीं करना पड़ा था। यदि कोई परिवार सल्तनत के अधिकारियों को अपने ऊपर जुल्म होने की शिकायत करता था तो सल्तनत के अधिकारी उस परिवार को कुछ धन देकर उससे क्षमापत्र लिखने को कहते थे। जो लोग क्षमापत्र लिखकर देने को तैयार हो जाते थे उनके गांव अथवा भूमि उन्हें वापस लौटा दी जाती थी जो कि विगत सुल्तान के समय में छीनी गई थी।

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बहुत से लोगों को मुहम्मद बिन तुगलक ने बहुत हानि पहुंचाई थी तथा उनके परिवार वालों के अंग-भंग कर दिए थे या उनके प्राण ले लिए थे। ऐसे लोगों ने क्षमापत्र लिखने से मना कर दिया। फीरोज तुगलक की सेना ने ऐसे लोगों को मारा-पीटा और उनके घरों में आग लगा दी। इस भय से बहुत से लोग जंगलों में भाग गए।

इस प्रकार इन लोगों का एक बार फिर से भयानक उत्पीड़न हुआ और जिस उद्देश्य से यह योजना आरम्भ की गई थी कि लोग सुल्तान को क्षमा कर दें, धूल में मिल गई। आज भी बहुत से सरकारी कर्मचारियों के काम करने का तरीका ऐसा ही है।

फीरोज के शासनकाल में गुलामों का बाहुल्य था। इन गुलामों की दशा बड़ी ही दयनीय थी। फीरोज तुगलक ने उनकी दशा सुधारने का प्रयत्न किया। ये गुलाम युद्धबंदी होने के कारण असभ्य तथा अशिक्षित थे। इसलिए ये राज्य के लिए सहायक सिद्ध होने के स्थान पर राज्य के लिए भार बन गए थे। फिरोज ने इनके लिए एक अलग विभाग खोला और उसका नाम ‘दीवाने बन्दगान’ रखा। इस विभाग का एक अलग कोष तथा अलग दीवान होता था।

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सुल्तान फीरोज तुगलक ने 40,000 गुलामों को सरकार की सेवा में रखा और उन्हें योग्यतानुसार विभिन्न विभागों में नियुक्त कर दिया। कुछ गुलामों की शिक्षा की व्यवस्था की गई और कुछ को सुल्तान के अंग-रक्षकों में भर्ती कर लिया गया। शेष 1,60,000 गुलाम सल्तनत के विभिन्न भागों में भेज दिए गए और प्रांतीय गवर्नरों तथा अधिकारियों के संरक्षण में रखे गए। यद्यपि फीरोज स्वयं बहुत बड़ा विद्वान नहीं था परन्तु वह इस्लामिक शिक्षा तथा साहित्य का पोषक था। उसने जनता को इस्लामिक शिक्षा देने के लिए बहुत से मदरसे तथा मकतब खुलवाये। इन संस्थाओं को राज्य से सहायता मिलती थी। इनमें पढ़ने वाले विद्यार्थियों को छात्रवृत्तियां तथा अध्यापकों को पेंशनें दी जाती थी। मकतबों को राज्य की ओर से भूमि मिलती थी। सुल्तान ने इस्लामिक साहित्य सृजन को संरक्षण तथा सहायता प्रदान की। जियाउद्दीन बरनी ने अपनी पुस्तक तारीखे फीरोजशाही की रचना फीरोज तुगलक के शासन काल के प्रारंभिक भाग में की थी। इस्लामिक दर्शन पर इस काल में कई ग्रंथ लिखे गए। शम्से सिराज अफीफ ने अपनी इतिहास की पुस्तक इसी काल में लिखी थी। फीरोज ने कुछ संस्कृत ग्रन्थों का फारसी में अनुवाद कराया। मौलाना जलालुद्दीन रूमी इस काल का बड़ा इस्लामिक चिंतक एवं तत्त्ववेत्ता था।

फीरोज तुगलक के शासन काल में सार्वजनिक सेवा के कुछ कार्य किये गए। सुल्तान ने ई.1350 में दिल्ली के निकट फीरोजाबाद नामक नगर स्थापित किया तथा वहाँ पर अम्बाला और मेरठ जिलों से लाकर दो अशोकस्तम्भ लाकर लगवाये। फीरोज तुगलक ने जौनपुर, फतेहाबाद तथा हिसार नामक नगरों का भी निर्माण करवाया।

जियाउद्दीन बरनी के अनुसार फीरोज ने 50 बांधों, 40 मस्जिदों, 30 मकतबों एवं मदरसों, 20 महलों, 100 सरायों, 200 नगरों, 30 झीलों, 100 दवाखानों, 5 मकबरों, 100 स्नानागारों, 10 स्तंभों, 40 सार्वजनिक कुओं तथा 150 पुलों का निर्माण करवाया। फीरोज को उपवन लगवाने का भी बड़ा शौक था। उसने दिल्ली के निकट 1,200 बाग लगवाये। अन्य कई स्थानों पर भी उसने बाग लगवाये। उसने अल्लाउद्दीन द्वारा बनवाये गए 30 उपवनों का जीर्णोद्धार करवाया।

फीरोज तुगलक का रहन-सहन इस्लामिक जीवन पद्धति के अुनसार सादगी से परिपूर्ण था। उसके दरबार में तड़क-भड़क नहीं थी। ईद तथा शबेरात पर अमीर लोग सज-धज कर आते थे। उनका बड़ा सम्मान होता था। इस आमोद-प्रमोद में धनी-गरीब, समस्त भाग लेते थे। राज्य परिवार की व्यवस्था को ‘कारखाना’ कहते थे। इसके अलग-अलग विभाग थे और इसके अलग-अलग पदाधिकारी तथा कर्मचारी होते थे। प्रत्येक कारखाने का अलग राजस्व विभाग होता था।

उन दिनों मध्यम श्रेणी के लोगों में बेकारी की समस्या ने विकराल रूप धारण कर लिया था। बेकारी की समस्या सुलझाने के लिए सुल्तान ने बेकारी उन्मूलन का अलग विभाग खोला। कोतवाल को आदेश दिया गया कि वह बेकार लोगों की सूची बनाये। बेकार लोगों को दीवान के पास आवेदन भेजना पड़ता था और लोगों को योग्यतानुसार काम दिया जाता था। शिक्षित व्यक्तियों को महल में नौकर रख लिया जाता था। जो लोग किसी अमीर का गुलाम बनना चाहते थे, उन्हें सिफारिशी चिट्ठियां दी जाती थीं।

फीरोज तुगलक को स्वयं औषधि विज्ञान का अच्छा ज्ञान था। उसने दिल्ली में एक ‘दारूलसफा’ स्थापित करवाया जिसमें रोगियों को निःशुल्क औषधियां मिलती थीं। रोगियों के भोजन की व्यवस्था राज्य की ओर से की जाती थी और देख-भाल के लिए योग्य हकीमों को रखा जाता था।

मुस्लिम फकीरों तथा सुल्तानों की कब्रों के दर्शनार्थ जाने वाले यात्रियों को राज्य की ओर से दान देने की व्यवस्था की गई।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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