Wednesday, April 1, 2026
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शाहजहाँ का परिवार (1)

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शाहजहाँ का परिवार - bharatkaitihas.com
शाहजहाँ का परिवार

शाहजहाँ का परिवार उससे प्रेम नहीं करता था। इसके कई कारण थे। शाहजहाँ (Shahjahan) स्वयं इतना बड़ा अय्याश था कि वह भी अपने परिवार से प्रेम नहीं करता था।

ई.1526 में बाबर (Babur) ने अपने पूर्ववर्ती अफगानों को हराकर उनसे उत्तरी भारत के हरे-भरे मैदान छीने थे। गंगा-यमुना के किनारों पर स्थित इन मैदानों के खेत, धान के कटोरे कहलाते थे तथा इन मैदानों में हरी घास चरने वाले दुधारू पशु, गंगा-यमुना में बहने वाले पवित्र जल के बराबर ही अपरिमित दूध देते थे।

ऊपर आसमान में रंग-बिरंगे पंछी उड़ते थे और सूर्य-चंद्र बारी-बारी से आकर इस शस्य-शामला धरती को मुग्ध भाव से निहारते थे। इन्हीं मैदानों में हजारों साल से सुख-पूर्वक निवास करने वाले हिन्दुओं की प्राचीन राजधानी थी दिल्ली।

जब यह दिल्ली ई.1193 में तुर्कों (Turks) के अधीन हो गई तो उन्होंने अपने लिए एक किला बनवाया जिसे सीरी का दुर्ग कहते थे। जब सूर वंश का शासक सलीमशाह (Saleem Shah) दिल्ली का बादशाह हुआ तो उसने दिल्ली में अपने लिए एक नया दुर्ग बनवाया जिसे सलीमगढ़ कहा जाता था। फरगना एवं समरकंद से आए मुगलों ने दिल्ली को छोड़कर आगरा को अपनी राजधानी बनाया तथा फतहपुर सीकरी में एक छोटा सा बदसूरत किला बनवाया।

जब बाबर की पीढ़ियों को भारत पर शासन करते हुए सौ साल से अधिक हो गए तब ई.1628 में मुगल शहजादा खुर्रम (Khurram) अपने 18 भाईयों और चाचाओं की हत्या करके भारत के हरे-भरे मैदानों, अविरल बहने वाली नदियों और गगनचुम्बी पहाड़ों का स्वामी हुआ। वह बाबर का चौथा वंशज (fourth generation descendant of Babur) था, उसे भारत के इतिहास में शाहजहाँ के नाम से जाना गया।

शाहजहां (Shahjahan) को अपने बाप-दादाओं का जमा-जमाया साम्राज्य मिला था। इसलिए उसके सामने चुनौतियां बहुत कम थीं। सल्तनत की विशाल सेनाएं अफगानिस्तान, चीन, बंगाल तथा दक्षिण भारत के मोर्चों पर लड़ती थीं और सल्तनत की सीमाओं में नित नई वृद्धि करती थीं। इस कारण सल्तनत के खजाने में सोने-चांदी और हीरे-जवाहरात के ढेर लग गए थे।

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इस धन का उपयोग करके शाहजहां ने अपने लिए एक विशाल सिंहासन बनवाया जिसे तख़्त-ए-ताऊस (Takht-e-Taus) कहते थे जिसका अर्थ होता है मयूर सिंहासन। इस सिंहासन को नाचते हुए मोर की आकृति में बनाया गया था।

तख्तेताउस 3.5 गज़ लम्बा, 2 गज़ चौड़ा और 5 गज़ ऊँचा था। पूरा सिंहासन ठोस सोने से बना था जिसमें 454 सेर भार के बहुमूल्य रत्न जड़े हुए थे। इन रत्नों की मीनाकरी एवं पच्चीकारी में कई सौ कारीगरों ने 7 वर्ष तक निरंतर कार्य किया था। तख्ते ताउस की लागत 2 करोड़ 14 लाख 50 हज़ार रुपये आई थी। यूरोपियन इतिहासकार टैवर्नियर ने लिखा है कि कोहिनूर भी इसी सिंहासन में जड़वाया गया था।

तख्तेताउस (Takht-e-Taus) पर बैठने के बाद शाहजहां का मन अकबर (Akbar) द्वारा आगरा (Agra) और फतहपुर सीकरी में बनाए गए पुरानी डिजाइन के भद्दे से किलों में नहीं लगता था। उसने यमुना के किनारे पर बसी तथा हिन्दुओं की हजारों सालों तक राजधानी रही दिल्ली में अपने लिए एक नया किला बनवाने का निर्णय लिया। शाहजहां से पहले भी दिल्ली लगभग सवा तीन सौ साल तक तुर्की और अफगानी मुसलमानों की राजधानी रह चुकी थी।

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शाहजहां (Shahjahan) ने उस्ताद अहमद लाहौरी नामक एक होशियार इंजीनियर को लाल किला बनाने का काम सौंपा जिसे मुगल स्थापत्य के भवन बनाने में महारत हासिल थी। इसी अहमद लाहौरी ने आगे चलकर आगरा का ताजमहल भी बनाया। 12 मई 1638 को दिल्ली में यमुना के किनारे लाल किले की नींव डाली गई। जब तक लाल किला बनकर तैयार हो, शाहजहाँ का परिवार इसके निकट स्थित सौ साल पुराने सलीमगढ़ (Saleem garh) नामक किले में रहा जिसका निर्माण ई.1546 में सलीमशाह सूरी ने करवाया था। शाहजहां घण्टों यमुना के किनारे खड़ा रहकर इस नवीन किले का निर्माण कार्य देखता और तेजी से ऊंची हो रही किले की दीवारों की परछाइयों को यमुना की श्यामवर्णी लहरों में हिलते-डुलते देखता रहता। शाहजहां ने अपनी पसंद के लाल और सफेद रंग के पत्थरों से इस किले का निर्माण करवाया। ये दोनों रंग शाहजहां को बहुत प्रिय थे। तब शाहजहां यह नहीं जानता था कि लाल किले की ये दीवारें तब तक लाल रंग के इंसानी खून से धोई जाती रहेंगी जब तक कि बाबर का अंतिम वंशज जंजीरों से बांधकर रंगून नहीं भेज दिया जाएगा।

लाल किले के ठीक बीच में शाहजहांनाबाद नामक नगर बसाया गया तथा इसके ठीक मध्य में शाही महल बनाया गया जहाँ खुद शाहजहां और उसकी भावी पीढ़ियां रहने वाली थीं। यमुना नदी से लाल किले तक कई छोटी-छोटी नहरें बनाई गईं जिनके माध्यम से यमुना का पवित्र जल खींचकर लाल किले के महलों तक लाया गया।

ये नहरें इतनी सुंदर थीं कि इन्हें नहर-ए-बहिश्त कहा जाता था। इन नहरों का जल पीकर लाल किले में दूर-दूर तक फैले बागीचों में इतने सुंदर फूल खिले, जो स्वर्ग के फूलों से होड़ करते थे। हालांकि लाल किले की दीवारों ने समय बदल जाने पर इन्हीं नहरों में शाहजहां के वंशजों के खून को भी बहते हुए देखा।

हिन्दू मानते हैं कि शाहजहां (Shahjahan) ने लालकिले के रूप में किसी नए किले का निर्माण नहीं करवाया था। यहां पहले से ही एक पुराना किला मौजूद था जिसमें सैंकड़ों साल तक हिन्दू शासकों ने निवास किया था। शाहजहां ने उसी किले का नए सिरे से निर्माण करवाया।

आखिर पूरे नौ साल के जी-तोड़ निर्माण के बाद, 6 अप्रेल 1648 को लाल किला बनकर पूरा हुआ और शाहजहाँ ने अपने विशाल हरम सहित किले में प्रवेश किया। बस उसी दिन से लाल किले की दीवारें इंसानी लाल खून से भीगनी शुरु हो गईं। शाहजहाँ का परिवार एक-दूसरे के रक्त का प्यासा हो गया।

लाल किले में प्रवेश करते समय शाहजहां 56 साल का प्रौढ़ हो चुका था लेकिन उसके शरीर में अब भी बहुत जान थी। वह अय्याश किस्म का इंसान था इसलिए उसके हरम में नित नई औरतों का आना-जाना लगा रहता था।

शाहजहां ने अपने कई अमीर-उमरावों और सेनानायकों के परिवारों की औरतों को अपने हरम में बुलाकर उन्हें खराब किया था। इस कारण कुछ औरतों ने तो आत्म-हत्याएं कर लीं। ऐसी स्थिति में शाहजहाँ का परिवार उससे कैसे प्रेम कर सकता था!

यही कारण था कि शाहजहाँ का परिवार उससे प्रेम नहीं करता था। उसका हरम षड़यंत्रों से भरा हुआ था। सल्तनत के बहुत से अमीर बादशाह के खून के प्यासे थे।

 तेजी से बूढ़ा होता जा रहा शाहजहां, अपनी औलाद की आखों में लाल किले का तख्त प्राप्त करने की चाहत में उतर रहे खून की ललाई को साफ देख सकता था। जिसके कारण उसके चेहरे की झुरियां तेजी से गहरी होती जा रही थीं।

घोषित रूप से शाहजहाँ की नौ बेगमें थीं जिनमें मुमताज महल तीसरे नम्बर की थी। वह केवल 10 साल की आयु में शाहजहां से ब्याही गई। मुमताज महल के पेट से 13 संतानों ने जन्म लिया तथा 14वें प्रसव के दौरान उसकी मृत्यु हुई।

शाहजहां की अन्य बेगमों से भी शाहजहाँ (Shahjahan) को ढेर सारी संतानें हुईं जिनमें से अधिकांश संतानें शाहजहां के जीवन काल में ही मर गईं।

जब शाहजहां को उसके पुत्र औरंगजेब (Aurangzeb) ने गिरफ्तार किया था, तब शाहजहां की आठ संतानें जीवित थीं जिनमें से चार पुत्र- दारा शिकोह, शाह शुजा, औरंग़ज़ेब और मुराद बख्श थे तथा चार शहजादियां- पुरहुनार बेगम (Purhunar Begum), जहांआरा बेगम (Jahanara Begum), रोशनारा बेगम (Roshanara Begum) और गौहरा बेगम (Gouhara Begum) थीं ।

शाहजहां की इन आठों संतानों की आंखों में लाल किले की दीवारों का रतनार रंग, ललाई बनकर छाया रहता था। शाहजहां के चारों शहजादे और चारों शहजादियां एक दूसरे के खून के प्यासे थे। प्रत्येक शहजादी ने अपने एक भाई को बादशाह बनाने के लिए शतरंज की गोटियां बिछानी आरम्भ कर दीं।

इस कारण शाहजहां ने अपने बड़े पुत्र दारा शिकोह के अतिक्ति और किसी को भी अपनी राजधानी दिल्ली में नहीं रहने दिया। फिर भी एक दिन उसके एक पुत्र औरंगजेब ने शाहजहां को पकड़कर बंदी बना लिया।

आधुनिक इतिहासकारों ने भले ही शाहजहां (Shahjahan) को ताजमहल (Taj Mahal) के निर्माण के कारण प्रेम का देवता बताया हो किंतु इतिहास की कड़वी सच्चाई यह है कि उसका व्यक्तिगत आचरण इतना खराब था कि जब उसके पुत्र औरंगजेब (Aurangzeb) ने उसे कैद किया तो न तो हरम का कोई सदस्य और न सल्तनत का कोई अमीर या सेनापति ही, बादशाह की सहायता के लिए आगे आया।

लाल किले की दीवारें अपने निर्माता और स्वामी की यह दुर्दशा देखकर हैरान थीं। वे तब और भी निराश हुईं जब बूढ़े शाहजहां (Shahjahan) को दिल्ली के लाल किले से बाहर निकालकर आगरा के लाल किले में बंद कर दिया गया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुगल शहजादियाँ (2)

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मुगल शहजादियाँ - www.bharatkaitihas.com
मुगल शहजादियाँ

मुगल शहजादियाँ लाल किले (Lal Qila) की दीवारों से बाहर अफवाहें फैलाती रहती थीं, इन अफवाहों का मुख्य कारण उस युग की स्वार्थ भरी राजनीति तो थी ही, साथ ही अपने वर्चस्व को बनाए रखने की होड़ भी थी।

अकबर (Akbar) के समय से ही मुगल दरबार (Mughal Darbar) एवं हरम (Mughal Harem) की गुटबंदी मुगल सल्तनत (Mughal Empire) की राजनीति में दखल करती आई थी। जहाँगीर (Jahangir) के समय में यह गुटबंदी और बढ़ गई थी। जब अय्याश शाहजहां (Shahjahan) अपने हरम को लाल किले में ले आया तो लाल किले (Lal Qila) की रंगीनियों ने हरम की औरतों को और भी उन्मुक्त कर दिया।

चूंकि हुमायूं (Humayun) के समय में ही मुगल शहजादियाँ के विवाह करने की परम्परा समाप्त कर दी गई थी, इसलिए मुगल शहजादियां लाल किले की मजबूत दीवारों के बीच बने हरम में छिपकर रहती थीं तथा अपने-अपने ढंग से लाल किले की राजनीतिक बिसातें बिछाकर अपने आप को व्यस्त रखती थीं।

इस कारण शाहजहां (Shahjahan) के काल में मुगल दरबार एवं हरम, गुटबन्दियों एवं षड्यन्त्रों का बड़ा अखाड़ा बन गया। सत्ता और शक्ति की लूट खसोट के कारण बादशाह के अतिरिक्त और किसी को सल्तनत की दुर्दशा की चिंता नहीं थी। अधिकांश लोग स्वार्थ-सिद्धि में लगे रहते थे।

मुगल शहजादियाँ, अमीर, शहजादे एवं बेगमें अपने-अपने गुट को शक्तिशाली बनाने के लिये एक दूसरे के विरुद्ध षड्यंत्र करते थे तथा एक दूसरे के विरुद्ध बादशाह के कान भरते थे। यहाँ तक कि विरोधी गुट पर सशस्त्र आक्रमण कर देते थे। इस अव्यवस्था ने शाही-परिवार की शक्ति को छिन्न-भिन्न कर दिया था जिसका परिणाम यह हुआ कि सल्तनत की शक्ति का असली आधार खिसकने लगा।

लाल किले (Red Fort or Lal Qila) का निर्माता शाहजहाँ (Shahjahan) सितम्बर 1657 में बीमार पड़ा। अब वह 65 वर्ष का हो चुका था। काम वासना की दलदल में अत्यधिक डूबे रहने के कारण उसे कई प्रकार के रोगों ने घेर लिया था और आए दिन उसकी मृत्यु की अफवाहें उड़ा करती थीं। अधिकतर अफवाहें हरम की बेगमें, मुगल शहजादियाँ, नौकर तथा हिंजड़े उड़ाया करते थे।

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जब बढ़ती हुई बीमारी के कारण शाहजहाँ के लिए दरबार में जाकर बैठना कठिन हो गया तो वह झरोखा दर्शन देकर जनता को विश्वास दिलाने लगा कि वह अब भी जिंदा है।

यूं तो शाहजहाँ (Shahjahan) की नौ बेगमें थीं जिनसे उसे ढेरों औलादें हुई थीं, अकेली मुमताज (Mumtaz Mahal) के पेट से चौदह औलादें जन्मी थीं किंतु इनमें से अधिकांश औलादें शाहजहां के जीवन काल में ही मर गई थीं। जब शाहजहां ईस्वी 1657 में बीमार पड़ा तब उसकी केवल आठ संतानें जीवित थीं।

इनमें से चार पुत्र थे- दारा शिकोह, शाह शुजा, औरंग़ज़ेब और मुराद बख्श। शाहजहाँ की चार शहजादियां भी थीं- पुर-हुनार बेगम, जहांआरा बेगम (Jahanara Begum), रोशनारा बेगम (Roshanara Begum) और गौहरा बेगम। ये चारों उस काल की राजनीति में भाग लेने वाली मुगल शहजादियाँ थीं किंतु शाहजहाँ के पूर्ववर्ती बादशाहों की बहिनें एवं विधवाएं भी उस काल की राजनीति में भाग लेती थीं। इन सभी की आंखों में शाहजहां का तख्ते ताउस, कोहिनूर हीरा (Kohinoor Heera) तथा दिल्ली का लाल किला दिन-रात किसी परी-स्वप्न की भांति घूमा करते थे।

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प्रत्येक शहजादा चाहता था कि जिस प्रकार उसके पिता शाहजहाँ (Shahjahan) ने अपने 18 चाचाओं और भाइयों का कत्ल करके मुगलों का राज्य हथियाया था, उसी प्रकार वह भी अपने शेष भाइयों को मारकर तख्ते ताउस, कोहिनूर हीरा तथा लाल किले को हथिया ले। इस कार्य में चारों शहजादियां भी शामिल हो गई थीं। प्रत्येक शहजादी ने अपना एक भाई चुन लिया था जिसे वह शाहजहां के बाद बादशाह बनाना चाहती थी ताकि लाल किले के हरम पर उसी शहजादी का हुक्म चले तथा महल की समस्त बेगमें उसकी लौण्डियाएं बनकर रहें। इन षड़यंत्रों से घबराकर ही शाहजहां अपने तीन पुत्रों को सदैव अपनी राजधानी से दूर रखा करता था। केवल सबसे बड़ा शहजादा दारा शिकोह अपने पिता की सेवा में दिल्ली में रहा करता था। वह शाहजहां की ओर से साम्राज्य की रीति-नीति तय करता, मुस्लिम अमीरों और हिन्दू राजाओं पर नियंत्रण रखता तथा उन्हें लड़ने के लिए विभिन्न मोर्चों पर भेजता। मुगलों द्वारा इकट्ठे किए गए हीरे-पन्ने, माणक-मोती, पुखराज, गोमेद, याकूत, लाल तथा सोने-चांदी के भारी-भरकम जेवरातों सहित सारे खजाने का मालिक भी वही था।

लाल किले (Lal Qila) में रहने वाले प्रत्येक व्यक्ति के पास इस अपार धन-सम्पदा की कोई न कोई सूची अवश्य थी किंतु इस विशाल खजाने की वास्तविक सूची के बारे में स्वयं शाहजहां भी पूरी तरह परिचित नहीं था।

लाल किले में बैठी मुगल शहजादियाँ किसी चतुर राजनीतिज्ञ से कम नहीं थीं। वे लाल किले की दीवारों के भीतर चल रही छोटी-से छोटी गतिविधि की जानकारी अपने गुप्तचरों के माध्यम से अपने पक्ष के शहजादे को लिख भेजती थीं। इनमें अधिकांश सूचनाएं बहुत बढ़ा-चढ़ाकर लिखी जाती थीं। इस कारण प्रत्येक शहजादा राजधानी से सैंकड़ों कोस दूर किसी मोर्चे पर होने पर भी वह शाही दरबार और शाही हरम की प्रत्येक गतिविधि से वाकिफ था किंतु अफवाहों के चलते सही-गलत का फैसला करने में असक्षम था।

जब शाहजहाँ (Shahjahan) के लिए झरोखा दर्शन देना भी कठिन हो गया तो उसने दारा शिकोह को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया तथा अपने अमीरों, सूबेदारों और हिन्दू राजाओं से कहा कि वे केवल दाराशिकोह का आदेश मानें।

जैसे ही शाहजहाँ ने दारा शिकोह को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया। लाल किले (Lal Qila) में उसके शेष तीनों शहजादे और उनके पक्ष की शहजादियां दारा शिकोह के खून के प्यासे हो गए।

जिस प्रकार दारा शिकोह अपने पिता शाहजहां से थोड़ा-बहुत प्रेम करता था, उसी प्रकार शहजादी जहाँआरा भी अपने पिता शाहजहां से सहानुभूति रखती थी और केवल वही थी जो अपने पिता की मुश्किलों को समझती थी तथा उन्हें सुलझाने में अपने भाई दारा शिकोह की मदद करती थी। अन्य मुगल शहजादियाँ अपने पिता शाहजहाँ की ही तरह बेरहम थीं।

दारा शिकोह (Dara Shikoh) अपने पिता का सबसे बड़ा पुत्र था। वह योग्य, उदार, विनम्र तथा दयालु स्वभाव का स्वामी था। शाहजहाँ उसे सर्वाधिक चाहता था तथा उसे अपने पास ही रखता था। दिल्ली की रियाया भी दाराशिकोह को चाहती थी। हालांकि उस काल में मुगल सल्तनत में 95 प्रतिशत हिन्दू तथा 5 प्रतिशत मुसलमान थे तो भी प्रजा से आशय केवल मुस्लिम प्रजा से होता था।

यह बात मुस्लिम अमीरों को बहुत अखरती थी कि दारा शिकोह, मुस्लिम रियाया के साथ-साथ हिन्दुओं में भी बहुत लोकप्रिय था।

राजधानी में रहने के कारण दारा, सल्तनत की समस्याओं से अच्छी तरह परिचित था। उसे जितना अधिक प्रशासकीय अनुभव था, और किसी शहजादे को नहीं था। दारा की कमजोरी यह थी कि उसे दूसरे शहजादों की भांति युद्ध लड़ने का व्यापक अनुभव नहीं था।

दारा के तीनों छोटे भाई, एक दूसरे के खून के प्यासे होने के बाद भी वे दारा शिकोह (Dara Shikoh) को अपना पहला शत्रु मानते थे तथा वह तीनों शहजादों का सम्मिलत शत्रु था। उनमें से प्रत्येक यह चाहता था कि किसी तरह दारा शिकोह मर जाए, शेष दो भाइयों को तो वह आसानी से निबटा देगा।

शाहजहाँ (Shahjahan) का दूसरा पुत्र शाहशुजा (Shah Shuja) बंगाल का शासक था। वह बुद्धिमान, साहसी तथा कुशल सैनिक था परन्तु विलासी और अयोग्य था। उसमें इतने विशाल मुगल साम्राज्य को सँभालने की योग्यता नहीं थी। इसलिए दारा उससे कम आशंकित रहता था।

शाहजहाँ का तीसरा पुत्र औरंगजेब (Auranzeb), कट्टर सुन्नी मुसलमान (Sunni Musalman) था। वह अत्यंत असहिष्णु तथा संकीर्ण विचारों का स्वामी था इस कारण उसे सल्तनत के कट्टर मुसलमानों का समर्थन प्राप्त था जिनकी संख्या, सहिष्णु मुसलमानों से बहुत अधिक थी।

राजधानी से दूर रहने के कारण तथा हर समय युद्ध में व्यस्त रहने के कारण औरंगजेब (Auranzeb) को प्रान्तीय शासन तथा युद्धों का अच्छा अनुभव था। धूर्त तथा कुटिल होने के कारण वह अपनी पराजय को विजय में बदलना जानता था।

दारा शिकोह अपने तीनों भाइयों तथा उनके पक्ष की शहजादियों के नापाक इरादों को जानते हुए भी औरंगजेब की तरफ से सर्वाधिक भयभीत रहता था। इसलिए वह औरंगजेब को किसी एक स्थान अथवा किसी एक मोर्चे पर टिके नहीं रहने देता था।

वह औरंगजेब को कभी अफगानिस्तान के मोर्चे पर, कभी दक्षिण के मोर्चे पर तो कभी बंगाल के मोर्चे पर उलझाए रखता था। औरंगजेब भी इस बात को बहुत अच्छी तरह से समझता था इसलिए वह दारा शिकोह से बेइंतहा नफरत करता था। इसी नफरत का परिणाम था कि औरंगजेब को दारा का पक्ष लेने वाले अपने बाप शाहजहां से भी गहरी नफरत हो गई थी।

जिस समय शाहजहां बीमार पड़ा, औरंगजेब, राजधानी दिल्ली से लगभग 2000 किलोमीटर दूर स्थित दक्षिण का सूबेदार था।

औरंगजेब की दृष्टि में उसका बड़ा भाई दाराशिकोह एक काफिर था जो इस्लाम के काम को आगे बढ़ाने की बजाय काफिर हिन्दुओं को बढ़ावा देता था तथा हिन्दू ग्रंथों का अरबी एवं फारसी में अनुवाद करवाता था।

शाहजहाँ का चौथा तथा सबसे छोटा पुत्र मुराद (Murad), गुजरात तथा मालवा का शासक था। वह भावुक तथा जल्दबाज युवक था। विलासी प्रवृत्ति का होने से उसमें दूरदृष्टि का अभाव था। वह जिद्दी तथा झगड़ालू प्रवृति का व्यक्ति था। उसमें प्रशासकीय प्रतिभा और सैनिक प्रतिभा की कमी होने पर भी बादशाह बनने की इच्छा अत्यधिक थी। मुगल शहजादियाँ भी उत्तराधिकार के इस युद्ध में भाग लेने लगीं। जहाँआरा, दारा का; रोशनआरा, औरंगजेब का; और गौहरआरा, मुराद का पक्ष ले रही थी।

इस कारण राजधानी की समस्त खबरें गुप्त रूप से इन शहजादों के पास पहुँचती थीं। इनमें से कई खबरें अतिरंजित होती थीं। शाहजहाँ तथा दारा शिकोह ने निराधार खबरों को रोकने का प्रयत्न किया परन्तु इस कार्य में सफलता नहीं मिली। तब शाहजहाँ (Shahjahan) ने अपनी मुहर तथा अपने हस्ताक्षर से शाहजादों के पास पत्र भेजना आरम्भ किया और उन्हें विश्वास दिलाने का प्रयत्न किया कि वह जीवित तथा स्वस्थ है परन्तु कोई भी शाहजादा इन पत्रों पर विश्वास करने के लिये तैयार नहीं था। वे इन पत्रों को दारा शिकोह की चाल समझते थे।

हर शहजादा बादशाह को अपनी आँखों से देखना चाहता था परन्तु कोई भी शाहजादा अकेले अथवा थोड़े से अनुचरों के साथ राजधानी आने को तैयार नहीं था, क्योंकि उन्हें दारा से भय था। किसी भी शहजादे को अपनी समस्त सेना के साथ राजधानी में आने की अनुमति नहीं थी।

इसलिये विभिन्न पक्षों में संदेह और वैमनस्य बढ़ने लगा और उत्तराधिकार के लिये होने वाले युद्ध की भूमिका तैयार हो गई। सद्भावना, विश्वास तथा धैर्य से ही उत्तराधिकार के संभावित युद्ध को रोका जा सकता था परन्तु दुर्भाग्यवश शाहजादों में इन गुणों का नितांत अभाव था। लाल किले (Lal Qila) की दीवारों से हजारों किलोमीटर दूर बैठे शुजा, औरंगजेब तथा मुराद पत्र-व्यवहार द्वारा एक दूसरे के सम्पर्क में थे। उनमें सल्तनत के विभाजन के लिये समझौता हो गया। इन तीनों शाहजादों ने दारा (Dara Shikoh) की शक्ति को छिन्न-भिन्न करने का निश्चय किया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुगल शहजादे (3)

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मुगल शहजादे

मुगल शहजादे अपने भाइयों एवं चाचाओं को मारकर ही तख्त प्राप्त कर पाते थे। मुगलों में यह परम्परा सदियों से चली आ रही थी। दिल्ली का लाल किला (Red Fort of Delhi) अपने ही मालिकों के खून से नहाता रहा। आगरा का लाल किला (Red Fort of Agra) भी इसका अपवाद नहीं था।

शाहजहाँ (Shah Jahan) को तीन दिन से पेशाब नहीं आ रहा था। उसे कोई यौन सम्बन्धी रोग हो गया था  जिसके उपचार के लिए हकीमों ने गरम तासीर वाली दवाइयां खिलाई थीं जिससे पेशाब की नली में सूजन आ गई थी और पेशाब नहीं उतर रहा था।

इस कारण वह अपने महल से उठकर दरबार में नहीं जा पा रहा था। यौन सम्बन्धी रोग होने से इस बीमारी को दूसरे लोगों से गुप्त रखा गया था। शाही हकीम, शहजादा दारा शिकोह (Dara Shikoh) तथा शहजादी जहांआरा (Jahanara) के अलावा किसी और को बादशाह के कक्ष में प्रवेश करने की अनुमति नहीं थी।

हरम में नियुक्त नौकरों, लौण्डियों और हिंजड़ों ने जरूरत से ज्यादा दिमाग लगाया और आनन-फानन में यह अफवाह फैला दी कि बादशाह मर गया है और शहजादा दारा-शिकोह उसके नाम से बादशाहत चला रहा है। हरामखोर किस्म के कुछ नौकरों ने यह अफवाह फैलाने में भी कोई कसर नहीं रखी कि शहजादे दारा शिकोह (Dara Shikoh) तथा शहजादी जहांआरा (Jahanara Begum) ने बादशाह को कैद कर लिया है तथा बादशाह वही आदेश जारी करता है जो आदेश उसे दाराशिकोह के द्वारा जारी करने के लिए दिए जाते हैं।

शाहजहां (Shah Jahan) की अन्य तीन शहजादियों- पुरहुनार बेगम (Purhunar Begum), रोशनारा बेगम (Roshanara Begum) और गौहरा बेगम (Gouhara Begum) ने भी ने भी शाहजहां की बीमारी का हाल बढ़ा-चढ़ा कर अपने-अपने पक्ष के शहजादे को लिख भेजा जिसे पढ़कर, राजधानी से हजारों किलोमीटर दूर बैठे शहजादों की बेचैनी दिन पर दिन बढ़ने लगी।

इस रोचक इतिहास का वीडियो देखें-

मुगल शहजादे अपनी भीतर पल रही लाल किला (Red Fort) पाने की चाहत के कारण र्धर्य और सब्र से काम नहीं ले पाते थे। वैसे भी मुगल शहजादों में उत्तराधिकार का प्रश्न शहजादों के खून से ही सुलझता आया था। पीढ़ी-दर पीढ़ी मुगल शहजादे अपने बाप का तख्त और दौलत पाने के लिए एक दूसरे का कत्ल करते आए थे।

अपने पुरखों से कुछ अलग करने नहीं जा रहे थे मुगल शहजादे, उनकी नसों में चंगेजी और तूमैरी खूनों का खतरनाक मिश्रण जोर मार रहा था जो खून-खराबे और मैदाने जंग के अलावा और किसी भाषा में नहीं समझता था। इसलिए शाहजहां के बेटों की बगावत के खूनी इतिहास की तरफ बढ़ने से पहले हम तैमूरी और चंगेजी इतिहास के पन्नों को कुछ पीछे चलकर टटोलते हैं।

भारत में मुगलिया सल्तनत (Mughal Sultanate) की नींव रखने वाला बाबर अपने पुरखों के दो राज्यों- समरकंद (Samarkand) और फरगना (Fargana) को छोड़कर भारत आया था क्योंकि बाबर (Babur) के ताऊ अहमद मिर्जा (Ahmed Mirza) ने समरकंद का और मामा महमूद खाँ ने फरगना का राज्य बाबर से छीन लिये थे और नौजवान बाबर को अपनी जान बचाने के लिए तीन साल तक पहाड़ों में छिपकर रहना पड़ा था।

पहाड़ियों में भटकते हुए बाबर (Babur) को किसी ने भारत की कमजोर राजनीतिक स्थिति की जानकारी दी जिससे उत्साहित होकर वह अपनी थोड़ी-बहुत सेना के साथ भारत के लिए चल दिया तथा उसके जैसे हजारों बेरोजगार युवक अपना भाग्य चमकने की आशा में उसकी सेना में भर्ती हो गए थे।

इसी सेना के बल पर बाबर भारत में अपना राज्य कायम करने में सफल हुआ था।

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बाबर के चार पुत्र थे- हुमायूँ (Humayun), कामरान (Kamran), अस्करी (Askari) तथा हिन्दाल (Hindal)। बाबर अपने परिवार से बहुत प्रेम करता था तथा परिवार की एकता के महत्व को अच्छी तरह समझता था। जब तक बादशाह का परिवार नहीं चाहता था, दुनिया का कोई भी बादशाह सुख से राज्य नहीं भोग सकता था। जब बाबर की मृत्यु हुई तो उसने अपने बड़े पुत्र हुमायूं को भारत का बादशाह घोषित किया तथा उससे वचन लिया कि वह अपने भाइयों से प्रेम करेगा, उनके अपराधों को क्षमा करेगा और उन्हें कभी भी जान से नहीं मारेगा। जब बाबर मर गया तो हुमायूं ने अपना राज्य अपने भाइयों में बांट दिया ताकि भाइयों में राज्य के लिए झगड़ा न हो। फिर भी हुमायूं के भाइयों कामरान, अस्करी तथा हिन्दाल ने अपने बड़े भाई के साथ बड़ी दुष्टता की और पग-पग पर हुमायूं को धोखा दिया जिससे हुमायूं का राज्य उसके हाथ से निकल गया। दस साल तक फारस के बादशाह तहमास्प की शरण में रहने के बाद जब हुमायूं ने दुबारा भारत पर अधिकार किया तब उसने अपने छोटे भाई मिर्जा हिन्दाल को मार डाला। दूसरे भाई कामरान की आंखें फोड़कर उसे मक्का भेज दिया तथा तीसरे भाई मिर्जा अस्करी को भी उसके साथ रवाना किया। इसके कुछ दिन बाद ही हुमायूं की स्वयं की भी मृत्यु हो गई।

जब हुमायूं की मृत्यु हुई तो उसके दो पुत्र थे जिनमें से बड़ा पुत्र अकबर केवल 13 साल का लड़का था तथा हुमायूं का दूसरा पुत्र हकीम खां अल्पवयस्क बालक था।

अकबर के संरक्षक बैराम खाँ (Bairam Khan) द्वारा अकबर (Akbar) को भारतीय प्रांतों का तथा हुमायूं के छोटे पुत्र हकीम खाँ को काबुल का बादशाह बनाया गया किंतु हकीम खाँ की माँ चूचक बेगम (Mah Chuchak Begum) ने उजबेगों (Uzbeks) से सहयोग प्राप्त करके अकबर से उसका राज्य छीनने तथा अपने पुत्र को भारत का राज्य दिलाने का षड़यंत्र किया।

अकबर (Akbar) के संरक्षक बैराम खाँ (Bairam Khan) ने हकीम खाँ तथा उसके सहयोगियों का बुरी तरह दमन किया। हकीम खां को काबुल से भी निकाल दिया गया। अंत में हकीम खाँ ने अपने बड़े भाई अकबर के पैरों में गिरकर क्षमा मांगी। अकबर ने उसे काबुल का राज्य फिर से दे दिया।

हकीम खाँ तीस साल तक काबुल (Kabul) पर राज्य करता रहा। ई.1585 में हकीम खाँ की मृत्यु के बाद अकबर ने उसका राज्य अपने राज्य में मिला लिया।

अकबर के चार पुत्र हुए सलीम(Saleem or Jahangir), मुराद (Murad), दानियाल (Daniyal) तथा हुसैन (Husain)। अकबर की वृद्धावस्था आने तक केवल सलीम ही जीवित बचा था। इनमें से मुराद तथा दानियाल, ज्यादा शराब पीने से मरे थे।

बादशाह का एक ही जीवित पुत्र होने से सलीम का कोई प्रतिद्वंद्वी नहीं था फिर भी राज्य पाने की लालसा में उसने अपने पिता अकबर के विरुद्ध दो बार सशस्त्र विद्रोह किया तथा अपने बाप के कई नौकरों, मित्रों, सम्बन्धियों और मंत्रियों को मार डाला।

इस कारण अकबर (Akbar) ने सलीम के बड़े पुत्र खुसरो को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया किंतु जब अकबर रोग शैय्या पर पड़ा अंतिम सांसें ले रहा था, तब एक दिन अचानक सलीम, अकबर के महल में घुस गया। उसने अकबर के पलंग के पास लटक रही अपने दादा हूमायूं की तलवार निकालकर अपने हाथ में ले ली।

अकबर अपने जीवन से निराश हो गया और उसने अपने मंत्रियों से कहा कि वे सलीम के सिर पर बादशाह का ताज रख दें। इस प्रकार सलीम अपने बाप अकबर के जीवित रहते ही जहांगीर के नाम से बादशाह बना और उसने अपने बड़े पुत्र खुसरो पर भयानक अत्याचार किया।

जहांगीर (Jahangir) ने अपने पुत्र खुसरो (Khusro or Khusrau) के खास मित्रों को जीवित ही गधों और बैलों की खालों में सिलवा दिया तथा उसके अन्य सैंकड़ों साथियों को एक मील लम्बी सूली पर कतार में लटका दिया।

खुसरो को हाथी पर बैठाकर, लटकते हुए शवों की कतारों के बीच से ले जाया गया। उससे कहा गया कि अपने हर आदमी की लाश के सामने रुके और झुक कर उसका सलाम कुबूल करे।

इस अपमान के बाद खुसरो की आँखें फोड़ कर उसे कारागार में डाल दिया गया। सत्रह साल बाद जहांगीर ने उसे अपने एक अन्य पुत्र खुर्रम को सौंप दिया ताकि खुर्रम अपने बाप जहांगीर के खिलाफ बगावत न करे। खुर्रम ने अपने अंधे एवं बड़े भाई खुसरो को बुरहानपुर के दुर्ग में तड़पा-तड़पा कर मारा।

कुछ दिन बाद खुर्रम (Khurram or Shahjahan) ने अपने बाप जहांगीर के खिलाफ बगावत कर ही दी। खुर्रम के बड़े भाई परवेज (Parvez) ने उसे दक्षिण भारत में धकेल दिया। कुछ दिन के लिए खुर्रम शांत होकर बैठ गया किंतु जैसे ही जहांगीर की मृत्यु हुई खुर्रम ने नूरजहां (Noorjahan) तथा अपने अन्य भाई शहरयार (Shahryar or Shehryar) के खिलाफ उत्तराधिकार का युद्ध लड़ा।

उसने मुगल शहजादा शहरयार तथा उसके पुत्रों को अंधा करवाकर कत्ल करवाया। अपने दूसरे भाई दानियाल के पुत्रों को भी अंध करके मरवाया तथा अपने मृतक भाई खुसरो के एकमात्र जीवित पुत्र दावरबख्श की भी हत्या करके अपने बाप के तख्त पर शान से बैठा।

शाहजहां (Shahjahan) के बारे में कहा जाता है कि उसने अठारह मुगल शहजादे मौत के घाट उतारे जो या तो उसके चाचा थे या उसके भाई थे। इस सम्बन्ध में एक दोहा इस प्रकार से कहा जाता है-

सबळ सगाई ना गिणै, सबळां में नहीं सीर।

खुर्रम अठारह मारिया, कै काका कै बीर।।

आज वही खुर्रम शाहजहां (Shahjahan) के नाम से बादशाह था और मुगल शहजादे उसका तख्ते ताउस, कोहिनूर हीरा (Kohinoor Diamond) तथा लाल किला (Red Fort) पाने के लिए अपने बाप के खून के प्यासे हो रहे थे।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

दारा शिकोह (4)

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दारा शिकोह - www.bharatkaitihas.com
दारा शिकोह

शाहजहाँ का सबसे बड़ा पुत्र दारा शिकोह (Dara Shikoh) मजहबी कट्टरता से दूर रहता था और संसार के हर धर्म का आदर करता था। वह रामनामी ओढ़कर लाल किले में घूमा करता था, इस कारण वह मुल्ला-मौलवियों की नजरों में काफिर था।

6 अप्रेल 1648 को दिल्ली के लाल किले (Red Fort) में प्रवेश करते समय शाहजहाँ (Shahjahan) 56 साल का प्रौढ़ हो चुका था किंतु उसके शरीर में अब भी बहुत जान थी। यद्यपि शाहजहाँ (Shahjahan) के हरम में कई हजार औरतें निवास करती थीं किंतु शाहजहाँ इतना विलासी था कि उसके हरम में नित नई औरतों का आना-जाना लगा रहता था।

शाहजहाँ ने अपने कई अमीर-उमरावों और सेनानायकों के परिवारों की औरतों को अपने हरम में बुलाकर उन्हें खराब किया था। इस कारण कुछ औरतों ने तो आत्म-हत्याएं तक कर लीं। यही कारण था कि उसका हरम षड़यंत्रों से भरा हुआ था। शाहजहाँ के अपने परिवार में कोई उससे प्रेम नहीं करता था। सल्तनत के बहुत से अमीर एवं सेनापति भी बादशाह के खून के प्यासे थे।

शाहजहाँ के हरम में हजारों औरतें थीं किंतु घोषित रूप से शाहजहाँ की केवल नौ बेगमें थीं। इन बेगमों से शाहजहाँ को ढेर सारी औलादें हुई थीं, इतिहास तो अब उनके नाम भी नहीं जानता। शाहजहाँ की मुख्य बेगम मुमताज महल (Mumtaz Mahal) थी जो शाहजहाँ की तीसरी पत्नी थी। वह केवल 19 वर्ष की आयु में शाहजहाँ से ब्याही गई। ई.1631 में 38 वर्ष की आयु में शाहजहाँ की 14वीं संतान को जन्म देते समय मुमताज महल की मृत्यु हुई।

पिछली तीन कड़ियों में आप देख चुके हैं कि फरगना (Fargana) और समरकंद (Samarkand) के शासक बाबर ने अपने राज्य से हाथ धोने के बाद भारत पर आक्रमण करके आगरा को अपनी राजधानी बनाया। उसके चौथे वंशज शाहजहां ने अपने बाप-दादों द्वारा एकत्र की गई अकूत सम्पदा का उपयोग करके दिल्ली में यमुना के किनारे, लाल किले (Red fort of Delhi) का निर्माण करवाया।

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मुगल शहजादों में उत्तराधिकार का कोई नियम नहीं था। बादशाह के बूढ़ा होते ही मुगल शहजादे एक दूसरे की हत्या करने में जुट जाते थे तथा अंत में जो शहजादा जीवित बचता था, वह मुगल तख्त का अधिकारी होता था। हमायूं (Humayun) के बाद मुगल शहजादियों के विवाह की परम्परा समाप्त कर दी गई थी जिसके कारण मुगल शहजादियों ने भी इस खूनी खेल में भाग लेना आरम्भ कर दिया था।

जब शाहजहां (Shahjahan) के बीमार पड़ने की सूचना सल्तनत में फैली तो शाहजहां के चारों शहजादे मुगलिया तख्त पाने के लिए एक दूसरे का खून बहाने को तैयार हो गए।

शाहजहां का तीसरा शहजादा औरंगजेब (Aurangzeb) भले ही इस समय लाल किले से हजारों किलोमीटर दूर दक्षिण के भयानक मोर्चों पर मुगलिया सल्तन के शत्रुओं से जूझ रहा था किंतु उसे लगता था कि लाल किले का अगला वारिस केवल और केवल औरंगजेब ही हो सकता है।

जब औरंगजेब (Aurangzeb) ने सुना कि बादशाह ने दारा शिकोह (Dara Shikoh) को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया है तो वह समझ गया कि लाल किला पाने की राह इतनी आसान नहीं रहने वाली है तथा शाहजहां के इस कदम से लाल किला औरंगजेब की पहुंच से बहुत दूर हो गया है।

बहिन रौशनआरा (Roshanara) द्वारा लाल किले से भेजी गई इस सूचना से औरंगजेब परेशान हो तो हुआ किंतु वह जल्दी से हार मानने वाला नहीं था।

औरंगजेब न केवल लाल किले का मालिक बनना चाहता था अपितु बड़े भाई दारा शिकोह के कारण मुगलिया राजनीति जिस दिशा में चल पड़ी थी, औरंगजेब उस दिशा का मुंह भी मोड़ना चाहता था।

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औरंगजेब (Aurangzeb) की दृष्टि में दारा शिकोह एक काफिर था और इस्लाम का अपराधी था। वह न केवल शियाओं को, मुगलिया दरबार में बढ़ावा दे रहा था अपितु हिन्दुओं को भी गले लगा रहा था। इस कारण बहुत से शिया और हिन्दू सरदार मुगल दरबार में बड़ा रुतबा पा गए थे। औरंगजेब महसूस करता था कि शाहजहां ने अपने बड़े पुत्र दारा शिकोह को उसी दिन से अपने तीनों शहजादों की तुलना में अधिक महत्व दिया था जिस दिन से शाहजहां ने अपने भाइयों और चाचाओं को मार कर मुगलिया तख्त पर अधिकार किया था। अपनी ताजपोशी के दिन शाहजहां ने दारा शिकोह को 60,000 जात एवं 40,000 सवार का मनसब दिया था जबकि दूसरे एवं तीसरे नम्बर के पुत्र शाहशुजा (Shah Shuja) एवं औरंगजेब (Aurangzeb) को केवल 20,000 जात एवं 15,000 सवार का तथा चौथे शहजादे मुरादबक्श को केवल 15,000 जात एवं 12,000 सवार का मनसब दिया था।  मुगल दरबार में अमीर, उमराव, शहजादे और सूबेदार की अपनी कोई पहचान नहीं थी। उसकी पहचान केवल मनसब के सवारों और जात से होती थी। जिसके पास जितने अधिक सवार और जितनी अधिक जात का मनसब था, वह अमीर, उमराव, शहजादा और सूबेदार उतने ही बड़े कद और इज्जत का मालिक था।

औरंगजेब को यह पसंद नहीं आया था कि उसका बाप शाहजहां (Shahjahan), किसी भी शहजादे को औरंगजेब से अधिक मनसब प्रदान करे। इसलिए औरंगजेब उसी दिन से मन ही मन अपने बड़े भाई दाराशिकोह का दुश्मन हो गया।

जब तख्त पर बैठने के कुछ दिन बाद शाहजहां ने दारा शिकोह को दिल्ली में रखा और औरंगजेब सहित अपने तीनों छोटे शहजादों को पूर्व, पश्चिम और दक्षिण के दूरस्थ मोर्चों पर रवाना कर दिया तब तो औरंगजेब बुरी तरह से तिलमिला गया।

उसे लगा कि उसके अपने बाप की सल्तनत में उसकी हैसियत दूसरे सूबेदारों से अधिक नहीं है। जबकि दूसरी ओर दारा का रुतबा हर साल बढ़ता रहा। ई.1633 में दारा को वली अहद अर्थात् युवराज बनाया गया।

दारा (Dara Shikoh) को ई.1645 में इलाहाबाद का, ई.1647 में लाहौर का और ई.1649 में गुजरात का शासक बनाया गया। दारा के दुर्भाग्य से ई.1653 में दारा कंधार में एक बड़ी लड़ाई हार गया। इस पराजय से दारा की प्रतिष्ठा को बड़ा धक्का पहुँचा। तीनों छोट भाइयों और उनकी पक्षधर शहजादियों ने दारा के विरुद्ध शाहजहां के कान भरे, फिर भी शाहजहाँ दारा को अपने वारिस के रूप में देखता रहा।

ई. 1657 में शाहजहाँ के बीमार पड़ने की सूचना मिलते ही दक्षिण में नियुक्त औरंगजेब और मालवा में नियुक्त मुरादबक्श ने अपने बड़े भाई दारा को काफ़ि़र घोषित किया।

इस आरोप ने मुगलिया सल्तनत के बड़े सुन्नी अमीरों का ध्यान आकर्षित किया। उन्हें मुगलों के अगले वारिस के रूप में दारा के स्थान मुराद तथा औरंगजेब, अधिक अच्छे लगे।

दारा शिकोह (Dara Shikoh) अपने जन्म के समय से ही कट्टर सुन्नी मुसलमानों (Sunni Musalman) की आंखों में खटकता था। क्योंकि शाहजहां ने उसके जन्म के लिए अजमेर जाकर, ख़्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती के मज़ार पर मन्नत मांगी थी। शाहजहां मानता था कि दारा शिकोह का जन्म ख़्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की कृपा से ही हुआ था।

दारा स्वयं भी अपनी साधारण जीवन शैली के कारण, शहजादा कम और फ़क़ीर अधिक दिखता था। जीवन की शुरुआत में उसकी रुचि ख़्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती के कादरिया सम्प्रदाय में हुई बाद में वह हिन्दू धर्म के निकट आया और हिन्दू धर्म में अनुरक्त होता चला गया।

हालांकि दारा नियमित रूप से नमाज पढ़ता था किंतु उसका झुकाव सूफियों की ओर अधिक था। अपने परदादा अकबर की तरह वह भी दुनिया के सभी धर्मों की वास्तविकता का पता लगाना चाहता था।

इसलिए जिज्ञासु दारा शिकोह (Dara Shikoh) ने सूफियों तथा हिन्दू विद्वानों से भी उतना ही सम्पर्क रखा जितना कि वह मुसलमान उलेमाओं और दरवेशों से रखता था।

दारा अपने समय का प्रतिभाशाली लेखक था। उसने कई किताबें लिखीं जिनमें सूफी संतों के जीवन चरित्र पर लिखी गई उसकी दो पुस्तकें- ‘सफ़ीनात अल औलिया’ और ‘सकीनात अल औलिया’ अधिक प्रसिद्ध हैं। उसकी लिखी पुस्तकों- ‘रिसाला ए हकनुमा’ और ‘तारीकात ए हकीकत’ में भी सूफीवाद का दार्शनिक विवेचन किया गया है।

दारा शिकोह (Dara Shikoh) के कविता संग्रह ‘अक्सीर ए आज़म’ से सभी धर्मों के प्रति उसके आदर भाव का बोध होता है। ‘हसनात अल आरिफीन’ और ‘मुकालम ए बाबालाल ओ दाराशिकोह’ नामक ग्रंथों में उसने धर्म और वैराग्य का विवेचन किया है।

‘मजमा अल बहरेन’ दारा शिकोह का सर्वाधिक चर्चित ग्रंथ है जिसमें वेदान्त और सूफीवाद के शास्त्रीय शब्दों का तुलनात्मक अध्ययन प्रस्तुत किया गया है। उसने हिन्दुओं के 52 उपनिषदों का फारसी में अनुवाद करके ‘सीर-ए-अकबर’ अर्थात् ‘सबसे बड़ा रहस्य’ नामक ग्रंथ तैयार किया।

इन ग्रंथों के कारण कट्टर उलेमाओं और मौलवियों को दारा के खिलाफ जहर उगने का मौका मिल गया। वली ए अहद होने के कारण कोई उसके मुंह पर तो कुछ नहीं कहता था किंतु ये लोग दारा (Dara Shikoh) तथा उसके समर्थकों की पीठ के पीछे, उसे काफिर कहने में संकोच नहीं करते थे।

दारा की विभिन्न कृतियों से ज्ञात होता है कि दारा, हिंदू दर्शन और पुराणों से बहुत प्रभावित था। ईश्वर का वैश्विक पक्ष, द्रव्य में आत्मा का अवतरण और निर्माण तथा संहार का चक्र जैसे सिद्धांतों के मामले में तो वह हिन्दू धर्म के एकदम निकट ठहरता है। दारा का विश्वास था कि वेदांत और इस्लाम में सत्यान्वेषण के सम्बन्ध में केवल शाब्दिक अंतर है।

‘मज्म उल बहरैन’ नामक ग्रंथ में दारा शिकोह ने वेदांत तथा सूफिज्म का तुलनात्मक अध्ययन करके इस्लामिक जगत में खलबली मचा दी थी। इस ग्रंथ ने सूफ़िज्म ओर वेदांत दर्शन में मौजूद अनके समानताओं का रहस्योद्घाटन किया।

यह पुस्तक ई.1654-55 में एक संक्षिप्त ग्रंथ के रूप में फारसी भाषा में लिखी गई थी। इसके हिंदी संस्करण को ‘समुद्र संगम ग्रंथ’ कहा जाता है।

जब दारा शिकोह (Dara Shikoh) ने घोषित किया कि जिस प्रकार कुरान में एक ईश्वर का अस्तित्व स्वीकार किया गया है, उसी प्रकार वेदों में एक ईश्वर की सत्ता स्वीकार की गई है। इसलिए इन दोनों धर्मों में कोई अंतर नहीं है तो सारे मुल्ला, मौलवी, उलेमा और नजूमी, दारा के दुश्मन हो गए। वे काफिरों की पुस्तकों की तुलना कुरान शरीफ से होते हुए नहीं देख सकते थे।

कुछ कट्टर आलोचकों ने लिखा है कि कई बार दारा शिकोह, रामनामी ओढ़कर सार्वजनिक स्थलों पर दिखाई देता था। उसने अपनी शाही मुहर में भी राम नाम अंकित करवा लिया था। दारा के ये लक्षण देखकर मुल्ला-मौलवी कांप उठते थे।

स्वयं को इस्लाम के ठेकेदार समझने वाले मुल्लाओं को डर था कि यदि आम मुसलमान ने दारा की बातों को स्वीकार कर लिया तो भारत में इस्लाम का प्रचार रुक जाएगा।

मुहम्मद काजिम नामक एक लेखक ने अपने ग्रंथ ‘आलमगीरनामा’ (Alamgir Nama) में  दारा शिकोह (Dara Shikoh) को ‘वेशिकोह’ अर्थात् बिना इज्जत वाला लिखा है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुमताज महल (5)

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मुमताज महल

मुमताज महल (Mumtaz Mahal) की नसों में ईरान का तथा शाहजहाँ (Shahjahan) की नसों में समरकंद के मंगोलों का रक्त था। इस रक्त मिश्रण से उत्पन्न मुगल शहजादे एक दूसरे के रक्त के प्यासे रहते थे।

अकबर (Akbar Shah) के समय से ही मुगल दरबार एवं हरम की गुटबंदी मुगल सल्तनत की राजनीति में हस्तक्षेप करती आई थी। जहाँगीर के समय में यह गुटबंदी और बढ़ गई थी। जब अय्याश शाहजहाँ (Shahjahan) अपने हरम को लाल किले में ले आया तो लाल किले की रंगीनियों ने हरम की औरतों को और भी उन्मुक्त कर दिया।

चूंकि अकबर के समय में मुगल शहजादियों के विवाह करने की परम्परा समाप्त कर दी गई थी, इसलिए मुगल शहजादियां लाल किले की मजबूत दीवारों के बीच बने हरम में छिपकर रहती थीं तथा अपने-अपने ढंग से लाल किले की राजनीतिक बिसातें बिछाकर अपने आप को व्यस्त रखती थीं। इस प्रकार शाहजहाँ के काल में मुगल दरबार एवं हरम, गुटबन्दियों एवं षड्यन्त्रों का बड़ा अखाड़ा बन गया। सत्ता और शक्ति की लूट-खसोट के कारण बादशाह के अतिरिक्त और किसी को सल्तनत की दुर्दशा की चिंता नहीं थी। अधिकांश लोग स्वार्थ-सिद्धि में लगे रहते थे।

मुगल शहजादों ने अपने बड़े भाई दारा शिकोह (Dara Shikoh) को काफिर तथा इस्लाम का अपराधी घोषित किया तथा सल्तनत के मुल्ला-मौलवियों ने भी कट्टर और संकीर्ण सोच वाले शहजादों का साथ देना स्वीकार किया।

जब शाहजहां ने मुमताज महल (Mumtaz Mahal) के सबसे बड़े बेटे दारा शिकोह को अपना वारिस और हिन्दुस्तान का अगला बादशाह घोषित किया तो मुमताज महल की बाकी औलादें लाल किला पाने के लिए एक दूसरे पर झपटीं।

पूरे आलेख के लिए देखें यह वी-ब्लॉग-

लाल किले (Red Fort Of Delhi) के निर्माता शाहजहां (Shahjahan) की नौ बेगमें थीं- कंधारी महल (Kandhari Mahal), अकबराबादी बेगम (Akbarabadi Begum), मुमताज महल (Mumtaz Mahal), हसीना बेगम (Haseena Begum), मोती बेगम (Moti Begum), कुदासिया बेगम (Qudsia Begum), फतेहपुरी महल (Fatehpuri Mahal), सरहिंदी बेगम (Sirhindi Begum) तथा रानी मनभाविती (Rani Manbhawati)। इन सभी बेगमों से शाहजहां को ढेरों औलादें हुई थीं।

शाहजहां की बेगमों में से मुमताज महल तीसरे नम्बर की थी। उसके पेट से जन्मी चौदह औलादों में से केवल आठ जीवित बची थीं। मुमताज महल की ये आठों औलादें मुगलिया तख्त को पाने के लिए एक दूसरे को जान से मारने को सन्नद्ध हो गईं।

यह एक हैरानी की ही बात थी कि शाहजहां (Shahjahan) की अन्य आठ बेगमों की औलादों को न तो लाल किले से कोई मतलब था और न लाल किले के लिए होने वाली खूनी जंग से। हालांकि इस खूनी जंग ने देखते ही देखते राष्ट्रव्यापी स्वरूप ले लिया था जिसमें कई लाख लोगों ने अपने प्राण गंवाए। राजपूत सेनाओं को इस खून खराबे में बड़ी कीमत चुकानी पड़ी।

मुमताज के बेटे-बेटियों की खूनी जंग के बारे में जानने से पहले हमें लाल किले की स्वामिनी मुमताज महल का थोड़ा सा इतिहास जानना चाहिए।

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मुमताज़ महल का असली नाम अर्जुमंद बानो बेगम था। शाहजहां उसे मुमताज महल कहा करता था जिसका अर्थ होता है महल का सबसे प्यारा आभूषण। मुमताज का जन्म अप्रैल 1593 में आगरा में हुआ था। उसका पिता अब्दुल हसन असफ़ ख़ान, जहांगीर (Jahangir) की बेगम नूरजहाँ (Noor Jahan) का भाई था तथा वह अपने बाप के साथ फारस से भारत आया था। इस प्रकार मुमताज महल (Mumtaz Mahal) की रगों में फारस का खून बहता था और वह शाहजहां की ममेरी बहिन थी। मुमताज महल संगमरमर के पत्थर से तराशी हुई सफेद गुड़िया की तरह बहुत सुंदर दिखती थी तथा आगरा के मीना बाजार में अपनी दुकान पर रेशम और कांच के मोती बेचा करती थी। मीना बाजार की परम्परा शाहजहां के दादा जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर ने शुरु की थी। यह केवल मुगलिया शहजादों और खादनदानी अमीर-उमरावों के लिए सजता था। मीना बाजार में केवल शहजादियों और हिन्दू राजकुमारियों को अपनी दुकानें लगाने की अनुमति थी जिन पर उन्हें खुद अपना सामान बेचना होता था। अक्सर इन दुकानें की मालकिनें भी किसी शहजादे या अमीर-उमराव के हाथ बिक जाती थीं।

ई.1607 में एक बार शहजादा खुर्रम (Prince Khurram), मीना बाजार की सैर करने के लिए आया और उसकी मुलाकात अपनी ममेरी बहिन अर्जुमंद बेगम (Arjumand Begum) से हुई। पहली ही मुलाकात में खुर्रम ने अर्जुमंदर बेगम से विवाह करने का निर्णय कर लिया।

पहले से ही दो बेगमों के होते हुए भी शहजादे खुर्रम ने अपने पिता जहांगीर के समक्ष अपने तीसरे विवाह की इच्छा व्यक्त की। इस पर ई.1612 में जहांगीर ने खुर्रम का विवाह अर्जुमंद बेगम से कर दिया।

इस प्रकार 19 साल की अर्जुमंद, खुर्रम (Shahjahan) की तीसरी बीवी बन गई जो बाद में शाहजहाँ के नाम से जहांगीर Jahangir) का उत्तराधिकारी हुआ। जहांगीर ने अर्जुमंद का नाम बदल कर मुमताज महल (Mumtaz Mahal) कर दिया।

कहने को वह शाहजहाँ (Shahjahan) की तीसरी बेगम थी परन्तु शीघ्र ही वह शाहजहां की सबसे पसंदीदा बेगम बन गई। शाहजहां के शाही फरमानों के खाली कागज तथा शाहजहां की असली शाही मुहर, मुमताज महल के पास रहती थी जिसका अर्थ यह था कि जहांगीर के नाम से जारी किए गए आदेश वास्तव में मुमताज महल द्वारा जारी किए जाते थे।

मुमताज महल शतरंज खेलने में माहिर थी। शाहजहां घण्टों तक मुमताज महल के सामने बैठकर उसके साथ शतरंज खेला करता था। मुमताज अक्सर बादशाह को इस खेल में हरा देती थी। जब भी मुमताज महल शाहजहां को हराती थी शाहजहां निहाल होकर उस पर अशर्फियों की बारिश करता था।

मुमताज को अपनी मातृभाषा फारसी का बहुत अच्छा ज्ञान था और वह फारसी भाषा में बहुत उम्दा कविताएं लिखा करती थी। उसने फारसी भाषा के बहुत से कवियों को मुगल दरबार में आश्रय दिया।

मुमताज ने शाही बागीचों को सुंदर फूलों से सजाकर उसे स्वर्ग जैसा बना दिया था। इस प्रकार मुमताज महल (Mumtaz Mahal) ने अपने चारों ओर सौंदर्य का सृजन किया था और शाहजहां सौंदर्य के इस अप्रतिम सागर में अनवरत डुबकियां लगाया करता था।

जिस प्रकार जहांगीर की बेगम नूरजहां (Noorjahan) ने मुगलिया सल्तनत को अपनी अंगुलियों पर नचाया था, उसी प्रकार मुमताज महल भी बादशाह की चहेती बनकर मुगलिया तख्त, मुगलिया खानदान और मुगलिया सल्तनत को अपनी अंगुलियों पर नचाने लगी। 

इसी का परिणाम था कि शाहजहां की अन्य आठों बेगमें तथा उनकी ढेर सारी औलादें बुरी तरह उपेक्षित हुईं तथा इतिहास के पन्नों पर उनका नाम तक दर्ज नहीं हो सका।

मुगलिया सल्तनत (Mughal Sultanate) पर मजबूती से अधिकार जमाए रखने के लिए मुमताज ने दो उपाय किए। पहला तो यह कि वह अक्सर शाही बाग में गरीब औरतों को आमंत्रित करती तथा उनके साथ पर्याप्त समय बिताती। इन औरतों से उसे सल्तनत में होने वाली छोटी-बड़ी बातों की जानकारी मिलती थी। मुमताज महल, गरीब और जरूरतमंद औरतों की भरपूर मदद भी करती।

मुमताज महल अक्सर बादशाह से कहकर ही जरूरतमंद रियाया की मदद करवाती थी किंतु उन लड़कियों का वह स्वयं ध्यान रखती थी जिनका विवाह गरीबी के कारण नहीं हो पाता था। इन कारणों से मुमताज महल, गरीब रियाया में बेहद पसंद की जाती थी।

दूसरा उपाय भी बहुत सोच समझ कर अपनाया गया था। जब भी शाहजहां (Shahjahan) किसी भी काम से राजधानी से बाहर जाता था तो मुमताज अनिवार्य रूप से उसके साथ जाती थी। इसका लाभ यह हुआ कि सल्तनत के प्रत्येक अमीर, उमराव, शहजादे, हिन्दू सरदार तथा मुल्ला-मौलवियों से मुमताज का सीधा सम्पर्क हो गया।

इस कारण जब तक मुमताज महल (Mumtaz Mahal) जीवित रही, किसी ने उसके विरुद्ध विद्रोह नहीं किया। न कोई व्यक्ति मुमताज के खिलाफ बादशाह के कान भर सका।

मुमताज के पेट से कुल 14 संतानों ने जन्म लिया। 17 जून 1631 को बुरहानपुर में शाहजहां की 14वीं संतान गौहरा बेगम को जन्म देते वक्त मुमताज महल की मृत्यु हो गई। शाहजहां ने गौहरा बेगम को अपने लिए अभिशप्त माना तथा उसका मुंह तक देखने से मना कर दिया।

 ई.1612 में 19 वर्ष की आयु में मुमताज महल (Mumtaj Mahal) का विवाह शाहजहां (Shahjahan) से हुआ था। इस विवाह के बाद वह केवल 19 साल जीवित रही तथा इस अवधि में उसने 14 बार गर्भ धारण किया। एक तरह से शाहजहां ने उसे बच्चे पैदा करने की मशीन बनाकर रख दिया था।

शाहजहां के चाचा दानियाल ने मुमताज महल (Mumtaz Mahal) का शव बुरहानपुर के जैनाबाद बाग में दफ्न किया। उसके शव को सुरक्षित रखने के लिए मिस्र देश में ममी बनाने की तीन प्रसिद्ध विधियों में से एक विधि का सहारा लिया गया ताकि उसके शव में से कभी बदबू नहीं आ सके तथा उसका शव हजारों साल तक सुरक्षित रह सके।

मुमताज के शोक में डूबा हुआ शाहजहां, लगभग एक साल तक बुरहानपुर में ही रहा तथा इस दौरान वह अपने डेरे से एक बार भी बाहर नहीं निकला।

बाद में जब आगरा में ताजमहल (Tajnahal) का निर्माण शुरु हो गया तथा चाहर-दीवारियां बन गईं, तब दिसम्बर 1631 में मुमताज के शव को कब्र से बाहर निकाला गया। इस शव को पूरे लाव-लश्कर के साथ शानदार शाही जुलूस के रूप में बुरहानपुर से आगरा तक लाया गया। इस जुलूस पर उस समय आठ करोड़ रुपए व्यय हुए थे।

 12 जनवरी 1632 को मुमताज का शव निर्माणाधीन ताजमहल के परिसर में दफना दिया गया।

जब 9 साल बाद ई.1640 में ताजमहल बनकर पूरा हो गया, तब मुमताज महल के शव को एक बार फिर कब्र से बाहर निकाला गया तथा इस बार उसे ताजमहल के एक तहखाने में दफनाया गया तथा उसके ऊपर की मंजिल में उसकी नकली कब्र (Tomb of MumtaZ Mahal) बनाई गई ताकि यदि दुश्मन कभी ताजमहल को नष्ट करें तो मुमताज महल, अपने तहखाने और अपने ताबूत में सुरक्षित रहकर आराम से कयामत का इंतजार कर सके।

जब शाहजहां (Shahjahan) भी मर गया, तब मुमताज महल (Mumtaz Mahal) के निकट ही ताजमहल (Taj Mahal) के तहखाने में शाहजहां को भी दफनाया गया तथा ऊपर की मंजिल में मुमताज की नकली कब्र के पास ही बादशाह की भी नकली कब्र (Tomb of Shahjahan) बनाई गई।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुगल हरम (6)

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मुगल हरम

मुगल हरम (Mughal Harem) शहंशाह अकबर (Akbar The Great or Akbar Shah) के समय से ही मुगल शहजादियों से भरने लगा था क्योंकि अकबर ने शहजादियों के विवाह करने की परम्परा बंद कर दी थी। मुगल हरमों में अपनाई गई इस नितांत अमानवीय परम्परा का एक खास कारण था।

अकबर की सात बहनें मुगल हरम (Mughal Harem) में रहती थीं, बक्शीबानू बेगम (Bakshi Banu Begum), अकीका सुल्ताना बेगम (Akika Sultana Begum), अमीना बानू बेगम (Amina Banu Begum), बख्त उन्निसा बेगम (Bakht-un-Nisa Begum), सकीना बानू बेगम (Sakina Banu Begum), जहान सुल्ताना बेगम (Jahan Sultana Begum) तथा फख्र उन्निसा बेगम (Fakhr-un-Nisa Begum)। इन सातों के पति मिर्जा (Mirza) कहलाते थे और ये सातों मिर्जा स्वयं को शहंशाह अकबर के बराबर समझते थे।

वे अकबर (Akbar) के साथ न केवल उद्दण्डता पूर्वक व्यवहार करते थे अपितु समय मिलते ही अकबर की सल्तनत उखाड़कर अपनी सल्तनत कायम करने के लिए बगावत करते थे। अकबर अपनी बहिनों के लिहाज के कारण अपने बहनोइयों को पकड़कर न तो मार ही पाता था और न उन्हें कैद कर पाता था।

अंत में तंग आकर जब तक अकबर ने अपने बागी बहनोइयों को मार नहीं डाला, तब तक उनके द्वारा की जाने वाली बगावत समाप्त नहीं हुई। इस कारण अकबर ने नियम बना दिया कि भविष्य में मुगल हरम की शहजादियों के विवाह नहीं किए जाएंगे।

इसी नियम पर चलते हुए अकबर (Akbar) ने अपनी चारों पुत्रियों आराम बानू बेगम (Aram Banu Begum), खानम सुल्तान बेगम (Khanam Sultan Begum), शकर उसनिसा बेगम (Shakar-un-Nisa Begum) तथा मेहरुन्निसा बेगम (Mehrunnisa Begum) के विवाह नहीं किए थे। ये चारों शहजादियां मुगल हरम (Mughal Harem) में रहती थीं।

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अकबर के पुत्र जहाँगीर (Jahangir) ने भी अपनी तीनों शहजादियों माजियार बेहरूज (Majiyar Behrouz), बहार बानू बेगम (Bahar Banu Begum) तथा निठार बेगम (Nithar Begum) की शादियां नहीं कीं। फिर भी जहाँगीर (Jahangir) के पुत्र शाहजहाँ (Shahjahan) को अपने राज्यारोहण से पहले अपनी सौतेली बहिन लाडली बेगम के पति से निबटना पड़ा था।

लाडली बेगम (Ladli Begum) का किस्सा इस प्रकार से है- जहाँगीर ने अपनी प्रेयसी नूरजहाँ (Noor Jahan) के पति शेरअफगन (Sher Afghan) को मारकर नूरजहाँ से विवाह किया था। शेरअफगन से नूरजहाँ की एक बेटी थी जिसे लाडली बेगम कहा जाता था। जब नूरजहाँ को बंगाल से आगरा लाया गया तो लाडली बेगम भी उसके साथ जहाँगीर के हरम (Mughal Harem) में चली आई थी तथा उसका लालन-पालन भी शहजादियों की तरह हुआ था।

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जब लाडली बेगम जवान हुई तो नूरजहाँ (Noor Jahan) ने लाडली बेगम का विवाह अपने पति जहाँगीर की एक अन्य बेगम के पेट से जन्मे पुत्र शहरयार (Shahryar) से कर दिया। जब जहाँगीर बीमार पड़ा तो शाहजहाँ (Shahjahan) जो कि उन दिनों खुर्रम (Khurram) के नाम से जाना जाता था, शहरयार को मारकर ही बादशाह बन सका था। हालांकि शहरयार को तो खुर्रम के हाथों इसलिए भी मरना ही था क्योंकि वह खुर्रम का सौतेला भाई भी था तथा शाहजहाँ जानता था कि उसे अपने अठारह चाचाओं और भाइयों को मारे बिना मुगलों का तख्त हासिल नहीं होने वाला था। इसलिए शाहजहाँ ने अपने दादा अकबर (Akbar) द्वारा शहजादियों का विवाह न करने के सम्बन्ध में बनाए गए नियम को अपने समय में भी सख्ती से लागू कर रखा था और अपनी चारों शहजादियों में से किसी का विवाह नहीं किया था। ये चारों शहजादियां मुगल हरम पर अपनी-अपनी तरह से शासन करती थीं। इस नियम की पालना करने से बादशाह को जंवाइयों की बगावत की संभावना से और भावी बादशाह को बहनोइयों की बगावत की समस्या से तो छुटकारा मिल गया था किंतु एक नई समस्या पैदा हो गई थी।

अब शहजादियाँ जीवन भर बादशाह के हरम (Mughal Harem) का हिस्सा बनकर रहतीं थीं और वे भावी बादशाह के लिए होने वाले उत्तराधिकार के युद्ध में खुलकर भाग लेती थीं। शाहजहाँ का हरम भी इस खतरनाक समस्या से संक्रमित था। उसकी चारों शहजादियों भी अब जवान हो गई थीं। और उन्होंने भी अपने भाइयों के साथ मिलकर मुगलिया राजनीति के खूनी खेल में भाग लेना आरम्भ कर दिया था।

चारों शहजादियों ने एक-एक भाई का दामन पकड़ लिया था। जहांआरा (Jahanara) ने दारा शिकोह (Dara Shikoh) को, रोशनआरा ने औरंगज़ेब को, गौहर आरा (Gouhar Ara) ने मुराद (Murad) को और पुरहुनार बेगम (Purhunar Begum) ने शाहशुजा (Shahshuja) को बादशाह बनाने के लिए राजनीतिक शतरंज पर षड़यंत्रों की खूनी गोटियां बिछानी आरम्भ कर दीं थीं।

चारों शहजादियाँ अपनी पसंद के भाई को तख्ते ताउस पर बैठाकर कोहिनूर हीरे तथा दिल्ली के लाल किले (Red Fort) का स्वामी बनाने का ख्वाब देखा करती थीं। इस प्रकार अकबर (Akbar) द्वारा बनाई गई नीति के कारण मुगलों को बहनोइयों और जवांइयों की समस्याओं से तो मुक्ति मिल गई थी किंतु अब मुगल हरम (Mughal Harem) बहनों और बेटियों के षड़यंत्रों से घिर गए थे।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

तैमूरी खून (7)

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तैमूरी खून

शाहजहाँ (Shahjahan) के चारों शहजादे लाल किले (Red Fort) की हकीकत के बारे में स्वयं को आश्वस्त नहीं कर पा रहे थे फिर भी शहजादों की नसों में चंगेजी और तैमूरी खून (Taimuri Khoon or Timurid Blood) जोर मारने लगा!

शाहजहाँ के हरम (Harem of Shahjahan) में नियुक्त नौकरों, लौण्डियों और हिंजड़ों की समझ में नहीं आ रहा था कि बादशाह को हुआ क्या है और शहजादे दारा शिकोह तथा शहजादी जहाँआरा के अतिरिक्त प्रत्येक व्यक्ति को बादशाह के शयन कक्ष में जाने से रोक क्यों दिया गया है! जबकि शाही हकीम की आवाजाही बादशाह के ख्वाबगाह में अभी भी बनी हुई है।

हरम के नौकरों, लौण्डियों और हिंजड़ों ने आनन-फानन में लाल किले तथा लाल किले से बाहर समूची दिल्ली में बादशाह की बीमारी की सूचना फैला दी। हरामखोर किस्म के कुछ नौकरों ने यह अफवाह फैलाने में भी कोई विलम्ब नहीं किया कि शहजादे दारा शिकोह तथा शहजादी जहांआरा (Jahanara) ने बादशाह को कैद कर लिया है तथा बादशाह वही आदेश जारी करता है जो आदेश उसे दाराशिकोह के द्वारा जारी करने के लिए दिए जाते हैं।

कुछ नौकरों ने अपने रिश्तेदारों और घर-परिवारों में जाकर यह कानाफूसी की कि बादशाह को कैद नहीं किया गया है, वास्तव में तो बादशाह मर गया है और शहजादा दारा-शिकोह तथा शहजादी जहाँआरा (Jahanara) उसकी बीमारी की अफवाह उड़ाकर उसके नाम से हुकूमत कर रहे हैं।

पुर-हुनार बेगम, रोशनारा बेगम और गौहरा बेगम ने बहुत चेष्टा की कि वे किसी भी बहाने से एक बार अपने पिता की ख्वाबगाह में घुसकर बादशाह हुजूर को अपनी आँखों से देख लें ताकि इस सच्चाई का पता चल सके कि बादशाह हुजूर वाकई में बीमार हैं या उन्हें काफिरों ने कैद करके रखा है! शाहजहाँ की तीनों छोटी शहजादियाँ, दारा और जहाँआरा को काफिर ही कहती थीं।

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जब तीनों छोटी शहजादियाँ अपने मकसद में कामयाब नहीं हो सकीं तो उन्होंने बादशाह की बीमारी के हाल बढ़ा-चढ़ा कर अपने-अपने पक्ष के शहजादे को लिख भेजे। तीनों ही शहजादियाँ अपने खतों में यह लिखना नहीं भूलीं कि काफिर दारा (Dara Shikoh) और जहाँआरा (Jahanara) ने बादशाह सलामत को कैद कर लिया है तथा शाही हकीम के अलावा किसी को बादशाह की ख्वाबगाह में जाने की इजाजत नहीं है। शाही हकीम को हरम के भीतर ही कड़ी निगरानी में रखा गया है तथा उसे किसी से भी बात करने की इजाजत नहीं है। शाहजहाँ की चारों शहजादियाँ यूं तो लाल किले के भीतर ही रहती थीं किंतु पुरहुनार बेगम (Purhunar Begum), रोशनारा बेगम (Roshanara Begum)और गौहरा बेगम (Gouharara Begum) को जवान होने के बाद शायद ही कभी अपने बाप का मुँह देखने को मिलता था। बादशाह उन्हें फूटी आँख नहीं देख सकता था। केवल जहाँआरा बेगम ही शाहजहाँ (Shahjahan) की चहेती पुत्री थी और वही बादशाह के ख्वाबगाह तक जाने का अख्तियार रखती थी। इसलिए तीनों छोटी शहजादियों ने उसके बारे में अफवाह फैला रखी थी कि यह बादशाह की बेटी नहीं, उसकी रखैल है। दिल्ली की जनता में भी जहाँआरा के बारे में तरह-तरह की बातें कही जाती थीं।

अपनी बहिनों से मिले खतों को पढ़कर, राजधानी से हजारों किलोमीटर दूर बैठे तीनों छोटे शहजादों की बेचैनी दिन पर दिन बढ़ने लगी। उन्हें इस बात पर तो पूरा विश्वास था कि बादशाह गंभीर रूप से बीमार है तथा जहाँआरा और दारा शिकोह ने उसे कैद कर लिया है लेकिन साथ ही उनमें से प्रत्येक को यह भी शक था कि कहीं ऐसा न हो कि बादशाह मर गया हो तथा दारा शिकोह और जहाँआरा (Jahanara) उसके शरीर को चुपचाप ठिकाने लगाकर, भीतर ही भीतर सल्तनत हड़पने की तैयारियां कर रहे हों!

तीनों शहजादों के भीतर पल रही लाल किला (Red Fort or Lal Kila) पाने की हवस, उन्हें धैर्य और सब्र से काम नहीं लेने देती थी। वैसे भी मुगल शहजादों में उत्तराधिकार का प्रश्न शहजादों के खून से ही सुलझता आया था। पीढ़ी-दर पीढ़ी तैमूरी खून (Taimuri Khoon or Timurid Blood) के मुगल शहजादे अपने बाप का तख्त और दौलत पाने के लिए एक दूसरे का कत्ल करते आए थे।

शाहजहाँ (Shahjahan) के चारों शहजादे लाल किले (Red Fort of Delhi) की हकीकत के बारे में स्वयं को आश्वस्त नहीं कर पा रहे थे फिर भी शहजादों का चंगेजी और तैमूरी खून राजधानी दिल्ली की ओर कूच करने के लिए जोर मारने लगा जो खून-खराबे और मैदाने जंग के अलावा और किसी भाषा में नहीं समझता था!

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

महाराणा राजसिंह (8)

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महाराणा राजसिंह

शाहजहाँ (Shahjahan) के बीमार होते ही महाराणा राजसिंह (Maharana Rajsingh) ने माण्डलगढ़ (Mandalgarh) छीन लिया! शाहजहां कालीन भारत में मेवाड़ का महाराणा राजसिंह एक बड़ी विभूति था। उसने अपने पूर्वज महाराणा प्रताप का अनुसरण करके समूचे मेवाड़ को एक दुर्ग की तरह इस्तेमाल करना सीख लिया था।

महाराणा राजसिंह (Maharana Rajsingh) की सेनाएं मुगल सेनाओं को नष्ट करने के लिए सदैव तत्पर रहती थीं। महाराणा राजसिंह भारत के ज्ञात इतिहास में अकेला राजा हुआ है जिसने रत्नों का तुलादान किया।

जब मेवाड़ के महाराणा राजसिंह ने शाहजहाँ (Shahjahan) के बीमार होने का समाचार सुना तो उसने माण्डलगढ़ (Mandal Garh) के किले पर आक्रमण कर दिया। माण्डलगढ़ वास्तव में मेवाड़ राज्य का ही पुराना किला था किंतु अकबर के समय आम्बेर के राजकुमार मानसिंह ने इस पर अधिकार करके मुगलों को सौंप दिया था। हालांकि महाराणा प्रताप (Maharana Pratap) ने इस दुर्ग को अकबर के जीवन काल में ही मुगलों से वापस छीन लिया था किंतु महाराणा प्रताप की मृत्यु के बाद यह दुर्ग पुनः मुगलों (Mughals) के अधिकार में चला गया था और उसके बाद से मेवाड़ और मुगलों के बीच आता-जाता रहता था।

इसके बाद महाराणा राजसिंह ने मांडल, दरीबा, बनेड़ा, शाहपुरा के शासकों से दण्ड वसूल किया। उसने जहाजपुर, सावर, फूलिया तथा केकड़ी पर भी अधिकार कर लिया तथा मालपुरा और टोडा को लूट लिया। महाराणा ने टोंक, सांभर, लालसोट और चाटसू पर आक्रमण करके वहां से भी दण्ड वसूल किया।

इन दिनों माण्डलगढ़ दुर्ग पर किशनगढ़ (Kishangarh) के महाराजा रूपसिंह (Maharaja Roop Singh) का अधिकार था। वह शाहजहाँ का सबसे विश्वस्त राजा था तथा कुछ साल पहले ही उसने इस दुर्ग को मेवाड़ से छीना था। महाराजा रूपसिंह आगरा में या बलख-बदख्शां के मोर्चे पर रहता था तथा उसकी तरफ से राघवदास महाजन किलेदार नियुक्त था, वह माण्डलगढ़ को महाराणा के हाथों में जाने से बचा नहीं पाया।

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इस प्रकार बादशाह की बीमारी तथा शहजादों की आपसी लड़ाई का लाभ उठाकर महाराणा राजसिंह (Maharana Rajsingh) ने मुगलों के क्षेत्रों से बहुत सारा धन इकट्ठा कर लिया जिसका उपयोग वह आने वाले समय में मुगलों के विरुद्ध सेना तैयार करने में करने वाला था।

आखिर शाहजहाँ (Shahjahan) के स्वास्थ्य ने पलटी खाई। कौन जाने कि यह शाही हकीम की दवाइयों का असर था या किशनगढ़ के महाराजा रूपसिंह द्वारा सलेमाबाद (Salemabad) के संतों से लाई गई चमत्कारी भभूती का किंतु बादशाह न केवल अपने बिस्तर से उठकर खड़ा हो गया अपितु सुबह की ताजी हवा खाने और प्रजा को झरोखा दर्शन देने के लिए अपने खास महल के झरोखे में भी आकर बैठने लगा।

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जैसे ही बादशाह ने झरोखा दर्शन देना शुरू किया, लाल किले और दिल्ली में चल रही फुसफुसाहटें बंद हो गईं। उन नौकरों, लौण्डियों, हिंजड़ों, वेश्याओं, पातरियों और पड़दा बेगमों के मुँह खुद-ब-खुद सिल गए जो बादशाह की नासाज तबियत तथा दारा द्वारा उसे बंदी बनाए जाने के बारे में तरह-तरह के किस्से गढ़ने और दुनिया भर की अफवाहें फैलाने में जरा भी भय नहीं खाते थे। जैसे-जैसे ईद निकट आती गई, शाहजहाँ (Shahjahan) की तबियत में सुधार होता चला गया। कुछ दिनों में बादशाह न केवल दरबार में जाकर बैठने लगा अपितु उसने हर साल की तरह ईद के जलसे में शामिल होकर जनता को ईद मुबारक भी कहा। ईद के जलसे में बादशाह की सवारी जिस-जिस अमीर-उमराव और हिन्दू सरदार की हवेली के सामने से निकलती थी, वह अमीर-उमराव और सरदार अपनी हवेली से बाहर आकर बादशाह का इस्तकबाल करता था और बादशाह को ईद की न्यौछावर पेश करता था। इस प्रकार दिल्ली की जनता से लेकर अमीर-उमरावों तक ने शाहजहाँ को अपनी आंखों से देख लिया और उन्हें विश्वास हो गया कि बादशाह के हरामखोर नौकर बादशाह की जेलबंदी और मौत के सम्बन्ध में झूठी अफवाहें फैला रहे थे।

चिंतातुर शहजादियों ने फिर से अपने भाइयों को गुप्त चिट्ठियां भिजवाईं जिनमें बादशाह की बीमारी ठीक होने तथा ईद पर शहर का चक्कर लगाने की सूचना दी। इन चिट्ठियों को पढ़कर शाहशुजा, औरंग़ज़ेब और मुरादबख्श ने अपने माथे पीट लिए। वे फिर से अपने लिए अच्छे दिनों की प्रतीक्षा करने लगे। शाहजहाँ के स्वस्थ होने का समाचार सुनकर महाराणा राजसिंह (Maharana Rajsingh) कुछ दिन के लिए शांत होकर बैठ गया।

शाहजहाँ (Shahjahan) यद्यपि पूर्ण स्वस्थ हो गया था फिर भी शरीर में पहले जैसी फुर्ती नहीं आ पाई थी। हकीमों ने उसे सलाह दी कि संभवतः दिल्ली की आबोहवा बादशाह के लिए मुफीद नहीं है। इसलिए बेहतर होगा कि बादशाह सलामत कुछ दिनों के लिए ठण्डी जगह पर जाकर रहें।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

आगरा का लाल किला (9)

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आगरा का लाल किला

शाहजहाँ (Shahjahan) दिल्ली छोड़कर आगरा चला गया! आगरा का लाल किला (Red Fort of Agra) उसने नहीं बनवाया था किंतु फिर भी आगरा और लाल किला दोनों ही उसे पसंद थे।

शाहजहाँ (Shahjahan) चाहता था कि जिस तरह उसके पिता जहाँगीर (Jahangir) ने अपनी वृद्धावस्था का अधिकांश समय काश्मीर में व्यतीत किया था, उसी तरह शाहजहाँ भी काश्मीर (Kashmir) में जाकर रहे किंतु शाहजहाँ यह भी जानता था कि यदि उसने दिल्ली या आगरा की जगह कहीं और जाकर प्रवास किया तो शहजादे उसी तरह बगावत पर उतर आएंगे जिस तरह शाहजहाँ स्वयं, अपने पिता जहाँगीर की बीमारी की सूचना पाकर दक्खिन का मोर्चा छोड़कर दिल्ली भाग आया था।

अकबर के समय से लेकर शाहजहाँ (Shahjahan) द्वारा दिल्ली में लाल किला (Red fort of Delhi) बनाए जाने तक आगरा ही मुगलों की मुख्य राजधानी रही थी। हालांकि अकबर आगरा के निकट फतेहपुर सीकरी (Fatehpur Sikari) के महलों में रहा करता था किंतु राजधानी तो उस समय भी आगरा ही थी।

शाहजहाँ ने अनुभव किया कि जब तक वह आगरा में अपनी राजधानी रखे हुए था, उसे सल्तनत सम्बन्धी मसलों में कोई विशेष कठिनाई नहीं हुई थी। अतः उसने स्वास्थ्य-लाभ करने एवं आबोहवा बदलने के लिए एक बार फिर आगरा जाने का विचार किया।

आगरा जाने का एक कारण और भी था। शाहजहाँ की चहेती बेगम मुमताज महल की कब्र (Tomb of Mumtaz Mahal) भी आगरा में थी जिसे मरे अब 26 साल हो चुके थे। आगरा में रहते हुए वह कुछ पलों के लिए मुमताज की कब्र के पास जाकर बैठ सकता था जहाँ मुमताज की रूह सोई पड़ी थी तथा कयामत होने का इंतजार कर रही थी।

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शाहजहाँ यह भी चाहता था कि जिस ताजमहल को उसने इतने चाव से बनवाया था तथा धरती भर में जिसकी बराबरी कोई दूसरी इमारत नहीं कर सकती थी, उस ताजमहल को भी वह कुछ समय के लिए ही सही अपनी आँखों से निहार कर तृप्ति का अनुभव करे।

आगरा से शाहजहाँ (Shahjahan) के बचपन की स्मृतियां भी जुड़ी हुई थीं। आगरा के लाल किले (Red Fort of Agra) में ही वह खेल-कूद कर बड़ा हुआ था। शाहजहाँ के बाबा अकबर ने लाल पत्थरों के इस विशाल दुर्ग का जीर्णोद्धार स्वयं खड़े रहकर अपनी आँखों के सामने करवाया था जिस पर हालांकि शाहजहाँ के पिता जहाँगीर (Jahangir) ने कोई विशेष ध्यान नहीं दिया था।

शाहजहाँ की ताजपोशी भी आगरा के लाल किले (Agra ka Lal Kila) में हुई थी तथा शाहजहाँ ने लाल पत्थरों के इस भव्य दुर्ग के भीतर सफेद संगमरमर की कई इमारतें बनाई थीं। एक बार फिर से शाहजहाँ उन्हीं इमारतों में जाकर रहना चाहता था। इन सब कारणों से आगरा का लाल किला शाहजहाँ को बुला रहा था।

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इन सब कारणों से शाहजहाँ (Shahjahan) ने अपनी राजधानी को एक बार फिर दिल्ली से आगरा ले जाने का निर्णय लिया और नजूमियों से अच्छा वक्त निश्चित करवाकर एक दिन वह अपने समस्त हरम के साथ, हाथियों और पालकियों पर बैठकर आगरा के लिए कूच कर गया। हालांकि वह नहीं जानता था कि आगरा का लाल किला ही उसके जीवन का अंतिम पड़ाव है। उसके हरम में रूप और यौवन के भार से लदी हुई न जाने कितने देशों की शहजादियाँ, राजकुमारियां और लौण्डियाएं भरी पड़ी थीं। वे भी अपनी-अपनी हैसियत के अनुसार हाथियों पालकियों, बग्घियों और बहलियों पर सवार होकर बड़े ठसके से लाल किले से बाहर निकलीं। यद्यपि उनके हाथियों के हौदों, पालकियों के झरोखों, बग्घियों तथा बहलियों को खूबसूरत झीने पर्दों से ढंक दिया गया था तथापि रूप के चौंधे दूर तक चमक मारते थे, जैसे रात की रानी बहुत दूर से अपनी उपस्थिति का अहसास करवाती है। नंगी तलवारें लिए तातारी और हब्शी जनाना सिपाही इन पालकियों के चारों ओर सर्पिणी सी फुंफकारती रहती थीं जिन्हें पड़दा बेगम कहा जाता था। राजपूत योद्धा इन्हें उड़दा बेगणियां कहा करते थे।

जब पूरा हरम हाथियों एवं पालकियों आदि पर सवार हो गया और मुँह पर पर्दा डाले एवं हाथ में नंगी तलवारें लिए तातारी और हब्शी जनाना सिपाहियों ने मुगलिया हरम (Mughal Harem) को चारों ओर से घेर लिया तब शाहजहाँ, शाही महल की ख्वाबगाह से बाहर निकला।

शाहजहाँ (Shahjahan) ने ख्वाबगाह की दीवारों पर देश-देश से लाकर सजाए गए मोती, माणक, हीरे, पन्ने, लाल, याकूत, गोमेद तथा चमकीले अकीकों पर अंतिम दृष्टि डाली, जाने क्यों उसे लग रहा था कि ये सब उसे अंतिम बार देखने को मिल रहे हैं। आज के बाद ये दृश्य हमेशा-हमेशा के लिए उसकी आंखों से दूर हो जाऐंगे।

ख्वाबगाह की छतों पर लटके विलायती झाड़-फानूसों और फर्श पर बिछे ईरानी गलीचों से विदा लेते हुए भी शाहजहाँ का मन कमजोर पड़ रहा था, शायद वे भी अब हमेशा के लिए उससे दूर होने जा रहे थे। इन्हीं फानूसों के नीचे और इन्हीं गलीचों के ऊपर शाहजहाँ ने जाने कितनी महफिलें सजाई थीं।

एक नजर उसने उन रंगीन शमादानों पर भी डाली जिनसे रौशनी और खुशबू की पिचकारियां सी छूटती रहती थीं। बूढ़ा शाहजहाँ (Shahjahan) चार कदम तेजी से चला और अपनी ख्वाबगाह से बाहर हो गया।

जब शाहजहाँ (Shahjahan) का हाथी, लाल किले के भीतर बसे शाहजहानाबाद से बाहर निकलने लगा तो शाहजहाँ ने बड़ी हसरत भरी दृष्टि से पीछे छूटते जा रहे बागीचों को देखा जिन्हें मुगल शहजादियों ने अपने हाथों से सजाया था और जिसके हाथों की मेहंदी की खूशबू आज भी इन बागीचों की मिट्टी में रची-बसी थी। जैसे-जैसे बादशाह का हाथी आगे बढ़ रहा था, दिल्ली का लाल किला पीछे छूटता जा रहा था और आगरा का लाल किला नजदीक आता जा रहा था।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

शाहजहाँ की बीमारी (10)

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शाहजहाँ की बीमारी

शाहजहाँ (Shahjahan) की बीमारी के समाचार लाल किले (Red Fort) की दीवारों से बाहर निकलकर पूरी सल्तनत में तेजी से फैलते जा रहे थे। ये खबरें मुगलियां शहजादों को तख्त पर कब्जा करने के लिए उकसाने वाली थीं।

शाहजहाँ (Shahjahan) ने न केवल पूरे हिन्दुस्तान पर मजबूती से नियंत्रण कर रखा था अपितु मारवाड़ (Marwar or Jodhpur), आम्बेर (Amber or Amer), बूंदी (Bundi) तथा किशनगढ़ (Kishangarh) के राजाओं के बल पर लगभग आधे मध्य एशिया पर भी नियंत्रण कर लिया था। फिर भी शाहजहाँ  अपने हरम को और अपने पुत्रों पर नियंत्रण नहीं रख सका था। जिस प्रकार वह अपनी उद्दाम वासनाओं पर नियंत्रण नहीं रख सका था, उसी प्रकार वह अपने शहजादों में बढ़ती दुश्मनी और शहजादियों में बढ़ती सत्ता की हवस पर भी नियंत्रण नहीं रख सका था।

शाहजहाँ (Shahjahan) की बीमारी की खबरें लाल किले (Red Fort) से बाहर निकलकर रियाया में फैल जाने से परिस्थितियां पूरी तरह शाहजहाँ के नियंत्रण से बाहर थीं और समय इतना आगे निकल गया था कि उसके किए कुछ भी ठीक होने वाला नहीं था। जाने क्यों उसे ऐसा लगता था कि अब वह घड़ी आने ही वाली है जब उसके शहजाद नंगी तलवारें लेकर एक दूसरे का खून बहाने के लिए निकल पड़ेंगे और उन सबकी लाशें धरती पर पड़ी होंगी।

बूढ़े शाहजहाँ की आंखों में रह-रह कर अपने भाइयों और चाचाओं के शव घूम जाते थे जिन्हें खुद शाहजहाँ ने मौत के मुंह में पहुंचाया था। ऐसी ही जाने कितनी ही भयावह बातें सोच-सोच कर बूढ़ा शाहजहाँ बार-बार बीमार पड़ जाता था। आगरा आकर वह फिर से बीमार पड़ गया। भरपूर इलाज के बावजूद उसकी बीमारी में दिन पर दिन वृद्धि होती जा रही थी।

पिछली बार के अनुभव के कारण इस बार शाहजहां (Shahjahan) ने झरोखा दर्शन देना बंद नहीं किया। चाहे बहुत थोड़ी देर के लिए ही सही बादशाह लाल किले (Red Fort) के झरोखे से रियाया के सामने जलवा अफरोज जरूर होता था।

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शाहजहाँ की बीमारी बढ़ती जा रही थी और एक दिन बादशाह के लिए शैय्या से उठकर खड़ा होना भी कठिन हो गया। उस दिन से उसने झरोखा दर्शन देना भी बंद कर दिया।

एक दिन उसने राजधानी में मौजूद अपने तमाम अमीरों, उमरावों, सूबेदारों, अहलकारों और हिन्दू सरदारों को बुलाकर कहा- ‘हमने पिछले पच्चीस साल से शहजादे दारा शुकोह (Dara Shikoh or Dara Shukoh) को वली-ए-अहद घोषित कर रखा है। हमारी तबियत नासाज रहती है तथा सल्तनत के बहुत से फैसले तुरंत लेने होते हैं। अतः आप सब आज से वली-ए-अहद शहजादे दारा को मुगलिया तख्त का अगला वारिस समझें तथा केवल उसके आदेश ही स्वीकार करें। सल्तनत का काम वैसे ही चलता रहे, जैसे आज तक चलता आया है।’

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दारा शिकोह को सल्तनत के सारे अधिकार दिए जाने की खबर आनन-फानन में न केवल लाल किले (Red Fort) में और राजधानी आगरा में अपितु पंख लगाकर पूरी सल्तन में फैल गई। जैसे ही बादशाह ने शहजादे दारा शिकोह (Dara Shikoh) को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया, उसके शेष तीनों शहजादों (Shah Shuja, Aurangzeb, Murad Bakhsh) और उनके पक्ष की शहजादियों (Jahanara Begum, Roshanara Begum, Gauharara Begum, Hoshmand Banu Begum, and Nithar Begum) के सब्र का बांध टूट गया और वे दारा शिकोह तथा जहाँआरा के खून के प्यासे हो उठे। आगरा के विशाल लाल किले (Red Fort) में अकेली जहाँआरा (Jahanara) ही ऐसी थी जिसे इस खबर को पाकर प्रसन्नता हुई थी। जिस प्रकार दारा शिकोह अपने पिता शाहजहाँ से थोड़ा-बहुत प्रेम करता था, उसी प्रकार शहजादी जहाँआरा भी अपने पिता शाहजहाँ (Shahjahan) से सहानुभूति रखती थी और केवल वही थी जो अपने पिता की मुश्किलों को समझती थी तथा उन्हें सुलझाने में अपने भाई दारा शिकोह की मदद करती थी। दारा शिकोह अपने पिता का सबसे बड़ा पुत्र था। वह योग्य, उदार, विनम्र तथा दयालु था। दारा की लाख कमजोरियों को जानने के बावजूद शाहजहाँ उसे सर्वाधिक चाहता था तथा उसे अपने पास ही रखता था। राजधानी में रहने के कारण दारा, सल्तनत की समस्याओं से अच्छी तरह परिचित था। उसे जितना अधिक प्रशासकीय अनुभव था, और किसी शहजादे को नहीं था। रियाया भी दारा शिकोह को चाहती थी।

यद्यपि उस काल में मुगल सल्तनत (Mughal Sultanate) में 95 प्रतिशत हिन्दू तथा 5 प्रतिशत मुसलमान थे तथापि रियाया से आशय केवल मुस्लिम जनसंख्या से होता था। यह बात मुस्लिम अमीरों को बहुत अखरती थी कि दारा शिकोह, मुस्लिम रियाया के साथ-साथ हिन्दुओं में भी बहुत लोकप्रिय था।

राजधानी में रहने के कारण दारा सल्तनत की समस्याओं से अच्छी तरह परिचित था। उसे जितना अधिक प्रशासकीय अनुभव था, और किसी शहजादे को नहीं था। दारा की सबसे बड़ी कमजोरी यह थी कि उसे दूसरे शहजादों की भांति युद्ध लड़ने का व्यापक अनुभव नहीं था। दारा के तीनों छोटे भाई एक दूसरे के खून के प्यासे होने के बाद भी दारा शिकोह को अपना पहला शत्रु मानते थे। क्योंकि तीनों शहजादों को उसी से सर्वाधिक खतरा था। वह बरसों से राजधानी दिल्ली में जमा हुआ था तथा उसने अमीरों के दिलों में भी जगह बना ली थी।

इसलिए लाल किले (Red Fort) में रहने वाला दारा शिकोह बाकी के तीनों शहजादों का सम्मलित शत्रु था। उनमें से प्रत्येक शहजादा यह चाहता था कि किसी तरह दारा शिकोह मर जाए शेष दो भाइयों से तो वह आसानी से निबट लेगा। ऐसा नहीं था कि दारा को अपने छोटे भाइयों और बहिनों के रवैये की जानकारी नहीं थी।

दारा कभी-कभी दबी जुबान से अपने पिता से उनकी शिकायत भी करता था किंतु शाहजहाँ की बीमारी शाहजहाँ (Shahjahan) को सही निर्णय नहीं लेने देती थी और पिता की इच्छा के बिना दारा किसी के भी खिलाफ कोई भी कार्यवाही करने में असमर्थ था। 

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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