Monday, July 15, 2024
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अध्याय-46 – उन्नीसवीं एवं बीसवीं सदी के समाज-सुधार आंदोलन (अ)

मुझे गर्व है कि मैं उस धर्म से हूँ जिसने दुनिया को सहिष्णुता और सार्वभौमिक स्वीकृति का पाठ पढ़ाया है। हम सिर्फ सार्वभौमिक सहिष्णुता पर ही विश्वास नहीं करते बल्कि, हम सभी धर्मों को सच के रूप में स्वीकार करते हैं।           

– स्वामी विवेकानंद, शिकागो सम्मेलन।

भारतीय सभ्यता, समाज एवं संस्कृति का विकास विश्व की अन्य संस्कृतियों से पूर्णतः पृथक एवं स्वतंत्र रूप से हुआ था। यह विश्व की प्राचीनतम संस्कृति थी जो मनुष्य मात्र के कल्याण के सिद्धांत पर विकसित हुई थी तथा इसमें धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष को जीवन के महत्वपूर्ण एवं बराबर अंग माना गया था किंतु मध्य-काल में देश की राजनीतिक शक्ति मुस्लिम हाथों में चली गई जिसके कारण भारतीय संस्कृति एवं समाज ने स्वयं को नष्ट होने से बचाने के लिए अपने आप को धर्म एवं भक्ति की मजबूत दीवारों में बंद कर लिया।

इस काल में हिन्दुओं की सामाजिक परम्पराएं एवं रीति-रिवाज धार्मिक अनुष्ठानों की तरह पवित्र माने जाने लगे जिसमें नवीन चिंतन के लिए स्थान नहीं बचा। इसलिए मध्य-कालीन वैष्णव-भक्तों ने हिन्दुओं को एक ओर तो उदारता, सहिष्णुता एवं प्रेम आधारित जीवन जीने का रास्ता दिखाया तथा दूसरी ओर अपने धर्म पर टिके रहने के लिए आतताइयों से संघर्ष करने के लिए आत्म-बल प्रदान किया।

सत्रहवीं-अठारहवीं शताब्दी में देश की राजनीतिक सत्ता यूरोपियन जातियों के हाथों में चली गई तथा ई.1765 की इलाहाबाद संधि के बाद अंग्रेेज इस देश के स्वामी हो गए।

19वीं शताब्दी के आरम्भ तक भारतीय सभ्यता पश्चिमी सभ्यता से पूर्णतः प्रभावित हो गयी थी। भारत का शिक्षित वर्ग पाश्चात्य सभ्यता और ज्ञान को श्रेष्ठ मानने लगा था और अपनी सभ्यता और संस्कृति की श्रेष्ठता में उनका विश्वास समाप्त होता जा रहा था। ईसाई धर्म-प्रचारक हिन्दू-धर्म की कमजोरियों को लक्ष्य करके हिन्दू-धर्म को असभ्य लोगों के धर्म के रूप में प्रचारित कर रहे थे।

उनके दुष्प्रचार से प्रभावित होकर कुछ शिक्षित हिन्दुओं ने ईसाई धर्म को अपना लिया। मधुसूदन दत्त, नीलकण्ठ शास्त्री तथा रमाबाई आदि कई व्यक्ति ईसाई बन गए। इससे भारतीय बुद्धिजीवी वर्ग आहत हुआ। इसलिए देश के विचारवान नौजवान, समाज में पुनः आत्म-सम्मान जागृत करने एवं भारतीयों में अपने धर्म, संस्कृति एवं राष्ट्र के प्रति गौरव की भावना जगाने के लिए आगे आए।

पुनर्जागरण का अर्थ

ई.1857 की क्रांति के बाद अर्थात् 19वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में भारतीयों में अपनी पराजय से उत्पन्न निराशा की दशा को सुधारने के लिए जिस चेतना का प्रादुर्भाव हुआ, वह भारतीय पुनर्जागरण कहलाता है। इस काल में भारतीयों ने अपने प्राचीन इतिहास, परम्पराओं और संस्कृति से जुड़े रहते हुए भी पश्चिमी सभ्यता से प्राप्त हो रहे नवीन ज्ञान एवं चिंतन को अपनाने का प्रयास किया। तथा धार्मिक, सामाजिक और राजनीतिक क्षेत्र में सुधारों की प्रक्रिया आरम्भ की।

18वीं शताब्दी में भारत में जो सामाजिक एवं सांस्कृतिक अवनति दिखाई देती है, उसका मूल कारण धार्मिक एवं सामाजिक जीवन की बुराईयां तथा विकृतियां हैं, राजनीतिक पराधीनता या पतन तो उसका परिणाम है। अतः पुनर्जागरण का यह कार्य धार्मिक और सामाजिक क्षेत्र से प्रारम्भ हुआ और कालान्तर में इसने राजनीतिक जागरण को जन्म दिया।

इसलिए भारतीय पुनर्जागरण को ‘धार्मिक एवं सामाजिक पुनर्जागरण’ का नाम दिया है। भारत की पुनर्जागृति मुख्यतः आध्यात्मिक थी तथा इसने राष्ट्रीय आन्दोलन का रूप धारण करने से पूर्व सामाजिक और धार्मिक आन्दोलन का सूत्रपात किया। रामधारीसिंह दिनकर ने धार्मिक एवं सामाजिक पुनर्जागरण के दो प्रमुख लक्षण बताए हैं- (1.) अतीत के प्रति गौरव की भावना और (2.) प्रवृत्तिवाद।

भारत में भी पुनर्जागरण का प्रथम लक्षण अपने अतीत के प्रति गौरव उत्पन्न होना था। भारतीय बुद्धिजीवियों ने यह अनुभव किया कि हमें पश्चिम से विज्ञान के अतिरिक्त अन्य कुछ नहीं सीखना है क्योंकि भारत की सांस्कृतिक विरासत विश्व में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण और गौरवपूर्ण है। भारतीयों के मन में इस विश्वास की उत्पत्ति का सर्वप्रमुख कारण भारतीयों के पास सदियों से उपलब्ध वेदान्त के ज्ञान का होना था।

पुनर्जागरण का दूसरा लक्षण प्रवृत्तिवाद को अपनाना अर्थात् निवृत्तिवाद का त्याग करना था। महात्मा बुद्ध के समय से भारतीयों में निवृत्तिवाद की भावना घर कर गई थी जिसमें भौतिक उपलब्धियों के स्थान पर आध्यात्मिक उन्नति एवं व्यक्तिगत आचरण की शुद्धता पर ही ध्यान दिया जा रहा था। भारतीय बुद्धिजीवी यूरोप के व्यक्तिवादी दृष्टिकोण की विशेषताओं एवं उपलब्धियों को भलीभांति समझ पा रहे थे।

उन्होंने अनुभव किया कि यूरोप की श्रेष्ठता का कारण यह नहीं कि उनके पास भारतीयों से अधिक मेधा है, या भारतीयों से अधिक विज्ञान है या युद्ध के भयानक अस्त्र-शस्त्र हैं, अपितु यूरोप की श्रेष्ठता का कारण यूरोपवासियों का जीवन के विषय में प्रवृत्तिमय दृष्टिकोण है। उन्होंने सामाजिक विन्यास की मजबूती एवं भौतिक संसाधनों की उपलब्धियों के माध्यम से स्वयं को शक्तिशाली बनाया है। भारतीयों को भी जातीय गौरव, राष्ट्रवाद एवं भौतिक उपलब्धियों के बारे में सोचना पड़ेगा।

भारतीय पुर्जागरण के कारण

आरम्भ में भारतीय पुनर्जागरण एक बौद्धिक आन्दोलन था जिसने हमारे साहित्य, शिक्षा तथा चिंतनधारा को प्रभावित किया। दूसरे चरण में यह सामाजिक और धार्मिक आन्दोलनों में बदल गया। तीसरे और अन्तिम चरण में इस आंदोलन ने राजनैतिक आन्दोलन का रूप ले लिया जिसके परिणास्वरूप हमें राजनीतिक स्वतंत्रता प्राप्त हो सकी। 19वीं शताब्दी के इस पुनर्जागरण के कई कारण थे-

(1.) एशियाई देशों में जन-जागरण: 19वीं शताब्दी में सम्पूर्ण एशिया में जन-जागृति की लहर व्याप्त थी। चीन में विदेशियों के प्रभुतव के विरुद्ध अनेक गुप्त समितियों का निर्माण हो चुका था जिन्होंने चीन में विद्रोही गतिविधियों को जन्म दिया तथा सनयातसेन ने देश में जागृति उत्पन्न करने का उत्तरदायित्व सम्भाला।

इसी प्रकार जापान में, ‘सम्राट का आदर करो, विदेशियों को भगा दो।’ का नारा गूँजने लगा तथा मुत्सोहितो ने जापान में जागृति उत्पन्न करने का प्रयास किया। टर्की में भी राष्ट्रीयता की लहर उत्पन्न हो रही थी, जो सुल्तान के निरंकुश शासन को उखाड़ फेंकना चाहती थी। यद्यपि भारत में जन-जागृति की भावना बहुत पहले से विद्यमान थी तथापि अन्य देशों की जागृति ने भारतीय जागृति की लहर को बल प्रदान किया। वस्तुतः एशियाई देश एक दूसरे से प्रेरणा ग्रहण करके आगे बढ़ रहे थे।

(2.) नए मध्यम वर्ग का विकास: 19वीं शताब्दी में भारत में नए मध्यम वर्ग का विकास हुआ जिसने परम्परागत सामाजिक संगठनों अर्थात् जाति-प्रथा, एवं वैवाहिक रीति-रिवाजों को चुनौती दी। शिक्षित मध्यम वर्ग में सभी जातियों के लोग सम्मिलित थे। जब विभिन्न वर्गों में व्यावसायिक समानता स्थापित होने लगी, तब जातीयता पर आधारित भेदभाव समाप्त करने की भावना भी प्रबल होने लगी तथा अन्तर्जातीय प्रतिबन्धों के विरुद्ध आवाज उठने लगी।

इस काल का मध्यम वर्ग पाश्चात्य सभ्यता के सामाजिक विन्यास से प्रभावित था और वह भारतीय सामाजिक जीवन को अंग्रेजों के सामाजिक जीवन के अनुरूप बनाना चाहता था। इसलिए 19वीं शताबदी के समाज सुधार आन्दोलन जीवन-पद्धति में बदलाव लाने के लिए किए गए। इनमें स्त्रियों की शिक्षा, पर्दा प्रथा समाप्ति, अन्तर्जातीय-विवाह के प्रतिबन्धों को तोड़ना, बाल-विवाह को रोकना, विधवा-विवाह के प्रतिबन्धों को समाप्त करना आदि सुधार प्रमुख थे।

(3.) अंग्रेजों द्वारा आर्थिक शोषण: अंग्रेजों ने भारत में आर्थिक शोषण की नीति अपनाई। हिन्दू किसान मुसलमानों के समय से ही निर्धन हो चुके थे किंतु अब अंग्रेजों ने मुसलमानों का भी आर्थिक शोषण किया तथा किसानों, शिल्पियों आदि को जीवन निर्वाह के अन्य साधन खोजने के लिए विवश कर दिया। प्रजा के आर्थिक एवं राजनीतिक शोषण ने भारत की उन शक्तियों को सक्रिय कर दिया, जो भारत के प्राचीन गौरव को पुनः स्थापित करने की कामना रखते थे।

कृषि के वाणिज्यिीकरण के कारण खेतों की पैदावार बढ़ी, विपणन के साधन बढ़े किंतु इस वृद्धि में से किसान के हाथ बहुत कम हिस्सा ही लगा। सारी मलाई अंग्रेज शक्ति लूट लेती थी। औद्योगिकीकरण के कारण किसान के लड़के अपने गांव छोड़़कर नगरों को पलायन करने लगे। इस नए परिवेश में उन्होंने नए ढंग से सोचना आरम्भ किया।

वे नियतिवाद एवं यथास्थिति वाद को छोड़कर परिश्रम के आधार पर भाग्य बदलने के विचारों से आप्लावित हो रहे थे तथा निवृत्तिवाद की भावना को त्यागकर प्रवत्तिवाद की ओर बढ़ रहे थे। लोगों की आकांक्षाएं एवं जीवन से अपेक्षाएं बढ़ रही थीं।

(4.) पाश्चात्य शिक्षा का प्रभाव: ई.1835 में अंग्रेजी को शिक्षा का माध्यम स्वीकार कर लिया गया। इस कारण अनेक भारतीय युवक शिक्षा प्राप्त करने हेतु इंग्लैण्ड जाने में सक्षम हो गए। उन्होंने अन्य यूरोपिय देशों की यात्राएं कीं तथा वहाँ के नागरिक जीवन को देखा। मध्यमवर्गीय शिक्षित भारतीय युवकों को पाश्चात्य देशों की सभ्यता और साहित्य का ज्ञान हुआ और उनमें अपने देश और समाज के उत्थान के प्रति उत्साह उत्पन्न हुआ।

वे भी यूरोपीय लोगों की तरह गुलामी से घृणा करने लगे जो जन-जीवन में समस्त प्रकार की विसंगतियां एवं असंतुलन उत्पन्न कर रहा था। उन्हें रूढ़वादी भारतीय समाज के खोखलेपन की भयावह स्थिति का ज्ञान हुआ। इस प्रकार अंग्रेजी पढ़े-लिखे वर्ग में समाज सुधार की आवाज सबसे पहले उठी किन्तु इस कार्य में वास्तविक सफलता उन युवाओं को मिली जिन्हें अंग्रेजी शिक्षा के साथ-साथ प्राचीन भारतीय संस्कृति एवं उसके गौरव का भी ज्ञान था।

यदि ऐसा नहीं होता तो पढ़ा-लिखा भारतीय युवक भारतीय संस्कृति से घृणा करने वाला एवं अंग्रेजी संस्कृति का अनुकरण करने वाला बन जाता। ऐसी जागृति देश का उत्थान करने की बजाय, और अधिक पतन करती।

(5.) ईसाई धर्म-प्रचारकों की आलोचना: ईसाई धर्म-प्रचारकों ने भारतीय धर्म का उपहास उड़ाया तथा भारतीय सामाजिक ढांचे की आलोचना की। उन्होंने हिन्दू समाज के लिए अपशब्दों का प्रयोग किया तथा ईसाई धर्म की श्रेष्ठता का प्रचार किया। गवर्नर जनरल कार्नवालिस से लेकर केनिंग तक और उसके बाद अनेक गवर्नर-जनरलों के भारतीयों के सम्बन्ध में तिरस्कारात्मक विचार थे।

बैंटिक, मेटकाफ, मेकाले आदि अंग्रेज अधिकारी भारत में व्याप्त विभिन्न सामाजिक कुरीतियों एवं अन्धविश्वासों को दूर करना चाहते थे किंतु उनके मन में भारतीय समाज एवं संस्कृति के प्रति घृणा एवं तिरस्कार की भावना थी।

इस कारण उनका सुधारवादी दृष्टिकोण भारतीयों को पाश्चात्य संस्कृति की श्रेष्ठता का पाठ पढ़ाने तक सीमित होकर रह गया था। ऐसी स्थिति में भारतीयों को यह समझ में आना स्वाभाविक ही था कि देश में वास्तविक सुधार केवल भारतीय ही ला सकते हैं और उसका माध्यम भी भारतीयता ही हो सकता है।

(6.) भारतीय समाचार-पत्र एवं साहित्य: भारतीय समाचार-पत्रों, पत्रिकाओं, साहित्य आदि ने भारतीय पुनर्जागरण में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। प्रेस की स्थापना से विचारों के तेजी से प्रसार की सुविधा उपलब्ध हो गयी। कुछ ऐसे समाचार-पत्र एवं पत्रिकायें प्रकाशित होने लगीं जिनमें अंग्रेजों द्वारा किए जा रहे दुव्र्यवहार, नस्लीय-भेद और शोषण के समाचार प्रकाशित होते थे।

साथ ही भारतीय राष्ट्रवादियों के विचारोत्तेजक लेख एवं कविताएं भी छपते थे। इस कारण पढ़ा-लिखा समाज तेजी से मानसिक विकास करने में सफल हो गया। रेलों के विस्तार से भी देश के विभिन्न हिस्सों के नागरिकों को एक-दूसरे के विचार जानने का अवसर मिला।

(7.) गैर-सरकारी अँग्रेजों की भूमिका: उन्नीसवीं सदी के आरम्भ में अनेक गैर-सरकारी अँग्रेज भारत आये। ये अँग्रेज ब्रिटेन के औद्योगिक बुर्जुआ वर्ग की प्रगतिशील विचारधारा से प्रभावित थे। ये लोग भारत में वकील, शिक्षक, पत्रकार आदि बन कर आये थे। कम्पनी सरकार के अधिकारी इन्हें तिरस्कार-वश इण्टर-लोफर (अनधिकार प्रवेशकारी) कहते थे।

इन अँग्रेजों का कई बातों पर कम्पनी के अधिकारियों से वाद-विवाद होता रहता था। इन्हीं लोगों ने कुछ प्रमुख भारतीयों के साथ मिलकर ईस्ट इण्डिया कम्पनी के शासन के विरुद्ध आन्दोलन चलाने के लिए लैण्ड होल्डर्स सोसाइटी (ई.1838), ब्रिटिश इण्डिया सोसाइटी (ई.1839) और बंगाल ब्रिटिश इण्डिया सोसाइटी (ई.1843) आदिप्रभावशाली संगठन स्थापित किये थे। इन संगठनों द्वारा चलाये गये आन्दोलनों से भारतीयों में नवीन दृष्टि का विकास हुआ।

(8.) यूरोपीय विद्वानों द्वारा भारतीय संस्कृति की प्रशंसा: मैक्समूलर, मोनियर विलयम्स, रौथ, सैसून, बुनर्फ आदि यूरोपीय विद्वानों ने प्राचीन भारतीय साहित्य, धर्म और संस्कृति के सम्बन्ध में शोध करके विश्व के सम्मुख भारतीयों के राजनैतिक, सांस्कृतिक और सामाजिक इतिहास का समृद्ध चित्र प्रस्तुत किया। इन अनुसन्धानों के परिणाम स्वरूप भारत की प्राचीन आध्यात्मिक श्रेष्ठता और दैदीप्यमान सभ्यता के चिन्ह भारतीयों के समक्ष आए। इससे भारतीयों का आत्म विश्वास तथा आत्माभिमान बढ़ा और उनमें राष्ट्रप्रेम की भावना ने जोर पकड़ा।

इन समस्त कारणों से भारत में पुनर्जागरण की एक अद्भुत लहर उत्पन्न हो गयी। भारत में नवचेतना की जो लहर उत्पन्न हुई उसने शैक्षणिक, सामाजिक, धार्मिक और राजनीतिक समस्त क्षेत्रों को प्रभावित किया।

भारतीय पुनर्जागरण का स्वरूप

भारत में 19वीं शताब्दी के पुनर्जागरण के फलस्वरूप जो समाज सुधार आरम्भ हुए, वह वास्तव में प्राचीन व्यवस्थाओं के विरुद्ध शांत-विद्रोह था। इन विद्रोही व्यक्तियों को व्यंग्य से ‘सुधारक’ कहते थे। इन सुधारकों का उद्देश्य प्रचलित सामाजिक ढांचे में परिवर्तन करना नहीं था, अपितु उसमें रहन-सहन की नवीन प्रणाली का समावेश करना था। भारत में समाज सुधार की परम्परा नई नहीं थी।

16वीं से 18वीं शताब्दी तक यह कार्य सन्तों एवं सन्यासियों द्वारा किया गया, जिसे भक्ति-आन्दोलन कहा जाता है। 19वीं शताब्दी में इस कार्य में गृहस्थ व्यक्तियों का योगदान अधिक रहा। इस सामाजिक आन्दोलन के तीन चरण थे-

(1.) ई.1877 से पहले समाज-सुधार के प्रयास व्यक्तिगत स्तर पर किए गए।

(2.) ई.1877 से ई.1919 के बीच समाज सुधार के संगठित प्रयास किए गए।

(3.) ई.1919 के बाद समाज सुधारों की दिशा राजनीतिक चेतना की ओर मोड़ दी गई।

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