Home Blog Page 116

राजा कुरु के परिश्रम से धर्म क्षेत्र बन गया कुरुक्षेत्र (24)

0
राजा कुरु - www.bharatkaitihas.com
राजा कुरु के परिश्रम से धर्म क्षेत्र बन गया कुरुक्षेत्र

पुराणों में उल्लेख है कि राजा कुरु ने अपने ससुर अत्यागस से, ईरान से लेकर यूनान तक का विशाल भूभाग प्राप्त किया था। उसने अपने राज्य का नाम अपने पिता अजमीड़ के नाम पर अजमीढ़ रखा था।

पिछली कथा में हमने चंद्रवंशी राजा संवरण की चर्चा की थी। राजा संवरण हस्तिनापुर को बसाने वाले राजा हस्ति का पौत्र था और राजा अजमीढ़ का पुत्र था। राजा अजमीढ़ का उल्लेख बहुत से पुराणों में हुआ है। किसी समय ईरान से लेकर ग्रीस तक मेड साम्राज्य विस्तृत था। संभवतः इसका कुछ सम्बन्ध राजा अजमीढ़ से रहा हो!

अजमीढ़ के पुत्र राजा संवरण की पत्नी ताप्ती, सूर्यपुत्री थी। उसकी कोख से कुरु नामक एक तेजस्वी पुत्र का जन्म हुआ। चंद्रवंशी राजाओं की परम्परा में वह बत्तीसवां राजा था। राजा कुरु की कथा मुख्यतः वामन पुराण में मिलती है। महाभारत एवं अन्य ग्रंथों में राजा कुरु तथा उसके द्वारा बसाए गए कुरुक्षेत्र का उल्लेख बार-बार हुआ है।

राजा कुरु अत्यंत प्रतापी राजा हुआ। उसका राज्य भारत के गंगा-यमुना के उपजाऊ प्रदेशों से लेकर ईरान, मिस्र, लीबिया तथा ग्रीस तक विस्तृत माना जाता है। कुरु राज्य में मिलाए जाने से पहले इस विशाल भूप्रदेश में मेड नामक राज्य हुआ करता था।

पुराणों में उल्लेख है कि कुरु ने अपने ससुर अत्यागस से, ईरान से लेकर यूनान तक का विशाल भूभाग प्राप्त किया था। राजा कुरु ने अपने राज्य का नाम अपने पिता अजमीड़ के नाम पर अजमीढ़ रखा था।

पूरे आलेख के लिए देखें, यह वी-ब्लाॅग-

श्रीमद्भागवत एवं विष्णु पुराण के अनुसार ब्रह्माजी की वंशावली में राजा अजमीढ़ की पीढ़ी में कुरु के नाम से सम्पूर्ण कुरुक्षेत्र जाना जाता है। कुरु के नाम से ही पुरुवंश एवं पौरव वंश आगे चलकर कुरु वंश कहलाया।

पुराणों के अनुसार कुरु ने जिस क्षेत्र को बार-बार जोता था, उसका नाम कुरुक्षेत्र पड़ा। कहते हैं कि जब वह बहुत मनोयोग से इस क्षेत्र की जुताई कर रहा था, तब देवराज इन्द्र ने राजा से इस परिश्रम का कारण पूछा।

इस पर कुरु ने कहा- ‘मैं यहाँ पर एक धर्मक्षेत्र बना रहा हूँ। जो भी व्यक्ति यहाँ युद्ध करते हुए मृत्यु को प्राप्त होगा, वह सीधे ही पुण्यलोकों में जायेगा।’

देवराज इन्द्र को उसकी बात बड़ी हास्यास्पद अनुभव हुई और देवराज राजा कुरु का परिहास करते हुए स्वर्गलोक चले गए किंतु राजा कुरु बार-बार कुरु क्षेत्र की भूमि में हल चलाता रहा।

देवराज इन्द्र ने स्वर्ग के देवताओं को राजा कुरु द्वारा कुरुक्षेत्र में हल चलाए जाने की बात बताई। इस पर कुछ देवताओं ने इन्द्र को परामर्श दिया कि- ‘यदि संभव हो तो उसे अपने अनुकूल करने का प्रयास करिए। अन्यथा यदि प्रजा यज्ञ किए बिना ही और हमारा यज्ञभाग दिए बिना ही स्वर्गलोक में प्रवेश करने लगेगी, तब हमारा क्या होगा!’

देवताओं की सलाह मानकर देवराज इन्द्र ने पुनः राजा कुरु के पास जाकर कहा- ‘हे नरेन्द्र! आप व्यर्थ ही कष्ट कर रहे हैं। आप हल चलाना बंद कीजिए। मैं आपको वदरान देता हूँ कि यदि कोई भी पशु, पक्षी या मनुष्य इस क्षेत्र में निराहार रहकर अथवा युद्ध करते हुए यहाँ मृत्यु को प्राप्त होगा तो वह स्वर्ग का अधिकारी होगा।’

To purchase this book, please click on photo.

राजा कुरु ने देवराज की यह बात मान ली तथा हल चलाना बंद कर दिया। पुराणों में इसी स्थान को ‘समंत-पंचक’ एवं ‘प्रजापति की उत्तरवेदी’ कहा गया है। वामन पुराण के अनुसार राजा कुरु ने कुरुक्षेत्र में ‘ब्रह्मसरोवर’ की स्थापना की थी। कुछ ग्रंथों के अनुसार राजा कुरु ने इन्द्र से यह वरदान मांगा था कि कुरुक्षेत्र को धर्मक्षेत्र कहा जाए तथा यहाँ के सरोवरों में स्नान करने वाला मनुष्य अथवा कुरुक्षेत्र में प्राण त्यागने वाला मनुष्य स्वर्गलोक को प्राप्त करे। कुछ पुराणों के अनुसार राजा कुरु ने द्वैतवन में हल चलाकर कुरुक्षेत्र में मानव बस्तियां बसाईं। इससे स्पष्ट है कि राजा कुरु से पहले यह पूरा क्षेत्र वीरान एवं अनुपजाऊ था। राजा कुरु ने इस क्षेत्र को कृषि योग्य बनाकर वहाँ मानव बस्तियां बसाईं। ऋग्वेद में त्रसदस्यु के पुत्र कुरुश्रवण का उल्लेख हुआ है। कुरुश्रवण का शाब्दिक अर्थ है- ‘कुरु की भूमि में सुना गया या प्रसिद्ध।’ इस उल्लेख से यह अनुमान होता है कि ऋग्वेद काल में भी कुरुक्षेत्र एक धार्मिक एवं पुण्यस्थल माना जाता था जहाँ ऋषियों द्वारा ज्ञानोपदेश का आयोजन किया जाता था। अथर्ववेद में एक कौरव्यपति की चर्चा हुई है जिसने अपनी पत्नी से बातचीत की है। यह कौरवपति संभवतः कोई कुरुवंशी राजा था।

ब्राह्मण-ग्रन्थों में कुरुक्षेत्र का उल्लेख अत्यंत पवित्र तीर्थ-स्थल के रूप में हुआ है। शतपथ ब्राह्मण में कहा गया है कि एक बार देवताओं ने कुरुक्षेत्र में एक यज्ञ किया जिसमें उन्होंने दोनों अश्विनों को पहले यज्ञ-भाग से वंचित कर दिया। मैत्रायणी संहिता एवं तैत्तिरीय ब्राह्मण का कथन है कि देवों ने कुरुक्षेत्र में एक सत्र का सम्पादन किया था। महाभारत में कुरुक्षेत्र की महत्ता का उल्लेख हुआ है तथा कहा गया है कि सरस्वती के दक्षिण एवं दृषद्वती के उत्तर की भूमि कुरुक्षेत्र में थी और जो लोग उसमें निवास करते थे, मानो स्वर्ग में रहते थे।

वामन पुराण में कुरुक्षेत्र को ब्रह्मावर्त कहा गया है। वामन पुराण के अनुसार सरस्वती एवं दृषद्वती के बीच का देश कुरु-जांगल था। मनुस्मृति के लेखक मनु ने उस देश को ब्रह्मावर्त कहा है जिसे ब्रह्माजी ने सरस्वती एवं दृषद्वती नामक पवित्र नदियों के मध्य में बनाया था जबकि ब्रह्मर्षिदेश वह था जो पवित्रता में थोड़ा कम था। इस उक्ति से लगता है कि उत्तर वैदिक काल में आर्यावर्त में ब्रह्मावर्त सर्वाेत्तम देश था जिसके भीतर कुरुक्षेत्र स्थित था।

ब्राह्मण ग्रंथों के रचना काल में सरस्वती कुरुक्षेत्र से होकर बहती थी। जहाँ सरस्वती मरुभूमि में अन्तर्हित होती थी, उसे ‘विनशन’ कहते थे और वह भी एक प्रसिद्ध तीर्थ था। कौरवों एवं पाण्डवों का युद्ध कुरुक्षेत्र में ज्योतिकुण्ड के निकट हुआ था। भगवद्गीता के प्रथम श्लोक में कुरुक्षेत्र को धर्मक्षेत्र कहा गया है। वायु पुराण एवं कूर्म पुराण में लिखा है कि श्राद्ध करने के लिए कुरुजांगलः एक योग्य देश है।

सातवीं शताब्दी ईस्वी में ह्वेनसांग ने कुरुक्षेत्र का उल्लेख हर्ष की राजधानी स्थाण्वीश्वर के रूप में किया है जिसे बाद में थानेसर कहा जाने लगा। ह्वेनसांग ने इसे धार्मिक एवं पुण्य भूमि बताया है। महाभारत के वन पर्व एवं वामन पुराण में कुरुक्षेत्र का विस्तार पाँच योजन व्यास में बताया गया है।

आधुनिक वैज्ञानिकों का मानना है कि वर्तमान समय में कुरुक्षेत्र में जो बड़े-बड़े सरोवर दिखाई पड़ते हैं, वस्तुतः वे लुप्त हो चुकी सरस्वती के ही अवशेष हैं।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

गंगा ने राजा शांतनु के सात पुत्रों को नदी में बहा दिया (25)

0
गंगा - www.bharatkaitihas.com
गंगा ने राजा शांतनु के सात पुत्रों को नदी में बहा दिया

महाराज शांतनु उस शिशु को लेकर अपने महल में आ गए। गंगा और शांतनु का यह आठवां पुत्र वास्तव में प्रभास नामक आठवां वसु था जो श्राप के कारण धरती पर ही रह गया। उसका नाम देवव्रत रखा गया किंतु भीषण प्रतिज्ञा करने के कारण वह बालक आगे चलकर भीष्म के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

पिछली कथा में हमने चंद्रवंशी राजा कुरु की चर्चा की थी जिसकी राजधानी हस्तिनापुर थी तथा जिसने अत्यंत परिश्रम करके कुरुभूमि को पुण्य तीर्थ में बदल दिया था। उसी की वंश परम्परा में आगे चलकर राजा शांतनु का जन्म हुआ। राजा शांतनु चंद्रवंशी राजााओं में अड़तालीसवें क्रम का राजा था।

मान्यता है कि राजा शांतनु का विवाह गंगा से हुआ था। कुछ ग्रंथ शांतनु की पत्नी देवी गंगा को गंगा नदी मान लेते हैं किंतु वास्तव में शांतनु का विवाह गंगा नदी से नहीं हुआ था, अपितु गंगा नामक एक अप्सरा से हुआ था। स्वर्ग की अप्सरा गंगा का विवाह राजा शांतनु के साथ होने के पीछे दो पौराणिक कथाएं मिलती हैं।

पहली कथा के अनुसार एक बार स्वर्ग लोक में बहुत से देवी-देवता एवं महर्षि एवं राजर्षि ब्रह्माजी की सेवा में उपस्थित हुए जिनमें महाभिष नामक राजा भी थे। उसी समय गंगा भी ब्रह्माजी के दर्शनों के लिए आई। संयोगवश उसी समय गंगा के श्वेत वस्त्र वायु के झौंके के कारण गंगा के शरीर से खिसक गए। यह देखकर समस्त देवताओं एवं राजर्षियों ने अपने नेत्र नीचे कर लिए किंतु राजा महाभिष अपलक गंगाजी को देखते रहे।

यह देखकर ब्रह्माजी ने राजा महाभिष से कहा- ‘राजन् अब तुम मृत्युलोक में जाओ। जिस गंगा को तुम देखते रहे, वही गंगा धरती पर आकर तुम्हारा अप्रिय करेगी। इस कारण जब तुम उस पर क्रोध करोगे, तब तुम शापमुक्त होकर पुनः स्वर्ग लोक में लौट आओगे!’

पूरे आलेख के लिए देखें, यह वी-ब्लाॅग-

गंगा भी ब्रह्माजी को प्रणाम करके वहाँ से लौट गईं। मार्ग में गंगा की भेंट वसुओं से हुई जो महर्षि वसिष्ठ के श्राप से श्रीहीन हो रहे थे। गंगा ने वसुओं से उनकी श्रीहीनता का कारण पूछा। इस पर वसुओं ने महर्षि वसिष्ठ द्वारा दिए गए श्राप के बारे में बताया।

पौराणिक धर्मग्रंथों एवं श्रीमद्भागवत् पुराण के अनुसार दक्ष प्रजापति की एक पुत्री का नाम वसु था जिसका विवाह धर्म से हुआ था। वसु के गर्भ से आठ पुत्र उत्पन्न हुए जिन्हें वसु कहा जाता था। बृहदारण्यकोपनिषद में तैंतीस देवताओं का विस्तार से परिचय मिलता है। इनमें आठ वसुओं को पृथ्वी का देवता कहा गया है।

महाभारत के अनुसार आठ वसुओं के नाम इस प्रकार हैं- धर ध्रुव, सोम, विष्णु, अनिल, अनल, प्रत्यूष एवं प्रभास। श्रीमद्भागवत में इन वसुओं के नाम द्रोण, प्राण, ध्रुव, अर्क, अग्नि, दोष, श्वसु और विभावसु बताए गए हैं। कुछ ग्रंथों में अग्नि को प्रथम वसु बताया गया है क्योंकि अग्नि में किए गए हवन के माध्यम से ही देवी-देवताओं को उनका भाग मिलता है। वाल्मीकि रामायण में वसुओं को अदिति-पुत्र कहा गया है।

To purchase this book, please click on photo.

आठ वसुओं में सबसे छोटे वसु प्रभास ने एक दिन महर्षि वशिष्ठ की गाय नंदिनी को चुरा लिया। महर्षि वशिष्ठ ने ध्यान लगाकर देखा तो उन्होंने नंदनी को वसुओं के बीच खड़े हुए देखा। इस पर महर्षि वसिष्ठ ने वसुओं को पृथ्वी पर जन्म लेने का श्राप दे दिया। जब वसुओं को महर्षि द्वारा श्राप दिए जाने का पता चला तो आठों वसुओं ने महर्षि से क्षमा माँगी। इस पर महर्षि वसिष्ठ ने कहा- ‘बड़े सात वसु पृथ्वी पर जन्म लेने के कुछ ही समय बाद मृत्यु को प्राप्त करके पुनः स्वर्ग लौट आएंगे किंतु प्रभास लंबे समय तक पृथ्वी लोक पर ही रहेगा।’ इस श्राप के कारण वसु बहुत दुःखी थे। इसलिए जब गंगा ने उनकी श्रीहीनता का कारण पूछा तो वसुओं ने महर्षि वसिष्ठ द्वारा श्राप दिए जाने की कथा बता दी। इस पर गंगा ने द्रवित होकर कहा- ‘ब्रह्मदेव द्वारा राजा महाभिष को श्राप दिया गया है जिसके कारण मुझे भी धरती पर जाना पड़ेगा। मैं धरती पर रहते हुए, तुम्हें श्राप से शीघ्र मुक्ति दिलवाने का उपाय करूंगी। जब मैं धरती पर जाकर, शांतनु के रूप में उत्पन्न हुए महाभिष की पत्नी बनूं, तब तुम एक-एक करके मेरे गर्भ में आना, मैं तुम्हारे धरती पर जन्म लेते ही तुम्हें जीवन से मुक्त कर दूंगी। इस प्रकार बहुत कम समय में तुम्हें श्राप से मुक्ति मिल जाएगी।’

वसुओं ने गंगा का यह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। महाभारत में उल्लेख मिलता है कि वसुओं ने गंगा से कहा- ‘जब आप हमें श्राप से मुक्त करेंगी तब हम सभी अपने अष्टमांश से निर्मित एक वसु को धरती पर छोड़ देंगे जो अपुत्र ही रहेगा। अर्थात्! धरती पर हमारा अष्टमांश लम्बे समय तक जीवित रहेगा किंतु हमारा वंश धरती पर नहीं चलेगा।’

उधर ब्रह्माजी के श्राप से राजर्षि महाभिष ने धरती पर आकर चंद्रवंशी राजा प्रतीप के पुत्र के रूप में जन्म लिया। शांतनु के युवा होने पर राजा प्रतीप अपना राज्य शांतनु को सौंपकर वन में तपस्या करने चले गए।

अपने पूर्वजों की तरह शांतनु भी बड़े धर्मनिष्ठ राजा हुए। एक दिन जब राजा शांतनु गंगा नदी के तट पर घूम रहे थे तब उनकी भेंट एक अत्यंत सुंदर स्त्री से हुई जिसके शरीर पर दिव्य आभूषण सुशोभित थे। उसे देखकर ऐसा लगता था मानो देवी लक्ष्मी ही साक्षात आ गई हों! राजा शांतनु उस स्त्री पर आसक्त हो गए तथा उसके साथ विवाह करने का अनुरोध करने लगे।

राजा ने कहा- ‘हे देवी! आप स्वर्ग की देवी हैं, दानवी हैं, गन्धर्वी हैं, अप्सरा, यक्षी, नागकन्या अथवा मानवी हैं। देवकन्याओं के समान सुशोभित होने वाली सुन्दरी! मैं आपसे याचना करता हूँ कि आप मेरी पत्नी हो जाएं।’

महाराज शांतनु के ऐसा कहने पर गंगा ने कहा- ‘हे भूपाल! मैं आपकी महारानी बनूंगी एवं आपके अधीन रहूँगी परन्तु मेरी कुछ शर्तें हैं कि आप कभी मेरे बारे में मुझसे कभी प्रश्न नहीं करेंगे। मैं कहीं भी जाऊं मेरा पीछा नहीं करेंगे तथा मैं भला या बुरा जो कुछ भी करूं, उसके लिए मुझे कभी नहीं रोकेंगे। आप मुझसे कभी अप्रिय वचन नहीं कहेंगे। पृथ्वीपति! जब तक आप ऐसा बर्ताव करेंगे तब तक ही मैं आपके समीप रहूँगी। यदि आपने कभी मुझे किसी कार्य से रोका या अप्रिय वचन कहा तो मैं निश्चय ही आपको छोड़ दूंगी।’

गंगा के रूप-सौंदर्य से बेसुध हुए राजा शांतनु ने गंगा की यह शर्त मान ली। इस पर राजा शान्तनु देवी गंगा को रथ पर बिठाकर अपनी राजधानी ले आए। कुछ समय पश्चात् गंगा ने एक पुत्र को जन्म दिया। वह उस शिशु को महल से ले गई और उसे गंगा नदी में बहा दिया। इस प्रकार एक-एक करके गंगा के सात पुत्र हुए और उसने उन सभी को गंगा नदी में बहा दिया।

जब गंगा अपने आठवें पुत्र को नदी में बहाने के लिए गई तो राजा शांतनु ने उसका पीछा किया तथा जब वह अपने पुत्र को नदी में बहा ही रही थी तभी शांतनु ने उस बालक को पकड़ लिया तथा गंगा को इस क्रूर कर्म के लिए धिक्कारा।

राजा के कठोर वचन सुनकर गंगा ने राजा को अपनी तथा अपने पुत्रों की वास्तविकता बताई तथा उसी समय अदृश्य हो गई। महाराज शांतनु उस शिशु को लेकर अपने महल में आ गए। गंगा और शांतनु का यह आठवां पुत्र वास्तव में प्रभास नामक आठवां वसु था जो श्राप के कारण धरती पर ही रह गया। उसका नाम देवव्रत रखा गया किंतु भीषण प्रतिज्ञा करने के कारण वह बालक आगे चलकर भीष्म के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

सत्यवती से विवाह कर लिया राजा शांतनु ने (26)

0
सत्यवती - www.bharatkaitihas.com
सत्यवती से विवाह कर लिया राजा शांतनु ने

सत्यवती का उत्तर सुनकर महाराज शांतनु चकित रह गए। निषाद कन्या होकर इतना रूप वैभव, जिसकी समता कोई आर्यकन्या एवं देवकन्या भी नहीं कर सकती थी।

पिछली कथा में हमने स्वर्ग की अप्सरा गंगा द्वारा आठ वसुओं को जन्म देने तथा आठवां पुत्र शांतनु को देकर फिर से स्वर्ग लौट जाने की कथा कही थी। गंगा का आठवां पुत्र वस्तुतः आठवां वसु था जो महर्षि वशिष्ठ के श्राप के कारण धरती पर ही रह गया था। उसका नाम देवव्रत रखा गया। महाराज शांतनु उस बालक को अपने महल में ले आए। उस बालक में देवों के समान अद्भुत तेज एवं अतुल्य पराक्रम था।

गंगा के जाने के लौट जाने के बाद शांतनु ने 36 वर्ष तक ब्रह्मचर्य का पालन किया। एक दिन महाराज शान्तनु यमुना के तट पर घूम रहे थे कि उन्हें नदी में नाव चलाते हुये एक सुन्दर युवती दिखाई दी। उसका रूप लावण्य किसी अप्सरा के समान था और उसके अंग-प्रत्यंग से कमल की सुगन्ध निकल रही थी। महाराज शांतनु ने उस कन्या को निकट बुलाकर उससे पूछा- ‘हे देवि! तुम कौन हो?’

पूरे आलेख के लिए देखें, यह वी-ब्लाॅग-

उस कन्या ने कहा- ‘महाराज! मेरा नाम सत्यवती है और मैं निषाद कन्या हूँ।’

सत्यवती का उत्तर सुनकर महाराज शांतनु चकित रह गए। निषाद कन्या होकर इतना रूप वैभव, जिसकी समता कोई आर्यकन्या एवं देवकन्या भी नहीं कर सकती थी। महाराज को लगा कि यह भी अवश्य ही गंगा के समान स्वर्ग की अप्सरा होगी। इस कथा को आगे बढ़ाने से पहले हमें सत्यवती के अतीत के सम्बन्ध में कुछ चर्चा करनी होगी।

To purchase this book, please click on photo.

कुछ पुराणों में आई एक कथा के अनुसार एक मछली ने राजा सुधन्वा का अंश अपने शरीर में धारण किया जिससे वह गर्भवती हो गई। एक दिन एक मछुआरा मछली पकड़ रहा था, तब उसके जाल में वह मछली फंस गई। मछुआरे ने उस मछली का पेट चीरा तो उसमें से एक बालक तथा एक बालिका निकले। मछुआरे ने बालिका तो अपने पास रख ली तथा बालक राजा सुधन्वा को सौंप दिया। वह बालक आगे चलकर मत्स्यराज के नाम से प्रसिद्ध हुआ तथा बालिका का नाम सत्यवती रखा गया। वस्तुतः सत्यवती के पौराणिक आख्यान से हम अनुमान लगा सकते हैं कि सत्यवती राजा सुधन्वा एवं किसी धीमर-पुत्री की संतान रही होगी जिसका पालन-पोषण एक निषाद ने किया था। सत्यवती अत्यंत रूपसी कन्या थी किंतु उसकी देह में से मछली की गंध आती थी। समय अपने पर वह एक रूपवती युवती में बदल गई। एक दिन मुनि पराशर ने सत्यवती को नदी में नाव चलाते हुए देखा तो वे उस पर आसक्त हो गए। मुनि पराशर ने सत्यवती के समक्ष प्रणय निवेदन किया। इस पर सत्यवती ने कहा- मैं कुंवारी लड़की हूँ, इस कारण मेरा आपके साथ रमण करना उचित नहीं है।’

इस पर पराशर ने कहा- ‘तुम्हें मेरे साथ रमण करते हुए कोई नहीं देख सकेगा तथा तुम्हारे कौमार्य में भी कोई अंतर नहीं आएगा।’

सत्यवती ने कहा- मेरे शरीर से मछली जैसी गंध आती है, इसलिए आप मेरे साथ रमण नहीं कर सकेंगे।’

पराशर मुनि ने कहा- ‘मेरे आशीर्वाद से तुम्हारे शरीर से मछली की गंध आनी बंद हो जाएगी तथा तुम्हारे शरीर से दिव्य गंध आने लगेगी।’

पराशर की बात सुनकर सत्यवती पराशर मुनि के साथ रमण करने के लिए सहमत हो गई। पराशर मुनि ने अपनी तपस्या के बल पर सत्यवती के शरीर से आ रही मछली की गंध को समाप्त करके उसे दिव्य सुगंध में बदल दिया तथा अपने और सत्यवती के चारों ओर घनघोर कोहरा उत्पन्न कर दिया जिसमें सत्यवती एवं पराशर छिप गए। उनके प्रणय के परिणाम स्वरूप सत्यवती गर्भवती हो गई तथा उसने एक बालक को जन्म दिया। पुत्र को जन्म देने के बाद पराशर के आशीर्वाद से सत्यवती पुनः कुंवारी कन्या में बदल गई।

इसके बाद सत्यवती तो अपने पिता के पास चली गई और पराशर ऋषि उस पुत्र को अपने साथ लेकर वन में तपस्या करने चले गए। पराशर तथा सत्यवती के पुत्र का नाम द्वैपायन रखा गया। द्वैपायन ने धूप में खड़े रहकर घनघोर तपस्या की जिसके कारण उसकी त्वचा का रंग काला हो गया। इसलिए उसे कृष्ण द्वैपायन कहा जाने लगा।

इसी कृष्ण द्वैपायन ने वेदों को संहिता बद्ध किया था, पुराणों को लिपिबद्ध किया था तथा महाभारत एवं भागवत पुराण की रचना की थी। इस कारण उन्हें वेदव्यास कहा जाने लगा। हिन्दू धर्म में उन्हें भगवान कहकर उनका आदर किया जाता है। वेदव्यास ने सत्यवती को वचन दिया था कि- ‘जब कभी भी तू विपत्ति में मुझे स्मरण करेगी, मैं उपस्थित हो जाउँगा।’

अब राजा शांतनु उसी सत्यवती के रूप-यौवन पर रीझ गए थे। उन्होंने सत्यवती से तो कुछ नहीं कहा किंतु वे सत्यवती के पिता के पास पहुँचे और उसके समक्ष सत्यवती से विवाह करने की इच्छा प्रकट की।

इस पर निषाद बोला- ‘राजन्! मुझे अपनी कन्या का विवाह आपके साथ करने में कोई आपत्ति नहीं है परन्तु आपको मेरी कन्या के गर्भ से उत्पन्न पुत्र को ही अपने राज्य का उत्तराधिकारी बनाना होगा।’

शांतनु ने निषाद को बताया- ‘उनका पहले से ही एक पुत्र है। उसका नाम देवव्रत है और वही राज्य का अधिकारी है।’

निषाद ने कहा- ‘यदि आप मेरी पुत्री सत्यवती से विवाह करना चाहते हैं तो आपको मेरी शर्त स्वीकार करनी होगी।’ यह सुनकर शान्तनु चुपचाप हस्तिनापुर लौट आये।

जब राजकुमार देवव्रत ने अपने पिता को उद्विग्न एवं चिंतातुर देखा तो उसने अपने पिता के मंत्रियों से कहा कि वे महाराज की चिंता का पता लगाएं। मन्त्रियों ने महाराज से उनकी उद्विग्नता एवं चिंता का कारण पूछा। इस पर महाराज शांतनु ने मंत्रियों को अपनी उद्विग्नता एवं चिता का कारण बता दिया। मंत्रियों ने उसकी सूचना राजकुमार देवव्रत को दे दी।

देवव्रत मन्त्रियों को अपने साथ लेकर निषाद के घर गया और निषाद से कहा- ‘हे निषाद! आप सहर्ष अपनी पुत्री सत्यवती का विवाह मेरे पिता शान्तनु के साथ कर दें। मैं आपको वचन देता हूँ कि आपकी पुत्री के पेट से जो बालक जन्म लेगा वही राज्य का उत्तराधिकारी होगा।’

इस पर निषाद ने कहा- ‘आप तो इस वचन का पालन कर लेंगे किंतु आपकी संतानों ने सत्यवती के पुत्रों को राजसिंहासन पर बैठाने से मना कर दिया तो उसकी जिम्मेदारी कौन लेगा?’

इस पर देवव्रत ने निषाद के समक्ष दूसरी प्रतिज्ञा की- ‘आपकी पुत्री के अधिकारों की रक्षा करने के लिए मैं आजीवन ब्रह्मचारी रहूँगा तथा हस्तिनापुर के सिंहासन की रक्षा करूंगा।’

राजकुमार की इस प्रतिज्ञा को सुन कर निषाद ने हाथ जोड़ कर कहा- ‘हे देवव्रत! आपकी यह प्रतिज्ञा अभूतपूर्व है। मैं अपनी पुत्री का विवाह आपके पिता के साथ करने के लिए तैयार हूँ।’

जब राजा शांतनु ने भीष्म के प्रण के बारे में सुना तो उन्होंने देवव्रत से कहा- ‘तुम  इस प्रतिज्ञा को त्याग दो। मैं सत्यवती से विवाह नहीं करूंगा।’

देवव्रत ने कहा- ‘अब तो मैं प्रतिज्ञा ले चुका हूँ।’

इस पर महाराज शांतनु ने कहा- ‘वत्स! तुमने पितृभक्ति के वशीभूत होकर भीषण प्रतिज्ञा की है, इस प्रतिज्ञा के कारण आज से तुम भीष्म के नाम से प्रसिद्ध होओगे। मैं तुम्हें वरदान देता हूँ कि तुम्हारी मृत्यु तुम्हारी इच्छा से होगी।’

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

वेदव्यास ने नियोग से चंद्रवंशियों के कुल की रक्षा की (27)

0
वेदव्यास - www.bharatkaitihas.com
वेदव्यास ने नियोग से चंद्रवंशियों के कुल की रक्षा की

एक वर्ष व्यतीत हो जाने पर वेदव्यास पुनः हस्तिनापुर आए। सबसे पहले वे बड़ी रानी अम्बिका के पास गए। अम्बिका अपने समक्ष इतने तेजस्वी ऋषि को देखकर भयभीत हो गई तथा उसने अपने नेत्र बन्द कर लिए।

पिछली कथा में हमने चर्चा की थी कि सत्यवती के पिता ने निषाद होते हुए भी आर्य राजाओं के हस्तिनापुर जैसे प्रबल राज्य पर अपनी पुत्री सत्यवती के पुत्रों का अधिकार स्थापित करवा दिया। महर्षि अत्रि से आरम्भ हुए चंद्र वंश में अब तक जितनी भी कुल-वधुएं आई थीं वे स्वर्ग की देवियां, अप्सराएं एवं अप्सराओं से उत्पन्न कन्याएं थीं। यहाँ तक कि दैत्यगुरु शुक्राचार्य की पुत्री देवयानी भी इस कुल में ब्याहकर आई थी।

सत्यवती के रूप में पहली बार एक मत्स्य कन्या ने चंद्रवंशी राजकुल में राजरानी के रूप में प्रवेश किया। सत्यवती ने चित्रांगद और विचित्रवीर्य नामक दो पुत्रों को जन्म दिया। जब राजकुमार चित्रांगद एवं विचित्रवीर्य छोटे ही थे कि अचानक ही महाराज शांतनु का निधन हो गया। इस पर शांतनु के बड़े पुत्र भीष्म ने सत्यवती की सम्मति से सत्यवती के बड़े पुत्र चित्रांगद को हस्तिनापुर के सिंहासन पर बैठा दिया।

राजा चित्रांगद अपने पूर्वजों की भांति पराक्रमी राजा हुआ। उसने कई राजाओं को परास्त करके हस्तिनापुर राज्य का विस्तार किया। चित्रांगद अपने पराक्रम के कारण किसी भी मनुष्य अथवा असुर को अपने समकक्ष नहीं समझता था। इस कारण तीनों लोकों में चित्रांगद का भय छा गया। इस पर गंधर्वराज चित्रांगद ने शांतनुपुत्र चित्रांगद पर आक्रमण कर दिया।

पूरे आलेख के लिए देखें, यह वी-ब्लाॅग-

चित्रांगद नामक दोनों राजाओं में कुरुक्षेत्र के मैदान में भयंकर युद्ध हुआ। सरस्वती के तट पर तीन वर्ष तक यह युद्ध चलता रहा। गंधर्वराज चित्रांगद बड़ा मायावी था, उसने शांतनुपुत्र चित्रांगद को सम्मुख युद्ध में मार डाला।

शांतनुपुत्र देवव्रत ने अपने भाई चित्रांगद का अंतिम संस्कार किया तथा विचित्रवीर्य का राजतिलक कर दिया। विचित्रवीर्य अभी बालक ही था, इस कारण वह अपने बड़े भाई देवव्रत के निर्देशन में राज्य करने लगा जो अब भीष्म कहा जाता था।

जब विचित्रवीर्य युवा हुआ, तब भीष्म ने उसका विवाह करने का निश्चय किया। उन्हीं दिनों भीष्म को सूचना मिली कि काशीराज की तीन पुत्रियों का स्वयंवर होने जा रहा है। इस पर भीष्म ने माता सत्यवती से अनुमति लेकर अकेले ही रथ पर बैठकर काशी की यात्रा की। जब स्वयंवर में राजाओं एवं राजकुमारों का परिचय दिया जा रहा था तब काशी नरेश की तीन कन्याएं भीष्म को बूढ़ा समझकर आगे बढ़ गईं।

To purchase this book, please click on photo.

इस पर भीष्म ने उन कन्याओं को रोककर बताया कि वे अपने विवाह के लिए नहीं अपितु अपने छोटे भाई हस्तिनापुर नरेश विचित्रवीर्य के विवाह के लिए यहाँ आए हैं। ऐसा कहकर भीष्म ने बलपूर्वक उन कन्याओं को अपने रथ पर बैठा लिया। इस पर स्वयंवर में उपस्थित राजाओं ने भीष्म पर आक्रमण कर दिया किंतु भीष्म ने उस सभी को पराजित कर दिया। विजयी भीष्म उन तीनों राजकन्याओं को लेकर हस्तिनापुर लौटे तथा उन्होंने वे तीनों राजकन्याएं राजा विचित्रवीर्य को समर्पित कर दीं। तब काशी नरेश की बड़ी पुत्री अम्बा ने भीष्म से कहा कि मैं तो शाल्व नरेश को अपना पति मान चुकी हूँ, मैं विचित्रवीर्य से विवाह नहीं कर सकती। इस पर भीष्म ने उसे शाल्व नरेश के पास जाने की अनुमति दे दी तथा शेष दोनों राजकन्याओं अम्बिका और अम्बालिका का विवाह विचित्रवीर्य से कर दिया। विचित्रवीर्य अपनी दोनों रानियों के साथ भोग-विलास में रत हो गया किन्तु दोनों ही रानियों से कोई सन्तान नहीं हुई और राजा क्षयरोग से पीड़ित होकर मृत्यु को प्राप्त हो गया। इस प्रकार शांतनु के कुल में अब केवल राजकुमार भीष्म अकेले ही जीवित बचे।

कुलनाश के भय से माता सत्यवती ने भीष्म से कहा- ‘पुत्र! इस गौरवशाली चंद्रवंश को नष्ट होने से बचाने के लिए तुम इन दोनों पुत्र-कामिनी रानियों से पुत्र उत्पन्न करो तथा राजसिंहासन पर बैठकर राज्य का संचालन करो।’

माता सत्यवती की बात सुनकर भीष्म ने कहा- ‘मैंने आजीवन ब्रह्मचारी रहने तथा हस्तिनापुर का राजा न बनने की की प्रतिज्ञा की है। मैं अपनी प्रतिज्ञा किसी भी स्थिति में भंग नहीं कर सकता।’

इस पर माता सत्यवती ने पराशर मुनि से उत्पन्न अपने पुत्र वेदव्यास को स्मरण किया। स्मरण करते ही वेदव्यास वहाँ उपस्थित हो गए। सत्यवती ने उनसे कहा- ‘हे पुत्र! तुम्हारे दोनों भाई निःसन्तान ही स्वर्गवासी हो गए। अतः मेरे वंश को नष्ट होने से बचाने के लिए मैं तुम्हें आज्ञा देती हूँ कि तुम उनकी रानियों से सन्तान उत्पन्न करो।’

वेदव्यास ने माता की आज्ञा मान ली तथा माता सत्यवती से कहा- ‘हे माता! आप उन दोनों रानियों से कह दीजिये कि वे एक वर्ष तक नियम-व्रत का पालन करती रहें तभी उनको गर्भ धारण होगा।’

एक वर्ष व्यतीत हो जाने पर वेदव्यास पुनः हस्तिनापुर आए। सबसे पहले वे बड़ी रानी अम्बिका के पास गए। अम्बिका अपने समक्ष इतने तेजस्वी ऋषि को देखकर भयभीत हो गई तथा उसने अपने नेत्र बन्द कर लिए। वेदव्यास ने नियोगविधि से रानी अम्बिका को गर्भवती किया तथा उसके महल से लौटकर माता सत्यवती से कहा- ‘माता! अम्बिका का पुत्र बड़ा तेजस्वी होगा किन्तु रानी द्वारा नेत्र बन्द कर लेने ने के दोष के कारण वह अंधा होगा।’

सत्यवती को यह सुन कर अत्यन्त दुःख हुआ और उन्होंने वेदव्यास को छोटी रानी अम्बालिका के पास भेजा। अम्बालिका भी वेदव्यास को देख कर भयभीत हो गई तथा उसका शरीर पीला पड़ गया। महर्षि ने उसे भी नियोग से गर्भ प्रदान किया तथा उसके कक्ष से लौटकर सत्यवती से कहा- ‘माता! अम्बालिका भय से पीली पड़ गई इसलिए उसके गर्भ से पाण्डुरोग-ग्रस्त पुत्र उत्पन्न होगा।’

यह सुनकर माता सत्यवती को अत्यंत दुःख हुआ और उन्होंने बड़ी रानी अम्बालिका को पुनः वेदव्यास के पास जाने का आदेश दिया। इस बार बड़ी रानी ने स्वयं न जा कर अपनी दासी को वेदव्यास के पास भेज दिया।

इस बार वेदव्यास ने माता सत्यवती के पास आ कर कहा- ‘माते! इस दासी के गर्भ से वेद-वेदान्त में पारंगत अत्यन्त नीतिवान पुत्र उत्पन्न होगा।’

इसके बाद वेदव्यास तपस्या करने पुनः वन में चले गए। समय आने पर दोनों रानियों एवं एक दासी के गर्भ से एक-एक बालक का जन्म हुआ। इस प्रकार वेदव्यास ने नियोग की सहायता से चंद्रवंशी राजाओं के कुल को समाप्त होने से बचाया।

आधुनिक काल के अनेक लोगों ने नियोग की अलग-अलग व्याख्या की है किंतु किसी भी पुराण में यह नहीं लिखा है कि नियोग क्या था! कुछ लोगों का मानना है कि नियोग एक प्रथा थी जिसमें पति के निःसंतान अवस्था में मर जाने पर स्त्री को अपने ही कुल के किसी पुरुष से एक बार गर्भधारण करने की अनुमति दी जाती थी, जबकि कुछ लोगों का कहना है कि नियोग आज के टेस्टट्यूब बेबी की तरह कृत्रिम गर्भाधान की एक वैज्ञानिक विधि थी।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

धृतराष्ट्र, पाण्डु एवं विदुर(28)

0
धृतराष्ट्र - www.bharatkaitihas.com
धृतराष्ट्र, पाण्डु एवं विदुर

धृतराष्ट्र तथा पाण्डु तो महर्षि वेदव्यास की संतान थे। फिर वे चंद्रवंशी राजसिंहासन के उत्तराधिकारी कैसे हुए! धृतराष्ट्र, पाण्डु तथा विदुर एक ही पिता की संतान थे, फिर भी उनमें से धृतराष्ट्र एवं पाण्डु को राजकुमार तथा विदुर को दासीपुत्र क्यों माना गया।

पिछली कथा में हमने सत्यवती के पुत्र वेदव्यास द्वारा कुरुवंशी रानियों अम्बिका एवं अम्बालिका एवं एक दासी से नियोग के माध्यम से एक-एक पुत्र उत्पन्न करने की कथा की चर्चा की थी।

अम्बा के गर्भ से उत्पन्न पुत्र नेत्रहीन होने पर भी बड़ा बलशाली था। इसलिए उसका नाम धृतराष्ट्र रखा गया। अम्बालिका के गर्भ से उत्पन्न पुत्र पाण्डु रोग से ग्रस्त था इसलिए उसका नाम पाण्डु रखा गया। पाण्डु का अर्थ पीला होता है। दासी के गर्भ से उत्पन्न पुत्र अत्यंत धीर-गंभीर, वेदों एवं विभिन्न शास्त्रों का ज्ञाता तथा धर्म का मर्मज्ञ था। उसका नाम विदुर रखा गया। हिन्दू संस्कृति में विदुर को आदर से धर्मात्मा विदुर कहा जाता है।

जब तक वे बालक बड़े हुए तब तक भीष्म ही माता सत्यवती के परामर्श के अनुसार हस्तिनापुर राज्य का संचालन करते रहे। जब वेदव्यास द्वारा नियोग से उत्पन्न तीनों पुत्र बड़े हुए तो राज्य सिंहासन पर किसे बिठाया जाए, इस प्रश्न को लेकर मंथन आरम्भ हुआ। चूंकि अम्बिका का पुत्र धृतराष्ट्र नेत्रहीन था इसलिए उसे राजा बनने के योग्य नहीं माना गया। दासी पुत्र को राजा बनाने की परम्परा नहीं थी। इसलिए पाण्डु रोग से ग्रस्त पाण्डु को ही राजा बनने का अधिकारी माना गया।

यहाँ यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि धृतराष्ट्र तथा पाण्डु तो महर्षि वेदव्यास की संतान थे। फिर वे चंद्रवंशी राजसिंहासन के उत्तराधिकारी कैसे हुए! धृतराष्ट्र, पाण्डु तथा विदुर एक ही पिता की संतान थे, फिर भी उनमें से धृतराष्ट्र एवं पाण्डु को राजकुमार तथा विदुर को दासीपुत्र क्यों माना गया।

इस रोचक कथा का वीडियो देखें-

इस प्रश्न का उत्तर आर्यों की सांस्कृतिक परम्परा में छिपा हुआ है। वस्तुतः किसी भी बालक के दो प्रकार के माता-पिता हो सकते हैं, पहले वे जो उस बालक को जन्म देते हैं और दूसरे वे जो उस बालक का पालन-पोषण करते हैं। यदि हम इसे उदाहरणों के माध्यम से समझना चाहें तो हमें शकुंतला का उदाहरण लेना होगा।

शकुंतला के पिता विश्वामित्र थे किंतु उसका पालन कण्व ऋषि ने किया था इसलिए वह कण्व की पुत्री मानी गई न कि विश्वामित्र की। इसी प्रकार निषाद-कन्या सत्यवती के पुत्र वेदव्यास का लालन-पालन पराशर मुनि के आश्रम में हुआ इसलिए वेदव्यास को ब्राह्मण माना गया जबकि उसी धीमर कन्या सत्यवती के पुत्रों चित्रांगद एवं विचित्रवीर्य का लालन-पालन राजा शांतनु के महलों में हुआ था, इसलिए चित्रांगद एवं विचित्रवीर्य को क्षत्रिय राजकुमार माना गया।

इसी प्रकार सत्यवती तथा उसके भाई मत्स्यराज का जन्म एक ही माता के गर्भ से हुआ था और वे एक ही पिता राजा सुधन्वा की संतान थे किंतु सत्यवती का पालन-पोषण एक निषाद के घर में हुआ इसलिए उसे निषादपुत्री माना गया जबकि उसके भाई मत्स्यराज का पालन-पोषण राजा सुधन्वा के महलों में हुआ इसलिए उसे राजपुत्र माना गया।

To purchase this book, please click on photo.

इसी प्रकार नियोग प्रथा में भी यह प्रावधान था कि पति की मृत्यु के बाद किसी स्त्री द्वारा अपने कुल को चलाने के लिए नियोग से प्राप्त पुत्र उस स्त्री के मृत-पति के कुल को चलाता था तथा उसी का नाम पाता था क्योंकि उस पुत्र का पालन अपनी माता के मृत-पति के घर में होता था। चूंकि धृतराष्ट्र एवं पाण्डु का पालन-पोषण अम्बिका एवं अम्बालिका के मृत-पति विचित्रवीर्य के महलों में हुआ था इसलिए धृतराष्ट्र एवं पाण्डु विचित्रवीर्य के पुत्र माने गए। उन्हें वे सभी अधिकार प्राप्त हुए जो उन्हें विचित्रवीर्य के पुत्र के रूप में मिलने चाहिए थे। चूंकि विदुर का लालन-पालन अम्बालिका की दासी के घर में हुआ था इसलिए विदुर को दासी पुत्र माना गया। अतः आर्य परम्परा के अनुसार राजकुमार पाण्डु को राज्य का योग्य उत्तराधिकारी माना गया। चूंकि धृतराष्ट्र और पाण्डु युवा हो चुके थे इस कारण भीष्म के समक्ष एक बार पुनः राजकुमारों के विवाह का वही प्रश्न आ खड़ा हुआ जो विचित्रवीर्य के समय में उत्पन्न हुआ था। जब भीष्म ने सुना कि गांधार नरेश की पुत्री गांधारी ने भगवान शिव को प्रसन्न करके सौ पुत्रों की माता होने का वरदान प्राप्त किया है तो भीष्म ने धृतराष्ट्र का विवाह गांधारी से करने का निर्णय लिया।

जब भीष्म ने गांधार नरेश के पास धृतराष्ट्र तथा गांधारी के विवाह का प्रस्ताव भिजवाया तो गांधार नरेश विचलित हो गया। वह अपनी पुत्री का विवाह नेत्रहीन राजकुमार के साथ नहीं करना चाहता था किंतु उस काल में भूण्डल पर शांतनुपुत्र भीष्म का प्रभाव इतना बढ़ा-चढ़ा हुआ था कि गांधार नरेश के लिए मना करना संभव नहीं था। अतः गांधार नरेश ने अपने पुत्र शकुनि को आदेश दिया कि वह राजकुमारी गांधारी को सम्मान के साथ हस्तिनापुर छोड़ आए।

जब गांधारी का भाई शकुनि अपनी बहिन को लेकर हस्तिनापुर आया तो हस्तिनापुर के वैभव को देखकर चकित रह गया। शकुनि ने अपनी बहिन का विवाह धृतराष्ट्र के साथ कर दिया तथा वह स्वयं भी अपनी बहिन के साथ हस्तिनापुर में ही रह गया।

इसी प्रकार यदुवंशी नरेश शूरसेन की पुत्री पृथा बड़ी सुंदर थी। वसुदेवजी पृथा के भाई थे। शूरसेन ने पृथा को अपनी संतानहीन फुफेरे भाई कुंतिभोज को दे दिया था। इस कारण पृथा को कुंती भी कहा जाता था। वह अत्यंत सात्विक प्रवृत्ति की राजकुमारी थी। जब कुंतिभोज ने कुंती के लिए स्वयंवर का आयोजन किया तो भीष्म अपने भतीजे महाराज पाण्डु को अपने साथ लेकर इस स्वयंवर में पहुंचा।

जब स्वयंवर में हस्तिनापुर से आए भीष्म तथा महाराज पाण्डु का परिचय दिया गया तो राजकुमारी कुंती ने महाराज पाण्डु को अपने पति के रूप में चुन लिया। कुछ समय पश्चात् देवव्रत भीष्म ने मद्र देश की राजधानी को घेर लिया। इस पर मद्रनरेश शल्य ने अपनी बहिन माद्री का विवाह महाराज पाण्डु के साथ कर दिया।

इस प्रकार शांतनु-पुत्र भीष्म के प्रभाव से चंद्रवंशी राजकुमारों धृतराष्ट्र और पाण्डु के विवाह भारतवर्ष के उत्तम राजकुलों की कन्याओं से हो गया। कुछ समय पश्चात् भीष्म ने राजा देवक की परम सुंदरी युवा दासी का विवाह विदुरजी के साथ करवा दिया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

गांधारी ने कुंती से द्वेष रखने के कारण अपना गर्भ गिरा दिया (29)

0
गांधारी - www.bharatkaitihas.com
गांधारी ने कुंती से द्वेष रखने के कारण अपना गर्भ गिरा दिया

गांधारी के पेट से लोहे के समान कठोर एक मांसपिण्ड निकला। गांधारी ने उसे मांस-पिण्ड को फिंकवाने का निर्णय किया। महर्षि वेदव्यास को योगबल से इस घटना का पता चल गया और वे तुरंत गांधारी के पास आए तथा उससे गर्भ गिराने का कारण पूछा।

पिछली कथाओं में हमने चर्चा की थी कि स्वर्गीय चंद्रवंशी राजा शांतनु की विधवा रानी सत्यवती के अनुरोध पर सत्यवती के पुत्र महर्षि वेदव्यास ने शांतनु के कुल की विधवा रानियों अम्बिका एवं अम्म्बालिका से नियोग करके तीन पुत्र उत्पन्न किए। इनमें से बड़ा राजपुत्र धृतराष्ट्र नेत्रहीन था, छोटा भाई पाण्डु, पाण्डुरोग से ग्रसित था।

बड़ा राजपुत्र शरीर से बलिष्ठ होने पर भी नेत्रहीन था। इसलिए छोटे राजपुत्र पाण्डु को शरीर से रोगी एवं निर्बल होते हुए भी राजा बनाया गया। जब ये बालक बड़े हो गए तब दिवंगत महाराज शांतनु के पुत्र देवव्रत अर्थात् भीष्म ने माता सत्यवती से अनुमति लेकर धृतराष्ट्र एवं पाण्डु के विवाह भारत वर्ष के प्रसिद्ध राजकुलों की राजकुमारियों से करवा दिए।

To purchase this book, please click on photo.

धृतराष्ट्र की पत्नी गांधारी यद्यपि नेत्रहीन नहीं थी तथापि उसने अपनी पतिभक्ति का प्रदर्शन करने के लिए स्वेच्छा से अपने नेत्रों पर कपड़े की पट्टी बांध ली। इस पर गांधारी का भाई शकुनि भी हस्तिनापुर में ही रहने लगा ताकि वह अपने नेत्रहीन बहनोई धृतराष्ट्र तथा नेत्रहीन बनकर रहने वाली बहिन गांधारी की सेवा कर सके। महर्षि वेदव्यास अपनी माता सत्यवती के कुल को देखने के लिए समय-समय पर हस्तिनापुर आया करते थे। जब गांधारी हस्तिनापुर में ब्याहकर आई तो वह महर्षि वेदव्यास की आव-भगत करने लगी। एक बार महर्षि वेदव्यास ने गांधारी से प्रसन्न होकर उससे कहा कि वह कोई वरदान मांगे। इस पर गांधारी ने अपने पति के समान ही सौ बलिष्ठ पुत्र होने का वर मांगा। भगवान वेदव्यास जानते थे कि गांधारी ने भगवान शिव की तपस्या करके उनसे सौ पुत्रों की माता होने का वरदान प्राप्त किया था। इसलिए उन्होंने गांधारी को वही आशीर्वाद दे दिया। कुछ समय बाद गांधारी गर्भवती हुई। महाभारत के अनुसार गांधारी का गर्भ दो वर्ष तक गांधारी के जठर में रहा। इसी बीच महाराज पाण्डु की बड़ी रानी कुंती के पेट से राजपुत्र युधिष्ठिर का जन्म हुआ। इससे गांधारी को अपने पेट में पल रहे गर्भ की चिंता हुई तथा उसने अपने पति से छिपाकर अपना गर्भ गिरा दिया।

पूरे आलेख के लिए देखें, यह वी-ब्लाॅग-

गांधारी के पेट से लोहे के समान कठोर एक मांसपिण्ड निकला। गांधारी ने उसे मांस-पिण्ड को फिंकवाने का निर्णय किया। महर्षि वेदव्यास को योगबल से इस घटना का पता चल गया और वे तुरंत गांधारी के पास आए तथा उससे गर्भ गिराने का कारण पूछा।

इस पर गांधारी ने महर्षि वेदव्यास को मांस-पिण्ड दिखाया तथा कहा- ‘पहले मैं गर्भवती हुई किंतु कुंती ने मुझसे पहले ही अपने पुत्र को जन्म दे दिया। आपने मुझे सौ बलवान पुत्रों की माता होने का वरदान दिया था किंतु दो वर्ष तक मेरे गर्भ में रहने के बाद भी मेरे गर्भ से केवल यह मांसपिण्ड उत्पन्न हुआ है।’

महर्षि वेदव्यास ने गांधारी से कहा- ‘मेरा वचन कभी खाली नहीं जा सकता। इसलिए तुम एक सौ कुण्ड बनवाकर उन्हें घी से भर दो और सुरक्षित स्थान में रखकर उनकी रक्षा का प्रबंध करो तथा इस मांसपिण्ड पर जल छिड़को। यदि तुम ऐसा करोगी तो समय आने पर इस पिण्ड से सौ बलवान पुत्र उत्पन्न होंगे।’

गांधारी ने वैसा ही किया। जैसे ही उस मांसपिण्ड पर जल छिड़का गया, वैसे ही उस मांसपिण्ड के एक सौ एक टुकड़े हो गए। प्रत्येक टुकड़ा अंगूठे के एक पोरुए के बराबर था।

महर्षि वेदव्यास ने गांधारी से कहा- ‘मांसपिण्ड के इन एक सौ एक टुकड़ों को घी से भरे कुंडों में डाल दो। अब इन कुंडों को दो साल बाद खोलना।’

यह कहकर महर्षि वेदव्यास तपस्या करने हिमालय पर चले गए। समय आने पर उन्हीं मांसपिण्डों से पहले दुर्याेधन और बाद में गांधारी के 99 पुत्र तथा अंत में एक कन्या उत्पन्न हुई। राजपुत्र दुर्योधन पैदा होते ही गधे की भांति रोने लगा। उसका शब्द सुनकर गधे, गीदड़, गिद्ध और कौए भी चिल्लाने लगे। आंधी चलने लगी तथा कई स्थानों पर आग लग गई। जिस दिन दुर्योधन का जन्म हुआ, उसी दिन कुंती के पुत्र भीमसेन का भी जन्म हुआ।

धृतराष्ट्र ने ब्राह्मणों को बुलाकर पूछा- ‘वैसे तो पाण्डुपुत्र युधिष्ठिर मेरे पुत्र दुर्योधन से ज्येष्ठ है किंतु आप लोग यह बताइए कि मेरे पुत्र दुर्योधन को राज्य मिलेगा या नहीं?’

अभी धृतराष्ट्र की बात पूरी भी नहीं हुई थी कि गीदड़ आदि मांसभोजी जंतु जोर-जोर से चिल्लाने लगे। इस पर ब्राह्मणों ने कहा- ‘आपके पुत्र के अशुभ लक्षणों को देखकर कहा जा सकता है कि यह बालक आपके कुल का नाश करने वाला होगा। अतः आप इस पुत्र को त्याग दीजिए।’

ब्राह्मणों की बात सुनकर धृतराष्ट्र चुप हो गया किंतु उसने अपने पुत्र का त्याग नहीं किया। 

जिन दिनों गांधारी गर्भवती थी और धृतराष्ट्र की सेवा करने में असमर्थ थी, उन दिनों एक वैश्य-कन्या धृतराष्ट्र की सेवा में रहती थी, उससे धृतराष्ट्र को एक पुत्र की प्राप्ति हुई जिसका नाम युयुत्सु रखा गया। गांधारी के पुत्रों से ठीक उलट, युयुत्सु बड़ा धर्मात्मा और विचारशील था।

जब ये बालक बड़े हुए तो धृतराष्ट्र ने उन सबके विवाह योग्य कन्याओं के साथ करवा दिए तथा राजपुत्री दुश्शला का विवाह सिंधुनरेश जयद्रथ के साथ कर दिया।

व्यावहारिक रूप से देखने पर गांधारी के दो साल तक गर्भवती रहने, उसके पेट से मांसपिण्ड निकलने एवं मांसपिण्ड से एक सौ एक 101 बच्चों के उत्पन्न होने की कथा कपोल-कल्पना जैसी लगती है किंतु इस घटना को समझने के लिए हमें एक बार पुनः महर्षि वेदव्यास की तरफ चलना होगा।

महाभारत में आई कथाओं के अनुसार महर्षि वेदव्यास नियोग पद्धति से पुत्र उत्पन्न करने के जानकार थे। उन्होंने ही विचित्रवीर्य की दो विधवा रानियों के गर्भ से नियोग प्रथा के माध्यम से दो राजपुत्रों एवं दासी के गर्भ से एक दासीपुत्र को जन्म दिया था।

संभवतः नियोग प्रथा आज की ‘टैस्टट्यूब बेबी’ जैसी कोई तकनीक थी जो महर्षि वेदव्यास को आती थी। अतः पर्याप्त संभव है कि गांधारी के गर्भ से प्राप्त टिशुओं से महर्षि वेदव्यास ने ‘टेस्टट्यूब बेबी टैक्नॉलॉजी’ के माध्यम से एक सौ एक बच्चों को उत्पन्न करवाया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

ऋषि किन्दम ने महाराज पाण्डु को स्त्री-संसर्ग से मृत्यु का श्राप दिया (30)

0
ऋषि किन्दम - www.bharatkaitihas.com
ऋषि किन्दम ने महाराज पाण्डु को स्त्री-संसर्ग से मृत्यु का श्राप दिया

महाराज पाण्डु ने एक मृग युगल को तीर मारकर घायल कर दिया। वे दोनों मृग ऋषि किन्दम तथा उनकी पत्नी थे। ऋषि किन्दम ने महाराज पाण्डु को मृत्यु का श्राप दिया!

यह कथा चंद्रवंशी राजा पाण्डु पर केन्द्रित है। एक बार हस्तिनापुर के राजा पाण्डु अपनी दोनों रानियों कुन्ती तथा माद्री के साथ आखेट के लिये वन में गये। वहाँ उन्होंने एक यूथपति मृग को एक मृगी के साथ संसर्ग करते हुए देखा। महाराज पाण्डु ने उसी समय लक्ष्य साधकर पांच बाण चलाए जिससे वे दोनों मृग घायल होकर धरती पर गिर गए। वे दोनों मृग ऋषि किन्दम तथा उनकी पत्नी थे।

एक धर्मशील राजा द्वारा किए गए इस अधर्मपूर्ण आचरण को देखकर नर-मृग रूपी ऋषि किन्दम ने कहा- ‘राजन्! अत्यंत कामी, क्रोधी और बुद्धिहीन मनुष्य भी ऐसा क्रूर कर्म नहीं करते! राजन् आपके लिए तो उचित यही है कि आप पापी और क्रूरकर्मा मनुष्यों को दण्ड दें। मुझ निरपराध को मारकर आपने क्या लाभ उठाया? मैं किन्दम नामक तापस हूँ तथा यह मेरी पत्नी है। मनुष्य रूप में रहकर स्त्री-संसर्ग करते हुए मुझे लज्जा आती है, इसलिए मैं मृग बनकर अपनी पत्नी के साथ विहार कर रहा था। मुझे मारने से आपको ब्रह्महत्या तो नहीं लगेगी क्योंकि आप यह बात जानते नहीं थे कि मैं ब्राह्मण हूँ किंतु आपने मुझे जिस अवस्था में मारा है, वह सर्वथा अनुपयुक्त है। इसलिए जब कभी भी आप स्त्री-संसर्ग की स्थिति में होंगे, उसी अवस्था में आपकी मृत्यु हो जाएगी और वह स्त्री भी आपके साथ सती होकर मृत्यु को प्राप्त होगी।’

इतना कहकर नर-मृग रूपी ऋषि किन्दम ने प्राण त्याग दिए।

जब महाराज पाण्डु को ज्ञात हुआ कि उनके हाथों से घनघोर अपराध हो गया है तो उन्हें तथा उनकी रानियों को बहुत पश्चाताप हुआ। महाराज पाण्डु ने अपनी रानियों से कहा- ‘मुझे ज्ञात है कि मनुष्य कितना भी कुलीन हो तथा उसका अंतःकरण कितना भी निर्मल हो, वह काम के फंदे में फंस ही जाता है। मेरे पिता विचित्रवीर्य भी काम-वासना के फंदे में फंसकर असमय मृत्यु को प्राप्त हुए थे। अतः अवश्य ही एक न एक दिन मैं भी काम-वासना के फंदे में फंस जाउंगा और असमय मृत्यु को प्राप्त होउंगा।’

पूरे आलेख के लिए देखें, यह वी-ब्लाॅग-

महाराज पाण्डु ने अपने अस्त्र-शस्त्र त्याग दिए तथा भगवान श्री हरि विष्णु की तपस्या करने का निश्चय करके एक पेड़ के नीचे बैठ गए तथा अपना संकल्प व्यक्त करते हुए बोले- ‘मैं इसी समय से मौनी संन्यासी होकर जंगलों में स्थित आश्रमों में भिक्षा मांगकर अपना उदर भरूंगा और कभी भी अपनी राजधानी हस्तिनापुर नहीं लौटूंगा।’

महाराज पाण्डु ने अपनी रानियों से कहा- ‘अब तुम दोनों राजधानी हस्तिनापुर लौट जाओ। वहाँ मेरी माता अम्बालिका, दादी सत्यवती, मेरे कुल एवं परिवार के समस्त वरिष्ठ जन एवं पुर-वासियों से कहना कि पाण्डु ने संन्यास ले लिया।’

महारानी कुंती एवं माद्री को ऋषि किन्दम के श्राप तथा महाराज पाण्डु का निश्चय जानकर बड़ा दुःख हुआ। उन्होंने महाराज पाण्डु से कहा- ‘संन्यास आश्रम में प्रवेश करने से अच्छा है कि आप समस्त वासनाओं का त्याग करके हमारे साथ ही वन में रहकर तपस्या करें। हम दोनों भी अपनी इंद्रियों को वश में करके आपके साथ महान् तपस्या करेंगी। हम लोग साथ-साथ ही स्वर्ग में चलेंगे और वहाँ भी पति-पत्नी के रूप में साथ-साथ रहेंगे। महाराज यदि आप हमें त्याग देंगे तो हम अवश्य ही अपने प्राण त्याग देंगी, इसमें कोई संदेह नहीं है। हम इस स्थिति में आपको छोड़कर हस्तिनापुर नहीं जाएंगी।’

महाराज पाण्डु ने कहा- ‘यदि तुम दोनों ने धर्म के अनुसार ऐसा ही करने का निश्चय किया है तो अच्छी बात है, मैं संन्यास आश्रम में नहीं रहकर वानप्रस्थ आश्रम में रहूँगा और घनघोर तपस्या करते हुए वन में विचरण करूंगा।’

इसके बाद महाराज पाण्डु तथा दोनों रानियों ने अपने राजसी वस्त्र-आभूषण त्याग दिए तथा वल्कल धारण कर लिए। महाराज पाण्डु ने अपने साथ आए हुए सेवकों से कहा- ‘आप ये वस्त्र-आभूषण हस्तिनापुर जाकर भ्राता धृतराष्ट्र को सौंप दें तथा हस्तिनापुरवासियों से कहें कि पाण्डु अपनी रानियों सहित वानप्रस्थी हो गया है।’ राजा के वचन सुनकर उनके साथ आए सेवक अश्रु बहाने लगे।

To purchase this book, please click on photo.

जब सेवक राजा पाण्डु के कपड़े और आभूषण लेकर हस्तिनापुर पहुंचे तो राजा के बड़े भाई धृतराष्ट्र को सेवकों की बात सुनकर बड़ा दुःख हुआ। धृतराष्ट्र भी भोजन आदि भूलकर अपने भाई की चिंता में डूब गए किंतु देवव्रत भीष्म ने माता सत्यवती से सलाह करके धृतराष्ट्र को महाराज पाण्डु के प्रतिनिधि के रूप में हस्तिनापुर का राजा बना दिया। उधर महाराज पाण्डु अपनी रानियों के साथ एक पर्वत से दूसरे से पर्वत पर होते हुए गंधमादन पर्वत पर जा पहुंचे। वे केवल कन्द-मूल-फल खाकर रहते तथा संयम का पालन करते हुए ऊंची-नीची धरती पर सोते। उनकी तप-निष्ठा को देखकर वनों में रहने वाले तापस एवं सिद्ध उन तीनों का ध्यान रखते तथा उनके साथ प्रेम-पूर्ण व्यवहार करते। कई दिनों तक गंधमादन पर्वत पर तपस्या करने के बाद महाराज पाण्डु अपनी पत्नियों को लेकर इन्द्रद्युम्न सरोवर को पार करके हंसकूट शिखर पर पहुंचे तथा उसे भी लांघकर शतशृंग नामक पर्वत पर पहुंचे। वहाँ बहुत से तापस, सिद्ध एवं चारण रहते थे। महात्मा पाण्डु उन सबकी सेवा करने लगे तथा अपनी इन्द्रियों को वश में करके ईश्वर का ध्यान करने लगे।

वन में निवास करने वाले स्त्री-पुरुष राजा एवं उनकी रानियों को स्वजन मानकर उनसे स्नेह-व्यवहार करते थे जिसके कारण राजा एवं रानियों की तपस्या निर्विघ्न चलने लगी।

एक बार अमावस्या का दिन था। राजा पाण्डु पर्वत के शिखर पर बैठे हुए तपस्या कर रहे थे। उन्होंने बहुत से ऋषियों को ब्रह्मलोक जाते हुए देखा। पाण्डु ने उनसे पूछा- ‘आप कहाँ जा रहे हैं!’

ऋषियों ने उत्तर दिया- ‘हम लोग ब्रह्माजी के दर्शनों के लिए ब्रह्मलोक जा रहे हैं।’

इस पर महाराज पाण्डु भी अपनी पत्नियों के साथ ऋषियों के पीछे चल पड़े। ऋषियों ने राजा से कहा- ‘महाराज! ब्रह्मलोक जाने का मार्ग बड़ा दुर्गम है। उस मार्ग के कष्टों को हमारे जैसे ऋषि-मुनि एवं तापस ही सहन कर सकते हैं। मार्ग में अप्सराओं के विमानों की भीड़ से ठसाठस भरी हुई भूमि है। ऊंचे-नीचे उद्यान हैं। नदियों के कगार हैं, भयंकर पर्वत एवं गुफाएं हैं। वहाँ बर्फ ही बर्फ है, वृक्ष नहीं हैं। हरिण और पक्षी दिखाई नहीं देते। कुछ स्थानों पर तो केवल वायु ही उड़ सकता है। ऐसे मार्ग से केवल सिद्ध ऋषि ही निकल सकते हैं। ऐसे मार्ग से महारानी कुंती एवं माद्री कैसे निकल सकेंगी! अतः आप हमारे पीछे मत आइए।’

महाराज पाण्डु समझ गए कि सिद्ध-जन मुझे अपने साथ ब्रह्मलोक नहीं ले जाना चाहते! महाराज पाण्डु उसका कारण भी जान गए।

राजा ने कहा- ‘हे महात्मन्! मैं जानता हूँ कि मैंने अभी तक धरती पर चार ऋणों में से केवल तीन ऋण अर्थात् देव-ऋण, ऋषि-ऋण और मनुष्य ऋण ही चुकाए हैं, पितृ-ऋण का भार अब भी मुझ पर शेष है। उसे चुकाए बिना मैं ब्रह्मलोक में प्रवेश नहीं कर सकता। यज्ञ से देव-ऋण, स्वाध्याय और तपस्या से ऋषि-ऋण और दान एवं परोपकार से मनुष्य ऋण उतरता है किंतु पितृ-ऋण से उऋण होने के लिए पुत्र का होना आवश्यक है। मैं चाहता हूँ कि मेरी पत्नियों के पेट से पुत्रों का जन्म हो ताकि मैं पितृ-ऋण से मुक्त हो सकूँ।’

इस पर ऋषियों ने कहा- ‘हम देख रहे हैं कि आपकी रानियों के पेट से देवताओं के समान तेजस्वी पुत्र उत्पन्न होंगे। इसलिए आप बिल्कुल भी दुःखी न हों। आप इस देवदत्त अधिकार की प्राप्ति के लिए उद्योग कीजिए, आपका मनोरथ अवश्य ही पूर्ण होगा!’

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

पाण्डुपुत्र (31)

0
पाण्डुपुत्र - www.bharatkaitihas.com
पाण्डुपुत्र

महाराज पाण्डु की रानियों कुंती एवं माद्री ने देवताओं से पांच पुत्र वरदान में प्राप्त किए जिन्हें लोक में पाण्डुपुत्र एवं पांच पाण्डव के नाम से प्रतिष्ठा प्राप्त हुई।

पिछली कथा में हमने चर्चा की थी कि ब्रहृलोक जा रहे ऋषि-मुनियों ने महाराज पाण्डु के कोई पुत्र नहीं होने के कारण उन्हें अपने साथ ले जाने से मना कर दिया। इस बात से व्यथित होकर महाराज पाण्डु ने अपनी बड़ी रानी कुन्ती से कहा- ‘संतानहीन होने के कारण मेरा धरती पर जन्म लेना वृथा हो गया है क्योंकि सन्तानहीन व्यक्ति पितृ-ऋण से मुक्ति नहीं पा सकता। ऋषि किंदम द्वारा दिए गए श्राप के कारण मैं पुत्र भी उत्पन्न नहीं कर सकता, क्योंकि जब भी मैं तुम्हारे निकट आउंगा, मेरी उसी क्षण मृत्यु हो जाएगी।’

इस कथा को आगे बढ़ाने से पहले हमें महारानी कुंती के जीवन के पिछले भाग में चलना होगा। हम पूर्व की कथाओं में चर्चा कर चुके हैं कि कुंती, यदुवंशी नरेश शूरसेन की पुत्री थी। वह श्रीकृष्ण के पिता वसुदेव की बहन और भगवान श्रीकृष्ण की बुआ थी। नागवंशी महाराज कुन्तिभोज ने कुन्ती को गोद लिया था। इस कारण कुंती को पृथा भी कहा जाता था। भारतीय संस्कृति में कुंती को पंच-कन्याओं में से एक माना जाता है तथा उन्हें चिर-कुमारी कहा जाता है।

जब राजकुमारी कुंती अविवाहित थी तथा अपने पिता कुंतीभोज के घर में रहा करती थी, तब एक बार महर्षि दुर्वासा राजा शूरसेन के महलों में अतिथि बनकर आए। राजकुमारी कुंती ने दुर्वासा ऋषि की बड़ी सेवा की जिससे प्रसन्न होकर दुर्वासा ने कुंती को एक मंत्र दिया तथा उससे कहा कि इस मंत्र के माध्यम से कुंती जिस किसी भी देवता का आह्वान करेगी, वह देवता कुंती के अधीन हो जाएगा तथा उससे कुंती को उसी देवता के समान तेजस्वी पुत्र प्राप्त होगा।

एक बार कौमार्य अवस्था में ही कुंती ने कौतूहलवश भगवान सूर्य का आह्वान किया जिससे कुंती के पेट से कर्ण का जन्म हुआ। लोकलाज के भय से कुंती ने उस पुत्र को लकड़ी की पेटी में रखकर नदी में बहा दिया था। इस भेद को संसार में भगवान श्रीकृष्ण एवं भगवान सूर्य के अतिरिक्त और कोई नहीं जानता था।

पूरे आलेख के लिए देखें, यह वी-ब्लाॅग-

जब महाराज पाण्डु ने रानी कुंती के समक्ष अपनी निःसंतानअवस्था एवं अपनी विवशता प्रकट की तो कुंती ने महाराज पाण्डु को उस वरदान के बारे में बताया। इस पर महाराज पाण्डु ने कुंती से कहा- ‘तुम धर्मराज का ध्यान करके उनसे एक पुत्र प्राप्त करो। उनसे जो पुत्र उत्पन्न होगा, वह कभी भी अधर्म की ओर नहीं जाएगा।’

महाराज पाण्डु के आदेश पर महारानी कुंती ने दुर्वासा से प्राप्त मंत्र के माध्यम से धर्मराज का आह्वान किया। एक चमकीले रथ पर सवार धर्मराज कुंती के समक्ष प्रकट हुए। उन्होंने कुंती से पूछा- ‘मैं तुम्हारा क्या प्रिय करूं?’

कुंती ने उनसे एक पुत्र मांगा। धर्मराज की कृपा से कुंती को गर्भ रह गया तथा समय आने पर कुंती ने धर्मराज के समान ही तेजस्वी पुत्र को जन्म दिया। उस समय एक आकशवाणी हुई- ‘यह बालक धर्मात्मा मनुष्यों में श्रेष्ठ होगा तथा सम्पूर्ण धरती पर शासन करेगा। पाण्डु के इस पुत्र का नाम युधिष्ठिर होगा।’

कुछ दिनों बाद महाराज पाण्डु ने कुंती से कहा- ‘क्षत्रिय जाति बल-प्रधान है। इसलिए तुम एक ऐसा पुत्र उत्पन्न करो जो बलवान् हो।’

पति की आज्ञा पाकर कुंती ने वायुदेव का आह्वान किया। महाबली वायु ने कुंती के समक्ष प्रकट होकर उसे महाबलशाली पुत्र होने का वरदान दिया। जिस समय कुंती के इस पुत्र का जन्म हुआ, उस समय भी एक आकाशवाणी हुई- ‘पाण्डु का यह पुत्र बलवान पुरुषों का शिरोमणि होगा।’

To purchase this book, please click on photo.

जिस दिन वन में प्रवास कर रहे पाण्डु और कुंती के पुत्र भीमसेन का जन्म हुुआ, उसी दिन हस्तिनापुर के महलों में गांधारी के पुत्र दुर्योधन का भी जन्म हुआ। जब भीमसेन का जन्म हुआ, तब एक बाघ वहाँ आया। बाघ को देखकर कुंती अपने पुत्र भीमसेन को लेकर सुरक्षित स्थान के लिए भागी किंतु हड़बड़ाहट में बालक भीमसेन माता कुंती की गोद से फिसल गया। महाराज पाण्डु ने जब उस बालक को जाकर देखा, तो उन्हें बड़ा आश्चर्य हुआ। बालक तो जीवित था किंतु जिस चट्टान पर वह बालक गिरा था, वह चूर-चूर हो गई थी। कुछ समय पश्चात् महाराज पाण्डु को चिंता हुई कि मुझे ऐसा पुत्र हो जो संसार में सर्वश्रेष्ठ माना जाए। देवताओं में सर्वश्रेष्ठ देवराज इन्द्र हैं, अतः महाराज पाण्डु ने कुंती से आग्रह किया कि वह एक वर्ष तक सत्य-निष्ठा पूर्वक व्रत करे। महाराज पाण्डु स्वयं भी एक वर्ष तक सूर्यदेव के समक्ष खड़े रहकर घनघोर तपस्या करते रहे। एक वर्ष की तपस्या के उपरांत देवराज इंद्र महाराज पाण्डु के समक्ष प्रकट हुए। महाराज पाण्डु ने इन्द्र से कहा- ‘मुझे ऐसा पुत्र चाहिए जो संसार भर में सर्वश्रेष्ठ हो।’

इस पर देवराज ने कहा- ‘मैं तुम्हारे तप से प्रसन्न हूँ। अतः तुम्हें ऐसा पुत्र पाने का वरदान देता हूँ जो विश्वविख्यात होगा, ब्राह्मण, गौ एवं श्रेष्ठजन का सेवक होगा और शत्रुओं का नाश करने वाला होगा।’

इंद्र को प्रसन्न जानकर महाराज पाण्डु ने महारानी कुंती से कहा- ‘तुम देवराज इंद्र का आह्वान करके उनसे एक पुत्र प्राप्त करो।’ इस पर कुंती ने इंद्र का आह्वान किया। देवराज इंद्र ने कुंती को अपने ही समान सर्वश्रेष्ठ पुत्र प्रदान किया।

अर्जुन के जन्म के समय आकाशवाणी हुई- ‘कुंती यह पुत्र कार्तवीर्य अर्जुन और भगवान शंकर के समान पराक्रमी तथा इन्द्र के समान अपराजित होकर अपनी माता का यश बढ़ाएगा। जैसे विष्णु ने अपनी माता अदिति को प्रसन्न किया था, वैसे ही यह तुम्हें प्रसन्न करेगा। यह बहुत से राजाओं पर विजय प्राप्त करके तीन अश्वमेध यज्ञ करेगा। स्वयं भगवान् रुद्र इसके पराक्रम से प्रसन्न होकर इसे रुद्रास्त्र प्रदान करेंगे। यह इन्द्र की आज्ञा से निवात कवच नामक असुरों को मारेगा और समस्त दिव्य अस्त्र-शस्त्रों को प्राप्त करेगा।’

इस आकाशवाणी के पूरे होते ही आकाश में दुंदुभि बजने लगी तथा पुष्पवर्षा होने लगी। इन्द्रादि देवगण, सप्तर्षि, प्रजापति, गंधर्व, अप्सरा आदि दिव्य वस्त्राभूषणों से सुसज्जित होकर अर्जुन के जन्म का आनंदोत्सव मनाने लगे।

इस प्रकार देवताओं के आशीर्वाद से महाराज पाण्डु की रानी कुंती को तीन पुत्र तथा माद्री को दो पुत्र प्राप्त हुए। इन पांचों को पाण्डुपुत्र कहा जाता था। पांचों पाण्डुपुत्र देवताओं के समान सत्यनिष्ठ, सुंदर, महाबली एवं पराक्रमी थे।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

माद्री ने देवताओं से दो पुत्रों को प्राप्त किया (32)

0
माद्री - www.bharatkaitihas.com
माद्री ने देवताओं से दो पुत्रों को प्राप्त किया

पिछली कथा में हमने महारानी कुंती द्वारा देवताओं का आह्वान करके तीन पुत्र प्राप्त करने की चर्चा की थी। इस कथा में हम रानी माद्री द्वारा दो पुत्र उत्पन्न किए जाने की कथा की चर्चा करेंगे।

जब महारानी कुंती को दुर्वासा ऋषि द्वारा दिए गए दिव्य मंत्र की सहायता सेे तीन देवताओं के माध्यम से तीन पुत्र प्राप्त हो गए, तब एक दिन महाराज पाण्डु ने महारानी कुंती से पुनः अनुरोध किया कि वह प्रजा की प्रसन्नता के लिए एक कठिन कार्य और करे जिससे तुम्हारा यश होगा। वह कार्य यह है कि तुम माद्री के गर्भ से संतान उत्पन्न करके ने लिए अपने मंत्र का उपयोग करो।

इस पर महारानी कुंती ने रानी माद्री से कहा कि बहिन तुम केवल एक बार किसी देवताआ का चिंतन करो। उससे तुम्हें उसी देवता के अनुरूप पुत्र की प्राप्ति होगी। इस पर माद्री ने अश्विनी कुमारों का ध्यान किया। अश्विनी कुमारों ने उसी समय प्रकट होकर माद्री को नकुल एवं सहदेव के रूप में जुड़वा पुत्र प्रदान किए। ये दोनों बालक अत्यंत सुंदर था विनयशील थे।

उसी समय एक आकाशवाणी हुई कि ये दोनों बालक बल, रूप एवं गुणों में अश्विनीकुमारों से भी बढ़कर होंगे। ये अपने रूप, द्रव्य, सम्पत्ति और शक्ति से सम्पूर्ण जगत् में प्रकाशित होंगे।

पूरे आलेख के लिए देखें, यह वी-ब्लाॅग-

जब शतशृंग पर्वत पर निवास करने वाले सिद्धों, चारणों, ऋषियों एवं तपस्वियों ने इस भविष्यवाणी को सुना तो वे सब राजा पाण्डु को बधाई देने के लिए आए। सबसे बड़े राजपुत्र युधिष्ठिर का नामकरण तो आकशवाणी के माध्यम से पूर्व में ही किया जा चुका था, अब ऋषियों ने शेष पुत्रों के नामकरण किए तथा उन्हें भीमसेन, अर्जुन, नकुल और सहदेव नाम दिए। ये सभी राजपुत्र एक-एक वर्ष के अंतराल से उत्पन्न हुए थे किंतु नकुल और सहदेव जुड़वां थे। इस प्रकार राजा पाण्डु का पितृ-ऋण भी चुक गया। वे अपनी रानियों सहित शतशृंग पर्वत पर रहते हुए अपनी तपस्या करते रहे। पांचों बालक भी ऋषि-पुत्रों के साथ खेलते हुए बड़े होने लगे।

 बहुत से लोग विशेषकर कुतर्की, नास्तिक, आर्यसमाजी एवं विधर्मी लोग इस बात को लेकर सनातन हिन्दू धर्मग्रंथों पर कटाक्ष करते हैं कि यह तो मर्यादाहीन आचरण है किंतु हमें इस तथ्य पर विचार करना चाहिए कि वेदों, पुराणों एवं अन्य धर्मग्रंथों में वर्णित देवता कोई साधारण मनुष्य नहीं हैं, वे अतीन्द्रिय हैं तथा दिव्य शक्तियों से सम्पन्न हैं। दिव्य होने के कारण ही उन्हें देवता कहा गया है।

To purchase this book, please click on photo.

अतः सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि महारानी कुंती ने महर्षि दुर्वासा से प्राप्त दिव्य मंत्र के माध्यम से तीन देवताओं का आह्वान करके जिन तीन पुत्रों को प्राप्त किया, उनके जन्म की प्रक्रिया मनुष्यों की प्रजनन प्रक्रिया से नितांत अलग रही होगी। जिस प्रकार आज भी परग्रही जीवों के बारे में यह अनुमान है कि वे अपनी मानसिक शक्ति अर्थात् इच्छा मात्र से ही धरती की किसी स्त्री को गर्भवती कर सकते हैं, वे किसी भी मनुष्य की स्मरण-शक्ति नष्ट कर सकते हैं, वे मनुष्यों में जैविक बदलाव कर सकते हैं, उसी प्रकार उस काल के देवता भी अपनी संकल्प शक्ति से किसी स्त्री को गर्भवती कर सकते थे। कुंती एवं माद्री के पुत्र उन्हीं दिव्य देवताओं की संतान थे। अतः वे देवताओं के संकल्प-मात्र से उत्पन्न हुए थे। यदि कुंती एवं माद्री द्वारा उत्पन्न पांचों पुत्रों के जन्म में किसी प्रकार का अनैतिक आचरण होता, परिवार रूपी संस्था का अनादर होता अथवा पर-पुरुष सेवन का भाव होता तो महाराज पाण्डु महारानी कुंती एवं माद्री को इस प्रकार संतानोत्पत्ति की कभी भी आज्ञा नहीं देते। यदि ये पांचों पुत्र किसी पर-पुरुष की संतान होते तो महाराज पाण्डु उन्हें अपने पुत्र के रूप में स्वीकार नहीं करते। न ही कौरव राजकुल इस बात को स्वीकार करता। अतः कुतर्कियों एवं विधर्मियों के आक्षेप गलत हैं।

जब महाराज पाण्डु तथा उनके परिवार को शतशृंग पर्वत पर निवास करते हुए कुछ समय बीत गया तब काल ने महाराज पाण्डु पर मृत्युपाश फैंकने का निर्णय लिया। वसंत ऋषि में एक दिन महाराज पाण्डु छोटी रानी माद्री के साथ सरिता के तट पर भ्रमण कर रहे थे तब अचानक ही महाराज पाण्डु ने कामग्रस्त होकर रानी माद्री को पकड़ लिया। वे काम-वासना में इतने अंधे हो गए कि माद्री के बार-बार स्मरण दिलाने पर भी उन्हें ऋषि द्वारा दिया गया श्राप याद नहीं आया और उसी क्षण मृत्यु को प्राप्त हो गए। कुंती ने माद्री से अनुरोध किया कि वह पाण्डुपुत्रों को लेकर हस्तिनापुर चली जाए ताकि मैं महाराज के साथ सती हो सकूं किंतु माद्री ने स्वयं सती होने का हठ पकड़ लिया। इस प्रकार रानी माद्री सती हो गई और महारानी कुंती पाण्डुपुत्रों को लेकर हस्तिनापुर लौट आई।

जब सत्यवती के पुत्र महर्षि वेदव्यास को ज्ञात हुआ कि महारानी कुंती पाण्डुपुत्रों को लेकर हस्तिनापुर लौट आई है तो वदेव्यास ने हस्तिनापुर आकर माता सत्यवती से कहा- ‘अब आपका हस्तिनापुर में रहना उचित नहीं है। अतः आप अम्बिका तथा अम्बालिका को लेकर वन में चली जाएं तथा वहाँ योगिनी बनकर योग करें। अब इस महल में कुल-नाश के षड़यंत्र रचे जाएंगे। उन्हें आप न ही देखें तो अच्छा है।’

इस पर माता सत्यवती अपनी दोनों बहुओं रानी अम्बिका एवं अम्बालिका के साथ हस्तिनापुर के महलों से निकल गई ओर जंगलों में जाकर तप करने लगी। कुछ समय बाद राजमाताओं ने अपनी देह त्याग दी। पाण्डुपुत्रों के हस्तिनापुर आगमन के साथ चंद्रवंशी राजाओं की पुरानी परम्परा समाप्त होती है तथा चंद्रवंश की परम्परा एक नवीन युग में प्रवेश करती है। इस नई परम्परा के आरम्भ होने की चर्चा हम अगली कथा में किंचित् विस्तार से करेंगे।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

चंद्रवंशी राजा देवताओं और मनुष्यों का मिश्रण बन गए (33)

0
चंद्रवंशी राजा - www.bharatkaitihas.com
चंद्रवंशी राजा देवताओं और मनुष्यों का मिश्रण बन गए

चंद्रवंशी राजा ययाति ने स्वर्ग की अप्सरा उर्वशी तथा विश्वाची के साथ रमण किया। महाराज दुष्यंत ने स्वर्ग की अप्सरा मेनका की पुत्री से विवाह किया।

पिछली कथा में हमने चर्चा की थी कि स्वर्गीय महाराज पाण्डु के पांचों पुत्रों के हस्तिनापुर आगमन के साथ ही चंद्रवंशी राजाओं की पुरानी परम्परा समाप्त होती है तथा चंद्रवंश की परम्परा एक नये युग में प्रवेश करती है।

ब्रह्माजी के मानसिक संकल्प से उत्पन्न मुनि अत्रि से आरम्भ हुई चंद्रवंशी राजाओं की यह सुदीर्घ परम्परा अब तक कई उतार-चढ़ाव एवं मोड़ देख चुकी थी। महाराज चंद्र से लेकर देवव्रत भीष्म तक हुए इस कुल के राजा एवं राजकुमार या तो स्वयं कोई प्राकृतिक शक्ति अथवा देवता थे या फिर वे किसी शक्ति के अधिपति अथवा किसी देवता के अवतार थे।

महाराज चंद्र, महाराज बुध तथा राजकुमार भरद्वाज अंतरिक्षीय पिण्ड थे, पुरूरवा अग्नि का एक प्रकार थे। राजा सहस्रार्जुन धरती पर मेघ बनकर बरसता था। राजा धन्वन्तरि समुद्र से उत्पन्न हुए थे, राजा ययाति ने दैत्यगुरु शुक्राचार्य की पुत्री से और राजा संवरण ने सूर्यपुत्री ताप्ती से विवाह किया। राजा भरत किसी अन्य सौर मण्डल के सूर्य थे। नहुष आदि कुछ चंद्रवंशी राजा तो स्वर्ग के इन्द्र भी रहे। राजा कुरु में इतनी दिव्य सामर्थ्य थी कि उन्होंने कुरुक्षेत्र में एक स्वर्ग बनाने का संकल्प लिया जिसे इन्द्र ने रुकवाया।

चंद्रवंशी राजा ययाति ने स्वर्ग की अप्सरा उर्वशी तथा विश्वाची के साथ रमण किया। महाराज दुष्यंत ने स्वर्ग की अप्सरा मेनका की पुत्री से विवाह किया। महाराज शांतनु ने स्वर्ग की अप्सरा गंगा को अपनी पत्नी के रूप में रखा। देवव्रत भीष्म अप्सरा के पुत्र थे तथा स्वयं आठवें वसु थे, उन्हें इच्छा-मृत्यु जैसे दिव्य वरदान प्राप्त थे।

पूरे आलेख के लिए देखें, यह वी-ब्लाॅग-

इस प्रकार चंद्रवंशी राजाओं के स्वर्ग लोक के देवताओं एवं अप्सराओं से सीधे सम्बन्ध थे, चंद्रवंशी राजाओं में से बहुतों ने देवासुर संग्राम में भाग लेकर देवताओं को विजयी बनाया था और बहुत से राजा स्वर्ग में उसी प्रकार जाया करते थे जिस प्रकार वे धरती एवं आकाश में विचरण किया करते थे।

इस प्रकार अब तक के चंद्रवंशी राजा धरती के मनुष्यों से भिन्न थे किंतु अब चंद्रवंशी राजाओं की वे पीढ़ियां बीत चुकी थीं, केवल देवव्रत भीष्म ही उनमें से अकेले जीवित बचे थे।

To purchase this book, please click on photo.

पाण्डुपुत्रों के रूप में हस्तिनापुर के महलों में ऐसे राजकुमारों का प्रवेश हुआ जो देवताओं की संतान होते हुए भी प्राकृतिक शक्तियों के स्वामी नहीं थे। वे देवताओं एवं मनुष्यों के बीच की पीढ़ी थे। वे अत्यंत शक्तिशाली तो थे किंतु थे नितांत मनुष्य। उन्हें देवताओं से दिव्य शस्त्र एवं शक्तियां तो मिल सकती थीं किंतु देवत्व नहीं! इनमें से केवल अर्जुन को ही सशरीर स्वर्ग में प्रवेश पाने का अधिकारी था। शेष पाण्डवों को देहत्याग के पश्चात् ही स्वर्ग में प्रवेश मिल सकता था। जब गांधारी के पुत्रों ने देखा कि जिस हस्तिनापुर को अब तक वे अपना निर्बाध राज्य समझ रहे थे, उसी हस्तिनापुर को अब पाण्डुपुत्रों का बताया जाने लगा है तो गांधारी के पुत्र क्रोध से भड़ककर पाण्डुपुत्रों के शत्रु हो गए। वे पाण्डुपुत्रों अर्थात् पाण्डवों को मारने का उद्यम करने लगे। महर्षि वेदव्यास ने माता सत्यवती से उचित ही कहा था कि अब हस्तिनापुर में वंश-विनाश की लीला आरम्भ होने वाली है। पाण्डुपुत्र भले ही कितने ही शक्तिशाली एवं वीर क्यों न हों किंतु दुष्ट शक्तियों के आगे वे कमजोर ही थे। इसका कारण बहुत स्पष्ट था। बुराई छिपकर वार करती है और धर्म कभी सत्य से च्युत नहीं होता। गांधारीपुत्र छिपकर वार करते थे किंतु पाण्डुपुत्र शांति और धैर्य से काम लेते थे।

पाण्डुपुत्रों के सौभाग्य से जिस समय वे हस्तिनापुर के महलों में बड़े हो रहे थे, उसी समय कुंती के भाई वसुदेव के पुत्र श्रीकृष्ण भी धरती पर अपनी लीला दिखाने आ चुके थे। भगवान श्रीकृष्ण ने पाण्डुपुत्रों के नाम से जानी जाने वाली, देवताओं की इन धर्मनिष्ठ संतानों को अपना मित्र बना लिया। वे भगवान श्रीकृष्ण ही थे जिन्होंने पाण्डुपुत्रों के जीवन एवं धर्म की पग-पग पर रक्षा की। अन्यथा गांधारी के पुत्र जो स्वयं को कौरव कहते थे, कभी का पाण्डवों को मार चुके होते।

कुरुवंशी होने के कारण कौरव तो पाण्डुपुत्र भी थे किंतु गांधारी के पुत्र कुंती और माद्री के पुत्रों को कौरवों से अलग दिखाने के लिए स्वयं को कौरव तथा कुंती एवं माद्री के पुत्रों को पाण्डव कहते थे। महाभारत में महर्षि वेदव्यास ने भी उन्हें कौरव एवं पाण्डव कहकर उनमें अंतर स्पष्ट किया है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

- Advertisement -

Latest articles

सगुण-निर्गुण अंतर्द्वन्द्व में फंसी कबीर की राम-भक्ति - bharatkaitihas.com

सगुण-निर्गुण अंतर्द्वन्द्व में फंसी कबीर की राम-भक्ति

0
हिन्दू सनातन धर्म परम्परा (Sanatan Dharma Tradition) में सगुण-निर्गुण अंतर्द्वन्द्व उपनिषदों के काल से ही दिखाई देने लगता है। कबीर की रामभक्ति भी इसी...
काशी नामकरण का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य - bharatkaitihas.com

काशी नामकरण का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य

0
काशी (Kashi) को पुराणों] धर्मशास्त्रों, विविध हिन्दू ग्रंथों, इतिहास ग्रंथों  तथा लोकपरंपरा में अनेक नामों से पुकारा जाता है। इसके प्रमुख नाम निम्नलिखित हैं— काशी...
तिरुक्कुरल विश्व साहित्य का गौरव - bharatkaitihas.com

तिरुक्कुरल : विश्व साहित्य का गौरव

0
तिरुक्कुरल (Thirukkural) केवल एक पुस्तक नहीं है, बल्कि यह जीवन जीने की एक संपूर्ण संहिता है। इसे 'तमिल वेद' और 'विश्व नीतिशास्त्र' के रूप...
डिजिटल क्रांति www.bharatkaitihas.com

डिजिटल क्रांति और भविष्य की तैयारी

0
चारों ओर डिजिटल क्रांति का शोर है किंतु हमारे पास भविष्य की क्या तैयारी है! क्या हमने कभी इस पर गंभीरता से विचार किया...
वॉयनिच मैन्युस्क्रिप्ट : नीले पानी में नहाती औरतों का रहस्य - www.bharatkaitihas.com

वॉयनिच मैन्युस्क्रिप्ट : नीले पानी में नहाती औरतों का रहस्य

0
वॉयनिच मैन्युस्क्रिप्ट एक ऐसी पहेली, जिसे द्वितीय विश्व युद्ध के दिग्गज कोड-ब्रेकर्स से लेकर आज के सबसे एडवांस आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और सुपर कंप्यूटर्स...