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आदिवाराह अवतार की कथा

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आदिवाराह अवतार की कथा

भगवान श्रीहरि ने आदिवाराह अवतार लेकर धरती का उद्धार किया!

दक्ष पुत्री दिति और मरीचि के पुत्र कश्यप से उत्पन्न के दैत्य हिरण्याक्ष ने पृथ्वी को पाताल में छिपा दिया ताकि देवगण कभी धरती पर पहुंच कर यज्ञ-भाग प्राप्त न कर सकें। धरती के रसातल में चले जाने से समस्त ब्रह्मांड में उथल-पुथल मच गई। सृष्टि के नियम भंग होने लगे और चतुर्दिक हा-हा-कार मच गया।

ऋषियों-मुनियों तथा देवताओं ने मिलकर भगवान श्री हरि विष्णु से प्रार्थना की- ‘भगवन्! इन महापराक्रमी असुरों ने देवताओं का यज्ञ भाग छीन लिया है, पूजा-पाठ, धार्मिक कर्मकांड समाप्त कर दिए हैं और समस्त भूमण्डल को रसातल में ले गए हैं। इस कारण ब्रह्माजी की बनाई सृष्टि में बड़ा व्यवधान उत्पन्न हो गया है। पृथ्वी जल में डूब रही है, इसलिए आप कृपा करके ऋषियों-मुनियों तथा मानवों के रहने के लिए स्थान बनाएं।

भगवान विष्णु ने देवताओं तथा ऋषियों को अभयदान देते हुए कहा- ‘आप लोग निश्चिन्त होकर जाइये। मैं मेदिनी का उद्धार करता हूँ।’

पृथ्वी को समुद्र में छिपा देने के बाद हिरण्याक्ष ने गर्वित होकर तीनों लोकों को जीतने का विचार किया। वह हाथ में गदा लेकर इन्द्रलोक में जा पहुंचा। देवताओं को जब उसके आने की सूचना मिली, तो वे भयभीत होकर इन्द्रलोक से भाग गए। देखते ही देखते समस्त इन्द्रलोक पर हिरण्याक्ष का अधिकार स्थापित हो गया। जब इन्द्रलोक में युद्ध करने के लिए कोई नहीं मिला, तो हिरण्याक्ष ‘वरुण देव’ की राजधानी ‘विभावरी नगरी’ में जा पहुंचा।

हिरण्याक्ष ने वरुण देव से कहा- ‘वरुण देव! आपने दैत्यों को पराजित करके राजसूय यज्ञ किया था। आज आपको मुझसे युद्ध करना पड़ेगा। कमर कसकर तैयार हो जाइए, मेरी युद्ध-पिपासा को शांत कीजिए।’

हिरण्याक्ष का कथन सुनकर वरुण देव के मन में रोष उत्पन्न हुआ किंतु उन्होंने बड़े शांत भाव से कहा- ‘हिरण्याक्ष! तुम महान् योद्धा हो। तुमसे युद्ध करने के लिए मेरे पास शौर्य कहाँ? तीनों लोकों में भगवान यज्ञ-पुरुष-विष्णु को छोड़कर कोई भी ऐसा नहीं है, जो तुमसे युद्ध कर सके। अतः तुम उन्हीं के पास जाओ। वे ही तुम्हारी युद्ध पिपासा शांत करेंगे।’

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हिरण्याक्ष ने वरुण देव से पूछा- ‘विष्णु कहाँ है?’

वरुण देव ने कहा- ‘वे धरती का उद्धार करने के लिए पाताल लोक गए हैं।’ इतना सुनते ही हिरण्याक्ष क्रोध में भरकर पाताल लोक के लिए रवाना हो गया।

उधर जब हिरण्याक्ष वरुण देव से भगवान श्रीहरि विष्णु के बारे में पूछताछ कर रहा था, इधर भगवान श्रीहरि विष्णु आदिवाराह अवतार धरकर धरती को ढूंढ रहे थे। उन्होंने देखा कि पृथ्वी का कहीं पता नहीं है, सर्वत्र जल ही जल दिखाई दे रहा है। इस पर भगवान श्रीहरि विष्णु वराह के रूप में प्रकट हुए और उन्होंने समुद्र में घुसकर पृथ्वी को ढूंढ लिया।

आदिवाराह अवतार धारी श्रीहरि विष्णु ने पृथ्वी को अपने विशाल दांत पर धारण किया तथा भयंकर गर्जना करते हुए पृथ्वी को अथाह जल राशि में से निकाल लाए। इस घटना को भारतीय ग्रंथों में ‘मेदिनी-उद्धार’ के नाम से जाना जाता है। पृथ्वी को समुद्र से ऊपर आते हुए देखकर तथा वराह का भयंकर शब्द सुनकर हिरण्याक्ष क्रोध में भरकर दौड़ा।

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हिरण्याक्ष ने देखा कि आदिवाराह अवतार धारी श्रीहरि विष्णु पृथ्वी को अपनी दाढ़ पर रखकर पाताल लोक से ऊपर की ओर बढ़ रहे हैं। उस महाबली दैत्य ने अत्यंत क्रोध में भरकर आदिवाराह अवतार धारी श्रीहरि विष्णु से कहा- ‘अरे जंगली पशु! तू जल में कहाँ से आ गया है? मूर्ख पशु! तू इस पृथ्वी को कहाँ लिए जा रहा है? इसे तो ब्रह्माजी ने हमें दे दिया है। तू मेरे रहते इस पृथ्वी को रसातल से निकालकर नहीं ले जा सकता। तू दैत्य और दानवों का शत्रु है इसलिए आज मैं तेरा वध करूंगा!’ हिरण्याक्ष के कठोर वचनों को सुन कर भी आदिवाराह अवतार धारी श्रीहरि विष्णु शांत बने रहे। वे पृथ्वी को बीच में छोड़ कर हिरण्याक्ष से युद्ध नहीं करना चाहते थे इसलिए हिरण्याक्ष के कटु वचनों को सहन करते हुए वे आगे बढ़ते रहे और जल से बाहर आ गए। भगवान वराह का पीछा करते हुए दुष्ट हिरण्याक्ष भी जल से बाहर आ गया और कहने लगा- ‘हे कायर! तुझे भागने में लज्जा नहीं आती? आ, मुझसे युद्ध कर।’ दैत्य से भयभीत पृथ्वी को अभयदान देकर भगवान ने उसे जल के ऊपर स्थापित कर दिया और उसे उचित आधार प्रदान करके महादैत्य की ओर मुड़े।

भगवान ने कहा- ‘अरे ग्राम-सिंह हम तो जंगली-पशु हैं और तुझ जैसे ग्राम-सिंहों को ही ढूँढते रहते हैं। अब तेरी मृत्यु सिर पर नाच रही है।’ ज्ञातव्य है कि संस्कृत साहित्य में ‘श्वान’ को व्यंग्य से ‘ग्राम-सिंह’ कहते हैं।

आदिवाराह अवतार धारी भगवान श्रीहरि विष्णु ने आधा शरीर समुद्र के भीतर तथा आधा शरीर समुद्र से बाहर रखकर हिरण्याक्ष को अपनी दाढ़ पर उठाकर आकाश में दूर फेंक दिया। आकाश में चक्कर काटता हुआ विशाल दैत्य भयानक शब्द करते हुए पृथ्वी पर गिर पड़ा।

दैत्यराज हिरण्याक्ष तथा उसके भाई हिरण्यकश्यप ने ब्रह्माजी से वरदान प्राप्त कर रखा था। इस कारण वे देवता, असुर, गन्धर्व, यक्ष, नाग, राक्षस, मनुष्य और पिशाच द्वारा मारे जाने पर नहीं मर सकते थे। उन्हें किसी अस्त्र-शस्त्र, पर्वत या वृृक्ष से भी नहीं मारा जा सकता था। वे न जल में मारे जा सकते थे, न आकाश में और न पृथ्वी पर। उन्हें न दिन में मारा जा सकता था, न रात में। उन्हें न बाहर मारा जा सकता था न भीतर। उनकी मृत्यु किसी पशु, पक्षी अथवा सरीसृप द्वारा भी नहीं हो सकती थी।

हिरण्याक्ष ने देखा कि उसे एक मायावी वराह ने मारा है जो देवता, असुर, गन्धर्व, यक्ष, नाग, राक्षस, मनुष्य और पिशाच नहीं है। वराह ने आधा शरीर जल में एवं आधा शरीर आकाश में रखकर बिना किसी शस्त्र के ही, ऐसे समय मारा है जब न दिन है न रात, आधा पानी में डूबे हुए होने के कारण वह न भीतर है न बाहर, न धरती पर है न आकाश में और न समुद्र में।

मरणासन्न हिरण्याक्ष ने देखा कि वराह के स्थान पर स्वयं भगवान श्रीहरि विष्णु सुशोभित हैं। हिरण्याक्ष को अपने पूर्व-जन्म का स्मरण हो आया। उसने भगवान के चरण पकड़ लिए और कहा-‘भगवन्! आपने मुझ पापी के शाप का अंत कर दिया और अपने ही हाथों से मुझे इस जन्म से मुक्ति दिलाई। कृपा करके मेरे भाई हिरण्यकश्यप को भी मुक्ति दीजिये।’

भगवान विष्णु हंसकर बोले- ‘समय से पूर्व किसी के पाप का अंत नहीं होता। तुम्हारे भाई हिरण्यकश्यप के पाप का अभी अंत नहीं है। उसका अंत करने के लिए मुझे एक और अवतार लेना पड़ेगा। तुम्हारे लिए वराह बनना पड़ा, उसके लिए नृसिंह बनना पड़ेगा।’

आदिवाराह अवतार धारी श्रीहरि विष्णु के विजय प्राप्त करते ही ब्रह्माजी सहित समस्त देवतागण भगवान श्रीहरि विष्णु पर आकाश से पुष्प-वर्षा एवं स्तुति-गायन करने लगे।

विभिन्न पुराणों में भगवान वराह द्वारा मेदिनी-उद्धार की कथा अलग-अलग प्रकार से मिलती है। भागवत पुराण के अनुसार ब्रह्मा ने मनु और सतरूपा नामक पुरुष एवं स्त्री का निर्माण किया और उन्हें सृष्टि आरम्भ करने की आज्ञा दी। सृष्टि आरम्भ करने के लिए भूमि की आवश्यकता थी किंतु इस समय हिरण्याक्ष नामक दैत्य धरती को सागर के भीतर ले जाकर भू-देवी को अपना तकिया बना कर सोया हुआ था। हिरण्याक्ष ने अपने चारों ओर विष्ठा का घेरा बना रखा था ताकि देवता हिरण्याक्ष के निकट नहीं आएं।

जब मनु और सतरूपा को चारों ओर जल ही जल दिखाई दिया तो उन्होंने ब्रह्माजी को बताया कि धरती दिखाई नहीं दे रही। उसे तो हिरण्याक्ष रसातल में ले गया है। तब ब्रह्माजी ने विचार किया कि देव विष्ठा के पास तक नहीं जाते, एक शूकर ही है जो विष्ठा के समीप जा सकता है।

इसलिए ब्रह्माजी ने भगवान विष्णु का ध्यान किया और अपनी नासिका से वराह नारायण को जन्म दिया। ब्रह्माजी ने वराह को आज्ञा दी कि वह पृथ्वी को रसातल से ऊपर ले आए। इस पर वराह भगवान समुद्र में उतरे और हिरण्याक्ष का संहार करके भू-देवी को मुक्त करा लिया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

वाराह अवतार से जुड़ी हुई है दक्षिण भारत की वराह जाति (10)

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वाराह अवतार से जुड़ी हुई है दक्षिण भारत की वराह जाति

पिछली कुछ कड़ियों में हमने भगवान श्री हरि विष्णु के नील वाराह एवं आदि वाराह के अवतारों की चर्चा की थी। इस कड़ी में हम नील वाराह वाराह अवतार, आदि वाराह अवतार तथा श्वेत वाराह वाराह अवतार के दक्षिण भारत की कुछ वनवासी जातियों से सम्बन्ध की चर्चा करेंगे।

वाराह कल्प के 3 खण्ड हैं- 1. नील वराह काल, 2. आदि वराह काल और 3. श्वेत वराह काल। इन तीनों खण्डों में भगवान श्री हरि विष्णु ने अलग-अलग अवतार लिए हैं। हिन्दू धर्म ग्रंथों के अनुसार वाराह कल्प का आरम्भ भगवान श्री हरि विष्णु द्वारा नील वाराह के रूप में प्रकट होकर भूमि को रहने योग्य बनाने से होता है।

हिन्दू धर्मग्रंथों की मान्यता है कि इस काल में ब्रह्मा, विष्णु और महेश सहित समस्त देवी-देवता धरती पर निवास करते थे। भगवान शिव का स्थान कैलाश पर्वत था। श्री हरि विष्णु हिंद महासागर में रहते थे। धरती के जिस स्थान पर देव-जाति निवास करती थी उसे स्वर्ग एवं देवलोक कहा जाता था। ब्रह्माजी एवं उनके पुत्रों ने मध्य एशिया से लेकर काश्मीर तक के क्षेत्र में कुछ बस्तियां बसा ली थीं। हालांकि उस काल में धरती पर रहने योग्य स्थान बहुत कम था।

अधिकांश भूमि जल में डूबी हुई थी।

हिन्दू धर्म ग्रंथों के अनुसार आज से लगभग 16 हजार वर्ष पूर्व भगवान ने नील-वराह के रूप में अवतार लिया था। नील-वराह काल में भगवान नील-वराह ने धरती पर से जल हटाया और उसे प्राणियों के रहने योग्य बनाया। उसके बाद ब्रह्माजी ने मनुष्य जाति का विस्तार किया और भगवान शिव ने संपूर्ण धरती पर धर्म और न्याय का राज्य प्रतिष्ठित किया।

यद्यपि मानवों की कई प्राचीन जातियाँ तब भी धरती पर निवास करती थीं तथापि आधुनिक मानव की सभ्यता का प्रारम्भ यहीं से, अर्थात् आज से 16 हजार साल पहले हुआ माना जाता है। हिन्दू धर्म की यह कहानी वराह-कल्प से ही आरम्भ होती है किंतु पुराणों में इससे पहले का इतिहास भी मिलता है जिसे पांच मुख्य कल्पों में विभक्त किया गया है।

नील-वराह काल के बाद आदि-वराह काल और फिर श्वेत वराह काल हुए। वराह-कल्प के छः मन्वन्तर अपनी संध्याओं सहित बीत चुके हैं तथा वर्तमान समय में सातवां मन्वन्तर चल रहा है। इसे वैवस्वत मनु की संतानों का काल माना जाता है। जम्बूद्वीप के पहले राजा स्वायम्भू-मनु थे। वही स्वायमभु-मनु जिनका उल्लेख हम ‘मत्स्यावतार’ की कथा में कर चुके हैं।

हिन्दू धर्म ग्रंथों के अनुसार वराह-कल्प के सातवें मन्वन्तर में 27वीं चतुर्युगी भी बीत चुकी है अर्थात चार युगों के 27 चक्र बीत चुके हैं और वर्तमान में वराह काल की 28वीं चतुर्युगी के कृतयुग, त्रेता और द्वापर बीत चुके हैं और कलियुग चल रहा है। यह कलियुग ब्रह्मा के द्वितीय परार्ध में वराह-कल्प के श्वेत-वराह नामक काल में और वैवस्वत मनु के मन्वन्तर में चल रहा है।

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इस प्रकार हिन्दू धर्म ग्रंथों में सृष्टि के इतिहास के साथ काल-गणना की पूरी संकल्पना विद्यमान है किंतु यह पश्चिमी देशों के ‘एंथ्रोपोलॉजी साइंटिस्ट’ अर्थात् नृवंशीय वैज्ञानिकों द्वारा बताई गई काल गणना से कहीं पर मेल खाती हुई तो कहीं पर बिल्कुल अलग प्रतीत होती है।

नील-वराह-काल के बाद आदि-वराह-काल शुरू हुआ। इसमें हिरण्याक्ष द्वारा धरती को चुराकर समुद्र में छिपा दिया गया तथा भगवान श्रीहरि विष्णु द्वारा धरती का उद्धार करके हिरण्याक्ष का वध किया गया। कुछ विद्वानों के अनुसार नील वाराह अवतार के काम को आदि वराह ने आगे बढ़ाया। आदि-वराह को कपिल वराह भी कहा गया है।

आधुनिक काल के कुछ विद्वानों का मानना है कि भगवान के इन अवतारों को वराह इसलिए कहा गया क्योंकि उन्होंने धरती पर रहने वाली वराह जाति में जन्म लिया था। उस काल में वराह एक वनवासी जाति थी जो समुद्र के निकट स्थित वनों में निवास करती थी।

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इन विद्वानों के अनुसार दक्षिण भारत में वराह देव नामक एक राजा हुआ। उसने महाप्रबल वराह सेना लेकर हिरण्याक्ष के राज्य पर चढ़ाई कर दी और विन्ध्यगिरि के पाद-प्रसूत जल-समुद्र को पार करके हिरण्याक्ष के नगर को घेर लिया। वराह देव तथा हिरण्याक्ष के बीच संगमनेर नामक स्थान में महासंग्राम हुआ और अंततः हिरण्याक्ष का अंत हुआ। वराह देव ने महाराष्ट्र में अपने नाम से एक पुरी भी बसाई जिसमें हिरण्याक्ष के बचे-खुचे दुष्ट असुरों को नियंत्रित रखने के लिए अपनी सेना का एक अंग भी यहाँ छोड़ दिया। यह पुरी ‘बारामती कराड़’ के नाम से प्रसिद्ध है। आज भी दक्षिण भारत में हिंगोली, हिंगनघाट, हींगना नदी, हिरण्याक्षगण एवं हैंगड़े आदि नामों से कई स्थान मिलते हैं। वराह अवतार की कथा के अनुकरण पर कुछ धर्म-ग्रंथों में वाराही देवी की भी कल्पना कर ली गई। कुछ ग्रंथों के अनुसार भगवती दुर्गा रण-संग्राम में अपनी विशाल देव-सेनाओं अर्थात् वाराही सेना और नारसिंही सेना को लेकर उनका संचालन करते हुए विजयश्री से विभूषित हुई थीं। दुर्गा के रण प्रसंग में ‘वाराही नारसिंही च भीम भैरव नादिनी’ कहकर वाराही देवी को याद किया जाता है। श्वेत वराह-कल्प का आरम्भ आज से लगभग 10 हजार साल पहले हुआ था।

कुछ परवर्ती ग्रंथों में भगवान श्वेत वराह का राजा विमति से युद्ध होने की कथा मिलती है। इस कथा के अनुसार द्रविड़ देश में सुमति नामक राजा राज्य करता था। वह अपने पुत्रों को राज्य देकर तीर्थयात्रा को निकला। तीर्थयात्रा के मार्ग में ही कहीं उसकी मृत्यु हो गई। सुमति का पुत्र विमति बहुत दुष्ट-बुद्धि राजा था। वह विष्णु-भक्त प्रजा को सताया करता था। इसलिए देवर्षि नारदजी ने भगवान श्रीहरि विष्णु के हाथों उसका नाश करवाने का विचार किया। महर्षि नारद विमति के पास पहुंचे तथा उससे कहा- ‘जो पिता का ऋण उतारे वही पुत्र है।’

विमति ने अपने मंत्रियों से पूछा- ‘पिता का ऋण कैसे उतरे?’

मंत्रियों ने कहा- ‘राजन् आपके पिताजी को तीर्थों ने मारा है, इसलिए तीर्थों को मारकर उनसे बदला लें।’

राजा विमति ने कहा- ‘तीर्थ तो अगणित हैं!’

एक मंत्री ने सुझाव दिया- ‘मथुरा सब तीर्थों की प्रमुख नगरी है, उसी को नष्ट कर दिया जाए।’

विमति ने मंत्रियों की यह सलाह स्वीकार कर ली तथा एक विशाल सेना लेकर मथुरा नगरी पर आक्रमण किया। इससे मथुरा के लोगों में भय व्याप्त हो गया और वे उत्तरी ध्रुव के बर्फीले क्षेत्र में स्थित श्वेत-द्वीप की ओर चले गए जहाँ स्वर्ग अर्थात् देवलोक स्थित था। श्वेत-द्वीप में उन्हें श्वेत-वराह के दर्शन हुए। श्वेत-वराह ने विष्णु-भक्त-प्रजा को अभयदान दिया और विमति से युद्ध करके सैन्य सहित राजा विमति को मार डाला।

पुराणों की वंशावली के अनुसार सुमति जैन संप्रदाय के सुमतिनाथ तीर्थंकर हैं और वे योगेश्वर ऋषभदेव के पौत्र तथा भरत के पुत्र हैं। उनका समय आज से लगभग 8000 वर्ष पहले का माना जाता है। वायु पुराण, वराह पुराण और माथुर चतुर्वेदी ब्राह्मणों का इतिहास आदि ग्रंथों में आए प्रसंगों के अनुसार भगवान श्रीहरि नारायण ने अपने भक्त ध्रुव को उत्तर ध्रुव का एक क्षेत्र प्रदान किया था। यहीं पर भगवान शिव के पुत्र स्कंद का एक देश था और यहीं पर नारद मुनि भी निवास करते थे। उत्तर ध्रुव में कुछ आर्य भी निवास करते थे और यहीं पर श्वेतवराह नामक जाति भी रहती थी।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

नृसिंह अवतार की कथा (11)

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नृसिंह अवतार की कथा

पिछली कड़ियों में चर्चा की थी कि सनकादि ऋषि के श्राप से भगवान विष्णु के जय एवं विजय नामक दो गण, दैत्य बनकर कश्यप ऋषि की पत्नी दिति के गर्भ से धरती पर आए। इनमें से दैत्यों के राजा हिरण्याक्ष के वध हेतु भगवान श्री हरि विष्णु के वाराह अवतार की कथा हम बता चुके हैं। इस कथा में हम दैत्यराज हिरण्यकश्यप के वध के लिए भगवान श्री हरि विष्णु के नृसिंह अवतार की कथा की चर्चा करेंगे।

नृसिंह अवतार को पुराणों में भगवान विष्णु का चौथा अवतार कहा गया है जो आधे मानव एवं आधे सिंह के रूप में प्रकट होते हैं, जिनका चेहरा तथा पंजे सिंह के तथा सिर एवं धड़ मानव का है। वे सम्पूर्ण भारत में वैष्णव भक्तों द्वारा पूजे जाते हैं किंतु दक्षिण भारत में उनकी पूजा अधिक लोकप्रिय है। महाभारत के सभा पर्व के ‘अर्घाभिहरण पर्व’ सहित अनेक पुराणों में नृसिंह अवतार की कथा किंचिंत् अंतरों के साथ मिलती है।

हिरण्याक्ष तथा हिरण्यकशिप ने घनघोर तपस्या करके ब्रह्माजी को प्रसन्न किया तथा उनसे वरदान मांगा कि उन्हें देवता, असुर, गन्धर्व, यक्ष, नाग, राक्षस, मनुष्य और पिशाच न मार सकें। हम अस्त्र-शस्त्र, पर्वत या वृृक्ष से मरें। हम न जल में मरें, न आकाश पर और न पृथ्वी पर मरें। हम न रात में मरें न दिन में, न बाहर मरें न भीतर। किसी मृग, पक्षी अथवा सरीसृप से भी हमारी मृत्यु न हो। जब ब्रह्माजी ने उन्हें यह वरदान दे दिया तो वे दोनों महादैत्य ब्रह्माजी की बनाई सृष्टि को अत्यंत कष्ट देने लगे।

इसलिए भगवान श्रीहरि विष्णु ने वराह का रूप धारण करके संध्या काल में आधे समुद्र के भीतर और आधे समुद्र से बाहर खड़े होकर अपने दांत से हिरण्याक्ष का वध किया था।

जब भगवान श्रीहरि विष्णु ने हिरण्याक्ष का वध किया तो उसका भाई हिरण्यकश्यप दैत्यों का राजा बन गया तथा भगवान श्रीहरि का शत्रु हो गया। हिरण्यकश्यप और उसके दैत्य, भगवान के भक्तों को कष्ट देने लगे। उसने अपने राज्य में भगवान विष्णु की भक्ति करने तथा पूजा करने पर प्रतिबंध लगा दिया।

दैत्यराज हिरण्यकश्यप ने तीनों लोकों को जीत लिया और देवताओं को स्वर्ग से निकालकर स्वयं अपने दैत्यों सहित स्वर्ग में रहने लगा। नर्क में पड़े हुए सब जीवों को वहाँ से निकालकर उसने स्वर्ग का निवासी बना दिया। हिरण्यकश्यप ने देवताओं को दिए जाने वाले यज्ञ-भाग पर रोक लगा दी और स्वयं ही यज्ञ-भाग का अधिकारी बन बैठा।

वह मुनियों के आश्रमों पर आक्रमण करके कठोर व्रत पालन करने वाले, सत्यधर्म परायण एवं जितेन्द्रिय महाभाग मुनियों को सताने लगा। उसने दैत्यों को यज्ञभाग का अधिकारी बनाया और देवताओं को यज्ञभाग के अधिकार से वंचित कर दिया। वह देवताओं के पीछे पड़ गया। जहाँ-जहाँ देवता जाते थे, वह वहाँ-वहाँ उनका पीछा करता था। इस प्रकार उस दुरात्मा को राज्य करते हुए पाँच करोड़ इकसठ लाख साठ हजार वर्ष बीत गए।

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महाबली हिरण्यकश्यप से पीड़ित होकर इन्द्र आदि देवता ब्रह्मलोक में गए और ब्रह्माजी के समक्ष हाथ जोड़कर बोले- ‘आप हमारी रक्षा कीजिये। हमें उस दैत्य से छुटकारा दिलाइये। आपसे मिले वरदान के बल पर वह त्रिलोकी को सता रहा है।’

ब्रह्माजी ने कहा कि अन्तर्यामी भगवान श्रीनारायण ही हमारी सहायता कर सकते हैं। हिरण्यकश्यप दैत्य का वे ही संहार करेंगे। इस पर देवगण ब्रह्माजी के साथ क्षीरसागर में शयन कर रहे भगवान नारायण की शरण में गए। भगवान श्रीहरि विष्णु ने देवताओं को अभयदान देते हुए कहा- ‘मैं इस दुष्ट दानव का नाश अवश्य करूंगा।’

हिरण्यकश्यप भगवान विष्णु को अपना परम शत्रु समझता था परंतु उसका पुत्र प्रह्लाद भगवान विष्णु का परम भक्त था और दिन-रात भगवान हरि की भक्ति किया करता था। कुछ ग्रंथों के अनुसार जब हिरण्यकश्यप ब्रह्माजी की तपस्या कर रहा था, तब देवताओं ने हिरण्यकश्यप की पत्नी कयाधु को पकड़ लिया। इस पर देवर्षि नारद ने कयाधु को छुड़ाया और उसे भगवद्-भक्ति का उपदेश दिया। उस समय भक्त प्रह्लाद अपनी माता के गर्भ में थे। इसलिए गर्भस्थ शिशु ने भी उन उपदेशों को सुना और वह भगवान का भक्त हो गया।

जब प्रह्लाद का जन्म हुआ तो हिरयण्कश्प ने उसे शिक्षा प्राप्त करने के लिए दैत्यगुरु शुक्राचार्य के पुत्रों षण्ड तथा अमर्क के पास भेजा। गुरुओं ने बालक प्रह्लाद को अर्थ, धर्म और काम की शिक्षा प्रदान की। जब प्रह्लाद घर लौटा तो हिरण्यकश्यप ने पूछा- ‘संसार में किसकी भक्ति श्रेष्ठ है!’

इस पर भक्त प्रह्लाद ने उत्तर दिया- ‘श्रवण, कीर्तन, स्मरण, पादसेवन, अर्चन, वन्दन, दास्य, सख्य और आत्मनिवेदन नामक नौ भक्तियों से प्राप्त किए जाने वाले भगवान श्री हरि विष्णु की भक्ति ही श्रेष्ठ है।’

अपने पुत्र के मुंह से अपने शत्रु का नाम सुनकर हिरण्यकश्यप बड़ा क्रोधित हुआ। उसने बालक प्रह्लाद से कहा- ‘तू भगवान विष्णु की भक्ति छोड़कर मेरी अर्थात् हिरणकश्यप की भक्ति कर!’

प्रह्लाद ने अपने पिता के आदेश को स्वीकार नहीं किया तथा वह ईश्भक्ति पर ही अडिग रहा। बहुत समझाने पर भी जब बालक प्रह्लाद न माना तो हिरण्यकश्यप ने अपने पुत्र प्रह्लाद को मारने का निश्चय किया तथा अपने सैनिकों को आदेश दिया- ‘इसे मार डालो। यह मेरे शत्रु का पक्षपाती हो गया है।’

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जब असुरों ने बालक प्रह्लाद पर आघात किया तो उनके खड्ग टूट गए तथा त्रिशूल टेढ़े हो गए किंतु बालक के शरीर पर खरोंच तक नहीं आई। इस पर बालक प्रह्लाद को विष दिया गया किंतु बालक पर उसका भी प्रभाव नहीं हुआ। बालक पर सर्प छोड़े गए किंतु वे भी भक्त प्रह्लाद के निकट जाकर शांत हो गए। इस पर उन्हें मत्त गजराज के समक्ष फैंका गया। गजराज ने भक्त प्रह्लाद को उठाकर अपने मस्तक पर रख लिया। पर्वत से नीचे फेंके जाने पर प्रह्लाद ऐसे उठ खड़े हुए, जैसे शय्या से उठे हों। समुद्र में पाषाण बाँधकर डुबाने पर वे पुनः जल के ऊपर आ गए। गुरु-पुत्रों ने मन्त्रबल से कृत्या नामक राक्षसी को बुलाया किंतु कृत्या ने भक्त प्रह्लाद की जगह दैत्यगुरु शुक्राचार्य के पुत्रों को ही मार डाला। भक्त प्रह्लाद ने प्रभु से प्रार्थना करके अपने गुरुओं को जीवित करवाया। हिरण्यकश्यप ने अपनी बहन होलिका को बुलाया। होलिका के पास एक ऐसी मायावी चद्दर थी जिसे ओढ़ने पर अग्नि का प्रभाव नहीं होता था। हिरण्यकश्यप ने होलिका को आदेश दिया कि वह प्रह्लाद को लेकर चिता में बैठ जाये। होलिका ने वह मायावी चद्दर ओढ़ ली तथा प्रह्लाद को लेकर चिता पर बैठ गई। जब चिता में आग लगाई गई तो वह मायावी चद्दर होलिका के शरीर से हटकर भक्त प्रह्लाद के शरीर पर चली गई जिससे होलिका तो जल गई किंतु भक्त प्रह्लाद पूरी तरह सुरक्षित रहे।

होलिका के जल जाने के बाद हिरण्यकश्यप ने स्वयं ही प्रह्लाद को मारने का निश्चय किया तथा क्रोध में भरकर बोला- ‘मैं तुझे मार रहा हूँ, तेरा भगवान कहाँ है, उसे बुला ले!’

इस पर भक्त प्रह्लाद ने कहा- ‘भगवान तो कण कण में हैं। वे तो मुझ में, आप में और इस खड्ग में भी हैं।’

इस पर हिरण्यकश्यप एक स्तंभ की तरफ संकेत करके बोला- ‘क्या इसमें भी तेरा भगवान है?’

भक्त प्रह्लाद ने कहा- ‘हाँ इस स्तम्भ में भी भगवान हैं।’

जब हिरण्यकश्यप ने भक्त प्रह्लाद पर अपनी गदा से प्रहार किया तो उसी समय भगवान श्रीहरि विष्णु स्तम्भ को फाड़कर नृसिंह अवतार के रूप में प्रगट हो गए। भगवान का आधा शरीर सिंह का तथा आधा शरीर मानव का था। अपने भक्त को सताए जाने के कारण भगवान अत्यंत क्रोध में थे। भगवान श्रीनृसिंह ने भयंकर सिंह-गर्जना करते हुए हिरण्यकश्यप को पकड़ लिया और उसे घसीटते हुए हिरण्यकश्यप के महल की चौखट तक ले गए।

भगवान इस समय न नर के वेश में थे, न मृग के। वे न घर के अंदर थे, न बाहर। उस समय संध्या हो रही थी, अर्थात् तब न दिन थी, न रात। नृसिंह अवतारधारी भगवान श्रीहरि विष्णु ने हिरण्यकश्यप को उठाकर अपनी जंघाओं पर लिटा लिया। इस प्रकार हिरण्कश्यप न भीतर था न बाहर, न न धरती पर था, न आकाश में। भगवान ने अपने नाखूनों से हिरण्यकश्यप का पेट फाड़ डाला जो न अस्त्र थे, न शस्त्र!

महाभारत में लिखा है कि भगवान विष्णु ने नृसिंह रूप धरकर हिरण्यकश्यप पर आक्रमण किया। दैत्यों ने कुपित होकर नृसिंह पर अस्त्र-शस्त्रों की वर्षा कर दी। भगवान उन सभी शस्त्रों को खा गए तथा कई हजार दैत्यों का संहार कर दिया। इस पर हिरण्यकश्यप ने अत्यंत क्रोध में भरकर भगवान पर आक्रमण किया।

दैत्य को सामने आया देख महातेजस्वी भगवान नृसिंह ने नखों के तीखे अग्र-भागों के द्वारा उस दैत्य के साथ घनघोर युद्ध किया। फिर संध्याकाल आने पर भगवान उसे पकड़कर महल की देहरी पर बैठ गए और उसे अपनी जाँघों पर रखकर अपने नखों से उसका वक्षस्थल विदीर्ण कर डाला।

हिरण्यकश्यप के मर जाने के बाद भी भगवान क्रोध में भरकर भयंकर गर्जना करते रहे। उनका यह उग्र रूप देखकर देवता डर गए, ब्रह्माजी भी अवसन्न हो गए, लक्ष्मीजी भगवान को शांत करने के लिए गईं किंतु दूर से लौट आयीं। इस पर भक्त प्रह्लाद ने भगवान की स्तुति की। भगवान नृसिंह ने शांत होकर अपने भक्त को गोद में बैठा लिया और उसे स्नेह से दुलारने लगे।

बिहार के लोगों का मानना है कि भगवान नृसिंह का अवतार पूर्णिया जिला के ‘बनमनखी’ क्षेत्र के सिकलीगढ़ धरहरा गांव में हुआ था। इसी गांव में होलिका भक्त प्रह्लाद को गोद में लेकर आग में बैठी थी। इस गांव में 12 फुट मोटा एवं 65 डिग्री पर झुका हुआ एक खम्भा है जिसे माणिक्य स्तम्भ कहते हैं।

मान्यता है कि इसी खंभे को फाड़कर भगवान श्रीहरि विष्णु नृसिंह के रूप में प्रकट हुए थे। गीता प्रेस गोरखपुर से प्रकाशित कल्याण के 31वें साल के तीर्थांक विशेषांक में सिकलीगढ़ धरहरा का उल्लेख किया गया है। मान्यता है कि नृसिंह अवतार वैशाख माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को हुआ था।

वामन अवतार की कथा (12)

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वामन अवतार - bharatkaitihas.com
वामन अवतार की कथा

इस धारावाहिक की पिछली कड़ियों में हमने भगवान श्री हरि विष्णु के चार अवतारों- मत्स्यावतार, कूर्मावतार, वाराह अवतार एवं नृसिंह अवतार की चर्चा की है। ये सभी अवतार मनुष्येतर रूप में अर्थात् जलचर, उभयचर एवं थलचर जीवों के रूप में थे जबकि इस कड़ी में हम भगवान श्री हरि के वामन अवतार की चर्चा कर रहे हैं, वह पूर्णतः मानव रूप का अवतार है किंतु यह अवतार भी मनुष्य के सामान्य आकार में न होकर वामन रूप में हुआ। वामन अवतार मानव प्रजाति के उस क्रमिक विकास की ओर संकेत करता है कि धरती के प्रारम्भिक मनुष्य छोटे कद के थे।

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हिन्दू ग्रंथों के अनुसार वामन भगवान श्री हरि विष्णु के पाँचवे तथा त्रेता युग के पहले अवतार थे। दक्षिण भारत में वामन को उपेन्द्र कहा जाता है। वामन ऋषि कश्यप तथा उनकी पत्नी अदिति के पुत्र थे। अदिति के पुत्र आदित्य कहलाते हैं। इन्द्र, सूर्य तथा समस्त देवता अदिति के ही पुत्र हैं। वामन बारहवें आदित्य माने जाते हैं। कहीं-कहीं ऐसी भी मान्यता मिलती है कि वामन, हनुमान के छोटे भाई थे। कहीं-कहीं पर वामन को तीन पैरों वाला दर्शाया गया है। भगवान के इस रूप को त्रिविक्रम भी कहा जाता है। इस रूप में भगवान का एक पैर धरती पर, दूसरा आकाश अर्थात् देवलोक पर तथा तीसरा दैत्यराज बलि के सिर पर दर्शाया जाता है। भागवत कथा के अनुसार दैत्यराज बली भक्तराज प्रह्लाद का पौत्र तथा दैत्यराज विरोचन का पुत्र था। दैत्यराज बली अत्यंत बलशाली था। उसने देवताओं को देवलोक से निकाल कर देवलोक में अपना निवास बना लिया था। कुछ ग्रंथों में यह भी मान्यता है कि दैत्यराज बली ने अपनी तपस्या से त्रिलोकी पर आधिपत्य प्राप्त किया था। जब देवताओं से स्वर्ग छिन गया तब उनकी माता अदिति ने बारह वर्ष तक घनघोर तपस्या करके भगवान श्रीहरि विष्णु को प्रसन्न किया। भगवान श्रीहरि विष्णु ने ऋषि-पत्नी अदिति के समक्ष प्रकट होकर कहा- ‘हे देवी! तुम्हारे पुत्रों अर्थात् देवताओं के उद्धार के लिए मैं स्वयं तुम्हारे पुत्र के रूप में जन्म लूंगा।’

श्रवण मास की द्वादशी को अभिजीत नक्षत्र में भगवान श्रीहरि विष्णु ने अदिति के गर्भ से वामन के रूप में अवतार लिया। उनके ब्रह्मचारी रूप को देखकर सभी देवता और ऋषि-मुनि आनंदित हो उठे। महर्षि कश्यप ने ऋषियों के साथ मिलकर उनका उपनयन संस्कार किया। महर्षि पुलह ने बटुक रूपी वामन को यज्ञोपवीत दिया।

महर्षि अगस्त्य ने मृगचर्म, मरीचि ने पलाश दण्ड, आंगिरस ने वस्त्र, सूर्य ने छत्र, भृगु ने खड़ाऊं, गुरु बृहस्पति ने जनेऊ तथा कमण्डल, माता अदिति ने कोपीन, देवी सरस्वती ने रुद्राक्ष माला तथा यक्षराज कुबेर ने बटुक रूपी भगवान वामन को भिक्षा-पात्र प्रदान किया। जब राजा बली ने अश्वमेध यज्ञ का आयोजन किया तो वामन रूपधारी विष्णु भी वहाँ पहुंच गए। वामन के तेज से यज्ञशाला प्रकाशित हो उठी। दैत्यराज बली ने वामन भगवान को एक उत्तम आसन पर बिठाकर उनका सत्कार किया और उनसे दक्षिणा मांगने के लिए आग्रह किया।

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तभी दैत्यगुरु शुक्राचार्य ने वामन रूपधारी श्रीहरि विष्णु को पहचान लिया और उसने दैत्यराज को सावधान किया- ‘ये स्वयं भगवान विष्णु हैं, इनके छल में मत आओ।’

बली ने यह कहकर गुरु की अवहेलना की- ‘मैं याचक को खाली हाथ नहीं भेज सकता!’

इस पर वामन रूपी भगवान ने बली से कहा- ‘मुझे स्वयं के रहने के लिए तीन पग भूमि चाहिए।’

इस पर दैत्यराज बली को बड़ा आश्चर्य हुआ और उसने वामन से अनुरोध किया- ‘आप अपने लिए कुछ और बड़ी वस्तु मांगें!’

दैत्यराज के बार-बार अनुरोध करने पर भी वामन भगवान अपनी बात पर अडिग रहे तथा उससे अपने लिए तीन पग भूमि मांगते रहे। इस पर बली ने वामन का अनुरोध स्वीकार कर लिया।

जब दैत्यराज ने भूमिदान हेतु संकल्पबद्ध होने के लिए अपने कमण्डल से जल लेना चाहा तो देवगुरु शुक्राचार्य अपने शिष्य बली को संकट से बचाने के लिए लघु रूप धारण करके कमण्डल की टोंटी में बैठ गए और कमण्डल में से जल निकलने से रोक दिया। इस पर बली ने एक तिनका कमण्डल की टोंटी में घुसाया। यह तिनका दैत्यगुरु शुक्राचार्य की आंख में जाकर घुस गया जिससे शुक्राचार्य की एक आंख फूट गई।

दैत्यराज बली ने हाथ में जल लेकर वामन को तीन पग भूमि देने का संकल्प लिया। संकल्प पूरा होते ही वामन का आकार बढ़ने लगा और वे वामन से विराट हो गए। उन्होंने एक पग से पृथ्वी नाप ली, दूसरे पग से स्वर्ग नाप लिया तथा दैत्यराज से पूछा- ‘तीसरा पग कहाँ रखूं?’

इस पर बली ने अपना मस्तक आगे कर दिया और बोला- ‘प्रभु, सम्पत्ति का स्वामी सम्पत्ति से बड़ा होता है। तीसरा पग मेरे मस्तक पर रख दें।’ इस पर भगवान ने तीसरा पग उसके सिर पर रखकर उसे भी नाप लिया।

इस प्रकार भगवान श्रीहरि विष्णु ने दैत्यराज बली से स्वर्ग और धरती का राज्य छीन लिया। भगवान ने स्वर्ग अदिति के पुत्रों अर्थात् देवताओं को लौटा दिया तथा इन्द्र को फिर से स्वर्ग का अधिपति बना दिया। इसके बाद भगवान ने दैत्यराज बली से कहा- ‘अगले मन्वन्तर में तू ही स्वर्ग का अधिपति इन्द्र होगा। तब तक तू अपने दैत्यों को लेकर सुतल पाताल में चला जा और वहीं पर निवास कर। मैं स्वयं तेरा द्वारपाल बनकर तेरी रक्षा करूंगा।’

बली ने भगवान के आदेश का पालन किया और वह दैत्यों को लेकर स्वर्ग छोड़कर पाताल चला गया। आधुनिक काल में इस पाताल का आशय भारत के दक्षिण-पूर्व में स्थित बाली द्वीप से लिया जाता है। बाली द्वीप पर आज भी राक्षसों की हजारों छोटी-बड़ी एवं विशालाकाय मूर्तियां मंदिरों के बाहर लगी हुई हैं। 

कुछ अन्य पुराणों में आई कथा के अनुसार भगवान श्रीहरि विष्णु वामन का रूप धारण करके राजा बली के द्वार पर जाकर खड़े हो गए। वे चार महीने तक दैत्यराज बली के द्वार पर खड़े रहे। इस पर दैत्यराज बली को आश्चर्य हुआ और उन्होंने उस बालक को बुलाकर पूछा- ‘तुम कौन हो?’

वामन ने उत्तर दिया- ‘मैं अपूर्वाली हूँ, क्या तुम मुझे नहीं जानते?’

बली ने पूछा- ‘तुम कहां से हो?’

इस पर वामन ने कहा- ‘सारी सृष्टि मुझसे है।’

राजा बली ने पूछा- ‘तुम्हारे माँ बाप कौन हैं?’

इस पर भगवान वामन ने कहा- ‘मेरा कोई माँ, बाप नहीं है।’

बली ने पूछा- ‘मुझसे क्या चाहते हो?’

तब वामन ने कहा कि मुझे अपने रहने के लिए तीन पग भूमि चाहिए। इसके बाद की कथा एक जैसी ही है जिसका उल्लेख हमने ऊपर की पंक्तियों में किया है। कुछ ग्रंथों के अनुसार तब से बली पाताल लोक में रहता है। वह केवल चार महीने के लिए अपने राज्य अर्थात् दक्षिण भारत में आता है। उस समय भगवान विष्णु पाताल में चले जाते हैं। भगवान के पाताल में जाने पर धरती पर ‘देव-शयनी’ पर्व मनाया जाता है। इन चार महीनों में धरती पर विवाह आदि मंगल कार्य नहीं होते हैं। भगवान के पुनः धरती पर आने पर ‘देव-उठानी एकादशी’ मनाई जाती है। इसे देव-झूलनी एकादशी भी कहते हैं।

भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की द्वादशी को वामन द्वादशी या वामन जयंती का आयोजन किया जाता है। इसी दिन भगवान का वामन अवतार हुआ था। धार्मिक पुराणों तथा मान्यताओं के अनुसार भक्तों को इस दिन व्रत-उपवास करके भगवान वामन की स्वर्ण प्रतिमा बनवा कर पंचोपचार सहित पूजा करनी चाहिए। जो लोग इस दिन श्रद्धा एवं भक्ति पूर्वक भगवान वामन की पूजा करते हैं, उनके सभी कष्ट दूर हो जाते हैं।

कुछ ग्रंथों में आई कथा के अनुसार वामन ने राजा बली के सिर पर अपना पैर रखकर उसे अमरत्व प्रदान कर दिया। इस कारण राजा बली को भारतीय संस्कृति में महान आदर दिया गया है। आज भी सम्पूर्ण भारत में जब ब्राह्मण-पुरोहित किसी यजमान को रक्षासूत्र बांधते हैं तो यह मंत्र उच्चारित करते हैं-

येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबलः। तेन त्वामनु बध्नामि रक्षे मा चल मा चल।

इसका अर्थ है कि जिस प्रकार दानवों के राजा बली वचन से बांधे गए थे, मैं भी तुम्हें उसी से बांधता हूँ। हे रक्षासूत्र! तुम कभी भी चलायमान न होओ, चलायमान न होओ। अर्थात्- हे रक्षासूत्र! तुम मेरे यजमान की रक्षा करो, कभी भी इस वचन से नहीं फिरो। इसे ‘रक्षासूत्र-मंत्र’ भी कहते हैं। महर्षि वेदव्यासजी द्वारा रचित अध्यात्म रामायण के अनुसार वामन भगवान, राजा बली के सुतल लोक में द्वारपाल बन गए और सदैव बने रहेंगे। गोस्वामी तुलसीदासजी द्वारा रचित रामचरितमानस में भी इस घटना का उल्लेख किया है।

बली की कथा में आए संदर्भों को लौकिक दृष्टि से देखने पर यह अनुमान लगाया जाता है कि दक्षिण भारत में रहने वाले दैत्यों ने हिमालय पर्वत के क्षेत्र में रहने वाले देवताओं के राज्य पर अधिकार कर लिया था जिसे स्वर्ग कहते थे। भगवान ने राजा बली से यह समस्त भूमि लेकर उसे पाताल लोक अर्थात् दक्षिण-पूर्व एशियाई द्वीपों में जाकर रहने का आदेश दिया जिन्हें अब जावा, सुमात्रा, बाली, मलाया आदि द्वीपों के रूप में देखा जा सकता है। बाली द्वीप का नामकरण दैत्यराज ‘बली’ के नाम माना जाता है।

इन्हीं दैत्यों में आगे चलकर सुमाली नामक दैत्य हुआ जो रावण का नाना था। माना जाता है कि रावण का जन्म इन्हीं द्वीपों में हुआ था। कुछ लोग रावण का जन्म आंध्रालय अर्थात् ऑस्ट्रेलिया में होना मानते हैं। यक्षराज कुबेर के पास इतना सोना था कि उन्होंने सोने की लंका बनाई थी।

कुबेर को यह सोना संभवतः सुमात्रा नामक द्वीप से मिला था। इसे संस्कृत साहित्य में ‘स्वर्णद्वीप’ कहा गया है। इस द्वीप पर आज भी बहुत बड़ी मात्रा में सोने का उत्पादन होता है। इन समस्त द्वीपों पर आज भी राक्षस जैसी मुखाकृतियों वाली मूर्तियां और चित्र बड़ी संख्या में मिलते हैं।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

प्रजापति कश्यप की कथा (13)

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प्रजापति कश्यप की कथा

हिन्दू धर्मग्रंथों में आए संदर्भों के अनुसार प्रजापति ब्रह्मा के पुत्र मरीचि हुए। मरीचि के पुत्र प्रजापति कश्यप हुए। प्रजापति कश्यप ने प्रजापति दक्ष की 17 पुत्रियों से विवाह किया। इनमें दिति और अदिति भी थीं। इस कड़ी में हम प्रजापति कश्यप तथा उनकी पत्नियों दिति एवं अदिति की चर्चा करेंगे।

प्राचीन धर्म-ग्रंथों में प्रजापति कश्यप का नाम बार-बार आया है। ये एक वैदिक ऋषि थे तथा इनकी गणना सप्तर्षियों में की जाती थी। हिन्दू धर्मग्रंथों की मान्यता है कि प्रजापति कश्यप के वंशजों ने ही मानव सृष्टि का प्रसार किया। कुछ हिन्दू धर्मग्रंथों के अनुसार धरती पर निवास करने वाले समस्त जीवधारियों की उत्पत्ति प्रजापति कश्यप से हुई।

विश्व के प्राचीनतम ग्रंथ ऋग्वेद में प्रजापति कश्यप का उल्लेख केवल एक बार हुआ है। जबकि यजुर्वेद, सामवेद एवं अथर्ववेद में इनका उल्लेख कई बार हुआ है। अन्य वैदिक ग्रंथों, पुराणों एवं उपनिषदों में आए विवरणों में कश्यप ऋषि प्रमुख पात्र हैं। इन्हें सृष्टि में अत्यंत प्राचीन काल का बताया गया है तथा इन्हें परम धार्मिक एवं रहस्यात्मक दर्शाया गया है। ऐतरेय ब्राह्मण के अनुसार कश्यप ऋषि ने ‘विश्व-कर्म-भौवन’ नामक राजा का अभिषेक कराया था। ऐतरेय ब्राह्मण ने कश्यपों का सम्बन्ध जनमेजय से बताया है। शतपथ ब्राह्मण में प्रजापति को कश्यप कहा गया है।

महाभारत एवं पुराणों में असुरों की उत्पत्ति तथा वंशावली के वर्णन में कहा गया है कि ब्रह्माजी के सात मानस पुत्रों में से एक मरीचि थे जिन्होंने अपनी इच्छा से कश्यप नामक प्रजापति उत्पन्न किया। भागवत पुराण तथा मार्कण्डेय पुराण के अनुसार प्रजापति कश्यप की की बारह पत्नियां थीं किंतु कुछ ग्रंथों में आए उल्लेख के अनुसार कश्यप ने दक्ष प्रजापति की 17 पुत्रियों से विवाह किया। दक्ष की इन पुत्रियों से जो सन्तानें उत्पन्न हुईं उसका विवरण इस प्रकार है-

प्रजापति कश्यप की पत्नी अदिति से आदित्य अर्थात् देवताओं ने जन्म लिया। दिति से दैत्यों ने जन्म लिया। दनु से दानव उत्पन्न हुए। काष्ठा से अश्व आदि पशु उत्पन्न हुए। अनिष्ठा से गन्धवों की उत्पत्ति हुई। सुरसा से राक्षस जन्मे। इला से वृक्षों ने जन्म लिया। मुनि से अप्सराएं उत्पन्न हुईं। क्रोधवशा से सर्प, सुरभि से गौ और महिष, सरमा से श्वापद अर्थात् हिंसक पशु, ताम्रा से श्येन अर्थात् गिद्ध, तिमि से यादोगण अर्थात् जल-जन्तु उत्पन्न हुए। कश्यप की पत्नी विनता से गरुड़जी और अरुण, कद्रू से नाग, पतंगी से पक्षी और यामिनी से शलभ अर्थात् कीड़े उत्पन्न हुए।

प्रजापति कश्यप की पत्नी अदिति के बारह पुत्र हुए जो आदित्य कहलाए- अदितेः अपत्यं पुमान् आदित्यः। अदिति को देवमाता तथा आदित्यों को देवता कहा जाता है। संस्कृत भाषा में अदिति का अर्थ होता है ‘असीम’ अर्थात् जिसकी कोई सीमा न हो।

अदिति के बारह पुत्र हुए जिनके नाम मित्र, वरुण, धाता, अर्यमा, अंश, विवस्वान्, भग-आदित्य, इन्द्र, विष्णु, पर्जन्य, पूषा तथा त्वष्टा हैं। हिन्दू धर्म ग्रंथों के अनुसार अन्तरिक्ष में द्वादश आदित्य भ्रमण करते हैं, वे अदिति के पुत्र हैं। अदिति के पुण्यबल से ही उसके पुत्रों को देवत्व प्राप्त हुआ। यह आख्यान इस ओर संकेत करता है कि विश्व की समस्त नियामक एवं निर्माणकारी शक्तियाँ एक ही माता से उत्पन्न हुई हैं जिसे ‘अदिति’ कहा गया है।

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पुराणों में कहा गया है कि अदिति का एक पुत्र गर्भ में ही मृत्यु को प्राप्त हो गया परन्तु अदिति ने अपने तपोबल से उसे पुनर्जीवित कर दिया। उस पुत्र का नाम मार्तण्ड था। वह मार्तण्ड विश्व-कल्याण के लिए अन्तरिक्ष में गतिमान् है। हम उसे विवस्वान तथा सूर्य के नाम से भी जानते हैं।

इस आख्यान से यह स्पष्ट संकेत मिलता है कि यहाँ अदिति से आशय ‘ब्लैक होल’ जैसी उस अंतरिक्षीय रचना से है जिसमें खगोल-पिण्डों का निर्माण होता है तथा जिसे आकाश-गंगाओं की नर्सरी कहा जाता है। यह आख्यान यह सोचने के लिए विवश करता है कि जब सूर्य का निर्माण हो रहा था, तब कोई दुर्घटना हुई जिससे सूर्य का बनना रुक गया किंतु बाद में सूर्य का निर्माण फिर से आरम्भ हो गया और सूर्य सुरक्षित रूप से अस्तित्व में आ गया।

ऋग्वेद में अदिति को माता स्वीकारा गया है। मातृदेवी की स्तुति में ऋग्वेद में बीस मंत्र हैं। उन मन्त्रों में ‘अदितिर्द्याैः’ मन्त्र अदिति को माता के रूप में प्रदर्शित करता है जिसका अर्थ है- ‘यह मित्रावरुण, अर्यमन्, रुद्रों, आदित्यों इन्द्र आदि की माता हैं। इन्द्र और आदित्यों को शक्ति अदिति से ही प्राप्त होती है।’

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अथर्ववेद एवं वाजसनेयी-संहिता में अदिति के मातृत्व की ओर संकेत हुआ है। इस प्रकार उसका स्वाभाविक स्वत्व शिशुओं पर है। ऋग्वैदिक ऋषि अपने देवताओं सहित बार-बार अदिति की शरण में जाते हैं एवं अदिति से संकट निवारण करने एवं अपनी रक्षा करने की प्रार्थना करते हैं। ‘अदिति’ अपने शाब्दिक अर्थ में व्यापकता, बंधनहीनता और स्वतंत्रता की द्योतक है। इसलिए ऋग्वेद में अदिति की शरण में जाने वाले ऋषि अपनी मुक्ति की कामना करते हैं। कुछ अर्थों में अदिति को ‘गौ’ का पर्याय माना गया है। ऋग्वेद का एक प्रसिद्ध मंत्र इस प्रकार है- ‘मा गां अनागां अदिति वधिष्ट’ अर्थात् गाय रूपी अदिति को न मारो। इस मंत्र का सम्बन्ध गाय से है तथा इसी मंत्र का सम्बन्ध देवताओं की माता अदिति से है। इस मंत्र से स्पष्ट होता है कि भारतीय संस्कृति में अत्यंत प्राचीन काल से ही गाय को मनुष्य जीवन के लिए कितना महत्त्वपूर्ण माना गया! ऋग्वेद के इसी मंत्र के कारण हिन्दू आज तक ‘गौ-हत्या’ को घनघोर पाप मानते हैं। इसी मातृदेवी की उपासना के लिए विभिन्न रूपों में बनाई गई, प्राचीन काल की लाखों मूर्तियां मिलती हैं। इन मूर्तियों को सिंधु नदी घाटी से लेकर मध्य एशिया अर्थात् ईरान एवं ईराक और भू-मध्य सागर के देशों अर्थात् असीरिया, तुर्की एवं अनेक यूरोपीय देशों में प्राप्त किया गया है।

इन्हीं मातृदेवियों की पूजा इस्लाम के उदय से पहले अरब के रेगिस्तान में होती थी। उनकी मूर्तियां आज भी अरब देशों से खुदाई में प्राप्त होती हैं। इन्हें लात अथवा अल्लात, मनात, हुबल और उज्जा अल-उज्जा कहा जाता है।

इनमें से तीन देवियों की प्रतिमाएं एक ही पैनल पर प्राप्त होती हैं तथा एक देवी के समक्ष सिंह बैठा हुआ होता है। ऐसा प्रतीत होता है कि ये तीन देवियां लक्ष्मी, सरस्वती एवं दुर्गा हैं तथा दुर्गा के चरणों के पास सिंह बैठा हुआ है। जब इस्लाम का उदय हुआ तो देवियों की इन प्रतिमाओं को नष्ट कर दिया गया तथा उनकी पूजा बंद कर दी गई। इन्हें पूजने वालों को असभ्य और अंध-विश्वासी कहा गया।

इस विवेचना के पश्चात् हमएक बार फिर से पुराणों की ओर चलते हैं। जब अदिति के पुत्रों अर्थात् देवताओं को रहने के लिए स्वर्ग मिल गया तो दिति के पुत्रों अर्थात् दैत्यों ने देवताओं से स्वर्ग छीनना चाहा। इस पर देवों एवं दैत्यों में भयानक शत्रुता उत्पन्न हो गई तथा दैत्यों और देवों के बीच हजारों साल तक अनेक युद्ध हुए।

पौराणिक कथाओं के अनुसार स्वर्ग के देवगण ऋषियों द्वारा प्रदत्त यज्ञ-भाग एवं हविष्य पर जीवित रहते थे जबकि दैत्य मानव जाति को मारकर खाते थे। देवता सात्विक वृत्ति के होने के कारण, प्रायः दुष्ट दैत्यों से परास्त हो जाते थे। तब ब्रह्मा, विष्णु एवं महेश देवताओं की सहायता किया करते थे।

चूंकि विष्णु भी अदिति के पुत्र थे, इसलिए दैत्य विष्णु से भी शत्रुता रखते थे। यही कारण था कि दैत्य, ब्रह्माजी एवं शिवजी को प्रसन्न करने के लिए घनघोर तपस्या करके उनसे वरदान पाते थे। दैत्यगण ब्रह्माजी एवं शिवजी से प्राप्त शक्ति का उपयोग भगवान श्रीहरि विष्णु, उनके भाइयों अर्थात् देवताओं, उनके भक्तों तथा ऋषियों-मुनियों के विरुद्ध किया करते थे। दैत्यकुल में प्रह्लाद, दैत्यराज विरोचन, दैत्यराज बली एवं राक्षसराज विभीषण आदि कुछ ही दैत्य हुए जो भगवान श्रीहरि विष्णु को भजते थे। त्रिजटा नामक राक्षसी भी भगवान की भक्त थी।

एक बार बहुत लम्बे समय तक हुए देव-दानव युद्ध में देव पराजित हो गए और वे स्वर्ग छोड़कर वनों में विचरण करने लगे। उनकी दुर्दशा को देखकर अदिति और कश्यप बड़े दुःखी हुए। तब नारद मुनि ने अदिति को सूर्याेपासना करने की सलाह दी। अदिति ने सूर्यदेव को प्रसन्न करने के लिए अनेक वर्षों तक घनघोर तपस्या की। सूर्यदेव अदिति के तप से प्रसन्न हुए तथा उन्होंने अदिति से वरदान मांगने को कहा।

अदिति ने कहा कि आप मेरे पुत्र के रूप में जन्म लें। कालान्तर में सूर्य का तेज अदिति के गर्भ में प्रतिष्ठित हुआ किन्तु एक बार अदिति और प्रजापति कश्यप में कलह हो गया। प्रजापति कश्यप ने क्रोधवश अदिति के गर्भस्थ शिशु को ‘मृत’ कह दिया। उसी समय अदिति के गर्भ से एक प्रकाश-पुंज बाहर आया। उसे देखकर प्रजापति कश्यप भयभीत हो गए और उन्होंने सूर्य से क्षमा-याचना की।

उसी समय एक आकाशवाणी हुई- ‘आप दोनों इस पुंज का प्रतिदिन पूजन करें। उचित समय होने पर इस पुंज से एक पुत्र-रत्न जन्म लेगा। वह आप दोनों की इच्छा को पूर्ण करके ब्रह्माण्ड में स्थित होगा।’

अदिति का यही पुत्र आदित्य, मार्तण्ड, विवस्वान, अंशुमाली तथा सूर्य कहलाया। जब आदित्य दैत्यों से युद्ध करने गए तो दैत्य आदित्य के तेज को देखकर युद्ध से पलायन करके पाताल-लोक में चले गए। आदित्य सूर्यदेव के रूप में ब्रह्माण्ड के मध्यभाग में स्थित हुए और ब्रह्माण्ड का संचालन करने लगे।

जिस प्रकार अदिति के पुत्र आदित्य कहलाते थे, उसी प्रकार दिति के पुत्र दैत्य कहलाते थे। जब दिति के पुत्रों हिरण्याक्ष और हिरण्यकश्यप ने इन्द्र से स्वर्ग छीन लिया तब भगवान विष्णु ने दिति के पुत्रों को मारकर स्वर्ग पुनः दिति के पुत्रों को प्रदान किया। इस पर दिति ने अपने पति प्रजापति कश्यप से ऐसा पुत्र देने की याचना की जो इन्द्र का नाश कर सके!

डॉ. मोहनलाल गुप्ता

दिति ने इन्द्रहंता पुत्र की प्राप्ति के लिए पति को प्रसन्न किया (14)

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दिति ने इन्द्रहंता पुत्र की प्राप्ति के लिए पति को प्रसन्न किया

पिछली कड़ी में हमने देवमाता अदिति की कथा पर चर्चा की थी। इस कड़ी में हम दैत्यों की माता दिति की चर्चा करेंगे। अदिति की भांति दिति भी प्रजापति दक्ष की उन 17 पुत्रियों में  से थी जिनका विवाह प्रजापति मरीचि के पुत्र कश्यप से हुआ था।

विभिन्न धर्मग्रंथों में उल्लेख मिलता है कि एक बार जब ऋषि कश्यप सन्ध्या काल में देवताओं के निमित्त यज्ञ में खीर की आहुतियां दे रहे थे, तब दिति अत्यंत कामासक्त होकर अपने पति कश्यप के पास आई तथा उनसे समागम का आग्रह करने लगी।

इस पर ऋषि कश्यप ने उसे समझाया कि यह भूत-भ्रमण काल है, इस काल में समागम करना उचित नहीं है अन्यथा भूतनाथ शिव क्रुद्ध जो जाएंगे किंतु कामातुर दिति ऋषि से समागम का आग्रह करती रही।

कश्यप समझाते रहे किंतु दिति जिद करती रही। अंत में ऋषि कश्यप ने विवश होकर अपनी पत्नी की बात मान ली। समागम के पश्चात् जब काम का आवेग शांत हो गया तो दिति अपने कृत्य के लिए अत्यंत लज्जित हुई तथा क्षमा याचना के लिए अपने पति के समक्ष उपस्थित हुई।

मुनि ने कहा- ‘हे भार्या! तेरे द्वारा असमय में समागम किए जाने के कारण तेरे गर्भ से दैत्य उत्पन्न होंगे। वे तीनों लोकों को अत्यंत दुःख देंगे, देवताओं से शत्रुता करने वाले होंगे तथा भगवान श्रीहरि विष्णु के हाथों मारे जायेंगे।’

जब दिति को यह ज्ञात हुआ कि उसके पुत्र देवताओं के कष्ट का कारण बनेंगे, तो दिति ने सौ वर्ष तक अपने शिशुओं का उदर में ही रखा। अंत में उसके गर्भ से हिरण्याक्ष एवं हिरण्यकश्यप आदि दैत्य उत्पन्न हुए।

जब दिति के पुत्रों ने अदिति के पुत्रों को स्वर्ग से निकाल दिया तो भगवान विष्णु ने वराह के रूप में प्रकट होकर हिरण्याक्ष का तथा नृसिंह रूप में प्रकट होकर हिरण्यकश्यप का वध किया और इन्द्र को फिर से स्वर्ग का राजा बना दिया। इस कारण अदिति और दिति में वैर रहने लगा।

पूरे आलेख के लिए देखें यह वी-ब्लॉग-

एक बार दिति ने सोचा मैं कोई ऐसा उपाय करूं जिससे मुझे ऐसा पुत्र प्राप्त हो, जो इन्द्र को मार डाले। इसलिए दिति उसी दिन से अपने पति कश्यप को प्रसन्न करने में जुट गई और दिन-रात ऋषि की सेवा करने लगी। दिति ने अपने मन को संयमित करके प्रेम, विवेक, मधुर भाषण, मुस्कान एवं चितवन से ऋषि कश्यप के मन को जीत लिया।

दिति की सेवा से प्रसन्न होकर ऋषि कश्यप ने दिति से कहा- ‘तुम जो चाहो हम करने को तैयार हैं।’

दिति ने ऋषि से कहा- ‘अदिति के पुत्रों ने मेरे पुत्रों को मार डाला है। अतः मैं आपसे ऐसे गर्भ की इच्छुक हूँ, जिससे उत्पन्न पुत्र, अदिति के पुत्र इन्द्र को मार डाले।’

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दिति के मन का कपट जानकर कश्यप ऋषि को बहुत दुःख हुआ। उन्होंने सोचा कि माया ने मुझे पकड़ लिया। संसार में लोग स्वार्थ के लिए पति-पुत्रादि का भी नाश कर देते हैं। अब मेरा क्या होगा? मैंने अपनी पत्नी को जो वचन दिया है, वह व्यर्थ नहीं हो सकता किंतु मैं यह भी नहीं चाहता कि मेरे पुत्र इन्द्र का अनिष्ट हो। इस प्रकार सोच-विचार करके कश्यप ऋषि ने दिति को एक वर्ष का ‘पुंसवन व्रत’ धारण करने के लिए कहा। कश्यप ने कहा- ‘यदि तुम एक वर्ष तक व्रत का पालन करोगी तो तुम्हारे गर्भ से जो पुत्र उत्पन्न होगा वह इन्द्र को मारने वाला होगा किंतु यदि व्रत में कोई त्रुटि हो जायेगी तो वह इन्द्र का मित्र हो जाएगा।’ कश्यप मुनि ने व्रत-काल में दिति को कई नियमों का पालन करने के लिए कहा। इन नियमों के अनुसार वह व्रत की अवधि में किसी भी प्राणी को मन, वचन या कर्म के द्वारा नहीं सताएगी। किसी को शाप या गाली नहीं देगी, झूठ नहीं बोलेगी, शरीर के नख एवं बाल नहीं काटेगी, किसी भी अशुभ वस्तु का स्पर्श नहीं करेगी, क्रोध नहीं करेगी, बिना धुले वस्त्र नहीं पहनेगी तथा किसी अन्य व्यक्ति द्वारा पहनी हुई माला नहीं पहनेगी। किसी का जूठा नहीं खाएगी, मांसयुक्त अन्न का भोजन नहीं करेगी, शूद्र और रजस्वला स्त्री का अन्न नहीं खाएगी। जूठे मुंह, संध्या समय एवं खुले केश लेकर घर से बाहर नहीं जाएगी। केवल रात्रि में शयन करेगी, प्रातःकाल एवं सायंकाल में शयन नहीं करेगी।

ऋषि ने दिति से कहा कि इस व्रत के दौरान वह निषिद्ध-कर्मों का त्याग करके सदैव पवित्र और सौभाग्य के चिह्नों से सुसज्जित रहे। प्रातःकाल में गाय, ब्राह्मण, लक्ष्मीजी और भगवान नारायण की पूजा करके ही कलेवा करे। सुहागिन स्त्रियों एवं पति की सेवा में संलग्न रहे और यही भावना करती रहे कि पति का तेज मेरी कोख में है।

अपने पति की बात मानकर दिति कश्यप ऋषि के ओज से सुंदर गर्भ धारण करके पुंसवन व्रत का पालन करने लगी। पुत्र-जन्म एक सहस्र वर्ष बाद होना था। तब तक दिति कुशप्लव नामक तपोवन में रहकर घनघोर तपस्या करने लगी। वह भूमि पर सोती थी और सदैव पवित्रता का ध्यान रखती थी।

उसके इस प्रकार के सात्विक जीवन व्यतीत करने से उसका गर्भ भी अति उत्तम संस्कारों से विभूषित हो गया। इस प्रकार कई सौ साल बीत गए तथा दिति का गर्भ बड़ा होने लगा। एक दिन अदिति को दिति के गर्भवती होने तथा उसके गर्भ के उद्देश्य के बारे में जानकारी हो गई। अदिति को यह जानकर अत्यंत चिंता हुई कि दिति ने अदिति के पुत्रों को मारने के उद्देश्य से पति कश्यप से महातेजस्वी गर्भ की प्राप्ति की है। अतः अदिति अपनी बहिन के गर्भ को नष्ट करने का उपाय सोचने लगी!

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

इन्द्र ने दिति के गर्भ के उनन्चास टुकड़े कर दिए (15)

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कपटी इन्द्र - bharatkaitihas.com
कपटी इन्द्र ने दिति के गर्भ के उनन्चास टुकड़े कर दिए

पिछली कथा में हमने चर्चा की थी कि अदिति के पुत्र इन्द्र को मारने के लिए अदिति की बहिन दिति ने एक तेजस्वी पुत्र की कामना की तथा अपने पति को प्रसन्न करके उससे एक तेजस्वी गर्भ प्राप्त कर लिया। महर्षि कश्यप ने दिति को तेजस्वी पुत्र प्राप्त करने के लिए पुंसवन व्रत करने का उपदेश दिया। तदनुसार दिति विगत कई सौ सालों से पुंसवन व्रत का पालन कर रही थी।

जब दिति का तेजस्वी गर्भ बढ़ने लगा तो दिति के अत्यन्त दीप्तिमान अंगों को देखकर अदिति को बड़ा दुःख हुआ। उसने अपने मन में सोचा कि यदि दिति के गर्भ से इन्द्र के समान महाबली पुत्र उत्पन्न होगा तो निश्चय ही मेरा पुत्र निस्तेज हो जाएगा।

चिन्ता-ग्रस्त अदिति ने अपने पुत्र इन्द्र से कहा इस समय दिति के गर्भ में तुम्हारा शत्रु पल रहा है। अतः ऐसा कोई प्रयत्न करो कि गर्भस्थ शिशु नष्ट हो जाए। दिति का वह गर्भ मेरे हृदय में शूल के समान चुभ रहा है। अतः किसी उपाय से तुम उसे नष्ट कर दो। जब शत्रु बढ़ जाता है तब वह राजयक्ष्मा रोग की भांति, नष्ट नहीं हो पाता है। इसलिए बुद्धिमान मनुष्य का कर्तव्य है कि वह ऐसे शत्रु को अंकुरित होते ही नष्ट कर डाले। चतुर राजनीतिज्ञ वही है जिसे शत्रु के घर की एक-एक बात का पता हो।

अपनी माता की बात मानकर इन्द्र अपनी सौतेली माता दिति के पास गया। उसने ऊपर से मधुर किन्तु भीतर से विषभरी वाणी में विनम्रतापूर्वक दिति से कहा- ‘हे माता! व्रत के कारण आप अत्यन्त दुर्बल हो गयी हैं अतः मैं आपकी सेवा करने के लिए आया हूँ।’

जिस प्रकार बहेलिया हिरन को मारने के लिए हिरन की सी भोली सूरत बनाकर उसके पास जाता है, वैसे ही देवराज भी कपट-वेष धारण करके व्रतपरायणा दिति के व्रत-पालन की त्रुटि पकड़ने के लिए उसकी सेवा करने लगा। एक दिन उसने दिति से कहा- ‘माता मैं आपके चरण दबाऊँगा, क्योंकि बड़ों की सेवा करने से मनुष्य अक्षय गति प्राप्त कर लेता है।’

ऐसा कहकर इन्द्र दिति के दोनों चरण पकड़कर दबाने लगा। इस प्रकार प्रेम पूर्वक चरण दबाए जाने से दिति को बहुत सुख मिला और उसे नींद आने लगी। उस दिन वह पैर धोना भूल गयी और खुले बालों से ही सो गई। दिति को नींद के वशीभूत देखकर इन्द्र योगबल से अत्यन्त सूक्ष्म रूप धारण करके दिति के उदर में प्रवेश कर गया और अपने वज्र से दिति के गर्भस्थ बालक के सात टुकड़े कर डाले। तब वे सातों टुकड़े सूर्य के समान तेजस्वी सात कुमारों में परिणत हो गए।

वज्र के आघात से गर्भस्थ शिशु रोने लगे। तब दानव-शत्रु इन्द्र ने उनसे ‘मा रुद’ अर्थात् ‘मत रोओ’ कहा। फिर इन्द्र ने उन सातों टुकड़ों के सात-सात टुकड़े और कर दिये। इस प्रकार वे उनन्चास कुमार बन गए और पुनः जोर-जोर से रोने लगे। उन सब ने हाथ जोड़कर इन्द्र से कहा- ‘देवराज! तुम हमें क्यों मार रहे हो? हम तो तुम्हारे भाई हैं।’

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इन्द्र ने मन-ही-मन सोचा कि निश्चय ही यह सौतेली माँ दिति के व्रत का परिणाम है कि वज्र से मारे जाने पर भी इनका विनाश नहीं हुआ। ये एक से अनेक हो गए, फिर भी उदर की रक्षा हो रही है। इसमें संदेह नहीं कि ये अवध्य हैं, इसलिए इन्द्र ने विचार किया कि ये देवता हो जाएं। इस प्रकार इन्द्र ने सौतेली माता के पुत्रों से शत्रु-भाव त्यागकर उन्हें ‘सोमपायी देवता’ बना लिया। जब दिति के गर्भ के बालक देवराज इन्द्र द्वारा किए गए वज्र-प्रहार से आहत होकर रो रहे थे, उस समय इन्द्र ने इन गर्भस्थ बालकों को ‘मा रुद’ कहकर चुप कराया था, इसलिए ये बालक आगे चलकर ‘मरुद्गण’ नाम से प्रसिद्ध हुए। इन्द्र द्वारा अपने गर्भ को विकृत किया गया जानकर दिति जाग गई। उसने अत्यंत क्रोध में भरकर अपनी बहिन अदिति तथा उसके पुत्र इन्द्र को शाप दिया। दिति ने इन्द्र से कहा- ‘तुमने छलपूर्वक मेरा गर्भ छिन्न-भिन्न किया है। इसलिए तेरा राज्य भी शीघ्र ही नष्ट हो जाएगा। जिस प्रकार अदिति ने गुप्त पाप के द्वारा मेरे गर्भ को नष्ट करवाया है, उसी प्रकार उसके पुत्र भी क्रमशः उत्पन्न होते ही नष्ट हो जायेंगे और वह पुत्र-शोक से चिन्तित होकर कारावास में रहेगी।’

कश्यप ऋषि ने दिति को शांत करते हुए कहा- ‘देवी! तुम क्रोध मत करो। तुम्हारे ये उनचास पुत्र मरुद् नामक देवता होंगे, जो इन्द्र के मित्र बनेंगे। तुम्हारा शाप अट्ठाईसवें द्वापर-युग में सफल होगा। वरुणदेव ने भी अदिति को शाप दिया है। इन दोनों शापों के संयोग से मनुष्य योनि में जन्म लेकर देवकी के रूप में उत्पन्न होगी और कारवास में बंद होकर अपने पुत्रों के लिया रोया करेगी! इस प्रकार यह अपने द्वारा किए गए कठोर कर्म का फल भोगेगी।’

इस पौराणिक कथा से अनुमान लगाया जा सकता है कि दिति के गर्भ से उनन्चास पुत्रों के जन्म लेने की यह कथा वस्तुतः प्रकृति की किसी बड़ी घटना का उल्लेख है जिसमें सृष्टि में वायु का प्राकट्य हुआ। चूंकि इन्द्र बादलों का देवता है तथा वायु बादलों को उड़ाकर नष्ट कर देता है इसलिए वायु को इन्द्रहंता माना जाना था किंतु इन्द्र ने वायु को देवता बना लिया। अर्थात् इन्द्र की चतुराई से वायु बादलों के सहायक बन गए जो बादलों को एक स्थान से उड़ाकर दूसरे स्थान तक ले जाने में सहायता करते हैं।

कुछ ग्रंथों में यह कथा थोड़े से अंतरों के साथ मिलती है। इन ग्रंथों के अनुसार इन्द्र ने दिति को अपनी सेवा से प्रसन्न कर लिया किंतु दिति इन्द्र के मनोभावों को ताड़ गई। इसलिए पुत्र-प्राप्ति से दस वर्ष पूर्व दिति ने इन्द्र से कहा- ‘मैं तेरी सेवा से अत्यंत प्रसन्न हूँ। मेरे गर्भ में तेरा हंता पल रहा है किंतु जब वह उत्पन्न होगा तो मैं उससे कहूंगी कि वह तेरा वध नहीं करे।’

एक दिन दिति पायताने की ओर सिर करके सो गयी। इन्द्र ने उसे ऐसी अपवित्र स्थिति में सोते हुए देखा तो इन्द्र ने दिति के गर्भ में प्रवेश करके गर्भ में पल रहे शिशु के सात टुकड़े कर डाले। बालक के चिल्लाने पर दिति जाग गयी। उसने इन्द्र से पूछा कि तूने मेरे गर्भ के टुकड़े क्यों किए? इस पर इन्द्र ने विनीत भाव से कहा- ‘माता! आप अशुचिता पूर्वक पायताने पर सिर रखकर सो रही थीं। इसलिए आपके गर्भ के टुकड़े किए गए हैं।’

इन्द्र की यह बात सुनकर दिति ने लज्जित होकर इस कर्म का परिमार्जन करने की प्रार्थना की। तब इन्द्र ने उसके दोष का परिमार्जन कर दिया।

दिति ने इन्द्र से प्रार्थना की- ‘मेरे गर्भ से सात दिव्य रूपधारी बेटे जन्म लें जो मारुत कहलाएं क्योंकि गर्भ को काटते हुए इन्द्र ने ‘मा रूद्’ (रो मत) कहा था। इनमें से चार पुत्र इन्द्र के अधीन रहकर चारों दिशाओं में विचरण करें। दो बालक क्रमशः ब्रह्मलोक तथा इन्द्रलोक में विचरण करें और सातवां पुत्र महायशस्वी ‘दिव्य वायु’ के नाम से विख्यात हो।’ इन्द्र ने दिति की यह प्रार्थना स्वीकार कर ली।

इस प्रकार इन ग्रंथों में सात मरुद्गण का उल्लेख मिलता है जबकि बहुत से हिन्दू धर्म-ग्रंथों में उनन्चास मरुद्ों का उल्लेख मिलता है। रामचरित मानस में भी गोस्वामीजी ने लंका दहन के प्रसंग में लिखा है- ‘हरि प्रेरित तेहि अवसर चले मरुत उनचास!’ अर्थात् ईश्वर की प्रेरणा से लंका को जलाने के लिए उनन्चास प्रकार के मरुत चलने लगे।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

कद्रू के पुत्र (16)

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कद्रू के पुत्र

अण्डों के उत्पन्न होने के पांच सौ वर्ष बीत जाने के बाद कद्रु के अंडों से एक सहस्र नाग प्रकट हुए जो कद्रू के पुत्र कहलाए!

हम पिछली कुछ कड़ियों में दक्ष की 17 पुत्रियों का उल्लेख करते आए हैं जिनका विवाह प्रजापति ब्रह्माजी के पौत्र कश्यप ऋषि से हुआ था। प्रजापति दक्षराज की इन 17 कुमारियों में कद्रू तथा विनता भी थीं जिनका विवाह कश्यप ऋषि से हुआ था। एक बार कश्यप ऋषि ने कद्रू तथा विनता से प्रसन्न होकर उन्हें मनचाहा वर मांगने को कहा।

कद्रु ने महापराक्रमी एक सहस्त्र नाग पुत्रों के रूप में मांगे तथा विनता ने केवल तेजस्वी दो पुत्र मांगे जो कद्रू के एक सहस्र पुत्रों की अपेक्षा अधिक पराक्रमी एवं यशस्वी हों। दक्षपुत्रियों की ऐसी इच्छा जानकर प्रजपति कश्यप ने कद्रू तथा विनता को गर्भवती कर दिया।

समय आने पर कद्रू की कोख से एक सहस्स्र अण्डे उत्पन्न हुए तथा विनता की कोख से दो अंडे उत्पन्न हुए। अण्डों के उत्पन्न होने के पांच सौ वर्ष बीत जाने के बाद कद्रु के अंडों से एक सहस्र नाग प्रकट हुए जो कद्रू के पुत्र कहलाए किंतु विनता के अण्डे ज्यों के त्यों पड़े रहे। इस पर विनता ने अपना एक अंडा स्वयं ही तोड़ डाला। उसमें से एक अविकसित बालक निकला जिसका ऊर्ध्वभाग तो बन चुका था किंतु अधोभाग अभी विकसित नहीं हुआ था।

उस अविकसित बालक ने क्रुद्ध होकर अपनी माँ को श्राप दिया कि वह 500 वर्ष तक कद्रु की दासी बनकर रहे। उस बालक ने यह भी कहा कि यदि दूसरा अंडा समय से पूर्व नहीं फोड़ा गया तो उस अण्डे से उत्पन्न पुत्र विनता को दासत्व से मुक्ति दिलवाएगा। इसके बाद वह अविकसित बालक अरुण बनकर आकाश में चला गया तथा सूर्यदेव का सारथि बन गया।

जब समय आने पर दूसरा अण्डा परिपक्व हुआ तो उसमें से गरुड़जी ने जन्म लिया। वे भगवान विष्णु के वाहन बन गए। विनता का पुत्र होने के कारण गरुड़जी को वैनतेय भी कहते हैं। उन्हें पक्षियों का राजा तथा खगपति भी कहा जाता है। जब राम-रावण युद्ध में भगवान श्रीराम एवं लक्ष्मण को मेघनाद ने नागपाश से बांध दिया था, तब यही गरुड़जी नागपाश को काटने के लिए धरती पर उपस्थित हुए थे।

विभिन्न पुराणों तथा महाभारत में आई एक कथा के अनुसार विनता तथा कद्रू एक बार कहीं बाहर घूमने गयीं। वहाँ उनमें उच्चैश्रवा नामक घोड़े के रंग को लेकर विवाद हो गया। विनता ने कहा कि उच्चैश्रवा का रंग पूरी तरह श्वेत है जबकि कद्रू ने कहा कि घोड़े का रंग श्वेत है किंतु पूंछ का रंग काला है। इस पर दोनों में शर्त लग गई कि जिसकी बात गलत होगी, वह पांच सौ सालों के लिए दूसरी बहिन की दासी बनकर रहेगी। अगले दिन घोड़े का रंग देखने का निश्चय हुआ।

कद्रू के मन में कपट आ गया। उसने अपने पुत्रों से कहा कि वे उच्चैश्रवा की पूंछ पर लटक जाएं जिससे उसकी पूंछ काली दिखाई दे। कद्रू के अधिकांश पुत्र इस कपट में अपनी माता का साथ देने को तैयार हो गए किंतु कुछ पुत्रों ने अपनी माता के कपट में साथ देने से मना कर दिया। इस पर कद्रू ने उन नागों को शाप दिया कि वे जनमेजय के यज्ञ में भस्म हो जायें।

पूरे आलेख के लिए देखें यह वी-ब्लॉग-

कद्रू के मुख से इतनी कड़वी बात सुनकर कश्यप ऋषि अत्यंत दुःखी हुए। तब ब्रह्माजी ने अपने पौत्र कश्यप को बुलाकर कहा- ‘तुमसे उत्पन्न सर्पों की संख्या बहुत बढ़ गयी है। तुम्हारी पत्नी ने उन्हें शाप देकर अच्छा ही किया, अतः तुम उससे रुष्ट मत होना।’ ब्रह्माजी ने कश्यप को सर्पों का विष उतारने की विद्या भी प्रदान की।

अगले दिन विनता तथा कद्रू उच्चैश्रवा को देखने के लिए गयीं। उच्चैश्रवा की पूंछ सफेद रंग की ही थी किंतु कद्रू के पुत्र उसकी पूंछ से लटक गए। इस कारण उच्चैश्रवा की पूंछ काले रंग की दिखाई पड़ी। विनता अत्यंत दुःखी हुई किंतु उसने कद्रू की दासी बनना स्वीकार कर लिया।

जब गरुड़जी उत्पन्न हुए और उन्होंने अपनी माता विनता को कद्रू की दासी बने हुए देखा तो गरुड़जी ने कद्रू तथा उसके पुत्रों से पूछा- ‘ऐसा कौन-सा कार्य है जिसको करने से मेरी माता को दासत्व से मुक्ति मिले सकती है?’

इस पर नागों ने गरुड़जी से कहा- ‘यदि तुम स्वर्ग से अमृत लाकर नागों को प्रदान करो तो हम तुम्हारी माता को दासत्व से मुक्त कर देंगे।’

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 गरुड़जी उसी समय अमृत लाने के लिए स्वर्ग चले गए। जब देवताओं ने देखा कि गरुड़जी अमृत लेने आ रहे हैं तो उन्होंने गरुड़जी पर आक्रमण कर दिया। शक्तिशाली गरुड़जी ने समस्त देवताओं को परास्त कर दिया तथा स्वर्ग में प्रवेश करके अमृत-कलश उठा लिया। भगवान श्रीहरि विष्णु ने भी गरुड़जी को अमृतघट ले जाते हुए देखा किंतु जब भगवान ने यह विचार किया कि गरुड़जी ने अमृत का पान स्वयं नहीं किया अपितु उसे नागों के पास लेकर जा रहे हैं ताकि गरुड़जी की माता को दासतव से मुक्ति मिल सके तो श्रीहरि भगवान विष्णु, गरुड़जी की निस्पृहता देखकर अत्यंत प्रसन्न हुए तथा उन्होंने गरुड़जी को वरदान दिया कि वे अमृत का पान किए बिना ही अजर-अमर होंगे तथा उनका स्थान विष्णु-ध्वज पर रहेगा। इस प्रकार गरुड़जी अदिति के पुत्र न होते हुए भी देवताओं में सम्मिलित हो गए। जब गरुड़जी अमृत-कलश लेकर चले तो मार्ग में उन्हें देवराज इन्द्र मिले। इन्द्र ने गरुड़जी से कहा- ‘यह अमृत-कलश मुझे दे दो। यदि नागों ने इसका पान कर लिया तो यह सम्पूर्ण सृष्टि के लिए अत्यधिक बुरा होगा।’ इस पर गरुड़जी ने इन्द्र को बताया- ‘मुझे इसकी आवश्यकता नहीं है किंतु इसे ले जाए बिना मेरी माता, नागों की माता के दासत्व से मुक्त नहीं होगी। मैं यह अमृत-कलश नागों के पास ले जाकर रख दूंगा। आप इसे वहाँ से उठा लेना।’

जब इन्द्र ने गरुड़जी की यह बात सुनी तो उसने गरुड़जी को वरदान दिया- ‘आज के बाद सर्प गरुड़जी की भोजन सामग्री होंगे।’

गरुड़जी अपनी माँ के पास पहुंचे और उसे बताया कि मैं अमृत ले आया हूँ। माता विनता अपने पुत्र का यह पराक्रम देखकर बहुत प्रसन्न हुई।

गरुड़जी ने नागों को भी सूचना दी- ‘मैं अमृत ले आया हूँ। अतः आप लोग मेरी माता विनता को दासत्व से मुक्त कर दें।’

जब नागों ने पूछा कि अमृत-कलश कहाँ है तो  गरुड़जी ने अमृत-कलश एक कुशासन पर रख दिया तथा नागों से कहा कि वे स्नान आदि से पवित्र होकर अमृत-कलश ले जाएं। नागों ने गरुड़जी की बात स्वीकार कर ली। उन्होंने अपनी मौसी विनता को दासत्व से मुक्त कर दिया तथा स्वयं स्नान करने के लिए चले गए।

जब तक नाग स्नान करके लौटते, तब तक देवराज इन्द्र अमृत-कलश लेकर चले गए। इस पर नागों ने उस कुशा को चाटना आरम्भ कर दिया जिस पर गरुड़जी ने अमृत-कलश रखा था। उन्होंने सोचा कि संभवतः अमृत की कुछ बूंदें इस कुशा पर गिर गई हों। नागों को अमृत तो नहीं मिला किंतु कुशा के कारण उनकी जीभ बीच में से चिर गई। कहा जाता है कि उसी दिन से सांपों की जीभ बीच में से चिरी हुई होती है।

कश्यप की पत्नी कद्रू के सम्बन्ध में पुराणों में एक अन्य कथा भी मिलती है जिसके अनुसार कश्यप की पत्नी सुपर्णा तथा कद्रू, अन्य ऋषियों के मना करने पर भी ऋषियों के आश्रमों में चल रहे यज्ञों के हविष्य को दूषित कर देती थीं। अतः ऋषियों ने उन्हें शाप देकर नदियां बना दिया।

कश्यप ऋषि ने अपनी पत्नियों की शाप-मुक्ति के लिए भगवान शिव की आराधाना की। भगवान शिव ने उन्हें वरदान दिया कि जब ये दोनों नदियां गंगाजी में मिलेंगी तब वे पुनः नारी-रूप धारण कर लेंगी।

जब कुछ समय बाद कश्यप ऋषि को अपनी दोनों पत्नियां पुनः नारी रूप में प्राप्त हो गईं तब कश्यप ने अपनी दोनों पत्नियों का सीमांतोन्नयन संस्कार किया किंतु यज्ञ के समय कद्रू ने एक आंख से संकेत करके ऋषियों का उपहास किया। अतः ऋषियों ने कद्रू को शाप देकर उसे कानी बना दिया। कश्यप ने बड़ी कठिनाई से ऋषियों को प्रसन्न करके कद्रू को श्राप मुक्त करवाया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

कश्यप ऋषि को वसुदेव के रूप में पैदा होने का श्राप मिला था (17)

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कश्यप ऋषि

हमने इस धारावाहिक की पिछली कुछ कड़ियों में कश्यप ऋषि का उल्लेख किया है। कश्यप, ब्रह्माजी के पुत्र प्रजापति मरीचि के पुत्र थे। वे अत्यंत ज्ञानी थे। उनकी बहुत सारी पत्नियां थीं जिनमें से 17 पत्नियां तो प्रजापति दक्ष की पुत्रियां थीं। माना जाता है कि इस धरती पर जितने भी प्राणी हैं, वे कश्यप ऋषि तथा उनकी पत्नियों की संतान हैं।

ऐसे महापराक्रमी, महाज्ञानी तथा महातपस्वी कश्यप को भी एक बार शाप झेलना पड़ा ओर उस शाप के कारण धरती पर जन्म लेकर ना-ना प्रकार के कष्ट उठाने पड़े। इस कड़ी में हम कश्यप ऋषि के शापग्रस्त होने की कथा की चर्चा करेंगे।

एक बार ऋषि कश्यप ने अपने आश्रम में एक विशाल यज्ञ का आयोजन करवाया तथा अनेक महाज्ञानी ऋषियों को यज्ञ सम्पन्न करने के लिए अपने आश्रम में बुलाया। यज्ञ में आहुति देने के लिए ऋषि को विपुल यज्ञ सामग्री, दूध एवं घी आदि की आवश्यकता थी। इस व्यवस्था के लिए कश्यप ऋषि ने वरुण देव का आह्वान किया।

वरुण देव के प्रकट होने पर कश्यप ने उनसे प्रार्थना की- ‘मुझे ऐसा वरदान दीजिए कि मेरे द्वारा आयोजित होने वाले वाले इस यज्ञ में यज्ञ-सामग्री का कभी अभाव न हो तथा यह यज्ञ भली-भांति सम्पन्न हो जाए।’

वरुण देव ने ऋषि को एक दिव्य गाय भेंट की और कहा- ‘यह गाय आपके यज्ञ हेतु आवश्यक समस्त सामग्री की पूर्ति करेगी। यज्ञ समाप्ति के बाद आप इसे पुनः मुझे लौटा दीजिएगा। अन्यथा मैं इस गाय को वापस लेने के लिए आऊंगा।’ कश्यप ऋषि वरुण देव से वरदान एवं दिव्य गौ प्राप्त करके बहुत प्रसन्न हुए।

कश्यप ऋषि का यज्ञ बहुत लम्बे समय तक चलता रहा। वरुण देव द्वारा दी गई गाय के प्रभाव से उनके यज्ञ में कभी भी बाधा नहीं आई। यज्ञ में प्रयुक्त होने वाली सामग्री का स्वतः प्रबन्ध होता रहा। जब यज्ञ सम्पन्न हुआ तो ऋषि कश्यप के मन में उस दिव्य गौ को लेकर लालच उत्पन्न हो गया। उन्होंने गौ को अपने पास रख लिया।

यज्ञ सम्पूर्ण होने के कई दिनों बाद तक जब ऋषि कश्यप गाय को वापस लौटाने वरुण देव के पास नहीं आए तो एक दिन वरुण देव उनके समक्ष प्रकट हुए तथा बोले- ‘हे मुनिवर, मैंने आपको यह दिव्य गौ यज्ञ सम्पन्न करने के लिए दी थी। अब आपका उद्देश्य पूर्ण हो चुका है। यह दिव्य गौ स्वर्ग की सम्पत्ति है, अतः इसे वापस लौटा दें।’

पूरे आलेख के लिए देखें यह वी-ब्लॉग-

तब ऋषि कश्यप ने वरुण देव से कहा- ‘हे वरुण देव! ब्राह्मण को दान में दी गई वस्तु को कभी उससे नहीं मांगना चाहिए अन्यथा वह व्यक्ति पाप का भागी बनता है। अब यह गाय मेरे संरक्षण में है। अतः मैं इसकी देख-भाल भलीभांति करूंगा।’

वरुण देव ने ऋषि को अनेक प्रकार से समझाने का प्रयास किया कि वे इस दिव्य गौ को पृथ्वी पर नहीं छोड़ सकते परन्तु ऋषि कश्यप ने वरुण देव की एक न सुनी। अंत में वरुण देव प्रजापति ब्रह्माजी के पास ब्रह्मलोक गए। वरुण देव ने उन्हें सारी बात बताई। इस पर ब्रह्मदेव पृथ्वीलोक में ऋषि कश्यप के समक्ष प्रकट हुए।

ब्रह्मदेव ने ऋषि कश्यप को समझाया- ‘आप क्यों लोभ में पड़कर अपने समस्त पुण्य नष्ट कर रहे हैं? आप जैसे महान ऋषि को यह शोभा नही देता!’

ब्रह्माजी के बहुत समझाने पर भी ऋषि कश्यप पर कोई प्रभाव नही पड़ा और वे अपने निर्णय पर अडिग रहे। ऋषि कश्यप के इस तरह के व्यवहार से ब्रह्माजी क्रोधित हो गए तथा उन्होंने कश्यप ऋषि को श्राप देते हुए कहा- ‘तुम इस गाय के लोभ में पड़कर अपनी विचार-क्षमता क्षमता खो चुके हो। अतः तुम अपने अंश से पृथ्वी लोक में गौ-पालक के रूप में जन्म लो और गाय की सेवा करो!’

प्रजापति ब्रह्मा के मुख से श्राप सुनकर ऋषि कश्यप को अत्यंत पश्चाताप हुआ और वे अपनी त्रुटि के लिए पितामह ब्रह्माजी तथा वरुण देव से क्षमा मांगने लगे। जब ब्रह्माजी का क्रोध शांत हुआ तो उन्हें भी इस बात पर पश्चाताप हुआ कि क्रोध में आकर उन्होंने महातपस्वी कश्यप ऋषि को श्राप दे दिया।

पितामह ब्रह्मा ने अपने पौत्र कश्यप से कहा- ‘तुम अपने अंश से यदुकुल में उत्पन्न होओगे तथा वहाँ गायों की सेवा करोगे। गौ-सेवा के पुण्य से स्वयं भगवान विष्णु तुम्हारे पुत्र के रूप में जन्म लेंगे।’

इस श्राप के प्रभाव से ऋषि कश्यप ने वसुदेव के रूप में पृथ्वी पर जन्म लिया और उन्हें भगवान विष्णु के अवतार श्रीकृण का पिता बनने का सौभाग्य मिला। कश्यप की पत्नी अदिति को भी, अपनी बहिन दिति के गर्भ को इंद्र के हाथों नष्ट करवाने का प्रयास करने के कारण दिति द्वारा श्राप दिया गया था। इसलिए ऋषि कश्यप जब धरती पर वसुदेव के रूप में जन्मे, तब उनकी पत्नी अदिति देवकी के रूप में और दिति रोहिणी के रूप में उत्पन्न र्हुईं। देवकी का विवाह वसुदेव से हुआ जबकि रोहिणी का विवाह गोपराज नंद से हुआ।

जब देवकी और वसुदेव का विवाह हुआ तो आकाशवाणी हुई कि देवकी का पुत्र कंस का वध करेगा। इसलिए भाई कंस ने देवकी तथा उसके पति वसुदेव को कारागार में बंद कर दिया तथा एक-एक करके देवकी के सात पुत्रों की कारागार में ही हत्या कर दी। वसुदेव एवं देवकी के उद्धार के लिए भगवान श्रीहरि विष्णु ने देवकी के आठवें पुत्र के रूप में श्रीकृष्ण के नाम से अवतार लिया और उन्होंने अत्याचारी कंस का वध किया।

ऋशि कश्यप के सम्बन्ध में विविध धर्म-ग्रंथों में थोड़े-बहुत अंतरों के साथ और भी कथाएं मिलती हैं। एक ग्रंथ में आई कथा के अनुसार जब भगवान परशुराम ने धरती को क्षत्रिय-विहीन किया तब उन्होंने समस्त पृथ्वी अपने गुरु कश्यप मुनि को दान कर दी थी। तब कश्यप मुनि ने परशुराम से कहा- ‘अब तुम मेरे देश में मत रहो।’ परशुराम गुरु की आज्ञा का पालन करने के लिए महेंद्र पर्वत पर जाकर रहने लगे।

एक अन्य पौराणिक कथा के अनुसार एक बार महर्षि कश्यप के पुत्र सूर्य ने माली एवं सुमाली नामक राक्षसों को मार दिया। इस पर भगवान शिव ने सूर्य को मार दिया। इससे रुष्ट होकर ऋषि कश्यप ने भगवान शिव को श्राप दिया कि जिस प्रकार आपने मेरे पुत्र को मारा है, उसी प्रकार आपके पुत्र का भी सिर कटेगा। देवताओं के आग्रह पर भगवान शिव ने सूर्य को वापस जीवित कर दिया। महर्षि कश्यप द्वारा दिए गए श्राप के कारण आगे चलकर भगवान शिव ने अपने पुत्र गणेश का सिर काट कर उन्हें फिर से जीवित कर दिया।

वृत्रासुर वध की कथा धरती पर वर्षा आरम्भ होने की घटना से जुड़ी है (18)

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वृत्रासुर वध - bharatkaitihas.com
वृत्रासुर वध की कथा धरती पर वर्षा आरम्भ होने की घटना से जुड़ी है

वृत्रासुर वध की कथा सबसे पहले ऋग्वेद के चतुर्थ ब्राह्मण में मिलती है। बाद में यह कविता बहुत से पुराणों में भी कही गई है। यद्यपि वैदिक ब्राह्मण एवं पौराणिक ग्रंथों में मिलने वाली इस कथा के मुख्य पात्र इन्द्र, त्वष्टा, विश्वरूप एवं वृत्रासुर ही हैं तथापि बाद की कथाओं में गुरु बृहस्पति एवं महर्षि दधीचि के कथानक भी जुड़ गए हैं जिनके कारण कथाओं के स्वरूप में पर्याप्त अंतर आ गया है।

इस कड़ी में हम वैदिक ग्रंथों अर्थात् ब्राह्मणों में आए संदर्भों के अनुसार इन्द्र द्वारा वृत्रासुर के वध की कथा की चर्चा करेंगे। यह कथा वस्तुतः संसार में अनावृष्टि एवं अकाल के उत्पन्न होने एवं इन्द्र द्वारा फिर से बादलों को धरती पर बरसा कर वनस्पतियों को प्रकट करने की घटना की ओर संकेत करती हुई प्रतीत होती है।

वृत्रासुर वध की कथा अत्यंत प्राचीन समय से सम्बन्ध रखती है। इस समय तक देव जाति अपने पराक्रम के चरम पर नहीं पहुँची थी। देवों में तब अनेक नयी व्यवस्थायें बन रही थीं। फिर भी प्रकृति की अधिकतर शक्तियाँ इन्द्र के पास ही थीं। इस कारण कई देवता इन्द्र से वैमनस्य रखते थे। उनमें से त्वष्टा भी एक था। त्वष्टा के पुत्र विश्वरूप के तीन सिर और तीन मुख थे। विश्वरूप एक मुख से सोमपान करता था तो दूसरे मुख से सुरा पीता था। तीसरे मुख से वह अन्न का भक्षण करता था।

प्रजापति ने सोम देवों के लिये, सुरा असुरों के लिये तथा अन्न मनुष्यों के लिये बनाया था किंतु विश्वरूप तीनों ही पदार्थों का भक्षण करके असीमित शक्तिशाली और स्वेच्छाचारी हो गया। इस कारण प्रजापति की बनाई व्यवस्था नष्ट होने लगी। इसलिये इन्द्र ने उस गर्वित विश्वरूप के तीनों सिर काट डाले।

विश्वरूप का सोमपायी मुख कटते ही बटेर बन गया। इसलिए बटेर का मुख सोम के समान ही भूरा होता हैै। सुरा पीने वाला मुख गौरैया बन गया। वह मद्यमत्त की ही तरह कहता रहता है- ‘कः इव?’ अर्थात् कौन है वह? विश्वरूप का तीसरा अन्नभक्षी मुख तीतर बन गया। उसमें घृत और मधु की बूंदें अंकित रहती हैं।

विश्वरूप के तीनों मुख कट जाने से विश्वरूप का पिता त्वष्टा कुपित हुआ। कुपित त्वष्टा ने इन्द्र का आह्वान किए बिना ही सोम का आहरण किया। सोम जैसे चुवाया हुआ था वैसे ही बिना इन्द्र के भी रहा। अर्थात् बिना इन्द्र की सहायता के भी सोम अपने सात्त्विक रूप में बना रहा। यह देखकर इन्द्र ने सोचा कि इससे तो मुझे सोम से वंचित कर दिया जायेगा। अतः इन्द्र ने द्रोण-कलश में रखे सोम का बलपूर्वक भक्षण कर लिया।

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त्वष्टा द्वारा इन्द्र का आह्वान किए बिना ही इन्द्र द्वारा बलपूर्वक पिये जाने से सोम कुपित हो गया और उसने इन्द्र को आहत किया। मुख को छोड़कर इन्द्र के जितने भी प्राण-छिद्र थे, उन सबमें से सोम बाहर आने लगा। इन्द्र की नाक से बाहर निकला हुआ सोम सिंह बन गया। जो सोम कानों से बहा, वह भेड़िया बन गया। जो सोम वाक् और प्राण से बहा, वह शार्दूल प्रधान श्वापद बन गया। इन्द्र ने तीन बार थूका उससे गूलर, घुंघची तथा बेर बने। शरीर से सोम के बह जाने के कारण इन्द्र अत्यंत कमजोर हो गया तथा लड़खड़ाता हुआ अपने घर गया। तब अश्विनी कुमारों ने इन्द्र की चिकित्सा की।

जब त्वष्टा को ज्ञात हुआ कि इन्द्र ने सोमपान कर लिया तो वह और भी कुपित हो गया। त्वष्टा ने द्रोण-कलश में बचे हुए सोम को यह कह कर यज्ञ में प्रवाहित किया कि ‘इन्द्र-शत्रु तुम बढ़ो।’

बहता हुआ सोम अग्नि में पहुँच कर ‘वृत्र’ के रूप में प्रकट हुआ। उसे सब विद्याएं, यश, अन्न एवं वैभव प्राप्त हुए। वह लुढ़कता हुआ उत्पन्न हुआ इससे वृत्र कहलाया। वह बिना पैरों के हुआ इसलिए ‘अहि’ कहलाया। दनु और दनायु उसके माता-पिता हुए इसलिए वह ‘दनुज’ कहलाया।

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क्रोध से भरे हुए त्वष्टा के कोप से इन्द्र को बचाने के लिए ऋषियों ने मंत्रजाप में त्रुटि कर दी जिससे मंत्र का अर्थ ‘इंद्र के शत्रु तुम बढ़ो’ के स्थान पर ‘शत्रु इन्द्र तुम बढ़ो’ हो गया। इससे इन्द्र का बल बढ़ गया। त्वष्टा के आदेश पर ‘वृत्र’ द्युलोक और पृथ्वी के बीच में जो कुछ भी है, उस सब को आच्छादित करके सो गया। वृत्र ने पूर्व और पश्चिम में समुद्रों को समेट लिया और उतना ही अन्न खाने लगा। उसे पूर्वाह्न में देवता अन्न देते थे, मध्याह्न में मनुष्य और अपराह्ण में पितर। वृत्र द्वारा वरुण को बंदी बना लिए जाने से चारों ओर हा-हा कार मच गया। वनस्पतियाँ सूख गयीं। नदियों ने प्रवाहित होना बंद कर दिया। पशु-पक्षी, देव, मानव सब कष्ट पाने लगे। इस पर इन्द्र ने अग्नि और सोम का आह्वान करके कहा कि तुम तो मेरे हो और मैं तुम्हारा हूँ। तुम क्यों इस दस्यु को बढ़ावा देते हो। इन्द्र ने अग्नि और सोम को प्रसन्न करने के लिए ‘एका-दशक-पाल पुरोडाश’ का निर्वपन किया। इस यज्ञ से इन्द्र ने पुनः इन्द्रत्व प्राप्त किया और अग्नि एवं सोम पुनः इन्द्र की ओर हो गए। उनके साथ अन्य देवता भी इन्द्र की ओर आ गए। इन्द्र ने भगवान श्रीहरि विष्णु से प्रार्थना की- ‘मैं वृत्र पर वज्र का प्रहार करूंगा, आप मेरे निकट खड़े रहना।’

विष्णु ने कहा- ‘अच्छी बात है। मैं तुम्हारे पास रहूँगा, तुम प्रहार करो।’

इससे पहले कि इन्द्र वृत्र पर प्रहार कर पाता, वृत्र ने विशाल आकार धारण करके इन्द्र को निगल लिया। इस पर बृहस्पति की प्रेरणा से देवताओं ने इन्द्र को वृत्र के पेट से बाहर निकाला। इन्द्र की प्रार्थना पर विष्णु ने वज्र में प्रवेश किया। इस बार जब इन्द्र ने वज्र उठाया तो वृत्र डर गया। वृत्र ने कहा- ‘मुझे मारो मत, मैं तुम्हें अपना पराक्रम देता हूँ।’ इन्द्र रुक गया और वृत्र ने इन्द्र को ‘यजुष्’ अर्थात् यज्ञ प्रदान कर दिया।

इन्द्र ने दुबारा वज्र उठाया तो वृत्र ने कहा- ‘मुझे मारो मत, मैं अपना ‘ऋक्’ अर्थात् ‘पूजा-स्तुति’ तुमको देता हूँ।’ इन्द्र रुक गया और वृत्र ने इन्द्र को पूजा-स्तुति प्रदान कर दिए। जब इन्द्र ने तीसरी बार वज्र उठाया तो वृत्र ने अपना ‘साम’ अर्थात् ‘वाणी चातुर्य’ भी इन्द्र को दे दिया।

इस प्रकार इन्द्र को समस्त विद्या, यश, अन्न और समस्त वैभव की प्राप्ति हो गयी और वृत्र खाली घड़े के समान रह गया। पुत्र को निर्बल हुआ देखकर वृत्र की माता तिरछी होकर उसके ऊपर छा गयी तथा ‘कालेय’ नामक दैत्य, वृत्र की सहायता करने को आ गए।

इस पर देवों ने वृत्रासुर वध के लिए ‘साकमेध’ का आयोजन किया। अग्नि तीक्ष्ण बाणों के रूप में प्रकट हुआ। सोम और सविता ने वृत्र को मारने के लिए इंद्र को तीक्ष्ण प्रेरणा प्रदान की। सरस्वती ने कहा- ‘मारो-मारो।’

पुष्टि के देवता पूषा ने वृत्र को कसकर पकड़ लिया। विष्णु ने बताया कि वृत्र को लौह, काष्ठ तथा बांस से निर्मित तथा किसी भी ऐसे पदार्थ से निर्मित अस्त्र-शस्त्र से नहीं मारा जा सकता जो सूखी अथवा गीली हो। इसे न दिन में मारा जा सकता है न रात्रि में।

इस पर जब दिवस और रात्रि के मध्य संध्या काल उपस्थित हुआ तो इन्द्र ने अग्नि की ब्रह्मशक्ति और अपनी क्षमशक्ति से वज्र को समुद्र के फेन में लपेट कर वृत्र पर प्रहार किया जिससे वृत्र तथा उसकी माता के दो टुकडे़ हो गए। कालेय भाग कर समुद्र में छिप गए। वृत्रासुर वध सम्पन्न हुआ।

इन्द्र के प्रहार से आहत वृत्र सड़ांध के साथ सब दिशाओं से समुद्र की ओर बहने लगा। इससे समुद्रों में जल का स्तर फिर से बढ़ गया। ऋग्वेद में लिखा है कि वृत्र रंभाती हुई गायों के समान समुद्र की ओर बढ़ चला। वृत्र के ‘सौम्य’ भाग से चन्द्रमा बन गया और ‘आसुरि’ भाग से समस्त प्राणियों का उदर। इसी कारण प्रत्येक प्राणी उदर रूपी वृत्र के लिए बलिहरण करता है और अन्न भक्षण करना चाहता है। 

वृत्र के मरने पर मरुतों ने संगीत का आयोजन किया किंतु वज्र के फेन में लिपटे हुए होने से इन्द्र को वृत्र की मृत्यु का पता नहीं चला और इन्द्र डर कर ‘अनुष्टप’ में छिप गया। अग्नि, हिरण्यस्तूप तथा बहती उसे ढंूढने निकले। अग्नि ने इन्द्र को ढूंढ लिया। देवताओं ने बारह पात्रों में आहरण किया हुआ पुरोडाश इन्द्र को समर्पित किया।

इन्द्र ने कहा- ‘वृत्र पर वज्र का प्रहार करने से मेरे समस्त अंग शिथिल हो गए हैं, इसलिए इस पुरोडाश से मेरी तृप्ति नहीं होती। जिस वस्तु से मेरी तृप्ति हो वही वस्तु मुझे दो।’

इस पर देवताओं ने विचार किया कि सोम के बिना इन्द्र तृप्त नहीं होगा। देवताओं के आह्वान पर सोम रात्रि में चन्द्रमा के साथ आया और जल तथा वनस्पतियों में समा गया। गायों ने उन वनस्पतियों का भक्षण करके तथा सोमयुक्त जलपान करके सोम का सम्भरण किया। देवताओं ने गौओं से सोम प्राप्त करके उसे इन्द्र को प्रदान किया। इन्द्र ने कहा- ‘मुझे इससे भी तृप्ति नहीं होती, मुझे उबाला हुआ सोम दो।’

अंत में अमावस्या को दही और उबले हुए दूध को मिलाकर ‘सान्नय्य याग’ किया गया जिससे इन्द्र तृप्त हुआ और नवीन बल धारण करके प्रकट हो गया।

यदि प्राकृतिक घटनाओं के आधार पर इस कथा का विश्लेषण करें तो हमें स्पष्ट हो जाता है कि विभिन्न देवताओं द्वारा इन्द्र से शत्रुता मानने के कारण इन्द्र कमजोर पड़ गया अर्थात् विभिन्न प्राकृतिक शक्तियों में असंतुलन हो जाने से धरती पर वर्षा कम होने लगी तथा धरती का सारा जल बर्फ में बंद हो गया। इस कारण समुद्रों का जल-स्तर घट गया तथा वर्षा बंद होने लगी।

इस पर इन्द्र अर्थात् ‘बादलों के स्वामी’ ने विष्णु, वरुण एवं सरस्वती आदि देवी-देवताओं की सहायता से चारों दिशाओं में छाई हुई बर्फ पर प्रहार किया जिससे बर्फ टूट गई तथा उसमें बंद पानी फिर से समुद्रों को प्राप्त हो गया तथा धरती पर वर्षा आरम्भ हो गई। जब वृत्रासुर मरा तो सड़ा हुआ पानी समुद्र की ओर बहा, इस कथन से तात्पर्य यह प्रतीत होता है कि बर्फ में पानी को बंद हुए काफी समय हो चुका था।

इस आख्यान में ‘वृत्रासुर’ प्रकृति का वह असंतुलन है जो जल को बर्फ में सीमित कर देता है तथा वर्षा को बंद करके धरती के अन्न, सोम एवं अन्य वैभव को सोख लेता है। वृत्रासुर वध आख्यान में ‘वरुण’ को जल के रूप में तथा सरस्वती को ‘नदी’ के रूप में देखा जाना चाहिए। ऋग्वेद के चतुर्थ ब्राह्मण की वृत्रासुर वध कथा विभिन्न पुराणों में अलग-अलग रूप धारण कर लेती है जिनके बारे में हम आगामी कथाओं में जानेंगे।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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