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रवीन्द्र नाथ टैगोर

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रवीन्द्र नाथ टैगोर

रवीन्द्र नाथ टैगोर का प्रारम्भिक जीवन

रवीन्द्र नाथ टैगोर का जन्म 7 मई 1861 को कलकत्ता में हुआ। उनके पिता देवेन्द्रनाथ टैगोर ने केशवचंद्र सेन से मतभेद हो जाने के कारण ब्रह्मसमाज से अलग होकर आदि-ब्रह्मसमाज की स्थापना की थी। रवीन्द्रनाथ की माता का नाम शारदा देवी था। रवीन्द्र नाथ टैगोर की प्रारंभिक शिक्षा कोलकाता के सेंट जेवियर स्कूल में हुई।

देवेन्द्र नाथ अपने पुत्र रवीन्द्र नाथ को बैरिस्टर बनाना चाहते थे किंतु रवीन्द्र नाथ की रुचि साहित्य पढ़ने-लिखने में अधिक थी। रवीन्द्र नाथ के पिता ने ई.1878 में उनका लंदन विश्वविद्यालय में प्रवेश कराया परन्तु ई.1880 में वे बिना डिग्री लिये ही वापस आ गए। ई.1883 में रवीन्द्र नाथ टैगोर का विवाह मृणालिनी देवी से हुआ।

सार्वजनिक जीवन

रवीन्द्र नाथ टैगोर बीसवीं सदी के प्रारम्भिक भारत में प्रसिद्ध साहित्यकार, चित्रकार, संगीतज्ञ एवं समाजसेवी के रूप में जाने गए। उन्हें बंगाली एवं अंग्रेजी भाषा के साहित्यकार के रूप में अधिक प्रसिद्धि मिली। उनकी प्रमुख रचना गीतांजलि को ई.1913 में नोबोल पुरुस्कार मिला। ई.1901 में रवीन्द्र नाथ टैगोर ने शांति निकेतन की स्थापना की जिसके कारण वे गुरुदेव के नाम से प्रसिद्ध हुए।

वे चाहते थे कि प्रत्येक विद्यार्थी प्रकृति के निकट रहकर पढ़े, इसलिये शान्ति निकेतन में बड़ी संख्या में वृक्ष लगाए गए। उन्होंने शांति निकेतन में एक पुस्तकालय की भी स्थापना की। शान्ति निकेतन को विश्वविद्यालय के रूप में मान्यता दी गई। वे अपने जीवन में तीन बार अल्बर्ट आइंस्टीन से मिले जो रवीन्द्र नाथ टैगोर को ‘रब्बी टैगोर’ कहते थे। 7 अगस्त 1941 को रवीन्द्र नाथ टैगोर का निधन हुआ।

रवीन्द्र नाथ टैगोर की प्रमुख रचनाएं

रवीन्द्र नाथ टैगोर ने अपनी पहली कविता केवल आठ वर्ष की आयु में लिखी। ई.1877 में सोलह वर्ष की आयु में उन्होंने प्रथम लघुकथा लिखी। रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने बड़ी संख्या में कविता, गीत, उपन्यास, कहानियाँ, निबन्ध तथा नाटक लिखे। उन्होंने 2,230 गीतों एवं कविताओं की रचना की। रवीन्द्र नाथ टैगोर के लिखे गीतों में से ‘जन मन गण’ को भारत के तथा ‘आमार सोनार बांग्ला’ को बांग्लादेश के राष्ट्रगान के रूप में मान्यता मिली।

टैगोर ने बांग्ला साहित्य में नए गद्य और छंद तथा लोकभाषा के उपयोग की शुरुआत की और इस प्रकार शास्त्रीय संस्कृत पर आधारित पारंपरिक प्रारूपों से उसे मुक्ति दिलाई। भारत में रवीन्द्र नाथ टैगोर ने 1880 के दशक में कविताओं की अनेक पुस्तकें प्रकाशित कीं तथा ई.1890 में ‘मानसी’ की रचना की। यह संग्रह उनकी प्रतिभा की परिपक्वता का परिचायक है।

इसमें उनकी कुछ सर्वश्रेष्ठ कविताएँ शामिल हैं, जिनमें से कई बांग्ला भाषा में अपरिचित नई पद्य शैलियों में हैं। साथ ही समसामयिक बंगालियों पर कुछ सामाजिक और राजनीतिक व्यंग्य भी हैं। वे वैश्विक समानता और एकांतिकता के पक्षधर थे। उनकी अधिकतर रचनाएँ बांग्ला भाषा में लिखी हुई हैं। वह एक ऐसे लोक कवि थे जिनका केन्द्रीय तत्त्व अंतिम आदमी की भावनाओं का परिष्कार करना था।

वह मनुष्य मात्र के स्पन्दन के कवि थे। एक ऐसे रचनाकार जिनकी रचनाओं में शाश्वत प्रेम की गहरी अनुभूति है, एक ऐसा नाटककार जिसके रंगमंच पर सिर्फ़ ट्रेजडी ही ज़िंदा नहीं है, जीवन जीने की गहरी जिजीविषा भी है। एक ऐसा कथाकार जो अपने आस-पास से कथालोक चुनता है, बुनता है, सिर्फ़ इसलिए नहीं कि घनीभूत पीड़ा की आवृत्ति करे या उसे ही अनावृत्त करे, बल्कि उस कथालोक में वह आदमी के अंतिम गंतव्य की तलाश भी करता है।

सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ

रवीन्द्र नाथ टैगोर सियालदह और शजादपुर में स्थित पैतृक जमींदारी के प्रबंधन के लिए 10 वर्ष तक पूर्वी बंगाल (वर्तमान बांगला देश) में रहे, वहाँ वह पद्मा नदी (गंगा नदी) पर एक हाउस बोट में ग्रामीणों के निकट संपर्क में रहते थे और उन ग्रामीणों की निर्धनता एवं पिछड़ेपन के प्रति संवेदनाएं ही टैगोर की रचनाओं का मूल स्वर बनीं।

उनकी सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ, जिनमें दीन-हीनों का जीवन और उनके छोटे-मोटे दुःख वर्णित हैं, ई.1890 के बाद की हैं और उनकी मार्मिकता में हल्का सा विडंबना का पुट है जो टैगोर की निजी विशेषता है तथा जिसे बाद में फिल्म-निर्देशक सत्यजित राय ने अपनी फ़िल्मों में दर्शाया।

उनकी समस्त चैरासी कहानियाँ ‘गल्पगुच्छ’ की तीन जिल्दों में संग्रहीत हैं। ई.1891 से 1895 के बीच के पाँच वर्षों का समय रवीन्द्रनाथ की साधना का महान् काल था। वे अपनी कहानियाँ सबुज पत्र (हरे पत्ते) में छपवाते थे। आज भी पाठकों को उनकी कहानियों में हरे पत्ते और हरे गाछ मिल सकते हैं। उनकी कहानियों में सूर्य, वर्षा, नदियाँ और नदी किनारे के सरकंडे, वर्षा ऋतु का आकाश, छायादार गाँव, वर्षा से भरे अनाज के प्रसन्न खेत मिलते हैं।

उनकी कहानियों के साधारण पात्र कहानी सम्पूर्ण होते-होते असाधारण मनुष्यों में बदल जाते हैं तथा महानता की पराकाष्ठा छू लेते हैं। उनकी मूक पीड़ा की करुणा पाठक के हृदय को अभिभूत कर लेती है। उनकी कहानी पोस्टमास्टर इस बात का सजीव उदाहरण है कि एक सच्चा कलाकार साधारण उपकरणों से कैसी अद्भुत सृष्टि कर सकता है। कहानी में केवल दो सजीव साधारण-से पात्र हैं।

बहुत कम घटनाओं से भी वे अपनी कहानी का महल खड़ा कर देते हैं। एक छोटी लड़की कैसे बड़े-बड़े इंसानों को अपने स्नेह-पाश में बाँध देती हैं। क़ाबुलीवाला भी इस बात का जीता-जागता उदाहरण है। रवीन्द्रनाथ ने पहली बार अपनी कहानियों में साधारण की महिमा का बखान किया।

रवीन्द्रनाथ की कहानियों में अनपढ़ क़ाबुलीवाला और सुसंस्कृत बंगाली भूत भावनाओं में एक समान हैं। उनकी क़ाबुलीवाला, मास्टर साहब, पोस्टमास्टर आदि कहानियाँ आज भी लोकप्रिय हैं और सर्वश्रेष्ठ भी। पात्रों के साथ रवीन्द्रनाथ की अद्भुत सहानुभूतिपूर्ण एकात्मकता और उसके चित्रण का अतीव सौंदर्य उनकी कहानी को सर्वश्रेष्ठ बना देते हैं जिसे पढ़कर द्रवित हुए बिना नहीं रहा जा सकता।

उनकी कहानियाँ कठोर एवं शुष्क हृदय व्यक्ति को मोम जैसा कोमल बनाने की क्षमता रखती हैं। अतिथि का तारापद रवीन्द्रनाथ की अविस्मरणीय रचनाओं में है। इसका नायक कहीं बँधकर नहीं रह पाता। आजीवन अतिथि ही रहता है। क्षुधित पाषाण, आधी रात में (निशीथे) तथा मास्टर साहब कहानियों में दैवीय तत्त्व का स्पर्श है। क्षुधित पाषाण में रचनाकार की कल्पना अपने सुंदरतम रूप में व्यक्त हुई है।

यहाँ अतीत वर्तमान के साथ वार्तालाप करता है- रंगीन प्रभामय अतीत के साथ नीरस वर्तमान। समाज में महिलाओं का स्थान तथा नारी जीवन की विशेषताएँ उनके लिए गंभीर चिंता के विषय थे और इस विषय में भी उन्होंने गहरी अंतर्दृष्टि का परिचय दिया है।

गीतांजलि का अंग्रेज़ी अनुवाद प्रकाशित होने के एक सप्ताह के भीतर लंदन से प्रकाशित होने वाले प्रसिद्ध साप्ताहिक टाइम्स लिटरेरी सप्लीमेंट में उसकी समीक्षा प्रकाशित हुई थी और बाद में आगामी तीन माह के अंदर तीन समाचार पत्रों में भी उसकी समीक्षा प्रकाशित हुई। रवीन्द्रनाथ ठाकुर को नोबेल पुरस्कार मिलने के सम्बन्ध में ब्रिटिश समाचार पत्रों में मिश्रित प्रतिक्रिया हुई।

द टाइम्स ने लिखा- ‘स्वीडिश एकेडेमी के इस अप्रत्याशित निर्णय पर कुछ समाचार पत्रों में आश्चर्य व्यक्त किया गया है।’ किंतु इसी पत्र के स्टाकहोम स्थित संवाददाता ने अपने डिस्पेच में लिखा- ‘स्वीडन के प्रमुख कवियों और लेखकों ने स्वीडिश कमेटी के सदस्यों की हैसियत से नोबेल कमेटी के इस निर्णय पर पूर्ण संतोष व्यक्त किया है।’

ब्रिटेन के प्रतिष्ठित समाचार पत्र मेन्चेस्टर गार्डियन ने लिखा- ‘रवीन्द्रनाथ टैगोर को नोबेल पुरस्कार मिलने की सूचना पर कुछ लोगों को आश्चर्य अवश्य हुआ पर असंतोष नहीं। टैगोर एक प्रतिभाशाली कवि हैं।’

बाद में द केरसेण्ट मून नामक समाचार पत्र ने लिखा- ‘इस बंगाली (यानी रवीन्द्रनाथ ठाकुर) का अंग्रेज़ी भाषा पर जैसा अधिकार है वैसा बहुत कम अंग्रेज़ों का होता है।’

टैगोर की कविताओं की पांडुलिपि को सबसे पहले विलियम रोथेनस्टाइन ने पढ़ा था और वे इतने मुग्ध हुए कि उन्होंने अंग्रेज़ी कवि यीट्स से संपर्क किया और पश्चिमी जगत् के लेखकों, कवियों, चित्रकारों और चिंतकों से टैगोर का परिचय कराया। उन्होंने ही इंडिया सोसायटी से इसके प्रकाशन की व्यवस्था की। शुरू में 750 प्रतियाँ छापी गईं, जिनमें से सिर्फ़ 250 प्रतियाँ ही बिक्री के लिए थीं।

बाद में मार्च 1913 में मेकमिलन एंड कंपनी लंदन ने इसे प्रकाशित किया और 13 नवंबर 1913 को नोबेल पुरस्कार की घोषणा से पहले इसके दस संस्करण छापने पड़े। यीट्स ने टैगोर के अंग्रेज़ी अनुवादों का चयन करके उनमें कुछ सुधार किए और अंतिम स्वीकृति के लिए उन्हें टैगोर के पास भेजा और लिखा- ‘हम इन कविताओं में निहित अजनबीपन से उतने प्रभावित नहीं हुए, जितना कि यह देखकर कि इनमें तो हमारी ही छवि नज़र आ रही है।’

बाद में यीट्स ने ही अंग्रेज़ी अनुवाद की भूमिका लिखी। उन्होंने लिखा कि कई दिनों तक इन कविताओं का अनुवाद लिए मैं रेलों, बसों और रेस्तराओं में घूमा हूँ और मुझे बार-बार इन कविताओं को इस डर से पढ़ना बंद करना पड़ा है कि कहीं कोई मुझे रोते-सिसकते हुए न देख ले। अपनी भूमिका में यीट्स ने लिखा कि हम लोग लंबी-लंबी किताबें लिखते हैं जिनमें शायद एक भी पन्ना लिखने का ऐसा आनंद नहीं देता है।

बाद में गीतांजलि का जर्मन, फ्रैंच, जापानी, रूसी आदि विश्व की सभी प्रमुख भाषाओं में अनुवाद हुआ और टैगोर की ख्याति विश्व भर में फैल गई। गीतांजलि के लिए उन्हें ई1913 में साहित्य के लिए नोबेल पुरस्कार प्रदान किया गया।

राष्ट्रवाद से ऊपर मानवता

रवीन्द्र नाथ टैगोर मानवता को राष्ट्रीयता से ऊपर रखते थे। टैगोर मानते थे कि देशभक्ति चार-दिवारी से बाहर विचारों से जुड़ने की आजादी से हमें रोकती है, साथ ही दूसरे देशों की जनता के दुःख-दर्द को समझने की स्वतंत्रता भी सीमित कर देती है। वह अपने लेखन में राष्ट्रवाद को लेकर आलोचनात्मक दृष्टि रखते थे। ई.1908 में प्रसिद्ध वैज्ञानिक जगदीश चंद्र बोस की पत्नी अबला बोस की आलोचना का जवाब देते हुए टैगोर ने कहा था- ‘देशभक्ति हमारा आखिरी आध्यात्मिक सहारा नहीं बन सकता, मेरा आश्रय मानवता है।’

ई.1916-17 में टैगोर ने जापान और अमेरिका की यात्रा के दौरान राष्ट्रवाद पर कई वक्तव्य दिए जिनमें उन्होंने कहा- ‘राष्ट्रवाद का राजनीतिक और आर्थिक संगठनात्मक आधार उत्पादन में बढ़ोतरी और मानवीय श्रम की बचत कर अधिक संपन्नता हासिल करने का प्रयास है। राष्ट्रवाद की धारणा मूलतः राष्ट्र की समृद्धि और राजनैतिक शक्ति में बढ़ोतरी करने में इस्तेमाल की गई है।

शक्ति की बढ़ोतरी की इस संकल्पना ने देशों में पारस्परिक द्वेष, घृणा और भय का वातावरण बनाकर मानव जीवन को अस्थिर और असुरक्षित बना दिया है। यह सीधे-सीधे जीवन से खिलवाड़ है, क्योंकि राष्ट्रवाद की इस शक्ति का प्रयोग बाहरी सम्बन्धों के साथ ही राष्ट्र की आंतरिक स्थिति को नियंत्रित करने में भी होता है। ऐसी स्थिति में समाज पर नियंत्रण बढ़ना स्वाभाविक है।

ऐसी स्थिति में समाज और व्यक्ति के निजी जीवन पर राष्ट्र छा जाता है और एक भयावह नियंत्रणकारी स्वरूप हासिल कर लेता है। दुर्बल और असंगठित पड़ोसी राज्यों पर अधिकार करने का प्रयास राष्ट्रवाद का ही स्वाभाविक प्रतिफलन है। इससे पैदा हुआ साम्राज्यवाद अंततः मानवता का संहारक बनता है।’

भारत के संदर्भ में टैगोर ने लिखा है- ‘भारत की समस्या राजनैतिक नहीं सामाजिक है, यहाँ राष्ट्रवाद नहीं के बराबर है। हकीकत तो ये है कि यहाँ पर पश्चिमी देशों जैसा राष्ट्रवाद पनप ही नहीं सकता, क्योंकि सामाजिक काम में अपनी रूढ़िवादिता का हवाला देने वाले लोग जब राष्ट्रवाद की बात करें तो वह कैसे प्रसारित होगा? भारत को राष्ट्र की संकरी मान्यता छोड़कर अंतरराष्ट्रीय दृष्टिकोण अपनाना चाहिए।’

टैगोर ने लिखा है- ‘भारत भले ही पिछड़ा हो, मानवीय मूल्यों में पिछड़ापन नहीं होना चाहिए। निर्धन भारत भी विश्व का मार्गदर्शन कर मानवीय एकता में आदर्श को प्राप्त कर सकता है। भारत का अतीत यह सिद्ध कर सकता है कि भौतिक संपन्नता की चिंता नहीं करके भारत ने आध्यात्मिक चेतना का सफलतापूर्वक प्रचार किया है।’

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य अध्याय -भारतीय साहित्यिक विरासत

कालीदास

तुलसीदास

मीराबाई

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भारतीय पुनर्जागरण

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भारतीय पुनर्जागरण

अपने आरम्भिक चरण में भारतीय पुनर्जागरण एक बौद्धिक आन्दोलन था जिसने पराधीन भारत के साहित्य, शिक्षा तथा चिंतनधारा को प्रभावित किया तथा जीवन के प्रत्येक अंग का परिष्कार किया।

भारतीय सभ्यता, समाज एवं संस्कृति का विकास विश्व की अन्य संस्कृतियों से पूर्णतः पृथक एवं स्वतंत्र रूप से हुआ था। यह विश्व की प्राचीनतम संस्कृति थी जो मनुष्य मात्र के कल्याण के सिद्धांत पर विकसित हुई थी तथा इसमें धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष को जीवन के महत्वपूर्ण एवं बराबर अंग माना गया था किंतु मध्य-काल में देश की राजनीतिक शक्ति मुस्लिम हाथों में चली गई जिसके कारण भारतीय संस्कृति एवं समाज ने स्वयं को नष्ट होने से बचाने के लिए अपने आप को धर्म एवं भक्ति की मजबूत दीवारों में बंद कर लिया।

इस काल में हिन्दुओं की सामाजिक परम्पराएं एवं रीति-रिवाज धार्मिक अनुष्ठानों की तरह पवित्र माने जाने लगे जिसमें नवीन चिंतन के लिए स्थान नहीं बचा। इसलिए मध्य-कालीन वैष्णव-भक्तों ने हिन्दुओं को एक ओर तो उदारता, सहिष्णुता एवं प्रेम आधारित जीवन जीने का रास्ता दिखाया तथा दूसरी ओर अपने धर्म पर टिके रहने के लिए आतताइयों से संघर्ष करने के लिए आत्म-बल प्रदान किया।

सत्रहवीं-अठारहवीं शताब्दी में देश की राजनीतिक सत्ता यूरोपियन जातियों के हाथों में चली गई तथा ई.1765 की इलाहाबाद संधि के बाद अंग्रेेज इस देश के स्वामी हो गए।

19वीं शताब्दी के आरम्भ तक भारतीय सभ्यता पश्चिमी सभ्यता से पूर्णतः प्रभावित हो गयी थी। भारत का शिक्षित वर्ग पाश्चात्य सभ्यता और ज्ञान को श्रेष्ठ मानने लगा था और अपनी सभ्यता और संस्कृति की श्रेष्ठता में उनका विश्वास समाप्त होता जा रहा था। ईसाई धर्म-प्रचारक हिन्दू-धर्म की कमजोरियों को लक्ष्य करके हिन्दू-धर्म को असभ्य लोगों के धर्म के रूप में प्रचारित कर रहे थे।

उनके दुष्प्रचार से प्रभावित होकर कुछ शिक्षित हिन्दुओं ने ईसाई धर्म को अपना लिया। मधुसूदन दत्त, नीलकण्ठ शास्त्री तथा रमाबाई आदि कई व्यक्ति ईसाई बन गए। इससे भारतीय बुद्धिजीवी वर्ग आहत हुआ। इसलिए देश के विचारवान नौजवान, समाज में पुनः आत्म-सम्मान जागृत करने एवं भारतीयों में अपने धर्म, संस्कृति एवं राष्ट्र के प्रति गौरव की भावना जगाने के लिए आगे आए।

भारतीय पुनर्जागरण का अर्थ

ई.1857 की क्रांति के बाद अर्थात् 19वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में भारतीयों में अपनी पराजय से उत्पन्न निराशा की दशा को सुधारने के लिए जिस चेतना का प्रादुर्भाव हुआ, वह भारतीय पुनर्जागरण कहलाता है। इस काल में भारतीयों ने अपने प्राचीन इतिहास, परम्पराओं और संस्कृति से जुड़े रहते हुए भी पश्चिमी सभ्यता से प्राप्त हो रहे नवीन ज्ञान एवं चिंतन को अपनाने का प्रयास किया। तथा धार्मिक, सामाजिक और राजनीतिक क्षेत्र में सुधारों की प्रक्रिया आरम्भ की।

18वीं शताब्दी में भारत में जो सामाजिक एवं सांस्कृतिक अवनति दिखाई देती है, उसका मूल कारण धार्मिक एवं सामाजिक जीवन की बुराईयां तथा विकृतियां हैं, राजनीतिक पराधीनता या पतन तो उसका परिणाम है। अतः पुनर्जागरण का यह कार्य धार्मिक और सामाजिक क्षेत्र से प्रारम्भ हुआ और कालान्तर में इसने राजनीतिक जागरण को जन्म दिया।

इसलिए भारतीय पुनर्जागरण को ‘धार्मिक एवं सामाजिक पुनर्जागरण’ का नाम दिया है। भारत की पुनर्जागृति मुख्यतः आध्यात्मिक थी तथा इसने राष्ट्रीय आन्दोलन का रूप धारण करने से पूर्व सामाजिक और धार्मिक आन्दोलन का सूत्रपात किया। रामधारीसिंह दिनकर ने धार्मिक एवं सामाजिक पुनर्जागरण के दो प्रमुख लक्षण बताए हैं- (1.) अतीत के प्रति गौरव की भावना और (2.) प्रवृत्तिवाद।

भारत में भी पुनर्जागरण का प्रथम लक्षण अपने अतीत के प्रति गौरव उत्पन्न होना था। भारतीय बुद्धिजीवियों ने यह अनुभव किया कि हमें पश्चिम से विज्ञान के अतिरिक्त अन्य कुछ नहीं सीखना है क्योंकि भारत की सांस्कृतिक विरासत विश्व में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण और गौरवपूर्ण है। भारतीयों के मन में इस विश्वास की उत्पत्ति का सर्वप्रमुख कारण भारतीयों के पास सदियों से उपलब्ध वेदान्त के ज्ञान का होना था।

पुनर्जागरण का दूसरा लक्षण प्रवृत्तिवाद को अपनाना अर्थात् निवृत्तिवाद का त्याग करना था। महात्मा बुद्ध के समय से भारतीयों में निवृत्तिवाद की भावना घर कर गई थी जिसमें भौतिक उपलब्धियों के स्थान पर आध्यात्मिक उन्नति एवं व्यक्तिगत आचरण की शुद्धता पर ही ध्यान दिया जा रहा था। भारतीय बुद्धिजीवी यूरोप के व्यक्तिवादी दृष्टिकोण की विशेषताओं एवं उपलब्धियों को भलीभांति समझ पा रहे थे।

उन्होंने अनुभव किया कि यूरोप की श्रेष्ठता का कारण यह नहीं कि उनके पास भारतीयों से अधिक मेधा है, या भारतीयों से अधिक विज्ञान है या युद्ध के भयानक अस्त्र-शस्त्र हैं, अपितु यूरोप की श्रेष्ठता का कारण यूरोपवासियों का जीवन के विषय में प्रवृत्तिमय दृष्टिकोण है। उन्होंने सामाजिक विन्यास की मजबूती एवं भौतिक संसाधनों की उपलब्धियों के माध्यम से स्वयं को शक्तिशाली बनाया है। भारतीयों को भी जातीय गौरव, राष्ट्रवाद एवं भौतिक उपलब्धियों के बारे में सोचना पड़ेगा।

भारतीय पुर्जागरण के कारण

आरम्भ में भारतीय पुनर्जागरण एक बौद्धिक आन्दोलन था जिसने हमारे साहित्य, शिक्षा तथा चिंतनधारा को प्रभावित किया। दूसरे चरण में यह सामाजिक और धार्मिक आन्दोलनों में बदल गया। तीसरे और अन्तिम चरण में इस आंदोलन ने राजनैतिक आन्दोलन का रूप ले लिया जिसके परिणास्वरूप हमें राजनीतिक स्वतंत्रता प्राप्त हो सकी। 19वीं शताब्दी के इस पुनर्जागरण के कई कारण थे-

(1.) एशियाई देशों में जन-जागरण

19वीं शताब्दी में सम्पूर्ण एशिया में जन-जागृति की लहर व्याप्त थी। चीन में विदेशियों के प्रभुतव के विरुद्ध अनेक गुप्त समितियों का निर्माण हो चुका था जिन्होंने चीन में विद्रोही गतिविधियों को जन्म दिया तथा सनयातसेन ने देश में जागृति उत्पन्न करने का उत्तरदायित्व सम्भाला।

इसी प्रकार जापान में, ‘सम्राट का आदर करो, विदेशियों को भगा दो।’ का नारा गूँजने लगा तथा मुत्सोहितो ने जापान में जागृति उत्पन्न करने का प्रयास किया। टर्की में भी राष्ट्रीयता की लहर उत्पन्न हो रही थी, जो सुल्तान के निरंकुश शासन को उखाड़ फेंकना चाहती थी। यद्यपि भारत में जन-जागृति की भावना बहुत पहले से विद्यमान थी तथापि अन्य देशों की जागृति ने भारतीय जागृति की लहर को बल प्रदान किया। वस्तुतः एशियाई देश एक दूसरे से प्रेरणा ग्रहण करके आगे बढ़ रहे थे।

(2.) नए मध्यम वर्ग का विकास

19वीं शताब्दी में भारत में नए मध्यम वर्ग का विकास हुआ जिसने परम्परागत सामाजिक संगठनों अर्थात् जाति-प्रथा, एवं वैवाहिक रीति-रिवाजों को चुनौती दी। शिक्षित मध्यम वर्ग में सभी जातियों के लोग सम्मिलित थे। जब विभिन्न वर्गों में व्यावसायिक समानता स्थापित होने लगी, तब जातीयता पर आधारित भेदभाव समाप्त करने की भावना भी प्रबल होने लगी तथा अन्तर्जातीय प्रतिबन्धों के विरुद्ध आवाज उठने लगी।

इस काल का मध्यम वर्ग पाश्चात्य सभ्यता के सामाजिक विन्यास से प्रभावित था और वह भारतीय सामाजिक जीवन को अंग्रेजों के सामाजिक जीवन के अनुरूप बनाना चाहता था। इसलिए 19वीं शताबदी के समाज सुधार आन्दोलन जीवन-पद्धति में बदलाव लाने के लिए किए गए। इनमें स्त्रियों की शिक्षा, पर्दा प्रथा समाप्ति, अन्तर्जातीय-विवाह के प्रतिबन्धों को तोड़ना, बाल-विवाह को रोकना, विधवा-विवाह के प्रतिबन्धों को समाप्त करना आदि सुधार प्रमुख थे।

(3.) अंग्रेजों द्वारा आर्थिक शोषण

अंग्रेजों ने भारत में आर्थिक शोषण की नीति अपनाई। हिन्दू किसान मुसलमानों के समय से ही निर्धन हो चुके थे किंतु अब अंग्रेजों ने मुसलमानों का भी आर्थिक शोषण किया तथा किसानों, शिल्पियों आदि को जीवन निर्वाह के अन्य साधन खोजने के लिए विवश कर दिया। प्रजा के आर्थिक एवं राजनीतिक शोषण ने भारत की उन शक्तियों को सक्रिय कर दिया, जो भारत के प्राचीन गौरव को पुनः स्थापित करने की कामना रखते थे।

कृषि के वाणिज्यिीकरण के कारण खेतों की पैदावार बढ़ी, विपणन के साधन बढ़े किंतु इस वृद्धि में से किसान के हाथ बहुत कम हिस्सा ही लगा। सारी मलाई अंग्रेज शक्ति लूट लेती थी। औद्योगिकीकरण के कारण किसान के लड़के अपने गांव छोड़़कर नगरों को पलायन करने लगे। इस नए परिवेश में उन्होंने नए ढंग से सोचना आरम्भ किया।

वे नियतिवाद एवं यथास्थिति वाद को छोड़कर परिश्रम के आधार पर भाग्य बदलने के विचारों से आप्लावित हो रहे थे तथा निवृत्तिवाद की भावना को त्यागकर प्रवत्तिवाद की ओर बढ़ रहे थे। लोगों की आकांक्षाएं एवं जीवन से अपेक्षाएं बढ़ रही थीं।

(4.) पाश्चात्य शिक्षा का प्रभाव

ई.1835 में अंग्रेजी को शिक्षा का माध्यम स्वीकार कर लिया गया। इस कारण अनेक भारतीय युवक शिक्षा प्राप्त करने हेतु इंग्लैण्ड जाने में सक्षम हो गए। उन्होंने अन्य यूरोपिय देशों की यात्राएं कीं तथा वहाँ के नागरिक जीवन को देखा। मध्यमवर्गीय शिक्षित भारतीय युवकों को पाश्चात्य देशों की सभ्यता और साहित्य का ज्ञान हुआ और उनमें अपने देश और समाज के उत्थान के प्रति उत्साह उत्पन्न हुआ।

वे भी यूरोपीय लोगों की तरह गुलामी से घृणा करने लगे जो जन-जीवन में समस्त प्रकार की विसंगतियां एवं असंतुलन उत्पन्न कर रहा था। उन्हें रूढ़वादी भारतीय समाज के खोखलेपन की भयावह स्थिति का ज्ञान हुआ। इस प्रकार अंग्रेजी पढ़े-लिखे वर्ग में समाज सुधार की आवाज सबसे पहले उठी किन्तु इस कार्य में वास्तविक सफलता उन युवाओं को मिली जिन्हें अंग्रेजी शिक्षा के साथ-साथ प्राचीन भारतीय संस्कृति एवं उसके गौरव का भी ज्ञान था।

यदि ऐसा नहीं होता तो पढ़ा-लिखा भारतीय युवक भारतीय संस्कृति से घृणा करने वाला एवं अंग्रेजी संस्कृति का अनुकरण करने वाला बन जाता। ऐसी जागृति देश का उत्थान करने की बजाय, और अधिक पतन करती।

(5.) ईसाई धर्म-प्रचारकों की आलोचना

ईसाई धर्म-प्रचारकों ने भारतीय धर्म का उपहास उड़ाया तथा भारतीय सामाजिक ढांचे की आलोचना की। उन्होंने हिन्दू समाज के लिए अपशब्दों का प्रयोग किया तथा ईसाई धर्म की श्रेष्ठता का प्रचार किया। गवर्नर जनरल कार्नवालिस से लेकर केनिंग तक और उसके बाद अनेक गवर्नर-जनरलों के भारतीयों के सम्बन्ध में तिरस्कारात्मक विचार थे।

बैंटिक, मेटकाफ, मेकाले आदि अंग्रेज अधिकारी भारत में व्याप्त विभिन्न सामाजिक कुरीतियों एवं अन्धविश्वासों को दूर करना चाहते थे किंतु उनके मन में भारतीय समाज एवं संस्कृति के प्रति घृणा एवं तिरस्कार की भावना थी।

इस कारण उनका सुधारवादी दृष्टिकोण भारतीयों को पाश्चात्य संस्कृति की श्रेष्ठता का पाठ पढ़ाने तक सीमित होकर रह गया था। ऐसी स्थिति में भारतीयों को यह समझ में आना स्वाभाविक ही था कि देश में वास्तविक सुधार केवल भारतीय ही ला सकते हैं और उसका माध्यम भी भारतीयता ही हो सकता है।

(6.) भारतीय समाचार-पत्र एवं साहित्य

भारतीय समाचार-पत्रों, पत्रिकाओं, साहित्य आदि ने भारतीय पुनर्जागरण में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। प्रेस की स्थापना से विचारों के तेजी से प्रसार की सुविधा उपलब्ध हो गयी। कुछ ऐसे समाचार-पत्र एवं पत्रिकायें प्रकाशित होने लगीं जिनमें अंग्रेजों द्वारा किए जा रहे दुव्र्यवहार, नस्लीय-भेद और शोषण के समाचार प्रकाशित होते थे।

साथ ही भारतीय राष्ट्रवादियों के विचारोत्तेजक लेख एवं कविताएं भी छपते थे। इस कारण पढ़ा-लिखा समाज तेजी से मानसिक विकास करने में सफल हो गया। रेलों के विस्तार से भी देश के विभिन्न हिस्सों के नागरिकों को एक-दूसरे के विचार जानने का अवसर मिला।

(7.) गैर-सरकारी अँग्रेजों की भूमिका

उन्नीसवीं सदी के आरम्भ में अनेक गैर-सरकारी अँग्रेज भारत आये। ये अँग्रेज ब्रिटेन के औद्योगिक बुर्जुआ वर्ग की प्रगतिशील विचारधारा से प्रभावित थे। ये लोग भारत में वकील, शिक्षक, पत्रकार आदि बन कर आये थे। कम्पनी सरकार के अधिकारी इन्हें तिरस्कार-वश इण्टर-लोफर (अनधिकार प्रवेशकारी) कहते थे।

इन अँग्रेजों का कई बातों पर कम्पनी के अधिकारियों से वाद-विवाद होता रहता था। इन्हीं लोगों ने कुछ प्रमुख भारतीयों के साथ मिलकर ईस्ट इण्डिया कम्पनी के शासन के विरुद्ध आन्दोलन चलाने के लिए लैण्ड होल्डर्स सोसाइटी (ई.1838), ब्रिटिश इण्डिया सोसाइटी (ई.1839) और बंगाल ब्रिटिश इण्डिया सोसाइटी (ई.1843) आदिप्रभावशाली संगठन स्थापित किये थे। इन संगठनों द्वारा चलाये गये आन्दोलनों से भारतीयों में नवीन दृष्टि का विकास हुआ।

(8.) यूरोपीय विद्वानों द्वारा भारतीय संस्कृति की प्रशंसा

मैक्समूलर, मोनियर विलयम्स, रौथ, सैसून, बुनर्फ आदि यूरोपीय विद्वानों ने प्राचीन भारतीय साहित्य, धर्म और संस्कृति के सम्बन्ध में शोध करके विश्व के सम्मुख भारतीयों के राजनैतिक, सांस्कृतिक और सामाजिक इतिहास का समृद्ध चित्र प्रस्तुत किया। इन अनुसन्धानों के परिणाम स्वरूप भारत की प्राचीन आध्यात्मिक श्रेष्ठता और दैदीप्यमान सभ्यता के चिन्ह भारतीयों के समक्ष आए। इससे भारतीयों का आत्म विश्वास तथा आत्माभिमान बढ़ा और उनमें राष्ट्रप्रेम की भावना ने जोर पकड़ा।

इन समस्त कारणों से भारत में पुनर्जागरण की एक अद्भुत लहर उत्पन्न हो गयी। भारत में नवचेतना की जो लहर उत्पन्न हुई उसने शैक्षणिक, सामाजिक, धार्मिक और राजनीतिक समस्त क्षेत्रों को प्रभावित किया।

भारतीय पुनर्जागरण का स्वरूप

भारत में 19वीं शताब्दी के पुनर्जागरण के फलस्वरूप जो समाज सुधार आरम्भ हुए, वह वास्तव में प्राचीन व्यवस्थाओं के विरुद्ध शांत-विद्रोह था। इन विद्रोही व्यक्तियों को व्यंग्य से ‘सुधारक’ कहते थे। इन सुधारकों का उद्देश्य प्रचलित सामाजिक ढांचे में परिवर्तन करना नहीं था, अपितु उसमें रहन-सहन की नवीन प्रणाली का समावेश करना था। भारत में समाज सुधार की परम्परा नई नहीं थी।

16वीं से 18वीं शताब्दी तक यह कार्य सन्तों एवं सन्यासियों द्वारा किया गया, जिसे भक्ति-आन्दोलन कहा जाता है। 19वीं शताब्दी में इस कार्य में गृहस्थ व्यक्तियों का योगदान अधिक रहा। इस सामाजिक आन्दोलन के तीन चरण थे-

(1.) ई.1877 से पहले समाज-सुधार के प्रयास व्यक्तिगत स्तर पर किए गए।

(2.) ई.1877 से ई.1919 के बीच समाज सुधार के संगठित प्रयास किए गए।

(3.) ई.1919 के बाद समाज सुधारों की दिशा राजनीतिक चेतना की ओर मोड़ दी गई।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य अध्याय : उन्नीसवीं एवं बीसवीं सदी के समाज-सुधार आंदोलन

भारतीय पुनर्जागरण

राजा राममोहन राय और उनका ब्रह्मसमाज

युवा बंगाल आन्दोलन

केशवचन्द्र सेन का भारतीय ब्रह्मसमाज

आत्माराम पाण्डुरंग और प्रार्थना समाज

स्वामी दयानंद सरस्वती और आर्य समाज

स्वामी श्रद्धानंद का शुद्धि आंदोलन

रामकृष्ण परमहंस

स्वामी विवेकानन्द

थियोसॉफिकल सोसायटी

मुस्लिम सुधार आन्दोलन

विभिन्न सम्प्रदायों में सुधार आंदोलन

समाजसुधार आंदोलनों का मूल्यांकन

राजा राममोहन राय और उनका ब्रह्मसमाज

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राजा राममोहन राय

राजा राममोहन राय ने शुद्ध एकेश्वरवाद के सिद्धांत पर आधारित ब्रह्मसमाज की स्थापना की। ब्रह्मसमाज मूलतः भारतीय था और इसका आधार उपनिषदों का अद्वैतवाद था।

भारत में धार्मिक और समाजिक आन्दोलनों के प्रवर्तक राजा राम मोहन राय का जन्म ई.1774 में बंगाल के राधानगर गांव में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ। वे आरम्भ से ही क्रांतिकारी विचारों के थे। 17 वर्ष की आयु में उन्होंने एक पुस्तिका प्रकाशित करवाई जिसमें उन्होंने मूर्ति-पूजा का प्रबल विरोध किया। उनके परम्परावादी ब्राह्मण परिवार ने नाराज होकर उन्हें घर से बाहर निकाल दिया।

वे इधर-उधर भटकने लगे तथा इस दौरान उन्होंने संस्कृत, फारसी, बंगला, अरबी तथा अँग्रेजी भाषाओं का अध्ययन किया और ईस्ट इण्डिया कम्पनी के अधीन रंगपुर की कलेक्टरी में क्लर्क बन गये। अपनी प्रतिभा के बल पर वे शीघ्र ही जिले की दीवानगिरी के उच्च पद पर पहुँच गये। इसी बीच उन्होंने लेटिन, ग्रीक एवं हिब्रू भाषाएं सीखकर ईसाई धर्म का गहन अध्ययन किया। हिन्दू-धर्म-शास्त्रों, वेद, उपनिषद तथा वेदान्त आदि का अध्ययन वे पहले ही कर चुके थे।

राजा राममोहन राय द्वारा इसाई धर्म के आक्षेपों का जवाब

राजा राममोहन राय ईसाई धर्म की अच्छाइयों के प्रशंसक थे किंतु उन्होंने ईसा के देवत्व को उसी प्रकार अस्वीकार किया जिस प्रकार वे हिन्दू अवतारवाद को अस्वीकार करते थे। ई.1813 में जब ईसाई मिशनरियों ने हिन्दू-धर्म पर आक्षेप करने आरम्भ किये तो राजा राममोहन राय ने उन आक्षेपों का उत्तर देना आरम्भ किया।

ई.1814 में 40 वर्ष की आयु में उन्होंने अपने पद से त्याग-पत्र दे दिया और कलकत्ता जाकर रहने लगे। ई.1820 में उन्होंने प्रीसेप्ट्स ऑफ जीसस नामक पुस्तक प्रकाशित की जिसमें उन्होंने न्यू टेस्टामेंट्स के नैतिक और दार्शनिक संदेश को उसकी चमत्कारी कहानियों से अलग करने का प्रयास किया।

राजा राममोहन राय द्वारा ब्रह्मसमाज की स्थापना

20 अगस्त 1828 को राजा राममोहन राय ने शुद्ध एकेश्वरवाद के सिद्धांत पर आधारित ब्रह्मसमाज की स्थापना की। ब्रह्मसमाज 19वीं शताब्दी का प्रथम धार्मिक और सामाजिक आन्दोलन था तथा राजा राममोहन राय पहले भारतीय थे जिन्होंने भारतीय धर्म और समाज की बुराईयों का दूर करने का प्रयत्न किया।

ब्रह्मसमाज का विभाजन

ई.1833 में राजा राममोहन राय की मृत्यु के बाद देवेन्द्रनाथ टैगोर और केशवचन्द्र सेन ने ब्रह्मसमाज को आगे बढ़ाया। केशवचन्द्र सेन ब्रह्मसमाज को ईसाई धर्म के सिद्धान्तों पर चलाना चाहते थे किन्तु देवेन्द्रनाथ टैगोर इससे सहमत नहीं थे। अतः ब्रह्मसमाज दो भागों में विभक्त हो गया-

(1.) देवेन्द्रनाथ का आदि ब्रह्मसमाज

(2.) केशवचन्द्र सेन का भारतीय ब्रह्मसमाज।

केशवचन्द्र ने अपने समाज के प्रचार हेतु देश का पर्यटन किया। इसके फलस्वरूप बम्बई में प्रार्थना समाज और मद्रास में वेद समाज की स्थापना हुई। ई.1881 में भारतीय ब्रह्मसमाज में पुनः मतभेद उत्पन्न हो गए। केशवचन्द्र सेन के विरोधियों ने साधारण ब्रह्मसमाज स्थापित किया। केशवचन्द्र सेन ने नव विधान समाज की स्थापना की जिसमें हिन्दू, ईसाई, बौद्ध और मुस्लिम धार्मिक ग्रन्थों से भी अनेक बातें ली गई थीं। यद्यपि ब्रह्मसमाज विभिन्न शाखाओं में विभक्त हो गया तथापि उसका मूल लक्ष्य हिन्दू समाज और धर्म का सुधार करना था।

ब्रह्मसमाज के प्रमुख सिद्धान्त

राजा राममोहन राय ने ब्रह्मसमाज के रूप में किसी नवीन सम्प्रदाय को खड़ा नहीं किया अपितु हिन्दू-धर्म की उच्च शिक्षाओं के तत्त्व से एक सामान्य पृष्ठभूमि तैयार की। ब्रह्मसमाज मूलतः भारतीय था और इसका आधार उपनिषदों का अद्वैतवाद था। ब्रह्मसमाज की साप्ताहिक बैठकों में वेदों का पाठ होता था तथा उपनिषदों के बंगला अनुवाद का वाचन होता था।

ब्रह्मसमाज के सुधार कार्य

राममोहन राय के धार्मिक सुधार

ब्रह्मसमाज ने वेदों और उपनिषदों को आधार मानकर बताया कि ईश्वर एक है, समस्त धर्मों में सत्यता है, मूर्ति-पूजा और कर्मकाण्ड निरर्थक हैं तथा सामाजिक कुरीतियों का धर्म से कोई सम्बन्ध नहीं है। सर्वप्रथम ब्रह्मसमाज ने ही भारतीय समाज को तर्क के आधार पर धर्म की व्याख्या करने का विचार दिया।

धर्म की व्याख्या करते हुए, ईसाई धर्म के कर्मकाण्डों तथा ईसा मसीह के ईश्वरीय अवतार होने के दावे पर प्रबल आक्रमण किया तथा ईसाई धर्म-प्रचारकों से शास्त्रार्थ किया। इस कारण जो हिन्दू, ईसाई धर्म ग्रहण कर रहे थे, वे धर्म-परिवर्तन करने से बच गए। राजा राममोहन राय ने हिन्दू, ईसाई, इस्लाम, बौद्ध आदि समस्त धर्मों का गहन अध्ययन किया और इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि समस्त धर्मों में सत्य है किन्तु समस्त धर्मों में कर्मकाण्ड सम्मिलित हो गये हैं जिनको दूर करने की आवश्यकता है।

उन्होंने मुख्यतः हिन्दू-धर्म में सुधार करने का प्रयत्न किया। उन्होंने लोगों का ध्यान उस निराकार, निर्विकार ब्रह्म की ओर आकृष्ट किया जिसका निरूपण वेदान्त में हुआ है। ब्रह्मसमाज समस्त धर्मों के प्रति सहिष्णु था। जब राजा राममोहन राय ने ब्रह्मसमाज के लिए भवन का निर्माण कराया, तब उसके ट्रस्ट के दस्तावेज में स्पष्ट किया गया कि ‘समस्त लोग बिना किसी भेदभाव के, शाश्वत सत्ता की उपासना के लिए इस भवन का प्रयोग कर सकते हैं। इसमें किसी मूर्ति की स्थापना नहीं होगी, न इसमें कोई बलिदान होगा, न किसी धर्म की निन्दा की जायेगी। इसमें केवल ऐसे उपदेश दिये जायेंगे जिनसे समस्त धर्मों के बीच एकता तथा सद्भाव की वृद्धि हो।’

ब्रह्मसमाज पर आरोप लगाया जाता है कि उस पर ईसाई धर्म और सभ्यता का प्रभाव था किन्तु यह सत्य नहीं है। उसकी प्रेरणा के मूल स्रोत प्राचीन भारतीय धर्म ग्रन्थ ही थे। ब्रह्मसमाज ने भारत के अन्य धर्मों में सुधार का मार्ग भी प्रशस्त किया।

राममोहन राय के सामाजिक सुधार

राजा राममोहन राय उच्च कोटि के समाज सुधारक थे। उस समय हिन्दू समाज में अनेक बुराईयां व्याप्त थीं। राजा राममोहन राय ने उन्हें दूर करने का निश्चय किया। उन्होंने अपनी विधवा भाभी को सती होते देखकर इस अमानुषिक प्रथा के विरुद्ध आन्दोलन चलाया। इसके परिणाम स्वरूप लॉर्ड विलियम बैंटिक ने ई.1829 में सती-प्रथा को गैर कानूनी घोषित किया।

ब्रह्मसमाज ने बाल-विवाह, बहु-विवाह, जाति प्रथा, छुआछूत, नशा आदि कुरीतियों का विरोध किया तथा स्त्री-शिक्षा, अन्तर्जातीय विवाह, विधवा-विवाह आदि का समर्थन किया। उस समय भारतीय हिन्दू समाज में कन्या एवं वर विक्रय और कन्या-वध जैसी कुप्रथायें प्रचलित थीं।

ब्रह्मसमाज ने इन कुरीतियों के विरुद्ध प्रबल आन्दोलन चलाया। उन्होंने समता का सिद्धान्त प्रतिपादित करते हुए लाखों हिन्दुओं को ईसाई होने से रोका। ई.1822 और ई.1830 में दो प्रकाशनों द्वारा राजा राममोहन राय ने स्त्रियों के सामाजिक, कानूनी और सम्पत्ति के अधिकारों पर प्रकाश डाला। उनके मत में, स्त्री और पुरुष दोनों ही समान हैं।

इस प्रकार समाज सुधार के क्षेत्र में ब्रह्मसमाज का योगदान अद्वितीय है। हिन्दू समाज में कोई भी ऐसी कुरीति नहीं थी, जिस पर ब्रह्मसमाज ने प्रहार न किया हो। आधुनिक काल में जिन कुरीतियों का विरोध समस्त प्रबुद्ध भारतीयों ने किया है तथा जिन्हें आज भी भारत का शिक्षित वर्ग घृणा की दृष्टि से देखता है, उन कुरीतियों पर सर्वप्रथम ब्रह्मसमाज ने ही प्रहार किया था। स्वतंत्र भारत के संविधान में जिन सामाजिक कुरीतियों को असंवैधानिक घोषित किया गया है, उनके विरुद्ध भी सर्वप्रथम ब्रह्मसमाज ने ही संघर्ष किया था। 

राममोहन राय के साहित्यिक सुधार

ब्रह्मसमाज ने साहित्यिक क्षेत्र में भी उल्लेखनीय कार्य किया। देवेन्द्रनाथ की तत्त्व बोधिनी सभा, केशवचंद्र सेन की संगत सभा और भारतीय समाज सुधार जैसी सभाएं ब्रह्मसमाज के विचारों का प्रचार करने में सहायक सिद्ध हुईं। राजा राममोहन राय ने बंगला, उर्दू, फारसी, अरबी, संस्कृत और अँग्रेजी भाषा में पुस्तकों की रचना कर भारतीय साहित्य को समृद्ध बनाया।

उन्होंने अनेक धार्मिक ग्रन्थों का विभिन्न भाषाओं में अनुवाद किया जो भारतीय साहित्यिक जगत् के लिए स्थायी योगदान है। राजा राममोहन राय और केशवचन्द्र सेन के लेखों और वक्तव्यों ने भारतीय साहित्य को समृद्ध बनाया। राजा राममोहन राय के अपील टू द क्रिश्चियन पब्लिक तथा दी डेस्टिनी ऑफ ह्यूमन लाइफ जैसे लेखों ने भारतीयों में नव-जागरण उत्पन्न किया।

राजा राममोहन राय ने संवाद कौमुदी नामक सर्वप्रथम बंगला साप्ताहिक पत्र निकाला। उन्होंने फारसी अखबार मिरातउल भी प्रकाशित किया। केशवचन्द्र सेन ने भारतीय ब्रह्मसमाज द्वारा तत्त्व कौमुदी, ब्रह्म पब्लिक ओपीनियन, संजीवनी आदि पत्र प्रकाशित किये। इन पत्र-पत्रिकाओं ने साहित्य के विकास में भारी योगदान दिया।

राममोहन राय के शैक्षणिक सुधार

राजा राममोहन राय ने अँग्रेजी भाषा और पाश्चात्य शिक्षा का समर्थन किया। उनकी मान्यता थी कि आधुनिक युग में प्रगति के लिए अँग्रेजी का ज्ञान आवश्यक है। वे चाहते थे कि भारत में पाश्चात्य शिक्षा तथा ज्ञान की समस्त शाखाओं के शिक्षण की व्यवस्था हो। इसके लिए ब्रह्मसमाज ने विभिन्न स्थानों पर स्कूल और कॉलेज खोले। स्वयं राजा राममोहन राय ने कलकत्ता में वेदान्त कॉलेज, इंगलिश स्कूल और हिन्दू कॉलेज की स्थापना की।

केशवचन्द्र सेन के भारतीय ब्रह्मसमाज ने ब्रह्म बालिका स्कूल तथा सिटी कॉलेज ऑफ कलकत्ता की नींव डाली। भारत के आधुनिकीकरण और समाज सुधार में इन शिक्षण संस्थाओं ने महान् योगदान दिया। हिन्दू कॉलेज ने भारतीय बौद्धिक जागरण में अग्रदूत का काम किया तथा युवा बंगाल आन्दोलन को जन्म दिया।

राममोहन राय के राष्ट्रीय सुधार

ब्रह्मसमाज ने राष्ट्रीयता की भावना के निर्माण में विपुल योगदान दिया। उसने प्राचीन भारतीय गौरव, सभ्यता एवं संस्कृति का ज्ञान कराया, जिससे भारतीयों में राष्ट्रीयता की भावना उत्पन्न हुई। राजा राममोहन राय ने हिन्दू कानूनों में सुधार की वकालात की। स्त्रियों के सामाजिक और सम्पत्ति अधिकारों पर बल दिया।

भूमि-कर में कमी करने की मांग की और दमनकारी कृषि कानूनों के विरुद्ध एक प्रार्थना-पत्र इंग्लैण्ड भेजा। समाचार-पत्रों पर लगे प्रतिबन्धों के विरोध में सुप्रीम कोर्ट तथा किंग-इन-कौंसिल को आवेदन भेजे। राजा राममोहन राय ने सर्वप्रथम विचार-स्वतंत्रता का नारा बुलन्द किया। उन्होंने भारतीयों को शासन और सेवा में अधिक संख्या में भरती करने की मांग की।

उन्होंने इंग्लैण्ड के हाउस ऑफ कॉमन्स की प्रवर समिति को भारतीय शासन में सुधार हेतु सुझाव दिये। उन्होंने न्याय में जूरी प्रथा का समर्थन किया तथा न्यायपालिका को प्रशासन से अलग करने की मांग की। उन्होंने दीवानी तथा फौजदारी कानूनों का संग्रह तैयार करने की भी मांग की और फारसी के स्थान पर अँग्रेजी भाषा को न्यायालयों की भाषा बनाने पर बल दिया।

उन्होंने किसानों से ली जाने वाली मालगुजारी निश्चित करने की मांग की। उनके आन्दोलन के फलस्वरूप ई.1835 में समाचार पत्रों पर से प्रतिबन्धों को हटाया गया। राजा राममोहन राय ने भारत के राजनीतिक नवजागरण में महान् योगदान दिया।

नये युग के अग्रदूत राजा राममोहन राय

राजा राममोहन राय अन्तर्राष्ट्रीयता के समर्थक थे। उन्होंने अन्तर्राष्ट्रीय विवादों को शान्तिपूर्ण ढंग से निपटाने हेतु एक सुझाव प्रस्तुत किया जिसमें सम्बन्धित देशों की संसदों से एक-एक सदस्य लेकर अन्तर्राष्ट्रीय कांग्रेस बनाने कर योजना थी। इस प्रकार राजा राममोहन राय राष्ट्रीयता एवं अन्तराष्ट्रीयता- दोनों के प्रबल समर्थक थे।

एडम ने लिखा है- ‘स्वतंत्रता की लगन उनकी अन्तर्रात्मा की सबसे जोरदार लगन थी और यह प्रबल भावना उनके धार्मिक, सामाजिक, राजनीतिक आदि समस्त कार्यों में फूट-फूटकर निकल पड़ती थी।’ इसीलिए उन्हें नये युग का अग्रदूत कहा गया है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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युवा बंगाल आन्दोलन

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युवा बंगाल आन्दोलन का जनक हेनरी लुई विवियन देरीजियो

हेनरी लुई विवियन देरीजियो युवा बंगाल आन्दोलन का जनक था। उसने कलकत्ता के विद्यार्थियों को इस संस्था से जोड़कर अंग्रेजी कुशासन के विरुद्ध आंदोलन चलाया। इस कारण अंग्रेज उससे नाराज हो गए। 

जनवरी 1817 में कलकत्ता में हिन्दू कॉलेज की स्थापना, भारत के धर्म और समाज सुधार आन्दोलन के इतिहास की महत्त्वपूर्ण घटना थी। सार्वजनिक जीवन तथा जनजागरण का इतिहास हिन्दू कॉलेज से ही आरम्भ होता है। इससे पूर्व बंगाल के जनजीवन पर धर्म का गहरा प्रभाव था तथा भारतीयों का राजनीति से सम्पर्क नहीं के बराबर था।

ई.1826 में हेनरी लुई विवियन देरीजियो इस कॉलेज में शिक्षक के पद पर नियुक्त हुआ। वह एक स्वतंत्र विचारक था तथा 19वीं शताब्दी की उदारवादी विचारधारा से प्रभावित था। उसने हिन्दू कॉलेज को जन-जागरण का केन्द्र बना दिया। वह ऐसा वातावरण निर्मित करना चाहता था जिससे भारतीयों में राजनीति के प्रति रुचि उत्पन्न हो।

उसने कॉलेज के मेधावी छात्रों को यूरोप के राजनीतिक विचारकों की विचार धाराओं से परिचित कराया। अमृतलाल मित्र, कृष्णमोहन बनर्जी, रसिककृष्ण मल्लिक, दक्षिणरंजन मुखर्जी, रामगोपाल घोष आदि अनेक छात्र उसके निकट सम्पर्क में थे। देरीजियो और उसके मेधावी छात्रों की विचार गोष्ठियों में धर्म, राजनीति, नैतिकता और भारतीय इतिहास पर विचार-विमर्श होता था।

देरीजियो के छात्रों ने बंगाल में एक नया जागरूक वर्ग तैयार किया जिसे युवा बंगाल कहा जाता था। युवा बंगाल के सदस्य अन्धविश्वासों तथा भारतीय सामाजिक कुरीतियों के कटु आलोचक थे और सुधारों के प्रबल पक्षपाती थे। उन्होंने बंगाल में एक आन्दोलन आरम्भ किया जिसे युवा बंगाल आन्दोलन कहा जाता है।

देरीजियो के विचारों से प्रभावित होकर युवा बंगाल के सदस्यों ने ई.1828 में देरीजियो की अध्यक्षता में एकेडेमिक एसोसिएशन की स्थापना की। इस एसोसियेशन के तत्त्वावधान में आयोजित होने वाली सभाओं में विभिन्न विषयों पर चर्चा होती थी और विचारों का आदान-प्रदान होता था। इस प्रकार की विचार-गोष्ठियों में हिन्दू कॉलेज के छात्रों के साथ-साथ कलकत्ता के शिक्षित और जागरूक लोग भी भाग लेते थे।

देरीजियो और उसके ऐसासिएशन ने सुप्त भारतीयों को झकझोर दिया। छात्रों में आत्म-विश्वास की भावना उत्पन्न हुई और वे प्राचीन रूढ़ियों की आलोचना करने लगे। पुरातनपंथी भारतीयों ने इस एसोसिएशन के विरुद्ध आवाज उठाई। अनेक अभिभावकों ने अपने लड़कों को हिन्दू कॉलेज से निकाल लिया। इस पर कॉलेज की मैनेजिंग कमेटी ने इस एसोसिएशन पर प्रतिबंध लगा दिया।

मैनेजिंग कमेटी ने देरीजियो को कॉलेज से निकालने का निर्णय किया। मार्च 1831 में देरीजियो ने स्वयं त्याग पत्र दे दिया। इसके कुछ ही दिनों बाद उसकी मृत्यु हो गयी। देरीजियो की मृत्यु के बाद भी उसके शिष्य उसके बताए हुए मार्ग पर चलते रहे और बंगाल में जनजागरण का कार्य करते रहे।

बंगाल में सार्वजनिक संगठनों की स्थापना का प्रारम्भ देरीजियो के युवा बंगाल तथा एकेडेमिक एसोसिएशन से होता है। उसने बंगाल में और अन्ततः सम्पूर्ण भारत में जनजागरण की नींव रखी। उसने वस्तुओं को तर्क के आधार पर परखने एवं अन्धविश्वासों तथा पुरानी मान्यताओं पर प्रहार करने की परम्परा आरम्भ की।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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केशवचन्द्र सेन का भारतीय ब्रह्मसमाज

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केशवचन्द्र सेन
केशवचन्द्र सेन का भारतीय ब्रह्मसमाज

केशवचन्द्र सेन ने ई.1866 में भारतीय ब्रह्मसमाज की स्थापना की। ईसाई धर्म से प्रभावित होने के कारण भारतीय ब्रह्मसमाज ईसा मसीह को पूज्य मानने लगा।

केशवचन्द्र सेन द्वारा संत सभा की स्थापना

केशवचन्द्र सेन ई.1856 में ब्रह्मसमाज के सदस्य बने। उन्होंने अपने भाषणों तथा लेखों के माध्यम से नवयुवकों को ब्रह्मसमाज की ओर आकर्षित किया। उन्होंने संत सभा की स्थापना की। केशवचन्द्र सेन पाश्चात्य विचारों तथा ईसाई धर्म से अधिक प्रभावित थे और ब्रह्मसमाज को ईसाई धर्म के सिद्धान्तों के अनुसार चलाना चाहते थे।

केशवचन्द्र सेन का भारतीय ब्रह्मसमाज

चूंकि केशवचंद्र सेन ब्रह्मसमाज को ईसाई धर्म के सिद्धांतों पर चलाना चाहते थे और देवेन्द्रनाथ टैगोर ब्रह्मसमाज को हिन्दू धर्म की मान्यताओं के अनुसार चलाना चाहते थे, इस कारण केशवचंद्र सेन और देवेन्द्रनाथ टैगोर में मतभेद हो गया।

ई.1866 में केशवचंद्र सेन ने भारतीय ब्रह्मसमाज की स्थापना की। ईसाई धर्म से प्रभावित होने के कारण भारतीय ब्रह्मसमाज, ईसा मसीह को पूज्य मानने लगा। इस संस्था के अनुयाइयों में बाइबिल तथा ईसाई पुराणों का अध्ययन होता था। केशवचन्द्र सेन ने भारतीय ब्रह्मसमाज के प्रार्थना संग्रह में हिन्दू, बौद्ध, यहूदी, ईसाई, मुस्लिम और चीनी आदि विविध धर्मों की प्रार्थनाएं तथा वैष्णव कीर्तन सम्मिलित किये।

केशवचंद्र सेन ने नवयुवकों में सामाजिक सुधार की उग्र भावना जागृत की। उन्होंने स्त्री-शिक्षा और विधवा-विवाह का प्रबल समर्थन किया तथा बाल-विवाह, बहु-विवाह और पर्दा-प्रथा का विरोध किया। उन्होंने अन्तर्जातीय-विवाह का भी समर्थन किया। इसके परिणामस्वरूप ई.1872 में ब्रह्म मेरिजेज एक्ट पारित हुआ जिसके अनुसार अन्तर्जातीय-विवाह एवं विधवा-विवाह हो सकते थे तथा बाल-विवाह एवं बहु-विवाह का निषेध कर दिया गया।

ई.1870 में केशवचन्द्र सेन ने इण्डियन रिफार्म एसोसिएशन की स्थापना की जिसमें स्त्रियों की स्थिति में सुधार, मजदूर वर्ग की शिक्षा, सस्ते साहित्य का निर्माण, नशाबन्दी आदि उद्देश्य रखे गये। इन उद्देश्यों की पूर्ति के लिए उन्होंने साप्ताहिक समाचार पत्र सुलभ समाचार आरम्भ किया। स्त्रियों को उनके घर पर शिक्षा देने के लिए एक समुदाय बनाया और एक समुदाय सस्ती एवं उपयोगी पुस्तकों के प्रकाशन के लिए स्थापित किया।

केशवचंद्र सेन के नेतृत्व में भारतीय ब्रह्मसमाज का तीव्र गति से उत्कर्ष हुआ। नवयुवकों ने बंगाल के गांव-गांव में जाकर भारतीय ब्रह्मसमाज के सिद्धांतों का प्रचार किया तथा अनेक नवयुवक बंगाल से बाहर भी गये। ई.1866 में छपे एक लेख से ज्ञात होता है कि भारतीय ब्रह्मसमाज की बंगाल में 50, उत्तर प्रदेश में 2, पंजाब तथा मद्रास में 1-1 शाखा स्थापित हुई। भारतीय ब्रह्मसमाज के सिद्धांतों के प्रचार के लिए विभिन्न भाषाओं में 37 पत्रिकाएं प्रकाशित की जाती थीं।

ई.1878 में कूचबिहार के अवयस्क राजकुमार और केशवचन्द्र सेन की अवयस्क पुत्री का विवाह हुआ। इससे केशवचन्द्र सेन की प्रतिष्ठा को गहरा आघात लगा। ब्रह्म मेरिजेज एक्ट पारित करवाने में केशवचन्द्र सेन सबसे अधिक सक्रिय थे और अब उन्होंने स्वयं उस कानून का उल्लंघन किया। इसलिये केशवचन्द्र सेन के विरुद्ध आवाज उठी और भारतीय ब्रह्मसमाज के दो टुकड़े हो गये। केशवचन्द्र सेन के विरोधियों ने साधारण ब्रह्मसमाज स्थापित किया। केशवचन्द्र सेन के नेतृत्व में नव विधान सभा गठित की गई।

सुरेन्द्रनाथ बनर्जी का साधारण ब्रह्मसमाज

सुरेन्द्रनाथ बनर्जी तथा शिवनाथ शास्त्री जैसे महान् समाज सुधारकों ने केशवचंद्र सेन से नाराज होकर साधारण ब्रह्मसमाज की स्थापना की। इसने कलकत्ता में एक स्कूल स्थापित किया, जो बाद में सिटी कॉलेज ऑफ कलकत्ता कहलाया। इस संस्था ने पुस्तकालय तथा छापाखाने की स्थापना की तथा समाचार पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन किया। बंगला में ‘तत्व कौमुदी’ और अँग्रेजी में ‘ब्रह्म पब्लिक ओपिनियन’ नामक दो समाचार पत्र चलाये।

ई.1884 में साप्ताहिक पत्रिका संजीवनी आरम्भ की गई। ई.1888 में ब्रह्म बालिका स्कूल खोला गया। इस प्रकार साधारण ब्रह्मसमाज ने भी धर्म और समाज सुधार आन्दोलन में महत्त्वपूर्ण कार्य किया। बाद के समय में ब्रह्मसमाज की सबसे अधिक लोकप्रिय शाखा यही थी।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य अध्याय : उन्नीसवीं एवं बीसवीं सदी के समाज-सुधार आंदोलन

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राजा राममोहन राय और उनका ब्रह्मसमाज

युवा बंगाल आन्दोलन

केशवचन्द्र सेन का भारतीय ब्रह्म समाज

आत्माराम पाण्डुरंग और प्रार्थना समाज

स्वामी श्रद्धानंद का शुद्धि आंदोलन

रामकृष्ण परमहंस

स्वामी विवेकानन्द

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मुस्लिम सुधार आन्दोलन

विभिन्न सम्प्रदायों में सुधार आंदोलन

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आत्माराम पाण्डुरंग और प्रार्थना समाज

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आत्माराम पाण्डुरंग

डॉ. आत्माराम पाण्डुरंग ने 31 मार्च 1867 को जस्टिस महादेव गोविन्द रानडे तथा इतिहासकार आर. जी. भंडारकर के साथ मिलकर बम्बई में प्रार्थना समाज की स्थापना की।

प्रार्थना-समाज ब्रह्म-समाज से प्रेरित हिन्दूवादी आंदोलन था। यह प्राचीन वेदों पर आधारित था एवं पूर्णतः आस्तिक विचारधारा पर खड़ा था। आत्माराम पाण्डुरंग केशवचंद्र सेन से बहुत प्रभावित थे। इस कारण ब्रह्मसमाज तथा प्रार्थना समाज की बहुत सी बातें एक जैसी थीं।

ब्रह्मसमाज की तरह प्रार्थना समाज का उद्देश्य भी समाज सुधार करना था। आत्माराम पाण्डुरंग एकेश्वरवाद तथा ईश्वर के निराकार रूप के सिद्धांत को मानते थे।

प्रार्थना समाज के दार्शनिक सिद्धांत

आत्माराम पाण्डुरंग एवं उनके साथियों का मुख्य उद्देश्य ईश्वर को प्रार्थना एवं सेवा से प्रसन्न करना था, इसलिए प्रार्थना समाज के मुख्य सिद्धांत वैष्णव भक्ति के सिद्धांतों की ही तरह थे। प्रार्थना समाज के मुख्य सिद्धांत इस प्रकार थे-

1. ईश्वर ही ने इस ब्रह्मांड को रचा है।

2. ईश्वर की आराधना से इहलोक एवं परलोक में सुख प्राप्त हो सकता है।

3. ईश्वर के प्रति अनन्य प्रेम और अनन्य आस्था रखकर उसकी प्रार्थना, उपासना और कीर्तन करना चाहिए।

4. ईश्वर को अच्छे लगने वाले कार्य करना ही ईश्वर की सच्ची आराधना है।

5. यद्यपि प्रार्थना समाज में मूर्ति-पूजा के त्याग की शर्त नहीं थी तथापि आत्माराम पाण्डुरंग एवं उनके साथी मानते थे कि ईश्वर की मूर्तियों अथवा अन्य मानव सृजित वस्तुओं की पूजा करनाए ईश्वर की आराधना का सच्चा मार्ग नहीं है।

6. प्रार्थना समाज का मानना था कि ईश्वर अवतार नहीं लेता। कोई भी पुस्तक ऐसी नहीं है जिसे स्वयं ईश्वर ने रचा अथवा प्रकाशित किया हो या पूर्णतः दोष.रहित हो।

प्रार्थना समाज के सामाजिक लक्ष्य

सामाजिक क्षेत्र में इस संस्था के मुख्य उद्देश्य इस प्रकार थे-

(1.) विधवा-विवाह को बढ़ावा देना।

(2.) जाति-प्रथा को अस्वीकार करना।

(3.) स्त्री-शिक्षा को प्रोत्साहन देना।

(4.) बाल-विवाह का बहिष्कार करना।

(5.) विवेकपूर्ण उपासना करना।

(6.) अन्य सामाजिक सुधार करना।

केशवचन्द्र सेन, नवीनचन्द्र राय, पी. सी. मजूमदार और बाबू महेन्द्रनाथ बोस जैसे प्रसिद्ध ब्रह्म समाजियों के बम्बई आगमन से प्रार्थना समाज को प्रोत्साहन मिला। प्रार्थना समाज के अनुयायियों ने अपना ध्यान अन्तर्जातीय विवाह, विधवा-विवाह और महिलाओं एवं हरिजनों की दशा सुधारने पर केन्द्रित किया।

उन्होंने अनाथाश्रम, रात्रि पाठशालाएं, विधवाश्रम, अछूतोद्धार जैसी अनेक उपयोगी संस्थाएं स्थापित कीं। प्रार्थना समाज ने हिन्दू-धर्म से अलग होकर कोई नवीन सम्प्रदाय स्थापित करने का प्रयास नहीं किया और न इसने ईसाई धर्म का समर्थन किया। इसने अपने सिद्धान्त भागवत् सम्प्रदाय से सम्बन्धित रखे।

हिन्दू कट्टरता पर करारी चोट

आत्माराम पाण्डुरंग तथा प्रार्थना समाज के कुछ सदस्यों ने हिन्दू-कट्टरता पर करारी चोट की। महाराष्ट्र के समाज सुधारक गोपाल हरिदेशमुख (लोकहितवादी) ने लिखा है- ‘धर्म यदि सुधार की अनुमति नहीं देता तो उसे बदल देना चाहिये। क्योंकि धर्म को मनुष्य ने बनाया है और यह आवश्यक नहीं है कि बहुत पहले लिखे गये धर्म ग्रंथ आज भी प्रासंगिक हों।’

गोपाल हरिदेशमुख ने पुरोहितों तथा ब्राह्मणों पर प्रहार करते हुए उन्होंने लिखा- ‘पुरोहित बहुत ही अपवित्र हैं क्योंकि कुछ बातों को बिना उनका अर्थ समझे दुहराते रहते हैं……. पण्डित तो पुरोहितों से भी बुरे हैं क्योंकि वे और भी अज्ञानी हैं तथा अहंकारी भी हैं

…….. ब्राह्मण कौन हैं और किन अर्थों में वे हमसे भिन्न हैं ? क्या उनके बीस हाथ हैं और क्या हममें कोई कमी है ? अब जब ऐसे सवाल पूछे जायें तो ब्राह्मणों को अपनी मूर्खतापूर्ण धारणाएं त्याग देनी चाहिये, उन्हें यह मान लेना चाहिये कि समस्त मनुष्य बराबर हैं तथा हर व्यक्ति को ज्ञान प्राप्त करने का अधिकार है।’

जस्टिस महादेव गोविन्द रानाडे का योगदान

जस्टिस महादेव गोविन्द रानाडे ने प्रार्थना-समाज के माध्यम से बहुत कार्य किया। जस्टिस महादेव गोविन्द रानाडे (ई.1842-1901) ने इस संस्था के माध्यम से बहुत काम किया। उन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन प्रार्थना समाज के उद्देश्यों को आगे बढ़ाने में लगाया। वे समाज सुधार के साथ राष्ट्रीय प्रगति के प्रबल पक्षधर थे। उन्होंने ई.1884 में दकन एजूकेशन सोसायटी तथा विधवा-विवाह संघ की स्थापना की।

उन्होंने भारतीय सुधारों को नवीन दिशा दी। प्रार्थना समाज धार्मिक गतिविधियों की अपेक्षा सामाजिक क्षेत्र में अधिक कार्यशील रहा और पश्चिमी भारत में समाज सुधार सम्बन्धी विभिन्न कार्यकलापों का केन्द्र रहा। प्रार्थना समाज ने महाराष्ट्र में समाज सुधार के लिए वही कार्य किया, जो ब्रह्मसमाज ने बंगाल में किया था।

प्रार्थना समाज का प्रभाव सीमित था और यह संस्था शीघ्र ही छिन्न-भिन्न हो गई।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य अध्याय : उन्नीसवीं एवं बीसवीं सदी के समाज-सुधार आंदोलन

भारतीय पुनर्जागरण

राजा राममोहन राय और उनका ब्रह्मसमाज

युवा बंगाल आन्दोलन

केशवचन्द्र सेन का भारतीय ब्रह्मसमाज

आत्माराम पाण्डुरंग और प्रार्थना समाज

स्वामी श्रद्धानंद का शुद्धि आंदोलन

रामकृष्ण परमहंस

स्वामी विवेकानन्द

थियोसॉफिकल सोसायटी

मुस्लिम सुधार आन्दोलन

विभिन्न सम्प्रदायों में सुधार आंदोलन

समाजसुधार आंदोलनों का मूल्यांकन

स्वामी दयानन्द सरस्वती और आर्य समाज

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स्वामी दयानन्द सरस्वती और आर्य समाज

स्वामी दयानन्द सरस्वती

स्वामी दयानन्द सरस्वती का जन्म ई.1824 में गुजरात के टंकारा परगने के शिवपुर ग्राम में सम्पन्न एवं रूढ़िवादी ब्राह्मण परिवार में हुआ। उनके बचपन का नाम मूलशंकर था। 14 वर्ष की आयु में उन्होंने एक चूहे को शिवलिंग पर चढ़कर प्रसाद खाते देखा तो उनका मूर्ति-पूजा से विश्वास उठ गया। जब वे 21 वर्ष के हुए तो उनके पिता ने उनके विवाह का प्रबन्ध किया किंतु वे ई.1845 में आध्यात्मिक ज्ञान की खोज में, घर छोड़कर चल दिये।

15 वर्षों तक वे विभिन्न स्थानों पर भ्रमण तथा अध्ययन करते रहे। ई.1860 में वे मथुरा पहुँचे जहाँ उन्होंने दण्डी स्वामी विरजानन्द के चरणों में बैठकर ज्ञान प्राप्त किया। स्वामी विरजानन्द वैदिक ज्ञान, भाषा एवं दर्शन के प्रकाण्ड पण्डित थे। उन्होंने दयानन्द को वेदों में निहित ज्ञान की व्याख्या समझाई। इस अध्ययन से दयानन्द को विश्वास हो गया कि वेद ही समस्त ज्ञान के स्रोत हैं।

स्वामी विरजानन्द ने उन्हें पौराणिक हिन्दू-धर्म की कुरीतियों तथा अन्धविश्वासों का खण्डन कर देश में वैदिक धर्म व संस्कृति की पुनः स्थापना करने का आदेश दिया। स्वामी दयानन्द सरस्वती जीवन भर यह कार्य करते रहे। वे पाश्चात्य सभ्यता व ईसाई धर्म से अप्रभावित थे। उनका उद्देश्य हिन्दू-धर्म की बुराइयों को दूर करके हिन्दू-धर्म की श्रेष्ठता को स्थापित करना था।

स्वामी दयानन्द सरस्वती अपने उपदेशों में संस्कृत भाषा का प्रयोग करते थे। केशवचन्द्र सेन के परामर्श से उन्होंने हिन्दी भाषा के माध्यम से जन-साधारण को उपदेश देना प्रारम्भ किया। ई.1863 में उन्होंने आगरा से धर्म-प्रचार का कार्य आरम्भ किया। ई.1874 में उन्होंने सत्यार्थ प्रकाश की रचना की। वाराणसी में कर्मकाण्डी पण्डितों से हुए शास्त्रार्थ में उन्होंने प्रमाणित किया कि वेद ही समस्त ज्ञान के आधार हैं तथा मूर्ति-पूजा वेदों की शिक्षा के प्रतिकूल है।

स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा आर्य समाज की स्थापना

महर्षि दयानंद ने हिन्दू-धर्म, सभ्यता और भाषा के प्रचार के लिए 10 अप्रेल 1875 को बम्बई में आर्य समाज की स्थापना की। उसके बाद स्वामीजी दिल्ली गये जहाँ उन्होंने ईसाई, मुसलमान और हिन्दू पण्डितों की एक सभा बुलाई। दो दिन के विचार-विमर्श के बाद भी कोई निष्कर्ष नहीं निकला। दिल्ली से वे पंजाब गये।

यहाँ जन-साधारण में उनके प्रति बड़ा उत्साह जागृत हुआ। जून 1877 में लाहौर में आर्य समाज की एक शाखा खोली गई तथा इस आन्दोलन का प्रमुख कार्यालय लाहौर ही बन गया। इसके पश्चात् स्वामी दयानन्द सरस्वती भारत के विभिन्न प्रान्तों में अपने विचारों का प्रचार करते रहे तथा आर्य समाज की शाखाएँ स्थापित करते रहे।

स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा लिखित ग्रंथ

अपने विचारों का प्रचार करने के लिए स्वामी दयानन्द सरस्वती ने तीन ग्रन्थ लिखे-

(1.) ऋग्वेदादि भाष्य-भूमिका: इस ग्रन्थ में स्वामीजी ने वेदों के सम्बन्ध में अपने दृष्टिकोण को स्पष्ट किया।

(2.) वेदभाष्य: इस ग्रन्थ में उन्होंने यजुर्वेद और ऋग्वेद की टीकाएं लिखीं।

(3.) सत्यार्थ प्रकाश: स्वामीजी का सर्वाधिक प्रसिद्ध ग्रन्थ सत्यार्थ प्रकाश है जिसमें उन्होंने समस्त धर्मों का आलोचनात्मक विश्लेषण करते हुए यह प्रमाणित किया कि वैदिक धर्म ही सर्वश्रेष्ठ है। उन्होंने इस ग्रन्थ में पौराणिक हिन्दू-धर्म की कुरीतियों का खण्डन जिस निर्भयता से किया, उसी ढंग से इस्लाम तथा ईसाइयत के ढोंग, आडम्बर तथा अन्धविश्वासों की तीव्र आलोचना की।

इससे हिन्दुओं का ध्यान अपने धर्म के मूल स्वरूप की ओर आकृष्ट हुआ और ईसाईयत की श्रेष्ठता की जो भावना बल पकड़ रही थी, उस पर रोक लग गई। स्वामीजी ने सत्यार्थ प्रकाश में अवतारवाद, तीर्थ-यात्रा, श्राद्ध, व्रत, अनुष्ठान आदि बातों का युक्ति-पूर्वक खण्डन किया।

उन्होंने प्रत्येक आर्य के लिए, वेदों में निर्दिष्ट यज्ञ तथा संध्या करना आवश्यक बताया तथा छुआछूत को अवैदिक बताया। स्वामीजी ने सहस्रों अन्त्यजों को यज्ञोपवीत देकर उन्हें आर्य समाज में आदर दिलवाया। स्वामीजी ने बाल-विवाह, बहु-विवाह तथा पर्दा-प्रथा का खण्डन किया, स्त्री-शिक्षा पर जोर दिया तथा अन्तर्जातीय-विवाह का समर्थन किया।

दयानन्द सरस्वती के अन्तिम वर्ष

स्वामी दयानन्द सरस्वती के अन्तिम वर्ष राजपूताने में व्यतीत हुए। अनेक राजाओं तथा जागीदारों ने उनकी शिक्षा से प्रभावित होकर अपने राज्यों एवं जागीरों में उनके उपदेश करवाये। उदयपुर के महाराणा सज्जनसिंह ने उनसे मनुस्मृति, राजनीति तथा राजधर्म की शिक्षा ग्रहण की। ई.1881 में उदयपुर राज्य की बनेड़ा जागीर के जागीदार राजा गोविन्दसिंह के निमन्त्रण पर स्वामीजी बनेड़ा गये जहाँ वे सोलह दिन रहे।

इस दौरान स्वामीजी ने राजा गोविन्दसिंह के दोनों पुत्रों- अक्षयसिंह और रामसिंह को सस्वर वेद पाठ करना सिखाया। इसके बाद स्वामीजी चितौड़गढ़ चले गये। अक्टूबर 1883 में स्वामीजी जोधपुर राज्य के प्रधानमंत्री सर प्रताप के निमंत्रण पर जोधपुर पहुँचे। जोधपुर नरेश जसवंतसिंह (द्वितीय) ने स्वामीजी का भव्य स्वागत किया।

जोधपुर राज्य में स्वामीजी के भाषणों की धूम मच गई। महाराजा जसवंतसिंह (द्वितीय) ने राईकाबाग महल में बैठकर स्वामीजी के उपदेश सुने। उनके उपदेशों का राजा से लेकर मन्त्रियों, राज्य कर्मचारियों और प्रजा पर गहरा प्रभाव पड़ा। राजा और मन्त्रियों ने राज्य और प्रजा की उन्नति की ओर ध्यान दिया। शिक्षा के लिये विद्यालय स्थापित किये और राज्य के न्यायालयों में उर्दू के स्थान पर हिन्दी में काम होने लगा।

स्वामी दयानन्द सरस्वती का निधन

राजा जसवंतसिंह ने स्वामीजी को दुर्ग में पधारने का निमंत्रण दिया तथा उन्हें अपने महल में लाने के लिये रत्न-जड़ित पालकी भेजी। स्वामीजी ने पालकी लौटा दी और एक दिन बिना कोई सूचना दिये पैदल ही दुर्ग पहुँचे। स्वामीजी ने देखा कि राजा नशे में धुत्त है और राज्य की प्रसिद्ध वेश्या नन्ही बाई की पालकी को कन्धे पर उठाये महल से बाहर आ रहा है। स्वामीजी ने राजा को कड़ी फटकार लगाई और किले से नीचे उतर गये।

स्वामीजी ने राजा को एक पत्र लिखा जिसमें उन्होंने राजा की तुलना नारकीय पशु से की। यह पत्र नन्ही बाई के हाथ लग गया। उसने 29 सितम्बर 1883 को स्वामीजी के दूध में पिसा हुआ काँच एवं विष मिला दिया। स्वामीजी को अजमेर ले जाया गया जहाँ 30 अक्टूबर को दीपावली के दिन उनका निधन हो गया।

स्वामीजी की मृत्यु पर रूस निवासी मैडम ब्लेवटास्की ने लिखा- ‘यह बिल्कुल सही बात है कि शंकराचार्य के बाद भारत में कोई भी व्यक्ति ऐसा नहीं हुआ जो स्वामीजी से बड़ा संस्कृतज्ञ, उनसे बड़ा दार्शनिक, उनसे अधिक तेजस्वी व्यक्ति तथा कुरीतियों पर टूट पड़ने में उनसे अधिक निर्भीक रहा हो।’

स्वामीजी की मृत्यु के बाद थियोसोफिस्ट अखबार ने उनकी सेवाओं की प्रशंसा करते हुए लिखा- ‘उन्होंने जर्जर हिन्दुत्व के गतिहीन जनसमूह पर भारी प्रहार किया और अपने भाषणों से लोगों के हृदय में ऋषियों और वेदों के लिए अपरिमित उत्साह की आग जला दी। सारे भारतवर्ष में उनके समान हिन्दी और संस्कृत का वक्ता दूसरा कोई और नहीं था।’

आर्य समाज के नियम

स्वामी दयानन्द सरस्वती तथा उनके द्वारा स्थापित आर्य समाज के सिद्धान्तों का परिचय सत्यार्थ प्रकाश में मिलता है। आर्य समाज के दस नियम इस प्रकार हैं-

(1.) ईश्वर एक है तथा निराकार है। वह सर्वशक्तिमान, न्यायकारी, दयालु, निर्विकार, सर्वव्यापक, अजर, अमर, पवित्र और सृष्टिकर्ता है। अतः उसकी उपासना करने योग्य है।

(2.) वेद ही सच्चे ज्ञान के स्रोत हैं। अतः वेदों का पढ़ना-पढ़ाना और सुनना-सुनाना समस्त आर्यों का परम धर्म है।

(3.) प्रत्येक व्यक्ति को सदा सत्य ग्रहण करने और असत्य को छोड़ने के लिए तैयार रहना चाहिये।

(4.) समस्त कार्य धर्मानुसार अर्थात् सत्य और असत्य को विचार करके करने चाहिये।

(5.) संसार का उपकार करना, अर्थात् सबकी शारीरिक, आत्मिक और सामाजिक उन्नति करना मानव समाज का मुख्य कत्र्तव्य है।

(6.) प्रत्येक व्यक्ति को अपनी ही उन्नति में सन्तुष्ट नहीं रहना चाहिये। अपितु सब लोगों की उन्नति में अपनी उन्नति समझनी चाहिये।

(7.) समस्त ज्ञान का निमित्त कारण और उसके माध्यम से समस्त बोध ईश्वर है।

(8.) प्रत्येक व्यक्ति को अविद्या का नाश और विद्या की वृद्धि करनी चाहिये।

(9.) समस्त लोगों से धर्मानुसार, प्रीतिपूर्वक एवं यथायोग्य व्यवहार करना चाहिए।

(10.) व्यक्तिगत हितकारी विषयों में प्रत्येक व्यक्ति को आचरण की स्वतन्त्रता है परन्तु सामाजिक भलाई से सम्बन्धित विषयों में सब मतभेदों को भुला देना चाहिए।

आर्य समाज के सामाजिक सुधार

(1.) जाति प्रथा का विरोध: भारतीय समाज में वर्ण व्यवस्था से प्रसूत जाति प्रथा, शताब्दियों से प्रचलित थी। इस प्रथा ने सदियों तक हिन्दू-धर्म की रक्षा की किंतु मुसलमानों के आने के बाद इसने जो संकुचित स्वरूप ग्रहण किया उससे हिन्दू समाज संकीर्ण होता चला गया।

इस कारण हिन्दुओं की सामाजिक एकता भंग हो गई। स्वामी दयानन्द ने जाति प्रथा की कटु आलोचना की। उनके अनुसार समाज में किसी व्यक्ति को जन्म के आधार पर उच्च स्थान पर पहुँचने से वंचित नहीं किया जाना चाहिये। उन्होंने छुआछूत तथा समुद्र-यात्रा-निषेध के विरुद्ध आवाज उठाई तथा प्राचीन वर्ण-व्यवस्था को उचित ठहराते हुए जाति-प्रथा का विरोध किया।

(2.) स्त्रियों की दशा में सुधार: बहु-विवाह, बाल-विवाह, पर्दा प्रथा, अशिक्षा, सती-प्रथा तथा कन्या-वध जैसी कुरीतियों के कारण हिन्दू समाज में स्त्रियों की दशा अत्यन्त ही शोचनीय थी। आर्य समाज ने स्त्रियों को समाज में उच्च स्थान दिलाने तथा स्त्री-शिक्षा पर विशेष ध्यान दिया। आर्य समाज ने बाल-विवाह, बहु-विवाह तथा पर्दा-प्रथा का घोर विरोध किया तथा विधवा-विवाह एवं स्त्री-शिक्षा का समर्थन किया।

ऋषि दयानंद ने 16 वर्ष से कम आयु की लड़कियों का विवाह बन्द करने का आह्वान किया, सती-प्रथा को पाप बताया और स्त्री-पुरुष की समानता पर बल दिया। स्वामी दयानन्द ने कहा कि स्त्रियों को वेदों का अध्ययन करने तथा यज्ञोपवीत धारण का उतना ही अधिकार है जितना पुरुषों को।

(3.) शुद्धि आंदोलन: आर्य समाज ने शुद्धि आन्दोलन को जन्म दिया। हिन्दू-धर्म छोड़कर ईसाई एवं मुसलमान हो चुके लोगों को शुद्धि संस्कार के द्वारा पुनः हिन्दू-धर्म में स्वीकार किया जाने लगा। आर्य समाज के प्रयत्नों से लाखों हिन्दुओं को जो मुसलमान और ईसाई बन गये थे, शुद्ध करके पुनः हिन्दू-धर्म में बुला लिया गया। वे आज भी हिन्दू समाज में सम्मान पूर्वक जीवन-यापन कर रहे हैं। आर्य समाज ने हिन्दू समाज के सुप्त आत्म गौरव, संगठन की भावना एवं शुद्ध धार्मिक संस्कारों को फिर से जगाया।

आर्य समाज द्वारा धार्मिक सुधार के कार्य

(1.) अंधविश्वासों का विरोध: स्वामी दयानन्द ने पौराणिक रूढ़ियों एवं मान्यताओं की निन्दा की। उन्होंने मूर्ति-पूजा, कर्मकाण्ड, अनेकेश्वरवाद, अवतारवाद, बलि-प्रथा, स्वर्ग और नरक तथा भाग्य के सर्वोपरि होने में विश्वास रखने का विरोध किया।

(2.) श्राद्ध एवं पाखण्ड का विरोध: आर्य समाज ने मृतकों के श्राद्ध का विरोध किया। उसका कहना था कि ब्राह्मणों अथवा अन्य लोगों को भोजन खिलाकर अथवा दान देकर मृतक व्यक्तियों को परलोक में सब कुछ पहुँचाने की कल्पना मूर्खतापूर्ण है।

(3.) वेदों के महत्त्व की पुनस्र्थापना: दयानंद ने वेदों की व्याख्या इस प्रकार की जिससे वेद वैज्ञानिक, सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक सिद्धान्तों के स्रोत माने जा सकें। आर्य समाज का दृढ़ विश्वास था कि कोई भी ऐसा ज्ञान नहीं है, जो वेदों से नहीं लिया जा सकता। वेदोें की श्रेष्ठता के आधार पर आर्य समाज ने हिन्दू-धर्म को इस्लाम और ईसाई धर्म के आक्रमणों से बचाने में सफलता प्राप्त की।

(4.) वैदिक कर्मों का प्रचार: आर्य समाज ने वेदों के आधार पर यज्ञ-हवन, मन्त्रोच्चारण, कर्म आदि पर बल दिया। उनका मानना था कि ईश्वर निराकार है, अतः मूर्ति-पूजा निरर्थक है। उन्होंने हिन्दुओं की मोक्ष सम्बन्धी अवधारणा का समर्थन करते हुए कहा कि ईश्वर की उपासना, अच्छे कर्म और ब्रह्मचर्य व्रत के पालन से मोक्ष प्राप्त किया जा सकता है।

आर्य समाज द्वारा साहित्यिक एवं शैक्षणिक सुधार के कार्य

स्वामी दयानन्द तथा उनके द्वारा स्थापित आर्य समाज ने साहित्यिक एवं शैक्षणिक क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण कार्य किये। स्वामी दयानन्द ने अपने ग्रन्थ हिन्दी में लिखकर राष्ट्र-भाषा के विकास में योगदान दिया। उन्होंने संस्कृत के महत्त्व को प्रतिपादित करते हुए उसके अध्ययन और अध्यापन पर बल दिया। आर्य समाज का मुख्य उद्देश्य अज्ञानता को दूर करके ज्ञान का प्रसार करना था।

अतः उसने प्राचीन आश्रम व्यवस्था को पुनः स्थापित करने की आवश्यकता पर बल दिया। उसने शिक्षा की प्राचीन गुरुकुल प्रणाली को प्रचलित किया, जहाँ विद्यार्थी ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करते हुए विद्या-अध्ययन कर सकें। सर्वप्रथम आर्य समाज ने ही भारतीयों को मैकाले की शिक्षा पद्धति के दोषों से अवगत कराया। स्त्री-शिक्षा को बढ़ावा देकर उन्होंने सही अर्थों में देश के शैक्षिक विकास की नींव रखी।

स्वामी दयानन्द की मृत्यु के बाद आर्य समाजियों में कुछ विषयों पर मतभेद हो जाने के कारण ई.1892 में इसमें दो दल बन गये। यह मतभेद इस मौलिक सिद्धान्त को लेकर आरम्भ हुआ कि क्या एक आर्य-समाजी के लिए केवल दस नियमों का पालन करना ही आवश्यक है। आर्य समाज के इन दो दलों में एक दल के नेता लाला हंसराज थे जो पाश्चात्य शिक्षा के समर्थक थे।

उनके प्रयत्नों से स्थान-स्थान पर डी.ए.वी. स्कूल एवं कॉलेज स्थापित किये गए। ये शिक्षण-संस्थाएँ सरकारी पद्धति से सम्बद्ध थीं। दूसरे दल के नेता महात्मा मुन्शीराम थे जो भारत की प्राचीन शिक्षा पद्धति को पुनः प्रचलित करना चाहते थे। महात्मा मुन्शीराम ने हरिद्वार के पास गुरुकुल कांगड़ी की तथा देश के अन्य स्थानों पर गुरुकुलों की स्थापना की।

यह देश का पहला विश्वविद्यालय था जहाँ राष्ट्र भाषा हिन्दी के माध्यम से उच्च शिक्षा दी गई। आर्यसमाज द्वारा स्थापित शिक्षण संस्थाएँ हिन्दू-धर्म और संस्कृति तथा आर्य समाज के सिद्धान्तों के प्रचार में सहायक सिद्ध हुईं। इन संस्थाओं के प्रभाव से पंजाब एवं संयुक्त प्रदेश (अब उत्तर प्रदेश) की सरकारों ने शिक्षा के क्षेत्र में बड़े सुधार किए।

आर्य समाज द्वारा राष्ट्रीय सुधार के कार्य

भारत में राजनीतिक जागृति उत्पन्न करने में आर्य समाज का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा। आर्य समाज द्वारा किये गये सामाजिक और धार्मिक सुधारों से भारतीयों में आत्मविश्वास और स्वाभिमान का विकास हुआ। आर्य समाज ने भारत के प्राचीन गौरव की चर्चा करते हुए स्वावलम्बन के विकास को प्रोत्साहन दिया। इससे स्वराष्ट्र प्रेम की भावना को बल मिला।

स्वामी दयानन्द के जीवनी लेखक ने लिखा है- ‘दयानन्द का एक मुख्य लक्ष्य राजनीतिक स्वतन्त्रता था। वास्तव में वह प्रथम व्यक्ति थे जिन्होंने स्वराज्य शब्द का प्रयोग किया। वह प्रथम व्यक्ति थे जिन्होंने विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार करना तथा स्वदेशी वस्तुओं का उपयोग करना सिखाया। वह प्रथम व्यक्ति थे जिन्होंने हिन्दी को राष्ट्रभाषा स्वीकार किया।’

स्वामीजी ने सत्यार्थ प्रकाश में लिखा है कि अच्छे-से-अच्छा विदेशी राज्य, स्वदेश की तुलना नहीं कर सकता। दयानन्द ने वेद कालीन भारत को इसलिए गौरवमय बताया क्योंकि उस समय भारत में स्वराज्य था। बालगंगाधर तिलक, लाला लाजपतराय, गोपालकृष्ण गोखले आदि जिन नेताओं ने भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन का नेतृत्व किया, वे आर्य समाज से प्रभावित थे।

काँग्रेस में उग्रवाद की भावना का विकास होने का कारण हिन्दू-धर्म की भावना थी। आर्य समाज ने इस भावना के निर्माण में योगदान दिया। डॉ. आर. सी. मजूमदार ने लिखा है- ‘आर्य समाज प्रारम्भ से ही उग्रवादी सम्प्रदाय था।’

आर्य समाज ने भारतीयों के समक्ष प्राचीन भारत के बारे में एक निश्चित विचारधारा प्रस्तुत की। आर्य समाज ने ही परस्पर अभिवादन करने हेतु विख्यात नमस्ते शब्द का प्रचलन किया, जो आज न केवल भारत में अपितु विदेशों में भी लोकप्रिय है। आर्य समाज ने हिन्दी भाषा और साहित्य को प्रोत्साहित करके अँग्रेजी भाषा पर निर्भरता कम करने का प्रयास किया। 

कुछ आधुनिक विद्वानों की धारणा है कि आर्य समाज का कार्य हिन्दू-धर्म की पुनस्र्थापना तक सीमित था। इसलिये इसने राष्ट्रीयता का विकास नहीं किया। इन विद्वानों का आरोप है कि आर्य समाज ने हिन्दू-धर्म का पुनरुत्थान करके साम्प्रदायिक भावना को पुष्ट किया। कुछ अँग्रेज लेखकों, अधिकारियों एवं ईसाई धर्म-प्रचारकों ने आर्य समाज के सम्बन्ध में इसी प्रकार के उल्टे-सीधे प्रचार किये।

वेलेण्टाइन शिरोल ने लिखा है- ‘आर्य समाज का उद्देश्य समाज सुधार की अपेक्षा हिन्दू-धर्म को विदेशी प्रभाव से मुक्त करना था।’ शिरोल के इन आरोपों का प्रत्युत्तर लाला लाजपतराय ने अपनी पुस्तक हिस्ट्री ऑफ द आर्य समाज में बड़े प्रभावशाली ढंग से दिया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि आर्य समाज के चिंतन का आधार हजारों साल पुराने वेद हैं जिनसे प्रेरणा प्राप्त करना भारतीय समाज की मुख्य धारा को फिर से जीवित करना है इसलिये आर्य समाज को साम्प्रदायिक आन्दोलन की संज्ञा किसी भी प्रकार नहीं दी जा सकती।

अपितु जो लोग आर्य समाज पर साम्प्रदायिक होने का आरोप लगाते हैं, वस्तुतः वे स्वयं साम्प्रदायिक सोच रखते हैं तथा भारत की मूल सांस्कृतिक धारा के प्रवाह को निरुद्ध करना चाहते हैं। आर्य समाज वास्तव में एक ऐसा शक्तिशाली आन्दोलन था, जिसके फलस्वरूप हिन्दू समाज में नव-चेतना एवं आत्म-सम्मान के भाव जागृत हुए तथा हिन्दू यह अनुभव करने लगे कि हिन्दू-धर्म और संस्कृति, विश्व के अन्य समस्त धर्मों एवं संस्कृतियों से श्रेष्ठ है। आर्य समाज ने भारतीयों में स्वाभिमान और राष्ट्र प्रेम की एक अद्भुत लहर उत्पन्न की तथा धर्म, समाज और शिक्षा के क्षेत्र में महान् योगदान दिया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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स्वामी श्रद्धानंद का शुद्धि आंदोलन

स्वामी श्रद्धानंद का वास्तविक नाम महात्मा मुन्शीराम था। भारत की स्वतंत्रता प्राप्ति से पहले स्वामी श्रद्धानन्द कांग्रेस के लिए कार्य करते थे तथा देश भर में आर्य समाज के सिद्धांतों का प्रचार करते हुए लोगों को वेदों का ज्ञान प्राप्त करने के लिए प्रेरित करते थे।

ई.1901 में मुंशीराम विज ने वैदिक धर्म तथा भारतीयता की शिक्षा देने के लिए हरिद्वार के कांगड़ी गांव में गुरुकुल विद्यालय की स्थापना की। वर्तमान में इस संस्था का नाम गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय है। महात्मा मुंशीराम विज ने गुरुकुल के छात्रों से 1500 रुपए एकत्रित कर गांधीजी को भिजवाए ताकि वे अंग्रेजों के विरुद्ध आंदोलन चला सकें। कहा जाता है कि स्वामी श्रद्धानन्द ने ही सबसे पहले गांधीजी को महात्मा की उपाधि से विभूषित किया।

जब स्वामी श्रद्धानन्द ने कांग्रेस के कुछ प्रमुख नेताओं को मुस्लिम-तुष्टीकरण करते हुए देखा तो उन्हें लगा कि यह नीति आगे चलकर राष्ट्र के लिए विघटनकारी सिद्ध होगी। इस कारण कांग्रेस से उनका मोहभंग हो गया और उन्होंने कांग्रेस छोड़ दी। उस काल में बहुत से कट्टरपंथी मुस्लिम तथा ईसाई हिन्दुओं का मतान्तरण कराने में लगे हुए थे।

कुछ समय बाद स्वामीजी ने हिन्दू धर्म छोड़कर जा चुके लोगों को पुनः अपने मूल धर्म में लाने के लिये शुद्धि-आन्दोलन चलाया। असंख्य व्यक्तियों को आर्य समाज के माध्यम से पुनः हिन्दू धर्म में लाया गया। किया। स्वामी श्रद्धानन्द ने स्वयं के आर्यसमाजी होने पर भी सनातनी विचारधारा के पंडित मदनमोहन मालवीय तथा पुरी के शंकराचार्य स्वामी भारतीकृष्ण तीर्थ को गुरुकुल में आमंत्रित कर छात्रों के बीच उनका प्रवचन कराया।

23 दिसम्बर 1926 को नया बाजार स्थित उनके निवास स्थान पर अब्दुल रशीद नामक एक युवक ने धर्म-चर्चा के बहाने उनके कक्ष में प्रवेश करके गोली मारकर उनकी हत्या कर दी। उनकी हत्या पर गांधी एवं नेहरू आदि किसी भी कांग्रेसी नेता ने दुःख व्यक्त नहीं किया।

आर्य समाज के अथक प्रयासों से भारत में कई स्थानों पर अनाथालयों, विधवा-आश्रमों तथा गौ-शालाओं आदि की स्थापना हुई। इस प्रकार धार्मिक, सामाजिक, शैक्षणिक और राजनैतिक क्षेत्र में आर्य समाज ने जो अद्भुत सफलता प्राप्त की उसकी तुलना किसी भी अन्य सुधार आन्दोलन से नहीं की जा सकती।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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रामकृष्ण परमहंस

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रामकृष्ण परमहंस

रामकृष्ण परमहंस का जन्म ई.1836 में बंगाल के हुगली जिले में निर्धन ब्राह्मण परिवार में हुआ था। ने भारतीयों के समक्ष धर्म के सच्चे स्वरूप को प्रदर्शित किया। रामकृष्ण के बचपन का नाम गदाधर चट्टोपाध्याय था। उन उन्हें बचपन से ही शिक्षा के प्रति रुचि नहीं थी। वे हर समय धार्मिक चिंतन में मग्न रहते थे। जब वे 17 वर्ष के थे, उनके पिता का देहान्त हो गया।

इस पर गदाधर अपने बड़े भाई के साथ कलकत्ता आ गये। अपने भाई की मृत्यु के बाद 21 वर्ष की आयु में वे कलकत्ता के पास दक्षिणेश्वर में कालीदेवी के मन्दिर में पुजारी बन गये। वे देवी को माँ कहकर पुकारते थे और उसके समक्ष शिशु की तरह व्यवहार करते थे। 24 वर्ष की आयु में उनका विवाह शारदामणि नामक 5 वर्ष की कन्या के साथ कर दिया गया। विवाह के पश्चात् रामकृष्ण पुनः दक्षिणेश्वर मन्दिर आ गये।

दक्षिणेश्वर मंदिर में उन्होंने 12 वर्ष तक विभिन्न प्रकार की साधनाएँ कीं। उन्होंने भैरवी नामक एक ब्राह्मण सन्यासिन से दो वर्ष तक तान्त्रिक साधना सीखी। उसके बाद उन्होंने वैष्णव धर्म की साधना की। वैष्णव धर्म की साधना करते हुए उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण के प्रत्यक्ष दर्शन किये। तोतापुरी नामक एक महान् वेदान्तिक साधु ने उन्हें वेदान्त-साधना सिखाई। उसके पश्चात् रामकृष्ण ने सूफी धर्म तथा ईसाई धर्म का ज्ञान प्राप्त किया।

ई.1876 के बाद रामकृष्ण की आत्मा को सन्तोष प्राप्त हुआ। उन्होंने अपनी साधना द्वारा यह सिद्ध कर दिया कि धर्म तथा ज्ञान, विद्या का विषय नहीं है, अपितु अनुभूति का विषय है। शारदामणि जीवनपर्यन्त दक्षिणेश्वर में अपने पति के साथ रहीं किन्तु रामकृष्ण ने उन्हें कभी पत्नी के रूप में नहीं देखा।

वे शारदामणि को माँ कहते थे। उनकी संवेदना का स्तर इतना गहरा था कि एक बार उन्होंने गाय की पीठ पर लाठी पड़ती हुई देख ली, इस लाठी का चिह्न उनकी पीठ पर भी उभर आया।

रामकृष्ण परमहंस राजा राममोहन राय तथा स्वामी दयानन्द के समान बहुपठित विद्वान नहीं थे, अपितु उच्चकोटि के साधक एवं सन्त थे। दूर-दूर से लोग उनके दर्शनों को आते थे। अनेक शिक्षित नवयुवक भी उनकी तरफ आकर्षित हुए। रामकृष्ण, अपने दर्शनों के लिये आने वाले व्यक्तियों को आध्यात्मिक उपदेश देते रहते थे।

ब्रह्मसमाजी आचार्य पी. सी. मजूमदार ने लिखा है- ‘रामकृष्ण के दर्शन होने से पूर्व यह कोई नहीं जानता था कि धर्म कैसा होता है। सब आडम्बर ही था। धार्मिक जीवन कैसा होता है, यह बात रामकृष्ण की संगति का लाभ होने पर जान पड़ी।’ 16 अगस्त 1886 को क्षय रोग से रामकृष्ण का निधन हुआ। उन्होंने कोई सम्प्रदाय या आश्रम स्थापित नहीं किया।

 वे भारत की परम्परागत संत परम्परा के संत थे तथा धर्म के गहन तत्त्वों को सरल शब्दों में उदाहरण सहित समझाते थे। रामकृष्ण को कुछ विद्वानों ने धर्म का जीता-जागता स्वरूप बताया है। स्वामी दयानन्द ने हिन्दू-धर्म के बौद्धिक अंग की श्रेष्ठता को सिद्ध किया था।

रामकृष्ण हिन्दू-धर्म के वास्तविक प्रतिनिधि थे। वे ईश्वर के निराकार तथा साकार दोनों रूपों को मानते थे। वे मूर्ति-पूजा के विरोधी नहीं थे। वे एकेश्वरवाद और अनेकेश्वरवाद में भेद नहीं मानते थे। वे वेद, उपनिषद्, पुराण, रामायण और महाभारत पवित्र आध्यात्मिक ग्रन्थ मानते थे।

रामकृष्ण परमहंस की शिक्षाएँ

उच्च कोटि के विद्वान् न होते हुए भी रामकृष्ण ने वेदान्त के सत्यों की बड़े ही सुन्दर ढंग से व्याख्या की। उनकी शिक्षाओं का सार इस प्रकार से है-

(1.) मानव जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य ईश्वर से साक्षात्कार करना है। हम अपने उच्च आध्यात्मिक जीवन का विकास करके ईश्वर के दर्शन कर सकते हैं।

(2.) गृहस्थ जीवन ईश्वर की प्राप्ति में बाधक नहीं है। ईश्वर-प्राप्ति के लिए विषय-वासनाओं को त्यागकर तथा मन को कंचन और कामिनी से हटाकर ईश्वर में लगाना होगा। इस प्रकार गृहस्थ भी आध्यात्मिक विकास कर सकते हैं।

(3.) शरीर और आत्मा, दो भिन्न वस्तुएँ हैं। इस सिद्धान्त को समझाते हुए उन्होंने कहा- ‘कामिनी-कंचन की आसक्ति यदि पूर्ण रूप से नष्ट हो जाए तो शरीर अलग है और आत्मा अलग है, यह स्पष्ट दिखाई देने लगता है। नारियल का पानी सूख जाने पर जैसे खोपरा और नरेटी दोनों अलग-अलग दिखाई देने लगते हैं, वैसे ही शरीर और आत्मा के बारे में जानना चाहिए।’

(4.) तर्क व्यर्थ है, ईश्वर शास्त्रार्थ की शक्ति से परे है, जो कुछ है वह ईश्वरमय है, फिर तर्कों से क्या लाभ!

(5.) वे मूर्ति-पूजा के समर्थक थे। उनका मानना था कि जैसे वकील को देखते ही अदालत याद आती है, उसी तरह प्रतिमा पर ध्यान जाते ही ईश्वर की याद आती है।

(6.) रामकृष्ण अनुभूति को तर्क, वाद-विवाद, प्रवचन और भाषण से अधिक महत्त्व देते थे। उनका कहना था कि अनुभूति से ही परमतत्त्व का दर्शन सम्भव है। इस दर्शन के बाद मनुष्य की अभिलाषाएं समाप्त हो जाती हैं।

(7.) रामकृष्ण मनुष्यों में कोई भेद नहीं मानते थे। उनका कहना था कि मनुष्य, तकिये के गिलाफ के समान है। गिलाफ जैसे भिन्न-भिन्न रंग और आकार के होते हैं वैसे ही मनुष्य भी कोई सुन्दर, कोई कुरूप, कोई साधु और कोई दुष्ट होता है, बस इतना ही अंतर है। पर जैसे समस्त गिलाफों में एक ही पदार्थ- कपास भरा रहता है, उसी के अनुसार समस्त मनुष्यों में वही एक सच्चिदानन्द भरा हुआ है।

(8.) रामकृष्ण परमहंस विद्वता और पांडित्य के साथ, मनुष्य में शील और सदाचार चाहते थे। उनका कहना था कि विद्वान् कभी भी अहंकार नहीं दिखाता। जिस प्रकार आलू सिक जाने पर नर्म हो जाता है, उसी प्रकार विद्वता के साथ अंहकार समाप्त हो जाता है।

(9.) रामकृष्ण की मान्यता थी कि समस्त धर्म एक ही ईश्वर तक पहुँचने के विभिन्न मार्ग हैं। एक बार एक व्यक्ति ने पूछा- ‘जब सत्य एक है तो फिर धर्म अनेक क्यों हैं?’

रामकृष्ण ने उत्तर दिया- ‘ईश्वर एक है किन्तु उसके विभिन्न स्वरूप हैं, जैसे-एक घर का मालिक, एक के लिए पिता, दूसरे के लिए भाई और तीसरे के लिए पति है और वह विभिन्न व्यक्तियों के द्वारा विभिन्न नामों से पुकारा जाता है, उसी प्रकार ईश्वर भी विभिन्न कालों व देशों में भिन्न-भिन्न नामों एवं भावों से पूजा जाता है। इसलिए धर्मों की अनेकता देखने को मिलती है।’

रामकृष्ण परमंहस की देन

रामकृष्ण परमहंस की विश्व को तीन देन सबसे बड़ी देन इस प्रकार हैं-

(1.) आध्यात्मिक सरलता

उनकी सबसे बड़ी देन आध्यात्मिक सरलता है। वे सरल उपदेशों और जीवंत उदाहरणों से वेदों और उपनिषदों के जटिल ज्ञान को जन-साधारण के निकट ले आए। रामकृष्ण ने अपनी शिक्षाओं द्वारा हिन्दू-धर्म के ग्रन्थों को सरल बनाया तथा हिन्दुओं में अपने प्राचीन ज्ञान के प्रति श्रद्धा और विश्वास भी उत्पन्न किया। वे हिन्दू-धर्म के अध्यात्मवाद के जीवित स्वरूप थे।

(2.) समस्त धर्मों की एकता में विश्वास

रामकृष्ण की दूसरी महत्त्वपूर्ण देन समस्त धर्मों की एकता में विश्वास उत्पन्न करना है। उन्होंने अपने उपदेशों तथा अपने जीवन में विभिन्न धर्मों की साधना करके स्पष्ट किया कि समस्त धर्म ईश्वर-प्राप्ति के विभिन्न मार्ग हैं।

(3.) मानव मात्र की सेवा

उन्होंने मानव मात्र की सेवा और भलाई को धर्म बताया। उनका कहना था कि प्रत्येक प्राणी भगवान् का रूप है; अतः उसकी सेवा करना भगवान् की सेवा करना है। उनके शिष्य विवेकानन्द ने इसी भाव को ग्रहण कर दरिद्रनारायण की सेवा करने में स्वयं को समर्पित कर दिया।

ई.1886 में रामकृष्ण परमहंस का निधन हुआ।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य लेख : उन्नीसवीं एवं बीसवीं सदी के समाज-सुधार आंदोलन

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स्वामी विवेकानन्द

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स्वामी विवेकानन्द

शिकागो सम्मेलन में स्वामी विवेकानन्द ने कहा- मुझे गर्व है कि मैं उस धर्म से हूँ जिसने दुनिया को सहिष्णुता और सार्वभौमिक स्वीकृति का पाठ पढ़ाया है। हम सिर्फ सार्वभौमिक सहिष्णुता पर ही विश्वास नहीं करते बल्कि, हम सभी धर्मों को सच के रूप में स्वीकार करते हैं।           

स्वामी विवेकानन्द ने हिन्दू-धर्म का प्रतिपादन ब्रह्मसमाज और आर्य समाज की अपेक्षा अधिक मनोबल एवं सम्मान से किया। राजा राममोहन राय हिन्दू-धर्म के लिये क्षमायाचक से अधिक नहीं थे। भारतीय हिन्दू-धर्म को उन्होंने पाश्चात्य सभ्यता और संस्कृति के परिप्रेक्ष्य में देखा।

स्वामी दयानन्द ने वेदों में निहित ज्ञान को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया तथा ईसाई मिशनरियों के आरोपों का प्रत्युत्तर दिया। स्वामी विवेकानन्द ने समस्त वेदान्त की सैद्धान्तिक व्याख्या करके हिन्दू-धर्म को पाश्चात्य धर्म में उपलब्ध ज्ञान से उच्चतर बताया। 

स्वामी विवेकानन्द, रामकृष्ण परमहंस के शिष्य थे। उनका जन्म 12 जनवरी 1863 को कलकत्ता के दत्त परिवार में हुआ। बचपन में उनका नाम नरेन्द्र दत्त था। उन्होंने एक अँग्रेजी कॉलेज से बी. ए. की डिग्री प्राप्त की। उन पर यूरोप के बुद्धिवाद और उदारवाद का भारी प्रभाव था। उन्होंने जॉन स्टुअर्ट मिल, हर्बर्ट, स्पेन्सर, रूसो जैसे पाश्चात्य दार्शनिकों का गहन अध्ययन किया।

उनमें उच्चकोटि की बौद्धिकता के साथ-साथ जिज्ञासा-भाव भी प्रबल था। आरम्भ में वे ब्रह्मसमाज की ओर आकर्षित हुए किन्तु ब्रह्मसमाज के उपदेशक, उनकी आध्यात्मिक जिज्ञासा शान्त नहीं कर सके। किसी सम्बन्धी के कहने पर ई.1881 में उन्होंने दक्षिणेश्वर मंदिर जाकर स्वामी रामकृष्ण परमहंस से भेंट की।

रामकृष्ण परमहंस परम्पारगत हिन्दू-धर्म के प्रतीक थे, जबकि नरेन्द्र दत्त पश्चिमी शिक्षा, तर्क, विचार और बुद्धिवाद में विश्वास करने वाले थे। रामकृष्ण के सम्पर्क से नरेन्द्र के जीवन की दिशा ही बदल गई। स्वामी रामकृष्ण की मृत्यु के बाद उनके बहुत से शिष्य अपने-अपने घरों को चले गये किन्तु नरेन्द्र दत्त ने अपने तीन-चार साथियों के साथ काशीपुर के निकट बारा-नगर में एक टूटे हुए मकान में रहना आरम्भ किया।

ई.1887 में प्रथम बार इस मठ को, धार्मिक रूप में स्थापित किया गया। उस समय मठ के 12 सदस्यों ने वैदिक क्रियाओं के अनुसार सन्यास ग्रहण किया और अपने नाम भी बदल लिये। उसी समय नरेन्द्र दत्त का नाम स्वामी विवेकानन्द रखा गया।

शिकागो सर्व-धर्म-सम्मेलन में स्वामी विवेकाननन्द

संन्यास ग्रहण करने के बाद स्वामी विवेकानन्द ने भारत भ्रमण किया। जब वे कन्याकुमारी पहुँचे तो उन्हें ज्ञात हुआ कि अमेरिका के शिकागो नगर में विश्व के समस्त धर्मों की एक सभा हो रही है। ई.1893 में बड़ी कठिनाई से वे अमेरिका पहुँचे। इस सम्मेलन में स्वामी विवेकानंद ने हिन्दुत्व के उज्वल पक्ष को इतने प्रभावशाली ढंग से विश्व के समक्ष प्रस्तुत किया कि सम्पूर्ण विश्व में हिन्दू-धर्म की धूम मच गई। विश्व स्तर पर इस तरह का कार्य इससे पहले कभी नहीं हुआ था। स्वामी विवेकानंद की इस विदेश यात्रा के तीन मुख्य उद्देश्य थे-

(1.) स्वमी विवेकानंद इस यात्रा के माध्यम से सम्पूर्ण विश्व को यह संदेश देना चाहते थे कि विश्व के समस्त धर्म, एक ही धर्म के विभिन्न अंग हैं। सम्पूर्ण विश्व में एक प्रकार की धार्मिक एकता का भाव जागृत होना चाहिए।

(2.) विवेकानंद अँग्रेजी शिक्षा प्राप्त भारतीयों के समक्ष यह उदाहरण प्रस्तुत करना चाहते थे कि यदि भारतवासी स्वयं को ऊँचा उठायें तो पश्चिम के सुशिक्षित एवं सुसम्पन्न लोग भी भारतीयों का आदर करने के लिये विवश होंगे।

(3.) विवेकानंद भारतीयों के इस भय को दूर करना चाहते थे कि समुद्र-यात्रा करने तथा विदेशियों के हाथ का अन्न-जल ग्रहण करने से धर्म और जाति नष्ट हो जाते हैं।

शिकागो नगर के सर्व-धर्म-सम्मेलन में स्वामीजी ने हिन्दू-धर्म के प्रतिनिधि के रूप में भाग लिया। उन्होंने सम्मेलन में जिस ज्ञान, जिस उदारता, जिस विवेक और जिस वाक्शक्ति का परिचय दिया, उससे विश्व भर से आये लोग विस्मित रह गये। उनके भाषणों ने श्रोताओं को मन्त्र-मुग्ध किया।

जब स्वामी विवेकानन्द ने अपने प्रथम भाषण में अमेरिका वासियों को ‘भाइयो और बहिनो!’ कहकर सम्बोधित किया तो विश्व के आश्चर्य का पार न रहा कि एक मानव संसार के समस्त मनुष्यों का भाई हो सकता है। उनके देश में सार्वजनिक आयोजनों में माई फैलो सिटीजन्स अथवा माई फैलो कन्ट्रीमैन कहने की परम्परा थी। इस सम्बोधन से एक मानव का दूसरे मानव से कोई आत्मिक सम्बन्ध स्थापित नहीं होता था। इसलिये स्वामीजी द्वारा कहे गये- ‘ब्रदर्स एण्ड सिस्टर्स!’ सम्बोधन का बड़ी देर तक भारी करतल-ध्वनि से स्वागत हुआ।

इस सम्मेलन की सभाएँ प्रतिदिन होती थीं। स्वामीजी ने अपने भाषण सभा के अन्त में ही दिये, क्योंकि सारी जनता उन्हीं का भाषण सुनने के लिए अन्त तक बैठी रहती थी। उन्होंने हिन्दू-धर्म की उदारता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि हिन्दुत्व के शब्दकोष में असहिष्णु शब्द ही नहीं है। हिन्दू-धर्म का आधार शोषण, रक्तपात या हिंसा नहीं है, वरन् प्रेम है।

स्वामीजी ने वेदान्त के सत्य पर भी प्रकाश डाला। जब तक सम्मेलन समाप्त हुआ, तब तक स्वामीजी अपना तथा भारत का प्रभाव अमेरिका में अच्छी तरह स्थापित कर चुके थे। स्वामीजी के भाषणों की प्रशंसा में अमेरिका के समाचार पत्र द न्यूयार्क हेराल्ड ने लिखा- ‘सर्व-धर्म-सम्मेलन में सबसे महान् व्यक्ति विवेकानन्द हैं। उनका भाषण सुन लेने पर अनायास ही यह प्रश्न उत्पन्न होता है कि ऐसे ज्ञानी, देश को सुधारने के लिए धर्म-प्रचारक भेजने की बात कितनी मूर्खतापूर्ण है!’

इस सम्मेलन के बाद स्वामी विवेकानन्द लगभग तीन वर्ष तक विदेशों में वेदान्त पर भाषाण करते रहे। उनके भाषणों, वार्तालापों, लेखों और वक्तव्यों के द्वारा यूरोप व अमेरिका में हिन्दू-धर्म और संस्कृति की प्रतिष्ठा स्थापित हुई। फरवरी 1896 में उन्होंने न्यूयार्क में वेदान्त सोसायटी की स्थापना की जिसका लक्ष्य वेदान्त का प्रचार करना था।

अमेरिका में उनके अनेक अनुयायी हो गये जो चाहते थे कि कुछ भारतीय धर्म-प्रचारक, अमेरिका में भारतीय दर्शन तथा वेदान्त का प्रचार करें और उनके अमेरिकी शिष्य भारत जाकर विज्ञान और संगठन का महत्त्व सिखायें।

स्वामी विवेकानन्द ने भारत लौटकर मई 1897 में रामकृष्ण मिशन की स्थापना की तथा 1 जनवरी 1899 को वेलूर में मिशन का मुख्यालय स्थापित किया। जून 1899 में वे दूसरी बार अमेरिका गये तथा लॉस एंजिल्स, सैनफ्रांसिस्को, केलिफोर्निया आदि विभिन्न नगरों में वेदान्त सोसायटी की स्थापना की। यहाँ से वे एक धार्मिक सम्मेलन में भाग लेने पेरिस गये जहाँ उन्होंने हिन्दू-धर्म पर भाषण दिया। अपने विदेश प्रवास में स्वामीजी ने हिन्दू-धर्म का व्यापक प्रचार किया।

प्रायः डेढ़ सौ वर्षों से ईसाई धर्म प्रचारक विश्व में हिन्दुत्व की आलोचना एवं निन्दा कर रहे थे। उन आलोचनाओं और निंदाओं पर विवेकानंद ने रोक लगा दी। जब भारतवासियों को ज्ञात हुआ कि समस्त पश्चिमी जगत् स्वामीजी के मुख से हिन्दुत्व का आख्यान सुनकर गद्गद् हो रहा है, तब हिन्दू भी अपने धर्म और संस्कृति के गौरव का अनुभव करने लगे।

ई.1900 में स्वामीजी सम्पूर्ण यूरोप का दौरा कर पुनः भारत लौटे। अब उनका स्वास्थ्य बिगड़ने लगा था। इसी कारण वे बनारस गये। वहाँ से कलकत्ता वापिस आने पर उनका स्वास्थ्य फिर खराब हो गया और 4 जुलाई 1902 को मात्र 39 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया।

स्वामी विवेकानंद द्वारा हिन्दू-धर्म के लिये की गई सेवाओं की प्रश्ंसा करते हुए रामधारीसिंह दिनकर ने लिखा है- ‘हिन्दुत्व को लीलने के लिए अँग्रेजी भाषा, ईसाई धर्म ओर यूरोपीय बुद्धिवाद के पेट से जो तूफान उठा था, वह स्वामी विवेकानन्द के हिमालय जैसे विशाल वृक्ष से टकराकर लौट गया। हिन्दू जाति का धर्म है कि वह जब तक जीवित रहे, विवेकानन्द की याद उसी श्रद्धा से करती जाये, जिस श्रद्धा से वह व्यास और वाल्मीकि को याद करती है।’

स्वामी विवेकानंद के धार्मिक सुधार

स्वामी विवेकानन्द ने विश्व धर्म सम्मेलन में विश्व के समस्त धर्मों की सत्यता में विश्वास व्यक्त किया। उन्हें जितनी आस्था वेदों में थी, उतनी ही आस्था उपनिषदों, पुराण, रामायण, महाभारत आदि ग्रंथों में भी थी। उन्हें ईश्वर के निराकार रूप की उपासना में जितनी रुचि थी, उतनी ही साकार रूप में थी। उन्होंने धार्मिक उदारता, समानता और सहयोग पर बल दिया। उन्होंने धार्मिक झगड़ों का मूल कारण बाहरी चीजों पर अधिक बल देना बताया। उनके अनुसार सिद्धान्त, धार्मिक क्रियाएँ, पुस्तकें, मस्जिद तथा गिरजाघर, ईश्वरीय उपासना के साधन मात्र हैं। इस कारण इन पर अधिक बल नहीं देना चाहिये।

स्वामी विवेकानन्द ने धर्म की व्याख्या करते हुए कहा- ‘धर्म मनुष्य के भीतर निहित देवत्व का विकास है; धर्म न तो पुस्तकों में है, न धार्मिक सिद्धान्तों में। यह केवल अनुभूति में निवास करता है…….

….. मनुष्य सर्वत्र अन्न ही खाता है किन्तु हर देश में अन्न से भोजन तैयार करने की विधियाँ अनेक हैं। इसी प्रकार धर्म मनुष्य की आत्मा का भोजन है और देश-देश में उसके भी अनेक रूप हैं। इससे यह स्पष्ट है कि समस्त धर्मों में मूलभूत एकता है, यद्यपि उसके स्वरूप भिन्न हैं। उन्होंने अन्य धर्म-प्रचारकों को बताया कि भारत ही ऐसा देश है जहाँ कभी धार्मिक भेदभाव नहीं हुआ। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि धर्म-परिवर्तन से कोई लाभ नहीं है, क्योंकि प्रत्येक धर्म का लक्ष्य समान है। उन्होंने ईसाई धर्म के अनुयायियों को स्पष्ट किया कि भारत में ईसाई धर्म के प्रचार से उतना लाभ नहीं हो सकता जितना पश्चिमी औद्योगिक तकनीकी तथा आर्थिक ज्ञान से हो सकता है। भारत पर विजय राजनीतिक हो सकती है, सांस्कृतिक नहीं।’

स्वामी विवेकानन्द ने हिन्दू समाज को सन्देश दिया कि हिन्दू राष्ट्र, विश्व का शिक्षक रहा है और भविष्य में भी रहेगा। प्रत्येक हिन्दू को अपने धर्म और संस्कृति की रक्षा करनी चाहिये और साथ ही पाश्चात्य शिक्षा को भी अपनाना चाहिये अन्यथा हमारा उत्थान सम्भव नहीं है। उन्होंने दर्शन के सत्य की सुन्दर ढंग से व्याख्या की और बताया कि वेदान्त की आध्यात्मिकता के बल पर भारत सारे विश्व को जीत सकता है।

 विवेकानन्द वेदान्त की परम्परागत व्याख्या से सहमत नहीं थे। भारतीय संत, सांसारिक जीवन से विमुख होकर ध्यान-समाधि द्वारा ब्रह्म से साक्षात्कार का उपदेश देते थे किन्तु विवेकानन्द ने कहा कि ब्रह्म से साक्षात्कार करने के लिए सांसारिक जीवन से विमुख होना अनुचित है। सच्ची ईश्वरोपासना यह है कि हम अपने मानव बन्धुओं की सेवा में अपने आपको लगा दें।

स्वामी विवेकानन्द ने दीन-दुःखी तथा दरिद्र मानव को ईश्वर का रूप बताया और उसके लिए दरिद्रनारायण शब्द का प्रयोग किया। जब पड़ौसी भूखा हो तब मन्दिर में भोग चढ़ाना पुण्य नहीं, अपितु पाप है। स्वामीजी की इन घोषणाओं ने धार्मिक क्षेत्र में क्रान्ति उत्पन्न कर दी। जो लोग पश्चिम की भौतिकता तथा बुद्धिवाद से प्रभावित होकर ईसाइयत अथवा नास्तिकता की ओर दौड़ रहे थे, वे फिर से हिन्दू-धर्म में विश्वास करने लगे।

स्वामी विवेकानंद की मान्यता थी कि- ‘तुम समस्त व्यक्तियों की विचारधारा को एक नहीं कर सकते, यह सत्य है और मैं इसके लिए ईश्वर को धन्यवाद देता हूँ। विचारों की भिन्नता और संघर्ष से ही नवीन विचार जन्म लेते हैं।’

स्वामी विवेकानन्द के समाज सेवा कार्य

(1.) मानवमात्र की सेवा को प्राथमिकता

स्वामी विवेकानंद ने अपने उपदेशों में मानव मात्र की सेवा को सबसे महत्त्वपूर्ण बताया। वे शिक्षा, स्त्री-पुनरुद्धार तथा आर्थिक प्रगति के पक्षधर थे। उन्होंने रूढ़िवाद, अन्धविश्वास और अशिक्षा की आलोचना की तथा कहा- ‘जब तक करोड़ों व्यक्ति भूखे और अज्ञानी हैं, तब तक मैं उस प्रत्येक व्यक्ति को देशद्रोही मानता हूँ, जो उन्हीं के खर्च पर शिक्षा प्राप्त करता है किन्तु उनकी परवाह बिल्कुल नहीं करता।’ उन्होंने हिन्दू सन्यासियों को संकीर्णता से निकलकर मानव मात्र की सेवा करने को कहा।

(2.) देशवासियों के उत्थान हेतु नर्क में रहना स्वीकार

स्वामी विवेकानंद की मान्यता थी कि देश की गरीबी को दूर करना आवश्यक है। वे कहते थे कि देशवासियों के उद्धार के पुनीत कार्य के लिये उन्हें मोक्ष छोड़कर नरक में भी जाना स्वीकार है।

(3.) अस्पश्र्यता का विरोध

स्वामीजी छुआछूत के घोर विरोधी थे तथा जन्म पर आधारित वर्ण-भेद को नहीं मानते थे। उन्होंने अन्ध-विश्वासी और छुआछूत में विश्वास करने वाले सन्यासियों और ब्राह्मणों की तीव्र आलोचना की। वे थियोसॉफिकल सोसायटी से भिन्न विचार रखते थे, क्योंकि थियोसॉफिकल सोसायटी अन्ध-विश्वासों और तन्त्र-विद्या को प्रोत्साहन दे रही थी।

(4.) आध्यात्मिकता से आत्म-निर्माण

स्वामी विवेकानंद सामाजिक सुधारों में विश्वास नहीं करते थे। उनका कहना था कि आध्यात्मिकता से आत्म-निर्माण होता है जिससे देश की सामाजिक और आर्थिक प्रगति सम्भव है। आध्यात्मिक उन्नति के माध्यम से वे मनुष्य को मनुष्य बनाना चाहते थे और उसी को प्रगति मानते थे।

(5.) संगठित प्रयत्नों पर बल

विवेकानंद ने जन-कल्याण के लिये संगठित प्रयत्नों पर बल दिया तथा रामकृष्ण मिशन की स्थापना की जहाँ दीन-दुखियों की सहायतार्थ विभिन्न जातियाँ, वर्ग और धर्म मिल सकते थे। उनका कहना था कि गरीबों की सहायता करना ईश्वर-प्राप्ति के मार्ग में एक यज्ञ होगा। विवेकानन्द की सबसे बड़ी सफलता यह थी कि उन्होंने सन्यासियों के समक्ष व्यक्ति-निष्ठ मोक्ष की अपेक्षा समाज सेवा का आदर्श प्रस्तुत किया।

(6.) भारतीयों में आत्म-सम्मान की उत्पत्ति

स्वामी विवेकानंद ने पश्चिमी देशों में हिन्दुओं की आध्यात्मिक उपलब्धियों की चर्चा करके हिन्दुओं की हीन भावना को समाप्त करने का प्रयास किया। भारतीयों में आत्म-विश्वास उत्पन्न करना स्वामीजी की महान् देन है।

स्वामी विवेकानन्द द्वारा राष्ट्रीयता का निर्माण

स्वामी विवेकानन्द ने राष्ट्रीयता के निर्माण में विपुल योगदान दिया। उन्होंने हिन्दू-धर्म और आध्यात्मवाद की श्रेष्ठता को स्थापित करके हिन्दुओं में आत्मगौरव और देश-प्रेम उत्पन्न किया। उन्होंने वेदान्त की व्याख्याओं के माध्यम से यह सिद्ध किया कि प्रत्येक व्यक्ति स्वयं में ईश्वर की ज्योति देख सकता है। जिस प्रकार ईश्वर सदा स्वतन्त्र है, उसी प्रकार प्रत्येक व्यक्ति भी सदा स्वतन्त्र है।

पश्चिमी राजनीति तथा अन्य संस्थाओं के पीछे जो भारतीय दौड़ रहे हैं, उन्हें ध्यान रखना चाहिये कि पश्चिमी देशों में व्यापक असन्तोष है, जबकि उनके यहाँ वे संस्थाएँ कई पीढ़ियों से चल रही है। स्वामी विवेकानन्द ने देश में सांस्कृतिक चेतना की जो धारा प्रवाहित की, उस पर भारतीय राष्ट्रीयता का भव्य भवन खड़ा किया जा सका।

उन्होंने कहा कि आध्यात्मिकता के बल से विश्व पर सांस्कृतिक विजय प्राप्त की जा सकती है किन्तु जब तक भारत दासता की बेड़ियों से जकड़ा हुआ है, वह इस महत्त्वपूर्ण भूमिका को नहीं निभा सकता। उनकी मान्यता थी कि भारत की राजनैतिक स्वतन्त्रता विश्व मानवता के उद्धार के लिये अनिवार्य है। उन्होंने भारतीयों में राजनीतिक स्वाधीनता की भावना जागृत की।

स्वामीजी ने भगवद्गीता के कर्मयोगी श्रीकृष्ण को भारतीय राष्ट्र का आदर्श बताया। वास्तव में विवेकानंद ने देशभक्ति और समाज सेवा के जिन आदर्शों का प्रतिपादन किया, उनसे भारत में देश-प्रेम की भावना नये सिरे से विकसित हुई।

रवीन्द्रनाथ टैगोर ने लिखा है- ‘यदि कोई भारत को समझना चाहता है तो उसे विवेकाननद को पढ़ना चाहिए।’

महर्षि अरविन्द ने लिखा है- ‘पश्चिमी जगत में विवेकानन्द को जो सफलता मिली, वही इस बात का प्रमाण है कि भारत केवल मृत्यु से बचने को जागृत नहीं हुआ है, एक बार इस हिन्दू सन्यासी को देख लेने के पश्चात् उसे और उसके संदेश को भुला देना कठिन है।’

विवेकानंद की मृत्यु के बाद उनके द्वारा स्थापित रामकृष्ण मिशन ने उनके महान् कार्यों को आगे बढ़ाया। इस संस्था के द्वारा अँग्रेजी भाषा का मासिक प्रबुद्ध भारत तथा बंगाली भाषा का पाक्षिक उद्बोधन प्रकाशित गए। कई ग्रन्थों में स्वामी विवेकानन्द के भाषणों का प्रकाशन हुआ। रामकृष्ण मिशन की शाखाएँ भारत के विभिन्न नगरों में विद्यमान हैं तथा विविध प्रकार के कल्याणकारी कार्य यथा- चिकित्सालय, अनाथालय, विद्यालय, वाचनालय आदि का संचालन कर रही हैं।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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रावण का वध करने के बाद जब भगवान श्रीराम अयोध्या लौटे तो उन्होंने पुष्पक विमान लंका के नए राजा विभीषण को क्यों नहीं लौटाया?...
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एनीमल फार्म और भारतीय राजनीति

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क्या आपने उस किताब का नाम सुना है जिसने 1950 के दशक में पूरी दुनिया में आग लगा दी थी! क्या आपने एनीमल फार्म...
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हरम बेगम का कपट जाल (69)

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बाकी काकशाल नामक एक अमीर ने मिर्जा हकीम से कहा कि यह हरम बेगम का कपट जाल है, इसलिए वहाँ जाना ठीक नहीं है...