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अल्लाउद्दीन खिलजी का शासन सर्वथा गौरवहीन था (118)

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अल्लाउद्दीन खिलजी का शासन सर्वथा गौरवहीन था

कई इतिहासकारों की दृष्टि में अल्लाउद्दीन खिलजी दिल्ली के सुल्तानों में सर्वश्रेष्ठ था किंतु कई अन्य इतिहासकार इस बात से सहमत नहीं हैं। वी. ए. स्मिथ ने उसके शासन को सर्वथा गौरवहीन बताते हुए लिखा है कि वह वास्तव में बड़ा ही बर्बर तथा क्रूर शासक था और न्याय का बहुत कम ध्यान रखता था। इसके विपरीत एल्फिन्स्टन के विचार में अल्लाउद्दीन खिलजी का शासन बड़ा ही गौरवपूर्ण था।

जो विद्वान अल्लाउद्दीन को दिल्ली सल्तनत का सर्वश्रेष्ठ सुल्तान मानते हैं उनका मानना है कि अल्लाउद्दीन एक वीर सैनिक तथा कुशल सेनानायक था। वह महत्त्वाकांक्षी, साहसी, दृढ़प्रतिज्ञ तथा प्रतिभावान शासक था। दिल्ली के सुल्तानों में कोई भी ऐसा नहीं है जौ सैनिक दृष्टिकोण से उसकी समता कर सके। सुल्तान में ऐसे गुण थे कि जो भी लोग उसकी अधीनता में कार्य करते थे, वे उसके अनुगामी हो जाते थे और सदैव सुल्तान के हित-साधन में संलग्न रहते थे।

यद्यपि अल्लाउद्दीन के पूर्ववर्ती तुर्क सुल्तानों ने भी भारत विजय का कार्य किया था परन्तु लगभग सम्पूर्ण भारत में तुर्क साम्राज्य का वास्तविक संस्थापक अल्लाउद्दीन खिलजी ही था। उसने अपनी महत्त्वाकांक्षाओं से प्रेरित होकर साम्राज्यवादी नीति का अनुसरण किया और एक अत्यन्त विशाल साम्राज्य की स्थापना की।

साम्राज्य संस्थापक के रूप में अल्लाउद्दीन ने तीन बड़े कार्य किए-

1. उत्तर भारत के राजपूत राज्यों पर विजय, जिससे अब तक के सुल्तान बचते रहे थे।

2. दक्षिण भारत की विजय जिसे करने की हिम्मत किसी अन्य सुल्तान ने नहीं की थी।

3. पश्चिमोत्तर सीमा की सुरक्षा की समुचित व्यवस्था।

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अल्लाउद्दीन के केवल ये तीन कार्य ही उसे दिल्ली के सुल्तानों में सर्वश्रेष्ठ स्थान प्रदान करने के लिए पर्याप्त हैं। अल्लाउद्दीन ने लगभग बीस वर्ष तक अत्यन्त सफलतापूर्वक शासन किया। उसके सम्पूर्ण शासन काल में शान्ति तथा सुव्यवस्था स्थापित रही। राज्य में चोरी, डकैती तथा लूटमार नहीं होती थी। उसका दण्ड विधान इतना कठोर था कि लोगों को अपराध करने तथा झगड़ा करने का साहस नहीं होता था।

अल्लाउद्दीन में उच्चकोटि की मौलिकता थी। उसके पूर्ववर्ती सुल्तानों ने जो संस्थाएं स्थापित की थीं, अल्लाउद्दीन उनसे संन्तुष्ट नहीं रहा और उसने उन संस्थाओं में कई बड़े परिवर्तन किये। उसने अपने उद्देश्यों की पूर्ति के लिए स्थायी सेना की व्यवस्था, भूमि सम्बधी नियमों का निर्माण, बाजारों का प्रबंधन आदि ऐसे कार्य किए जो उससे पहले किसी ने नहीं किए थे।

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इन इतिहासकारों की दृष्टि में अल्लाउद्दीन खिलजी दिल्ली का प्रथम सुल्तान था जिसने सम्पूर्ण उत्तरी भारत तथा दक्षिण पर सत्ता स्थापित करके राजनीतिक एकता स्थापित की। उसने प्रान्तीय शासन को केन्द्रीय शासन के अनुशासन तथा नियंत्रण में लाकर शासन में एकरूपता स्थापित की। इल्तुतमिश ने मुल्ला-मौलवियों को राज्यकार्य में हस्तक्षेप करने की पूरी छूट दी थी जबकि रजिया ने मुल्ला-मौलवियों को मुंह नहीं लगाया। बलबन ने मुल्ला-मौलवियों को सिर पर तो बैठाया किंतु उन्हें राजनीति में हस्तक्षेप नहीं करने दिया। मुल्ला-मौलवियों के मामले में अल्लाउद्दीन ने बलबन की नीति का अनुसरण किया। अल्लाउद्दीन की शासन-व्यवस्था का महत्त्व इस बात से प्रकट होता है कि शेरशाह सूरी तथा अकबर ने भी अपनी शासन व्यवस्था में उसके सिद्धांतों का समावेश किया। अल्लाउद्दीन स्वयं शिक्षित नहीं था परन्तु उसके दरबार में अमीर खुसरो, जियाउद्दीन बरनी तथा अमीर हसन आदि विद्वान रहते थे। अल्लाउद्दीन ने कई दुर्ग, मस्जिद एवं महल बनवाए। अल्लाउद्दीन को श्रेष्ठ मानने वाले इतिहासकारों के अनुसार उपर्युक्त तथ्यों के आधार पर उसे दिल्ली के सुल्तानों में सर्वोत्कृष्ट स्थान मिलना चाहिए किंतु जो इतिहासकार अल्लाउद्दीन खिलजी को दिल्ली के सुल्तानों में सर्वश्रेष्ठ नहीं मानते, उनके अनुसार अल्लाउद्दीन ने कोई ऐसा कार्य नहीं किया जो स्थायी हो सका।

अल्लाउद्दीन के समकालीन शेख वशीर दीवाना ने लिखा है- ‘अल्लाउद्दीन के राज्य की कोई स्थायी नींव नहीं थी और खिलजी वंश के विनाश का कारण अल्लाउद्दीन के शासन की स्वाभाविक दुर्बलता थी।’

जदुनाथ सरकार ने लिखा है- ‘स्वेच्छाचारी शासन स्वभावतः अनिश्चित तथा अस्थायी होता है।’

अल्लाउद्दीन खिलजी का शासन भी स्वेच्छाचारी तथा निरंकुश था। राज्य की सारी शक्तियां केवल सुल्तान में केन्द्रीभूत थीं। इसलिए अल्लाउद्दीन का शासन अच्छा नहीं माना जा सकता और न ही उसे दिल्ली सल्तनत का सबसे महान सुल्तान माना जा सकता है। अल्लाउद्दीन ने अपनी सेना के बल पर एक विशाल साम्राज्य की स्थापना की थी और सेना के बल पर ही बीस साल तक उस पर शासन किया था। जिस सुल्तान का शासन जनता की इच्छा पर आधारित नहीं होकर सैनिक शक्ति द्वारा चलाया जाये, वह महान् नहीं माना जा सकता।

यदि हम इतिहासकारों की राय से निरपेक्ष होकर आकलन करें तो हम जान लेते हैं कि अल्लाउद्दीन खिलजी का शासन बड़ा ही क्रूर, निर्दयी तथा गौरवहीन था। वह बर्बरता तथा नृशंसता के साथ लोगों को दण्ड देता था। साधारण अपराधों के लिए भी अंग-भंग तथा मृत्यु दण्ड दिया करता था। वह बड़ा ही स्वार्थी था और अपने हित के लिए अपने निकटतम सम्बन्धियों एवं राज्याधिकारियों की हत्या करने में संकोच नहीं करता था।

सुल्तान का व्यक्तिगत जीवन बड़ा ही घृणित था। वह अस्वाभाविक संसर्ग का व्यसनी था। उसने दूसरे राजा की पत्नी छीनकर उसे अपनी बेगम बनाया। उसने अपने उन पुत्रों को जेल में डाला जिन्हें आगे चलकर सुल्तान बनना था!

सुल्तान अपनी हिन्दू प्रजा को घृणा तथा सन्देह की दृष्टि से देखता था तथा उसे सब प्रकार से अपमानित एवं पददलित करने का प्रयत्न करता था। हिन्दुओं को दरिद्र तथा विपन्न बनाना उसकी नीति का एक अंग था ताकि वे कभी भी सुल्तान के विरुद्ध विद्रोह न कर सकें।

अल्लाउद्दीन की समस्त सुधार योजनाएं सुल्तान तथा सल्तनत की स्वार्थपूर्ति के उद्देश्य से आरम्भ की गई थीं न कि लोक-कल्याण के लिये। उसकी योजनाओं से केवल उसके सैनिकों को लाभ हुआ, जनसाधारण को नहीं। उसकी सारी योजनाएं युद्धकालीन थीं जो शान्ति कालीन शासन के लिए अनुपयुक्त थीं।

अल्लाउद्दीन ने ऐसे युग में शासन किया था जब केन्द्रीभूत शासन की आवश्यकता थी परन्तु केन्द्रीभूत शासन की भी कुछ सीमाएं होती हैं। अल्लाउद्दीन इन सीमाओं का उल्लंघन कर गया। उसने केवल थोड़े से व्यक्तियों की सहायता से शासन किया, इसलिए उसका शासन लोकप्रिय नहीं बन सका और जब इन सहायकों की मृत्यु हो गई, तब उसके साम्राज्य का पतन हो गया।

अल्लाउद्दीन में साहित्य तथा कला के संवर्द्धन की प्रवृत्ति नहीं थी। उसका सारा ध्यान सेना को प्रबल बनाने तथा राज्य जीतने की ओर रहा। इसलिए सांस्कृतिक दृष्टि से उसका शासन गौरवहीन था। अल्लाउद्दीन अपने अमीरों को नीचा दिखाने के लिए प्रायः निम्न वर्ग के अयोग्य लोगों को प्रोत्साहन देकर उन्हें उच्च पद दिया करता था जो साम्राज्य के लिए बड़ा घातक सिद्ध हुआ।

अल्लाउद्दीन ने अपने पुत्रों को उचित शिक्षा नहीं दिलवाई और अपने उत्तराधिकारियों की रक्षा करने की बजाय उन्हें कारागृह में बंद कर दिया। उपर्युक्त तर्कों आधार पर कहा जा सकता है कि अल्लाउद्दीन का शासन सर्वथा गौरवहीन था और दिल्ली के सुल्तानों में उसे सर्वश्रेष्ठ स्थान प्रदान नहीं किया जा सकता।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

अल्लाउद्दीन खिलजी के अंतिम दिन (119)

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अल्लाउद्दीन खिलजी के अंतिम दिन

अल्लाउद्दीन खिलजी के अंतिम दिन अच्छे नहीं बीते। वह हर समय शराब के नशे में धुत्त रहता था और अपने महल में अकेला पड़ा हुआ पागलों की तरह दहाड़ें मार कर रोता था!

अल्लाउद्दीन खिलजी का जन्म ई.1266 में हुआ था। तीस साल की आयु में अर्थात् ई.1296 में वह सुल्तान बना था और ई.1316 तक वह शासन करता रहा किंतु उसके शासनकाल में ई.1312 से लेकर ई.1316 तक का समय प्रतिक्रिया का काल माना जाता है।

ई.1312 तक अल्लाउद्दीन खिलजी के समस्त उद्देश्य पूरे हो चुके थे। साम्राज्य विस्तार का कार्य पूरा हो चुका था। मंगोलों को बुरी तरह परास्त किया जा चुका था। उत्तर भारत में स्थानीय शासन पर भी कब्जा कसा जा चुका था तथा दक्षिण भारत में राजाओं से वार्षिक कर देना स्वीकार करवाकर उन्हें दिल्ली के अधीन लाया जा चुका था।

ई.1312 के आते-आते अल्लाउद्दीन खिलजी थकने लगा। मात्र 46 वर्ष की आयु में उसे बुढ़ापे ने घेर लिया जिसके कारण सुल्तान की मानसिक स्थिति ठीक नहीं रह गयी। उसके कई विश्वस्त अमीर एवं सेनापति भी मर गए।

राज्य की सैनिक शक्ति ई.1306 से ही धीरे-धीरे मलिक काफूर के हाथों में जाने लगी थी तथा ई.1312 के बाद मलिक काफूर का सेना पर पूरा नियंत्रण स्थापित हो गया। यद्यपि शहजादा खिज्र खाँ सुल्तान का उत्तराधिकारी घोषित कर दिया गया था परन्तु उसमें इतने विशाल साम्राज्य को संभालने की योग्यता नहीं थी।

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दरबार में दो दल बन गए थे। एक दल शहजादे खिज्र खाँ का था जिसे शहजादे की माँ मलिका-ए-जहाँ संभाल रही थी। शहजादे का मामा अल्प खाँ उसका सहयोग कर रहा था। दूसरा दल मलिक काफूर का था जिसका सेना के ऊपर प्रभाव था। मलिक काफूर की दृष्टि दिल्ली के तख्त पर थी। अतः वह ऐसी परिस्थितियाँ उत्पन्न करने लगा जिनसे सम्पूर्ण राजनैतिक शक्ति भी काफूर के हाथों में आ जाये।

मलिक काफूर सुल्तान की वृद्धावस्था जानकर अब उससे उन सब अपमानों एवं कष्टों का बदला लेना चाहता था जो मलिक काफूर ने जीवन भर सहे थे। मलिक काफूर का जन्म एक हिन्दू परिवार में हुआ था किंतु सुल्तान के सुखभोग के लिए उसे बलपूर्वक मुसलमान बनाया गया। सुल्तान के सुख भोग के लिए ही मलिक काफूर को हिंजड़ा बनाकर सुल्तान की पुरुष रखैल के रूप में रखा गया।

अब वह समय आ गया था जब मलिक काफूर अल्लाउद्दीन खिलजी का सर्वनाश कर दे। उसने राजपरिवार में फूट पैदा करने के लिए सुल्तान अल्लाउद्दीन को समझाया कि मलिका-ए-जहाँ, शहजादा खिज्र खाँ, अमीर अल्प खाँ और मुबारक खाँ सुल्तान की हत्या करवाने का प्रयत्न कर रहे हैं ताकि खिज्र खाँ को सुल्तान बनाया जा सके।

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अल्लाउद्दीन खिलजी, मलिक काफूर की बातों में आ गया और उसने अपने पुत्र खिज्र खाँ तथा मुबारक खाँ को ग्वालियर के कारागार में डलवा दिया। सुल्तान ने मलिका-ए-जहाँ को पुरानी दिल्ली में कैद कर लिया और अल्प खाँ की हत्या करवा दी। इससे अमीरों एवं राजघराने में अल्लाउद्दीन खिलजी के विरुद्ध अंसतोष की अग्नि और अधिक भड़क गई। इस असंतोष की चिन्गारियां अल्लाउद्दीन तक पहुंचने लगीं और उसे लगने लगा कि राजमहल का प्रत्येक व्यक्ति सुल्तान के प्राण लेना चाहता है। हत्या के भय से अल्लाउद्दीन खिलजी उन्मादी हो गया और वह जरा-जरा सी बात पर चिढ़कर लोगों के सिर तराशने (सिर काटने) के आदेश देने लगा। इससे स्थिति और अधिक बिगड़ने लगी। अब कोई भी व्यक्ति सुल्तान के निकट जाने एवं उसके सामने पड़ने को तैयार नहीं था। अल्लाउद्दीन के सेवक जब भोजन लाकर उसके समक्ष रखते तो सुल्तान को लगता था कि उसमें जहर मिला हुआ है। इसलिए वह भोजन की थालियां उठाकर फैंक देता और भोजन परोसने वालों को लात-घूंसों से पीटने लगता। जब अल्लाउद्दीन के अमीर उसे दूरस्थ राज्यों के समाचार लाकर देते कि अमुक गवर्नर अथवा राजा ने बगावत करके स्वयं को स्वतंत्र घोषित कर दिया तो अल्लाउद्दीन पागलों की तरह दहाड़ें मारकर रोने लगता।

जो तिलिस्म उसने तलवार के बल पर खड़ा किया था, वह तलवार पर पकड़ ढीली पड़ते ही विलुप्त होने लगा था।

अल्लाउद्दीन खिलजी के अंतिम दिन उतने ही बुरे थे जितना उसके जीवन का आरम्भिक भाग। वह बहुत छोटा बच्चा ही था जब उसके पिता का निधन हो गया था। जब वह जवान हुआ तो उसने अपने पालनकर्ता ताऊ (एवं श्वसुर) की हत्या कर दी और अब जबकि वह बूढ़ा हो रहा था, उसने अपनी पत्नी एवं जवान पुत्रों को जेल में डाल दिया था। इन्हीं परिस्थितियों में अल्लाउद्दीन खिलजी घातक रूप से बीमार पड़ा और 4 जनवरी 1316 को उसकी मृत्यु हो गयी। कुछ इतिहासकारों का मत है कि मलिक काफूर ने अल्लाउद्दीन खिलजी को विष देकर मार डाला।

अल्लाउद्दीन खिलजी के अंतिम दिन इतने बुरे थे कि उसकी बेगम मलिका-ए-जहाँ, बड़ा शहजादा खिज्र खाँ तथा उससे छोटा शहजादा शादी खाँ कारागृह में बन्द थे। मरहूम अल्लाउद्दीन के और भी कई पुत्र थे जिनमें से किसी एक को सुल्तान बनाया जाना था। चूंकि सेना पर मलिक काफूर का नियंत्रण था। इसलिए वही उत्तराधिकार का निर्णय कर सकता था।

मलिक काफूर ने तुर्की अमीरों को एकत्रित किया और उन्हें मरहूम सुल्तान द्वारा लिखी गई एक वसीयत दिखाई जिसमें सुल्तान ने अपने सबसे छोटे पुत्र शिहाबुद्दीन उमर को अपना उत्तराधिकारी और मलिक काफूर को उसका संरक्षक नियुक्त किया गया था।

उस समय शहजादा शिहाबुद्दीन उमर केवल पांच साल का था। स्वार्थी अमीरों ने इस वसीयत को स्वीकार कर लिया तथा शिहाबुद्दीन उमर को सुल्तान घोषित कर दिया। मलिक काफूर उसका संरक्षक बन गया। इस प्रकार राज्य की सारी शक्ति मलिक काफूर के हाथों में चली गई और वह सल्तनत का वास्तविक शासक बन गया। राज्य की बागडोर हाथ में आते ही मलिक काफूर ने खिलजी वंश के समर्थकों पर अत्याचार करने आरम्भ किये। उसने खिलजी वंश के समस्त समर्थकों को उनके पदों से हटा दिया।

इतना होने पर भी मरहूम सुल्तान का बड़ा शहजादा खिज्र खाँ तथा सुल्तान का दूसरा शहजादा शादी खाँ मलिक काफूर के लिए कोई बड़ा खतरा पैदा कर सकते थे। जब तक शहजादे जीवित थे, तब तक मलिक काफूर के लिए खतरे भी जीवित थे!

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

अल्लाउद्दीन खिलजी की बेगम से एक किन्नर ने विवाह कर लिया (120)

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अल्लाउद्दीन खिलजी की बेगम - www.bharatkaitihas.com
अल्लाउद्दीन खिलजी की बेगम से एक किन्नर ने विवाह कर लिया

मलिक काफूर ने अल्लाउद्दीन खिलजी की बेगम मलिका-ए-जहाँ की सारी सम्पत्ति छीन ली तथा मलिका को उसके पुत्र मुबारक खाँ के साथ ग्वालियर के जेल में बन्द कर दिया।

यद्यपि मरहूम सुल्तान अल्लाउद्दीन के दोनों बड़े पुत्र अल्लाउद्दीन के समय से ही कारागार में बंद थे तथापि वे किसी भी समय मलिक काफूर के लिए संकट उत्पन्न कर सकते थे। इसलिए मलिक काफूर ने अल्लाउद्दीन खिलजी के दोनों बड़े शहजादों की आँखें निकलवा लीं।

मलिक काफूर ने मरहूम सुल्तान के तीसरे पुत्र मुबारक खाँ की भी आँखें निकलवाने का प्रयास किया परन्तु उसे इस कार्य में सफलता नहीं मिली क्योंकि तभी मलिका ए जहाँ ने मलिक काफूर के समक्ष प्रस्ताव भिजवाया कि मैं तुझसे विवाह करना चाहती हूँ।

मलिक काफूर ने बेगम मलिका-ए-जहाँ का यह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया तथा मलिका से विवाह कर लिया। पाठकों को स्मरण होगा कि मलिक काफूर गुजरात से खरीदा गया एक हिन्दू गुलाम था जिसे किन्नर बनाकर तथा इस्लाम में परिवर्तित करके सुल्तान अल्लाउद्दीन की सेवा में पुरुष रखैल के रूप में प्रस्तुत किया गया था। इस प्रकार एक किन्नर जो जीवन भर अल्लाउद्दीन की पुरुष रखैल बनकर रहा था, उसने उसी की बेगम से विवाह कर लिया।

कुछ दिनों बाद मलिक काफूर ने मलिका की सारी सम्पत्ति छीन ली तथा मलिका को उसके पुत्र मुबारक खाँ के साथ ग्वालियर के जेल में बन्द कर दिया। इस प्रकार दुष्ट मलिक काफूर ने सल्तनत पर अपनी पकड़ को मजबूत बनाया परन्तु उसके ये समस्त प्रयत्न उस समय निष्फल सिद्ध हुए जब ग्वालियर के किले में बन्द शहजादा मुबारक खाँ कर्मचारियों को घूस देकर दुर्ग से निकल भागा और दिल्ली आ पहुँचा।

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शहजादे मुबारक खाँ ने कुछ अमीरों को अपनी ओर मिलाकर मलिक काफूर के विरुद्ध संगठन खड़ा किया तथा मलिक काफूर की हत्या कर दी। इस प्रकार दुष्ट मलिक काफूर के शासन का अंत हो गया।

आशीर्वादी लाल श्रीवास्तव ने लिखा है कि मलिक काफूर ने कुछ पेशेवर हत्यारों को धन देकर मुबारक खाँ की हत्या करने के लिए नियुक्त किया। जब ये हत्यारे मुबारक खाँ के पास पहुंचे तो मुबारक खाँ ने उन हत्यारों को अधिक धन देकर खरीद लिया तथा उन्हीं से मलिक काफूर की हत्या करवा दी। अब मुबारक खाँ, अपने छोटे भाई सुल्तान शिहाबुद्दीन उमर का संरक्षक बन गया।

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छः दिन बाद मुबारक खाँ ने पांच वर्षीय सुल्तान शिहाबुद्दीन उमर की आँखें निकलवा लीं और स्वयं कुतुबुद्दीन मुबारकशाह के नाम से तख्त पर बैठ गया। कुतुबुद्दीन मुबारकशाह ने तख्त पर बैठते ही मलिक काफूर के हत्यारों को पकड़ मंगवाया क्योंकि अब वे अपने लिए अधिक धन और सम्मान की मांग कर रहे थे। कुतुबुद्दीन ने उन हत्यारों पर मलिक काफूर की हत्या करने का आरोप लगाकर उन्हें फांसी पर चढ़ा दिया। मुबारक खाँ अनुभव-शून्य नवयुवक था। तख्त पर बैठने के समय उसकी आयु 17-18 वर्ष थी तथा उसने शासन में किसी भी पद का दायित्व नहीं संभाला था। दिल्ली के तख्त पर बैठने के उपरान्त उसने अपनी स्थिति को मजबूत बनाने के लिए सेना को सन्तुष्ट करने का प्रयत्न किया। उसने सैनिकों को छः महीने का वेतन पेशगी दे दिया। मुबारकशाह ने अपने पिता अल्लाउद्दीन के समय के बनाए हुए समस्त कठोर नियमों को हटा दिया। इससे लोगों ने राहत की सांस ली तथा चारों ओर अच्छा वातावरण बना किंतु मुबारक खिलजी पुराने नियमों एवं व्यवस्थाओं के स्थान पर नये नियम अथवा नई व्यवस्थाएँ नहीं बना सका। इससे लोगों में उच्छृखंलता आ गई और उनका नैतिक स्तर बहुत गिर गया। साम्राज्य के विभिन्न भागों में उपद्रव तथा विद्रोह होने लगे।

मुबारक खाँ को सबसे पहले गुजरात में हुए विद्रोह का सामना करना पड़ा। अल्प खाँ की हत्या के बाद गुजरात में विद्रोह की अग्नि भड़क उठी थी। गुजरात ने दिल्ली से अपना सम्बन्ध विच्छेद कर लिया था। मुबारक खिलजी ने एक विशाल सेना भेजकर इस विद्रोह को शान्त किया और गुजरात में फिर से दिल्ली सल्तनत की सत्ता स्थापित की।

इन दिनों देवगिरि में यादव राजा हरपाल देव शासन कर रहा था। दिल्ली की गड़बड़ी से लाभ उठा कर उसने विद्रोह का झण्डा खड़ा कर दिया। इस पर मुबारक खाँ ने एक सेना लेकर देवगिरि पर अभियान किया। इस युद्ध में हरपाल देव परास्त हो गया। उसकी जिन्दा खाल खिंचवा ली गई और देवगिरि में एक मुसलमान शासक नियुक्त कर दिया गया।

जब सुल्तान मुबारक खाँ देवगिरि से दिल्ली लौट रहा था तब उसे असदुद्दीन के षड़यंत्र का सामना करना पड़ा जो अल्लाउद्दीन का भतीजा और मुबारक खाँ का चचेरा भाई था। असदुद्दीन ने मुबारक खाँ की हत्या करके तख्त हासिल करने का षड्यन्त्र रचा। मुबारक खाँ को इस षड्यन्त्र का पता लग गया। उसने असदुद्दीन तथा उसके साथियों की उनके सम्बन्धियों सहित हत्या करवा दी।

अब मुबारक खाँ ने खिज्र खाँ की ओर ध्यान दिया। खिज्र खाँ जिसे पहले ही अन्धा कर दिया गया था, इन दिनों अपनी स्त्री देवल देवी के साथ ग्वालियर के किले में बंद था। मुबारक खाँ ने खिज्र खाँ को आदेश भिजवाया कि वह देवल देवी को दिल्ली भेज दे। खिज्र खाँ ने इस आज्ञा का पालन नहीं किया। इसलिए उसकी भी हत्या करवा दी गई।

इसके बाद देवल देवी को दिल्ली लाया गया। मुबारक खाँ ने उसे अपने हरम में डाल लिया। पाठकों को स्मरण होगा कि अल्लाउद्दीन खिलजी ने अन्हिलवाड़ा के राजा कर्ण बघेला की रानी कमलावती को अपने हरम में डाल लिया था और उसकी पुत्री देवल देवी को खिज्र खाँ की बेगम बना दिया था। यह वही देवलदेवी थी जो मुबारक खाँ की बड़ी भाभी लगती थी किंतु अब मुबारक खाँ की बेगम बना दी गई। खिलजी राजवंश में नैतिकता का प्रश्न तो अल्लाउद्दीन खिलजी के समय से ही अप्रासंगिक हो चुका था।

आगे बढ़ने से पहले हमें इस बात पर अवश्य विचार करना चाहिए कि यह कैसा राजपरिवार था जिसने राज्य के वास्तविक उत्तराधिकारी को स्वयं ही बर्बाद करके अपने भविष्य को जलाकर राख कर दिया था!

होना तो यह चाहिए था कि अल्लाउद्दीन खिलजी अपने बड़े पुत्र खिज्र खाँ के जीवन की रक्षा करता तथा खिज्र खाँ के छोटे भाई, खिज्र खाँ को सुल्तान बनाकर राजपरिवार एवं सल्तनत को सुरक्षित बनाते किंतु खिज्र खाँ अपने ही बाप और भाइयों द्वारा छला गया और पूरी तरह बर्बाद किया गया। उसे पिता ने जेल में डाला, एक भाई ने आँखें फोड़ीं तथा दूसरे भाई ने उसकी हत्या करके उसकी पत्नी छीन ली।

ऐसी स्थिति में यह कहा जा सकता है कि अल्लाउद्दीन खिलजी तथा उसके परिवार को शत्रुओं की आवश्यकता नहीं थी, वे स्वयं ही अपने शत्रु सिद्ध हुए।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

सुल्तान मुबारक खाँ नंगा होकर दरबार में दौड़ने लगा (121)

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सुल्तान मुबारक खाँ नंगा होकर दरबार में दौड़ने लगा

सुल्तान मुबारक खाँ

अल्लाउद्दीन खिलजी का तीसरे नम्बर का पुत्र मुबारक खाँ मलिक काफूर तथा अपने छोटे भाई शिहाबुद्दीन उमर की हत्या करके मुबारक शाह के नाम से स्वयं सुल्तान बन गया। उसने अपने बड़े भाई खिज्र खाँ की हत्या करके उसकी पत्नी देवलदेवी को भी छीन लिया। उन्हीं दिनों मुबारक शाह ने अपने अन्य जीवित भाई शादी खाँ की भी हत्या करवा दी। जिन चचेरे भाइयों ने मुबारकशाह के विरुद्ध विद्रोह करने का प्रयास किया था, उस परिवार में किसी भी स्त्री-पुरुष को जीवित नहीं छोड़ा गया।

मुबारक खाँ अधिक दिन तक दिल्ली के तख्त पर बैठा नहीं रह सका। उसके पतन का कारण उसकी क्रूरता तथा विलासिता की प्रवृत्ति तो थी ही, साथ ही गुजरात का रहने वाला खुसरो खाँ नामक एक अमीर भी उसके पतन के लिए जिम्मेदार था।

खुसरो खाँ गुजरात का रहने वाला हिन्दू था। उसका वास्तविक हिन्दू नाम अब ज्ञात नहीं है। उसे किसी समय इस्लाम स्वीकार करने को बाध्य किया गया था। इसलिए वह खिलजियों से बदला लेने की ताक में था।

खुसरो खाँ संयोगवश मुबारक खाँ के सम्पर्क में आया और उसका विश्वस्त सहायक बन गया। जब मुबारक खाँ दिल्ली का सुल्तान बना तो खुसरो खाँ के भाग्य का भी उत्कर्ष हो गया और वह दिल्ली दरबार का प्रमुख अमीर बन गया। उसे बिना किसी आज्ञा के सुल्तान के निजी कक्ष में प्रवेश करने की छूट थी।

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मुबारक खाँ ने खुसरो को तेलंगाना के राय का विद्रोह दबाने के लिए भेजा। खुसरो को इस कार्य में पूर्ण सफलता प्राप्त हुई। खुसरो खाँ दक्षिण में अपना स्वतन्त्र राज्य स्थापित करना चाहता था परन्तु मुबारक खाँ ने उसे दिल्ली बुलवा लिया। अब खुसरो ने दिल्ली में अपनी महत्त्वाकांक्षाओं को विस्तार देना आरम्भ किया।

खुसरो खाँ ने सुल्तान मुबारक खाँ को नष्ट करने और दिल्ली सल्तनत पर कब्जा करने के लिए मुबारक खाँ को दुर्गुणों में फंसाना आरम्भ किया। स्त्री एवं शराब के व्यसनों में फंस जाने पर मुबारक खाँ की क्रूरता और विलासिता बढ़ती चली गई। वह दिन-रात शराब के नशे में डूबा रहता और विलासिता में चूर होकर औरत के कपड़े पहनकर दरबार में आने लगा।

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मुबारक शाह ने भांडों तथा वेश्याओं को आज्ञा दी कि वे दरबार के पुराने तथा अनुभवी अमीरों का अभद्र संकेतों तथा अशिष्ट भाषा से अभिवादन करें। जियाउद्दीन बरनी ने लिखा है कि कभी-कभी सुल्तान नंगा होकर अपने दरबारियों के बीच दौड़ा करता था। उसने खलीफा की उपाधि भी धारण कर ली। जब मुबारकशाह के श्वसुर जफर खाँ और एक निकट सम्बन्धी शहीम ने सुल्तान की हरकतों का विरोध किया तो मुबारकशाह ने उन दोनों को मरवा दिया। कुछ समय बाद देवगिरि के मुस्लिम सूबेदार मलिक यकलाकी ने बगावत का झण्डा बुलंद किया किंतु दक्षिण में नियुक्त एक अन्य मुस्लिम अधिकारी ने मलिक यकलाकी को पकड़कर दिल्ली भेज दिया। सुल्तान ने मलिक यकलाकी के नाक-कान कटवाकर उसे समाना का गवर्नर बनाकर भेज दिया। खुसरो खाँ ने सुल्तान से आज्ञा प्राप्त करके 40 हजार अश्वारोहियों की एक विशेष सेना तैयार की जिसमें उसने अपनी जाति के परवारी अथवा बरवार लोगों को भर्ती किया। इनमें बहुत से लोग खुसरो खाँ के सम्बन्धी थे। वह सेना खुसरो खाँ की निजी सेना के रूप में कार्य करती थी। खुसरो खाँ ने इसी सेना के बल पर सुल्तान मुबारक खाँ खिलजी को मारने तथा दिल्ली का तख्त हड़पने की योजना बनाई।

सुल्तान के आदेश से खुसरो खाँ सुल्तान के महल में बने एक कक्ष में रहता था। एक दिन खुसरो ने सुल्तान से अनुरोध किया कि मेरे सगे-सम्बन्धी मुझसे मिलने के लिए आते हैं, उन्हें महल के दरवाजे पर न रोका जाए, अपितु मुझसे मिलने के लिए सीधे अंदर आने दिया जाए। सुल्तान ने खुसरो की यह बात मान ली। इस प्रकार खुसरो के सिपाही दिन-रात बिना किसी रोक-टोक के महल के भीतर आने-जाने लगे।

अब खुसरो के लिए सुल्तान के विरुद्ध षड़यंत्र करना और उसकी हत्या करना आसान हो गया। 4 अप्रेल 1320 को खुसरो खाँ अपने साथियों के साथ सुल्तान के कक्ष में घुस गया। जब नशे में धुत्त सुल्तान ने खुसरो से पूछा कि यह शोरगुल क्यों हो रहा है? तो खुसरो ने उत्तर दिया कि कुछ घोड़े छूट गए हैं और हमारे लोग उन्हें पकड़ने का प्रयत्न कर रहे हैं। इसलिए यह शोरगुल हो रहा है।

खुसरो यह कह ही रहा था कि खुसरो के कुछ सशस्त्र सिपाही सुल्तान मुबारक खाँ के कक्ष में घुस गए और सुल्तान को पकड़ने के लिए दौड़े! इस पर सुल्तान मुबारक खाँ आतंकित होकर उछल पड़ा और रनिवास की ओर भागा किंतु खुसरो खाँ ने सुल्तान मुबारक खाँ के बाल पकड़ लिये। जहीरा नामक एक आदमी ने भालों से छेदकर सुल्तान मुबारक खाँ खिलजी को वहीं पर मार डाला। इस प्रकार मुबारक खाँ खिलजी वंश का अंतिम सुल्तान सिद्ध हुआ।

नासिरूद्दीन खुसरोशाह

मुबारक खाँ खिलजी का सिर धड़ से अलग करके नीचे चौक में फैंक दिया गया। दूसरे दिन खुसरो ने सुल्तान की मृत्यु का घोषणा कर दी और 15 अप्रेल 1320 को स्वयं नासिरूद्दीन खुसरोशाह के नाम से दिल्ली के तख्त पर बैठ गया। इस प्रकार खिलजी वंश का अन्त हो गया। अल्लाउद्दीन खिलजी के शासन में खिलजी वंश का शासन चरमोत्कर्ष को पहुँच गया था परन्तु उसकी मृत्यु के केवल चार साल में खिलजी राजपरिवार का समूल नाश हो गया।

दिल्ली के खिलजियों का नाश वस्तुतः उस काल के मुस्लिम शासकों की स्वाभाविक कमजोरियों का इतिहास है। उस काल के मुस्लिम शासक एक जैसी कमजोरियों से ग्रस्त थे। एक ओर तो उन्हें अनुशासनहीन, लालची एवं घमण्डी तुर्की अमीरों के बल पर अपने राज्य का ताना-बना खड़ा करना था तो दूसरी ओर एक उद्दण्ड सेना को धन के बल पर अपने नियंत्रण में रखना था।

तीसरी ओर उन्हें एक ऐसी जनता पर शासन करना था जो सुल्तानों को अपना शत्रु मानती थी और सुल्तान उस जनता को अपना शत्रु मानते थे। चौथी ओर उनकी सल्तनत चारों ओर से हिन्दू शासकों से घिरी हुई थी जो हर समय दिल्ली सल्तनत को नष्ट कर देने की फिराक में रहते थे। इन सब कारणों से प्रत्येक सुल्तान को दिल्ली सल्तनत मुट्ठी में बंद रेत की तरह लगता था जो हर क्षण हाथों से फिसलती हुई प्रतीत होती थी।

खिलजी राजवंश अपने स्वामियों की छलपूर्वक हत्या करके तख्त हथियाने में सफल हुआ था। इन छल और हत्याओं ने खिलजी राजवंश का तब तक पीछा नहीं छोड़ा जब तक कि इस परिवार के अंतिम शहजादे की हत्या नहीं कर दी गई। नैतिकता तो इस परिवार को जैसे छू भी नहीं गई थी। ऐसे राजपरिवार के साथ किसी की भी सहानुभूति नहीं थी। इस कारण खिलजी जिस तेजी से उभरे थे, उसी तेजी से इतिहास के नेपथ्य में चले गए।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

तुर्की अमीर इस्लाम के नाम पर भारतीय अमीरों को नष्ट करने लगे! (122)

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तुर्की अमीर इस्लाम के नाम पर भारतीय अमीरों को नष्ट करने लगे!

जब नासिरुद्दीन खुसरोशाह अल्लाउद्दीन खिलजी के पुत्र को मारकर दिल्ली का सुल्तान बन गया तो तुर्की अमीर इस परिवर्तन को सहन नहीं कर सके। वे किसी भारतीय मुसलमान को सुल्तान के रूप में स्वीकार नहीं कर सकते थे। इसलिए तुर्की अमीर इस्लाम के नाम पर भारतीय अमीरों को नष्ट करने लगे!

गुजरात के एक हिन्दू ने जो कि कुछ ही समय पहले मुसलमान बना था, अंतिम खिलजी सुल्तान मुबारक खाँ की हत्या करके नासिरुद्दीन खुसरोशाह के नाम से सुल्तान बन गया किंतु तुर्की अमीर उसे निम्न जाति का कहकर उसे पसंद नहीं करते थे।

कुछ इतिहासकारों ने नासिरुद्दीन खुसरोशाह को बरवार जाति का बताया है जो बैस राजपूतों की एक शाखा थी। आजादी के समय गौण्ड क्षेत्र में बरवार जाति बड़ी संख्या में निवास करती थी जिन्हें अंग्रेजों ने ‘जुरायम पेशा कौम’ घोषित कर रखा था। आजादी के बाद इन्हें समाज की मुख्य धारा में लिया गया।

वर्तमान समय में ये लोग सम्पूर्ण उत्तरी भारत में निवास करते हैं। कुछ इतिहासकारों ने नासिरुद्दीन खुसरोशाह को परवारी जाति का बताया है। कुछ लोगों का अनुमान है कि वह रेवारी जाति का था। कुछ इतिहासकारों ने लिखा है कि वह भारवार अथवा गड़रिया नामक नीची समझे जाने वाली जाति का गुजराती हिन्दू था।

इस प्रकार नासिरुद्दीन खुसरोशाह की जाति के बारे में अलग-अलग राय प्रकट की जाती है किंतु अनुमान होता है कि वह गुजरात में रहने वाली रैवारी जाति का था। यह जाति आज भी बड़ी संख्या में गुजरात में निवास करती है। यह मूलतः चरवाहा जाति है तथा रैवारी शब्द का उद्भव भी चरवाहा से हुआ है।

हालांकि मुस्लिम इतिहासकारों ने उसे नीची हिन्दू जाति का बताया है किंतु भारतीय समाज में परम्परागत रूप से रैबारी को उच्च एवं सर्वण जाति माना जाता है। संभवतः मुस्लिम इतिहासकारों ने नासिरुद्दीन खुसरोशाह को नीचा दिखाने के लिए उसे नीची जाति का हिन्दू लिखा है।

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नासिरूद्दीन खुसरोशाह ने अपने उन साथियों को ऊँचे पद देकर अपनी स्थिति को मजबूत बनाने का प्रयास किया जिहोंने नासिरुद्दीन खुसरोशाह को तख्त प्राप्त करने में सहयोग किया था। उसने पुराने अमीरों को उनके पदों पर रहने देकर और उन्हें नई पदवियां देकर प्रसन्न करने का प्रयास किया। नासिरुद्दीन खुसरोशाह को शेख निजामुद्दीन औलिया का नैतिक समर्थन प्राप्त हो गया परन्तु तुर्की अमीर उसे पसंद नहीं करते थे क्योंकि खुसरो मूलतः हिन्दू था तथा कुछ ही समय पहले मुसलमान बना था। इसलिए तुर्की अमीरों को वह सुल्तान के रूप में स्वीकार नहीं था।

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 खुसरोशाह हिन्दुओं में भी निम्न समझे जाने वाले वर्ग से था। इसलिए स्वयं को उच्च रक्त वंश का समझने वाले तुर्की अमीर उसे सुल्तान स्वीकार करने में अपनी तौहीन समझते थे। खुसरोशाह हिन्दुओं के साथ विशेष सहानुभूति दिखाता था और अपने सम्बन्धियों को शासन में उच्च पद देता था। खुसरो ने कुछ तुर्की अमीरों को अपमानित किया था। इससे वे भी उसके प्रबल विरोधी थे। इन सब कारणों से तुर्की अमीरों ने खुसरो पर आरोप लगाया कि वह आधा हिन्दू है तथा शाही महलों में मूर्तिपूजा को प्रोत्साहन देता है। वस्तुतः खुसरो के बहुत से सम्बन्धी अब भी हिन्दू थे और वे महलों में रहकर मूर्ति पूजा करते थे। वस्तुतः तुर्की अमीरों को यह भय था कि यदि खुसरो शाह का राज्य जम गया तो भारत से तुर्की अमीरों का पत्ता साफ होने में अधिक समय नहीं लगेगा। इससे पहले भी जब इमादुद्दीन रेहानी नामक एक भारतीय मुसलमान ने दिल्ली सल्तनत के प्रधानमंत्री का पद प्राप्त किया था तब तुर्की अमीरों ने उसे केवल एक साल के भीतर ही नष्ट कर दिया था। यह दूसरा अवसर था जब किसी भारतीय मुसलमान ने शासन में ऊंचा उठने का प्रयास किया था। इसलिए कुछ तुर्की अमीरों एवं मलिकों ने नारा बुलंद किया कि हिन्दुस्तान में इस्लाम खतरे में है।

जियाउद्दीन बरनी भी एक तुर्की अमीर था। उसने खुसरोशाह की बड़ी कटु आलोचना एवं निंदा की है और यह दिखाने का प्रयास किया है कि खुसरो शाह मूर्तिपूजक, आधा हिन्दू, दुष्ट एवं जनता में अलोकप्रिय था।

जियाउद्दीन बरनी ने लिखा है-

‘खुसरोशाह बरवारों अथवा परवारी हिन्दुओं की सहायता से अलाई तथा कुतुबी तख्त पर बैठ गया। अपने सिंहासनारोहण के पांच ही दिन के भीतर उस तुच्छ तथा पतित ने महल में मूर्तिपूजा प्रारम्भ कर दी। उसके राज्य में बरवार अधिकार सम्पन्न हो गए।

पश्चाताप की अग्नि तथा अत्याचार की लपट आकाश तक पहुंचने लगी। बरवार तथा हिन्दुओं ने अपने अधिकार के नशे में कुरान का कुर्सी के स्थान पर प्रयोग करना प्रारम्भ कर दिया। मस्जिद की ताकों में मूर्तियां रख दी गईं और मूर्तिपूजा होने लगी।

उसका राज्याभिषेक होने से तथा बरवारों और हिन्दुओं के अधिकार सम्पन्न हो जाने से कुफ्र तथा काफिरी के नियमों को उन्नति प्राप्त होने लगी। खुसरो खाँ ने इस उद्देश्य से कि बरवारों तथा हिन्दुओं को विशेष अधिकार प्राप्त हो जाएं और अत्यधिक हिन्दू उसके सहायक बन जाएं, खजाना लुटाना तथा धन-सम्पत्ति बांटना प्रारम्भ कर दिया।

हिन्दू समस्त इस्लामी राज्य में उत्पात मचा रहे थे। वे खुशियां मनाते और इस बात पर प्रसन्न होते थे कि देहली में पुनः हिन्दुओं का राज्य स्थापित हो गया है। इस्लामी राज्य का अंत हो गया है।’

इब्नबतूता ने लिखा है- ‘खुसरो खाँ ने गोहत्या का निषेध कर दिया क्योंकि हिन्दू धर्म में इसकी मनाही थी।’

निजामुद्दीन अहमद ने लिखा है- ‘उसके राज्य में मस्जिदों का विनाश सामान्य हो गया।’

निःसंदेह जियाउद्दीन बरनी, इब्नबतूता एवं निजामुद्दीन अहमद के कथन अतिश्योक्तिपूर्ण हैं क्योंकि गैर-तुर्की अमीरों में खुसरोशाह काफी लोकप्रिय था और वे अमीर चाहते थे कि दिल्ली सल्तनत में तुर्की अमीरों का एकाधिकार समाप्त हो और भारत के मुसलमान ही दिल्ली का तख्त संभालें। यहाँ तक कि उस काल का प्रमुख सूफी दरवेश निजामुद्दीन औलिया भी खुसरोशाह के शासन को अच्छा समझता था और उसके पक्ष में था। 

किशोरीसरन लाल ने लिखा है-

‘यह सत्य है कि कुछ बरवारियों ने महल के भीतर मूर्तियों की पूजा की और कुरान की प्रतियों को फाड़ा। उन्हें ज्ञात था कि मुस्लिम विजेताओं ने मंदिर तोड़े थे और धार्मिक पुस्तकें जलाई थीं। अतः बरवारी लोग मुसलमानों से भी वैसा बर्ताव कर रहे थे और सिंहासन प्राप्त करने में सुल्तान पर जो अनुग्रह उन्होंने किया था, उनके कारण सुल्तान ने उनके कार्यों में हस्तक्षेप नहीं किया।

वास्तव में इस बात का एक भी उदाहरण नहीं मिलता कि नासिरुद्दीन खुसरो इस्लाम विरोधी था। फिर भी तुर्की अमीरों ने उसके बारे में जमकर दुष्प्रचार किया कि वह इस्लाम विरोधी है। यह स्थिति लगभग दो महीने तक रही।’

तुर्की अमीरों की बेचैनी का लाभ उठाने के लिए दिपालपुर के हाकिम गाजी तुगलक ने खुसरोशाह के विरुद्ध मोर्चा खोला। उसने अन्य हाकिमों को भड़काकर उन्हें अपने पक्ष में संगठित करने का प्रयास आरम्भ कर दिया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

गाजी मलिक भारत का सुल्तान बन गया (123)

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गाजी मलिक भारत का सुल्तान बन गया

गाजी मलिक ने सिबिस्तान, मुल्तान तथा समाना के उन तुर्की सेनापतियों से सहयोग मांगा जो एक हिन्दुस्तानी मुसलमान को सुल्तान के रूप में नहीं देखना चाहते थे। इन प्रांतों में नियुक्त तुर्की मूल के बहुत से अधिकारी गाजी मलिक का सहयोग करने को तैयार हो गए।

अंतिम खिलजी सुल्तान मुबारकशाह को मारकर एक भारतीय मुसलमान नासिरुद्दीन खुसरोशाह के नाम से दिल्ली के तख्त पर बैठ गया किंतु कुछ तुर्की अमीरों ने इसे अपने भविष्य के लिए खतरे की घण्टी समझा और वे ‘हिन्दुस्तान में इस्लाम खतरे में है’ का नारा देकर खुसरोशाह के विरुद्ध एकत्रित होने का प्रयास करने लगे।

इस अभियान का नेतृत्व मलिक गाजी नामक एक तुर्की अमीर ने किया जो दिपालपुर का गवर्नर था। वास्तव में इस अभियान की शुरुआत मलिक गाजी के पुत्र जूना खाँ ने की थी। जूना खाँ को फखरूद्दीन जूना भी कहा जाता था। वह शाही सेना के घोड़ों का अधिकारी था तथा अल्लाउद्दीन खिलजी के समय से मलिक काफूर के साथ बड़े अभियानों पर भेजा जाता था। उसने कुछ तुर्की अमीरों के साथ मिलकर सुल्तान को उसके तख्त से हटाने के लिए एक षड़यंत्र रचा तथा इस षड़यंत्र में अपने पिता मलिक गाजी को भी सम्मिलित कर लिया।

गाजी मलिक ने सिबिस्तान, मुल्तान तथा समाना के सूबेदारों से इस कार्य में सहयोग मांगा किंतु उन्होंने गाजी मलिक का समर्थन नहीं किया। इस पर गाजी मलिक ने मालवा के गवर्नर आईन मुल्क मुल्तानी से सहयोग मांगा किंतु उसने भी गाजी मलिक का सहयोग नहीं किया। इन तुर्की अमीरों को भारत में इस्लाम खतरे में नहीं लगता था।

इस पर गाजी मलिक ने सिबिस्तान, मुल्तान तथा समाना के उन तुर्की सेनापतियों से सहयोग मांगा जो एक हिन्दुस्तानी मुसलमान को सुल्तान के रूप में नहीं देखना चाहते थे। इन प्रांतों में नियुक्त तुर्की मूल के बहुत से अधिकारी गाजी मलिक का सहयोग करने को तैयार हो गए। ये लोग अपने प्रांतपतियों का साथ छोड़कर गाजी मलिक के झण्डे के नीचे एकत्रित हो गए तथा उन्होंने एक बड़ी सेना खड़ी कर ली। गाजी मलिक इस सेना को लेकर दिल्ली की ओर बढ़ा।

इस रोचक इतिहास का वीडियो देखें-

जिस समय गुप्त रूप से ये षड़यंत्र चल रहे थे, तब गाजी मलिक का पुत्र जूना खाँ दिल्ली से निकल भागा तथा दिपालपुर पहुंचकर अपने पिता से मिल गया। जब गाजी मलिक की सेना दिल्ली की ओर बढ़ने लगी तब समाना के सूबेदार यकलाकी ने गाजी मलिक का मार्ग रोका। दोनों पक्षों में भीषण युद्ध हुआ जिसमें यकलाकी परास्त हो गया। जब गाजी मलिक की सेनाएं हिसार के निकट पहुंची तो सुल्तान खुसरोशाह के सौतेले भाई हिसामुद्दीन ने गाजी मलिक का मार्ग रोका किंतु हिसामुद्दीन भी पराजित हो गया।

अब गाजी मलिक अपनी सेना के साथ दिल्ली के निकट पहुंच गया। खुसरोशाह भी एक सेना लेकर उससे युद्ध करने के लिए आया। उसे विश्वास था कि वह गाजी खाँ को परास्त कर देगा किंतु आईन-उल-मुल्क सुल्तान खुसरो शाह को धोखा देकर अपनी सेना के साथ मालवा चला गया। इससे खुसरो की सेना छोटी रह गई। 5 सितम्बर 1320 को इन्द्रप्रस्थ के निकट गाजी मलिक तथा खुसरोशाह की सेनाओं में युद्ध हुआ। इस युद्ध में खुसरोशाह बड़ी वीरता से लड़ते हुए मारा गया।

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इसके बाद गाजी मलिक की सेनाएं दिल्ली में घुस गईं तथा दिल्ली सल्तनत की सफाई का काम आरम्भ हुआ जिसके तहत तुर्की अमीरों ने भारतीय मुस्लिम अमीरों को ढूंढ-ढूंढकर मारा। इस्लाम के नाम पर तुर्की अमीरों ने भारतीय मुस्लिम अमीरों को मार डाला। तुगलकों के सम्बन्ध में प्रारंभिक जानकारी फरिश्ता तथा इब्नबतूता के विवरणों से मिलती है। उन दोनों के अनुसार तुगलक, तुर्क थे। फरिश्ता के अनुसार तुगलक भारत में बलबन के समय आए थे जबकि इब्नबतूता के अनुसार तुगलक भारत में अल्लाउद्दीन खिलजी के समय सिंध से आए थे। भारत आने से पहले तुगलक, सिन्ध तथा तुर्किस्तान के बीच में निवास करते थे। ‘तारीखे रशीदी’ के रचयिता मिर्जा हैदर के अनुसार तुगलक मंगोल थे परन्तु उसकी बात सही नहीं है क्योंकि भारत में तुगलक वंश की स्थापना करने वाले गाजी मलिक को 29 बार मंगोलों से युद्ध करना पड़ा। यदि वह मंगोल होता तो मंगोलों से इतने युद्ध नहीं करता। यदि तुगलक मंगोल होते तो बलबन और अल्लाउद्दीन खिलजी उन्हें अपनी सेवा में नहीं रखते क्योंकि वे दोनों ही मंगोलों के बड़े शत्रु थे।

गाजी तुगलक का पिता मलिक तुगलक, बलबन का गुलाम था। उस समय तक मंगोल, तुर्कों के गुलाम नहीं होते थे। समकालीन इतिहासकारों ने लिखा है कि तुगलकों की आकृति तुर्कों से मिलती थी न कि मंगोलों से। तुर्की अमीरों के रहते यह संभव नहीं था कि गाजी तुगलक मंगोल होते हुए भी, सुल्तान की हत्या करके स्वयं सुल्तान बन जाता।

इब्नबतूता के अनुसार गाजी तुगलक का पिता मलिक तुगलक, बलबन का गुलाम था और उसकी माता पंजाब की जाट स्त्री थी परन्तु कुछ इतिहासकारों के अनुसार गाजी तुगलक अपने दो भाइयों रजब तुगलक तथा अबूबकर तुगलक के साथ खुरासान से भारत आया था। यदि यह बात सही है तो वह जाट स्त्री का पुत्र नहीं था।

तुगलक भाइयों ने अल्लाउद्दीन खिलजी के यहाँ नौकरी कर ली। गाजी तुगलक युद्धकला में कुशल था। इसलिए वह सुल्तान का कृपापात्र बन गया और दिपालपुर का गवर्नर बना दिया गया। अल्लाउद्दीन खिलजी के अंतिम दिनों में गाजी तुगलक की गिनती दिल्ली के प्रमुख अमीरों में होती थी। जब सुल्तान मुबारक खिलजी की हत्या करके खुसरोशाह दिल्ली के तख्त पर बैठा था तब गाजी तुगलक को खुसरोशाह का यह कार्य अच्छा नहीं लगा था।

गाजी तुगलक नहीं चाहता था कि भारत का कोई मुसलमान उच्च तुर्की अमीरों पर शासन करे। इसलिए गाजी तुगलक ने विद्रोह का झंडा उठाया। दिल्ली के कई तुर्की अमीर उसके साथ हो गए। दिल्ली के निकट इन्द्रप्रस्थ में गाजी तुगलक ने खुसरोशाह को परास्त करके उसकी हत्या कर दी। इसके बाद दिल्ली के अमीरों ने एक स्वर से गाजी तुगलक को अपना सुल्तान निर्वाचित किया।

कुछ इतिहासकारों ने लिखा है कि दिल्ली के तख्त पर बैठने से पहले गाजी तुगलक ने दिल्ली में खिलजी वंश के पुरुषों एवं लड़कों को ढुंढवाया ताकि यदि खिलजी राजकुल का कोई पुरुष या लड़का जीवित हो तो उसे दिल्ली का सुल्तान बना दिया जाए किंतु उसे खिलजी राजपरिवार का एक भी पुरुष अथवा लड़का नहीं मिला। इस पर वह स्वयं दिल्ली का सुल्तान बन गया। कहा नहीं जा सकता कि इस खोज में गाजी तुगलक ने कितनी ईमानदारी बरती थी!

सितम्बर 1320 में गाजी तुगलक दिल्ली के तख्त पर बैठ गया। उसने गयासुद्दीन तुगलक शाह गाजी की उपाधि धारण की। गाजी का अर्थ होता है काफिरों पर बिजली बनकर गिरने वाला। इस प्रकार गाजी तुगलक ने दिल्ली सल्तनत में तुगलक वंश के नाम से एक नये शासक वंश की स्थापना की। जब गाजी तुगलक खिलजी वंश के राजकुमारों की खोज करवा रहा था तो उसे खिलजी राजवंश की कुछ अविवाहित लड़कियां मिलीं। गाजी तुगलक ने उनके गुजर-बसर का प्रबंध किया तथा उनके विवाह करवाए। गाजी ने एक मंजे हुए राजनीतिज्ञ की तरह खुसरोशाह के रिश्तेदारों को उनके पदों पर पूर्ववत् बने रहने दिया। उन्हें न तो मारा गया और न उनके पदों से हटाया गया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

बुद्ध के सामाजिक विचार : सामान्य ज्ञान प्रश्नोत्तरी – 6

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बुद्ध के सामाजिक विचार

बुद्ध के सामाजिक विचार : सामान्य ज्ञान प्रश्नोत्तरी – 6 में महात्मा बुद्ध के सामाजिक विचारों के सम्बन्ध में प्रश्नोत्तरी दी गई है।

1. प्रश्न: बौद्ध धर्म का एक प्रमुख तत्त्व करुणा है। करुणा के कितने भेद कहे गए हैं?

उत्तर: करुणा के तीन भेद हैं-

(1.) स्वार्थमूलक करुणा: इस करुणा में स्वार्थ होता है। उदाहरणार्थ माता-पिता की अपनी संतान के प्रति करुणा स्वार्थमूलक करुणा है।

(2.) सहेतुकी करुणा: किसी भी प्राणी को कष्ट में देखकर हृदय का द्रवित हो जाना सहेतुकी करुणा है।

(3.) अहेतुकी या महाकरुणा: इसमें न तो मनुष्य का स्वार्थ होता है और न वह पवित्रता का ही विचार करता है। वह समस्त प्राणियों पर समान रूप से अपनी करुणा बिखेरता है।

2. प्रश्न: महात्मा बुद्ध ने मनुष्य का भाग्यविधाता किसे माना है?

उत्तर: महात्मा बुद्ध ने मनुष्य को स्वयं अपना भाग्यविधाता माना है। उनका मानना था कि मनुष्य अपने ही प्रयत्नों से दुःखों से छुटकारा प्राप्त कर सकता है। इसके लिए ईश्वरीय कृपा की आवश्यकता नहीं है।

3. प्रश्न: पाटिच्च समुप्पाद अथवा प्रतीत्य समुत्पाद किसे कहते हैं?

उत्तर: प्रतीत्यसमुत्पाद का अर्थ है- एक वस्तु के प्राप्त होने पर दूसरी वस्तु की उत्पत्ति अथवा एक कारण के आधार पर एक कार्य की उत्पत्ति। उसका सूत्र है- ‘यह होने पर यह होता है।’ दूसरे शब्दों में, इसे ‘कार्य-कारण नियम’ भी कह सकते हैं।

4. प्रतीत्य समुत्पाद को अन्य किन नामों से जाना जाता है?

उत्तर: (1) द्वादश निदान, (2) कार्य-कारण नियम।

5. प्रश्न: पाटिच्च समुप्पाद अथवा प्रतीत्य समुत्पाद का उल्लेख किस स्थान पर हुआ है?

उत्तर: बुद्ध के द्वितीय आर्य सत्य में द्वादश निदान का उल्लेख हुआ है। यह द्वादशनिदान का सिद्धांत ही प्रतीत्यसमुत्पाद कहलाता है।

इस प्रनोत्तरी का वीडियो देखें-

6. प्रश्न: प्रतीत्य समुत्पाद पर कौनसे सिद्धांत आधारित हैं?

उत्तर: कर्म का सिद्धांत, क्षणिकवाद, नैरात्म्यवाद, संघातवाद और अर्थक्रियाकारित्व आदि शेष समस्त सिद्धांत प्रतीत्यसमुत्पाद पर आधारित हैं।

7. प्रश्न: बुद्ध ने धम्म किसे कहा है?

उत्तर: प्रतीत्य समुत्पाद को अर्थात् कार्य-कारण सिद्धांत को।

8. प्रश्न: बुद्ध के अनुसार मनुष्य का जन्म बार-बार क्यों होता है?

उत्तर: बुद्ध के अनुसार किसी भी घटना के लिए कोई कारण अवश्य होता है। बिना कारण के कुछ भी नहीं घटित होता। इस सिद्धांत से इस सत्य की स्थापना हुई कि संसार में बारम्बार जन्म और उससे होने वाले दुःखों का सम्बन्ध किसी सृष्टिकर्ता से नहीं है, प्रत्युत उनके कुछ निश्चित कारण एवं प्रत्यय होते हैं।

9. प्रश्न: बुद्ध को अनीश्वरवादी क्यों कहा जाता है?

उत्तर: क्योंकि महात्मा बुद्ध ने ईश्वर को सृष्टि का निर्माणकर्ता नहीं माना है।

10. प्रश्न: बुद्ध के अनुसार मनुष्य के दुःखों का मूल कारण क्या है?

उत्तर: बुद्ध के अनुसार प्रतीत्य समुत्पाद को भूल जाना ही दुखों का मूल कारण है। प्रतीत्य समुत्पाद सापेक्ष भी है और निरपेक्ष भी। सापेक्ष दृष्टि से वह संसार है और निरपेक्ष दृष्टि से निर्वाण। जो प्रतीत्य समुत्पाद देखता है, वह धर्म देखता है और जो धर्म देखता है वह प्रतीत्य समुत्पाद देखता है। प्रतीत्य समुत्पाद के ज्ञान से मनुष्य के दुःखों का अंत हो जाता है।

11. बुद्ध का क्षणिकवाद क्या है?

उत्तर: प्रतीत्य समुत्पाद के सिद्धान्त से ही क्षणिकवाद अथवा परिवर्तनवाद का जन्म हुआ। बौद्ध दर्शन के अनुसार संसार और जीवन दोनों में से कोई नित्य नहीं है। उनकी स्वतंत्र सत्ता नहीं है। दोनों परिवर्तनशील हैं, इसलिए नाशवान हैं। महात्मा बुद्ध का कहना था कि जगत की प्रत्येक वस्तु प्रति क्षण बदलती रहती है, यहाँ तक कि आत्मा व जगत भी निरन्तर बदलता रहता है परन्तु संसार का यह परिवर्तन साधारण मनुष्य को दिखाई नहीं पड़ता। ठीक वैसे ही जैसे नदी का प्रवाह प्रति क्षण बदलते रहने पर भी पूर्ववत् ही प्रतीत होता है।

12. प्रश्न: महात्मा बुद्ध के अनुसार व्यक्ति का मूल्यांकन किस आधार पर होना चाहिए?

उत्तर: महात्मा बुद्ध ब्राह्मणवादी जाति-व्यवस्था के विरोधी थे। वे जन्म के आधार पर किसी को छोटा या बड़ा नहीं मानकर कर्म के आधार पर व्यक्ति का मूल्यांकन करने के पक्षधर थे।

13. प्रश्न: दास प्रथा एवं बेकारी के सम्बन्ध में महात्मा बुद्ध के क्या विचार थे?

उत्तर: महात्मा बुद्ध दास-प्रथा के विरोधी थे। उनकी मान्यता थी कि बेकारी एक अभिशाप है और राज्य का कर्त्तव्य है कि वह प्रत्येक व्यक्ति को किसी न किसी काम में लगाए रखे।

14. प्रश्न: राजतन्त्र के सम्बन्ध में महात्मा बुद्ध के क्या विचार थे?

उत्तर: बुद्ध राजतन्त्र के पक्ष में थे तथा राजा को समस्त भूमि का स्वामी मानते थे। उनके अनुसार आदर्श राजा वह है जो शस्त्रबल तथा दण्ड के बिना केवल नीति और धर्म के माध्यम से अच्छा शासन चला सके।

15. प्रश्न: महात्मा बुद्ध ने सामाजिक उन्नति के लिए कई बातों पर बल दिया?

उत्तर: महात्मा बुद्ध ने सामाजिक उन्नति के लिए हिंसा, निर्दयता, स्त्रियों पर अत्याचार, दुराचारण, चुगलखोरी, कटु भाषा तथा प्रलाप नहीं करने पर बल दिया।

16. प्रश्न: महात्मा बुद्ध कि दृष्टि में गृहस्थ के क्या कर्त्तव्य हैं?

उत्तर: बुद्ध की मान्यता थी कि प्रत्येक गृहस्थ को अपने माता-पिता, अचार्य, पत्नी, मित्र, सेवक और साधु-सन्यासियों की सेवा करनी चाहिए।

17. प्रश्न: महात्मा बुद्ध ने क्रोध को जीतने के क्या उपाय बताए?

उत्तर: महात्मा बुद्ध के अनुसार बैर से बैर नहीं मिट सकता अतः प्र्रेम का सहारा लेना चाहिए। अक्रोध से क्रोध को जीतना चाहिए। दूसरे के दोषों को देखने की आदत नहीं रखनी चाहिए।

18. प्रश्न: महात्मा बुद्ध के अनुसार मनुष्य को अपना जीवनयापन किस प्रकार करना चाहिए?

उत्तर: महात्मा बुद्ध के अनुसार मनुष्य को अपने मन, वचन एवं कर्म को संतुलित रखकर जीवनयापन करना चाहिए।

19. प्रश्न: महात्मा बुद्ध ने अहिंसा परमोधर्मः का विचार कहाँ से लिया?

उत्तर: उपनिषदों से।

20. प्रश्न: महात्मा बुद्ध ने अपने अनुयाइयों को कितनी श्रेणियों में विभाजित किया?

उत्तर: दो श्रेणियों में – (1) भिक्षु तथा (2) उपासक।

21. प्रश्न: महात्मा बुद्ध ने अपने अनुयाइयों को दो श्रेणियों में विभक्त क्यों किया?

उत्तर: क्योंकि महात्मा बुद्ध जानते थे कि सब मनुष्य एक जैसे कठोर नियमों का पालन नहीं कर सकते। इसलिए उन्होंने अपने अनुयाइयों को ‘भिक्षु’ तथा ‘उपासक’ नामक दो श्रेणियों में विभाजित कर दिया।

22. प्रश्न: भिक्षु किन्हें कहते थे?

उत्तर: भिक्षु उन्हें कहते थे जो गृहस्थ जीवन छोड़कर बुद्ध के समस्त उपदेशों का पूर्ण पालन करते हुए बौद्ध धर्म के प्रचार प्रसार में जीवन व्यतीत करते थे।

23. प्रश्न: बौद्ध धर्म में स्त्री भिक्षुओं को क्या कहते हैं?

उत्तर: भिक्खुणी अथवा भिक्षुणी। बुद्ध ने स्त्रियों को भी भिक्षुणी बनने का अधिकार दिया। उन्हें भी पुरुष-भिक्षुओं की भाँति कठोर नियमों का पालन करना पड़ता था।

24. गृहस्थ स्त्री-पुरुषों को क्या कहा जाता था?

उत्तर: गृहस्थ स्त्री-पुरुषों को उपासक एवं उपासिका कहा जाता था। वे गृहस्थ जीवन में रहकर, बुद्ध द्वारा बताए गए नियमों का पालन करते थे।

25. भगवान बुद्ध ने बौद्ध संघ की स्थापना क्यों की?

उत्तर: भिक्षु-वर्ग को संगठित एवं संयमी बनाए रखने के लिए बुद्ध ने बौद्ध-संघ की स्थापना की। संघ में भिक्षुओं को निर्धारित दिनचर्या और कार्यक्रम के अनुसार जीवन बिताना पड़ता था। संघ में जाति-पाँति का भेद नहीं था और न ही इसका कोई अधिपति होता था। संघ का मुख्य काम बौद्ध धर्म का प्रचार करना था।

26. संघ में भिक्षु एवं भिक्षुणियों के रहने की क्या व्यवस्था थी?

उत्तर: संघ में रहने वाले भिक्षु-भिक्षुणियों के लिए अलग-अलग मठ बने होते थे जहाँ वे त्यागमय एवं सादा जीवन बिताते थे।

27. प्रश्न: बौद्ध भिक्षुओं को वर्ष में कितने माह मठ में रहने की अनुमति होती थी?

उत्तर: भिक्षु-भिक्षुणियों को वर्ष के आठ माह तक समाज में घूम-घूमकर बौद्ध धर्म का प्रचार करना होता था। वे चार माह तक मठ में रहते हुए आत्मचिन्तन एवं साधना करते थे।

28. प्रश्न: बौद्ध मठों का संगठन किस आधार पर किया गया था?

उत्तर: बौद्ध संघ को गणतन्त्रात्मक प्रणाली के आधार पर संगठित किया गया था। संघ सम्बन्धी कार्यों में प्रत्येक भिक्षु के अधिकार समान थे। संघ की बैठकों में उपस्थित रहना अनिवार्य था। अनुपस्थित भिक्षु किसी दूसरे व्यक्ति के माध्यम से अपना मत प्रकट करवा सकता था।

29. प्रश्न: संघ द्वारा निर्णय लेने की क्या प्रक्रिया थी?

उत्तर: संघ का कोई भी सदस्य संघ की बैठक में प्रस्ताव एवं मत दे सकता था। बहुमत के द्वारा निर्णय लिए जाते थे। प्रत्येक प्रस्ताव को तीन बार प्रस्तुत और स्वीकृत किया जाता था। तभी वह ‘नियम’ बनता था।

30. प्रश्न: आसन-प्रज्ञापक किसे कहते थे?

उत्तर: संघ की सभाओं में सदस्यों के बैठने की व्यवस्था करने वाले को ‘आसन-प्रज्ञापक’ कहते थे।

31. प्रश्न: ज्ञाप्ति एवं नति किसे कहा जाता था?

उत्तर: बैठक में प्रस्ताव रखने वाले को प्रस्ताव की सूचना बैठक से पहले देनी होती थी। इस कार्यवाही को ‘ज्ञाप्ति’ कहा जाता था। प्रस्ताव को ‘नति’ कहा जाता था।

32. प्रश्न: अनुस्सावन अथवा कम्मवाचा किसे कहा जाता था?

उत्तर: प्रस्ताव प्रस्तुत करने को अनुस्सावन अथवा कम्मवाचा कहा जाता था।

33. संघ में मतदान की क्या प्रक्रिया होती थी?

उत्तर: बैठक में प्रत्येक प्रस्ताव पर विचार-विमर्श होता था और उसके बाद प्रस्ताव पर मतदान होता था। कभी-कभी शलाकाओं द्वारा मतदान की व्यवस्था की जाती थी। संघीय-सभा करने के लिए 30 सदस्यों की उपस्थिति आवश्यक थी। कोरम के अभाव में सभा की कार्यवाही अवैध समझी जाती थी।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

महात्मा बुद्ध के धार्मिक विचार : सामान्य ज्ञान प्रश्नोत्तरी: 5

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महात्मा बुद्ध के धार्मिक विचार : सामान्य ज्ञान प्रश्नोत्तरी: 5

महात्मा बुद्ध के धार्मिक विचार : सामान्य ज्ञान प्रश्नोत्तरी: 5 में महात्मा बुद्ध के धार्मिक विचारों के सम्बन्ध में प्रश्नोत्तरी दी गई है।

1. प्रश्न: अष्टांग-पथ के तीन प्रधान अंग कौनसे हैं?

उत्तर: अष्टांग-पथ का अनुसरण करने से मनुष्य के भीतर शील, समाधि और प्रज्ञा का उदय होता है जो कि बुद्ध के अष्टांगिक मार्ग के तीन प्रधान अंग हैं।

2. बुद्ध के अनुसार प्रज्ञा क्या है?

उत्तर:  ‘प्रज्ञा’ पदार्थ ज्ञान है। प्रज्ञा का स्थान बौद्धिक स्थान से बहुत ऊँचा है।

3. प्रश्न: प्रज्ञा से क्या लाभ होता है?

उत्तर: प्रज्ञा से कामासव, भवासव और अविद्यासव का नाश होता है तथा यथार्थ ज्ञान उत्पन्न होता है।

4. प्रश्न: यथार्थ ज्ञान कब संभव है?

उत्तर: सदाचार से यथार्थ ज्ञान होता है। सदाचार के बिना ज्ञान की पूर्णता असम्भव है।

5. प्रश्न: प्रज्ञा का उदय कैसे होता है?

उत्तर: अखण्ड समाधि से ‘प्रज्ञा’ का उदय होता है।

इस प्रनोत्तरी का वीडियो देखें-

6. प्रश्न: महात्मा बुद्ध ने अपने अनुयाइयों को मन, वचन और कर्म से पवित्र रहने के लिए किन नियमों का पालन करने को कहा?

उत्तर: दसशील का।

7. प्रश्न: दसशील से क्या आशय है?

सदाचार के दस नियमों को दस शील कहते हैं।

8. प्रश्न: दश शील कौनसे हैं?

उत्तर – (1.) अहिंसा व्रत का पालन करना, (2.) सदा सत्य बोलना, (3.) अस्तेय अर्थात् चोरी न करना, (4.) अपरिग्रह अर्थात् वस्तुओं का संग्रह न करना, (5.) ब्रहाचर्य अर्थात् भोग विलास से दूर रहना, (6.) नृत्य का त्याग,  (7.) सुगन्धित पदार्थों का त्याग,  (8.) असमय में भोजन का त्याग, (9.) कोमल शय्या का त्याग, (10.) कामिनी एवं कंचन का त्याग।

9. प्रश्न: दस शील का पालन करना किनके लिए आवश्यक है?

उत्तर: दस शील के प्रथम पांच नियमों का पालन करना गृहस्थ, साधु तथा उपासकों आदि सबके लिए अनिवार्य है जबकि शेष पांच नियम केवल भिक्खुओं के लिए अनिवार्य हैं।

10. प्रश्न: बुद्ध के किन पांच नियमों की तुलना महावीर स्वामी के पाँच अणुव्रतों से की जाती है?

उत्तर: जिन नियमों का पालन करना गृहस्थ, साधु तथा उपासकों आदि सबके लिए अनिवार्य है, उनकी तुलना महावीर के पांच अणुव्रतों से की जाती है। ये नियम इस प्रकार हैं- (1.) अहिंसा (2.) सत्य (3.) अस्तेय (4.) अपरिग्रह (5.) ब्रहाचर्य।

11. प्रश्न: महात्मा बुद्ध श्रद्धा और तर्क में किस पर अधिक बल देते थे?

उत्तर: तर्क पर।

12. प्रश्न: वेदों में कही गई बातों के सम्बन्ध में बुद्ध के क्या विचार थे?

उत्तर: बुद्ध वेदों में कही गई बातों को अन्तिम सत्य के रूप में स्वीकार करने को तैयार नहीं थे।

13. प्रश्न: अंध विश्वासों के सम्बन्ध में बुद्ध का क्या विचार था?

उत्तर: बुद्ध का मानना था कि अन्धविश्वास से मानव बुद्धि कुण्ठित हो जाएगी।

14. प्रश्न: वेदों की प्रामाणिकता के सम्बन्ध में बुद्ध के क्या विचार थे?

उत्तर: बुद्ध वेदों की प्रमाणिकता में विश्वास नहीं रखते थे।

15. प्रश्न: बुद्ध को नास्तिक क्यों कहा जाता है?

उत्तर: क्योंकि महात्मा बुद्ध वेदों की प्रामाणिकता में विश्वास नहीं रखते थे।

16. प्रश्न: ईश्वर के सम्बन्ध में बुद्ध के क्या विचार थे?

उत्तर: बुद्ध ईश्वर को इस सृष्टि का निर्माता नहीं मानते थे।

17. बुद्ध ने ऐसा क्यों कहा- ‘जो लोग मुझे सर्वज्ञ मानते हैं, वे मेरी निन्दा करते है।’

उत्तर: महात्मा बुद्ध का कहना था कि मनुष्य की बुद्धि परीक्षात्मक होनी चाहिए। उसे किसी के कहे पर पूरा विश्वास न करके स्वयं बात और चीज को परखना चाहिए। इसीलिए उन्होंने कहा- ‘जो लोग मुझे सर्वज्ञ मानते हैं, वे मेरी निन्दा करते है।’

18. प्रश्न: आत्मा के सम्बन्ध में बुद्ध ने क्या कहा?

उत्तर: महात्मा बुद्ध जीवन भर इस विषय पर मौन रहे। उन्होंने न तो यह कहा कि आत्मा है और न यह कहा कि आत्मा नहीं है। उन्होंने आत्मा सम्बन्धी विषय पर विवाद करने से मना कर दिया। क्योंकि यदि वे यह कहते कि आत्मा है तो मनुष्य को स्वयं से आसक्ति हो जाती और उनकी दृष्टि में आसक्ति ही दुःख का मूल कारण थी। यदि वे यह कहते कि आत्मा नहीं है तो मनुष्य यह सोचकर दुःखी हो जाता कि मृत्यु के बाद मेरा कुछ भी शेष नहीं रहेगा। अतः उन्होंने इस विवाद में पड़ना उचित नहीं समझा।

19. प्रश्न: क्या महात्मा बुद्ध कर्म-फल के सिद्धांत में विश्वास रखते थे?

उत्तर: महात्मा बुद्ध कर्म-फल के सिद्धांत में विश्वास रखते थे। उनका कहना था कि मनुष्य जैसा कर्म करता है उसे वैसा ही फल भोगना पड़ता है। मनुष्य का यह लोक और परलोक उसके कर्म पर निर्भर हैं।

20. प्रश्न: बुद्ध कर्म किसे मानते थे?

उत्तर: बुद्ध मनुष्यों की समस्त कायिक, वाचिक और मानसिक चेष्टाओं को कर्म मानते थे। उनका कहना था कि हमारे कर्म ही सुख-दुःख के दाता हैं। बुद्ध वैदिक कर्मकाण्ड को कर्म नहीं मानते थे।

21. प्रश्न: जाति के सम्बन्ध में बुद्ध के क्या विचार थे?

उत्तर: बुद्ध का कहना था कि मनुष्य की जाति मत पूछिए। निम्न जाति का व्यक्ति भी अच्छे कर्मों से ज्ञानवान और पापरहित मुनि हो सकता है और आचरणहीन ब्राह्मण, शूद्र हो सकता है।

22. प्रश्न: महात्मा बुद्ध ने नैतिक आदर्शवाद की स्थापना का कौनसा मार्ग दिखाया?

उत्तर: महात्मा बुद्ध ने अन्तःशुद्धि और सम्यक् कर्मों पर जोर देकर समाज में नैतिक आदर्शवाद स्थापित करने पर जोर दिया।

23. प्रश्न: क्या महात्मा बुद्ध पुनर्जन्म में विश्वास करते थे?

उत्तर: बुद्ध कर्मवादी थे तथा उनकी मान्यता थी कि कर्मों के अनुसार मनुष्य अच्छा या बुरा जन्म पाता है।

24. प्रश्न: बुद्ध ने आत्मा के अस्तित्त्व के विषय में कुछ नहीं कहा। अतः बुद्ध की दृष्टि में कर्मों का फल कौन भोगता है? पुनर्जन्म किसका होता है?

उत्तर: महात्मा बुद्ध के अनुसार यह पुनर्जन्म आत्मा का नहीं अपितु अहंकार का होता है।

25. प्रश्न: बुद्ध की दृष्टि में मनुष्य पुनर्जन्म के चक्र से कब मुक्त होता है?

उत्तर: बुद्ध के अनुसार जब मनुष्य की तृष्णाएँ एवं वासनाएँ नष्ट हो जाती हैं तब वह पुनर्जन्म के चक्र से मुक्त हो जाता है।

26. प्रश्न: क्या महात्मा बुद्ध कार्य-कारण सम्बन्ध में विश्वास करते थे?

उत्तर: वेदों की तरह महात्मा बुद्ध भी संसार की प्रत्येक वस्तु और घटना के पीछे किसी न किसी कारण का होना मानते थे। उनका कहना था कि प्रत्येक घटना अथवा स्थिति के कारणों को समझकर ही उससे मुक्ति पाने का उपाय किया जा सकता है।

27. प्रश्न: महात्मा बुद्ध के अनुसार संसार चक्र कैसे चलता है?

उत्तर: महात्मा बुद्ध का कहना था कि जन्म-मरण सकारण हैं। जन्म के कारण वृद्धावस्था एवं मृत्यु है। कार्य-कारण की शृंखला से यह संसार चलता रहता है। संसार को चलाने के लिए किसी सत्ता अथवा ईश्वर की आवश्यकता नहीं पड़ती।

28. प्रश्न: क्या महात्मा बुद्ध मोक्ष में विश्वास रखते थे?

उत्तर: बुद्ध ने मोक्ष के स्थान पर निब्बान अर्थात् निर्वाण में विश्वास जताया है। बौद्ध धर्म का अन्तिम लक्ष्य निर्वाण प्राप्त करना है जिसक अर्थ है ‘बुझना’। बुद्ध का कहना था कि मन में पैदा होने वाली तृष्णा या वासना की अग्नि को बुझा देने पर निर्वाण प्राप्त हो सकता है। यह निर्वाण इसी जन्म में तथा इसी लोक में प्राप्त किया जा सकता है।

29. प्रश्न: बुद्ध ने वैराग्य को निर्वाण का पथ क्यों कहा?

उत्तर: महात्मा बुद्ध का कहना था- हे भिक्षुओ! यह संसार अनादि है। तृष्णा से संचालित हुए प्राणी इसमें भटकते फिरते हैं। उनके आदि-अन्त का पता नहीं चलता। भव-चक्र में पड़ा हुआ प्राणी अनादि काल से बार-बार जन्म लेता और मरता आया है। तुम समस्त संस्कारों से निर्वेद प्राप्त करो, वैराग्य प्राप्त करो, मुक्ति प्राप्त करो।

30. बुद्ध ने आत्मावलम्बन के सम्बन्ध में क्या कहा?

उत्तर: गौतम बुद्ध ने आत्मावलम्बन को बड़ा महत्त्व दिया है जिसका अर्थ है किसी के आश्रित न होकर अपने आश्रित बनो।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

बौद्ध धर्म के प्रमुख सिद्धान्त : प्राचीन भारत प्रनोत्तरी-4

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बौद्ध धर्म के प्रमुख सिद्धान्त : प्राचीन भारत प्रनोत्तरी-4

बौद्ध धर्म के प्रमुख सिद्धान्त : प्राचीन भारत प्रनोत्तरी-4 में बौद्ध धर्म के प्रमुख सिद्धांतों एवं दर्शन के सम्बन्ध में प्रश्नोत्तरी दी गई है।

1. प्रश्न: महात्मा बुद्ध ने कितने सत्य बताए हैं?

उत्तर : चार।

2. प्रश्न: महात्मा बुद्ध के चार सत्यों को क्या कहा जाता है?

उत्तर : चार आर्य-सत्य अथवा चत्वारि आर्य सत्यानि।

3. प्रश्न: बौद्ध धर्म की आधारशिला किसे कहा जाता है?

उत्तर : बौद्ध धर्म की आधारशिला है, उसके चार-आर्य सत्य। बौद्ध धर्म के सिद्धान्तों का विकास इन्हीं चार आर्य-सत्यों के आधार पर हुआ है।

4. प्रश्न: चार आर्य सत्य अथवा चत्वारि आर्य सत्यानि कौनसे हैं?

उत्तर : (1) सर्वं दुःखम् (2) दुःख समुदयः (3.) दुःख निरोध (4.) दुःख निरोधगामिनी प्रतिपद्।

5. प्रश्न: सर्वं दुःखम् का क्या अर्थ है?

उत्तर : सर्वं दुःखम् का अर्थ है- हर जगह दुःख है। महात्मा बुद्ध के अनुसार जन्म के साथ कष्ट होता है, रोग कष्टमय है, मृत्यु कष्टमय है, अरुचिकर से संयोग कष्टमय है, सुखकर से वियोग कष्टमय है, जो वासना असंतुष्ट रह जाती है, वह भी कष्टप्रद है। हमारा शरीर कष्टमय है। सुख मनाने से दुःख उत्पन्न होता है। इन्द्रिय-सुख में खो जाने से दुःख उत्पन्न होता है। जीवन दुःखों से परिपूर्ण है। सभी उत्पन्न वस्तुएं दुःख और कष्ट हैं।

इस प्रनोत्तरी का वीडियो देखें-

6. प्रश्न: दुःख समुदयः का क्या अर्थ है?

उत्तर : महात्मा बुद्ध के अनुसार दुःख का कोई न कोई कारण अवश्य होता है। जन्म-मरण के चक्र को चलाने वाली तृष्णा दुःखों का मूल कारण है।

7. प्रश्न: बुद्ध की दृष्टि में तृष्णा कितने प्रकार की है?

उत्तर : तृष्णा तीन प्रकार की है- (1.) काम-तृष्णा- इन्द्रिय सुखों के लिए, (2.) भव-तृष्णा- जीवन के लिए, (3.) विभव-तृष्णा- वैभव के लिए।

8. प्रश्न: तृष्णा दुःखमय क्यों है?

उत्तर : बुद्ध के अनुसार तृष्णा पुनर्भव को करने वाली, आसक्ति और राग के साथ चलने वाली और यत्र-तत्र रमण करने वाली है।

9. प्रश्न : बुद्ध के अनुसार तृष्णा का जन्म कैसे होता है?

उत्तर : रूप, शब्द, गन्ध, रस, स्पर्श तथा मानसिक वितर्क और विचारों से जब मनुष्य आसक्ति करने लगता है तो तृष्णा का जन्म होता है।

10. प्रश्न: प्रश्न बुद्ध की दृष्टि में अविद्या क्या है?

उत्तर : बुद्ध की दृष्टि में सभी दुःख उपाधियों से उत्पन्न होते हैं जो कि अविद्या के कारण हैं। अविद्या, दुःखों का मूल है और जीवैष्णा के कारण है।

11. प्रश्न: दुःख निरोध का क्या अर्थ है?

उत्तर : दुःख निरोध का अर्थ है कि दुःखों का नाश संभव है। जिस प्रकार संसार में दुःख हैं और दुःखों के कारण हैं, उसी प्रकार, दुःखों का नाश भी सम्भव है।

12. प्रश्न : दुःख निरोध कैसे किया जा सकता है?

उत्तर : महात्मा बुद्ध के अनुसार तृष्णाओं के मूलोच्छेदन से दुःखों से छुटकारा मिल सकता है। उनका कहना था- संसार में जो कुछ भी प्रिय लगता है, संसार में जिससे रस मिलता है उसे जो दुःखस्वरूप समझेंगे और उससे डरेंगे वे ही तृष्णा को छोड़ सकेंगे। रूप, वेदना, संज्ञा, संस्कार और विज्ञान का विरोध ही दुःख निरोध है।

13. प्रश्न : दुःख निरोधगामिनी प्रतिपद् से बुद्ध का क्या आशय है?

उत्तर : दुःख निरोधगामिनी प्रतिपद्  का अर्थ है दुःखनिरोध मार्ग। अर्थात् दुःखों के नाश के उपाय भी हैं।

14. प्रश्न: बुद्ध के अनुसार दुःखों पर विजय कैसे प्राप्त की जा सकीती है?

उत्तर : अष्टांगपथ अथवा आर्य अष्टांगिक मार्ग पर चलकर कोई भी व्यक्ति दुःखों पर विजय प्राप्त कर सकता है। इसमें आठ अंगों की व्यवस्था है।

15. अष्टांगपथ का दूसरा नाम कया है?

उत्तर : इस मार्ग को ‘दुःख निरोधगामिनि प्रतिपद्’ तथा ‘दुःख निरोध मार्ग’ भी कहा जाता है।

16. प्रश्न: अष्टांग मार्ग को अपनाने का क्या लाभ है?

उत्तर : महात्मा बुद्ध के अनुसार अष्टांग मार्ग मनुष्य की आंखें खोलता है और उसे बुद्धि प्रदान करता है। अष्टांग मार्ग मनुष्य को शांति, अन्तर्दृष्टि, उच्चप्रज्ञा और निर्वाण की ओर ले जाता है।

17. प्रश्न: आर्य अष्टांगिक मार्ग क्या है?

उत्तर : इसे अष्टांग पथ भी कहते हैं। अष्टांग पथ ‘बौद्ध धर्म का नीति-शास्त्र’ है। यह मध्यम मार्ग है।

18. प्रश्न: मध्यम मार्ग क्या है?

उत्तर : मध्यम मार्ग में विषयों में आसक्ति रखना और स्वयं को कष्ट देना दोनों का ही निषेध किया गया है। महात्मा बुद्ध ने आध्यात्मिक और नैतिक दोनों दृष्टि से मध्यम मार्ग अपनाया।

19. प्रश्न: मध्यम मार्ग की दो ऐसी सीमाएं कौनसी हैं जिनका अनुसरण कभी नहीं करना चाहिए?

उत्तर : (1.) इन्द्रिय विषयों के सुखों और वासनाओं की पूर्ति का निम्नतम मार्ग।

            (2.) आत्मा को कष्ट देने की आदत।

            ये दोनों ही त्याज्य एवं कष्टमय हैं।

20. प्रश्न: अष्टांग मार्ग अथवा अष्टांगिक मार्ग के आठ अंग कौनसे हैं?

उत्तर : अष्टांगिक मार्ग के आठ अंग इस प्रकार से हैं-

(1.) सम्मादिट्ठि  अर्थात् सम्यक् दृष्टि                      (2.) सम्मा संकप्प अर्थात् सम्यक संकल्प

(3.) सम्मा वाचा अर्थात् सम्यक वाणी                    (4.) सम्मा कम्मन्त अर्थात् सम्यक् कर्मान्त

(5.) सम्मा आजीव अर्थात् सम्यक् आजीव              (6.) सम्मा वायाम् अर्थात् सम्यक् व्यायाम

(7.) सम्मासति अर्थात् सम्यक स्मृति                     (8.) सम्मा समाधि अर्थात् सम्यक् समाधि

21. प्रश्न: सम्मादिट्ठि अथवा सम्यक् दृष्टि क्या है?

उत्तर : अविद्या के कारण संसार तथा आत्मा के सम्बन्ध में मिथ्या दृष्टि प्राप्त होती है। सत्य-असत्य, पाप-पुण्य, सदाचार और दुराचार में भेद करना ही सही सम्यक् दृष्टि है। इसी से चार आर्य सत्यों का सही ज्ञान प्राप्त होता है। यह ज्ञान श्रद्धा और भावना से युक्त होना चाहिए। सम्यक् दृष्टि चारों आर्य सत्यों का ‘सत्’ ध्यान है जो निर्वाण की ओर ले जाता है।

22. प्रश्न: सम्मा संकप्प अथवा सम्यक संकल्प क्या है?

उत्तर : सम्यक् संकल्प का अर्थ इन्द्रिय सुखों से लगाव तथा दूसरों के प्रति बुरी भावनाओं और उनको हानि पहुँचाने वाले विचारों का मूलोच्छेदन करने का निश्चय है। कामना और हिंसा से मुक्त आत्म-कल्याण का पक्का निश्चय ही सम्यक संकल्प है। सम्यक् दृष्टि, सम्यक् संकल्प में परिवर्तित होनी चाहिए।

23. प्रश्न: सम्मा वाचा अथवा सम्यक वाणी क्या है?

उत्तर : सम्यक् संकल्प से हमारे वचनों का नियंत्रण होना चाहिए। सत्य, विनम्र और मृदु वचन तथा वाणी पर संयम ही सम्यक वाणी है। प्रत्येक को अधम्म (अशुभ) से बचकर धम्म (शुभ) ही बोलाना चाहिए। शत्रुता को कठोर शब्दों से नहीं अपितु अच्छी भावनाओं से दूर किया जा सकता है। मन को शांत करने वाला एक हितकारी शब्द हजारों निरर्थक शब्दों से अच्छा है।

24. प्रश्न: सम्मा कम्मन्त अथवा सम्यक् कर्मान्त क्या है?

उत्तर : सब कर्मों में पवित्रता रखना। हिंसा, द्रोह तथा दुराचरण से बचते रहना और सत्कर्म करना ही सम्यक् कर्मान्त है। जीवनाश, चोरी, कामुकता, झूठ, अतिभोजन, सामाजिक मनोरंजन, प्रसाधन, आभूषण धारण करना, आरामदेह बिस्तरों पर सोना तथा सोना चांदी उपयोग में लाना आदि दुराचरणों से बचना ही सम्यक् कर्मान्त है।

25. सम्मा आजीव अथवा सम्यक् आजीव क्या है?

उत्तर : न्यायपूर्ण मार्ग से आजीविका चलाना। जीवन-निर्वाह से निषिद्ध मार्गों का त्याग करना ही सम्यक् आजीव है। अस्त्र-शस्त्र, पशु, गोश्त, शराब और जहर आदि का व्यापार नहीं करना चाहिए। दबाव, धोखा, रिश्वत, अत्याचार, जालसाजी, डकैती, लूट, कृतघ्नता आदि से जीविकोपार्जन नहीं करना चाहिए।

26. प्रश्न: सम्मा वायाम् अथवा सम्यक् व्यायाम क्या है?

उत्तर : इसे सम्यक् प्रयत्न भी कहते हैं। इसका अर्थ है सत्कर्मों के लिए निरन्तर उद्योग करते रहना। इसमें आत्म संयम्, इन्द्रिय निग्रह, शुभ विचारों को जाग्रत करने और मन को सर्वभूतहित पर जमाए रखने का ‘सत्’ प्रयत्न करना शामिल है।

(27.) सम्मासति अथवा सम्यक स्मृति क्या है?

उत्तर : सम्यक् समाधि के लिए सम्यक् स्मृति आवश्यक है। इसमें शरीर की अशुद्धियों, संवेदना, सुख, दुःख और तटस्थ वृत्ति का स्वभाव, लोभ, घृणा और भ्रमयुक्त मन का स्वभाव, धर्म, पंचस्कंधों, इन्द्रियों, इन्द्रियों के विषयों, बोधि के साधनों तथा चार आर्यसत्यों का स्मरण सम्मिलित है। सम्यक् स्मृति का अर्थ शरीर, चित्त, वेदना या मानसिक अवस्था को उनके यथार्थ रूप में स्मरण रखना है। उनके यथार्थ स्वरूप को भूल जाने से मिथ्या विचार मन में घर कर लेते हैं और उनके अनुसार क्रियाएं होने लगती हैं, आसक्ति बढ़ती है और दुःख सहन करना पड़ता है। सम्यक् स्मृति से आसक्ति नष्ट होकर दुःखों से छुटकारा मिलता है तथा मनुष्य सम्यक् समाधि में प्रवेश के योग्य हो जाता है।

28. प्रश्न: सम्मा समाधि अथवा सम्यक् समाधि क्या है?

उत्तर : राग-द्वेष से रहित होकर चित्त की एकाग्रता को बनाए रखना ही सम्यक् समाधि है।

29. निर्वाण तक पहुँचने से पूर्व सम्यक् समाधि की कितनी अवस्थाएं आती हैं?

उत्तर : चार अवस्थाएं आती हैं-

(i.) पहली अवस्था में शांत चित्त से चार आर्य सत्यों पर विचार किया जाता है। विरक्ति तथा शुद्ध विचार अपूर्व आनंद प्रदान करते हैं।

(ii.) दूसरी अवस्था में मनन आदि प्रयत्न दब जाते हैं, तर्क-वितर्क अनावश्यक हो जाते हैं, संदेह दूर हो जाते हैं और आर्य-सत्यों के प्रति निष्ठा बढ़ती है। इस अवस्था में आनंद तथा शांति का अनुभव होता है।

(iii.) तीसरी अवस्था में तटस्थता आती है। मन को आनंद तथा शांति से हटाकर उपेक्षाभाव लाने का प्रयत्न किया जाता है। इससे चित्त की साम्यावस्था रहती है परन्तु समाधि में आनंद के प्रति उदासीनता आ जाती है।

(iv.) चौथी अवस्था पूर्ण शांति की है जिसमें सुख-दुःख नष्ट हो जाते हैं। चित्त की साम्यावस्था, दैहिक सुख और ध्यान का आनंद आदि किसी बात का ध्यान नहीं रहता अर्थात् चित्त-वृत्तियों का निरोध हो जाता है। यह पूर्ण शांति, पूर्ण विराग और पूर्ण निरोध की अवस्था है। इसमें दुःखों का सर्वथा निरोध होकर अर्हंत पद अथवा निर्वाण प्राप्त हो जाता है। यह पूर्ण प्रज्ञा की अवस्था है।

30. प्रश्न: मध्यमा प्रतिपदा क्या है?

उत्तर : दुःख से छुटकारा पाने के लिए महात्मा बुद्ध ने अष्टांगिक मार्ग बताया। वह विशुद्ध आचार-तत्त्वों पर आधारित था। उसमें न तो शारीरिक कष्ट एवं क्लेश से युक्त कठोर तपस्या को उचित बताया गया और न ही अत्यधिक सांसारिक भोग विलास को। वस्तुतः वह दोनों अतियों के बीच का मार्ग था। इसलिए उसे मध्यमा-प्रतिपदा भी कहा गया है। इसके पालन से मनुष्य निर्वाण-पथ की ओर अग्रसर हो सकता है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

महात्मा बुद्ध का परिचय : प्राचीन भारत प्रनोत्तरी-3

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महात्मा बुद्ध का परिचय : प्राचीन भारत प्रनोत्तरी-3

महात्मा बुद्ध का परिचय : प्राचीन भारत प्रनोत्तरी-3 में महात्मा बुद्ध का जीवन परिचय एवं उनके जीवन की प्रमुख घटनाओं के सम्बन्ध में प्रश्नोत्तरी दी गई है।

1. प्रश्न: बौद्ध धर्म के प्रवर्तक कौन थे?

उत्तर: महात्मा बुद्ध

2. प्रश्न: बौद्ध धर्म को किस धर्म के विरुद्ध धार्मिक क्रांति माना जाता है?

उत्तर: ब्राह्मण धर्म के विरुद्ध।

3. प्रश्न: शाक्य मुनि किन्हें कहा जाता है?

उत्तर: गौतम बुद्ध को।

4. प्रश्न: गौतम बुद्ध के बचपन का क्या नाम था?

उत्तर: सिद्धार्थ!

5. प्रश्न: गौतम बुद्ध के पिता शुद्धोदन किस गणराज्य के प्रधान थे?

उत्तर: शाक्य गणराज्य के।

इस प्रनोत्तरी का वीडियो देखें-

6. प्रश्न: शाक्यों का गणराज्य कहाँ स्थित था?

उत्तर: भारत की उत्तर-पूर्वी सीमा पर हिमालय की तराई में।

7. प्रश्न: शाक्य गणराज्य की राजधानी कहाँ थी?

उत्तर: कपिलवस्तु।

8. प्रश्न: गौतम बुद्ध का जन्म कब हुआ था?

उत्तर: ईसा से 563 वर्ष पूर्व।

9. प्रश्न: गौतम बुद्ध का जन्म कहाँ हुआ था?

उत्तर: लुम्बनी वन में। बौद्ध सूत्रों के अनुसार कपिलवस्तु के राजा शुद्धोदन की महारानी मायादेवी अपने पिता के घर जा रही थीं कि मार्ग में लुम्बिनी वन में वैशाख मास की पूर्णिमा को महारानी ने एक बालक को जन्म दिया।

10. लुम्बनी वन कहाँ स्थित था?

उत्तर: कपिलवस्तु एवं देवदह के मध्य, वर्तमान नौतनवा स्टेशन से 8 मील पश्चिम में रुक्मिनदेई नामक स्थान है। वहाँ उस काल में लुम्बिनीवन स्थित था। इस बालक का नाम सिद्धार्थ रखा गया।

11. प्रश्न: सिद्धार्थ के जन्म के कितने समय बाद उनकी माता का निधन हो गया?

उत्तर: एक सप्ताह बाद।

12. प्रश्न: सिद्धार्थ का पालन पोषण किसने किया?

उत्तर: सिद्धार्थ का पालन-पोषण उनकी मौसी एवं विमाता प्रजापति ने।

13. प्रश्न: सिद्धार्थ का विवाह किससे हुआ?

उत्तर: सोलह वर्ष की आयु में दण्डपाणि नामक राजा की सुंदर राजकन्या यशोधरा से।

14. सिद्धार्थ के पुत्र का क्या नाम था?

उत्तर: राहुल।

15. सिद्धार्थ कितने समय तक गृहस्थ जीवन में रहे?

उत्तर: लगभग 12 वर्ष तक।

16. सिद्धार्थ ने कितनी आयु में घर छोड़ दिया?

उत्तर: 29 वर्ष की आयु में।

17. सिद्धार्थ के घर छोड़ने की घटना को क्या कहा जाता है?

उत्तर: महाभिनिष्क्रमण।

18. सन्यास लेने के बाद सिद्धार्थ का पहला गुरु कौन था?

उत्तर: वैशाली के आलाकालाम नामक एक तपस्वी।

19. सन्यास लेने के बाद सिद्धार्थ का दूसरा गुरु कौन था?

उत्तर: राजगृह के ब्राह्मण उद्रक रामपुत।

20. अपने गुरुओं से सिद्धार्थ ने क्या शिक्षा ली?

उत्तर: इन दोनों गुरुओं से सिद्धार्थ ने योग साधना और समाधिस्थ होना सीखा परन्तु इससे उन्हें सन्तोष नहीं हुआ।

21. अपने गुरुओं से अलग होकर सिद्धार्थ ने क्या किया?

उत्तर: सिद्धार्थ उरुवेला की वनस्थली में जाकर तपस्या में लीन हो गए।

22. प्रश्न: उरुवेला में सिद्धार्थ को कौन मिला?

उत्तर: यहाँ उन्हें कौडिल्य आदि पाँच ब्राह्मण सन्यासी मिले जिनके साथ वे उरुवेला में कठोर तपस्या करने लगे।

23. प्रश्न: सिद्धार्थ ने किस तरह की तपस्या की?

उत्तर: सिद्धार्थ ने पहले तो तिल और चावल खाकर तप किया परन्तु बाद में उन्होंने आहार का सर्वथा त्याग कर दिया जिससे उनका शरीर सूख गया। तप करते-करते सिद्धार्थ को 6 वर्ष बीत गए परन्तु साधना में सफलता नहीं मिली।

24. प्रश्न: कौनसा गीत सुनकर सिद्धार्थ को तपस्या की कठोरता की निरर्थकता का पता लगा?

उत्तर: जनश्रुति है कि एक दिन नगर की कुछ स्त्रियाँ गीत गाती हुई उस ओर से निकलीं जहाँ सिद्धार्थ तपस्यारत थे। उनके कान में स्त्रियों का एक गीत पड़ा जिसका भावार्थ इस प्रकार था- ,वीणा के तारों को ढीला मत छोड़़ो। ढीला छोड़़ने से उनसे सुरीला स्वर नहीं निकलेगा परन्तु वीणा के तारों को इतना भी मत कसो कि वे टूट जाएं।’

25. प्रश्न: इस गीत को सुनकर सिद्धार्थ के मन में क्या विचार आया?

उत्तर: तपस्वी सिद्धार्थ ने अपने हृदय में गीत के भावों पर विचार किया तथा अनुभव किया कि नियमित आहार-विहार से ही योग साधना सिद्ध हो सकती है। किसी भी बात की अति करना ठीक नहीं है, अतः मनुष्य को मध्यम मार्ग ही अपनाना चाहिए। अतः उन्होंने फिर से आहार करना शुरु कर दिया।

26. प्रश्न: सिद्धार्थ के साथियों ने उन्हें क्यों छोड़ दिया?

उत्तर: सिद्धार्थ को तपस्या छोड़कर भोजन करते देखकर उनके पाँचों साथियों ने उन्हें पथ-भ्रष्ट समझकर उनका साथ छोड़़ दिया और वे सारनाथ चले गए।

27. प्रश्न: साथी तपस्वियों के चले जाने के बाद सिद्धार्थ ने क्या किया?

उत्तर: सिद्धार्थ एक पीपल वृक्ष के नीचे ध्यान-अवस्था में बैठ गए तथा सात दिन तक ध्यानमग्न रहे।

28. प्रश्न: सिद्धार्थ को बुद्धत्व की प्राप्ति कब हुई?

उत्तर: सात दिन तक ध्यानमग्न रहने के पश्चात् वैसाख पूर्णिमा की रात को जब सिद्धार्थ ध्यान लगाने बैठे तो उन्हें बोध हुआ। उन्हें साक्षात् सत्य के दर्शन हुए। तभी से वे बुद्ध अथवा गौतम बुद्ध के नाम से विख्यात हुए।

29. प्रश्न: बुद्ध के जीवन में ज्ञान-प्राप्ति की घटना क्या कहलाती है?

उत्तर: सम्बोधि।

30. बुद्धत्व की प्राप्ति के समय महात्मा बुद्ध की आयु कितनी थी?

उत्तर: 35 वर्ष।

31. प्रश्न: जिस वृक्ष के नीचे बुद्ध को बुद्धत्व प्राप्त हुआ उसे क्या कहते हैं?

उत्तर: बोधि-वृक्ष’ कहा गया।

32. बुद्ध को बुद्धत्व प्राप्ति की घटना कहाँ घटी?

उत्तर: बोधगया।

33. बुद्धत्व की प्राप्ति के बाद बुद्ध ने क्या किया?

उत्तर: इस घटना के बाद महात्मा बुद्ध चार सप्ताह तक बोधि-वृक्ष के नीचे रहकर धर्म के स्वरूप का चिन्तन करते रहे।

34. बुद्ध ने साधना का कौनसा मार्ग अपनाया?

उत्तर: मध्यम-मार्ग।

35. मज्झिम प्रतिपदा किसे कहते हैं?

उत्तर: बुद्ध ने साधना का मध्यम-मार्ग अपनाया। इसके अनुसार काम-वासना अर्थात् विषय-भोग में फंसना और घनघोर तप करके शरीर को कष्ट देना, दोनों ही व्यर्थ हैं। इसे मध्यम मार्ग अथवा ,मज्झिम प्रतिपदा’ कहा जाता है।

36. ज्ञान-प्राप्ति के बाद बुद्ध ने सबसे पहले किसे धर्म-उपदेश दिया?

उत्तर: महात्मा बुद्ध ने सबसे पहले बोधगया में तपस्यु और मल्लिक नामक दो बनजारों को अपने ज्ञान का उपदेश दिया।

37. धर्म-चक्र प्रवर्तन किसे कहा जाता है?

उत्तर: बुद्ध अपने ज्ञान एवं विचारों को जनसाधारण तक पहुँचाने के लिए बोधगया से सारनाथ गए। यहाँ उन्हें वे पाँचों ब्राह्मण साथी मिल गए जो उन्हें छोड़़कर चले गए थे। बुद्ध ने उन्हें अपने ज्ञान की, धर्म के रूप में दीक्षा दी। यह घटना बौद्ध धर्म के इतिहास में ,धर्म-चक्र प्रवर्तन’ के नाम से जानी गई।

38. प्रश्न: पंचवर्गीय किसे कहते हैं।

उत्तर: बुद्ध के वे पांचों शिष्य ,पंचवर्गीय’ कहलाए।

39. सारनाथ से बुद्ध कहाँ गए?

उत्तरः महात्मा बुद्ध सारनाथ से काशी गए और वहाँ अपने ज्ञान का प्रसार करने लगे। जब बुद्ध के शिष्यों की संख्या बढ़ गई तब उन्होंने एक संघ की स्थापना की तथा उनके लिए आचरण के नियम निर्धारित किए।

40. प्रश्न: महात्मा बुद्ध कितने वर्ष तक अपने धर्म का प्रचार करते रहे?

उत्तर: लगभग 45 वर्ष तक।

41. बुद्ध ने किन-किन क्षेत्रों में घूमकर अपने ज्ञान का प्रचार किया?

उत्तर: वे अंग, मगध, वज्जि, कौशल, काशी, मल्ल, शाकय, कोलिय, वत्स, सूरसेन आदि जनपदों में घूमते रहे। केवल वर्षा काल में वे एक स्थान पर निवास करते थे। राजगृह एवं श्रावस्ती से उन्हें विशेष प्रेम था।

42. बुद्ध ने कौनसी भाषा में उपदेश दिए?

उत्तर: कुछ लोगों के अनुसार बुद्ध ने अपने उपदेश संस्कृत भाषा में दिए जिन्हें पालि में लिपिबद्ध किया गया। कुछ लोगों के अनुसार बुद्ध ने अपने उपदेश जनभाषा में दिए। इस प्रश्न का सही उत्तर है- बुद्ध ने अपने उपदेश पालि भाषा में दिए।

43. किस शिष्य के अनुरोध पर बुद्ध ने स्त्रियों को भी बौद्धधर्म में दीक्षा देना स्वीकार कर लिया?

उत्तर: अपने प्रिय शिष्य आनंद के अनुरोध पर।

44. जाति-पाँति और ऊँच-नीच की भावना के सम्बन्ध में बुद्ध का क्या दृष्टिकोण था?

उत्तर: महात्मा बुद्ध जाति-पाँति और ऊँच-नीच की भावना से दूर रहते थे तथा सम्पूर्ण मानव समाज को अपने उपदेशों से लाभान्वित करते थे।

45. महापरिनिर्वाण किसे कहते हैं?

उत्तर: ई.पू. 544 में 80 वर्ष की आयु में गोरखपुर के निकट कुशीनारा में गौतम बुद्ध ने देह-त्याग किया। बुद्ध के शरीर त्यागने की घटना को महापरिनिर्वाण कहते हैं।

46. प्रश्न: बुद्ध का अंतिम उपदेश क्या था?

उत्तर: हे भिक्षुओं, तुम आत्मदीप बनकर विचरो तुम अपनी ही शरण में जाओ। किसी अन्य का सहारा मत ढूँढो। केवल धर्म को अपना दीपक बनाओ। केवल धर्म की शरण में जाओ।

47. बौद्ध धर्म का दर्शन किसने तैयार किया?

उत्तर: बौद्ध धर्म का कोई पृथक दर्शन नहीं है क्योंकि महात्मा बुद्ध ने ईश्वरीय सत्ता, आत्मा, मोक्ष, पुनर्जन्म आदि प्रश्नों पर विचार प्रकट नहीं किए। आज जो कुछ भी बौद्ध दर्शन के नाम से विख्यात है, वह महात्मा बुद्ध की मृत्यु के बाद का विकास है।

48. प्रश्न: बौद्धधर्म का अध्यात्म शास्त्र किसने तैयार किया?

उत्तर: बौद्ध धर्म का कोई आध्यात्म शास्त्र नहीं है। क्योंकि बुद्ध ने सृष्टि सम्बन्धी विषय पर अपने विचार प्रकट नहीं किए। उनका धर्म व्यावहारिक धर्म था जो नैतिक जीवन पर आधारित है। बुद्ध का धर्म मनुष्य की उन्नति का साधन था। वह जीवन का विषय है और इसी जीवन में निर्वाण दिलाता है। बुद्ध का धर्म नितान्त बुद्धिवादी है, उसमें अन्ध-विश्वासों के लिए स्थान नहीं है तथा उसका आधार मानव मात्र का कल्याण है।

49. बुद्ध संसार तथा मानव जीवन को सत्य मानते थे या असत्य?

उत्तर: बुद्ध ने संसार तथा मानव जीवन को असत्य नहीं माना। वे इस विवाद में नहीं पड़े कि संसार तथा मनुष्य अमर हैं या नश्वर! सीमित हैं या असीम! जीव और शरीर एक हैं या अलग। जब किसी ने उनसे इन प्र्रश्नों का उत्तर देने का आग्रह किया तो भी वे मौन रहे। उन्होंने जीवन को जैसा भी है, वैसा मानकर व्यावहारिक दृष्टि अपनाने का उपदेश दिया।

50. कुछ विद्धानों ने बुद्ध के धर्म को धर्म क्यों नहीं माना?

उत्तर: महात्मा बुद्ध आत्मा-परमात्मा, लोक-परलोक, पाप-पुण्य और मोक्ष आदि विषयों के विवादों में नहीं पड़े। उन्होंने मनुष्य को नैतिकता पर आधारित जीवन जीने का उपदेश दिया। उन्होंने अपने धर्म की इतनी अधिक नैतिक व्याख्या की कि कुछ विद्वानों की दृष्टि में बौद्ध धर्म, वास्तव में धर्म नहीं होकर आचार-शास्त्र मात्र था।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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