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कालीदास

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कालीदास

वैदिक एवं उत्तरवैदिक धार्मिक ग्रंथों के बाद संस्कृत साहित्य में महाकवि कालीदास को जितनी सफलता मिली, उतनी अन्य किसी कवि को नहीं मिली। 

काउण्ट ब्जोन्सर्टजेरेना ने लिखा है कि भारत का साहित्य हमें अतीत काल के महान राष्ट्र से परिचित कराता है जिसका ज्ञान की हर शाखा पर अधिकार था और जो सदा ही मानव सभ्यता के इतिहास में एक विशिष्ट स्थान ग्रहण करेगा।

भारत में वैदिक-काल से ही उत्कृष्ट कोटि की साहित्य रचना की परम्परा आरम्भ हुई जो प्रत्येक युग में चलती रही। भारत का सबसे पहला महाकाव्य महर्षि वाल्मीकि कृत रामायण तथा दूसरा महाकाव्य वेदव्यास द्वारा रचित महाभारत है। ईसा बाद की शताब्दियों में भी संस्कृत भाषा के अनेक महाकवि हुए जिनमें कालीदास, भारवि, दण्डी एवं माघ बहुत प्रसिद्ध हैं। इनके बारे में एक उक्ति बड़ी प्रसिद्ध है-

उपमा कालीदासस्य,  भारवैः अर्थ गौरवं

दण्डि तु पद लालित्यं माघः संति त्रयो गुणाः।

महाकवि कालीदास के संस्कृत साहित्य में हमें गुप्तकालीन समाज और संस्कृति के दर्शन होते है। मध्य-काल में तुलसीदास, सूरदास, कबीर और मीराबाई आदि अनेक विख्यात कवि हुए जिन्होंने लोकभाषा में रचनाएं लिखकर देश को महान साहित्य प्रदान किया। गोस्वामी तुलसीदास का साहित्य, भारतीय संस्कृति के उच्चतम आदर्शों की अभिव्यक्ति है। मीराबाई का भक्ति साहित्य हिन्दी साहित्य की अमर निधि है। इन साहित्यकारों ने देश के साहित्यिक और सांस्कृतिक जागरण में अमूल्य योगदान दिया।

महाकवि कालीदास

वैदिक एवं उत्तरवैदिक धार्मिक ग्रंथों के बाद संस्कृत साहित्य में महाकवि कालीदास को जितनी सफलता मिली, उतनी अन्य किसी कवि को नहीं मिली।  महाकवि कालीदास भारतीय संस्कृति के उत्कर्ष काल के प्रतिनिधि कवि हैं। कालीदास के जीवन के सम्बन्ध में प्रमाणिक जानकारी का अभाव है। विभिन्न ग्रंथों से मिलने वाली अनुश्रुतियों के अनुसार कालीदास का जन्म उज्जैन के एक ब्राह्मण परिवार में हुआ।

वे शैव मतावलम्बी थे। कुछ विद्वान् कालीदास के काव्यों और नाटकों में कश्मीर के वर्णन के आधार पर उन्हें काश्मीर का ही मानते हैं। अनेक बंगाली साहित्यकारों ने उन्हें बंगाल का निवासी बताया है। प्रसिद्ध इतिहासकार वी. ए. स्मिथ का मत है कि कालीदास मालवा प्रदेश के मन्दसौर के निवासी थे।

महाकवि का काल निर्णय

कालीदास ने ‘विक्रमोर्वशीय’ नाटक में ‘विक्रम’ शब्द का प्रयोग किया है। इसके आधार पर कालीदास के काल के सम्बन्ध में दो मत बनाए गए हैं। प्रथम मत के अनुसार कालीदास, महाराजा विक्रमादित्य की राजसभा के नवरत्नों में से एक थे। विक्रमादित्य परमारवंशीय राजा महेन्द्रादित्य का पुत्र था जो ईस्वी पूर्व प्रथम शताब्दी में उज्जयिनी का राजा हुआ। उसने शकों को पराजित किया तथा अपनी विजय के उपलक्ष में ई.पू. 57 में विक्रम संवत् चलाया। अतः इस मत के आधार पर कालीदास का काल ई.पू. प्रथम शताब्दी ठहरता है।

दूसरे मत के अनुसार कालीदास गुप्त शासक चन्द्रगुप्त (द्वितीय) (ई.380-413) के समकालीन थे जिसने ‘विक्रमादित्य’ की उपाधि धारण की थी। इस मत के समर्थकों का तर्क है कि-

(1.) ईस्वी पूर्व प्रथम शताब्दी में विक्रमादित्य नामक किसी राजा के होने का ऐतिहासिक साक्ष्य उपलब्ध नहीं होता, अतः कालीदास चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य के समकालीन थे।

(2.) कालीदास ने ‘कुमार-सम्भव’ महाकाव्य की रचना की। यह ग्रंथ चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य के पुत्र कुमारगुप्त के जन्म के उपलक्ष में लिखा गया।

(3.) कालीदास के महाकाव्य ‘रघुवंश’ में रघु-दिग्विजय का वर्णन हुआ है। यह वर्णन इलाहाबाद-स्तम्भ-लेख में वर्णित समुद्रगुप्त की दिग्विजय के वर्णन से मेल खाता है जो चन्द्रगुप्त (द्वितीय) का पिता था।

(4.) कालीदास ने ‘रघुवंश’ में हूण नामक विदेशी जाति का उल्लेख किया है, जो गुप्त काल में ही भारत में प्रविष्ट हुए थे।

(5.) कालीदास की रचनाओं में संस्कृत भाषा की ‘गुप्’ धातु का बार-बार प्रयोग हुआ है जिसका अर्थ होता है ‘रक्षा करना’। चूंकि गुप्तों ने अत्यंत शक्तिशाली एवं बर्बर हूणों से युद्ध करके देश की रक्षा की थी। इसलिए कालीदास द्वारा गुप् धातु का प्रयोग करके उसी ओर संकेत किया गया है।

(6.) कालीदास तथा बौद्ध कवि अश्वघोष की रचनाओं में, अनेक स्थानों पर समानता है। दोनों रचनाओं में कालीदास की रचना, निर्विवाद रूप से श्रेष्ठ है। ऐसा प्रतीत होता है कि कालीदास ने अश्वघोष का अनुसरण करके अपनी शैली का परिष्कार एवं सुधार किया। चूँकि अश्वघोष का समय प्रथम शताब्दी ईस्वी है, इसलिए कालीदास उनके बाद में अर्थात् गुप्त-काल में हुए होंगे।

(7.) ई.473 के गुप्तकालीन मन्दसौर अभिलेख में कालीदास की रचनाओं की स्पष्ट झलक मिलती है, जिससे अनुमान लगाया जा सकता है कि कालीदास इस लेख के लिखे जाने के समय अथवा उससे पूर्व हुए होंगे। अतः वे चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य के समय में ही हुए होंगे।

(8.) जिस परिष्कृत संस्कृत भाषा, सुख, वैभव, शान्ति, समृद्धि तथा उल्लासमय वातावरण का वर्णन कालीदास के काव्यों में पाया जाता है, वह गुप्त काल में ही सम्भव था, अन्य किसी युग में नहीं।

(9.) परमारों का उदय अन्य राजपूत वंशों अर्थात् चैहानों, चैलुक्यों, प्रतिहारों के साथ हुआ जबकि ईस्वी पूर्व प्रथम शताब्दी में भारत के इतिहास में परमार वंश का कोई अस्तित्व नहीं था। अतः कालीदास गुप्तवंश के समकालीन हो सकते हैं न कि किसी परमार वंशी राजा के।

उपरोक्त तर्कों के आधार पर कालीदास को गुप्त सम्राट चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य का समकालीन माना जाता है।

कालीदास का जीवन-परिचय

कालीदास के बाल्यकाल और शिक्षा आदि के सम्बन्ध में प्रामाणिक जानकारी नहीं मिलती। उनके जीवन का परिचय विभिन्न ग्रंथों में आए हुए उल्लेखों से मिलता है जिनमें अविश्वसनीय किंवदंतियां भी सम्मिलित हैं। कहा जाता है कि कालीदास महामूर्ख थे। वे पेड़ की जिस डाल पर बैठते थे, उसी को काटने लग जाते थे।

वहाँ के राजा की पुत्री विद्योत्तमा समस्त विद्याओं और कलाओं में निपुण थी किंतु अभिमानी होने के कारण वह राज्य के पण्डितों का अपमान करती थी। इसलिए राज्य पंडितों ने राजकुमारी का मानमर्दन करने के लिए मूर्ख कालीदास को पकड़कर राजा के दरबार में यह कहकर प्रस्तुत किया कि यह अत्यंत विद्वान है तथा किसी को भी शास्त्रार्थ में परास्त कर सकता है।

राजा ने अपनी विदुषी पुत्री का विवाह मूर्ख कालीदास के साथ कर दिया। विवाह के पश्चात् विद्योत्तमा को कालीदास की मूर्खता का ज्ञान हुआ और उसने कालीदास का घनघोर अपमान किया। कालीदास घर छोड़कर विद्याध्ययन के लिए चले गए। अनेक वर्षों तक व्याकरण और काव्य-शास्त्र का अध्ययन करने के बाद जब वे घर लौटे तो विद्योत्तमा ने उनका स्वागत किया।

कहा जाता है कि विद्योत्तमा द्वारा कहे गए स्वागत-वाक्य- ‘अस्तिकाश्चिद्वागर्थ’ को आधार मानकर ही कालीदास ने कुमार-सम्भव, मेघदूत और रघुवंश की रचना की। 

एक दूसरी मान्यता यह भी है कि अपनी पत्नी से अपमानित होकर वे घर से सीधे काली के मन्दिर में पहुँचे और उन्होंने देवी को प्रसन्न करने के लिए अपनी जिह्वा काटकर देवी के चरणों में अर्पित कर दी। देवी ने प्रसन्न होकर कालीदास को समस्त शास्त्रों का ज्ञाता और महाकवि बना दिया। माना जाता है कि देवी काली की कृपा प्राप्त करने के कारण उनका नाम कालीदास पड़ा।

मुंशी प्रेमचन्द ने इन किंवदंतियों के सम्बन्ध में लिखा है- ‘ये अधिकांशतः निर्मूल एवं निराधार हुआ करती हैं और तथ्य से इनका कोई सम्बन्ध नहीं होता। जहाँ इतिहास अधूरा रह जाता है या मौन हो जाता है वहाँ इस प्रकार की गाथाएं गढ़ लेना साधारण सी बात है।’

किंवदन्तियों को अलग कर दें तो भी यह स्पष्ट है कि कालीदास ने अनेक वर्षों तक विद्याध्ययन करके शास्त्रों एवं व्याकरण में निपुणता प्राप्त की और बाद में गृहस्थाश्रम में प्रवेश करके अनेक विख्यात ग्रन्थों की रचना की।

माना जाता है कि गुप्त शासकों ने कालीदास को कश्मीर का राजा बनाया। इसी कारण उनकी रचनाओं में केसर की क्यारियों एवं कश्मीर की घाटियों का बहुतायत से उल्लेख हुआ है।

कालीदास के काव्य ग्रंथ

कालीदास की रचनाओं में चार काव्य- ऋतु-संहार, कुमार-सम्भव, रघुवंश और मेघदूत तथा तीन नाटक- विक्रमोर्वशीय, मालविकाग्निमित्रम् और अभिज्ञान शाकुन्तलम् प्रमुख हैं।

(1.) ऋतु संहार

यह एक गीति-काव्य है। इसमें छः सर्ग हैं और प्रत्येक सर्ग में एक ऋतु क्रमशः ग्रीष्म, वर्षा, शरद् हेमन्त, शिशिर और बसन्त ऋतु का बड़ा ही सुन्दर वर्णन किया गया है। ऋतु संहार को कालीदास की प्रथम कृति माना जाता है। ऋतु संहार में महाकवि की भावनाओं तथा भाषा का वह परिष्कृत और विकसित रूप नहीं मिलता जो उनकी अन्य रचनाओं में मिलता है।

(2.) कुमार-सम्भव

महाकवि कालीदास का यह एक उत्कृष्ट महाकाव्य है। इसमें 17 सर्ग हैं। कुमार-सम्भव की कथा-वस्तु का आधार शिव-पुराण और विष्णु-पुराण में वर्णित कथाएं हैं किन्तु कालीदास ने अपनी कल्पना के मिश्रण से पौराणिक घटनाओं में नवीनता, सरलता एवं लालित्य उत्पन्न किया है। इस कारण यह मौलिक काव्य बन गया है।

इसके प्रथम सर्ग में पर्वतराज हिमालय के सौन्दर्य का हृदयग्राही वर्णन, दूसरे सर्ग में बसन्त ऋतु एवं वन की अनुपम शोभा, तीसरे में शिव की समाधि, चैथे में शिव द्वारा कामदेव का दहन तथा रति का करुण विलाप, पांचवे में पार्वती की तपस्या तथा शिव और पार्वती में संवाद तथा बाद के सर्गों में शिव-पार्वती विवाह, कुमार कार्तिकेय का जन्म, देवताओं का सेनापति नियुक्त होना तथा तारकासुर-वध आदि का वर्णन है।

कुमार-सम्भव में पार्वती के यौवन एवं सौन्दर्य, रति का विलाप तथा शिव-पार्वती विवाह आदि प्रसंग अत्यन्त ही भावपूर्ण एवं सुन्दर बन पड़े हैं। काव्य कला की दृष्टि से यह उच्च-कोटि की रचना है। किंवदंति है कि माता पार्वती के सौन्दर्य का शृंगारिक वर्णन करने के कारण कालीदास को कोढ़ हो गया था जो बाद में शिव-पार्वती की कृपा से ही ठीक हुआ।

(3.) रघुवंश

रघुवंश एक अनुपम महाकाव्य है जिसमें 19 सर्ग हैं। कालीदास की रचनाओं में तथा सम्पूर्ण संस्कृत साहित्य में रघुवंश को सर्वाधिक ख्याति प्राप्त है। इस ग्रंथ का मूल स्रोत वाल्मीकिकृत रामायण है। रघुवंश में सूर्यवंशी राजा दिलीप से लेकर रघु, अज, दशरथ, राम, कुश आदि उन्तीस राजाओं की जीवन-घटनाओं और उनके एक हजार साल के इतिहास को क्रमबद्ध रूप से सजाया गया है तथा यत्र-तत्र बिखरी हुई घटनाओं और कथाओं को जोड़कर एक अविरल प्रवाह वाला महाकाव्य बनाया गया है। रघुवंश में सभी प्रधान रसों का समावेश हुआ है।

वशिष्ठ तथा वाल्मीकि ऋषियों के आश्रमों के वर्णन में शान्त रस का, अज तथा राम के युद्धों के वर्णन में वीर रस का और राजा अग्निवर्ण के विलास-वर्णन में शृंगार रस का सुन्दर निष्पादन हुआ है। रघुवंश की रचना का मूल उद्देश्य महाराज रघु की वंश-परम्परा का वर्णन करने के साथ श्रीराम की जीवन-घटनाओं का सविस्तार वर्णन करना रहा है। इस लक्ष्य की पूर्ति हेतु राम और उनके जीवन-वृत्त का वर्णन 10वें सर्ग से 16वें सर्ग तक सात सर्गों में किया गया है।

जबकि राम के पूर्वज दिलीप, रघु, अज और दशरथ के जीवन-वृत्तों का वर्णन प्रारम्भ के 9 सर्गों में तथा राम के आगे की वंश-परम्परा का वर्णन अन्तिम तीन सर्गों में संक्षिप्त रूप से किया गया है। रघुवंश में रघु के पुत्र अज का इन्दुमति से विवाह, कोमल माला के गिरने से इन्दुमति की मृत्यु और अज का करुण विलाप, पुष्पक विमान द्वारा राम और सीता का रमणीय स्थलों का भ्रमण आदि प्रसंगों का अत्यन्त मनोहारी चित्रण है।

(4.) मेघदूत

मेघदूत संस्कृत साहित्य का ही नहीं अपितु विश्व-साहित्य का ऐसा दूत-काव्य है, जिसकी समता का कोई अन्य दूत-काव्य अब तक उपलब्ध नहीं हुआ है। मेघदूत में 111 पद्य हैं। इस ग्रंथ के दो खण्ड हैं- पूर्व मेघ तथा उत्तर मेघ। इस काव्य में एक यक्ष का वर्णन है जिसे अपने स्वामी कुबेर के शाप के कारण अपनी पत्नी को अलकापुरी में छोड़कर रामगिरी पर्वत पर रहना पड़ा।

पत्नी से वियोग उसके लिए असहनीय सिद्ध हुआ। उसने वर्षा ऋतु में एक मेघ को उत्तर दिशा में पर्वत की ओर जाते देखा तो मेघ से आग्रह करने लगा कि वह मेरी प्रिया तक मेरा विरह-सन्देश पहुँचा दे। पूर्व मेघ में प्रकृति के मनोरम दृश्यों तथा बरसात की मादकताओं का साहित्यिक वर्णन किया गया है। इसमें रामगिरि से अलका तक पहुँचने के लिए मार्ग भी बताया गया है।

उत्तर मेघ सौन्दर्य और प्रेम के नवीनतम, अनोखे और अभिरामतम चित्रण से परिपूर्ण है। भावाभिव्यंजना तथा प्राकृतिक सौन्दर्य वर्णन की दृष्टि से यह अत्यन्त ही सुन्दर काव्य है। कुछ विद्वानों ने इस कृति को कवि की व्यक्ति-व्यंजक अर्थात् आत्मपरक रचना माना है।

कालीदास के नाटक

कालीदास की जितनी ख्याति कवि के रूप में है, उतनी ही ख्याति नाट्यलेखक के रूप में भी है। उन्हें भारत का शेक्सपीयर कहा जाता है। उनके द्वारा लिखित तीन नाटक विश्वविख्यात हैं-

(1.) विक्रमोर्वशीय

विक्रमोर्वशीय नाटक के नायक और नायिका पुरूरवा और उर्वशी हैं जिनका उल्लेख ऋग्वेद, शतपथ ब्राह्मण तथा मत्स्य-पुराण में हुआ है। कालीदास ने उनकी प्रेमकथा को विक्रमोर्वशीय नामक नाटक में ढाल दिया है।

नाटक में पुरूरवा का देवलोक की अप्सरा उर्वशी से प्रेम होना, निषिद्ध वन में जाने से उर्वशी का लता बन जाना, पुरूरवा का उसके वियोग में पागल होकर इधर-उधर भटकना, संगमनीय मणि द्वारा उर्वशी का पुनः अपने असली रूप में प्रकट होना और अन्त में दोनों का पुनर्मिलन होना आदि का बड़ा मार्मिक चित्रण हुआ है।

(2.) मालविकाग्निमित्रम्

यह एक ऐतिहासिक नाटक है। इसमें पांच अंक हैं। इसमें शुंगवंशीय राजा अग्निमित्र तथा उसकी रानी इरावती की परिचारिका मालविका की प्रेम-कथा है। मालविका अपने सौन्दर्य से अग्निमित्र का हृदय जीत लेती है। रानी इरावती को जब इस बात का पता लगता है तो वह मालविका को कारावास में बन्द करवा देती है।

अन्त में यह मालूम होने पर कि मालविका भी राजकुमारी है, तब उसका अग्निमित्र से विवाह हो जाता है। नाट्य कला की दृष्टि से मालविकाग्निमित्रम् एक अत्यन्त सुन्दर रचना है तथा इसके संवाद बड़े ही आकर्षक एवं हृदय को छूने वाले हैं।

(3.) अभिज्ञानशाकुन्तलम्

कालीदास का यह नाटक संस्कृत साहित्य की उत्कृष्ट रचना है। इस नाटक की कथा-वस्तु महाभारत और पद्मपुराण के उस कथानक से ली गई है जिसमें ऋषि विश्वामित्र के तपोभंग, शकुन्तला की उत्पत्ति और दुष्यन्त से प्रेम तथा गन्धर्व-विवाह का वर्णन है। कालीदास ने इस पौराणिक कथानक को सात अंकों वाले नाटक में ढाल दिया। नाटक में हस्तिनापुर के राजा दुष्यन्त तथा ऋषि-पुत्री शकुन्तला के प्रेम, वियोग तथा पुनर्मिलन की कथा का वर्णन किया गया है।

प्रथम एवं द्वितीय अंक में राजा दुष्यन्त एवं शकुन्तला में एक-दूसरे के प्रति अनुराग उत्पन्न होना, तीसरे अंक में दुष्यन्त तथा शकुन्तला का समागम और फिर गान्धर्व विवाह होना, चतुर्थ अंक में ऋषि कण्व द्वारा शकुन्तला को पति-गृह के लिए विदा करना, पंचम अंक में ऋषि दुर्वासा के शाप के कारण दुष्यन्त का शकुन्तला को न पहचानना तथा शकुन्तला का अपनी माता मेनका के साथ मारीच ऋषि के आश्रम में जाकर रहना, छठे अंक में अंगूठी के मिलने पर दुष्यन्त को शकुन्तला की याद आना और दुःखी होना, सातवें अंक में स्वर्ग से लौटते समय दुष्यन्त का मारीच ऋषि के आश्रम में अपने पुत्र सर्वदमन (भरत) तथा शकुन्तला से मिलना आदि प्रसंगों का वर्णन किया गया है।

नाटक के संवाद रोचक और भाषा पात्रों के अनुरूप है। नाटक में शृंगार और करुणा रस का सुन्दर निष्पादन हुआ है। शकुन्तला के हृदय में दुष्यन्त के प्रति पे्रम, दोनों के मिलन और गान्धर्व विवाह में शृंगार रस का सुन्दर निष्पादन हुआ है और ऋषि कण्व द्वारा शकुन्तला को पतिगृह के लिए विदा करने के अवसर पर करुण रस का निष्पादन हुआ है। पांचवे अंक में राजा दुष्यन्त द्वारा अपमानित होकर रोती हुई शकुन्तला के गमन का दृश्य भी बड़ा करुणाजनक है।

कालीदास के साहित्य की विशेषताएं

पुराणों में जिस धार्मिक और सांस्कृतिक समन्वय का परिपाक हुआ उसने साहित्य में लालित्य परम्परा को जन्म दिया। महाकवि कालीदास ने साहित्य में लालित्य को ऊँचाई प्रदान की। कालीदास द्वारा प्रस्तुत मर्यादित व्यवस्था और सन्तुलित जीवन के आदर्श ने, भारतीय धर्म और संस्कृति को बल प्रदान किया। उनके साहित्य की अनेक विशेषताएं हैं-

(1.) कालीदास की भाषा और छन्द योजना

कालीदास के साहित्य में भाषा की परिपक्वता और अद्भुत छन्द योजना के दर्शन होते हैं। कहीं भी अनावश्यक या अनुपयुक्त शब्दों का प्रयोग नहीं किया गया है। उनकी शैली और लेखन प्रवाह अत्यन्त रोचक है। किसी विषय के दीर्घ वर्णन में भी शिथिलता अथवा बोरियत नहीं पाई जाती।

भाषा का माधुर्य, उसकी सुकोमलता, सुन्दर वाक्य-विन्यास और भावनुकूल शब्द-चयन उनके साहित्य की प्रमुख विशेषताएं हैं। महाकवि कालीदास छन्द रचना में सिद्धहस्त थे। उन्होंने अपनी रचनाओं में घटना एवं भावों के अनुकूल ही छन्दों का प्रयोग किया। छन्द योजना का उन्होंने इतना अधिक ध्यान रखा है कि जहाँ कहीं रस और भाव में परिवर्तन होता है, वहीं उसी के अनुरूप छन्द भी बदल जाते हैं।

(2.) कालीदास के विषयों में सरसता

कालीदास ने गंभीर, दार्शनिक एवं शुष्क समझे जाने वाले विषयों में भी काव्य प्रतिभा के बल से सरसता एवं रोचकता का सृजन किया है। कालीदास ने वेद, पुराण, इतिहास, दर्शन ग्रंथों से अपने विषयों एवं नायक-नायिकाओं का चुनाव किया और उन्हें रोचक रचनाओं में ढाल दिया। कालीदास ने ठूँठ वृक्षों और निर्जन खण्डहरों में भी सौन्दर्य का सृजन किया। ऋतु-संहार में ग्रीष्म के तपते हुए दिनों में ठूँठ वृक्षों और जंगली झड़बेरियों में कालीदास की कलम ने सौन्दर्य की सृष्टि की है।

(3.) रूपक एवं उपमाओं का प्रयोग

कालीदास का साहित्य ना-ना प्रकार की उपमाओं एवं रूपकांे से समृद्ध है जो पाठक को आनन्द देता है। उनकी उपमाएं सजीव एवं चित्रात्मक हैं जिनके बिना छन्द सौन्दर्य-विहीन एवं नीरस हो जाते हैं। कालीदास ने गंगा की लहरें, चन्द्रमा की शीतल चांदनी, तारों की जगमगाहट, सूर्य का ताप, हिरण के चचंल नेत्र, खिलते हुए कमल का सौन्दर्य, कोयल की मदभरी कूक, पपीहे की पुकार, मयूर का नृत्य, हंसों की किल्लोल आदि उपमाओं से अपनी रचनाओं को सजीव बनाया है।

(4.) प्रकृति के साथ तादात्मय

कालीदास का साहित्य प्रकृति के साथ तादात्म्य स्थापित करता हुआ चलता है। अभिज्ञान शाकुन्तलम् के प्रथम अंक में चचंल हिरणों की क्रीड़ाएँ, भौरों की रागमयी गुजाँर, माधवी और केतकी की मादक सुगन्ध, शीतल छाया प्रदान करने वाले अशोक और कदम्ब के वृक्ष कथानक का सजीव वातावरण तैयार करते हैं।

अभिज्ञान शाकुन्तलम् के चैथे अंक में जब ऋषि कण्व शकुन्तला को पति-गृह के लिए विदा करते हैं तो आश्रमवासियों के साथ वृक्ष एवं लताएं भी दुःखी होते हैं। पति-गृह को जाने के लिए उद्यत शकुन्तला को वृक्षों ने अनेक उपहार दिए परन्तु शकुन्तला के विछोह को वे सहन नहीं कर सके। मृगियों ने तृण खाना छोड़ दिया है, मोरों ने नाचना छोड़ दिया है और लताएं पत्तों के रूप में आंसू बहा रही हैं। शकुंतला द्वारा पालित मृग-शिशु भी शकुन्तला से लिपट जाता है।

कालीदास ने जिस सूक्ष्मता के साथ प्रकृति का मानवीकरण किया है, वह भविष्य के कवियों के लिए अनुकरणीय बन गया। रघुवंश में महाकवि कहते हैं- ‘मृग सीता के दुःख में मुँह से घास गिरा देते हैं, मोर नाचना छोड़ देते हैं, वृक्षों से पुष्प गिर पड़ते हैं। सीता के रोने पर सारा वन रो रहा है।’ मेघदूत में भी कवि ने मानव और प्रकृति के बीच संवेदना के भाव प्रदर्शित किए हैं। प्रकृति के साथ मानव का ऐसा तादाम्य केवल कालीदास के साहित्य में ही देखने को मिलता है।

(5.) मानवीय भावनाओं का चित्रण

कालीदास की रचनाओं में मानव-हृदय की कोमल भावनाओं एवं विचारों का अत्यन्त सुन्दर वर्णन हुआ है। महाकवि ने मानव जीवन के ऐसे गुह्यतम रहस्यों का भी सजीव चित्रण किया है, जिन पर साधारण व्यक्ति की दृष्टि ही नहीं जाती। कालीदास ने मानव-हृदय की भावनाओं को इतने सुन्दर ढंग से व्यक्त किया है कि सहृदय पाठक उनकी रचना को पढ़कर मुग्ध हुए बिना नहीं रह सकता।

जब आश्रम में दुष्यन्त और शकुन्तला एक-दूसरे को देखते हैं तो दोनों के हृदय में प्रेम की तरंगें हिलोर लेती हैं। दुष्यन्त संकेतों के माध्यम से अपना प्रेम प्रकट करता है किंतु शकुन्तला नारी-सुलभ लज्जा के कारण, नयन झुकाये और मौन रहती है। महाकवि ने नारी मन के सुकोमल भावों का अत्यन्त सुन्दर चित्रण किया है।

शकुन्तला को विदा करते हुए समस्त संसार से विमुख होकर निर्जन आश्रम में रहते हुए वीतरागी कण्व की पीड़ा के वर्णन में कालीदास ने कण्व ऋषि के हृदय का एक-एक कोना छानकर उनकी व्यथा का वर्णन किया है। ‘रघुवंश’ में इन्दुमति के स्वयंवर के पश्चात् विवाहोत्सव के वर्णन में भी कालीदास ने प्रेम-भावनाओं का ऐसा ही चित्रण किया है, जिसमें लज्जा की मर्यादा और प्रेम की उच्छृंखलता के बीच एक द्वंद्व दिखाई देता है।

(6.) सौन्दर्य वर्णन

कालीदास ने अपनी रचनाओं में प्रकृति और नारी के सौन्दर्य का हृदयग्राही वर्णन किया है। कुमार सम्भव में हिमालय पर्वत की शोभा-वर्णन, रघुवंश में वशिष्ठ ऋषि का तपोवन तथा त्रिवेणी के सौन्दर्य का वर्णन तथा ऋतु-संहार में षड्ऋतुओं के सौन्दर्य का वर्णन अत्यन्त मनोहारी है।

मेघदूत भी प्राकृतिक दृश्यों के चित्रण से भरा पड़ा है। मालिनी की रेती में खेलते हुए हंस-युगल, पर्वत की तलहटी मे मृग के सींग से आंख खुजलाती हुई मृगी और वृक्षों की शाखाओं पर सूखते हुए ऋषियों के वल्कलों से प्रकृति का सौन्दर्य मानो मुंह से बोल उठता है।

प्रकृति-सौन्दर्य के साथ-साथ कालीदास का नारी-सौन्दर्य वर्णन भी मनमोहक है। महाकवि ने कुमार-सम्भव में पार्वती के सौन्दर्य का नख-शिख वर्णन किया है। इसी प्रकार अभिज्ञान शाकुन्तलम् में शकुन्तला के यौवन और सौन्दर्य का वर्णन हुआ है। कवि कहता है कि शकुन्तला को बनाने से पहले ब्रह्मा ने उसे चित्त में परिकल्पित किया होगा।

मेघदूत में यक्ष, मेघ से अपनी पत्नी के सौन्दर्य का वर्णन करता है। कवि ने नारी के बाह्य सौन्दर्य को प्रधानता न देकर उसके शुभ-गुणों के सौन्दर्य को प्रधानता दी है। अतः कालीदास ने सौन्दर्य के साथ-साथ मर्यादा का भी पालन किया है।

इस प्रकार कालीदास की रचनाओं के आधार पर कहा जा सकता है कि कालीदास न केवल अपने समय के, न केवल संस्कृत साहित्य के अपितु सम्पूर्ण विश्व-साहित्य के कालजयी कवि एवं नाटककार थे।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

भारतीय साहित्यिक विरासत

कालीदास

तुलसीदास

मीराबाई

रवीन्द्र नाथ टैगोर

संत तुलसीदास का साहित्य

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संत तुलसीदास का साहित्य

भारतीय इतिहास के मध्य-काल में तथा आर्य-संस्कृति के लिए सर्वाधिक कठिन समय में संत तुलसीदास आर्य-संस्कृति के प्रतिनिधि कवि हुए। वे हिन्दी साहित्य के सर्वाधिक प्रसिद्ध और सर्वाधिक प्रतिभाशाली कवि थे।

संत तुलसीदास की जीवनी

संत तुलसीदास के जीवन के बारे में ठीक-ठीक जानकारी नहीं मिलती किन्तु उनके जीवन की बहुत सी घटनाओं से उनके काल एवं आयु आदि का अनुमान लगाया जाता है।

संत तुलसीदास सोलहवीं सदी के मुगल बादशाह अकबर के समकालीन थे। अधिकांश विद्वान तुलसीदास का जनम ई.1532 में होना मानते हैं। उनका जन्म सोरों (उत्तरप्रदेश) में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ। उनके पिता का नाम आत्माराम दूबे तथा माता का नाम हुलसी था। तुलसी का जन्म मूल-नक्षत्र में हुआ था। किंवदंतियों के अनुसार तुलसी ने जन्मते ही राम नाम का उच्चारण किया जिसके कारण उन्हें रामबोला कहा जाता था।

जन्म के समय ही उनके मुंह में पूरे दाँत थे। तुलसी जब छोटे बालक थे, तभी उनके माता-पिता का निधन हो गया और उन्हें भिक्षा मांगकर जीवन-यापन करना पड़ा। काशी में रहते हुए उन्होंने गुरु नरहरिदास से संस्कृत भाषा की शिक्षा ली तथा वेद-पुराणों का अध्ययन किया। युवा होने पर इनका विवाह दीनबन्धु पाठक की कन्या रत्नावली से हुआ। तुलसीदास अपनी पत्नी में अत्यधिक आसक्ति रखते थे और वियोग सहन नहीं कर पाते थे।

एक दिन इनकी पत्नी उनकी अनुपस्थिति में अपने भाई के साथ मायके चली गई। तुलसीदास भी रात के समय नदी को पार करके अपने ससुराल जा पहुँचे। इस कामासक्ति को देखकर रत्नावली ने तुलसीदास को झिड़कते हुए कहा कि आपने मेरी हाड़-चर्म युक्त देह से इतना स्नेह किया है, यदि ऐसी प्रीति ईश्वर में रखी होती तो आप सांसारिक बंधनों से मुक्त हो जाते।

पत्नी की इस झिड़की ने तुलसी के भावुक हृदय पर प्रहार किया और उन्हें सासांरिक जीवन से विरक्ति हो गई। उन्होंने घर का त्याग कर दिया और अनेक स्थानों का भ्रमण करते हुए काशी में जाकर बस गए। यहाँ रहते हुए उन्होंने अनेक ग्रन्थों की रचना की। अन्तिम समय में सुख एवं शान्ति के साथ भगवान श्रीराम का यशोगायन करते हुए वि.सं.1680 (ई.1623) में उन्होंने देह का त्याग किया। उनकी मृत्यु के सम्बन्ध में यह दोहा प्रसिद्ध है –

संवत सोलह सो असी, असी गंग के तीर।

श्रावण शुक्ला सप्तमी, तुलसी तज्यो शरीर।।

संत तुलसीदास राम-काव्य के पुरोधा कवि हैं क्योंकि इन्होनें अपने युग की परिस्थितियों को सामने रखकर सकल मानव जाति के लिए भक्तिपूर्ण, सामाजिक, संस्कृति-प्रधान एवं मार्गदर्शक ग्रन्थ ‘रामचरितमानस’ की रचना की। प्रसिद्ध इतिहासकार ‘वेन्सेंट स्मिथ’ ने तुलसीदास को अपने युग का सर्वश्रेष्ठ पुरुष माना है और इन्हें अकबर से भी महान स्वीकार किया है।

क्योंकि तुलसीदास ने अपने द्वारा रचे गए साहित्य के द्वारा करोड़ों मानवों के हृदयों पर विजय प्राप्त की, उनके सामने सम्राट अकबर की विजयें नगण्य हैं। गोस्वामी तुलसीदास अपने समय के महान रामभक्त, महान कवि, महान संत एवं महान् चिंतक थे। उन्होंने अनेक ग्रन्थ लिखे जिन्होंने भारतीय जन-मानस को रामभक्ति की तरफ मोड़ा। उनके द्वारा लिखित ‘रामचरित मानस’ उनकी कीर्ति का सबसे ऊँचा स्तम्भ है।

संत तुलसीदास का साहित्य

तुलसीदास वैष्णव-भक्ति की रामभक्ति शाखा के महान् कवि थे। उन्होंने हिन्दी साहित्य में प्रचलित समस्त काव्य-शैलियों में रचना की। आचार्य रामचंद्र शुक्ल के अनुसार तुलसीदास ने बारह ग्रंथों की रचना की। कुछ विद्वान तुलसीदास के ग्रंथों की संख्या 25 मानते हैं।

इनमें से रामचरित मानस महाकाव्य है। शेष रचनाएं यथा- बरवै रामायण, पार्वती मंगल, जानकी मंगल, वैराग्य संदीपनी, रामाज्ञा प्रश्न, दोहावली, कवितावली, गीतावली, श्रीकृष्ण गीतावली, विनय पत्रिका, और रामलला नहछू आदि रचनाएँ खंड काव्य, मुक्तक काव्य, प्रबंधात्मक मुक्तक और लोकगीतात्मक मुक्तक काव्य के रूप में रचित हैं।

(1.) रामचरित मानस

रामचरित मानस एक प्रबन्ध काव्य है तथा न केवल हिन्दी साहित्य में अपितु सम्पूर्ण विश्व साहित्य में अत्यंत आदर की दृष्टि से देखा जाता है। विषय, उद्देश्य, भाव, भाषा, प्रबन्ध कौशल, छन्द, अलंकार योजना, शैली, कथा प्रवाह, नीति, धर्म एवं सामाजिक सरोकार आदि समस्त दृष्टियों से रामचरित मानस विश्व-साहित्य का अद्वितीय ग्रन्थ है।

इस काव्य में रामकथा का विस्तृत वर्णन है। रामचरित मानस में सात अध्याय हैं जिन्हें वाल्मीकि रामायण के अनुकरण में काण्ड कहा गया है। किसी ग्रंथ के प्रबंध काव्य होने की पहली शर्त यही होती है कि उसमें कम से कम सात अध्याय हों।

इस ग्रंथ में अयोध्या नरेश दशरथ के पुत्र श्रीराम को भगवान विष्णु के अवतार के रूप में तथा मिथिला के राजा जनक की पुत्री सीता को लक्ष्मी के अवतार के रूप में स्थापित किया गया है। रामचरित मानस की कथा के माध्यम से भगवान के दुष्ट-हंता, भक्त-वत्सल स्वरूप की अराधना की गई है।

रामकथा के प्रसंग भारतीय जनमानस में अत्यंत प्राचीन काल से प्रचलित थे। सबसे पहले महर्षि वाल्मीकि द्वारा दशरथ नंदन राम को मर्यादा पुरुषोत्तम मानकर स्वतंत्र प्रबंध काव्य लिखा गया। चैथी शताब्दी ईस्वी में राम को विष्णु का अवतार मानकर रामकथा को महाभारत का अंश बना दिया गया तथा नौवीं शताब्दी ईस्वी में दक्षिण भारत के आलवार संतों ने राम-भक्ति परम्परा को विकसित स्वरूप प्रदान किया। इस परम्परा को गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरित मानस में चरम पर पहुँचा दिया।

गोस्वामीजी ने रामचरित मानस के विभिन्न पात्रों के माध्यम से समाज के समक्ष उच्च-आदर्श उपस्थित किए हैं तथा वाल्मीकि द्वारा आरम्भ किए गए कार्य को नवीन ऊंचाइयां प्रदान कीं। राजा के रूप में दशरथ और जनक, गुरु के रूप में वसिष्ठ एवं विश्वामित्र, माता के रूप में कौशल्या और सुमित्रा, पुत्र के रूप में राम, लक्षमण, भरत और शत्रुघ्न, पत्नी के रूप में सीता, मित्र के रूप में सुग्रीव एवं विभीषण तथा सेवक के रूप में हनुमान एवं अंगद के चरित्रों को आदर्श के रूप में स्थापित किया गया है।

राजा दशरथ सत्यवादी धर्मनिष्ठ राजा हैं जो वचन देकर धर्म की और प्राण देकर पुत्र-प्रेम की रक्षा करते हैं। सीता आदर्श भारतीय नारी की प्रतिमूर्ति हैं जो कत्र्तव्य और पति के साथ वन जाने हेतु तर्क पूर्ण उत्तर द्वारा राम को भी निरूत्तर कर देती हैं- ‘जिय बिनु देहु, नदी बिनु वारि। तैसिय नाथ पुरुष बिनु नारी।’ तुलसी के लक्ष्मण चपल और उग्र स्वभाव के हैं किंतु भातृ-प्रेम के अनूठे आदर्श हैं।

भरत का चरित्र शीलता का चरमोत्कर्ष है। मानवीय चरित्र इससे ऊपर नहीं जा सकता। भरत का चरित्र इतना उज्ज्वल है कि प्रकृति भी उनके प्रति सहानुभूति रखती है- ‘जहँ जहँ जायँ भरत रघुराया, तहँ तहँ मेघ करहिं नवछाया।’

खर, दूषण, रावण, कुंभकर्ण एवं मेघनाथ जैसे राक्षसी चरित्र वाले अहंकारी पात्र हैं जो धर्म एवं नीति से च्युत हो गए हैं। ऐसे पात्रों का अंत राम के हाथों होता है जो असत्य पर सत्य की और बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक है।

समन्वय का अद्भुत ग्रंथ

रामचरित मानस समन्वय का अद्भुत ग्रंथ है। उन्होंने भारत में प्रचलित विभिन्न धार्मिक मतों एवं सम्प्रदायों में समन्वय स्थापित करके उन्हें एक ही केन्द्र-बिंदु ‘राम’ से जुड़ा हुआ बताया। दिल्ली सल्तनत (13वीं-16वीं शताब्दी ईस्वी) एवं मुगलों के शासन काल (16वीं-18वीं शताब्दी ईस्वी) में हिन्दू-धर्म के शैव, शाक्त एवं वैष्णव सम्प्रदायों के बीच कटुता का वातावरण था।

यहाँ तक कि सगुणोपासकों एवं निर्गुणोपासकों के बीच भी कटुता व्याप्त थी। सभी सम्प्रदायों के मतावलम्बी अपने-अपने मत को श्रेष्ठ बताकर दूसरे के मत को बिल्कुल ही नकारते थे। संत तुलसीदास ने राम चरित मानस के माध्यम से इस कटुता को समाप्त करने का सफल प्रयास किया।

इस ग्रंथ में तुलसी ने शैवों के आराध्य देव शिव तथा विष्णु के अवतार राम को एक दूसरे का स्वामी, सखा और सेवक घोषित किया। राम भक्त तुलसी ने ‘सेवक स्वामि सखा सिय-पिय के, हित निरुपधि सब बिधि तुलसी के’ कहकर शंकर की स्तुति की।

इतना ही नहीं तुलसी ने अपने स्वामी राम के मुख से- ‘औरउ एक गुपुत मत सबहि कहउं कर जोरि, संकर भजन बिना नर भगति न पावई मोर’ कहलवाकर राम-भक्तों को शिव की पूजा करने का मार्ग दिखाया एवं राम-पत्नी सीता के मुख से शिव-पत्नी गौरी की स्तुति करवाकर शाक्तों एवं वैष्णवों को निकट लाने में सफलता प्राप्त की- ‘जय जय गिरिबर राज किसोरी। जय महेस मुख चंद चकोरी।’

तुलसी ने ‘सगुनहि अगुनहि नहीं कछु भेदा, गावहिं मुनि पुरान बुध बेदा’ कहकर सगुणोपासकों एवं निर्गुणोपासकों के बीच की खाई को पाटने का प्रयास किया। तुलसी ने भक्तिमार्गियों एवं ज्ञानमार्गियों के बीच की दूरी समाप्त करते हुए कहा- ‘भगतहि ज्ञानही नहीं कछु भेदा, उभय हरहिं भव संभव खेदा।’

हजारी प्रसाद द्विवेदी के अनुसार- ‘तुलसी का सम्पूर्ण काव्य समन्वय की विरोट चेष्टा है।’ ग्रियर्सन के अनुसार- ‘भारत का लोकनायक वही हो सकता है जो समन्वय करना जानता हो’ तुलसी का मानस समन्वय की विराट चेष्टा है। उन्होंने द्वैत-अद्वैत, निर्गुण-सगुण, माया एवं जीव का भेद एवं अभेद, कर्म ज्ञान, भक्ति, ब्राह्मण, शूद्र, शैव, शाक्त, वैष्णव समाज संस्कृति के संगम के साथ-साथ भाव-पक्ष और कला-पक्ष का भी समन्वय किया है।

साहित्य की परिपक्व रचना

साहित्य की दृष्टि से भी रामचरित मानस एक परिपक्व रचना है। इसमें शास्त्रीय लक्षणों का भली-भांति निर्वाह हुआ है। इसकी भाषा सधी हुई है जिसमें भाषा की तीनों शक्तियों- अभिधा, लक्षणा एवं व्यंजना का भरपूर गुम्फन किया गया है। सम्पूर्ण ग्रंथ में छंदों एवं अलंकारों का शास्त्रीय विधान प्रयुक्त हुआ है तथा रसों का परिपाक प्रसंगानुकूल एवं पात्रानुकूल है।

इसमें शृंगार रस, वीर रस, भक्ति रस (शान्त रस) की प्रधानता है। पात्रों के चरित्र-चित्रण में भी तुलसी ने महान् कौशल प्रदर्शित किया है। सम्पूर्ण महाकाव्य दोहा और चैपाइयों में लिखा गया है। यह संगीतमय काव्य है, जिसके पद श्रोताओं को मन्त्र-मुग्ध कर देते हैं। समग्र रूप में यह भारतीय संस्कृति का आदर्श धार्मिक ग्रन्थ है।

मानस पर 500 से अधिक पीएच.डी. एवं डी.लिट्. डिग्रियां

महाकवि तुलसीदास पर विश्व में सबसे पहला शोधग्रंथ ‘रामचरित और रामायण’ इटली के विद्वान एल एल. पी. टेस्सीटोरी ने लिखा था। उन्होंने ई.1911 में फ्लोरेंस विश्वविद्यालय से इस ग्रंथ के लिए पीएचडी की उपाधि प्राप्त की।

संत तुलसीदास पर दूसरा शोध कार्य लंदन में ई.1918 में जे. एन. कापैनर ने किया। भारत में तुलसीदास पर पहली पीएचडी ई.1938 में नागपुर विश्वविद्यालय से बलदेव प्रसाद मिश्र ने की थी। ई.1949 में हरिशचन्द्र राय ने तुलसीदास पर लंदन से पीएचडी की तथा फादर कामिल बुल्के ने प्रयाग विश्वविद्यालय से डी.फिल. की डिग्री प्राप्त की।

तुलसीदास के साहित्य पर अब तक विश्वभर में पीएचडी और डीलिट की पांच सौ से अधिक डिग्रियां दी जा चुकी हैं। इतनी संख्या में हिन्दी में किसी लेखक पर शोधकार्य नहीं हुआ है।

सर्वाधिक शब्दों का प्रयोग

विश्व में सर्वाधिक शब्दों का प्रयोग संत तुलसीदास ने किया है। उन्होंने अपनी रचनाओं में 36 हजार से अधिक विभिन्न शब्दों का प्रयोग किया है जबकि शेक्सपियर ने लगभग 35 हजार शब्दों का प्रयोग किया है।

विश्व का सर्वश्रेष्ठ ग्रंथ

संत तुलसीदास पर लगभग 250 आलोचनात्मक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। रूस के विख्यात लेखक वरात्रिकोव ने विश्व की 2,796 भाषाओं के साहित्य में से रामचरित मानस को सर्वश्रेष्ठ महाकाव्य घोषित किया। उन्होंने ई.1938 से 1942 के बीच रामचरित मानस का रूसी भाषा में अनुवाद किया जब द्वितीय विश्व युद्ध चल रहा था।

(2.) विनय पत्रिका

ब्रज भाषा में लिखे हुए इस मुक्तक काव्य में अनेक राग-रागनियों में बंधे हुए विनय सम्बन्धी पद हैं। इसमें मुक्ति के आत्म-निवेदन का तथा आराध्य देव राम से उद्धार की कामना का मार्मिक चित्रण हुआ है। यह दास्य-भक्ति की उत्कृट कृति है। इसके गीतों में दैन्य-भाव तथा शान्त-रस की प्रधानता है। इसमें ज्ञान, भक्ति और वैराग्य सम्बन्धी विचारों का सुन्दर वर्णन है तथा इसके गीत संवेदनापूर्ण तथा संगीत प्रधान हैं। इसकी भाषा संस्कृतनिष्ठ है तथा उसमें अल्प मात्रा में फारसी-अरबी शब्दों का मिश्रण है।

(3.) कवितावली

यह खण्ड-काव्य है, जिसमें गोस्वामीजी ने अपने इष्ट-देव राम का स्तुतिगान किया है। इसमें वात्सल्य, शृंगार, वीभत्स तथा भयानक रसों का परिपाक है। इसमें केवट प्रसंग, लंका दहन तथा हनुमानजी के युद्ध का बड़ा सजीव चित्रण है। इसमें एक क्रम और योजना का पालन किया गया है।

(4.) गीतावली

यह भी संत तुलसीदास का एक सुन्दर गीति-काव्य है, जिसमें ब्रज भाषा के गीतों में रामचरित का सुन्दर वर्णन किया गया है। यह सरल तथा लीला-प्रधान रचना है जिसमें वात्सल्य रस का सजीव एवं हृदयग्राही वर्णन है।

(5.) दोहावली

इसमें दोहों के रूप में राम-भक्ति का वर्णन है। इसमें 573 दोहों का संकलन है। ये दोहे जनमानस में उक्तियों के रूप में प्रयुक्त किए जाते हैं।

(6.) रामाज्ञाप्रश्न

यह ज्योतिष शास्त्रीय ग्रंथ है। इस ग्रन्थ में सात सर्ग हैं तथा राम कथा का दोहों में वर्णन किया गया है जिसमें प्रश्न और उत्तर समाहित हैं। दोहों, सप्तकों और सर्गों में विभक्त यह ग्रंथ रामकथा के विविध मंगल एवं अमंगलमय प्रसंगों की मिश्रित रचना है। इसमें कथा-शृंखला का अभाव है तथा अनेक दोहों में वाल्मीकी रामायण के प्रसंगों का अनुवाद है।

(7.) बरवै रामायण

इस लघु ग्रंथ में बरवै छन्द के अंतर्गत बांधकर रामकथा से सम्बन्धित घटनाओं का वर्णन किया गया है।

(8.) रामललानहछू

यह संस्कार-गीत है। इसमें कतिपय उल्लेख राम-विवाह कथा से भिन्न हैं। इसे पूर्वी-अवधी भाषा के छंदों में लिखा गया है।

(9.) कृष्ण गीतावली

इसमें ब्रज भाषा में कृष्ण चरित्र का स्फुट पदों में वर्णन किया गया है।

(10.) वैराग्य संदीपनी

इसमें वैरागय सम्बन्धी छन्द हैं, जिनमें धर्म और ज्ञान के साधारण सिद्धन्तों का विवेचन है।

(11.) पार्वती मंगल

इस लघु-ग्रंथ में शिव-पार्वती विवाह का वर्णन है।

(12.) जानकी मंगल

यह भी लघु-ग्रंथ है। इसमें ब्रज भाषा में राम और सीता के विवाह का वर्णन किया गया है।

(13.) हनुमानबाहुक

इस लघु रचना में हनुमानजी को सम्बोधित करके उनके प्रति भक्ति भाव से पूर्ण प्रार्थनाएं लिखी गई हैं। यह एक प्रौढ़ रचना है जिसमें भाषा और भाव नवीन ठाठ के साथ उपस्थित हुए हैं।

महान् लोकनायक संत तुलसीदास

गोस्वामी तुलसीदास अपने समय के सर्वश्रेष्ठ कवि, संत, रामभक्त एवं विचारक ही नहीं थे अपितु वे महान लोकनायक भी थे। महाकवि अपने युग का ज्ञापक एवं निर्माता होता है। तुलसी ने मध्य-कालीन भारत में हिन्दू जाति में व्याप्त निराशा को अनुभव किया तथा अपनी रचनाओं के माध्यम से समाज में भक्ति एवं विनय के साथ-साथ शौर्य, साहस एवं स्वातंत्र्य भाव का संचरण किया। 

भक्ति-काल के निर्गुणोपासक सन्त, धर्म और समाज में प्रचलित परम्पराओं की निन्दा कर सामाजिक और धार्मिक मर्यादाओं पर भी प्रहार कर रहे थे जिनके प्रभाव से लोगों का मूर्ति-पूजा तथा पौराणिक धर्म से विश्वास उठने लगा था। ऐसे समय में गोस्वामी तुलसीदास ने सगुण भक्ति का मार्ग खोला तथा राम के रूप में समाज को ऐसा महानायक प्रदान किया जो शक्ति, शील एवं सौंदर्य की प्रतिमूर्ति था।

 वह सर्वशक्तिमान, दयालु, दुष्टहंता, भक्त-वत्सल तथा मोक्ष प्रदान करने में समर्थ था। उन्होंने रामचरित मानस के पात्रों के माध्यम से प्रजा में आदर्श समाज की रचना का संदेश दिया। उन्होंने जनभाषा में रामचरित मानस की रचना करके उसे सर्वजन के लिए सुलभ बनाया। उन्होंने समाज को आचरणगत दूषण त्यागकर दीनता और हीनता से स्वतः मुक्त होने का संदेश दिया। उन्होंने श्रीराम को गौ, ब्राह्मण, धरती, स्त्री, दीन-दुःखी एवं शरणागत का रक्षक बताकर वस्तुतः मानवता आधारित सम्पूर्ण हिन्दू-संस्कृति का रक्षक बताया।

महात्मा बुद्ध एवं शंकाराचार्य के बाद भारत में यदि कोई सबसे बड़े लोकनायक हुए तो वह गोस्वामी तुलसीदास ही थे जिनका शिक्षित एवं अशिक्षित, धनी एवं निर्धन, राजा एवं प्रजा आदि सम्पूर्ण समाज पर व्यापक रूप से प्रभाव पड़ा। उनकी रामचरित मानस घर-घर गाई जाने लगी। उसके सामूहिक गायन के विशाल आयोजन होने लगे।

रामचरित मानस को आधार बनाकर नगर-नगर एवं गांव-गांव में रामलीलाएं खेली जाने लगीं। लोग संकट के समय, अपनी सत्यता प्रमाणित करते समय एवं एक-दूसरे को धैर्य बंधाते समय रामचरित मानस की चैपाइयां बोलकर सुनाने लगे। समाज में ऐसी व्यापक क्रांति कोई महानायक ही कर सकता था और तुलसीदास ने उसमें सफलता प्राप्त की।

संस्कृति के रक्षक एवं समाज सुधारक संत तुलसीदास

गोस्वामी तुलसीदास भारतीय संस्कृति के रक्षक, पोषक एवं उन्नायक थे। उनका स्वयं का व्यक्तित्त्व हिन्दू-धर्म और संस्कृति का प्रतिनिधि व्यक्तित्व था। वे त्याग, तपस्या एवं साधना की प्रतिमूर्ति थे। उन्हें हिन्दू शास्त्रों का अद्भुत ज्ञान था। उन्होंने जो कुछ लिखा वही धर्म, संस्कृति एवं परम्परा बन गया। उन्होंने हिन्दू-धर्म में प्रचलित आडम्बर तथा पाखण्डों का रामचरित मानस के माध्यम से खण्डन करके वास्तविक धर्म की प्रतिष्ठा की।

उन्होंने दया, करुणा, परोपकार, अहिंसा आदि नैतिक गुणों को निजी जीवन और सार्वजनिक आचरण का आधार बताया तथा अभिमान, पर-पीड़ा, हिंसा आदि दुर्गणों को पाप तथा नर्क की तरफ ले जाने वाला घोषित किया। तुलसीदास अपने समय के महान् समाज सुधारक भी थे। उन्होंने लोगों से पाखण्ड पूर्ण आचरण, दम्भ, कपट, हिंसा एवं अनाचार त्यागकर सद्व्यवहार एवं सादगी पर आधारित जीवन जीने का मंत्र दिया। उन्होंने कलियुग में होने वाले कदाचारों का विशद वर्णन करके लोगों को उनसे दूर रहने के लिए कहा।

कुछ लोग तुलसीदास पर नारी-विरोधी मानसिकता रखने का आरोप लगाते हैं किंतु वे गलत हैं। माता कौशल्या, सीता, मन्दोदरी और तारा के उज्जवल चरित्रों की प्रशंसा करके उन्होंने यह स्पष्ट कर दिया है कि वे समाज में किस तरह की नारी चाहते हैं। वे उच्छृंखलता और कदाचार के विरोधी हैं न कि नारी जाति के।

‘ढोल-गंवार शूद्र पशु नारी’ वाला संवाद समुद्र के मुंह से कहलवाया गया है और यह तत्कालीन समाज में नारी के प्रति प्रचलित धारणा को व्यक्त करता है, यह संवाद राम अथवा किसी ऐसे पात्र ने नहीं कहा है जिससे यह कहा जा सके कि तुलसीदास नारी की प्रताड़ना करके उसे नियंत्रण में रखना चाहते थे। न ही यह बात गोस्वामीजी ने अपनी ओर से कही है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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मीराबाई

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मीराबाई

मध्यकालीन राजस्थान में सगुण-भक्ति-रस की धारा प्रवाहित करने वाले संत-कवियों में सन्त शिरोमणि मीराबाई का नाम सर्वोपरि है

मीराबाई के जन्मकाल की घटनाएं तो मिलती हैं किंतु जन्म-मृत्यु के सम्बन्ध में निश्चित तिथियाँ नहीं मिलती हैं। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने मीरा का जन्म वि.सं. 1573 (ई.1516) में माना है जबकि गौरीशंकर हीराचंद ओझा, हरविलास शारदा तथा गोपीनाथ शर्मा आदि इतिहासकारों ने मीराबाई का जन्म वि.सं. 1555 (ई.1498) में माना है। मीरा के कुछ पदों के आधार पर अनुमान लगाया जाता है कि वह कबीर, तुलसीदास, रैदास और अकबर की समकालीन थीं किन्तु कबीर के जन्म और अकबर की मृत्यु के बीच 200 वर्षों से भी अधिक समय का अंतराल होने से यह सत्य प्रतीत नहीं होता।

मीरां के जन्म के सम्बन्ध में ओझा आदि विद्वानों का मत अधिक सही प्रतीत होता है अतः मीराबाई का जन्म कबीर के निधन के बाद और अकबर के बादशाह बनने से पहले हुआ।

मीराबाई का प्रारम्भिक जीवन

मीराबाई मेड़ता के राव दूदा के द्वितीय पुत्र राठौड़ रतनसिंह की इकलौती पुत्री थी। मीरा का जन्म मेड़ता से लगभग 21 मील दूर कुड़की गांव में हुआ। मीरा की अल्पायु में ही उनकी माँ का निधन हो गया। मीराबाई के दादा राव दूदा तथा उनका परिवार भगवान श्रीकृष्ण के भक्त थे। राव दूदा ने पण्डित गजाधर को मीरा का शिक्षक नियुक्त किया जो पूजा-पाठ के साथ-साथ मीरा को पुराणों की कथाएं एवं स्मृतियां आदि सुनाया करते थे।

इस प्रकार मीरा में कृष्ण के प्रति भक्ति-भावना का बीजारोपण बाल्यकाल में ही हो गया था। मान्यता है कि किसी साधु ने मीरा को उसके बाल्यकाल में भगवान मुरलीधर की मूर्ति दी थी। मीरा उन्हें अपना पति मानने लगीं। राव दूदा की मृत्यु के बाद मीरा के ताऊ वीरमदेव मेड़ता के शासक हुए। ई.1516 में मीरा का विवाह मेवाड़ के महाराणा सांगा के ज्येष्ठ पुत्र भोजराज के साथ हुआ।

विवाह के बाद मीरा भगवान मुरलीधर की मूर्ति को तथा पण्डित गजाधर को चित्तौड़ ले गयी। मीरा ने चित्तौड़ दुर्ग में मुरलीधरजी का मन्दिर बनवाया तथा उनकी सेवा का दायित्व पण्डित गजाधर को सौंप दिया। इस सेवा के बदले गजाधर को मांडल एवं पुर में 2,000 बीघा जमीन प्रदान की गई जो अब भी उनके वंशजों के पास है।

 विवाह के 7 वर्ष बाद मीरा के पति भोजराज एक युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए। मीराबाई सांसारिक सुखों से विरक्त होकर सत्संग और भजन-कीर्तन करने लगीं। ई.1528 में मीरा के श्वसुर महाराणा सांगा भी खानवा की लड़ाई में घायल होकर वीरगति को प्राप्त हुए। उनके बाद महाराणा रत्नसिंह और उसके बाद महाराणा विक्रमादित्य मेवाड़ के शासक बने। उन दोनों को यह पसंद नहीं था कि मीरा साधुओं के बीच उठे-बैठे। उन्होंने मीरां का अपमान किया तथा उसे मारने का भी प्रयत्न किया। इस पर मीराबाई चित्तौड़ छोड़कर अपने पीहर मेड़ता लौट गई।

कुछ समय बाद जोधपुर के राव मालदेव ने मीरा के ताऊ वीरमदेव का मेड़ता राज्य छीन लिया। अतः मीरा वृन्दावन चली गईं। महाराणा विक्रमादित्य द्वारा यहाँ भी तंग किए जाने पर मीराबाई वृन्दावन छोड़़कर द्वारिका चली गईं। कुछ समय बाद मीरा के ताऊ के पुत्र जयमल राठौड़ ने मेड़ता पुनः अधिकृत कर लिया और मीरा को द्वारिका से मेड़ता बुलाया किंतु मीरा ने द्वारिका छोड़़ने से मना कर दिया। इस पर जयमल ने कुछ पुरोहितों को द्वारिका भेजा। वे मीरा के द्वार पर बैठ कर उपवास करने लगे।

तब मीराबराई मन्दिर में गयी और एक भजन गाया जिसका अर्थ था कि हे प्रभु! मैं तुम्हारे इस धाम को नहीं त्यागना चाहती, यह मेरा प्रण है किंतु यदि ये ब्राह्मण भूख से मृत्यु को प्राप्त हुए तो मुझे ब्रह्महत्या का दोष लगेगा। अतः आप ऐसा उपाय करें जिससे मेरा प्रण और ब्राह्मणों के प्राण दोनों की रक्षा हो जाए। इस भजन के गाते हुए मीरा के प्राण-पँखेरू उड़ गए और वह द्वारिकाधीश की प्रतिमा में विलीन हो गई।

मीरा की भक्ति भावना

मीरा की रचनाओं में उनकी आध्यात्मिक यात्रा के तीन पड़ाव दिखाई देते हैं। प्रारम्भ में उनकी आत्मा भगवान श्रीकृष्ण के लिए लालायित रहती है और वे प्रेमविरह में व्याकुल होकर कहती हैं- ‘मैं विरहणी बैठी जागूँ, जग सोवे री आली’ ….. ‘दरस बिन दूखण लागे नैण।’ भक्ति के दूसरे पड़ाव में उन्हें श्री कृष्ण की उपलब्धि हो जाती है वह कहती हैं- ‘पायोजी मैंने रामरतन धन पायो’ ……. ‘साजन म्हारे घरि आया हो, जुगा-जुगा री जोवता, विरहणी पिव पाया हो।’

मीरा की भक्ति का तीसरा और अन्तिम पड़ाव है जब उन्हें भक्ति एवं ईश-प्राप्ति के फलस्वरूप उत्पन्न चरम-आनंद की प्राप्ति होती है- ‘अंसुवन जल सींच-सींच प्रेम बेल बोई, अब तो बेल फैल गई आनन्द फल होई।’

भारतीय अध्यात्म में चार प्रकार के मोक्ष माने गए हैं- सायुज्य, सारूप्य, सालोक्य और सामीप्य। सायुज्य मोक्ष में भक्त अपने ईश्वर के साथ एकाकार हो जाता है। सारूप्य मोक्ष में भक्त, ईश्वर के समान रूप धारण कर लेता है, सालोक्य मोक्ष में भक्त अपने ईश्वर के लोक में जाकर स्थित हो जाता है।

सामीप्य मोक्ष में भक्त अपने ईश्वर के समीप स्थित होता है। मीरां को सगुण भक्ति के कारण तथा सगुण भक्ति में भी दाम्पत्य भाव की भक्ति के कारण सायुज्य मोक्ष की प्राप्ति होती है जिसमें वे ईश्वर से एकाकार हो जाती हैं। इस अनुभूति को मीरा ने इस प्रकार व्यक्त किया है- ‘मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरा न कोई।’

जनसाधारण में मीराबाई के पद भक्ति-भाव से गाए जाते हैं।  मीराबाई भले ही राजस्थान की भक्त-कवयित्री थीं किंतु उनके पदों का गायन पूरे देश में होता है। विभिन्न स्थानों का प्रभाव हो जाने के कारण इन पदों के स्वरूप एवं भाषा में अंतर मिलता है। कर्नल टॉड तथा स्ट्रैटन ने मीराबाई के जीवन पर प्रकाश डाला। नैणसी ने भी मीराबाई का उल्लेख इन शब्दों में किया है- ‘भोजराज सांगावत इणनु कहै छै, मीरांबाई राठौड़ परणाई हुती।’ मुंशी देवी प्रसाद मुंसिफ ने ‘मीराबाई का जीवन और उनका काव्य’ नामक पुस्तक लिखी। महादेवी वर्मा के अनुसार, ‘मीरा के पद विश्व के भक्ति साहित्य के रत्न हैं।’

मीराबाई की रचनाएं

मीराबाई ने अपने फुटकर पद लिखे हैं तथा उनकी भाषा राजस्थानी मिश्रित खड़ी बोली है। कुछ पद विशुद्ध ब्रजभाषा में और कुछ पद गुजराती भाषा भी मिलते हैं। उनके पदों में हिंदी एवं राजस्थानी के साथ-साथ डिंगल, पिंगल, ब्रज, संस्कृत, सधुक्कड़ी भाषाओं के भी दर्शन होते हैं। मीरा के विरह गीतों में समकालीन कवियों की अपेक्षा अधिक स्वाभाविकता एवं मौलिकता पाई जाती है।

इनके लिखें पदों में शांत रस एवं शृंगार रस का प्रयोग अधिक हुआ है। माना जाता है कि मीराबाई ने चार ग्रंथों की रचना की- (1.) बरसी का मायरा, (2.) गीत गोविंद टीका, (3.) राग गोविंद, (4.) राग सोरठ के पद। मीराबाई के लिखे पदों का संकलन ‘मीराबाई की पदावली’ नामक ग्रन्थ में भी किया गया है।

हृदय की गहरी पीड़ा, विरहानुभूति और प्रेम की तन्मयता से भरे हुए मीराबाई के पद हिन्दी साहित्य की अनमोल धरोहर हैं। समर्पण की तीव्र अनुभूति, विरह की घनीभूत वेदना एवं मिलन की प्रसन्नता से निकल पड़ने वाले आँसुओं से सिंचित मीरा के पद गीतिकाव्य के उत्तम नमूने हैं। भावों की सुकुमारता, आडम्बरहीनता और भाषा के सहज प्रवाह के कारण इन्हें लोक में विशेष प्रसिद्धि मिली।

मीरा के पदों में माधुर्य-भक्ति के साथ प्रेम की गहन पीड़ा, विरह की आंतरिक अनुभूति और आध्यात्मिक उदात्तता व्यक्त हुई है जो हिन्दी-साहित्य की अप्रतिम थाती है। सामंती परिवेश की वर्जनाओं को तोड़कर कृष्ण-भक्ति में रंगी-पगी मीरा के पदों में सीधी-सरल एवं हृदय-ग्राही भाषा का प्रयोग हुआ है जो मार्मिक विरह-अभिव्यक्ति एवं अलंकारों के सहज-स्वाभाविक प्रयोग के कारण अनूठा बन पड़ा है।

मीराबाई को संगीत का अच्छा ज्ञान था, इस कारण उनका काव्य विभिन्न राग-रागनियों पर आधारित है। अतः शास्त्रीय गायन में भी मीरा के पदों का उपयोग किया जाता है।

मीरादासी सम्प्रदाय

मीरांबाई ने किसी संप्रदाय की स्थापना नहीं की फिर भी मीराबाई के भक्ति मार्ग पर चलने वाले भक्त अपने आप को मीरादासी संप्रदाय से जोड़ते हैं। इस संप्रदाय के लोगों की संख्या बहुत कम है। इस संप्रदाय के लोग मीरांबाई की तरह तन्मय होकर हरि-कीर्तन एवं नृत्य करते हैं।

एनसाइक्लोपीडिया ऑफ रिलीजन एण्ड एथिक्स के अनुसार मीरादासी सम्प्रदाय की भक्त-नारियों में कृष्ण के बाल-स्वरूप की अराधना पद्धति प्रचलित है। एच. एच. विल्सन ने भी इस सम्प्रदाय का उल्लेख किया है। माना जाता है कि मीराबाई ने राजस्थान में अनेक राजकुमारों और राजकुमारियों को भक्ति के मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी।

इनमें ईडर के अखैराज, बीकानेर के पृथ्वीराज, जयपुर के जयसिंह और प्रतापसिंह, किशनगढ़ के सावन्तसिंह (नागरीदास), पृथ्वीराज की पत्नी रानावतजी, सावंतसिंह की प्रेयसी रसिक बिहारी (बनी-ठनी) एवं उसकी बहिन सुन्दर कंवरी, मारवाड़ की किसनी आदि प्रमुख हैं। मीरा की दाम्पत्य भाव की भक्ति का विधवा स्त्रियों पर विशेष प्रभाव पड़ा जो मीरा की तरह श्रीकृष्ण को अपना पति मानने लगती थीं। मीरादासी सम्प्रदाय की भक्त-नारियां मीराबाई जैसे ही वस्त्र धारण करती थीं।

वर्तमान समय में मीराबाई की प्रसिद्धि

आज मीराबाई की ख्याति पूरे विश्व में है। राव दूदा की राजधानी मेड़ता में भगवान कृष्ण का मध्य-कालीन मंदिर है जिसमें मीराबाई की मनुष्याकार प्रतिमा लगी हुई है। चित्तौड़ दुर्ग में भी मीराबाई का मंदिर है जिस पर भारत सरकार के डाक विभाग ने विशेष आवरण जारी किया। मीराबाई को लेकर कई फीचर-फिल्मों का भी निर्माण हुआ। राजस्थान साहित्य अकादमी का सर्वोच्च साहित्य पुरस्कार मीरा पुरस्कार के नाम से जाना जाता है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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मीराबाई

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रवीन्द्र नाथ टैगोर

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रवीन्द्र नाथ टैगोर

रवीन्द्र नाथ टैगोर का प्रारम्भिक जीवन

रवीन्द्र नाथ टैगोर का जन्म 7 मई 1861 को कलकत्ता में हुआ। उनके पिता देवेन्द्रनाथ टैगोर ने केशवचंद्र सेन से मतभेद हो जाने के कारण ब्रह्मसमाज से अलग होकर आदि-ब्रह्मसमाज की स्थापना की थी। रवीन्द्रनाथ की माता का नाम शारदा देवी था। रवीन्द्र नाथ टैगोर की प्रारंभिक शिक्षा कोलकाता के सेंट जेवियर स्कूल में हुई।

देवेन्द्र नाथ अपने पुत्र रवीन्द्र नाथ को बैरिस्टर बनाना चाहते थे किंतु रवीन्द्र नाथ की रुचि साहित्य पढ़ने-लिखने में अधिक थी। रवीन्द्र नाथ के पिता ने ई.1878 में उनका लंदन विश्वविद्यालय में प्रवेश कराया परन्तु ई.1880 में वे बिना डिग्री लिये ही वापस आ गए। ई.1883 में रवीन्द्र नाथ टैगोर का विवाह मृणालिनी देवी से हुआ।

सार्वजनिक जीवन

रवीन्द्र नाथ टैगोर बीसवीं सदी के प्रारम्भिक भारत में प्रसिद्ध साहित्यकार, चित्रकार, संगीतज्ञ एवं समाजसेवी के रूप में जाने गए। उन्हें बंगाली एवं अंग्रेजी भाषा के साहित्यकार के रूप में अधिक प्रसिद्धि मिली। उनकी प्रमुख रचना गीतांजलि को ई.1913 में नोबोल पुरुस्कार मिला। ई.1901 में रवीन्द्र नाथ टैगोर ने शांति निकेतन की स्थापना की जिसके कारण वे गुरुदेव के नाम से प्रसिद्ध हुए।

वे चाहते थे कि प्रत्येक विद्यार्थी प्रकृति के निकट रहकर पढ़े, इसलिये शान्ति निकेतन में बड़ी संख्या में वृक्ष लगाए गए। उन्होंने शांति निकेतन में एक पुस्तकालय की भी स्थापना की। शान्ति निकेतन को विश्वविद्यालय के रूप में मान्यता दी गई। वे अपने जीवन में तीन बार अल्बर्ट आइंस्टीन से मिले जो रवीन्द्र नाथ टैगोर को ‘रब्बी टैगोर’ कहते थे। 7 अगस्त 1941 को रवीन्द्र नाथ टैगोर का निधन हुआ।

रवीन्द्र नाथ टैगोर की प्रमुख रचनाएं

रवीन्द्र नाथ टैगोर ने अपनी पहली कविता केवल आठ वर्ष की आयु में लिखी। ई.1877 में सोलह वर्ष की आयु में उन्होंने प्रथम लघुकथा लिखी। रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने बड़ी संख्या में कविता, गीत, उपन्यास, कहानियाँ, निबन्ध तथा नाटक लिखे। उन्होंने 2,230 गीतों एवं कविताओं की रचना की। रवीन्द्र नाथ टैगोर के लिखे गीतों में से ‘जन मन गण’ को भारत के तथा ‘आमार सोनार बांग्ला’ को बांग्लादेश के राष्ट्रगान के रूप में मान्यता मिली।

टैगोर ने बांग्ला साहित्य में नए गद्य और छंद तथा लोकभाषा के उपयोग की शुरुआत की और इस प्रकार शास्त्रीय संस्कृत पर आधारित पारंपरिक प्रारूपों से उसे मुक्ति दिलाई। भारत में रवीन्द्र नाथ टैगोर ने 1880 के दशक में कविताओं की अनेक पुस्तकें प्रकाशित कीं तथा ई.1890 में ‘मानसी’ की रचना की। यह संग्रह उनकी प्रतिभा की परिपक्वता का परिचायक है।

इसमें उनकी कुछ सर्वश्रेष्ठ कविताएँ शामिल हैं, जिनमें से कई बांग्ला भाषा में अपरिचित नई पद्य शैलियों में हैं। साथ ही समसामयिक बंगालियों पर कुछ सामाजिक और राजनीतिक व्यंग्य भी हैं। वे वैश्विक समानता और एकांतिकता के पक्षधर थे। उनकी अधिकतर रचनाएँ बांग्ला भाषा में लिखी हुई हैं। वह एक ऐसे लोक कवि थे जिनका केन्द्रीय तत्त्व अंतिम आदमी की भावनाओं का परिष्कार करना था।

वह मनुष्य मात्र के स्पन्दन के कवि थे। एक ऐसे रचनाकार जिनकी रचनाओं में शाश्वत प्रेम की गहरी अनुभूति है, एक ऐसा नाटककार जिसके रंगमंच पर सिर्फ़ ट्रेजडी ही ज़िंदा नहीं है, जीवन जीने की गहरी जिजीविषा भी है। एक ऐसा कथाकार जो अपने आस-पास से कथालोक चुनता है, बुनता है, सिर्फ़ इसलिए नहीं कि घनीभूत पीड़ा की आवृत्ति करे या उसे ही अनावृत्त करे, बल्कि उस कथालोक में वह आदमी के अंतिम गंतव्य की तलाश भी करता है।

सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ

रवीन्द्र नाथ टैगोर सियालदह और शजादपुर में स्थित पैतृक जमींदारी के प्रबंधन के लिए 10 वर्ष तक पूर्वी बंगाल (वर्तमान बांगला देश) में रहे, वहाँ वह पद्मा नदी (गंगा नदी) पर एक हाउस बोट में ग्रामीणों के निकट संपर्क में रहते थे और उन ग्रामीणों की निर्धनता एवं पिछड़ेपन के प्रति संवेदनाएं ही टैगोर की रचनाओं का मूल स्वर बनीं।

उनकी सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ, जिनमें दीन-हीनों का जीवन और उनके छोटे-मोटे दुःख वर्णित हैं, ई.1890 के बाद की हैं और उनकी मार्मिकता में हल्का सा विडंबना का पुट है जो टैगोर की निजी विशेषता है तथा जिसे बाद में फिल्म-निर्देशक सत्यजित राय ने अपनी फ़िल्मों में दर्शाया।

उनकी समस्त चैरासी कहानियाँ ‘गल्पगुच्छ’ की तीन जिल्दों में संग्रहीत हैं। ई.1891 से 1895 के बीच के पाँच वर्षों का समय रवीन्द्रनाथ की साधना का महान् काल था। वे अपनी कहानियाँ सबुज पत्र (हरे पत्ते) में छपवाते थे। आज भी पाठकों को उनकी कहानियों में हरे पत्ते और हरे गाछ मिल सकते हैं। उनकी कहानियों में सूर्य, वर्षा, नदियाँ और नदी किनारे के सरकंडे, वर्षा ऋतु का आकाश, छायादार गाँव, वर्षा से भरे अनाज के प्रसन्न खेत मिलते हैं।

उनकी कहानियों के साधारण पात्र कहानी सम्पूर्ण होते-होते असाधारण मनुष्यों में बदल जाते हैं तथा महानता की पराकाष्ठा छू लेते हैं। उनकी मूक पीड़ा की करुणा पाठक के हृदय को अभिभूत कर लेती है। उनकी कहानी पोस्टमास्टर इस बात का सजीव उदाहरण है कि एक सच्चा कलाकार साधारण उपकरणों से कैसी अद्भुत सृष्टि कर सकता है। कहानी में केवल दो सजीव साधारण-से पात्र हैं।

बहुत कम घटनाओं से भी वे अपनी कहानी का महल खड़ा कर देते हैं। एक छोटी लड़की कैसे बड़े-बड़े इंसानों को अपने स्नेह-पाश में बाँध देती हैं। क़ाबुलीवाला भी इस बात का जीता-जागता उदाहरण है। रवीन्द्रनाथ ने पहली बार अपनी कहानियों में साधारण की महिमा का बखान किया।

रवीन्द्रनाथ की कहानियों में अनपढ़ क़ाबुलीवाला और सुसंस्कृत बंगाली भूत भावनाओं में एक समान हैं। उनकी क़ाबुलीवाला, मास्टर साहब, पोस्टमास्टर आदि कहानियाँ आज भी लोकप्रिय हैं और सर्वश्रेष्ठ भी। पात्रों के साथ रवीन्द्रनाथ की अद्भुत सहानुभूतिपूर्ण एकात्मकता और उसके चित्रण का अतीव सौंदर्य उनकी कहानी को सर्वश्रेष्ठ बना देते हैं जिसे पढ़कर द्रवित हुए बिना नहीं रहा जा सकता।

उनकी कहानियाँ कठोर एवं शुष्क हृदय व्यक्ति को मोम जैसा कोमल बनाने की क्षमता रखती हैं। अतिथि का तारापद रवीन्द्रनाथ की अविस्मरणीय रचनाओं में है। इसका नायक कहीं बँधकर नहीं रह पाता। आजीवन अतिथि ही रहता है। क्षुधित पाषाण, आधी रात में (निशीथे) तथा मास्टर साहब कहानियों में दैवीय तत्त्व का स्पर्श है। क्षुधित पाषाण में रचनाकार की कल्पना अपने सुंदरतम रूप में व्यक्त हुई है।

यहाँ अतीत वर्तमान के साथ वार्तालाप करता है- रंगीन प्रभामय अतीत के साथ नीरस वर्तमान। समाज में महिलाओं का स्थान तथा नारी जीवन की विशेषताएँ उनके लिए गंभीर चिंता के विषय थे और इस विषय में भी उन्होंने गहरी अंतर्दृष्टि का परिचय दिया है।

गीतांजलि का अंग्रेज़ी अनुवाद प्रकाशित होने के एक सप्ताह के भीतर लंदन से प्रकाशित होने वाले प्रसिद्ध साप्ताहिक टाइम्स लिटरेरी सप्लीमेंट में उसकी समीक्षा प्रकाशित हुई थी और बाद में आगामी तीन माह के अंदर तीन समाचार पत्रों में भी उसकी समीक्षा प्रकाशित हुई। रवीन्द्रनाथ ठाकुर को नोबेल पुरस्कार मिलने के सम्बन्ध में ब्रिटिश समाचार पत्रों में मिश्रित प्रतिक्रिया हुई।

द टाइम्स ने लिखा- ‘स्वीडिश एकेडेमी के इस अप्रत्याशित निर्णय पर कुछ समाचार पत्रों में आश्चर्य व्यक्त किया गया है।’ किंतु इसी पत्र के स्टाकहोम स्थित संवाददाता ने अपने डिस्पेच में लिखा- ‘स्वीडन के प्रमुख कवियों और लेखकों ने स्वीडिश कमेटी के सदस्यों की हैसियत से नोबेल कमेटी के इस निर्णय पर पूर्ण संतोष व्यक्त किया है।’

ब्रिटेन के प्रतिष्ठित समाचार पत्र मेन्चेस्टर गार्डियन ने लिखा- ‘रवीन्द्रनाथ टैगोर को नोबेल पुरस्कार मिलने की सूचना पर कुछ लोगों को आश्चर्य अवश्य हुआ पर असंतोष नहीं। टैगोर एक प्रतिभाशाली कवि हैं।’

बाद में द केरसेण्ट मून नामक समाचार पत्र ने लिखा- ‘इस बंगाली (यानी रवीन्द्रनाथ ठाकुर) का अंग्रेज़ी भाषा पर जैसा अधिकार है वैसा बहुत कम अंग्रेज़ों का होता है।’

टैगोर की कविताओं की पांडुलिपि को सबसे पहले विलियम रोथेनस्टाइन ने पढ़ा था और वे इतने मुग्ध हुए कि उन्होंने अंग्रेज़ी कवि यीट्स से संपर्क किया और पश्चिमी जगत् के लेखकों, कवियों, चित्रकारों और चिंतकों से टैगोर का परिचय कराया। उन्होंने ही इंडिया सोसायटी से इसके प्रकाशन की व्यवस्था की। शुरू में 750 प्रतियाँ छापी गईं, जिनमें से सिर्फ़ 250 प्रतियाँ ही बिक्री के लिए थीं।

बाद में मार्च 1913 में मेकमिलन एंड कंपनी लंदन ने इसे प्रकाशित किया और 13 नवंबर 1913 को नोबेल पुरस्कार की घोषणा से पहले इसके दस संस्करण छापने पड़े। यीट्स ने टैगोर के अंग्रेज़ी अनुवादों का चयन करके उनमें कुछ सुधार किए और अंतिम स्वीकृति के लिए उन्हें टैगोर के पास भेजा और लिखा- ‘हम इन कविताओं में निहित अजनबीपन से उतने प्रभावित नहीं हुए, जितना कि यह देखकर कि इनमें तो हमारी ही छवि नज़र आ रही है।’

बाद में यीट्स ने ही अंग्रेज़ी अनुवाद की भूमिका लिखी। उन्होंने लिखा कि कई दिनों तक इन कविताओं का अनुवाद लिए मैं रेलों, बसों और रेस्तराओं में घूमा हूँ और मुझे बार-बार इन कविताओं को इस डर से पढ़ना बंद करना पड़ा है कि कहीं कोई मुझे रोते-सिसकते हुए न देख ले। अपनी भूमिका में यीट्स ने लिखा कि हम लोग लंबी-लंबी किताबें लिखते हैं जिनमें शायद एक भी पन्ना लिखने का ऐसा आनंद नहीं देता है।

बाद में गीतांजलि का जर्मन, फ्रैंच, जापानी, रूसी आदि विश्व की सभी प्रमुख भाषाओं में अनुवाद हुआ और टैगोर की ख्याति विश्व भर में फैल गई। गीतांजलि के लिए उन्हें ई1913 में साहित्य के लिए नोबेल पुरस्कार प्रदान किया गया।

राष्ट्रवाद से ऊपर मानवता

रवीन्द्र नाथ टैगोर मानवता को राष्ट्रीयता से ऊपर रखते थे। टैगोर मानते थे कि देशभक्ति चार-दिवारी से बाहर विचारों से जुड़ने की आजादी से हमें रोकती है, साथ ही दूसरे देशों की जनता के दुःख-दर्द को समझने की स्वतंत्रता भी सीमित कर देती है। वह अपने लेखन में राष्ट्रवाद को लेकर आलोचनात्मक दृष्टि रखते थे। ई.1908 में प्रसिद्ध वैज्ञानिक जगदीश चंद्र बोस की पत्नी अबला बोस की आलोचना का जवाब देते हुए टैगोर ने कहा था- ‘देशभक्ति हमारा आखिरी आध्यात्मिक सहारा नहीं बन सकता, मेरा आश्रय मानवता है।’

ई.1916-17 में टैगोर ने जापान और अमेरिका की यात्रा के दौरान राष्ट्रवाद पर कई वक्तव्य दिए जिनमें उन्होंने कहा- ‘राष्ट्रवाद का राजनीतिक और आर्थिक संगठनात्मक आधार उत्पादन में बढ़ोतरी और मानवीय श्रम की बचत कर अधिक संपन्नता हासिल करने का प्रयास है। राष्ट्रवाद की धारणा मूलतः राष्ट्र की समृद्धि और राजनैतिक शक्ति में बढ़ोतरी करने में इस्तेमाल की गई है।

शक्ति की बढ़ोतरी की इस संकल्पना ने देशों में पारस्परिक द्वेष, घृणा और भय का वातावरण बनाकर मानव जीवन को अस्थिर और असुरक्षित बना दिया है। यह सीधे-सीधे जीवन से खिलवाड़ है, क्योंकि राष्ट्रवाद की इस शक्ति का प्रयोग बाहरी सम्बन्धों के साथ ही राष्ट्र की आंतरिक स्थिति को नियंत्रित करने में भी होता है। ऐसी स्थिति में समाज पर नियंत्रण बढ़ना स्वाभाविक है।

ऐसी स्थिति में समाज और व्यक्ति के निजी जीवन पर राष्ट्र छा जाता है और एक भयावह नियंत्रणकारी स्वरूप हासिल कर लेता है। दुर्बल और असंगठित पड़ोसी राज्यों पर अधिकार करने का प्रयास राष्ट्रवाद का ही स्वाभाविक प्रतिफलन है। इससे पैदा हुआ साम्राज्यवाद अंततः मानवता का संहारक बनता है।’

भारत के संदर्भ में टैगोर ने लिखा है- ‘भारत की समस्या राजनैतिक नहीं सामाजिक है, यहाँ राष्ट्रवाद नहीं के बराबर है। हकीकत तो ये है कि यहाँ पर पश्चिमी देशों जैसा राष्ट्रवाद पनप ही नहीं सकता, क्योंकि सामाजिक काम में अपनी रूढ़िवादिता का हवाला देने वाले लोग जब राष्ट्रवाद की बात करें तो वह कैसे प्रसारित होगा? भारत को राष्ट्र की संकरी मान्यता छोड़कर अंतरराष्ट्रीय दृष्टिकोण अपनाना चाहिए।’

टैगोर ने लिखा है- ‘भारत भले ही पिछड़ा हो, मानवीय मूल्यों में पिछड़ापन नहीं होना चाहिए। निर्धन भारत भी विश्व का मार्गदर्शन कर मानवीय एकता में आदर्श को प्राप्त कर सकता है। भारत का अतीत यह सिद्ध कर सकता है कि भौतिक संपन्नता की चिंता नहीं करके भारत ने आध्यात्मिक चेतना का सफलतापूर्वक प्रचार किया है।’

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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भारतीय पुनर्जागरण

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भारतीय पुनर्जागरण

अपने आरम्भिक चरण में भारतीय पुनर्जागरण एक बौद्धिक आन्दोलन था जिसने पराधीन भारत के साहित्य, शिक्षा तथा चिंतनधारा को प्रभावित किया तथा जीवन के प्रत्येक अंग का परिष्कार किया।

भारतीय सभ्यता, समाज एवं संस्कृति का विकास विश्व की अन्य संस्कृतियों से पूर्णतः पृथक एवं स्वतंत्र रूप से हुआ था। यह विश्व की प्राचीनतम संस्कृति थी जो मनुष्य मात्र के कल्याण के सिद्धांत पर विकसित हुई थी तथा इसमें धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष को जीवन के महत्वपूर्ण एवं बराबर अंग माना गया था किंतु मध्य-काल में देश की राजनीतिक शक्ति मुस्लिम हाथों में चली गई जिसके कारण भारतीय संस्कृति एवं समाज ने स्वयं को नष्ट होने से बचाने के लिए अपने आप को धर्म एवं भक्ति की मजबूत दीवारों में बंद कर लिया।

इस काल में हिन्दुओं की सामाजिक परम्पराएं एवं रीति-रिवाज धार्मिक अनुष्ठानों की तरह पवित्र माने जाने लगे जिसमें नवीन चिंतन के लिए स्थान नहीं बचा। इसलिए मध्य-कालीन वैष्णव-भक्तों ने हिन्दुओं को एक ओर तो उदारता, सहिष्णुता एवं प्रेम आधारित जीवन जीने का रास्ता दिखाया तथा दूसरी ओर अपने धर्म पर टिके रहने के लिए आतताइयों से संघर्ष करने के लिए आत्म-बल प्रदान किया।

सत्रहवीं-अठारहवीं शताब्दी में देश की राजनीतिक सत्ता यूरोपियन जातियों के हाथों में चली गई तथा ई.1765 की इलाहाबाद संधि के बाद अंग्रेेज इस देश के स्वामी हो गए।

19वीं शताब्दी के आरम्भ तक भारतीय सभ्यता पश्चिमी सभ्यता से पूर्णतः प्रभावित हो गयी थी। भारत का शिक्षित वर्ग पाश्चात्य सभ्यता और ज्ञान को श्रेष्ठ मानने लगा था और अपनी सभ्यता और संस्कृति की श्रेष्ठता में उनका विश्वास समाप्त होता जा रहा था। ईसाई धर्म-प्रचारक हिन्दू-धर्म की कमजोरियों को लक्ष्य करके हिन्दू-धर्म को असभ्य लोगों के धर्म के रूप में प्रचारित कर रहे थे।

उनके दुष्प्रचार से प्रभावित होकर कुछ शिक्षित हिन्दुओं ने ईसाई धर्म को अपना लिया। मधुसूदन दत्त, नीलकण्ठ शास्त्री तथा रमाबाई आदि कई व्यक्ति ईसाई बन गए। इससे भारतीय बुद्धिजीवी वर्ग आहत हुआ। इसलिए देश के विचारवान नौजवान, समाज में पुनः आत्म-सम्मान जागृत करने एवं भारतीयों में अपने धर्म, संस्कृति एवं राष्ट्र के प्रति गौरव की भावना जगाने के लिए आगे आए।

भारतीय पुनर्जागरण का अर्थ

ई.1857 की क्रांति के बाद अर्थात् 19वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में भारतीयों में अपनी पराजय से उत्पन्न निराशा की दशा को सुधारने के लिए जिस चेतना का प्रादुर्भाव हुआ, वह भारतीय पुनर्जागरण कहलाता है। इस काल में भारतीयों ने अपने प्राचीन इतिहास, परम्पराओं और संस्कृति से जुड़े रहते हुए भी पश्चिमी सभ्यता से प्राप्त हो रहे नवीन ज्ञान एवं चिंतन को अपनाने का प्रयास किया। तथा धार्मिक, सामाजिक और राजनीतिक क्षेत्र में सुधारों की प्रक्रिया आरम्भ की।

18वीं शताब्दी में भारत में जो सामाजिक एवं सांस्कृतिक अवनति दिखाई देती है, उसका मूल कारण धार्मिक एवं सामाजिक जीवन की बुराईयां तथा विकृतियां हैं, राजनीतिक पराधीनता या पतन तो उसका परिणाम है। अतः पुनर्जागरण का यह कार्य धार्मिक और सामाजिक क्षेत्र से प्रारम्भ हुआ और कालान्तर में इसने राजनीतिक जागरण को जन्म दिया।

इसलिए भारतीय पुनर्जागरण को ‘धार्मिक एवं सामाजिक पुनर्जागरण’ का नाम दिया है। भारत की पुनर्जागृति मुख्यतः आध्यात्मिक थी तथा इसने राष्ट्रीय आन्दोलन का रूप धारण करने से पूर्व सामाजिक और धार्मिक आन्दोलन का सूत्रपात किया। रामधारीसिंह दिनकर ने धार्मिक एवं सामाजिक पुनर्जागरण के दो प्रमुख लक्षण बताए हैं- (1.) अतीत के प्रति गौरव की भावना और (2.) प्रवृत्तिवाद।

भारत में भी पुनर्जागरण का प्रथम लक्षण अपने अतीत के प्रति गौरव उत्पन्न होना था। भारतीय बुद्धिजीवियों ने यह अनुभव किया कि हमें पश्चिम से विज्ञान के अतिरिक्त अन्य कुछ नहीं सीखना है क्योंकि भारत की सांस्कृतिक विरासत विश्व में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण और गौरवपूर्ण है। भारतीयों के मन में इस विश्वास की उत्पत्ति का सर्वप्रमुख कारण भारतीयों के पास सदियों से उपलब्ध वेदान्त के ज्ञान का होना था।

पुनर्जागरण का दूसरा लक्षण प्रवृत्तिवाद को अपनाना अर्थात् निवृत्तिवाद का त्याग करना था। महात्मा बुद्ध के समय से भारतीयों में निवृत्तिवाद की भावना घर कर गई थी जिसमें भौतिक उपलब्धियों के स्थान पर आध्यात्मिक उन्नति एवं व्यक्तिगत आचरण की शुद्धता पर ही ध्यान दिया जा रहा था। भारतीय बुद्धिजीवी यूरोप के व्यक्तिवादी दृष्टिकोण की विशेषताओं एवं उपलब्धियों को भलीभांति समझ पा रहे थे।

उन्होंने अनुभव किया कि यूरोप की श्रेष्ठता का कारण यह नहीं कि उनके पास भारतीयों से अधिक मेधा है, या भारतीयों से अधिक विज्ञान है या युद्ध के भयानक अस्त्र-शस्त्र हैं, अपितु यूरोप की श्रेष्ठता का कारण यूरोपवासियों का जीवन के विषय में प्रवृत्तिमय दृष्टिकोण है। उन्होंने सामाजिक विन्यास की मजबूती एवं भौतिक संसाधनों की उपलब्धियों के माध्यम से स्वयं को शक्तिशाली बनाया है। भारतीयों को भी जातीय गौरव, राष्ट्रवाद एवं भौतिक उपलब्धियों के बारे में सोचना पड़ेगा।

भारतीय पुर्जागरण के कारण

आरम्भ में भारतीय पुनर्जागरण एक बौद्धिक आन्दोलन था जिसने हमारे साहित्य, शिक्षा तथा चिंतनधारा को प्रभावित किया। दूसरे चरण में यह सामाजिक और धार्मिक आन्दोलनों में बदल गया। तीसरे और अन्तिम चरण में इस आंदोलन ने राजनैतिक आन्दोलन का रूप ले लिया जिसके परिणास्वरूप हमें राजनीतिक स्वतंत्रता प्राप्त हो सकी। 19वीं शताब्दी के इस पुनर्जागरण के कई कारण थे-

(1.) एशियाई देशों में जन-जागरण

19वीं शताब्दी में सम्पूर्ण एशिया में जन-जागृति की लहर व्याप्त थी। चीन में विदेशियों के प्रभुतव के विरुद्ध अनेक गुप्त समितियों का निर्माण हो चुका था जिन्होंने चीन में विद्रोही गतिविधियों को जन्म दिया तथा सनयातसेन ने देश में जागृति उत्पन्न करने का उत्तरदायित्व सम्भाला।

इसी प्रकार जापान में, ‘सम्राट का आदर करो, विदेशियों को भगा दो।’ का नारा गूँजने लगा तथा मुत्सोहितो ने जापान में जागृति उत्पन्न करने का प्रयास किया। टर्की में भी राष्ट्रीयता की लहर उत्पन्न हो रही थी, जो सुल्तान के निरंकुश शासन को उखाड़ फेंकना चाहती थी। यद्यपि भारत में जन-जागृति की भावना बहुत पहले से विद्यमान थी तथापि अन्य देशों की जागृति ने भारतीय जागृति की लहर को बल प्रदान किया। वस्तुतः एशियाई देश एक दूसरे से प्रेरणा ग्रहण करके आगे बढ़ रहे थे।

(2.) नए मध्यम वर्ग का विकास

19वीं शताब्दी में भारत में नए मध्यम वर्ग का विकास हुआ जिसने परम्परागत सामाजिक संगठनों अर्थात् जाति-प्रथा, एवं वैवाहिक रीति-रिवाजों को चुनौती दी। शिक्षित मध्यम वर्ग में सभी जातियों के लोग सम्मिलित थे। जब विभिन्न वर्गों में व्यावसायिक समानता स्थापित होने लगी, तब जातीयता पर आधारित भेदभाव समाप्त करने की भावना भी प्रबल होने लगी तथा अन्तर्जातीय प्रतिबन्धों के विरुद्ध आवाज उठने लगी।

इस काल का मध्यम वर्ग पाश्चात्य सभ्यता के सामाजिक विन्यास से प्रभावित था और वह भारतीय सामाजिक जीवन को अंग्रेजों के सामाजिक जीवन के अनुरूप बनाना चाहता था। इसलिए 19वीं शताबदी के समाज सुधार आन्दोलन जीवन-पद्धति में बदलाव लाने के लिए किए गए। इनमें स्त्रियों की शिक्षा, पर्दा प्रथा समाप्ति, अन्तर्जातीय-विवाह के प्रतिबन्धों को तोड़ना, बाल-विवाह को रोकना, विधवा-विवाह के प्रतिबन्धों को समाप्त करना आदि सुधार प्रमुख थे।

(3.) अंग्रेजों द्वारा आर्थिक शोषण

अंग्रेजों ने भारत में आर्थिक शोषण की नीति अपनाई। हिन्दू किसान मुसलमानों के समय से ही निर्धन हो चुके थे किंतु अब अंग्रेजों ने मुसलमानों का भी आर्थिक शोषण किया तथा किसानों, शिल्पियों आदि को जीवन निर्वाह के अन्य साधन खोजने के लिए विवश कर दिया। प्रजा के आर्थिक एवं राजनीतिक शोषण ने भारत की उन शक्तियों को सक्रिय कर दिया, जो भारत के प्राचीन गौरव को पुनः स्थापित करने की कामना रखते थे।

कृषि के वाणिज्यिीकरण के कारण खेतों की पैदावार बढ़ी, विपणन के साधन बढ़े किंतु इस वृद्धि में से किसान के हाथ बहुत कम हिस्सा ही लगा। सारी मलाई अंग्रेज शक्ति लूट लेती थी। औद्योगिकीकरण के कारण किसान के लड़के अपने गांव छोड़़कर नगरों को पलायन करने लगे। इस नए परिवेश में उन्होंने नए ढंग से सोचना आरम्भ किया।

वे नियतिवाद एवं यथास्थिति वाद को छोड़कर परिश्रम के आधार पर भाग्य बदलने के विचारों से आप्लावित हो रहे थे तथा निवृत्तिवाद की भावना को त्यागकर प्रवत्तिवाद की ओर बढ़ रहे थे। लोगों की आकांक्षाएं एवं जीवन से अपेक्षाएं बढ़ रही थीं।

(4.) पाश्चात्य शिक्षा का प्रभाव

ई.1835 में अंग्रेजी को शिक्षा का माध्यम स्वीकार कर लिया गया। इस कारण अनेक भारतीय युवक शिक्षा प्राप्त करने हेतु इंग्लैण्ड जाने में सक्षम हो गए। उन्होंने अन्य यूरोपिय देशों की यात्राएं कीं तथा वहाँ के नागरिक जीवन को देखा। मध्यमवर्गीय शिक्षित भारतीय युवकों को पाश्चात्य देशों की सभ्यता और साहित्य का ज्ञान हुआ और उनमें अपने देश और समाज के उत्थान के प्रति उत्साह उत्पन्न हुआ।

वे भी यूरोपीय लोगों की तरह गुलामी से घृणा करने लगे जो जन-जीवन में समस्त प्रकार की विसंगतियां एवं असंतुलन उत्पन्न कर रहा था। उन्हें रूढ़वादी भारतीय समाज के खोखलेपन की भयावह स्थिति का ज्ञान हुआ। इस प्रकार अंग्रेजी पढ़े-लिखे वर्ग में समाज सुधार की आवाज सबसे पहले उठी किन्तु इस कार्य में वास्तविक सफलता उन युवाओं को मिली जिन्हें अंग्रेजी शिक्षा के साथ-साथ प्राचीन भारतीय संस्कृति एवं उसके गौरव का भी ज्ञान था।

यदि ऐसा नहीं होता तो पढ़ा-लिखा भारतीय युवक भारतीय संस्कृति से घृणा करने वाला एवं अंग्रेजी संस्कृति का अनुकरण करने वाला बन जाता। ऐसी जागृति देश का उत्थान करने की बजाय, और अधिक पतन करती।

(5.) ईसाई धर्म-प्रचारकों की आलोचना

ईसाई धर्म-प्रचारकों ने भारतीय धर्म का उपहास उड़ाया तथा भारतीय सामाजिक ढांचे की आलोचना की। उन्होंने हिन्दू समाज के लिए अपशब्दों का प्रयोग किया तथा ईसाई धर्म की श्रेष्ठता का प्रचार किया। गवर्नर जनरल कार्नवालिस से लेकर केनिंग तक और उसके बाद अनेक गवर्नर-जनरलों के भारतीयों के सम्बन्ध में तिरस्कारात्मक विचार थे।

बैंटिक, मेटकाफ, मेकाले आदि अंग्रेज अधिकारी भारत में व्याप्त विभिन्न सामाजिक कुरीतियों एवं अन्धविश्वासों को दूर करना चाहते थे किंतु उनके मन में भारतीय समाज एवं संस्कृति के प्रति घृणा एवं तिरस्कार की भावना थी।

इस कारण उनका सुधारवादी दृष्टिकोण भारतीयों को पाश्चात्य संस्कृति की श्रेष्ठता का पाठ पढ़ाने तक सीमित होकर रह गया था। ऐसी स्थिति में भारतीयों को यह समझ में आना स्वाभाविक ही था कि देश में वास्तविक सुधार केवल भारतीय ही ला सकते हैं और उसका माध्यम भी भारतीयता ही हो सकता है।

(6.) भारतीय समाचार-पत्र एवं साहित्य

भारतीय समाचार-पत्रों, पत्रिकाओं, साहित्य आदि ने भारतीय पुनर्जागरण में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। प्रेस की स्थापना से विचारों के तेजी से प्रसार की सुविधा उपलब्ध हो गयी। कुछ ऐसे समाचार-पत्र एवं पत्रिकायें प्रकाशित होने लगीं जिनमें अंग्रेजों द्वारा किए जा रहे दुव्र्यवहार, नस्लीय-भेद और शोषण के समाचार प्रकाशित होते थे।

साथ ही भारतीय राष्ट्रवादियों के विचारोत्तेजक लेख एवं कविताएं भी छपते थे। इस कारण पढ़ा-लिखा समाज तेजी से मानसिक विकास करने में सफल हो गया। रेलों के विस्तार से भी देश के विभिन्न हिस्सों के नागरिकों को एक-दूसरे के विचार जानने का अवसर मिला।

(7.) गैर-सरकारी अँग्रेजों की भूमिका

उन्नीसवीं सदी के आरम्भ में अनेक गैर-सरकारी अँग्रेज भारत आये। ये अँग्रेज ब्रिटेन के औद्योगिक बुर्जुआ वर्ग की प्रगतिशील विचारधारा से प्रभावित थे। ये लोग भारत में वकील, शिक्षक, पत्रकार आदि बन कर आये थे। कम्पनी सरकार के अधिकारी इन्हें तिरस्कार-वश इण्टर-लोफर (अनधिकार प्रवेशकारी) कहते थे।

इन अँग्रेजों का कई बातों पर कम्पनी के अधिकारियों से वाद-विवाद होता रहता था। इन्हीं लोगों ने कुछ प्रमुख भारतीयों के साथ मिलकर ईस्ट इण्डिया कम्पनी के शासन के विरुद्ध आन्दोलन चलाने के लिए लैण्ड होल्डर्स सोसाइटी (ई.1838), ब्रिटिश इण्डिया सोसाइटी (ई.1839) और बंगाल ब्रिटिश इण्डिया सोसाइटी (ई.1843) आदिप्रभावशाली संगठन स्थापित किये थे। इन संगठनों द्वारा चलाये गये आन्दोलनों से भारतीयों में नवीन दृष्टि का विकास हुआ।

(8.) यूरोपीय विद्वानों द्वारा भारतीय संस्कृति की प्रशंसा

मैक्समूलर, मोनियर विलयम्स, रौथ, सैसून, बुनर्फ आदि यूरोपीय विद्वानों ने प्राचीन भारतीय साहित्य, धर्म और संस्कृति के सम्बन्ध में शोध करके विश्व के सम्मुख भारतीयों के राजनैतिक, सांस्कृतिक और सामाजिक इतिहास का समृद्ध चित्र प्रस्तुत किया। इन अनुसन्धानों के परिणाम स्वरूप भारत की प्राचीन आध्यात्मिक श्रेष्ठता और दैदीप्यमान सभ्यता के चिन्ह भारतीयों के समक्ष आए। इससे भारतीयों का आत्म विश्वास तथा आत्माभिमान बढ़ा और उनमें राष्ट्रप्रेम की भावना ने जोर पकड़ा।

इन समस्त कारणों से भारत में पुनर्जागरण की एक अद्भुत लहर उत्पन्न हो गयी। भारत में नवचेतना की जो लहर उत्पन्न हुई उसने शैक्षणिक, सामाजिक, धार्मिक और राजनीतिक समस्त क्षेत्रों को प्रभावित किया।

भारतीय पुनर्जागरण का स्वरूप

भारत में 19वीं शताब्दी के पुनर्जागरण के फलस्वरूप जो समाज सुधार आरम्भ हुए, वह वास्तव में प्राचीन व्यवस्थाओं के विरुद्ध शांत-विद्रोह था। इन विद्रोही व्यक्तियों को व्यंग्य से ‘सुधारक’ कहते थे। इन सुधारकों का उद्देश्य प्रचलित सामाजिक ढांचे में परिवर्तन करना नहीं था, अपितु उसमें रहन-सहन की नवीन प्रणाली का समावेश करना था। भारत में समाज सुधार की परम्परा नई नहीं थी।

16वीं से 18वीं शताब्दी तक यह कार्य सन्तों एवं सन्यासियों द्वारा किया गया, जिसे भक्ति-आन्दोलन कहा जाता है। 19वीं शताब्दी में इस कार्य में गृहस्थ व्यक्तियों का योगदान अधिक रहा। इस सामाजिक आन्दोलन के तीन चरण थे-

(1.) ई.1877 से पहले समाज-सुधार के प्रयास व्यक्तिगत स्तर पर किए गए।

(2.) ई.1877 से ई.1919 के बीच समाज सुधार के संगठित प्रयास किए गए।

(3.) ई.1919 के बाद समाज सुधारों की दिशा राजनीतिक चेतना की ओर मोड़ दी गई।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य अध्याय : उन्नीसवीं एवं बीसवीं सदी के समाज-सुधार आंदोलन

भारतीय पुनर्जागरण

राजा राममोहन राय और उनका ब्रह्मसमाज

युवा बंगाल आन्दोलन

केशवचन्द्र सेन का भारतीय ब्रह्मसमाज

आत्माराम पाण्डुरंग और प्रार्थना समाज

स्वामी दयानंद सरस्वती और आर्य समाज

स्वामी श्रद्धानंद का शुद्धि आंदोलन

रामकृष्ण परमहंस

स्वामी विवेकानन्द

थियोसॉफिकल सोसायटी

मुस्लिम सुधार आन्दोलन

विभिन्न सम्प्रदायों में सुधार आंदोलन

समाजसुधार आंदोलनों का मूल्यांकन

राजा राममोहन राय और उनका ब्रह्मसमाज

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राजा राममोहन राय

राजा राममोहन राय ने शुद्ध एकेश्वरवाद के सिद्धांत पर आधारित ब्रह्मसमाज की स्थापना की। ब्रह्मसमाज मूलतः भारतीय था और इसका आधार उपनिषदों का अद्वैतवाद था।

भारत में धार्मिक और समाजिक आन्दोलनों के प्रवर्तक राजा राम मोहन राय का जन्म ई.1774 में बंगाल के राधानगर गांव में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ। वे आरम्भ से ही क्रांतिकारी विचारों के थे। 17 वर्ष की आयु में उन्होंने एक पुस्तिका प्रकाशित करवाई जिसमें उन्होंने मूर्ति-पूजा का प्रबल विरोध किया। उनके परम्परावादी ब्राह्मण परिवार ने नाराज होकर उन्हें घर से बाहर निकाल दिया।

वे इधर-उधर भटकने लगे तथा इस दौरान उन्होंने संस्कृत, फारसी, बंगला, अरबी तथा अँग्रेजी भाषाओं का अध्ययन किया और ईस्ट इण्डिया कम्पनी के अधीन रंगपुर की कलेक्टरी में क्लर्क बन गये। अपनी प्रतिभा के बल पर वे शीघ्र ही जिले की दीवानगिरी के उच्च पद पर पहुँच गये। इसी बीच उन्होंने लेटिन, ग्रीक एवं हिब्रू भाषाएं सीखकर ईसाई धर्म का गहन अध्ययन किया। हिन्दू-धर्म-शास्त्रों, वेद, उपनिषद तथा वेदान्त आदि का अध्ययन वे पहले ही कर चुके थे।

राजा राममोहन राय द्वारा इसाई धर्म के आक्षेपों का जवाब

राजा राममोहन राय ईसाई धर्म की अच्छाइयों के प्रशंसक थे किंतु उन्होंने ईसा के देवत्व को उसी प्रकार अस्वीकार किया जिस प्रकार वे हिन्दू अवतारवाद को अस्वीकार करते थे। ई.1813 में जब ईसाई मिशनरियों ने हिन्दू-धर्म पर आक्षेप करने आरम्भ किये तो राजा राममोहन राय ने उन आक्षेपों का उत्तर देना आरम्भ किया।

ई.1814 में 40 वर्ष की आयु में उन्होंने अपने पद से त्याग-पत्र दे दिया और कलकत्ता जाकर रहने लगे। ई.1820 में उन्होंने प्रीसेप्ट्स ऑफ जीसस नामक पुस्तक प्रकाशित की जिसमें उन्होंने न्यू टेस्टामेंट्स के नैतिक और दार्शनिक संदेश को उसकी चमत्कारी कहानियों से अलग करने का प्रयास किया।

राजा राममोहन राय द्वारा ब्रह्मसमाज की स्थापना

20 अगस्त 1828 को राजा राममोहन राय ने शुद्ध एकेश्वरवाद के सिद्धांत पर आधारित ब्रह्मसमाज की स्थापना की। ब्रह्मसमाज 19वीं शताब्दी का प्रथम धार्मिक और सामाजिक आन्दोलन था तथा राजा राममोहन राय पहले भारतीय थे जिन्होंने भारतीय धर्म और समाज की बुराईयों का दूर करने का प्रयत्न किया।

ब्रह्मसमाज का विभाजन

ई.1833 में राजा राममोहन राय की मृत्यु के बाद देवेन्द्रनाथ टैगोर और केशवचन्द्र सेन ने ब्रह्मसमाज को आगे बढ़ाया। केशवचन्द्र सेन ब्रह्मसमाज को ईसाई धर्म के सिद्धान्तों पर चलाना चाहते थे किन्तु देवेन्द्रनाथ टैगोर इससे सहमत नहीं थे। अतः ब्रह्मसमाज दो भागों में विभक्त हो गया-

(1.) देवेन्द्रनाथ का आदि ब्रह्मसमाज

(2.) केशवचन्द्र सेन का भारतीय ब्रह्मसमाज।

केशवचन्द्र ने अपने समाज के प्रचार हेतु देश का पर्यटन किया। इसके फलस्वरूप बम्बई में प्रार्थना समाज और मद्रास में वेद समाज की स्थापना हुई। ई.1881 में भारतीय ब्रह्मसमाज में पुनः मतभेद उत्पन्न हो गए। केशवचन्द्र सेन के विरोधियों ने साधारण ब्रह्मसमाज स्थापित किया। केशवचन्द्र सेन ने नव विधान समाज की स्थापना की जिसमें हिन्दू, ईसाई, बौद्ध और मुस्लिम धार्मिक ग्रन्थों से भी अनेक बातें ली गई थीं। यद्यपि ब्रह्मसमाज विभिन्न शाखाओं में विभक्त हो गया तथापि उसका मूल लक्ष्य हिन्दू समाज और धर्म का सुधार करना था।

ब्रह्मसमाज के प्रमुख सिद्धान्त

राजा राममोहन राय ने ब्रह्मसमाज के रूप में किसी नवीन सम्प्रदाय को खड़ा नहीं किया अपितु हिन्दू-धर्म की उच्च शिक्षाओं के तत्त्व से एक सामान्य पृष्ठभूमि तैयार की। ब्रह्मसमाज मूलतः भारतीय था और इसका आधार उपनिषदों का अद्वैतवाद था। ब्रह्मसमाज की साप्ताहिक बैठकों में वेदों का पाठ होता था तथा उपनिषदों के बंगला अनुवाद का वाचन होता था।

ब्रह्मसमाज के सुधार कार्य

राममोहन राय के धार्मिक सुधार

ब्रह्मसमाज ने वेदों और उपनिषदों को आधार मानकर बताया कि ईश्वर एक है, समस्त धर्मों में सत्यता है, मूर्ति-पूजा और कर्मकाण्ड निरर्थक हैं तथा सामाजिक कुरीतियों का धर्म से कोई सम्बन्ध नहीं है। सर्वप्रथम ब्रह्मसमाज ने ही भारतीय समाज को तर्क के आधार पर धर्म की व्याख्या करने का विचार दिया।

धर्म की व्याख्या करते हुए, ईसाई धर्म के कर्मकाण्डों तथा ईसा मसीह के ईश्वरीय अवतार होने के दावे पर प्रबल आक्रमण किया तथा ईसाई धर्म-प्रचारकों से शास्त्रार्थ किया। इस कारण जो हिन्दू, ईसाई धर्म ग्रहण कर रहे थे, वे धर्म-परिवर्तन करने से बच गए। राजा राममोहन राय ने हिन्दू, ईसाई, इस्लाम, बौद्ध आदि समस्त धर्मों का गहन अध्ययन किया और इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि समस्त धर्मों में सत्य है किन्तु समस्त धर्मों में कर्मकाण्ड सम्मिलित हो गये हैं जिनको दूर करने की आवश्यकता है।

उन्होंने मुख्यतः हिन्दू-धर्म में सुधार करने का प्रयत्न किया। उन्होंने लोगों का ध्यान उस निराकार, निर्विकार ब्रह्म की ओर आकृष्ट किया जिसका निरूपण वेदान्त में हुआ है। ब्रह्मसमाज समस्त धर्मों के प्रति सहिष्णु था। जब राजा राममोहन राय ने ब्रह्मसमाज के लिए भवन का निर्माण कराया, तब उसके ट्रस्ट के दस्तावेज में स्पष्ट किया गया कि ‘समस्त लोग बिना किसी भेदभाव के, शाश्वत सत्ता की उपासना के लिए इस भवन का प्रयोग कर सकते हैं। इसमें किसी मूर्ति की स्थापना नहीं होगी, न इसमें कोई बलिदान होगा, न किसी धर्म की निन्दा की जायेगी। इसमें केवल ऐसे उपदेश दिये जायेंगे जिनसे समस्त धर्मों के बीच एकता तथा सद्भाव की वृद्धि हो।’

ब्रह्मसमाज पर आरोप लगाया जाता है कि उस पर ईसाई धर्म और सभ्यता का प्रभाव था किन्तु यह सत्य नहीं है। उसकी प्रेरणा के मूल स्रोत प्राचीन भारतीय धर्म ग्रन्थ ही थे। ब्रह्मसमाज ने भारत के अन्य धर्मों में सुधार का मार्ग भी प्रशस्त किया।

राममोहन राय के सामाजिक सुधार

राजा राममोहन राय उच्च कोटि के समाज सुधारक थे। उस समय हिन्दू समाज में अनेक बुराईयां व्याप्त थीं। राजा राममोहन राय ने उन्हें दूर करने का निश्चय किया। उन्होंने अपनी विधवा भाभी को सती होते देखकर इस अमानुषिक प्रथा के विरुद्ध आन्दोलन चलाया। इसके परिणाम स्वरूप लॉर्ड विलियम बैंटिक ने ई.1829 में सती-प्रथा को गैर कानूनी घोषित किया।

ब्रह्मसमाज ने बाल-विवाह, बहु-विवाह, जाति प्रथा, छुआछूत, नशा आदि कुरीतियों का विरोध किया तथा स्त्री-शिक्षा, अन्तर्जातीय विवाह, विधवा-विवाह आदि का समर्थन किया। उस समय भारतीय हिन्दू समाज में कन्या एवं वर विक्रय और कन्या-वध जैसी कुप्रथायें प्रचलित थीं।

ब्रह्मसमाज ने इन कुरीतियों के विरुद्ध प्रबल आन्दोलन चलाया। उन्होंने समता का सिद्धान्त प्रतिपादित करते हुए लाखों हिन्दुओं को ईसाई होने से रोका। ई.1822 और ई.1830 में दो प्रकाशनों द्वारा राजा राममोहन राय ने स्त्रियों के सामाजिक, कानूनी और सम्पत्ति के अधिकारों पर प्रकाश डाला। उनके मत में, स्त्री और पुरुष दोनों ही समान हैं।

इस प्रकार समाज सुधार के क्षेत्र में ब्रह्मसमाज का योगदान अद्वितीय है। हिन्दू समाज में कोई भी ऐसी कुरीति नहीं थी, जिस पर ब्रह्मसमाज ने प्रहार न किया हो। आधुनिक काल में जिन कुरीतियों का विरोध समस्त प्रबुद्ध भारतीयों ने किया है तथा जिन्हें आज भी भारत का शिक्षित वर्ग घृणा की दृष्टि से देखता है, उन कुरीतियों पर सर्वप्रथम ब्रह्मसमाज ने ही प्रहार किया था। स्वतंत्र भारत के संविधान में जिन सामाजिक कुरीतियों को असंवैधानिक घोषित किया गया है, उनके विरुद्ध भी सर्वप्रथम ब्रह्मसमाज ने ही संघर्ष किया था। 

राममोहन राय के साहित्यिक सुधार

ब्रह्मसमाज ने साहित्यिक क्षेत्र में भी उल्लेखनीय कार्य किया। देवेन्द्रनाथ की तत्त्व बोधिनी सभा, केशवचंद्र सेन की संगत सभा और भारतीय समाज सुधार जैसी सभाएं ब्रह्मसमाज के विचारों का प्रचार करने में सहायक सिद्ध हुईं। राजा राममोहन राय ने बंगला, उर्दू, फारसी, अरबी, संस्कृत और अँग्रेजी भाषा में पुस्तकों की रचना कर भारतीय साहित्य को समृद्ध बनाया।

उन्होंने अनेक धार्मिक ग्रन्थों का विभिन्न भाषाओं में अनुवाद किया जो भारतीय साहित्यिक जगत् के लिए स्थायी योगदान है। राजा राममोहन राय और केशवचन्द्र सेन के लेखों और वक्तव्यों ने भारतीय साहित्य को समृद्ध बनाया। राजा राममोहन राय के अपील टू द क्रिश्चियन पब्लिक तथा दी डेस्टिनी ऑफ ह्यूमन लाइफ जैसे लेखों ने भारतीयों में नव-जागरण उत्पन्न किया।

राजा राममोहन राय ने संवाद कौमुदी नामक सर्वप्रथम बंगला साप्ताहिक पत्र निकाला। उन्होंने फारसी अखबार मिरातउल भी प्रकाशित किया। केशवचन्द्र सेन ने भारतीय ब्रह्मसमाज द्वारा तत्त्व कौमुदी, ब्रह्म पब्लिक ओपीनियन, संजीवनी आदि पत्र प्रकाशित किये। इन पत्र-पत्रिकाओं ने साहित्य के विकास में भारी योगदान दिया।

राममोहन राय के शैक्षणिक सुधार

राजा राममोहन राय ने अँग्रेजी भाषा और पाश्चात्य शिक्षा का समर्थन किया। उनकी मान्यता थी कि आधुनिक युग में प्रगति के लिए अँग्रेजी का ज्ञान आवश्यक है। वे चाहते थे कि भारत में पाश्चात्य शिक्षा तथा ज्ञान की समस्त शाखाओं के शिक्षण की व्यवस्था हो। इसके लिए ब्रह्मसमाज ने विभिन्न स्थानों पर स्कूल और कॉलेज खोले। स्वयं राजा राममोहन राय ने कलकत्ता में वेदान्त कॉलेज, इंगलिश स्कूल और हिन्दू कॉलेज की स्थापना की।

केशवचन्द्र सेन के भारतीय ब्रह्मसमाज ने ब्रह्म बालिका स्कूल तथा सिटी कॉलेज ऑफ कलकत्ता की नींव डाली। भारत के आधुनिकीकरण और समाज सुधार में इन शिक्षण संस्थाओं ने महान् योगदान दिया। हिन्दू कॉलेज ने भारतीय बौद्धिक जागरण में अग्रदूत का काम किया तथा युवा बंगाल आन्दोलन को जन्म दिया।

राममोहन राय के राष्ट्रीय सुधार

ब्रह्मसमाज ने राष्ट्रीयता की भावना के निर्माण में विपुल योगदान दिया। उसने प्राचीन भारतीय गौरव, सभ्यता एवं संस्कृति का ज्ञान कराया, जिससे भारतीयों में राष्ट्रीयता की भावना उत्पन्न हुई। राजा राममोहन राय ने हिन्दू कानूनों में सुधार की वकालात की। स्त्रियों के सामाजिक और सम्पत्ति अधिकारों पर बल दिया।

भूमि-कर में कमी करने की मांग की और दमनकारी कृषि कानूनों के विरुद्ध एक प्रार्थना-पत्र इंग्लैण्ड भेजा। समाचार-पत्रों पर लगे प्रतिबन्धों के विरोध में सुप्रीम कोर्ट तथा किंग-इन-कौंसिल को आवेदन भेजे। राजा राममोहन राय ने सर्वप्रथम विचार-स्वतंत्रता का नारा बुलन्द किया। उन्होंने भारतीयों को शासन और सेवा में अधिक संख्या में भरती करने की मांग की।

उन्होंने इंग्लैण्ड के हाउस ऑफ कॉमन्स की प्रवर समिति को भारतीय शासन में सुधार हेतु सुझाव दिये। उन्होंने न्याय में जूरी प्रथा का समर्थन किया तथा न्यायपालिका को प्रशासन से अलग करने की मांग की। उन्होंने दीवानी तथा फौजदारी कानूनों का संग्रह तैयार करने की भी मांग की और फारसी के स्थान पर अँग्रेजी भाषा को न्यायालयों की भाषा बनाने पर बल दिया।

उन्होंने किसानों से ली जाने वाली मालगुजारी निश्चित करने की मांग की। उनके आन्दोलन के फलस्वरूप ई.1835 में समाचार पत्रों पर से प्रतिबन्धों को हटाया गया। राजा राममोहन राय ने भारत के राजनीतिक नवजागरण में महान् योगदान दिया।

नये युग के अग्रदूत राजा राममोहन राय

राजा राममोहन राय अन्तर्राष्ट्रीयता के समर्थक थे। उन्होंने अन्तर्राष्ट्रीय विवादों को शान्तिपूर्ण ढंग से निपटाने हेतु एक सुझाव प्रस्तुत किया जिसमें सम्बन्धित देशों की संसदों से एक-एक सदस्य लेकर अन्तर्राष्ट्रीय कांग्रेस बनाने कर योजना थी। इस प्रकार राजा राममोहन राय राष्ट्रीयता एवं अन्तराष्ट्रीयता- दोनों के प्रबल समर्थक थे।

एडम ने लिखा है- ‘स्वतंत्रता की लगन उनकी अन्तर्रात्मा की सबसे जोरदार लगन थी और यह प्रबल भावना उनके धार्मिक, सामाजिक, राजनीतिक आदि समस्त कार्यों में फूट-फूटकर निकल पड़ती थी।’ इसीलिए उन्हें नये युग का अग्रदूत कहा गया है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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युवा बंगाल आन्दोलन

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युवा बंगाल आन्दोलन का जनक हेनरी लुई विवियन देरीजियो

हेनरी लुई विवियन देरीजियो युवा बंगाल आन्दोलन का जनक था। उसने कलकत्ता के विद्यार्थियों को इस संस्था से जोड़कर अंग्रेजी कुशासन के विरुद्ध आंदोलन चलाया। इस कारण अंग्रेज उससे नाराज हो गए। 

जनवरी 1817 में कलकत्ता में हिन्दू कॉलेज की स्थापना, भारत के धर्म और समाज सुधार आन्दोलन के इतिहास की महत्त्वपूर्ण घटना थी। सार्वजनिक जीवन तथा जनजागरण का इतिहास हिन्दू कॉलेज से ही आरम्भ होता है। इससे पूर्व बंगाल के जनजीवन पर धर्म का गहरा प्रभाव था तथा भारतीयों का राजनीति से सम्पर्क नहीं के बराबर था।

ई.1826 में हेनरी लुई विवियन देरीजियो इस कॉलेज में शिक्षक के पद पर नियुक्त हुआ। वह एक स्वतंत्र विचारक था तथा 19वीं शताब्दी की उदारवादी विचारधारा से प्रभावित था। उसने हिन्दू कॉलेज को जन-जागरण का केन्द्र बना दिया। वह ऐसा वातावरण निर्मित करना चाहता था जिससे भारतीयों में राजनीति के प्रति रुचि उत्पन्न हो।

उसने कॉलेज के मेधावी छात्रों को यूरोप के राजनीतिक विचारकों की विचार धाराओं से परिचित कराया। अमृतलाल मित्र, कृष्णमोहन बनर्जी, रसिककृष्ण मल्लिक, दक्षिणरंजन मुखर्जी, रामगोपाल घोष आदि अनेक छात्र उसके निकट सम्पर्क में थे। देरीजियो और उसके मेधावी छात्रों की विचार गोष्ठियों में धर्म, राजनीति, नैतिकता और भारतीय इतिहास पर विचार-विमर्श होता था।

देरीजियो के छात्रों ने बंगाल में एक नया जागरूक वर्ग तैयार किया जिसे युवा बंगाल कहा जाता था। युवा बंगाल के सदस्य अन्धविश्वासों तथा भारतीय सामाजिक कुरीतियों के कटु आलोचक थे और सुधारों के प्रबल पक्षपाती थे। उन्होंने बंगाल में एक आन्दोलन आरम्भ किया जिसे युवा बंगाल आन्दोलन कहा जाता है।

देरीजियो के विचारों से प्रभावित होकर युवा बंगाल के सदस्यों ने ई.1828 में देरीजियो की अध्यक्षता में एकेडेमिक एसोसिएशन की स्थापना की। इस एसोसियेशन के तत्त्वावधान में आयोजित होने वाली सभाओं में विभिन्न विषयों पर चर्चा होती थी और विचारों का आदान-प्रदान होता था। इस प्रकार की विचार-गोष्ठियों में हिन्दू कॉलेज के छात्रों के साथ-साथ कलकत्ता के शिक्षित और जागरूक लोग भी भाग लेते थे।

देरीजियो और उसके ऐसासिएशन ने सुप्त भारतीयों को झकझोर दिया। छात्रों में आत्म-विश्वास की भावना उत्पन्न हुई और वे प्राचीन रूढ़ियों की आलोचना करने लगे। पुरातनपंथी भारतीयों ने इस एसोसिएशन के विरुद्ध आवाज उठाई। अनेक अभिभावकों ने अपने लड़कों को हिन्दू कॉलेज से निकाल लिया। इस पर कॉलेज की मैनेजिंग कमेटी ने इस एसोसिएशन पर प्रतिबंध लगा दिया।

मैनेजिंग कमेटी ने देरीजियो को कॉलेज से निकालने का निर्णय किया। मार्च 1831 में देरीजियो ने स्वयं त्याग पत्र दे दिया। इसके कुछ ही दिनों बाद उसकी मृत्यु हो गयी। देरीजियो की मृत्यु के बाद भी उसके शिष्य उसके बताए हुए मार्ग पर चलते रहे और बंगाल में जनजागरण का कार्य करते रहे।

बंगाल में सार्वजनिक संगठनों की स्थापना का प्रारम्भ देरीजियो के युवा बंगाल तथा एकेडेमिक एसोसिएशन से होता है। उसने बंगाल में और अन्ततः सम्पूर्ण भारत में जनजागरण की नींव रखी। उसने वस्तुओं को तर्क के आधार पर परखने एवं अन्धविश्वासों तथा पुरानी मान्यताओं पर प्रहार करने की परम्परा आरम्भ की।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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विभिन्न सम्प्रदायों में सुधार आंदोलन

समाजसुधार आंदोलनों का मूल्यांकन

केशवचन्द्र सेन का भारतीय ब्रह्मसमाज

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केशवचन्द्र सेन
केशवचन्द्र सेन का भारतीय ब्रह्मसमाज

केशवचन्द्र सेन ने ई.1866 में भारतीय ब्रह्मसमाज की स्थापना की। ईसाई धर्म से प्रभावित होने के कारण भारतीय ब्रह्मसमाज ईसा मसीह को पूज्य मानने लगा।

केशवचन्द्र सेन द्वारा संत सभा की स्थापना

केशवचन्द्र सेन ई.1856 में ब्रह्मसमाज के सदस्य बने। उन्होंने अपने भाषणों तथा लेखों के माध्यम से नवयुवकों को ब्रह्मसमाज की ओर आकर्षित किया। उन्होंने संत सभा की स्थापना की। केशवचन्द्र सेन पाश्चात्य विचारों तथा ईसाई धर्म से अधिक प्रभावित थे और ब्रह्मसमाज को ईसाई धर्म के सिद्धान्तों के अनुसार चलाना चाहते थे।

केशवचन्द्र सेन का भारतीय ब्रह्मसमाज

चूंकि केशवचंद्र सेन ब्रह्मसमाज को ईसाई धर्म के सिद्धांतों पर चलाना चाहते थे और देवेन्द्रनाथ टैगोर ब्रह्मसमाज को हिन्दू धर्म की मान्यताओं के अनुसार चलाना चाहते थे, इस कारण केशवचंद्र सेन और देवेन्द्रनाथ टैगोर में मतभेद हो गया।

ई.1866 में केशवचंद्र सेन ने भारतीय ब्रह्मसमाज की स्थापना की। ईसाई धर्म से प्रभावित होने के कारण भारतीय ब्रह्मसमाज, ईसा मसीह को पूज्य मानने लगा। इस संस्था के अनुयाइयों में बाइबिल तथा ईसाई पुराणों का अध्ययन होता था। केशवचन्द्र सेन ने भारतीय ब्रह्मसमाज के प्रार्थना संग्रह में हिन्दू, बौद्ध, यहूदी, ईसाई, मुस्लिम और चीनी आदि विविध धर्मों की प्रार्थनाएं तथा वैष्णव कीर्तन सम्मिलित किये।

केशवचंद्र सेन ने नवयुवकों में सामाजिक सुधार की उग्र भावना जागृत की। उन्होंने स्त्री-शिक्षा और विधवा-विवाह का प्रबल समर्थन किया तथा बाल-विवाह, बहु-विवाह और पर्दा-प्रथा का विरोध किया। उन्होंने अन्तर्जातीय-विवाह का भी समर्थन किया। इसके परिणामस्वरूप ई.1872 में ब्रह्म मेरिजेज एक्ट पारित हुआ जिसके अनुसार अन्तर्जातीय-विवाह एवं विधवा-विवाह हो सकते थे तथा बाल-विवाह एवं बहु-विवाह का निषेध कर दिया गया।

ई.1870 में केशवचन्द्र सेन ने इण्डियन रिफार्म एसोसिएशन की स्थापना की जिसमें स्त्रियों की स्थिति में सुधार, मजदूर वर्ग की शिक्षा, सस्ते साहित्य का निर्माण, नशाबन्दी आदि उद्देश्य रखे गये। इन उद्देश्यों की पूर्ति के लिए उन्होंने साप्ताहिक समाचार पत्र सुलभ समाचार आरम्भ किया। स्त्रियों को उनके घर पर शिक्षा देने के लिए एक समुदाय बनाया और एक समुदाय सस्ती एवं उपयोगी पुस्तकों के प्रकाशन के लिए स्थापित किया।

केशवचंद्र सेन के नेतृत्व में भारतीय ब्रह्मसमाज का तीव्र गति से उत्कर्ष हुआ। नवयुवकों ने बंगाल के गांव-गांव में जाकर भारतीय ब्रह्मसमाज के सिद्धांतों का प्रचार किया तथा अनेक नवयुवक बंगाल से बाहर भी गये। ई.1866 में छपे एक लेख से ज्ञात होता है कि भारतीय ब्रह्मसमाज की बंगाल में 50, उत्तर प्रदेश में 2, पंजाब तथा मद्रास में 1-1 शाखा स्थापित हुई। भारतीय ब्रह्मसमाज के सिद्धांतों के प्रचार के लिए विभिन्न भाषाओं में 37 पत्रिकाएं प्रकाशित की जाती थीं।

ई.1878 में कूचबिहार के अवयस्क राजकुमार और केशवचन्द्र सेन की अवयस्क पुत्री का विवाह हुआ। इससे केशवचन्द्र सेन की प्रतिष्ठा को गहरा आघात लगा। ब्रह्म मेरिजेज एक्ट पारित करवाने में केशवचन्द्र सेन सबसे अधिक सक्रिय थे और अब उन्होंने स्वयं उस कानून का उल्लंघन किया। इसलिये केशवचन्द्र सेन के विरुद्ध आवाज उठी और भारतीय ब्रह्मसमाज के दो टुकड़े हो गये। केशवचन्द्र सेन के विरोधियों ने साधारण ब्रह्मसमाज स्थापित किया। केशवचन्द्र सेन के नेतृत्व में नव विधान सभा गठित की गई।

सुरेन्द्रनाथ बनर्जी का साधारण ब्रह्मसमाज

सुरेन्द्रनाथ बनर्जी तथा शिवनाथ शास्त्री जैसे महान् समाज सुधारकों ने केशवचंद्र सेन से नाराज होकर साधारण ब्रह्मसमाज की स्थापना की। इसने कलकत्ता में एक स्कूल स्थापित किया, जो बाद में सिटी कॉलेज ऑफ कलकत्ता कहलाया। इस संस्था ने पुस्तकालय तथा छापाखाने की स्थापना की तथा समाचार पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन किया। बंगला में ‘तत्व कौमुदी’ और अँग्रेजी में ‘ब्रह्म पब्लिक ओपिनियन’ नामक दो समाचार पत्र चलाये।

ई.1884 में साप्ताहिक पत्रिका संजीवनी आरम्भ की गई। ई.1888 में ब्रह्म बालिका स्कूल खोला गया। इस प्रकार साधारण ब्रह्मसमाज ने भी धर्म और समाज सुधार आन्दोलन में महत्त्वपूर्ण कार्य किया। बाद के समय में ब्रह्मसमाज की सबसे अधिक लोकप्रिय शाखा यही थी।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य अध्याय : उन्नीसवीं एवं बीसवीं सदी के समाज-सुधार आंदोलन

भारतीय पुनर्जागरण

राजा राममोहन राय और उनका ब्रह्मसमाज

युवा बंगाल आन्दोलन

केशवचन्द्र सेन का भारतीय ब्रह्म समाज

आत्माराम पाण्डुरंग और प्रार्थना समाज

स्वामी श्रद्धानंद का शुद्धि आंदोलन

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आत्माराम पाण्डुरंग और प्रार्थना समाज

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आत्माराम पाण्डुरंग

डॉ. आत्माराम पाण्डुरंग ने 31 मार्च 1867 को जस्टिस महादेव गोविन्द रानडे तथा इतिहासकार आर. जी. भंडारकर के साथ मिलकर बम्बई में प्रार्थना समाज की स्थापना की।

प्रार्थना-समाज ब्रह्म-समाज से प्रेरित हिन्दूवादी आंदोलन था। यह प्राचीन वेदों पर आधारित था एवं पूर्णतः आस्तिक विचारधारा पर खड़ा था। आत्माराम पाण्डुरंग केशवचंद्र सेन से बहुत प्रभावित थे। इस कारण ब्रह्मसमाज तथा प्रार्थना समाज की बहुत सी बातें एक जैसी थीं।

ब्रह्मसमाज की तरह प्रार्थना समाज का उद्देश्य भी समाज सुधार करना था। आत्माराम पाण्डुरंग एकेश्वरवाद तथा ईश्वर के निराकार रूप के सिद्धांत को मानते थे।

प्रार्थना समाज के दार्शनिक सिद्धांत

आत्माराम पाण्डुरंग एवं उनके साथियों का मुख्य उद्देश्य ईश्वर को प्रार्थना एवं सेवा से प्रसन्न करना था, इसलिए प्रार्थना समाज के मुख्य सिद्धांत वैष्णव भक्ति के सिद्धांतों की ही तरह थे। प्रार्थना समाज के मुख्य सिद्धांत इस प्रकार थे-

1. ईश्वर ही ने इस ब्रह्मांड को रचा है।

2. ईश्वर की आराधना से इहलोक एवं परलोक में सुख प्राप्त हो सकता है।

3. ईश्वर के प्रति अनन्य प्रेम और अनन्य आस्था रखकर उसकी प्रार्थना, उपासना और कीर्तन करना चाहिए।

4. ईश्वर को अच्छे लगने वाले कार्य करना ही ईश्वर की सच्ची आराधना है।

5. यद्यपि प्रार्थना समाज में मूर्ति-पूजा के त्याग की शर्त नहीं थी तथापि आत्माराम पाण्डुरंग एवं उनके साथी मानते थे कि ईश्वर की मूर्तियों अथवा अन्य मानव सृजित वस्तुओं की पूजा करनाए ईश्वर की आराधना का सच्चा मार्ग नहीं है।

6. प्रार्थना समाज का मानना था कि ईश्वर अवतार नहीं लेता। कोई भी पुस्तक ऐसी नहीं है जिसे स्वयं ईश्वर ने रचा अथवा प्रकाशित किया हो या पूर्णतः दोष.रहित हो।

प्रार्थना समाज के सामाजिक लक्ष्य

सामाजिक क्षेत्र में इस संस्था के मुख्य उद्देश्य इस प्रकार थे-

(1.) विधवा-विवाह को बढ़ावा देना।

(2.) जाति-प्रथा को अस्वीकार करना।

(3.) स्त्री-शिक्षा को प्रोत्साहन देना।

(4.) बाल-विवाह का बहिष्कार करना।

(5.) विवेकपूर्ण उपासना करना।

(6.) अन्य सामाजिक सुधार करना।

केशवचन्द्र सेन, नवीनचन्द्र राय, पी. सी. मजूमदार और बाबू महेन्द्रनाथ बोस जैसे प्रसिद्ध ब्रह्म समाजियों के बम्बई आगमन से प्रार्थना समाज को प्रोत्साहन मिला। प्रार्थना समाज के अनुयायियों ने अपना ध्यान अन्तर्जातीय विवाह, विधवा-विवाह और महिलाओं एवं हरिजनों की दशा सुधारने पर केन्द्रित किया।

उन्होंने अनाथाश्रम, रात्रि पाठशालाएं, विधवाश्रम, अछूतोद्धार जैसी अनेक उपयोगी संस्थाएं स्थापित कीं। प्रार्थना समाज ने हिन्दू-धर्म से अलग होकर कोई नवीन सम्प्रदाय स्थापित करने का प्रयास नहीं किया और न इसने ईसाई धर्म का समर्थन किया। इसने अपने सिद्धान्त भागवत् सम्प्रदाय से सम्बन्धित रखे।

हिन्दू कट्टरता पर करारी चोट

आत्माराम पाण्डुरंग तथा प्रार्थना समाज के कुछ सदस्यों ने हिन्दू-कट्टरता पर करारी चोट की। महाराष्ट्र के समाज सुधारक गोपाल हरिदेशमुख (लोकहितवादी) ने लिखा है- ‘धर्म यदि सुधार की अनुमति नहीं देता तो उसे बदल देना चाहिये। क्योंकि धर्म को मनुष्य ने बनाया है और यह आवश्यक नहीं है कि बहुत पहले लिखे गये धर्म ग्रंथ आज भी प्रासंगिक हों।’

गोपाल हरिदेशमुख ने पुरोहितों तथा ब्राह्मणों पर प्रहार करते हुए उन्होंने लिखा- ‘पुरोहित बहुत ही अपवित्र हैं क्योंकि कुछ बातों को बिना उनका अर्थ समझे दुहराते रहते हैं……. पण्डित तो पुरोहितों से भी बुरे हैं क्योंकि वे और भी अज्ञानी हैं तथा अहंकारी भी हैं

…….. ब्राह्मण कौन हैं और किन अर्थों में वे हमसे भिन्न हैं ? क्या उनके बीस हाथ हैं और क्या हममें कोई कमी है ? अब जब ऐसे सवाल पूछे जायें तो ब्राह्मणों को अपनी मूर्खतापूर्ण धारणाएं त्याग देनी चाहिये, उन्हें यह मान लेना चाहिये कि समस्त मनुष्य बराबर हैं तथा हर व्यक्ति को ज्ञान प्राप्त करने का अधिकार है।’

जस्टिस महादेव गोविन्द रानाडे का योगदान

जस्टिस महादेव गोविन्द रानाडे ने प्रार्थना-समाज के माध्यम से बहुत कार्य किया। जस्टिस महादेव गोविन्द रानाडे (ई.1842-1901) ने इस संस्था के माध्यम से बहुत काम किया। उन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन प्रार्थना समाज के उद्देश्यों को आगे बढ़ाने में लगाया। वे समाज सुधार के साथ राष्ट्रीय प्रगति के प्रबल पक्षधर थे। उन्होंने ई.1884 में दकन एजूकेशन सोसायटी तथा विधवा-विवाह संघ की स्थापना की।

उन्होंने भारतीय सुधारों को नवीन दिशा दी। प्रार्थना समाज धार्मिक गतिविधियों की अपेक्षा सामाजिक क्षेत्र में अधिक कार्यशील रहा और पश्चिमी भारत में समाज सुधार सम्बन्धी विभिन्न कार्यकलापों का केन्द्र रहा। प्रार्थना समाज ने महाराष्ट्र में समाज सुधार के लिए वही कार्य किया, जो ब्रह्मसमाज ने बंगाल में किया था।

प्रार्थना समाज का प्रभाव सीमित था और यह संस्था शीघ्र ही छिन्न-भिन्न हो गई।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य अध्याय : उन्नीसवीं एवं बीसवीं सदी के समाज-सुधार आंदोलन

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स्वामी दयानन्द सरस्वती और आर्य समाज

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स्वामी दयानन्द सरस्वती और आर्य समाज

स्वामी दयानन्द सरस्वती

स्वामी दयानन्द सरस्वती का जन्म ई.1824 में गुजरात के टंकारा परगने के शिवपुर ग्राम में सम्पन्न एवं रूढ़िवादी ब्राह्मण परिवार में हुआ। उनके बचपन का नाम मूलशंकर था। 14 वर्ष की आयु में उन्होंने एक चूहे को शिवलिंग पर चढ़कर प्रसाद खाते देखा तो उनका मूर्ति-पूजा से विश्वास उठ गया। जब वे 21 वर्ष के हुए तो उनके पिता ने उनके विवाह का प्रबन्ध किया किंतु वे ई.1845 में आध्यात्मिक ज्ञान की खोज में, घर छोड़कर चल दिये।

15 वर्षों तक वे विभिन्न स्थानों पर भ्रमण तथा अध्ययन करते रहे। ई.1860 में वे मथुरा पहुँचे जहाँ उन्होंने दण्डी स्वामी विरजानन्द के चरणों में बैठकर ज्ञान प्राप्त किया। स्वामी विरजानन्द वैदिक ज्ञान, भाषा एवं दर्शन के प्रकाण्ड पण्डित थे। उन्होंने दयानन्द को वेदों में निहित ज्ञान की व्याख्या समझाई। इस अध्ययन से दयानन्द को विश्वास हो गया कि वेद ही समस्त ज्ञान के स्रोत हैं।

स्वामी विरजानन्द ने उन्हें पौराणिक हिन्दू-धर्म की कुरीतियों तथा अन्धविश्वासों का खण्डन कर देश में वैदिक धर्म व संस्कृति की पुनः स्थापना करने का आदेश दिया। स्वामी दयानन्द सरस्वती जीवन भर यह कार्य करते रहे। वे पाश्चात्य सभ्यता व ईसाई धर्म से अप्रभावित थे। उनका उद्देश्य हिन्दू-धर्म की बुराइयों को दूर करके हिन्दू-धर्म की श्रेष्ठता को स्थापित करना था।

स्वामी दयानन्द सरस्वती अपने उपदेशों में संस्कृत भाषा का प्रयोग करते थे। केशवचन्द्र सेन के परामर्श से उन्होंने हिन्दी भाषा के माध्यम से जन-साधारण को उपदेश देना प्रारम्भ किया। ई.1863 में उन्होंने आगरा से धर्म-प्रचार का कार्य आरम्भ किया। ई.1874 में उन्होंने सत्यार्थ प्रकाश की रचना की। वाराणसी में कर्मकाण्डी पण्डितों से हुए शास्त्रार्थ में उन्होंने प्रमाणित किया कि वेद ही समस्त ज्ञान के आधार हैं तथा मूर्ति-पूजा वेदों की शिक्षा के प्रतिकूल है।

स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा आर्य समाज की स्थापना

महर्षि दयानंद ने हिन्दू-धर्म, सभ्यता और भाषा के प्रचार के लिए 10 अप्रेल 1875 को बम्बई में आर्य समाज की स्थापना की। उसके बाद स्वामीजी दिल्ली गये जहाँ उन्होंने ईसाई, मुसलमान और हिन्दू पण्डितों की एक सभा बुलाई। दो दिन के विचार-विमर्श के बाद भी कोई निष्कर्ष नहीं निकला। दिल्ली से वे पंजाब गये।

यहाँ जन-साधारण में उनके प्रति बड़ा उत्साह जागृत हुआ। जून 1877 में लाहौर में आर्य समाज की एक शाखा खोली गई तथा इस आन्दोलन का प्रमुख कार्यालय लाहौर ही बन गया। इसके पश्चात् स्वामी दयानन्द सरस्वती भारत के विभिन्न प्रान्तों में अपने विचारों का प्रचार करते रहे तथा आर्य समाज की शाखाएँ स्थापित करते रहे।

स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा लिखित ग्रंथ

अपने विचारों का प्रचार करने के लिए स्वामी दयानन्द सरस्वती ने तीन ग्रन्थ लिखे-

(1.) ऋग्वेदादि भाष्य-भूमिका: इस ग्रन्थ में स्वामीजी ने वेदों के सम्बन्ध में अपने दृष्टिकोण को स्पष्ट किया।

(2.) वेदभाष्य: इस ग्रन्थ में उन्होंने यजुर्वेद और ऋग्वेद की टीकाएं लिखीं।

(3.) सत्यार्थ प्रकाश: स्वामीजी का सर्वाधिक प्रसिद्ध ग्रन्थ सत्यार्थ प्रकाश है जिसमें उन्होंने समस्त धर्मों का आलोचनात्मक विश्लेषण करते हुए यह प्रमाणित किया कि वैदिक धर्म ही सर्वश्रेष्ठ है। उन्होंने इस ग्रन्थ में पौराणिक हिन्दू-धर्म की कुरीतियों का खण्डन जिस निर्भयता से किया, उसी ढंग से इस्लाम तथा ईसाइयत के ढोंग, आडम्बर तथा अन्धविश्वासों की तीव्र आलोचना की।

इससे हिन्दुओं का ध्यान अपने धर्म के मूल स्वरूप की ओर आकृष्ट हुआ और ईसाईयत की श्रेष्ठता की जो भावना बल पकड़ रही थी, उस पर रोक लग गई। स्वामीजी ने सत्यार्थ प्रकाश में अवतारवाद, तीर्थ-यात्रा, श्राद्ध, व्रत, अनुष्ठान आदि बातों का युक्ति-पूर्वक खण्डन किया।

उन्होंने प्रत्येक आर्य के लिए, वेदों में निर्दिष्ट यज्ञ तथा संध्या करना आवश्यक बताया तथा छुआछूत को अवैदिक बताया। स्वामीजी ने सहस्रों अन्त्यजों को यज्ञोपवीत देकर उन्हें आर्य समाज में आदर दिलवाया। स्वामीजी ने बाल-विवाह, बहु-विवाह तथा पर्दा-प्रथा का खण्डन किया, स्त्री-शिक्षा पर जोर दिया तथा अन्तर्जातीय-विवाह का समर्थन किया।

दयानन्द सरस्वती के अन्तिम वर्ष

स्वामी दयानन्द सरस्वती के अन्तिम वर्ष राजपूताने में व्यतीत हुए। अनेक राजाओं तथा जागीदारों ने उनकी शिक्षा से प्रभावित होकर अपने राज्यों एवं जागीरों में उनके उपदेश करवाये। उदयपुर के महाराणा सज्जनसिंह ने उनसे मनुस्मृति, राजनीति तथा राजधर्म की शिक्षा ग्रहण की। ई.1881 में उदयपुर राज्य की बनेड़ा जागीर के जागीदार राजा गोविन्दसिंह के निमन्त्रण पर स्वामीजी बनेड़ा गये जहाँ वे सोलह दिन रहे।

इस दौरान स्वामीजी ने राजा गोविन्दसिंह के दोनों पुत्रों- अक्षयसिंह और रामसिंह को सस्वर वेद पाठ करना सिखाया। इसके बाद स्वामीजी चितौड़गढ़ चले गये। अक्टूबर 1883 में स्वामीजी जोधपुर राज्य के प्रधानमंत्री सर प्रताप के निमंत्रण पर जोधपुर पहुँचे। जोधपुर नरेश जसवंतसिंह (द्वितीय) ने स्वामीजी का भव्य स्वागत किया।

जोधपुर राज्य में स्वामीजी के भाषणों की धूम मच गई। महाराजा जसवंतसिंह (द्वितीय) ने राईकाबाग महल में बैठकर स्वामीजी के उपदेश सुने। उनके उपदेशों का राजा से लेकर मन्त्रियों, राज्य कर्मचारियों और प्रजा पर गहरा प्रभाव पड़ा। राजा और मन्त्रियों ने राज्य और प्रजा की उन्नति की ओर ध्यान दिया। शिक्षा के लिये विद्यालय स्थापित किये और राज्य के न्यायालयों में उर्दू के स्थान पर हिन्दी में काम होने लगा।

स्वामी दयानन्द सरस्वती का निधन

राजा जसवंतसिंह ने स्वामीजी को दुर्ग में पधारने का निमंत्रण दिया तथा उन्हें अपने महल में लाने के लिये रत्न-जड़ित पालकी भेजी। स्वामीजी ने पालकी लौटा दी और एक दिन बिना कोई सूचना दिये पैदल ही दुर्ग पहुँचे। स्वामीजी ने देखा कि राजा नशे में धुत्त है और राज्य की प्रसिद्ध वेश्या नन्ही बाई की पालकी को कन्धे पर उठाये महल से बाहर आ रहा है। स्वामीजी ने राजा को कड़ी फटकार लगाई और किले से नीचे उतर गये।

स्वामीजी ने राजा को एक पत्र लिखा जिसमें उन्होंने राजा की तुलना नारकीय पशु से की। यह पत्र नन्ही बाई के हाथ लग गया। उसने 29 सितम्बर 1883 को स्वामीजी के दूध में पिसा हुआ काँच एवं विष मिला दिया। स्वामीजी को अजमेर ले जाया गया जहाँ 30 अक्टूबर को दीपावली के दिन उनका निधन हो गया।

स्वामीजी की मृत्यु पर रूस निवासी मैडम ब्लेवटास्की ने लिखा- ‘यह बिल्कुल सही बात है कि शंकराचार्य के बाद भारत में कोई भी व्यक्ति ऐसा नहीं हुआ जो स्वामीजी से बड़ा संस्कृतज्ञ, उनसे बड़ा दार्शनिक, उनसे अधिक तेजस्वी व्यक्ति तथा कुरीतियों पर टूट पड़ने में उनसे अधिक निर्भीक रहा हो।’

स्वामीजी की मृत्यु के बाद थियोसोफिस्ट अखबार ने उनकी सेवाओं की प्रशंसा करते हुए लिखा- ‘उन्होंने जर्जर हिन्दुत्व के गतिहीन जनसमूह पर भारी प्रहार किया और अपने भाषणों से लोगों के हृदय में ऋषियों और वेदों के लिए अपरिमित उत्साह की आग जला दी। सारे भारतवर्ष में उनके समान हिन्दी और संस्कृत का वक्ता दूसरा कोई और नहीं था।’

आर्य समाज के नियम

स्वामी दयानन्द सरस्वती तथा उनके द्वारा स्थापित आर्य समाज के सिद्धान्तों का परिचय सत्यार्थ प्रकाश में मिलता है। आर्य समाज के दस नियम इस प्रकार हैं-

(1.) ईश्वर एक है तथा निराकार है। वह सर्वशक्तिमान, न्यायकारी, दयालु, निर्विकार, सर्वव्यापक, अजर, अमर, पवित्र और सृष्टिकर्ता है। अतः उसकी उपासना करने योग्य है।

(2.) वेद ही सच्चे ज्ञान के स्रोत हैं। अतः वेदों का पढ़ना-पढ़ाना और सुनना-सुनाना समस्त आर्यों का परम धर्म है।

(3.) प्रत्येक व्यक्ति को सदा सत्य ग्रहण करने और असत्य को छोड़ने के लिए तैयार रहना चाहिये।

(4.) समस्त कार्य धर्मानुसार अर्थात् सत्य और असत्य को विचार करके करने चाहिये।

(5.) संसार का उपकार करना, अर्थात् सबकी शारीरिक, आत्मिक और सामाजिक उन्नति करना मानव समाज का मुख्य कत्र्तव्य है।

(6.) प्रत्येक व्यक्ति को अपनी ही उन्नति में सन्तुष्ट नहीं रहना चाहिये। अपितु सब लोगों की उन्नति में अपनी उन्नति समझनी चाहिये।

(7.) समस्त ज्ञान का निमित्त कारण और उसके माध्यम से समस्त बोध ईश्वर है।

(8.) प्रत्येक व्यक्ति को अविद्या का नाश और विद्या की वृद्धि करनी चाहिये।

(9.) समस्त लोगों से धर्मानुसार, प्रीतिपूर्वक एवं यथायोग्य व्यवहार करना चाहिए।

(10.) व्यक्तिगत हितकारी विषयों में प्रत्येक व्यक्ति को आचरण की स्वतन्त्रता है परन्तु सामाजिक भलाई से सम्बन्धित विषयों में सब मतभेदों को भुला देना चाहिए।

आर्य समाज के सामाजिक सुधार

(1.) जाति प्रथा का विरोध: भारतीय समाज में वर्ण व्यवस्था से प्रसूत जाति प्रथा, शताब्दियों से प्रचलित थी। इस प्रथा ने सदियों तक हिन्दू-धर्म की रक्षा की किंतु मुसलमानों के आने के बाद इसने जो संकुचित स्वरूप ग्रहण किया उससे हिन्दू समाज संकीर्ण होता चला गया।

इस कारण हिन्दुओं की सामाजिक एकता भंग हो गई। स्वामी दयानन्द ने जाति प्रथा की कटु आलोचना की। उनके अनुसार समाज में किसी व्यक्ति को जन्म के आधार पर उच्च स्थान पर पहुँचने से वंचित नहीं किया जाना चाहिये। उन्होंने छुआछूत तथा समुद्र-यात्रा-निषेध के विरुद्ध आवाज उठाई तथा प्राचीन वर्ण-व्यवस्था को उचित ठहराते हुए जाति-प्रथा का विरोध किया।

(2.) स्त्रियों की दशा में सुधार: बहु-विवाह, बाल-विवाह, पर्दा प्रथा, अशिक्षा, सती-प्रथा तथा कन्या-वध जैसी कुरीतियों के कारण हिन्दू समाज में स्त्रियों की दशा अत्यन्त ही शोचनीय थी। आर्य समाज ने स्त्रियों को समाज में उच्च स्थान दिलाने तथा स्त्री-शिक्षा पर विशेष ध्यान दिया। आर्य समाज ने बाल-विवाह, बहु-विवाह तथा पर्दा-प्रथा का घोर विरोध किया तथा विधवा-विवाह एवं स्त्री-शिक्षा का समर्थन किया।

ऋषि दयानंद ने 16 वर्ष से कम आयु की लड़कियों का विवाह बन्द करने का आह्वान किया, सती-प्रथा को पाप बताया और स्त्री-पुरुष की समानता पर बल दिया। स्वामी दयानन्द ने कहा कि स्त्रियों को वेदों का अध्ययन करने तथा यज्ञोपवीत धारण का उतना ही अधिकार है जितना पुरुषों को।

(3.) शुद्धि आंदोलन: आर्य समाज ने शुद्धि आन्दोलन को जन्म दिया। हिन्दू-धर्म छोड़कर ईसाई एवं मुसलमान हो चुके लोगों को शुद्धि संस्कार के द्वारा पुनः हिन्दू-धर्म में स्वीकार किया जाने लगा। आर्य समाज के प्रयत्नों से लाखों हिन्दुओं को जो मुसलमान और ईसाई बन गये थे, शुद्ध करके पुनः हिन्दू-धर्म में बुला लिया गया। वे आज भी हिन्दू समाज में सम्मान पूर्वक जीवन-यापन कर रहे हैं। आर्य समाज ने हिन्दू समाज के सुप्त आत्म गौरव, संगठन की भावना एवं शुद्ध धार्मिक संस्कारों को फिर से जगाया।

आर्य समाज द्वारा धार्मिक सुधार के कार्य

(1.) अंधविश्वासों का विरोध: स्वामी दयानन्द ने पौराणिक रूढ़ियों एवं मान्यताओं की निन्दा की। उन्होंने मूर्ति-पूजा, कर्मकाण्ड, अनेकेश्वरवाद, अवतारवाद, बलि-प्रथा, स्वर्ग और नरक तथा भाग्य के सर्वोपरि होने में विश्वास रखने का विरोध किया।

(2.) श्राद्ध एवं पाखण्ड का विरोध: आर्य समाज ने मृतकों के श्राद्ध का विरोध किया। उसका कहना था कि ब्राह्मणों अथवा अन्य लोगों को भोजन खिलाकर अथवा दान देकर मृतक व्यक्तियों को परलोक में सब कुछ पहुँचाने की कल्पना मूर्खतापूर्ण है।

(3.) वेदों के महत्त्व की पुनस्र्थापना: दयानंद ने वेदों की व्याख्या इस प्रकार की जिससे वेद वैज्ञानिक, सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक सिद्धान्तों के स्रोत माने जा सकें। आर्य समाज का दृढ़ विश्वास था कि कोई भी ऐसा ज्ञान नहीं है, जो वेदों से नहीं लिया जा सकता। वेदोें की श्रेष्ठता के आधार पर आर्य समाज ने हिन्दू-धर्म को इस्लाम और ईसाई धर्म के आक्रमणों से बचाने में सफलता प्राप्त की।

(4.) वैदिक कर्मों का प्रचार: आर्य समाज ने वेदों के आधार पर यज्ञ-हवन, मन्त्रोच्चारण, कर्म आदि पर बल दिया। उनका मानना था कि ईश्वर निराकार है, अतः मूर्ति-पूजा निरर्थक है। उन्होंने हिन्दुओं की मोक्ष सम्बन्धी अवधारणा का समर्थन करते हुए कहा कि ईश्वर की उपासना, अच्छे कर्म और ब्रह्मचर्य व्रत के पालन से मोक्ष प्राप्त किया जा सकता है।

आर्य समाज द्वारा साहित्यिक एवं शैक्षणिक सुधार के कार्य

स्वामी दयानन्द तथा उनके द्वारा स्थापित आर्य समाज ने साहित्यिक एवं शैक्षणिक क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण कार्य किये। स्वामी दयानन्द ने अपने ग्रन्थ हिन्दी में लिखकर राष्ट्र-भाषा के विकास में योगदान दिया। उन्होंने संस्कृत के महत्त्व को प्रतिपादित करते हुए उसके अध्ययन और अध्यापन पर बल दिया। आर्य समाज का मुख्य उद्देश्य अज्ञानता को दूर करके ज्ञान का प्रसार करना था।

अतः उसने प्राचीन आश्रम व्यवस्था को पुनः स्थापित करने की आवश्यकता पर बल दिया। उसने शिक्षा की प्राचीन गुरुकुल प्रणाली को प्रचलित किया, जहाँ विद्यार्थी ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करते हुए विद्या-अध्ययन कर सकें। सर्वप्रथम आर्य समाज ने ही भारतीयों को मैकाले की शिक्षा पद्धति के दोषों से अवगत कराया। स्त्री-शिक्षा को बढ़ावा देकर उन्होंने सही अर्थों में देश के शैक्षिक विकास की नींव रखी।

स्वामी दयानन्द की मृत्यु के बाद आर्य समाजियों में कुछ विषयों पर मतभेद हो जाने के कारण ई.1892 में इसमें दो दल बन गये। यह मतभेद इस मौलिक सिद्धान्त को लेकर आरम्भ हुआ कि क्या एक आर्य-समाजी के लिए केवल दस नियमों का पालन करना ही आवश्यक है। आर्य समाज के इन दो दलों में एक दल के नेता लाला हंसराज थे जो पाश्चात्य शिक्षा के समर्थक थे।

उनके प्रयत्नों से स्थान-स्थान पर डी.ए.वी. स्कूल एवं कॉलेज स्थापित किये गए। ये शिक्षण-संस्थाएँ सरकारी पद्धति से सम्बद्ध थीं। दूसरे दल के नेता महात्मा मुन्शीराम थे जो भारत की प्राचीन शिक्षा पद्धति को पुनः प्रचलित करना चाहते थे। महात्मा मुन्शीराम ने हरिद्वार के पास गुरुकुल कांगड़ी की तथा देश के अन्य स्थानों पर गुरुकुलों की स्थापना की।

यह देश का पहला विश्वविद्यालय था जहाँ राष्ट्र भाषा हिन्दी के माध्यम से उच्च शिक्षा दी गई। आर्यसमाज द्वारा स्थापित शिक्षण संस्थाएँ हिन्दू-धर्म और संस्कृति तथा आर्य समाज के सिद्धान्तों के प्रचार में सहायक सिद्ध हुईं। इन संस्थाओं के प्रभाव से पंजाब एवं संयुक्त प्रदेश (अब उत्तर प्रदेश) की सरकारों ने शिक्षा के क्षेत्र में बड़े सुधार किए।

आर्य समाज द्वारा राष्ट्रीय सुधार के कार्य

भारत में राजनीतिक जागृति उत्पन्न करने में आर्य समाज का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा। आर्य समाज द्वारा किये गये सामाजिक और धार्मिक सुधारों से भारतीयों में आत्मविश्वास और स्वाभिमान का विकास हुआ। आर्य समाज ने भारत के प्राचीन गौरव की चर्चा करते हुए स्वावलम्बन के विकास को प्रोत्साहन दिया। इससे स्वराष्ट्र प्रेम की भावना को बल मिला।

स्वामी दयानन्द के जीवनी लेखक ने लिखा है- ‘दयानन्द का एक मुख्य लक्ष्य राजनीतिक स्वतन्त्रता था। वास्तव में वह प्रथम व्यक्ति थे जिन्होंने स्वराज्य शब्द का प्रयोग किया। वह प्रथम व्यक्ति थे जिन्होंने विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार करना तथा स्वदेशी वस्तुओं का उपयोग करना सिखाया। वह प्रथम व्यक्ति थे जिन्होंने हिन्दी को राष्ट्रभाषा स्वीकार किया।’

स्वामीजी ने सत्यार्थ प्रकाश में लिखा है कि अच्छे-से-अच्छा विदेशी राज्य, स्वदेश की तुलना नहीं कर सकता। दयानन्द ने वेद कालीन भारत को इसलिए गौरवमय बताया क्योंकि उस समय भारत में स्वराज्य था। बालगंगाधर तिलक, लाला लाजपतराय, गोपालकृष्ण गोखले आदि जिन नेताओं ने भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन का नेतृत्व किया, वे आर्य समाज से प्रभावित थे।

काँग्रेस में उग्रवाद की भावना का विकास होने का कारण हिन्दू-धर्म की भावना थी। आर्य समाज ने इस भावना के निर्माण में योगदान दिया। डॉ. आर. सी. मजूमदार ने लिखा है- ‘आर्य समाज प्रारम्भ से ही उग्रवादी सम्प्रदाय था।’

आर्य समाज ने भारतीयों के समक्ष प्राचीन भारत के बारे में एक निश्चित विचारधारा प्रस्तुत की। आर्य समाज ने ही परस्पर अभिवादन करने हेतु विख्यात नमस्ते शब्द का प्रचलन किया, जो आज न केवल भारत में अपितु विदेशों में भी लोकप्रिय है। आर्य समाज ने हिन्दी भाषा और साहित्य को प्रोत्साहित करके अँग्रेजी भाषा पर निर्भरता कम करने का प्रयास किया। 

कुछ आधुनिक विद्वानों की धारणा है कि आर्य समाज का कार्य हिन्दू-धर्म की पुनस्र्थापना तक सीमित था। इसलिये इसने राष्ट्रीयता का विकास नहीं किया। इन विद्वानों का आरोप है कि आर्य समाज ने हिन्दू-धर्म का पुनरुत्थान करके साम्प्रदायिक भावना को पुष्ट किया। कुछ अँग्रेज लेखकों, अधिकारियों एवं ईसाई धर्म-प्रचारकों ने आर्य समाज के सम्बन्ध में इसी प्रकार के उल्टे-सीधे प्रचार किये।

वेलेण्टाइन शिरोल ने लिखा है- ‘आर्य समाज का उद्देश्य समाज सुधार की अपेक्षा हिन्दू-धर्म को विदेशी प्रभाव से मुक्त करना था।’ शिरोल के इन आरोपों का प्रत्युत्तर लाला लाजपतराय ने अपनी पुस्तक हिस्ट्री ऑफ द आर्य समाज में बड़े प्रभावशाली ढंग से दिया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि आर्य समाज के चिंतन का आधार हजारों साल पुराने वेद हैं जिनसे प्रेरणा प्राप्त करना भारतीय समाज की मुख्य धारा को फिर से जीवित करना है इसलिये आर्य समाज को साम्प्रदायिक आन्दोलन की संज्ञा किसी भी प्रकार नहीं दी जा सकती।

अपितु जो लोग आर्य समाज पर साम्प्रदायिक होने का आरोप लगाते हैं, वस्तुतः वे स्वयं साम्प्रदायिक सोच रखते हैं तथा भारत की मूल सांस्कृतिक धारा के प्रवाह को निरुद्ध करना चाहते हैं। आर्य समाज वास्तव में एक ऐसा शक्तिशाली आन्दोलन था, जिसके फलस्वरूप हिन्दू समाज में नव-चेतना एवं आत्म-सम्मान के भाव जागृत हुए तथा हिन्दू यह अनुभव करने लगे कि हिन्दू-धर्म और संस्कृति, विश्व के अन्य समस्त धर्मों एवं संस्कृतियों से श्रेष्ठ है। आर्य समाज ने भारतीयों में स्वाभिमान और राष्ट्र प्रेम की एक अद्भुत लहर उत्पन्न की तथा धर्म, समाज और शिक्षा के क्षेत्र में महान् योगदान दिया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य लेख : उन्नीसवीं एवं बीसवीं सदी के समाज-सुधार आंदोलन

भारतीय पुनर्जागरण

राजा राममोहन राय और उनका ब्रह्मसमाज

युवा बंगाल आन्दोलन

केशवचन्द्र सेन का भारतीय ब्रह्मसमाज

आत्माराम पाण्डुरंग और प्रार्थना समाज

स्वामी दयानंद सरस्वती और आर्य समाज

स्वामी श्रद्धानंद का शुद्धि आंदोलन

रामकृष्ण परमहंस

स्वामी विवेकानन्द

थियोसॉफिकल सोसायटी

विभिन्न सम्प्रदायों में सुधार आंदोलन

समाजसुधार आंदोलनों का मूल्यांकन

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