Friday, April 3, 2026
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राजाओं का धन नहीं, उनके राज्य चाहिये थे!

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जब भारत सरकार राजाओं से उनके राज्य छीन रही थी, तब सरदार पटेल ने अत्यंत व्यावहारिक रुख अपाया। लोग चाहते थे कि राजा लोग अपना धन और महल छोड़कर निकल जाएं किंतु सदार पटेल को राजाओं का धन नहीं, उनके राज्य चाहिये थे!

सदार पटेल ने भारत के 554 राजाओं के राज्य, भारत में मिलाये थे। जब राजाओं को उनके राज्य जाते दिखे तो उन्होंने अपने महलों, कोषागारों एवं राजकीय भवनों में रखी धन-सम्पत्ति को छिपाना आरम्भ कर दिया। अनेक राजाओं ने राजकीय सम्पत्ति को भी हड़प लिया। हैदराबाद तथा भोपाल तथा पटियाला आदि रियासतों के राजाओं ने अपने महलों, कारों, बग्घियों एवं पालकियों पर लगे सोने-चांदी के पतरे उखाड़ लिये।

सोने-चांदी के बरतन गलाकर उन्हें धातुओं में बदल दिया। महलों की छतों पर लगे हीरे-जवाहरात गायब कर दिये। खजानों में रखे कीमती पत्थर, मोतियों की मालायें और रत्नाभूषण महलों से निकालकर अन्यत्र पहुंचा दिये। कुछ राजाओं ने स्वयं को काश्तकार घोषित करके खेती की जमीनों पर कब्जा कर लिया। राज्य की कीमती जमीनें अपने दास-दासियों एवं कुत्ते-बिल्लियों के नाम कर दी गई। राजाओं का धन राजाओं के महलों से रातों-रात गायब हो गया!

राजाओं की इन कार्यवाहियों से कांग्रेसी कार्यकर्त्ताओं में बेचैनी व्याप्त हो गई तथा भारत भर के राजाओं के विरुद्ध तरह-तरह की शिकायतें सरदार पटेल के पास पहुंचने लगीं। पटेल को मानव मन की गहरी समझ थी। वे जानते थे कि यह अस्वाभाविक नहीं है। भविष्य की आशंका से ग्रस्त कौन मानव ऐसा नहीं करेगा! इसलिये पटेल ने राजाओं को आश्वस्त करते हुए यह वक्तव्य दिया कि मुझे राजाओं के राज्य चाहिये, राजाओं का धन नहीं।

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पटेल ने उदार भाव से राजाओं के महल, बग्घियां, कारें, सोने-चांदी और रत्नों के भण्डार उनके पास रहने दिये। इस पर भी कुछ राजाओं की भूख शांत नहीं हुई। वे तरह-तरह की समस्याएं उठाने लगे। फिर भी सरदार पटेल ने अत्यंत उदारता से राजाओं की समस्याओं का निराकरण किया।

बांसवाड़ा के महारावल ने राज्य के जंगलों पर, निजी सम्पत्ति होने का दावा किया तथा भारत सरकार से शिकायत की कि आदिवासी, राजाओं की निजी सम्पत्ति में आने वाले जंगलों को भी काट रहे हैं, जंगलों में स्थित भवनों में तोड़-फोड़ कर रहे हैं एवं कृषि क्षेत्र को हानि पहुंचा रहे हैं। महाराजा जयपुर ने मांग की कि उनके दिल्ली स्थित जयपुर भवन में स्थित साजोसामान, पशुधन एवं आदमियों का खर्चा सरकार द्वारा वहन किया जाये। जयपुर भवन महाराजा की निजी सम्पत्ति मान लिया गया था इसलिये सरकार ने इस व्यय को उठाने से मना कर दिया।

झालावाड़ के महाराजराणा ने अपने महलों के बिजली व्यय के पुनर्भरण की मांग की तो रियासती विभाग ने महाराजराणा को लिखा कि जिन महलों एवं भवनों को राजाओं की व्यक्तिगत सम्पत्ति घोषित कर दिया गया है, उनके विद्युत व्यय एवं विद्युत संस्थापन आदि का व्यय राजाओं के प्रिवीपर्स में से किया जाये न कि राज्य व्यय से। टोंक तथा किशनगढ़ आदि कुछ रियासतों ने राजस्थान में विलय से ठीक पहले ही राजमाताओं (शासक की माता, विधवा बुआ अथवा दादी) को जागीरें प्रदान कीं ताकि राजमाताओं को अधिक से अधिक भत्ते प्राप्त हो सकें। रियासती विभाग ने इन प्रकरणों की जांच करवाने के आदेश दिये।

सरदार पटेल की अध्यक्षता वाले रियासती विभाग ने समस्त प्रांतों के मुख्य सचिवों को निर्देशित किया कि कई पूर्व रियासतों की राजमाताओं से शिकायतें प्राप्त हो रही हैं कि उन्हें भत्तों का भुगतान समय पर नहीं हो रहा है। अतः शासकों तथा राजमाताओं को इस सम्बन्ध में सूचना भिजवायी जाये कि इस विषय पर क्या कार्यवाही की जा रही है।

विभिन्न संघ इकाइयों में सम्मिलित पूर्व रियासतों के शासकों ने रियासती विभाग को सूचित किया कि जिन राजमाताओं को पूर्व में राज्यकोष से भत्ते मिलते रहे थे, उनके बंद हो जाने के कारण शासकों द्वारा अपने प्रिवीपर्स में से भुगतान किया जा रहा है।

राजपरिवारों के सदस्यों, विशेषतः राजमाताओं को भत्तों का भुगतान अलग से किया जाये। रियासती विभाग ने निर्णय दिया कि जिन सदस्यों को पहले से ही अलग से भत्ते मिल रहे थे, उन्हें राज्य के राजस्व से भत्तों का भुगतान किया जाना चाहिये न कि शासकों के प्रिवीपर्स से। शासक के प्रिवीपर्स में शासक के बच्चे एवं पत्नियां ही सम्मिलित की गयी हैं। ये भत्ते जीवन भर के लिये दिये जाने चाहिये।

जयपुर महाराजा ने राजस्थान के एकीकरण के पश्चात् कुछ स्वर्ण पर अपना दावा किया जिसका मूल्य एक करोड़ रुपये था। मुख्यमंत्री हीरालाल शास्त्री ने उसे राज्य का बताते हुए देने से मना कर दिया। बात सरदार पटेल तक गयी। सरदार पटेल ने मुख्यमंत्री हीरालाल शास्त्री से पूछा कि सोना किसका है? इस पर शास्त्री ने जवाब दिया कि सोना पहले तो राजा का ही रहा होगा, पर बाद में राज्य के बजट में दर्ज हो गया।

अतः अब राज्य का मानना पड़ेगा। सरदार ने पूछा कि आपकी राय क्या है? शास्त्री ने कहा कि मेरी राय में सोना महाराजा को दे देना चाहिये। सरदार बोले क्यों? शास्त्री ने कहा इतना बड़ा राज्य किसी का आपने ले लिया है। इतना सा सोना दे देने में क्यों संकोच करना चाहिये। सरदार ने सोना महाराजा को देने की अनुमति दे दी।

जैसलमेर महारावल ने वर्ष 1927-28 में अपने निजी धन से एक पुस्तकालय भवन बनाने के लिये राजकोष में राशि जमा करवाई थी। जैसलमेर रियासत के विलय के बाद महारावल ने मांग की कि पुस्तकालय भवन का उपयोग महकमा खास के कार्यालयों के लिये हो रहा है इसलिये महारावल द्वारा इस भवन को बनाने के लिये दी गयी राशि, ब्याज सहित महाराजा को लौटाई जाये। सरकार ने निर्णय दिया कि यदि इस तरह के दावों को स्वीकार किया गया तो रियासती विभाग में शासकों की ओर से धन राशि की मांग के दावों की बाढ़ आ जायेगी।

अतः महाराजा का यह दावा निरस्त करने योग्य है। झालावाड़ के शासक ने दावा किया कि महल परिसर में स्थित बिजलीघर शासक की स्वयं की निजी सम्पत्ति है। साथ ही राजस्थान सरकार द्वारा इस महल के बिजलीघर में स्थित पुरानी मशीनों की नीलामी भी नहीं की जा सकती क्योंकि यह महाराजा की निजी सम्पत्ति में आती हैं। भारत सरकार ने राजस्थान सरकार को सूचित किया कि इस प्रकरण पर तब तक कोई कार्यवाही न की जाये जब तक कि स्वयं वी. पी. मेनन इस प्रकरण का निस्तारण न कर दें।

टोंक कलक्टर ने पूर्व टोंक रियासत की कुछ सम्पत्ति जिसमें घोड़े, बग्घियां, कार, अस्तबल आदि सम्मिलित थे, को सरकारी सम्पत्ति मानकर नीलाम करने का निर्णय लिया। इस पर टोंक नवाब ने सरकार से अनुरोध किया कि जब तक टोंक नवाब की निजी सम्पत्ति के सम्बन्ध में अंतिम निर्णय न हो जाये तब तक उक्त नीलामी रोकी जाये। डूंगरपुर महारावल के अधिकार में माही नदी के बीच में स्थित एक टापू पर स्थित भूमि बेंका (सोहन बीड) कहलाती थी।

यह एक विशाल भूमि थी जिसमें सिंचाई के लिये माही नदी का जल प्रचुर मात्रा में उपलब्ध था। महारावल ने रियासती विभाग को पत्र लिखकर यह भूमि महारावल को ही काश्त के लिये दिये जाने की मांग की। रियासती विभाग ने राजस्थान के मुख्य सचिव को पत्र लिखकर सिफारिश की कि उक्त भूमि समुचित आकलन के आधार पर महारावल को काश्त के लिये दे दी जाये। इस प्रकार सरदार पटेल ने राजाओं की अधिकांश मांगों पर सहानुभूति पूर्वक निर्णय लिये।

इस प्रकार सरदार पटेल ने व्यावहारिक रुख अपनते हुए राजाओं का धन राजाओं के पास ही रहने दिया। इससे देशी राज्यों के विलय की समस्या बहुत आसानी से सुलझ गई।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

अलवर नरेश तेजसिंह नजरबंद !

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राजा लोग विगत कुछ दशकों से अंग्रेजों की छत्रछाया में कांग्रेसी नेताओं से संघर्ष करते आ रहे थे। इसलिए वे देशी की आजादी के समय भी हवा के रुख के परिवर्तन को नहीं पहुंचा सके और भारत सरकार के नेताओं की अवज्ञा करने लगे। जब अलवर नरेश तेजसिंह नजरबंद कर लिया गया, तब जाकर राजाओं की आंखें खुलीं।

जब राजाओं को भारत संघ में मिलने का आमंत्रण दिया गया था तब सरदार पटेल द्वारा यह आश्वासन दिया गया था कि स्वतंत्र भारत में, 19 सक्षम राज्यों- कश्मीर, हैदराबाद, त्रावणकोर, कोचीन, मैसूर, बड़ौदा, कच्छ, ग्वालियर, इंदौर, भोपाल, बीकानेर, जोधपुर, कूच बिहार, त्रिपुरा, मनिपुर, जयपुर, उदयपुर, मयूरभंज तथा कोल्हापुर को अलग राज्य बने रहने दिया जायेगा।

जबकि वास्तविकता यह थी कि लोकतंत्रात्मक व्यवस्था में दो तरह की प्रशासनिक व्यवस्था चलाना संभव नहीं था। इसलिये सरदार पटेल ने 15 अगस्त 1947 के बाद से ही रियासतों के एकीकरण का अभियान छेड़ दिया। 14 दिसम्बर 1947 एवं बाद की तिथियों में छत्तीसगढ़ तथा उड़ीसा की रियासतों ने भारत सरकार को शासन के पूर्ण अधिकार सौंप दिये। 1 जनवरी 1948 को इन रियासतों का शासन मध्यप्रदेश तथा उड़ीसा सरकारों को सौंप दिया गया।

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रियासती मंत्रालय की एकीकरण नीति की अखबारों में कटु आलोचना हुई तो सरदार पटेल ने अपने सलाहकार वी. पी. मेनन को गांधीजी और पं. नेहरू के पास भेजा ताकि उन्हें इस कार्यवाही के औचित्य में विश्वास करा दिया जाये। गांधीजी को इस काम से पूरी तरह संतोष था किंतु सरदार पटेल की इस कार्यवाही से राजाओं के मन में भय उत्पन्न हो गया। पटेल एक सुनिश्चित नीति के तहत एकीकरण की प्रक्रिया चला रहे थे किंतु कुछ देशी रियासतों में भड़के हिन्दू-मुस्लिम दंगों ने एकीकरण की प्रक्रिया को तेज कर दिया।

अलवर एवं भरतपुर में मेव जाति ने आतंक फैला दिया जिसकी प्रतिक्रिया में हिन्दुओं ने भी मेवों पर आक्रमण किये। इन दंगों में भरतपुर रियासत में 209 गाँव पूर्णतः नष्ट हो गये। मेवों के नेता, भरतपुर रियासत के उत्तरी भाग, गुड़गांव और अलवर रियासत के दक्षिणी क्षेत्रों को मिलाकर मेवस्तान बनाने का स्वप्न देख रहे थे किंतु अलवर राज्य के दीवान नारायण भास्कर खरे ने मेवों को सख्ती से कुचला।

खरे हिन्दू महासभा के अध्यक्ष भी रहे थे, इसलिये कांग्रेसी नेताओं ने खरे पर कट्टर हिन्दूवादी होने के आरोप लगाये। कांग्रेसियों का मानना था कि खरे ने हिन्दुओं को मेवों के विरुद्ध भड़का कर दंगा करवाया। अक्टूबर 1947 में सरदार पटेल ने दिल्ली में रियासती प्रतिनिधियों की एक सभा बुलाई। इस सभा में सरदार पटेल ने अलवर के राजा तेजसिंह तथा दीवान नारायण भास्कर खरे को चेतावनी दी कि जो लोग सांप्रदायिकता फैलाने का काम कर रहे हैं, वे देश के शत्रु हैं। नारायण भास्कर खरे का कहना था कि सरदार पटेल, अलवर राज्य के आंतरिक मामले में हस्तक्षेप कर रहे हैं जिसका उन्हें कोई अधिकार नहीं है।

30 जनवरी 1948 को गांधीजी की हत्या हो गई जिसमें अलवर नरेश तेजसिंह और उसके प्रधानमंत्री नारायण भास्कर खरे का हाथ होने का संदेह किया गया। भारत सरकार ने 7 फरवरी 1948 को तेजसिंह को दिल्ली बुलाकर कनाट प्लेस पर स्थित मरीना होटल में नरजबंद कर दिया तथा अलवर राज्य का प्रशासन अपने हाथ में ले लिया। राज्य के दीवान खरे को पदच्युत करके दिल्ली में नजरबंद कर दिया गया।

जब अलवर नरेश तेजसिंह नजरबंद कर लिया गया तब राजपूताना के राजाओं में भय व्याप्त हो गया और वे राष्ट्रीय नेताओं के दबाव में आ गये। अब वे अपने राज्यों को राजस्थान में मिलाने के लिये प्रस्तुत हो गये।

अलवर, भरतपुर, धौलपुर तथा करौली के राजाओं को हटाकर इन राज्यों का एक संघ बनाने का निर्णय होने के बाद, सरदार पटेल अलवर आये तथा एक आम सभा में उन्होंने मार्मिक शब्दों में राजस्थान की जनता का आह्वान किया- ‘छोटे राज्य अब बने नहीं रह सकते।

उनके सामने एक ही विकल्प है कि वे बड़ी तथा समुचित आकार की इकाईयों में सम्मिलित हो जायें। जो अब भी राजपूत आधिपत्य की स्थापना का स्वप्न देखते हैं, वे आधुनिक संसार से बाहर हैं। अब शक्ति, प्रतिष्ठा या वर्ग का चिंतन उचित नहीं।

आज हरिजन की झाड़ू राजपूतों की तलवार से कम महत्वपूर्ण नहीं है। जैसे माँ का झुकाव बच्चे की ओर होता है वैसे ही जो लोग देश के हितों की देखभाल कर रहे हैं, वे सबसे ऊपर हैं। वे भी समान समर्पण तथा बराबर आदर सम्मान के अधिकारी हैं। जनता सांप्रदायिक सद्भाव, एकता तथा शांति बनाये रखे।’

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

भरतपुर महाराजा का भाग्य

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भारत की आजादी के समय भरतपुर महाराजा ने भारत सरकार को नाराज करने वाले कई कार्य किए। इस कारण भारत सरकार भरतपुर महाराजा के विरुद्ध हो गई और उसके विरुद्ध सख्त कार्यवाही करने पर विचार करने लगी। ऐसी स्थिति में सरदार वल्लभभाई ने भरतपुर महाराजा का भाग्य बचाया।

रियासती विभाग भरतपुर राज्य की गतिविधियों से बड़ा खिन्न था। इसलिये रियासती विभाग ने भरतपुर महाराजा बृजेन्द्रसिंह के विरुद्ध एक आरोप सूची तैयार की तथा राजा पर ये आरोप लगाये गये-

(1.) भरतपुर के महाराजा ने 15 अगस्त 1947 को स्वतंत्रता दिवस नहीं मनाया तथा उसने खुले तौर पर भारतीय नेताओं को भारत विभाजन के लिये उत्तरदायी बताया।

(2.) महाराजा ने 1 लाख मुसलमानों को राज्य से भगा दिया। महाराजा को प्रसन्नता थी कि उनके राज्य में एक भी मुसलमान नहीं बचा था।

(3.) भरतपुर राज्य में से जाने वाली बांदीकुई-आगरा रेलवे लाइन को सुरक्षा प्रदान करने के लिये महाराजा ने कारगर कदम नहीं उठाये।

(4.) महाराजा की सेना में अनुशासन जैसी कोई चीज नहीं रह गयी थी।

(5.) महाराजा ने राज्य में जाटवाद को बढ़ावा देने में कोई कसर नहीं रखी थी।

(6.) भरतपुर राज्य में शस्त्र व गोला-बारूद तैयार करने के लिए अवैध कारखाना खोला गया तथा जाटों एवं राष्ट्रीय स्वयं सेवकों को शस्त्र बांटे जा रहे थे।

(7.) महाराजा राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की गतिविधियों में रुचि लेता था।

(8.) पं. नेहरू ने भी अपने पत्र दिनांक 28 जनवरी 1948 के द्वारा पटेल को अवगत करवाया था कि भरतपुर राज्य में राष्ट्रीय स्वयं सेवकों को शस्त्र प्रशिक्षण दिया जा रहा है।

भारत सरकार ने 10 फरवरी 1948 को भरतपुर महाराजा बृजेन्द्रसिंह को दिल्ली बुलाया और उनके विरुद्ध एकत्र किये गये आरोपों से अवगत करवा कर उन्हें निर्देश दिये कि वे राज्य प्रशासन का दायित्व भारत सरकार को सौंप दें। अलवर महाराजा तथा प्रधानमंत्री दिल्ली में नजरबंद किये जा चुके थे। इसलिये भरतपुर महाराजा अत्यंत दबाव में थे। उन्होंने अत्यंत अनिच्छा से सम्मति प्रदान की।

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14 फरवरी 1948 को रियासती विभाग द्वारा एस. एन. सप्रू को भरतपुर राज्य का प्रशासक नियुक्त किया गया। कर्नल ढिल्लों को राज्य की सेना का अध्यक्ष नियुक्त किया गया। महाराजा के भाई गिरिराजशरण सिंह, जिसके विरुद्ध नेहरू ने सरदार पटेल को लिखा था, को इंगलैण्ड भेज दिया गया। स्वतंत्र भारत के प्रथम गवर्नर जनरल लॉर्ड माउंटबेटन, महाराजा भरतपुर को सांप्रदायिक आधार पर हत्याएं करने तथा खराब प्रशासन के आरोप में अपदस्थ करके दक्षिण में भेजना चाहते थे जहाँ उन्हें नजरबंद कर दिया जाना था किंतु सरदार पटेल ने महाराजा के भाग्य की रक्षा की।

अलवर तथा भरतपुर राज्यों से सटे धौलपुर और करौली राज्यों के राजाओं को भी 27 फरवरी 1948 को दिल्ली बुलाया गया और सलाह दी गयी कि अलवर और भरतपुर राज्य के साथ संघ में शामिल हो जायें। चारों राजाओं ने इस प्रस्ताव को मान लिया तथा 28 फरवरी 1948 को एकीकरण के दस्तावेज पर हस्ताक्षर कर दिये। के. एम. मुंशी की सलाह पर इस संघ का नाम मत्स्य संघ रखा गया।

चूंकि महाराजा अलवर तथा महाराजा भरतपुर के विरुद्ध जांच चल रही थी इसलिये धौलपुर महाराजा को संघ का राजप्रमुख तथा करौली महाराजा को उपराजप्रमुख बनाया गया।

18 मार्च 1948 को इसका विधिवत् उद्घाटन किया गया। मत्स्य संघ बन जाने के बाद लॉर्ड माउंटबेटन ने अलवर तथा भरतपुर राज्यों के शासकों के विरुद्ध जांच करने के लिये बड़ौदा, ग्वालियर, नवानगर तथा बीकानेर के शासकों की एक समिति नियुक्त की किंतु इन शासकों ने अपने भ्रातृ महाराजाओं की जांच करने से मना कर दिया।

इस पर भारत सरकार के प्रतिनिधियों को इस कार्य के लिये नियुक्त किया गया। जांच में न केवल महाराजा अलवर तथा महाराजा भरतपुर निर्दोष पाये गये अपितु अलवर राज्य के दीवान नारायण भास्कर खरे के विरुद्ध भी किसी तरह का आरोप प्रमाणित नहीं हुआ। भारत सरकार ने इन सबको दोषमुक्त घोषित कर दिया तथा इनके विरुद्ध किसी तरह की कानूनी कार्यवाही नहीं की।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

देशी रियासतों का एकीकरण

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देशी रियासतों का एकीकरण करके सरदार पटेल ने भारत में वह कर दिखाया जो जर्मनी में बिस्मार्क ने तथा इटली में काबूर ने किया था!

सरदार पटेल के नेतृत्व में देशी रियासतों का एकीकरण करने का काम तेजी से चला। दिसम्बर 1947 में उड़ीसा और छत्तीसगढ़ के 39 राज्यों का उड़ीसा और मध्यप्रान्त में विलय हुआ।

फरवरी 1948 में 17 दक्षिणी राज्यों को बम्बई प्रान्त के साथ मिलाया गया। जून 1948 में गुजरात तथा काठियावाड़ के समस्त राज्यों को बम्बई प्रदेश में सम्मिलित किया गया। पूर्वी पंजाब, पाटियाला तथा पहाड़ी क्षेत्र के राज्यों को मिलाकर एक नया संघ बनाया गया जिसे पेप्सू कहा गया। इसी आधार पर मत्स्य संघ, विन्ध्य प्रदेश और राजस्थान का निर्माण किया गया। कुछ क्षेत्रों को केन्द्र प्रशासित क्षेत्र बनाया गया जिनका प्रशासन केन्द्र सरकार के हाथों में रखा गया।

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सरदार पटेल तथा वी. पी. मेनन ने दो प्रकार की पद्धतियों को प्रोत्साहन दिया- बाह्य विलय और आन्तरिक संगठन। बाह्य विलय में छोटे-छोटे राज्यों को मिलाकर अथवा पड़ौसी प्रान्तों में विलय करके बड़े राज्य बनाये गये। आन्तरिक संगठन के अन्तर्गत इन राज्यों में प्रजातन्त्रीय शासन व्यवस्था लागू की गई। पूरे देश में चार प्रकार के राज्य बनाये गये (संविधान में ‘प्रान्त’ शब्द हटा दिया गया और देशी रियासतों तथा प्रान्तों, दोनों के लिए ‘राज्य’ शब्द का ही प्रयोग किया गया)। इन्हें क, ख, ग और घ श्रेणी के राज्य कहा गया।

‘क’ श्रेणी के अन्तर्गत भूतपूर्व ब्रिटिश प्रान्तों को रखा गया। इनकी संख्या 9 थी- असम, बिहार, बम्बई, मध्य प्रदेश, मद्रास, उड़ीसा, पंजाब, उत्तर प्रदेश और पश्चिमी बंगाल। ‘ख’ श्रेणी के अन्तर्गत कुछ संघ तथा बड़ी देशी रियासतों को रखा गया जिनकी संख्या 8 थी। ये थीं- हैदराबाद, जम्मू-कश्मीर, मध्य भारत, मैसूर, पटियाला तथा पेप्सू, राजस्थान, सौराष्ट्र, त्रावणकोर तथा कोचीन। ‘ग’ श्रेणी के अन्तर्गत अजमेर, भोपाल, कुर्ग, दिल्ली, हिमाचल प्रदेश, कच्छ, विन्ध्य प्रदेश, मणिपुर और त्रिपुरा राज्यों को सम्मिलित किया गया। ‘घ’ श्रेणी में अण्डमान और निकोबार द्वीप को सम्मिलित किया गया।

‘क’ और ‘ख’ श्रेणी के राज्यों में पूर्ण उत्तरदायी सरकार स्थापित की गई परन्तु ‘ग’ श्रेणी के राज्यों में कुछ नियंत्रित उत्तरदायी सरकार की स्थापना की गई। ‘घ’ श्रेणी के राज्यों की प्रशासन व्यवस्था केन्द्र के अधीन रखी गई।

देशी रियासतों के एकीकरण से भारत में शक्तिशाली संघ की स्थापना हो गई। यह काम जिस शान्ति एवं शीघ्रता से सम्पन्न हुआ, उसकी आशा किसी को नहीं थी। सितम्बर 1948 में पं. जवाहरलाल नेहरू ने कहा- ‘यदि मुझसे कोई व्यक्ति 6 महीने पूर्व ये पूछता कि अगले 6 महीनों में क्या होगा, तो मैं भी यह नहीं कह सकता था

कि अगले 6 महीनों में इतने शीघ्र परिवर्तन होंगे।’ माइकल ब्रीचर ने लिखा है- ‘केवल एक वर्ष में 5 लाख वर्ग मील क्षेत्र और 9 करोड़ आबादी भारतीय संघ में मिल गई। यह एक महान् रक्तहीन क्रान्ति थी जिसकी तुलना कहीं भी इस शताब्दी में नहीं मिलती और इसकी तुलना उन्नीसवीं शताब्दी में बिस्मार्क द्वारा जर्मनी में और काबूर द्वारा इटली में किये हुए एकीकरण से की जा सकती है।’ भारत के एकीकरण में उनके महान योगदान के लिये उन्हें भारत का लौह पुरुष कहा जाता है।

भारत की 566 रियासतों का एकीकरण विश्व की सबसे बड़ी रक्तहीन क्रांति थी। गांधीजी ने पटेल को लिखा- ‘रियासतों की समस्या इतनी जटिल थी जिसे केवल तुम ही हल कर सकते थे।’

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

अजमेर दंगे !

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जवाहर लाल नेहरू एवं सरदार वल्लभ भाई पटेल

भारत की आजादी के तुरंत बाद हुए अजमेर दंगे सरदार पटेल एवं जवाहर लाल नेहरू के बीच विवाद का विषय बन गए। जवाहर लाल नेहरू ने इन दंगों के बाद हिन्दुओं को कुचलने की तैयारी की जबकि पटेल का मानना था कि दंगे मुसलमानों ने किए थे।

5 दिसम्बर 1947 को अजमेर में साम्प्रदायिक दंगे फैल गये। इन दंगों को रोकने के लिये दिल्ली से सेना बुलानी पड़ी। दिल्ली क्षेत्र के कमाण्डिंग अधिकारी जनरल राजेन्द्रसिंह ने अजमेर का दो दिवसीय भ्रमण किया। पं. नेहरू ने इण्टर डोमिनियन मायनोरिटीज के अध्यक्ष एन. आर. मलकानी को एक तार भेजकर सूचित किया कि मुझे अजमेर में हुए दंगों पर गहरा खेद है किंतु दरगाह को पूरी तरह सुरक्षित रखा गया है। नेहरू ने मलकानी को यह भी सूचित किया कि वे शीघ्र ही अजमेर का दौरा करेंगे।

यह एक शर्मनाक स्थिति थी। एक ओर से पाकिस्तान से हिन्दुओं की ट्रेनें कटकर आ रही थीं और दूसरी ओर जवाहर लाल नेहरू छोटे से अजमेर दंगे के लिए पाकिस्तान से माफी मांग रहे थे। नेहरू के इस टेलिग्राम के बाद पाकिस्तान को भारत के विरुद्ध जहर उलगने का अवसर मिल गया।

पाकिस्तान सरकार के शरणार्थी एवं पुनर्वास मंत्री गजनफर अली खां ने भारत सरकार के गृहमंत्री सरदार पटेल को अजमेर की स्थिति के सम्बन्ध में टेलिग्राम किया। 17 दिसम्बर 1947 को सरदार पटेल ने उसे जवाब में टेलिग्राम भिजवाकर सूचित किया कि अजमेर में स्थिति नियंत्रण में है तथा एक सैनिक टुकड़ी दरगाह की रक्षा कर रही है।

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जवाहरलाल नेहरू अजमेर दंगे पर बहुत चिंतित थे। बालकृष्ण कौल एवं मुकुट बिहारी लाल ने नेहरू को अजमेर की स्थिति के बारे में सूचित किया। नेहरू अजमेर के अधिकारियों एवं पुलिस के रवैये से प्रसन्न नहीं थे। नेहरू ने सरदार पटेल को लिखे एक पत्र में दो महत्त्वपूर्ण बातों की ओर ध्यान दिलाया। पहला बिंदु यह था कि यदि इस घटना की बड़े स्तर पर पुनरावृत्ति हुई तो उसके भयानक परिणाम होंगे। दूसरा यह कि दरगाह के कारण अजमेर पूरे भारत में तथा पूरे विश्व में प्रसिद्ध है। यदि दरगाह को कुछ हुआ तो उसका प्रचार पूरे भारत में एवं पूरे विश्व में होगा। इससे भारत सरकार की छवि को धक्का पहुँचेगा।

जवाहरलाल नेहरू का पत्र मिलने के बाद सरदार पटेल ने अजमेर प्रकरण पर एक सार्वजनिक वक्तव्य जारी किया। उन्होंने अजमेर में हुई मौतों की संख्या बताते हुए कहा कि 15 दिसम्बर 1947 से लेकर अब तक हुए दंगों में 5 हिन्दू तथा 1 मुसलमान मरा है। साथ ही पुलिस फायरिंग में 21 हिन्दू तथा 62 मुसलमान घायल हुए हैं। मिलिट्री की फायरिंग में 8 हिन्दू तथा 7 मुसलमान मारे गये हैं और 2 हिन्दू एवं 2 मुसलमान घायल हुए हैं। सम्पत्ति का भयानक नुक्सान हुआ है।

अधिक नुक्सान स्टेशन रोड तथा इम्पीरियल रोड पर स्थित मुसलमानों की आठ बड़ी दुकानों में हुआ है। कुछ अन्य दुकानों यथा स्टेशनरी, चूड़ी, आलू, कोयला, किताबों आदि की दुकानों में भी नुक्सान हुआ है।

कुल 41 दुकानें लूटी गई हैं तथा 16 दुकानें जलाई गई हैं। इनमें से तीन दुकानें पूरी तरह नष्ट हो गई हैं। सम्पत्ति को नष्ट होने से बचाने तथा दंगाइयों को बंदी बनाने के लिये सघन प्रयास किये गये हैं। दरगाह इस सबसे पूरी तरह सुरक्षित रही है। सरदार पटेल ने दरगाह से जुड़े धार्मिक लोगों से अपील की कि वे इसकी सुरक्षा का पूरा ध्यान रखेंगे। उन्होंने सरकार की ओर से आशा व्यक्त की कि इस ऐतिहासिक नगरी में शीघ्र ही फिर से शांति स्थापित होगी।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

नेहरू को फटकार !

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अजमेर दंगे के बहाने से जवाहर लाल नेहरू जिस तरह की ओछी हरकतें कर रहे थे, उनसे सरदार पटेल को बड़ा क्रोध आया। उन्होंने नेहरू को फटकार लगाने का निश्चय किया।

सरदार के सार्वजनिक वक्तव्य को नेहरू ने अपनी व्यक्गितगत प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया और उन्होंने व्यक्तिशः अजमेर भ्रमण का कार्यक्रम बनाया किंतु अचानक ही पं. नेहरू के भतीजे की मृत्यु हो गई। इससे इस यात्रा को निरस्त करना पड़ा। नेहरू ने सोचा कि इससे अजमेर पर बुरा प्रभाव पड़ेगा क्योंकि अजमेर में उनकी बहुत उत्सुकता से प्रतीक्षा हो रही थी। यह यात्रा पूरे देश को यह दिखाने के लिये की जा रही थी कि सरकार इस प्रकार की स्थिति से बहुत चिंतित है तथा इससे निबटने में नेता व्यक्तिगत रूप से रुचि ले रहे हैं।

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नेहरू का मानना था कि दिल्ली के बाद देश में अजमेर ही दूसरा महत्वपूर्ण नगर है जहाँ हो रही घटनाओं का पूरे देश की नीतियों पर प्रभाव पड़ रहा है। इसलिये नेहरू ने अपने प्रमुख निजी सचिव एच. आर. वी. आर. आयंगर से कहा कि वे अजमेर जाकर अजमेर की जनता से नेहरू के न आने के लिये नेहरू की ओर से क्षमा मांगें। आयंगर ने 20 दिसम्बर 1947 को शनिवार के दिन अजमेर का दौरा किया। उसने अजमेर दंगे वाले स्थलों का निरीक्षण किया तथा एडवाइजरी कौंसिल के सदस्यों से विचार-विमर्श किया। उसने मुकुट बिहारी लाल एवं बालकृष्ण कौल से भी विचार-विमर्श किया। अगले दिन उसने मुस्लिम प्रतिनिधि मण्डलों, खादिमों, आर्य समाज के सदस्यों, महासभा के सदस्यों एवं प्रेस प्रतिनिधियों से बात की।

आयंगर के इस प्रकार विजिट करने से अजमेर का चीफ कमिश्नर शंकर प्रसाद बुरी तरह घबरा गया। उसे लगा कि इस यात्रा से यह छवि बनी है कि चीफ कमिश्नर न केवल स्थिति को संभालने में बुरी तरह विफल रहा अपितु उसने सरकार को पूरे तथ्य बताने में भी बेईमानी बरती है।

इसलिये शंकर प्रसाद ने गृहमंत्री सरदार पटेल के निजी सचिव वी. शंकर को एक पत्र लिखकर सूचित किया कि चीफ कमिश्नर को कम से कम यह ज्ञात होने का अधिकार होना चाहिये था कि उसने ऐसा क्या किया है जो उस पर विश्वास नहीं किया जा रहा है तथा जनता से उसके सम्बन्ध में प्रश्न किये जा रहे हैं। सरदार पटेल ने भी आयंगर की अजमेर यात्रा को पसंद नहीं किया था। सरदार पटेल ने नेहरू को फटकार लगाने का निश्चय किया।

23 दिसम्बर 1947 को पटेल ने आयंगर को पत्र लिखा कि इतने वरिष्ठ अधिकारी होने के नाते उसे यह सोचना चाहिये था कि उसकी इस यात्रा के क्या गंभीर प्रभाव होंगे ? उसकी इस यात्रा से अजमेर के चीफ कमिश्नर जैसे वरिष्ठ अधिकारी की कैसी विचित्र स्थिति हुई है जो कि एक प्रांत का मुखिया है ?

ऐसी स्थिति में चीफ कमिश्नर को पूरा अधिकार है कि वह मंत्रियों अथवा अपने विभाग के सचिव के अतिरिक्त हर अधिकारी का विरोध करे। पटेल ने आयंगर की इस बात के लिये भी भर्त्सना की कि उसने अजमेर-मेरवाड़ा को लेकर प्रेस में वक्तव्य जारी किया। इन परिस्थितियों में दिये गये इस वक्तव्य से ऐसा लगा है कि चीफ कमिश्नर द्वारा अजमेर में परिस्थति को संभालने के कार्य को लेकर प्रधानमंत्री में असंतोष है। यदि प्रधानमंत्री स्वयं नहीं जा सकते थे तो वे सरदार पटेल को अथवा गोपालस्वामी को अथवा किसी अन्य मंत्री को जाने के लिये कह सकते थे।

आयंगर ने यह पत्र नेहरू के समक्ष रख दिया। नेहरू समझ गए कि पटेल ने आयंगर को नहीं फटकारा है, यह फटकार नेहरू के लिए है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

नेहरू को पत्र

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यद्यपि सरदार पटेल अजमेर दंगे पर आयंग की यात्रा के लिए आयंगर के माध्यम से नेहरू को फटकार चुके थे किंतु इससे पटेल को संतोष नहीं हुआ। उन्होनें सीधे ही नेहरू को पत्र लिखने का निश्चय किया।

23 दिसम्बर 1947 को सरदार पटेल ने नेहरू को पत्र लिखकर कहा कि आयंगर की अजमेर यात्रा आश्चर्य में डालने वाली एवं धक्का पहुँचाने वाली थी। इस यात्रा के दो ही अर्थ निकलते हैं। पहला यह कि प्रधानमंत्री, गृहमंत्री द्वारा अजमेर को लेकर दिये गये वक्तव्य से असंतुष्ट थे।

दूसरा यह कि वे अजमेर के स्थानीय प्रशासन द्वारा की गई कार्यवाही से असंतुष्ट थे। इसलिये प्रधानमंत्री ने स्वतंत्र अभिमत जानने के लिये अपने प्रमुख निजी सचिव को अजमेर यात्रा पर भेजा। चीफ कमिश्नर या तो मंत्री के अधीन होता है या फिर सम्बन्धित विभाग के सचिव के अधीन होता है।

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पटेल ने चीफ कमिश्नर शंकर प्रसाद की प्रशंसा करते हुए लिखा कि वह यू. पी. का सबसे योग्यतम अधिकारी है जिसकी दक्षता, ईमानदारी एवं निष्पक्षता को चुनौती नहीं दी जा सकती। आयंगर की इस यात्रा ने शंकर प्रसाद को दुःखी किया है तथा उसकी छवि को कमजोर किया है। कौल तथा भार्गव द्वारा चीफ कमिश्नर के विरुद्ध एक अभियान चलाया गया था। इस यात्रा से आयंगर को कौल तथा भार्गव के बारे में सही जानकारी हो गई होगी। अतः आशा की जानी चाहिये कि अजमेर की यह यात्रा, इस प्रकार की अंतिम यात्रा होगी।

सरदार पटेल का पत्र निश्चित रूप से जवाहरलाल नेहरू पर अपने काम में हस्तक्षेप करने का आक्षेप था और खुली चुनौती भी कि भविष्य में इसे दोहराया न जाये। इस आक्षेप तथा चुनौती को सहन करना जवाहरलाल के लिये सहज नहीं था। जवाहरलाल ने उसी दिन पटेल को जवाब भिजवाया जिसमें उन्होंने लिखा कि यह यात्रा इन परिस्थितियों में व्यक्तिगत प्रकार की थी। इस यात्रा का उद्देश्य किसी अधिकारी अथवा उसके द्वारा किये गये कार्य पर कोई निर्णय देना नहीं था। यह जनता से सम्पर्क करने के लिये, विशेषतः पीड़ितों से सम्पर्क करने के लिये की गई ताकि उनका विश्वास जीता जा सके तथा उनके हृदय से भय को निकाला जा सके।

नेहरू ने सहमति व्यक्त की कि शंकर प्रसाद एक अच्छे और निष्पक्ष अधिकारी हैं किंतु यह समझ से परे है कि प्रधानमंत्री द्वारा किसी व्यक्ति को अजमेर भेज देने से उसकी प्रतिष्ठा अथवा छवि को धक्का कैसे पहुँच गया!

किसी भी परिस्थिति में जनता पर पड़ने वाला प्रभाव महत्वपूर्ण है न कि एक अधिकारी की प्रतिक्रिया। नेहरू ने लिखा कि जब लोगों के दिलों में घबराहट हो तथा मनोवैज्ञानिक परिस्थितियां उत्पन्न हो गई हों, तब केवल विशुद्ध प्रशासन कैसे काम कर सकता है! इससे तो कोई बड़ा हादसा घटित हो सकता है।

किसी अधिकारी की प्रतिष्ठा अथवा हमारी स्वयं की प्रतिष्ठा एक द्वितीय मुद्दा है यदि अन्य बड़े मुद्दे दांव पर लगे हुए हों। यदि हम प्रजा के साथ सही आचरण करेंगे तो हमारी प्रतिष्ठा स्वयं ही बन जायेगी। अधिकारियों के मामले में भी ऐसा ही है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

नेहरू द्वारा पदत्याग की इच्छा !

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अजमेर दंगे के बाद सरदार पटेल द्वारा जवाहर लाल नेहरू को लगाई गई फटकार से व्यथित होकर नेहरू द्वारा पदत्याग करने की इच्छा व्यक्त की गई!

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नेहरू ने सरदार को लिखा कि आपके और मेरे बीच में इस प्रकार की घटनाओं की प्रवृत्ति तथा कठिनाइयां उत्पन्न होने से मैं बहुत अप्रसन्न हूँ। ऐसा लगता है कि आपकी और मेरी कार्य करने की प्रवृत्ति अलग-अलग प्रकार की है। यद्यपि आप और मैं एक दूसरे का बहुत आदर करते हैं तथापि हम दोनों के बीच जो विषय खड़ा हो गया है, इसे हम सबके द्वारा बहुत सावधानीपूर्वक लिया जाना चाहिये। यदि मुझे प्रधानमंत्री रहना है तो मुझ पर इस तरह के प्रतिबंध से मुक्ति होनी चाहिये। अन्यथा मेरे लिये यही उचित है कि मैं कुर्सी छोड़ दूं।

मैं जल्दबाजी में कोई कदम नहीं उठाना चाहता और न यह चाहता हूँ कि आप ऐसा करें। इसलिये हम दोनों को इस परिस्थिति पर गहरा विचार करना चाहिये ताकि हमारे निर्णय राष्ट्र के लिये हितकारी हो सकें। हमने और आपने देश की लम्बी सेवा की है। यदि दुर्भाग्य से आपको अथवा मुझे सरकार से हटना पड़े तो इसे प्रतिष्ठापूर्ण एवं गरिमापूर्ण विधि से होने देना चाहिये। मैं प्रसन्नता पूर्वक त्यागपत्र देने और सत्ता आपको सौंपेने के लिये तैयार हूँ। नेहरू द्वारा पदत्याग की इच्छा व्यक्त करने वाले इस पत्र का उल्लेख इतिहास में बहुत कम हुआ है।

सरदार पटेल ने नेहरू के इस पत्र का प्रत्युत्तर दिया जिसमें उन्होंने लिखा कि यह सही है कि विभिन्न विषयों एवं मुद्दों पर आपके और मेरे काम करने के ढंग में अंतर है किंतु निष्कर्षतः अथवा अंतिम निर्णय के रूप में यह कहा जा सकता है कि आपमें और मुझमें कोई भेद नहीं है। हम दोनों देश के भले के लिये एक समान उद्देश्य से काम कर रहे हैं। पटेल ने लिखा कि आयंगर का अजमेर भेजा जाना गलत था।

मैं आपकी स्वतंत्रता को सीमित नहीं करना चाहता और न ही मैंने पहले कभी ऐसा किया है। न मेरा उद्देश्य आपके लिये किसी प्रकार की कोई समस्या खड़ी करना है किंतु जब यह हम दोनों को ही अपने उत्तरदायित्वों के क्षेत्र के आधारभूत प्रश्न, अधिकार तथा कार्यों में विरोधाभास स्पष्ट हों तब यह हमारे उन उद्देश्यों के लिये हितकारी नहीं होगा जो कि हम दोनों ही करना चाहते हैं।

इस पत्र के मिलने के बाद जवाहर लाल नेहरू ने सरदार पटेल को गांधीजी के निवास पर मिलने का सुझाव दिया ताकि इस विषय पर आगे विचार-विमर्श किया जा सके। 6 जनवरी 1948 को नेहरू ने गांधीजी को एक नोट भिजवाया तथा उसकी एक प्रति सरदार पटेल को भिजवाई।

सरदार ने नेहरू के निमंत्रण को स्वीकार कर लिया तथा उन्हें संदेश भिजवाया कि जो भी समय उन्हें उचित लगता हो, वे गांधीजी से तय कर लें। सरदार ने भी एक नोट गांधीजी को भिजवाया तथा उसकी प्रति नेहरू को दी।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

पटेल-नेहरू विवाद काल के गर्त में समा गया!

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जवाहर लाल नेहरू ने सरदार पटेल के साथ मिलकर एक-दूसरे की शिकायतें सुनने का निर्णय किया किंतु उसके कुछ दिन बाद ही गांधीजी की हत्या हो गई। इसके कारण नेहरू और पटेल की बैठक नहीं हो सकी तथा इसी के साथ पटेल-नेहरू विवाद काल के गर्त में समा गया।

नेहरू ने अपने नोट में गांधीजी को अजमेर दंगे के प्रकरण के सम्बन्ध में घटी घटनाओं के सम्बन्ध में जानकारी दी तथा पटेल-नेहरू विवाद को स्पष्ट करते हुए पूछा कि क्या प्रधानमंत्री इस प्रकार का कदम उठाने के लिये अधिकृत थे। इस बात का निर्णय किसे लेना था ?

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यदि प्रधानमंत्री को इस प्रकार का कदम उठाने का अधिकार नहीं था, और न ही इस सम्बन्ध में निर्णय लेने का अधिकार था तो वे इस पद पर ढंग से काम नहीं कर सकेंगे और न ही अपने दायित्वों का निर्वहन कर सकेंगे। नेहरू ने इस नोट में गांधी को लिखा कि यह तो पृष्ठभूमि है किंतु निरंतर उठ रही व्यावहारिक कठिनाईयों के सम्बन्ध में सिद्धांत क्या रहेगा ?

यदि सीधे शब्दों में कहें तो कैबीनेट में कुछ व्यवस्थायें करने की आवश्यकता है जो एक व्यक्ति पर उत्तरदायित्व का निर्माण कर सके। वर्तमान परिस्थितियों में या तो मैं जाऊँ या सरदार जायें। जहाँ तक मेरा प्रश्न है, मैं जाने को तैयार हूँ। मेरा या हम दोनों में से किसी एक का सरकार से बाहर जाने का अर्थ यह नहीं है कि हम आगे से एक दूसरे का विरोध करेंगे। हम सरकार के भीतर रहें अथवा बाहर, हम विश्वसनीय कांग्रेसी रहेंगे, विश्वसनीय साथी रहेंगे तथा हम अपने कार्यक्षेत्र में फिर से एक साथ आने के लिये कार्य करेंगे।

सरदार पटेल ने अपने पत्र में प्रधानमंत्री के दायित्वों के सम्बन्ध में नेहरू की धारणा से असहमति व्यक्त की। यदि प्रधानमंत्री इसी प्रकार कार्य करेगा तो वह एक निरंकुश शासक बन जायेगा। प्रधानमंत्री, सरकार में, बराबर के मंत्रियों में सबसे पहला है। वह अपने साथियों पर कोई बाध्यकारी शक्तियां नहीं रखता।

पटेल ने गांधी को लिखा कि प्रधानमंत्री ने अपने नोट में लिखा है कि यदि प्रधानमंत्री तथा गृहमंत्री के बीच सामंजस्य नहीं बनता है तो एक को जाना होगा। यदि ऐसा ही होना है तो मुझे जाना चाहिये। मैंने सक्रिय सेवा का दीर्घ काल व्यतीत किया है। प्रधानमंत्री देश के जाने-माने नेता हैं तथा अपेक्षाकृत युवा हैं।

उन्होंने अपने लिये अंतर्राष्ट्रीय छवि स्थापित की है। मुझे कोई संदेह नहीं है कि मेरे और उनके बीच में निर्णय उनके पक्ष में होगा। इसलिये उनके कार्यालय छोड़ने का कोई प्रश्न ही नहीं है।

इन दोनों नेताओं के मध्य, गांधीजी के समक्ष होने वाला विचार-विमर्श गांधीजी के उपवास के कारण स्थगित कर देना पड़ा। इसके अन्य कारण भी थे। कश्मीर समस्या अपने चरम पर पहुँच गई थी तथा देश में साम्प्रदायिक तनाव भी अपने उच्चतम स्तर पर था। भारत सरकार इस समय संक्रांति काल में थी। एक छोटा सा धक्का भी बहुत बड़ा नुक्सान पहुँचा सकता था।

अंत में गांधी की मृत्यु पर दोनों ने एक दूसरे को गले लगा लिया और उसके बाद उनके झगड़े सदैव के लिये मिट गये। दोनों ने एक साथ देश को सम्बोधित किया तथा जनता को संभावित हिंसा से दूर रहने का आह्वान किया।गांधी की हत्या ने नेहरू और पटेल को एक किया। इसी के साथ पटेल-नेहरू विवाद काल के गर्त में समा गया तथा पटेल और नेहरू के बीच रहने वाला स्थाई विरोध और मतभेद काल के गर्त में समा गये।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

भीमराव अम्बेडकर की नियुक्ति में पटेल की भूमिका

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सरदार पटेल ने डॉ. भीमराव अम्बेडकर को प्रारूप समिति का अध्यक्ष बनाने का निश्चय किया किंतु भीमराव अम्बेडकर की नियुक्ति में कठिनाई यह थी कि उस काल की कांग्रेस में डॉ. भीमराव अम्बेडकर का कद इतना ऊँचा नहीं था।

जिस समय भारत की संविधान सभा का गठन हुआ और संविधान का प्रारूप बनाने के लिए प्रारूप समिति का गठन किया गया, तब कांग्रेस को एक ऐसे नेता की तलाश थी जो अंतर्राष्ट्रीय कानूनों का ज्ञाता हो तथा भारत की राजनीति में सभी पक्षों को स्वीकार हो सके। गांधी, जिन्ना एवं नेहरू लंदन में बैरिस्ट्री की पढ़ाई करके आए थे।

ये तीनों ही अंतर्राष्ट्रीय कानूनों के ज्ञाता थे किंतु ये तीनों ही संविधान का प्रारूप बनाने के लम्बे कार्य को करने के लिए समय निकालने में असमर्थ थे। इसलिए सरदार पटेल की दृष्टि डॉ. भीमराव अम्बेडकर पर गई जो गांधी, जिन्ना एवं नेहरू की तरह लंदन में रहकर बैरिस्ट्री की पढ़ाई करके आए थे तथा अंतर्राष्ट्रीय कानूनों के ज्ञाता थे।

सरदार पटेल ने डॉ. भीमराव अम्बेडकर को प्रारूप समिति का अध्यक्ष बनाने का निश्चय किया किंतु भीमराव अम्बेडकर की नियुक्ति में कठिनाई यह थी कि उस काल की कांग्रेस में डॉ. भीमराव अम्बेडकर का कद इतना ऊँचा नहीं था। इससे भी बड़ी कठिनाई यह थी कि डॉ. भीमराव अम्बेडकर के गांधीजी एवं जिन्ना दोनों से सम्बन्ध अच्छे नहीं थे।

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अम्बेडकर सरे आम गांधीजी की आलोचना किया करते थे और उन्हें राजनीति से संन्यास लेने की सलाह दिया करते थे। इसलिए किसी कांग्रेसी नेता में हिम्मत नहीं थी कि इतनी महत्वपूर्ण समिति के लिए अम्बेडकर का नाम सुझा सके। सरदार पटेल डॉ. भीमराव अम्बेडकर की योग्यता, विद्वता एवं परिश्रमशील स्वभाव से परिचित थे। उन्होंने यह भी पता था कि उस काल की राजनीति में डॉ. अम्बेडकर ही एक मात्र ऐसे कानूनविद् थे जिन्हें हिन्दुओं एवं मुसलमानों के बीच की समस्या की गहराई तक जानकारी थी।

डॉ. अम्बेडकर अनेक बार सार्वजनिक मंचों से हिन्दुओं में व्याप्त छुआछूत एवं भेदभाव की समस्या पर बोल चुके थे किंतु इसके साथ ही वे इस्लाम के सम्बन्ध में भी खुलकर विचार प्रकट करने का साहस रखते थे। वे जानते थे कि यदि मुसलमान भारत में रहे तो वे कभी भी हिंदुओं को शांति से नहीं जीने देंगे। डॉ. भीमराव अम्बेडकर में एक विशेषता और थी जो उस काल के किसी भी नेता में नहीं थी, वह विशेषता थी उनका सच बोलने के प्रति उत्साह। वे किसी बात को गांधीजी की तरह चाशनी में लपेटकर, अल्पसंख्यकों के प्रति अनावश्यक आग्रह दिखाकर अपनी राजनीति आगे नहीं बढ़ाते थे।

डॉ. अम्बेडकर भारत जैसे विशाल देश में बड़ी संख्या में निवास करने वाली एवं दलित जातियों को शैक्षिक रूप से योग्य बनाकर आर्थिक रूप से सक्षम बनाना चाहते थे। इसलिए अंग्रेजों द्वारा पैदा की गई आरक्षण जैसी बुराइयों से दलित जातियों को अलग रखना चाहते थे।
इसलिए सरदार पटेल ने डॉ. अम्बेडकर को ही प्रारूप समिमिति का अध्यक्ष बनवाने का संकल्प किया।

संविधान सभा में सरदार पटेल ने सक्रिय भूमिका निभाई। उन्होंने भीमराव अम्बेडकर की नियुक्ति संविधान की प्रारूप समिति के अध्यक्ष के पद पर करवाने के लिए नेताओं को सहमत किया तथा अम्बेडकर के पक्ष में वातावरण तैयार किया।

सरदार पटेल संविधान सभा की अनेक महत्त्वपूर्ण सामितियों यथा अल्पसंख्यक समिति, आदिवासी समिति, मौलिक अधिकार समिति तथा प्रांतीय संविधान समिति के अध्यक्ष थे।

पटेल ने संविधान सभा में प्रांतीय संविधान का मॉडल प्रस्तुत किया जिसमें राज्यपालों को अत्यंत सीमित अधिकार दिये गये। पटेल चाहते थे कि राज्यपाल किसी भी स्थिति में, चुनी गई सरकार के कामकाज को प्रभावित न करें। पटेल ने ही राष्ट्रपति द्वारा संसद में दो एंग्लो इण्डियन्स को नामित करने का प्रावधान करवाया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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