Saturday, June 22, 2024
spot_img

अध्याय – 5 : अकबर के शासन-काल में निर्मित भवन

हुमायूँ के दो पुत्र थे। बड़े पुत्र जलालुद्दीन मोहम्मद अकबर को भारत का तथा छोटे पुत्र मिर्जा हकीम को काबुल का राज्य प्राप्त हुआ। हालांकि मिर्जा हकीम काबुल का शासक था और अकबर को किसी भी प्रकार का कर नहीं देता था किंतु सैद्धांतिक रूप से वह अकबर के अधीन था और मिर्जा हकीम की मृत्यु के बाद काबुल के क्षेत्र पुनः अकबर को प्राप्त हो गए।

अकबर का जन्म 15 अक्टूबर 1542 को हमीदा बानू बेगम की कोख से हुआ था। उस समय हुमायूँ अपने दुर्भाग्य के चरम पर था और अपनी गर्भवती बेगम हमीदा बानो के साथ अमरकोट के राणा वीरसाल की शरण में रह रहा था। अकबर को अपने राज्य पर अधिकार करने के लिए हेमचंद्र विक्रमादित्य (हेमू) तथा अफगानों से कड़ा संघर्ष करना पड़ा था किंतु बैराम खाँ की सेवाएं मिल जाने से अकबर ने अपने पिता के राज्य पर अधिकार कर लिया तथा अपने राज्य को पहले से भी कहीं अधिक विस्तृत कर लिया। इससे अकबर के शासन-काल में मुगल सल्तनत की आर्थिक स्थिति पहले की अपेक्षा बेहतर हो गई।

अकबर का शासन-काल शासन के प्रत्येक क्षेत्र में हिन्दू-मुस्लिम संस्कृति के सम्मिश्रण और समन्वय का काल था। इस कारण उसके समय में स्थापत्य एवं भवन निर्माण में भी सम्मिश्रण की नई शुरुआत हुई। अकबर द्वारा निर्मित भवनों में ईरानी तथा भारतीय तत्त्व दृष्टिगोचर होते हैं पर इनमें प्रधानता भारतीय तत्त्वों की ही है। कुछ विद्वानों की धारणा है कि मुगल कला का आरम्भ अकबर से ही मानना चाहिये। अबुल फजल का कथन है- ‘बादशाह सुन्दर इमारतों की योजना बनाता है और अपने मस्तिष्क एवं हृदय के विचार को पत्थर और गारे का रूप देता है।’ अकबर ने तत्कालीन शैलियों की बारीकी को समझा और अपने शिल्पकारों को इमारतें बनाने के लिए नये-नये विचार दिये। अकबर के काल में स्थापत्य कला की जो नई शैली विकसित हुई, वह वास्तव में हिन्दू-मुस्लिम शैलियों का समन्वय थी।

सुदृढ़ आर्थिक स्थिति के कारण अकबर के समय में साहित्य, स्थापत्य, शिल्प एवं संगीत आदि विविध कलाओं की बड़ी उन्नति हुई। अकबर के दरबार में नौ रत्नों की उपस्थिति से भी देश में कला और साहित्य की अभिवृद्धि हुई। अकबरकालीन स्थापत्य की कुछ प्रमुख विशेषताएं इस प्रकार थीं-

(1.) भवन निर्माण में अधिकांशतः लाल बलुआ पत्थर का उपयोग हुआ है, कहीं-कहीं पर सफेद संगमरमर का प्रयोग किया गया है।

(2.) अकबरी स्थापत्य शैली में मेहराबी और शहतीरी शैलियों का समान अनुपात में प्रयोग किया गया है।

(3.) आरम्भ में गुम्बद लोदी शैली में बनते रहे जो भीतर से खोखले होते थे किंतु तकनीकी दृष्टि से यह दोहरा गुम्बद नहीं था।

(4.) स्तम्भ का अग्रभाग बहुफलक युक्त था और इनके शीर्ष पर बै्रकेट या ताक बने होते थे।

(5.) भवनों का अलंकरण प्रायः नक्काशी या पच्चीकारी द्वारा होता था और उनमें चमकीले रंग भरे जाते थे।

अकबरी स्थापत्य का विकास दो चरणों में हुआ। प्रथम चरण में फतेहपुर सीकरी से पहले के स्थापत्य को रखा जाता है जिसमें आगरा, इलाहाबाद और लाहौर के किला शामिल हैं। दूसरे चरण में फतेहपुर सीकरी के निर्माण हैं।

अकबर के समय दिल्ली में निर्मित भवन

हुमायूँ का मकबरा

अकबर के शासनकाल में बनी सबसे पहली महत्वपूर्ण इमारत हुमायूँ का मकबरा थी। 20 जनवरी 1556 को हुमायूँ की मृत्यु के उपरांत उसे दिल्ली में ही दफ़्नाया गया था किंतु बाद में ई.1558 में उसके शव को खंजरबेग नामक सरदार द्वारा पंजाब के सरहिंद ले जाकर दफनाया गया। ई.1562 में हुमायूँ की विधवा हमीदा बानो बेगम के आदेशानुसार इस मकबरे का निर्माण आरम्भ किया गया। समकालीन ग्रंथ आइने अकबरी के अनुसार मकबरे की देखरेख का काम हुमायूँ की सबसे पहली बेगम हाजी बेगम को सौंपा गया था जो हुमायूँ की ममेरी बहन थी और बाद में उसकी बेगम बनी। वह ईरानी आदर्शों से प्रभावित थी।

यह मकबरा दिल्ली के दीनापनाह अर्थात् पुराने किले के निकट स्थित है। गुलाम वंश के काल में यह भूमि किलोकरी किले में हुआ करती थी और नसीरुद्दीन (ई.1268-87) के पुत्र सुल्तान कैकूबाद की राजधानी थी। हुमायूँ के मकबरे के लिए इस स्थान का चुनाव यमुना नदी के जल की उपलब्धता तथा हजरत निजामुद्दीन की दरगाह से निकटता के कारण किया गया था।

यह मकबरा भारत में मुगल वास्तुकला का प्रथम उदाहरण है। इस मक़बरे की चारबाग शैली भी भारत में पहली बार प्रयुक्त हुई थी। इसके अनुकरण पर ही आगे चलकर ताजमहल तथा उसके चारों ओर के उद्यान का निर्माण हुआ। समकालीन इतिहासकार अब्द-अल-कादिर बदायूनीं के अनुसार इस भवन का मुख्य वास्तुकार मिराक मिर्जा घियास था जिसे अफगानिस्तान के हेरात शहर से इस मकबरे के निर्माण के लिए विशेष रूप से बुलवाया गया था। उसने हेरात में कई भवन बनाए थे। मकबरे का निर्माण पूर्ण होने से पहले ही मिराक मिर्जा घियास की मृत्यु हो गई। अतः शेष कार्य उसके पुत्र सैयद मुहम्मद इब्न मिराक घियाथुद्दीन ने पूरा करवाया। मकबरे का मुख्य भवन ई.1571 में बनकर तैयार हुआ। संभवतः उसी समय हुमायूँ का शव सरहिंद से निकालकर दिल्ली लाया गया और इस मकबरे में दफनाया गया। यह मुगल सल्तनत की पहली इमारत थी जिसमें लाल बलुआ पत्थर का इतने बड़े स्तर पर प्रयोग हुआ था। इसके निर्माण पर 15 लाख रुपये की लागत आयी थी।

इस भवन-समूह में बादशाह हुमायूँ तथा शाही परिवार के सदस्यों की कब्रें हैं जिनमें हुमायूँ की बेगम हमीदा बानो, हुमायूँ की छोटी बेगम, शाहजहाँ के ज्येष्ठ पुत्र दाराशिकोह, मुगल बादशाह जहांदारशाह, फर्रूखशीयर, बादशाह रफीउद्दरजात, रफीउद्दौला एवं आलमगीर (द्वितीय) आदि की कब्रें शामिल हैं। यह भवन चारबाग शैली में निर्मित उद्यान के भीतर स्थित है। ऐसे उद्यान भारत में इससे पूर्व कभी नहीं बने थे और इसके बाद अनेक इमारतों का अभिन्न अंग बनते चले गये। यह मकबरा, बाबर के काबुल स्थित बाग-ए-बाबर मकबरे से एकदम भिन्न था। बाबर के साथ ही बादशाहों को बाग में बने मकबरों में दफ़्न करने की परंपरा आरंभ हुई थी। मकबरा निर्माण की यह शैली पूर्ववर्ती मंगोल शासक तैमूर लंग के समरकंद (उजबेकिस्तान) में बने मकबरे पर आधारित थी तथा यही मकबरा आगे चलकर भारत में मुगल स्थापत्य के मकबरों की प्रेरणा बना। ताजमहल के निर्माण के साथ ही मकबरा निर्माण की यह स्थापत्य शैली अपने चरम पर पहुंच गई।

कुछ विद्वानों के अनुसार इस मकबरे की निर्माता हाजी बेगम, ईरानी (अर्थात् फारसी) आदर्शों से प्रभावित थी। अकबर ने इस मकबरे के निर्माण के लिए अफगानिस्तान के हेरात नगर से वास्तुशिल्पियों का बुलवाया था तथा इस मकबरे के निर्माण में अनेक भारतीय शिल्पकारों ने भी काम किया था। उन सबके सम्मिलित प्रभाव से यह मकबरा ईरानी आदर्शों की भारतीय अभिव्यक्ति बन गया। इस इमारत का नीचे का भाग हिन्दू-मुस्लिम वास्तुकला शैली का तथा ऊपरी भाग ईरानी शैली का है किंतु इस मकबरे के चारों ओर स्वतंत्र रूप से कोई मीनार नहीं बनाई गई है।

मकबरे के विशाल भवन में प्रवेश करने के लिये पश्चिम और दक्षिण में दो दुमंजिले प्रवेशद्वार बने हुए हैं। इनकी ऊँचाई 16 मीटर है। दोनों द्वारों में दोनों ओर कक्ष बने हुए हैं एवं ऊपरी तल पर छोटे प्रांगण स्थित हैं। मुख्य इमारत के ईवान पर सितारे अंकित किए गए हैं। एक छः किनारों वाला सितारा मुख्य प्रवेशद्वार पर भी अंकित है। पत्थरों से बनी दीवारों की चिनाई में गारे-चूने का प्रयोग किया गया है और दीवारों को बाहर से लाल बलुआ पत्थर से ढका गया है। इसके ऊपर पच्चीकारी, फर्श की सतह, झरोखों की जालियों, द्वार-चौखटों और छज्जों के लिये श्वेत संगमरमर का प्रयोग किया गया है।

TO PURCHASE THIS BOOK, PLEASE CLICK THIS PHOTO

मकबरे का विशाल मुख्य गुम्बद श्वेत संगमरमर से ढका गया है। यह समरकंद के तैमूर के मकबरे तथा बीबी खानम के मकबरे के गुम्बद जैसा लगता है। इसकी शैली दमस्कस की 11वीं सदी के अंत में निर्मित उमैय्यद मस्जिद की शैली जैसी है। मकबरे के प्रत्येक तरफ एक द्वार मण्डप है जिसके साथ नुकीला मेहराब है। इस तरह इस भवन में विदेशी लक्षणों की अधिकता है किंतु इसकी कुछ विशेषताएं हिन्दू वास्तुकला की पंचरथ शैली की ओर संकेत करती हैं। मकबरे का भवन 8 मीटर ऊँचे चबूतरे पर खड़ा है। 12 हजार वर्ग मीटर की ऊपरी सतह को लाल जालीदार मुंडेर घेरे हुए है। इस वर्गाकार चबूतरे के कोनों को छांटकर अष्टकोणीय आभास दिया गया है।

फारसी वास्तुकला से प्रभावित यह मकबरा 47 मीटर ऊँचा और 100 मीटर  चौड़ा है। इमारत पर फारसी बल्बुअस गुम्बद बना है, जो सर्वप्रथम सिकंदर लोदी के मकबरे में देखा गया था। यह गुम्बद 42.5 मीटर ऊँचे गर्दन रूपी बेलन पर स्थित है। गुम्बद के ऊपर 6 मीटर ऊँचा पीतल का मुकुट रूपी कलश स्थापित किया गया है और उसके ऊपर चंद्रमा लगा हुआ है, जो तैमूर वंश के मकबरों में सैंकड़ों सालों से बनाया जा रहा था। गुम्बद दोहरी पर्त में बना है, बाहरी पर्त के बाहर श्वेत संगमरमर का आवरण लगा है और भीतरी पर्त गुफा के समान बनाई गई है। दोहरी पर्त का गुम्बद बनाने का प्रयोग भारत में सबसे पहले ‘सिकन्दर लोदी के मकबरे’ में किया गया था।

हुमायूँ के मकबरे में गुम्बद को ही सफेद संगमरमर से बनाया गया है जबकि  शेष इमारत लाल बलुआ पत्थर से निर्मित है जिस पर श्वेत और काले संगमरमर तथा पीले बलुआ पत्थर से पच्चीकारी का काम किया गया है। रंगों का यह संयोजन इस भवन को अनूठी आभा प्रदान करता है।

बाहर से सरल दिखने वाली इमारत की आंतरिक योजना कुछ जटिल है। मुख्य भवन में केन्द्रीय कक्ष सहित नौ वर्गाकार कक्ष बने हैं। बीच में मुख्य कक्ष है तथा उसे घेरे हुए शेष आठ दुमंजिले कक्ष बीच में खुलते हैं। बीच में बने मुख्य कक्ष को घेरे हुए शेष आठ दुमंजिले कक्ष बीच में खुलते हैं। मुख्य कक्ष गुम्बददार (हुज़रा) एवं दुगुनी ऊँचाई का एक-मंजिला है और इसमें गुम्बद के नीचे एकदम मध्य में आठ किनारे वाले एक जालीदार घेरे में बादशाह हुमायूँ की कब्र बनी है। यह इस इमारत की मुख्य कब्र है किंतु यह असली नहीं है। असली कब्र निचले कक्ष में बनी हुई है।

मुख्य कक्ष का प्रवेश दक्षिणी ओर बनी एक ईवान से होता है तथा अन्य दिशाओं के ईवानों में श्वेत संगमरमर की जालियां लगी हैं। बादशाह की असली समाधि ठीक नीचे आंतरिक कक्ष में बनी है जिसका रास्ता बाहर से आता है। इसके ठीक ऊपर दिखावटी किन्तु सुन्दर कब्र की प्रतिकृति बनायी गई है। नीचे तक आम पर्यटकों को जाने की अनुमति नहीं है। बाद में यही प्रयोग ताजमहल में भी दोहराया गया था। हुमायूँ के मकबरे के सम्पूर्ण भवन में पीट्रा ड्यूरा नामक संगमरमर की पच्चीकारी का प्रयोग किया गया है। इस प्रकार के कब्र-नियोजन भारतीय-इस्लामिक स्थापत्यकला के महत्त्वपूर्ण अंग हैं जो मुगल मकबरों अर्थात् ताजमहल आदि में प्रयुक्त हुए हैं।

मुख्य कक्ष में संगमरमर के जालीदार घेरे के ठीक ऊपर पश्चिम दिशा में अर्थात् मक्का की ओर एक मेहराब है। यहाँ पर प्रवेश-द्वारों पर खुदे कुरआन के सूरा 24 के बजाय सूरा-अन-नूर की एक रेखा बनी है जिसके द्वारा क़िबला अर्थात् मक्का की दिशा से प्रकाश आता है। इस प्रकार बादशाह का स्तर उसके विरोधियों और प्रतिद्वंदियों से ऊँचा एवं फरिश्तों के निकट हो जाता है। प्रधान कक्ष के चार कोणों पर स्थित चार अष्टकोणीय कमरे मेहराबदार दीर्घा से जुड़े हैं। प्रधान कक्ष की भुजाओं के बीच-बीच में चार अन्य कक्ष भी बने हैं। ये आठ कमरे मुख्य कब्र की परिक्रमा बनाते हैं। ऐसी रचना सूफ़ीवादी और कई अन्य मुगल मकबरों में दिखती है; साथ ही ये जन्नत का संकेत भी करते हैं।

प्रत्येक कमरे के साथ 8-8 कमरे और बने हैं, जो कुल मिलाकर 124 कक्षीय योजना का भाग हैं। इन छोटे कमरों में अनेक शहजादों, नवाबों और दरबारियों की कब्रें स्थित हैं। इनमें हमीदा बानो बेगम और दारा शिकोह की कब्रें प्रमुख हैं। इस चबूतरे के नीचे गर्भगृह में 56 कोठरियां बनी हुई हैं। इस सम्पूर्ण भवन में 100 से अधिक कब्रें स्थित हैं। इसलिए इस इमारत को मुगलों का कब्रिस्तान भी कहते हैं। कब्रों पर मृतक का नाम अंकित नहीं होने से, कब्र में दफ़्न व्यक्ति का पता नहीं चलता है।

 इस इमारत में लाल बलुआ पत्थर पर श्वेत संगमरमर के संयोजन का सर्वप्रथम प्रयोग किया गया था। यह पूर्णतः मुगल वास्तुकला से निर्मित है तथापि इसमें भारतीय स्थापत्य कला की अनेक विशेषताएं देखने को मिलती हैं। यहाँ स्थित राजस्थानी स्थापत्य की छोटी छतरियां नीली टाइल्स से ढकी गई थीं।

चारबाग

मुख्य भवन के चारों ओर एक वर्गाकार उद्यान है जिसका क्षेत्रफल लगभग 30 एकड़ है। वर्गाकार होने एवं चार भागों में बंटा हुआ होने से इसे चारबाग कहा जाता है। इस प्रकार के उद्यान न केवल भारत में अपितु सम्पूर्ण दक्षिण एशिया में अपनी प्रकार के पहले उदाहरण थे। इस प्रकार के उद्यान उच्च श्रेणी की ज्यामितीय रचनाएं हैं। इस उद्यान को तीन ओर ऊँची चहारदीवारी से घेरा गया था तथा चौथी ओर यमुना नदी स्थित थी। अब यमुना नदी इस भवन से काफी दूर चली गई है।

सम्पूर्ण उद्यान चार भागों में पैदल पथों (खियाबान) और दो विभाजक केन्द्रीय नहरों (चौड़ी नालियों) द्वारा बंटा हुआ है। ये पथ एवं नहरें इस्लाम में कल्पित जन्नत के बाग में बहने वाली चार नदियों की प्रतीक हैं। इस प्रकार बने चार-बागों को पुनः पत्थर से निर्मित रास्तों द्वारा चार-चार छोटे उप-विभागों में विभाजित किया गया है। इस प्रकार कुल मिलाकर 36 भाग बनते हैं। केन्द्रीय नहर, परिसर के मुख्य द्वार से मकबरे तक पहुँचकर उसके भूमिगत होती हुई एवं दूसरी ओर से पुनः निकलती हुई प्रतीत होती है, ठीक जैसा कुरआन की आयतों में जन्नत के बाग का वर्णन किया गया है।

केन्द्रीय पैदल पथ दो द्वारों तक जाते हैं। एक मुख्य द्वार दक्षिणी दीवार में और दूसरा छोटा द्वार पश्चिमी दीवार में है। ये दोनों द्वार दो-मंजिला हैं। दक्षिणी द्वार मुगल काल में प्रयोग हुआ करता था किंतु अब यह बंद रहता है। वर्तमान में पश्चिमी द्वार का प्रयोग किया जाता है। पूर्वी दीवार से जुड़ी हुई एक बारादरी है जिसमें नाम के अनुसार बारह द्वार हैं। उत्तरी दीवार से लगा हुआ एक स्नानघर है जिसे हम्माम कहा जाता था।

एक अंग्रेज़ व्यापारी, विलियम फ़िंच ने ई.1611 में मकबरे का भ्रमण किया उसने लिखा है कि केन्द्रीय कक्ष की आंतरिक सज्जा बढ़िया कालीनों एवं गलीचों से परिपूर्ण थी। कब्रों के ऊपर एक शुद्ध श्वेत शामियाना लगा होता था और उनके सामने ही पवित्र ग्रंथ रखे रहते थे। इसके साथ ही हुमायूँ की पगड़ी, तलवार और जूते भी रखे रहते थे। यहाँ के चारबाग 13 हेक्टेयर क्षेत्र में फ़ैले हुए थे। आने वाले वर्षों में यह सब तेजी से बदल गया। इसका मुख्य कारण, राजधानी का आगरा स्थानांतरण था। बाद के मुगल शासकों के पास इतना धन नहीं रहा कि वे इन बागों का मंहगा रख-रखाव कर सकें।

18वीं शताब्दी तक स्थानीय लोगों ने चारबाग में सब्जी उगाना आरंभ कर दिया था। ब्रिटिश क्राउन के शासन-काल में ई.1860 में चारबाग शैली के वर्गाकार केन्द्रीय सरोवरों का स्थान अंग्रेज़ी शैली के गोल चक्करों ने ले लिया एवं क्यारियों में फूलों के पौधों के स्थान पर बड़े पेड़ उगने लगे। 20 वीं शताब्दी के आरम्भ में वायसरॉय लॉर्ड कर्ज़न ने चार बाग को वापस सुधारा। ई.1903-09 के बीच एक वृहत् उद्यान जीर्णोद्धार परियोजना आरंभ हुई जिसके अंतर्गत नालियों में भी बलुआ पत्थर लगाया गया। ई.1915 में पौधारोपण योजना के तहत केन्द्रीय और विकर्णीय अक्षों पर पौधा रोपण हुआ। फूलों की क्यारियां भी दोबारा बनायी गयीं।

भारत के विभाजन के समय, अगस्त 1947 में पुराना किला और हुमायूँ का मकबरा भारत से पाकिस्तान जाने वाले शरणार्थियों के लिये शरणार्थी कैम्प में बदल गये। बाद में इन्हें भारत सरकार द्वारा नियंत्रण में लिया गया। ये कैम्प लगभग पाँच वर्षों तक चलते रहे जिससे हुमायूँ का मकबरा परिसर के स्मारकों को अत्यधिक क्षति पहुंची। बगीचे, पानी की सुंदर नालियां, सुंदर जालियां आदि पूरी तरह बरबाद हो गए। इस विनाश को रोकने के लिए मकबरे के अंदर के स्थान को ईंटों से ढंक दिया गया। बाद में भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण विभाग ने इन्हें पुनः अपने पुराने रूप में स्थापित किया। मार्च 2003 में आगा खान सांस्कृतिक ट्रस्ट द्वारा इसका जीर्णोद्धार कराया गया। इसके बाद बागों की जल-नालियों में एक बार फिर से जल प्रवाह आरंभ हुआ।

ई.1857 में जब अंग्रेजों ने लाल किले पर अधिकार किया तब मुगल बादशाह बहादुर शाह ज़फ़र ने अपने तीन शहजादों सहित इसी मकबरे के परिसर में शरण ली थी। ब्रिटिश कप्तान हडसन ने बहादुरशाह को यहीं से गिरफ्तार करके रंगून भिजवाया था। कुछ इतिहासकारों के अनुसार हडसन ने बादशाह तथा उसके शहजादों को लाल किले से गिरफ्तार करके हुमायूँ के मकबरे में रखा था और फिर यहीं से बादशाह को उसके परिवार सहित बर्मा लेजाकर नजरबन्द किया था। ई.1993 में इस भवन-समूह को विश्व-धरोहर घोषित किया गया है।

नाई का मकबरा

चारबाग के भीतर दक्षिण-पूर्वी कौने में ई.1590 में निर्मित शाही-नाई का गुम्बद है। यह मकबरा एक ऊँचे चबूतरे पर बना है जिस तक पहुंचने के लिये दक्षिणी ओर से सात सीढ़ियां बनी हुई हैं। यह वर्गाकार है और इसके अकेले कक्ष के ऊपर एक दोहरा गुम्बद बना हुआ है। भीतर स्थित दो कब्रों पर कुरआन की आयतें खुदी हुई हैं। इनमें से एक कब्र पर 999 अंकित है जिसका अर्थ हिजरी सन् 999 अर्थात् ई.1590-91 से है।

बूहलीमा का मकबरा

हुमायूँ के मकबरे की मुख्य चहारदीवारी के बाहर स्थित स्मारकों में बूहलीमा का मकबरा प्रमुख है। हुमायूं के मकबरे के परिसर के पश्चिमी किनारे पर स्थित यह मकबरा एक आयताकार परिसर में लगे हरे-भरे बगीचे में स्थित है। बाग में एक सुव्यवस्थित मार्ग बना हुआ है जिसके एक छोर पर बू हलीमा का मकबरा स्थित है। इसका स्थापत्य एक आयताकार साधारण मकान के रूप में है जिस पर कोई गुम्बद, मीनार, बुर्ज, ईवान, मेहराब आदि फारसी संरचनाएं नहीं हैं। इस मकान को स्थानीय क्वार्टजाइट पत्थरों से बनाया गया है।

इस मकबरे की छत पर जाने के लिए पत्थरों की सीढ़ियां बनी हैं तथा इसके कक्षों में प्रवेश करने के लिए बने द्वारों के ऊपरी भाग में हिन्दू शैली के शहतीर रखे गए हैं। हालांकि मकबरे के बाहर एक मेहराब बनाया गया है इस मेहराब के ऊपर होकर ही सीढ़ियां छत पर जाती हैं। मकान की छत पर ठीक बीच में किसी गुम्बद के निशान जान पड़ते हैं। संभवतः किसी समय इस मकबरे पर गुम्बद बनाया गया होगा जो समय के साथ नष्ट हो गया होगा। सामान्यतः मकबरे किसी बगीचे के केन्द्रीय भाग में होते हैं किंतु यह एक सिरे पर स्थित है। लोक में मान्यता है कि बू-हलीमा हुमायूँ से नजदीकी रखने वाली कोई महिला थी जिसने हुमायूं की मकबरे से केवल 100 मीटर की दूरी पर जबर्दस्ती अपना मकबरा बनवाया। 

अरब सराय

 अरब सराय बूहलीमा के मकबरे के निकट ‘अरब सराय’ स्थित है जिसे हमीदा बेगम ने मुख्य मकबरे के निर्माण में लगे कारीगरों के लिये बनवाया था। हुमायूं की विधवा ने अरब से आए 300 कारीगरों के लिए अरब सराय का निर्माण करवाया। यह हुमायूं के मकबरे के परिसर में स्थित है। संभवतः ये कारीगर हुमायूं के मकबरे को बनाने के लिए अरब से बुलवाए गए थे। माना जाता है कि हमायूं की विधवा हाजी बेगम जब हज करने के लिए मक्का गई थी, तब वहाँ से लौटते समय वह इन कारीगरों को लेकर आई। इस सराय का मुख्य द्वारा एक बड़े ईवार के रूप में बनाया गया है जिसमें दो विशाल मेहराब बनाए गए हैं।

इस द्वार से प्रवेश करने पर सराय का मुख्य हिस्सा दो भागों में बंटा हुआ दिखाई देता है जिनमें एक जैसी मेहराबदार कोठरियां बनी हुई हैं तथा अब भग्न अवस्था में हैं। इस मेहंदी बाजार भी कहा जाता है जिसके बारे में मान्यता है कि इसे जहाँगीर के मुख्य हींजड़े मिहर बनू ने बनाया था। यह सराय अफसरवाला मकबरा के निकट ही स्थित है।

अफ़सरवाला मकबरा एवं मस्जिद

बूहलीम के मकबरे के परिसर में ही ‘अफ़सरवाला मकबरा’ बना है, जो अकबर के एक नवाब के लिये बना था। इसके साथ ही एक मस्जिद भी बनी है। अफसर वाला मकबरा तथा अफसरवाली मस्जिद दोनों एक ही प्लेटफॉर्म पर खड़े हैं तथा दोनों इमारतें स्थानीय क्वार्टजाईट पत्थर से बनी हैं। दोनों भवनों की बाहरी दीवारों पर लाल बलुआ पत्थर से सजावट की गई है। लाल बलुआ पत्थर में सफेद संगमरमर से पर्चिनकारी की गई है। इन इमारतों के भीतर की बनावट फारसी शैली पर आधारित है तथा सादगी पूर्ण है। दोनों ही भवन अब जीर्ण अवस्था में हैं। मस्जिद का मुख्य कक्ष ‘थ्री बे’ बना हुआ है। बीच की ‘बे’ के चारों ओर मेहराब बने हुए हैं जिनके ऊपर एक गुम्बद स्थित है। गुम्बद के भीतरी हिस्से में चित्रों का एक पूरा पैनल है। मस्जिद का ‘तिहरा ईवान’ फारसी शैली में निर्मित है।

अफसरवाला मकबरे के भीतर एक ही कक्ष है जिसमें संगमरमर की कब्रें बनी हुई हैं जिनमें से एक कब्र पर कुरान की नौ सौ चौहत्तरवीं आयत लिखी गई है। जो संभवतः हिजरी 974 की द्योतक है। इस हिसाब से यह कब्र ई.1566-67 में बनी होनी चाहिए। अफसर वाला मकबरा के ऊपर दो गुम्बद बने हुए हैं। यह मकबरा बाहर से अष्टकोणीय दिखाई देता है। इनमें से चार तरफ की दीवारों में चार मेहराबदार प्रवेशद्वार बने हुए हैं जो सीधे ही कब्र वाले कमरे में खुलते हैं।  मेहराबों को लाल बलुआ पत्थरों के अलंकरणों से सजाया गया है। गुम्बद के ऊपर एक उलटा कमल लगा है जो कलश के लिए आधार बनाता है। इस आधार पर एक मंगल-कलश रखा हुआ है। अकबर कालीन भवन में इस प्रकार का कमल एवं कलश बहुत कम दिखाई देता है।

आदम खाँ का मकबरा

आदम खाँ अथवा (अदहम खाँ) अकबर की धाय ‘माहम अनगा’ का पुत्र था। चूंकि अकबर केवल चौदह साल की आयु में बाशाह बन गया था इसलिये माहम अनगा ही बहुत दिनों तक सरकार चलाती रही जिसे ‘हरम सरकार’ कहते थे। माहम की ऐसी प्रभावी स्थिति के कारण उसका पुत्र आदम खाँ स्वयं को बादशाह के बराबर समझने लगा। वह अत्यंत घमण्डी और बुरे स्वभाव का व्यक्ति था तथा अकबर से भी उद्दण्डता कर बैठता था। अकबर अपनी धाय का बहुत आदर करता था। इसलिए आदम खाँ की उद्दण्डता को सहन करता था। एक दिन आदम खाँ ने कचहरी में घुसकर अकबर के वकील-ए-मुतलक (प्रधानमंत्री) अतगा खाँ की हत्या कर दी और इसके बाद वह नंगी तलवार लेकर बादशाही हरम की तरफ गया। उस समय अकबर सो रहा था। इसलिए महल के हिंजड़ों ने महल के दरवाजे बंद कर दिए।

इस शोरगुल से अकबर की नींद खुल गई और उसने शोरगुल का कारण पूछा। उसी समय आदम खाँ भीतर आ गया और उसने शराब के नशे में अकबर को अपशब्द कहे। अकबर ने अपनी तलवार निकालकर आदम खाँ की छाती पर टिका दी और आदम खाँ से कहा कि अपनी तलवार हिंजड़े को दे दे किंतु आदम खाँ ने अकबर का आदेश मानने की बजाय अकबर की तलवार छीनने के लिए उसकी कलाई पकड़ ली।

अकबर ने आदम खाँ को कसकर मुक्का मारा जिससे आदम खाँ बेहोश हो गया। अकबर ने हिंजड़ों का आदेश दिया कि वे आदम खाँ के हाथ-पैर बांध कर उसे महल की मुंडेर से नीचे फैंक दें। ऐसा ही किया गया जिससे आदम खाँ की मृत्यु हो गई। अकबर ने हिंजड़ों को आदेश दिया कि वे मरे हुए आदम खाँ उठाकर लाएं और फिर से एक बार नीचे गिराएं।

इसके बाद अकबर अपनी धाय माहम अनगा के महल में गया और उसे घटना की जानकारी दी। माहम ने अकबर के निर्णय का समर्थन किया और स्वयं भी पुत्र-शोक में चालीस दिन बाद ही मर गई। इस प्रकार अकबर को हरम सरकार से छुटकारा मिल गया। अकबर ने दिल्ली में एक मकबरा बनवाया जिसमें आदम खाँ तथा माहम अनगा के शव दफन करवाए। आज भी यह मकबरा अच्छी हालत में है।

यह मक़बरा दक्षिणी दिल्ली के लालकोट की दीवार पर बने एक चबूतरे पर बना है। इस अष्टकोणीय इमारत के गुम्बद को 15-16वीं सदी के सैयद और लोदी शासन-काल में बनी इमारतों की शैली में बनाया गया है। मक़बरे में चारों तरफ मेहराबदार बरामदे बने हैं। प्रत्येक बरामदे में तीन दरवाजे हैं।

ई.1830 में मि. ब्लैक नामक बंगाल सिविल सेवा के अंग्रेज अधिकारी ने इस मकबरे में अपना निवास स्थान बनाया और मक़बरे के बीचों-बीच अपने डाइनिंग हॉल तक रास्ता साफ करने के लिए इसके अंदर बनी कब्रें हटा दीं। लम्बे समय तक यह मक़बरा अंग्रेज अधिकारियों का अतिथिगृह बना रहा। बाद में कुछ समय तक इस मक़बरे को पुलिस थाने और डाकघर के रूप में भी काम में लिया गया। ब्रिटिश वॉयसराय लॉर्ड कर्ज़न के आदेश से इस मक़बरे को खाली करके कब्रों का पुनर्निर्माण किया गया।

अकबर के समय आगरा में निर्मित भवन

आगरा का किला

आगरा का किला भारत के उत्तर प्रदेश राज्य के आगरा शहर में स्थित है। इस किले को इतिहासकार चारदीवारी से घिरी पैलेस-सिटी (प्रासाद-नगरी) कहना अधिक उचित मानते हैं। आगरा का किला लगभग डेढ़ मील के घेरे में स्थित है। यह भारत के महत्वपूर्ण किलों में से एक है तथा प्राचीन दुर्ग श्रेणी विभाजन के अनुसार स्थल-दुर्ग की श्रेणी में आता है। इस किले की साधारण रूपरेखा मानसिंह द्वारा बनवाये गये ग्वालियर के किले से मिलती-जुलती है। लोदी सुल्तान सिकंदर लोदी तथा इब्राहीम लोदी एवं मुगल बादशाह बाबर, हुमायूँ, अकबर, जहाँगीर, शाहजहाँ तथा औरंगज़ेब इस किले में थोड़े-बहुत समय के लिए अवश्य रहे। इस दुर्ग में मुगलों का सबसे बड़ा खजाना, बहुमूल्य रत्न, स्वर्ण एवं अन्य कीमती सम्पत्ति रहती थी। इस दुर्ग में मुगलों की टकसाल भी थी जिसमें सोने-चांदी के सिक्के ढाले जाते थे।

आगरा का दुर्ग मूलतः हिन्दुओं का बनवाया प्रतीत होता है क्योंकि इसका पुराना नाम बादलगढ़ था। यह मूलतः ईंटों से बनाया गया था। इसका वास्तविक निर्माण काल बताया जाना संभव नहीं है। ई.1018 में महमूद गजनवी ने जब उत्तर भारत के बुलंदशहर, मथुरा तथा कन्नौज आदि महत्वपूर्ण नगरों पर आक्रमण किया, उस समय आगरा का दुर्ग चौहान शासकों के अधीन था।

सिकंदर लोदी (ई.1487-1517) दिल्ली सल्तनत का प्रथम सुल्तान था जिसने आगरा की यात्रा की तथा उसने ई.1504 में आगरा के किले की मरम्म्त करवाई। वह कुछ समय के लिए इस किले में रहा। ई.1504 में सिकंदर लोदी ने इसे अपनी राजधानी बनाया। यह भारत की राजनीति में एक बड़ा परिवर्तन था क्योंकि भारत की राजधानी दिल्ली से खिसक कर आगरा आ गई थी। ई.1517 में इसी किले में सिकंदर लोदी का निधन हुआ। उसके पुत्र इब्राहीम लोदी ने भी इसी दुर्ग को अपनी राजधानी बनाया। उसने इस दुर्ग में अनेक मस्जिदें, महल एवं कुएं आदि बनवाये। ई.1526 में वह पानीपत के मैदान में बाबर के विरुद्ध लड़ता हुआ मृत्यु को प्राप्त हुआ।

जब ई.1526 में बाबर ने लोदियों को परास्त किया तब वह दिल्ली पर अधिकार करने के बाद आगरा भी आया। मुगलों को इस किले से अगाध सम्पत्ति प्राप्त हुई। इस सम्पत्ति में ही कोहिनूर हीरा भी था। बाबर ने इस दुर्ग में एक बावली बनवायी। ई.1530 में हुमायूँ का राजतिलक आगरा के दुर्ग में हुआ था। ई.1540 में जब शेरशाह सूरी ने हुमायूँ से उसका राज्य छीना तब उसने आगरा के दुर्ग पर भी अधिकार कर लिया। ई.1555 में हुमायूँ ने इसे विक्रमादित्य हेमचंद्र से छीना किंतु इस बार हुमायूँ ने दिल्ली में ही रहना पसंद किया। जब ई.1556 में अकबर बादशाह हुआ तो उसने भी दो वर्ष तक अपनी राजधानी दिल्ली में रखी तथा दिल्ली में ही उसकी मृत्यु हुई।

ई.1558 में जब अकबर आगरा आया तो उसने इस दुर्ग को देखने के बाद अपनी राजधानी आगरा में स्थानांतरित करने का निर्णय लिया। इस प्रकार एक बार पुनः भारत की राजधानी दिल्ली से आगरा स्थानांतरित हो गई।

अबुल फजल ने लिखा है कि- ‘यह किला ईंटों से बना हुआ था और बादलगढ़ के नाम से जाना जाता था। यहाँ लगभग पाँच सौ सुंदर इमारतें, बंगाली व गुजराती शैली में बनी थीं।’

यह किला अत्यंत जीर्ण-शीर्ण स्थिति में था इसलिए अकबर ने इस दुर्ग का जीर्णोद्धार करवाया। उसने धौलपुर के निकट करौली से लाल पत्थर मंगवाकर ईंटों की दीवारों पर चढ़वा दिया और लगभग सम्पूर्ण दुर्ग का पुनर्निर्माण करवाया। 8 साल तक लगभग 4,000 कारीगर एवं श्रमिक इस दुर्ग का जीर्णोद्धार करते रहे। ई.1573 में यह दुर्ग दुबारा से बनकर तैयार हुआ और अकबर अपने परिवार सहित इसमें निवास करने लगा।

आगरा के किले की पौरुषपूर्ण विशालाकाय दीवारें और परकोटे किसी महान सत्ता की शक्ति का परिचय देते हैं। किले के भीतर गुजरात और बंगाल शैली के भवन हैं। इस किले के भीतर स्थित लगभग सभी भवनों को शाहजहाँ ने दुबारा बनवाया किंतु किले का मुख्य द्वार अर्थात् दिल्ली दरवाजा और जहाँगीरी महल  अकबर के समय के ही निर्मित हैं। ई.1566 में निर्मित दिल्ली दरवाजा अकबर के प्रारम्भिक काल की स्थापत्य कला विशेषताओं का प्रतिनिधित्व करता है। इस किले का निर्माण तराशे हुए लाल बलुआ पत्थर से किया गया है। इन भवनों के मेहराब, दोनों ओर झुकी हुई अष्टकोणीय दीवारें, तोरणयुक्त छतें, मण्डप, कंगूरे, लाल बलुआ पत्थर पर सफेद पत्थर का अलंकरण प्रमुख हैं।

अकबरी महल

अकबरी महल की स्थापत्य शैली, जहाँगीरी महल के स्थापत्य की तुलना में कम कलात्मक है एवं भद्दी सी दिखाई देती है। अकबरी महल में बंगाली शैली के बुर्ज बने हुए हैं तथा यह महल जीर्ण-शीर्ण अवस्था में है।

जहाँगीरी महल

अकबरी महल के निकट जहाँगीरी महल का निर्माण करवाया गया। जहाँगीरी महल हिन्दू और इस्लामी पद्धति के मिश्रण से बना है। जहाँगीरी महल में कई स्तम्भ हैं तथा इस महल में जालियों द्वारा सजावट की गई है। यह हिन्दू कला से प्रभावित है। दोनों महलों के बीच में चौकोर आँगन है तथा चारों ओर दुमंजिले कमरे बने हुए हैं। इस महल में गुम्बदों के बदले छतरियां प्रयुक्त हुई हैं। यह महल ग्वालियर के मानसिंह महल से प्रेरित है। इस महल में हिन्दू स्थापत्य की अधिकता होने से अनुमान लगाया जाता है कि यह महल अकबर के आगरा आगमन से पहले भी मौजूद था तथा हिन्दू राजाओं द्वारा बनवाया गया था। अकबर ने उसका जीर्णोद्धार करवाया और कुछ नव-निर्माण भी करवाए।

फतेहपुर सीकरी के जोधाबाई महल का स्थापत्य इसी जहाँगीरी महल के स्थापत्य से मेल खाता है जो कि मूलतः सीकरी के पूर्ववर्ती शासकों अर्थात् सिकरवार राजपूतों ने बनवाया था और जिसे अकबर द्वारा निर्मित बताया जाता है।

कलात्मक जलकुण्ड (हौज)

जहाँगीरी महल के सामने एक हौज का भी निर्माण करवाया गया था जो एक प्याले के आकार का है। हौज के बाहरी भाग में कुछ पंक्तियां खुदी हुई हैं। अब यह हौज खण्डहर अवस्था में है।

परकोटा एवं दरवाजे

आगरा का किला अर्ध-वृत्ताकार क्षेत्र में बना हुआ है जिसकी सीधी भुजा, यमुना नदी के समानांतर है। इसका बाहरी परकोटा सत्तर फुट ऊँचा है। इसमें दोहरे परकोटे हैं, जिनके बीच-बीच में भारी बुर्ज बराबर अंतराल पर हैं, जिनके साथ ही तोपों के झरोखे एवं रक्षा चौकियां भी बनी हैं। इसके चार कोनों पर चार द्वार हैं, जिनमें से एक खिड़की द्वार, नदी की ओर खुलता है। इसके दो द्वारों को दिल्ली गेट एवं लाहौरी दरवाजा कहते हैं। जहाँगीर ने अकबर दरवाज़ा का नाम अमरसिंह दरवाजा कर दिया था। यह दरवाजा, दिल्ली-दरवाजा से मेल खाता है। दोनों ही लाल बलुआ पत्थर के बने हैं।

आजकल दर्शक किला देखने के लिये अमरसिंह दरवाजे से प्रवेश दिया जाता है। नगर की ओर का दिल्ली दरवाजा, चारों द्वारों में से भव्यतम है। इसके अंदर एक और द्वार है जिसे हाथी पोल कहते हैं। इसके दोनों ओर दो वास्तविक आकार के हाथियों की पाषाण प्रतिमाएं हैं। इनके निकट रक्षक भी खड़े हैं। एक द्वार से खुलने वाला पुल खाई पर बना है। दुर्ग की प्राचीर में एक चोर दरवाजा भी है।

भवनों की सजावट

इस्लामी अलंकरणों में ज्यामितीय नमूने, लिखाइयां तथा कुरान की आयतें आदि ही फलकों की सजावट में दिखाई देतीं हैं किंतु आगरा के किले के भवनों में हिन्दू एवं इस्लामी स्थापत्य कला का मिश्रण देखने को मिलता है। कई अलंकरण तो ऐसे हैं जिन्हें इस्लाम में वर्जित माना गया है, जैसे- अज़दहे, हाथी एवं पक्षी, जिनसे स्पष्ट है कि ये मूलतः हिन्दू भवन हैं।

अबुल फजल ने इस दुर्ग में लगभग 500 भवनों का उल्लेख किया है। इनमें से कुछ भवन शाहजहाँ के समय ध्वस्त करके सफेद संगमरमर से दुबारा बनाए गए। बहुत सी इमारतों को ब्रिटिश अधिकारियों ने मिलिट्री बैरेक बनवाने के लिए ई.1803 से 1862 के बीच तुड़वा दिया। वर्तमान में दक्षिण-पूर्वी ओर कठिनाई से तीस इमारतें शेष बची हैं।

जहाँगीर तथा शाहजहाँ ने इस दुर्ग के अनेक पुराने निर्माणों को गिरवाकर नए भवनों का निर्माण कराया जिनका वर्णन जहाँगीर तथा शाहजहाँ के काल में हुए निर्माणों के साथ किया गया है।

फतहपुर सीकरी का स्थापत्य

फतेहपुर सीकरी, आगरा से 23 मील दक्षिण-पश्चिम में एक ढालू पहाड़ी पर स्थित है। इस नगर के तीन ओर दीवारें और एक ओर कृत्रिम झील थी। यह नगर ई.1571 में बनना आरम्भ हुआ और ई.1580 में बनकर तैयार हुआ। इस समय तक अकबर गुजरात एवं राजपूताना की रियासतों को अपने अधीन कर चुका था। अतः उसके पास अपार सम्पदा एकत्रित हो गई थी। अकबर के दो पुत्रों सलीम (जहाँगीर) तथा मुराद का जन्म सीकरी में ही हुआ था। इसलिए अकबर सीकरी को अपने लिए सौभाग्यशाली समझता था।

अबुल फजल ने लिखा है- ‘शहजादे सलीम का जन्म शेख सलीम चिश्ती के आशीर्वाद से हुआ था इस कारण शेख सलीम चिश्ती के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने के लिए अकबर ने सीकरी को भव्यता प्रदान करने का निर्णय लिया और वहाँ अकबर की राजधानी का निर्माण किया गया।’

जहाँगीर ने अपनी आत्मकथा में लिखा है- ‘मेरे श्रद्धेय पिता ने सीकरी गांव को जो कि मेरा जन्मस्थान था, अपने लिए सौभाग्यपूर्ण समझकर उसे अपनी राजधानी बना लिया। चौदह-पन्द्रह वर्षों में यह जंगली जानवरों से भरी हुई पहाड़ी, समस्त प्रकार के महलों से युक्त नगरी बन गई।’

रिचडर्स ने लिखा है- ‘महलों के बीच बनी मस्जिद में शेख का मकबरा बनवाकर अकबर ने सांकेतिक रूप से राजनीतिक और आध्यात्मिक सत्ता का परस्पर संयोजन कर फतेहपुर सीकरी और आगरा को राजनीतिक सत्ता तथा अजमेर की आध्यात्मिक सत्ता को व्यावहारिक रूप देने की कोशिश की।’

फतेहपुर सीकरी के भवनों को तीन श्रेणियों में विभक्त किया जा सकता है-

(1.) मजहबी इमारतें- जामा मस्जिद, शेख सलीम चिश्ती की दरगाह, बुलंद दरवाजा, इबादतखाना (केन्द्रीय कक्ष या दीवाने आम) आदि।

(2.) रिहाइशी इमारतें- ख्वाबगाह, जोधाबाई महल, बीरबल महल (जनाना महल), बीबी मरियम महल, तुर्की सुल्ताना महल, अबुल फजल एवं फैजी के महल आदि।

(3.) कार्यालयी इमारतें- खजाना, दीवाने आम, दीवाने खास (खास महल) आदि।

मजहबी इमारतें

फतहपुर सीकरी की मजहबी इमारतों का निर्माण अर्द्ध-वृत्ताकार या धनुषाकार शैली में हुआ जबकि गैर-मजहबी इमारतों के निर्माण में शहतीर शैली काम में ली गई।

जामा मस्जिद: सीकरी की जामा मस्जिद यद्यपि इस्लामी स्थापत्य के आधार पर बनाई गई है तथापि इसमें भारतीय स्थापत्य के तत्वों को भी अपनाया गया है। इस मस्जिद के ऊपर तीन गुम्बदों का निर्माण किया गया जिनमें से केन्द्रीय गुम्बद अन्य दोनों की अपेक्षा विशाल है। इस मस्जिद की रूपरेखा सामान्य है और इसके अग्रभाग की गणना देश की मस्जिदों के सर्वोत्तम अग्रभागों में की जाती है। इसके स्तम्भ और छत पर हिन्दू प्रभाव है। सामान्यतः यह माना जाता है कि इसके गुम्बद ईरानी स्थापत्य की प्रतिकृति हैं किंतु इसका केन्द्रीय गुम्बद चम्पानेर की जामी मस्जिद के गुम्बद से काफी साम्य रखता है। इन तीनों गुम्बदों के ऊपर के कलश पूरी तरह से हिन्दू स्थापत्य से लिए गए हैं।

मस्जिद और उसके केन्द्रीय भाग में सजावट के लिए भित्तिचित्र बनाए गए हैं। पर्सी ब्राउन ने लिखा है- ‘इस सुन्दर इमारत में जो सजावट की विभिन्नता है, उसका सही वर्णन नहीं किया जा सकता किंतु ऐसा लगता है कि इसके कलाकारों ने किसी बहुत ही सुंदर हस्तलिखित ग्रंथ के पृष्ठों को अपना नमूना मान लिया और उन्हें अपनी रेखाओं तथा रंगों के ताने-बाने में बुनकर दीवारों के रिक्त स्थान की सजावट के लिए अंकित कर दिया।’

कुछ विद्वानों के अनुसार फतेहपुर सीकरी की जामा मस्जिद केवल दीन-ए-इलाही के अनुयायियों के लिये थी। संभवतः मस्जिद के मूल निर्माण के समय केवल मस्जिद ही बनाई गई थी, इस कारण उत्तरी दरवाजा भी बनाया गया किंतु बाद में इसके उत्तरी कौने में शेख सलीम चिश्ती को दफनाया गया। उस समय मस्जिद का उत्तरी द्वार बंद कर दिया गया। अकबर ने लगभग 25 वर्ष बाद दक्षिण विजय के उपरांत दक्षिण द्वार भी गिरवा दिया और उसके स्थान पर बुलंद दरवाजा बनवाया।

शेखी सलीम चिश्ती का मकबरा: शेखी सलीम चिश्ती का मकबरा फतेहपुर सीकरी की स्थापत्यकला का विशिष्ट उदाहरण है। इसका निर्माण जामा मस्जिद के खुले आंगन के उत्तरी कोने में किया गया है। फतेहपुर सीकरी के अन्य भवन लाल बलुआ पत्थर के बने हुए हैं किंतु चिश्ती का मकबरा सफेद संगमरमर से बना हुआ है। पर्सी ब्राउन का मानना है कि फतेहपुर की अन्य इमारतों की भांति इसका निर्माण भी लाल बलुआ पत्थर से हुआ हो लेकिन जहाँगीर या शाहजहाँ के काल में इसकी रचना में बिना कोई परिवर्तन करवाए ही इसको ज्यों का त्यों संगमरमर की इमारत में बदल दिया गया। इसकी योजना वर्गाकार है और इसको सुसज्जित करने के लिए सजावटपूर्ण स्तम्भों और छज्जों का निर्माण किया गया है। इसके शाफ्ट्स टेढ़े-मेढ़े और सर्पिलाकार हैं और उनके ऊपर का शिरो-भाग चूने की उभरी हुई आकृतियों से सजाया गया है।

बरसाती की स्तम्भों के कोष्ठक (ब्रैकेट) बहुत सुंदर हैं। सलीम चिश्ती के मकबरे की विशेषताएं हिन्दू मंदिरों से ली गई हैं। शेख सलीम की दरगाह में इतनी हिन्दू विशेषताओं को देखकर स्मिथ आश्चर्य में पड़ गए थे। उन्होंने लिखा है कि सम्पूर्ण भवन में हिन्दू अनुभूति का अनुमान होता है। इस भवन के भीतरी भागों को सुंदर जालियों, सजावटदार दीवारों तथा फर्श को रंग-बिरंगी कलाकृतियों द्वारा सुसज्जित किया गया है। मकबरे की कब्र के चबूतरे के ऊपर एक लकड़ी की चांदनी है जिसमें आबनूस की लकड़ी और सीपों का जड़ाऊ कार्य किया गया है। पर्सी ब्राउन ने इसे देखते हुए लिखा है कि इसकी स्थापत्य कला इस्लाम की बौद्धिकता तथा गांभीर्य की अपेक्षा मंदिर निर्माता की मुक्त कल्पना का आभास कराती है। इस मकबरे में शेख सलीम चिश्ती और उसके पौत्र इस्लाम खाँ की कब्रें बनी हुई हैं।

बुलंद दरवाजा: भारत का सबसे ऊँचा दरवाजा फतेहपुर सीकरी की मस्जिद के दक्षिणी द्वार की तरफ निर्मित बुलंद दरवाजा है। पृथ्वी की सतह से इसकी ऊँचाई 176 फुट है जबकि इसके चबूतरे की ऊँचाई 42 फुट है। इसके आगे का भाग 130 फुट चौड़ा तथा आगे से पीछे तक लम्बाई 123 फुट है। इसे ई.1573 में अकबर की गुजरात विजय के उपलक्ष्य में बनाया गया था। इसे पूरा होने में पाँच साल लगे थे। अर्थात् यह ई.1578 में बनकर तैयार हुआ।

बुलंद दरवाजा स्वयं अपने-आप में एक भवन है। इसमें एक बड़े हॉल के साथ कई छोटे-छोटे कक्षों की योजना है जिनके द्वारा जामा मस्जिद के भवन तक पहुंचा जा सकता है। इस प्रवेश द्वार का आगे का भाग ईरानी शैली में बना हुआ है किंतु इसकी बनावट स्पष्ट रूप से भारतीय है। केंद्रीय द्वार-मण्डप में तीन मेहराबदार प्रवेश द्वार हैं जिनमें सबसे बड़ा मध्य में है। इसे ‘होर्स शू गेट’ के रूप में जाना जाता है।

इसके बीच के ऊँचे भाग और उसके दोनों ओर के कम ऊँचे तथा कोण पर कम होते हुए भागों को तीन सतहों द्वारा उभारा गया है। बीच का भाग एक सिरे से दूसरे सिरे तक 86 फुट है। इसकी बनावट आयताकार है और इसकी सतह के बड़े भाग में एक मेहराबी और गुम्बदी मार्ग है। इसके दोनों बगल के संकरे भाग तीन-मंजिले हैं। उनकी प्रत्येक मंजिल पर कई प्रकार की खिड़कियां हैं। इसके अग्रभाग का मेहराबी मार्ग इसकी सबसे बड़ी विशेषता है। दरवाजे के दक्षिणी अग्रभाग पर एक सुंदर कंगूरेदार सफी है जिसके पीछे 12 ऊँची गुमटियां हैं। इनके पीछे तीन और छतरियां हैं जिनके ऊपर गोल गुम्बद हैं। इन गुम्बदों पर कलश चढ़ाए गए हैं।

दरवाज़े के प्रवेश द्वार में दो शिलालेख लगे हैं। बुलंद दरवाजा यूनेस्को की विश्व-धरोहर संरचनाओं की सूची में सबसे महत्वपूर्ण इमारतों में से एक माना जाता है। पर्सी ब्राउन ने इसके बारे में लिखा हैं- ‘बुलन्द दरवाजा एक प्रभावशाली निर्माण कार्य है, विशेषकर तब जबकि यह जमीन पर खड़ा होकर देखा जाये। तब यह उत्तेजक एवं विस्मयकारक शक्ति का रूप दिखाई देता है किन्तु इसका प्रभाव भार-स्वरूप तथा दिखावटी प्रतीत नहीं होता है।’

सरकारी इमारतें

दीवान-ए-आम: दीवान-ए-आम की बनावट आयताकार है तथा दीवान-ए-खास की वर्गाकार। दीवाने आम के मध्य में एक नक्काशीदार केन्द्रीय स्तम्भ है जिसका शीर्ष, आकार में विशाल है। इसी शीर्ष पर जैन शैली के मेहराबदार ब्रैकिटों पर गोल चबूतरा टिका हुआ है। इसमें बौद्ध तथा हिन्दू वास्तुकला की झलक दिखाई देती है। केन्द्रीय स्तम्भ के शीर्ष पर बैठी देवी की मूर्ति की कल्पना की गई है जिसे कन्हेरी की बौद्ध गुफाओं में सामान्यतः देखा जा सकता है। ऐसी बनावट का आशय यह प्रतीत होता है कि जब अकबर विभिन्न धार्मिक सम्प्रदायों के प्रतिनिधियों के बीच विवाद को सुनता हुआ इस केन्द्रीय मंच पर आसीन होता होगा तो संभवतः अपने सिंहासन को ‘बिहिश्त’ के सिंहासन के समकक्ष अनुभव करने का प्रयास करता होगा। वास्तव में यह स्पष्ट नहीं हुआ है कि यह कक्ष दीवान-ए-आम था अथवा धार्मिक चर्चाओं के लिए प्रयोग में लिया जाने वाला कक्ष अर्थात् ‘इबादतखाना’, जहाँ से अकबर ने ‘दीन-ए-इलाही’ का प्रवर्तन किया था!

दीवाने खास: इसे खास हॉल भी कहते हैं। यह पच्चीसी आंगन के उत्तरी छोर पर स्थित है। यह अकबर का शाही कक्ष था। अकबर द्वारा निर्मित दीवान-ए-खास अनेक विशेषताओं से युक्त है। यह इमारत बहुत ही प्रभावशाली है। इस इमारत की सबसे बड़ी विशेषता इसकी बनावट है जो कलाकारी का उत्कृष्ट उदाहरण है। इसके मध्य का सतून अत्यन्त सुन्दर ढंग से बना है जिसकी नक्काशी देखने योग्य है। इसी सतून के ऊपर शाही तख्त रखा रहता था जिसको रोकने के लिए बहुत सी नक्शदार छतगीरियाँ हैं। सिंहासन तक पहुँचने के लिये चारों कोनों से छज्जों के रूप में चार मार्ग बनाये गये हैं। इसका निर्माण हिन्दू स्थापत्य के अनुसार हुआ है। इसके निकट ही ‘आंख-मिचौली’ बनी हुई है।

ट्रेजरी: दीवान-ए-खास के पास ट्रेजरी है। इसे गुप्त पत्थर की तिजोरी का घर भी कहा जाता था जो कुछ कोनों में सुरक्षित था। इस ट्रेजरी की छत पर ‘समुद्र- राक्षसों’ की मूर्तियां बनाई गई थीं जो यहाँ जमा किये गये धन की रक्षा करने के उद्देश्य से थीं।

ज्योतिषी की छतरी: ट्रेजरी के सामने ज्योतिषी की छतरी है जिसकी छत जैन शैली में तैयार की गई है।

रिहाइशी इमारतें

पंचमहल: पंचमहल अथवा हवामहल पच्चीसी आंगन के पश्चिम में स्थित ‘जनाना बाग’ के एक कोने में स्थित है। इस महल में अकबर द्वारा आंचलिक स्थापत्य तत्वों का समावेश किया गया था। इसमें नालंदा के बौद्ध विहारों के लक्षण दिखाई देते हैं। हिन्दू और बौद्ध धर्म-ग्रंथों में उल्लिखित सभा भवनों के आदर्श पर ही सम्भवतः पंच महल की निर्माण योजना तैयार की गई थी। इस पाँच मंजिले खुले मण्डप की पहली मंजिल एक बड़े हॉल जैसी है। ऊपर वाली प्रत्येक मंजिल अपनी नीचे वाली मंजिल से छोटी होती गई है। पाँचवे तल में अर्थात् सबसे ऊपर के तल में चौखूंटे स्तम्भों पर टिकी हुई एक छोटी सी सुन्दर छतरी है।

सबसे नीचे की मंजिल में 84, पहली मंजिल में 56, दूसरी मंजिल में 20, तीसरी मंजिल में 20, चौथी मंजिल में 12 तथा सबसे ऊपर की मंजिल में 4 स्तम्भ हैं तथा सम्पूर्ण भवन में कुल 196 स्तम्भ हैं। हर स्तम्भ पर अलग तरह की नक्काशी की गई है। कहीं पर जैन स्थापत्य कला शैली की विशेषतायें दिखाई देती हैं तो कहीं पर हिन्दू स्थापत्य शैली की। इसी प्रकार मुस्लिम स्थापत्य कला तथा बौद्ध स्थापत्यकाल की विशेषताओं को भी सम्मिलित किया गया है। नीचे की मंजिलों पर हिन्दू स्थापत्य शैली की छाप अधिक है। सजावट तथा सुन्दरता के लिये घण्टियों तथा जंजीरों की बेलों का बहुत सुंदर ढंग से प्रयोग किया गया है।

पंचमहल का निर्माण वस्तुतः हवामहल के रूप में किया गया था ताकि हरम की औरतें गर्मियों के दिनों में ठण्डी हवा का आनंद ले सकें। इसके बाहरी हिस्सों को पत्थरों की कलात्मक जालियों से ढका गया था ताकि कोई बाहरी व्यक्ति हरम की औरतों को न देख सके। इस महल का निर्माण सिकरवार राजपूतों द्वारा किया गया जो कि मुगलों के फतेहरपुर सीकरी आगमन से पहले सीकरी क्षेत्र पर शासन करते थे।

जोधाबाई का महल: जोधाबाई का महल फतहपुर सीकरी के महलों में सबसे पुराना एवं सबसे बड़ा है। जोधाबाई जहाँगीर की पत्नी थी तथा उसका वास्तविक नाम जगत गुसाईन था। वह जोधपुर की राजकुमारी थी। इस महल की बनावट न तो मुस्लिम स्थापत्य शैली की है और न हिन्दू स्थापत्य के अनुसार। वास्तव में यह इमारत अपने समय की मिली-जुली शैलियों की है। इसकी बनावट आगरा के जहाँगीरी महल के समान है। इसकी छत बहुत सुन्दर एवं सजीव है और इसमें तराशे हुए पत्थरों का उपयोग हुआ है।

पर्सी ब्राउन ने लिखा है कि इस भवन से तत्कालीन स्थापत्य कला के पूर्ण विकसित रूप का परिचय मिलता है। इसके निर्माण में भारतीय शैली के कोष्ठकों (ब्रैकेट्स) का प्रयोग किया गया है। पर्सी का मानना है कि इस भवन का निर्माण अवश्य ही गुजराती कारीगरों को सौंपा गया होगा। जहाँगीरी महल शाही आवास का आरम्भिक और प्रायोगिक रूप लगता है। जबकि जोधाबाई महल परिपक्व रूप लिए हुए है।

बीबी मरियम की कोठी: इसका असली नाम सुनहरी मकान है। यह दो-मंजिला भवन, जोधाबाई महल के निकट स्थित है। इसे सज्जित और कलात्मक बनाने के लिए बेहतर नक्काशी का काम किया गया है। इसके स्तम्भों में बंदरों, हाथियों और चीतों आदि वन्य-पशुओं की आकृतियां बनाई गई थीं। इसकी भीतरी तथा बाहरी दीवारों पर सुनहरे पत्थर जड़े गए थे। इसमें संगतराशी का अच्छा काम किया गया था। महल के भीतरी भाग में ईरानी शैली के सुन्दर चित्र बनाये गये थे जो अब नष्ट हो गये हैं।

स्मिथ ने इन चित्रों को ईसाई धर्म की पवित्र पुस्तक बाइबिल पर आधारित बताया है परन्तु इसमें पंखवाली शबीहें दिखाई गई हैं, जो ईरानी देवमाला पर आधारित हैं। इनकी शक्ल फरिश्तों के समान हैं। ये भित्तिचित्र इस महल की भीतरी दीवारों, कमरों के आलों और बारामदे की बाहरी दीवारों पर चित्रित किए गए थे।

मरियम-उज्ज़मानी का महल प्राचीन हिन्दू घरों के ढंग का बनवाया गया था। इसलिए इसे महल न कहकर कोठी कहा जाता है। इस भवन के आंगन में तुलसी के पौधे का थाला है और सामने एक मंदिर के चिह्न हैं। दीवारों में मूर्तियों के लिए आले बने हैं तथा कृष्णलीला के चित्र हैं जो औरंगजेब द्वारा घिसवा दिए जाने के कारण मद्धिम पड़ गए हैं। भवन के पत्थरों पर मंदिर के घंटों के चिह्न भी अंकित हैं। इस तीन मंज़िले घर के ऊपर के कमरों को ग्रीष्मकालीन और शीतकालीन महल कहा जाता था। ग्रीष्मकालीन महल में पत्थर की बारीक जालियों में से ठंडी हवा छन-छन कर आती थी।

तुर्की सुल्ताना का महल: तुर्की सुल्ताना का महल फतेहपुर सीकरी की इमारतों में सबसे अच्छा माना जाता है। इसकी निर्माण शैली तथा पत्थरों की बनावट सुन्दर एवं सजीव है। इसके बारे में रशब्रुक विलियम ने लिखा है- ‘यहाँ अकबर के शासनकाल की चित्रकारी बहुत ही सुन्दर है। इसके अतिरिक्त यह महल संगतराशी का अच्छा उदारहण है। इसकी दीवारों पर जंगल, पेड़-पौधे, झाड़ियों आदि के दृश्य बहुत ही सुन्दर ढंग से बने हैं। झाड़ियों में शेर और पेड़ों पर मोर बैठे दिखाई देते हैं।’

तुर्की सुल्ताना का महल एक लघु किंतु सुंदर रचना वाला भवन है जिसमें एक ही मंजिल है और स्तम्भों पर आधारित योजना पर निर्मित है। पर्सी ब्राउन ने इस महल को ‘स्थापत्यकाल का मोती’ कहा है। तुर्की सुल्ताना के विषय में अनुमान है कि यह या तो हिन्दाल की पुत्री रुकय्या बेगम थी या अकबर की पत्नी सलीमा बेगम जो वास्तव में बैरम खाँ की विधवा और हिन्दी के सुप्रसिद्ध कवि अब्दुर्रहीम खानखाना की माँ थी और जिससे अकबर ने विवाह कर लिया था। इस महल की दीवारों का गढ़न बहुत सुंदर है तथा इनका स्थापत्य कोमलता एवं सुरुचिता का प्रदर्शन करता है। इसका भीतरी भाग अत्यधिक सजावट पूर्ण है।

दीवारों के निचले रंगे हुए भाग पर हाथी, चीता आदि पशुओं की आकृतियां बनी हुई हैं और कई प्रकार के वृक्ष, पौधे एवं फल-फूल खुदे हुए हैं। इनमें से कुछ मानव-आकृतियाँ भी हैं जिनके चेहरे औरंगजेब के समय मिटा दिये गये क्योंकि ये इस्लाम के विरुद्ध थे।

इस भवन में ढलवां छज्जों एवं चमकदार टाइलों का प्रयोग किया गया है। पर्सी ब्राउन ने लिखा है- ‘इसकी बनावट और उभरे चित्रों की सजावट के कारण ऐसा प्रतीत होता है कि इसकी सजावट में काष्ठकला का अनुकरण किया गया है और इसके बनाने वाले कारीगर पंजाब से आए होंगे जहाँ अकबर के काल में पत्थरों पर लकड़ी जैसी खुदाई करने की कला प्रचलित थी।’

अकबर का निजी महल: तुर्की सुल्ताना के महल से लगा हुआ अकबर का निजी महल है। इस दो मंजिले भवन में चारों कोनों पर छतरियों का निर्माण किया गया है। इसकी बाहरी दीवार सफेद संगमरमर के जालीदार पर्दों और लाल ग्रेनाइट के पत्थरों की बनी थीं। इस सहन के दक्षिण में बादशाह का शयनागार है। यह 15 गुणा 15 वर्ग फुट की लम्बाई-चौड़ाई का वर्गाकार भवन है। इसमें चार द्वार हैं जिनमें से प्रत्येक के ऊपर फारसी की चार आयतें लिखी गई हैं। ये आयतें परस्पर जुड़कर एक पद बनाती हैं जो अकबर की प्रशंसा में लिखा गया है। अकबर के शयनागार से ही लगा हुआ पुस्तकालय का कक्ष है और ऊपरी मंजिल के एक कोने में ही झरोखा दर्शन है जहाँ बादशाह प्रतिदिन प्रातःकाल में अपनी प्रजा को दर्शन देता था।

अकबर का निजी महल ख्वाबगाह के नाम से भी जाना जाता था। इसके ऊपर की मंजिल का छोटा कमरा अकबर का शयनागार था जिसकी दीवारों पर अनेक चित्र अंकित थे। इन चित्रों में महात्मा बुद्ध, मदर मेरी तथा शिशु रूप में ईसा मसीह के चित्र थे। साथ ही आखेट तथा नदी-नालों के दृश्य भी बने हुए थे। ये चित्र अब धूमिल हो गये हैं।

राजा बीरबल का महल: राजा बीरबल के महल का निर्माण मरियम महल की शैली पर हुआ है। बीरबल महल काफी ऊँची कुर्सी पर बना हुआ है तथा सीकरी की समस्त इमारतों में इसका गुम्बद सबसे सुन्दर दिखाई देता हैं। यह दो मंजिली इमारत है जिसकी पहली मंजिल में दो बरसातियां हैं। ऊपरी मंजिल के कमरों के ऊपर चपटे गुम्बद बने हैं और बरसातियों पर मिस्र के पिरामिड जैसी छत-योजना अपनाई गई है। इन गुम्बदों और पिरामिडों जैसी छतों में दुहरे गुम्बद का प्रयोग किया गया है अर्थात् इन गुम्बदों के दो खोल हैं तथा दोनों खोलों के बीच खाली जगह है। ताकि नीचे का भवन ठण्डा रह सके।

इस मंजिल की विशेषता इसमें किया गया नक्काशी का काम और इसके अत्यधिक सुसज्जित ब्रैकेट हैं। इस भवन के भीतरी एवं बाहरी दोनों ही भागों में रचना सम्बन्धी और सजावटी तत्व उल्लेखनीय हैं क्योंकि उन्हें इतनी बारीकी से कहीं भी सुनियोजित अथवा निर्मित नहीं किया गया है जितना कि उन्हें अपेक्षाकृत इस छोेटे किंतु वैभवपूर्ण राजसी आवास में गढ़ा गया है।

अनूप तालाब: पंचमहल के सामने स्थित यह सुंदर जलकुण्ड अकबर द्वारा बनाया गया था। इसे अनूप तालाब भी कहा जाता था। कहा जाता है कि यहाँ गायक और संगीतकार पानी के ऊपर एक मंच पर प्रदर्शन करते थे। अकबर अपने निजी महल अर्थात् दौलत ख़ाने से इस संगीत का आनंद लेता था।

फजल और फैजी के महल

जामा मस्जिद के पीछे दो मामूली से किंतु ऊँचे आवासगृह हैं जो एक ही चाहरदीवारी के भीतर हैं और जिनका प्रवेशद्वार भी एक ही है। ये आवास अकबर के मित्र तथा नवरत्न अबुल फजल और उसके भाई फैजी के लिए बनवाए गए थे। इन दोनों महलों में किसी तरह का अलंकरण नहीं है। अब ये दोनों महल अच्छी दशा में नहीं हैं।

हिरन मीनार

हिरन मीनार फतेहपुर सीकरी की प्रसिद्ध इमारतों में से एक है। मान्यता है कि इस मीनार के अंदर ख़ूनी हाथी ‘हनन’ की समाधि है। मीनार में ऊपर से नीचे तक आगे निकले हुए हिरन के सींगों की तरह पत्थर जड़े हैं। इसके पास के मैदान में बादशाह अकबर शिकार खेलता था। यहाँ बेगमों के आने के लिए अकबर ने एक आवरण-मार्ग भी बनवाया था। हिरन मीनार की दीवारों पर बड़े-बड़े सींगनुमा नुकीले पत्थर लगे हैं। संभवतः इसीलिए इसका नाम हिरन मीनार पड़ा। कुछ इतिहासकार मानते हैं कि यहाँ जंगल से घेरकर हिरन लाए जाते थे तथा इस बुर्ज पर चढ़कर मुग़ल बेगमें उन हिरनों का शिकार करती थीं।

फतेहपुर सीकरी के अन्य भवन

पंचमहल के निकट मुग़ल शहजादियों का मदरसा है। फतेहपुर सीकरी के अन्य भवनों में मरियम का चमन, जनाना बाग, शिफाखाना, जनाना रास्ता, मीना बाजार, दफ्तरखाना, हकीम का महल, जौहरी बाजार, नौबतखाना, राजा टोडरमल का महल आदि प्रमुख हैं। पर्सी ब्राउन ने लिखा है- ‘फतेहपुर सीकरी के ये वैभवशाली महल ताजमहल के पश्चात् मुगलों की सर्वश्रेष्ठ कृतियां हैं।’

शहतीरी और मेहराबी शैलियों का समन्वय

फतेहपुर सीकरी के सभी शाही महल एवं मजहबी भवन यहाँ तक कि सरकारी कार्यालय भी तीरा-ब्रैकेट तथा पटी हुई छतों की शैली (ट्रैबिएट शैली) के हैं और मेहराब का प्रयोग मुख्यतः मेहराबी गुम्बदी सजावट के लिए किया गया है। सही अर्थों में फतेहपुर सीकरी के भवनों में ट्रैबिएट (शहतीरी) और आर्कुएट (मेहराबी) शैलियों का समन्वय किया गया है। सीकरी के भवनों में प्रयुक्त गुम्बदों का भी भारतीयकरण किया गया है। इन पर जो नक्काशी या जड़ाऊ कार्य किया गया है, उसमें नवीनता के लक्षण दिखाई देते हैं। सीकरी के सभी भवन मुख्यतः लाल बलुआ पत्थरों से निर्मित हैं। केवल सजावट के लिए या किन्हीं अंशों पर जोड़ देने के लिए ही इनमें सफेद संगमरमर का उपयोग किया गया है। केवल शेख सलीम चिश्ती की दरगाह को सफेद संगमरमर से ढका गया है।

सीकरी का फीका पड़ता वैभव

फतेहपुर सीकरी के निर्माण अकबर के शासनकाल में ई.1671 के आसपास आरम्भ हुए तथा अनुमानतः ई.1585 तक पूर्णता को प्राप्त कर गए। ई.1585 में अकबर को उजबेकों से लड़ने के लिए सीकरी छोड़कर लाहौर जाना पड़ा। इसके बाद से सीकरी का वैभव फीका पड़ने लगा। सीकरी केवल कुछ समय के लिए अकबर की राजधानी रही। ई.1605 में अकबर की मृत्यु के बाद जहाँगीर बादशाह हुआ किंतु उसने फिर से आगरा को अपनी राजधानी बनाया और अपने जीवन का बड़ा हिस्सा अजमेर में व्यतीत किया। उसके उत्तराधिकारियों में से किसी ने भी फिर सीकरी की तरफ मुड़कर नहीं देखा। इसलिए सीकरी का स्थापत्य केवल देखने-दिखाने की वस्तु बनकर रह गया।

फतेहपुर सीकरी के स्थापत्य पर विद्वानों की टिप्पणियां

फतेहपुर सीकरी के स्थापत्य को देखने के लिए दुनिया भर के विद्वानों ने सीकरी की यात्रा की तथा इन भवनों का अवलोकन करने के बाद महत्वपूर्ण टिप्पणियां कीं जिनमें से कुछ टिप्पणियां इस प्रकार हैं-

अकबर के समकालीन लेखक रॉल्फ फिच ने ई.1585 में लिखा है- ‘आगरा और फतेहपुर सीकरी दो बड़े नगर हैं। इनमें से कोई भी लंदन से कहीं अधिक बड़ा है। इनकी आबादी बहुत अधिक है। ये बड़ी घनी आबादी के हैं। आगरा और सीकरी के बीच 12 कोस का फासला है और पूरे मार्ग में खाने-पीने की तथा अन्य वस्तुओं का ऐसा भरा-पूरा बाजार है कि जैसे कोई किसी नगर में ही हो। और इतने आदमी होते हैं कि जैसे बाजार ही लगा हो……. यह ईरान और भारत के व्यापारियों और सिल्क कपड़ा, कीमती रत्नों, हीरों तथा मोतियों के व्यापार का बड़ा केन्द्र है।’

फर्ग्यूसन ने लिखा है- ‘सब मिलाकर फतेहपुर सीकरी का यह महल पाषाण का ऐसा रोमांच है जैसे कि कहीं कम, बहुत ही कम मिलेंगे और यह उस महान् व्यक्ति जिसने इसे बनवाया था, के मस्तिष्क की ऐसी प्रतिच्छाया है जो किसी अन्य स्रोत से सरलता से उपलब्ध नहीं हो सकती।’

वी. ए. स्मिथ ने लिखा है- ‘फतेहपुर सीकरी जैसा निर्माण कार्य न तो पहले कभी हुआ था और न फिर कभी होगा। ये रोमांच का पाषाण प्रतिरूप हैं। जैसे अकबर की अद्भुत प्रवृत्ति के आते-जाते मनोभाव जड़ हो गए हों। और लगता है जैसे कि जब तक मनोभाव बने रहे तब तक विद्युत गति से इसे बनाकर खत्म कर दिया गया हो। किसी और समय अथवा किन्हीं अन्य स्थितियों में यह अकल्पनीय और असंभव था। संसार निश्चय ही उस समय के शासन के प्रति कृतज्ञता अनुभव कर सकता है जिसके लिए ऐसी प्रेरित मूर्खता करना संभव था।’

फतेहपुर सीकरी की राष्ट्रीय स्थापत्य शैली

फतेहपुर सीकरी की अकबर कालीन समस्त इमारतें हिंदू-मुस्लिम मिश्रित स्थापत्य शैली की हैं। इनमें हिन्दू स्थापत्य की प्रधानता है। इनमें से कुछ की सजावट, जैसे- दीवाने खास में लगे हुए स्तम्भों के तोड़े, पंचमहल और जोधाबाई के महल में लगे हुए उभरे घण्टे तथ जंजीर और मरियम के महल में पत्थर खोदकर बनाये गये पशु-पक्षियों के चित्र इत्यादि हिन्दू और जैन मन्दिरों की ही नकल हैं। संगमरमर और बलुआ लाल पत्थर से बना हुआ बुलन्द दरवाजा स्थापत्य का उत्कृष्ट नमूना है।

डॉ. आशीर्वादीलाल श्रीवास्तव ने लिखा है- ‘फतेहपुर सीकरी की स्थापत्य कला की शैली भारतीय प्राचीन संस्कृति के विभिन्न तत्त्वों को समन्वित करने और मिलाने की अकबर की नीति को ही जैसे पाषाण रूप में प्रस्तुत करती हैं।’ 

डा. श्रीवास्तव ने अकबर की इस समन्वित स्थापत्य शैली को राष्ट्रीय स्थापत्य कला शैली कहा है। अकबर ने स्थापत्य की जो नई शैली विकसित की, उसका प्रभाव सारे देश पर और राजस्थान के राजपूत राजाओं पर पड़ा। अकबर के शासनकाल में अजमेर, बीकानेर, जोधपुर, आम्बेर, ओरछा और दतिया में जो महल बने, उन पर मुगल कला का प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है। हिन्दुओं के मन्दिर भी इस शैली के प्रभाव से नहीं बच सके।

हिन्दू राजाओं के महलों के बारे में पर्सी ब्राउन ने लिखा है- ‘राजपूत भवनों को देखकर कोई भी कल्पना कर सकता है कि उनमें प्रारम्भिक मुगली कला, जैसे-कटोरेदार मेहराबें, काँच की पच्चीकारी, दरीखाना, पलस्तर की रँगाई किस प्रकार हिन्दू राजाओं की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये अपना लिये गये थे।’

क्या सीकरी के महल हिन्दू-मुस्लिम मिश्रित शैली के हैं?

इन इतिहासकारों ने अकबर-कालीन इमारतों में हिन्दू-मुस्लिम एकता के तत्व ढूंढे हैं जबकि इस वास्तविकता को भी भुलाया नहीं जाना चाहिए कि फतेहपुर सीकरी के अधिकांश महलों का निर्माण सिकरवार राजपूतों ने करवाया था, अकबर ने तो केवल उनके बाहरी रूप को बदला था। अंग्रेजी इतिहासकार, लेखक एवं पुरातत्ववेत्ता इस बात को नहीं समझ पाए थे, इसलिए उन्होंने मुगल कालीन इमारतों में हिन्दू-मुस्लिम मिश्रित शैली के दर्शन किए। बाद के भारतीय लेखकों ने भी उन्हीं के लिखे हुए को सच मान लिया। बहुत से भारतीय लेखकों ने तो इन भवनों को अपनी आंखों से देखे बिना ही यूरोपीय लेखकों का अनुसरण किया।

यहाँ तक कि कुछ इतिहासकारों ने फतेहपुर सीकरी के भवनों को राष्ट्रीय स्थापत्य शैली भी घोषित कर दिया।

भारत के अन्य नगरों में बने अकबर कालीन भवन

लाहौर का किला

लाहौर नगर की स्थापना भगवान राम के पुत्र लव ने की थी। उन्हीं के नाम पर यह लाहौर कहलाया। यहाँ हजारों सालों से हिन्दू राआओं का राज्य था। लाहौर का दुर्ग सबसे पहले कब और किसने बनवाया, इसका विवरण नहीं मिलता किंतु यह निश्चित है कि लाहौर में प्राचीन काल से ही एक बड़ा दुर्ग स्थित था जिसकी चिनाई मिट्टी-गारे में की गई थी। अकबर ने ई.1566 में इस दुर्ग का जीर्णोद्धार करवाया तथा इसके भीतर कई भवन बनवाए। वस्तुतः उस काल में अकबर ने नवीन निर्माण बहुत कम करवाए अपितु पुराने भवनों के बाहरी स्वरूप को मुगल शैली में ढालने का काम अधिक किया। आगे भी उसके वंशजों ने यह परम्परा जारी रखी जो शाहजहाँ के काल तक चलती रही।

लाहौर दुर्ग आगरा के दुर्ग के समान अत्यंत विशाल है। लाहौर के किले की इमारतें आगरा के किले के जहाँगीरी महल के समान हैं। अन्तर यह है कि लाहौर के किले की सजावट आगरा के किले की अपेक्षा अधिक घनी है। तोड़ों में हाथी और सिंहों की मूर्तियाँ और छत के नीचे कारनिस में मोरों के चित्रों को देखकर सहज ही अनुमान लगाया जाता है कि यह भवन मुगलकाल से भी पहले मौजूद रहा होगा तथा इसका मूल निर्माण हिन्दू राजाओं ने करवाया होगा।

भवन निर्माण में अपनाई गई शैलियों से ज्ञात होता है कि इस दुर्ग के अधिकांश भवनों के शिल्पकार हिन्दू थे। अकबर के काल में बने बहुत से मुगल भवनों की सजावट में, इस्लाम में वर्जित अलंकरण अर्थात् जीवित पशु-पक्षियों एवं मनुष्यों के चेहरे एवं मूर्तियां दिखाई देते हैं जिससे यह धारणा पुष्ट होती है कि अकबर के समय प्राचीन हिन्दू इमारतों को ही मुगल शैली के भवनों में बदल दिया गया था।

लाहौर के किले के भीतर अकबर के बाद जहाँगीर, शाहजहाँ तथा औरंगजेब ने भी बड़े स्तर पर निर्माण करवाए। जहाँगीर काफी समय तक लाहौर में नरहा थां उसने लाहौर दुर्ग में कुछ आवासीय महलों का निर्माण करवाया। शाहजहाँ ने दीवान-ए-खास, शीश महल, नौलखा पेवेलियन और मोती मस्जिद बनवाए जबकि औरंगजेब ने आलमगीर दरवाजे का निर्माण करवाया। महाराजा रणजीतसिंह ने भी दुर्ग में कुछ निर्माण करवाए जिनमें से शीशमहल पर बनवाया गया उनका निजी महल भी था।

यह किला 1,400 फुट लंबा और 1,115 फुट चौड़ा है। यूनेस्को ने ई.1981 में इसे विश्व धरोहर सूची में सम्मिलित किया। वर्तमान में आलमगीर दरवाजे से ही किले में प्रवेश किया जाता है। दीवाने आम, दीवाने खास और शीश महल किले के मुख्य आकर्षण हैं। लाहौर के उत्तर-पश्चिम किनारे में स्थित यह किला, लाहौर का प्रमुख दर्शनीय स्थल है।

इलाहाबाद का किला

प्रयागराज (इलाहाबाद) का किला मूलतः किसने बनवाया, इस पर विवाद है। यहाँ पहले से ही एक हिन्दू किला मौजूद था जिसे मुगल बादशाह अकबर ने नए सिरे से बनवाया। अकबर के समकालीन लेखक अब्दुल कादिर बदायूंनी ने ‘मुंतखवुल-तवारीख’ में लिखा है कि इलाहाबाद किले की नींव ई.1583 में डाली गई। नदी की कटान से यहाँ की भौगोलिक स्थिति स्थिर न होने से इसका नक्शा अनियमित ढंग से तैयार किया गया। अनियमित नक्शे पर किले का निर्माण कराना ही इसकी सबसे बड़ी विशेषता है। किला तीस हजार वर्ग फुट क्षेत्र में बना है। इसके निर्माण में छः करोड़ 17 लाख 20 हजार 214 रुपये लागत आयी थी।

ई.1773 में अंग्रेजों ने इस दुर्ग पर अधिकार कर लिया। उन्होंने ई.1775 में इस दुर्ग को बंगाल के नवाब शुजाउद्दौला को 50 लाख रुपये में बेच दिया। ई.1798 में नवाब शुजात अली और अंग्रेजों में एक संधि के बाद किला फिर से अंग्रेजों के अधिकार में चला गया। आजादी के बाद इसमें भारतीय सेना रहती है। दुर्ग में फारसी भाषा का एक शिलालेख लगा है जिसमें किले की नींव पड़ने का वर्ष ई.1583 दिया गया है।

दुर्ग में जहाँगीर महल, तीन बड़ी गैलरी तथा ऊँची मीनारें हैं। मुगलों ने दुर्ग में कई फेरबदल कराये। अंग्रेजों ने भी इसमें कई परिवर्तन किए जिससे किले का अकबर कालीन स्वरूप बहुत-कुछ बदल गया। संगम के निकट स्थित इस किले के कुछ भाग ही पर्यटकों के लिए खुले रहते हैं। शेष हिस्से भारतीय सेना के अधिकार में हैं। पर्यटकों को अशोक स्तंभ, सरस्वती कूप और जोधाबाई का महल दिखाया जाता है। दुर्ग परिसर में अक्षय वट के नाम से विख्यात बरगद का एक पुराना पेड़ और पातालपुर मंदिर भी है। इलाहाबाद का किला खण्डहर प्रायः हो गया है। उसकी अनेक इमारतें नष्ट हो गई हैं। केवल जहाँगीर महल ही अपेक्षाकृत अच्छी स्थिति में है।

अजमेर का किला

अकबर पहाड़ी दुर्ग में रहने का अभ्यस्त नहीं था। वह अजमेर के तारागढ़ दुर्ग तक पहुँचने के लिये उपलब्ध पहाड़ी दुर्गम पथ को भी पसंद नहीं करता था। वह आगरा, लाहौर, इलाहाबाद तथा फतहपुर सीकरी के मैदानी दुर्गों में रहना पसंद करता था जहाँ बड़े-बड़े बाग बनाए जा सकें। इसलिये उसने अजमेर में एक मैदानी दुर्ग बनाने का निर्णय लिया। जिस स्थान पर अकबर ने अपने लिये नया दुर्ग बनवाने का निर्णय लिया, उस स्थान पर पहले से एक प्राचीन दुर्ग बना हुआ था। यह दुर्ग कब और किसने बनवाया था इसकी जानकारी इतिहास के ग्रंथों में प्राप्त नहीं होती किंतु चूंकि यह अजमेर की संस्कृत पाठशाला एवं विष्णु मंदिर (अब ढाई दिन का झौंपड़ा) से अधिक दूर नहीं है, इसलिए  अनुमान लगाया जाता है कि अजमेर नगर का मैदानी दुर्ग चौहान कालीन होना चाहिए।

अकबर ने इसी दुर्ग में कुछ निर्माण कार्य करवाए तथा इसे मुगल स्थापत्य के दुर्ग में बदल दिया। इसके भीतर अकबर ने अपने लिये एक महल बनवाया। अकबर के समय में इसे मुगल किला, अकबर का किला तथा दौलतखाना आदि नामों से जाना जाता था। आज भी इसे को अकबर के महल के नाम से जाना जाता है। यह दुर्ग फतहपुर सीकरी के महल की अनुकृति है और विशाल चतुष्कोणीय आकृति में है। इसके चारों कोनों पर अष्टकोणीय मीनारें हैं। इसका द्वार नगर की तरफ मुंह किये हुए है। केन्द्रीय भाग में विशाल बैठक बनी है।

ला टाउच की सैटलमेंट रिपोर्ट ई.1875 के अनुसार अजमेर स्थित दौलतखाना, एक विशाल चतुर्भुज दुर्गनुमा भवन है जिसे अकबर ने अजमेर नगर के उत्तर में बनवाया था। अबुल फजल के अनुसार इस दुर्ग का निर्माण 1870 में आरंभ हुआ और ई.1573 के लगभग यह बनकर तैयार हुआ। ई.1573 से 1579 के बीच अकबर जब भी अजमेर आया, इसी किले में ठहरा।

दुर्ग के चारों कोनों में एक-एक बुर्ज बनी हुई है। इसकी पश्चिमी दिशा में एक सुंदर दरवाजा है तथा इसके मध्य में भवन बना हुआ है। इस दुर्ग का दरवाजा 84 फुट ऊँचा तथा 43 फुट चौड़ा है। यह दरवाजा नया बाजार की तरफ मुंह करके खड़ा हुआ है। इस दरवाजे का निर्माण जहाँगीर के शासन-काल में करवाया गया था। इस दरवाजे के सामने हाथियों की लड़ाई के लिये विशाल मैदान था जिसमें बादशाहों के मनोरंजन के लिये और भी कई तरह के आयोजन किये जाते थे। अकबर और जहाँगीर के समय में इस के केन्द्रीय भवन के चारों ओर एक उद्यान भी हुआ करता था जो अब पूरी तरह लुप्त हो चुका है।

18 नवम्बर 1613 से 10 नवम्बर 1616 तक जहाँगीर इस किले में रहा। वह नित्य इसके मुख्य दरवाजे के झरोखे में बैठकर जनता को दर्शन देता और यहीं से न्याय किया करता था। इसी किले में 10 जनवरी 1616 को इंग्लैण्ड के राजा जेम्स प्रथम का राजदूत सर टामस रो जहाँगीर की सेवा में उपस्थित हुआ और उसने अपने देश के व्यापारियों के लिये भारत में व्यापार करने की अनुमति प्राप्त की। कालान्तर में इस किले में दिल्ली सरकार का शस्त्रागार रहा। इस कारण यह मैगजीन कहलाने लगा। जहाँगीर द्वारा बनाये गये मुख्य द्वार के शीर्ष भाग पर दो छतरियां हैं जहाँ से अजमेर नगर का विहंगम दृश्य दिखाई देता है। इन छतरियों के नीचे एक-एक झरोखा तथा जालियां लगी हुई हैं। यह भवन अजमेर रेल्वे स्टेशन के ठीक पास स्थित है। जब औरंगजेब के पुत्र अकबर ने विद्रोह किया था तब औरंगजेब कुछ समय तक इसी दुर्ग में रहा था।

उन्नीसवीं शताब्दी के आरंभ में मराठा सूबेदार इसी दुर्ग में रहा करते थे। उन्होंने अपनी आवश्यकताओं के अनुरूप इसकी बनावट में कई बदलाव किये। उस समय आनासागर के तट पर पत्थर के मण्डप के उत्तरी छोर पर पौने तेबीस फुट गुणा पौने बाईस फुट की, जहाँगीरकाली बारादरी बनी हुई थी। उस बारादरी को तोड़कर इस दुर्ग के उत्तरी बुर्ज की छत के ऊपर एक कक्ष बनाया गया जिसे एक मंदिर की तरह काम में लिया जाता था।

अकबर ने अपने अमीर-उमरावों को भी आदेश दिया कि वे अजमेर में अच्छे भवन बनवायें तथा उद्यान लगवायें। अमीरों ने आस पास के हिन्दू भवनों में कुछ परिवर्तन करके उन्हें नये भवनों का रूप दिया। इस प्रकार के भवनों का भीतरी भाग हिन्दू स्थापत्य शैली का है जबकि उनके बाहरी भाग को मुस्लिम स्थापत्य शैली में ढाल दिया गया है। ऐसे कुछ भवन आज भी इस दुर्ग के चारों ओर देखने को मिल जायेंगे। नया बाजार में बना हुआ बादशाही भवन इसी प्रकार का है। अकबर के किले में स्थित दरबारे-आम भी इसी शैली का गवाह है। इस प्रकार जब अकबर ने अजमेर में अपने लिये दुर्ग बनवाया तो उसके चारों ओर एक नया अजमेर शहर खड़ा हो गया।

ईस्ट इण्डिया कम्पनी के अधिकारी जनरल ऑक्टर लोनी ने अजमेर में स्थित अकबर के महल अर्थात् दौलतखाना को ‘मैगजीन’ में बदल दिया। मैगजीन के चारों ओर ऊँची और मजबूत दीवार बनायी गयी। इस मैगजीन में ब्रिटिश सेना के शस्त्र रखे जाने लगे। ई.1857 में मैगजीन बंगाल इन्फैण्ट्री की 15वीं रेजीमेंट के अधीन थी। जिस समय 1857 का विद्रोह हुआ, अजमेर-मेरवाड़ा का कमिश्नर कर्नल डिक्सन ब्यावर में था। दुर्ग का भवन उस समय इतना पुराना हो चुका था कि तोप का एक गोला उसे ध्वस्त करने के लिये पर्याप्त था। इसमें इतना बारूद, शस्त्र, तोपें तथा राजकीय खजाना मौजूद था कि सम्पूर्ण राजपूताना के विद्रोहियों को आपूर्ति करने के लिये पर्याप्त था।

कर्नल डिक्सन ने ऑफिशियेटिंग सैकण्ड इन-कमाण्ड लेफ्टिनेंट डब्लू कारनेल को रात्रि में ही ब्यावर से मेरवाड़ा बटालियन की दो कम्पनियों के साथ अजमेर के लिये रवाना किया। ले. कारनेल अगली प्रातः मैगजीन के पास पहुँचा। उसने ब्रिटिश ऑफीसर इन-कमाण्ड से अपनी सेना सहित मैगजीन से बाहर आने के लिये कहा। ब्रिटिश ऑफीसर इन-कमाण्ड ने मैगजीन खाली करने से मना कर दिया। इस पर ले. कारनेल ने उस पर दबाव बनाया और मैगजीन पर कब्जा करके 15वीं बंगाल इन्फैण्ट्री को मैगजीन से बाहर निकाल दिया। इसके बाद कारनेल, अजमेर स्थित समस्त अंग्रेज अधिकारियों के परिवारों को मैगजीन के भीतर ले आया और उसने मैगजीन की बुर्जों पर पुरानी तोपें चढ़ा दीं। कारनेल ने मैगजीन के मध्यम में एक कुआं खोदा तथा पर्याप्त रसद जमा करके, किसी भी आपात् स्थिति के लिये तैयार होकर बैठ गया।

जब 15वीं इण्डियन इनफैण्ट्री नसीराबाद पहुँची तो उनके भारतीय साथियों ने उन्हें इस बात के लिये धिक्कारा कि उन्होंने निम्न जाति के मेर लोगों को मैगजीन सौंप दी। 25 जून 1857 को कर्नल डिक्सन का ब्यावर में निधन हो गया। उसके बाद सर हेनरी लॉरेंस अजमेर-मेरवाड़ा का कमिश्नर बना। यही लॉरेंस आगे चलकर एजीजी अर्थात् एजेंट टू दी गवर्नर जनरल बना। वह मैगजीन के निकट रहा करता था। ई.1863 में मैगजीन में शस्त्र रखने बंद कर दिये गये तथा वहाँ पर तहसील कार्यालय स्थापित किया गया। ई.1908 में इस भवन में राजपूताना संग्रहालय खोला गया।

अटक का किला

 सिंधु नदी की पश्चिमी धारा को अटक कहा जाता था। काबुल और सिंध नदी के संगम के थोड़ा नीचे सिंघ के किनारे स्थित एक ऊँची पहाड़ी पर अटक का किला स्थित है। यह एक अत्यंत प्राचीन दुर्ग था। अकबर ने ई.1581 में सिंधु नदी के तट पर अटक के किले में कुछ नीवन निर्माण करवाए। इस नगर का प्राचीन नाम हाटक है जिसका अर्थ ‘स्वर्ण’ होता है। पारसियों के जेंद अवेस्ता में अटक नदी के पूर्व में स्थित देश को ‘हिन्दवः’ कहा जाता था, यूनानियों ने उस देश के लिए ‘इण्डिया’ (हिन्दिया) शब्द का प्रयोग किया। अटक से 16 मील दूर स्थित ओहिंद नामक स्थान पर अटक के ऊपर नावों का पुल बनाकर सिकन्दर ने भारत में प्रवेश किया था।

प्राचीन हिन्दू अटक नदी के पार जाने को बुरा समझते थे और उनमें विश्वास था कि इसके पार जाने से हिन्दुओं का धर्म नष्ट हो जाएगा। जिस भारत की कल्पना ‘आसेतु-हिमालय’ के रूप में की जाती थी, उसकी पश्चिमी सीमा का निर्माण अटक नदी ही करती थी। इन सब कारणों से प्राचीन काल एवं मध्यकाल में अटक का दुर्ग भारत की पश्चिमी सीमा का प्रहरी माना जाता था एवं सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण था।

 इस दुर्ग के सामने कमालिया और जलालिया नामक पहाड़ियों में से होकर सिंध नदी बहती है। अकबर के समय में दो हिन्दुओं को पाखण्डी बताकर इन चट्टानों से नीचे धकेला गया। अकबर ने अपने छोटे भाई हकीम मिरज़ा के आक्रमणों से बचने के लिये ई.1579 में यह किला फिर से बनवाया तथा नदी के पश्चिम तट पर ‘खैरबाद’ की स्थापना की।

औरंगजेब एक बार समस्त हिन्दू राजाओं को लेकर अटक के लिए रवाना हुआ। उसकी योजना इन राजाओं को अटक नदी के पार ले जाकर वहाँ उनकी सुन्नत करने की आौर सम्पूर्ण भारत को एक साथ ही मुसलमान बनाने की थी किंतु एक सूफी दरवेश को इस योजना का पता चल गया, उसने हिन्दू राजाओं को यह बात बता दी। इस पर भारतीय राजाओं ने अपनी नावों में आग लगा दी और अटक नदी पार करने से मना कर दिया। औरंगजेब ने कुरान हाथ में लेकर कसम खाई कि वह भविष्य में कभी भी ऐसा प्रयास नहीं करेगा।

मराठा सरदार रघुनाथ राव ने मराठों की सत्ता अटक तक बढ़ाई। ई.1792 में महाराजा रणजीतसिंह ने इस दुर्ग पर आक्रमण किया। इस दुर्ग के लिए अंग्रजों एवं सिक्खों में दो बार बड़ी लड़ाइयां हुईं। अंत में यह दुर्ग अंग्रेजों के अधिकार में चला गया। अंग्रेजों ने ई.1883 में इस नदी पर लोहे का एक पुल बनवाया तथा रेलवे लाइन बिछा दी जो पेशावर तक जाती है। अब यह दुर्ग पाकिस्तान एवं अफगानिस्तान की सीमा पर एवं पाकिस्तान में स्थित है तथा खण्डहर के रूप में बचा है। इस दुर्ग में पाकिस्तान द्वारा बलपूर्वक पकड़े गए भारतीय नागरिक बंदी बनाकर रखे जाते हैं। पुस्तक लिखे जाते समय इस दुर्ग में 72 भारतीय नागरिक बंद होने का अनुमान है।

अटक में ‘बेगम की सराय’ नामक एक मुगलकालीन सराय थी। पाकिस्तान के पंजाब प्रांत की सरकार ने इस सराय की मरम्मत करवाई है।

अकबरी मस्जिद, अजमेर

अकबर ने ई.1571 में अजमेर में ख्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह के निकट एक मस्जिद बनवाई जिसे अकबरी मस्जिद कहा जाता है। यह मस्जिद बुलंद दरवाज़ा एवं शाहजहानी दरवाजे के मध्य स्थित है। लाल बलुआ पत्थर से बनी यह मस्जिद अब मोईनुआ उस्मानिया दारुल-उलूम है जो कि अरबी एवं फारसी में इस्लामी शिक्षा का विद्यालय हैं। इस मस्जिद के निर्माण में हरे एवं सफ़ेद संगमरमर का प्रयोग किया गया है।

अकबरी मस्जिद, आम्बेर

ई.1569 में रणथंभौर दुर्ग अभियान की सफलता के बाद अकबर ख्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती का धन्यवाद ज्ञापित करने के लिए अजमेर गया। मार्ग में वह अपनी ससुराल आम्बेर में रुका। जयपुर के कच्छवाहा राजा भारमल ने अकबर के लिए आम्बेर दुर्ग में एक मस्जिद बनवाई जो आज भी देखी जा सकती है। यद्यपि इस भवन को मुगल शैली में बनाने का प्रयास किया गया है किंतु इस पूरे भवन पर हिन्दू स्थापत्य की छाप स्पष्ट दिखाई देती है। मस्जिद को बाहर से लाल रंग से पोतकर लाल बलुआ पत्थर से निर्मित होने का आभास दिया गया है। इसके प्रवेश द्वारा को फारसी शैली के ईवान की तरह बनाने का प्रयास किया गया है किंतु उसके ऊपर पत्थर की नक्काशी मुगलिया नक्काशी की जगह हिन्दू अलंकरण की तरह दिखती है। इसके मुख्य द्वार के दोनों तरफ तीन-तीन मेहराब बनाए गए हैं। मुख्य द्वार के दोनों तरफ एक-एक गुम्बद बनाया गया है। ये गुम्बद भी फारसी एवं मुगलिया शैली के गुम्बदों के स्थान पर मंदिर के गर्भगृहों के ऊपर बनने वाले शिखरनुमा निर्माण अधिक जान पड़ते हैं जो कि बंद कमल पुष्प की तरह दिखाई देते हैं। इस भवन के सामने एक-एक पतली मीनार बनाई गई है जो मुगल शैली से बिल्कुल भी मेल नहीं खाती।

कोस मीनार

ई.1574 में अकबर ने आगरा से अजमेर के रास्ते में प्रत्येक पड़ाव पर पक्के विश्राम गृहों का निर्माण करवाया ताकि वह प्रति वर्ष बिना किसी बाधा के अजमेर आ-जा सके। प्रत्येक एक कोस की दूरी पर एक मीनार खड़ी की गई जिस पर उन हजारों हरिणों के सींग लगवाये गये जो अकबर तथा उसके सैनिकों ने मारे थे। इन मीनारों के पास कुएं भी खुदवाये गये। बाद में इन मीनारों के पास उद्यान लगाने एवं यात्रियों के लिये सराय बनाने के भी निर्देश दिये गये। जयपुर में कनक वृंदावन के पास एवं हाड़ीपुर आमेर सहित कई स्थानों पर ये मीनारें देखी जा सकती हैं।

अकबर द्वारा निर्मित अन्य भवन

अकबर ने मेड़ता की मस्जिद तथा अन्य स्थानों के किले इत्यादि अन्य भवन बनवाए। सिकन्दरा में स्थित अकबर के मकबरे का नक्शा अकबर ने बनाया था। इसे अकबर की मृत्यु के बाद जहाँगीर ने पूरा करवाया।

Related Articles

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Stay Connected

21,585FansLike
2,651FollowersFollow
0SubscribersSubscribe
- Advertisement -spot_img

Latest Articles

// disable viewing page source