ओरछा के मंदिर एवं महल ओरछा राजाओं की भक्ति, शक्ति और स्थापत्य प्रेम के जीवंत प्रमाण हैं। सम्पूर्ण ओरछा नगर पर बुंदेला राजाओं के इतिहास की गहरी छाप है।
ओरछा नगर की स्थापना 15वीं शताब्दी ईसवी में बुंदेला राजा रुद्रप्रताप सिंह जूदेव ने की थी। उस समय दिल्ली पर क्रूर सुल्तान सिकन्दर लोदी का शासन था। राजा रुद्रप्रताप सिंह जूदेव ने सिकंदर लोदी के अत्याचारों का विरोध किया एवं युद्धक्षेत्र में उतरकर भीषण युद्ध किया था। राजा रुद्रप्रताप सिंह देव ने ही ओरछा का किला भी बनवाया था।
सोलहवीं शताब्दी ईस्वी में जब आगरा पर मुगलों का राज्य हुआ, तब भी ओरछा के राजा अपनी वीरता के लिए पूरे भारत में प्रसिद्ध रहे। जब मुगल बादशाह अकबर ने अपने विद्रोही पुत्र सलीम को समझाने के लिए अपने मित्र अबुल फजल को भेजा था, तब सलीम के कहने पर ओरछा के राजा वीरसिंह बुंदेला ने अबुल फजल की हत्या कर दी। इससे मुगलों एवं बुंदेलों के सम्बन्ध खराब हो गए।
ओरछा नगर में अनेक मंदिर, महल एवं उद्यान बने हुए हैं। बेतवा नदी के किनारे बने एक उद्यान में दो ऊँचे स्तम्भ सावन-भादों कहलाते हैं। नदी के दूसरी तरफ जहांगीर महल, राजमहल, शीशमहल और राय परवीन के महल स्थित हैं।
ओरछा नगर में स्थित राजमहल, रायप्रवीण महल, हरदौल बुंदेला की बैठक, हरदौल बुंदेला की समाधि, जहांगीर महल और उसकी चित्रकारी प्रमुख है।
ओरछा के महल बुंदेला राजाओं की वास्तुकला के उत्कृष्ट उदाहरण हैं। महलों के खुले गलियारे, पत्थरों से बनी जालियाँ, पशु-पक्षियों की मूर्तियां, बेल-बूटे बहुत आकर्षक हैं। महल के प्रवेश द्वार पर दो झुके हुए हाथी बने हुए हैं। इस महल का निर्माण वीरसिंह बुंदला ने करवाया था।
राजमहल ओरछा के सबसे प्राचीन स्मारकों में एक है। इसका निर्माण मधुकर शाह बुंदेला ने 17वीं शताब्दी ईस्वी में करवाया था। राजा वीरसिंह जुदेव बुंदेला उन्हीं के उत्तराधिकारी थे। यह महल छतरियों और बेहतरीन आंतरिक भित्तिचित्रों के लिए प्रसिद्ध है। महल में धर्म ग्रन्थों से जुड़ी तस्वीरें भी देखी जा सकती हैं।
यह महल राजा इन्द्रमणि बुंदेला की खूबसूरत गणिका प्रवीणराय की याद में बनवाया गया था। वह अच्छी कवयित्री तथा संगीतज्ञ थी। जब अकबर को प्रवीणराय की सुंदरता के बारे में पता चला तो उसे दिल्ली बुलवाया गया किंतु प्रवीणराय बुंदेला राजा इन्द्रमणि से प्रेम करती थी। वह अकबर से अनुमति लेकर वापस ओरछा लौट आई। प्रवीणराय का दो-मंजिला महल प्राकृतिक उद्यान से घिरा है।
राजमहल के निकट चतुर्भुज मंदिर स्थित है जो ओरछा का मुख्य आकर्षण है। यह मंदिर चार भुजाधारी भगवान विष्णु को समर्पित है। इस मंदिर का निर्माण ओरछा के राजा मधुकरशाह बुंदेला (ई.1554-1591) ने करवाया था। मधुकरशाह बुंदेला की रानी गणेश कुंवरि के महल में रामराजा सरकार विराजमान हैं, उसी को रामराजा मंदिर कहा जाता है।
ओरछा के राजाओं ने पालकी महल के निकट फूलबाग का निर्माण करवाया। फूलों का यह उद्यान चारों ओर पक्की दीवारों से घिरा है। यह उद्यान बुंदेला राजाओं का विश्रामगृह था। फूलबाग में एक भूमिगत महल और आठ स्तम्भों वाला मंडप है। यहाँ के चंदन कटोर से गिरता पानी झरने के समान दिखाई देता है।
राजा जुझार सिंह बुंदेला के पुत्र धुरभजन बुंदेला ने भी एक सुन्दर महल बनवाया था। धुरभजन की मृत्यु के बाद उन्हें संत के रूप में जाना गया। अब यह महल क्षतिग्रस्त अवस्था में है।
ईस्वी 1622 में वीरसिंह जुदेव बुंदेला ने लक्ष्मीनारायण मंदिर बनवाया। यह मंदिर ओरछा गांव के पश्चिम में एक पहाड़ी पर बना है। मंदिर में सत्रहवीं और उन्नीसवीं शताब्दी के भित्तिचित्र बने हुए हैं। चित्रों के चटकीले रंग आज भी अच्छी दशा में हैं। मंदिर में झांसी की लड़ाई के दृश्य और भगवान कृष्ण की आकृतियां भी बनी हुई हैं।
ईस्वी 1742 तक झांसी भी ओरछा राज्य में था किंतु मराठा सेनापति नारोशंकर मोतिवाले ने ओरछा पर हमला करके ओरछा नरेश पृथ्वीसिंह बुंदेला को बंदी बना लिया तथा अलग झांसी राज्य बनाया। ईस्वी 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में जिस प्रकार झांसी की रानी लक्ष्मीबाई ने अंग्रेजों से युद्ध किया था उसी प्रकार ओरछा की महारानी ने भी अंग्रेजों से युद्ध किया था। ओरछा झांसी से 15 किलोमीटर की दूरी पर है।
ओरछा में बेतवा नदी सात धाराओं में बंटती है, जिसे सतधारा कहते हैं। ओरछा में वन्यजीवों के सरंक्षण के लिए एक अभयारण्य स्थापित किया गया है जो लगभग 45 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला हुआ है।
ओरछा के रामराजा सरकार रानी गणेश कुंविर के पुत्र माने जाते हैं। रानी गणेश कुंवरि ने भगवान राम को पुत्र के रूप में पूजा और उन्हें अपना पुत्र बनाकर अयोध्या से ओरछा ले आईं! यह ऐतिहासिक घटना सोलहवीं शताब्दी ईस्वी में घटित हुई।
भगवान के करोड़ों-करोड़ भक्तों ने भगवान को अपनी-अपनी आस्था के रूप में पूजा और पाया है। सांस्कृतिक परम्पराओं के प्रभाव के कारण हिन्दू महिलाओं में वात्सल्य एवं भक्ति दोनों ही प्रकार के भाव संसार की अन्य महिलाओं की अपेक्षा अधिक होते हैं। इसलिए हिन्दू महिलाओं में भावुकता की भी अधिकता होती है। कई बार यह भावुकता ऐसे अनोखे कार्य करवा देती है जो किसी प्रकार के बुद्धिबल, बाहुबल एवं धनबल से किए जाने संभव नहीं है।
ऐसी ही एक अनोखी घटना आज से चार सौ साल पहले ओरछा में घटित हुई थी जब ओरछा की रानी गणेश कुंवरि अयोध्या के राजा रामचंद्र को अपना पुत्र बनाकर ओरछा ले आई थीं। पुत्र होने के कारण राम ही ओरछा के राजसिंहासन पर बैठे तथा उन्हें ओरछा के रामराजा सरकार के नाम से जाना गया। इस घटना के पीछे एक अनोखा इतिहास छिपा हुआ है।
मधुकरशाह बुंदेला ईस्वी 1554 से 1592 तक ओरछा का राजा था। कहा जाता है कि एक दिन राजा मधुकरशाह बुंदेला ने अपनी रानी गणेश कुंवरि राजे से वृंदावन चलने को कहा किंतु रानी ने अयोध्या जाने के लिए कहा। राजा ने पुनः वृंदावन जाने की इच्छा व्यक्त की किंतु रानी ने अयोध्या जाने की जिद पकड़ ली। इस पर राजा मधुकरशाह ने झुंझलाकर कहा कि यदि तुम इतनी ही रामभक्त हो तो जाकर अपने राम को ओरछा ले आओ।
राजा के ऐसा कहने पर ओरछा की रानी गणेश कुंवरि भगवान को लाने के लिए अयोध्या चली गईं। उन्हें पूरा विश्वास था कि भगवान राम उनकी प्रार्थना स्वीकार कर लेंगे तथा राजा के सामने उनकी बात नहीं गिरेगी।
उन दिनों संत तुलसीदास भी अयोध्या में साधनारत थे। रानी गणेश कुंवरि ने तुलसीदासजी के दर्शन किए तथा उनसे आशीर्वाद लेकर सरयू नदी के किनारे स्थित लक्ष्मण टीले के निकट कुटी बनाकर साधना करने लगीं।
रानी ने भगवान राम से प्रार्थना की कि जिस तरह वे कौसल्या के पुत्र बनकर अयोध्या में रहे, उसी तरह वे मेरे पुत्र बनकर ओरछा चल कर रहें। रानी को कई महीनों तक रामराजा के दर्शन नहीं हुए। एक दिन जब रानी ने स्नान करते समय सरयू नदी में डुबकी लगाई तो नदी के तल में उन्हें रामराजा के एक विग्रह के दर्शन हुए। रानी ने भगवान से कहा कि वे मेरे पुत्र बनकर ओरछा चलें। रामराजा ने दो शर्तों पर ओरछा चलना स्वीकार किया। पहली शर्त यह थी कि अयोध्या से ओरछा तक पैदल यात्रा करनी होगी। दूसरी शर्त यह थी कि यात्रा केवल पुष्य नक्षत्र में होगी।
रानी ने भगवान की दोनों बातें शिरोधार्य कर लीं तथा ओरछा महाराज मधुकरशाह बुंदेला को संदेश भेजा कि वे रामराजा को लेकर ओरछा आ रहीं हैं। राजा मधुकरशाह बुंदेला ने रामराजा के लिए चतुर्भुज मंदिर का निर्माण करवाना आरम्भ किया।
जब रानी ओरछा पहुंची तो उन्होंने यह मूर्ति अपने महल की भोजनशाला में रखवा दी ताकि किसी शुभ मुर्हूत में रामाजा की प्रतिमा को चतुर्भुज मंदिर में रखकर प्राण प्रतिष्ठा की जा सके। जब मंदिर बनकर पूरा हो गया तब रामराजा के विग्रह को मंदिर में प्रतिष्ठित करने हेतु उठाया गया किंतु रामराजा का विग्रह वहाँ से नहीं उठा। मान्यता है कि चूंकि रानी भगवान को अपने पुत्र के रूप में ओरछा लाई थीं, इसलिए भगवान ने अपनी माता का महल छोड़ना स्वीकार नहीं किया।
रामराजा को उसी महल में प्रतिष्ठित रहने दिया गया जहाँ वे आज भी विराजमान हैं। ओरछा के रामराजा सरकार की प्रतिमा मंदिर की ओर मुंह न होकर महल की ओर मुंह किए हुए है। रामराजा के लिए बनाये गये चतुर्भुज मंदिर में आज भी कोई विग्रह नहीं है।
मान्यता है कि संवत 1631 में जिस दिन ओरछा के रामराजा सरकार का आगमन हुआ, उसी दिन गोस्वामी तुलसीदासजी ने रामचरित मानस का लेखन प्रारंभ किया। यह भी मान्यता है कि भगवान विष्णु की जो मूर्ति ओरछा के रामराजा के रूप में विद्यमान है वह मूर्ति भगवान राम ने उस समय माता कौशल्या को दी थी, जब भगवान राम वनवास के लिए जा रहे थे। माँ कौशल्या उसी मूर्ति को भोग लगाया करती थीं। कुछ भक्तों की मान्यता है कि जब राम अयोध्या लौटे तो कौशल्याजी ने यह मूर्ति सरयू नदी में विसर्जित कर दी। वही मूर्ति रानी गणेश कुंवरि राजे को सरयू नदी में मिली थी।
वस्तुतः जब मुसलमानों ने अयोध्या पर आक्रमण किया था, उस समय भगवान राम एवं अन्य देवी-देवताओं की सैंकड़ों मूर्तियां सरयू नदी में छिपा दी गई थीं ताकि मुस्लिम आक्रांता उन्हें भंग न कर सकें। आज भी भक्तों को यदा-कदा ये मूर्तियां प्राप्त होती रहती हैं। ऐसी ही एक मूर्ति कुछ साधुओं को मिली थी जो रामलला के रूप में लगभग 80 साल तक रामजन्म भूमि मंदिर में प्रतिष्ठित रही।
ओरछा के रामराजा सरकार का मंदिर विश्व का एकमात्र मंदिर है, जहाँ भगवान राम की पूजा राजा के रूप में होती है तथा राजा की समस्त मर्यादाओं का पालन किया जाता है। ओरछा में रामचंद्रजी को ओरछाधीश तथा रामराजा सरकार भी कहा जाता है। सूर्याेदय एवं सूर्यास्त के समय भगवान को राजा की तरह गार्ड ऑफ ऑनर दिया जाता है।
ओरछा के रामराजा सरकार मंदिर के चारों तरफ हनुमानजी के कई मंदिर हैं जो रामराजा मंदिर के सुरक्षा चक्र के रूप में स्थित हैं। इनमें छडदारी हनुमान, बजरिया के हनुमान, लंका हनुमान आदि प्रमुख हैं। ओरछा में स्थित लक्ष्मी मंदिर, पंचमुखी महादेव, राधिका बिहारी मंदिर भी श्रद्धा के केन्द्र हैं।
ओरछा नगर रामराजा के इसी महल के चारों ओर बसा हुआ है। राम नवमी पर यहाँ देश भर से हजारों श्रद्धालु आते हैं।
हल्दीघाटी के मैदान (War of Haldighati) में जब महाराणा प्रताप (Maharana Pratap) के सामंत झाला मानसिंह (Jhala Manna) ने महाराणा को संकट में पड़ा हुआ देखा तो वह महाराणा की ओर दौड़ा। उसने प्रताप के घोड़े पर लगा महाराणा का छत्र उतारकर स्वयं अपने घोड़े पर लगा लिया और शत्रुओं को ललकार कर कहा कि मैं महाराणा हूँ।
महाराणा का छत्र लगाए हुए झाला मन्ना बिना किसी भय के आगे बढ़ने लगा। मुगल सैनिकों में सभी राणा प्रताप को स्वयं पकड़ने अथवा मारने को उत्सुक थे। इसलिए वे सब झाला मानसिंह को महाराणा समझकर उसके पीछे भागे। इस कारण वास्तविक महाराणा प्रताप पर से मुगल सैनिकों का दबाव ढीला पड़ गया।
बलवंतसिंह मेहता ने ‘प्रातः स्मरणीय महाराणा प्रताप’ नामक स्मारिका में अपने आलेख ‘हल्दीघाटी स्वतंत्रता-संग्राम’ में लिखा है कि प्रताप की अत्यधिक घायल अवस्था देखकर हकीम खाँ सूरी ने प्रताप से निवेदन किया कि वे युद्ध-क्षेत्र से बाहर निकल जायें किंतु प्रताप ने रणक्षेत्र में ही युद्ध के बीच रहना चाहा।
प्रताप की ऐसी प्रबल इच्छा देखकर हकीम खाँ सूरी, चेटक की लगाम को खींचे आगे बढ़ा जहाँ भामाशाह थे। वे लोग प्रताप को हल्दीघाटी के सुरक्षित स्थान की ओर ले गये। महाराणा के स्वामिभक्त सामंत घायल महाराणा प्रताप को रक्ततलाई से निकालकर हल्दीघाटी होते हुए बाहर ले गये। प्रताप की जगह झाला बीदा के प्राण गये। इस बलिदान के लिये उसने स्वयं अपने को प्रस्तुत किया था। झाला बीदा के गिरते ही हल्दीघाटी का युद्ध रुक गया।
यह एक आश्चर्य की ही बात है कि मेवाड़ के दो प्रमुख इतिहासकारों गौरीशंकर हीराचंद ओझा तथा श्यालदास ने हल्दीघाटी के युद्ध (War of Haldighati) में झाला मानसिंह द्वारा महाराणा का छत्र धारण किए जाने की घटना का उल्लेख नहीं किया है किंतु कर्नल जेम्स टॉड ने इस घटना को पूरी तरह से साफ करके लिखा है।
आधुनिक इतिहासकारों द्वारा कर्नल टॉड के मत पर ही अधिक विश्वास किया जाता है तथा माना जाता है कि खानवा के मैदान में हुई घटना की पुनरावृत्ति हल्दीघाटी के मैदान में भी हुई। अर्थात् जिस प्रकार खानवा के मैदान में झाला अज्जा ने महाराणा का छत्र एवं राजकीय चिह्न धारण किए थे, उसी प्रकार हल्दीघाटी के युद्ध में झाला मन्ना (Jhala Manna) ने महाराणा का छत्र धारण किया था।
उन्नीसवीं शताब्दी ईस्वी के प्रारम्भ में राजपूताने का इतिहास लिखने वाले अंग्रेज अधिकारी कर्नल जेम्स टॉड ने लिखा है कि महाराणा प्रताप के युद्धक्षेत्र से हट जाने से मेवाड़ी सेना की हिम्मत टूट गयी।
झाला मानसिंह, राठौड़ शंकरदास, रावत नेतसी आदि वीर सेनानियों ने अपने सैनिकों को थोड़ी देर और युद्ध के मैदान में जमाये रखने का यत्न किया परंतु कच्छवाहा मानसिंह (Kunwar Mansingh) की सेना ने मेवाड़ी सैनिकों के पैर जमने नहीं दिये और अंततः मेवाड़ी सेना के बचे हुए लोगों को भी या तो देह छोड़नी पड़ी या मैदान छोड़ना पड़ा। झाला मन्ना (Jhala Manna) अपने 150 सैनिकों के साथ रणखेत रहा।
बीसवीं शताब्दी ईस्वी के प्रारम्भ में राजपूताना रियासतों का इतिहास लिखने वाले महामहोपाध्याय रायबहादुर गौरीशंकर हीराचंद ओझा ने लिखा है कि हल्दीघाटी के युद्ध में झाला बीदा, तंवर रामशाह अर्थात् रामसिंह तोमर, रामशाह के तीनों पुत्र, रावत नेतसी (सारंगदेवोत), राठौड़ रामदास, डोडिया भीमसिंह, राठौड़ शंकरदास आदि कई सरदार काम आये।
रामशाह अथवा रामसिंह तोमर (Ramshah Tomar) ग्वालियर के उसी तोमर राजा विक्रमादित्य (Vikramaditya of Gwalior) का पुत्र था जो ई.1526 में लोदियों की तरफ से बाबर (Babur) के विरुद्ध लड़ता हुआ पानीपत के मैदान (Battle of Panipat) में काम आया था। तब रामशाह बालक ही था। हल्दीघाटी के युद्ध के समय राजा रामशाह लगभग 60 वर्ष का वृद्ध था।
To purchase this book please click on Image.
इस लड़ाई में चित्तौड़ दुर्ग (Chittorgarh Fort) में साका करने वाले जयमल राठौड़ का पुत्र राठौड़ रामदास और ग्वालियर का राजा रामशाह अपने पुत्र शालिवाहन सहित बड़ी वीरता के साथ लड़कर मारे गये। कुछ लेखकों के अनुसार ग्वालियर के तोमर राजवंश का एक भी पुरुष इस युद्ध में जीवित नहीं बचा। जबकि कुछ लेखकों के अनुसार राजा रामशाह का पोता बलभद्र इस युद्ध में घायल तो हुआ पर जीवित बच गया। कच्छवाहा माधवसिंह के विरुद्ध लड़ते समय महाराणा प्रताप (Maharana Pratap) पर तीरों की बौछार की गई और हकीम खाँ सूर, जो सैय्यदों से लड़ रहा था, हल्दीघाटी (Haldighati) से भागकर महाराणा के पीछे आया तथा महाराणा से मिल गया। इस प्रकार राणा के सैन्य के दोनों विभाग फिर एकत्र हो गये। फिर राणा लौटकर उन विकट पहाड़ों में चला गया, जो किसी दुर्ग के समान सुरक्षित था। तबकाते अकबरी का लेखक निजामुद्दीन अहमद बख्शी, महाराणा के दो घाव, एक तीर का और एक भाले का लगना लिखता है। इलियट ने इस पुस्तक का अंग्रेजी में अनुवाद किया है। मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूंनी और अबुल फजल महाराणा प्रताप के घायल होने का उल्लेख नहीं करते।
अबुल फजल ने अकबरनामा (Akbar Nama by Abul Fazal) में लिखा है कि उष्णकाल के मध्य के इस दिन गर्मी इतनी पड़ रही थी कि खोपड़ी के भीतर मगज भी उबलता था। ऐसे समय लड़ाई प्रातःकाल से मध्याह्न तक चली और 500 आदमी खेत रहे, जिनमें 120 मुसलमान और 380 हिन्दू थे। 300 से अधिक मुसलमान घायल हुए।
अबुल फजल पहर दिन चढ़े लड़ाई का प्रारम्भ होना लिखता है, जो कि ठीक नहीं है। उदयपुर के जगदीश मंदिर की प्रशस्ति में प्रतापसिंह का प्रातःकाल युद्ध में प्रवेश करना लिखा है, यही विवरण सही है।
अबुल फजल द्वारा अकबर की तरफ के सैनिकों के मरने के सम्बन्ध में दी गई 120 संख्या पूरी तरह अविश्वसनीय है। एक तरफ वह स्वयं ही लिखता है कि दोनों ओर के सैनिकों के शवों से रणखेत पट गया और दूसरी ओर उसने युद्ध में मरने वालों की संख्या 500 ही लिखी है।
इस सम्बन्ध में सैय्यद अहमद खाँ बारहा का एक वक्तव्य विचारणीय है। जब अकबर (Akbar) की सेना के कर्मचारी, युद्ध में मारे गए मुगल सैनिकों एवं घोड़ों की सूची बनाने लगे, तो सैय्यद अहमद खाँ बारहा ने उनसे कहा कि ऐसी फेहरिश्त बनाने से क्या लाभ है? मान लो कि हमारा एक भी घोड़ा व एक भी आदमी नहीं मारा गया। इस समय तो खाने के सामान का बंदोबस्त करना चाहिये।
सैय्यद अहमद खाँ बारहा के इस वक्तव्य से अनुमान लगाया जाना कठिन नहीं है कि हल्दीघाटी के युद्ध (War of Haldighati) में बड़ी संख्या में मुगल सैनिक मारे गये थे और मुगल अधिकारी अकबर तक उनकी सही सूची पहुंचाने से बचना चाहते थे। इस कारण मुगल अधिकारियों द्वारा महाराणा की पराजय और अकबर की विजय सिद्ध करने के लिये युद्ध में मृत मुगल सैनिकों की संख्या चालाकी से छिपा ली गई।
महाराणा का छत्र अजेय रहा एवं शत्रु के मुख पर पराजय की कालिख पुत गई।
-डॉ. मोहनलाल गुप्ता की पुस्तक तीसरा मुगल जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर से!
हल्दीघाटी (Haldighati) में महाराणा प्रताप (Maharana Pratap) वैसा ही था जैसा सांपों के झुण्ड में पक्षीराज गरुड़! हल्दीघाटी में महाराणा प्रताप ऐसा था जैसा दो मुंह वाला योद्धा! हल्दीघाटी में महाराणा प्रताप वैसा ही था जैसा कौरवों के बीच अर्जुन। हल्दीघाटी का युद्ध (War of Haldighati) कोई सामान्य युद्ध नहीं था। यह हिन्दू गौरव की पराकाष्ठा को प्रतिष्ठित करने वाला था। इस युद्ध की गूंज सदियों तक सुनाई देने वाली थी।
18 जून 1576 को हल्दीघाटी के मैदान में दोनों पक्षों के सैनिक लड़ते हुए रक्ततलाई (Takt Talai) तक जा पहुंचे। कहा जाता है कि उस समय इस स्थान का नाम रक्ततलाई नहीं था अपितु दोनों पक्षों के सैनिकों के रक्त के भूमि पर गिरने से यहाँ रक्त की एक तलाई बन गई जिसके कारण इस स्थान का नाम रक्ततलाई पड़ गया।
मध्याह्न पश्चात् महाराणा प्रताप के रक्ततलाई छोड़ने के साथ ही युद्ध रुक गया। महाराणा प्रताप किसी भी हालत में युद्ध-क्षेत्र छोड़ना नहीं चाहता था किंतु हकीम खाँ सूरी (Hakim Khan Suri) तथा भामाशाह (Bhamashah) महाराणा प्रताप के घोड़े (Chetak) को जबर्दस्ती युद्ध-क्षेत्र से खींच कर ले गए।
महाराणा मुट्ठी भर सैनिकों के साथ युद्ध के मैदान से निकला था। यदि मुगल सैनिक चाहते तो महाराणा का पीछा कर सकते थे किंतु किसी भी मुगल सेनापति की हिम्मत महाराणा के पीछे जाने की नहीं हुई।
मुल्ला बदायूंनी (Mulla Abdul Qadir Badauni) लिखता है- ‘जिस समय महाराणा प्रताप युद्ध में घायल होकर रक्ततलाई से निकला, उस समय आग के समान भयानक गर्म लू चल रही थी। हमारी सेना में यह खबर फैल गई कि राणा छल करने के लिए पहाड़ के पीछे घात लगाये खड़ा है।
इस कारण हमारे सैनिकों ने राणा का पीछा नहीं किया। वे अपने डेरों में लौट गये और घायलों का इलाज करने लगे।’
हल्दीघाटी का युद्ध निश्चित रूप से दो पक्षों के बीच हुआ। एक पक्ष भारत की सर्वशक्तिशाली मुगल सत्ता का था तथा दूसरा पक्ष भारत के सबसे पराक्रमी और गौरवशाली राजकुल गुहिलों का।
मुगलों की तरफ से लड़ने के लिये मानसिंह के नेतृत्व में कच्छवाहे सरदार तथा मुगल सल्तनत के लगभग समस्त प्रसिद्ध अमीर आये थे जबकि गुहिलों की तरफ से लड़ने के लिये प्रमुख रूप से ग्वालियर के तंवर (Tomars of Gwalior) , मुट्ठी भर चौहान, सोलंकी, डोडिया, समदड़ी के झाला, जालोर के सोनगरे (Songara of Jalore) , मेड़तिया राठौड़ (Meratia Rathore) , भामाशाह, उसका भाई ताराचंद ओसवाल एवं अफगान हकीम खाँ सूरी आये थे।
मुगलों का पक्ष बहुत भारी था और महाराणा के पास बहुत कम सेना थी।
इस प्रकार हल्दीघाटी के युद्ध में यही दो पक्ष स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं किंतु एक तीसरा पक्ष भी इस लड़ाई में मौजूद था जो इन पक्षों के केन्द्र में था, वही मुख्य भूमिका में भी था। वह था कच्छवाहों का राजकुमार मानसिंह (Kunwar Ramsingh), जो इस समय अकबर का सेनापति बनकर आया था।
मानसिंह तथा महाराणा प्रताप का सैंकड़ों साल पुराना रोटी-बेटी का सम्बन्ध था। जिस प्रकार महाराणा के कुल ने हिन्दुओं की बड़ी सेवा की थी, उसी प्रकार मानसिंह के कुल ने भी आगे चलकर हिन्दुओं की बड़ी सेवा की। विशेषतः तब, जब अकबर का वंशज औरंगजेब भारत का शासक बना। तब मानसिंह के वंशजों ने छत्रपति शिवाजी के प्राणों की रक्षा एक से अधिक बार की थी।
इसलिए इस युद्ध में मानसिंह को युद्धरत दो पक्षों में से एक समझने की बजाय तीसरे पक्ष के रूप में देखा जाना चाहिए। इसका कारण यह है कि अकबर का सेनापति होते हुए भी मानसिंह अपने पक्ष की स्वतंत्र अभिव्यक्ति का आकांक्षी था। तीसरे पक्ष के रूप में मानसिंह हल्दीघाटी के युद्ध में अपनी विजय की स्पष्ट घोषणा करता है।
अकबर (Akbar) का पक्ष प्रमुख रूप से मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूंनी तथा अबुल फजल (Abul Fazal) ने लिखा जबकि महाराणा प्रताप का पक्ष चारण कवियों ने ख्यातों एवं फुटकर रचनाओं में लिखा। अमरकाव्य वंशावली (Amarkavya Vanshavali), राजरत्नाकर (Rajaratnakara), जगन्नाथराय प्रशस्ति (Jagannatharay Prashasti), राणा रासौ (Rana Rasou) आदि रचनाओं में भी राणा प्रताप का पक्ष अच्छी तरह से रखा गया है।
मानसिंह का पक्ष ऐतिहासिक महाकाव्य ‘मानप्रकाश’ (Manprakash) के रूप में सामने आता है जिसकी रचना मानसिंह के दरबारी कवि मुरारीदास (Murari Das) ने की थी। वह लिखता है कि दोनों सेनाएं बहुत देर तक युद्ध की भावना से तथा चमकती हुई तलवारों की कांति से उद्दीप्त थीं।
राजा मानसिंह भुज-प्रताप से क्षण भर में विपक्षियों को छिन्न-भिन्न कर, जीत कर अपने प्रताप से वैरी वर्ग को सन्तप्त करता हुआ, इन्द्र के समान सुशोभित हुआ।
जब मानसिंह युद्ध कर रहा था तब उसका छोटा भाई माधवसिंह आ गया। उसने मानसिंह से कहा- राजन्! आप क्षण भर के लिये विश्राम कर लीजिये, इस युद्ध को समाप्त कीजिये। यह कहकर वीर माधवसिंह युद्धाभिमुख हुआ तथा समस्त विपक्षी योद्धाओं को व्यग्र बना दिया। उस समय उसके भय से कोई भी योद्धा, युद्ध के लिये सामने नहीं आया।
माधवसिंह के बाण से अनेक योद्धा छिन्न-भिन्न हो गये। अनेक राजा दीन हो गये, कुछ युद्ध भूमि छोड़कर भाग गये, कुछ युद्ध करने के लिये कुछ समय तक खड़े रहे। दुर्मद-वीर-वर्य राणा प्रताप, माधवसिंह से लड़ने के लिये सामने आया।
कर्ण के समान प्रतापी राणा प्रताप, अर्जुन के समान शक्तिशाली राजा मान को जीतने की इच्छा से कठोर वचन बोला- माधवसिंह! वीरों को अपने बल से विद्रावित कर तुम इस रणभूमि में जो हर्ष का अनुभव कर रहे हो, मैं अभी क्षण भर में राजा मान सहित तुम्हें हर्षहीन बना दूंगा।
राणा प्रताप के जीवित रहते तुम युवकों की जो जीतने की इच्छा है, वह व्यर्थ ही है। मैं जो कह रहा हूँ, उसे अच्छी तरह जान लो, मैं भगवान विष्णु के चरणों की शपथ खाकर कह रहा हूँ।
इस प्रकार कहकर वीर प्रताप ने उन दोनों को सैंकड़ों बाणों से ढक दिया। आकाश, बाण समूह से आच्छन्न हो गया और वह दिन, दुर्दिन के समान प्रतीत होने लगा।
सर्वप्रथम हाथी से हाथी भिड़ गये तथा घोड़े से घोड़े। पैदल से पैदल लड़ने लगे, इस प्रकार उस समय बराबरी का युद्ध हो रहा था। इस भयंकर संग्राम को देखकर देवताओं का समूह भी आश्चर्य चकित हो गया। शस्त्रों की अधिकता से हुए घने अंधकार में भय से आक्रांत मन व शरीर वाले योद्धा इतस्ततः भागने लगे।
जो जिसके सामने आया, उसने उसे मार डाला। अपने पराये का भेद नहीं रखा गया। राणा की सेना बाणों से छिन्न-भिन्न शरीरा विदेह के समान इतस्ततः दौड़ने लगी। जिस प्रकार बादल जलधारा से भूमि को रोक देता है, उसी प्रकार उस राणा ने पुनः सैंकड़ों बाणों से शूरवीर मानसिंह को रुद्ध कर दिया।
उसके बाणों से आच्छन्न धनुर्धारी युद्ध की कामना से उसके सामने जा खड़ा हुआ। राणा प्रताप के बाणों से उत्पन्न घने अंधकार को दूर करके सूर्य के समान मानसिंह रणभूमि में शत्रुओं के लिये उत्पेक्षणीय हो गया।
खड़ग से काटे गये हाथी और बाणों से छिन्न-भिन्न घुड़सवार वहाँ गिरे हुए थे। महीपालमणि मान के भय से अनेक योद्धा गिर पड़े थे। युद्ध करने वाले योद्धाओं के रक्त की नदी उत्पन्न हो गयी। मरे हुए हाथी महान् पर्वत के समान लग रहे थे तथा योद्धाओं के केश, शैवाल की भांति शोभा दे रहे थे। मानसिंह ने अपने पराक्रम से रणनदी को विशाल बना दिया।
दो मुख वाले व्यक्ति के समान बड़े वेग से आगे तथा पीछे देखता हुआ राणा प्रताप, हत-गति हो गया। राणा प्रताप के पीछे क्रोध से दौड़ते हुए राजा मानसिंह ने भी निष्प्राण के समान इस एक को ही छोड़ा। अर्थात् राणा प्रताप के अतिरिक्त सब को मार डाला।
यह एक अच्छी साहित्यिक रचना है किंतु मानप्रकाश का यह वर्णन अतिश्योक्तिपूर्ण तो है ही, काफी अंशों में असत्य भी है। साथ ही, राजस्थान में इस युद्ध के सम्बन्ध में जो बातें बहुतायत से और उसी काल से प्रसिद्ध हैं, मानप्रकाश की बातें उनसे भी मेल नहीं खातीं।इस पुस्तक से भी हल्दीघाटी में महाराणा प्रताप के शौर्य के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त होती है।
-डॉ. मोहनलाल गुप्ता की पुस्तक तीसरा मुगल जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर से!
जिस प्रकार मानसिंह कच्छवाहा हल्दीघाटी के युद्ध में अकबर की उपलब्धियों से विलग और स्वतंत्र अभिव्यक्ति का आकांक्षी है। उसी प्रकार ग्वालियर नरेश रामशाह तंवर का बलिदान भी स्वतंत्र अभिव्यक्ति का अभिलाषी है। तंवरों को भारत के इतिहास में तोमरों के नाम से भी जाना जाता है।
राजा रामशाह तंवर(Ramshah Tanwr/Ramshah Tomar), महाराणा प्रताप (Maharana Pratap) की बहिन का ससुर था तथा महाराणा उदयसिंह के समय से मेवाड़ का सामंत था। एक समय था जब आगरा का लाल किला ग्वालियर के तोमरों के अधिकार में हुआ करता था किंतु दिल्ली के लोदी सुल्तानों ने तोमरों से आगरा और ग्वालियर के किले छीन लिए थे।
तब से ग्वालियर के तोमर लोदियों के अमीर बन गए थे। ई.1536 में जब रामशाह तंवर की माता ने मुगल शहजादे हुमायूँ (Humayun) को बहुत सारा धन एवं कोहिनूर हीरा (Kohinoor Diamond) देकर अपने परिवार के प्राण बचाए थे, उस समय राजकुमार रामशाह तंवर 9-10 वर्ष का बालक था।
आगरा से निकलकर यह परिवार चम्बल के बीहड़ों में आ गया और बाद में इन्हें मेवाड़ के महाराणाओं (Maharanas Of Mewar) का आश्रय मिल गया। तब से ग्वालियर के तोमर मेवाड़ के महाराणाओं के सामंतों के रूप में अपना अस्तित्व बनाए हुए थे।
ई.1556 में रामशाह ने ग्वालियर के दुर्ग पर फिर से अधिकार कर लिया। ई.1558 में अकबर ने ग्वालियर (Gwalior) पर आक्रमण करके रामशाह को पुनः ग्वालियर से बाहर निकाल दिया।
इस बार भी रामशाह तंवर तथा उसका परिवार महाराणा उदयसिंह (Maharana Udaisingh) की सेवा में मेवाड़ चला आया। महाराणा उदयसिंह ने रामशाह के पुत्र शलिवाहन से अपनी एक पुत्री का विवाह कर दिया तथा रामशाह को प्रतिदिन 800 रुपये की वृत्ति बांधकर 20 लाख रुपये वार्षिक आय की जागीर प्रदान की थी।
जब ई.1567 में अकबर ने चित्तौड़ पर आक्रमण किया तब यही रामशाह तोमर, महाराणा उदयसिंह के साथ पहाड़ियों में गया था।
हल्दीघाटी के मैदान में रामशाह तोमर महाराणा प्रताप के घोड़े के ठीक सामने रहा और रणक्षेत्र में उसने महाराणा की सुरक्षा का दायित्व निर्वहन किया। उसके तीनों पुत्रों- शालिवाहन, भवानीसिंह तथा प्रतापसिंह ने भी इस युद्ध में भाग लिया।
उसका एक पुत्र महाराणा की गजसेना का अध्यक्ष था तथा एक पुत्र महाराणा की अश्व सेना का अध्यक्ष था। युद्धक्षेत्र में जगन्नाथ कच्छवाहा ने वीर कुल शिरोमणि रामशाह तंवर के प्राण लिए।
राजकुमार शालिवाहन के नेतृत्व में तोमर वीरों ने मुगलों की सेना पर ऐसा प्रबल धावा किया कि मुगल सेना हल्दीघाटी के मैदान से पांच कोस दूर भाग गई। राजा रामशाह के तीनों पुत्र अपने 300 तोमर वीरों सहित इस युद्ध में रणखेत रहे।
खमनौर तथा भागल के बीच जिस स्थान पर तंवरों की छतरियां बनी हुई हैं, वह स्थान रक्ततलाई कहलाता है क्योंकि यहाँ रामशाह के पुत्रों एवं तोमर सैनिकों ने भयानक मारकाट मचाई जिससे रक्त की तलैया बन गई। वीरवर रामशाह तंवर, उसके पुत्र तथा सैनिक इसी तैलया में अपना रक्त मिलाकर शोणित की वैतरणी पार कर गये।
भारत का इतिहास तंवर वीरों के अमर बलिदान पर गर्व करता है। निर्विवाद रूप से यह कहा जा सकता है कि इस युद्ध में यदि किसी ने सर्वाधिक बलिदान दिया था तो वह रामशाह तंवर तथा उसका परिवार ही था। रामशाह तंवर का बलिदान तोमरों के इतिहास का ठीक वैसा ही गौरवशाली पृष्ठ है जैसा कि तराईन के युद्ध में राजा गोविंद राय तोमर द्वारा दिया गया बलिदान।
कर्नल जेम्स टॉड ने हल्दीघाटी युद्ध को अत्यंत महत्त्व देते हुए इसे मेवाड़ की थर्मोपेली और दिवेर युद्ध को मेवाड़ का मेरेथान लिखा है। पाठकों की सुविधा के लिए बताना समीचीन होगा कि दिवेर का युद्ध, हल्दीघाटी युद्ध के सात साल बाद ई.1583 में हुआ था।
आधुनिक काल में कर्नल टॉड को ही हल्दीघाटी युद्ध को प्रसिद्ध करने का श्रेय जाता है। हल्दीघाटी का युद्ध कई प्रकार से थर्मोपेली के युद्ध से बढ़-चढ़कर था। थर्मोपेली के युद्ध में यूनानवासियों की हार तथा लियोनिडास की मृत्यु हुई थी जबकि हल्दीघाटी के युद्ध में मेवाड़वासियों की विजय हुई थी तथा इस युद्ध के बाद महाराणा प्रताप दीर्घकाल तक सुखपूर्वक जिया था।
थर्मोपेली के युद्ध में यूनानवासियों ने लियोनिडास को धोखा दिया था किंतु हल्दीघाटी के युद्ध में किसी मेवाड़वासी ने प्रताप से धोखा नहीं किया था। इस कारण हल्दीघाटी तथा थर्मोपेली की परस्पर तुलना नहीं की जा सकती किंतु थर्मोपेली के युद्ध तथा उसके नायक लियोनिडास को सम्पूर्ण यूरोप में जो प्रसिद्धि मिली थी, ठीक वैसी ही अपितु उससे भी बढ़कर हल्दीघाटी के युद्ध तथा उसके नायक महाराणा प्रताप को भी विश्वव्यापी प्रसिद्धि प्राप्त हुई।
पाठकों की सुविधा के लिए थर्मोपेली के बारे में कुछ तथ्य बताने समीचीन होंगे। थर्मोपेली, उत्तरी और पश्चिमी यूनान के बीच एक संकरी घाटी है जिसके बीच की भूमि सपाट है। ई.480 में ईरान के बादशाह जर्कसीज ने बड़े सैन्य दल के साथ यूनान देश पर आक्रमण किया।
उस समय यूनान में भी हिन्दुस्तान की तरह अनेक छोटे-छोटे स्वतंत्र राज्य थे, जिन्होंने मिलकर अपने में से स्पार्टा के वीर राजा लियोनिडास को थर्मोपेली की घाटी में 8,000 सैनिकों सहित ईरानियों का सामना करने के लिये भेजा।
ईरानियों ने कई बार उस घाटी को जीतने का प्रयास किया परंतु हर बार उन्हें बड़े नरसंहार के साथ पराजित होकर लौटना पड़ा। अंत में एक विश्वासघाती पुरुष की सहायता से ईरानी लोग पीछे से पहाड़ पर चढ़ आये।
लियोनिडास ने अपनी सेना में से बहुत से सिपाहियों को ईरानियों के पक्ष में मिल जाने के संदेह में केवल 1000 विश्वासपात्र योद्धाओं को अपने पास रखा और शेष को निकाल दिया। लियोनिडास अपने सिपाहियों सहित लड़ता हुआ मारा गया।
उसकी सेना में से केवल एक सैनिक जीवित बचा जिसने इस युद्ध का विवरण यूरोपवासियों को बताया और लियोनिडास सम्पूर्ण यूनान का गौरव बन गया।
हल्दीघाटी युद्ध की भयावहता का वर्णन करते हुए मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूंनी ने काव्यमय शैली में लिखा है-
सेना की जब सेना से मुठभेड़ हुई,
पृथ्वी पर स्वर्ग जाने का दिन जल्दी आ गया।
खून के दो समुद्रों ने एक दूसरे को टक्कर दी,
उनसे उठी उबलती लहरों ने पृथ्वी को रंग-बिरंगा कर दिया।
जान लेने और जान देने का बाजार खुल गया।
दोनों ओर के योद्धाओं ने
अपना जीवन दे दिया और अपना सम्मान बचा लिया।
बहुसंख्यक वीर एक दूसरे से लड़े,
रण क्षेत्र में बहुत सा रुधिर बहने लगा।
दिल बलने लगे, चिल्लाहटें गूंजने लगीं,
गरदनें फन्दों से भिंच गईं।
-डॉ. मोहनलाल गुप्ता की पुस्तक तीसरा मुगल जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर से!
झाला बीदा (Jhala Bida) झाला मानसिंह (Jhala Mansingh or Jhala Manna) के नाम से प्रसिद्ध था उसकी बहिन महाराणा प्रताप (Maharana Pratap) को ब्याही थी। झाला मानसिंह की दृष्टि घायल महाराणा प्रताप पर पड़ी। उसने महाराणा को मुगल सैनिकों से बचाने के लिये उसका राज्यचिह्न झपटकर स्वयं धारण कर लिया ताकि मुगल सैनिक भुलावे में आ जायें।
जब महाराणा प्रताप, हल्दीघाटी (Haldighati) के मैदान में कच्छवाहा राजकुमार मानसिंह (Kunwar Mansingh Kachchhawaha) को मारने के उद्देश्य से मुगल सेना के भीतर तक घुस गया तब कुछ क्षणों के लिये संभवतः महाराणा प्रताप अकेला रह गया था।
To purchase this book please click on Image.
जब महाराणा का घोड़ा राजा मानसिंह कच्छवाहा के हाथी की सूण्ड पर पैर रखकर खड़ा हो गया और महाराणा ने मानसिंह पर अपने भाले से वार करने के बाद उसे मारा गया जानकर छोड़ दिया, तब हाथी की सूण्ड में पकड़ी हुई तलवार से महाराणा के घोड़े का पिछला एक पैर कट गया। इससे महाराणा की स्थिति और भी नाजुक हो गई। इसी समय मुगल सैनिकों ने महाराणा को चारों तरफ से घेर लिया। महाराणा उनसे संघर्ष करता हुआ घायल हुआ और उसे सात घाव लग गये। संभवतः इन्हीं क्षणों में झाला बीदा जो कि मेवाड़ में झाला मानसिंह के नाम से प्रसिद्ध था तथा जिसकी बहिन महाराणा प्रताप को ब्याही गई थी, उसकी दृष्टि घायल महाराणा प्रताप पर पड़ी। झाला मानसिंह ने महाराणा को मुगल सैनिकों से बचाने के लिये उसका राज्यचिह्न झपटकर स्वयं धारण कर लिया ताकि मुगल सैनिक भुलावे में आ जायें। कर्नल टॉड ने इस घटना का उल्लेख करते हुए लिखा है- प्रताप के ऊपर राजकीय छतरी लगी हुई थी जिसे वह अलग नहीं कर रहा था तथा शत्रु उस छतरी से प्रताप को पहचान कर बारबार घेरने का प्रयास कर रहा था। प्रताप को उसके साथियों ने शत्रु के घेरे से तीन बार बचाया किंतु अंत में जब प्रताप बहुत अधिक शत्रु सैनिकों से घिर गया तब झाला मन्ना ने अनूठी स्वामिभक्ति का परिचय दिया तथा अपने प्राण देकर प्रताप को बचाया।
मन्ना ने मेवाड़ के उस राजच्छत्र को छीन लिया तथा उस सुनहरे सूर्य को अपने मस्तक पर लगाकर एक ओर को बढ़ गया। इससे मुगल सिपाहियों की बाढ़ झाला मन्ना के पीछे लग गई। इस बीच प्रताप को जबर्दस्ती युद्धस्थल से निकाल लिया गया। झाला मन्ना युद्ध क्षेत्र में वीरगति को प्राप्त हुआ
बलवंतसिंह मेहता ने अपने एक लेख में लिखा है- ‘स्वामी को संकट में देख और उसकी सुरक्षा को अनिवार्य समझ झाला मान, राणा के छत्र और चंवर छीनकर जोर-जोर से चिल्लाकर कहने लगा कि प्रतापसिंह आ गया है। यह सुनकर मुगल सेना भ्रमित हो गई और वह प्रताप का घेरा छोड़कर झाला मान पर टूट पड़ी।
हकीम खाँ सूरी (Haqim Khan Sur) , चेटक (Chetak) की लगाम को खींचे आगे बढ़ा जहाँ भामाशाह (Bhamashah) थे। वे लोग महाराणा प्रताप को हल्दीघाटी के सुरक्षित स्थान की ओर ले गये।’ मुगल सैनिकों ने झाला मानसिंह को घेरकर मार डाला।
आशीर्वादीलाल श्रीवास्तव ने ‘द बैटल ऑफ हल्दीघाटी’ (Battle of Haldighati) में लिखा है- ‘झाला बीदा ने शुद्ध स्वामिभक्ति से प्रेरित होकर अपने स्वामी के मस्तक पर से राज्यछत्र झपटकर छीन लिया और मानसिंह की सेना के समक्ष आगे बढ़कर चिल्लाना शुरू किया कि मैं ही महाराणा हूँ। इससे महाराणा प्रताप भार मुक्त हुए और हकीम सूर के साथ हल्दीघाटी के तंग दर्रे से गोगूंदा पहुँच सके।’
कर्नल वॉल्टर ने भी महाराणा के राजकीय चिह्न झपटने वाले वीर का नाम झाला बीदा लिखा है। मेवाड़ के दो प्रमुख इतिहासकारों गौरीशंकर हीराचंद ओझा तथा कविराज श्यालदास ने इस घटना का उल्लेख नहीं किया है किंतु सामान्यतः कर्नल टॉड के मत पर ही अधिक विश्वास किया जाता है तथा माना जाता है कि खानवा के मैदान में हुई घटना की पुनरावृत्ति हल्दीघाटी के मैदान में भी हुई।
झाला मानसिंह के बलिदान के सम्बन्ध में मेवाड़ (Mewar) में अनेक कविताएं लिखी गई हैं। एक दोहे में कहा गया है-
मान परां खागां छई, खागां ऊपर छत्र।
हरवळ दीठौ जेण पुळ, झालां कुळ रो चित्र।।
अर्थात् – झाला मानसिंह के सिर के ऊपर शत्रुओं की तलवारें छाई हुई हैं और उन तलवारों के ऊपर महाराणा का छत्र सुशोभित है। ऐसा वीर मानसिंह, महाराणा की हरवाल में लड़ता हुआ दिखाई देता है।
एक दोहे में कहा गया है-
गीध कहै सुण गीधणी, सुण मकवाण सराह।
मन न हुवै हथ खावतां, राखण हिन्दू राह।।
अर्थात्- युद्ध के पश्चात् जब गृद्ध, वीरों के शवों को खा रहे थे तब एक गृद्ध अपनी पत्नी से बोला कि हे गृद्धी, इस मानसिंह झाला के हाथों को खाने का मन नहीं करता, ये वही हाथ हैं जिन्होंने हिन्दुओं के रक्षक महाराणा की रक्षा की है।
एक अन्य दोहे में कहा गया है-
नवलख्खां न्यारौ लियौ, रगत मान रो हेर।
रछ्या कर नित राखस्यां, तिलक करालां फेर।।
अर्थात्- जब मानसिंह का रक्त धरती पर गिरने लगा तो रणक्षेत्र में रक्त पीने वाली योगिनियों ने उस रक्त से अपना खप्पर भरते हुए कहा कि वीर मानसिंह का पवित्र रक्त पीने योग्य नहीं है, यह तो सुरक्षित रखने तथा नित्य ही मस्तक पर तिलक करने के लिये हैं।
किसी कवि ने लिखा है-
धर थांभी कारज कियौ, सेस फणां पर नाग।
ढंहतौ अम्बर थांभियौ, मान अकेली खाग।।
अर्थात्- शेषनाग तो अपने सहस्र फणों पर धरती को थामता है किंतु झाला मानसिंह ने तो अपनी अकेली तलवार के बल पर टूटते हुए आकाश को थाम लिया।
के गंगा जमना करै, करै गौमती स्नान।
तैं धारा तीरथ कियौ, हळदीघाटी मान।।
अर्थात्- लोग तो गंगा, यमुना और गौमती में स्नान करते हैं किंतु हे मानसिंह! तूने तो हल्दीघाटी में रक्त की धारा में स्नान करके तीर्थ का लाभ लिया।
मान लिया छत्तर चंवर, रण रो भार अतोल।
पातल सुं मांग न सक्या, सेस कछप अर कोल।।
अर्थात्- धरती का भार उठाने वाले शेषनाग, कच्छप और कोल भी जिस प्रतापसिंह से छत्र और चंवर नहीं मांग सकते, उस प्रतापसिंह के छत्र और चंवर का भार रण में मानसिंह ने उठाया जो कि युद्ध के समस्त भार से भी अधिक भारी था।
बैन कहै धन सींचिणा, इण जग भ्रात अपार।
सिर हथळेवै सींचियौ, मकवांणा बळिहार।।
अर्थात्- मानसिंह की बहिन जिसका विवाह महाराणा प्रताप से हुआ था, ने अपने भाई के बलिदान पर अपना भाग्य सराहते हुए कहा कि इस संसार में बहिन के हाथ पर धन सींचने वाले भाई असंख्य हैं किंतु मेरे हाथ पर तो भाई मानसिंह ने अपना सिर ही सींच दिया।
-डॉ. मोहनलाल गुप्ता की पुस्तक तीसरा मुगल जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर से!
श्यामनारायण पाण्डे ने अपनी कविता हल्दीघाटी में लिखा है कि हल्दीघाटी के युद्ध में अकबर के सैनिक भेड़ों की तरह अपने प्राणों की रक्षा के लिए भागे- भेड़ों की तरह भगे कहते, अल्लाह हमारी जान बचा।
उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जिले में ई.1910 में जन्मे श्यामनारायण पाण्डेय (Shyam Narayan Pandey) ने 17 सर्गों में हल्दीघाटी (Haldighati) नामक काव्य की रचना की जिसे राष्ट्रीय स्तर पर ख्याति प्राप्त हुई। उन्होंने अपनी इस कविता में हल्दीघाटी के युद्ध का ऐसा सुंदर वर्णन किया है जिसे सुनकर रगों का खून उबाल लेने लगता है। प्रस्तुत हैं, इस काव्य के कुछ अंश-
ग्यारहवें सर्ग के अंश-
कोलाहल पर कोलाहल सुन, शस्त्रों की सुन, झंकार प्रबल।
मेवाड़ केसरी गरज उठा, सुनकर अरि की ललकार प्रबल।।
हर एक लिंग को माथ नवा, लोहा लेने चल पड़ा वीर।
चेतक का चंचल वेग देख, था महा-महा लज्जित समीर।।
लड़-लड़कर अखिल महीतल को, शोणित से भर देने वाली।
तलवार वीर की तड़प उठी, अरि कण्ठ कतर देने वाली।।
राणा का ओज भरा आनन, सूरज समान चमक उठा।
बन महाकाल का महाकाल, भीषण भाला दमदमा उठा।
भेरी प्रताप की बजी तुरत, बज चले दमामे धमर-धमर।
धम-धम रण के बाजे बाजे, बज चले नगारे घमर-घमर।।
कुछ घोड़े पर कुछ हाथी पर, कुछ योधा पैदल ही आये।
कुछ ले बरछे कुछ ले भाले, कुछ शर से तरकस भर लाये।।
रण-यात्रा करते ही बोले, राणा की जय, राणा की जय।
मेवाड़ सिपाही बोल उठे, शत बार महाराणा की जय।।
हल्दी घाटी के रण की जय, राणा प्रताप के प्रण की जय।
जय जय भारतमाता की जय, मेवाड़-देश कण-कण की जय।।
हर एक लिंग हर एक लिंग, बोला हर हर अम्बर अनन्त।
हिल गया अचल भर गया तुरत, हर हर निनाद से दिग्दिगन्त।।
घनघोर घटा के बीच चमक, तड़-तड़ नभ पर तड़िता तड़की।
झन-झन असि की झनकार इधर, कायर-दल की छाती धड़की।।
अब देर न थी वैरी-वन में, दावानल के सम छूट पड़े।
इस तरह वीर झपटे उन पर, मानों हरि मृग टूट पड़े।।
मरने कटने की बान रही। पुश्तैनी इससे आह न की।
प्राणों की रंचक चाह न की। तोपों की भी परवाह न की।।
रण-मत्त लगे बढ़ने आगे, सिर काट-काट करवालों से।
संगर की मही लगी पटने क्षण-क्षण अरि कंठ कपालों से।
हाथी सवार हाथी पर थे, बाजी सवार बाजी पर थे।
पर उनके शोणितमय मस्तक, अवनी पर मृत-राजी पर थे।।
कर की असि ने आगे बढ़कर, संगर-मतंग-सिर काट दिया।
बाजी वक्षःस्थल गोभ-गोभ, बरछी ने भूतल पाट दिया।।
गज गिरा मरा पिलवान गिरा, हय कटकर गिरा निशान गिरा।
कोई लड़ता उत्तान गिरा, कोई लड़कर बलवान गिरा।।
झटके से शूल गिरा भू पर, बोला भट, मेरा शूल कहाँ।
शोणित का नाला बह निकला, अवनी-अम्बर पर धूल कहाँ।।
आँखों में भाला भोंक दिया, लिपटे अन्धे जन अन्धों से।
सिर कटकर भू पर लोट-लोट। लड़ गये कबंध कबंधों से।।
अरि किंतु घुसा झट उसे दबा, अपने सीने के पार किया।
इस तरह निकट बैरी उर को कर-कर कटार से फार दिया।।
कोई खरतर करवाल उठा, सेना पर बरस आग गया।
गिर गया शीश कटकर भू पर, घोड़ा धड़ लेकर भाग गया।।
कोई करता था रक्त वमन, छिद गया किसी मानव का तन।
कट गया किसी का एक बाहु, कोई था सायक-विद्ध नयन।।
गिर पड़ा पीन गज, फटी धरा, खर रक्त-वेग से कटी धरा।
चोटी-दाढ़ी से पटी धरा, रण करने को भी घटी धरा।।
तो भी रख प्राण हथेली पर वैरी-दल पर चढ़ते ही थे।
मरते कटते मिटते भी थे, पर राजपूत बढ़ते ही थे।।
राणा प्रताप का ताप तचा, अरि-दल में हाहाकार मचा।
भेड़ों की तरह भगे कहते अल्लाह हमारी जान बचा।।
अपनी नंगी तलवारों से वे आग रहे हैं उगल कहाँ
वे कहाँ शेरों की तरह लड़ें, हम दीन सिपाही मुगल कहाँ।।
भयभीत परस्पर कहते थे, साहस के साथ भगो वीरो!
पीछे न फिरो न मुड़ो, न कभी अकबर के हाथ लगो वीरो।।
यह कहते मुगल भगे जाते, भीलों के तीर लगे जाते।
उठते जाते गिरते जाते, बल खाते, रक्त पगे जाते।
आगे थी अगम बनास नदी, वर्षा से उसकी प्रखर धार।
थी बुला रही उनको शत-शत लहरों के कर से बार-बार।।
पहले सरिता को देख डरे, फिर कूद-कूद उस पार भगे।
कितने बह-बह इस पार लगे, कितने बहकर उस पार लगे।।
मंझधार तैरते थे कितने, कितने जल पी-पी ऊब मरे।
लहरों के कोड़े खा-खाकर कितने पानी में डूब मरे।।
राणा दल की ललकार देख, अपनी सेना की हार देख।
सातंक चकित रह गया मान, राणा प्रताप के वार देख।।
व्याकुल होकर वह बोल उठा, लौटो-लौटो न भगो भागो।
मेवाड़ उड़ा दो तोप लगा, ठहरो-ठहरो फिर से जागो।।
देखो आगे बढ़ता हूँ मैं, बैरी-दल पर चढ़ता हूँ मैं।
ले लो करवाल बढ़ो आगे, अब विजय-मंत्र पढ़ता हूँ मैं।।
भगती सेना को रोक तुरत लगवा दी भैरवकाय तोप।
उस राजपूत-कुल-घालक ने हा महाप्रलय-सा दिया रोप।।
फिर लगी बरसने आग सतत उन भीम भयंकर तोपों से।
जल-जलकर राख लगे होने योद्धा उन मुगल-प्रकोपों से।।
भर रक्त तलैया चली उधर, सेना-उर में भर शोक चला।
जननी-पद शोणित से धो-धो, हर राजपूत हर-लोक चला।।
क्षण भर के लिये विजय दे दी अकबर के दारुण दूतों को।
माता ने अंचल बिछा दिया सोने के लिये सपूतों को।
विकराल गरजती तोपों से रुई-सी क्षण-क्षण धुनी गई।
उस महायज्ञ में आहुति सी राणा की सेना हुनी गई।।
बच गये शेष जो राजपूत संगर से बदल-बदलकर रुख।
निरुपाय दीन कातर होकर, वे लगे देखने राणा-मुख।।
राणा दल का यह प्रलय देख, भीषण भाला दमदमा उठा।
जल उठा वीर का रोम-रोम, लोहित आनन तमतमा उठा।।
वह क्रोध वह्नि से जलभुनकर काली कटाक्ष सा ले कृपाण।
घायल नाहर सा गरज उठा, क्षण-क्षण बिखरते प्रखर बाण।।
बोला, ‘आगे बढ़ चलो शेर, मत क्षण भर भी अब करो देर।
क्या देख रहे हो मेरा मुख, तोपों के मुँह दो अभी फेर’।।
बढ़ चलने का संदेश मिला, मर मिटने का उपदेश मिला।
दो फेर तोप-मुख राणा से। उन सिंहों को आदेश मिला।।
गिरते जाते बढ़ते जाते, मरते जाते चढ़ते जाते।
मिटते जाते कटते जाते गिरते-मरते मिटते जाते।।
बन गये वीर मतवाले थे, आगे वे बढ़ते चले गये।
‘राणा प्रताप की जय’ करते, तोपों तक चढ़ते चले गये।।
To purchase this book please click on Image.
उन आग बरसती तोपों के मुँह फेर अचानक टूट पड़े।
बैरी-सेना पर तड़-तड़प मानों शत-शत पत्रि छूट पड़े।
फिर महासमर छिड़ गया तुरत, लोहू-लोहित हथियारों से।
फिर होने लगे प्रहार वार, बरछे-भाले तलवारों से।।
शोणित से लथपथ ढालों से, करके कुन्तल करवालों से।
खर-छुरी-कटारी फालों से, भू भरी भयानक भालों से।।
गिरि की उन्नत चोटी से पाषाण भील बरसाते।
अरि दल के प्राण-पंखेरू तन-पिंजर से उड़ जाते।।
कोदण्ड चण्ड रव करते बैरी निहारते चोटी।
तब तक चोटीवालों ने बिखरा दी बोटी-बोटी।।
अब इस समर में चेतक मारुत बनकर आयेगा।
राणा भी अपनी असि का अब जौहर दिखलायेगा।।
बारहवें सर्ग के अंश
घायल बकरों से बाघ लड़े। भिड़ गये सिंह मृग छौनों से।
क्या अजब विषैली नागिन थी, जिसके डसने में लहर नहीं।
उतरी तन से मिट गये वीर, फैला शरीर में जहर नहीं।
थी छुरी कहीं तलवार कहीं, वह बरछी-असि खगधार कहीं
वह आग कहीं, अंगार कहीं। बिजली थी कहीं कटार कहीं।।
लहराती थी सिर काट-काट, बल खाती थी भू पाट-पाट।
बिखराती अवयव बाट-बाट, तनती थी लोहू चाट-चाट।।
सेना-नायक राणा के भी रण देख-देखकर चाह भरे।
मेवाड़ सिपाही लड़ते थे दूने-तिगुने उत्साह भरे।।
क्षण मार दिया कर कोड़े से, रण किया उतर कर घोड़े से।
राणा-रण कौशल दिखा दिया, चढ़ गया उतर कर घोड़े से।।
क्षण भीषण हलचल मचा-मचा, राणा-कर की तलवार बढ़ी।
था शोर रक्त पीने को यह रणचण्डी जीभ पसार बढ़ी।।
वह हाथी दल पर टूट पड़ा, मानो उस पर पवि छूट पड़ा।
कट गई वेग से भू ऐसा शोणित का नाला फूट पड़ा।।
जो साहस कर बढ़ता उसको केवल कटाक्ष से टोक दिया।
जो वीर बना नभ-बीच फैंक, बरछे पर उसको रोक दिया।।
क्षण उछल गया अरि घोड़े पर क्षण लड़ा सो गया घोड़े पर।
वैरी-दल से लड़ते-लड़ते, क्षण खड़ा हो गया घोड़े पर।।
क्षण भर में गिरते रुण्डों से मदमस्त गजों के झुण्डों से।
घोड़ों से विकल वितुण्डों से, पट गई भूमि नर-मुण्डों से।।
ऐसा रण राणा करता था, पर उसको था संतोष नहीं।
क्षण-क्षण आगे बढ़ता था वह पर कम होता था रोष नहीं।
कहता था लड़ता मान कहाँ मैं कर लूं रक्त-स्नान कहां।
जिस पर तय विजय हमारी है, वह मुगलों का अभिमान कहां।।
भाला कहता था मान कहां, घोड़ा कहता था मान कहां।
राणा की लोहित आँखों से, रव निकल रहा था मान कहां।।
लड़ता अकबर सुल्तान कहां, वह कुल-कलंक है मान कहां?
राणा कहता था बार-बार, मैं करूं शत्रु-बलिदान कहां?
तब तक प्रताप ने देख लिया लड़ रहा मान था हाथी पर।
अकबर का चंचल साभिमान उड़ता निशान था हाथी पर।।
वह विजय-मंत्र था पढ़ा रहा, अपने दल को था बढ़ा रहा।
वह भीषण समर भवानी को, पग-पग पर बलि था चढ़ा रहा।
फिर रक्त देह का उबल उठा, जल उठा क्रोध की ज्वाला से,
घोड़ा से कहा बढ़ो आगे, बढ़ चलो कहा निज भाला से।।
हय-नस में बिजली दौड़ी, राणा का घोड़ा लहर उठा।
शत-शत बिजली की आग लिये वह प्रलय मेघ से घहर उठा।।
क्षय अमिट रोग वह राजरोग, ज्वर सन्निपात लकवा था वह।
था शोर बचो घोड़ा रण से, कहता हय कौन हवा था वह।।
तनकर भाला भी बोल उठा, राणा मुझको विश्राम न दे।
बैरी का मुझसे हृदय गोभ तू मुझे तनिक आराम न दे।
खाकर अरि-मस्तक जीने दे, बैरी-उर-माल सीने दे।
मुझको शोणित प्यास लगी, बढ़ने दे शोणित पीने दे।।
मुरदों का ढेर लगा दूं मैं, अरि-सिंहासन थहरा दूं मैं।
राणा मुझको आज्ञा दे दें, शोणित सागर लहरा दूं मैं।।
रंचक राणा ने देर न की, घोड़ा बढ़ आया हाथी पर
वैरी-दल का सिर काट-काट राणा चढ़ आया हाथी पर।।
गिरि की चोटी पर चढ़कर, किरणें निहारती लाशें।
जिनमें कुछ तो मुरदे थे, कुछ की चलती थी सांसें।।
वे देख-देख कर उनको, मुरझाती जाती पल-पल।
होता था स्वर्णिम नभ पर, पक्षी क्रन्दन का कल-कल।।
मुख छिपा लिया सूरज ने, जब रोक न सका रुलाई।
सावन की अन्धी रजनी, वारिद-मिस रोती आई।।
श्यामनारायण पाण्डेय (Shyam Narayan Pandey) द्वारा लिखी गई यह कविता बहुत लम्बी है, उसमें से मैंने कुछ अंश यहाँ दिए गए हैं ताकि पाठकों को हल्दीघाटी युद्ध (War of Haldighati) की भयावहता और उसमें राणा प्रताप और उनकी सेना द्वारा दिखाए गए पराक्रम का कुछ अनुमान हो सके।
–श्यामनारायण पाण्डे की खण्डकाव्य रचना हल्दीघाटी का एक अंश!
हल्दीघाटी का युद्ध (War of Haldighati) समाप्त होने के बाद महाराणा प्रता (Maharana Pratap) ने मुगल सेना की दुर्दशा की तथा उसे पहाड़ियों में कैद कर लिया। महाराणा प्रताप के भय से मुगल सेना अरावली के पहाड़ों में चूहों की तरह फंस गई।
जब महाराणा प्रताप रक्ततलाई से हल्दीघाटी (Haldighati) होता हुआ पहाड़ों में चला गया और झाला बीदा (Jhala Bida or Jhala Manna) का बलिदान हो गया तो थोड़ी ही देर बाद युद्ध भी समाप्त हो गया।
मानसिंह कच्छवाहा (Kunwar Mansingh) के आदमियों को उसी समय ज्ञात हो गया होगा कि महाराणा युद्धक्षेत्र से निकल गया है तथा मरने वाला महाराणा प्रतापसिंह नहीं, अपितु उसका सेनापति झाला बीदा अथवा झाला मानसिंह है।
मुल्ला अल्बदायूनीं (Abd al-Qadir Badayuni, 1540–1615 A.D.) ने स्पष्ट लिखा है कि हमारी सेना प्रताप के पीछे नहीं जा सकी क्योंकि उसे भय था कि प्रताप पहाड़ियों के पीछे घात लगाये खड़ा होगा। अतः अनुमान लगाया जा सकता है कि मुगल सेना बहुत देर तक महाराणा के भय से रक्ततलाई में खड़ी महाराणा के पुनः आक्रमण की प्रतीक्षा करती रही होगी तथा बाद में अपने शिविर में चली गई होगी।
विभिन्न ख्यातों से पता चलता है कि हल्दीघाटी से निकलकर महाराणा प्रताप, उनवास के रास्ते से कालोड़ा गांव गया जहाँ एक मशहूर वैद्य रहता था। राणा ने उससे अपने घावों का उपचार कराया। कालोड़ा लोसिंग से हल्दीघाटी के मार्ग में पड़ता है। मेवाड़ में एक उक्ति प्रचलित है-
घाव सिराया राणा रा, कालोड़ा में जाय।
महाराणा जानता था कि इस समय गोगूंदा (Gogunda) जाना खतरे से खाली नहीं है क्योंकि मानसिंह निश्चित रूप से गोगूंदा पर आक्रमण करेगा। अतः वह हल्दीघाटी के निकट के ही पहाड़ी दर्रों में रुका रहा ताकि अपने घायल सैनिकों को युद्ध के मैदान से निकालकर कोल्यारी गांव में उनका उपचार करवा सके।
कविराज श्यामलदास (Kaviraj Shyamaldas) ने वीर विनोद (Veer Vinod) में लिखा है कि जब मुगल सेना अपने शिविर में चली गई तब महाराणा ने अपने घायलों को युद्ध के मैदान से निकाला और कोल्यारी गांव में ले जाकर उनका इलाज करवाया। फिर अपने राजपूतों एवं भीलों की सहायता से उसने समस्त पहाड़ी नाके और रास्ते रोक लिये। महाराणा की योजना मुगलों की सेना को अरावली की पहाड़ियों में ही नष्ट कर देने की थी।
उधर कुंअर मानसिंह कच्छवाहा अपनी सेनाओं के साथ उस रात बनास नदी के तट पर खमणोर (Khamnor) के निकट बने अपने शिविर में ही रुका तथा अगले दिन गोगूंदा चला गया।
To read this book please click on Image.
अल्बदायूंनी ने लिखा है कि दूसरे दिन हमारी सेना ने वहाँ से चलकर रणखेत को इस अभिप्राय से देखा कि हर एक ने कैसा काम किया था। फिर दर्रे (घाटी) से हम गोगूंदा पहुँचे, जहाँ राणा के महलों के कुछ रक्षक तथा मंदिरवाले जिन सबकी संख्या 20 थी, हिन्दुओं की पुरानी रीति के अनुसार अपनी प्रतिष्ठा के निमित्त अपने-अपने स्थानों से निकल आये और सब के सब लड़कर मारे गये। मुल्ला लिखता है कि मुगल अमीरों को यह भय था कि कहीं रात के समय राणा उन पर टूट न पड़े। इसलिये उन्होंने सब मोहल्लों में आड़ खड़ी करा दी और गांव के चारों तरफ खाई खुदवा कर इतनी ऊँची दीवार बनवा दी कि कोई घुड़सवार उसको फांद न सके। तत्पश्चात् वे निश्चिंत हुए। फिर वे मरे हुए सैनिकों और घोड़ों की सूची बादशाह के पास भेजने के लिये तैयार करने लगे, जिस पर सैय्यद अहमद खाँ बारहा ने कहा- ऐसे फेहरिश्त बनाने से क्या लाभ है? मान लो कि हमारा एक भी घोड़ा व आदमी मारा नहीं गया। इस समय तो खाने के सामान का बंदोबस्त करना चाहिये। लड़ाई के दूसरे ही दिन मुगल सेना के पास खाने-पीने का सामान कुछ भी न था और पीछे भी उसी कारण शाही सेना की दुर्दशा होती रही, जिसका वर्णन फारसी तवारीखों में मिलता है, परन्तु उनमें यह कहीं लिखा नहीं मिलता है कि 5,000 सवारों की सेना के साथ एक दिन तक का भी खाने का सामान क्यों न रहा!
इसका कारण यही हो सकता है कि लड़ाई के पहले ही दिन महाराणा के सैनिकों ने शत्रुसैन्य का खाने-पीने का सामान लूट लिया हो और बाहर से आपूर्ति आने का मार्ग रोक लिया हो।
मुल्ला बदायूंनी लिखता है कि इस पहाड़ी इलाके में न तो अधिक अन्न पैदा होता है और न बनजारे आते हैं, हमारी सेना भूखों मर रही है। इस पर मुगल सैनिक खाने के सामान के प्रबंध का विचार करने लगे।
मुगल सेना की दुर्दशा न हो इस भय से वे एक अमीर की अध्यक्षता में सैनिकों को इस अभिप्राय से समय-समय पर गांव से बाहर भेजने लगे ताकि वे बाहर जाकर अन्न ले आवें और पहाड़ियों में जहाँ कहीं लोग एकत्र पाये जायें उनको कैद कर लें, क्योंकि हर एक को जानवरों के मांस और आम के फलों पर जो वहाँ बहुतायत से थे, निर्वाह करना पड़ता था।
मुगल सेना की दुर्दशा यहीं नहीं रुकी। साधारण सिपाहियों को रोटी न मिलने के कारण इन्हीं आम के फलों पर निर्वाह करना पड़ता था जिससे उनमें से अधिकांश बीमार पड़ गये। जब तेज गर्मी पड़ती है तो आम खाने से प्रायः पेटदर्द एवं पेचिश जैसी बीमारियां हो जाया करती हैं।
मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूंनी के इस वर्णन से स्पष्ट है कि महाराणा प्रताप के भय से अकबर की सेना चूहों की तरह अरावली की पहाड़ियों में फंस गई। वह न तो अपने स्थान से आगे-बढ़कर अपने खाने पीने का सामान ला पा रही थी और न अरावली से निकलकर वापस अजमेर जा पा रही थी।
मुल्ला बदायूंनी लिखता है कि जब शहंशाह अकबर (Shahanshah Akbar) को हल्दीघाटी का युद्ध (War of Haldighati) समाप्त हो जाने की सूचना मिली तो उसने तुरंत ही महमूद खाँ को गोगूंदा जाने की आज्ञा दी।
महमूद खाँ ने रणखेत की स्थिति को देखा और वहाँ से लौटकर हर एक आदमी ने लड़ाई में कैसा काम दिया, इस विषय में जो कुछ उसके सुनने में आया, वह बादशाह से निवेदन किया। उसने मुगल सेना की दुर्दशा की पूरी बात बादशाह से छिपा ली।
महमूद खाँ ने का विवरण सुनकर बादशाह (Akbar) सामान्य रूप से तो प्रसन्न हुआ परन्तु राणा का पीछा न कर उसको जिन्दा रहने दिया, इस पर वह बहुत क्रुद्ध हुआ।
मुल्ला बदायूंनी ने लिखा है कि अमीरों ने विजय के लिखित वृत्तांत के साथ रामप्रसाद हाथी को, जो लूट में हाथ लगा था और जिसको बादशाह ने कई बार राणा से मांगा था, परंतु दुर्भाग्यवश वह नटता ही रहा, बादशाह के पास भेजना चाहा।
आसफ खाँ ने उक्त हाथी के साथ मुझे (मुल्ला बदायूंनी को) भेजने की सलाह दी क्योंकि मैं ही इस काम के लिये योग्य था और धार्मिक भावों को पूरा करने के लिये ही लड़ाई में भेजा गया था।
मुल्ला बदायूंनी लिखता है कि जब आसफ खाँ ने मानसिंह से कहा कि अलबदायूंनी को युद्ध के समाचारों के साथ बादशाह के पास भेजा जा रहा है तो मानसिंह ने हँसी के साथ कहा कि अभी तो अल्बदायूंनी को बहुत काम करना बाकी है। उसको तो हर एक लड़ाई में आगे रहकर लड़ना चाहिये।
इस पर मैंने अर्थात् अल्बदायूंनी ने जवाब दिया कि मेरा मुरशिदी का काम तो यहीं समाप्त हो चुका, अब मुझे बादशाह की सेवा में रहकर वहाँ काम देना चाहिये। इस पर मानसिंह खुश हुआ और हँसा।
फिर 300 सवारों को मेरे साथ देकर राणा के रामप्रसाद नामक हाथी के साथ मुझे वहाँ से रवाना किया। मानसिंह भिन्न-भिन्न स्थानों पर थाने नियत करता हुआ गोगूंदा से 20 कोस मोही गांव तक शिकार खेलता हुआ मेरे साथ रहा। वहाँ से एक सिफारिशी पत्र देकर उसने मुझे सीख दी।
-डॉ. मोहनलाल गुप्ता की पुस्तक तीसरा मुगल जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर से!
हल्दीघाट का युद्ध (War of Haldighati) हारने के बाद जब मानसिंह (Kunwar Masingh) अकबर (Akbar) के पास अजमेर गया तब अकबर ने मानसिंह की ड्यौढ़ी बंद कर दी। हल्दीघाटी के अभियान में आसफ खाँ भी बड़े सेनापति के रूप में भेजा गया था। इसलिए अकबर ने जिस तरह मानसिंह की ड्यौढ़ी बंद की थी, उसी तरह आसफ खाँ की भी ड्यौढ़ी बंद कर दी गई।
हल्दीघाटी का युद्ध रुक जाने के बाद अकबर की सेना अरावली के पहाड़ों में चूहों की तरह फंस गई और भूख से तड़पने लगी। भूख और कुपोषण के कारण बहुत से मुगल सैनिक बीमार पड़कर मरने लगे।
हल्दीघाटी का युद्ध रुक जाने के बाद अकबर की सेना अरावली के पहाड़ों में चूहों की तरह फंस गई और भूख से तड़पने लगी। भूख और कुपोषण के कारण बहुत से मुगल सैनिक बीमार पड़कर मरने लगे।
To read this book please click on Image.
इतना होने पर भी मानसिंह तथा आसफ खाँ (Asaf Khan) अपनी सेना को मेवाड़ की पहाड़ियों से निकालकर अजमेर की तरफ नहीं ले जा सके। इसके दो कारण थे, पहला तो यह कि मानसिंह तथा आसफ खाँ को भय था कि यदि वे बिना अतिरिक्त मुगल सेना आए अपने स्थान से निकलने का प्रयास करेंगे तो महाराणा (Maharana Pratap) के राजपूत एवं भील सैनिक मुगलों को मच्छरों की तरह मार देंगे। दूसरा कारण यह था कि उन्हें भय था कि यदि वे महाराणा को परास्त किए बिना ही बादशाह (Akbar) के पास लौट कर गए तो अवश्य ही अकबर नाराज होकर उन्हें दण्डित करेगा। मानसिंह तथा आसफ खाँ के इस भय से सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि अकबर ने उन्हें क्या आदेश देकर युद्ध करने के लिए भेजा होगा! या तो महाराणा को मारकर लौटना, या फिर मत लौटना। ऐसा ही कुछ शाही आदेश मानसिंह तथा आसफ खाँ के लिए रहा होगा। इसलिए उन दोनों ने एक उपाय सोचा। उन्होंने बड़बोले मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूंनी को अकबर की सेवा में भेजने का निश्चय किया ताकि मुल्ला बदायूंनी बादशाह अकबर के सामने जाकर शाही सेना की जीत की डींगें हांक सके। अकबर के मन में अपनी जीत के प्रति विश्वास उत्पन्न करने के लिए मानसिंह तथा आसफ खाँ ने शाही सेना की विजय के लिखित वृत्तांत के साथ महाराणा प्रताप के रामप्रसाद नामक हाथी को प्रमाण के रूप में भेजा।
मुल्ला बदायूंनी (Abd al-Qadir Badayuni) ने लिखा है कि रामप्रसाद हाथी लूट में हाथ लगा था, जिसको बादशाह ने कई बार राणा से मांगा था, परंतु दुर्भाग्यवश राणा नटता ही रहा था। स्पष्ट है कि बदायूंनी ने भी अबुल फजल की तरह झूठ बोलने में कोई परहेज नहीं किया है।
क्योंकि परिस्थितियां स्वयं स्पष्ट करने में सक्षम हैं कि न तो अकबर (Akbar) को महाराणा प्रताप के रामप्रसाद नामक हाथी के बारे में कुछ पता होगा। न अकबर ने महाराणा से कभी हाथी मांग कर स्वयं को छोटा करने का प्रयास किया होगा।
मुल्ला बदायूंनी लिखता है कि मैं बागोर और मांडलगढ़ (Mandalgarh) होता हुआ आम्बेर (Amber) पहुँचा। लड़ाई की खबर सर्वत्र फैल गई थी किंतु मैं मार्ग में उस लड़ाई में महाराणा की हार के सम्बन्ध में जो कुछ कहता, लोग उस पर विश्वास नहीं करते थे।
फिर टोडा और बसावर होता हुआ मैं फतहपुर पहुँचा, जहाँ राजा भगवानदास के द्वारा बादशाह की सेवा में उपस्थित हुआ और अमीरों के पत्र तथा राणा का हाथी बादशाह के नजर किया।
मुल्ला बदायूंनी लिखता है कि बादशाह ने पूछा इस हाथी का क्या नाम है?’ मैंने निवेदन किया कि ‘रामप्रसाद’। इस पर बादशाह ने कहा कि यह विजय पीर की कृपा से हुई है इसलिये इसका नाम ‘पीरप्रसाद’ रखा जाये।
फिर बादशाह ने मुझ से पूछा कि अमीरों ने तुम्हारी बड़ी प्रशंसा लिखी है, परन्तु सच-सच कहो कि तुम कौनसी सेना में रहे और तुमने वीरता का क्या काम किया? फिर मैंने सारा हाल निवेदन किया जिस पर बादशाह ने प्रसन्न होकर मुझे 96 अशर्फियां बख्शीं।’
पाठकों को स्मरण होगा कि जब बदायूंनी ने अकबर से मानसिंह तथा आसफ खाँ के साथ महाराणा प्रताप के विरुद्ध जेहाद में जाने की अनुमति मांगी थी, तब भी अकबर ने बदायूंनी को 96 अशर्फियां देकर विदा किया था।
कहा नहीं जा सकता कि अकबर मुल्ला बदायूंनी की उन बातों से कितना सहमत और कितना संतुष्ट हुआ होगा जो बातें बदायूंनी ने अकबर को मानसिंह तथा आसफ खाँ की विजय के बारे में बताई होंगी किंतु अकबर को अधिक दिनों तक अंधेरे में नहीं रखा जा सकता था।
कुछ ही दिनों में अकबर के सामने स्थितियां स्वतः स्पष्ट होती चली गईं और वह समझ गया कि मुगलों ने हल्दीघाटी में जबर्दस्त मार खाई है।
उधर मानसिंह और आसफ खाँ भी समझ चुके थे कि महाराणा प्रताप की सेना ने मुगल सेना को गोगूंदा (Gogunda) में बंदी बना लिया है। फिर भी वे अकबर को भुलावे में रखने के लिये अपनी जीत के समाचार भेजता रहे तथा मेवाड़ से सुरक्षित रूप से निकलने का उपाय ढूंढते रहे।
महाराणा की सेना मुगल सेना से बहुत छोटी थी किंतु राणा का भय मुगल सैन्य में इस कदर व्याप्त था कि भोजन प्राप्ति के लिये गोगूंदा से निकली मुगल टुकड़ी, छोटा सा खटका होते ही कोसों दूर भाग जाती थी।
चिलचिलाती धूप, गर्म लू के थपेड़ों और कहीं भी किसी भी समय राणा के सैनिकों के टूट पड़ने का भय मुगल सेना को काल की तरह खाने लगा। उस पर महाराणा ने पहले ही दिन मुगल सेना की रसद सामग्री छीन ली थी। इस कारण मुगल सैनिक पहाड़ों में लगे आम के पेड़ों से आम तोड़कर खाने लगे। ज्यादा आम खाने से बहुत से सैनिक बीमार पड़ गये।
अकबर समझ चुका था कि हल्दीघाटी (Haldighati) में उसके हाथ कुछ नहीं आया अपितु उसने खोया ही है फिर भी अकबर ने इस तरह का अभिनय किया मानो हल्दीघाटी में मुगल सेना को भारी विजय मिली हो तथा उसकी बहुत बड़ी इच्छा पूरी हो गई हो।
इसलिये 29 सितम्बर 1576 को अकबर ख्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती (Khwaja Moinuddin Chishti) के उर्स पर अजमेर आया और वहाँ से उसने 6 लाख रुपये और कुछ सामान मक्का और मदीना के योग्य पुरुषों को बांटने के लिये देकर सुल्तान ख्वाजा को रवाना किया।
बदायूंनी ने लिखा है कि अकबर (Akbar) ने कुतुबुद्दीन मुहम्मद खाँ, कुलीज खाँ और आसफ खाँ (Asaf Khan) को यह आज्ञा देकर भेजा कि वे गोगूंदा से ख्वाजा का साथ छोड़ दें, राणा के मुल्क में सब जगह फिरें और जहाँ कहीं उसका पता लगे, वहीं उसको मार डालें।
मानसिंह को गोगून्दा में रहते हुए चार माह बीत गये थे किंतु उससे कुछ भी न बन पड़ा जिससे बादशाह ने मानसिंह, आसफ खाँ और काजी खाँ को वहाँ से चले आने की आज्ञा लिख भेजी।
शाही सेना गोगूंदा में कैदियों की तरह पड़ी हुई थी। जब कभी थोड़े से आदमी रसद का सामान लाने के लिये जाते तो उन पर राजपूत धावा करते थे।
कविराज श्यामलदास (Kaviraja Shyamaldas) ने वीर विनोद (Veer Vinod) में लिखा है कि इन आपत्तियों से घबराकर शाही सेना राजपूतों से लड़ती-भिड़ती अजमेर के लिए रवाना हो गई। मार्ग में महाराणा की सेना ने उन्हें जगह-जगह घेरा और बहुत से मुगल सैनिकों को मार डाला।
जब मानसिंह, आसफ खाँ और काजी खाँ अजमेर पहुँचे तो अकबर ने मानसिंह तथा आसफ खाँ की गलतियों के कारण उन दोनों की ड्यौढ़ी बंद कर दी। इस बात पर विचार किया जाना चाहिए कि वे कौनसी गलतियां थीं जिनके कारण अकबर ने अपने सेनापतियों को अपने दरबार में आने से मना कर दिया।
मुगलों के काल में किसी राजा या सेनापति को ड्यौढ़ी बंद की सजा बहुत अपमानजनक मानी जाती थी। इसका अर्थ यह था कि पराजित या अपराधी व्यक्ति बादशाह के महल की ड्यौढ़ी नहीं लांघ सकता था। अर्थात् बादशाह उसका मुंह नहीं देखता था। जब मानसिंह की ड्यौढ़ी बंद की गई तो मानसिंह का बड़ा अपमान हुआ।
-डॉ. मोहनलाल गुप्ता की पुस्तक तीसरा मुगल जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर से!
महाराणा प्रताप (Maharana Pratap) की जीत से अकबर (Akbar) को मानसिंह (Kunwar Mansingh) पर संदेह हो गया! अकबर को शक था कि मानसिंह ने जानबूझ कर महाराणा प्रताप को जीतने का अवसर दिया है। अकबर पहले भी मानसिंह को खुले दरबार में यह उलाहना दे चुका था कि तुम हिंदुओं का पक्ष लेते हो!
जब कुंअर मानसिंह और आसफ खाँ मेवाड़ की पहाड़ियों से निकलकर अजमेर (Ajmer) चले गए तब महाराणा प्रताप भी अनेक बादशाही थानों को उजाड़ता हुआ अपने थाने स्थापित करने लगा और अपनी सेना के साथ पुनः कुंभलगढ़ चला गया।
उधर जब मानसिंह और आसफ खाँ अजमेर पहुंचे तो अकबर ने उन दोनों की ड्यौढ़ी बंद कर दी। अर्थात् उन्हें अपने सामने आने से रोक दिया। मुल्ला बदायूंनी (Mulla Abdul Qadir Badauni) ने लिखा है कि मानसिंह और आसफ खाँ की गलतियों के कारण बादशाह (Badshah Akbar) ने उनकी ड्यौढ़ी बंद कर दी किंतु वह यह नहीं बताता कि वे कौनसी गलतियां थीं जिनके कारण मानसिंह तथा आसफ खाँ की ड्यौढ़ी बंद की गई? निश्चित रूप से अकबर को मानसिंह पर संदेह था कि उसने जानबूझ कर अपने पुराने स्वामी अर्थात् महाराणा प्रताप को जिताया है।
निजामुद्दीन अहमद बख्शी ने इस विषय में तबकाते अकबरी अर्थात् तारीखे निजामी (Tabaqat-e-Akbari i.e. Tarikh-e-Nizami) में लिखा है कि मानसिंह वापस चले आने की आज्ञा पाते ही बादशाह के दरबार में उपस्थित हुआ।
जब सेना की दुर्दशा के सम्बन्ध में जांच की गई, तो पाया गया कि सैनिक बहुत बड़ी विपत्ति में थे तो भी कुंवर मानसिंह ने अपनी सेना को राणा कीका अर्थात् प्रतापसिंह का मुल्क नहीं लूटने दिया। इसी से बादशाह मानसिंह पर अप्रसन्न हुआ और उसे दरबार से निकाल कर उसकी ड्यौढ़ी बंद कर दी।
निजामुद्दीन अहमद बख्शी के उक्त कथन से इस बात का आभास हो जाता है कि अकबर भले ही अजमेर में ख्वाजा की दरगाह पर उपस्थित होकर अपनी जीत का जश्न मना रहा था किंतु वास्तव में उसे पता लग गया था कि अकबर की विजय नहीं हुई है अपितु हार हुई है! इस अप्रत्याशित हार के कारण ही अकबर को मानसिंह पर संदेह हो गया था।
अकबर को मानसिंह पर संदेह था अन्यथा वह विजयी सेनापतियों की ड्यौढ़ी क्यों बंद करता? अकबर को इस बात पर भी शक था कि मानसिंह ने जानबूझ कर महाराणा प्रताप को जीतने का अवसर दिया है। अकबर पहले भी मानसिंह को खुले दरबार में यह उलाहना दे चुका था कि तुम हिंदुओं का पक्ष लेते हो!
इस बात का प्रमाण आगे चलकर इस तथ्य से मिलता है कि अगले दस सालों तक अकबर (Akbar) मेवाड़ को जीतने के लिए अपनी सेनाएं भेजता रहा किंतु आगे के अभियानों में अकबर ने मानसिंह को कभी भी मेवाड़ के अभियान पर नहीं भेजा। इससे पुष्टि होती हे कि अकबर को मानसिंह पर संदेह केवल कुछ समय के लिए नहीं हुआ था अपितु उसका संदेह जीवन भर बना रहा।
अकबर के विश्वसनीय मुस्लिम सेनापतियों को ही मेवाड़ (Mewar) के विरुद्ध किए जाने वाले अभियानों की कमान सौंपी गई। यह अलग बात है कि आगे के समस्त अभियानों में भी अकबर के सेनापति मेवाड़ में पिटकर लौटते रहे।
जब हल्दीघाटी के युद्ध (War of Haldighati) के 24 साल बाद अकबर की मृत्यु हुई तब उसे दो ही दुःख सालते थे। पहला यह कि वह महाराणा प्रताप को नहीं मार सका और दूसरा यह कि अकबर का पुत्र सलीम जीवन भर अकबर के विरुद्ध चलता रहा किंतु अकबर उसे अपने अनुकूल नहीं बना सका।
भारत की आजादी के बाद विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम के लिए जो पुस्तकें लिखी गईं उनमें वास्तविक ऐतिहासिक तथ्यों की अनदेखी करके हल्दीघाटी के युद्ध में महाराणा प्रताप की हार तथा अकबर की विजय को चित्रित किया गया।
इन पुस्तकों के माध्यम से भारतीयों को समझाने का प्रयास किया गया कि जहाँ भारत के अन्य राजाओं ने दूरदृष्टि रखते हुए अकबर से संधि की तथा अपनी प्रजा एवं सेना को युद्धों की विभीषिका से बचाया वहीं महाराणा प्रताप में दूरदृष्टि का अभाव था, उसने अपनी प्रजा एवं सेना को अनावश्यक युद्धों की आग में झौंक दिया।
आजाद भारत में लिखी गई इन पुस्तकों ने भारत की जनता के मन में इस बात को लेकर स्थाई संशय उत्पन्न कर दिया कि हल्दीघाटी के युद्ध में महाराणा प्रताप की जीत हुई थी कि हार! वस्तुतः इस प्रश्न की तथ्यपूर्ण विवेचना की जानी चाहिए।
संसार में बहुत से ऐसे युद्ध हुए हैं जिनके विवरण इतिहास के पन्नों पर बहुत विस्तार से लिखे गए और वे जनमानस में भी बहुत लोकप्रिय हुए किंतु उनमें जीत-हार का निर्णय स्पष्ट रूप से नहीं हो सका।
इन युद्धों में दोनों पक्षों ने बहुत-कुछ खोया किंतु सब-कुछ नहीं जिसके कारण न तो किसी पक्ष की स्पष्ट विजय हुई और न किसी पक्ष की स्पष्ट पराजय हुई।
हल्दीघाटी का युद्ध (War of Haldighati) भी उन्हीं युद्धों में से एक था जिसमें दोनों पक्षों ने कुछ न कुछ खोया अवश्य था किंतु सब-कुछ नहीं। अकबर ने अपनी साख खोई थी और महाराणा ने अपने विश्वस्त सेनापति गंवाए थे। यही कारण था कि दोनों पक्षों के कवियों और लेखकों ने हल्दीघाटी के युद्ध में अपने-अपने स्वामियों की विजय बताते हुए उनका पक्ष स्पष्ट किया।
To read this book please click on Image.
यदि तथ्यों की विवेचना की जाए तो हम पाते हैं कि इस युद्ध में अकबर ने केवल इतना प्राप्त किया था कि उसके अमीरों एवं सेनापतियों को मेवाड़ की भौगोलिक एवं सामरिक स्थिति से वास्तविक परिचय हो गया था जबकि महाराणा ने इस युद्ध के माध्यम से कालजयी ख्याति एवं देशवासियों की अटूट श्रद्धा प्राप्त की। जैसे-जैसे समय बीतता गया, महाराणा प्रताप साहसी योद्धा से ऐतिहासिक योद्धा, ऐतिहासिक योद्धा से कालजयी योद्धा और कालजयी योद्धा से मिथकों का नायक बनता चला गया। आज भी बहुत से लोग महाराणा प्रताप में इतनी अधिक श्रद्धा रखते हैं जितनी कि वे अपने देवी-देवताओं में रखते हैं जबकि अकबर को समाज के किसी भी वर्ग में ऐसी श्रद्धा, ऐसा आदर और ऐसा प्रेम प्राप्त नहीं हो सका! हल्दीघाटी के युद्ध (war of Haldighati) में दोनों पक्षों ने अपनी-अपनी जीत बताई है किंतु 18 जून 1576 में हल्दीघाटी का युद्ध होने से लेकर 19 जनवरी 1597 को महाराणा प्रताप का स्वर्गवास होने तक की समस्त घटनाओं का समग्र विश्लेषण करने से स्पष्ट है कि इस युद्ध में अकबर को विजय प्राप्त नहीं हुई थी। युद्ध के मैदान में न तो महाराणा प्रताप रणखेत रहा, न युद्ध के पश्चात् महाराणा ने समर्पण किया और न ही, युद्ध के पश्चात् के महाराणा के लगभग 21 वर्ष के जीवन काल में महाराणा प्रताप और अकबर के बीच कोई संधि हुई जिससे यह कहा जा सके कि अकबर को विजय प्राप्त हुई।
न तो महाराणा प्रताप और न उसका पुत्र अमरसिंह कभी भी अकबर के दरबार में उपस्थित हुए। उनके बाद भी कोई महाराणा किसी मुगल बादशाह के दरबार में नहीं गया।
राणा रासौ आदि मेवाड़ (Mewar) से सम्बन्ध रखने वाली अनेक प्राचीन पुस्तकों में महाराणा प्रताप (Maharana Pratap) की विजय लिखी गई है। उदयपुर के जगदीश मंदिर की 13 मई 1652 की प्रशस्ति में लिखा है- अपनी प्यारी तलवार हाथ में लिये प्रतापसिंह प्रातःकाल युद्ध में आया तो मानसिंह वाली शत्रु की सेना ने छिन्न-भिन्न होकर पैर संकोचते हुए पीठ दिखाई-
निश्चित रूप से अकबर (Akbar) को मानसिंह (Kunwar Mansingh) पर संदेह हल्दीघाटी युद्ध में अकबर की पराजय और प्रताप की विजय सूचित करता है जिसकी आधुनिक इतिहासकारों ने पूरी तरह अनदेखी की है।
–डॉ. मोहनलाल गुप्ता की पुस्तक तीसरा मुगल जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर से!
वॉयनिच मैन्युस्क्रिप्ट एक ऐसी पहेली, जिसे द्वितीय विश्व युद्ध के दिग्गज कोड-ब्रेकर्स से लेकर आज के सबसे एडवांस आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और सुपर कंप्यूटर्स...