Thursday, February 19, 2026
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राजतरंगिणी : कश्मीर का प्रामाणिक ऐतिहासिक ग्रंथ

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राजतरंगिणी

राजतरंगिणी कल्हण द्वारा रचित संस्कृत ग्रंथ है जो कश्मीर का प्रामाणिक इतिहास प्रस्तुत करता है। जानिए इसकी रचना, महत्व और साहित्यिक विशेषताएँ।

परिचय

भारतीय इतिहास में अनेक ग्रंथ अतीत की वास्तविक झलक दिखाते हैं। उनमें से ‘राजतरंगिणी’ (Rajatarangini) विशेष महत्व रखता है। इस आलेख में हम राजतरंगिणी के महत्व, कल्हण की लेखन शैली और इसके ऐतिहासिक साक्ष्यों का विस्तार से विश्लेषण करेंगे।

‘राजतरंगिणी’ का शाब्दिक अर्थ है— राजाओं की नदी’। जिस प्रकार एक नदी अपनी धाराओं के साथ निरंतर बहती है, उसी प्रकार कल्हण ने कश्मीर के राजाओं के उत्थान और पतन के इतिहास को एक प्रवाह में पिरोया है। इसकी रचना 1148-1150 ईस्वी के आसपास की गई थी।

राजतरंगिणी (Rajatarangini) भारतीय इतिहास लेखन की उस परंपरा का ग्रंथ है जहाँ ‘तथ्य’ और ‘तर्क’ को प्रधानता दी गई। संस्कृत भाषा में कल्हण द्वारा रचित यह ग्रंथ कश्मीर के गौरवशाली इतिहास का सबसे महत्वपूर्ण प्रमाण है। राजतरंगिणी को भारतीय इतिहास में पहला व्यवस्थित ऐतिहासिक ग्रंथ माना जाता है, जिसमें कश्मीर के राजाओं का क्रमबद्ध इतिहास प्रस्तुत किया गया है।

कल्हण: भारत के प्रथम वास्तविक इतिहासकार

कल्हण (kalhana) एक निष्पक्ष लेखक थे। उन्होंने स्पष्ट किया कि इतिहासकार को राग-द्वेष’ (पक्षपात) से मुक्त होना चाहिए। उन्होंने अपनी रचना में राजाओं की प्रशंसा तो की, किंतु उनकी गलतियों और अत्याचारों की आलोचना करने से भी वे पीछे नहीं हटे।

राजतरंगिणी: रचना काल और लेखक

  • लेखक: कल्हण, एक विद्वान कवि और इतिहासकार।
  • रचना काल: 1148 से 1150 ईस्वी के बीच।
  • भाषा: संस्कृत।
  • शैली: महाकाव्य (काव्यात्मक इतिहास)
  • संदर्भ सामग्री: कल्हण ने अपने ग्रंथ की रचना करते समय ग्यारह अन्य ग्रंथों का सहारा लिया, जिनमें से आज केवल नीलमत पुराण (Neelmat Puran) उपलब्ध है।
  • समय काल: महाभारत काल से लेकर 12वीं शताब्दी तक का इतिहास।

राजतरंगिणी की संरचना

  • यह ग्रंथ काव्य शैली में लिखा गया है।
  • इसमें कुल आठ तरंग (अध्याय) हैं।
  • प्रत्येक तरंग में कश्मीर के विभिन्न शासकों का विवरण क्रमबद्ध रूप से मिलता है।
  • राजतरंगिणी में कुल 7,826 श्लोक हैं।

ऐतिहासिक स्रोत

कल्हण ने इतिहास लिखने के लिए वैज्ञानिक पद्धति का उपयोग किया, जो आज के आधुनिक इतिहासकारों जैसी है:

  1. अभिलेख (Inscriptions): उन्होंने मंदिरों और ताम्रपत्रों पर खुदे लेखों का अध्ययन किया।
  2. सिक्के (Numismatics): तत्कालीन मुद्राओं के माध्यम से आर्थिक स्थिति का आकलन किया।
  3. पुराने दस्तावेज़: उनसे पहले के इतिहासकारों (जैसे नीलमत पुराण) के कार्यों की समीक्षा की।
  4. मौखिक परंपराएँ: लोककथाओं को तथ्यों की कसौटी पर परखा।

राजतरंगिणी के अध्याय

राजतरंगिणी के आठ अध्याय हैं जिन्हें तरंग कहा गया है। इन तरंगों की मुख्य विषय-वस्तु इस प्रकार से है-

  1. प्रथम तरंग: महाभारत काल से कश्मीर के इतिहास का आरंभ। इसमें पांडव वंश के राजकुमारसहदेव द्वारा राज्य स्थापना का उल्लेख है।
  2. द्वितीय तरंग: इसमें मुख्य रूप से गोनन्द वंश के पतन के बाद के राजाओं और एक नए राजवंश के उदय का वर्णन है।
  3. तृतीय तरंग : इसमें कलहण ने गोनन्द वंश (द्वितीय) को सिंहासन की पुनर्प्राप्ति और कुछ ऐसे राजाओं का वर्णन किया है जिनका चरित्र बहुत उदार और महान है। तृतीय तरंग की शुरुआत राजा मेघवाहन (Raja Megh Vahan)के शासनकाल से होती है।
  1. चतुर्थ तरंग: इस ग्रंथ का सबसे गौरवशाली और ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है। इसमें कश्मीर के सबसे शक्तिशाली राजवंश, कर्कोट वंश (Karkota Dynasty) का उदय और विस्तार वर्णित है। इस तरंग का मुख्य आकर्षण सम्राट ललितादित्य मुक्तापीड़ (Lalitaditya Muktapida ) का शासनकाल है, जिन्हें “कश्मीर का सिकंदर” भी कहा जाता है।
  2. पंचम तरंग : इसमें कर्कोट वंश के पतन के बाद उत्पल वंश (Utpala Dynasty) का उदय और राजा अवंतीवर्मन (Avantivarman ) के कल्याणकारी शासन का वर्णन है। यह अध्याय युद्धों के बजाय प्रशासनिक सुधारों और इंजीनियरिंग (अभियांत्रिकी) के चमत्कारों के लिए प्रसिद्ध है।
  3. षष्ठ तरंग: राजतरंगिणी की छठी तरंग इतिहास की दृष्टि से उतार-चढ़ाव भरी है। इस अध्याय का केंद्र बिंदु एक महिला का प्रभाव है—रानी दिद्दा (Rani Didda)। यह तरंग दिखाती है कि कैसे राजनीति में कूटनीति, क्रूरता और महत्वाकांक्षा का खेल चलता है।
  4. सप्तम तरंग: राजतरंगिणी की सप्तम तरंग (सातवीं तरंग) बहुत लंबी है और यह कश्मीर के इतिहास के एक बहुत ही उथल-पुथल भरे दौर को दर्शाती है। इसमें लोहार वंश (Lohar Dynasty) का विस्तार से वर्णन है, और इसका सबसे प्रमुख और विवादित पात्र है—राजा हर्ष
  5. अष्टम तरंग: कलहण अपनी इस महान कृति को राजा जयसिंह (Raja Jaisingh) के शासनकाल के 22वें वर्ष (लगभग 1149-50 ईस्वी) में समाप्त करते हैं।

ऐतिहासिक महत्व

  • राजतरंगिणी को भारतीय इतिहास का प्रथम प्रामाणिक ग्रंथ माना जाता है।
  • इसमें पौराणिक तत्वों के साथ-साथ तथ्यात्मक विवरण भी मिलता है।
  • कल्हण ने निष्पक्षता से घटनाओं का वर्णन किया है।
  • यह ग्रंथ न केवल कश्मीर अपितु समग्र भारतीय इतिहास के लिए महत्वपूर्ण स्रोत है।

साहित्यिक विशेषताएँ

  • काव्यात्मक शैली: संस्कृत श्लोकों में रचना।
  • नैतिक दृष्टिकोण: राजाओं के गुण-दोषों का निष्पक्ष वर्णन।
  • इतिहास और साहित्य का संगम: तथ्यात्मकता और काव्य सौंदर्य दोनों का समावेश।

राजतरंगिणी और आधुनिक इतिहासकार

  • आधुनिक इतिहासकारों ने राजतरंगिणी को कश्मीर का प्रामाणिक इतिहास माना है।
  • अनेक शोधकर्ताओं ने इसमें वर्णित घटनाओं का उपयोग किया है।
  • यह ग्रंथ आज भी कश्मीर अध्ययन (Kashmir Studies) का आधार है।

कश्मीर का ‘स्वर्ण युग’ और ललितादित्य मुक्तापीड़

  • राजतरंगिणी में ललितादित्य मुक्तापीड़ का वर्णन सबसे प्रभावशाली है। उसे कश्मीर का ‘सिकंदर’ कहा जाता है। उसने कन्नौज के राजा यशोवर्मन को पराजित किया और मध्य एशिया तक अपनी धाक जमाई। उसके द्वारा निर्मित मार्तंड सूर्य मंदिर आज भी उनके वैभव का साक्षी है।

राजतरंगिणी की प्रासंगिकता

राजतरंगिणी केवल राजाओं की वंशावली नहीं है, बल्कि यह उस समय के सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक ढाँचे का दर्पण है।

  • भ्रष्टाचार पर प्रहार: कल्हण ने ‘कायस्थों’ (नौकरशाहों) द्वारा जनता के शोषण का कड़ा विरोध किया है।
  • नारी शक्ति: इसमें सुगंधा और दिद्दा जैसी शक्तिशाली रानियों का वर्णन है, जो दिखाती हैं कि मध्यकालीन भारत में महिलाओं की राजनीतिक भूमिका कितनी महत्वपूर्ण थी।
  • भौगोलिक ज्ञान: वितस्ता (झेलम) नदी और कश्मीर की घाटियों का सटीक वर्णन इसे एक भौगोलिक ग्रंथ भी बनाता है।

निष्कर्ष

राजतरंगिणी भारतीय साहित्य की वह अनमोल धरोहर है जिसने इतिहास को ‘पुराण’ से अलग कर एक ‘विज्ञान’ के रूप में स्थापित किया। कल्हण की यह कृति हमें सिखाती है कि इतिहास केवल अतीत की घटनाओं का संग्रह नहीं है, अपितु यह वर्तमान के लिए एक सबक है। यदि आप कश्मीर के वास्तविक स्वरूप और भारतीय इतिहास की जड़ों को समझना चाहते हैं, तो राजतरंगिणी का अध्ययन अनिवार्य है। यह ग्रंथ आज भी इतिहासकारों और शोधकर्ताओं के लिए मार्गदर्शक है।

चित्तौड़ पर संकट देखकर शक्तिसिंह ने अकबर को त्याग दिया (78)

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चित्तौड़ पर संकट - www.bharatkaitihas.com
चित्तौड़ पर संकट

शक्तिसिंह (Shaktisingh) ने विचार किया कि मेरे, अकबर के पास आने से, सब लोग यही समझेंगे कि मैं ही अकबर (Akbar) को मेवाड़ पर चढ़ा लाया हूँ। इससे मेरी बड़ी बदनामी होगी। चित्तौड़ (Chittor) पर संकट देखकर शक्तिसिंह उसी रात बिना कोई सूचना दिए अकबर के शिविर से निकल गया और चित्तौड़ पहुंच गया।

अकबर चाहता था कि जिस प्रकार अन्य हिन्दू राजाओं ने अकबर की अधीनस्थ मित्रता स्वीकार कर ली है, उसी प्रकार चित्तौड़ का महाराणा उदयसिंह (Maharana Udaisingh) भी अकबर की सेवा में उपस्थित होकर अधीनता प्रकट करे तथा मुगलों के राज्य-विस्तार के लिए मुगलों के शत्रुओं से युद्ध करे किंतु महाराणा उदयसिंह चित्तौड़ पर संकट आया जानकर भी अकबर की अधीनता स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हुआ।

जब ई.1543 में 18 साल के महाराणा उदयसिंह को चित्तौड़ पर संकट देखकर चित्तौड़ दुर्ग की चाबियां शेरशाह सूरी को सौंपनी पड़ीं थीं, महाराणा उदयसिंह उसी समय समझ गया था कि चित्तौड़ को शक्तिशाली बनाने के लिए अरावली के घने पहाड़ों में नई राजधानियां बनानी होंगी। इसी उद्देदश्य से उसने उदयपुर नामक एक नवीन नगर की स्थापना की। यह नगर अरावली की विकट पहाड़ियों से घिरा हुआ था।

अरावली की पहाड़ियों में हजारों साल से, दूर-दूर तक भीलों की बस्तियां बसी हुई थीं। ये लोग पहाड़ियों की टेकरियों पर झौंपड़ियाँ तथा पड़वे बनाकर रहते थे और छोटे-छोटे तीर-कमान से बड़े-बड़े वन्य पशुओं का शिकार करते थे।

अपने शिकार के पीछे भागते हुए वे एक पहाड़ी से उतर कर, दूसरी पहाड़ी पर तेजी से दौड़ते हुए चढ़ जाते थे। भीलों में सैनिक संगठन जैसी व्यवस्था नहीं थी किंतु संकट के समय ये लोग मिलकर लड़ते थे। भील-योद्धा स्वाभाविक रूप से पहाड़ियों के दुर्गम मार्गों से परिचित होते थे।

इस कारण बड़ी से बड़ी शक्ति के लिये पहाड़ों में आकर भीलों से युद्ध करना, बहुत बड़े संकट को आमंत्रण देने जैसा था। इन भीलों से गुहिल शासकों के सम्बन्ध आरम्भ से ही अच्छे थे। महाराणा कुम्भा ने भीलों से अपनी मित्रता को और अधिक सुदृढ़ बनाया था। तब से भील, मेवाड़ राज्य के विश्वसनीय साथी बने हुए थे।

जब उदयसिंह महाराणा बना तो उसने शेरशाह सूरी तथा अपने राज्य की सीमाओं के दोनों तरफ मालवा तथा गुजरात जैसे प्रबल शत्रु-राज्यों की उपस्थिति के कारण भीलों के महत्त्व को और अधिक अच्छी तरह से समझा।

महाराणा उदयसिंह जानता था कि खानुआ के मैदान में अपनी तोपों के बल पर सांगा को पछाड़ने वाले मुगल, अथवा सुमेल के मैदान में मालदेव को पटकनी देने वाले अफगान, किसी भी दिन चित्तौड़ तक आ धमकेंगे और तब चित्तौड़ की कमजोर हो चुकी दीवारें मेवाड़ राज्य को सुरक्षा नहीं दे पायेंगी।

वैसे भी वह महाराणा उदयसिंह अपने बड़े भाई विक्रमादित्य के समय में चित्तौड़ दुर्ग की दुर्दशा अपनी आँखों से देख चुका था। इसलिये उसने अपनी राजधानी के लिये प्राकृतिक रूप से ऐसे सुरक्षित स्थान की खोज आरम्भ की जहाँ तक शत्रुओं की तोपें न पहुँच सकें।

महाराणा उदयसिंह की दृष्टि मेवाड़ राज्य के दक्षिण-पश्चिमी भाग पर गई। मेवाड़ राज्य का यह क्षेत्र विकट पहाड़ियों से घिरा हुआ था तथा बीच-बीच में उपजाऊ मैदान भी स्थित थे जिनमें खेती तथा पशुपालन बहुत अच्छी तरह से हो सकता था। यह पूरा क्षेत्र भील बस्तियों से भरा हुआ था और इस क्षेत्र में बड़ी-बड़ी झीलें एवं छोटी-छोटी नदियां स्थित थीं।

इन सब बातों को देखते हुए महाराणा उदयसिंह ने इस क्षेत्र में उदयपुर नगर की नींव डाली। उसने गिरवा तथा उसके आसपास के क्षेत्र में किसानों एवं अन्य जनता को लाकर बसाया और नई बस्तियां बनानी आरम्भ कीं।

शीघ्र ही इस क्षेत्र में बड़े भू-भाग पर खेती-बाड़ी एवं पशु-पालन आदि गतिविधियां होने लगीं। बढ़ई तथा लुहार आदि दस्तकार और छोटे-मोटे व्यापारी एवं व्यवसायी भी आकर बस गये।

महाराणा उदयसिंह के इस कार्य ने राजा और प्रजा के सम्बन्धों को भी नया आकार दिया जिससे परस्पर सहयोग, मैत्री एवं विश्वास का वातावरण बना और प्रजा अपने राजा को पहले से भी अधिक चाहने लगी।

इधर तो महाराणा उदयसिंह अकबर से लड़ने के लिए ये सब तैयारियां कर रहा था और उधर राजपूताने के अन्य हिन्दू राजाओं द्वारा मुगलों की अधीनता स्वीकार कर लेने से गुहिलों की शक्ति को भारी नुक्सान पहुंच रहा था।

जब भी मेवाड़ के महाराणा, खलीफा की सेनाओं से लड़ने के लिए रण में जाया करते थे तब उत्तर भारत के बहुत से हिन्दू राजा, महाराणा की सहायता के लिए अपनी सेनाएं लेकर आया करते थे।

यह परम्परा ई.1527 में हुए खानवा के (War of Khanwa) युद्ध तक बनी रही किंतु जब ई.1562 में आम्बेर के कच्छवाहों ने अपने घरेलू क्लेश से छुटकारा पाने के लिये, अकबर की अधीनता स्वीकार कर ली तो उन्होंने मेवाड़ के गुहिलों की सेवा त्याग दी।

कच्छवाहों के अनुकरण में जोधपुर एवं बीकानेर के राजाओं ने भी, गुहिलों की मित्रता छोड़कर, अकबर की अधीनता स्वीकार कर ली तथा अपने-अपने राज्यों को सुरक्षित बनाने का प्रयास किया। हिन्दू राजाओं की इस कार्यवाही से गुहिल, राजपूताने में अलग-थलग पड़ गये तथा उनकी शक्ति को बहुत नुक्सान हुआ।

अबुल फजल (ABUL FAZAL) ने अकबरनामा (AKBARNAMA) में तथा विंसेंट स्म्थि ने अकबर दी ग्रेट मुगल में लिखा है कि ई.1567 में मालवा का सुल्तान बाजबहादुर अर्थात् बायजीद, अकबर के सेनापति अब्दुलाह खाँ के भय से, मालवा छोड़कर, महाराणा उदयसिंह की शरण में आया। उदयसिंह ने उसे अपने पास रख लिया। इस पर अकबर बहुत क्रुद्ध हुआ और स्वयं सेना लेकर चित्तौड़ की ओर बढ़ा।

गौरी शंकर हीराचंद ओझा ने लिखा है कि राणा उदयसिंह का पुत्र शक्तिसिंह अपने पिता से नाराज होकर अकबर की सेवा में उपस्थित हुआ। अकबर उस समय धौलपुर में शिविर लगाए पड़ा था।

अकबर ने कुंवर शक्तिसिंह से कहा- ‘बड़े-बड़े जमींदार मेरे अधीन हो चुके हैं, केवल राणा उदयसिंह अभी तक नहीं हुआ। अतः मैं उस पर चढ़ाई करने वाला हूँ। क्या तुम इस कार्य में मेरी सहायता करोगे?’

इस पर शक्तिसिंह ने विचार किया कि मेरे, अकबर के पास आने से, सब लोग यही समझेंगे कि मैं ही अकबर को मेवाड़ पर चढ़ा लाया हूँ। इससे मेरी बड़ी बदनामी होगी। इसलिए शक्तिसिंह उसी रात बिना कोई सूचना दिए अकबर के शिविर से निकल गया और चित्तौड़ पहुंच गया।

यह समाचार पाकर अकबर बड़ा क्रुद्ध हुआ और उसने चित्तौड़ पर तत्काल आक्रमण करने का निश्चय किया।

सितम्बर 1567 में अकबर चित्तौड़ की ओर रवाना हुआ और सिवीसपुर अर्थात् शिवपुर और कोटा के किलों पर अधिकार करता हुआ गागरौन पहुंचा। अकबर ने आसफ खाँ तथा वजीर खाँ को माण्डलगढ़ पर हमला करने के लिए भेजा जो कि महाराणा के मजबूत किलों में से एक था।

उन दिनों बल्लू सोलंकी माण्डलगढ़ का किलेदार था। आसफ खाँ और वजीर खाँ ने उसे हराकर माण्डलगढ़ पर अधिकार कर लिया। अकबर ने मालवा के लिए भी एक सेना रवाना की तथा स्वयं चित्तौड़ की तरफ बढ़ने लगा। इस पर महाराणा उदयसिंह ने अपने सरदारों को चित्तौड़ की रक्षा के लिये बुलाया।

चित्तौड़ पर संकट देखकर मेड़ता का निर्वासित शासक जयमल वीरमदेवोत, रावत सांईदास चूंडावत, ईसरदास चौहान, राव बल्लू सोलंकी, डोडिया सांडा, राव संग्रामसिंह, रावत साहिबखान, रावत पत्ता, रावत नेतसी आदि कई सरदार अपनी सेनाएं लेकर चित्तौड़ आ गये।

✍️ – डॉ. मोहनलाल गुप्ता की पुस्तक तीसरा मुगल जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर (Teesra Mughal Jalaluddin Muhammad Akbar) से।

अकबर का चित्तौड़ आक्रमण: 1567 का ऐतिहासिक घेरा (79)

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अकबर का चित्तौड़ आक्रमण

जब ईस्वी 1567 में अकबर का चित्तौड़ आक्रमण हुआ तो मेवाड़ी सामंतों ने अकबर को चित्तौड़ से दूर भेजने के लिए चाल चली! इस योजना में महाराणा उदयसिंह की कोई सहमति नहीं ली गई।

अकबर का चित्तौड़ आक्रमण (Akbar’s invasion of Chittorgarh) तब शुरू हुआ जब अकबर ने चित्तौड़ पर आरोप लगाया कि उसने अकबर के शत्रु बाजबहादुर को शरण देकर शाही मंशा के विरुद्ध कार्य किया है और अकबर एक सेना लेकर चित्तौड़ के लिए चल पड़ा। 20 अक्टूबर 1567 को अकबर ने चित्तौड़ से दस मील उत्तर-पूर्व में अपनी छावनी डाली। उस समय चित्तौड़ की राजनीतिक एवं सामरिक शक्ति अत्यंत विपन्नावस्था में थी।

 फिर भी महाराणा उदयसिंह (Maharana Udaisingh) ने अकबर का सामना करने का निश्चय किया। गौरीशंकर हीराचंद ओझा ने लिखा है कि कुंवर शक्ति सिंह ने अकबर के धौलपुर शिविर से लौटकर महाराणा उदयसिंह को सूचित किया कि अकबर चित्तौड़ पर आक्रमण करने आ रहा है। इस पर सब सरदार बुलाए गए। महाराणा की सेवा के लिए आने वाले प्रमुख सरदारों की सूची हम पिछले आलेख में दे चुके हैं।

मेवाड़ी सरदारों ने महाराणा उदयसिंह को सलाह दी कि दिल्ली, आगरा, गुजरात एवं मालवा से लड़ते-लड़ते मेवाड़ कमजोर हो चुका है। इसलिये महाराणा को अपने परिवार सहित घने पहाड़ों में चले जाना चाहिये। इस पर महाराणा उदयसिंह, मेड़ता के शासक जयमल राठौड़ और उसके बहनोई सिसोदिया पत्ता (Sisodia Patta) को चित्तौड़ दुर्ग की सुरक्षा का भार सौंपकर, रावत नेतसी आदि कुछ सरदारों सहित मेवाड़ के पहाड़ों में चला गया।

अकबर का चित्तौड़ आक्रमण रोकने के लिए ओझाजी ने लिखा है कि जयमल (Jaimal Rathore) के नेतृत्व में 8000 हिन्दू सैनिक चित्तौड़ दुर्ग की रक्षा के लिए मरने-मारने को तैयार हो गए। अबुल फजल ने हिन्दू सैनिकों की संख्या 5000 लिखी है। वह लिखता है कि राणा के सिपाहियों ने दुर्ग के आसपास के प्रदेश को नष्ट-भ्रष्ट कर दिया जिससे खेतों में घास का एक तिनका भी नहीं रहा।

अक्टूबर 1567 में अकबर ने चित्तौड़ दुर्ग के निकट पड़ाव डाला। अकबर ने अपने सेनापति बख्सीस को घेरा डालने का काम सौंपा। चित्तौड़ दुर्ग इतना विशाल था कि मुगल सेना को उसे हर ओर से घेरने में एक महीने का समय लग गया। जब यह घेरा डालने की कार्यवाही चल रही थी, तब अकबर ने आसफ खाँ को रामपुर के किले पर भेजा। यह दुर्ग मेवाड़ राज्य में ही स्थित था।

आसफ खाँ (Asaf Khan) रामपुर के किले (Rampur Fort) को जीतकर अकबर के पास लौट आया। अकबर को ज्ञात हुआ कि महाराणा उदयसिंह चित्तौड़ दुर्ग में नहीं है। वह या तो कुंभलमेर की तरफ गया है या फिर उदयपुर की तरफ गया है। इस पर अकबर ने एक-एक सेना दोनों स्थानों के लिए रवाना की।

हुसैन कुली खाँ (Husain Kuli Khan) को उदयपुर की तरफ भेजा गया था। वह कई महीनों तक महाराणा को उदयपुर एवं उसके आसपास की पहाड़ियों में ढूंढता रहा किंतु वह महाराणा को नहीं ढूंढ सका। हुसैन कुली खाँ को जहाँ भी पहाड़ियों में इक्का-दुक्का आदमी मिलते, वह उनसे महाराणा उदयसिंह के बारे में पूछता किंतु उसे किसी ने नहीं बताया कि महाराणा अपने परिवार के साथ कहाँ निवास कर रहा है।

हुसैन कुली खाँ के सैनिक उन लोगों का सामान लूट लेते, उनकी झौंपड़ियों में आग लगा देते और उन्हें मार देते। अंत में हुसैन कुली खाँ निराश होकर अकबर के पास लौट गया। अकबर का चित्तौड़ आक्रमण जारी था और उधर जब अकबर की सेनाएं महाराणा उदयसिंह को अरावली की पहाड़ियों में ढूंढ रही थीं, इधर अकबर भी चैन से नहीं बैठा था। अबुल फजल ने लिखा है कि अकबर ने खाने आलम तथा आदिल खाँ से दुर्ग पर आक्रमण करवाया किंतु वे विफल होकर लौट आए तथा उन्होंने अकबर से कहा कि इसमें जल्दबाजी की गई थी।

जयमल राठौड़ के सैनिक दुर्ग की प्राचीर से अकबर की सेना पर तीर, पत्थर, जलता हुआ तेल और जलते हुए कपड़े फैंकते थे जिसके कारण अकबर के सैनिकों की हिम्मत दुर्ग के निकट जाने की नहीं होती थी। अकबर के साथ कुछ हिन्दू राजाओं की सेनाएं भी थीं। विचित्र दृश्य था, कल तक आम्बेर के कच्छवाहे तथा अन्य हिन्दू राजा चित्तौड़ की रक्षा करने में अपना गर्व समझते थे, आज वे अकबर की चाकरी स्वीकार करके चित्तौड़ का मानभंजन करने को तलवारें निकालकर खड़े थे।

मेड़ता के राठौड़ अब भी गुहिलों के कंधे से कंधा लगाकर चित्तौड़ के रक्षक बने हुए थे। मुट्ठी भर चौहान, सोलंकी, डोडिया और झाला भी चित्तौड़ के लिये मरने-मारने को तैयार थे। भले ही चित्तौड़ के रक्षक थोड़े से थे किंतु इनके सामने अकबर का चित्तौड़ आक्रमण सफल होना या अकबर की दाल गलनी कठिन थी।

अबुल फजल ने लिखा है कि दुर्ग के चारों ओर तोपें लगाई गईं। इन तोपों के लिए तीन बड़े मंच भी बनाए गए। तोपों का एक मंच लाकूटा दरवाजे के सामने था जिसे लाखोटा बारी (Lakhota Bari) भी कहा जाता था। यह मोर्चा स्वयं अकबर के अधीन था। हसन खाँ, चगताई खाँ, राय पत्तर दास, काजी अली बगदादी, इख्तियार खाँ फौजदार और काबिर खाँ को इसी मंच पर तैनात किया गया। उधर किलेदार जयमल राठौड़ (Jaimal Rathore) भी अकबर की समस्त गतिविधियों पर दृष्टि रख रहा था। जब उसे ज्ञात हुआ कि अकबर ने लाखोटा बारी पर मोर्चा जमाया है तो जयमल ने भी किले के भीतर लाखोटा बारी पर मोर्चो जमाया।

दुर्ग के बाहर दूसरा मोर्चा पूर्व की तरफ सूरजपोल के सामने राजा टोडरमल ने जमाया। इस मोर्चे पर शुजात खाँ, मीर बर्रू-बहर तथा कासिम खाँ को तोपखाने के साथ तैनात किया गया। इस मंच को बरसात से बचाने के लिए एक ढका हुआ मार्ग बनाया गया जिसकी लम्बाई एक बाण की मार तक थी। इस मोर्चे के सामने किले के भीतर रावत सांईदास चूंडावत को नियुक्त किया गया।

तीसरे मोर्चे पर जो किले के दक्षिण की तरफ चित्तौड़ी बुर्ज के सामने था, ख्वाजा अब्दुल मजीद असद खाँ आदि कई अमीरों को नियुक्त किया गया। इस मोर्चे के लिए एक भारी तोप ढाली गई जो आधा मन का गोला फैंक सकती थी। इस मोर्चे के सामने किले के भीतर बल्लू सोलंकी को नियुक्त किया गया। एक दिन दुर्ग के सरदारों ने रावत साहिबखान चौहान और डोडिया के ठाकुर सांडा को अकबर के पास भेजकर कहलवाया कि हम वार्षिक कर दिया करेंगे और आपकी अधीनता स्वीकार करते हैं। अनेक मुगल अमीरों ने अकबर से कहा कि वह यह संधि स्वीकार कर ले किंतु अकबर को इसमें मेवाड़ी सरदारों की कोई चाल दिखाई दी।

अकबर समझ गया कि मेवाड़ी सामंतों के इस प्रस्ताव में महाराणा की कोई सहमति नहीं है। यह तो मेवाड़ी सरदारों ने अकबर को चित्तौड़ से दूर भेजने के लिए कोई चाल चली है। इसलिए अकबर का चित्तौड़ आक्रमण और तेज हो गया और अकबर ने कहा कि यदि राणा स्वयं उपस्थित होकर यह बात कहे तो मैं संधि करने को तैयार हूँ। अकबर की इस शर्त के सामने आने के बाद राजपूतों ने संधि की बात बंद कर दी और पूरे उत्साह के साथ युद्ध करने के लिए तैयार हो गए।

✍️ – डॉ. मोहनलाल गुप्ता की पुस्तक तीसरा मुगल जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर (Teesra Mughal Jalaluddin Muhammad Akbar) से।

चित्तौड़ दुर्ग की घेराबंदी: सुरंग विस्फोट और राजपूतों का शौर्य (80)

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चित्तौड़ दुर्ग की घेराबंदी

चित्तौड़ दुर्ग की घेराबंदी के दौरान पचास कोस दूर तक सुनाई दिया चित्तौड़ दुर्ग की दीवार उड़ने का धमाका!

चित्तौड़ दुर्ग की घेराबंदी (Siege of Chittorgarh Fort) के दौरान जब अकबर (Akbar) के सेनापति खानेआलम तथा आदिल खाँ चित्तौड़ दुर्ग की दीवारों तक पहुंचने में विफल रहे तब अकबर ने दुर्ग की दीवारों तक कुछ सुरंगों एवं साबातों का निर्माण करवाने का विचार किया जिनमें से होकर अकबर के सैनिक दुर्ग की दीवारों तक पहुंच सकते थे।

अकबर ने लाखोटा बारी से उस पहाड़ी तक एक सुरंग खुदवानी आरम्भ की जिस पहाड़ी पर चित्तौड़ का किला खड़ा था। शीघ्र ही राजपूत सैनिकों को अकबर की इस चालाकी का पता चल गया और वे सुरंग खोदने वालों पर किले से पत्थर और तीर फैंकने लगे। इस पर कुछ और सुरंगें खुदवानी आरम्भ की गईं ताकि कुछ सुरंगें दुर्ग के सैनिकों की चपेट में आने से बच सकें।

चित्तौड़ दुर्ग की घेराबंदी का यह दृश्य तब और भीषण हो गया जब जिस मोर्चे पर राजा टोडरमल नियुक्त था, उस मोर्चे से लेकर दुर्ग की पहाड़ी तक एक साबात बनवानी आरम्भ की गई। साबात उस कृत्रिम छत अथवा कृत्रिम गुफा को कहते थे जिसके नीचे से होकर सेना अपने शत्रुओं के तीरों एवं हथियारों से बचती हुई निर्धारित बिंदु तक पहुंच जाती थी। साबात बनने के समय भी राजपूत सैनिक अवसर पाकर मुगल सैनिकों एवं कारीगरों पर हमले करते रहे।

तारीखे अल्फी (Tarikh-i-Alfi) के अनुसार जब साबात बन रहे थे, तब राणा के सात-आठ हजार सवार और कई गोलंदाजों ने उन पर हमला किया। कारीगरों के बचाव के लिए गाय-भैंस के मोटे चमड़े की छावन थी। तो भी वे इतनी संख्या में मरे कि ईंट-पत्थर की तरह लाशें चुनी गईं। राजपूताना की रियासतों का इतिहास लिखने वाले सुप्रसिद्ध इतिहासकार गौरीशंकर हीराचंद ओझा ने लिखा है कि चित्तौड़ के किले (Chittor Fort) में कई चतुर तोपची थे जो सुरंग खोदने वालों और साबात बनाने वाले मुस्लिम सैनिकों को पत्थर एवं गोले फैंककर मार देते थे।

अबुल फजल लिखता है कि साबात की रक्षा करने वाले लगभग 200 सैनिक प्रतिदिन मारे जाते थे। फिर भी दिन-दिन साबात आगे बढ़ाए जाते तथा सुरंगें खोदी जाती थीं। मेवाड़ी सैनिक साबातों को तोड़ डालते थे। इसलिये जगह-जगह मोर्चे रखकर तोपखाने से साबात की रक्षा की गई। अकबर की सेना ने साबात बनाने वाले कारीगरों के बचाव के लिये गाय-भैंस के मोटे चमड़े की छावन लगाई।

बदायूंनी (Mulla Badayuni) ने लिखा है कि मारे गए सैनिकों एवं मजदूरों के शरीर ईंटों एवं पत्थरों की जगह काम में लिए गए। बदायूंनी लिखता है कि साबात की चौड़ाई इतनी अधिक थी कि इसके नीचे दस घुड़सवार एक साथ चल सकते थे और ऊंचाई इतनी थी कि हाथी पर हाथ में भाला लिए बैठा आदमी आसानी से गुजर सकता था। बादशाह ने सुरंग और साबात बनाने वालों को जी खोलकर रुपया दिया। अबुल फजल ने लिखा है कि मजदूरों को चांदी और सोना मिट्टी की भांति दिया जाता था।

चित्तौड़ दुर्ग की घेराबंदी के इस दौर में अकबर के सैनिकों ने साबात के दोनों ओर मिट्टी की इतनी चौड़ी दीवार बना दी थी कि तोप के गोले उसमें प्रवेश नहीं कर सकते थे। किसी तरह से दो सुरंगें किले की तलहटी तक पहुंच गईं। एक सुरंग में 120 मन और दूसरी सुरंग में 80 मन बारूद भरी गई। 17 दिसम्बर 1567 को लाखोटा बारी की तरफ एक सुरंग उड़ाई गई जिससे 50 राजपूत सैनिकों सहित किले की एक बुर्ज उड़ गई।

लाखोटाबारी (Lakhotabari) का दरवाजा नींव से उखड़ गया। इस दरार से होकर शाही फौज किले में घुसने लगी। इतने में अचानक दूसरी सुरंग भी उड़ गई जिससे शाही फौज के 200 सिपाही मारे गये। लगभग चालीस सिपाही पास की खाई में छिपे हुए थे वे भी मिट्टी एवं ईंटों में दब कर मर गए।

अबुल फजल तथा मुल्ला बदायूंनी दोनों ने लिखा है कि दो सुरंगें पास-पास खोदी गईं थीं तथा इनमें बारूद भर दिया गया था। सेना की एक टुकड़ी पूरी तरह हथियार बंद एवं साजो-सामान सहित, सुरंगों की ओर चली गई और सुरंग के फटने की प्रतीक्षा करने लगी ताकि दुर्ग की दीवार गिरते ही वे दुर्ग में घुस जाएं।

अबुल फजल (Abul Fazal) लिखता है कि दोनों सुरंगों में आग लगाने के लिए एक ही बत्ती बनाई गई थी किंतु मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूंनी लिखता है कि दोनों सुरंगों की बत्तियों में एक ही समय में आग लगाई गई थी किंतु एक की बत्ती जो दूसरी से छोटी थी, पहले फट गई और उसने जमीन को उछाल दिया। दुर्घटना यह हुई कि लम्बी बत्ती से दूसरी सुरंग देर से विस्फोटित हुई। पहली सुरंग के फटने पर, टूटी दीवार में बने रास्ते से बेसब्री से प्रतीक्षा कर रही एक टुकड़ी आगे बढ़ गई। उसने इस बात की परवाह नहीं की कि अभी दूसरी सुरंग फटी नहीं है और फटने वाली है।

मुल्ला लिखता है- ‘जब पहली सुरंग के फटने पर आमने-सामने की लड़ाई शुरु हो गई तब अचानक ही दूसरी सुरंग सुलगी और फट पड़ी जो कि पूरी तरह बारूद से भरी हुई थी। दोस्त और दुश्मन दोनों ही हवा में उछाल दिए गए। इस्लाम के फौजी (अकबर के सैनिक) सौ मन और दो सौ मन भारी पत्थरों के तले दब गए। पत्थर-दिल काफिर (महाराणा के सैनिक) भी उसी प्रकार उछल गए जैसे आग के दरिया में पतंगे। विस्फोट के पत्थर तीन-चार कोस की दूरी तक उछल गए और एक जोर की चीख ईस्लाम के सैनिकों तथा काफिरों दोनों ओर से हुई।

रक्त की एक धारा जन्नत से जहन्नुम की ओर बही। हालांकि ग्रेबे का और इस्लाम के विश्वासियों का खून एक ही जगह बहा। कौवों और गिद्धों के लिए खुशी का दिन था। अल्लाह की रहमत कि कौओं और गिद्धों को खाना मिला। अचानक फटने वाली सुरंग के धमाके में शहंशाह के व्यक्तिगत परिचय वाले करीब पांच सौ योद्धा काट दिए गए। उन्होंने शहादत का जाम पिया और काफिरों के कितने सैनिक काटे गए, कौन कह सकता है!

चित्तौड़ दुर्ग की घेराबंदी को विफल करने हेतु चित्तौड़ के सैनिकों ने रात भर उस टूटी दीवार को बनाने का काम किया जो उन सुरंगों के फटने से टूट चुकी थी। चित्तौड़ दुर्ग की दीवार के साथ-साथ दुर्ग की एक बुर्ज भी इस धमाके की चपेट में आने से गिर गई।’

गौरीशंकर हीराचंद ओझा (Gouri Shankar Hira Chand Ojha) ने लिखा है कि सुरंग के इस विस्फोट का धड़ाका 50 कोस दूर तक सुनाई दिया। निश्चित रूप से यह हिन्दू सैनिकों के लिए परीक्षा की घड़ी थी किंतु किले के भीतर के वीरों ने बिना कोई समय गंवाए दुर्ग की दीवार एवं बुर्ज, फिर से बना ली। उसी दिन आसफ खाँ ने बीका खोह और मोर मगरी की तरफ तीसरी सुरंग उड़ाई, जिससे अकबर की तरफ के 30 आदमी और मारे गए। अबुल फजल के अनुसार ये 30 आदमी दुर्ग की रक्षा करने वालों में से थे। कतिपय समकालीन इतिहासकारों ने लिखा है कि अकबर भी इस धड़ाके की चपेट में आ गया किंतु वह बाल-बाल बच गया।

✍️ – डॉ. मोहनलाल गुप्ता की पुस्तक तीसरा मुगल जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर (Teesra Mughal Jalaluddin Muhammad Akbar) से।

जयमल राठौड़ का क्रोधित चेहरा देख लिया आखिर मुगलों ने  (81)

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जयमल राठौड़ का क्रोधित चेहरा देख लिया आखिर मुगलों ने

अबुल फजल ने लिखा है कि जब दुर्ग में जौहर की ज्वालाएं (Flames of Jouhar) दिखाई दीं तो पता लग गया कि अकबर की गोली से दुर्गपति जयमल राठौड़ मारा गया था। हालांकि अबुल फजल (Abul Fazal) ने यह सूचना गलत दी है कि अकबर की गोली से जयमल की मृत्यु हो गई थी। अकबर की बंदूक से चली गोली दुर्गपति जयमल राठौड़ के पैर में लगी थी जिससे जयमल लंगड़ा हो गया था।

जब अकबर (AKBAR) के सैनिकों द्वारा बनाई गई दो सुरंगों में भरे हुए बारूद को पलीता दिखाया गया तो एक सुरंग तो समय पर फटी किंतु दूसरी सुरंग कुछ देर से फटी जिसकी चपेट में आकर न केवल दुर्ग की दीवार पर खड़े चित्तौड़ी सैनिक अपितु दुर्ग के बाहर खड़े अकबर के सैनिक भी मारे गए।

 कुछ सैनिक मिट्टी एवं पत्थरों के नीचे दबकर मर गए। यहाँ तक कि स्वयं अकबर भी मरते-मरते बचा। इस दौरान चित्तौड़ दुर्ग के भीतर से भारी गोलीबारी की जा रही थी। अकबर भी वहाँ खड़े रहकर समस्त कार्यवाही का संचालन कर रहा था।

इस दौरान एक गोली अकबर के ठीक पास खड़े एक आदमी को आकर लगी जिससे उस आदमी की तुरंत मृत्यु हो गई किंतु अकबर बाल-बाल बच गया। गौरीशंकर हीराचंद ओझा ने लिखा है कि इस युद्ध में अकबर कई बार मरते-मरते बचा।

अबुल फजल (ABUL FAZAL) लिखता है कि इन सुरंगों के फटने से अकबर के पक्ष को हुई क्षति के कारण दुर्गरक्षकों में तो हर्ष और जोश था किंतु अकबर शांत और गंभीर था। उसने सोचा कि यह काम बिना योजना के किया गया है और जोशीले लोगों ने जल्दबाजी की है।

सुरंगों के फटने से गिरी चित्तौड़ दुर्ग (Chittor Fort) की दीवार को राजपूतों द्वारा वापस बना लिए जाने से अकबर की सेना दुर्ग में प्रवेश नहीं कर सकी और अकबर की यह योजना विफल हो गई।

इस पर अकबर साबात बनवाने में व्यस्त हो गया। वह समझता था कि दुर्ग को छीन लेने का यही सर्वोत्तम उपाय है। वह साबात के निर्माण कार्य को देखता और दुर्ग के समीप जाकर दुर्गरक्षकों पर गोलियां चलाया करता था।

अबुल फजल ने लिखा है कि राजा टोडरमल और कासिम खाँ मीर की देख-रेख में एक साबात बनकर तैयार हो गया। अबुल फजल ने लिखा है कि साबात के ऊपर भी कोठड़ियां बनाई गईं।

स्वयं अकबर भी दो रात और एक दिन एक कोठड़ी में रहा था। दुर्ग में घिरे हुए लोग भी वीरतापूर्वक लड़े। अकबर साबात पर बैठा वीरों के काम देख रहा था। जब यह साबात बन गया तब इस साबात के नीचे से होकर अकबर की सेनाएं चित्तौड़ दुर्ग की दीवार तक पहुंच गईं।

दो रात और एक दिन तक दोनों सेनाएं लड़ाई में इस तरह लगी रहीं कि खाना-पीना भी भूल गईं। इन दो रातों और एक दिन में वीर लोगों ने न भोजन किया न नींद ली, इससे दोनों पक्ष थक गए।

शाही फौज ने कई जगह से किले की दीवार तोड़ डाली परन्तु राजपूतों ने उन स्थानों पर तेल, रुई, कपड़ा, बारूद आदि जलाकर शत्रु को भीतर आने से रोका।

एक दिन अकबर लाखोटा बारी वाले तोप-मंच पर आया। उसने देखा कि उसके योद्धा, दुर्ग के घेरे पर तैनात हैं तथा दुर्ग की प्राचीर पर खड़े हुए दुर्ग-रक्षकों पर गोलियां चला रहे हैं।

अकबर ने भी रन्ध्रों की आड़ में से दुर्ग-रक्षकों पर गोलियां चलाईं। जहाँ से अकबर गोलियां चला रहा था, उससे थोड़ी दूर पर अकबर का सेनापति जलाल खाँ खड़ा हुआ दुर्ग-रक्षकों पर निशाने लगा रहा था। अचानक दुर्ग में से किसी बंदूकची ने गोली चलाई जो अकबर के सेनापति जलाल खाँ को आकर लगी।

जलाल खाँ घायल हो गया किंतु मरा नहीं। जलाल खाँ को गोली लगने से अकबर बुरी तरह से बौखला गया। उसने कहा कि मैं अवश्य ही इस बंदूकची को मारकर जलाल खाँ का बदला लूंगा। इसके बाद अकबर ने एक रंध्र की आड़ में से गोली चलाई जिससे दुर्ग की प्राचीर पर खड़ा हुआ निशानची उसी समय मारा गया।

बाद में ज्ञात हुआ कि उस निशानची का नाम इस्माइल था। वह मेवाड़ की तरफ से लड़ रहे अफगान बंदूकचियों का अफसर था।

अबुल फजल लिखता है कि बादशाह के हाथ से इस प्रकार जाने कितने ही सैनिक मारे गए। यह बताना समीचीन होगा कि सूरी सल्तनत के पतन के बाद अफगान सेनाओं के बहुत से तोपची एवं बंदूकची उन हिन्दू राज्यों में चले आए थे जिनका मुगलों से संघर्ष चल रहा था। इस्माइल भी उन्हीं में से एक था।

अकबर (AKBAR) के दरबारी लेखक अबुल फजल (ABUL FAZAL) ने लिखा है कि एक दिन अकबर चित्तौड़ी बुर्ज के पास वाले मंच पर आया। वह धीरे-धीरे एक स्थान की ओर जा रहा था जहाँ पर गोलियों और गोलों की वर्षा हो रही थी। उसके मन में किसी प्रकार का भय नहीं था। एकाएक तोप का एक बड़ा गोला उसके पास आकर गिरा जिससे अकबर के बीस सैनिक मारे गए।

 दूसरे दिन खानेआलम को एक गोली लगी। वह अकबर (AKBAR) के पास ही खड़ा हुआ था। गोली खाने आलम के कवच में चली गई परंतु अंदर जाते-जाते ठण्डी हो गई। एक दिन मुजफ्फर खाँ को भी गोली लगी परंतु उसकी कोई क्षति नहीं हुई।

एक रात को मुगल सेना द्वारा दुर्ग पर सब ओर से आक्रमण किया गया और प्राचीर को स्थान-स्थान पर तोड़ दिया गया। यह प्रत्यक्ष दिखाई दे रहा था कि दुर्ग नष्ट होने वाला है। साबात के पास विजयी सेना आगे बढ़ रही थी। आधी रात को दुर्गरक्षक टूटी हुई प्राचीर के पास आए।

उस समय हुए संघर्ष में कुछ लोग तो मारे गए और दूसरे लोगों ने टूटी हुई प्राचीर में मखमल, रुई, लकड़ियां और तेल भर दिया। जब मुगल आक्रमण करते तो राजपूत इस सामग्री में आग लगा देते जिससे मुगल सैनिक दुर्ग में प्रवेश नहीं कर पा रहे थे।

उसी समय अकबर ने देखा कि एक राजपूत सरदार दीवार की मरम्मत कराने के लिये हाथ में मशाल लेकर इधर-उधर घूम रहा है। अबुल फजल लिखता है कि उसके कवच में हजार मेखें थीं जो उसके उच्च अधिकारी होने का संकेत दे रही थीं परंतु अकबर नहीं जानता था कि वह कौन है। अकबर ने अपनी संग्राम नामक बंदूक से उस पर गोली चलाई।

अबुल फजल ने लिखा है कि पहले शुजात खाँ ने और बाद में राजा भगवंतदास (Raja Bhagwant Das) ने आकर अकबर (AKBAR) से कहा कि ऐसा मालूम होता है कि उस आदमी को गोली लग गई है।

 खानेजहाँ (Khane Jahanने कहा कि यह व्यक्ति रात भर वहीं था और प्राचीर की मरम्मत करवा रहा था। अब वह दुबारा नहीं आए तो मान लेना चाहिए कि वह मारा गया। थोड़ी ही देर में जब्बार अली दीवाना ने आकर बादशाह को सूचना दी कि शत्रु दिखाई नहीं देते।

अबुल फजल ने लिखा है कि जब दुर्ग में जौहर की ज्वालाएं (Flames of Jouhar) दिखाई दीं तो पता लग गया कि अकबर की गोली से दुर्गपति जयमल मारा गया था। हालांकि अबुल फजल (Abul Fazal) ने यह सूचना गलत दी है कि अकबर की गोली से जयमल राठौड़ की मृत्यु हो गई थी। अकबर की बंदूक से चली गोली दुर्गपति जयमल राठौड़ के पैर में लगी थी जिससे जयमल लंगड़ा हो गया था।

मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूंनी (Mulla Abdul Qadir Badayuni ) ने लिखा है कि छः महीना या उससे अधिक समय बीतने पर अंततः एक रात शाही फौज ने चारों ओर से आक्रमण करते हुए किले (Chittor Fort) की दीवार को तोड़ दिया और तूफान की तरह दुर्ग में घुस गई।

बंदूकों व तोपों के छोड़ने की रौशनी में जयमल राठौड़ का क्रोधित चेहरा दिखाई देने लगा जो कि इस्लाम के सिपाहियों की ओर मुखातिब था। यही वह चेहरा था जिसने पिछले छः महीनों से अकबर की रातों की नींद और खाना-पीना हराम कर रखा था।

भले ही किसी भी इतिहासकार ने नहीं लिखा है किंतु यदि मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूंनी के विवरण में थोड़ी-बहुत भी सच्चाई है तो उसे पढ़कर यह सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि राजा जयमल राठौड़ के क्रोधित चेहरे को देखकर कितने ही मुगल सेनापतियों के प्राण सूखकर कण्ठ में आ गए होंगे! कितने ही मुगल सेनापतियों ने जयमल राठौड़ (Jaimal Rathore) के इस क्रोधित चेहरे को देखकर अपने जीवन को धिक्कारा होगा। मोर्चे पर मौजूद राजा भगवंतदास, राजा टोडरमल (Raja Todarmal) एवं राय पत्तर दास भी उन्हीं में से रहे होंगे!

✍️ – डॉ. मोहनलाल गुप्ता की पुस्तक तीसरा मुगल जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर (Teesra Mughal Jalaluddin Muhammad Akbar) से।

मात्रामेरु का महत्व

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मात्रामेरु का महत्व

मात्रामेरु (Matrameru) छंदःशास्त्र का एक अत्यंत महत्वपूर्ण और अद्भुत गणितीय उपकरण है। सरल शब्दों में, यह छंदों के विभेदों (Combinations) को जानने की एक सारणी है। मात्रामेरु का उपयोग संगीत के तालों और स्थापत्य कला (Architecture) में भी किया जाता रहा है।

ऐतिहासिक तथ्य

यद्यपि विश्व आधुनिक गणित में मात्रामेरु को 17वीं शताब्दी के फ्रांसीसी गणितज्ञ ब्लेज़ पास्कल के नाम से पास्कल ट्रायंगल (Pascal’s Triangle)  के रूप में जानता है, परंतु भारत में महर्षि पिंगल (लगभग 200 ईसा पूर्व) और बाद में केदार भट्ट एवं हलायुध (10वीं शताब्दी) ने छंदों के गणित को सुलझाने के लिए ‘मेरु प्रस्तार’ के रूप में इसका सविस्तार वर्णन किया था।

मात्रामेरु की संरचना

मात्रामेरु में संख्याओं को एक पिरामिड या ‘मेरु’ (पर्वत) के आकार में व्यवस्थित किया जाता है। इसका मुख्य उद्देश्य यह पता लगाना है कि किसी निश्चित मात्रा वाले छंद में कितने गुरु (S) और कितने लघु (I) अक्षरों के संयोग बन सकते हैं।

मात्रामेरु बनाने की विधि

  1. सबसे ऊपर एक कोष्ठक में 1 लिखें।
  2. उसके नीचे की पंक्ति में दो कोष्ठक बनाकर दोनों में 1 लिखें।
  3. तीसरी पंक्ति से, किनारे वाले कोष्ठकों में हमेशा 1 रहेगा, और बीच के कोष्ठकों में ऊपर वाले दो कोष्ठकों का योग (Sum) लिखा जाएगा।

मात्रामेरु का गणितीय महत्व

मात्रामेरु के माध्यम से हम बिना विस्तार किए यह जान सकते हैं कि-

  • कुल कितने प्रकार के छंद बनेंगे।
  • कितने छंदों में सभी अक्षर ‘गुरु’ होंगे।
  • कितने छंदों में केवल एक ‘लघु’ होगा, इत्यादि।

चार (4) मात्राओं के लिए उदाहरण

यदि हम मेरु की चौथी पंक्ति देखें (1, 3, 3, 1):

  • 1: केवल एक रूप जिसमें सब समान हैं।
  • 3: तीन ऐसे रूप जिनमें गुरु-लघु का एक विशेष क्रम है।
  • यह क्रम द्विपद प्रमेय (Binomial Theorem) के गुणांकों (nCr) को दर्शाता है।

चार (4) मात्राओं वाले छंदों के संयोग

4 मात्राओं के लिए मात्रामेरु की पांचवीं पंक्ति (0 से गणना शुरू करने पर) के अंक हमें संयोग बताते हैं। इसके कुल 8 भेद होते हैं-

संयोग का प्रकारसंख्या (मात्रामेरु से)उदाहरण क्रम (S=2, I=1)
शून्य गुरु (सब लघु)1IIII
एक गुरु (दो लघु)3SII, ISI, IIS
दो गुरु (शून्य लघु)1SS
कुल योग5 (प्रकार) / 8 (संयोग)

छः (6) मात्राओं वाले छंदों के संयोग

छः मात्राओं के लिए मात्रामेरु की सातवीं पंक्ति का उपयोग होता है। इसके कुल 13 भेद होते हैं-

संयोग का प्रकारसंख्या (मात्रामेरु से)उदाहरण स्वरूप
शून्य गुरु (6 लघु)1IIIIII
एक गुरु (4 लघु)4SIIII, ISIII, IISII, IIISI
दो गुरु (2 लघु)3SSII, SISI, SIIS \dots
तीन गुरु (0 लघु)1SSS

चौपाई

चौपाई एक मात्रिक सम छंद है जिसके प्रत्येक चरण में 16 मात्राएँ होती हैं। मात्रामेरु की सहायता से हम यह देख सकते हैं कि इन 16 मात्राओं को भरने के कितने गणितीय तरीके हो सकते हैं।

चौपाई में मात्रा गणना का उदाहरण

हम प्रसिद्ध पंक्ति लेते हैं- जय हनुमान ज्ञान गुन सागर”

इसकी मात्रा गणना (S=2, I=1) इस प्रकार है:

  • जय: I + I (2)
  • हनुमान: I + I + S + I (5)
  • ज्ञान: S + I (3)
  • गुन: I + I (2)
  • सागर: S + I + I (4)
  • कुल योग: 2 + 5 + 3 + 2 + 4 = 16

मात्रामेरु (Pascal’s Triangle) और 16 मात्राएँ

यदि मात्रामेरु की 17वीं पंक्ति (16 मात्राओं के लिए) को देखें, तो वह हमें बताती है कि 16 मात्राएँ बनाने के कुल 987 तरीके (प्रस्तार) हो सकते हैं। इनमें से कुछ प्रमुख संयोग ये हैं-

गुरु (S) की संख्यालघु (I) की संख्याकुल तरीके (संयोग)
801 (सभी गुरु: SSSSSSSS)
7228 (7 गुरु और 2 लघु के अलग-अलग स्थान)
0161 (सभी लघु: IIIIIIIIIIIIIIII)

छंद शास्त्र में मात्रामेरु के लाभ

  1. लय की विविधता: यह कवि को बताता है कि वह गुरु-लघु को कहाँ बदलकर कविता के प्रवाह को संगीतमय बना सकता है।
  2. नियम पालन: चौपाई के अंत में ‘लघु-गुरु’ (IS) नहीं होना चाहिए, बल्कि ‘गुरु-गुरु’ (SS) या ‘लघु-लघु’ (II) होना चाहिए। मात्रामेरु की गणना इन सीमाओं के भीतर नए शब्द संयोजन खोजने में मदद करती है।

फिबोनाची श्रेणी का अनुसरण

मात्रामेरु में जो संख्याएँ निकलती हैं, वे फिबोनाची श्रेणी (Fibonacci series) का अनुसरण करती हैं।

  • 1 मात्रा के लिए: 1 तरीका
  • 2 मात्रा के लिए: 2 तरीके
  • 3 मात्रा के लिए: 3 तरीके
  • 4 मात्रा के लिए: 5 तरीके
  • 5 मात्रा के लिए: 8 तरीके…

दोहा छंद की गणना

दोहा छंद की गणना समझना और भी दिलचस्प है क्योंकि यह एक अर्ध-सम मात्रिक छंद है। इसमें प्रथम और तृतीय चरण (विषम चरण) में 13 मात्राएँ और द्वितीय एवं चतुर्थ चरण (सम चरण) में 11 मात्राएँ होती हैं।

मात्रामेरु (फिबोनाची क्रम) के अनुसार, 13 और 11 मात्राओं के लिए संभावित संयोगों की संख्या बहुत अधिक होती है:

  • 13 मात्राओं के लिए: 233 संभावित तरीके (प्रस्तार)
  • 11 मात्राओं के लिए: 89 संभावित तरीके

दोहा का उदाहरण और मात्रा विभाजन

उदाहरण पूर्वक समझने के लिए प्रसिद्ध दोहा लेते हैं- श्रीगुरु चरन सरोज रज, निज मनु मुकुरु सुधारि।”

1. विषम चरण (13 मात्राएँ): “श्रीगुरु चरन सरोज रज”

यहाँ मात्रामेरु के अनुसार वर्णों का क्रम देखिए:

  • श्रीगुरु: S (श्री) + I (गु) + I (रु) = 4
  • चरन: I + I + I = 3
  • सरोज: I + S + I = 4
  • रज: I + I = 2
  • कुल: 4 + 3 + 4 + 2 = 13 मात्राएँ।

2. सम चरण (11 मात्राएँ): “निज मनु मुकुरु सुधारि”

  • निज: I + I = 2
  • मनु: I + I = 2
  • मुकुरु: I + I + I = 3
  • सुधारि: I + S + I = 4
  • कुल: 2 + 2 + 3 + 4 = 11 मात्राएँ।

दोहा के लिए मात्रामेरु के विशेष नियम (गणित और शास्त्र का मेल)

मात्रामेरु हमें हज़ारों विकल्प देता है, किंतु दोहा शास्त्र कुछ प्रतिबंध (Constraints) लगाता है:

  1. विषम चरण की शुरुआत: दोहा के 13 मात्रा वाले चरण की शुरुआत अक्सर जगण’ (ISI) से नहीं होनी चाहिए।
  2. अंत का नियम: 11 मात्रा वाले चरण का अंत हमेशा गुरु-लघु’ (SI) से होना चाहिए (जैसे: सु-धा-रि में ‘धा’ S और ‘रि’ I है)।
  3. कल (मात्रा समूह): दोहा में 13 मात्राओं को 6 + 4 + 3 के समूह में बांटना लय के लिए सबसे अच्छा माना जाता है।

गणना तालिका-

चरणकुल मात्रामात्रामेरु भेद (Total Permutations)अंत का अनिवार्य नियम
विषम (1, 3)13233अंत में I (लघु) अनिवार्य नहीं पर शुभ
सम (2, 4)1189अंत में SI (गुरु-लघु) अनिवार्य

मात्रामेरु का यह गणित कवियों को यह समझने में सहायता करता है कि शब्दों को कविता या गीत में कैसे पिरोया जाए कि लय भी न टूटे और व्याकरण भी सही रहे।

छन्द-प्रस्तार की गणनाएँ

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छन्द-प्रस्तार की गणनाएँ

महर्षि पिङ्गल के छन्दःसूत्रम् में मुख्य रूप से चार प्रकार की ‘Combinatorial’ गणनाएँ मिलती हैं, जिन्हें छन्द-प्रस्तार के अंतर्गत रखा जाता है।

ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य

पश्चिमी गणित में ‘Combinatorics’ का व्यवस्थित इतिहास 17वीं सदी (Pascal, Leibniz) से माना जाता है, लेकिन छन्दःशास्त्र के माध्यम से भारत में यह ज्ञान 200-300 ईसा पूर्व में ही अत्यंत विकसित हो चुका था। महर्षि पिंगल ने शून्य (Zero) का उपयोग भी इसी गणना के क्रम में किया था।

छन्दःशास्त्र (छंदः सूत्रम्) और Combinatorics (क्रमचय-संचय) का संबंध बहुत गहरा और ऐतिहासिक है। जिसे आज हम गणित की एक शाखा के रूप में पढ़ते हैं, प्राचीन भारत में उसका विकास छंदों के संभावित विस्तार (Permutations) को खोजने के लिए किया गया था।

चार प्रकार की गणनाएँ (Combinatorial)

पिङ्गल के छन्दःसूत्रम् में मुख्य रूप से चार प्रकार की ‘Combinatorial’ गणनाएँ मिलती हैं, जिन्हें छन्द-प्रस्तार के अंतर्गत रखा जाता है:

1. प्रस्तार (Permutations/Listing)

इसका अर्थ है—किसी निश्चित वर्ण या मात्रा वाले छंद के सभी संभव रूपों (Variations) को व्यवस्थित तरीके से लिखना।

  • यदि हमें 3 वर्णों वाला छंद लिखना है, तो कुल 23 = 8 रूप बनेंगे (जैसे: SSS, SSI, SIS, . . . .)।
  • पिंगल ने इसके लिए एक ‘Algorithm’ दिया था जिससे बिना कोई क्रम भूले सभी 8 गण लिखे जा सकें।

2. संख्या (Total Combinations)

यह गणना बताती है कि कुल कितने छंद बन सकते हैं।

  • वर्णिक छंद: यदि n वर्ण हैं, तो कुल छंद 2n होंगे।
  • मात्रिक छंद: इसके लिए पिंगल ने जो विधि दी, वह आज के Fibonacci Numbers के समान है।

3. नष्ट और उद्दिष्ट (Mapping and Inverse Mapping)

ये दो सबसे उन्नत (Advanced) गणनाएँ हैं:

  • नष्ट (Nashta): यदि आपको कोई संख्या दी जाए (जैसे—”6वें नंबर का छंद कौन सा है?”), तो गणितीय गणना से उस छंद का स्वरूप (S/I का क्रम) बता देना।
  • उद्दिष्ट (Uddishta): यदि आपको छंद का स्वरूप दिया जाए, तो यह बता देना कि वह सूची में किस क्रम (Index) पर आएगा।

4. मेरु प्रस्तार (Pascal’s Triangle)

जैसा कि हमने पहले चर्चा की, मात्रामेरु का उपयोग यह जानने के लिए किया जाता था कि $n$ अक्षरों वाले छंदों में:

  • कितने छंदों में 1 गुरु होगा?
  • कितने छंदों में 2 गुरु होंगे?
  • यह सीधे तौर पर Binomial Coefficients  (nCr) की गणना है।

पिंगल भाषा : ब्रजभाषा का साहित्यिक रूप

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पिंगल भाषा : ब्रजभाषा का साहित्यिक रूप

पिंगल भाषा का नाम ऋषि पिंगल के नाम पर पड़ा है, जिन्होंने छंदों की रचना की थी। पिंगल भाषा ब्रजभाषा का साहित्यिक रूप है, जिसमें राजस्थानी का पुट भी मिलता है। पिंगल को ब्रजभाषा का पुराना स्वरूप भी कहा जाता है। पिंगल भाषा मुख्यतः ‘छंदशास्त्र’ और ‘वीरगाथा साहित्य’ से जुड़ी रही है।

📚पिंगल भाषा की विशेषताएँ

पिंगल भाषा का मुख्य आधार ही ‘छंद’ है। पिंगल को ‘छंदों की जननी भी कहा जाता है। जहाँ डिंगल में ‘कवित्त’ और ‘दुहा’ की प्रधानता थी, वहीं पिंगल भाषा अपनी कोमलता और गेयता (गाने योग्य) के लिए जानी जाती है।

📖पिंगल भाषा का छंद विधान

पिंगल में प्रयुक्त होने वाले प्रमुख छंद विधानों का विवरण नीचे दिया गया है-

📌 1. मात्रिक छंद (Matrik Chhand)

पिंगल साहित्य में मात्रिक छंदों का सबसे अधिक प्रयोग हुआ है, क्योंकि ये संगीत और लय के अनुकूल होते हैं।

  • दोहा: यह पिंगल का प्राण है। इसमें 13 और 11 मात्राओं का विश्राम (यति) होता है।
  • सोरठा: यह दोहे का उल्टा होता है (11 और 13 मात्राएँ)। पिंगल के नीति काव्यों में इसका प्रयोग बहुत मिलता है।
  • चौपाई: 16 मात्राओं वाला यह छंद भक्तिकालीन पिंगल रचनाओं (जैसे तुलसीदास की ब्रज रचनाओं) में प्रमुख रहा है।
  • रोला: यह 24 मात्राओं का छंद है। इसे पिंगल कवि अक्सर ‘कुंडलिया’ बनाने के लिए प्रयोग करते थे।
  • छप्पय: यह एक संयुक्त छंद है जो रोला और उल्लाला के मेल से बनता है। पिंगल के वीर और स्तुति काव्यों में इसका बहुत सम्मान था।

📌 2. वर्णिक छंद (Varnik Chhand)

रीतिकाल के पिंगल कवियों ने विद्वत्ता प्रदर्शन के लिए वर्णिक छंदों का सहारा लिया, जिनमें अक्षरों की गणना निश्चित होती है।

  • सवैया: पिंगल भाषा का सबसे प्रिय और सुंदर छंद। इसमें 22 से 26 वर्ण होते हैं। रसखान और पद्माकर के सवैये पिंगल शैली के शिखर माने जाते हैं।
  • कवित्त (मनहरण): इसमें 31 वर्ण होते हैं। ओज और श्रृंगार दोनों रसों के लिए पिंगल कवियों ने इसका भरपूर प्रयोग किया है।
  • मालिनी: 15 वर्णों का यह छंद अपनी कोमल लय के लिए पिंगल के श्रृंगारिक पदों में प्रयुक्त होता था।

📌 विशिष्ट ‘मिश्रित’ छंद

पिंगल ग्रंथों में कुछ ऐसे छंद मिलते हैं जो दो अलग-अलग छंदों को जोड़कर बनाए जाते हैं, जिससे काव्य में रोचकता बढ़ जाती है-

  • कुंडलिया: यह दोहा और रोला के संयोग से बनता है। गिरधर कविराय की कुंडलियाँ पिंगल अर्थात् ब्रज साहित्य में अत्यंत लोकप्रिय हैं।
  • बरवै: 12 और 7 मात्राओं का यह छंद अत्यंत मधुर माना जाता है (जैसे जैसे तुलसीदास कृत बरवै रामायण और रहीम कृत बरवै नायिका भेद)।

📌 छंद विधान की संरचना

छंद का नामप्रकारविशेषता
सवैयावर्णिकपिंगल की सुकुमारता और संगीत के लिए सर्वश्रेष्ठ।
छप्पयमात्रिक (विषम)वीर रस और दरबारी प्रशंसा के लिए उपयुक्त।
दोहामात्रिकगागर में सागर भरने के लिए प्रसिद्ध।
कवित्तवर्णिकदरबारी काव्य की शान और लयबद्ध पठन।

📌 पिंगल छंदों का वैशिष्ट्य

पिंगल कवियों ने यति’ (विराम) और गति’ (प्रवाह) पर विशेष ध्यान दिया। डिंगल के छंदों में जहाँ ‘झंकार’ होती थी, वहीं पिंगल के छंदों में ‘गुंजन’ और ‘माधुर्य’ होता था। यही कारण है कि पिंगल भाषा छंदशास्त्र (Prosody) की जननी मानी गई।

📖 छन्दःशास्त्र (छंदःसूत्रम्) ही पिंगल शास्त्र

पिंगल भाषा अथवा साहित्यिक ब्रजभाषा और छन्दःशास्त्र एक-दूसरे के इतने पूरक हैं कि कई बार छन्दःशास्त्र को ही पिंगल शास्त्र कह दिया जाता है। इसकी उत्पत्ति ऋषि पिंगल के छन्दःसूत्र से मानी जाती है, जिसे बाद में मध्यकालीन कवियों ने ब्रजभाषा (पिंगल) में रूपांतरित और पल्लवित किया।

छन्दःसूत्रम् (Chhandasutram) भारतीय वाङ्मय का वह आधारभूत ग्रंथ है जिसने कविता को लय, अनुशासन और गणितीय सटीकता प्रदान की। इसकी रचना महर्षि पिंगल ने ईसा पूर्व दूसरी या तीसरी शताब्दी (विद्वानों के अनुसार) में की थी। पिंगल भाषा का नाम इन्हीं के सम्मान में पड़ा है।

🏰मात्रामेरु (Meru of Syllables)

मात्रामेरु (Mātrāmeru) छंदःशास्त्र का एक अत्यंत महत्वपूर्ण और अद्भुत गणितीय उपकरण है। सरल शब्दों में, यह छंदों के विभेदों (Combinations) को जानने की एक सारणी है।

⚔️ पिंगल (छंद:शास्त्र) के प्रमुख काव्य-शास्त्र ग्रंथ

पिंगल शब्द का प्रयोग मुख्य रूप से ‘छंदशास्त्र’ के लिए होता है, इस विषय के सबसे महत्वपूर्ण ग्रंथ ये हैं:

  1. प्राकृत पैंगलम (सूत्रधार ग्रंथ): यह 14वीं शताब्दी का ग्रंथ है। इसमें पिंगल (ब्रज) और अपभ्रंश के छंदों का विस्तार से वर्णन है। यह पिंगल साहित्य का आधार स्तंभ माना जाता है तथा पिंगल साहित्य का सबसे प्रामाणिक ग्रंथ है। इसमें अपभ्रंश और पुरानी ब्रज (पिंगल) के छंदों का संग्रह भी दिया गया है।
  2. पिंगल शिरोमणि (कुशललाभ): 16वीं शताब्दी का यह ग्रंथ छंदों के लक्षणों को पिंगल भाषा में विस्तार से समझाता है। यह राजस्थानी और पिंगल के मिश्रण वाली एक महत्वपूर्ण रचना है जो छंद विधान को समझाती है।
  3. छंदमाला (केशवदास): रीतिकालीन कवि केशवदास द्वारा रचित इस ग्रंथ में पिंगल के विभिन्न छंदों का शास्त्रीय परिचय दिया है। केशवदास ने विभिन्न छंदों के लक्षण और उदाहरण भी दिए हैं।
  4. वृत्त विचार (सुखदेव मिश्र): पिंगल भाषा के छंदों के शास्त्रीय विवेचन के लिए यह एक उच्च कोटि का ग्रंथ है।
  5. छंदोर्णव पिंगल (भिखारीदास): यह पिंगल भाषा और उसके छंद विधान पर लिखा गया महत्वपूर्ण ग्रंथ है।
  6. छंद प्रकाश (कवि भान): यह ग्रंथ भी पिंगल शास्त्र को समर्पित है।
  7. काव्य निर्णय (भिखारीदास): ब्रजभाषा (पिंगल) के काव्य गुणों और दोषों पर विस्तृत चर्चा।
  8. भाषा भूषण (महाराज जसवंत सिंह): अलंकार विवेचन का मुख्य ग्रंथ।

✍️ पिंगल (ब्रजभाषा) के प्रमुख काव्य ग्रंथ

मध्यकाल (रीतिकाल) में पिंगल शब्द ‘ साहित्यिक ब्रजभाषा ‘ का पर्याय बन गया। इस दौरान कई काव्य ग्रंथ लिखे गए-

  1. सुदामा चरित (नरोत्तमदास): यह पिंगल/ब्रजभाषा की अत्यंत कोमल और प्रसिद्ध रचना है।
  2. पद्माभरण (पद्माकर): काव्यशास्त्र और पिंगल शैली का उत्कृष्ट उदाहरण।
  3. कविप्रिया और रसिकप्रिया (केशवदास): यद्यपि य ये अलंकार और रसविवेचन के ग्रंथ हैं तथापि इनकी भाषा शुद्ध साहित्यिक पिंगल/ब्रज है।
  4. साहित्य लहरी (सूरदास): छंदों के ‘दृष्टकूट’ पदों के कारण इसे पिंगल की दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जाता है।

🌍 डिंगल और पिंगल में अंतर

डिंगल’ और पिंगल में सूक्ष्म अंतर है। पिंगल भाषा को डिंगल भाषा (मारवाड़ी मिश्रित) के विपरीत माना जाता है। जहाँ डिंगल कठोर और ओजपूर्ण है, वहीं पिंगल कोमलकांत पदावली और श्रृंगार रस के लिए अधिक उपयुक्त मानी जाती है। मारवाड़ नरेश मानसिंह राठौड़, किशनगढ़ नरेश रूपसिंह राठौड़ तथा मेड़ता की राजकुमारी मीराबाई आदि ने स्वयं डिंगल भाषी होते हुए भी पिंगल अथवा ब्रजभाषा में भक्ति रचनाएं लिखीं क्योंकि भक्ति रचनाओं के लिए डिंगल भाषा के स्थान पर पिंगल का प्रयोग ही उचित था।

🎭 डिंगल और पिंगल का साहित्यिक उपयोग

  • पिंगल: ब्रजभाषा की प्रधानता + कोमल शब्दावली (श्रृंगार, भक्ति और छंदशास्त्र के लिए)।
  • डिंगल: राजस्थानी शब्दावली की प्रधानता + कठोर वर्ण (युद्धों के लिए)।

📖 डिंगल और पिंगल का मिश्रण

पृथ्वीराज रासो को विद्वान डिंगल और पिंगल का मिश्रण मानते हैं। पृथ्वीराज रासो की तरह विजयपाल रासो, हम्मीर रासो तथा खुमाण रासो भी डिंगल के ग्रंथ माने जाते हैं किंतु इनमें भी पिंगल भाषा का मिश्रण हुआ है-

🔑 वीरगाथा एवं दरबारी साहित्य (पिंगल शैली)

वीरगाथा काल में चारण कवियों ने जब युद्धों का ओजस्वी वर्णन ब्रज मिश्रित भाषा में किया, तो उसे पिंगल कहा गया।

ग्रंथ का नामरचयिताविवरण
पृथ्वीराज रासोचंद्रबरदाईइसे हिंदी और पिंगल का प्रथम महाकाव्य माना जाता है। इसमें दिल्ली नरेश पृथ्वीराज चौहान के जीवन का वर्णन है।
विजयपाल रासोनल सिंहइसमें विजयपाल के युद्धों का पिंगल मिश्रित ब्रजभाषा में वर्णन है।
हम्मीर रासोजोधराज / शारंगधररणथंभौर के शासक हम्मीर देव की वीरता की गाथा।
खुमाण रासोदलपति विजयमेवाड़ के शासकों का वर्णन करने वाला एक प्रसिद्ध पिंगल ग्रंथ।

📚 पिंगल छन्दःशास्त्र की मूल संरचना

पिंगल ग्रंथों में छंदों को वैज्ञानिक तरीके से बाँटा गया है। इसके मुख्य अवयव निम्नलिखित हैं:

  • वर्ण और मात्रा: पिंगल में लघु (I) और गुरु (S) का विचार सबसे महत्वपूर्ण है।
  • गण विधान: वर्णिक छंदों के लिए 8 गणों का समूह (यमाताराजभानसलगा) निर्धारित है।
  • यति और गति: छंद पढ़ते समय कहाँ रुकना है (यति) और किस लय में पढ़ना है (गति), इसका सूक्ष्म वर्णन इन ग्रंथों में मिलता है।
  • तुक (Rhyme): पिंगल काव्य में तुकबंदी का विशेष महत्व होता है।

⚖️ पिंगल ग्रंथों की शास्त्रीय श्रेणियाँ

इन ग्रंथों में छंदों को तीन मुख्य श्रेणियों में विभाजित किया गया है, जिनका विवरण इस प्रकार है:

श्रेणीविवरणप्रमुख छंद
मात्रिक छंदजिनमें मात्राओं की गणना निश्चित होती है।दोहा, चौपाई, रोला, छप्पय
वर्णिक छंदजिनमें अक्षरों (वर्णों) की संख्या और क्रम निश्चित होता है।सवैया, कवित्त, मालिनी
मुक्तक / विषमजिनमें छंदों के चरण समान नहीं होते या मिश्रित होते हैं।कुंडलिया, बरवै

🏰 पिंगल शास्त्र का प्रभाव

पिंगल ग्रंथों ने न केवल कविता लिखने के नियम तय किए, बल्कि उन्होंने:

  1. संगीत और काव्य का समन्वय किया: क्योंकि पिंगल छंद गेय होते हैं।
  2. मानकीकरण (Standardization): ब्रजभाषा को एक व्यवस्थित साहित्यिक रूप प्रदान किया।
  3. कवियों की कसौटी: रीतिकाल में माना जाता था कि जिसे पिंगल शास्त्र का ज्ञान नहीं, वह सफल कवि नहीं हो सकता।

एक प्रसिद्ध कहावत है- छंद ज्ञान के बिना कवि वैसा ही है जैसे पंख के बिना पक्षी।

छन्दःसूत्रम् – पिंगल भाषा का मुख्य ग्रंथ

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छन्दःसूत्रम्

पिंगलाचार्य द्वारा रचित प्रमुख ग्रंथ छन्दःसूत्रम् (Chhandsutram) है, जिसे छन्दःशास्त्र (Chhand Shastra) या पिंगलशास्त्र (Pingal Shastra) भी कहा जाता है। यह सूत्र (Formula) रूप में लिखा गया है और इसमें लघु-गुरु मात्राओं पर आधारित छंदों का वर्णन है।

छन्दःसूत्रम् या छन्दःशास्त्र

कुछ स्रोतों में इसे छन्दसूत्र या छन्दःशास्त्र दोनों नामों से जाना जाता है, किंतु पिंगल की अपनी रचना यही एक है। प्राकृत या अपभ्रंश भाषाओं में इससे प्रेरित ग्रंथ जैसे प्राकृत पिंगलमिमांसा हैं, पर वे अलग हैं।

छन्दःसूत्रम् पिंगलाचार्य द्वारा रचित प्राचीन भारतीय ग्रंथ है, जो छन्दशास्त्र का मूल आधार है। यह सूत्र रूप में लिखा गया है और वैदिक छंदों के गणितीय वर्गीकरण पर केंद्रित है।

रचना काल और लेखक

पिंगलाचार्य (Pingalacharya) का काल 400 ई.पू. से 200 ई.पू. माना जाता है, और जनश्रुति के अनुसार वे पाणिनि (Panini) के अनुज थे। ग्रंथ में छंद रचना के नियम, लघु-गुरु मात्राओं (ह्रस्व-दीर्घ स्वरों) पर आधारित त्रिक (गण) जैसे यमाताराजभानसलगा, और चरणों के भेद (सम-विषम) का वर्णन है।

पिंगल के छन्दशास्त्र में 8 अध्याय हैं। यह सूत्र-शैली में लिखा गया है। 8वें अध्याय में 35 सूत्र हैं। जिनमें से अन्तिम 16 सूत्र (8.20 से 8.35 तक) संयोजिकी से सम्बन्धित हैं। केदारभट्ट द्वारा रचित वृत्तरत्नाकर में 6 अध्याय हैं जिसका 6ठा अध्याय पूरी तरह से संयोजिकी के कलनविधियों को समर्पित है।

छन्दःसूत्रम् की गणितीय विशेषताएँ

यह ग्रंथ द्विआधारी संख्या पद्धति (binary system) और मेरु-प्रस्तार (पास्कल त्रिभुज) का प्रारंभिक वर्णन करता है, जो छंदों की संख्यात्मक गणना के लिए उपयोगी है। उदाहरणस्वरूप, विभिन्न छंदों जैसे जगती (8 अक्षर, तीन चरण) या उष्णिक (11 अक्षर, चार चरण) का वर्गीकरण बाइनरी कोड पर आधारित है।

छन्दःसूत्रम् का महत्व और टीकाएँ

छन्दःसूत्रम् को पिंगलशास्त्र भी कहा जाता है, और इसके परवर्ती आचार्यों जैसे कालिदास (श्रुतबोध) ने इस पर टीकाएँ लिखीं। यह पद्य रचना, स्मरण और भाव संप्रेषण में सहायक है, तथा यति (विराम स्थान) नियमों से यतिभंग दोष से बचाता है।

पैरानॉर्मल मशीनें कैसे काम करती हैं!

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पैरानॉर्मल मशीनें

पैरानॉर्मल मशीनें वास्तव में भूत पकड़ने वाली मशीनें नहीं होतीं। ये उपकरण केवल पर्यावरणीय बदलावों (जैसे तापमान, विद्युत-चुंबकीय क्षेत्र, ध्वनि, रोशनी) को मापते हैं और उन बदलावों को संभावित अलौकिक गतिविधि से जोड़कर देखा जाता है।

पैरानॉर्मल मशीनों के सम्बन्ध में धारणा

इस कारण यह धारणा बन गई है कि पैरानॉर्मल मशीनें भूत-प्रेत एवं आत्माओं की उपस्थिति जैसी अलौकिक गतिविधियों को मापने वाली मशीनें हैं।

पैरानॉर्मल मशीनों की वास्तविकता

वस्तुतः ये मशीनें अपने आस-पास के वातावरण में विद्युत चुम्बकीय क्षेत्र (EMF) के अचानक बदलाव, असामान्य ध्वनि (EVP), तापमान में गिरावट, या दृश्य विसंगतियों (शैडो) को डिटेक्ट करती हैं। EMF Meters – Warwick University और K2 Meters – A Night Among Ghosts के माध्यम से, ये डिवाइस रेडिएशन के स्तर को मापकर अदृश्य ऊर्जा के होने का संकेत देती हैं। 

पैरानॉर्मल मशीनें और उनकी कार्यप्रणाली

पैरानॉर्मल मशीनें विशिष्ट वैज्ञानिक विधि से कार्य करती हैं। यहाँ प्रमुख मशीनों की कार्यप्रणाली दी गई है:

  • EMF मीटर (K2 Meter): ये मशीनें विद्युत चुम्बकीय क्षेत्रों में अचानक उतार-चढ़ाव को मापती हैं। अगर कोई स्पष्ट विद्युत स्रोत (जैसे तार या उपकरण) न होने पर भी मीटर हाई EMF रीडिंग दिखाता है, तो इसे आत्माओं की उपस्थिति का संकेत माना जाता है।
  • तापमान मापने वाली बंदूकें (Temperature Guns): ये भूतिया स्थानों पर ठंडी हवा (cold spots) का पता लगाती हैं, जिसे अक्सर किसी साये या ऊर्जा की उपस्थिति का संकेत माना जाता है।
  • EVP रिकॉर्डर (Electronic Voice Phenomenon): ये साधारण साउंड रिकॉर्डर से भिन्न होते हैं और सूक्ष्म से सूक्ष्म ध्वनियों को पकड़ सकते हैं। इनका उपयोग उन आवाज़ों को रिकॉर्ड करने के लिए किया जाता है जो इंसानी कानों को नहीं सुनाई देतीं।
  • स्पिरिट बॉक्स (Spirit Boxes): ये तेज़ी से AM/FM रेडियो आवृत्तियों (रेडियो फ्रीक्वेंसी ) को तेजी से स्कैन करते हैं, जिससे सफ़ेद शोर (white noise) पैदा होता है। माना जाता है कि आत्माएं इन आवृत्तियों का उपयोग करके बात कर सकती हैं। इन मशीनों में बीच-बीच में आने वाली आवाज़ों को आत्माओं का संदेश माना जाता है।
  • इंफ्रारेड कैमरे (Infrared Cameras): ये रात में या अंधेरे में तापमान में बदलाव और छाया जैसी विसंगतियों (shadow anomalies) को रिकॉर्ड करते हैं, जो सामान्य कैमरे में नहीं दिखतीं। इन मशीनों के माध्यम से अनदेखी आकृतियों या रोशनी को कैप्चर करने का प्रयास किया जाता है।
  • मोशन सेंसर / REM Pod :मोशन सेंसर तापमान के छोटे-छोटे बदलावों को दिखाता है। अचानक ठंडे या गर्म धब्बे को “स्पिरिट प्रेज़ेन्स” माना जाता है।

निष्कर्ष

  • वैज्ञानिक दृष्टिकोण से: ये मशीनें केवल भौतिक बदलाव मापती हैं।
  • पैरानॉर्मल व्याख्या: जब कोई असामान्य बदलाव मिलता है, तो उसे आत्मा या अलौकिक गतिविधि से जोड़ा जाता है।
  • संदेह और विवाद: वैज्ञानिक समुदाय इन उपकरणों को अलौकिक प्रमाण  नहीं मानता, बल्कि इन्हें केवल पर्यावरणीय डेटा रिकॉर्डर मानता है।
  • इन उपकरणों द्वारा ली गई रीडिंग को वैज्ञानिक रूप से सीधे भूत-प्रेत से नहीं जोड़ा जाता है, क्योंकि ये सामान्य विद्युत या पर्यावरणीय कारणों से भी प्रभावित हो सकते हैं। 
  • लोकप्रियता: टीवी शो, यूट्यूब चैनल और शौकिया “घोस्ट हंटर्स” इन मशीनों का खूब इस्तेमाल करते हैं।

यह भी देखें-

क्वाण्टम ब्रह्माण्ड और वेदान्त

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