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भारतीय नागरिक सेवाएँ बनाए रखने का निर्णय लिया पटेल ने!

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भारत की आजादी के बाद जवाहर लाल नेहरू भारतीय नागरिक सेवाएँ भंग करना चाहते थे किंतु सरदार पटेल ने देश का शासन चलाने के लिए भारतीय नागरिक सेवाएँ बनाए रखने का निश्चय किया ताकि देश को मजबूत शासन तंत्र दिया जा सके!

स्वतंत्रता प्राप्ति के समय भारतीय नागरिक सेवाओं (आईसीएस) में दक्षिण भारतीयों का बोलबाला था। दक्षिणात्य अधिकारियों की नौकरशाही इस कदर हावी थी कि अंग्रेजों के राज्य में यह कहावत चल पड़ी थी कि देहली इज रूल्ड आईदर बाई मद्रासी और बाई चपरासी। भारत की स्वतंत्रता के समय यह नौकरशाही बहुत काम आई। इसने आगे बढ़कर स्वेच्छा से अपनी सेवाएं, राष्ट्रीय नेताओं को दीं। यही कारण था कि सरदार पटेल का अत्यधिक झुकाव भारतीय नागरिक सेवाओं के अधिकारियों की तरफ रहता था।

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भारत की आजादी के समय राजपूताना के चारों बड़े राज्यों के प्रधानमंत्री भी दक्षिण भारतीय थे। वे देश की राजनीति में एक शक्तिशाली समूह के रूप में कार्य करने में सक्षम रहे। उदयपुर में सर टी. विजयराघवाचारी, जयपुर में सर वी. टी. कृष्णामाचारी, जोधपुर में सी. एस. वेंकटाचार एवं बीकानेर में सरदार के. एम. पनिक्कर दीवान के पद पर कार्यरत थे। वे चारों ही अच्छे मित्र थे

तथा उन्हें एक दूसरे का विश्वास प्राप्त था इसलिये उन्होंने निकट संगति के साथ कार्य किया और राजपूताना के इन चारों देशी राज्यों ने भारत की राजनीति में सम्मिलित प्रभाव बनाया। राज्यों के भारत में विलय तथा बाद में राजस्थान में सम्मिलन में भी इन दक्षिणात्य प्रधानमंत्रियों की भूमिका प्रभावी एवं सकारात्मक रही। सर वी. टी. कृष्णामाचारी (जयपुर), सरदार के. एम. पनिक्कर (बीकानेर), एम. ए. श्रीनिवासन (ग्वालियर), सर बी. एल. मित्रा (बड़ौदा) एवं सी. एस. वेंकटाचार (जोधपुर) ने इस महान उद्देश्य के लिये दोनों पक्षों को एक साथ लाने तथा देश को बलकान प्रांतों की तरह बिखरने से बचाने के लिये कठोर परिश्रम से कार्य किया।

उनके महान प्रयासों के बिना, 3 जून 1947 को माउण्टबेटन द्वारा भारत को स्वतंत्रता दिये जाने की घोषणा करने के बाद से लेकर 15 अगस्त 1947 तक की मात्र 11 सप्ताह की अवधि में इस कार्य को पूरा नहीं किया जा सकता था।

लंदन से बैरिस्टरी करने के कारण तथा अपने व्यक्तित्व की विलक्षणता के कारण सरदार पटेल इन अधिकारियों के अनुभव और ज्ञान का लाभ उठाने में समर्थ थे। यद्यपि भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू का मानना था कि इस सेवा के अधिकारियों में अहंकार की मात्रा अधिक है जो कि प्रजातंत्र के लिये अनुकूल नहीं है। भारत की गरीब जनता के उत्थान के लिये विनम्र सेवकों की आवश्यकता है न कि अहंकारी कठोर अधिकारियों की।

इसलिये आजादी के बाद नेहरू ने चाहा कि इन सेवाओं को समाप्त कर दिया जाये किंतु सरदार पटेल ने इन अधिकारियों की आवश्यकता को समझते हुए उन्हें बनाये रखने एवं उनका भारतीयकरण करने का पक्ष लिया।

संसद में चली लम्बी बहस के बाद अंत में पटेल की ही जीत हुई। इस प्रकार गृहमंत्री के नाते उन्होंने भारतीय नागरिक सेवाओं (इण्डियन सिविल सर्विसेज) का भारतीयकरण करके उन्हें भारतीय प्रशासनिक सेवा में बदल दिया तथा अंग्रेजों की सेवा करने वाले काले साहबों को राजभक्ति से देशभक्ति की ओर मोड़ दिया। यदि सरदार पटेल कुछ वर्ष और जीवित रहते तो भारतीय नौकरशाही का पूर्ण कायाकल्प हो जाता।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

फांसी चढ़ाने का अधिकार

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देशी रियासतों के राजाओं के पास अपनी जनता को सजा देने के अधिकार थे। वे किसी को भी फांसी पर चड़ा सकते थे।सरदार पटेल नहीं चाहते थे कि भारत की आजादी के बाद भी राजाओं के पास प्रजा को फांसी चढ़ाने का अधिकार हो!

देशी राज्यों को भारत में सम्मिलित कर लेना सरदार पटेल की बड़ी सफलता थी किंतु यह सफलता तब तक अधूरी थी जब तक देशी राज्यों में प्रजातांत्रिक शासन व्यवस्था स्थापित न हो जाये। स्वतंत्र भारत में मिलने से पहले देशी राज्य अंग्रेजों के अधीन थे तथा अंग्रेजों को इन राज्यों में अबाध राज्य करने का अधिकार था।

यहाँ तक कि किसी भी राज्य में कोई राजा तब तक ही अपने सिंहासन पर बना रह सकता था जब तक कि अंग्रेज उससे खुश था। यह खुशी प्रायः तब तक ही बनी रहती थी जब तक उस राज्य का खजाना, अंग्रेजों को लूट के लिये उपलब्ध रहता था। बड़े से बड़े राज्य में उत्तराधिकारी भी अंग्रेज अपनी पसंद से चुनता था और उसे राजा बनाता था किंतु स्वतंत्र भारत में राजाओं की स्थिति बदल चुकी थी। उन्होंने केवल रक्षा, संचार और विदेश मामले ही भारत सरकार को समर्पित किये थे। शेष मामलों में वे पूरी तरह स्वतंत्र हो गये थे।

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अंग्रेजों के जाने के बाद देशी राजा बड़ी शान से अपने स्वर्ण मुकुट और चमकीली पगड़ियां पहन सकते थे तथा अपने गगनचुम्बी राजप्रासादों में विलासिता का जीवन जी सकते थे। वे अपनी दीन-हीन प्रजा को बात-बात पर फांसी पर चढ़ा सकते थे और अपने राज्य के समस्त प्राकृतिक संसाधनों एवं प्रजा से मिलने वाले विभिन्न करों को अपनी विलासिता पर खर्च कर सकते थे। यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा कि भारत की आजादी का असली मजा राजा लोगों को ही आने वाला था।

पटेल नहीं चाहते थे कि दो गांवों से लेकर बड़े से बड़े राजा के पास प्रजा को फांसी चढ़ाने का अधिकार बना रहे। इसलिये इन रियासतों को लोकतांत्रिक शासन प्रणाली के अंतर्गत लाना अनिवार्य हो गया। पटेल ने भारतीय नरेशों को समझाया कि आधुनिक विश्व की तरह देशी राज्यों में भी राजसत्ता का प्रयोग जनता के द्वारा एवं जनता के कल्याण के लिए होना चाहिए। उन्होंने राजाओं को चेतावनी दी कि किसी भी देशी राज्य में अशान्ति एवं अव्यवस्था सहन नहीं की जायेगी। देशी रियासतों में प्रजा मण्डल आंदोलन, आजादी के पहले से ही चल रहे थे

किंतु उन्हें अपने प्रयासों में आंशिक सफलता ही मिली थी। कुछ बड़े राज्यों में लोकप्रिय मंत्रिमण्डलों का गठन हुआ था किंतु उनमें प्रधानमंत्री से लेकर सामान्य मंत्रियों के अधिकांश पद राजाओं के रिश्तेदारों के पास थे। कुछ राज्यों में स्थानीय संविधानों का निर्माण भी हुआ था किंतु उनमें भी जागीरदारों को सामान्य जनता से अधिक अधिकार दिये गये थे।

कुछ देशी राज्यों में निर्वाचन पद्धति के आधार पर भी सरकारों का गठन हुआ था किंतु उनके संविधानों का निर्माण इस प्रकार किया गया था कि अधिक संख्या में जमींदार ही चुने जा सकें।

पटेल चाहते थे कि समस्त देशी रियासतों की प्रजा को भी भारतीय प्रांतों की प्रजा के समान आर्थिक, शैक्षणिक एवं अन्य क्षेत्रों में समान अवसर एवं सुविधाएं मिलें परन्तु राजाओं और उनके जागीरदारों के बने रहने तक ऐसा हो पाना संभव नहीं था।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

देशी राज्यों का विलय

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देशी राज्यों का विलय स्वतंत्र भारत के सामने एक उलझन भरी समस्या बन गया। राजा लोग किसी भी कीमत पर न अपने राज्य छोड़ना चाहते थे और न अधिकार।

भारत संघ में रह गये 554 देशी राज्यों में से अधिकांश, आर्थिक दृष्टि से इतने कमजोर एवं छोटे थे कि वे अपने संसाधनों से एक छोटी सी सड़क भी नहीं बनवा सकते थे। बड़ी रियासतों में भी शासन की पद्धति इतनी पुरानी और मध्यकालीन थी कि प्रजा का सहज विकास संभव नहीं था।

अतः पटेल ने देशी राज्यों का एकीकरण करके संतुलित प्रशासनिक इकाइयां गठित करने का निर्णय लिया। यह काम आसान नहीं था। राजाओं को अपने स्वर्ण मुकुट और चमकीली पगड़ियां उतारने, गगनचुम्बी राजप्रासादों का त्याग करने तथा दीन-हीन प्रजा पर शासन करने का अबाध अधिकार छोड़ने के लिये मनाना एक तरह से असंभव को संभव कर दिखाने जैसा था। अंग्रेजों के जाने के बाद छोटे-से छोटे राजा को अपनी निरीह प्रजा को फांसी पर चढ़ाने का मनमाना अधिकार मिल गया था। इस अधिकार को राजा लोग भला क्यों त्यागने वाले थे ?

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राजाओं को अपने राज्य के समस्त प्राकृतिक संसाधनों एवं प्रजा से मिलने वाले विभिन्न करों को खर्च करने का अधिकार मिल गया था, ऐसे खीर भरे कटोरे को भला कौन राजा त्यागने को तैयार होता ?

सरदार पटेल जानते थे कि देशी राज्यों का विलय करने से पहले एक जोर का झटका इन राजाओं को दिया जाना आवश्यक है। सौभाग्य से देश की परिस्थितियां सरदार पटेल के अनुकूल थीं। देशी राज्य हमेशा के लिये भारत में आ चुके थे, वे भागकर बाहर नहीं जा सकते थे। उनका संरक्षण करने वाला अंग्रेज, सात समंदर पार जा चुका था। राजाओं को विद्रोह के लिये उकसाने वाला जिन्ना पाकिस्तान में अपनी जीत का जश्न मना रहा था। प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को वैसे ही देशी राजाओं के नाम से चिढ़ थी। अतः 554 रियासतों के राजाओं से उनके मुकुट उतरवाना, पटेल के जीवन का अंतिम लक्ष्य बन गया।

पटेल को सूचना मिली कि बस्तर नामक रियासत में सोने का बड़ा भण्डार है। इस भूमि को दीर्घकालिक पट्टे के आधार पर हैदराबाद का निजाम खरीद रहा है। सरदार ने उसी दिन अपना थैला उठाया और वी. पी. मेनन के साथ बस्तर चल पड़े। बस्तर से निबटकर सरदार पटेल और वी. पी. मेनन उड़ीसा पहुंचे तथा उस क्षेत्र के 23 राजाओं को उड़ीसा नामक प्रांत में एकीकृत होने के लिये तैयार कर लिया।

इसके बाद पटेल और मेनन नागपुर पहुंचे तथा वहाँ के 38 राजाओं से मिले। इन्हें सैल्यूट स्टेट कहा जाता था। पटेल ने इन राज्यों से आखिरी सलामी ली और इन्हें भी प्रजातांत्रिक व्यवस्था में ले आया गया। इसके बाद पटेल काठियावाड़ पहुंचे जहाँ 250 बौनी रियासतें थीं। पटेल ने इन रियासतों का भी एकीकरण कर लिया।

पटेल का अगला पड़ाव बम्बई हुआ। वहाँ उन्होंने दक्षिण भारत की रियासतों को अपनी गठरी में बांधा और पंजाब आ गये। पटियाला का खजाना खाली था, सरदार ने परवाह नहीं की। फरीदकोट के राजा ने आनाकानी की तो पटेल ने फरीदकोट के नक्शे पर लाल पैंसिल घुमाते हुए पूछा कि क्या मर्जी है ?

राजा कांप उठा और पटेल की बात मानने पर सहमत हो गया। इस प्रकार राजाओं को उनके सिंहासनों से उतारकर सामान्य इंसान बना दिया गया। भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र बन गया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

पटेल का व्यावहारिक रुख

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पांच सौ चौवन राजाओं के सैंकड़ों साल पुराने राज्य खत्म होने जा रहे थे, मुसलमान अपना बोरिया-बिस्तर लेकर पाकिस्तान भाग रहे थे। सिक्खों के सैलाब पश्चिमी पंजाब से भारत की तरफ भागे चल आ रहे थे। सिंध प्रदेश पाकिस्तान में छूट गया था, देश में चारों तरफ अफरा-तफरी मची हुई थी। ऐसी स्थिति में सरदार पटेल का व्यावहारिक रुख भारत के बहुत काम आया।

सरदार पटेल जितने दृढ़ संकल्प के धनी थे, उतने ही व्यावहारिक भी थे। वे थोथे आदर्शों को व्यर्थ मानते थे और हर समय अपनी दृष्टि लक्ष्य पर गढ़ाये रहते थे। इसलिये उन्होंने राजाओं के साथ जोर-जबरदस्ती के स्थान पर, व्यावहारिक बुद्धि से काम लिया। उन्होंने राजाओं को अनेक राजसी सुविधायें, प्रिवीपर्स की लम्बी रकमें तथा राजप्रमुख और उपराजप्रमुख के पदों का लालच देकर अपनी राजनीति को सफल बनाया।

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कपूरथला रियासत के दीवान जरमनी दास ने राजाओं को दी गई सुविधाओं के बारे में लिखा है- पटेल ने राजाओं को जी खोलकर सुविधायें दीं। राजाओं के महल उनके अधिकार में रहेंगे। उन्हें समस्त प्रकार के करों से मुक्ति मिलेगी। उनके महलों में बिजली, पानी मुफ्त मिलेगा। उन्हें अपनी मोटरों पर खास लाल रंग की प्लेट लगाने की छूट होगी। वे अपनी मोटरों और महलों पर रियासती झण्डा लगा सकेंगे। वे जब विदेशों से लौटेंगे तो उनके सामान की जांच नहीं होगी। उन्हें अदालतों में हाजिरी से छूट रहेगी।

भारत सरकार की अनुमति के बिना, किसी महाराजा पर दीवानी या फौजदारी मुकदमा नहीं चलेगा। उन्हें फौजी सलामियां, तोपों की सलामियां, और लाल कालीन के दस्तूर वैसे ही मिलेंगे जैसे कि अंग्रेजों के समय मिलते थे। वे अपने महलों पर सैनिक गार्ड रख सकेंगे। महाराजाओं को अपने करोड़ों रुपयों के हीरे जवाहरात, सिवाय राजमुकुट के जवाहरातों के जो रियासत की सम्पत्ति समझे जाते थे और असली निकाल कर नकली लगा दिये गये, रखने का अधिकार रहा।

राजाओं द्वारा लाखों रुपयों के मूल्य के असली मोतियों के हार नकली मोतियों के हारों से बदल दिये गये। बड़ौदा के राजा ने दो करोड़ रुपये मूल्य का सात लड़ियों का मोतियों का हार, तीन बेशकीमती हीरों वाला हार, स्टार ऑफ साउथ, यूजीन, शाहे अकबर नामक विख्यात रत्न तथा मोती टँके दो कालीन, बड़ौदा के खजाने से गायब कर दिये।

सरदार पटेल ने जानबूझकर राजाओं की इस लुटेरी प्रवृत्ति की ओर से आंखें मूंद लीं। पटेल को ज्ञात था कि प्रजा को राजाओं के सामंती शासन के चंगुल से बाहर निकालने के लिये चुकाई गई यह कीमत बहुत कम है। इस प्रकार राजाओं ने सरदार के जाल में फंसकर अपनी शासन-सत्ता और अधिकार भारत सरकार को दे दिये तथा भेड़ों की तरह पंक्तिबद्ध होकर एकीकरण के दस्तावेजों पर हस्ताक्षर कर दिये। पटेल का व्यावहारिक रुख अच्छे परिणाम देने में सफल रहा।

राजाओं के प्रिवीपर्स तथा सुविधाओं के मामले तय करने में एक साल से अधिक समय लगा। भारत सरकार की ओर से विश्वास दिलाया गया कि राजाओं के अधिकार, सुविधायें और खिताब, जो उन्होंने भारत की ब्रिटिश सरकार से संधियों एवं सेवाओं के बदले प्राप्त किये थे, उन्हें भारत सरकार द्वारा मान्यता देकर सुरक्षित रखा जायेगा। राजाओं को सरदार पर भरोसा हो गया, भरोसा करने के अतिरिक्त कोई चारा भी नहीं था।

इसलिये उन्होंने जो मिल रहा था, उसे लेकर अपने राज्य छोड़ दिये। उनके स्वर्ण मुकुट उतर चुके थे, अब तो केवल चमकीला रंग ही शेष था जिसे साफ करने का काम आगे चलकर भारत की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को करना था।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

राजाओं का धन नहीं, उनके राज्य चाहिये थे!

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जब भारत सरकार राजाओं से उनके राज्य छीन रही थी, तब सरदार पटेल ने अत्यंत व्यावहारिक रुख अपाया। लोग चाहते थे कि राजा लोग अपना धन और महल छोड़कर निकल जाएं किंतु सदार पटेल को राजाओं का धन नहीं, उनके राज्य चाहिये थे!

सदार पटेल ने भारत के 554 राजाओं के राज्य, भारत में मिलाये थे। जब राजाओं को उनके राज्य जाते दिखे तो उन्होंने अपने महलों, कोषागारों एवं राजकीय भवनों में रखी धन-सम्पत्ति को छिपाना आरम्भ कर दिया। अनेक राजाओं ने राजकीय सम्पत्ति को भी हड़प लिया। हैदराबाद तथा भोपाल तथा पटियाला आदि रियासतों के राजाओं ने अपने महलों, कारों, बग्घियों एवं पालकियों पर लगे सोने-चांदी के पतरे उखाड़ लिये।

सोने-चांदी के बरतन गलाकर उन्हें धातुओं में बदल दिया। महलों की छतों पर लगे हीरे-जवाहरात गायब कर दिये। खजानों में रखे कीमती पत्थर, मोतियों की मालायें और रत्नाभूषण महलों से निकालकर अन्यत्र पहुंचा दिये। कुछ राजाओं ने स्वयं को काश्तकार घोषित करके खेती की जमीनों पर कब्जा कर लिया। राज्य की कीमती जमीनें अपने दास-दासियों एवं कुत्ते-बिल्लियों के नाम कर दी गई। राजाओं का धन राजाओं के महलों से रातों-रात गायब हो गया!

राजाओं की इन कार्यवाहियों से कांग्रेसी कार्यकर्त्ताओं में बेचैनी व्याप्त हो गई तथा भारत भर के राजाओं के विरुद्ध तरह-तरह की शिकायतें सरदार पटेल के पास पहुंचने लगीं। पटेल को मानव मन की गहरी समझ थी। वे जानते थे कि यह अस्वाभाविक नहीं है। भविष्य की आशंका से ग्रस्त कौन मानव ऐसा नहीं करेगा! इसलिये पटेल ने राजाओं को आश्वस्त करते हुए यह वक्तव्य दिया कि मुझे राजाओं के राज्य चाहिये, राजाओं का धन नहीं।

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पटेल ने उदार भाव से राजाओं के महल, बग्घियां, कारें, सोने-चांदी और रत्नों के भण्डार उनके पास रहने दिये। इस पर भी कुछ राजाओं की भूख शांत नहीं हुई। वे तरह-तरह की समस्याएं उठाने लगे। फिर भी सरदार पटेल ने अत्यंत उदारता से राजाओं की समस्याओं का निराकरण किया।

बांसवाड़ा के महारावल ने राज्य के जंगलों पर, निजी सम्पत्ति होने का दावा किया तथा भारत सरकार से शिकायत की कि आदिवासी, राजाओं की निजी सम्पत्ति में आने वाले जंगलों को भी काट रहे हैं, जंगलों में स्थित भवनों में तोड़-फोड़ कर रहे हैं एवं कृषि क्षेत्र को हानि पहुंचा रहे हैं। महाराजा जयपुर ने मांग की कि उनके दिल्ली स्थित जयपुर भवन में स्थित साजोसामान, पशुधन एवं आदमियों का खर्चा सरकार द्वारा वहन किया जाये। जयपुर भवन महाराजा की निजी सम्पत्ति मान लिया गया था इसलिये सरकार ने इस व्यय को उठाने से मना कर दिया।

झालावाड़ के महाराजराणा ने अपने महलों के बिजली व्यय के पुनर्भरण की मांग की तो रियासती विभाग ने महाराजराणा को लिखा कि जिन महलों एवं भवनों को राजाओं की व्यक्तिगत सम्पत्ति घोषित कर दिया गया है, उनके विद्युत व्यय एवं विद्युत संस्थापन आदि का व्यय राजाओं के प्रिवीपर्स में से किया जाये न कि राज्य व्यय से। टोंक तथा किशनगढ़ आदि कुछ रियासतों ने राजस्थान में विलय से ठीक पहले ही राजमाताओं (शासक की माता, विधवा बुआ अथवा दादी) को जागीरें प्रदान कीं ताकि राजमाताओं को अधिक से अधिक भत्ते प्राप्त हो सकें। रियासती विभाग ने इन प्रकरणों की जांच करवाने के आदेश दिये।

सरदार पटेल की अध्यक्षता वाले रियासती विभाग ने समस्त प्रांतों के मुख्य सचिवों को निर्देशित किया कि कई पूर्व रियासतों की राजमाताओं से शिकायतें प्राप्त हो रही हैं कि उन्हें भत्तों का भुगतान समय पर नहीं हो रहा है। अतः शासकों तथा राजमाताओं को इस सम्बन्ध में सूचना भिजवायी जाये कि इस विषय पर क्या कार्यवाही की जा रही है।

विभिन्न संघ इकाइयों में सम्मिलित पूर्व रियासतों के शासकों ने रियासती विभाग को सूचित किया कि जिन राजमाताओं को पूर्व में राज्यकोष से भत्ते मिलते रहे थे, उनके बंद हो जाने के कारण शासकों द्वारा अपने प्रिवीपर्स में से भुगतान किया जा रहा है।

राजपरिवारों के सदस्यों, विशेषतः राजमाताओं को भत्तों का भुगतान अलग से किया जाये। रियासती विभाग ने निर्णय दिया कि जिन सदस्यों को पहले से ही अलग से भत्ते मिल रहे थे, उन्हें राज्य के राजस्व से भत्तों का भुगतान किया जाना चाहिये न कि शासकों के प्रिवीपर्स से। शासक के प्रिवीपर्स में शासक के बच्चे एवं पत्नियां ही सम्मिलित की गयी हैं। ये भत्ते जीवन भर के लिये दिये जाने चाहिये।

जयपुर महाराजा ने राजस्थान के एकीकरण के पश्चात् कुछ स्वर्ण पर अपना दावा किया जिसका मूल्य एक करोड़ रुपये था। मुख्यमंत्री हीरालाल शास्त्री ने उसे राज्य का बताते हुए देने से मना कर दिया। बात सरदार पटेल तक गयी। सरदार पटेल ने मुख्यमंत्री हीरालाल शास्त्री से पूछा कि सोना किसका है? इस पर शास्त्री ने जवाब दिया कि सोना पहले तो राजा का ही रहा होगा, पर बाद में राज्य के बजट में दर्ज हो गया।

अतः अब राज्य का मानना पड़ेगा। सरदार ने पूछा कि आपकी राय क्या है? शास्त्री ने कहा कि मेरी राय में सोना महाराजा को दे देना चाहिये। सरदार बोले क्यों? शास्त्री ने कहा इतना बड़ा राज्य किसी का आपने ले लिया है। इतना सा सोना दे देने में क्यों संकोच करना चाहिये। सरदार ने सोना महाराजा को देने की अनुमति दे दी।

जैसलमेर महारावल ने वर्ष 1927-28 में अपने निजी धन से एक पुस्तकालय भवन बनाने के लिये राजकोष में राशि जमा करवाई थी। जैसलमेर रियासत के विलय के बाद महारावल ने मांग की कि पुस्तकालय भवन का उपयोग महकमा खास के कार्यालयों के लिये हो रहा है इसलिये महारावल द्वारा इस भवन को बनाने के लिये दी गयी राशि, ब्याज सहित महाराजा को लौटाई जाये। सरकार ने निर्णय दिया कि यदि इस तरह के दावों को स्वीकार किया गया तो रियासती विभाग में शासकों की ओर से धन राशि की मांग के दावों की बाढ़ आ जायेगी।

अतः महाराजा का यह दावा निरस्त करने योग्य है। झालावाड़ के शासक ने दावा किया कि महल परिसर में स्थित बिजलीघर शासक की स्वयं की निजी सम्पत्ति है। साथ ही राजस्थान सरकार द्वारा इस महल के बिजलीघर में स्थित पुरानी मशीनों की नीलामी भी नहीं की जा सकती क्योंकि यह महाराजा की निजी सम्पत्ति में आती हैं। भारत सरकार ने राजस्थान सरकार को सूचित किया कि इस प्रकरण पर तब तक कोई कार्यवाही न की जाये जब तक कि स्वयं वी. पी. मेनन इस प्रकरण का निस्तारण न कर दें।

टोंक कलक्टर ने पूर्व टोंक रियासत की कुछ सम्पत्ति जिसमें घोड़े, बग्घियां, कार, अस्तबल आदि सम्मिलित थे, को सरकारी सम्पत्ति मानकर नीलाम करने का निर्णय लिया। इस पर टोंक नवाब ने सरकार से अनुरोध किया कि जब तक टोंक नवाब की निजी सम्पत्ति के सम्बन्ध में अंतिम निर्णय न हो जाये तब तक उक्त नीलामी रोकी जाये। डूंगरपुर महारावल के अधिकार में माही नदी के बीच में स्थित एक टापू पर स्थित भूमि बेंका (सोहन बीड) कहलाती थी।

यह एक विशाल भूमि थी जिसमें सिंचाई के लिये माही नदी का जल प्रचुर मात्रा में उपलब्ध था। महारावल ने रियासती विभाग को पत्र लिखकर यह भूमि महारावल को ही काश्त के लिये दिये जाने की मांग की। रियासती विभाग ने राजस्थान के मुख्य सचिव को पत्र लिखकर सिफारिश की कि उक्त भूमि समुचित आकलन के आधार पर महारावल को काश्त के लिये दे दी जाये। इस प्रकार सरदार पटेल ने राजाओं की अधिकांश मांगों पर सहानुभूति पूर्वक निर्णय लिये।

इस प्रकार सरदार पटेल ने व्यावहारिक रुख अपनते हुए राजाओं का धन राजाओं के पास ही रहने दिया। इससे देशी राज्यों के विलय की समस्या बहुत आसानी से सुलझ गई।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

अलवर नरेश तेजसिंह नजरबंद !

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राजा लोग विगत कुछ दशकों से अंग्रेजों की छत्रछाया में कांग्रेसी नेताओं से संघर्ष करते आ रहे थे। इसलिए वे देशी की आजादी के समय भी हवा के रुख के परिवर्तन को नहीं पहुंचा सके और भारत सरकार के नेताओं की अवज्ञा करने लगे। जब अलवर नरेश तेजसिंह नजरबंद कर लिया गया, तब जाकर राजाओं की आंखें खुलीं।

जब राजाओं को भारत संघ में मिलने का आमंत्रण दिया गया था तब सरदार पटेल द्वारा यह आश्वासन दिया गया था कि स्वतंत्र भारत में, 19 सक्षम राज्यों- कश्मीर, हैदराबाद, त्रावणकोर, कोचीन, मैसूर, बड़ौदा, कच्छ, ग्वालियर, इंदौर, भोपाल, बीकानेर, जोधपुर, कूच बिहार, त्रिपुरा, मनिपुर, जयपुर, उदयपुर, मयूरभंज तथा कोल्हापुर को अलग राज्य बने रहने दिया जायेगा।

जबकि वास्तविकता यह थी कि लोकतंत्रात्मक व्यवस्था में दो तरह की प्रशासनिक व्यवस्था चलाना संभव नहीं था। इसलिये सरदार पटेल ने 15 अगस्त 1947 के बाद से ही रियासतों के एकीकरण का अभियान छेड़ दिया। 14 दिसम्बर 1947 एवं बाद की तिथियों में छत्तीसगढ़ तथा उड़ीसा की रियासतों ने भारत सरकार को शासन के पूर्ण अधिकार सौंप दिये। 1 जनवरी 1948 को इन रियासतों का शासन मध्यप्रदेश तथा उड़ीसा सरकारों को सौंप दिया गया।

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रियासती मंत्रालय की एकीकरण नीति की अखबारों में कटु आलोचना हुई तो सरदार पटेल ने अपने सलाहकार वी. पी. मेनन को गांधीजी और पं. नेहरू के पास भेजा ताकि उन्हें इस कार्यवाही के औचित्य में विश्वास करा दिया जाये। गांधीजी को इस काम से पूरी तरह संतोष था किंतु सरदार पटेल की इस कार्यवाही से राजाओं के मन में भय उत्पन्न हो गया। पटेल एक सुनिश्चित नीति के तहत एकीकरण की प्रक्रिया चला रहे थे किंतु कुछ देशी रियासतों में भड़के हिन्दू-मुस्लिम दंगों ने एकीकरण की प्रक्रिया को तेज कर दिया।

अलवर एवं भरतपुर में मेव जाति ने आतंक फैला दिया जिसकी प्रतिक्रिया में हिन्दुओं ने भी मेवों पर आक्रमण किये। इन दंगों में भरतपुर रियासत में 209 गाँव पूर्णतः नष्ट हो गये। मेवों के नेता, भरतपुर रियासत के उत्तरी भाग, गुड़गांव और अलवर रियासत के दक्षिणी क्षेत्रों को मिलाकर मेवस्तान बनाने का स्वप्न देख रहे थे किंतु अलवर राज्य के दीवान नारायण भास्कर खरे ने मेवों को सख्ती से कुचला।

खरे हिन्दू महासभा के अध्यक्ष भी रहे थे, इसलिये कांग्रेसी नेताओं ने खरे पर कट्टर हिन्दूवादी होने के आरोप लगाये। कांग्रेसियों का मानना था कि खरे ने हिन्दुओं को मेवों के विरुद्ध भड़का कर दंगा करवाया। अक्टूबर 1947 में सरदार पटेल ने दिल्ली में रियासती प्रतिनिधियों की एक सभा बुलाई। इस सभा में सरदार पटेल ने अलवर के राजा तेजसिंह तथा दीवान नारायण भास्कर खरे को चेतावनी दी कि जो लोग सांप्रदायिकता फैलाने का काम कर रहे हैं, वे देश के शत्रु हैं। नारायण भास्कर खरे का कहना था कि सरदार पटेल, अलवर राज्य के आंतरिक मामले में हस्तक्षेप कर रहे हैं जिसका उन्हें कोई अधिकार नहीं है।

30 जनवरी 1948 को गांधीजी की हत्या हो गई जिसमें अलवर नरेश तेजसिंह और उसके प्रधानमंत्री नारायण भास्कर खरे का हाथ होने का संदेह किया गया। भारत सरकार ने 7 फरवरी 1948 को तेजसिंह को दिल्ली बुलाकर कनाट प्लेस पर स्थित मरीना होटल में नरजबंद कर दिया तथा अलवर राज्य का प्रशासन अपने हाथ में ले लिया। राज्य के दीवान खरे को पदच्युत करके दिल्ली में नजरबंद कर दिया गया।

जब अलवर नरेश तेजसिंह नजरबंद कर लिया गया तब राजपूताना के राजाओं में भय व्याप्त हो गया और वे राष्ट्रीय नेताओं के दबाव में आ गये। अब वे अपने राज्यों को राजस्थान में मिलाने के लिये प्रस्तुत हो गये।

अलवर, भरतपुर, धौलपुर तथा करौली के राजाओं को हटाकर इन राज्यों का एक संघ बनाने का निर्णय होने के बाद, सरदार पटेल अलवर आये तथा एक आम सभा में उन्होंने मार्मिक शब्दों में राजस्थान की जनता का आह्वान किया- ‘छोटे राज्य अब बने नहीं रह सकते।

उनके सामने एक ही विकल्प है कि वे बड़ी तथा समुचित आकार की इकाईयों में सम्मिलित हो जायें। जो अब भी राजपूत आधिपत्य की स्थापना का स्वप्न देखते हैं, वे आधुनिक संसार से बाहर हैं। अब शक्ति, प्रतिष्ठा या वर्ग का चिंतन उचित नहीं।

आज हरिजन की झाड़ू राजपूतों की तलवार से कम महत्वपूर्ण नहीं है। जैसे माँ का झुकाव बच्चे की ओर होता है वैसे ही जो लोग देश के हितों की देखभाल कर रहे हैं, वे सबसे ऊपर हैं। वे भी समान समर्पण तथा बराबर आदर सम्मान के अधिकारी हैं। जनता सांप्रदायिक सद्भाव, एकता तथा शांति बनाये रखे।’

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

भरतपुर महाराजा का भाग्य

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भारत की आजादी के समय भरतपुर महाराजा ने भारत सरकार को नाराज करने वाले कई कार्य किए। इस कारण भारत सरकार भरतपुर महाराजा के विरुद्ध हो गई और उसके विरुद्ध सख्त कार्यवाही करने पर विचार करने लगी। ऐसी स्थिति में सरदार वल्लभभाई ने भरतपुर महाराजा का भाग्य बचाया।

रियासती विभाग भरतपुर राज्य की गतिविधियों से बड़ा खिन्न था। इसलिये रियासती विभाग ने भरतपुर महाराजा बृजेन्द्रसिंह के विरुद्ध एक आरोप सूची तैयार की तथा राजा पर ये आरोप लगाये गये-

(1.) भरतपुर के महाराजा ने 15 अगस्त 1947 को स्वतंत्रता दिवस नहीं मनाया तथा उसने खुले तौर पर भारतीय नेताओं को भारत विभाजन के लिये उत्तरदायी बताया।

(2.) महाराजा ने 1 लाख मुसलमानों को राज्य से भगा दिया। महाराजा को प्रसन्नता थी कि उनके राज्य में एक भी मुसलमान नहीं बचा था।

(3.) भरतपुर राज्य में से जाने वाली बांदीकुई-आगरा रेलवे लाइन को सुरक्षा प्रदान करने के लिये महाराजा ने कारगर कदम नहीं उठाये।

(4.) महाराजा की सेना में अनुशासन जैसी कोई चीज नहीं रह गयी थी।

(5.) महाराजा ने राज्य में जाटवाद को बढ़ावा देने में कोई कसर नहीं रखी थी।

(6.) भरतपुर राज्य में शस्त्र व गोला-बारूद तैयार करने के लिए अवैध कारखाना खोला गया तथा जाटों एवं राष्ट्रीय स्वयं सेवकों को शस्त्र बांटे जा रहे थे।

(7.) महाराजा राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की गतिविधियों में रुचि लेता था।

(8.) पं. नेहरू ने भी अपने पत्र दिनांक 28 जनवरी 1948 के द्वारा पटेल को अवगत करवाया था कि भरतपुर राज्य में राष्ट्रीय स्वयं सेवकों को शस्त्र प्रशिक्षण दिया जा रहा है।

भारत सरकार ने 10 फरवरी 1948 को भरतपुर महाराजा बृजेन्द्रसिंह को दिल्ली बुलाया और उनके विरुद्ध एकत्र किये गये आरोपों से अवगत करवा कर उन्हें निर्देश दिये कि वे राज्य प्रशासन का दायित्व भारत सरकार को सौंप दें। अलवर महाराजा तथा प्रधानमंत्री दिल्ली में नजरबंद किये जा चुके थे। इसलिये भरतपुर महाराजा अत्यंत दबाव में थे। उन्होंने अत्यंत अनिच्छा से सम्मति प्रदान की।

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14 फरवरी 1948 को रियासती विभाग द्वारा एस. एन. सप्रू को भरतपुर राज्य का प्रशासक नियुक्त किया गया। कर्नल ढिल्लों को राज्य की सेना का अध्यक्ष नियुक्त किया गया। महाराजा के भाई गिरिराजशरण सिंह, जिसके विरुद्ध नेहरू ने सरदार पटेल को लिखा था, को इंगलैण्ड भेज दिया गया। स्वतंत्र भारत के प्रथम गवर्नर जनरल लॉर्ड माउंटबेटन, महाराजा भरतपुर को सांप्रदायिक आधार पर हत्याएं करने तथा खराब प्रशासन के आरोप में अपदस्थ करके दक्षिण में भेजना चाहते थे जहाँ उन्हें नजरबंद कर दिया जाना था किंतु सरदार पटेल ने महाराजा के भाग्य की रक्षा की।

अलवर तथा भरतपुर राज्यों से सटे धौलपुर और करौली राज्यों के राजाओं को भी 27 फरवरी 1948 को दिल्ली बुलाया गया और सलाह दी गयी कि अलवर और भरतपुर राज्य के साथ संघ में शामिल हो जायें। चारों राजाओं ने इस प्रस्ताव को मान लिया तथा 28 फरवरी 1948 को एकीकरण के दस्तावेज पर हस्ताक्षर कर दिये। के. एम. मुंशी की सलाह पर इस संघ का नाम मत्स्य संघ रखा गया।

चूंकि महाराजा अलवर तथा महाराजा भरतपुर के विरुद्ध जांच चल रही थी इसलिये धौलपुर महाराजा को संघ का राजप्रमुख तथा करौली महाराजा को उपराजप्रमुख बनाया गया।

18 मार्च 1948 को इसका विधिवत् उद्घाटन किया गया। मत्स्य संघ बन जाने के बाद लॉर्ड माउंटबेटन ने अलवर तथा भरतपुर राज्यों के शासकों के विरुद्ध जांच करने के लिये बड़ौदा, ग्वालियर, नवानगर तथा बीकानेर के शासकों की एक समिति नियुक्त की किंतु इन शासकों ने अपने भ्रातृ महाराजाओं की जांच करने से मना कर दिया।

इस पर भारत सरकार के प्रतिनिधियों को इस कार्य के लिये नियुक्त किया गया। जांच में न केवल महाराजा अलवर तथा महाराजा भरतपुर निर्दोष पाये गये अपितु अलवर राज्य के दीवान नारायण भास्कर खरे के विरुद्ध भी किसी तरह का आरोप प्रमाणित नहीं हुआ। भारत सरकार ने इन सबको दोषमुक्त घोषित कर दिया तथा इनके विरुद्ध किसी तरह की कानूनी कार्यवाही नहीं की।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

देशी रियासतों का एकीकरण

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देशी रियासतों का एकीकरण करके सरदार पटेल ने भारत में वह कर दिखाया जो जर्मनी में बिस्मार्क ने तथा इटली में काबूर ने किया था!

सरदार पटेल के नेतृत्व में देशी रियासतों का एकीकरण करने का काम तेजी से चला। दिसम्बर 1947 में उड़ीसा और छत्तीसगढ़ के 39 राज्यों का उड़ीसा और मध्यप्रान्त में विलय हुआ।

फरवरी 1948 में 17 दक्षिणी राज्यों को बम्बई प्रान्त के साथ मिलाया गया। जून 1948 में गुजरात तथा काठियावाड़ के समस्त राज्यों को बम्बई प्रदेश में सम्मिलित किया गया। पूर्वी पंजाब, पाटियाला तथा पहाड़ी क्षेत्र के राज्यों को मिलाकर एक नया संघ बनाया गया जिसे पेप्सू कहा गया। इसी आधार पर मत्स्य संघ, विन्ध्य प्रदेश और राजस्थान का निर्माण किया गया। कुछ क्षेत्रों को केन्द्र प्रशासित क्षेत्र बनाया गया जिनका प्रशासन केन्द्र सरकार के हाथों में रखा गया।

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सरदार पटेल तथा वी. पी. मेनन ने दो प्रकार की पद्धतियों को प्रोत्साहन दिया- बाह्य विलय और आन्तरिक संगठन। बाह्य विलय में छोटे-छोटे राज्यों को मिलाकर अथवा पड़ौसी प्रान्तों में विलय करके बड़े राज्य बनाये गये। आन्तरिक संगठन के अन्तर्गत इन राज्यों में प्रजातन्त्रीय शासन व्यवस्था लागू की गई। पूरे देश में चार प्रकार के राज्य बनाये गये (संविधान में ‘प्रान्त’ शब्द हटा दिया गया और देशी रियासतों तथा प्रान्तों, दोनों के लिए ‘राज्य’ शब्द का ही प्रयोग किया गया)। इन्हें क, ख, ग और घ श्रेणी के राज्य कहा गया।

‘क’ श्रेणी के अन्तर्गत भूतपूर्व ब्रिटिश प्रान्तों को रखा गया। इनकी संख्या 9 थी- असम, बिहार, बम्बई, मध्य प्रदेश, मद्रास, उड़ीसा, पंजाब, उत्तर प्रदेश और पश्चिमी बंगाल। ‘ख’ श्रेणी के अन्तर्गत कुछ संघ तथा बड़ी देशी रियासतों को रखा गया जिनकी संख्या 8 थी। ये थीं- हैदराबाद, जम्मू-कश्मीर, मध्य भारत, मैसूर, पटियाला तथा पेप्सू, राजस्थान, सौराष्ट्र, त्रावणकोर तथा कोचीन। ‘ग’ श्रेणी के अन्तर्गत अजमेर, भोपाल, कुर्ग, दिल्ली, हिमाचल प्रदेश, कच्छ, विन्ध्य प्रदेश, मणिपुर और त्रिपुरा राज्यों को सम्मिलित किया गया। ‘घ’ श्रेणी में अण्डमान और निकोबार द्वीप को सम्मिलित किया गया।

‘क’ और ‘ख’ श्रेणी के राज्यों में पूर्ण उत्तरदायी सरकार स्थापित की गई परन्तु ‘ग’ श्रेणी के राज्यों में कुछ नियंत्रित उत्तरदायी सरकार की स्थापना की गई। ‘घ’ श्रेणी के राज्यों की प्रशासन व्यवस्था केन्द्र के अधीन रखी गई।

देशी रियासतों के एकीकरण से भारत में शक्तिशाली संघ की स्थापना हो गई। यह काम जिस शान्ति एवं शीघ्रता से सम्पन्न हुआ, उसकी आशा किसी को नहीं थी। सितम्बर 1948 में पं. जवाहरलाल नेहरू ने कहा- ‘यदि मुझसे कोई व्यक्ति 6 महीने पूर्व ये पूछता कि अगले 6 महीनों में क्या होगा, तो मैं भी यह नहीं कह सकता था

कि अगले 6 महीनों में इतने शीघ्र परिवर्तन होंगे।’ माइकल ब्रीचर ने लिखा है- ‘केवल एक वर्ष में 5 लाख वर्ग मील क्षेत्र और 9 करोड़ आबादी भारतीय संघ में मिल गई। यह एक महान् रक्तहीन क्रान्ति थी जिसकी तुलना कहीं भी इस शताब्दी में नहीं मिलती और इसकी तुलना उन्नीसवीं शताब्दी में बिस्मार्क द्वारा जर्मनी में और काबूर द्वारा इटली में किये हुए एकीकरण से की जा सकती है।’ भारत के एकीकरण में उनके महान योगदान के लिये उन्हें भारत का लौह पुरुष कहा जाता है।

भारत की 566 रियासतों का एकीकरण विश्व की सबसे बड़ी रक्तहीन क्रांति थी। गांधीजी ने पटेल को लिखा- ‘रियासतों की समस्या इतनी जटिल थी जिसे केवल तुम ही हल कर सकते थे।’

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

अजमेर दंगे !

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जवाहर लाल नेहरू एवं सरदार वल्लभ भाई पटेल

भारत की आजादी के तुरंत बाद हुए अजमेर दंगे सरदार पटेल एवं जवाहर लाल नेहरू के बीच विवाद का विषय बन गए। जवाहर लाल नेहरू ने इन दंगों के बाद हिन्दुओं को कुचलने की तैयारी की जबकि पटेल का मानना था कि दंगे मुसलमानों ने किए थे।

5 दिसम्बर 1947 को अजमेर में साम्प्रदायिक दंगे फैल गये। इन दंगों को रोकने के लिये दिल्ली से सेना बुलानी पड़ी। दिल्ली क्षेत्र के कमाण्डिंग अधिकारी जनरल राजेन्द्रसिंह ने अजमेर का दो दिवसीय भ्रमण किया। पं. नेहरू ने इण्टर डोमिनियन मायनोरिटीज के अध्यक्ष एन. आर. मलकानी को एक तार भेजकर सूचित किया कि मुझे अजमेर में हुए दंगों पर गहरा खेद है किंतु दरगाह को पूरी तरह सुरक्षित रखा गया है। नेहरू ने मलकानी को यह भी सूचित किया कि वे शीघ्र ही अजमेर का दौरा करेंगे।

यह एक शर्मनाक स्थिति थी। एक ओर से पाकिस्तान से हिन्दुओं की ट्रेनें कटकर आ रही थीं और दूसरी ओर जवाहर लाल नेहरू छोटे से अजमेर दंगे के लिए पाकिस्तान से माफी मांग रहे थे। नेहरू के इस टेलिग्राम के बाद पाकिस्तान को भारत के विरुद्ध जहर उलगने का अवसर मिल गया।

पाकिस्तान सरकार के शरणार्थी एवं पुनर्वास मंत्री गजनफर अली खां ने भारत सरकार के गृहमंत्री सरदार पटेल को अजमेर की स्थिति के सम्बन्ध में टेलिग्राम किया। 17 दिसम्बर 1947 को सरदार पटेल ने उसे जवाब में टेलिग्राम भिजवाकर सूचित किया कि अजमेर में स्थिति नियंत्रण में है तथा एक सैनिक टुकड़ी दरगाह की रक्षा कर रही है।

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जवाहरलाल नेहरू अजमेर दंगे पर बहुत चिंतित थे। बालकृष्ण कौल एवं मुकुट बिहारी लाल ने नेहरू को अजमेर की स्थिति के बारे में सूचित किया। नेहरू अजमेर के अधिकारियों एवं पुलिस के रवैये से प्रसन्न नहीं थे। नेहरू ने सरदार पटेल को लिखे एक पत्र में दो महत्त्वपूर्ण बातों की ओर ध्यान दिलाया। पहला बिंदु यह था कि यदि इस घटना की बड़े स्तर पर पुनरावृत्ति हुई तो उसके भयानक परिणाम होंगे। दूसरा यह कि दरगाह के कारण अजमेर पूरे भारत में तथा पूरे विश्व में प्रसिद्ध है। यदि दरगाह को कुछ हुआ तो उसका प्रचार पूरे भारत में एवं पूरे विश्व में होगा। इससे भारत सरकार की छवि को धक्का पहुँचेगा।

जवाहरलाल नेहरू का पत्र मिलने के बाद सरदार पटेल ने अजमेर प्रकरण पर एक सार्वजनिक वक्तव्य जारी किया। उन्होंने अजमेर में हुई मौतों की संख्या बताते हुए कहा कि 15 दिसम्बर 1947 से लेकर अब तक हुए दंगों में 5 हिन्दू तथा 1 मुसलमान मरा है। साथ ही पुलिस फायरिंग में 21 हिन्दू तथा 62 मुसलमान घायल हुए हैं। मिलिट्री की फायरिंग में 8 हिन्दू तथा 7 मुसलमान मारे गये हैं और 2 हिन्दू एवं 2 मुसलमान घायल हुए हैं। सम्पत्ति का भयानक नुक्सान हुआ है।

अधिक नुक्सान स्टेशन रोड तथा इम्पीरियल रोड पर स्थित मुसलमानों की आठ बड़ी दुकानों में हुआ है। कुछ अन्य दुकानों यथा स्टेशनरी, चूड़ी, आलू, कोयला, किताबों आदि की दुकानों में भी नुक्सान हुआ है।

कुल 41 दुकानें लूटी गई हैं तथा 16 दुकानें जलाई गई हैं। इनमें से तीन दुकानें पूरी तरह नष्ट हो गई हैं। सम्पत्ति को नष्ट होने से बचाने तथा दंगाइयों को बंदी बनाने के लिये सघन प्रयास किये गये हैं। दरगाह इस सबसे पूरी तरह सुरक्षित रही है। सरदार पटेल ने दरगाह से जुड़े धार्मिक लोगों से अपील की कि वे इसकी सुरक्षा का पूरा ध्यान रखेंगे। उन्होंने सरकार की ओर से आशा व्यक्त की कि इस ऐतिहासिक नगरी में शीघ्र ही फिर से शांति स्थापित होगी।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

नेहरू को फटकार !

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अजमेर दंगे के बहाने से जवाहर लाल नेहरू जिस तरह की ओछी हरकतें कर रहे थे, उनसे सरदार पटेल को बड़ा क्रोध आया। उन्होंने नेहरू को फटकार लगाने का निश्चय किया।

सरदार के सार्वजनिक वक्तव्य को नेहरू ने अपनी व्यक्गितगत प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया और उन्होंने व्यक्तिशः अजमेर भ्रमण का कार्यक्रम बनाया किंतु अचानक ही पं. नेहरू के भतीजे की मृत्यु हो गई। इससे इस यात्रा को निरस्त करना पड़ा। नेहरू ने सोचा कि इससे अजमेर पर बुरा प्रभाव पड़ेगा क्योंकि अजमेर में उनकी बहुत उत्सुकता से प्रतीक्षा हो रही थी। यह यात्रा पूरे देश को यह दिखाने के लिये की जा रही थी कि सरकार इस प्रकार की स्थिति से बहुत चिंतित है तथा इससे निबटने में नेता व्यक्तिगत रूप से रुचि ले रहे हैं।

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नेहरू का मानना था कि दिल्ली के बाद देश में अजमेर ही दूसरा महत्वपूर्ण नगर है जहाँ हो रही घटनाओं का पूरे देश की नीतियों पर प्रभाव पड़ रहा है। इसलिये नेहरू ने अपने प्रमुख निजी सचिव एच. आर. वी. आर. आयंगर से कहा कि वे अजमेर जाकर अजमेर की जनता से नेहरू के न आने के लिये नेहरू की ओर से क्षमा मांगें। आयंगर ने 20 दिसम्बर 1947 को शनिवार के दिन अजमेर का दौरा किया। उसने अजमेर दंगे वाले स्थलों का निरीक्षण किया तथा एडवाइजरी कौंसिल के सदस्यों से विचार-विमर्श किया। उसने मुकुट बिहारी लाल एवं बालकृष्ण कौल से भी विचार-विमर्श किया। अगले दिन उसने मुस्लिम प्रतिनिधि मण्डलों, खादिमों, आर्य समाज के सदस्यों, महासभा के सदस्यों एवं प्रेस प्रतिनिधियों से बात की।

आयंगर के इस प्रकार विजिट करने से अजमेर का चीफ कमिश्नर शंकर प्रसाद बुरी तरह घबरा गया। उसे लगा कि इस यात्रा से यह छवि बनी है कि चीफ कमिश्नर न केवल स्थिति को संभालने में बुरी तरह विफल रहा अपितु उसने सरकार को पूरे तथ्य बताने में भी बेईमानी बरती है।

इसलिये शंकर प्रसाद ने गृहमंत्री सरदार पटेल के निजी सचिव वी. शंकर को एक पत्र लिखकर सूचित किया कि चीफ कमिश्नर को कम से कम यह ज्ञात होने का अधिकार होना चाहिये था कि उसने ऐसा क्या किया है जो उस पर विश्वास नहीं किया जा रहा है तथा जनता से उसके सम्बन्ध में प्रश्न किये जा रहे हैं। सरदार पटेल ने भी आयंगर की अजमेर यात्रा को पसंद नहीं किया था। सरदार पटेल ने नेहरू को फटकार लगाने का निश्चय किया।

23 दिसम्बर 1947 को पटेल ने आयंगर को पत्र लिखा कि इतने वरिष्ठ अधिकारी होने के नाते उसे यह सोचना चाहिये था कि उसकी इस यात्रा के क्या गंभीर प्रभाव होंगे ? उसकी इस यात्रा से अजमेर के चीफ कमिश्नर जैसे वरिष्ठ अधिकारी की कैसी विचित्र स्थिति हुई है जो कि एक प्रांत का मुखिया है ?

ऐसी स्थिति में चीफ कमिश्नर को पूरा अधिकार है कि वह मंत्रियों अथवा अपने विभाग के सचिव के अतिरिक्त हर अधिकारी का विरोध करे। पटेल ने आयंगर की इस बात के लिये भी भर्त्सना की कि उसने अजमेर-मेरवाड़ा को लेकर प्रेस में वक्तव्य जारी किया। इन परिस्थितियों में दिये गये इस वक्तव्य से ऐसा लगा है कि चीफ कमिश्नर द्वारा अजमेर में परिस्थति को संभालने के कार्य को लेकर प्रधानमंत्री में असंतोष है। यदि प्रधानमंत्री स्वयं नहीं जा सकते थे तो वे सरदार पटेल को अथवा गोपालस्वामी को अथवा किसी अन्य मंत्री को जाने के लिये कह सकते थे।

आयंगर ने यह पत्र नेहरू के समक्ष रख दिया। नेहरू समझ गए कि पटेल ने आयंगर को नहीं फटकारा है, यह फटकार नेहरू के लिए है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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