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मलिक छज्जू के साथ हो गए बागी हिन्दू (82)

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मलिक छज्जू - www.bharatkaitihas.com
मलिक छज्जू के साथ हो गए बागी हिन्दू

बलबन के भतीजे मलिक छज्जू ने बगावत का झण्डा उठाया जो कि कड़ा-मानिकपुर का गवर्नर बनाया गया था। मलिक छज्जू ने भरे दरबार में सुल्तान की अधीनता स्वीकार की थी और तभी से राजभक्ति प्रदर्शित कर रहा था किंतु असन्तुष्ट तुर्क सरदारों ने उसे विद्रोह करने के लिए उकसाया।

तुर्की सरदार सत्ता के इतने भूखे थे कि वे सत्ता प्राप्त करने के लिए अपने किसी भी स्वामी के साथ गद्दारी कर सकते थे! लकुवाग्रस्त सुल्तान कैकूबाद तथा शिशु सुल्तान क्यूमर्स की निर्मम हत्याएं करके 13 जून 1290 को मलिक फीरोज खिलजी ‘जलालुद्दीन फीरोजशाह खिलजी’ के नाम से दिल्ली के तख्त पर बैठ गया। उस समय उसकी आयु 70 वर्ष थी।

तुर्की अमीरों के उत्पात से बचने के लिए उसने दिल्ली के लालकोट में अपनी ताजपोशी नहीं करवाई जिसमें बलबन रहा करता था। जलालुद्दीन खिलजी दिल्ली के बाहर कीलूगढ़ी अथवा किलोखरी नामक दुर्ग में तख्त पर बैठा और उसी को अपनी राजधानी बना लिया। यहाँ उसने कैकुबाद के समय से निर्माणाधीन चल रहे महल को पूर्ण करवाया और उसी में रहने लगा।

सुल्तान बनने के बाद जलालुद्दीन ने दिल्ली के उन अमीरों का विश्वास जीतने का प्रयास किया जिन्होंने खिलजियों का विरोध नहीं किया था। उसने शासकीय पदों पर खिलजियों के साथ-साथ अन्य मुसलमानों को भी नियुक्त किया। उसने फखरुद्दीन को उसके पद पर अर्थात् दिल्ली का कोतवाल बने रहने दिया। सुल्तान जलालुद्दीन खिजली ने बलबन के भतीजे मलिक छज्जू को कड़ा-मानिकपुर का हाकिम बना दिया जो अपने कुल में अकेला ही जीवित बचा था। इससे सुल्तान जलालुद्दीन बहुत से तुर्की अमीरों का विश्वासपात्र बन गया।

सुल्तान जलालुद्दीन ने अपने पुत्रों एवं भाइयों को उच्च पदों पर नियुक्त किया। उसने सबसे बड़े पुत्र महमूद को खानखाना, दूसरे पुत्र को अर्कली खाँ की तथा तीसरे पुत्र को कद्र खाँ की उपाधियाँ दीं तथा अपने छोटे भाई को यग्रास खाँ की उपाधि देकर ‘आरिजे मुमालिक’ अर्थात् सैनिक मंत्री बना दिया। सुल्तान जलालुद्दीन ने अपने भतीजों अल्लाउद्दीन तथा असलम बेग को भी उच्च पद दिए तथा अपने एक निकट सम्बन्धी मलिक अहमद चप को ‘अमीरे हाजिब’ के पद नियुक्त किया।

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जब जलालुद्दीन खिलजी को सुल्तान बने हुए एक साल हो गया तो दिल्ली के कोतवाल फखरूद्दीन ने दिल्ली के सैंकड़ों नागरिकों के साथ सुल्तान के समक्ष उपस्थित होकर उसे किलोखरी से दिल्ली आने के लिए आमन्त्रित किया। सुल्तान ने उन लोगों के निमन्त्रण को स्वीकार कर लिया और वह अपने परिवार तथा मंत्रियों सहित दिल्ली आ गया।

जब जलालुद्दीन खिलजी दिल्ली में लालकोट के सामने पहुंचा तो पूर्ववर्ती सुल्तानों के सम्मान में अपने घोड़े से उतर पड़ा तथा उसने उस तख्त पर बैठने से मना कर दिया जिस पर कभी कुतुबुद्दीन ऐबक, इल्तुतमिश तथा बलबन जैसे महान सुल्तान बैठा करते थे। जलालुद्दीन खिलजी ने रोते हुए कहा कि वह इस सिंहासन पर नहीं बैठेगा जिसके सामने वह कई बार साधारण अमीर की हैसियत से खड़ा हुआ था।

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जलालुद्दीन खिलजी के सुल्तान बनने के बाद उन तुर्की अमीरों में विद्रोह की सुगबुगाहट आरम्भ हुई जो उच्च पदों पर पहुंचने के आकांक्षी थे। सबसे पहले बलबन के भतीजे मलिक छज्जू ने बगावत का झण्डा उठाया जो कि कड़ा-मानिकपुर का गवर्नर बनाया गया था। मलिक छज्जू ने भरे दरबार में सुल्तान की अधीनता स्वीकार की थी और तभी से राजभक्ति प्रदर्शित कर रहा था किंतु असन्तुष्ट तुर्क सरदारों ने उसे विद्रोह करने के लिए उकसाया। दूसरी ओर अनेक युवा खिलजी भी सुल्तान की इस नीति से अंसतुष्ट थे कि सुल्तान अन्य मुसलमानों को भी शासन में ऊँचे पद दे रहा था। इसलिए वे भी सुल्तान के प्रति विद्रोह की भावना रखते थे। इन परिस्थितियों में मलिक छज्जू ने विद्रोह का झंडा खड़ा करके स्वयं को स्वतन्त्र सुल्तान घोषित कर दिया। उसने कड़ा-मानिकपुर में अपना राज्याभिषेक करवाया तथा अपने नाम की मुद्राएं अंकित करवाईं। उसने ‘मुगीसुद्दीन’ की उपाधि धारण करके अपने नाम में खुतबा पढ़वाया। इसके बाद अपने पूर्वज बलबन का सिहांसन प्राप्त करने के लिए एक विशाल सेना के साथ दिल्ली की ओर कूच कर दिया। जियाउद्दीन बरनी ने लिखा है कि इस अवसर पर आसपास के हिन्दू रावत एवं जमींदार चींटियों और टिड्डियों की तरह मलिक छज्जू के साथ एकत्रित हो गए।

प्रसिद्ध रावतों एवं पायकों ने पान का बीड़ा लेकर संकल्प लिया कि वे सुल्तान जलालुद्दीन के छत्र पर अधिकार जमा लेंगे। पीरमदेव कोतला नामक एक प्रसिद्ध हिन्दू रावत इनमें प्रमुख था। इतिहास की पुस्तकों में उसे भीमदेव भी लिखा गया है।

जब जलालुद्दीन खिलजी को मलिक छज्जू के विद्रोह की सूचना मिली तब उसने अपने बड़े पुत्र खानाखाना को दिल्ली की सुरक्षा पर नियुक्त करके स्वयं एक विशाल सेना लेकर मलिक छज्जू का सामना करने के लिए रवाना हुआ।

सुल्तान जलालुद्दीन खिलजी ने अपने दूसरे पुत्र अर्कली खाँ को अपनी सेना के हरावल में नियुक्त किया तथा स्वयं मुख्य सेना के साथ रहा। जब तक अर्कली खाँ अपने हरावल के साथ काली नदी पार करता, तब तक मलिक छज्जू काली नदी के उस पार आकर अपना डेरा जमा चुका था।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

जलालुद्दीन खिलजी की नीति (83)

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जलालुद्दीन खिलजी की नीति

हालांकि जलालुद्दीन खिलजी दो मुसलमान बादशाहों की हत्या करके दिल्ली सल्तनत के तख्त पर बैठा था किंतु सुल्तान बन जाने के बाद जलालुद्दीन खिलजी की नीति हिन्दुओं के साथ कठोरतम व्यवहार करने की और मुसलमानों के साथ उदारता बरतने की बन गई।

सुल्तान जलालुद्दीन खिलजी ने तुर्की अमीरों को अपने पक्ष में करने के लिए उन्हें बड़े-बड़े पद दिए। इस कारण कुछ तुर्की अमीर तो सुल्तान को पसंद करने लगे किंतु कई तुर्की अमीरों तथा युवा खिलजियों ने 70 साल के बूढ़े जलालुद्दीन को पसंद नहीं किया और वे बगावत की योजना बनाने लगे।

सबसे पहले बलबन के भतीजे मलिक छज्जू ने बगावत का झण्डा बुलंद किया जिसे कड़ा-मानिकपुर का गवर्नर बनाया गया था। हजारों हिन्दू सैनिक, रावत एवं पायक भी छज्जू के साथ एकत्रित हो गए। इस पर सुल्तान जलालुद्दीन ने अपनी राजधानी दिल्ली को बड़े पुत्र खानखाना महमूद की सुरक्षा में छोड़ा तथा अपने छोटे पुत्र अर्कली खाँ को साथ लेकर मलिक छज्जू का दमन करने के लिए चला।

जब तक सुल्तान के पुत्र अर्कली खाँ ने सेना के अग्रिम भाग सहित काली नदी पार की तब तक मलिक छज्जू एवं विद्रोही हिन्दुओं की सेना काली नदी के उस पार आकर अपने डेरे गाढ़ चुकी थी। इसलिए मलिक छज्जू ने तुरंत ही विद्रोहियों की सेना पर हमला बोल दिया।

जियाउद्दीन बरनी ने लिखा है कि काली नदी पार करते ही अर्कली खाँ मलिक छज्जू की सेना पर टूट पड़ा तथा एक ही प्रयास में उसने छज्जू को परास्त करके दूर भाग जाने पर विवश कर दिया। जबकि अमीर खुसरो ने लिखा है कि दोनों पक्षों में कई दिनों तक सुबह से शाम तक संघर्ष होता रहा। अंत में मलिक छज्जू की सेना के कई सरदार थककर समर्पण करने को तैयार हो गए। जब मलिक छज्जू को अपने साथियों के इस विचार की जानकारी हुई तो वह रात के अंधेरे में अपना शिविर छोड़कर भाग गया।

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यहिया नामक एक मुस्लिम लेखक ने लिखा है कि रहब नदी के किनारे दोनों पक्षों में कई दिन और कई रात युद्ध हुआ। इसी बीच पीरमदेव कोतला के कुछ साथियों ने मलिक छज्जू के समक्ष उपस्थित होकर उसे बताया कि वह केवल अर्कली खाँ की सेना को ही वास्तविक शत्रु न समझे, सुल्तान जलालुद्दीन खिलजी स्वयं भी अपनी विशाल सेना लेकर काली नदी के उस पार आ गया है तथा नदी पार करने की तैयारी कर रहा है। यह समाचार सुनकर मलिक छज्जू रात्रि में ही शिविर छोड़कर भाग गया। अगले दिन पीरमदेव कोतला तथा उसके साथी हिन्दू रावतों एवं पायकों ने मोर्चा संभाला।

इस समय तक अर्कली खाँ की सेना काफी बड़ी हो चुकी थी और उसने पीरमदेव कोतला को युद्ध के मैदान में ही मार डाला। इसके बाद अर्कली खाँ ने अपनी सेना को आदेश दिया कि वह भगोड़े छज्जू का पीछा करे। मलिक छज्जू ने पास के एक ‘मवास’ में शरण लेने का विचार किया किंतु वहाँ के मुकद्दम ने मलिक छज्जू को पकड़कर सुल्तान जलालुद्दीन के पास भेज दिया। इस पर भी अर्कली खाँ अपने काम में लगा रहा तथा उसकी सेना ने मलिक छज्जू के सैंकड़ों साथियों को आसपास के जंगलों से पकड़ लिया।

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मलिक छज्जू तथा उसके साथियों को रस्सियों से बांधकर सुल्तान जलालुद्दीन के समक्ष उपस्थित किया गया। एक उच्च वंशी तुर्क को रस्सियों में बंधे हुए देखकर सुल्तान जलालुद्दीन खिलजी की आँखों में दुःख के आंसू उमड़ आए। सुल्तान ने विद्रोही मलिक छज्जू तथा उसके साथियों को बन्धन-मुक्त करके उनके वस्त्र बदलवाए तथा उन्हें मदिरा-पान करवाया और उनके स्वागत-सम्मान में सुंदर स्त्रियों के नृत्य का आयोजन करवाया। सुल्तान ने मलिक छज्जू के साथियों की इस बात के लिए प्रशंसा की वे अपने पुराने स्वामियों के वंशजों के प्रति निष्ठावान थे। सुल्तान ने छज्जू एवं उसके साथियों को भविष्य में विद्रोह न करने का उपदेश देकर उन्हें क्षमा कर दिया तथा उन्हें कोई सजा नहीं दी। सुल्तान के इस व्यवहार से मलिक छज्जू तथा उसके साथी तो बहुत प्रसन्न हुए किंतु तुर्की एवं अफगानी अमीरों के क्रोध का पार न रहा। उन्होंने अपने प्राणों पर खेलकर विद्रोहियों को पकड़ा था। सुल्तान का रिश्तेदार मलिक अहमद चप एक नौजवान अमीर था जिसे सुल्तान ने अमीरे हाजिब के पद नियुक्त किया था। वह सुल्तान की इस मूर्खता को सहन नहीं कर सका और उसने भरे दरबार में सुल्तान की भर्त्सना करते हुए कहा कि ऐसे कामों से विद्रोहियों को प्रोत्साहन मिलता है। इस पर सुल्तान ने कहा कि मैं क्षण-भंगुर राज्य के लिए एक भी मुसलमान का कत्ल करना पसंद नहीं करता।

एक ओर तो सुल्तान जलालुद्दीन खिलजी ने मलिक छज्जू के साथ अतिथियों जैसा व्यवहार किया किंतु दूसरी ओर उसके हिन्दू साथियों को हाथियों के पैरों तले कुचलवा कर मरवा दिया। जलालुद्दीन खिलजी ने आसपास के मैदानों को कटवाकर साफ कर दिया ताकि विद्रोही हिन्दुओं को पकड़कर मारा जा सके। जिन हिन्दू राजाओं ने अब तक कर नहीं दिया था, उन्हें भी पकड़कर बुलाया गया तथा कठोर दण्ड दिया गया।

सुल्तान ने अपने पुत्र अर्कली खाँ को मुल्तान का गवर्नर नियुक्त किया तथा अपने भतीजे अल्लाउद्दीन खिलजी को कड़ा-मानिकपुर का गवर्नर बना दिया जो कि सुल्तान का दामाद भी था। सुल्तान के निर्देश पर मलिक छज्जू को नजरबन्द करके शाही सुख-सुविधाओं के बीच दिल्ली में ही रखा गया और उस पर कड़ा पहरा बैठा दिया गया जबकि अन्य प्रमुख मुस्लिम विद्रोहियों को दिल्ली से बाहर स्थानांतरित कर दिया गया।

बलबन अपने विरोधियों को एक जैसी सजा देता था चाहे वे हिन्दू हों या मुसलमान जबकि सुल्तान जलालुद्दीन खिलजी ने सल्तनत की नीति में बड़ा परिवर्तन करते हुए मुसलमानों के साथ उदारता एवं हिन्दुओं के साथ कठोरता की नीति अपनाई। संभवतः इस नीति के पीछे जलालुद्दीन खिलजी का यह चिंतन काम कर रहा था कि भविष्य में हिन्दू तथा मुसलमान मिलकर बगावत नहीं कर सकें।

एक ओर तो जलालुद्दीन खिलजी इस नीति पर चल रहा था कि वह हिन्दुओं और मुसलमानों को एकत्रित हाने से रोक सके तथा दूसरी ओर वह इस नीति को अपना रहा था कि किसी भी हालत में सुल्तान का तुर्की अमीरों से सीधा टकराव न हो जाए।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

सीदी मौला भारत का खलीफा बनना चाहता था (84)

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सीदी मौला भारत का खलीफा बनना चाहता था

सीदी मौला अजुद्धान अर्थात् पाकपटन के ‘शेख फरीदुद्दीन गजेशंकर’ का शिष्य था। सीदी मौला के गुरु ने उसे राजनीति से दूर रहने का उपदेश दिया था परन्तु दिल्ली आने पर सीदी मौला की रुचि राजनीति में हो गई।

दिल्ली के सुल्तान जलालुद्दीन खिलजी ने पूर्व सुल्तान बलबन के भतीजे मलिक छज्जू का सफलता पूर्वक दमन करके उसे क्षमा कर दिया तथा उसके हिन्दू साथियों को हाथियों के पैरों के नीचे कुचलवाकर मरवा दिया।

उन दिनों दिल्ली में सीदी मौला नामक एक दरवेश का बड़ा बोलबाला था। कुछ इतिहासकारों के अनुसार वह मूलतः फारस से आया हुआ एक दरवेश था जो ई.1291 में अर्थात् जलालुद्दीन खिलजी के सुल्तान बनने के कुछ समय बाद दिल्ली चला आया और दिल्ली में ही स्थायी रूप से निवास कर रहा था।

कुछ इतिहासकारों ने लिखा है कि सीदी मौला अजुद्धान अर्थात् पाकपटन के ‘शेख फरीदुद्दीन गजेशंकर’ का शिष्य था। सीदी मौला के गुरु ने उसे राजनीति से दूर रहने का उपदेश दिया था परन्तु दिल्ली आने पर उसकी रुचि राजनीति में हो गई। इस रुचि का एक विशेष कारण था।

सीदी ने दिल्ली की गलियों में लोगों को यह कहते हुए सुना कि भारत में सुल्तान बनना इतना आसान है कि गजनी का कोई भी गुलाम भारत आकर सुल्तान बन जाता है। मौला को बताया गया कि जो कोई भी व्यक्ति सुल्तान का कत्ल कर देता है, वही दिल्ली का अगला सुल्तान बन जाता है। स्वयं जलालुद्दीन खिलजी भी पुराने सुल्तानों का कत्ल करके सुल्तान बना है और अगला सुल्तान भी ऐसे ही बनेगा।

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सीदी मौला ने भारत को अपने लिए अवसरों के खजाने के रूप में देखा तथा उसने न केवल भारत का सुल्तान बनने अपितु खलीफा बनने का स्वप्न भी देख डाला। उसने दिल्ली की मुस्लिम जनता को इस्लाम के उपदेशों के साथ-साथ जन्नत की हूरों से लेकर बगदाद और फारस की हसीनाओं की ऐसी-ऐसी रोचक कथाएं सुनाईं कि दिल्ली के हजारों युवक उसके शिष्य बन गए।

जब सीदी मौला की प्रसिद्धि बढ़ने लगी तो दिल्ली सल्तनत के बड़े-बड़े अमीर भी उसके यहाँ आकर उपस्थिति देने लगे। यहाँ तक कि कुछ अमीरों ने मरहूम सुल्तान नासिरुद्दीन की एक पुत्री का विवाह सीदी मौला से करवा दिया।

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कहा जाता है कि सीदी मौला ने दिल्ली में अजोद पर एक खानकाह बनवाई थी जिसमें चारों दिशाओं से लोग आते थे तथा हजारों व्यक्तियों को प्रतिदिन निःशुल्क भोजन मिलता था। डॉ. बरनी ने लिखा है कि वह स्वयं बहुत कम भोजन करता था किंतु उसकी रसोई में प्रतिदिन दो हजार मन आटा, दो हजार किलो मांस, और दो हजार किलो घी खर्च होता था। दिल्ली की जनता में सीदी मौला के आय के साधनों के बारे में तरह-तरह की बातें होती थीं। वह लोगों को विचित्र रूप से धन देता था। बरनी का कहना है कि वह धन अधिक चमकीला होता था। कुछ लोग उसे रहस्यमय शक्तियों का स्वामी समझते थे तो कुछ लोग उसे डाकुओं तथा लुटेरों का सरदार मानते थे। जब दिल्ली में मौला के चाहने वालों की संख्या बढ़ गई तो सीदी ने राजनीतिक शक्ति प्राप्त करने के लिए षड्यन्त्र रचना आरम्भ किया। उसने अपने अनुयाइयों के साथ मिलकर यह तय किया कि शुक्रवार की नमाज के बाद सुल्तान को खत्म कर दिया जाए तथा सीदी को खलीफा घोषित कर दिया जाये। सुल्तान जलालुद्दीन खिलजी को सीदी द्वारा रचे जा रहे षड्यन्त्र का पता लग गया। उसने सीदी को पकड़वा कर दरबार में बुलवाया।

जब सीदी को सुल्तान के सामने लाया गया तब सीदी ने किसी भी षड़यंत्र में शामिल होने की बात से इन्कार कर दिया तथा सुल्तान से विवाद करना आरम्भ कर दिया। इस पर जलालुद्दीन को क्रोध आ गया और वह चिल्लाकर बोला- ‘यहाँ कोई नहीं है जो इस दुष्ट को ठीक कर दे।’

इतना सुनते ही दरबार में खड़े एक व्यक्ति ने उसकी छाती में छुरा भोंक दिया। छुरा लगने पर भी उसके प्राण नहीं निकले।

इस पर शहजादे अर्कली खाँ ने सीदी मौला को हाथी के पैर के नीचे कुचलवा दिया। आशीर्वादी लाल श्रीवास्तव ने लिखा है कि एक धर्मान्ध मुसलमान ने मौला पर छुरे से कई बार काटा ओर एक सूजा उसके शरीर में भौंक दिया। अंत में उसके शरीर को हाथी के पैरों तले कुचलवाया गया।

यह व्यक्ति सीदी मौला के सम्प्रदाय का विरोधी था। कहा जाता है कि जिस दिन सीदी मौला को मारा गया, उस दिन दिल्ली में ऐसा भयानक तूफान आया कि दिन में ही रात हो गई। उसके बाद आगामी ऋतु में वर्षा न होने से भयानक अकाल पड़ गया। कुछ समय उपरान्त सुल्तान जलालुद्दीन खिलजी की भी नृशंसतापूर्वक हत्या कर दी गई।

आशीर्वादी लाल श्रीवास्तव ने लिखा है कि सीदी मौला की मृत्यु के बाद एक भयंकर आंधी आई तथा अनावृष्टि के कारण दुर्भिक्ष पड़ गया। लोगों ने समझा कि स्वर्गीय फकीर ने सुल्तान को शाप दिया है इसलिए ये सब दुर्घटनाएं हुईं। दुर्भिक्ष इतना भयंकर था कि अन्न का भाव एक जीतल प्रति सेर तक पहुंच गया और बड़ी संख्या में लोगों ने यमुनाजी में डूबकर प्राण त्याग दिए।

कहा नहीं जा सकता कि इन सब घटनाओं के पीछे किसी रहस्यमय शक्ति का हाथ था अथवा ये सब घटनाएं स्वतंत्र रूप से घटित हुई थीं और सीदी मौला के चेलों ने बड़ी चालाकी से इन घटनाओं का सम्बन्ध सीदी मौला की हत्या से जोड़ दिया था।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

रणथम्भौर दुर्ग नहीं जीत सका जलालुद्दीन खिलजी (85)

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रणथंभौर दुर्ग नहीं जीत सका जलालुद्दीन खिलजी

सुल्तान ने रणथम्भौर दुर्ग पर आक्रमण करने का निश्चय किया। रणथंभौर के शासक वीर हम्मीरदेव चौहान के सैनिक अपने दुर्ग की रक्षा के लिए दृढ़़-सकंल्प थे। राजपूतों की दृढ़़ता तथा दुर्ग की अभेद्यता से हताश होकर सुल्तान ने रणथम्भौर विजय का विचार त्याग दिया और घेरा उठाने के आदेश दिए।

जलालुद्दीन खिलजी ने बलबन के भतीजे मलिक छज्जू के विद्रोह का दमन करके उसे तथा उसके साथी मुस्लिम सैनिकों को तो क्षमा कर दिया था किंतु उसके साथ के हिंदू सैनिकों को जंगलों से पकड़कर उनकी निर्मम हत्या करवाई थी।

जलालुद्दीन खिलजी ने यह नीति आगे भी जारी रखी। कुछ समय बाद जलालुद्दीन की सेना ने उन डाकुओं को पकड़ा जो किसी समय हिन्दू थे तथा दिल्ली सल्तनत की सेना के सताए जाने के कारण मुसलमान हो गए थे। इन लोगों को न तो सेना में भर्ती किया गया था और न उनकी आर्थिक स्थिति में कोई सुधार आया था। इसलिए उनके कुछ समूह स्वयं संगठित होकर डकैती किया करते थे।

जब दिल्ली के निकटवर्ती जंगलों से इन समूहों के एक हजार डाकुओं को पकड़कर सुल्तान जलालुद्दीन खिलजी के समक्ष लाया गया तब सुल्तान ने उनके साथ भी उदारता का वैसा ही प्रदर्शन किया जो उसने मलिक छज्जू तथा उसके मुस्लिम विद्रोही साथियों के साथ किया था। सुल्तान ने उन्हें कठोर दण्ड देने के स्थान पर उन्हें चोरी की बुराइयों पर उपदेश दिया। सुल्तान ने उन्हें चेतावनी दी कि फिर कभी ऐसा निकृष्ट कार्य न करें और उन्हें नावों में बैठाकर बंगाल भेज दिया जहाँ उन्हें मुक्त कर दिया गया।

विद्रोहियों एवं अपराधियों के प्रति सुल्तान की इस उदार नीति की सर्वत्र आलोचना होने लगी तथा उसकी उदारता को उसकी दुुर्बलता समझा गया। तुर्की अमीर तो पहले से ही सुल्तान से असंतुष्ट थे, अब खिलजी अमीर भी उससे अप्रसन्न हो गए।

जलालुद्दीन खिलजी एक भी मुस्लिम सैनिक को मरते हुए नहीं देखना चाहता था। फिर भी उसने राजपूत राजाओं पर कुछ आक्रमण किए जिनमें उसे विशेष सफलता नहीं मिली। तत्कालीन मुस्लिम लेखकों द्वारा इस पराजय का कारण यह बताया जाता है कि सुल्तान अपने मुस्लिम सैनिकों के शव गिरते हुए नहीं देखना चाहता था।

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सुल्तान जलालुद्दीन का पहला आक्रमण ई.1291 में रणथम्भौर दुर्ग पर हुआ। सुल्तान ने स्वयं इस युद्ध का संचालन किया। उसने अपने पुत्र अर्कली खाँ को किलोखरी में रहने की आज्ञा दी तथा स्वयं एक सेना लेकर रणथम्भौर की ओर चल दिया। इस समय वीर हम्मीर रणथम्भौर का शासक था। उसके चौहान सैनिक अपने दुर्ग की रक्षा के लिए दृढ़़-सकंल्प थे।

सुल्तान ने सबसे पहले झाइन के दुर्ग पर आक्रमण किया। कुछ इतिहासकारों ने इसे छान का किला भी कहा है। रणथम्भौर दुर्ग के शासक हम्मीर ने सेनापति भीमसिंह के नेतृत्व में 10,000 सैनिक झाइन के दुर्ग की रक्षा करने के लिए भेजे किंतु दिल्ली की सेना ने रणथंभौर की इस सेना को परास्त करके झाइन के दुर्ग पर अधिकार कर लिया। अमीर खुसरो ने लिखा है कि एक ही धावे में हजारों रावत मार डाले गए। हिन्दू सेनानायक साहिनी भाग गया जबकि पराजित हिन्दू सेना रणथंभौर की ओर भाग आई।

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इस पर सुल्तान जलालुद्दीन स्वयं झाइन पहुंचा तथा हम्मीरदेव के महल में रुका। वहाँ सुल्तान ने अनेक भवनों, मंदिरों एवं मूर्तियों का विध्वंस किया। इसके बाद सुल्तान ने मलिक खुर्रम के साथ आगे बढ़कर रणथम्भौर दुर्ग पर घेरा डाल दिया तथा उसने अपनी सेना के एक हिस्से को मालवा की ओर भेज दिया जिसने मालवा के समृद्ध क्षेत्र में लूटमार करके पर्याप्त धन प्राप्त किया। जब मालवा से शाही सेना का वह हिस्सा वापस लौट आया तब सुल्तान ने रणथम्भौर दुर्ग पर आक्रमण करने का निश्चय किया। रणथम्भौर दुर्ग के शासक वीर हम्मीरदेव चौहान के सैनिक अपने दुर्ग की रक्षा के लिए दृढ़़-सकंल्प थे। उन्होंने बड़ी वीरता से तुर्कों का सामना किया। राजपूतों की दृढ़़ता तथा दुर्ग की अभेद्यता से हताश होकर सुल्तान ने रणथम्भौर दुर्ग पर विजय का विचार त्याग दिया और घेरा उठाने के आदेश दिए। जियाउद्दीन बरनी ने लिखा है कि जब सुल्तान ने रणथंभौर के दुर्ग को देखा तो आश्चर्यचकित रह गया तथा उसने घेरा उठाने के आदेश दिए। एक अन्य इतिहासकार ने लिखा है कि एक दिन राजपूतों ने शाही सेना के बहुत से मुस्लिम सैनिकों को काट डाला। उनके शवों को देखकर जलालुद्दीन के शोक का पार नहीं रहा और उसने तुरंत घेरा उठाने के आदेश दिए।

मलिक अहमद चप ने सुल्तान से कहा कि बिना जीत हासिल किए घेरा उठाने से सुल्तान की प्रतिष्ठा गिर जाएगी। इस पर सुल्तान ने जवाब दिया कि रणथम्भौर दुर्ग को जीतने के लिए असंख्य मुसलमानों की बलि देनी पड़ेगी। और मैं इस प्रकार के दस किलों को भी मुसलमानों के एक बाल को भी हानि पहुंचाकर लेने के पक्ष में नहीं। आशीर्वादीलाल श्रीवास्तव ने लिखा है कि सुल्तान ने कहा कि उसके मुसलमान सैनिकों के सिर का प्रत्येक बाल,रणथम्भौर दुर्ग जैसे सौ दुर्गों से अधिक मूल्यवान था।

शाही सेना के रणथंभौर से जाते ही हम्मीर चौहान ने झाइन के दुर्ग पर भी फिर से अधिकार कर लिया। कुछ समय बाद पुनः शाही सेना ने झाइन पर आक्रमण करके उसे तहस-नहस कर दिया।

सुल्तान जलालुद्दीन खिलजी का दूसरा आक्रमण रेगिस्तान के मण्डोर राज्य पर हुआ। पाठकों को स्मरण होगा कि मण्डोर का राज्य शम्सुद्दीन इल्तुतमिश के समय में दिल्ली सल्तनत के अधीन हो चुका था परन्तु बाद में जालौर के चौहान राजपूतों ने उस पर फिर से अपना अधिकार कर लिया था। ई.1292 में जलालुद्दीन खिलजी ने मण्डोर को पुनः अपने अधिकार में कर लिया।

जलालुद्दीन खिलजी के काल में शाही सेनाओं द्वारा दो और हिन्दू राजाओं पर आक्रमण किए गए जिनमें सुल्तान की सेनाओं को बड़ी विजय मिली किंतु ये दोनों आक्रमण जलालुद्दीन के भतीजे अल्लाउद्दीन खिलजी के नेतृत्व में किए थे जो कि सुल्तान का दामाद भी था।

इनमें से पहला आक्रमण ई.1292 में मालवा पर तथा दूसरा आक्रमण भिलसा पर किया गया और वहाँ के मन्दिरों तथा सेठ-साहूकारों को लूटकर अपार धन एकत्रित किया गया। अल्लाउद्दीन इस धन को लेकर दिल्ली लौट आया और उसने यह समस्त धन सुल्तान को भेंट कर दिया। सुल्तान ने अल्लाउद्दीन की सफलता से प्रसन्न होकर कड़ा-मानिकपुर के साथ-साथ अवध की जागीर भी उसे दे दी और उसे आरिज-ए-मुमालिक के पद पर नियुक्त कर दिया।

अल्लाउद्दीन द्वारा मालवा में स्थित देवगिरि के यादव राज्य पर किए गए आक्रमण की  विस्तृत चर्चा हम आगे करेंगे।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

जलालुद्दीन खिलजी की बेटी मंगोलों को दे दी गई (86)

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जलालुद्दीन खिलजी की बेटी मंगोलों को दे दी गई

जलालुद्दीन खिलजी संसार में किसी भी कीमत पर इस्लाम का प्रसार करना चाहता था। उसने मंगोलों को भी मुसलमान बनने का प्रस्ताव दिया। इसके बदले में जलालुद्दीन खिलजी की बेटी मंगोलों को दे दी गई तथा मंगोलों को दिल्ली में लाकर बसाया गया।

ई.1292 में सुल्तान जलालुद्दीन खिलजी की आज्ञा से उसके भतीजे एवं दामाद अल्लाउद्दीन खिलजी ने मालवा पर आक्रमण करके भिलसा पर अधिकार कर लिया और वहाँ के मन्दिरों तथा सेठ-साहूकारों को लूटकर अपार धन एकत्रित कर लिया। इस धन को लेकर वह दिल्ली लौट आया और समस्त धन सुल्तान को भेंट कर दिया। सुल्तान ने प्रसन्न होकर कड़ा-मानिकपुर के साथ-साथ अवध की भी जागीर उसे दे दी और उसे आरिज-ए-मुमालिक के पद पर नियुक्त कर दिया।

कुछ खिलजी एवं अन्य तुर्की सरदारों ने सुल्तान को सावधान किया कि अल्लाउद्दीन युवा और महत्त्वाकांक्षी है, इसलिए उसे इतना बढ़ावा देना ठीक नहीं है किंतु सुल्तान ने उनसे कहा कि मैं उसे अपने पुत्र की भांति समझता हूँ तथा उसके लिए कुछ भी करने के लिए तैयार हूँ। जलालुद्दीन को अपने अमीरों की इस नेक सलाह की उपेक्षा करने का दुष्परिणाम आने वाले चार वर्षों के भीतर ही झेलना पड़ा।

जिस वर्ष अल्लाउद्दीन खिलजी भिलसा पर सफलता प्राप्त करके लौटा, उसी वर्ष ई.1292 में डेढ़ लाख मंगोलों ने हुलागू खाँ के पौत्र अब्दुल्ला के नेतृत्व में भारत पर आक्रमण किया। जलालुद्दीन खिलजी ने भी एक विशाल सेना के साथ पश्चिमोत्तर सीमा की ओर प्रस्थान किया। मंगोल-सेना ने सिन्धु नदी के पश्चिमी तट पर पड़ाव डाल रखा था। सुल्तान की सेना नदी के पूर्वी तट पर आ डटी।

जलालुद्दीन खिलजी ने बलबन के समय में मंगोलों के विरुद्ध कई युद्ध जीते थे तथा इन युद्धों में मिली सफलताओं के कारण ही जलालुद्दीन खिलजी का भाग्योत्कर्ष हुआ था और वह सुल्तान के पद तक पहुंचा था किंतु इस समय जलालुद्दीन खिलजी की आयु 72 वर्ष से अधिक हो चुकी थी और वह अपने जीवन में शांति चाहता था। इसलिए वह मंगोलों से युद्ध नहीं करना चाहता था अपितु सुलह-सफाई करके मंगोलों एवं दिल्ली सल्तनत की सीमा का निर्धारण करना चाहता था।

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इससे पहले कि सुल्तान कुछ कर पाता मंगोलों की सेना ने सिंधु नदी पार करके दिल्ली की सेना पर आक्रमण करने का प्रयास किया परन्तु सुल्तान जलालुद्दीन ने अत्यन्त दु्रतगति से मंगोलों पर आक्रमण करके उन्हें परास्त कर दिया। शाही सेना द्वारा हजारों मंगोलों को बन्दी बना लिया गया। दिल्ली की सेना चाहती थी कि पकड़े गए मंगोलों का संहार कर दिया जाए किंतु सुल्तान ने मंगालों के सम्बन्ध में कुछ और सोच रखा था।

अब तक मंगोल किसी भी धर्म को नहीं मानते थे, सुल्तान जलालुद्दीन खिलजी चाहता था कि मंगोलों को मुसलमान बनाकर दिल्ली सल्तनत का मित्र बना लिया जाए। इसलिए जलालुद्दीन खिलजी ने मंगोलों के नेता अब्दुल्ला के समक्ष प्रस्ताव रखा कि वह मुसलमान बन जाए तथा जलालुद्दीन के साथ दिल्ली चलकर वहाँ आराम से रहे।

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मंगोल सरदार अब्दुल्ला ने जलालुद्दीन खिलजी का यह प्रस्ताव स्वीकार नहीं किया तथा जलालुद्दीन से अनुमति लेकर अपने अधिकांश मंगोल सैनिकों के साथ अपने देश को लौट गया परन्तु चंगेज खाँ के एक पौत्र उलूग खाँ तथा कई अन्य मंगोल सरदारों ने जलालुद्दीन की नौकरी करना स्वीकार करके इस्लाम स्वीकार कर लिया तथा बहुत से मंगोल सैनिकों के साथ दिल्ली के निकट बस गए। यह स्थान मंगोलपुरा के नाम से प्रसिद्ध हुआ। दिल्ली में बसाए गए मंगोल नव-मुस्लिम कहलाने लगे। जलालुद्दीन खिलजी की बेटी का विवाह उलूग खाँ के साथ कर दिया गया। इससे तुर्की सरदारों को बड़ी निराशा हुई। उनकी दृष्टि में जलालुद्दीन खिलजी की बेटी मंगोल नेता के साथ किए जाने से तुर्कों के साथ-साथ दिल्ली सल्तनत की प्रतिष्ठा को भी बहुत ठेस पहुँची थी। मंगोलों को राजधानी के निकट बसाना सल्तनत के लिए अत्यन्त घातक सिद्ध हुआ क्योंकि मंगोलपुरा दिल्ली के सुल्तान के विरुद्ध षड्यन्त्रों तथा कुचक्रों का केन्द्र बन गया। मंगोलों को परास्त करने के बाद जलालुद्दीन खिलजी ने किसी भी सैनिक अभियान का नेतृत्व नहीं किया। इसके बाद के सारे सैनिक अभियान उसके भतीजे एवं दामाद अल्लाउद्दीन के नेतृत्व में हुए जिसे जलालुद्दीन ने अपने बेटे की तरह पालपोस कर बड़ा किया था।

सुल्तान जलालुद्दीन खिलजी की यह नीति भी उसके विरुद्ध सिद्ध हुई। जलालुद्दीन खिलजी अपने मुसलमान सैनिकों, अमीरों तथा अपने परिवार के सदस्यों के प्रति जिस भावुकता का अनुभव करता था, वैसी भावुकता और सद्भावना न तो मुसलमान सैनिक, न तुर्की अमीर और न परिवार के सदस्य, जलालुद्दीन के प्रति अनुभव करते थे। उनकी दृष्टि में सुल्तान बूढ़ा, सनकी और दिमाग से कमजोर था जो अपराधियों, बागियों और मंगोलों के प्रति उदारता दिखाकर अपनी कमजोरी का प्रदर्शन करता था।

जलालुद्दीन खिलजी ने मलिक छज्जू को दण्ड देने की बजाय सम्मानित किया था, रणथंभौर को जीतने की बजाय बीच में से ही घेरा उठा लिया था, मंगोलों को मौत के घाट उतारने की बजाय दिल्ली में लाकर बसा लिया था और जलालुद्दीन खिलजी की बेटी का ब्याह उनके नेता के साथ कर दिया था।

इन सब कारणों से युवा खिलजी एवं अन्य तुर्की अमीर सुल्तान जलालुद्दीन खिलजी से जितनी जल्दी हो सके, छुटकारा पा लेना चाहते थे। सबसे अधिक छटपटाहट सुल्तान के भतीजे और दामाद अल्लाउद्दीन खिलजी में थी जो स्वयं सुल्तान के तख्त पर बैठकर भारत के काफिरों पर नियंत्रण प्राप्त करना चाहता था।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

देवगिरि के यादव अल्लाउद्दीन से परास्त हो गए (87)

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देवगिरि के यादव अल्लाउद्दीन से परास्त हो गए

देवगिरि के यादव अल्लाउद्दीन से परास्त हो गए! उन्होंने अल्लाउद्दीन को 50 मन सोनाए 5 मन मोतीए 2 मन हीरे और 1 हजार मन चाँदी दी। अल्लाउद्दीन खिलजी की सेना ने देवगिरि राज्य को जमकर लूटा।

मंगोलों पर की गई सैनिक कार्यवाही के बाद सुल्तान जलालुद्दीन खिलजी ने कभी कोई सैनिक अभियान नहीं किया तथा सैनिक अभियानों की जिम्मेदारी अपने युवा भतीजे एवं दामाद अल्लाउद्दीन खिलजी पर डाल दी।

अल्लाउद्दीन खिलजी को मालवा क्षेत्र में स्थित भिलसा राज्य में जो सफलता प्राप्त हुई थी, उससे उसका उत्साह बहुत बढ़ गया था। भिलसा में ही उसने देवगिरि के यादव राज्य की अपार सम्पत्ति के विषय में सुना था। उसने इस राज्य की विशाल सम्पत्ति को लूटने का निश्चय किया परन्तु अपने ध्येय को किसी पर प्रकट नहीं होने दिया।

जब सुल्तान जलालुद्दीन मंगोल अभियान के बाद दिल्ली लौट आया तो अल्लाउद्दीन खिलजी ने उससे चन्देरी पर आक्रमण करने की आज्ञा प्राप्त की तथा इस अभियान के लिए नए सैनिकों की भर्ती करने लगा। कुछ अमीरों ने अल्लाउद्दीन खिलजी द्वारा की जा रही सैनिक भर्ती पर आपत्ति की किंतु सुल्तान ने इस आपत्ति को अस्वीकार कर दिया।

सुल्तान इस बात को समझ ही नहीं सका था कि जो भी सेनापति सैनिकों की भर्ती करेगा तथा उन्हें वेतन देगा, सैनिक उसी के प्रति निष्ठा का प्रदर्शन करेंगे। अतः सेना की भर्ती का काम किसी और अमीर को सौंपा जाना चाहिए था।

जब अल्लाउद्दीन खिलजी ने शाही-व्यय पर आठ हजार सैनिकों की सेना खड़ी कर ली तब ई.1294 में वह एक विशाल सेना के साथ मालवा की ओर चल दिया। वह अत्यन्त दु्रतगति से चलता हुआ एलिचपुर पहुँचा तथा उस पर आक्रमण कर दिया। ऐलिचपुर की सफलता के बाद उसे चंदेरी पर आक्रमण करना था किंतु अल्लाउद्दीन खिलजी ने अपनी सेना को देवगिरी पर आक्रमण करने का निर्देश दिया।

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देवगिरि के यादव राजा रामचन्द्र को अल्लाउद्दीन खिलजी के उद्देश्यों की कुछ भी जानकारी नहीं थी। इसलिए उसने अपने राज्य की सुरक्षा की कोई व्यवस्था नहीं की। अल्लाउद्दीन तेजी से चलता हुआ लाजौरा की घाटी पहुंचा जहाँ से देवगिरि केवल 12 मील दूर थी। अल्लाउद्दीन ने जब देवगिरि पर आक्रमण किया तब यह भी झूठी खबर चारों ओर फैला दी कि सुल्तान भी 20,000 सैनिकों की सेना के साथ देवगिरि आ रहा है।

इस सूचना से देवगिरि का राजा रामचन्द्र और अधिक आतंकित हो उठा। उसने अपनी राजधानी से 12 मील दूर लसूरा नामक स्थान पर अल्लाउद्दीन का सामना किया किंतु जब परास्त होने लगा तो राजा रामचंद्र ने स्वयं को लाजौरा के दुर्ग में बन्द कर लिया।

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एक इतिहासकार ने लिखा है कि अल्लाउद्दीन ने देवगिरि के यादव राजा रामचंद्र के पास संदेश भिजवाया कि मैं अपने ताऊ सुल्तान जलालुद्दीन से नाराज होकर राजमुंदरी के राजा के यहाँ नौकरी करने जा रहा हूँ। इस पर रामचंद्र निश्चिंत हो गया तथा उसने अल्लाउद्दीन का अपने महल में स्वागत किया। धोखेबाज अल्लाउद्दीन ने महल में घुसते ही महल पर अधिकार कर लिया। राजा रामचंद्र ने अपने पुत्र शंकरदेव के पास इस छल की सूचना भेजी तथा उसे कहलवाया कि वह शीघ्रातिशीघ्र देवगिरि लौट आए। राजकुमार शंकरदेव इस समय दक्षिण भारत में तीर्थयात्रा पर गया हुआ था तथा राज्य की अधिकांश सेना उसके साथ गई थी। जब तक शंकरदेव लौट कर आता, तब तक का समय व्यतीत करने के लिए राजा रामचंद्र ने अल्लाउद्दीन खिलजी से सन्धि की बातचीत आरम्भ कर दी। इस बीच अल्लाउद्दीन खिलजी की सेना ने देवगिरि राज्य को जमकर लूटा। कई दिनों तक वार्त्ता चलती रही। अन्त में यह निश्चित हुआ कि राजा रामचन्द्र एक निश्चित धनराशि अल्लाउद्दीन खिलजी को देगा और अल्लाउद्दीन खिलजी देवगिरि के कैदियों को मुक्त करके दिल्ली लौट जायेगा। जब शंकरदेव लौटकर नहीं आया तो राजा रामचंद्र ने विशाल सम्पत्ति अल्लाउद्दीन खिलजी को समर्पित कर दी।

एक इतिहासकार ने लिखा है कि देवगिरि के यादव राजा रामचंद्र ने 50 मन सोना, 7 मन मोती तथा 40 घोड़े और बहुमूल्य द्रव्य देकर अपनी जान बचाई। जिस समय आलाउद्दीन लूट का धन लेकर दिल्ली के लिए प्रस्थान कर ही रहा था कि राजकुमार शंकरदेव अपनी सेना के साथ दक्षिण से आ गया।

राजकुमार शंकर देव ने अल्लाउद्दीन के पास कहला भेजा कि वह देवगिरि राज्य से लूटी गई सम्पत्ति वापस लौटा दे और चुपचाप दिल्ली लौट जाये। इस पर अल्लाउद्दीन ने नसरत खाँ को लूसरा के दुर्ग पर घेरा डालने का आदेश दिया और स्वयं एक सेना लेकर शंकरदेव पर आक्रमण करने चल दिया।

दोनों पक्षों में हुए भीषण युद्ध के बाद यादव राजकुमार शंकरदेव परास्त हो गया। अब दुर्ग का घेरा जोरों के साथ आरम्भ हुआ। एक दिन रामचन्द्र के सैनिकों ने रामचंद्र को सूचित किया कि दुर्ग के जिन बोरों में अब तक अन्न भरा हुआ समझा जा रहा था उनमें तो नमक भरा है। इस सूचना से देवगिरि के यादव रामचंद्र का साहस भंग हो गया और उसने पुनः अल्लाउद्दीन से सन्धि कर ली। इस बार उसे पहले से अधिक कठोर शर्तें स्वीकार करनी पड़ीं।

फरिश्ता के अनुसार, अल्लाउद्दीन को छः सौ मन सोना, सात मन मोती, दो मन हीरा, पन्ना, लाल, पुखराज, एक हजार मन चाँदी, चार हजार रेशम के थान तथा अन्य असंख्य बहुमूल्य वस्तुऐं दी गईं। बरार क्षेत्र में स्थित एलिचपुर का प्रान्त भी अल्लाउद्दीन को मिल गया। राजा ने वार्षिक कर भी अल्लाउद्दीन के पास भेजने का वचन दिया। हरिशंकर शर्मा ने लिखा है कि यादव राजा ने अल्लाउद्दीन खिलजी को पचास मन सोना, 5 मन मोती, 40 हाथी तथा कई हजार घोड़े उपहार में दिए।

यह एक विशाल एवं अकल्पनीय सम्पत्ति थी जो थोड़े से प्रयास से ही अल्लाउद्दीन खिलजी के हाथ लग गई थी। हो सकता है कि फरिश्ता ने सम्पत्ति की सूची काफी बढ़ा-चढ़ाकर बताई हो किंतु इतना निश्चित है कि यह एक विशाल सम्पत्ति थी जिसे देखकर अल्लाउद्दीन की आँखें चौड़ गईं।

इस सम्पत्ति के बल पर तो वह नई सल्तनत खड़ी कर सकता था। अब उसे किसी भी सुल्तान का ताबेदार रहने की आवश्यकता नहीं थी। अल्लाउद्दीन खिलजी ने मन ही मन एक निर्णय लिया और उसे कार्यान्वित करने के लिए वह देवगिरि से दिल्ली की ओर चल दिया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

जलालुद्दीन खिलजी की हत्या (88)

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जलालुद्दीन खिलजी की हत्या

अल्लाउद्दीन खिलजी ने सुल्तान जलालुद्दीन खिलजी की हत्या करके उसका सिर भाले पर लटका दिया । सुल्तान का सिर अवध के विभिन्न शहरों शहरों में घुमाया गया ताकि पूरी सल्तनत तक यह समाचार भलीभांति पहुंच जाए।

अल्लाउद्दीन खिलजी ने सुल्तान जलालुद्दीन से चंदेरी पर अभियान करने की अनुमति मांगी और ऐलिचपुर को जीतने के बाद चुपचाप देवगिरि के समृद्ध राज्य की तरफ बढ़ गया जहाँ से अल्लाउद्दीन को अपार सम्पत्ति प्राप्त हुई।

कहा जाता है कि जब अल्लाउद्दीन, सुल्तान को बताये बिना देवगिरि का अभियान कर रहा था, उस समय सुल्तान जलालुद्दीन ग्वालियर में था। उसे अल्लाउद्दीन के इस गुप्त अभियान की सूचना मिल गई। इस पर सुल्तान के अमीरों ने सुल्तान को सलाह दी कि वह अल्लाउद्दीन का मार्ग रोककर उससे लूट का माल छीन ले किंतु सुल्तान ने ऐसा करने से मना कर दिया और दिल्ली चला गया।

सुल्तान जलालुद्दीन को आशा थी कि पहले की भाँति इस बार भी अल्लाउद्दीन लूट की सम्पूर्ण सम्पत्ति लेकर, सुल्तान की सेवा में उपस्थित होगा और उसे समर्पित कर देगा परन्तु इस बार अल्लाउद्दीन ने मालवा से कुछ दूरी तक दिल्ली की ओर चलने के बाद अचानक ही अपना मार्ग बदला और वह दिल्ली जाने की बजाय अपनी जागीर कड़ा-मानिकपुर की ओर मुड़ गया। कुछ ही दिनों बाद गंगाजी को पार करके वह कड़ा-मानिकपुर पहुंच गया।

जब सुल्तान जलालुद्दीन को यह सूचना मिली कि अल्लाउद्दीन दिल्ली आने की बजाय कड़ा-मानिकपुर जा रहा है तो सुल्तान ने अपने अमीरों की एक सभा बुलाई और उनसे इस विषय पर परामर्श मांगा।

सुल्तान के शुभचिन्तक अमीरों ने सुल्तान को समझाया कि अल्लाउद्दीन बड़ा ही महत्त्वाकांक्षी युवक है। उसकी दृष्टि सुल्तान के तख्त पर लगी है। अतः कठोर नीति का अनुसरण करने की आवश्यकता है। सुल्तान को चाहिए कि तुरंत एक विशाल सेना लेकर अल्लाउद्दीन के विरुद्ध अभियान करे तथा उससे सारी सम्पत्ति छीन ले।

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सुल्तान के चाटुकार अमीरों ने इसके विपरीत सलाह दी तथा सुल्तान को समझाया कि यदि उसने ऐसा किया तो अल्लाउद्दीन तथा उसके साथी आतंकित होकर इधर-उधर भाग जायेंगे जिससे सारा धन तितर-बितर हो जायेगा। अतः सुल्तान को चाहिए कि वह अल्लाउद्दीन को बहला-फुसलाकर दिल्ली बुलाने का प्रयास करे। सुल्तान को इन चाटुकारों की सलाह पसन्द आयी और उसने इसी सलाह को व्यवहार में लाने का निश्चय किया।

अल्लाउद्दीन खिलजी भी अपने चाचा एवं श्वसुर सुल्तान जलालुद्दीन की दुर्बलताओं से भली-भांति परिचित था। उसने जलालुद्दीन खिलजी की हत्या करने का निश्चय किया। अल्लाउद्दीन ने खूनी शतरंज की बिसात बिछाई तथा सुल्तान को ठीक वैसे ही घेरकर मारने का निश्चय किया जैसे कि शतरंज के बादशाह को चकमा देकर मारा जाता है।

अल्लाउद्दीन खिलजी ने सुल्तान के पास एक पत्र भेजा जिसमें अपने अपराध को स्वीकार किया और प्रार्थना की कि यदि उसे अभयदान मिल जाए तो वह लूट की सम्पत्ति के साथ सुल्तान की सेवा में उपस्थित होगा।

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आशीर्वादी लाल श्रीवास्तव ने लिखा है कि अल्लाउद्दीन खिलजी ने अपने भाई उलूग खाँ को सुल्तान के पास भेजा। उसकी मीठी-मीठी बातों से सुल्तान का अल्लाउद्दीन खिलजी में विश्वास बढ़ गया। उलूग खाँ ने सुल्तान को विश्वास दिलाया कि अल्लाउद्दीन देवगिरि से जो अपार धनराशि लाया है, उसे आपको अर्पित करना चाहता है किंतु दिल्ली आने और आपके सम्मुख उपस्थित होने का उसे साहस नहीं होता क्योंकि उसने आपसे देवगिरि पर आक्रमण करने की आज्ञा नहीं ली थी। सुल्तान अपने भतीजे जो कि दामाद भी था और पालित पुत्र भी, के प्रति प्रेम एवं उदारता की भावना के वशीभूत था। उसने अल्लाउद्दीन के पास क्षमादान भेज दिया। अल्लाउद्दीन ने सूचना-वाहकों को वापस दिल्ली नहीं लौटने दिया। इस पर भी सुल्तान की आँखें नहीं खुलीं। सुल्तान सपने में भी यह नहीं सोच सकता था कि अल्लाउद्दीन का इरादा जलालुद्दीन खिलजी की हत्या करने का है। अब अल्लाउद्दीन ने अपने भाई असलम बेग के पास एक पत्र भेजा जिसमें उसने लिखा कि वह इतना आतंकित हो गया है कि दरबार में आकर सुल्तान के समक्ष उपस्थित होने का साहस नहीं हो रहा है। उसका हृदय क्षोभ से इतना संतप्त है कि वह आत्महत्या करने के लिए उद्यत है।

उसकी रक्षा का एकमात्र उपाय यही है कि सुल्तान स्वयं कड़ा आकर उसे क्षमा कर दे।

जब असलम बेग ने सुल्तान को यह पत्र दिखाया तब सुल्तान ने उससे कहा कि वह तुरन्त कड़ा जाकर अल्लाउद्दीन को आश्वासन दे। सुल्तान ने स्वयं भी कड़ा जाने का निश्चय किया। वह एक हजार सैनिकों के साथ नावों में बैठकर गंगा नदी के रास्ते कड़ा पहुंचा।

जब अल्लाउद्दीन ने सुना कि सुल्तान सेना लेकर आ रहा है तो उसने लूट की सम्पत्ति के साथ बंगाल भाग जाने की योजना बनाई परन्तु जब उसे यह ज्ञात हुआ कि सुल्तान केवल एक हजार सैनिकों के साथ आ रहा है, तब उसने बंगाल जाने का विचार त्याग दिया। उसने गंगा नदी को पार किया और दूसरे तट पर अपनी सेना को एकत्रित कर लिया। इसके बाद उसने अपने भाई असलम बेग को सुल्तान का स्वागत करने के लिए भेजा।

असलम बेग ने सुल्तान को सरलता से अल्लाउद्दीन के जाल में फँसा लिया। उसके कहने से सुल्तान ने अपने सैनिकों को पीछे छोड़ दिया और केवल थोड़े से अमीरों के साथ अल्लाउद्दीन से मिलने के लिए आगे बढ़ा। सुल्तान अपने पालित भतीजे के स्नेह में अंधा हो गया। उसने अल्लाउद्दीन को निःशंक बनाने के लिए अपने अमीरों के शस्त्र गंगाजी में फिंकवा दिए।

अल्लाउद्दीन ने सुल्तान के पैरों में गिरकर उसका स्वागत किया। प्रेम से लबालब सुल्तान ने अपने प्यारे भतीजे और दामाद को धरती से उठाकर गले से लगा लिया। जब सुल्तान जलालुद्दीन, अल्लाउद्दीन को अपने साथ लेकर अपनी नाव की ओर लौट रहा था, तब मुहम्मद सलीम नामक एक सैनिक ने सुल्तान को छुरा मार दिया।

सुल्तान घायल होकर नाव की ओर भागा, उसने चिल्लाकर कहा- ‘दुष्ट अल्लाउद्दीन! यह तूने क्या किया?’ परन्तु इक्तयारुद्दीन नामक एक दूसरे सैनिक ने सुल्तान को धरती पर गिराकर उसका सिर धड़ से अलग कर दिया। सुल्तान जलालुद्दीन खिलजी की हत्या करके उसने सुल्तान का कटा हुआ सिर धरती से उठाकर अल्लाउद्दीन को उपहार की तरह भेंट किया। इस प्रकार 19 जुलाई 1296 को जलालुद्दीन खिलजी की जीवन-लीला समाप्त हो गई।

पाठकों को स्मरण होगा कि तुर्कों को भारत में शासन करते हुए अब सौ साल हो चुके थे और पिछले सौ सालों से तुर्की अमीर इसी तरह सुल्तानों के सिर काट-काट कर धरती पर गिरा रहे थे। उन्हें किसी शत्रु की आवश्यकता नहीं थी, वे स्वयं ही अपने शत्रु बने हुए थे।

जिस स्थान पर जलालुद्दीन का धड़ गिरा था, उसी स्थान पर अल्लाउद्दीन खिलजी की ताजपोशी की गई तथा उसे सुल्तान घोषित कर दिया गया। अल्लाउद्दीन के आदेश से सुल्तान का सिर भाले पर टांगा गया और उसे कड़ा-मानिकपुर एवं अवध के सूबों में घुमाया गया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

दिल्ली का शाही तख्त सुल्तानों के खून का प्यासा था (89)

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दिल्ली का शाही तख्त सुल्तानों के खून का प्यासा था

दिल्ली का शाही तख्त अब तक कई सुल्तानों का खून पी चुका था। प्रत्येक शहजादा, अमीर और विदेशी आक्रांता दिल्ली का शाही तख्त प्राप्त करना चाहता था। इस कारण अधिकतर सुल्तानों को अपनी स्वाभाविक मौत नसीब नहीं हो पाती थी।

दिल्ली सल्तनत का शाही-तख्त इल्तुतमिश की मृत्यु के बाद से ही सुल्तानी खून का प्यासा हो चुका था। इस तख्त ने इल्तुतमिश के लगभग पूरे खानदान को ही निगल लिया था। सुल्तान रुकनुद्दीन फीरोजशह, रजिया सुल्तान, बहरामशाह तथा अल्लाउद्दीन मसूद शाही-तख्त की रक्त-पिपासा की भेंट चढ़ चुके थे।

बलबन ने किसी तरह स्थितियों को संभाला तथा अपने स्वामी नासिरुद्दीन और स्वयं अपने जीवन की पूरी तरह से रक्षा की किंतु जैसे ही बलबन की आँखें बंद हुईं, दिल्ली के शाही-तख्त ने फिर से सुल्तानों का रक्त पीना आरम्भ कर दिया था। बलबन ने अपने पुत्र बुगरा खाँ को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया था किंतु वह शाही तख्त की खूनी तबियत को अच्छी तरह समझ चुका था, इसलिए तख्त पर बैठने की बजाय बंगाल भाग गया था।

इसके बाद बलबन ने अपने पोते कैखुसरो को अगला सुल्तान बनाने की घोषणा की किंतु दिल्ली के तुर्की अमीरों ने कैखुसरो को मारकर उसके स्थान पर कैकुबाद को सुल्तान बना दिया। हर समय दयालुता एवं दरियादिली का प्रदर्शन करने वाले जलालुद्दीन खिलजी ने न केवल लकवाग्रस्त सुल्तान कैकुबाद को लातों से मारकर यमुनाजी में फैंक दिया अपितु शिशु सुल्तान क्यूमर्स को भी गला घोंटकर मार डाला था और स्वयं दिल्ली के तख्त पर बैठा था।

सुल्तानों के खून में भीगा हुआ दिल्ली का शापित शाही-तख्त जलालुद्दीन को भी जीवित कैसे छोड़ देता! आखिर वह दिन भी बहुत जल्दी आ गया जब अल्लाउद्दीन ने अपने चाचा को धोखे से मारकर धरती पर गिरा दिया तथा उसका सिर कटवा कर और भाले पर टंगवाकर कड़ा, मानिकपुर एवं अवध के शहरों में घुमवाया।

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जियाउद्दीन बरनी का ग्रंथ ‘तारीखे-फीरोजशाही’ एकमात्र उपलब्ध समकालीन ऐतिहासिक स्रोत है जिसके माध्यम से जलालुद्दीन खिलजी के शासनकाल की घटनाओं की जानकारी मिलती है। जियाउद्दीन बरनी, जलालुद्दीन खिलजी का घनघोर आलोचक था क्योंकि उसकी दृष्टि में जलालुद्दीन खिलजी एक उदार शासक था। इसलिए जियाउद्दीन बरनी ने उन्हीं घटनाओं को अपने ग्रंथ में लिखने का प्रयास किया जो जलालुद्दीन खिलजी की नीतियों को असफल घोषित करने के लिए पर्याप्त थीं।

जलालुद्दीन खिलजी दिल्ली का पहला सुल्तान था जिसने ‘उदार-निरंकुशवाद’ के आदर्श को अपनाया। वह सफल सेनानायक था और एक शक्तिशाली सेना उसके अधिकार में थी। फिर भी उसने सैनिकवादी नीति को त्याग दिया। इस पर भी उसने डेढ़ लाख मंगोलों की सेना को परास्त करके अपनी सामरिक क्षमता का परिचय दिया।

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जलालुद्दीन खिलजी अपनी उदार नीति के माध्यम से दरबार तथा राज्य के समस्त वर्गों के लोगों को संतुष्ट रखना चाहता था। उसने बलबन तथा उसके वंशजों के अनुयायी तुर्क अमीरों को महत्त्वपूर्ण पदों पर बने रहने दिया। उसने पूर्ववर्ती सुल्तानों के प्रति सम्मान का प्रदर्शन करते हुए बलबन के महल के चौक में घोड़े पर सवार होने से मना कर दिया। उसने सुल्तान के पुराने सिंहासन पर बैठने से भी इसलिए मना कर दिया क्योंकि वह अनेक बार सेवक के रूप में इस सिंहासन के सम्मुख खड़ा हो चुका था। जलालुद्दीन खिलजी ने जब विद्रोही मलिक छज्जू को बेड़ियों में बंधे हुए देखा तो जलालुद्दीन खिलजी रो पड़ा। जहाँ एक ओर जलालुद्दीन खिलजी मुसलमानों के प्रति अत्यंत उदार था वहीं दूसरी ओर हिन्दुओं के प्रति अत्यंत अनुदार था। उसने झाइन में मंदिरों को तोड़ा तथा अपवित्र किया और देव-मूर्तियों को नष्ट किया। जलालुद्दीन ने रणथंभौर सहित किसी भी बड़े हिन्दू शासक के विरुद्ध इसलिए कोई विशेष कार्यवाही नहीं की क्योंकि वह मुसलमान सैनिकों का रक्तपात होते हुए नहीं देखना चाहता था। चार वर्ष के संक्षिप्त शासन काल में जलालुद्दीन खिलजी की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि उसने जीर्ण हो चले इल्बरी तुर्कों के शासन को नष्ट करके दिल्ली सल्तनत में नये राजवंश की नींव रखी।

जलालुद्दीन खिलजी की दूसरी उपलब्धि यह कही जा सकती है कि उसने शासन में उदारवादी तत्वों का समावेश करके खिलजियों, तुर्कों तथा पठानों सहित विभिन्न मुस्लिम कबीलों को राहत देने का प्रयास किया। उसकी तीसरी सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि उसने मंगालों के एक बड़े समूह को इस्लाम का अनुयायी बनाकर उन्हें अपनी सेवा में रख लिया।

इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि जलालुद्दीन खिलजी इस्लामिक संसार का पहला सुल्तान था जिसने मंगोलों को सबसे पहले इस्लाम में लाने का सफल प्रयास किया था।

दिल्ली सल्तनत का इतिहास आगे बढ़ाने से पहले हमें जलालुद्दीन की इस सफलता पर थोड़ी चर्चा करनी चाहिए। तेरहवीं शताब्दी ईस्वी के मध्य तक मंगोल लड़ाके किसी भी धर्म को नहीं मानते थे तथा मुसलमानों के बड़े दुश्मन थे। इस बात का अनुमान इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि जब चंगेज खाँ के पोते हलाकू ने बगदाद पर आक्रमण किया तो उस हमले का आँखों देखा विवरण लिखते हुए बगदाद के लेखक अब्दुल्ला वस्साफ़ शिराज़ी ने लिखा है-

‘मंगोल बगदाद शहर में भूखे गधों की तरह घुस गए और जिस तरह भूखे भेड़िये, भेड़ों पर हमला करते हैं, वैसा करने लगे। बिस्तर और तकिए चाकूओं से फाड़ दिए गए…. महल की औरतें गलियों में घसीटी गईं और उनमें से हर एक तातरियों का खिलौना बनकर रह गई।’

ई.1252 में हलाकू का छोटा भाई मंगू खाँ अथवा मोंगके खान मंगोलों का नेता हुआ, उसे मंगोलों के इतिहास में ‘खान महान’ कहा जाता है। वह अपने भाई की अपेक्षा थोड़ा उदार था। इसलिए मुसलमानों, ईसाइयों तथा बौद्धों में होड़ मची कि किसी तरह मंगू खाँ को प्रसन्न करके उसे अपने धर्म में सम्मिलित कर लिया जाए। पोप ने भी रोम से अपने एलची मंगू खाँ के पास भेजे। नस्तोरियन ईसाई भी पूरी तैयारी के साथ मंगू खाँ के चारों ओर मण्डराने लगे।

मुसलमान और बौद्ध प्रचारक भी तेजी से अपने काम में जुट गए किंतु मंगू खाँ को धर्म जैसी चीज में अधिक रुचि नहीं थी, फिर भी वह ईसाई बनने को तैयार हो गया। जब रोम के एलचियों ने मंगू खाँ को पोप तथा उसके चमत्कारों की कहानियां सुनाईं तो मंगू खाँ भड़क गया और उसने कोई भी धर्म स्वीकार करने से मना कर दिया।

जब कुछ समय बाद मंगू खाँ मर गया तब जो मंगोल सरदार जिस क्षेत्र में राज्य करता था, उसने वहीं के लोगों का धर्म अपना लिया। चीन और मंगोलिया के मंगोल बौद्ध हो गए, रूस और हंगरी में रह रहे मंगोल ईसाई हो गए, जबकि मध्यएशिया के मंगोलों ने अब तक कोई धर्म स्वीकार नहीं किया था। ऐसी स्थिति में जलालुद्दीन खिलजी द्वारा चंगेज खाँ के परिवार के मंगोलों को मुसलमान बना लेना एक बड़ी उपलब्धि थी।

मंगोलों को मुसलमान बनाने के उत्साह में उसने अपने जीवन की सबसे बड़ी भूल मंगेालों को दिल्ली लाकर बसाने के रूप में की। कालांतर में ये मंगोल, दिल्ली सल्तनत में षड़यंत्रों एवं कुचक्रों का केन्द्र बन गए।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

अल्लाउद्दीन खिलजी दिल्ली में घुस गया (90)

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अल्लाउद्दीन खिलजी दिल्ली में घुस गया

अपने मजहबी विश्वासों के प्रति उन्मादी सुल्तान जलालुद्दीन खिलजी धोखे, छल, फरेब से भरी तेरहवीं शताब्दी के भारत में अपने दुष्ट भतीजे अल्लाउद्दीन खिलजी के ऊपर विश्वास करके भयानक मृत्यु को प्राप्त हुआ।

इतिहास के पन्नों में आगे बढ़ने से पहले हमें अल्लाउद्दीन खिलजी के बाल्यकाल में झांकना चाहिए। यद्यपि उस काल के इतिहासकारों ने अल्लाउद्दीन खिलजी के बाल्यकाल पर बहुत कम प्रकाश डाला है, तथापि उसका जो इतिहास हमारे सामने आता है, वह भी कम विस्मयकारी नहीं है।

अल्लाउद्दीन खिलजी का पिता शिहाबुद्दीन मसूद खिलजी, जलालुद्दीन फीरोजशाह खिलजी का छोटा भाई था। शिहाबुद्दीन के चार पुत्र थे जिनमें से अल्लाउद्दीन सबसे बड़ा था। इतिहासकारों का अनुमान है कि अल्लाउद्दीन का जन्म ई.1266-67 में हुआ था, उसकी सही जन्मतिथि उपलब्ध नहीं है। जलालुद्दीन खिलजी के तख्त पर बैठने से काफी पहले ही उसके छोटे भाई शिहाबुद्दीन की मृत्यु हो चुकी थी। उसकी मृत्यु के समय अल्लाउद्दीन खिलजी छोटा बालक ही था। इसलिए अल्लाउद्दीन का पालन पोषण जलालुद्दीन ने किया था।

चूंकि जलालुद्दीन अपने जीवन के अधिकांश समय में मंगोलों से लड़ने के लिए भारत की पश्चिमी सीमा पर नियुक्त था, इसलिए उसके परिवार के लड़कों को नियमित रूप से लिखने-पढ़ने की सुविधा प्राप्त नहीं हो सकी। जलालुद्दीन अपने पितृहीन भतीजों से अत्यंत प्रेम करता था। जब ये भतीजे बड़े हुए तो जलालुद्दीन ने अपनी एक पुत्री का विवाह अल्लाउद्दीन के साथ कर दिया।

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इस प्रकार अल्लाउद्दीन खिलजी, जलालुद्दीन खिलजी का भतीजा, पालित पुत्र तथा दामाद तीनों ही था। पढ़ाई-लिखाई में रुचि नहीं होने से अल्लाउद्दीन नितांत निरक्षर बना रहा किंतु उसने घुड़सवारी, खेलकूद तथा युद्धविद्या सीख ली। जब जलालुद्दीन खिलजी सुल्तान बना तो अल्लाउद्दीन को अमीर-ए-तुजुक अर्थात् उत्सव आयोजनों के मंत्री का पद दिया गया।

कहने को अल्लाउद्दीन एक सुल्तान का दामाद था किंतु उसका वैवाहिक जीवन बहुत नीरस था। उसकी सास मलिका जहान तथा पत्नी, दोनों मिलकर अल्लाउद्दीन को बात-बात पर ताने देती थीं। इसलिए अल्लाउद्दीन ने महरू नामक एक प्रेमिका तलाश कर ली। एक दिन अल्लाउद्दीन की पत्नी को इस बात का पता चल गया इसलिए उसने अल्लाउद्दीन के सामने ही महरू की पिटाई कर दी। इससे अल्लाउद्दीन का मन दिल्ली से उखड़ गया।

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अल्लाउद्दीन के सौभाग्य से ई.1291 में कड़ा के गवर्नर मलिक छज्जू ने सुल्तान जलालुद्दीन खिलजी के विरुद्ध विद्रोह कर दिया। इस विद्रोह को दबाने में अल्लाउद्दीन ने भारी वीरता का परिचय दिया। यहाँ तक कि सुल्तान के मंझले पुत्र अर्कली खाँ ने सुल्तान के समक्ष अल्लाउद्दीन की प्रशंसा की। इस पर सुल्तान ने अल्लाउद्दीन को कड़ा-मानिकपुर का सूबेदार नियुक्त कर दिया। अल्लाउद्दीन दिल्ली से कड़ा चला गया। उसकी पत्नी ने कड़ा चलने से मना कर दिया। इस पर अल्लाउद्दीन अपनी प्रेमिका महरू को अपने साथ कड़ा ले गया। कड़ा का वातावरण अल्लाउद्दीन के लिए अत्यंत अनुकूल था। सुल्तान और उसके परिवार की छत्रछाया से दूर अल्लाउद्दीन को स्वतंत्र जीवन जीने का अवसर मिला। इससे उसकी महत्त्वाकांक्षाओं ने नया विस्तार लिया और उसने दिल्ली के तख्त पर आँख गढ़ाई। अल्लाउद्दीन ने शाही-तख्त प्राप्त करने के लिए सैनिक संगठन, धन संग्रह तथा साथियों की परीक्षा करना आरम्भ किया। ई.1292 में सुल्तान की आज्ञा से अल्लाउद्दीन ने मालवा क्षेत्र में स्थित भिलसा राज्य पर आक्रमण किया। भिलसा पर उसे बड़ी सरलता से विजय प्राप्त हो गई और उसने लूट का सारा माल सुल्तान जलालुद्दीन को समर्पित कर दिया।

सुल्तान ने अल्लाउद्दीन की निष्ठा से प्रसन्न होकर उसे आरिजे मुमालिक अर्थात सैन्य-मंत्री के महत्त्वपूर्ण पद पर नियुक्त कर दिया और उसे कड़ा के साथ-साथ अवध का भी गवर्नर नियुक्त कर दिया। ई.1294 में अल्लाउद्दीन ने सुल्तान से छिपकर देवगिरी पर आक्रमण किया और वहाँ से लूट की अपार सम्पत्ति लेकर कड़ा वापस लौट आया।

देवगिरि की अकूत सम्पदा प्राप्त करके अल्लाउद्दीन मदान्ध हो गया। अब उसने दिल्ली का तख्त प्राप्त करने का निश्चय कर लिया। उसने कई तरह के बहाने करके अपने श्वसुर तथा ताऊ सुल्तान जलालुद्दीन खिलजी को कड़ा बुलाया। अपने भतीजे के प्रेम में पागल सुल्तान कड़ा आया जहाँ अल्लाउद्दीन ने 19 जुलाई 1296 को मानिकपुर के निकट सुल्तान के साथ विश्वासघात करके उसकी हत्या करवा दी। इतना किए जाने के बाद भी दिल्ली का तख्त अभी दूर था। मरहूम सुल्तान के दो पुत्र अभी जीवित थे, उन्हें भी मार्ग से हटाना आवश्यक था।

सुल्तान जलालुद्दीन खिलजी की बेगम मलिका जहान को जैसे ही सुल्तान की कड़ा में हत्या होने का समाचार मिला, उसने अपने छोटे पुत्र कद्र खाँ को रुकुनुद्दीन इब्राहीम के नाम से दिल्ली के तख्त पर बैठा दिया क्योंकि मंझला पुत्र अर्कली खाँ मुल्तान का गवर्नर होने के कारण मुल्तान में था। संभवतः जलालुद्दीन का बड़ा पुत्र खानखाना महमूद इस समय तक मृत्यु को प्राप्त हो चुका था।

जब अर्कली खाँ ने सुना कि उसकी माँ ने छोटे पुत्र कद्र खाँ को दिल्ली के तख्त पर बैठा दिया तो वह अपने परिवार से नाराज हो गया तथा उसने अपने परिवार की सहायता करने के लिए दिल्ली आना उचित नहीं समझा।

जब अल्लाउद्दीन को सुल्तान के परिवार में फूट पड़ने के समाचार मिले तो अल्लाउद्दीन ने दिल्ली जाने का निर्णय किया। उसने मार्ग में नये सैनिकों की भर्ती की। सैनिकों की भरती का उसका तरीका भी बहुत विचित्र था। शाही छावनी के प्रत्येक अड्डे पर मंजनीक सोने की पांच-पांच मन अशर्फियां लेकर खड़े हो गए। जो सैनिक सेना में भरती होना चाहते थे, उन पर ये अशर्फियां लुटाई जाती थीं। अशर्फियां लूटने के लिए दूर-दूर से लोग आने लगे और दल के दल शाही सेना में भरती होने लगे। इस प्रकार जब अल्लाउद्दीन दिल्ली पहुँचा तो उसके पास 56 हजार घुड़सवार तथा 70 हजार पैदल सिपाही हो गए थे।

जब दिल्ली की सेना ने अल्लाउद्दीन का मार्ग रोका तो दिल्ली के सैनिकों को भी अल्लाउद्दीन की सेना में भरती होने का अवसर दिया गया तथा वे भी अशर्फियाँ लूटने के लालच में शाही सेना छोड़कर अल्लाउद्दीन की सेना में भरती होने लगे।

दिल्ली के लालची अमीरों को भी मुँह मांगा पैसा देकर अल्लाउद्दीन ने अपनी ओर मिला लिया। सैनिकों एवं अमीरों की गद्दारी देखकर मलिका जहान ने अपने पुत्र अर्कली खाँ को दिल्ली आने तथा परिवार की सहायता करने के लिए संदेश भिजवाये किंतु अर्कली खाँ ने उन संदेशों पर ध्यान नहीं दिया। इससे मलिका जहान दिल्ली में अकेली पड़ गई।

जब अल्पवय सुल्तान कद्र खाँ ने अपने चचेरे भाई एवं बहनोई अल्लाउद्दीन का सामना करने का विचार किया तो रहे-सहे अमीर भी अपने सैनिक लेकर अल्लाउद्दीन की तरफ जा मिले। इससे मलिका जहान कद्र खाँ तथा परिवार को लेकर अपने पुत्र अर्कली खाँ के पास मुल्तान भाग गई। इस प्रकार बिना लड़े ही, अल्लाउद्दीन खिलजी का दिल्ली के तख्त पर अधिकार हो गया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

जलाली अमीर (91)

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जलाली अमीर

पूर्व सुल्तान जलालुद्दीन खिलजी के विश्वस्त अमीरों को जलाली अमीर कहा जाता था। चूंकि अल्लाउद्दीन खिलजी ने सुल्तान जलालुद्दीन की हत्या की थी, इसलिए जलाली अमीर अल्लाउद्दीन को क्षमा करने को तैयार नहीं थे। इसलिए नए सुल्तान ने जलाली अमीर अंधे करके जेल में ठूंस दिए।

जिस समय अल्लाउद्दीन खिलजी दिल्ली का शासक बना, वह बहुत ही उथल-पुथल भरा समय था। उसके पूर्ववर्ती, दिल्ली के ग्यारह सुल्तानों में से आठ सुल्तनों की मृत्यु षड़यंत्रों एवं युद्ध के मैदानों में हुई थी। केवल तीन सुल्तान ही अपनी मौत मरे थे।

अल्लाउद्दीन खिलजी तख्त पर तो बैठ गया किंतु उसे राज्य का अपहर्त्ता तथा अपराधी समझा जाता था, क्योंकि उसने ऐसे व्यक्ति की हत्या करवाई थी जो उसका अत्यन्त निकट सम्बन्धी तथा बहुत बड़ा शुभचिन्तक था। अतः जलालुदद्ीन का वध बड़ा ही नृशंस तथा घृणित कार्य समझा गया।

जलालुद्दीन खिलजी के उत्तराधिकारियों का भी अभी तक नाश नहीं हुआ था। जलालुद्दीन की बेगम मलिका जहान, मंझला पुत्र अर्कली खाँ, छोटा पुत्र कद्र खाँ उर्फ रुकुनुद्दीन इब्राहीम और जलालुद्दीन का मंगोल दामाद उलूग खाँ अभी जीवित थे। उनके झण्डे के नीचे अब भी विशाल सेनाएँ संगठित हो सकती थीं।

अल्लाउद्दीन ने अमीरों का विश्वास अर्जित करने के लिए सोने-चाँदी की मुद्राओं का मुक्तहस्त से वितरण किया। उसके पास अशर्फियों की कोई कमी नहीं थी, वह कई मन अशर्फियां देवगिरि के यादवों से लूटकर लाया था। उसने सैनिकों को छः मास का वेतन पारितोषिक के रूप में दिलवाया।

अल्लाउद्दीन ने शेखों तथा आलिमों को दिल खोलकर धन एवं धरती से पुरस्कृत किया। इस कारण लालची अमीर अल्लाउद्दीन के विश्वासघात तथा घृणित कार्य को भूलकर उसकी उदारता की प्रशंसा करने लगे। प्रायः समस्त बड़े अमीर अल्लाउद्दीन के समर्थक बन गए।

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अल्लाउद्दीन खिलजी ने कुछ ऊँचे पदाधिकारियों को पूर्ववत् उनके पदों पर बने रहने दिया और शेष पदों पर अपने सहायकों तथा सेवकों को नियुक्त कर दिया। इससे अल्लाउद्दीन की स्थिति बड़ी दृढ़ हो गई। यद्यपि अल्लाउद्दीन को चार योग्य अमीरों- उलूग खाँ, नसरत खाँ, जफर खाँ तथा अल्प खाँ की सेवाएँ प्राप्त हो गईं तथापि दिल्ली सल्तनत के जलाली अमीर अल्लाउद्दीन को क्षमा करने के लिए तैयार नहीं थे। पूर्व सुल्तान जलालुद्दीन खिलजी के विश्वस्त अमीरों को जलाली अमीर कहा जाता था।

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अल्लाउद्दीन को इन जलाली अमीरों से बड़ा भय लगता था क्योंकि ये बड़े कुचक्री और दुस्साहसी होते थे। जलालुद्दीन के इन स्वामिभक्त सेवकों में अहमद चप का नाम प्रमुख है। वह बड़ा ही निर्भीक तथा साहसी तुर्की अमीर था और जलालुद्दीन तथा उसके उत्तराधिकारियों में उसकी अटूट निष्ठा थी। अल्लाउद्दीन के सौभाग्य से मलिक अहमद चप मरहूम सुल्तान जलालुद्दीन की बेवा मलिका जहान तथा उसके द्वारा नियुक्त अवयस्क सुल्तान कद्र खाँ के साथ मुल्तान चला गया था, इसलिए एकदम से उसके विरुद्ध कार्यवाही किए जाने की आवश्यकता नहीं थी। कुछ समय बाद जब अल्लाउद्दीन ने दिल्ली पर अपनी पकड़ मजबूत कर ली, तब उसने अपने दो सेनानायकों उलूग खाँ (अल्लाउद्दीन का भाई) और जफर खाँ को मुल्तान पर आक्रमण करने भेजा। अल्लाउद्दीन के सेनापतियों ने मलिका जहान, अर्कली खाँ, कद्र खाँ, अहमद चप और उलूग खाँ ( मंगोल सरदार) को बंदी बनाकर दिल्ली रवाना कर दिया। पाठकों को यह बताना समीचीन होगा कि इस समय दो उलूग खाँ थे। एक उलूग खाँ मंगोलों का सरदार था जो कि चंगेज खाँ का पोता था और जिसे मरहूम सुल्तान जलालुद्दीन ने अपना दामाद बनाया था जबकि दूसरा उलूग खाँ अल्लाउद्दीन खिलजी का छोटा भाई था।

उलूग खाँ ने पूर्ववर्ती सुल्तान जलालुद्दीन की हत्या करवाने में प्रमुख भूमिका निभाई थी। हांसी के निकट अर्कली खाँ, कद्र खाँ, अहमद चप और उलूग खाँ को अंधा करके परिवार के सदस्यों से अलग कर दिया गया। बाद में अर्कली खाँ तथा कद्र खाँ को उनके पुत्रों सहित मौत के घाट उतार दिया गया। मलिका जहान को दिल्ली लाकर नजरबंद कर दिया गया। मलिक अहमद चप को हांसी के दुर्ग में बंद किया गया।

जलालुद्दीन के उत्तराधिकारियों का दमन करने के बाद अल्लाउद्दीन ने जलाली अमीरों के दमन का कार्य नसरत खाँ को सौंपा। नसरत खाँ ने जलाली अमीरों की सम्पत्ति छीनकर राजकोष में जमा करवाई। कुछ अमीर अन्धे कर दिए गए तथा कुछ कारगार में डाल दिए गए।

कुछ जलाली अमीर मौत के घाट उतार दिए गए। उनकी भूमियां तथा जागीरें छीन ली गईं। जलाली अमीरों से शाही खजाने में लगभग एक करोड़ रुपया प्राप्त हुआ। अल्लाउद्दीन ने दिल्ली की गलियों में घूमने वाले भिखारियों एवं दीन-दुखियों में अन्न वितरित करवाया। इससे जनता ने भी अल्लाउद्दीन की आलोचना करना बंद कर दिया।

इस प्रकार नितांत निरक्षर अल्लाउद्दीन ने प्रकृति से मिले सहज विवेक से काम लेते हुए न केवल दिल्ली पर अपनी पकड़ मजबूत कर ली अपितु मरहूम सुल्तान के परिवार तथा उसके प्रति निष्ठावान अमीरों से भी छुटकारा पा लिया। अल्लाद्दीन ने वित्तीय प्रबंधन के किसी कॉलेज में पढ़ाई नहीं की थी किंतु उसका वित्तीय प्रबंधन इतना कुशल था कि उसने सुल्तान बनने के लिए सोने की जो अशर्फिंयां लुटाई थीं, उनकी भरपाई जलाली अमीरों की सम्पत्तियों से कर ली।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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