Sunday, April 5, 2026
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खतरनाक जॉम्बी बन रहे हैं हम!

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खतरनाक जॉम्बी बन रहे हैं हम!

हम भारत के लोग जो कि जल्दी से जल्दी विश्वगुरु बनने की फिराक में हैं, दूसरों के द्वारा थूका हुआ चाटने वाले खतरनाक जॉम्बी बनते जा रहे हैं।

हॉर्वर्ड, कैम्ब्रिज और कैलिफोर्निया आदि विदेशी यूनिवर्सिटियों द्वारा थूके गए ज्ञान, इकॉनोमिक फोरम्स द्वारा फैंके गए आंकड़े और सोरोस जैसे शक्तिशाली विदेशी एनजीओज द्वारा फैंके गए डॉलरों को चटाकर बनाए गए कुछ अत्यंत शक्तिशाली जॉम्बी विगत कुछ दशकों में बड़ी ही चालाकी से भारत में घुसाए गए हैं और कुछ खतरनाक जॉम्बी अमरीका एवं कनाडा में बैठाकर रखे गए हैं।

भारत में घुसाए गए जॉम्बी कुछ विश्वविद्यालयों, राजनीतिक पार्टियों एवं एनजीओज में छिपे हुए हैं। विदेशी ज्ञान, आर्थिक आंकड़े और डॉलरों को चाटकर जीवित रहने वाले खतरनाक जॉम्बी भारत के शांतिप्रिय एवं भोले-भाले लोगों को बड़ी तेजी से जॉम्बियों में बदल रहे हैं।

जॉम्बी उस आवेशित मनुष्य को कहते हैं जिसके शरीर में कोई खतरनाक वायरस घुसकर उस मनुष्य के मस्तिष्क को भावना-शून्य बना देता है। ऐसा आवेशित मनुष्य अर्थात् जॉम्बी बना हुआ मनुष्य दूसरे मनुष्यों को काटकर खाना चाहता है किंतु जब कोई जॉम्बी किसी मनुष्य को काटता है तो वह मनुष्य भी जॉम्बी बन जाता है और फिर वे दोनों जॉम्बी किसी नए मनुष्य की तलाश में आगे बढ़ते हैं। इस प्रकार जॉम्बियों की संख्या बड़ी तेजी से बढ़ जाती है।

अमेरिकन फिक्शन फिल्म जॉम्बी में मानवता के शत्रु बन चुके कुछ वैज्ञानिकों को जॉम्बी का वायरस फैलाते हुए तो दिखाया गया है किंतु जॉम्बी बने लोगों को नियंत्रित करने का कोई उपाय नहीं बताया गया है, उन्हें केवल गोली मारकर ही नियंत्रित किया जाता है।

विदेशी ज्ञान, आर्थिक आंकड़े और विदेशी डॉलर चाट चुके जॉम्बी कभी इतने अनियंत्रित नहीं होते कि उन्हें गोली मारनी पड़े क्योंकि उनके शरीर में कोई वायरस नहीं होता अपितु उनके दिमाग में कुछ खरतनाक विचार होते हैं। ऐसे जॉम्बी विदेशी ताकतों द्वारा बड़ी आसानी से नियंत्रित किए जाते हैं।

हाल ही में घटित एक उदाहरण लेते हैं! विगत लोकसभा चुनावों से पहले ऑक्सफैम इंटरनेशनल नामक संस्था ने घोषणा की कि वर्ष 2012 से 2021 के बीच देश में बनाई गई 40 प्रतिशत से अधिक संपत्ति केवल 1 प्रतिशत लोगों के पास गई। वहीं देश की निचली आधी जनसंख्या के पास कुल संपत्ति का सिर्फ 3 प्रतिशत हिस्सा है।

उसी समय वर्ल्ड इनइक्वैलिटी लैब ने भी एक रिपोर्ट देकर कहा कि भारत के अरबपतियों की करीब 90 प्रतिशत संपत्ति उच्च जातियों के पास है।

ये बातें इतनी चालाकी से और इतनी घुमाकर बोली गईं जिनके कारण भारत की जनता में यह भ्रम पैदा हुआ कि भारत की कुल सम्पत्ति का 90 प्रतिशत हिस्सा उच्च जाति के अरबपतियों के पास है, जबकि विदेशी संस्था की रिपोर्ट में कहा यह गया था कि भारत में अरबपतियों के पास जितनी सम्पत्ति है, उसमें से 90 प्रतिशत सम्पत्ति उच्च जाति के अरबपतियों के पास है। यह नहीं कहा गया था कि देश की कुल सम्पत्ति का 90 प्रतिशत हिस्सा उच्च जातियों के पास है।

इसी प्रकार विदेशी संस्था की रिपोर्ट में यह कहा गया कि देश की निचली आधी जनसंख्या के पास कुल संपत्ति का सिर्फ 3 प्रतिशत हिस्सा है। भारत की जनता द्वारा इसका अर्थ यह लगाया गया कि भारत के गरीब लोगों के पास केवल 3 प्रतिशत सम्पत्ति बची है।

विदेशी संस्था ने हमें जॉम्बी बनाने के लिए बड़ी ही चालाकी से कहा कि देश की निचली आधी जनसंख्या के पास कुल संपत्ति का सिर्फ 3 प्रतिशत हिस्सा है। उसने यह नहीं बताया कि देश की निचली आधी जनसंख्या का मतलब क्या है?

आज की तारीख में देश में निचली गरीब आबादी कितनी है, इसके सम्बन्ध में एनएफएचएस 2019-21 की रिपोर्ट खुलासा करती है कि भारत में बहुआयामी रूप से गरीब आबादी का प्रतिशत केवल 14.96 है। इसमें से भी निचली आधी आबादी का अर्थ होता है कि देश की लगभग 8 प्रतिशत जनसंख्या।

अर्थात् विदेशी संस्था ने जो कुछ भी कहा उसका अर्थ यह होता है कि देशी की सबसे गरीब जनसंख्या में से आधी यानि कि 8 प्रतिशत लोगों के पास 3 प्रतिशत सम्पत्ति है। यह बात किसी के समझ में नहीं आई और लोगों ने समझा कि अब भारत में आधी जनसंख्या के पास केवल 3 प्रतिशत सम्पत्ति बची है।

करोड़ों भारतीय इस विदेशी ज्ञान एवं आर्थिक आंकड़ों को चाटकर वैचारिक जॉम्बी बन गए। उन्होंने भारत की जमी-जमाई सरकार को वोट न देकर कुछ ऐसी ताकतों को वोट दे दिए जो देश के लोगों को जातीय जनगणना करवाने का लालच दे रही थीं तथा कह रही थीं कि जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी भागीदारी।

करोड़ों लोगों को लगा कि जब विपक्षी पार्टियां सत्ता में आकर जातीय जनगणना करवाएंगी तो हमारी जाति को अधिक आरक्षण मिलेगा और हमारे बच्चों को संख्या के आधार पर अधिक नौकरियां मिलेंगी। इस कारण उन्होंने एक विशेष विचार से आवेशित होकर लोकसभा के चुनावों में भाग लिया।

जब हम योग्यता को नकार कर जाति के आधार पर ही नौकरी देने का विचार रखते हैं तो यह हमारे जॉम्बी होने की निशानी नहीं है तो क्या है! अयोग्य डॉक्टर चाहे जिस जाति का हो, पूरे समाज का नुक्सान करेगा और योग्य डॉक्टर चाहे जिस जाति का हो, पूरे समाज का अच्छा इलाज करेगा। किंतु जॉम्बी इस तरह नहीं सोचते, वे केवल अपनी जाति के बारे में सोचते हैं।

दूसरा उदाहरण लेते हैं, अमरीका में बैठे सैम पित्रोदा ने विगत लोकसभा चुनावों के दौरान चालाकी भरी भाषा में कुछ ऐसी बातें कहीं जिनका अर्थ भारत के आम आदमी ने यह लगाया कि जब हमारी सरकार आएगी तो अमीरों की सम्पत्ति लेकर गरीबों में बांटेगी।

करोड़ों गरीब लोग अमीरों की सम्पत्ति पाने के लालच से ग्रस्त होकर वोट देने गए तथा देश के मुख्य विपक्षी दल की सीटें 52 से 99 तथा दूसरे बड़े विपक्षी दल की सीटें 5 से 37 पहुंच गईं।

तीसरा उदाहरण लेते हैं, भारत सरकार ने किसानों के लिए तीन कृषि कानून बनाए किंतु अमरीका और कनाडा में बैठे उन लोगों ने जो जॉम्बियों को बनाते और पालते हैं, भारत के किसानों को भड़काया कि यदि ये तीन कृषि कानून लागू हुए तो किसान बर्बाद हो जाएगा। इसलिए किसान इन कानूनों को लागू न होने दें तथा यह मांग करें कि हमें एमएसपी पर खरीद की गारण्टी दी जाए।

एमएसपी पर खरीद की गारण्टी एक ऐसा खतरनाक विचार है जो देश को बर्बाद कर देगा। इसका अर्थ यह होता है कि सरकार अनाज का एम एस पी अर्थात् न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित करेगी जो कि फसल की लागत मूल्य पर आधारित होगा। बाजार में किसान का अनाज उस समर्थन मूल्य से कम पर नहीं खरीदा जाएगा। यदि कोई व्यापारी इससे कम मूल्य पर किसान से अनाज खरीदता है तो उस व्यापारी को गिरफ्तार करके सजा दी जाएगी।

जॉम्बी बनने को आतुर किसी भी व्यक्ति ने यह नहीं सोचा कि यदि भारत सरकार इस बात को मान ले तो इसके कितने भयंकर परिणाम होंगे! मण्डियों में बैठे व्यापारी किसानों से अनाज खरीदना ही बंद कर देंगे। यदि व्यापारी नहीं खरीदे तो सरकार को वह अनाज एमएसपी पर खरीदना होगा। क्योंकि सरकार एमएसपी की गारण्टी दे चुकी होगी।

इससे सरकार का खजाना खाली हो जाएगा, व्यापारी बर्बाद हो जाएंगे और किसान के हाथ कुछ नहीं आएगा। देश का आम आदमी परेशान होगा सो अलग! सरकार ने यह सब स्पष्ट किया किंतु आंदोलन तब तक चलता रहा जब तक कि तीनों कानून रद्द नहीं कर दिए गए। सरकार किसी भी सूरत में एमएसपी की गारण्टी न तो दे सकती थी और न उसने दी किंतु आंदोलन आज भी चल रहा है।

ठीक ऐसा ही सीएए अर्थात् नागरिकता संशोधन अधिनियम के मामले में हुआ। विदेशी शक्तियों ने भारत के मुसलमानों को यह कहकर भड़काया कि इससे मुसलमानों की नागरिकता छिन जाएगी तथा उनके घर छीनकर उन्हें कैम्पों में भेज दिए जाएगा।

भारत सरकार ने लाख समझाया कि यह कानून किसी की नागरिकता नहीं छीनता, अपितु उन पड़ौसी देशों से आने वाले हिन्दू, सिक्ख, ईसाई आदि को नागरिकता देता है जो विभाजन से पहले भारत के ही नागरिक थे और अब उन देशों में प्रताड़ित किए जा रहे हैं, किंतु विदेशी ज्ञान, आर्थिक आंकड़े और अमरीकी डॉलर चाटकर आए जॉम्बियों ने आम मुसलमान को कभी भी यह बात नहीं समझने दी जिसका परिणाम शाहीन बाग जैसे आंदोलनों के रूप में सामने आया।

चीजें दूर से साफ दिखाई नहीं देतीं, निकट जाने पर ही उनका घिनौना स्वरूप स्पष्ट होता है। जाकिर नाइक, पन्नू और उनके जैसे सैंकड़ों खतरनाक जॉम्बी अमरीका और कनाडा की युनिवर्सिटियों एवं एनजीओज का सहारा पाकर पूरी दुनिया में अपने-अपने खतरनाक एजेण्डे चलाते हैं।

ऐसे सैंकड़ों उदाहरण दिए जा सकते हैं जो यह सिद्ध करने के लिए पर्याप्त हैं कि हम आरक्षण के लिए सड़कों पर आंदोलन करने वाले, जातीय जनगणना में अपनी मुक्ति का उपाय ढूंढने वाले, फ्री का आटा खाने वाले, फ्री की बिजली लेने वाले, सरकारी जमीनों पर कब्जा करने वाले जॉम्बी बना दिए गए हैं और जो लोग अभी तक जॉम्बी नहीं बन पाए हैं, उन्हें तेजी से जॉम्बी बनाने के षड़यंत्र चलाए जा रहे हैं।

देश में बड़ी संख्या में मजहब के नाम पर गला काटने वाले जॉम्बी घूम रहे हैं। सैंकड़ों जॉम्बी रेल की पटरियों पर पत्थर और गैस के सिलिण्डर रखकर ट्रेनें गिराने का प्रयास कर रहे हैं। ऐसे भयानक कार्य तो जॉम्बी ही कर सकते हैं जिन्हें इंसान का खून देखकर खुशी होती है।

हजारों जॉम्बी ढाबों और होटलों में रोटियों पर थूक रहे हैं, जूस में पेशाब कर रहे हैं, समोसों में चिकन और बीफ मिला रहे हैं।

बहुत से जॉम्बी मंदिरों के प्रसाद में गाय की चर्बी से बने घी की सप्लाई कर रहे हैं। तिरुपति मंदिर के वे प्रबंधक जो तीन सौ रुपए किलो घी खरीदकर लड्डू बनवा रहे थे, वे भी जॉम्बी नहीं हैं तो क्या हैं? क्या उन्हें पता नहीं है कि यदि घर में भी घी बनाया जाए तो सात सौ रुपए किलो से कम नहीं पड़ता? मंदिर के जॉम्बियों ने पूरे हिन्दू समाज का अनादर किया और उसे धोखे से गाय की चर्बी से बना प्रसाद खिलाया।

कुछ जॉम्बी मंदिरों के प्रसाद में पशुचर्बी से बना घी सप्लाई कर रहे हैं और कुछ जॉम्बी वीआईपी लाइन के माध्यम से सबसे पहले मंदिर में घुसकर उस प्रसाद को पा रहे हैं। क्योंकि उनकी जेब में रुपए नहीं हैं, डॉलर हैं! मैंने उन्हें जॉम्बी इसलिए भी कहा कि वे स्वयं को वीआईपी समझते हैं किंतु उन्हें समझ इतनी भी नहीं है कि जो लड्डू वे खा रहे हैं उसमें से पशुचर्बी की बदबू आ रही है।

भारत के हर शहर में जॉम्बियों की भीड़ थूक लगी रोटियों को खाने के लिए रेस्टोरेंटों के बाहर कतार लगाकर खड़ी है। जब मनुष्य यात्रा पर होता है, तब तो बाहर खाना मजबूरी होती है किंतु देश में करोड़ों जॉम्बी अपने घर में खाना बनाना अपनी शान के खिलाफ समझते हैं क्योंकि उनकी जेब में रुपया नहीं, डॉलर है।

कुछ जॉम्बी समोसों में मेंढक की टांग और कॉकरॉच डाल रहे हैं और बाकी के जॉम्बी मीडिया में रिपोर्टें देखकर भी ऐसे समोसों को ऑन लाइन ऑर्डर करके मंगवा रहे हैं। आजादी के बाद करोड़ों भारतीय परिवारों ने पैसा तो खूब बनाया, डिग्रियां भी हॉर्वर्ड-फार्वर्ड से ले लीं, कारें भी बड़ी-बड़ी खरीद लीं, कपड़े भी डिजाइनर पहनने शुरु कर दिए किंतु हम कब थूका हुआ चाटने वाले जॉम्बी बन गए, हमें पता ही नहीं चला!

हम इतने खतरनाक जॉम्बी हैं कि हम आज भी यह बात समझने को तैयार नहीं हैं कि केवल मंदिर में ही पशुचर्बी से बना घी सप्लाई नहीं होता होगा, भारत के न जाने कितने होटलों, रेस्टोरेंटों एवं ढाबों में पशुचर्बी से बना घी सप्लाई हो रहा होगा!

जॉम्बी बन जाने के कारण हम यह भी नहीं समझ पाते कि आज भारत के लोग जितना घी खा रहे हैं, क्या उतना घी हमें पशुओं के दूध से मिल सकता है? निश्चित रूप से बहुत सा घी पाम ऑइल और पशुचर्बी से बना हुआ है क्योंकि पशुओं से मिलने वाला अधिकांश दूध तो हम बिना घी निकाले ही दूध-दही के रूप में काम लेते हैं।

आज बहुत बड़ी संख्या में स्त्री और पुरुष दोनों ही खतरनाक जॉम्बी बनकर कमाते हैं, इसके लिए वे बहुत देरी से विवाह करते हैं, पति या पत्नी की जगह बॉयफ्रैंण्ड और गर्लफ्रैण्ड रखते हैं। ऐसे फ्रैण्ड कुछ ही सालों में एक दूसरे का मर्डर करने पर उतारू हो जाते हैं। यदि शादी कर लें तो भी बच्चा देरी से पैदा करते हैं। और पिज्जा-बर्गर खाने रेस्टोरेंट में जाते हैं, जहाँ वे पशुचर्बी से बना भोजन पाते हैं। तब भी हम समझ नहीं पाते कि हम इंसान कम और पैसे के पीछे भागने वाले जॉम्बी अधिक हैं।

कुछ ऐसे जॉम्बी भी हैं जो इंसान से अधिक कुत्ते से प्रेम करते हैं, अपने माता-पिता को साथ रखने की बजाय कुत्ते साथ में रखते हैं। जब उनका कुत्ता किसी इंसान को काटता है तो इन जॉम्बियों को दर्द नहीं होता किंतु यदि पीड़ित इंसान कुत्ते को लाठी दिखा देता है तो कुत्ता-प्रेमी खतरनाक जॉम्बी उन इंसानों के विरुद्ध पुलिस में एफआईआर दर्ज करवाते हैं। इन जॉम्बियों को पड़ौसी से अच्छे सम्बन्ध नहीं चाहिए, कुत्ते से अच्छे सम्बन्ध चाहिए।

ऐसी हजारों बातें हैं जिनसे यह पता लगता है कि हम जॉम्बी बन रहे हैं, या बन चुके हैं किंतु हम समझ नहीं पाते।

हम कुछ भी समझ क्यों नहीं पाते? क्योंकि सोरोस जैसे अनगिनत लोग जो तरह-तरह के एनजीओ बनाकर आदमियों की हथेलियों पर डॉलर थूकते हैं, उस डॉलर को चाटने वाले जॉम्बियों की भीड़ अमरीका और कनाडा के हर शहर में घूम रही है। वे बड़े-बड़े जॉम्बी भारत में छोटे-छोटे खतरनाक जॉम्बी बनाने का काम करते हैं। हमें भी किसी न किसी प्रकार का जॉम्बी बनाया जा चुका है और हमें स्वयं यह बात मालूम नहीं है।

हम जॉम्बी कैसे हैं, इसे समझने के लिए यह समझना आवश्यक है कि यदि हमने स्वयं कमाकर खाने का, स्वयं मेहनत करके खाने का, घर में रोटी बनाकर खाने का, गुरु बनाओ जानकर और पानी पियो छानकर वाला पुराना सिद्धांत नहीं अपनाया तो हम खतरनाक जॉम्बी ही बने रहेंगे और सोचते रहेंगे कि एक दिन 3 प्रतिशत लोग जो भारत की 90 प्रतिशत सम्पत्ति लिए बैठे हैं, वह अमरीका और कनाडा में बैठे जॉम्बी हमें दिलवा देंगे और इस चक्कर में हम अपने देश की बची-खुची सुख शांति भी लुटा बैठेंगे! हम कभी नहीं समझ पाएंगे कि ये आंकड़े हमें खतरनाक जॉम्बी बनाने के लिए हमारे दिमागों में डाले गए हैं!

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

विपक्षी ईको सिस्टम – गुण्डे के प्राण बाद में निकलते हैं, जाति पहले निकलती है!

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विपक्षी ईको सिस्टम - www.bharatkaitihas.com
विपक्षी ईको सिस्टम

भारत में गुण्डों की मौत पर बड़ी अजीब सी राजनीति होती है। गुण्डों के पक्ष में पूरा विपक्षी ईको सिस्टम खड़ा हुआ दिखाई देता है। संसार में ऐसा शायद ही कहीं होता हो!

उत्तर प्रदेश में इन दिनों गोली-गोली पर लिखा है गुण्डे का नाम। पुलिस की गोलियां गुण्डों की टांगों का पीछा कर रही हैं जिनके कारण गुण्डे व्हील चेयर पर बैठकर अस्पतालों से निकलते हुए दिखाई देते हैं। वे हाथ जोड़ते हैं, गिड़गिड़ाते हैं और रो-रो कर कहते हैं कि अब वे कभी गुण्डागर्दी नहीं करेंगे। ऐसे दृश्य आजकल नित्य ही दिखाई देते हैं।

कुछ गोलियां ऐसी भी हैं जो एनकाउण्टर के समय गुण्डों की टांगों को माफ करके, सीधे उनकी छाती में विश्राम करने पहुंच जाती हैं। गोली अंदर और गुण्डे की जाति बाहर। गुण्डे के प्राण बाद में निकलते हैं, उसकी जाति पहले निकलती है।

यही कारण है कि गुण्डे को गोली लगते ही विपक्षी पार्टियों के नेताओं को स्वतः पता लग जाता है कि मरने वाले गुण्डे की जाति क्या थी!

जिस गुण्डे की जैसी जाति होती है, उसकी मौत की प्रतिध्वनि भी वैसी ही गूंजती है।

यदि पुलिस की गोली किसी बनिया, ब्राह्मण, ठाकुर, कायस्थ, पंजाबी, खत्री, जाट, गूजर, आदि जाति के गुण्डे के लगी है तो कोई बात नहीं, उस गुण्डे की छाती से निकली जाति की प्रतिध्वनि या तो होती ही नहीं है, और यदि होती भी है तो इतनी कम होती है कि लोगों तक उसकी गूंज नहीं पहुंचती।

यदि मरने वाले गुण्डे की जाति दलित होती है, तो उसकी प्रतिध्वनि चारों ओर गूंजती है। पूरा ईको सिस्टम चीखने लगता है। यह सिद्ध करने के लिए कि सरकार दलित विरोधी है, विपक्षी पार्टियों को पूरा अवसर मिल जाता है। विपक्ष का ईको सिस्टम इस बात की चर्चा तक नहीं करता कि मरने वाला कितना बड़ा गुण्डा था! केवल इस बात की चर्चा करता है कि मरने वाला दलित था!

यदि पुलिस की गोली से मरने वाला गुण्डा यादव जाति का है, तब तो उत्तर प्रदेश में सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी के नेता अखिलेश यादव पूरे जोश के साथ योगी सरकार पर पिल पड़ते हैं, महंत को माफिया बताते हैं। गुण्डे को निर्दोष बताते हैं, एनकाउंटर को हत्या बताते हैं। आखिर उस गुण्डे को पुलिस कैसे मार सकती है जिसकी जाति अखिलेश यादव को सबसे अधिक वोट देती है, जो समाजवादी पार्टी का कोर वोटर है!

पुलिस की गोली से मरने वाला गुण्डा यदि मुसलमान हुआ, फिर तो कहना ही क्या है, गुण्डे की छाती में घुसी गोली की प्रतिध्वनि कश्मीर की महबूबा से लेकर, लखनऊ में अखिलेश तक, दिल्ली में राहुल-प्रियंका तक, पटना में तेजस्वी तक, पश्चिमी बंगाल में ममता बनर्जी तक, राजस्थान में अशोक गहलोत तक और हैदराबाद में असदुद्दीन ओबैसी तक के कण्ठ से निकलती है।

पूरा ईको सिस्टम एक सुर में चिल्लाता है! मरने वाला अल्पसंख्यक था, केवल यही बार-बार दोहराया जाता है, मरने वाला गुण्डा था, पुलिस पर गोलियां चला रहा था, पुलिस ने आत्मरक्षा में गोलियां चलाईं, इन बातों की चर्चा तक नहीं होने दी जाती।

ईको सिस्टम के लिए गुण्डा, गुण्डा नहीं है, वह मतदाता है, किसी राजनीतिक पार्टी के लिए वोटों का दूध देने वाला पशु है।

ईको सिस्टम की धूर्त राजनीति को यदि प्याज की पर्तों की तरह खोलकर देखा जाए तो कोई भी वह व्यक्ति जिसे इंसानियत समझ में आती है, वह आसानी से समझ जाएगा कि ईको सिस्टम स्वयं ही चाहता है कि पुलिस उन गुण्डों को गोली मारती रहे जो गुण्डे मरने के बाद विपक्षी ईको सिस्टम को वोटों की फसल दे सकें।

जब तक पुलिस किसी गुण्डे को गोली नहीं मारती, तब तक वह गुण्डा पर्दे के पीछे ईको सिस्टम के लिए काम करता रहता है और जैसे ही किसी गुण्डे को गोली मारी जाती है तो मरा हुआ हाथी सवा लाख का हो जाता है। वोटों का खलिहान नई कटी हुई फसल से भर जाता है!

केवल गुण्डे को गोली मारने के मामले में ही नहीं, अपितु किसी लड़की के साथ बलात्कार के मामले में भी ऐसी ही घिनौनी राजनीति होती है। यदि सवर्ण जाति की अथवा किसी ऐसी जाति की लड़की के साथ बलात्कार हुआ है जो ईको सिस्टम की वोटर नहीं है तो ईको सिस्टम उसकी चर्चा तक नहीं करता किंतु यदि बलात्कार ईको सिस्टम को वोट देने वाली जाति की लड़की का हुआ है तो ईको सिस्टम चीखने-चिल्लाने में कोई कसर नहीं छोड़ता।

जब किसी गुण्डे के अवैध घर पर बुलडोजर चलता है, तब भी विपक्षी पाटियों का ईको सिस्टम गुण्डे की जाति क्या थी, इसे लेकर चीखने-चिल्लाने लगता है। न्यायालयों में जाकर रोता-पीटता है।

खुशी जूस सेंटर एवं महादेव रेस्टोरेंट आदि नामों से चल रहे ठेलों एवं ढाबों के संचालक जो कि जूस में पेशाब मिलाते हैं, समोसे के मसाले में गाय का मांस मिलाते हैं, रोटी पर थूकते हैं के विरुद्ध यदि योगी सरकार केवल इतना आदेश देती है कि अपनी दुकान या ठेले पर संचालक का वास्तविक नाम लिखें तो ईको सिस्टम उछलकर सामने आता है और कोर्ट में जाकर स्टे ले आता है।

क्या विपक्षी पार्टियों का ईको सिस्टम यह नहीं समझता कि थूक और पेशाब मिला हुआ जूस एक न एक दिन उनके अपने कण्ठ से नीचे उतरेगा, उनके बच्चों और उनके माता-पिता और पत्नी के कण्ठ से नीचे उतरेगा!

यह कितनी घृणित बात है कि वोटों की राजनीति के लिए ईको सिस्टम अपने अल्पसंख्यक भाइयों का थूक चाटने और पेशाब पीने के लिए तैयार है! समोसे में मिला मांस खाने को तैयार है!

जब उद्धव ठाकरे, कांग्रेस एवं एनसीपी की महाअघाड़ी गठबंधन सरकार के समय महाराष्ट्र के पालघर में तीन साधुओं की हत्या की गई तो ईको सिस्टम मुंह पर टेप लगाकर बैठ गया, हिन्दू संगठन चिल्लाते रहे किंतु नक्कारखाने में तूती की आवाज सिद्ध हुए।

अब जबकि एकनाथ शिंदे की सरकार के समय महाराष्ट्र में तीन मासूम लड़कियों का यौन उत्पीड़न करने वाले गुण्डे अक्षय शिंदे ने पुलिस की रिवॉल्वर छीनकर एक सहायक इंसपेक्टर को गोली मार दी और पास ही बैठे संजय शिंदे नामक पुलिस इंसपेक्टर ने अक्षय शिंदे की छाती में छोटी सी, प्यारी सी गोली उतार दी तो पूरा ईको सिस्टम एक सुर में चीखने लगा कि अक्षय शिंदे को इसलिए गोली मारी गई क्योंकि वह दलित है।

विपक्षी ईको सिस्टम इस बात की चर्चा तक नहीं करना चाहता था कि अक्षय शिंदे की छाती में गोली उतरने का घटनाक्रम कैसे घटित हुआ था। ईको सिस्टम इस बात की भी चर्चा नहीं करना चाहता कि गुण्डे की छाती में गोली उतारने वाला पुलिस इंस्पेक्टर भी शिंदे है और महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री भी शिंदे हैं।

विपक्षी ईको सिस्टम यह देखना भी नहीं चाहता कि अक्षय शिंदे को गोली मारे जाने की खबर सुनकर महाराष्ट्र की जनता ने कितनी खुशियां मनाई हैं तथा औरतों ने सड़कों पर निकल कर मिठाइयां बाटीं हैं। ईको सिस्टम जानता है कि गुण्डों की मौत पर खुशी मनाने वाले लोग तथा मिठाई बांटने वाली औरतें कभी भी विपक्षी ईको सिस्टम को वोट नहीं देंगी!

ईको सिस्टम इतना चालाक है कि जब कांग्रेस के महान नेता राहुल गांधी और समाजवादी पार्टी के और भी महान नेता अखिलेश यादव से कोई पत्रकार कभी ऐसा सवाल करता है जिससे ईको सिस्टम को कोई कठिनाई हो तो ये लोग उस पत्रकार से पूछते हैं कि तेरी जाति क्या है?

ईको सिस्टम पुलिस की गोली से मरने वाले गुण्डे से लेकर, गोली मारने वाले पुलिस अधिकारी और पब्लिक में सवाल उठाने वाले पत्रकार तक की जाति पूछता है किंतु अपनी जाति नहीं बताता। पता नहीं क्यों नहीं बताता! अपनी जाति बताने में किसी को क्या शर्म हो सकती है! आखिर इस जाति को ही तो आपने अपनी जिंदगी का आधार बना रखा है।

ईको सिस्टम गलत भौंकाल पैदा करके अपना स्वार्थ भले ही सिद्ध कर रहा हो किंतु इससे किसी दलित, यादव अथवा मुसलमान का भला नहीं होता। मीडिया में बार-बार इन जातियों के नाम उछालकर ईको सिस्टम इन जातियों को बदनाम ही कर रहा है।

यदि मुसलमानों को छोड़ दिया जाए जो कि वैश्विक एजेंडे पर काम कर रहे हैं, यादव एवं दलित जातियों में भी उतने ही अपराधी हैं जितने कि समाज की अन्य जातियों अथवा उच्च वर्ण जातियों में हैं। फिर ईको सिस्टम दलितों एवं यादवों को क्यों बदनाम कर रहा है?

ईको सिस्टम के दूसरी ओर उत्तर प्रदेश के निस्पृह एवं निरपेक्ष मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी खड़े हैं जिनकी पुलिस गुण्डों की छातियों में बड़े प्यार से गोलियां उतार रही है। बिना यह देखे कि गुण्डे की जाति क्या है। और योगीजी हैं कि मीडिया में आकर आत्मविश्वास और सामर्थ्य से भरी मनमोहक मुस्कान देते हैं मानो विपक्षी ईको सिस्टम को संदेश दे रहे हों कि हे प्यारे विपक्ष तुम गुण्डे की जाति ही पूछते रहो! तुम यह कभी मत देखो कि वह गुण्डा कितना बड़ा अपराधी था, समाज का शत्रु था, और गोली का प्रयोग विधिसम्मत और परिस्थितिवश ही किया गया है।

हे प्यारे विपक्षी ईको सिस्टम तुम यह भी मत देखो उस गुण्डे के मरने पर पब्लिक कितनी मिठाइयाँ बांट रही है और झोली भर-भर का आशीर्वाद दे रही है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

डॉ. मोहन भागवत की बातें आधी-अधूरी सी लगती हैं!

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डॉ. मोहन भागवत

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सर संघचालक डॉ. मोहन मधुकर भागवत सार्वजनिक मंचों पर दिए गए भाषणों के माध्यम से हिन्दुओं को उनका धर्म स्मरण कराते रहते हैं। मैं भी हिन्दू हूँ तथा बचपन से ही संघ के संस्कारों में पला-बढ़ा हूँ, डॉ. हेडगवार, गुरु गोलवलकर, छत्रपति शिवाजी महाराजा और वीर विनायक दामोदर सावरकर के चित्रों को देख-देखकर बड़ा हुआ हूँ और आरएसएस को हिन्दुओं की सबसे अच्छी, सबसे बड़ी, अनुशासित और अनुकरणीय संस्था मानकर आरएसएस में श्रद्धा रखता हूँ।

इसलिए मैं भी डॉ. मोहन भागवत की बातों को बहुत ध्यान से सुनता हूँ किंतु मुझे हमेशा से लगता है कि डॉ. मोहन भागवत की बातें आधी-अधूरी हैं। इन बातों से हिन्दू जाति का और भारत राष्ट्र का कल्याण होगा, इसमें मुझे संदेह है। आज से नहीं, जब से डॉ. मोहन भागवत सर संघचालक के रूप में सार्वजनिक रूप से बोल रहे हैं, तभी से मुझे उनकी बातों पर संदेह है। मैं अपना संदेह पहले भी कई आलेखों में व्यक्त कर चुका हूँ।

15 सितम्बर 2024 को जयपुर में स्वयंसेवकों के एकत्रीकरण कार्यक्रम में डॉ. मोहन भागवत ने कहा कि हमें अपने राष्ट्र को समर्थ करना है। हमने प्रार्थना में ही कहा है कि यह हिंदू राष्ट्र है क्योंकि हिंदू समाज इसका उत्तरदायी है। इस राष्ट्र का अच्छा होता है तो हिंदू समाज की कीर्ति बढ़ती है।

इस राष्ट्र में कुछ गड़बड़ होता है तो इसका दोष हिंदू समाज पर आता है, क्योंकि वे ही इस देश के कर्ताधर्ता हैं। राष्ट्र को परम वैभव संपन्न और सामर्थ्यवान बनाने का काम पुरुषार्थ के साथ करने की आवश्यकता है और हमें समर्थ बनना है, जिसके लिए पूरे समाज को योग्य बनाना पड़ेगा।’

डॉ. भागवत ने कहा कि जिसे हम हिंदू धर्म कहते हैं यह वास्तव में मानव धर्म है, विश्व धर्म है और सबके कल्याण की कामना लेकर चलता है। हिंदू का अर्थ विश्व का सबसे उदारतम मानव, जो सब कुछ स्वीकार करता है, सबके प्रति सद्भावना रखता है। पराक्रमी पूर्वजों का वंशज है जो विद्या का उपयोग विवाद पैदा करने के लिए नहीं करता, ज्ञान देने के लिए करता है। हिंदू धन का उपयोग मदमस्त होने के लिए नहीं करता, दान के लिए करता है और शक्ति का उपयोग दुर्बलों की रक्षा के लिए करता है। यह जिसका शील है, यह जिसकी संस्कृति है वह हिंदू है। चाहे वह पूजा किसी की भी करता हो, भाषा कोई भी बोलता हो, किसी भी जात-पात में जन्मा हो, किसी भी प्रांत का रहने वाला हो, कोई भी खानपान, रीति रिवाज को मानता हो। ये मूल्य और संस्कृति जिनकी है, वे सब हिंदू हैं।

डॉ. मोहन भागवत की इन बातों से मुझे काई आपत्ति नहीं है। ये सारे विचार स्तुत्य हैं और हिन्दू धर्म का मूल हैं। हिन्दू को ऐसा ही होना चाहिए किंतु इससे आगे क्या……? क्या यह सहिष्णुता हिन्दू धर्म की रक्षा करने में समर्थ है? क्या हिन्दू की उदारता राष्ट्र की सुरक्षा करने में समर्थ है? डॉ. मोहन भागवत की इन बातों में न तो ऐसे प्रश्नों को उठाया जाता है और न उनका समाधान देने का प्रयास किया जाता है।

इसी कारण मुझे लगता है कि मोहन भागवन अपनी बातों को आधी-अधूरी छोड़ देते हैं। सहिष्णु तो खरगोश और हिरण भी हैं वे भी जंगल के किसी प्राणी के दाना-पानी पर अपना अधिकार नहीं जमाते तो क्या हिंसक जंगली जानवर खरगोशों और हिरणों को जीवित छोड़ देते हैं, पलक झपकते ही मारकर खा जाते हैं!

सहिष्णु तो धरती माता भी है जो सबको धारण करती है, सबका पेट पालती है इस पर क्या संसार के समस्त मानव धरती को अपनी माता मानकर उसकी रक्षा करते हैं, पलक झपकते ही इस पर बारूद और एटम बम फोड़कर धरती को दहला देते हैं!

सहिष्णु और उदार तो गंगाजी भी हैं, बिना किसी भेदभाव के लोक-लाभ और परलोक निबाहू के सिद्धांत पर अटल रहती हैं। लोग अपने घरों में गंगाजल रखते हैं तथा मरते समय मुख में गंगाजल लेकर मरते हैं, तो क्या बुरे लोग गंगाजी में मल-मूत्र छोड़ने से बाज आ जाते हैं। मृत पशुओं के शव बहाने से बाज आ जाते हैं!

ऐसे सैंकड़ों-हजारों उदाहरण दिए जा सकते हैं।

हाल ही में बाबा बागेश्वर ने आदि जगत्गुरु शंकराचार्य की तरह पूरे भारत में हिन्दू एकता यात्रा पर निकलने की घोषणा की है। अर्थात् बाबा बागेश्वर को पता है कि हिन्दू धर्म और भारत राष्ट्र की रक्षा के लिए उदारता और सहिष्णुता जैसे सिद्धांत पर्याप्त नहीं हैं। क्योंकि ये सिद्धांत तो हिन्दू धर्म के पास सदियों से हैं, तो फिर हिन्दू पूरी धरती से सिमटता-सिकुड़ता क्यों जा रहा है?

उदारता और सहिष्णुता तो बांगला देश के हिन्दुओं में भी थी, फिर उन्हें क्यों नष्ट किया जा रहा है। इस्कॉन मंदिर आज भी बांगलादेश में गंगाजी की बाढ़ से पीड़ित लोगों को धर्म का भेद किए बिना पूड़ी-सब्जी बांट रहा है किंतु इस्कॉन मंदिर के सामने ही उदार और सहिष्णु हिन्दुओं को गाजर-मूली की तरह मारा जा रहा है!

भगवान राम और सीता के वनगमन के समय का एक प्राचीन आख्यान है जिसमें सीताजी रामजी से कहती हैं कि आपको वन्यपशुओं का आखेट करके हिंसा नहीं करनी चाहिए। अपने धनुष-बाण त्याग देने चाहिए। इसके उत्तर में रामजी कहते हैं कि मैं आपको छोड़ सकता हूँ किंतु मैंने ऋषियों की रक्षा के लिए जो प्रतिज्ञा की है, उसे नहीं छोड़ सकता। ऋषि-मुनियों की रक्षा करने के लिए मुझे अपने शस्त्रों का अभ्यास निरंतर करना पड़ेगा ताकि मैं राक्षसों का संहार कर सकूं।

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कुछ दिन पहले ही प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने संसद में कहा था कि अब सनानत को भी सोचना पड़ेगा। सनातन को क्या सोचना पड़ेगा, बिना बताए ही यह बात सब जानते हैं। प्रधानमंत्री मोदी हिन्दू समाज की दुर्दशा से क्यों व्यथित हैं, यह किसी से छिपा हुआ नहीं है।

डॉ. मोहन भागवत ने अपने जयपुर के भाषण में यह भी कहा कि पहले संघ को न कोई नहीं जानता था और न कोई मानता था किंतु अब सब जानते भी हैं और मानते भी हैं। हमारा विरोध करने वाले भी जीभ से तो विरोध करते हैं किंतु मन से तो मानते ही हैं। इसलिए अब हमें हिंदू धर्म, हिंदू संस्कृति और हिंदू समाज का संरक्षण राष्ट्र की सर्वांगीण उन्नति के लिए करना है।

बिल्कुल ठीक बात है कि हमें हिन्दू धर्म, समाज एवं संस्कृति की उन्नति राष्ट्र की उन्नति के लिए करनी है किंतु क्या मोहन भागवत की यह बात सही है कि अब विरोधी भी आरएसएस को मन से मान रहे हैं? क्या मान रहे हैं? कौन मान रहे हैं? क्या राहुल गांधी, अखिलेश यादव, ममता बनर्जी और दिग्विजय सिंह जैसे नेता आरएसएस को मान रहे हैं?

यदि विरोधी भी संघ की शक्ति को, सिद्धांतों को, आदर्श को मान रहे हैं तो हिन्दू विरोधी मानसकता से ग्रस्त राजनीतिक पार्टियाँ, सोरोस के द्वारा खरीदे गए लोग आरएसएस पर आए दिन यह आरोप क्यों लगाते हैं कि बीजेपी और आरएसएस समाज को तोड़ने का काम करती हैं। यदि लोग संघ के हाथ में पकड़ी हुई लाठी को मान रहे हैं तो फिर हिंसक एवं विरोधी मानसिकता के लोग रामनवमी की शोभायात्रा से लेकर गणेश पाण्डाल एवं दुर्गापूजा के पाण्डालों पर पत्थर क्यों फैंके रहे हैं?

यदि विरोधी लोग हिन्दुओं की उदारता और सहिष्णुता को मान रहे हैं, तो फिर आए दिन बाजार में बिकने वाली खाद्य वस्तुओं में थूकने, पेशाब करने, गाय का मांस मिलाने जैसे घटनाएं क्यों घट रही हैं?

कुछ माह पहले भारत के एक बड़े प्रतिष्ठित संत, जहाँ तक मुझे स्मरण है श्री अवधेशानंदजी ने यह घोषणा की थी कि यदि हिन्दू धर्म पर संकट आया तो मेरे लाखों नागा साधु आपको देश के बॉर्डर पर मिलेंगे। क्यों मिलेंगे, क्या वे वहाँ शत्रुओं को उदारता और सहिष्णुता का विचार बांटने जाएंगे? या फिर हिन्दू धर्म की रक्षा के लिए अपने प्राणों का बलिदान देने जाएंगे। स्पष्ट है कि राष्ट्र की रक्षा करने के लिए मरने और मारने जाएंगे!

संसार के प्रत्येक प्राणी को चाहे वह पशु हो या मनुष्य, उसे अपना जीवन सुरक्षित बनाने के लिए केवल उदारता और सहिष्णुता नहीं चाहिए, इसकी एक सीमा है। सहिष्णुता और उदारता तभी सफल है जब दूसरे भी आपके इन गुणों में विश्वास रखते हों, जहाँ सिर धड़ से अलग किए जा रहे हों, वहाँ सहिष्णुता और उदारता कब तक किसी प्राणी की रक्षा कर सकते हैं?

रामधारीसिंह दिनकर ने लिखा है- क्षमा शोभती उस भुजंग को जिसके पास गरल हो, उसको क्या जो दंतहीन विषहीन विनीत सरल हो!

यर्जुवेद कहता है- तेजोऽसि तेजो मयि धेहि वीर्यमसि वीर्यं महि धेहि बलमसि बलं मयि धेहि ओजोऽसि ओजो मयि धेहि मन्युरसि मन्यु मयि धेहि सहोऽसि सहो मयि धेहि अस्यो जो मम देहि।

अर्थात् हे परमात्मा! आपमें जो गुण हैं, वे मुझे दें। आपमें तेज है, मुझे तेज दें! आपमें वीरता है मुझे वीरता दें, आपमें बल है मुझे बल दें, आप में ओज है मुझे ओज दें, आप में क्रोध है मुझे क्रोध दें, आप में सहिष्णुता है आप मुझे सहिष्णुता दें। इस प्रकार वेद भी सहिष्णुता के साथ क्रोध की आवश्यकता को स्वीकार करता है। फिर हम केवल उदारता और सहिष्णुता की बात करके अपनी बात अधूरी क्यों छोड़ देते हैं?

प्रकृति के सत्य बड़े कठोर हैं, हिन्दू समाज को उनसे भी परिचित होना चाहिए। गुलाब के ठीक नीचे कांटे लगे रहते हैं। गुलाब सुगंध छोड़ता है और कांटा चुभन देता है। यदि गुलाब की झाड़ी को बरसों-बरस जीवित रहकर फूलों की सुगंध छोड़ते रहना है तो उसे अपनी शाखाओं पर चुभने वाले कांटे भी धारण करने होंगे। कांटा जबर्दस्ती किसी को जाकर नहीं चुभता अपितु उसे चुभता है जो गुलाब तोड़ने के लिए गुलाब की झाड़ी की तरफ हाथ बढ़ाता है।

कोई हिन्दू यह नहीं कह सकता कि हिन्दू को कांटे जैसा कठोर बनना चाहिए किंतु कांटे से ही कांटा निकाला जा सकता है, इसे भी समझना चाहिए। हिन्दू सहिष्णु है इसका अर्थ केवल इतना है कि किसी का गला नहीं उतारना है अपितु अपना गला भी तो बचाना है, उसके लिए भी तो हिन्दू में समझ, शक्ति एवं प्रयास का तत्व मौजूद होना चाहिए!

आज ही अर्थात् 16 सितम्बर 2024 को आदित्यनाथ योगी ने कहा है कि कृष्ण के होठों पर मुरली अच्छी लगती है किंतु उनके हाथों में सुदर्शन चक्र भी चाहिए। डॉ. मोहन भागवत को भी ऐसी बातें हिन्दू जाति को बतानी चाहिए। आखिर वे भी हिन्दू समाज के अग्रणी पुरुष हैं, हिन्दू जाति के संरक्षक हैं!

मेरा डॉ. मोहन भागवत से कोई विरोध नहीं है। वे संसार का सबसे बड़ा गैर सरकारी संगठन चला रहे हैं और बिना किसी भेद-भाव एवं विवाद के चला रहे हैं। इस देश को राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की बहुत आवश्यकता है। मैं केवल इतना कहना चाहता हूँ के सर संघचालक हिन्दुओं का पूरा मार्गदर्शन करें, आधा-अधूरा नहीं। हिन्दू जाति को सहिष्णुता और उदारता के साथ-साथ कम से कम इतना तेज और क्रोध भी धारण करने के लिए कहें जिससे हिन्दू जाति अपनी रक्षा कर सके।

डॉ. मोहन भागवत से अधिक इस बात को कौन जानता होगा कि हिन्दू जाति कितने खतरे में है, हर शहर, हर गांव, हर गली में एक भेड़िया घूम रहा है जो दबे पांव हिन्दू लड़कियों की तरफ बढ़ रहा है। पलक झपकते ही हिन्दू लड़की गायब हो जाती है। मैं जानता हूँ कि आरएसएस की शक्ति क्या है! जिस दिन मोहन भागवत हुंकार भरेंगे, सारी हिन्दू लड़कियां भेड़ियों की पहुंच से दूर हो जाएंगी। भेड़िए दूर तक भी दिखाई नहीं देंगे! प्रश्न केवल इतना सा है कि डॉ. मोहन भागवत ऐसा कब चाहेंगे?

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुसलमानों से अन्याय क्यों किया अकबर ने! (142)

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मुसलमानों से अन्याय

सोलहवीं शताब्दी ईस्वी के मुस्लिम उलेमा एवं मुल्ला-मौलवी (Ulema and Mullah-Maulvi) तो यह मानते ही थे कि अकबर (Akbar) ने मुसलमानों से अन्याय किया किंतु यह देखकर हैरानी होती है कि बीसवीं सदी के लेखक एवं भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू (Jawahar Lal Nehru) भी यह मानते थे कि अकबर ने मुसलमानों से अन्याय किया। 

पं. जवाहरलाल नेहरू ने लिखा है- ‘देखा जाए तो राजपूतों को और अपनी हिंदू प्रजा को मनाने के लिए कभी-कभी तो अकबर इतना आगे बढ़ जाता था कि मुसलमान प्रजा के साथ अक्सर अन्याय हो जाता था।’

नेहरू ने अकबर द्वारा मुसलमानों से अन्याय (Injustice against Muslims) का कोई उदाहरण नहीं दिया है किंतु इतिहास की पुस्तकें उन उदाहरणों से भरी पड़ी हैं जिनमें अकबर द्वारा अपने ही उन मुस्लिम सेनापतियों के प्रति नृशंसतापूर्वक व्यवहार किया गया जिन्होंने अकबर के विरुद्ध बगावत करने का दुःस्साहस किया। अकबर की तरफ से इस अन्याय की शुरुआत खानखाना बैराम खाँ (Bairam Khan) को उसके पद से हटाने के साथ ही आरम्भ हो गई थी।

अकबर ने अपने चचेरे भाई अबुल कासिम को केवल इस भय से मरवा दिया कि किसी दिन यह शाही-तख्त का दावेदार न बन जाए। अकबर ने अपने धायभाई आदम खाँ को किन्नरों द्वारा छत से गिरवाकर मरवाया। जब आदम खाँ मर गया तब अकबर ने किन्नरों को आदेश दिए कि वे आदम खाँ के शव को महल की छत पर लाएं और उसे फिर से गिराएं। मुगलों के इतिहास में ऐसी नृशंसता का दूसरा उदाहरण उपलब्ध नहीं है।

इतिहासकार पी. एन. ओक (P. N. Oak) ने लिखा है- ‘अकबर के अधिकारियों द्वारा खानेजमां के विद्रोह को दबाने के लिए खानेजमां के विश्वासपात्र मोहम्मद मिरक को वधस्थल पर पांच दिन तक निरंतर यातनाएं दी गईं। प्रत्येक दिन एक लकड़ी के कटघरे में उसकी मुश्कें बांधकर उसे हाथी के सामने लाया जाता था।

हाथी उसे सूंड से पकड़ता, झकझोरता और दूसरी ओर उछाल देता।’ अकबर ने सूरत के घेरे में अपने पिता हुमायूँ के पुराने सेवक हम्जाबान को दण्ड नहीं देने का वचन देकर उसकी जीभ कटवा ली! अकबर के आदेश से अकबर के निकट सम्बन्धी मसूद हुसैन मिर्जा की आंखों को सुई से सीं दिया गया। उसके तीन सौ सहायकों के चेहरों पर गधों, भेड़ों और कुत्तों की खालें चढ़ाकर अकबर के सम्मुख घसीट कर लाया गया था। उनमें से कुछ को अत्यंत घृणित क्रूर कर्मों सहित मारा गया।’

यदि एक बादशाह द्वारा किसी मुसलमान बागी को दण्डित करना मुसलमानों से अन्याय की श्रेणी में आता है तो अकबर पर लगाया गया यह आरोप सही है किंतु इतिहास गवाह है कि किसी बादशाह के लिए बागी का मजहब देखकर उसके लिए दण्ड निर्धारित करना कठिन है।

इतिहासकार स्मिथ ने लिखा है- ‘अकबर को अपने तातारी पूर्वजों से पैतृक रूप में ग्रहीत ऐसी बर्बरताओं की अनुमति देते हुए देखकर अत्यंत घृणावश जी ऊब जाता है।’

सुप्रसिद्ध इतिहासकार पी. एन. ओक ने लिखा है- ‘बंगाल के शासक दाऊद खाँ (Daud Khan Karrani of Bengal) को परास्त करने के बाद अकबर के सेनापति मुनीर खाँ (मुनीम खाँ अथवा मुनअम खाँ) ने शत्रु सैनिकों के सिर कटवा दिए तथा उन कटे हुए सिरों की ऊँची-ऊँची आठ मीनारें बनवाईं। इनमें से अधिकतर सिर मुसलमान सैनिकों के थे। जब दाऊद खाँ ने प्यास से व्याकुल होकर पानी मांगा तो अकबर के सैनिकों ने दाऊद को जूतियों में भरकर पानी दिया।’

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अकबर ने अहमदाबाद में मिर्जाओं को परास्त करने के बाद 2,000 से अधिक कटे हुए सिरों की मीनार बनवाई थी। इन कटे हुए सिरों में भी अधिकांश सिर मुसलमान सैनिकों के थे और उन मुसलमान सैनिकों के भी थे जो अकबर की तरफ से लड़ते हुए मरे थे। अकबर द्वारा मुस्लिम विद्रोहियों के प्रति की गई सख्ती के और भी बहुत से उदाहरण हैं किंतु केवल इतने उदाहरण पंडित नेहरू की इस बात को सही ठहराने के लिए पर्याप्त हैं कि अकबर के हाथों मुसलमान प्रजा के साथ अक्सर अन्याय हो जाता था। हालांकि नेहरू ने लिखा है कि अकबर द्वारा राजपूतों को मनाने के लिए ऐसा किया जाता था, किंतु इतिहास में एक भी उदाहरण ऐसा नहीं है जब अकबर ने किसी राजपूत राजा को मनाने के लिए मुसलमानों से अन्याय किया हो!नेहरू ने लिखा है कि अकबर ने खुद अपना विवाह एक ऊंचे राजपूत घराने की लड़की से किया। बाद में उसने अपने पुत्र का विवाह भी एक राजपूत लड़की से किया और उसने ऐसी मिली-जुली शादियों को बढ़ावा दिया। बहुत से लोग यह प्रश्न भी उठाते हैं कि यदि अकबर धर्म-सहिष्णु था तो उसने एक भी मुगल शहजादी का विवाह किसी हिन्दू राजकुमार के साथ क्यों नहीं किया! सच्चाई तो यह है कि अकबर ने मुगल शहजादियों के विवाह पर भी रोक लगा दी थी।

वे किसी से भी विवाह नहीं कर सकती थीं, न मुगल शहजादे से, न तुर्क लड़ाके से और न हिन्दू राजकुमार से।

क्या केवल इसलिए अकबर को महान ठहराया जा सकता है कि उसने कुछ हिंदू राजकुमारियों से विवाह किए तथा हिंदू राजाओं को बड़े-बड़े मनसब देकर उन्हें मुगल सल्तनत की सीमाओं के विस्तार के काम में लगाए रखा! अकबर के खाते में इससे अधिक कुछ भी हासिल-जमा नहीं है। मीना बाजार सजाकर उनमें औरतों का सौदा करने, अपने हरम में देश-विदेश की पांच हजार औरतों को इकट्ठा करने, ईद और नौरोजे के साथ होली एवं दीवाली के त्यौहारों का आनंद उठाने में यदि इतिहासकारों को किसी बादशाह में महानता के लक्षण दिखाई देने लगते हैं, तो फिर किया ही क्या जा सकता है!

अकबर कितना महान् था (How great was the Akbar) , इस बात की सच्चाई इस तथ्य से भी मिलती है कि अकबर के पुत्र भी अकबर से नाराज रहते थे। राजकिशोर शर्मा ‘राजे’ ने अपनी पुस्तक हकीकत ए अकबर में लिखा है कि अकबर के पुत्र भी अकबर से प्रसन्न नहीं रहते थे। इतिहास गवाह है कि सलीम (Saleem / Jahangir) जीवन भर अपने पिता अकबर से रुष्ट रहा और समय-समय पर बगावत करता रहा। यहाँ तक कि सलीम ने अपने मन का गुस्सा निकालने के लिए अकबर के नौकरों को इतना पीटा के उनमें से कुछ तो नपुंसक हो गए और कुछ मृत्यु को प्राप्त हुए। सलीम अपने पिता अकबर से इतना नाराज था कि सलीम ने अकबर के मित्र अबुल फजल की हत्या ही करवा दी।

राजकिशोर शर्मा ‘राजे’ ने लिखा है कि जब अकबर का मंझला पुत्र मुराद (Murad Baksh) अहमदनगर पर आक्रमण के दौरान बीमार पड़ा और अकबर ने उसे अपने पास बुलाना चाहा तो वह विभिन्न बहाने करके नहीं आया और वहीं मर गया। इसी तरह अकबर के दूसरे बेटे दानियाल ने भी दक्षिण में बीमार पड़ने पर पिता के बार-बार बुलाने पर उसके पास आना कबूल नहीं किया और वह भी वहीं पर मर गया। अकबर के तीनों बेटे अकबर से इतने नाराज क्यों थे?

यह अनुमान लगाया जा सकता है कि अकबर द्वारा जाने-अनजाने में इन तीनों के प्रति अन्याय किया जाता था। और यदि यह कहा जाए कि इस स्थिति के लिए अकबर जिम्मेदार नहीं था, अपितु उसके पुत्र जिम्मेदार थे, तो भी अकबर पूरी तरह से मुक्त नहीं हो जाता। नेहरू के अनुसार अकबर इतना महान् था कि उसकी आंखों में आकर्षण था, तो फिर वह अपनी महानता और आंखों के आकर्षण का जादू अपने पुत्रों पर क्यों नहीं चला पाया था?

उपरोक्त उदाहरणों को देखकर यह कहा जा सकता है कि जवाहर लाल नेहरू ने यह सही लिखा है कि अकबर के हाथों प्रायः मुसलमानों से अन्याय हो जाता था किंतु यह अन्याय राजपूतों अथवा हिन्दुओं को खुश करने के लिए नहीं किया जाता था अपितु अपनी अभिलाषाओं की पूर्ति में बाधक बनने वाले मुसलमानों को दण्डित करने के लिए किया जाता था।

डॉ. मोहनलाल गुप्ता की पुस्तक तीसरा मुगल जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर से!

इबादतखाना (143)

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इबादतखाना

अकबर द्वारा स्थापित इबादतखाना सोलहवीं शताब्दी ईस्वी के युग में एक बहुत बड़ी घटना थी। अकबर इसके माध्यम से विभिन्न मजहबों एवं पंथों के नेताओं के बीच बहस करवाकर धर्म के किसी वास्तविक स्वरूप की खोज करना चाहता था किंतु अकबर इसमें बुरी तरह असफल हुआ। इसका कारण यह था कि अकबर केवल यह छोटा सा तथ्य नहीं समझ सका कि इस्लाम कभी किसी से सहमत नहीं होता।

डॉ. आशीर्वादी लाल श्रीवास्तव की पुस्तक भारत का इतिहास के अनुसार अकबर (Akbar) ने लिखा है- ‘बीस वर्ष की आयु पूरी करने पर मैं आंतरिक कट्टरता का अनुभव करने लगा था और अपनी अंतिम यात्रा के लिए किसी आध्यात्मिक समाधान के अभाव में मेरा मन अत्यंत कठिन हो चला था।’

अकबर के दरबारी लेखकों ने लिखा है कि ई.1575 में अकबर ने सत्य की खोज के उद्देश्य से सीकरी में इबादतखाना (Ibadatkhana) का निर्माण करवाया। इबादतखाना का अर्थ पूजाघर होता है परन्तु इस इबादतखाने में पूजा नहीं की जाती थी अपितु इसमें इस्लाम के सैद्धांतिक पक्ष पर विचार-विमर्श तथा वाद-विवाद होते थे ताकि इस्लाम के मूल-तत्त्वों की बारीक बातों की जानकारी हो जाये।

इबादतखाना चार भागों में विभक्त था। पश्चिम की ओर सैयद लोग बैठते थे। दक्षिण की ओर उलेमा बैठते थे। उत्तर की ओर शेख तथा पूर्व की ओर अकबर के वे अमीर तथा दरबारी बैठते थे जो अपनी विद्वता तथा अलौकिक प्रतिभा के लिए प्रसिद्ध थे।

आरम्भ के दो सालों में यह मजहबी वाद-विवाद (Debates on religion) केवल मुसलमान शेख-सैय्यद और उलेमाओं तक ही सीमित था और केवल मुसलमान अमीर ही इसमें निमंत्रित किए जाते थे। उनकी बैठक प्रत्येक बृहस्पतिवार की रात्रि को होती थी। इस बैठक में अकबर उपस्थित रहकर इस्लामिक विद्वानों के व्याख्यान सुनता था।

अकबर ने इस्लामिक विद्वानों (Islamic scholars) से कहा कि इबादतखाने की स्थापना करने का उद्देश्य सत्य की खोज करना, सच्चे धर्म के सिद्धान्तों का अन्वेषण करना, सच्चे धर्म का प्रचार करना और सच्चे धर्म की दैवी उत्पत्ति का पता लगाना है। इसलिये कोई भी विद्वान सत्य पर पर्दा डालने का प्रयास नहीं करे परन्तु मुल्ला मौलवी, अपनी वैचारिक संकीर्णताओं को नहीं छोड़ सके। इस कारण इबादतखाने की कार्यवाहियाँ संतोषजनक सिद्ध नहीं हुईं।

इबादतखाने में जो वाद-विवाद होते थे उनमें संयम तथा मर्यादा का बड़ा अभाव था। वाद-विवाद करते समय विद्वान आपस में लड़ने लगते थे। इस कारण कटुता तथा पारस्परिक मनोमालिन्य बढ़ जाता था। कुछ समय बाद इबादतखाना विवादखाना बन गया।

अकबर को यह देखकर बड़ी निराशा हुई कि प्रतिष्ठत विद्वान् भी विवाद के समय संयम खो बैठते थे। बहुत से गम्भीर तथा वयोवृद्ध विद्वानों ने झगड़े से बचने के लिये इबादतखाने की बैठकों में भाग लेना बंद कर दिया।

सुल्तानपुर के मुल्ला अब्दुल्ला जिसे मखदूम-उल-मुल्क की उपाधि प्राप्त थी तथा प्रमुख सदर शेख अब्दुल नबी इन विवादों में प्रमुख रूप से भाग लिया करते थे। मखदूम-उल-मुल्क और अब्दुल नबी इस्लाम सम्बन्धी सैद्धांतिक प्रश्नों पर परस्पर लड़ बैठे और एक दूसरे के तर्क-कुतर्क के प्रति अवांछनीय असहिष्णुता का खुला प्रदर्शन भी करने लगे।

इन विद्वानों के इस आचरण को देखकर अकबर के ऊपर इनका प्रभाव कम होने लगा। कुछ विद्वानों ने तो अपने विरोधियों को बुरा-भला कहा और एक-दूसरे की नीतियों पर हमला भी कर डाला। बदायूनी ने लिखा है एक रात उलेमाओं की गर्दनों की नसें आवेश में तन गईं और भयंकर कोलाहल मचने लगा। शहंशाह उनके इस व्यवहार से बहुत क्रोधित हुआ। इस प्रकार की घटनाएं इबादतखाने में कई बार घटित हुईं।

डॉ. आशीर्वादी लाल श्रीवास्तव ने लिखा है कि यह सुनने पर कि हाजी इब्राहिम ने पीली और लाल रंग की पोशाकें पहने को न्याय-संगत घोषित करते हुए फतवा जारी किया है, मीर आदिल सैयद मोहम्मद ने बादशाह की उपस्थिति में उसे धूर्त और मक्कार कहा और उसे मारने के लिए अपना डंडा भी उठा लिया।

इन लोगों के इस प्रकार के उत्तरदायित्व-शून्य-व्यवहार, इस्लाम की तात्विक दृष्टि से विवेचना करने की असमर्थता तथा इन लोगों के व्यक्तिगत स्वार्थों को देखकर अकबर यह समझ गया कि सत्य की खोज इन लोगों की आपसी तू-तू, मैं-मैं से बाहर ही की जानी चाहिए।

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ई.1578 में अकबर (Akbar) ने इबादतखाने का द्वार हिन्दू, बौद्ध, जैन, ईसाई, पारसी आदि समस्त धर्मों के आचार्यों एवं विद्वानों तथा नास्तिकों के लिये भी खोल दिए। यदि विभिन्न धर्मों के आचार्य अकबर के वास्तविक उद्देश्य को समझ गये होते और सत्य के अन्वेषण की भावना से बहस करते तो इबादतखाना एक धार्मिक संसद का रूप धारण कर लेता और इससे मानवता का बड़ा कल्याण हुआ होता परन्तु दुर्भाग्यवश अन्य धर्मों के आचार्र्यों के आगमन से भी स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ और इबादतखाना पूर्ववत् निरर्थक विवादों का रण-स्थल बना रहा जिसमें संयम, धैर्य तथा मर्यादा का अभाव था। पंडित जवाहर लाल नेहरू ने लिखा है कि अलग-अलग मजहबों के लोग इबादतखाने में अकबर के चारों तरफ बैठते थे और हरेक इस महान् बादशाह को अपने मजहब में शामिल करने की उम्मीद रखता था। वे अक्सर एक-दूसरे से झगड़ पड़ते थे और अकबर बैठा-बैठा उनकी बहसें सुनता रहता और उनसे बहुत से सवाल पूछता रहता था। मालूम होता है कि उसे यह विश्वास हो गया था कि सत्य का ठेका किसी खास मजहब या फिरके ने नहीं ले रक्खा है। और उसने यह ऐलान कर दिया कि वह संसार के सारे मजहबों में आपसी उदारता के सिद्धांत को मानता है।

इबादतखाना में आत्म-संयम तथा आत्म-नियंत्रण का इतना अभाव था कि यदि अकबर उपस्थित नहीं रहता तो मार-पीट हो जाती थी। इबादतखाने की कार्यवाहियों से अकबर को बड़ी निराशा हुई। उसने सोचा था कि विभिन्न धर्मों के आचार्य परस्पर विचार-विमर्श करके एक-दूसरे के धर्म के वास्तविक ध्येय तथा उसके मौलिक सिद्धांतों का पता लगायेंगे परन्तु वे आपस में लड़-झगड़ कर मनोमालिन्य तथा साम्प्रदायिक संकीर्णता की भावना को और अधिक पुष्ट कर रहे थे। धीरे-धीरे अकबर इबादतखाने की बैठकों से उदासीन होता चला गया और इबादतखाने की बैठकें खानापूर्ति बन कर रह गईं।

पण्डित नेहरू ने लिखा है कि अकबर के शासनकाल (Akbar’s reign) के एक इतिहास लेखक बदायूनी जो कि खुद एक कट्टर मुसलमान था, उसने मुगल साम्राज्य का इतिहास लिखा है, जिसके हरेक पन्ने पर उसके कट्टरपन की छाप है। वह हिन्दुओं से बहुत चिढ़ता था। वह अकबर की इन कार्यवाहियों को बिल्कुल नापसंद करता था। बदायूनी ने जो ऐसे बहुत से मजमों में सम्मिलित होता रहा होगा, अकबर के बारे में मजेदार बयान लिखा है।

डॉ. मोहनलाल गुप्ता की पुस्तक तीसरा मुगल जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर से!

अकबर का मजहबी चिन्तन (144)

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अकबर का मजहबी चिन्तन (Akbar’s religious thought) जहाँ अकबर के भीतर अंसतोष को जन्म देता था वहीं दूसरी ओर सभी मजहबों के नेताओं को निराश करता था। अकबर का मजहबी चिन्तन न तो अकबर को मुसलमान रहने देता था और न किसी और मजहब को अपनाने देता था। इस कारण विभिन्न मुल्ला-मौलवी उसे इस्लाम का दुश्मन मानने लगे थे तो अन्य मजहबों के नेता उसे नास्तिक कहते थे।

अकबर ने अपने भीतर अध्यात्मिक शून्यता (Spiritual emptiness) का अनुभव करके ई.1575 में फतहपुर सीकरी के किले में एक इबादतखाने (Ibadatkhana) का निर्माण करवाया जिसमें अकबर का मजहबी चिन्तन कोई निश्चित आकार ले सके। इस इबादतखाने में विभिन्न धर्मों के विद्वानों को आमंत्रित किया जाता था। इबादतखाने में बहस करने के दौरान मुल्ला लोग अपने-अपने मत के प्रति इतने कट्टर हो जाते थे कि वे एक दूसरे की बात सुनने की बजाय एक-दूसरे पर अपनी बात थोपने का प्रयास करते थे और इसमें असफल रहने पर अकबर की उपस्थिति में ही एक दूसरे को मारने के लिए डण्डे उठा लेते थे। उनके इस आचरण के कारण अकबर उनसे उकता गया।

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डॉ. आशीर्वादी लाल श्रीवास्तव ने लिखा है कि इबादतखाने से उदासीन होने के बाद भी अकबर का मजहबी चिन्तन समाप्त नहीं हुआ। वह निरंतर सत्य की खोज में लगा रहा। उसने विभिन्न धर्मों के विद्वानों तथा विशेषज्ञों को अपने महल में बुलवाकर उनके साथ सत्य की खोज के लिए धार्मिक चर्चाएं जारी रखीं। सुन्नी मत में दिलचस्पी समाप्त हो जाने के पश्चात अकबर (Akbar) शिया विद्वानों की ओर आकर्षित हुआ। गिलान के श्रेष्ठ विद्वान हकीम अबुल फतह ने अकबर को विशेष रूप से प्रभावित किया। एक अन्य शिया मुल्ला मोहम्मद याजदी बादशाह के अत्यंत निकट आ गया और उसने बादशाह को शिया बनाने का प्रयत्न किया किंतु अकबर को शिया मत में कोई शांति और समाधान प्राप्त नहीं हुआ और वह सूफियों की ओर आकर्षित हुआ। शेख फैजी (Shaikh Faizi) और बदख्शां (Badakhshan) के मिर्जा सुलेमान ने जो साहिबेहाल (Sahibe-Haal) अर्थात् अल्लाह-दृष्टा (One who is spiritually enlightened) समझे जाते थे, अकबर को सूफी मत के सिद्धांतों और क्रियाओं जैसे अल्लाह से साक्षात करने के रहस्य से परिचित करवाया। यद्यपि अकबर स्वभाव से ही रहस्यवादी था और और उसका दावा था कि कई बार उसे रहस्यात्मक अनुभूतियां हुई थीं किंतु सूफी मत अपने उद्देश्य के लिए उसे पर्याप्त और संतोषजनक प्रतीत नहीं होता था। इसलिए उसने अन्य धर्मों में समाधान ढूंढने की चेष्टा की।

ई.1578 में अकबर ने महयार्जी राना को आमन्त्रित कर पारसी धर्म के सिद्धान्तों को समझा और गोवा से दो ईसाई पादरियों को बुलाकर ईसाई धर्म के मूल तत्त्वों के जानने का प्रयत्न किया। अकबर इन विद्वानों से धार्मिक चर्चाओं के साथ-साथ सामाजिक समस्याओं पर भी विचार-विमर्श किया करता था।  

डॉ. श्रीवास्तव ने लिखा है कि अकबर ने पुरुषोत्तम नामक हिन्दू विद्वान तथा देवी नामक हिन्दू विदुषी को अपने महल में आमंत्रित कर तथा हिन्दू साधुओं एवं योगियों से सम्पर्क स्थापित करके हिन्दू-धर्म का ज्ञान प्राप्त किया। बहुत से इतिहासकारों का मानना है कि इन चर्चाओं से अकबर के ज्ञान-कोष में विपुल वृद्धि हो गई तथा उसका दृष्टिकोण अत्यन्त व्यापक, उदार और सहिष्णु हो गया।

सत्य तक पहुंचने के लिए उसकी जिज्ञासा वृद्धि इतनी अधिक और तीव्र थी कि रात्रि में आराम और नींद त्याग कर भी वह अपने शयनकक्ष में ब्राह्मण विद्वान पुरुषोत्तम (Purushottam) और देवी (Devi) तथा अन्य मत संप्रदायों के धर्मशास्त्रियों से विचार-विमर्श करता रहता था किंतु हिंदू, जैन, बौद्ध, पारसी और ईसाई, कोई भी मत उसके अंतरप्रदेश को पूरी तरह प्रभावित नहीं कर सका। एक सच्चे जिज्ञासु की भांति अकबर का मजहबी चिन्तन चलता रहा तथा अकबर वैज्ञानिक भाव से सत्य की खोज करने में लगा रहा

मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूनी (Mulla Abdul Qadir Badauni) ने अपनी पुस्तक मुंतखब-उत्-तवारीख (Muntakhab-ut-Tawarikh) लिखा है कि जहांपनाह हरेक की राय इकट्ठी करते थे। खासकर ऐसे लोगों की जो मुसलमान नहीं थे और उनमें से जो कोई बात उनको पसंद आती, उसे रख लेते और जो उनके मिजाज और मर्जी के खिलाफ जातीं, उन सबको फैंक देते।

शुरु बचपन से जवानी तक और जवानी से बुढ़ापे तक, जहांपनाह बिल्कुल अलग-अलग तरह की हालतों में से और सब तरह के मजहबों, दस्तूरों और फिरकेवाराना अकीदों में से गुजरे हैं और जो कुछ किताबों में मिल सकता है, उस सबको उन्होंने छांटने के अपने खास गुण से इकट्ठा किया है और तहकीकात की उस रूह से इकट्ठा किया है जो हर इस्लामी उसूल के खिलाफ है।

बदायूनी लिखता है कि बादशाह के दिल में पत्थर की लकीर की तरह यह यकीन जमा हो गया है कि सभी मजहबों में समझदार आदमी हैं और सभी कौमों में परहेजगार, सोचने वाले और चमत्कारी ताकतों वाले आदमी हैं। अगर कोई सच्चा इल्म इस तरह हर जगह मिल सकता है तो सच्चाई किसी एक ही मजहब में कैसे बंद रह सकती है?

पण्डित नेहरू (Jawahar Lal Nehru) ने लिखा है कि अकबर ने वर्षों तक सब मतों के आचार्यों से अपनी मजहबी चर्चाएं और बहसें जारी रक्खीं। यहाँ तक कि अंत में सब मतों के आचार्य अकबर से उकता गए और उन्होंने अकबर को अपने-अपने खास मजहब में मिलाने की आशा छोड़ दी। अंत में जेजुइट पादरियों ने अपनी पुस्तकों में लिखा कि बादशाह में हम उस नास्तिक की सी आम गलती देखते हैं जो दलील को ईमान का दास बनाने से इन्कार करता है।

इतिहासकारों के अनुसार अब अकबर किसी एक मजहब के दायरे में बँधकर नहीं रह सकता था। वह समस्त मजहबों से ऊपर उठ गया था। वह जान गया था कि हर मजहब एवं पंथ में कुछ न कुछ बाह्याडम्बर हैं और हर मजहब एवं पंथ में कुछ न कुछ विशेषताएं हैं। इतना होने पर भी समस्त मजहबों एवं पंथों का ध्येय एक है। उनके मौलिक तत्त्व एक जैसे हैं।

मुल्ला बदायूनी लिखता है कि रात और दिन लोग ज्ञान-विज्ञान के गूढ़तम प्रश्नों, इतिहास की विचित्रताओं, प्रकृति के आश्चर्यों और ईश्वरीय ज्ञान संबंधी तत्वों की खोजबीन करते रहते थे। बादशाह ने इन सभी पक्षों को देखा-भाला है। सभी तरह की धार्मिक क्रियाओं और मत-विश्वासों को देखा-समझा है और अपनी संग्रह बुद्धि तथा इस्लाम के सिद्धांत के प्रतिकूल खोजबीन की भावना से उन चीजों का संग्रह कर लिया है जिन्हें लोग पुस्तकों द्वारा प्राप्त कर सकते हैं।

आईने अकबरी के अनुसार अकबर की जीवन भर की खोजबीन का परिणाम यह हुआ कि अकबर यह विश्वास करने लगा था कि सभी धर्मों में समझदार लोग होते हैं और वे स्वतंत्र विचारक भी होते हैं जब सत्य सभी धर्मों में है तो यह समझना भूल है कि सच्चाई सिर्फ इस्लाम तक सीमित है (Truth is limited only to Islam)। जबकि इस्लाम अन्य पंथों, मजहबों एवं धर्मों की अपेक्षाकृत नवीन है जिसकी आयु (अकबर के काल में) केवल एक हजार वर्ष की होगी!

इस प्रकार अकबर का मजहबी चिन्तन अकबर को सही दिशा में तो ले जा रहा था किंतु वह किसी एक सिद्धांत पर ठहर नहीं पा रहा था।

डॉ. मोहनलाल गुप्ता की पुस्तक तीसरा मुगल जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर से!

केजरीवाल …… थोड़ी-थोड़ी और बजेगी!

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केजरीवाल
केजरीवाल

भारत की राजनीति में यह एक कमाल का कारनामा हुआ है, जिस समय तक केजरीवाल जेल में बंद थे, तब तक तो वे सरकारी कागज पर हस्ताक्षर कर सकते थे किंतु जेल से बाहर आने पर उनकी यह शक्ति छीन ली गई है। इस पर भी केजरीवाल ने जेल से बाहर आते ही यह वक्तव्य दिया है कि उनका हौंसला कम नहीं हुआ है, अपितु सौ गुना बढ़ गया है।

अमृत वही अच्छा होता है जिसमें किसी को अमर करने की क्षमता हो, विष वह अच्छा होता है जो किसी के प्राण ले ले। मुख्यमंत्री वही अच्छा होता है जिसकी कलम में ताकत हो किंतु जिस मुख्यमंत्री की कलम ही छीन ली जाए और उससे कह दिया जाए कि वह किसी भी सरकारी कागज पर हस्ताक्षर नहीं करेगा, तो वह कैसा मुख्यमंत्री है!

पूजा में वही फूल काम में लिए जाते हैं जिनमें सुगंध हो! नागराज वही पूजनीय होते हैं जिनके मुख में दांत हों, जिस नाग के दांत तोड़ दिए जाएं, वह पूजा किए जाने के योग्य नहीं रहता, खिलौना बन जाता है। उसी प्रकार जिस मुख्यमंत्री से हस्ताक्षर करने के अधिकार छीन लिए जाएं, वह भी मुख्यमंत्री नहीं रहता, खिलौना बन जाता है। केजरीवाल अब दिल्ली के ऐसे ही मुख्यमंत्री हैं। वे न अपने कार्यालय में जा सकते हैं, न किसी सरकारी कागज पर हस्ताक्षर कर सकते हैं।

भारत की राजनीति में यह एक कमाल का कारनामा हुआ है, जिस समय तक केजरीवाल जेल में बंद थे, तब तक तो वे सरकारी कागज पर हस्ताक्षर कर सकते थे किंतु जेल से बाहर आने पर उनकी यह शक्ति छीन ली गई है। इस पर भी केजरीवाल ने जेल से बाहर आते ही यह वक्तव्य दिया है कि उनका हौंसला कम नहीं हुआ है, अपितु सौ गुना बढ़ गया है।

कमाल है भाई! कलम चलाने का अधिकार छिन जाने पर भी आपका हौंसला बना रहता है। ऐसा हौंसला आप लाए कहाँ से हैं?

जब समाज के पास मनोरंजन के आधुनिक साधन नहीं थे, तब गांवों में कठपुतलियों को नचाकर लोगों का मनोरंजन करने वाले घूमा करते थे। कठपुतलियों का एक मजाकिया खेल आज की राजनीति पर बड़ा सटीक बैठता है। इस खेल में बड़े-बड़े राजाओं-महाराजाओं का एक दरबार सजता है जिसमें बड़ी-बड़ी मूंछों एवं बड़ी-बड़ी तलवारों वाले राजा एकत्रित होते हैं। वे देश को दुश्मन से आजाद करवाने के लिए बड़ी-बड़ी चिंताएं व्यक्त करते हैं।

जब एक ढोलक बजाने वाले को पता चलता है कि यहाँ राजाओं का दरबार सजा हुआ है तो वह दरबार में आकर उन्हें प्रणाम करता है और अपनी ढोलक बजाकर उन्हें सुनाता है। राजा लोग उसकी ढोलक को सुनकर प्रसन्न होते हैं तथा उसे पुरस्कार देते हैं। ढोली उत्साहित होता है तथा जोर-जोर से ढोलक बजाता है। इस बार भी राजा लोग प्रसन्न होते हैं तथा उसे थोड़ा पुरस्कार और देते हैं। ढोली फिर ढोलक बजाता है। अब राजाओं में ढोलक के प्रति पहले जैसा आकर्षण दिखाई नहीं देता। ढोली फिर से ढोलक बजाता है, राजा लोग ढोली की तरफ ध्यान देना बंद करके अपना विचार-विमर्श आरम्भ कर देते हैं।

ढोली चुप होकर राजाओं की बात सुनता है किंतु कुछ देर बाद ढोली को लगता है कि राजा लोग उसकी तरफ ध्यान नहीं दे रहे, उनका ध्यान अपनी ओर खींचने के लिए ढोली फिर से ढोलक बजाता है। इस पर एक राजा ढोली को शांत रहने का संकेत करता है। ढोली थोड़ी देर शांत रहकर फिर से ढोलक बजाता है। इस पर एक राजा, ढोली को पुनः शांत रहने का संकेत करता है। ढोली शांत हो जाता है और कुछ देर बाद फिर से ढोलक बजाता है।

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इस पर एक राजा नाराज होकर ढोली को पीट देता है। ढोली फिर शांत हो जाता है किंतु कुछ देर बाद फिर से ढोलक बजाने लगता है। इस बार सारे राजा मिलकर ढोली को पीटते हैं। इस पर ढोली को भी गुस्सा आ जाता है और वह जोर-जोर से ढोलक बजाता हुआ चिल्लाता है- थोड़ी-थोड़ी और बजेगी।

केजरीवाल का यही हाल है, उनका हौंसला टूटना तो दूर, कम नहीं होता! अपितु छः महीने की जेल काटकर हौंसला पहले से ज्यादा बढ़ जाता है। इसी को कहते हैं- थोड़ी-थोड़ी और बजेगी!

समय के साथ माहौल में काफी बदलाव आ गया है। इस बार केजरीवाल की थोड़ी-थोड़ी और बजेगी केवल मजाक नहीं है, कांग्रेस के लिए जीवन-मरण का प्रश्न है। अगले महीने होने वाले हरियाणा विधानसभा चुनावों में केजरीवाल की ढोलक थोड़ी-थोड़ी नहीं बजेगी, पूरे जोर से बजेगी और राजाओं की हालत पतली हो जाएगी।

दिल्ली, हरियाणा और पंजाब में आम आदमी पार्टी का अच्छा प्रचार और प्रभाव है। इस कारण दूसरे राजनीतिक दलों की चिंताएं बढ़ गई हैं। आम आदमी पार्टी हरियाणा में भले ही सीटें न जीत पाए किंतु निश्चित रूप से कांग्रेस के वोटों में बड़ी सेंध लगाएगी। जेजेपी और इनेलो की भी मुसीबत बढ़ गई है।

आप पार्टी बीजेपी का भी कुछ न कुछ नुक्सान अवश्य करेगी किंतु अंततः बीजेपी को लाभ होगा।

इसलिए कहा जा सकता है कि इस बार ढोली केवल ढोलक बजाने नहीं आया है, राजाओं के ताज गिराने आया है। इसलिए केजरीवाल की ढोलक पूरे जोश से बजेगी।

जिस प्रकार पिछले लोकसभा चुनावों में दिल्ली क्षेत्र के चुनावों से एक महीना पहले केजरीवाल को जमानत पर छोड़ा गया था, इस बार भी हरियाणा विधान सभा के चुनावों से लगभग पंद्रह दिन पहले जेल से बाहर निकाल दिया गया है।

यही हाल राशिद इंजीनियर का भी है। वह भी जम्मू-कश्मीर में होने जा रहे विधान सभा चुनावों से ठीक पहले अपनी ढोलक लेकर जेल से बाहर आ गया है। उसकी ढोलक निश्चित रूप से फारुख अब्दुल्ला की नेशनल कांफ्रेंस तथा महबूबा मुफ्ती की पीडीपी का खेल पूरी तरह से बिगाड़ देगी।

राशिद इंजीनियर तो चुनावों के बाद फिर से जेल में चला जाएगा किंतु जेल जाने से पहले अब्दुल्ला परिवार और मुफ्ती परिवार की राजनीतिक ढोलकों की थाप अच्छी तरह बिगाड़ जाएगा!

जिस प्रकार केजरीवाल का हौंसला जेल में रहकर कम नहीं हुआ, उस प्रकार राशिद इंजीनियर भी जेल में रहकर नया हौंसला पा गया है।

नेताओं के हौंसले कभी कम नहीं होते, हौंसले तो लालू यादव के भी कम नहीं हुए भले ही बिहार की जनता ने उनके परिवार एवं उनकी पार्टी को 2024 के लोकसभा चुनावों बुरी तरह नकार दिया हो किंतु हौंसला वही है। उनकी भी ढोलक जोर से बज रही है। हौंसले तो ममता बनर्जी के भी कम नहीं हुए। पूरा पश्चिमी बंगाल गुस्से की आग में जल रहा है, किंतु ममता का हौंसला कहाँ टूटा है। ममता भी थोड़ी-थोड़ी और बजेगी गाती रहेंगी। राजनीति की ढोलक बजाती रहेंगी।

– डॉ. मोहनलाल गुप्ता

क्या अकबर मुसलमान था ? (145)

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क्या अकबर मुसलमान था

इतिहासकारों ने इस प्रश्न को लेकर बहुत माथापच्ची की है कि क्या अकबर मुसलमान था? (Was Akbar a Muslim?) विभिन्न इतिहासकारों ने इस प्रश्न का उत्तर अलग-अलग ढंग से दिया है। अधिकांश विदेशी इतिहासकारों का मानना है कि अकबर निश्चित रूप से जीवन भर इस्लाम और पैगम्बर (Islam and Prophet) पर विश्वास करता रहा इसलिए यह प्रश्न ही नहीं उठना चाहिए कि क्या अकबर मुसलान था?

डॉ. आशीर्वादी लाल श्रीवास्तव ने लिखा है कि अकबर अपने जीवन के आरम्भिक भाग में इस्लाम के सिद्धांतों में बड़ी श्रद्धा रखते हुए भी दूसरे धर्म वालों के प्रति बड़ा उदार था। इबादतखाने की तहरीरों को सुनने के बाद अकबर के मजहबी विचारों एवं विश्वासों के विकास का द्वितीय दौर आरंभ हुआ। कट्टर इस्लाम में अकबर का विश्वास हिल गया।

बदायूनी (Abdul Qadir Badauni) ने लिखा है कि पढ़े-लिखे जुबानी तलवार चलाकर जंग लड़ते। वाद-प्रतिवाद करते, पंथों के विरोध इस ऊंचाई पर पहुंच जाते कि वे एक-दूसरे को मूर्ख और पाखण्डी कहने लगते। यह विवाद शिया-सुन्नी, हनीफी-शाफई से ऊपर उठकर मूल विश्वास पर ही आक्रमण कर देता।

डॉ. आशीर्वादी लाल श्रीवास्तव ने लिखा है कि अकबर का तर्क-सम्मत विश्वास, इस्लाम के परंपरागत स्वरूप (The traditional form of Islam) से पहले ही हिल गया था। कयामत (Qayamat or The Day of Judgment) के इस्लामी सिद्धांतों को अकबर ने मानने से इंकार कर दिया और इलहाम (Ilham or Divine inspiration) की बात तो उसने एक ओर ही रख दी। उसे यह विश्वास ही नहीं होता था कि कोई स्वर्ग कैसे जाता है? वहाँ से लंबी बातचीत करके इतनी जल्दी वापस कैसे आ सकता है कि उसका बिस्तर गरम का गरम मिले? डॉ. आशीर्वादी लाल श्रीवास्तव ने लिखा है कि बहुत सी हिंदू और फारसी नीतियों और विश्वासों को भी अकबर ने अपना लिया था जैसे पुनर्जन्म का सिद्धांत और सूर्य उपासना। इस प्रकार इस्लाम से उसकी विरक्ति आरंभ हुई।

आधुनिक इतिहासकारों में से बहुतों का यह विचार है कि अकबर जीवन भर और अंत समय तक भी मुसलमान ही बना रहा किंतु डॉ. आशीर्वादी लाल श्रीवास्तव ने लिखा है कि मैं उनके विचारों से सहमत नहीं हूँ। हिंदू धर्म के प्रतिकूल इस्लाम एक सुनिश्चित धर्म है और जो व्यक्ति इस धर्म के पांच मूलभूत सिद्धांतों कलमा अर्थात् अल्लाह एक है, मोहम्मद की पैगंबरी, पांच नमाजों, रमजान के रोजों, जकात और हज में विश्वास नहीं रखता, मुसलमान नहीं कहा जा सकता।

डॉ. श्रीवास्तव लिखते हैं कि कर्म और पुनर्जन्म के सिद्धांत (The philosophy of karma and rebirth) पर विश्वास तथा सूर्य की उपासना, चाहे वह यह समझ कर ही की जाए कि सूर्य प्रकाश का स्रोत है, मुसलमानी धर्म के मूल सिद्धांत के बिल्कुल विरुद्ध है। डॉ. श्रीवास्तव लिखते हैं कि इस्लाम का दावा है कि सत्य पर केवल उसी का एकाधिकार है, अन्य धर्मों में सत्य नहीं है और जो कुछ पहले पैगंबरों ने शिक्षा दी थी, वह सब मोहम्मद की शिक्षा द्वारा रद्द हो गई है क्योंकि मोहम्मद सबसे अंतिम और सबसे बड़े पैगंबर हुए हैं।

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डॉ. श्रीवास्तव लिखते हैं कि अकबर मोहम्मद पैगंबर (Prophet Muhammad) को मानता था किंतु हमारे पास तत्कालीन कोई ऐसा प्रमाण नहीं है जिसके आधार पर यह कहा जा सके कि अकबर अपने बाल्यकाल में मजहब में निष्ठा रखे रहा। वौटेल्हो और पैरुशिची जिनकी यह धारणा थी, उस काल के इतिहासकार नहीं थे और उन्होंने अपनी जो राय प्रकट की है वह केवल जेजुइट पादरियों के लेखों पर आधारित है। डॉ. श्रीवास्तव लिखते हैं कि ईस्वी 1586 में अब्दुल्ला खाँ उजबेग (Abdullah Khan Uzbek) को अकबर द्वारा लिखे गए पत्र को भी, जिसमें उसने लिखा था कि वह (अकबर) मुसलमान है, इस सम्बन्ध में प्रमाण के रूप में प्रस्तुत और स्वीकार करना भी उचित नहीं है। यह तो केवल कूटनीतिक पत्र-व्यवहार था जिसमें सत्य की प्रतिष्ठा नहीं थी। यद्यपि अकबर ने इस्लाम को छोड़ दिया था तथापि मुसलमानी सभ्यता की सभी बातों को छोड़ना उसके लिए असंभव था क्योंकि उसका बाल्यकाल उसी सभ्यता में व्यतीत हुआ था। जब हम मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूनी, पण्डित जवाहर लाल नेहरू तथा डॉ. आशीर्वादी लाल श्रीवास्तव द्वारा अकबर के सम्बन्ध में प्रकट की गई धारणाओं पर ऐतिहासिक तथ्यों के संदर्भ में चर्चा करते हैं तो हम पाते हैं कि उनकी ये धारणाएं बिल्कुल गलत हैं कि अकबर सभी मजहबों से ऊपर उठ गया था या उसने इस्लाम छोड़ दिया था या उसने दूसरे धर्मों की बहुत सी बातों को मान लिया था।

इन्हीं धारणाओं के कारण यह प्रश्न बार-बार पूछा जाता है कि क्या अकबर मुसलमान था किंतु वास्तव में यह प्रश्न बेमानी है। सच्चाई यह है कि अकबर जीवन के आरम्भ से लेकर जीवन के अंत तक मुलसमान बना रहा। उसका मन इस्लाम से उचाट नहीं हुआ था।

अकबर यदि उकताया था तो मुल्लों के कट्टरपन से जो अपने-अपने हिसाब से इस्लाम की व्याख्या करते थे और अपनी बात को ही सही ठहराने की जिद्द ठान लेते थे। यदि कोई एक मुल्ला, दूसरे मुल्ला की बात को नहीं मानता था तो वे दोनों ही एक दूसरे पर डण्डा तान लेते थे। अकबर जैसा बुद्धिमान बादशाह ऐसे मुल्लों की बातों को कैसे स्वीकार कर सकता था!

इसलिए अकबर अवश्य ही इबादतखाने की बैठकों (Meetings of the Ibadat Khana) में इन मुल्लों की बातों को स्वीकार नहीं करता होगा और उनसे तर्क करके उन्हें पराजित कर देता होगा। इस कारण बहुत से मुल्लों ने अकबर को इस्लाम विरोधी कहना आरम्भ कर दिया होगा।

यही हाल अन्य धर्मावलम्बियों के आचार्यों एवं पादरियों का रहा होगा। अकबर उनकी सभी बातों पर आंखें मूंदकर विश्वास करने को तैयार नहीं था। मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूनी ने अपनी पुस्तक मुंतखब-उत्-तवारीख लिखा भी है कि जहांपनाह हरेक की राय इकट्ठी करते थे। खासकर ऐसे लोगों की जो मुसलमान नहीं थे और उनमें से जो कोई बात उनको पसंद आती, उसे रख लेते और जो उनके मिजाज और मर्जी के खिलाफ जातीं, उन सबको फैंक देते।

अकबर ने इस्लाम नहीं छोड़ा था (Akbar never left Islam), इस बात का सबसे बड़ा प्रमाण ई.1579 की एक घटना से मिलने वाला था। इस घटना ने स्पष्ट कर दिया कि अकबर ने इस्लाम में आस्था नहीं छोड़ी थी अपितु उन मुल्लों पर से आस्था छोड़ी थी जिन्होंने इस्लाम की मनमानी व्याख्या करना तथा एक-दूसरे को नीचा दिखाकर स्वयं को सबसे ऊंचा सिद्ध करना, अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझ लिया था।

इन मुल्लों को नियंत्रण में लाने के लिए अकबर ने फैजी और अबुल फजल (Abul Fazal) के पिता शेख मुबारक (Shaikh Mubarak) से कहा कि वह इस सम्बन्ध में अध्ययन करके बादशाह के समक्ष एक मजहर का मसविदा पेश करे। अर्थात् शाही परिपत्र का प्रारूप प्रस्तुत करे।

जब यह शाही मसविदा सामने आया तो मुल्लों के सामने फिर से यह प्रश्न खड़ा हो गया कि क्या अकबर मुसलमान था? (Was Akbar a Muslim?)

डॉ. मोहनलाल गुप्ता की पुस्तक तीसरा मुगल जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर से!

अकबर का इस्लाम (146)

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अकबर का इस्लाम

इस्लाम तो एक (Islam is One) ही है किंतु समय-समय पर मुस्लिम शासकों ने इस्लाम की अलग-अलग व्याख्या करने के प्रयास किए हैं ताकि वे स्वयं को मजहबी नेता भी घोषित कर सकें। मुस्लिम शासकों की इन चेष्टाओं से मुल्ला, मौलवी, उलेमा आदि उनके विरोधी हो जाते थे। अकबर का इस्लाम भी अपने काल के मुल्ला-मौलवियों के इस्लाम से मेल नहीं खाता था। इस कारण अकबर की अपने ही दरबारी मुल्लों से ठन गई।

विभिन्न मजहबों, पंथों एवं धर्मों के मौलवियों, पादरियों,एवं आचार्यों से विचार-विमर्श करने के बाद अकबर (Akbar) ने विभिन्न मजहबों, पंथों एवं धर्मों की अच्छी बातों को अनुभव किया। इससे नाराज होकर बहुत से लोगों ने अकबर पर आरोप लगाया कि उसने इस्लाम छोड़ दिया है।

जबकि अकबर ने इस्लाम में आस्था (Faith in Islam) नहीं छोड़ी थी अपितु उन मुल्लों पर से आस्था छोड़ी थी जिन्होंने इस्लाम की मनमानी व्याख्या करना तथा एक-दूसरे को नीचा दिखाकर स्वयं को सबसे ऊंचा सिद्ध करना, अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझ लिया था।

इन मुल्लों को नियंत्रण में लाने के लिए अकबर ने फैजी (Shaikh Faizi) और अबुल फजल (Abul Fazal) के पिता शेख मुबारक (Shekh Mubarik) से कहा कि वह इस सम्बन्ध में अध्ययन करके बादशाह के समक्ष एक मजहर का मसविदा (The Draft of the Mahzar) अर्थात् शाही परिपत्र का प्रारूप प्रस्तुत करे। सितंबर 1578 में शेख मुबारक ने बादशाह के समक्ष मजहर का एक मसौदा पेश किया। अकबर छः महीने तक इस मसौदे पर विचार करता रहा और उसमें सुधार करता रहा।

अकबर द्वारा तैयार करवाए गए इस मसविदे से भी यह आभास होता है कि अकबर का इस्लाम, मुल्लों के इस्लाम (The Islam of the Mullahs) से अलग था।  

बदायूनी ने लिखा है कि 22 जून 1579 को अकबर ने फतेहपुर सीकरी (Fatehpur Sikri) की प्रमुख मस्जिद के चबूतरे पर चढ़कर कवि फैजी द्वारा कविता में रचित खुतबा पढ़ा। संभवतः इस खुतबे में शेख मुबारक द्वारा प्रस्तुत मजहर के मसौदे का ही प्रयोग किया गया था। इस मजहर की तुलना आजकल के सरकारी परिपत्रों अथवा शासकीय आदेशों से की जा सकती है।

इस मजहर के द्वारा सल्तनत (Mughal Sultanate) के प्रमुख मजहबी अधिकारियों ने अकबर को समस्त देश में इस्लाम सम्बन्धी विवादों में अंतिम पंच-फैसले का अधिकार दिया था। इस मजहर पर प्रमुख मुसलमान मजहबी नेताओं ने हस्ताक्षर किए जिनमें मखदूम-उल-मुल्क और अब्दुल नबी भी सम्मिलित थे।

इस परिपत्र का मसौदा इस प्रकार था- ‘चूंकि हिंदुस्तान अब शांति और सुरक्षा का केंद्र तथा न्याय-नीति का स्थान बन गया है जिससे उच्च और निम्न वर्ग के लोगों और मुख्यतः आध्यात्मिक विद्या विशारद, विद्वान और वे लोग जो ज्ञान-विज्ञान का विचार-विस्तार करते हैं तथा मुक्ति के मार्गदर्शक बने हुए हैं, अरब और फारस देशों से यहाँ आकर बस गए हैं।

अब प्रमुख उलेमागण जो केवल कानून के विभिन्न अंगों के ही विशेषज्ञ और ज्ञाता नहीं, तर्क और प्रमाण पर आधारित नियमों से परिचित ही नहीं, बल्कि अपनी सच्चाई और सदाशयता के लिए भी प्रसिद्ध हैं, प्रथमतः कुरान की आयत की, अल्लाह की, पैगंबर की और उनकी जिन्हें सत्ता प्राप्त है, आज्ञा पालन करो।

दूसरे जो आदमी कयामत के दिन (The Day of Judgment) खुदा का प्यारा होता है वही असली नेता होता है और जो अमीर की आज्ञा-पालन करता है, वह मेरी आज्ञा का पालन करता है, और जो इसके प्रति विद्रोह करता है वह मेरे प्रति विद्रोह करता है, के सिद्धांत और तीसरे तर्क और प्रमाणों पर आधारित अन्य अनेक सबूतों का अच्छी तरह से मर्म समझ लिया है और इस निश्चय पर पहुंचे हैं कि न्याय में न्याय-प्रिय बादशाह का स्थान, अल्लाह की दृष्टि में मुजतहिद (मजहबी नेता) से कहीं ऊंचा होता है।

आगे हम यह घोषित करते हैं कि इस्लाम को मानने वाला बादशाह, मानवता का आश्रय-स्थल, स्वामि-भक्तों का सेनापति, संसार में अल्लाह का स्वरूप, अबुल फतेह जलालुद्दीन मोहम्मद अकबर, बादशाहे गाजी, सबसे अधिक न्यायप्रिय और बुद्धिमान बादशाह है और उसे अल्लाह का ज्ञान प्राप्त है।

इसलिए यदि भविष्य में ऐसे मजहबी प्रश्न उठ खड़े हों जिन पर मुजतहिद की राय (The opinion of a Mujtahid or Opinion of a Islamic Scholar) भिन्न-भिन्न हो तो बादशाह अपनी सूक्ष्म दृष्टि और बुद्धिमत्ता के अनुसार, सुव्यवस्था की दृष्टि से, देश की भलाई के लिए, इन विरोधी मतों में से किसी एक को स्वीकार करने की कृपा करेंगे और यह मत ही उसकी सारी प्रजा पर लागू समझा जाएगा।

यदि बादशाह कुरान (The Quran) के अनुसार, देश के हित में कोई नई आज्ञा जारी करना उचित समझेंगे तो सभी लोग उसे मानने के लिए बाध्य समझे जाएंगे और इसका विरोध करने पर उन्हें इस लोक में मजहबी अधिकार तथा धन संपदा से वंचित होना पड़ेगा तथा दूसरे लोक में कष्ट मिलेगा। यह मजहर अर्थात् शासकीय आदेश विशुद्ध भावनाओं के साथ तथा अल्लाह की कीर्ति और इस्लाम के प्रचार के लिए लिखा गया है। इस्लाम के प्रमुख उलेमाओं और प्रमुख मजहबी विद्वानों द्वारा रजब के महीने में इस मजहर पर हस्ताक्षर हुए हैं।’

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मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूनी ((Mulla Abdul Qadir Badauni)) अकबर के इस कार्य से प्रसन्न नहीं था। चूंकि वह अकबर का दरबारी नौकर था इसलिए उसने सीधे शब्दों में अकबर की आलोचना नहीं की किंतु इस घटना का ऐसे शब्दों में वर्णन किया है जिनसे यह ज्ञात हो सके कि कुदरत भी नहीं चाहती थी कि अकबर अपनी रियाया पर इस कानून को लागू करे। मुल्ला लिखता है कि अकबर को किसी का अधीनस्थ होना नहीं सुहाता था।  अकबर ने सुन रक्खा था कि पैगम्बर, उसके कानूनी वारिस और तिमूर साहिब किरान, मिर्जा उलूगबेग-ए-गुरगांव और अन्य अमीरों ने खुद ही खुतबा पढ़ा था। अकबर ने भी उनका अनुकरण करते हुए स्वयं ही अपना खुतबा पढ़ने का निश्चय किया। वह मुजतहिद (Islamic Scholar) के रूप में रियाया के सामने आना चाहता था। इसलिए हिजरी 987 के जमादअल अव्वल महीने के पहले जुम्मे को अकबर (Akbar) ने फतहपुर की मुख्य मस्जिद में जो उसने अपने महल के पास बनवाई थी, खुत्बा पढ़ना शुरु किया किंतु वह एकाएक लड़खड़ाया और कांपा। यद्यपि दूसरों ने उसे सहारा दिया, वह मुश्किल से तीन पद पढ़ पाया और जल्दी से मंच से नीचे आ गया तथा आगे का खुतबा हाफिज मुहम्मद अमीर, दरबारी खतीब ने पूरा किया।

इस प्रकार कवि फैजी द्वारा कविता में रचित खुतबा ही अकबर के विचारों का वह प्रारूप था जिसे अकबर का इस्लाम कहकर मुल्लों ने उसका विरोध किया।

डॉ. आशीर्वादी लाल श्रीवास्तव ने लिखा है कि उपर्युक्त पत्र द्वारा जिसे गलती से अचूक-आज्ञापत्र कहकर पुकारा गया है, अकबर को यह अधिकार प्राप्त हो गया कि वह मुस्लिम धर्म-शास्त्रियों के विरोधी मतों में से किसी एक को स्वीकार करे तथा मतभेद विहीन मामलों पर किसी भी नीति को निर्धारित करे, बशर्ते कि वह कुरान विहित हो।

इस प्रकार अकबर (Akbar) ने स्वयं वे अधिकार प्राप्त कर लिए जो अब तक उलेमाओं और विशेष रूप से प्रमुख सदर के अधिकार माने जाते थे। अब से वह मुसलमान प्रजा के लिए मजहबी नेता भी बन गया। इसी परिपत्र के आधार पर आधुनिक इतिहासकारों स्मिथ और वूल्जले हेग ने लिखा है कि- ‘अकबर पोप भी बन गया और राजा भी!’ (Akbar became both the Pope and the King.)

डॉ. आशीर्वादी लाल श्रीवास्तव ने लिखा है कि स्मिथ और वूल्जले हेग का यह कथन उचित दिखाई नहीं देता कि अकबर पोप भी बन गया और राजा भी।

हैवल ने लिखा है- ‘वास्तव में अकबर द्वारा इस्लाम का नेतृत्व ग्रहण करने की समस्या पर विचार करते हुए केवल इस बात का ही ध्यान नहीं रखना है कि वह उलेमा लोगों की धृष्टता पर नियन्त्रण रखना चाहता था वरन् उसकी दूरदर्शी राजनीतिज्ञता पर भी ध्यान रखना है जिसने हिन्दुस्तान की शान्ति तथा मुगल राज्यवंश (Mughal Dynasty) की सुरक्षा के लिये इस नीति के अनुसरण हेतु प्रेरित किया।’

इस परिपत्र के जारी करने के तीन वर्ष बाद ई.1582 में अकबर ने इबादतखाना (IbadatKhana) की बैठकों को पूरी तरह बंद कर दिया।  चूंकि मुल्लों ने अकबर (Akbar) की किसी भी मजहबी बात को स्वीकार नहीं किया इसलिए कहा जा सकता है कि अकबर का इस्लाम अस्तित्व में नहीं आ सका।

डॉ. मोहनलाल गुप्ता की पुस्तक तीसरा मुगल जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर से!

अल्लाह का दूत (147)

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अल्लाह का दूत

मुल्ला लोग अकबर की इस्लाम विरोधी बातों का विरोध लम्बे समय से कर रहे थे किंतु जब अकबर ने यह घोषित किया कि वह अल्लाह का दूत है तो मुल्ला लोग अकबर पर गुस्से से चिल्लाने लगे!

अकबर ने एक खुतबा पढ़कर यह घोषित कर दिया कि अब से उसकी सल्तनत में इस्लाम की व्याख्या के मामले में शहंशाह को ही अंतिम निर्णय करने का अधिकार होगा। इस आदेश के माध्यम से अकबर ने भारत के समस्त मुल्लाओं, मौलवियों, उलेमाओं, काजियों एवं इमामों के ऊपर सर्वोच्च अधिकार पा लिया। इसे बहुत से लोगों ने शहंशाह की तरफ से किया गया इस्लाम-विरोधी कार्य समझा जबकि कुछ लोगों ने मुल्लों के साथ-साथ इस्लाम की सत्ता की आलोचना करनी आरम्भ कर दी।

मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूनी ने अपनी पुस्तक मुन्तखब उत् तवारीख में लिखा है कि इन दिनों इस्लाम की सत्ता की आलोचना होने लगी तथा जब पैगम्बर के विरोध में उनसे सम्बन्धित प्रश्न, हिन्दू और हिन्दू जैसे मुसलमान उठाने लगे, कुछ खलनायक-उलेमाओं ने अपने कार्यों में शहंशाह को पाप से परे घोषित कर दिया और ‘एकाकी अल्लाह’ अर्थात् ‘अल्लाह एक है’ की घोषणा तक ही संतुष्ट हो गए।

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मुल्ला बदायूनी लिखता है कि उन लोगों ने शहंशाह के विभिन्न सम्मानों को अपनी रचनाओं में लिखा किंतु पैगम्बर का उल्लेख करने की हिम्मत नहीं कर सके। यह मसला जनसाधारण की लज्जा का कारण बना तथा ये लोग वंचना व उपद्रव के बीच सल्तनत में अपना सिर उठाने लगे। इसके अलावा उच्च व निम्न तबके के उद्दण्ड एवं नीच व्यक्ति अपनी गर्दनों में आध्यात्मिक आज्ञाकारिता का पट्टा पहने, अपने आपको शहंशाह का शिष्य बताने लगे। मुल्ला लिखता है कि ये लोग लालच एवं डर से बादशाह के शिष्य हुए। सत्य का एक शब्द भी उनके मुंह से बाहर नहीं आ सका।

मुल्ला बदायूनी लिखता है कि इस महीने के दूसरे जुम्मे को शहंशाह ने गरीबों एवं जरूरतमंदों को चौगान मैदान में बुलाया तथा स्वयं भी वहाँ आया। करीब एक लाख आदमी एवं औरतें उस चारदीवारी में आ गए। सद्र सुल्तान ख्वाजा व कुलिज खाँ ने प्रत्येक आदमी तथा औरत को सोने का टुकड़ा दिया। उस दिन भीड़ में अस्सी आदमी, औरत एवं बच्चे कुचलने से मारे गए। बंगाल की औरतों के अशर्फी से भरे बटुए जिनके पति बंगाल में मारे गए थे, कमर से गिर पड़े। गरीब लोगों ने इन बटुओं को लूटने का प्रयास किया जिसके कारण यह अफरा-तफरी मची।

मुल्ला ने अकबर द्वारा एक लाख गरीबों को चौगान मैदान में बुलाकर सोना बांटने का कारण स्पष्ट नहीं किया है किंतु अनुमान होता है कि अकबर ने अपनी प्रजा को अपने पक्ष में करने के लिए इतना विशाल आयोजन किया था। क्योंकि अकबर के विरुद्ध मुल्ला-लोग जहर उगल रहे थे और सल्तनत में अकबर के विरुद्ध वातावरण तैयार हो रहा था।

इस घटना के कुछ दिन बाद अकबर अजमेर के लिए रवाना हुआ। यह अकबर की चौदहवीं अजमेर यात्रा थी। ख्वाजा की दरगाह से पांच कोस पहले शहंशाह सवारी से उतर गया और दरगाह की ओर पैदल चला।

मुल्ला बदायूनी ने लिखा है- ‘शहंशाह को देखकर संवेदनशील लोग मुस्कुराए और बोले यह आश्चर्यजनक है कि हुजूर को अजमेर के ख्वाजा में इतना विश्वास है जबकि हुजूर ने अपने पैगम्बर के हर आधार को नकार दिया है जिसकी पोशाक से ख्वाजा जैसे सैंकड़ों-हजारों पीर निकले हैं।’

मुल्ला लिखता है कि शहंशाह के अजमेर की ओर निकल जाने के बाद मख्दुम-उल-मुल्क और शेख उब्दुन्नबी आदि उलेमाओं ने सामान्यजन को शहंशाह के खिलाफ भड़काया। उन्होंने लोगों को बताया कि शहंशाह द्वारा इलहाम को असंभव बताते हुए, सीमा से बाहर जाकर, पैगम्बर और इमामों की आधिकारिता में संदेह पैदा करके, देवदूत व शैतान को नकारकर, रहस्यों एवं चमत्कारों को नकारकर, कुरान के साथ साजिश की गई है।

अकबर-विरोधी मुल्लों ने कुरान की विषयवस्तु की अस्मिता पर, इसकी शाब्दिक आधिकारिता पर, शरीर समाप्ति के बाद रूह पर फिर से जन्म, के अलावा दण्ड व पारितोषिक की असंभवता पर व्यंग्य करते हुए लिखा-

मकबरे के हाथ में कितना सा सच है।

कुरान चिंरतन है और पुराने मकबरे भी।

मकबरे किसी से एक शब्द भी नहीं बोलते

कुरान के रहस्यों को कोई खोजता ही नहीं।

मुल्ला बदायूनी लिखता है- ‘शहंशाह ने अब इस सूत्र को अपनाने का निश्चय किया कि कोई ईश्वर नहीं है, अल्लाह के सिवा और अकबर अल्लाह का दूत है। अकबर के इस निश्चय से हंगामे हो सकते थे इसलिए उसने इस सूत्र का प्रयोग एक निश्चित सीमा में अर्थात् हरम की सीमा तक ही रखा।’

मुल्ला बदायूनी लिखता है कि शहंशाह ने कुतुबुद्दीन मुहम्मद खाँ व शाहबाज खाँ को मनाने की बहुत कोशिश की किंतु उन्होंने शहंशाह का भारी विरोध किया। कुतुबुद्दीन खाँ ने बादशाह से कहा कि पश्चिम के सुल्तान जैसे इस्तंबूल के सुल्तान यह सुनेंगे कि हिंदुस्तान का बादशाह क्या कह रहा है तो वे क्या कहेंगे? क्योंकि उन सबका विश्वास है कि बादशाह की यह बात हास्यास्पद है कि बादशाह अल्लाह का दूत है।

मुल्ला लिखता है कि तब शहंशाह ने कुतुबुद्दीन मुहम्मद खाँ से पूछा कि यदि इस्तंबूल का वह सुल्तान गुप्त कार्य के लिए भारत में होता तो क्या वह मेरी इस बात का इतना विरोध करता या अपने लिए अच्छा स्थान रखने के लिए भारत से वापस इस्ताम्बूल चला जाता और यदि चला जाता तो क्या वहाँ इतना सम्मान पाता? इस पर शहबाज खाँ ने उत्तेजना से चिल्लाते हुए कहा- ‘वह शायद तत्काल चला जाता।’

मुल्ला लिखता है- ‘जब बीरबल अर्थात् वही जहन्नुम का कुत्ता, ने ईमान पर आक्रमण किया तो शहबाज खाँ ने बीरबल से कहा तू शापित काफिर है। तू इस तरह बात करता रहेगा जब तक मैं तुझसे बदला न ले लूं। इस प्रकार मामला गंभीर हो गया और शहंशाह ने वहाँ उपस्थित सभी लोगों से विशेषकर शहबाज खाँ से कहा, लोग कीचड़ भरे जूतों से तुम्हारे मुंह पीटेंगे?’

मुल्ला बदायूनी ने बादशाह के आचरण को इंगित करके लिखा है कि इस्लाम के विरुद्ध बादशाह का ऐसा आचरण देखकर मुल्क में एक ऐसी पीढ़ी आ गई जिसने इबादत छोड़ दी और अपनी वासनाओं के पीछे दौड़ पड़े। मदरसे और मस्जिदें लोपित हो गईं और बहुत से व्यक्तियों ने अपना पैतृक क्षेत्र छोड़ दिया तथा उनके बच्चे जो वहाँ रह गए, उन्होंने स्तरहीन व्यवहार में ही इज्जत पाई।

मुल्ला बदायूनी लिखता है कि हकीम-उल-मुल्क ने शेख अबुल फजल का विरोध किया। मुल्ला बदायूनी ने इस विरोध का कारण तो नहीं लिखा है किंतु अनुमान लागाया जा सकता है कि इस समय मुल्ला और उलेमा अकबर के साथ-साथ उसके खास मित्रों एवं सेवकों से भी नाराज थे जो यह मानते थे कि अकबर अल्लाह का दूत है।

संभवतः इसीलिए हकीम-उल-मुल्क ने शेख अबुल फजल का विरोध किया था। इस पर शहंशाह ने सख्ती दिखाई और हकीम-उल-मुल्क को अपना मुल्क छोड़कर हज पर मक्का जाने का आदेश दे दिया। शहंशाह की इस कार्यवाही से मुल्ला और उलेमा लोग और अधिक नाराज हो गए। उनकी स्पष्ट धारणा थी कि अकबर अल्लाह का दूत नहीं है।

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