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राजा मांधाता को दिव्य त्रिशूल से नष्ट कर दिया लवणासुर ने (9)

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राजा मांधाता - www.bharatkaitihas.com
राजा मांधाता को दिव्य त्रिशूल से नष्ट कर दिया लवणासुर ने

राजा मांधाता की कथा वायुपुराण, विष्णु पुराण, ब्रह्माण्ड पुराण, भागवत पुराण, मत्स्य पुराण, वाल्मीकि रामायण, महाभारत आदि ग्रंथों में मिलती है। इन कथाओं के अनुसार ईक्ष्वाकुवंशी राजा युवनाश्व सतयुग का अंतिम राजा था।

विष्णु पुराण के अनुसार अयोध्या नरेश युवनाश्व निःसंतान था। च्यवन ऋषि की सलाह पर राजा युवनाश्व ने पुत्रेष्टि यज्ञ किया। जब यज्ञ सम्पन्न हुआ, तब तक बहुत रात्रि व्यतीत हो चुकी थी। अतः समस्त ऋषिगण यज्ञ से अभिमंत्रित जल को एक घड़े में रख कर सो गये।

रात्रि में राजा युवनाश्व को प्यास लगी और उन्होंने घड़े में से जल लेकर पी लिया। उन्हें यह ज्ञात नहीं था कि इस घड़े में अभिमंत्रित जल है। जब ऋषियों की आंख खुली तो उन्होंने देखा कि घड़ा पूर्णतः रिक्त है तथा उसमें अभिमंत्रित जल नहीं है।

ऋषियों ने वहाँ उपस्थित समस्त लोगों से जल के बारे में पूछा। इस पर राजा युवनाश्व ने बताया कि वह जल मैंने पी लिया! ऋषियों ने राजा से कहा कि अब उन्हीं की कोख से एक बालक जन्म लेगा।

जब इस घटना को एक सौ साल बीत गए, तब अश्विनीकुमारों ने राजा युवनाश्व की बायीं कोख फाड़कर एक बालक को बाहर निकाला। इस अवसर पर स्वर्ग के अन्य देवता भी उपस्थिति हुए।

देवताओं ने कहा कि यह तो एक पुरुष से उत्पन्न बालक है, यह क्या पिएगा? इस पर देवराज इंद्र ने अपनी तर्जनी अंगुली बालक के मुंह में डालकर- माम् अयं धाता। अर्थात् यह मुझे ही पीयेगा। इस कारण बालक का नाम मांधाता पड़ गया।

देवराज इन्द्र की अंगुली पीते-तीते वह बालक तेरह हाथ जितना बड़ा हो गया। इस दिव्य बालक ने चिंतनमात्र से धनुर्वेद सहित समस्त वेदों का ज्ञान प्राप्त कर लिया। इंद्र ने उसका राज्याभिषेक किया।

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राजा मांधाता ने अपने धर्म से तीनों लोकों को नाप लिया। एक बार जब उसके राज्य में बारह वर्ष तक वर्षा नहीं हुई तो राजा ने देवराज इन्द्र से वर्षा करने के लिए कहा किंतु देवराज इन्द्र ने राजा मान्धाता के तप-बल की परीक्षा करने के लिए धरती पर वर्षा नहीं की। इस पर राजा मांधाता ने इंद्र के सामने ही धरती पर वर्षा करके अपनी प्रजा के प्राणों की रक्षा की।

राजा मांधाता ने अंगार, मरूत, असित, गय तथा बृहद्रथ आदि अनेक राजाओं को परास्त करके अपने राज्य का विस्तार किया। उसका राज्य इतना बड़ा हो गया कि सूर्याेदय होने से लेकर सूर्यास्त होने तक सूर्य भगवान जितने प्रदेश में गमन करते थे, उतना प्रदेश राजा मांधाता के अधीन था। राजा मांधाता ने सौ अश्वमेध और सौ राजसूय यज्ञ करके दस योजन लंबे और एक योजन ऊंचे रोहित नामक सोने के मत्स्य बनवाकर ब्राह्मणों को दान दिए।

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राजा मांधाता ने दीर्घकाल तक धर्मपूर्वक राज्य करने के उपरांत भगवान श्री हरि विष्णु के दर्शनों के निमित्त घनघोर तपस्या की। भगवान विष्णु ने इंद्र का रूप धारण करके तथा मरुतों को अपने साथ लेकर, राजा मांधाता को दर्शन दिए। राजा ने कहा कि मैं अब राज्य त्यागकर वन में जाना चाहता हूँ। इस पर भगवान विष्णु ने राजा मांधाता को क्षत्रियोचित कर्म का निर्वाह करते रहने का उपदेश दिया तथा मरुतों सहित अंतर्धान हो गए। ब्रह्माण्ड पुराण के अनुसार मांधाता राजा भगवान श्री हरि विष्णु के मनुष्य-अवतार थे। कुछ पुराणों में आई कथाओं के अनुसार वे महाराज युवनाश्व और महारानी गौरी के पुत्र थे। यदुवंशी नरेश शशबिंदु की राजकन्या बिंदुमती राजा मांधाता की रानी थीं जिसे चैत्ररथी भी कहते थे। रानी बिंदुमती से मुचकुंद, अंबरीष और पुरुकुत्स नामक तीन पुत्र और 50 कन्याएँ उत्पन्न हुईं। पौराणिक कथाओं के अनुसार राजा मांधाता की पचास पुत्रियों का विवाह सौभरि नामक ऋषि से हुआ था। सौभरि ऋषि ने अपने योगबल से अपनी पत्नियों के निवास के लिए स्फटिक के महल बनवाए तथा उन महलों में सब प्रकार के सुख-संसाधन उपलब्ध करवाए। सौभरि ऋषि अपने योग बल से अपनी समस्त पत्नियों के साथ कुछ न कुछ दिन अवश्य व्यतीत करते थे। इन राजकन्याओं से सौभरि ऋषि को 150 संतानें प्राप्त हुईं।

एक पौराणिक कथा के अनुसार राजा मांधाता संपूर्ण पृथ्वी को जीतकर स्वर्ग भी जीतना चाहते थे। राजा के इस विचार से देवराज इंद्र सहित समस्त देवता चिंतित हुए। उन्होंने राजा मांधाता को आधे स्वर्ग का राज्य देना चाहा परन्तु उन्होंने आधे देवलोक का राज्य स्वीकार नहीं किया। वे संपूर्ण इंद्रलोक के राजा बनने के इच्छुक थे।

देवराज इंद्र ने कहा- ‘हे राजन! अभी तो सम्पूर्ण पृथ्वी भी आपके अधीन नहीं है, मधुवन का राजा लवणासुर आपका आदेश नहीं मानता और आप सम्पूर्ण देवलोक पर आधिपत्य मांग रहे हैं!’

देवराज का यह उपालम्भ सुनकर राजा मांधाता लज्जित होकर मृत्युलोक में लौट आए। उन्होंने दैत्यराज लवणासुर के पास दूत भेजकर कहलवाया कि या तो लवणासुर राजा मान्धाता की अधीनता स्वीकार करे अन्यथा युद्ध के लिए तैयार रहे। लवणासुर ने राजा मांधाता के दूत का भक्षण कर लिया। इस पर दोनों ओर की सेनाओं में भीषण युद्ध आरम्भ हो गया।

लवणासुर के पास उसके पिता दैत्यराज मधु द्वारा दिया गया एक दिव्य त्रिशूल था जो मधु को भगवान शिव से प्राप्त हुआ था। राजा मांधाता को इस दिव्य त्रिशूल की जानकारी नहीं थी, इसलिए उसने बिना सोचे-समझे लवणासुर पर आक्रमण कर दिया और वह धोखे से मार दिया गया।

लवणासुर ने अपने त्रिशूल से न केवल राजा मांधाता को अपितु उसकी सम्पूर्ण सेना को भी भस्म कर दिया। इस प्रकार देवराज इन्द्र ने युक्ति से काम लेकर राजा मांधाता को नष्ट करवा दिया जो सम्पूर्ण देवलोक पर आधिपत्य करने का आकांक्षी था।

पुराणों में ऐसी बहुत सी कथाएं हैं जिनमें यह बताया गया है कि जिस किसी भी मनुष्य ने सशरीर स्वर्ग में प्रवेश करने का प्रयास किया अथवा स्वर्ग पर विजय प्राप्त करने का उद्यम किया, उसका शीघ्र ही सर्वनाश हो गया। राजा मांधाता के काल की सबसे बड़ी घटना यह है कि उसके शासन काल में ही धरती पर सतयुग समाप्त होकर त्रेता युग आरम्भ हुआ था।

राजा सत्यव्रत के लिए नया स्वर्ग बना दिया ऋषि विश्वामित्र ने (10)

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ईक्ष्वाकु वंश में राजा मांधाता के वंशजों में से सातवां वंशज राजा सत्यव्रत था। उसे पुराणों में त्रिशंकु के नाम से जाना जाता है। राजा त्रिशंकु की कहानी का वर्णन वाल्मीकि रामायण के बाल काण्ड में भी किया गया है।

इस कथा के अनुसार राजा सत्यव्रत ईक्ष्वाकु वंशी राजा पृथु के पुत्र और राजा रामचंद्र के पूर्वज हैं। राजा सत्यव्रत जब वृद्ध होने लगे तो उन्हें राज-पाट त्याग कर अपने पुत्र हरिश्चंद्र को अयोध्या का राजा घोषित कर दिया। राजा सत्यव्रत एक धार्मिक पुरुष थे इसलिए उनकी आत्मा स्वर्ग के योग्य थी परंतु उनकी इच्छा सशरीर स्वर्ग जाने की थी। इस इच्छा की पूर्ति के लिए उन्होने अपने गुरु ऋषि वशिष्ठ से यज्ञ करने की प्रार्थना की। ऋषि वशिष्ठ ने यज्ञ करने से मना कर दिया कि स-शरीर स्वर्ग में प्रवेश की कामना प्रकृति के नियमों के विरुद्ध है।

सत्यव्रत अपनी ज़िद पर अड़े रहे और इच्छा की पूर्ति के लिए ऋषि वशिष्ठ के ज्येष्ठ पुत्र शक्ति को यज्ञ करने के लिए धन एवं प्रसिद्धि का लालच दिया। सत्यव्रत के इस दुस्साहस ने ऋषिपुत्र शक्ति को क्रोधित कर दिया और शक्ति ने सत्यव्रत को चाण्डाल होने का श्राप दे दिया। इस पर राजा सत्यव्रत दुखी होकर वनों में भटकने लगा।

वन में भटकते हुये सत्यव्रत की भेंट ऋषि विश्वामित्र से हुई। ऋषि विश्वामित्र ने राजा सत्यव्रत से पूछा कि वनों में क्यों भटक रहे हैं? इस पर राजा ने ऋषि को सम्पूर्ण वृत्तांत बताया।

ऋषि विश्वामित्र को राजा सत्यव्रत पर दया आ गई। उन्होंने पहले भी राजा सत्यव्रत के पूर्वज रोहित के प्राणों की रक्षा की थी। ऋषि विश्वामित्र ने राजा को सांत्वना दी और कहा कि आप निराश न हों, मैं आपके लिए यज्ञ करूंगा और आपको सशरीर स्वर्ग पहुंचाउंगा।

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ऋषि की बात सुनकर राजा सत्यव्रत बहुत प्रसन्न हुआ और ऋषि द्वारा बताए गए अनुष्ठान करने लगा। विश्वामित्र ने अपने चार पुत्रों से कहा कि वे यज्ञ की सामग्री एकत्रित करें तथा वन में निवास कर रहे समस्त ऋषि-मुनियों को यज्ञ में भाग लेने के लिए आमंत्रित करें।

बहुत से ऋषि-मुनियों ने विश्वामित्र के निमन्त्रण को स्वीकार कर लिया किन्तु महर्षि वसिष्ठ के पुत्रों ने यह कहकर उस निमन्त्रण को अस्वीकार कर दिया कि जिस यज्ञ में यजमान चाण्डाल और पुरोहित क्षत्रिय हो उस यज्ञ का भाग हम स्वीकार नहीं कर सकते। यह सुनकर विश्वामित्र ने वसिष्ठ के पुत्रों को श्राप दिया कि वे कालपाश में बँधकर यमलोक जाएं और सात सौ वर्षों तक चाण्डाल योनि में विचरण करें। विश्वामित्र के शाप से महर्षि वसिष्ठ के पुत्र यमलोक चले गए।

जब आसपास के वनों के बहुत से ऋषि आ गए तब विश्वामित्र ने यज्ञ आरम्भ किया। यज्ञ की समाप्ति पर विश्वामित्र ने समस्त देवताओं के नाम ले-लेकर उन्हें यज्ञ-भाग ग्रहण करने के लिये आह्वान किया किन्तु कोई भी देवता अपना भाग लेने नहीं आया। इस पर क्रुद्ध होकर विश्वामित्र ने अर्घ्य हाथ में लेकर कहा- हे सत्यव्रत! मैं आपको अपनी तपस्या के बल से स्वर्ग भेजता हूँ।’

इतना कह कर विश्वामित्र ने मन्त्र पढ़ते हुए आकाश में जल छिड़का और राजा त्रिशंकु शरीर सहित आकाश में चढ़ता हुआ स्वर्ग जा पहुँचा।

राजा सत्यव्रत को सशरीर देवलोक में आया जानकर स्वर्ग में खलबली मच गयी। इन्द्र ने क्रोध में भरकर राजा से कहा- ‘रे मूर्ख! तुझे तेरे गुरु ने शाप दिया है इसलिये तू स्वर्ग में रहने योग्य नहीं है।’

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इन्द्र के ऐसा कहते ही त्रिशंकु सिर के बल पृथ्वी पर गिरने लगा। स्वर्ग से धकेले जाने पर राजा सत्यव्रत करुण पुकार लगाता हुआ धरती की तरफ गिरने लगा। इस पर विश्वामित्र ने जोर से कहा- ‘तत्रैव तिष्ठ!’ अर्थात्- वहीं पर ठहरो। विश्वामित्र के आदेश से राजा सत्यव्रत का धरती पर गिरना रुक गया और वह त्रिशंकु की तरह अंतरिक्ष में औंधा लटक गया। तभी से इस राजा का नाम त्रिशंकु पड़ गया। आकाश में उलटे लटके हुए त्रिशंकु ने ऋषि विश्वामित्र से सहायता करने की प्रार्थना की। विश्वामित्र ने अपनी दिव्य शक्तियों का प्रयोग करके धरती एवं स्वर्ग के बीच में एक नया स्वर्ग बना दिया और त्रिशंकु को श्राप से मुक्त करते हुये इस नए स्वर्ग में रहने के लिए भेज दिया। मान्यता है कि विश्वामित्र ने नए स्वर्ग के साथ नए तारों का निर्माण किया तथा दक्षिण दिशा में नया सप्तर्षि मण्डल भी बना दिया। विश्वामित्र ने नए स्वर्ग के लिए कुछ नवीन प्राणियों एवं वनस्पतियों की रचना की। उन्होंने जौ के स्थान पर गेहूँ, गाय के स्थान पर भैंस, हाथी के स्थान पर ऊंट तथा फलों के स्थान पर नारियल की रचना की। कुछ ग्रंथों की मान्यता है कि विश्वामित्र द्वारा बनाए गए नवीन स्वर्ग को देवताओं ने नष्ट कर दिया किंतु विश्वामित्र के अनुरोध पर गेहूं, भैंस, ऊंट तथा नारियल को नष्ट नहीं किया गया।

इसी प्रकार विश्वामित्र द्वारा निर्मित त्रिशंकु नक्षत्र मण्डल भी सप्तऋषि मण्डल के दक्षिण में आज भी देखा जा सकता है।

कुछ पुराणों के अनुसार जब विश्वामित्र ने राजा सत्यव्रत को नवीन स्वर्ग का इन्द्र बनाने के लिए तप आरम्भ किया तब इस तप से चिंतित देवताओं ने विश्वामित्र को समझाया कि वे यह तप न करें। देवताओं ने विश्वामित्र की अवज्ञा नहीं की है, अपितु उन्होंने किसी भी मनुष्य के स-शरीर स्वर्ग में प्रवेश की अप्राकृतिक घटना को रोका है।

महर्षि विश्वामित्र ने देवताओं की प्रार्थना स्वीकार कर ली तथा उनसे कहा कि मैं अपनी तपस्या रोक दूंगा किंतु देवताओं को भी वचन देना होगा कि वे राजा सत्यव्रत को नए स्वर्ग में सुख से रहने देंगे। इस पर देवताओं ने राजा सत्यव्रत से वचन लिया कि वह कभी भी स्वयं इन्द्र नहीं बनेगा तथा देवराज इन्द्र की आज्ञा की अवहेलना नहीं करेगा।

इस प्रकार राजा सत्यव्रत को स्वर्ग में तो प्रवेश नहीं मिला किंतु उसे रहने के लिए एक नया स्वर्ग मिल गया। मान्यता है कि राजा त्रिशंकु अपने स्वर्ग के साथ आज भी वास्तविक स्वर्ग और पृथ्वी के बीच में लटका हुआ है।

राजा हरिश्चंद्र ने रानी से शमशान का कर मांगा (11)

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राजा हरिश्चंद्र ने रानी से शमशान का कर मांगा

राजा हरिश्चंद्र ने अपनी रानी तारामती से कहा कि वह अपनी साड़ी फाड़कर आधी साड़ी से शमशान का कर चुकाए। शमशान का कर चुकाए बिना वह अपने पुत्र का संस्कार शमशान में नहीं कर पाएगी।

ईक्ष्वाकु वंशी राजाओं में जितने भी प्रसिद्ध राजा हुए हैं उनमें महाराज हरिश्चंद्र का नाम भी अत्यधिक आदर से लिया जाता है। हिन्दू धर्म में सत्य को ईश्वरीय गुण माना गया है। परमात्मा को सत्यवादी प्रिय होता है और असत्यवादी अप्रिय।

भारत वर्ष में जब भी सत्यवादियों की चर्चा होती है, तब ईक्ष्वाकुवंशी महाराज हरिश्चन्द्र का नाम सबसे पहले लिया जाता है। महाराज हरिश्चंद्र उसी राजा सत्यव्रत के पुत्र थे जिन्हें भारतीय पौराणिक इतिहास में त्रिशंकु के नाम से जाना जाता है।

राजा हरिश्चंद्र त्रेता युग में ईक्ष्वाकु वंश के नौवें राजा थे। उनकी राजधानी अयोध्या थी। महाराज हरिश्चंद्र के बहुत काल तक कोई संतान नहीं हुई। अतः उन्होंने अपने कुलगुरु महिर्ष वशिष्ठ के आदेश से वरुण की उपासना की। वरुण ने राजा को एक पुत्र का वरदान दिया। समय आने पर राजा हरिश्चंद्र की रानी तारामती ने एक पुत्र को जन्म दिया जिसका नाम रोहिताश्व रखा गया। कुछ ग्रंथों में रानी तारामती का नाम शैव्या भी मिलता है।

राजा हरिश्चंद्र सत्य भाषण और वचन पालन के लिए प्रसिद्ध हुए। ऋषि विश्वामित्र ने भी राजा हरिश्चंद्र की प्रसिद्धि सुनी और उन्होंने राजा हरिश्चंद्र की परीक्षा लेने का निश्चय किया। महर्षि के तप बल के प्रभाव से राजा हरिश्चन्द्र ने स्वप्न में देखा कि उनके पास एक ऋषि आए हैं तथा राजा से उसका राजपाट मांग रहे हैं। राजा ने ऋषि को राजपाट देने का वचन दिया। कुछ देर बाद राजा की नींद खुल गई और वे स्वप्न के बारे में भूल गए।

जब प्रातः हुई तो महर्षि विश्वामित्र राजा हरिश्चंद्र के महल में आए। उन्होंने राजा हरिश्चंद्र से कहा कि आपने अपना समस्त राज्य मुझे देने का वचन दिया है। अपना वचन पूरा कीजिए। राजा को रात में देखे हुए स्वपन की याद आ गई और उसने महर्षि विश्वामित्र को स्वप्न में दिए गए वचन के अनुसार अपना समस्त राज्य उन्हें सौंप दिया।

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जब राजा हरिश्चंद्र अपनी रानी तारामती एवं पुत्र रोहिताश्व के साथ महल छोड़कर जाने लगे तो महर्षि विश्वामित्र ने राजा से दान के पश्चात् दी जाने वाली दक्षिण मांगी तथा दक्षिणा में पांच सौ स्वर्ण मुद्राओं की मांग की।

अब राजा के पास ऋषि को देने के लिए कुछ भी नहीं था, वे अपना राजपाट एवं राजकोष सभी महर्षि विश्वामित्र को दान कर चुके थे। इस पर राजा ने ऋषि से अनुरोध किया- ‘मुझे कुछ समय दीजिए, मैं आपको दक्षिणा अवश्य दे दूंगा।’

ऋषि ने राजा का अनुरोध स्वीकार कर लिया। इसके बाद राजा हरिश्चंद्र अपनी रानी एवं पुत्र के साथ अयोध्या छोड़कर काशी चले गए तथा उन्होंने स्वयं को दास के रूप में बेचकर पांच सौ स्वर्ण मुद्राएं प्राप्त करनी चाहीं किंतु काशी में किसी ने भी राजा को दास के रूप में नहीं खरीदा। इस पर राजा हरिश्चंद्र ने अपनी रानी तारामती और पुत्र रोहिताश्व को बेचकर स्वर्ण मुद्राएं प्राप्त कीं किंतु वे भी पांच सौ नहीं हो पाईं। इस पर राजा हरिश्चंद्र ने स्वयं को काशी नगर से बाहर शमशान में निवास करने वाले एक डोम के हाथों बेच दिया। इस प्रकार पांच सौ स्वर्ण मुद्राएं एकत्रित करके राजा ने ऋषि की दक्षिणा चुका दी।

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जिस डोम ने राजा हरिश्चंद्र को क्रय किया था, उसने राजा को शवदाह के लिए आने वाले शवों से ‘शमशान-कर’ एकत्रित करने के काम पर लगा दिया। इधर राजा शमाशान में रहकर अपने दिन व्यतीत कर रहे थे और उधर नगर में दासी के रूप में काम कर रही रानी तारामती के पुत्र रोहिताश्व को एक दिन सर्प ने डंस लिया जिससे राजकुमार रोहिताश्व की मृत्यु हो गयी। रानी तारामती अपने पुत्र रोहिताश्व की मृत्यु पर संताप करने लगीं। रानी को भय था कि राजा हरिश्चंद्र अपने पुत्र के शव को देखकर दुःख से कातर हो जाएंगे। इसलिए वह रात होने की प्रतीक्षा करने लगी। जब रात का अंधेरा घिर आया तब रानी अपने पुत्र के शव को लेकर शमशान पहुंची। रानी ने अपना मुंह अपनी साड़ी से ढंक लिया तथा अपने पुत्र के मुंह पर भी कपड़ा डाल दिया ताकि राजा हरिश्चंद्र अपनी रानी एवं पुत्र को इस संकट में देखकर दुःखी न हों। रानी संकटों में घिरे अपने पति के दुःखों को और नहीं बढ़ाना चाहती थी तथा राजकुमार की मृत्यु का समाचार राजा से छिपाना चाहती थी। शमशान पहुंचकर रानी तारामती अपने पुत्र की मृत-देह की चुपचाप अंत्येष्टि करने की चेष्टा करने लगी।

तभी डोम का सेवक अर्थात् राजा हरिश्चंद्र वहाँ आ गए और उन्होंने अपने पुत्र का शवदाह करने वाली स्त्री से शमशान का कर मांगा। रानी के पास देने के लिए कुछ नहीं था। इसलिए उसने शमशान का कर देने में असमर्थता प्रकट की।

राजा ने कहा- ‘मैं शमशान का कर लिए बिना आपको इस बालक का शवदाह नहीं करने दूंगा।’

उसी समय आकाश में बिजली चमकी तथा हवा के झौंके से रानी के मुंह से कपड़ा हट गया। राजा हरिश्चंद्र ने अपनी पत्नी को पहचान लिया। वह समझ गए कि जिस बालक का शवदाह किया जाना है, वह उनका अपना पुत्र रोहिताश्व है। राजा हरिश्चंद्र को अपनी रानी एवं पुत्र की यह दशा देखकर बहुत बहुत दुःख हुआ।

उस दिन राजा और रानी का एकादशी का व्रत था और उन दोनों ने ही पूरे दिन में पानी की एक बूंद तक ग्रहण नहीं की थी। उस पर यह घनघोर विपत्ति आन पड़ी थी। फिर भी राजा ने रानी को दुःख की इस घड़ी में धैर्य से काम लेने का उपदेश दिया तथा उससे शमशान का कर मांगा ताकि रानी अपने पुत्र की अंत्येष्टि कर सके। रानी ने पुनः कहा कि मेरे पास देने के लिए कुछ भी नहीं है।

इस पर राजा ने कहा कि शमशान का कर तो तुम्हें देना ही होगा। उससे कोई मुक्त नहीं हो सकता। यदि मैं किसी को छोड़ दूँ तो यह अपने स्वामी के प्रति विश्वासघात होगा। यदि तुम्हारे पास कुछ भी नहीं है तो अपनी साड़ी का आधा भाग कर के रूप में दे दो।

राजा ने कहा- जिस सत्य की रक्षा के लिए हमने अपना महल और राजपाट त्याग दिए, स्वयं को और अपने पुत्र को बेच दिया, उसी सत्य की रक्षा के लिए हमें प्राण भी त्यागने पड़ें तो भी हम पीछे नहीं हटेंगे।’

राजा का यह संकल्प सुनकर आकाशवाणी हुई और महर्षि विश्वामित्र सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र एवं रानी तारामती के समक्ष प्रकट हुए और उन्होंने कहा- ‘हरिश्चन्द्र! तुमने सत्य को जीवन में धारण करने का उच्चतम आदर्श स्थापित किया है। तुम्हारी कर्त्तव्य-निष्ठा महान् है, तुम कोई वर मांगो!’

इस पर राजा ने कहा- ऋषिवर! मुझे आपसे कुछ नहीं चाहिए किंतु यदि आप देना ही चाहते हैं तो इस स्त्री के पुत्र को जीवित कर दीजिए। यह पुत्र ही इसके जीवन का आधार है।’ राजा के इच्छा व्यक्त करते ही राजकुमार रोहिताश्व जीवित हो उठा।

महर्षि विश्वामित्र ने राजा हरिश्चंद्र से कहा- ‘राजन्! मुझे तुम्हारा राजपाट नहीं चाहिए, यह तो मैं तुम्हारी सत्यनिष्ठा की परीक्षा ले रहा था। तुम धन्य हो जिसने स्वप्न में दिए गए वचन का भी पूरी सत्यनिष्ठा से पालन किया। तुम ही अपनी प्रजा के राजा हो, जाओ धर्मपूर्वक प्रजा का पालन करो।

ऋषि की आज्ञा पाकर राजा और रानी राजकुमार रोहिताश्व के साथ फिर से अपनी राजधानी अयोध्या में चले गए और उन्होंने दीर्घकाल तक राज्य किया तथा अपनी प्रजा को सुखी बनाया। राजा हरिश्चंद्र के बारे में यह दोहा कहा जाता है-

चन्द्र टरे सूरज टरे, टरे जगत व्यवहार।

पै दृढ़व्रत हरिश्चन्द्र को, टरे न सत्य विचार।

राजा सगर ने यवनों के सिर मूंड कर उन्हें धर्म से वंचित कर दिया (12)

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राजा सगर ने यवनों के सिर मूंड कर उन्हें धर्म से वंचित कर दिया

ईक्ष्वाकु वंशी राजाओं में राजा बाहुक का नाम बहुत प्रसिद्ध है। वे राजा हरिश्चंद्र के बाद की लगभग सातवीं पीढ़ी के राजा हैं। चूंकि अलग अलग पुराणों, वाल्मीकि रामायण एवं महाभारत में सगर के पिता का नाम अलग-अलग दिया हुआ है, इसलिए यह निश्चित कर पाना संभव नहीं है कि राजा बाहुक हरिश्चंद्र की पीढ़ी में कौनसा था।

हरिवंश पुराण के अनुसार राजा सगर के पिता का नाम बाहुक था। वह आखेट एवं द्यूतक्रीड़ा का अत्यंत शौकीन था। इसलिए हैहय, तालजंघ, तथा शक राजाओं ने बाहुक के राज्य पर आक्रमण करके उसके राज्य को नष्ट कर दिया। यवन, पारद काम्बोज, खस और पह्लव नामक पांच गणों ने भी इस कार्य में हैहय एवं तालजंघों का साथ दिया था।

इस पर राजा बाहुक दुखी होकर वन में चला गया और उसने वहीं अपने प्राण त्याग दिए। इस पर राजा बाहुक की यदुवंशी रानी भी सती होने लगी। रानी उस समय गर्भवती थी इसलिए वन में रहने वाले भृगुवंशी ऋषि और्व ने रानी के प्राणों की रक्षा की।

रानी को उसकी सौत ने विष दे दिया था जिससे रानी के गर्भ में बालक के साथ विष भी था। और्व ऋषि ने रानी के गर्भ में स्थित बालक और विष दोनों को निकाल दिया। यही बालक आगे चलकर सगर कहलाया। संस्कृत में विष को गर भी कहते हैं चूंकि यह बालक गर के साथ उत्पन्न हुआ था इसलिए इसे सगर कहा गया।

कुछ पुराणों के अनुसार सगर के पिता का नाम असित था। राजा असित अत्यंत पराक्रमी था। हैहय, तालजंघ, शूर और शशबिन्दु नामक राजा उनके शत्रु थे। राजा असित को उनसे युद्ध करते-करते अपना राज्य त्यागकर अपनी दो रानियों  के साथ हिमालय चले जाना पड़ा। वहाँ कुछ काल बाद राजा असित की मृत्यु हो गयी।

उस समय उसकी दोनों रानियां गर्भवती थीं। उनमें से एक का नाम कालिंदी था। कालिंदी की संतान को नष्ट करने के लिए उसकी सौत ने उसको विष दे दिया। कालिंदी अपनी संतान की रक्षा के निमित्त भृगुवंशी महर्षि च्यवन के पास गयी। महर्षि ने उसे आश्वासन दिया कि उसकी कोख से एक प्रतापी बालक विष के साथ जन्म लेगा। अतः उसके पुत्र का नाम सगर पड़ा।

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भृगुवंशी ऋर्षि और्व ने बालक सगर के जातकर्म संस्कार किए तथा उन्हें वेद एवं शास्त्र पढ़ाए। ऋर्षि और्व ने सगर को अस्त्र-शस्त्र एवं युद्ध-नीति की भी शिक्षा दी तथा देवताओं के लिए दुर्लभ महाघोर आग्नेय अस्त्र प्रदान किया। जब बालक सगर बड़ा हुआ तो उसने क्रोध में भरकर हैहयों का संहार कर डाला।

इसके बाद उसने यवन, शक, काम्बोज, पारद और पह्लवों को भी निःशेष कर दिया तथा अपने पिता के खोए हुए राज्य एवं इक्ष्वाकुओं की प्राचीन राजधानी अयोध्या पर भी अधिकार कर लिया। जब राजा सगर ने यवन, शक, काम्बोज, पारद और पह्लवों का मूल नाश करने का निश्चय किया तो ये समस्त राजा भागकर महर्षि वसिष्ठ के चरणों में जा गिरे। महर्षि वसिष्ठ इक्ष्वाकुओं के कुलगुरु थे। उन्होंने राजा सगर से कहकर इन राजाओं को मारने से रोक दिया।

राजा सगर ने गुरु की आज्ञा का सम्मान करते हुए यवन, शक, काम्बोज, पारद और पह्लवों का संहार तो नहीं किया किंतु उनके धर्म को नष्ट कर दिया तथा उनका वेश बदल दिया। उन्होंने शकों के आधे सिर को मूंडकर छोड़ दिया। यवनों के सारे सिर को मूंड दिया और काम्बोजों को भी सिर मूंडकर उन्हें जीवित ही छोड़ दिया।

राजा सगर ने पारदों के सिर को मुक्तकेश अर्थात् खुले बालों वाला बना दिया और पह्लवों को श्मश्रुधारी अर्थात् बड़ी-बड़ी दाढ़ी-मूंछ वाला बना दिया। राजा सगर ने इन सब जातियों को धर्म से वंचित करके उनके द्वारा किए जाने वाले धर्मग्रंथों के अध्ययन पर रोक लगा दी।

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हरिवंश पुराण के अनुसार शक, यवन, काम्बोज, पादर, कोलिसर्प महिष, दर्द, चोल और केरल आदि क्षत्रिय ही थे। महर्षि वसिष्ठ के वचन पर राजा सगर ने इन सबका संहार नहीं करके उनके धर्म को नष्ट कर दिया। उस धर्म विजयी राजा ने अश्वमेध की दीक्षा लेकर खस, तुषार, चोल, मद्र, किष्किन्धक, कौन्तल, वंग, साल्व तथा कोंकण देश के राजाओं को जीता। सगर अयोध्या नगरी का राजा हुआ। उसकी बड़ी रानी विदर्भ नरेश की पुत्री केशिनी थी और छोटी रानी का नाम सुमति था। महाभारत के अनुसार सगर की रानियों के नाम वैदर्भी एवं शैव्या थे। उन दोनों को अपने रूप तथा यौवन का बहुत अभिमान था। जब दीर्घकाल तक दोनों रानियों के कोई पुत्र नहीं हुआ तो राजा सगर ने दोनों रानियों के साथ हिमालय के प्रस्रवण गिरि पर तप किया। बड़ी रानी ने एक पुत्र की और छोटी रानी ने साठ हजार पुत्रों की कामना की। राजा एवं रानियों की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने राजा सगर को वरदान दिया कि उसकी एक रानी को राजा सगर का वंश चलाने वाले एक पुत्र की प्राप्ति होगी और दूसरी रानी के गर्भ से साठ हजार वीर एवं उत्साही पुत्र जन्म लेंगे। कुछ समय पश्चात् रानी केशिनी के गर्भ से असमंजस नामक एक पुत्र उत्पन्न हुआ और रानी सुमति के गर्भ से एक तूंबा निकला।

राजा ने इस तूंबे को फैंकने की आज्ञा दी किंतु उसी समय आकाशवाणी हुई कि इस तूम्बे में साठ हजार बीज हैं। इन बीजों को घी में रखो, जिनसे समय आने पर साठ हजार राजकुमारों का जन्म होगा। राजा ने ऐसा ही किया।

बड़ी रानी का पुत्र असमंजस बहुत दुष्ट प्रकृति का था। वह पुरवासियों के दुर्बल बच्चों को गर्दन से पकड़कर मार डालता था। एक बार उसने अयोध्या नगरी के बच्चों को एकत्रित करके सरयू नदी में डाल दिया। अतः राजा सगर ने राजकुमार असमंजस का परित्याग कर दिया। इस पर असमंजस ने राजा से कहा- ‘मैंने पूर्वजन्म में मिले किसी श्राप के वशीभूत होकर ऐसा किया है। मैं अपने योगबल से अयोध्या के समस्त बच्चों को फिर से जीवित कर दूंगा।’

राजकुमार असमंजस ने समस्त बच्चों को अपने योगबल से पुनर्जीवित कर दिया तथा स्वयं तपस्या करने के लिए वन में चला गया। राजकुमार असमंजस को अयोध्या छोड़कर जाते देखकर अयोध्यावासियों को बहुत पश्चात्ताप हुआ। कालांतर में राजकुमार असमंजस के एक पुत्र हुआ जिसका नाम अंशुमान था। वह वीर, मधुरभाषी और पराक्रमी था। वह अपने पिता को छोड़कर अपने पुरखों की राजधानी अयोध्या लौट आया।

दूसरी रानी के गर्भ से उत्पन्न तूंबे से समय आने पर साठ हजार पुत्रों ने जन्म लिया।  महाभारत के अनुसार राजा सगर को साठ हजार उद्धत पुत्रों की प्राप्ति हुई। वे क्रूरकर्मी बालक आकाश में भी विचरण कर सकते थे तथा प्रजा को बहुत तंग करते थे।                       

राजा सगर के पुत्र (13)

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राजा सगर के पुत्र

राजा सगर के पुत्र बड़े पराक्रमी एवं वीर थे किंतु दुष्ट स्वभाव एवं क्रूर कर्मा होने के कारण उन्होंने धरती एवं समुद्र को बहुत कष्ट दिया।

पिछली कड़ी में हमने राजा सगर की बड़ी रानी केशिनी के गर्भ से असमंजस नामक दुष्ट पुत्र की तथा छोटी रानी सुमति के गर्भ से एक तूम्बे का जन्म होने की कथा की चर्चा की थी जिससे राजा सगर के साठ हजार पुत्रों ने जन्म लिया। जिस तरह रानी केशिनी का पुत्र असमंज अत्यंत दुष्ट था उसी तरह रानी सुमति के साठ हजार पुत्र भी अत्यंत दुष्ट एवं क्रूर कर्मा थे।

एक बार राजा सगर ने विंध्याचल पर्वत और हिमालय पर्वत के मध्य किसी स्थान पर अश्वमेध यज्ञ का आयोजन किया। राजा सगर ने अपने पौत्र अंशुमान को यज्ञ के घोड़े की रक्षा का दायित्व सौंपा। अभी यज्ञ चल ही रहा था कि यज्ञ का घोड़ा सहसा अदृश्य हो गया। वस्तुतः देवराज इन्द्र राक्षस का रूप धारण करके यज्ञ का घोड़ा चुराकर ले गया और उसे पाताल लोक में ले जाकर बांध दिया।

राजा सगर ने अपने साठ हज़ार पुत्रों को आज्ञा दी कि वे पृथ्वी को खोदकर घोड़े को ढूंढ़ लायें। जब तक वे नहीं लौटेंगे, तब तक राजा सगर और राजकुमार अंशुमान यज्ञ पूर्ण करने के लिए यज्ञशाला में ही रहेंगे। सगर-पुत्रों ने समुद्र के निकट पूर्व दिशा की ओर धरती में एक स्थान पर दरार देखी।

सगर के पुत्रों ने वहीं से पृथ्वी को खोदना आरम्भ किया जिसके कारण समुद्र को बहुत कष्ट हुआ तथा समुद्र के भीतर निवास करने वाले हजारों नाग एवं असुर आदि प्राणियों का नाश होने लगा। वे सब अपने प्राण बचाने के लिए देवताओं से करुण पुकार लगाने लगे।

इस पर समस्त देवता गण एकत्रित होकर पितामह ब्रह्मा के पास पहुंचे और उन्हें बताया कि राजा सगर के पुत्रों के कारण पृथ्वी और समुद्र के जीव-जंतु किस तरह चिल्ला रहे हैं। ब्रह्मा ने कहा कि आप चिंता न करें, पृथ्वी विष्णु भगवान की स्त्री है। अतः भगवान विष्णु ही कपिल मुनि का रूप धारण करके पृथ्वी की रक्षा करेंगे।

पूरे आलेख के लिए देखिए यह वी-ब्लॉग-

सगर के पुत्रों ने एक सहस्र योजन भूमि खोद डाली। वहाँ उन्हें पृथ्वी को धारण करने वाले विरूपाक्ष नामक दिग्गज को देखा। राजा सगर के पुत्रों ने विरूपाक्ष का बहुत सम्मान किया और फिर वहाँ से आगे बढ़े। सगर के पुत्रों ने दक्षिण दिशा में महापद्म दिग्गज, उत्तर दिशा में श्वेतवर्ण भद्र दिग्गज तथा पश्चिम दिशा में सोमनस दिग्गज को देखा। इस प्रकार चारों दिशाओं को देखते हुए सगर-पुत्रों ने पाताल लोक में प्रवेश किया जहाँ कपिल मुनि तपस्या कर रहे थे। उनके निकट ही यज्ञ का अश्व बंधा हुआ था। इन्हीं कपिल मुनि ने सांख्य दर्शन का प्रणयन किया था जो भारतीय षड़्दर्शन के छः दर्शनों में से एक है।

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हरिवंश पुराण के अनुसार सगर के पुत्रों ने श्री हरि विष्णु को कपिल मुनि के रूप में समाधि लगाए हुए देखा। सगर के पुत्रों ने समझा कि कपिल मुनि ने ही यज्ञ का अश्व चुराया है। अतः सगर के पुत्रों ने कपिल मुनि का निरादर किया। श्रीमद्भागवत पुराण के अनुसार कपिल मुनि के कोप के कारण सगर के साठ हजार पुत्रों के अपने शरीरों से आग निकलने लगी जिसमें जलकर वे भस्म हो गए। केवल चार राजकुमार बर्हकेतु, सुकेतु, धर्मरथ और पंचजन ही जीवित बचे। इधर जब राजा सगर ने देखा कि उसके पुत्रों को गए हुए बहुत दिन हो गए हैं तो राजा सगर ने अपने पौत्र अंशुमान को अपने चाचाओं तथा यज्ञ के अश्व को ढूंढ़ने के लिए भेजा और स्वयं यज्ञशाला में बैठा रहा। अंशुमान यज्ञ के अश्व तथा अपने चाचाओं को ढूंढता हुआ पाताल लोक में स्थित कपिल मुनि के आश्रम में पहुंचा। उसने वहाँ पर यज्ञ के अश्व तथा अपने चाचाओं की भस्म के ढेर को देखा। राजकुमार अंशुमान ने अपने चाचाओं की मुक्ति के लिए जल से तर्पण करना चाहा किंतु वहाँ कोई जलाशय नहीं मिला। उसी समय पक्षीराज गरुड़जी वहाँ आए। गरुड़जी ने अंशुमान को बताया कि यह सब कपिल मुनि के शाप से हुआ है, अतः साधारण जलदान से कुछ नहीं होगा। तुम्हारे चाचाओं की मुक्ति गंगाजी के जल से तर्पण करने पर होगी। इस समय तो तुम अश्व लेकर जाओ और अपने पितामह का यज्ञ पूर्ण करवाओ।

राजकुमार अंशुमान ने गरुड़जी की बात मान ली। राजकुमार अंशुमान ने कपिल मुनि को प्रणाम करके उन्हें प्रसन्न किया। मुनि ने प्रसन्न होकर उसके आने का कारण पूछा।

अंशुमान ने उन्हें बताया कि उसका पितामह यज्ञशाला में बैठा हुआ अपने पुत्रों एवं यज्ञ के अश्वों की प्रतीक्षा कर रहा है। मुनि ने राजकुमार अंशुमान से कहा कि वह यज्ञ के अश्व को ले जाए। मेरे द्वारा भस्म किए गए तुम्हारे पितृव्यों की मुक्ति तुम्हारे पौत्र भगीरथ के हाथों होगी जब वह भगवान शिव को प्रसन्न करके भगवती गंगा को धरती पर लाएगा और उनके जल से इनका तर्पण करेगा। राजा सगर का कुल अक्षय कीर्ति प्राप्त करेगा तथा आज से समुद्र को सागर अर्थात् राजा सगर का पुत्र कहा जाएगा।

कपिल मुनि के आदेश से राजकुमार अंशुमान यज्ञ का अश्व पुनः धरती पर ले आया और राजा सगर ने अश्वमेध यज्ञ पूर्ण किया। यदि पौराणिक साहित्य में आए वर्णन एवं धरती की भौगोलिक बनावट को मिलाकर देखा जाए तो पुराणों में जिसे पाताल लोक कहा जाता है, वस्तुतः वह आज के दक्षिण-पूर्वी एशियाई द्वीप हैं जिनमें आज के इण्डोनेशियाई द्वीप एवं ऑस्ट्रेलिया भी शामिल हैं।

राजा सगर के पुत्रों ने समुद्र के पूर्व की ओर खुदाई आरम्भ की थी। अतः पर्याप्त संभव है कि कपिल मुनि इन्हीं द्वीपों में से किसी द्वीप पर तपस्या करते हों। भारतीय पुराणों में पाताल लोक में जिन दैत्यों एवं असुरों के छिपने का स्थान माना गया है, वे यही द्वीप हैं। पौराणिक काल में इन द्वीपों की कतार लंका से आरम्भ होकर ऑस्ट्रेलिया पर जाकर समाप्त होती थी। आज तो धरती का मानचित्र बदल गया है तथा द्वीपों की स्थिति में बहुत परिवर्तन आ गया है।

हम जानते हैं कि बहुत सी पौराणिक कथाओं में प्राकृतिक घटनाओं का मानवीकरण किया गया है। वस्तुतः राजा सगर की कथा भी किसी प्राकृतिक घटना की ओर संकेत करती हुई दिखाई देती है। इस घटना का सम्बन्ध समुद्र के भारत की मुख्य धरती से पूर्व अथवा दक्षिण-पूर्व की ओर विस्तृत होने से लगता है।

प्रागैतिहासिक काल में विश्व दो भूखण्डों- अंगारालैण्ड तथा गौंडवाना लैण्ड में बंटा हुआ था। इन दोनों भूखण्डों के बीच में टेथिस महासागर स्थित था। जबकि आज धरती सात महाद्वीपों में विभक्त है तथा ये महाद्वीप समुद्रों के बीच में स्थित हैं। सगर के पुत्रों द्वारा धरती को खोदकर समुद्र को दुःख देने का रूपक समुद्र के विस्तार पाने अथवा दो भूखण्डों के टूटकर सात महाद्वीपों में बंटने जैसी किसी घटना की ओर संकेत करती है।

‘पउम चरित’ नामक जैन ग्रंथ में इस पौराणिक कथा के स्वरूप में बहुत परिवर्तन कर दिया गया है तथा अंत में राजा सगर को जैन धर्म में दीक्षित होते हुए दिखाया गया है।

राजा भगीरथ ने गंगाजी को धरती पर लाने के लिए महातप किया (14)

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राजा भगीरथ ने गंगाजी को धरती पर लाने के लिए महातप किया

राजा भगीरथ पुनः अपने दिव्य रथ पर सवार होकर समुद्र की ओर चल दिए तथा गंगाजी राजा भगीरथ के पीछे-पीछे चलती हुईं समुद्र तक पहुँच गयीं। यहाँ से राजा भगीरथ गंगाजी को रसातल में ले गए तथा अपने पितरों की भस्म को गंगाजल से सिंचित करके उन्हें मुक्ति दिलवाई।

विभिन्न पुराणों से लेकर वाल्मीकि रामायण एवं महाभारत में ईक्ष्वाकु वंशी राजा भगीरथ का उल्लेख बहुत आदर के साथ हुआ है। हम पिछली कड़ियों में चर्चा कर चुके हैं कि राजा सगर के पौत्र का नाम अंशुमान था। अंशुमान का पुत्र दिलीप हुआ। ईक्ष्वाकु वंश में त्रेता युग में दिलीप नामक दो राजा हुए हैं। प्रथम दिलीप, राजा अंशुमान का पुत्र था एवं राजा भगीरथ का पिता था और दूसरा दिलीप राजा खटवांग का पुत्र था और राजा रघु का पिता था।

जब भगवान श्री हरि विष्णु ने कपिल मुनि के रूप में प्रकट होकर राजा सगर के साठ हजार  पुत्रों को भस्म कर दिया तब राजा अंशुमान ने अपने पितृव्यों के तर्पण के लिए गंगाजल प्राप्ति हेतु घनघोर तपस्या की किंतु वह गंगाजी को पृथ्वी पर नहीं ला पाया।

तदनंतर उसके पुत्र दिलीप ने भी घनघोर तपस्या की किंतु वह भी भगवती गंगा को धरती पर नहीं ला सका। राजा दिलीप के बाद उसका पुत्र भगीरथ अयोध्या का राजा हुआ। राजा भगीरथ ने भी भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए घनघोर तपस्या की।

बहुत से पुराणों के अनुसार राजा भगीरथ पुत्रहीन थे। इसलिए उन्होंने राज्यभार अपने मन्त्रियों को सौंपा और स्वयं गोकर्ण तीर्थ में जाकर घोर तपस्या करने लगे। पितामह ब्रह्मा के प्रसन्न होने पर उन्होंने दो वरदान माँगे, एक तो यह कि राजा भगीरथ अपने पितरों का गंगा जल से तर्पण करके उन्हें स्वर्ग पहुंचाएं और दूसरा यह कि राजा भगीरथ की कुल परम्परा को आगे बढ़ाने के लिए एक पुत्र प्राप्त हो।

पितामह ब्रह्मा ने राजा भगीरथ को दोनों वरदान दिये तथा यह भी कहा कि स्वर्ग में बहने वाली गंगा नदी का वेग इतना अधिक है कि यह पृथ्वी उसे संभाल नहीं सकती। इसलिए तुम्हें भगवान शंकर को प्रसन्न करके उनकी कृपा प्राप्त करनी होगी।

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ब्रह्माजी से वरदान प्राप्त करने के पश्चात् राजा भगीरथ ने भगवान शंकर को प्रसन्न करने का निश्चय किया तथा एक वर्ष तक अपने पैरों के अंगूठों पर खड़े होकर घनघोर तपस्या की। भगवान शंकर ने भगीरथ से कहा कि धरती के प्राणियों के पाप-ताप तथा शाप हरने के लिए गंगाजी का धरती पर अवतरित होना आवश्यक है। मैं इस कार्य में तुम्हारी सहायता करूंगा तथा गंगाजी के स्वर्ग से धरती पर अवतरित होने से पहले मैं उसे अपने शीश पर धारण करूंगा ताकि गंगजाजी का वेग कम हो सके।

जब देवी गंगा स्वर्ग से धरती पर गिरने लगीं तो उनका वेग अत्यंत प्रबल था। निश्चय ही यदि गंगाजी सीधे ही धरती पर गिरतीं तो धरती अपने स्थान पर स्थिर नहीं रह सकती थी। अतः भगवान शंकर ने स्वर्ग से आती हुई गंगाजी को अत्यंत प्रसन्नता के साथ अपने मस्तक पर धारण कर लिया। तब से गंगाजी का नाम जटाशंकरी हो गया। वे भगवान शिव की जटाओं में ऐसे समा गईं कि उन्हें जटाओं से निकलने का मार्ग ही नहीं मिला।

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इस पर राजा भगीरथ ने फिर से भगवान शंकर की तपस्या की। भगवान शंकर ने प्रसन्न होकर गंगाजी को अपनी जटाओं से मुक्त किया। शिव पुराण के अनुसार भगवान शिव ने राजा भगीरथ की तपस्या से प्रसन्न होकर अपनी जटाओं को निचोड़ा जिससे तीन बूंद जल प्रकट हुआ। एक बूंद जल की पुनीत धारा बनकर पाताल की ओर चली गयी, दूसरी बूंद आकाशगंगा बनकर आकाश की ओर तथा तीसरी बूंद जल की धारा के रूप में राजा भगीरथ के पीछे-पीछे चली। कुछ पुराणों के अनुसार शिव की जटाओं से निकली गंगाजी सात धाराओं के रूप में प्रवाहित हुईं। इनमें से तीन धाराएं ह्लादिनी, पावनी और नलिनी पूर्व दिशा की ओर बढ़ीं। गंगाजी की अन्य तीन धाराएं सुचक्षु, सीता और सिंधु पश्चिम दिशा की ओर बढ़ीं और सातवीं धारा ‘भागीरथी’ राजा भगीरथ की अनुगामिनी हुई। राजा भगीरथ गंगाजी में स्नान करके पवित्र हुए और अपने दिव्य रथ पर चढ़कर हिमालय से समुद्र की ओर चल दिए। गंगा मैया उनके पीछे-पीछे चलीं। कुछ पुराणों के अनुसार इस मार्ग में जह्नु मुनि की यज्ञशाला थी जो गंगाजी के प्रवाह में बह गई। इस पर मुनि ने क्रुद्ध होकर गंगाजी को पी लिया। गंगाजी के इस प्रकार लुप्त हो जाने पर समस्त देवता चिंतित हुए और उन्होंने जह्नु मुनि का पूजन करके उन्हें प्रसन्न किया तथा उनसे कहा कि  गंगाजी आपकी पुत्री हैं, कृपया उन्हें मुक्त करें।

इस पर जह्न ऋषि ने गंगाजी को अपने कानों के मार्ग से बाहर निकाला। तभी से गंगाजी जह्नुसुता एवं जाह्नवी कहलाने लगीं।

राजा भगीरथ पुनः अपने दिव्य रथ पर सवार होकर समुद्र की ओर चल दिए तथा गंगाजी राजा भगीरथ के पीछे-पीछे चलती हुईं समुद्र तक पहुँच गयीं। यहाँ से राजा भगीरथ गंगाजी को रसातल में ले गए तथा अपने पितरों की भस्म को गंगाजल से सिंचित करके उन्हें मुक्ति दिलवाई।

राजा भगरीथ के दृढ़ संकल्प को देखकर पितामह ब्रह्माजी ने प्रसन्न होकर कहा- ‘हे भगीरथ, जब तक समुद्र रहेगा, तुम्हारे पितर देवता के समान पूज्य माने जायेंगे तथा गंगा तुम्हारी पुत्री कहलाकर भागीरथी के नाम से विख्यात होगी। तीन धाराओं में प्रवाहित होने के कारण गंगा आज से त्रिपथगा कहलाएगी।’

गंगा-अवतरण के सम्बन्ध में पुराणों में मिलने वाली कथाओं तथा महाभारत में मिलने वाली कथा में थोड़ा अंतर है। महर्षि वेदव्यास ने महाभारत के वनपर्व में तीर्थयात्रा पर्व का सुंदर वर्णन किया है इसी वर्णन में राजा भगीरथ की तपस्या का वर्णन हुआ है। महर्षि वैशम्पायन ने राजा जनमेजय को भगीरथ की तपस्या का बहुत सुंदर वर्णन सुनाया था। इस वर्णन के अनुसार राजा भगरीथ ने गंगाजी को प्रसन्न करने के लिए हजारों वर्षों तक हिमालय पर्वत पर घनघोर तपस्या की।

एक हजार दिव्य वर्ष बीत जाने पर स्वयं गंगाजी ने साकार होकर राजा भगीरथ को दर्शन दिए तथा उनसे पूछा- ‘महाराज आप मुझसे क्या चाहते हैं।’

राजा भगीरथ ने हाथ जोड़कर कहा- ‘वरदायिनी महानदी! मेरे साठ हजार पितृव्यों की मुक्ति के लिए आप धरती पर चलें। मैं उनके उद्धार के लिये आपसे याचना करता हूँ।’

राजा भगीरथ की यह बात सुनकर विश्वन्दिता गंगाजी अत्यन्त प्रसन्न हुईं और उन्होंने कहा-

‘महाराज! मैं आपकी प्रार्थना स्वीकार करती हूँ किंतु आकाश से पृथ्वी पर गिरते समय मेरे वेग को रोकना बहुत कठिन है। महेश्वर नीलकण्ठ को छोड़कर तीनों लोकों मे कोई भी मेरा वेग धारण नही कर सकता। अतः हे महाबाहो! तुम तपस्या द्वारा उन्हीं वरदायक भगवान शिव को प्रसन्न करो। स्वर्ग से गिरते समय वे ही मुझे अपने मस्तक पर धारण करेंगे। विश्वभावन भगवान शंकर आपके पितरों के हित की इच्छा से आपका मनोरथ अवश्य पूर्ण करेंगे।’

महाभारत की कथा के अनुसार जब गंगा भगवान शिव की जटाओं में होती हुई पृथ्वी पर अवतरित हुई तब वह राजा भगीरथ का अनुसरण करते हुए सूखे हुए समुद्र तक पहुँची, जिसका जल अगस्त्य मुनि ने पी लिया था। समुद्र को भरने के पश्चात् गंगाजी ने पाताल में स्थित सगर के साठ हजार पुत्रों का उद्धार किया।

पहले स्वर्ग, फिर पृथ्वी एवं अंत में पाताल में बहने के कारण गंगाजी ‘त्रिपथगा’ कहलाईं। यहाँ स्वर्ग से आशय हिमालय पर्वत के किसी क्षेत्र से, पृथ्वी का आशय भारत भूमि के मैदानी क्षेत्रों से तथा पाताल का आशय दक्षिण-पूर्व एशियाई द्वीपों  अर्थात् इण्डोनेशिया, कम्बोडिया, मलेशिया, वियतनाम एवं ऑस्ट्रेलिया आदि द्वीपों से लिया जाना चाहिए।

गंगाजी के धरती पर आने के उपलक्ष्य में राजा भगीरथ ने सौ अश्वमेध यज्ञों का अनुष्ठान किया। उनके द्वारा किए गए महान् यज्ञ में देवराज इन्द्र सोमपान करके मदमत्त हो गया। यज्ञ के अंत में राजा भगीरथ ने गंगाजी के किनारे दो स्वर्ण घाट बनवाए तथा रथ में बैठी अनेक सुन्दर कन्याएँ धन-धान्य सहित, ब्राह्मणों को दान स्वरूप प्रदान कीं।

पुराणों में उल्लेख है कि भगीरथ के संकल्प कालिक जलप्रवाह से आक्रांत होकर गंगा राजा भगीरथ की गोद में जा बैठी। इस प्रकार वह भगीरथ की पुत्री होकर भागीरथी कहलाई और राजा की जंघा अर्थात् उरु पर बैठने के कारण ‘उर्वशी’ के नाम से विख्यात हुई।

पुराणों के अनुसार पृथ्वी-वासियों के पाप धोने के लिए देवनदी गंगा को धरती पर लाने के पश्चात् राजा भगीरथ ने दीर्घकाल तक अयोध्या में राज्य किया तथा प्रजा को सुखी बनाया। महर्षि वाल्मीकि ने गंगा-अवतरण का बहुत संुदर वर्णन किया है। प्रत्येक भारतवासी चिरकाल तक राजा भगीरथ का ऋणी रहेगा जिन्होंने गंगाजी को स्वर्ग से धरती पर उतारकर भारत को सचमुच भारत बना दिया।

यदि इस प्रसंग को प्राकृतिक घटनाओं के आधार पर देखा जाए तो गंगा-अवतरण की घटना एक महत्वपूर्ण भौगोलिक घटना है। इस घटना का मानवीकरण करके राजा सगर के साठ हजार पुत्रों के उद्धार का कथानक रचा गया है। गंगा अवतरण की घटना होने से पहले, समुद्रों का जल हिमकाल के कारण हिमालय पर्वत पर जमा हो गया था जिसके कारण समुद्र खाली हो गए थे।

इस सम्बन्ध में यह रूपक गढ़ा गया कि अगस्त्य ऋषि ने समुद्रों का जल पीकर उन्हें खाली कर दिया था। वस्तुतः अगस्त्य किसी बादल का नाम था जिसने समुद्रों का जल अपने भीतर खींच लिया था। इस प्रकार खाली हुए समुद्र के बीच जो हजारों द्वीप उभर आए होंगे उन्हें ही राजा सगर के साठ हजार पुत्रों के नाम से पुकारा गया होगा।

जब हिमकाल बीत गया तब हिमालय की बर्फ पिघलने से सात नदियां ह्लादिनी, पावनी, नलिनी, सुचक्षु, सीता, सिंधु और भागीरथी एक साथ धरती की ओर प्रवाहित हुईं तथा इस जल से समुद्र भर गया। गंगा-अवतरण के कथानक में वर्णन आया है कि राजा भगीरथ द्वारा किए गए यज्ञ में इन्द्र सोमपान करके मदमत्त हो गया।

इस वाक्य का आशय इस घटना से लगता है कि हिमयुग बीत जाने के बाद जब हिमालय का जल नदियों के माध्यम से समुद्र में भर गया तब धरती पर फिर से वर्षा होने लगी। वेदों, उपनिषदों एवं पुराणों में इन्द्र को वर्षा का देवता कहा गया है तथा उसके मदमत्त हो जाने का अर्थ अधिक वर्षा करने से लगाया जा सकता है क्योंकि समुद्रों में जल भर जाने से वाष्पन की क्रिया से समुद्र का जल बादलों में पहुंचने एवं उनका जल फिर से धरती पर बरसने की क्रिया तेज हो गई होगी।

महर्षि अगस्त्य ने समुद्र पी लिया (15)

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महर्षि अगस्त्य ने समुद्र पी लिया

बहुत से पुराणों में महर्षि अगस्त्य द्वारा समुद्रों को पीकर उन्हें खाली करने का आख्यान मिलता है। महाभारत में भी इस आख्यान का विस्तार से वर्णन किया गया है।

पिछली कड़ी में हमने चर्चा की थी कि जब राजा भगरीथ गंगाजी को स्वर्ग से उतार कर लाए तो वे गंगाजी को धरती से पाताल लोक में ले गए। मार्ग में गंगाजी ने उन रिक्त समुद्रों को भी जल से भर दिया जो महर्षि अगस्त्य द्वारा पी लिए जाने के कारण खाली पड़े थे।

इस कड़ी में हम महर्षि अगस्त्य द्वारा समुद्र का जल पिए जाने की घटना की चर्चा करेंगे। बहुत से पुराणों में महर्षि अगस्त्य द्वारा समुद्रों को पीकर उन्हें खाली करने का आख्यान मिलता है। महाभारत में भी इस आख्यान का विस्तार से वर्णन किया गया है। इस आख्यान की भूमिका वृत्रासुर के वध से आरम्भ होती है तथा इसकी पूर्णाहुति ईक्ष्वाकु वंश के राजा भगीरथ पर जाकर पूर्ण होती है।

दर्शकों को स्मरण होगा कि हमने हिन्दू धर्म कथाएं की 18वीं कड़ी में वृत्रासुर वध के समय कालेय नामक दैत्यों का उल्लेख किया था। कुछ पुराणों में इन्हें कालकेय दैत्य कहा गया है। महाभारत में भी इन्हें कालकेय कहा गया है।

जब देवराज इन्द्र महर्षि दधीचि की अस्थियां प्राप्त करके विश्वकर्मा से छः दांतों वाला भयंकर वज्र बनवाकर वृत्रासुर को मारने के लिए आया तब भगवान विष्णु एवं समस्त देवगण इन्द्र की सहायता के लिए आकाश में स्थित हो गए। उसी समय कालकेय नामक दैत्यों के एक विशाल समूह ने वृत्रासुर के चारों ओर घेरा बना लिया। देखते ही देखते देवों एवं दानवों का भयंकर युद्ध छिड़ गया।

पूरे आलेख के लिए देखिए यह वी-ब्लॉग-

कालकेय दैत्यों के काले शरीर अत्यंत भयंकर थे और उनके आकार बहुत विशाल थे। अंत में भगवान विष्णु के निर्देशन पर देवराज इंद्र ने वृत्रासुर पर वज्र से प्रहार किया जिससे वृत्रासुर भयानक गर्जना करता हुआ धरती पर गिर गया और कालकेय दैत्य समुद्र में जा छुपे।

कालकेय दैत्यों ने सोचा कि समस्त लोकों की रक्षा तप से होती है। अतः सबसे पहले तप का नाश किया जाना चाहिए, इसलिए पृथ्वी पर जितने भी धर्मात्मा, तपस्वी और पुण्यात्मा मनुष्य हैं उनका नाश कर दिया जाए। इससे समस्त लोक स्वतः नष्ट हो जाएंगे।

यह विचार स्थिर करने के बाद कालेय दैत्य दिन में समुद्र के भीतर छिपे रहते एवं रात्रि के समय समुद्र से बाहर आकर आश्रमों और तीर्थ-स्थानों में रहने वाले ऋषि-मुनियों को खा जाते। उनके अत्याचार इतने बढ़ गए कि पृथ्वी पर चारों ओर ऋषि-मुनियों की हड्डियां दिखाई देने लगीं।

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ऋषियों एवं मुनियों का संहार होते हुए देखकर देवगण अत्यंत दुःखी हुए और भगवान श्री हरि विष्णु के पास जाकर बोले- ‘भगवन्! इस संसार पर भारी विपत्ति आन पड़ी है, पता नही कौन, रात्रि के समय धर्मात्मा पुरुषों और ऋषि-मुनियों की हत्या करता है! यदि ऐसे ही धर्मात्माओं और ऋषि-मुनियों की हत्या होती रही तो पृथ्वी सहित समस्त लोकों का नाश होना निश्चित है! अतः हे जगदीश्वर! हमें इस विपत्ति से बाहर निकालें।’ प्रार्थना सुनकर भगवान श्री हरि विष्णु बोले- ‘हे देवगण! मैं इस भयंकर उत्पात से भलीभाँति परिचित हूँ। यह कार्य कालकेय नामक दैत्य कर रहे हैं। वे दिन भर तो समुद्र में छिपे रहते हैं और रात के समय समुद्र से बाहर निकलकर धर्मात्माओं और ऋषि मुनियों की हत्या करते हैं। जब तक वे समुद्र में हैं, तब तक तुम उनका वध नही कर सकते। इसलिए समुद्र को सुखाने के उपाय करो। समुद्र को सुखाने का सामर्थ्य सम्पूर्ण धरती पर केवल महर्षि अगस्त्य में है। इसलिए आप सब अगस्त्य ऋषि के पास जाएं।’ भगवान विष्णु के आदेश पर समस्त देवगण एकत्रित होकर महर्षि अगस्त्य के आश्रम पहुंचे। देवताओं ने ऋषि अगस्त्य को प्रणाम किया। देवताओं को इस प्रकार आया देखकर ऋषि अगस्त्य ने उनसे वहाँ आने का कारण पूछा। तब देवताओं ने समस्त वृत्तांत कह सुनाया।

देवताओं ने ऋषि से अनुरोध किया- ‘आप इस समुद्र को सुखा दें, ताकि हम उन दैत्यों का विनाश कर सकें जो समस्त ऋषि-मुनियों के काल बने बैठे हैं।’

देवताओं की यह प्रार्थना सुनकर महर्षि अगस्त्य ने कहा- ‘मैं इस संसार के कष्ट दूर करने के लिए तुम्हारी इच्छा अवश्य पूरी करूँगा।’

महर्षि अगस्त्य तपसिद्ध ऋषियों और देवताओं को अपने साथ लेकर समुद्र के तट पर गए तथा कहने लगे- ‘मैं समस्त संसार के हित के लिए इस समुद्र का पान करता हूँ।’

ऐसा कहकर मुनि अगस्त्य ने समुद्र का समस्त जल पी लिया। उन्होंने समुद्र के जल को अपने उदर में ऐसे धारण कर लिया जैसे कुंभ जल को धारण करता है। तभी से महर्षि अगस्त को कुंभज ऋषि कहा जाने लगा। समुद्र के सूख जाने के कारण धरती पर वर्षा बंद हो गई।

जब समुद्र खाली हो गए तो उसके तल में छिपे हुए कालकेय दैत्य दिखाई देने लगे। समस्त देवता अपने दिव्य अस्त्रों के साथ कालकेय दैत्यों पर टूट पड़े और एक बार पुनः देवासुर संग्राम आरम्भ हो गया। इस युद्ध में कालकेय दैत्य देवताओं के हाथों मारे गए।

जब कालकेय दैत्य समाप्त हो गए तब देवताओं ने महर्षि अगस्त्य से प्रार्थना की कि अब आप समुद्र के पिये हुए जल को पुनः छोड़ दीजिए किंतु मुनि अगस्त्य ने कहा- ‘मैंने समस्त जल पचा लिया है। अतः अब मैं उसे नहीं छोड़ सकता।’

महर्षि अगस्त्य की यह बात सुनकर देवताओं को बड़ा आश्चर्य हुआ। वे पितामह ब्रह्माजी के पास गए एवं उनके समक्ष करबद्ध होकर प्रार्थना करने लगे कि आप समुद्र को फिर से भर दें ताकि धरती पर फिर से वर्षा आरम्भ हो सके। इस पर पितामह ब्रह्मा ने देवताओं को सलाह दी कि आप समस्त देवगण अपने-अपने स्थान पर जाएं। कुछ समय बाद जब इक्ष्वाकु वंशी राजा भगीरथ अपने पुरखों के उद्धार के लिए गंगाजी को धरती पर लेकर जाएंगे तब यह समुद्र पुनः जल से भर जाएगा।

पितामह ब्रह्मा के आदेशानुसार समस्त देवता अपने स्थान पर चले गए और राजा भगीरथ का जन्म होने की प्रतीक्षा करने लगे। आगे का कथानक हम पिछली कथा में सुना चुके हैं जिसमें राजा भगीरथ द्वारा गंगाजी को धरती पर लाने और गंगाजी द्वारा समुद्र को पुनः जल से भरने की कथा कही गई थी।

ऐसा जान पड़ता है कि अगस्त्य ऋषि द्वारा समुद्र को पीकर उसे खाली करने एवं धरती पर वर्षा बंद हो जाने का पौराणिक कथानक एक पर्यावरणीय घटना है। जब धरती पर हिमकाल आता है तो समुद्रों का वह जल जो बादलों में स्थित होता है, वह वर्षा के रूप में धरती पर न बरस कर बर्फ के रूप में पहाड़ों पर गिरता है और वहाँ बर्फ के रूप में कैद हो जाता है। इससे समुद्र का जलस्तर नीचे गिर जाता है।

जब पुनः गर्मयुग आरम्भ होता है तब पहाड़ों की बर्फ पिघल जाती है तथा पर्वतों का जल फिर से नदियों में प्रवाहित होता हुआ समुद्र में पहुंचने लगता है। धरती पर सूर्यताप बढ़ने से समुद्र के जल का वाष्पन होने लगता है और फिर से धरती पर वर्षा होने की प्रक्रिया आरम्भ हो जाती है।

वस्तुतः कुंभज ऋषि द्वारा समुद्र को पीकर खाली करने, राजा भगीरथ द्वारा गंगाजी को धरती पर लाने एवं इन्द्र द्वारा धरती पर वर्षा आरम्भ करने के रूपक इन्हीं पर्यावरणीय घटनाओं का मानवीकरण करके लिखी गई प्रतीत होती हैं।

हमारे इस कथन का आशय यह कतई नहीं है कि कोई राजा भगीरथ नहीं हुए थे अथवा कोई अगस्त्य ऋषि नहीं हुए थे या कोई इन्द्र नामक देवता नहीं हुए थे। निःसंदेह वे सब हुए थे और उन्होंने पृथ्वी के कल्याण के लिए बहुत बड़े-बड़े कार्य किए थे तभी तो उन्हें और अधिक महान् बताने के लिए इतनी बड़ी घटनाओं का नायक भी ठहरा दिया गया। भारतीय संस्कृति राजा भगीरथ एवं महर्षि अगस्त्य की चिरकाल तक ऋणी रहेगी।

महर्षि अगस्त्य निःसंदेह एक ऐसे ऋषि हुए हैं जिन्होंने भारत को सभ्य एवं सुसंस्कृत बनाने में बहुत बड़ा योगदान दिया किंतु उनकी कथा हम इक्ष्वाकुवंशी राजा रामचंद्र के प्रसंग में बताने का प्रयास करेंगे।

राजा नाभि के समय नवीन सृष्टि आरम्भ हुई (16)

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राजा नाभि के समय नवीन सृष्टि आरम्भ हुई

राजा ईक्ष्वाकुवंशी राजा अंशुमान के पौत्र राजा भगीरथ गंगाजी को धरती पर लाये। राजा भगीरथ के बाद उनका पुत्र श्रुत और श्रुत के बाद राजा नाभि अयोध्या का राजा हुआ।

पौराणिक अख्यानों के अनुसार राजा नाभि के समय में धरती पर बहुत सी बड़ी हलचलें हुईं। चूंकि वह काल हिमयुग के व्यतीत हो जाने के बाद आरम्भ हुए गर्मयुग का काल था इसलिए धरती पर बहुत से भौगोलिक एवं पर्यावरणीय परिवर्तन हुए। इस काल में नदियां पूरे वेग से बहने लगी थीं और आकाश में काले बादल छाए रहते थे जिनके कारण धरती पर वर्षा की मात्रा बहुत अधिक थी।

धरती पर चारों ओर बड़े-बड़े ताल-तलैया तथा बर्फीली नदियां दिखाई देती थीं। एक समय ऐसा भी आया कि राजा नाभ को अपनी प्रजा को जल प्रलय से बचाने के लिए अयोध्या छोड़कर पुनः हिमालय पर्वत पर जाना पड़ा जहां उनके पूर्वज महाराज मनु ने भी अपनी प्रजा की रक्षा के निमित्त आश्रय लिया था।

हिमलाय की तराई में स्थित भूमि गंगा-यमुना के दो आब की अपेक्षा काफी ऊंचाई पर थी इसलिए राजा नाभ ने कश्मीर से लेकर मगध तक की भूमि अपने अधिकार में कर ली और अपने राज्य रूपी शरीर की नाभि अयोध्या में बसायी। अर्थात् उन्होंने अपनी राजधानी अब भी अयोध्या में रखी।

कुछ पौराणिक कथाओं के अनुसार राजा नाभि के समय में धनुष का आविष्कार हुआ। उन्होंने ही पहली बार विधिवत् हल से खेती आरम्भ करायी। उनके समय में उपकरण एवं शस्त्र हड्डियों और पत्थरों से बनते थे, परन्तु वे अपने से पहले वाले युग की अपेक्षा अधिक मजबूत और नुकीले थे। मनुष्य को धातुओं की पहचान भी राजा नाभि के समय में हुई।

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राजा नाभि की कथा से अनुमान लगाया जा सकता है कि इस राजा का काल दो प्रस्तर युगीन सभ्यताओं के बीच का काल होना चाहिए। नृवंश विज्ञानियों के अनुसार भारत में प्रथम पाषाण काल का आरम्भ डेढ़ लाख साल पहले हुआ। इसे पुरापाषाण काल भी कहते हैं।

इस काल के बहुत से उपकरण एवं शस्त्र काश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक मिलते हैं। ये उपकरण बहुत ही मोटे एवं भद्दे हैं इन्हें देखने से अनुमान होता है कि इस काल में मानव आखेट की अवस्था में था और कृषि एवं पशुपालन से परिचित नहीं था। वह नदियों के किनारों पर स्थित जंगलों में घूमता रहता था।

दूसरा पाषाण काल आज से लगभग पचास हजार साल पहले आरम्भ हुआ। इसे मध्यपाषाण काल कहा जाता है। इस युग के उपकरण नदियों के किनारे एवं शैलाश्रयों के निकट मिलते हैं। ये उपकरण अपेकक्षाकृत अधिक तीखे, छोटे और धारदार हैं। इस काल के उपकरणों में स्क्रैपर तथा पाइंट विशेष उल्लेखनीय हैं। इन उपकरणों के मिलने का अर्थ है कि इस काल का मानव मछली एवं पशुओं को छीलने एवं उनसे हड्डियां एवं कांटे अलग करने में दक्ष था। इस समय तक भी मानव को पशुपालन तथा कृषि का ज्ञान नहीं हुआ था।

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तीसरा पाषाण काल उत्तर-पाषाण काल कहलाता है। इसका आरंभ आज से लगभग 10-12 हजार वर्ष पूर्व हुआ। इस काल में पहले हाथ से और फिर से चाक से बर्तन बनाए गए। इस काल में कपास की खेती भी होने लगी थी। समाज का वर्गीकरण आरंभ हो गया था। व्यवसायों के आधार पर जाति व्यवस्था का सूत्रपात हो गया था। इस प्रकार मानव सभ्यता हिमयुगों एवं गर्मयुगों के आने-जाने के बीच के कालों में बार-बार प्रकट हुई एवं नष्ट हुई। यही कारण है कि इक्ष्वाकु वंश के कई राजाओं के काल में नवीन सभ्यता आरम्भ होने की कथाएं मिलती हैं जिनमें से राजा नाभि भी एक था। नृवंशी वैज्ञानिकों का मानना है कि पुराणों में वर्णित भगवान परशुराम भी पाषणकालीन चरित्र है। भगवान परशुराम का उल्लेख विभिन्न पुराणों, वाल्मीकि रामायण एवं महाभारत में मिलता है। इन कथाओं के अनुसार भगवान परशुराम की उपस्थिति रामायण काल में भी मिलती है और महाभारत काल में भी। पुराणों की कालगणना इतनी उलझी हुई है कि हम उनके आधार पर भगवान परशुराम के युग अथवा जीवन काल का निर्धारण नहीं कर सकते। यदि उन्हें रामायण काल का पात्र माना जाए तो वे आज से लभगग सात से दस हजार साल पहले हुए और यदि भगवान परशुराम को महाभारत कालीन माना जाए तो वे आज से लगभग पांच हजार साल पुराने सिद्ध होते हैं।

कोई भी व्यक्ति पांच हजार साल तक जीवित रहे, यह संभव नहीं है किंतु यदि हम पुराणों में आए विवरण को देखें तो हर युग में मनुष्य की आयु अलग-अलग बताई गई है। पुराणों के अनुसार मनुष्य की आयु सतयुग में 1 लाख वर्ष, त्रेतायुग में 10 हजार वर्ष,  द्वापर में 1 हजार वर्ष और कलियुग में 100 वर्ष होती है।

यदि यह सही है तो परशुराम का रामायण काल से लेकर महाभारत काल तक होना संभव है किंतु धरती पर आज तक कोई भी नर कंकाल या उसका छोटा सा अवशेष ऐसा नहीं मिला है जिसके जीवनकाल का निर्धारिण कार्बन डेटिंग के आधार पर कुछ सौ वर्ष या कुछ हजार वर्ष किया जा सके।

पुराणों में जिन सप्त चिंरजीवियों की अवधारणा प्रस्तुत की गई है, उनमें भी भगवान परशुराम का नाम सम्मिलित है। इस दृष्टि से भी भगवान परशुराम की उपस्थिति रामायण काल से लेकर महाभारत काल तक होनी संभव है किंतु वैज्ञानिक आधार पर इसे सिद्ध नहीं किया जा सकता।

फिर भी हम अनुमान लगा सकते हैं कि जब धरती पर बार-बार हिमयुगों एवं गर्मयुगों  के आने-जाने के कारण मानव सभ्यता नष्ट हो जाती थी, या समूची धरती ही समुद्र में डूब जाती थी और हजारों साल बाद पुनः प्रकट होती थी, तब ऐसी स्थिति में हजारों साल पुराने नरकंकाल भी नष्ट हो जाते होंगे।

इसलिए हम उन्हें प्राप्त नहीं कर पाते किंतु इसका जवाब वैज्ञानिकों के पास यह है कि धरती से लाखों वर्ष पुराने वानर-कंकाल, डायनासोर-कंकाल और नरकंकाल प्राप्त हुए हैं। इनमें से किसी का भी जीवन काल हजारों वर्ष का नहीं ठहरता है।

भारतीय पुराणों में आए आख्यानों एवं वैज्ञानिक शोधों के बीच कालगणना का यह अंतर तब तक विद्यमान रहेगा जब तक कि भारतीय पुराण अपने समर्थन में कोई भौतिक साक्ष्य प्राप्त नहीं कर लेते हैं। तब तक हिन्दू समाज इस आस्था पर दृढ़ रहेगा कि भगवान परशुराम इक्ष्वाकु वंशी राजाओं की कई पीढ़ियों के राजााओं के काल में धरती पर विद्यमान थे, महाभारत काल में भी थे और चिरंजीवी होने के कारण वे आज भी धरती पर विद्यमान हैं किंतु वैज्ञानिक इस बात को कहते रहेंगे कि धरती पर आज तक किसी भी मनुष्य की आयु हजारों वर्ष की नहीं हुई है।

राजा ऋतुपर्ण ने आकाश से ही पेड़ के पांच करोड़ पत्ते गिन लिए (17)

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राजा ऋतुपर्ण ने आकाश से ही पेड़ के पांच करोड़ पत्ते गिन लिए

राजा नाभि के पश्चात् ईक्ष्वाकु वंश में राजा सिन्धुदीप तथा उसके बाद राजा अयुतायुष अयोध्या का राजा हुआ। राजा अयुतायुष के परलोक गमन के पश्चात् राजा ऋतुपर्ण अयोध्या का राजा हुआ। ऋतुपर्ण अयोध्या का पुराकालीन राजा माना जाता है।

वायु पुराण, ब्रह्म पुराण तथा हरिवंश पुराण इत्यादि पुराणों एवं महर्षि वेदव्यास द्वारा रचित महाभारत में ऋतुपर्ण को अयुतायुष का पुत्र बताया गया है। बौधायन श्रौत्रसूत्र के अनुसार ऋतुपर्ण भंगाश्विन का पुत्र तथा शफाल नामक राज्य का राजा था।

कुछ पुराणों के अनुसार ऋतुपर्ण के पिता का नाम सर्वकाम था। ऋतुपर्ण अश्वविद्या में अत्यंत निपुण था। निषध देश का राजा नल जुए में अपना राज्य हार जाने के उपंरात अपने अज्ञातवास के काल में इसी ईक्ष्वाकुवंशी राजन्ऋ तुपर्ण के पास ‘बाहुक’ नाम से सारथि के रूप में रहा था।

जब राजा नल की रानी दमयंती को अपने अनुचर पर्णाद के माध्यम से ज्ञात हुआ कि राजा नल सारथि के रूप में रह रहा है तो रानी दमयंती ने ऋतुपर्ण के पास संदेश भिजवाया कि मुझे अपने पति राजा नल का कुछ भी पता नहीं लग सका है। इसलिए मैं अपना दूसरा स्वयंवर कल सूर्याेदय के समय कर रही हूँ। अतः ऋतुपर्ण भी समय रहते विदर्भ राज्य की कुंडनिपुर पधारें। दमयंती का विचार था कि ऋतुपर्ण के साथ राजा नल भी अवश्य ही आएगा।

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ऋतुपर्ण ने अपने सारथि बने हुए राजा नल से कहा कि कल ही सूर्योदय के समय स्वयंवर है जबकि इतने कम समय में कुंडनिपुर पहुंचना संभव नहीं है। इस पर राजा नल ने अपनी अश्वविद्या के बल से ऋतुपर्ण को ठीक समय पर कुंडनिपुर पहुँचाने का आश्वासन दिया। सारथि बना हुआ राजा नल एवं सूतपुत्र वार्ष्णेय राजा के रथ पर सवार हो गए।

ऋतुपर्ण भी रथ पर बैठ गया। जैसे आकाशचारी पक्षी आकाश में उड़ते हैं, वैसे ही बाहुक का रथ थोड़े ही समय में नदी, पर्वत और वनों को लाँघने लगा। एक स्थान पर ऋतुपर्ण का उत्तरीय नीचे गिर गया। उन्होंने नल से कहा- ‘रथ रोको बाहुक! वार्ष्णेय मेरा उत्तरीय उठा लाएगा।’

बाहुक रूपी नल ने कहा- ‘महाराज! आपका वस्त्र गिरा तो अभी है परन्तु हम वहाँ से एक योजन आगे निकल आए हैं। अब वह नहीं उठाया जा सकता।’

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जिस समय यह बात हो रही थी, उस समय रथ एक वन के ऊपर से निकल रहा था। ऋतुपर्ण ने कहा- ‘बाहुक तुमने मुझे अपनी अश्व-विद्या दिखाई, अब तुम मेरी गणित-विद्या देखो। सामने के वृक्ष में जितने पत्ते और फल दिख रहे हैं, उनकी अपेक्षा भूमि पर गिरे हुए फल और पत्ते एक-सौ-एक गुना अधिक हैं। इस वृक्ष की दोनों शाखाओं और टहनियों पर पाँच-करोड़ पत्ते हैं और दो हजार पिच्यानवे फल हैं। तुम्हारी इच्छा हो तो गिन लो।’

इस पर बाहुक अर्थात् राजा नल ने रथ वहीं आकाश में खड़ा कर दिया और कहा कि मैं इस बहेड़े के वृक्ष को काटकर इसके फलों और पत्तों को ठीक-ठीक गिनकर निश्चय करूँगा। जब बाहुक ने उन फलों और पत्तों को गिना तो वे उतने ही निकले जितने ऋतुपर्ण ने बताए थे। बाहुक बने राजा नल ने आश्चर्य चकित होकर कहा- ‘राजन्! आपकी विद्या अद्भुत है। आप अपनी विद्या मुझे सिखा दीजिये।’ इस पर राजा ऋतुपर्ण ने कहा- ‘गणित-विद्या की तरह मैं पासों की वशीकरण-विद्या में भी इतना ही निपुण हूँ।’

बाहुक ने कहा- ‘आप मुझे यह विद्या भी सिखा दें तो मैं आपको अपनी दिव्य अश्व विद्या सिखा दूंगा।’

ऋतुपर्ण को विदर्भ पहुँचने की जल्दी थी और अश्वविद्या सीखने का लोभ भी था। अतः उसने राजा नल को गणित और पासों की विद्याएं सिखा दीं तथा कहा- ‘मैं तुमसे अश्वविद्या बाद में सीखूंगा। वह तुम्हारे पास मेरी धरोहर है।’

महाभारत वन पर्व के नलोपाख्यान में राजा ऋतुपर्ण का उल्लेख हुआ है। महाभारत में आए प्रसंग के अनुसार बृहदश्व मुनि कहते हैं- ‘हे युधिष्ठिर! तदनन्तर संध्या होते-होते सत्य-पराक्रमी राजा ऋतुपर्ण सारथी बाहुक तथा सूतपुत्र वार्ष्णेय के साथ विदर्भ राज्य में जा पहुँचे। राजा के अनुचरों ने राजा भीष्मक को इस बात की सूचना दी।

राजा भीष्मक के अनुरोध पर ऋतुपर्ण ने अपने रथ की घर्घराहट द्वारा सम्पूर्ण दिशाओं को प्रतिध्वनित करते हुए कुण्डिनपुर में प्रवेश किया। राजा नल के घोड़े वहीं रहते थे। वे रथ का घोष सुनकर अत्यंत प्रसन्न और उत्साहित हुए। उन्होंने अपने स्वामी के द्वारा संचालित हो रहे रथ की घर्घराहट को पहचान लिया।

रानी दमयन्ती ने भी नल के रथ की घर्घराहट सुनी, मानो वर्षाकाल में गरजते हुए मेघों का गम्भीर घोष हो रहा हो। इस महा-भयंकर रथनाद को सुनकर रानी दमयंती को अत्यंत विस्मय हुआ और उसने पहचान लिया कि रथ को राजा नल चला रहा है। इसलिए रानी दमयंती अपने स्वामी नल को देखने की इच्छा से ऊंचे महल की छत पर चढ़ गई। रानी ने राजा नल को देखते ही पहचान लिया।

महल के द्वार पर पहुंचकर रथ रुक गया। राजा नल तो रथ पर ही रहा और ऋतुपर्ण रथ से उतरकर दमयंती के पिता राजा भीष्मक से मिला। राजा भीष्मक ऋतुपर्ण को अपने महल में ले आया।

ऋतुपर्ण को वहाँ स्वयंवर जैसा कोई आयोजन दिखाई नहीं दिया। स्वयं राजा भीष्मक को भी ज्ञात नहीं था कि दमयंती ने झूठा संदेश भेजकर ऋतुपर्ण को बुलाया है। ऋतुपर्ण समझ गया कि उसे राजा भीष्मक ने वहाँ नहीं बुलाया है अपितु उसे बुलाए जाने के पीछे कोई और कारण है। इसलिए ऋतुपर्ण ने विदर्भराज से कहा- ‘राजन्! मैं आपका अभिवानदन करने के लिये आया हूँ।’

राजा भीष्मक ने विचार किया कि ऋतुपर्ण सौ योजन से भी अधिक दूरी से केवल मुझे प्रणाम करने नहीं आया है किंतु उसने ऋतुपर्ण के समक्ष ऐसा ही प्रकट किया जैसे ऋतुपर्ण का यूं चले आना सहज बात ही है और ऋतुपर्ण से कहा- ‘राजन्! आप बहुत थक गए होंगे, अतः विश्राम कीजिये।’

विदर्भ नरेश के द्वारा प्रसन्नता पर्वूक आदर-सत्कार पाकर ऋतुपर्ण को बड़ी प्रसन्नता हुई और उन्होंने राजा भीष्मक के यहाँ विश्राम करना स्वीकार कर लिया। इसी बीच ऋतुपर्ण का सारथी बाहुक अपना रथ लेकर रथशाला में आ गया और रथ के घोड़ों को खोलकर सूतपुत्र वार्ष्णेय के साथ रथ के पिछले भाग में जा बैठा। इसी समय रानी दमयन्ती ने राजा नल का पता लगाने के लिये अपनी दूती को रथशाला में भेजा। दासी ने राजा नल को पहुचान लिया। इस पर राजा नल अपने वास्तविक रूप में प्रकट हो गया।

राजा नल वस्त्राभूषणों से अलंकृत होकर अपनी रानी दमयन्ती एवं अपने श्वसुर राजा भीष्मक से मिला। राजा भीष्मक ने बड़ी प्रसन्नता के साथ नल का स्वागत किया। राजा नल के आगमन की प्रसन्नता में विदर्भ नगर में बड़ा आनंद हुआ।

जब ऋतुपर्ण ने सुना कि बाहुक के वेष में राजा नल उसकी सेवा कर रहा था तो ऋतुपर्ण को बड़ी प्रसन्नता हुई। उसने जाने-अनजाने में की गई अपनी गलतियों के लिए राजा नल से क्षमा याचना की। नल ने भी अनेक युक्तियों द्वारा ऋतुपर्ण की प्रशंसा करते हुए उनका धन्यवाद ज्ञापित किया।

नल ने ऋतुपर्ण से कहा- ‘आपका अश्वविज्ञान मेरे पास धरोहर के रूप में पड़ा है। राजन्! यदि आप उचित समझें तो मैं उसे आप को देने की इच्छा रखता हूँ।’ ऐसा कहकर निषधराज नल ने ऋतुपर्ण को अश्वविद्या प्रदान की। ऋतुपर्ण ने भी राजा नल से शास्त्रीय विधि के अनुसार अश्वविद्या ग्रहण की तथा अश्वों के रहस्य को समझा।

इसके बाद ऋतुपर्ण ने नल को द्यूतविद्या का रहस्य बताया और सूतपुत्र वार्ष्णेय को अपना सारथि बनाकर पुनः अयोध्या चले गए। ऋतुपर्ण के चले जाने पर राजा नल कुछ समय तक कुण्डिनपुर में रहे और रानी दमयंती को लेकर अपने राज्य ‘निषध’ चले गए। 

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

राजा सौदास महर्षि वसिष्ठ के श्राप से कल्मषपाद राक्षस बन गया (18)

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राजा सौदास महर्षि वसिष्ठ के श्राप से कल्मषपाद राक्षस बन गया

ईक्ष्वाकु वंशी राजा सौदास का उल्लेख अनेक हिन्दू पौराणिक ग्रंथों एवं महाभारत में हुआ है। विष्णु पुराण के अनुसार राजा सौदास इक्ष्वाकु वंश में उत्पन्न राजा ऋतुपर्ण का प्रपौत्र, राजा सर्वकाम का पौत्र तथा राजा सुदास का पुत्र था। सुदास का पुत्र होने के कारण इसे सौदास कहा जाता था।

कुल पुरोहित वसिष्ठ के आशीर्वाद से राजा सुदास और सौदास ने अपने शत्रुओं पर विजय प्राप्त की। एक बार राजा सौदास ने महर्षि वसिष्ठ को नमस्कार करके पूछा कि हे पूज्यवर! इस संसार में अत्यंत पूज्यवान वस्तु क्या है?

इस पर महिर्ष वसिष्ठ ने कहा- ‘गाय।’

राजा सौदास के अनुरोध पर महर्षि वसिष्ठ ने गाय की महत्ता बताने के लिए एक उपदेश दिया जिसे ‘गवोपतिषत्’ कहते हैं। इस उपदेश के अनुसार प्रतिदिन गौ-पूजन करना, उसे भक्ति के साथ प्रणाम करना और गाय से प्राप्त दूध, दही एवं घी आदि को उपयोग में लाना अत्यंत लाभकारी बताया गया है।

एक बार राजा सौदास अरण्य में आखेट खेलने गया। वहाँ राजा सौदास ने दो भयंकर राक्षसों को देखा। उनमें से एक राक्षस को राजा सौदास ने मार दिया किंतु दूसरा राक्षस भयभीत होकर अदृश्य हो गया तथा उसने राजा सौदास को फिर कभी मारने का निश्चय किया। राजा सौदास भी अरण्य से अपनी राजधानी अयोध्या लौट आया।

कुछ सयम पश्चात् कुलगुरु महर्षि वसिष्ठ की आज्ञा से राजा सौदास ने एक यज्ञ आरम्भ किया। यज्ञ पूर्ण होने के बाद राजा एवं रानी ने गुरु वसिष्ठ सहित समस्त ब्राह्मणों को भोजन करवाया। जिस मायावी राक्षस ने राजा सौदास को फिर कभी मारने का निश्चय किया था। उसे इस यज्ञ के बारे में ज्ञात हो गया और वह अपने साथी दैत्य की मृत्यु का बदला लेने के लिए वेश बदल कर राजा सौदास के महल में आया।

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उस दैत्य ने अवसर पाकर महर्षि वसिष्ठ के भोजन में नरमांस मिला दिया। रानी दमयंती ने अत्यंत श्रद्धा से वह भोजन कुलगुरु महर्षि वसिष्ठ को परोसा।

जब महर्षि वसिष्ठ ने अपने सामने नरमांस परोसा हुआ देखा तो उन्होंने राजा को श्राप दिया- ‘हे सौदास! तूने मुझे खाने के लिए नरमांस दिया है, इसलिए तू राक्षस हो जा और यही भोजन कर।’

इस पर राजा सौदास कुलगुरु वसिष्ठ पर क्रुद्ध हुआ और बोला- ‘आपने बिना सोचे-समझे हमें निरपराधी होते हुए भी इतना भयानक श्राप दिया है, अतः मैं भी आपको श्राप दूंगा।’

राजा ने कुलगुरु को श्राप देने के लिए अपने हाथ में जल लिया तो रानी मदयंती राजा के पैरों में गिर पड़ी और प्रार्थना करने लगी- ‘कुलगुरु को श्राप देना उचित नहीं है।’

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इस पर राजा सौदास ने अपने हाथ का जल अपने पैरों पर गिरा दिया। इस जल के स्पर्श से राजा सौदास के पैर काले हो गए तथा तभी से राजा को कल्मषपाद कहा जाने लगा। शाप के प्रभाव से राजा उसी क्षण राक्षस बन गया। उसी समय वसिष्ठजी को राक्षस द्वारा भोजन में नरमांस मिलाए जाने की बात ज्ञात हुई और उन्होंने कल्मषपाद राक्षस बने राजा सौदास से कहा- ‘मेरे शाप का प्रभाव बारह वर्ष तक रहेगा। जब आप श्राप के प्रभाव से मुक्त हो जाएंगे, तब आपको श्रापकाल की घटनाएं स्मरण नहीं रहेंगी।’ राक्षस कल्पषपाद अपनी राजधानी छोड़कर जंगलों में चला गया और प्राणियों को मार कर खाने लगा। एक बार कल्पषपाद अरण्य में एक संकरे पथ पर जा रहा था। उसी संकरे पथ पर सामने से महर्षि वसिष्ठ का पुत्र शक्ति आ रहा था। इस बात पर दोनों में बहस छिड़ गई कि कौन किसके लिए मार्ग छोड़ेगा! महर्षि वसिष्ठ का पुत्र शक्ति ऋषि वेश में था, इसलिए वह चाहता था कि राजा अपने गुरुपुत्र के सम्मान में मार्ग छोड़े। जबकि राजा चाहता था कि ऋषिपुत्र एक चक्रवर्ती सम्राट के लिए मार्ग छोड़े। जब गुरुपुत्र ने राजा के लिए मार्ग नहीं छोड़ा तो कल्मषपाद गुरुपुत्र को रस्सी से मारने लगा।

संयोगवश महर्षि विश्वामित्र भी वहाँ आ निकले। उन्होंने एक वृक्ष के पीछे खड़े होकर यह समस्त दृश्य देखा। उन्होंने अपने प्रतिद्वंद्वी महर्षि वसिष्ठ के पुत्र शक्ति को संत्रास देने के लिए किंकर नामक एक राक्षस की सृष्टि की तथा उसे राजा कल्पषपाद के शरीर में प्रवेश करा दिया। इस कारण कल्मषपाद ने और भी भयंकर रूप धारण कर लिया। शक्ति भयभीत होकर वहाँ से चला गया।

एक बार राक्षस कल्मषपाद ने एक ब्राह्मण युगल को रति के क्षणों में देखा। कल्मषपाद ने ब्राह्मण को मार दिया। इस पर ब्राह्मण-पत्नी ने दुःखी होकर कहा- ‘तू जब भी अपनी पत्नी के पास जाएगा, तू भी इसी तरह मर जाएगा, जिस तरह तूने आज मेरे पति को मारा है।’

एक बार राक्षस कल्मषपाद अरण्य में घूमता हुआ ऋषि वसिष्ठ के आश्रम में जा पहुंचा। वहाँ उसने वसिष्ठ के पुत्रों को यज्ञ करते हुए देखा तो कल्मषपाद वसिष्ठ के पुत्रों को खा गया। महर्षि वसिष्ठ ने अपने पुत्रों के शोक में अपने शरीर का अंत करने का निश्चय किया तथा उन्होंने पर्वत से गिरकर, समुद्र में डूबकर, अग्नि में जलकर देहत्याग करने का निश्चय किया किंतु देवताओं ने उन्हें मरने नहीं दिया।

इस पर महर्षि वसिष्ठ अपना शरीर लताओं से बांधकर एक तेज प्रवाहयुक्त नदी में कूद गए। यहाँ भी देवताओं ने उन्हें लताओं के पाश से मुक्त कर दिया। ऋषि बच गए तथा उसी दिन से उस नदी का नाम ‘विपाशा’ हो गया जिसे अब हम ‘व्यास’ नदी कहते हैं।

जब महर्षि विपाशा में जीवित बच बए तो उन्होंने एक अन्य नदी में कूदकर प्राण त्यागने का निश्चय किया। जैसे ही ऋषि वसिष्ठ ने नदी में प्रवेश किया, नदी सौ धाराओं में बंट गई और महर्षि स्वतः उससे बाहर निकल गए। उस दिन से उस नदी का नाम ‘शतुद्रि’ हो गया जिसे अब हम ‘सतलुज’ के नाम से जानते हैं।

एक बार महर्षि वसिष्ठ अपनी पुत्रवधु अदृश्यंति के साथ अरण्य में काष्ठ एकत्रित कर रहे थे। तब महर्षि को क्षीण स्वर में वेदमंत्र सुनाई दिए। इस पर महर्षि ने अपनी पुत्रवधु से पूछा- ‘ये वेदमंत्र कौन बोल रहा है।’

इस पर अदृश्यंति ने कहा- ‘विगत 12 वर्षों से मेरे गर्भ में आपके पुत्र शक्ति का पुत्र वेदघोष कर रहा है।’

जब महर्षि को ज्ञात हुआ कि मेरे कुल का सम्पूर्ण विनाश नहीं हुआ है तो महर्षि ने देह-त्याग करने का निश्चय छोड़ दिया। कुछ समय पश्चात् अदृश्यंति के गर्भ से पराशर ऋषि ने जन्म लिया। पराशर का शब्दिक अर्थ होता है- ‘प्राण बचाने वाला।’ चूंकि उन्होंने अपने पितामह वसिष्ठ के प्राण बचाए थे, इसलिए वे पराशर कहलाए।

इस तरह लगभग 12 वर्ष होने को आए। एक दिन राक्षस कल्मषपाद ने महर्षि वसिष्ठ को अरण्य में संचरण करते हुए देखा। वह महर्षि को खा जाने के लिए उन पर झपटा। महर्षि ने दया करके उसे शाप-मुक्त कर दिया। राजा सौदास शापमुक्त होकर अपने स्वरूप में स्थित हुआ तथा पुनः अपनी राजधानी अयोध्या में लौट आया।

जब राजा सौदास को राज्य करते हुए बहुत दिन बीत गए तो उसे चिंता हुई कि उसका कोई पुत्र नहीं है। ब्राह्मणी के शाप के कारण राजा अपनी रानी से पुत्र उत्पन्न नहीं कर सकता था। श्रीमद्भागवत महापुराण के अनुसार जब लम्बे समय तक राजा सौदास को पुत्र की प्राप्ति नहीं हुई तो महर्षि वसिष्ठ ने राजा सौदास के अनुराध पर रानी मदयंती को मंत्रों के बल पर गर्भाधान कराया।

इससे रानी मदयंती गर्भवती हो गई किंतु सात वर्ष तक बालक गर्भ से बाहर नहीं आया। इस पर वसिष्ठ ने रानी के गर्भ पर ‘अश्म’ अर्थात् पत्थर से प्रहार किया जिससे रानी ने एक पुत्र को जन्म दिया। उस बालक का नाम ‘अश्मक’ हुआ। उसे वीरसह अथवा मित्रसह भी कहते थे। राजा सौदास के बाद यही अश्मक अयोध्या का राजा हुआ।

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