Wednesday, May 22, 2024
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अध्याय-46 – उन्नीसवीं एवं बीसवीं सदी के समाज-सुधार आंदोलन (र)

अन्य सुधार आन्दोलन

भारत में ऐसे कई धार्मिक-सामाजिक सुधार आन्दोलन हुए जिनके कार्य तथा उद्देश्य बहुत छोटे क्षेत्र तक सीमित थे। पारसियों ने अपने धर्म और समाज सुधार के लिए धार्मिक सुधार समुदाय की स्थापना की। दादा भाई नौरोजी पारसी पुरोहित परिवार से थे। उन्होंने पारसी धर्म के सुधार हेतु महत्त्वपूर्ण कार्य किया।

महादेव गोविन्द रानाडे ने सामाजिक सुधारों के साथ डंकन एजूकेशन सोसायटी स्थापित कर शिक्षा के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण कार्य किया। हिन्दुओं के वैष्णव सम्प्रदाय में भी कुछ धार्मिक आन्दोलन हुए। माधव सम्प्रदाय ने अपनी धर्म सुधार सभा बनायी। शंकराचार्य के समर्थकों ने अपने मत का अलग प्रचार किया।

ज्योति बा फुले और सत्य शोधक समाज

ज्योति बा फुले का जन्म ई.1828 में एक माली परिवार में हुआ। उन्होंने शक्तिशाली गैर ब्राह्मण आंदोलन को जन्म दिया तथा हिन्दू-धर्म में प्रचलित प्रथाओं का विरोध किया। ई.1854 में उन्होंने अछूतों के लिये विद्यालय खोले तथा विधवाओं के लिये अनाथालयों की स्थापना की।

ज्योति बा फुले को ब्राह्मणों की पुरोहिताई से गहरी घृणा थी। दलित वर्गों के उत्थान के लिये उन्होंने ई.1873 में सत्य शोधक समाज की स्थापना की। ब्राह्मण विरोधी गतिविधियों को संगठित रूप में प्रसारित करने हेतु उन्होंने दो पुस्तकों- सार्वजनिक सत्य धर्म पुस्तक तथा गुलामगिरि की रचना की।

राधास्वामी सत्संग

ई.1861 में शिवदयाल ( ई.1818-1878) ने आगरा में राधास्वामी सत्संग की स्थापना की। राधास्वामी सत्संग के गुरु, ईश्वर के अवतार माने जाते थे। इसलिए इस संस्था में गुरु-भक्ति की प्रधानता थी। इस संस्था के अनुयायी जाति-पाँति के भेदभाव के बिना, ईश्वर की अराधना करते थे। वे ईश्वर, जीवात्मा और जगत को सत्य मानते थे। कबीर, दादू, नानक आदि सन्तों की वाणियाँ इनके धार्मिक ग्रन्थ थे।

ये समस्त धर्मों को समान मानते थे तथा प्रेम और भ्रातृत्व का प्रचार करते थे। राधास्वामी सत्संग भक्ति-मार्ग और योग-मार्ग का एक मिश्रण था। इस संस्था ने धार्मिक जागृति का काम किया। साथ ही जाति-प्रतिबन्धों का बहिष्कार किया, शिक्षा का प्रसार कर सांस्कृतिक जागरण और राष्ट्र निर्माण के कार्य में बहुमूल्य योगदान दिया।

पारसी समाज में सुधार आंदोलन

दादा भाई नौरोजी तथा एस. एस. बंगाली ने पारसी धर्म और समाज में सुधार लाने के लिए बहुत कार्य किया। उन्होंने पारसियों की सामाजिक दशा सुधारने तथा पारसी धर्मिक पुनरुत्थान के उद्देश्य से ई.1851 में रहनुमाई मज्दयासना सभा की स्थापना की। ई.1910 में पारसी धर्मगुरु ढोला के प्रोत्साहन से एक पारसी अधिवेशन का उद्घाटन हुआ जिसने पारसी वर्ग की बहुत सेवा की।

पारसियों ने अपने सुधार के साथ-साथ देश के सामाजिक तथा राजनैतिक उत्थान में भी योगदान दिया। देश की अनेक पारसी संस्थाएँ पारसी वर्ग की दानशीलता तथा धर्मपरायणता की द्योतक हैं। दादाभाई नौरोजी, सर फिरोजशाह मेहता, सर दीन शार्दूलजी आदि पारसी नेताओं ने भारत की सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक प्रगति में बहुमूल्य योगदान दिया।

सिक्ख समाज में सुधार आंदोलन

उन्नीसवीं सदी में पंजाब में सिंह सभा तथा प्रधान खालसा दीवान नामक संस्थाओं की स्थापना हुई। इन संस्थाओं ने पंजाब में कई गुरुद्वारे तथा कॉलेज खोले। प्रगतिशील सिक्खों ने अमृतसर में खालसा कॉलेज की स्थापना की। सिक्खों ने अपने धार्मिक व सामाजिक जीवन को शुद्ध बनाने का प्रयास किया।

 ई.1921 में सिक्खों ने अकालियों के नेतृत्व में सत्याग्रह आंदोलन आरम्भ किया। इनका मुख्य उद्देश्य गुरुद्वारों को भ्रष्ट महंतों से मुक्त कराना था। सरकार महंतों का समर्थन कर रही थी किंतु अंत में सरकार को झुकना पड़ा। इसके परिणाम स्वरूप ई.1922 में सिक्ख गुरुद्वारा कानून बनाया गया तथा ई.1925 में इसमें संशोधन किया गया।

ईसाई समाज में सुधार आंदोलन

इस काल में भारतीय ईसाइयों में भी नवजागरण का काम हुआ। उनमें अन्य धर्मों की अपेक्षा अन्धविश्वास तथा रूढ़िवादिता कम थी। अतः उनमें सुधार और परिवर्तन भी अपेक्षाकृत कम हुए। विवेकशील ईसाई पादरियों और दूरदर्शी धर्माधिकारियों ने भारतीय ईसाइयों में प्रचलित अनेक धार्मिक प्रथाओं, जो पश्चिमी प्रथाओं से भिन्न थीं, के अन्तर को दूर करके एक विशाल संगठन स्थापित करने की चेष्टा की।

ईसाई धर्म प्रचारकों ने पाश्चातय-शिक्षा के प्रसार के लिए विद्यालय स्थापित किये तथा इनकी आड़ में अदिवासियों एवं दलितों को ईसाई धर्म में सम्मिलित किया। इन नवीन ईसाइयों को शिक्षा की सुविधा देकर उनकी दशा सुधारने का प्रयत्न किया गया। अनाथलायों, औषधालयों, विद्यालयों आदि परोपकारी संस्थाओं के माध्यम से ईसाई धर्म प्रचारकों ने जन-साधारण का विश्वास अर्जित किया तथा मानव समाज की विपुल सेवा की।

समाज सुधार के प्रयासों का मूल्यांकन

19वीं शताब्दी के मध्य में समाज सुधार आन्दोलन व्यक्तिगत प्रयत्नों तक सीमित रहा किन्तु ई.1880 के बाद कुछ संगठित प्रयास किए गए। विधवा-विवाह और स्त्री-शिक्षा के क्षेत्र में सुधारकों को कुछ सफलता मिली। ज्यों-ज्यों शिक्षा का प्रसार होता गया, ये कुरीतियां कम होती गईं। लार्ड विलियम बैंटिक ने सती-प्रथा को गैर कानूनी घोषित किया। इस कार्य में राजा राममोहन राय तथा द्वारिकानाथ टैगोर का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा।

कानून का समर्थन प्राप्त होने पर भारत में यह प्रथा धीरे-धीरे समाप्त हो गयी किन्तु सती-प्रथा के बन्द होने से विधवाओं की समस्या पहले से भी अधिक गम्भीर हो गई क्योंकि देश में बाल-विधवाओं की संख्या भी बहुत अधिक थी। अतः समाज-सुधारकों ने विधवा-विवाह के लिए आन्दोलन चलाया। ईश्वरचन्द्र विद्यासागर ने विधवाओं के पुनर्विवाह के लिए आन्दोलन चलाया।

उन्होंने शास्त्रों से उद्धरण देते हुए प्रमाणित किया कि शास्त्रों में विधवा के पुनर्विवाह का निषेध नहीं है। उनके प्रयत्नों से ई.1856 में सरकार ने विधवा-विवाह को वैध घोषित कर दिया गया। धीरे-धीरे भारतीयों ने इस परिवर्तन को स्वीकार कर लिया। ई.1872 में ब्रह्म मेरिजेज एक्ट पारित किया गया, जिसमें विधवा-विवाह और अन्तर्जातीय-विवाह को वैध मान लिया गया।

बाल-विवाह को रोकने के लिए सहवास-वय अधिनियम पारित किया गया। इन सारे प्रयासों का यद्यपि तुरन्त प्रभाव नहीं पड़ा तथापि लोगों को यह बात समझ आने लगी कि बाल-विवाह अनुचित है और विधवा-विवाह उचित है।

महाराष्ट्र समाज सुधार की दृष्टि से अग्रणी रहा। महाराष्ट्र में ईसाई धर्म में दीक्षित हिन्दुओं को पुनः हिन्दू-धर्म में शामिल करने की परम्परा थी। बाल-विवाह और विधवा-विवाह के अलावा वहाँ की दशा बंगाल की तरह पिछड़ी हुई नहीं थी। जाति-पाति के बन्धन थे किन्तु 19वीं शताब्दी के मध्य में इन बन्धनों को कम कने के लिए आन्दोलन आरम्भ हो चुका था।

समाज सुधार आन्दोलन की सबसे बड़ी दुर्बलता यह थी कि सुधारकों ने समाज सुधार के जिन सिद्धान्तों का प्रचार किया, उनका वे स्वयं उनका पालन नहीं कर सके, जिसका समाज पर अच्छा प्रभाव नहीं पड़ा। इसके अतिरिक्त समस्त सुधारक, समाज सुधार की प्रत्येक बात से सहमत हों, यह आवश्यक नहीं था।

जो स्त्री-शिक्षा के समर्थक थे, उनमें से इस बात पर मतभेद था कि स्त्रियों को किस प्रकार की शिक्षा दी जाय। कुछ सुधारक सरकार से कानून बनवाकर सुधारों को लागू करने के पक्ष में थे। इसके विपरीत कुछ सुधारकों की यह दृढ़ मान्यता थी कि सामाजिक मामलों में सरकार का हस्तक्षेप अवांछनीय है।

समाज सुधार आन्दोलन की सफलता के बारे में प्रायः यह प्रश्न उत्पन्न होता है कि क्या यह आन्दोलन समाज की समस्त कुरीतियों को समाप्त करने में सफल हो सका? वस्तुतः भारतीय हिन्दू समाज शताब्दियों से एक व्यवस्था की परिधि में बंधा हुआ था। अतः उस परिधि को तोड़कर एकाएक परिवर्तन करना असम्भव था। आज भी भारत में बाल-विवाह होते हैं, कुछ लोग आज भी विधवा-विवाह को हेय समझते हैं अतः यह नहीं कहा जा सकता कि समाज द्वारा इन प्रथाओं को मान्यता प्राप्त है। किंतु इसका अर्थ यह नहीं है कि 19वीं-20वीं सदी के समाज सुधार आंदोलन निष्फल हो गए।

सुधार आन्दोलनों की शुरूआत बंगाल से हुई थी और उसके नेता राजा राममोहन राय थे। राजा राममोहन राय की मृत्यु के सौ वर्ष बाद जब ई.1933 में बंगाल के पुनर्जागरण के प्रमुख व्यक्तियों की उपस्थिति में उनकी मृत्यु-दिवस की शताब्दी मनाई गई, तब पुनर्जागरण काल के इतिहास का गौरवमय चित्र खींचा गया था, जिसमें राजा राममोहन राय को एक ‘चमकते सितारे’ के रूप में दिखाया गया।

कुछ विद्वानों ने समजा सुधार के इन प्रयासों को सामूहिक रूप से ‘भारतीय पुनर्जागरण’ कहा है। उनके अनुसार इन आन्दोलनों में बुद्धिवाद, विज्ञान, मानवतावाद जैसे कई ऐसे तत्त्व विद्यमान थे जो यूरोपिय पुनर्जागरण में भी उपस्थित थे किंतु तथ्यों के आधार पर यह धारणा पूर्णतः सत्य प्रतीत नहीं होती। इन आन्दोलनों का दृष्टिकोण छद्मवैज्ञानिकता पर आधारित था और मानवतावाद का व्यावहारिक पक्ष बहुत ही संकीर्ण था।

इनमें यूरोपीय पुनर्जागरण के कई तत्त्वों का पूर्णतः अभाव था। भौगोलिक खोज, वैज्ञानिक आविष्कार और कला एवं साहित्य के क्षेत्र में अभूतपूर्ण प्रगति यूरोपीय पुनर्जागरण की महत्त्वपूर्ण उपलब्धियाँ थीं किंतु भारतीय पुनर्जागरण में इन तत्त्वों का सर्वथा अभाव था। इस प्रकार भारतीय पुनर्जागरण, यूरोपीय पुनर्जागरण से कई अर्थोंं में भिन्न था। फिर भी, सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया के रूप में इन आन्दोलनों को ‘नवजागरण’ मानने में कोई आपत्ति नहीं है।

कुछ विद्वानों का विचार है कि इस पुनर्जागरण से भारत का आधुनिकीकरण हुआ, क्योंकि पुनर्जागरण के मूल में बुद्धिवाद, वैज्ञानिक दृष्टिकोण एवं वे आधुनिक विचार थे जो हर जगह आधुनिकता के वाहक रहे हैं। अंग्रेजी साम्राज्यवाद के समर्थकों ने भी इन आंदोलनों को भारत में आधुनिक युग का प्रारम्भ माना।

इन लोगों के अनुसार इन सुधार आन्दोलनों ने धार्मिक एवं सामाजिक अन्धविश्वास, रूढ़िवाद और क्रूर एवं अमानवीय प्रथाओं का विरोध किया, सामाजिक समता और विशेषकर महिलाओं की स्वतंत्रता का समर्थन किया तथा शिक्षा के माध्यम से आधुनिक ज्ञान, विचार एवं वैज्ञानिक दृष्टिकोण को जनमानस में प्रतिष्ठित करने का प्रयास किया किंतु कुछ विचारक इस बात से सहमत नहीं हैं।

उनके अनुसार आन्दोलनों से भले ही कुछ मौलिक परिवर्तन हुए हों परन्तु इनसे देश का आधुनिकीकरण नहीं हुआ। वस्तुतः जिसे देश का आधुनिकीकरण माना गया था, वह पश्चिमीकरण से अधिक कुछ नहीं था।

 यह सत्य है कि इन आन्दोलनों के परिणामस्वरूप देश में अंग्रेजी शिक्षा एवं पश्चिमी विचारों का प्रसार शुरू हुआ किंतु इनसे देश आधुनिक हो गया हो, ऐसा नहीं माना जा सकता। आधुनिकता के मुख्य आधार- मानव विवेक, ज्ञान, वैज्ञानिक दृष्टिकोण एवं मानवतावाद आदि हैं किंतु ये समस्त तत्त्व किसी समाज या देश विशेष को तभी आधुनिक बना सकते हैं जब इनका उस समाज के सन्दर्भ में स्वाभाविक रूप से विकास और विवेकपूर्ण उपयोग हो।

अलग-अलग देशों में आधुनिकीकरण की प्रक्रिया एवं आयाम अलग-अलग हो सकते हैं। ब्रिटेन और भारतीय जीवन की पृष्ठभूमि एक-दूसरे से पूर्णतः भिन्न थी। ऐसी स्थिति में भारत का आधुनिकीकरण, ब्रिटेन के ही मॉडल पर हो, यह आवश्यक नहीं था। भारत में आधुनिकता केवल अंग्रेजी से नहीं, अपितु संस्कृत या हिन्दी के माध्यम से भी आ सकती थी और भारत के ज्ञान-विज्ञान को भारत के परम्परागत ज्ञान-विज्ञान (जैसे आयुर्वेद, गणित, ज्योतिष, खगोल विज्ञान आदि) के अध्ययन एवं विकास के माध्यम से आधुनिक बनाया जा सकता था।

जापान और चीन का आधुनिकीकरण इस तथ्य के सफल उदाहरण हैं। इन देशों का आधुनिकीकरण स्वदेशी भाषा एवं स्वदेशी साधनों के माध्यम से हुआ। इस दृष्टि से तो भारतीय पुनर्जागरण में व्याप्त पश्चिमी प्रभाव ने भारत के आधुनिकीकरण की प्रक्रिया को कुछ सीमा तक अवरुद्ध कर दिया था।

इन आन्दोलनों के दौरान भारत में पश्चिमी उदारवाद का प्रचार हुआ। व्यावहारिक तौर पर उदारवाद के समर्थन का अन्तर्निहित परिणाम पूँजीवाद का पोषण एवं शोषण का समर्थन था। उदारवाद की जो कुछ उपयोगिता हो सकती थी, भारतीय परिस्थितियों के बीच वह भी निष्क्रिय एवं निष्फल होकर रह गई। ऐसी स्थिति में राजा राममोहन राय या सर सैयद अहमद खाँ के प्रयत्न ब्रिटिश साम्राज्यवाद के औपनिवेशिक ढांचे में तालमेल बैठाने तक ही सीमित थे।

तात्कालिक समस्या एक ब्रह्म की उपासना, सती-प्रथा या बाल-हत्या नहीं थी, अपितु आर्थिक, सामाजिक और राजनैतिक शोषण एवं गरीबी थी। इन आधारभूत प्रश्नों पर सुधारकों का ध्यान नाममात्र को ही गया। इस दिशा में अधिकांश प्रयत्न अस्पष्ट तथा असफल रहे। दूसरी तरफ, आन्दोलनों पर पश्चिमी संस्कृति के अत्यधिक प्रभाव एवं उदारवादी विचारों में आस्था ने भारत के देशी साधनों के माध्यम से आधुनिकीकरण के अवसर अवरुद्ध कर दिए और देश पश्चिमी सभ्यता की चकाचैंध में ‘आधुनिकता’ के भ्रम में जीने लगा।

सुधार आन्दोलनों के फलस्वरूप भारतीय समाज के बहुत थोड़े से हिस्से में चेतना जागृत हुई किंतु व्यापक परिवर्तन नहीं आया। आन्दोलन का वास्तविक स्वरूप मध्यमवर्गीय बना रहा और इसका कार्यक्षेत्र शहरों तक सिमट कर रह गया। सुधारकों ने किसानों या आम आदमी तक पहुँचने की कोशिश नहीं की। उनके विचारों ने अशिक्षित लोगों में सुधारों की प्रक्रिया आरम्भ नहीं की।

यदि ये सुधारवादी आन्दोलन सच्चे अर्थों में प्रगतिशील होते तो वे समाज के प्रत्येक वर्ग एवं नगरों से लेकर गांवों तक व्यापक सामाजिक परिवर्तन का शंखनाद कर सकते थे किंतु आधुनिकता का दम भरने के बावजूद ये आन्दोलन छद्म-वैज्ञानिकता के पोषक और एक सीमा तक रूढ़िवादी भी थे। पुर्जागरण काल का कोई भी आन्दोलन धर्म से ऊपर नहीं उठ सका।

ब्रह्मसमाज, आर्य समाज, रामकृष्ण मिशन आदि का सम्पूर्ण चिन्तन हिन्दू-धर्म पर आधारित था और अलीगढ़ आन्दोलन का इस्लाम पर। इनमें से कोई भी आन्दोलन समस्त भारतीय समाज को अपना कार्य-क्षेत्र नहीं बना सका। समस्त आन्दोलनों के मसले अलग-अलग थे। बाल-विवाह, सती-प्रथा एवं विधवा-विवाह हिन्दू समाज के दोष थे, जिनसे मुसलमानों का कोई सम्बन्ध नहीं था। इसी प्रकार बुरका-प्रथा एवं तीन तलाक से हिन्दुओं का कोई लेना-देना नहीं था।

बाल-विवाह और विधवा-विवाह के सम्बन्ध में हिन्दू सुधारकों में मतभेद थे। केशवचन्द्र सेन एवं उनके समर्थक बाल-विवाह के विरोधी थे किंतु स्वयं केशव चन्द्र सेन ने अपनी 13 वर्षीय पुत्री का विवाह पूरे वैदिक कर्मकाण्ड के साथ कूचबिहार के राजा के साथ कर दिया। अंतद्र्वद्व से राजा राममोहन राय भी मुक्त नहीं थे। उनके पास दो घर थे।

एक में स्वयं राजा राममोहन राय को छोड़़कर सब कुछ विदेशी था, दूसरे में राजा साहब को छोड़़ कर सब कुछ देशी था। वैसे ही सर सैयद अहमद खाँ पश्चिम के आधुनिक विचारों से प्रभावित तो थे किन्तु पर्दा प्रथा जैसे कई मुद्दों पर उनका दृष्टिकोण स्पष्ट नहीं था।

इन आन्दोलनों की विफलताओं का एक बड़ा कारण भारत का पराधीन होना भी था। साम्राज्यवादी शोषण और औपनिवेशिक ढांचे के भीतर होने वाले इन आन्दोलनों को बहुत अधिक सफलता मिल भी नहीं सकती थी। समस्त तरह की स्वतंत्रताओं की सबसे महत्त्वपूर्ण शर्त आर्थिक एवं राजनैतिक शोषण से मुक्ति थी। भारत का तात्कालीन शासन तन्त्र ऐसी स्वतंत्रता के पक्ष में नहीं था। ऐसी परिस्थितियों में सीमित उदारवादी सुधार ही हो सकते थे, कोई सामाजिक या सांस्कृतिक क्रांति नहीं।

आन्दोलन के परिणामस्वरूप अंग्रेजी शिक्षा और पश्चिमी विचारों का भारत में तेजी से प्रसार हुआ। इस काम में अंग्रेजों ने पश्चिमी विद्वानों तथा ईसाई पादरियों के साथ-साथ भारतीय सुधारकों के सहयोग एवं समर्थन का भी उपयोग किया। इससे देश में ब्रिटिश शासन के प्रति विरोध थमा रहा। राजा राममोहन राय और सैयद अहमद खाँ आदि ने अंग्रेजों का समर्थन भी किया।

सुधार आन्दोलनों पर पश्चिमी तत्त्वों का प्रभाव होने के कारण देश की वास्तविक सामाजिक एवं सांस्कृतिक समस्याओं को ठीक से समझ पाना कठिन हो गया जिससे अधिक महत्त्वपूर्ण मसलों को छोड़़कर सुधारक छोटे-छोटे मसलों से उलझते रहे। इस प्रकार पश्चिमी प्रभाव ने सुधारकों में स्वतन्त्र चिन्तन की प्रक्रिया को कमजोर किया और देश की तत्कालीन वास्तविकताओं की पृष्ठभूमि में पुनर्जागरण के आन्दोलन को स्वतंत्र रूप से विकसित नहीं होने दिया।

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