Friday, March 1, 2024
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12. राजा सगर ने यवनों के सिर मूंड कर उन्हें धर्म से वंचित कर दिया।

ईक्ष्वाकु वंशी राजाओं में राजा बाहुक का नाम बहुत प्रसिद्ध है। वे राजा हरिश्चंद्र के बाद की लगभग सातवीं पीढ़ी के राजा हैं। चूंकि अलग अलग पुराणों, वाल्मीकि रामायण एवं महाभारत में सगर के पिता का नाम अलग-अलग दिया हुआ है, इसलिए यह निश्चित कर पाना संभव नहीं है कि राजा बाहुक हरिश्चंद्र की पीढ़ी में कौनसा था।

हरिवंश पुराण के अनुसार राजा सगर के पिता का नाम बाहुक था। वह आखेट एवं द्यूतक्रीड़ा का अत्यंत शौकीन था। इसलिए हैहय, तालजंघ, तथा शक राजाओं ने बाहुक के राज्य पर आक्रमण करके उसके राज्य को नष्ट कर दिया। यवन, पारद काम्बोज, खस और पह्लव नामक पांच गणों ने भी इस कार्य में हैहय एवं तालजंघों का साथ दिया था।

इस पर राजा बाहुक दुखी होकर वन में चला गया और उसने वहीं अपने प्राण त्याग दिए। इस पर राजा बाहुक की यदुवंशी रानी भी सती होने लगी। रानी उस समय गर्भवती थी इसलिए वन में रहने वाले भृगुवंशी ऋषि और्व ने रानी के प्राणों की रक्षा की। रानी को उसकी सौत ने विष दे दिया था जिससे रानी के गर्भ में बालक के साथ विष भी था। और्व ऋषि ने रानी के गर्भ में स्थित बालक और विष दोनों को निकाल दिया। यही बालक आगे चलकर सगर कहलाया। संस्कृत में विष को गर भी कहते हैं चूंकि यह बालक गर के साथ उत्पन्न हुआ था इसलिए इसे सगर कहा गया।

कुछ पुराणों के अनुसार सगर के पिता का नाम असित था। राजा असित अत्यंत पराक्रमी था। हैहय, तालजंघ, शूर और शशबिन्दु नामक राजा उनके शत्रु थे। राजा असित को उनसे युद्ध करते-करते अपना राज्य त्यागकर अपनी दो रानियों  के साथ हिमालय चले जाना पड़ा। वहाँ कुछ काल बाद राजा असित की मृत्यु हो गयी। उस समय उसकी दोनों रानियां गर्भवती थीं। उनमें से एक का नाम कालिंदी था। कालिंदी की संतान को नष्ट करने के लिए उसकी सौत ने उसको विष दे दिया। कालिंदी अपनी संतान की रक्षा के निमित्त भृगुवंशी महर्षि च्यवन के पास गयी। महर्षि ने उसे आश्वासन दिया कि उसकी कोख से एक प्रतापी बालक विष के साथ जन्म लेगा। अतः उसके पुत्र का नाम सगर पड़ा।

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भृगुवंशी ऋर्षि और्व ने बालक सगर के जातकर्म संस्कार किए तथा उन्हें वेद एवं शास्त्र पढ़ाए। ऋर्षि और्व ने सगर को अस्त्र-शस्त्र एवं युद्ध-नीति की भी शिक्षा दी तथा देवताओं के लिए दुर्लभ महाघोर आग्नेय अस्त्र प्रदान किया। जब बालक सगर बड़ा हुआ तो उसने क्रोध में भरकर हैहयों का संहार कर डाला। इसके बाद उसने यवन, शक, काम्बोज, पारद और पह्लवों को भी निःशेष कर दिया तथा अपने पिता के खोए हुए राज्य एवं इक्ष्वाकुओं की प्राचीन राजधानी अयोध्या पर भी अधिकार कर लिया। जब राजा सगर ने यवन, शक, काम्बोज, पारद और पह्लवों का मूल नाश करने का निश्चय किया तो ये समस्त राजा भागकर महर्षि वसिष्ठ के चरणों में जा गिरे। महर्षि वसिष्ठ इक्ष्वाकुओं के कुलगुरु थे। उन्होंने राजा सगर से कहकर इन राजाओं को मारने से रोक दिया।

राजा सगर ने गुरु की आज्ञा का सम्मान करते हुए यवन, शक, काम्बोज, पारद और पह्लवों का संहार तो नहीं किया किंतु उनके धर्म को नष्ट कर दिया तथा उनका वेश बदल दिया। उन्होंने शकों के आधे सिर को मूंडकर छोड़ दिया। यवनों के सारे सिर को मूंड दिया और काम्बोजों को भी सिर मूंडकर उन्हें जीवित ही छोड़ दिया। राजा सगर ने पारदों के सिर को मुक्तकेश अर्थात् खुले बालों वाला बना दिया और पह्लवों को श्मश्रुधारी अर्थात् बड़ी-बड़ी दाढ़ी-मूंछ वाला बना दिया। राजा सगर ने इन सब जातियों को धर्म से वंचित करके उनके द्वारा किए जाने वाले धर्मग्रंथों के अध्ययन पर रोक लगा दी।

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हरिवंश पुराण के अनुसार शक, यवन, काम्बोज, पादर, कोलिसर्प महिष, दर्द, चोल और केरल आदि क्षत्रिय ही थे। महर्षि वसिष्ठ के वचन पर राजा सगर ने इन सबका संहार नहीं करके उनके धर्म को नष्ट कर दिया। उस धर्म विजयी राजा ने अश्वमेध की दीक्षा लेकर खस, तुषार, चोल, मद्र, किष्किन्धक, कौन्तल, वंग, साल्व तथा कोंकण देश के राजाओं को जीता।

सगर अयोध्या नगरी का राजा हुआ। उसकी बड़ी रानी विदर्भ नरेश की पुत्री केशिनी थी और छोटी रानी का नाम सुमति था। महाभारत के अनुसार सगर की रानियों के नाम वैदर्भी एवं शैव्या थे। उन दोनों को अपने रूप तथा यौवन का बहुत अभिमान था। जब दीर्घकाल तक दोनों रानियों के कोई पुत्र नहीं हुआ तो राजा सगर ने दोनों रानियों के साथ हिमालय के प्रस्रवण गिरि पर तप किया। बड़ी रानी ने एक पुत्र की और छोटी रानी ने साठ हजार पुत्रों की कामना की।

राजा एवं रानियों की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने राजा सगर को वरदान दिया कि उसकी एक रानी को राजा सगर का वंश चलाने वाले एक पुत्र की प्राप्ति होगी और दूसरी रानी के गर्भ से साठ हजार वीर एवं उत्साही पुत्र जन्म लेंगे। कुछ समय पश्चात् रानी केशिनी के गर्भ से असमंजस नामक एक पुत्र उत्पन्न हुआ और रानी सुमति के गर्भ से एक तूंबा निकला। राजा ने इस तूंबे को फैंकने की आज्ञा दी ंिकंतु उसी समय आकाशवाणी हुई कि इस तूम्बे में साठ हजार बीज हैं। इन बीजों को घी में रखो, जिनसे समय आने पर साठ हजार राजकुमारों का जन्म होगा। राजा ने ऐसा ही किया।

बड़ी रानी का पुत्र असमंजस बहुत दुष्ट प्रकृति का था। वह पुरवासियों के दुर्बल बच्चों को गर्दन से पकड़कर मार डालता था। एक बार उसने अयोध्या नगरी के बच्चों को एकत्रित करके सरयू नदी में डाल दिया। अतः राजा सगर ने राजकुमार असमंजस का परित्याग कर दिया। इस पर असमंजस ने राजा से कहा- ‘मैंने पूर्वजन्म में मिले किसी श्राप के वशीभूत होकर ऐसा किया है। मैं अपने योगबल से अयोध्या के समस्त बच्चों को फिर से जीवित कर दूंगा।’

राजकुमार असमंजस ने समस्त बच्चों को अपने योगबल से पुनर्जीवित कर दिया तथा स्वयं तपस्या करने के लिए वन में चला गया। राजकुमार असमंजस को अयोध्या छोड़कर जाते देखकर अयोध्यावासियों को बहुत पश्चात्ताप हुआ। कालांतर में राजकुमार असमंजस के एक पुत्र हुआ जिसका नाम अंशुमान था। वह वीर, मधुरभाषी और पराक्रमी था। वह अपने पिता को छोड़कर अपने पुरखों की राजधानी अयोध्या लौट आया। दूसरी रानी के गर्भ से उत्पन्न तूंबे से समय आने पर साठ हजार पुत्रों ने जन्म लिया।  महाभारत के अनुसार राजा सगर को साठ हजार उद्धत पुत्रों की प्राप्ति हुई। वे क्रूरकर्मी बालक आकाश में भी विचरण कर सकते थे तथा प्रजा को बहुत तंग करते थे।                       

Dr. Mohanlal Gupta
Dr. Mohanlal Gupta
Dr. Mohan Lal Gupta is a renowned historian from India. He has written more than 100 books on various subjects.

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