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मौत का जाल बिछा दिया शेर खाँ ने (54)

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मौत का जाल बिछा दिया शेर खाँ ने

जब शेर खाँ को ज्ञात हुआ कि हुुमायूँ वापस जा रहा है तो वह जंगलों से निकल आया। उसने हुमायूँ के लिए मौत का जाल बिछा दिया। इस समय हुमायूँ की स्थिति उस चिड़िया की तरह थी जिसके पैरों में मौत का जाल था और उसे खतरे का आभास तक नहीं था।

जब बंगाल की राजधानी गौड़ पर अधिकार करने के बाद हुमायूँ को समाचार मिला कि मिर्जा हिंदाल ने बगावत कर दी है तथा कुछ मुगल अमीर एवं बेग, मिर्जा हिंदाल की तरफ हो गए हैं तो हुमायूँ गौड़ से आगरा के लिए रवाना हुआ तथा गंगाजी के किनारे चलता हुआ गौड़ से मुंगेर होता हुआ हाजीपुर (पटना के निकट) पहुंच गया। 

जब शेर खाँ को ज्ञात हुआ कि हुुमायूँ वापस जा रहा है तो वह जंगलों से निकल आया। उसने अपनी सेनाओं को रोहतास दुर्ग में एकत्रित होने के आदेश दिए। शेर खाँ हुमायूँ को जीवित ही आगरा तक नहीं पहुंचने देता था। इसलिए जब शेर खाँ की पर्याप्त सेनाएं रोहतास पहुंच गईं तो शेर खाँ इन सेनाओं को लेकर हाजीपुर के लिए रवाना हुआ। हाजीपुर पहुंचकर शेर खाँ ने नदी के दूसरे तट पर शिविर लगा लिया जिसके एक तरफ हुमायूँ का शिविर था।

जब हुमायूँ को समाचार मिला कि शेर खाँ भारी सेना लेकर आ रहा है तो हुमायूँ ने जौनपुर से बाबा बेग, चुनार से मीरक बेग और अवध से मुगल बेग की सेनाएं बुलवा लीं।

हाजीपुर पहुंचकर शेर खाँ ने हुमायूँ को एक बार फिर प्रस्ताव भिजवाया- ‘यदि बादशाह मुझे बंगाल का राज्य प्रदान कर दे तो मैं बादशाह को 10 लाख रुपए वार्षिक-कर चुकाउंगा, बादशाह के नाम का खुतबा पढ़वाउंगा, बादशाह के नाम के ही सिक्के ढलवाउंगा और बादशाह का स्वामिभक्त बनकर रहूंगा।’

तारीखे शेरशाही में लिखा है कि इस प्रस्ताव के जवाब में हुमायूँ ने लिखा- ‘मैं तुम्हें बंगाल का राज्य देने को तैयार हूँ किंतु इस समय तुमने मेरे राज्य की सीमाओं का अतिक्रमण करके तथा मेरे सामने अपनी सेनाएं खड़ी करके बहुत अनुचित कार्य किया है। तुम्हें मेरा उचित सम्मान करते हुए वापस लौट जाना चाहिए। मैं 2-3 पड़ाव तक तुम्हारा पीछा करूंगा किंतु उसके बाद वापस लौट आउंगा। यह मैं इसलिए करूंगा ताकि सारे सैनिक मेरी उत्तम सैनिक शक्ति से परिचित हो जाएं।’

मखजने अफगना के अनुसार भी हुमायूँ केवल दिखावे के लिए शेर खाँ का पीछा करना चाहता था ताकि हुमायूँ का सम्मान बना रहे। हुमायूँ ने शेख फरीद शकर गंज के वंशज शेख खलील को अपना पत्र देकर शेर खाँ के पास भेजा। उसके साथ बहुत सारे मुगल अधिकारी भेजे गए। इन लोगों ने शेर खाँ को बादशाह हुमायूँ का प्रस्ताव दे दिया। शेर खाँ ने उस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया।

विद्या भास्कर ने अपनी पुस्तक शेरशाह सूरी में लिखा है- ‘जब सारे मुगल अधिकारी शेर खाँ से बात करके उसके दरबार से चले गए तो शेर खाँ ने हुमायूँ के दूत शेख खलील को गुप्त रूप से अपने पास बुलवाया तथा उससे पूछा कि समस्त अफगान अमीर आपके पूर्वज शेख फरीद शकर गंज में विश्वास रखते आए हैं। उसी सम्बन्ध से मैं आपसे पूछता हूँ कि मुझे हुमायूँ से लड़ना चाहिए या लौट जाना चाहिए?’

शेख खलील ने कहा- ‘हालांकि मैं बादशाह हुमायूँ का दूत हूँ किंतु तुमने मुझे अपना जानकर मुझसे यह सवाल पूछा है तो मैं तुम्हें सलाह देता हूँ कि तुम्हें हुमायूँ से युद्ध करना चाहिए क्योंकि इस समय हुमायूँ की सेना बिखरी हुई है तथा उसके पास घोड़ों और पशुओं का अभाव है। तुम्हें इस अवसर का लाभ उठाना चाहिए। क्योंकि ऐसा स्वर्णिम अवसर तुम्हें जीवन में फिर कभी नहीं मिलेगा।’

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इस गुप्त-वार्तालाप के बाद शेख खलील तो हुमायूँ के शिविर में लौट गया और शेर खाँ संधि की शर्तों को मानने का दिखावा करते हुए अपना शिविर नदी से कई कोस पीछे ले गया। अब हुमायूँ ने अपनी सेनाओं को पुल की सहायता से नदी पार करने के आदेश दिए और वह यह दिखावा करते हुए नदी के दूसरी तरफ उतर गया कि वह शेर खाँ के विरुद्ध कार्यवाही करने जा रहा है। हुमायूँ तो शेर खाँ से हुई संधि को अपनी जीत समझ रहा था और एक विजेता की तरह अपने शत्रु का पीछा करने का दिखावा कर रहा था किंतु वास्तविकता यह थी कि यह हुमायूँ की जीत नहीं थी अपितु मौत का ऐसा भयानक जाल था जो शेर खाँ ने हुमायूँ के लिए बिछाया था। अगले दिन शेर खाँ को और पीछे हटना था किंतु शेर खाँ अपनी सेना की पंक्तियाँ सजाकर हुमायूँ की तरफ बढ़ने लगा। शेर खाँ की इस कार्यवाही से हुमायूँ हक्का-बक्का रह गया और युद्ध की तैयारी करने लगा किंतु शेर खाँ कुछ कोस आगे बढ़ने के बाद अपनी सेनाओं को वापस पीछे की तरफ ले गया जहाँ उसका शिविर लगा हुआ था। उसके पीछे हट जाने पर हुमायूँ ने चैन की सांस ली।

अगले दिन शेर खाँ ने फिर यही कार्यवाही की। वह दिन निकलते ही अपने सेना की पंक्तियाँ सजा कर हुमायूँ की तरफ कुछ कोस बढ़ा और कुछ देर बाद फिर से अपनी सेना को पीछे लौटाकर अपने शिविर में ले गया। हुमायूँ पुनः असमंजस की स्थिति में रहा कि एक बार संधि हो जाने के बाद शेर खाँ यह क्या कर रहा है?

उसी दिन आधी रात के समय शेर खाँ ने अपने सेनापतियों एवं मंत्रियों की एक बैठक बुलाई तथा उन्हें एक जोशीला भाषण दिया- ‘अब वह समय आ गया है जब अफगान, मुगलों को एक भीषण टक्कर देकर हमेशा के लिए समाप्त कर सकते हैं और अपने खोए हुए राज्य एवं जागीरें प्राप्त कर सकते हैं। अफगानों ने आपसी फूट के कारण अपनी सल्तनत खोई थी किंतु अब आपसी एकता के बल पर हमें अपनी सल्तनत वापस प्राप्त करनी है। आप लोग मेरा साथ दीजिए। नहीं तो हमेशा-हमेशा के लिए मिट जाइए।

अफगान सेनापतियों ने शेर खाँ को वचन दिया कि- ‘हम मरते दम तक अफगानियों की आजादी के लिए लड़ेंगे और हुमायूँ को मारकर फिर से अपना मुल्क कायम करेंगे। आपको हमारी स्वामिभक्ति और कर्त्तव्यपरायणता पर संदेह नहीं करना चाहिए। आप ही हमारे सुल्तान हैं। हम आपके लिए अपने प्राण भी देंगे किंतु युद्ध का मैदान नहीं छोड़ेंगे।’

शेर खाँ यही चाहता था। इसलिए उसने बहुत सोच-समझकर सारी योजना बनाई थी। वह अपने जीवन का अंतिम सबसे बड़ा दांव लगाने की तैयारी कर चुका था। उसने अफगान अमीरों एवं सेनापतियों से कहा कि हमें आज रात ही अपनी योजना को अमल में लाना होगा और इसी समय अपनी सेना को पंक्तिबद्ध करके एक पहर रात रहते कूच करना होगा।

शेर खाँ की योजना के अनुसार इस बार उसकी सेनाएं न तो हुमायूँ की तरफ गईं, न हुमायूँ से उलटी दिशा में गईं अपितु नदी के समानांतर रहते हुए ढाई कोस तक आगे बढ़ीं। शेर खाँ हुमायूँ के सेनापतियों को पहले ही सूचित कर चुका था कि वह महर्ता (महारथ चेरो) के देश पर आक्रमण करने जा रहा है। हुमायूँ के गुप्तचरों ने दिन निकलते ही हुमायूँ को सूचित किया कि शेर खाँ की सेनाएं महर्ता के देश की तरफ चली गई हैं। यह समाचार सुनकर हुमायूँ ने चैन की सांस ली।

इस समय हुमायूँ की स्थिति उस चिड़िया की तरह थी जो मौत के जाल में फंस चुकी थी और उसे खतरे का आभास तक नहीं था।

– डॉ. मोहनलाल गुप्ता

चौसा का युद्ध (55)

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चौसा का युद्ध

चौसा का युद्ध कोई युद्ध नहीं था किंतु हुमायूँ के भाग्य का विनाश करने वाला सिद्ध हुआ। चौसा नामक स्थान पर शेर खाँ सूरी ने अचानक ही हुमायूँ के शिविर में घुसकर शाही हरम की औरतें पकड़ लीं और हुमायूँ को जान बचाकर भागना पड़ा। इसी के साथ हिन्दुस्तान का तख्त और ताज दोनों ही हुमायूँ के हाथ से निकल गए!

25 एवं 26 जून 1539 के बीच वाली रात में शेर खाँ स्थानीय आदिवासी कबीले के सरदार महारथ चेरो पर आक्रमण करने का बहाना करके उस कबीले की दिशा में रवाना हो गया। जब हुमायूँ को यह समाचार मिले तो हुमायूँ ने संतोष की सांस ली तथा हुमायूँ की सेना में भी खुशियां मनाई जाने लगीं किंतु शेर खाँ ने ढाई कोस आगे जाकर अपनी सेना को आदेश दिए कि अब पीछे मुड़कर मुगल शिविर पर आक्रमण किया जाए। शेर खाँ के सेनापति इस आकस्मिक आदेश के लिए पहले से ही तैयार थे।

इस समय हुमायूँ का शिविर चौसा नामक गांव के निकट लगा हुआ था जो गंगाजी एवं कर्मनासा नदियों के बीच स्थित था। वर्षा-ऋतु आरम्भ हो चुकी थी तथा हुमायूँ के शिविर के आसपास बाढ़ का पानी फैला हुआ था। इसके कारण मुगलों की तोपें काम नहीं कर सकती थीं।

शेर खाँ ने पूर्व निर्धारित योजना के अनुसार अपनी सेना को तीन हिस्सों में बांट दिया। इनमें से एक सेना की अध्यक्षता स्वयं शेर खाँ कर रहा था, दूसरी सेना की अध्यक्षता उसका पुत्र जलाल खाँ कर रहा था और तीसरी सेना की अध्यक्षता अफगान अमीर खवास खाँ कर रहा था। इन तीनों सेनाओं ने अलग-अलग दिशा से हुमायूँ के शिविर की तरफ प्रस्थान किया।

जब तक हुमायूँ के गुप्तचर हुमायूँ को शेर खाँ के आने की सूचना पहुंचाते, तब तक शेर खाँ के अग्रिम-दस्ते हुमायूँ के शिविर तक पहुंच गए। मुगलों ने स्वप्न में भी इस स्थिति की कल्पना नहीं की थी फिर भी हुमायूँ की सेना ने आनन-फानन में लड़ने की तैयारी की। हुमायूँ के पास इतना समय ही नहीं बचा था कि वह अपने सैनिकों को पंक्तियों में खड़ा करे। उसके अधिकांश सैनिक तो अभी अपने तम्बुओं में ही थे।

विद्या भास्कर ने लिखा है कि जब शेर खाँ के सैनिक हुमायूँ के शिविर में घुसे तो शेर खाँ के सैनिकों ने क्षण भर में ही हुमायूँ के सैनिकों को खदेड़ दिया। हुमायूँ अभी वजू से ही निवृत्त नहीं हो पाया था कि उसे अपनी सेना के छिन्न-भिन्न हो जाने की सूचना मिली। इससे हुमायूँ इतना घबरा गया कि उसने अपनी बेगमों एवं बच्चों की भी परवाह नहीं की और शिविर छोड़कर भाग खड़ा हुआ। कुछ लेखकों के अनुसार हुमायूँ चुनार दुर्ग की तरफ भागा जो इन दिनों हुमायूँ के अधिकार में था।

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मुगल सेना कर्मनाशा के तट की ओर भागी। चूँकि अफगानों द्वारा नदी का पुल नष्ट कर दिया गया था इसलिये मुगलों ने तैरकर नदी पार करने का प्रयत्न किया। अफगानों ने बड़ी क्रूरता से मुगलों का वध किया। कर्मनाशा नदी के भीतर तथा उसके तट पर लगभग सात हजार मुगलों के प्राण गए जिनमें से कई बड़े अधिकारी भी थे। हुमायूँ स्वयं अपने घोड़े के साथ नदी में कूद पड़ा। घोड़ा नदी में डूब गया। हुमायूँ स्वयं भी डूबने ही वाला था कि निजाम नामक एक भिश्ती ने अपनी मशक की सहायता से उसके प्राण बचाये। कुछ लेखकों के अनुसार हुमायूँ ने हाथी पर बैठकर नदी पार करने का प्रयास किया। देखते ही देखते शेर खाँ की सेना ने हुमायूँ का पूरा शिविर अपने अधिकार में ले लिया। शेर खाँ ने हुमायूँ के पक्ष के बहुत से लोगों को मार दिया तथा बहुत से प्रमुख लोगों को जीवित ही पकड़ लिया। हुमायूँ तो भाग खड़ा हुआ था किंतु उसके हरम की स्त्रियां अपने ही डेरों में बैठी हुई भय से कांप रही थीं। उन्होंने इस क्षण की कल्पना तक नहीं की थी। उन्हें पता नहीं था कि जब जीवन में ऐसी स्थिति उत्पन्न हो जाए तब उन्हें क्या करना चाहिए। न वे भाग सकीं, न छिप सकीं। उनमें से बहुत सी औरतों ने स्वयं को भाग्य के हवाले कर दिया और आने वाली विपदा की प्रतीक्षा करने लगीं।

शेर खाँ ने अपने सेनापतियों को आदेश दिया कि मुगलिया हरम की औरतों को उनके डेरों से बाहर लाया जाए। जब हुमायूँ की मुख्य बेगम परदे से बाहर लाई गई तो शेर खाँ अपने घोड़े से उतर पड़ा। उसने बेगम के प्रति सम्मान प्रकट किया तथा उसे ढाढ़स दिलाया। इसका नाम बेगा बेगम था जो अपनी पुत्री अकीकः बेगम के साथ शिविर में मौजूद थी।

इस युद्ध को इतिहास की पुस्तकों में चौसा का युद्ध कहा गया है। वस्तुतः यह कोई युद्ध नहीं था अपितु शेर खाँ द्वारा बिछाया गया एक जाल था जिसमें हुमायूँ बड़ी आसानी से फंस गया था। इस युद्ध में बहुत कम लोग मारे गए थे। हुमायूँ की तरफ से न तो तोपों में बारूद भरा गया, न बंदूकें चलीं, न किसी सैनिक ने अपनी म्यान में से तलवार बाहर निकाली, न किसी ने बादशाह की परवाह की, न बादशाह ने किसी की परवाह की। हर किसी को अपने प्राण बचाने की पड़ी थी। इसलिए हुमायूँ तथा उसकी सेना सिर पर पैर रखकर भाग खड़े हुए।

कुछ लेखकों ने लिखा है कि इस युद्ध में आठ हजार मुगल सैनिक मारे गए। यह बात सही प्रतीत नहीं होती क्योंकि यदि हुमायूँ के सैनिकों से हथियार उठाए होते तो मुगल बेगमें अपने डेरों में ही न पकड़ी जातीं। कुछ लेखकों के अनुसार मुगलों की तरफ से सात हजार सैनिक मारे गए थे जो कि नदी में डूबने से मरे थे न कि युद्ध में लड़ते हुए।

मुगल औरतों को बंदी बनाने के बाद शेर खाँ ने उसी स्थान पर नमाज पढ़ी तथा आकाश की ओर देखते हुए दोनों हाथ फैलाकर अल्लाह के प्रति कृतज्ञता प्रकट की। भावावेश में शेर खाँ की आंखों से आंसू निकल पड़े।

नमाज पढ़ने के बाद शेर खाँ ने अपनी सेना में मुनादी करवाई कि कोई भी सैनिक किसी भी मुगल स्त्री-बच्चे तथा दासी को एक रात के लिए भी अपने खेमे में न रखे। यदि किसी सैनिक को कोई मुगल-स्त्री हाथ लगी हो तो वह उसे तत्काल बेगा बेगम के पड़ाव में पहुंचा दे। इस प्रकार रात होने से पहले ही समस्त मुगल स्त्रियां बेगम के पड़ाव में पहुंच गईं और सबको भोजन दिया गया।

डॉ. आशीर्वादी लाल श्रीवास्तव ने अपनी पुस्तक भारत का इतिहास में लिखा है कि चौसा के युद्ध में हुमायूँ की दो बेगमें और एक लड़की लापता हो गई तथा उसकी मुख्य पत्नी बेगा बेगम और उसकी पुत्री अकीकः बेगम जीवित ही पकड़ ली गईं। शेर खाँ की विजय के उपलक्ष्य में नगाड़े बजने लगे और हजारों अफगान युवक अपने घोड़ों से उतर कर नाचने लगे। आखिर उन्होंने ई.1526 में पानीपत के युद्ध में हुई अपनी हार का भरपूर बदला ले लिया था! बाबर का बेटा हार कर भाग गया था और बाबर के खानदान की बहू-बेटियां अफगानों के कब्जे में थीं।

– डॉ. मोहनलाल गुप्ता

बाबर के बेटे अपने ही भाई को नष्ट करने लगे (56)

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बाबर के बेटे - www.bharatkaitihas.com
बाबर के बेटे

बाबर (Babur) ने पूरी जिंदगी खपाकर हिन्दुस्तान में अपनी सल्तनत स्थापित की थी। हुमायूँ (Humayun) उस सल्तनत को विस्तार दे रहा था किंतु बाबर के बेटे बड़े निकम्मे निकले, वे अपने ही भाई को मारकर अपने बाप के द्वारा बनाई गई सल्तनत को नष्ट करने पर तुल गए!

26 जून 1539 का तड़का होते ही चौसा का युद्ध (Chousa Ka Yuddh) आरम्भ हुआ और आरम्भ होने के साथ ही समाप्त हो गया। मुगल शिविर में मची भगदड़ में मुगलों की बहुत सी औरतें गायब हो गईं।

गुलबदन बेगम ने लिखा है- ‘मुगल सेना परास्त हुई। बहुत से सम्बन्धी और मनुष्य पकड़े गए। बादशाह के हाथ में भी घाव लगा। चौसा के युद्ध के उपरांत मची गड़बड़ में कितनों का कुछ भी पता नहीं लगा। उनमें सुल्तान हुसैन मिर्जा की पुत्री आयशा सुल्तान बेगम, बेगा जान कोका, अकीकः बेगम तथा चांदबीबी शाही हरम की सम्माननीय महिलाएं भी सम्मिलित थीं जिनका कुछ भी पता नहीं चला। बाबर के महल की मुख्य दासी का नाम बचका था जिसे खलीफा भी कहा जाता था। वह भी इस यात्रा में हुमायूँ के हरम के साथ थी। बचका भी इस अफरा-तफरी में लापता हो गई। उसका क्या हुआ, कुछ पता नहीं चल सका।’

गुलबदन बेगम लिखती है- ‘बादशाह हुमायूँ ने अपने हरम की लापता औरतों की खूब तलाश करवाई किंतु उन्हें ढूंढा नहीं जा सका। इसलिए बादशाह चुनार में तीन दिन ठहर कर आरेल आए। जब नदी के किनारे पहुंचे तो यह देखकर चकित हुए कि नाव के बिना किस प्रकार पार उतरें। इसी समय राजा वीरभान बघेला सेना लेकर आ पहुंचा। उसने हुमायूँ का पीछा कर रहे मीर फरीद गोर पर हमला करके उसे भगा दिया। राजा वीरभान बघेला ने हुमायूँ को नदी पार करवा दी।’

हुमायूँ (Humayun) के सैनिक चार-पांच दिनों से बिना भोजन और बिना मदिरा के थे। राजा वीरभान ने उनके लिए खाने की वस्तुएं, शराब, मांस और आवश्यक वस्तुओं का बाजार लगवा दिया जिससे हुमायूँ की सेना के कुछ दिन आराम से बीत गए और घोड़े भी ताजी हो गए। जो सिपाही पैदल हो गए थे उन्होंने नया घोड़ा खरीद लिया।

राजा वीरभान की सहायता से बादशाह हुमायूँ कड़ा पहुंच गया। यहाँ से हुमायूँ (Humayun) की सल्तनत आरम्भ हो गई थी। इसलिए हुमायूँ को शाही सुविधाएं एवं संसाधन फिर से प्राप्त हो गए। गुलबदन बेगम ने लिखा है- ‘इस युद्ध के बाद हुमायूँ बीमार पड़ गया और पूरे चालीस दिन तक बीमार रहा।’

नियामतुल्ला नामक एक लेखक ने लिखा है- ‘कुछ दिनों बाद शेर खाँ ने हुमायूँ की मुख्य बेगम अर्थात् बेगा बेगम को हुसैन खाँ नीरक की देख-रेख में रोहतास दुर्ग में भेज दिया तथा अन्य मुगल स्त्रियों के लिए सवारियों का प्रबंध करके उन्हें आगरा भिजवा दिया। इस विजय के बाद शेर खाँ ने हजरत अली की उपाधि धारण की।’

जब हुमायूँ कड़ा से आगरा जा रहा था, तब मार्ग में ही हुमायूँ को सूचना मिली कि मिर्जा हिंदाल (Mirza Hindal) दिल्ली आ गया है और अपनी माता द्वारा मना किए जाने के उपरांत भी, उसने शाही-चिह्न धारण करके स्वयं को बादशाह घोषित कर दिया है।

गुलबदन बेगम ने लिखा है- ‘खुसरू बेग, जाहिद बेग तथा सैयद अमीर कन्नौज में एकत्रित हो गए। ये लोग बादशाह हुमायूँ से बगावत करके मिर्जा हिंदाल की तरफ हो गए थे। मुहम्मद सुल्तान मिर्जा भी कन्नौज आ गया था जो पहले बगावत करके गुजरात के सुल्तान बहादुरशाह की तरफ हो गया था। जब मिर्जा हिंदाल को समाचार मिला कि हुमायूँ आगरा आ रहा है तो हिंदाल दिल्ली चला गया। उसी समय मीर फुक्रअली, यादगार नासिर मिर्जा को दिल्ली ले आया और यादगार नासिर मिर्जा ने दिल्ली पर अधिकार कर लिया। मिर्जा हिंदाल तथा मिर्जा यादगार नासिर में मेल नहीं था। इसलिए मिर्जा हिंदाल ने दिल्ली घेर ली।’

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जब मिर्जा कामरान (Mirza Kamran) को यह समाचार मिले तो वह भी अपने 12 हजार सैनिक लेकर दिल्ली आ गया ताकि कामरान दिल्ली पर अधिकार कर सके। मीर फुक्रअली तथा यादगार नासिर मिर्जा ने दिल्ली के फाटक बंद कर लिए। इस पर कामरान ने मीर फुक्रअली के समक्ष संधि का प्रस्ताव भिजवाया। मीर फुक्रअली, बाबर के बेटे मिर्जा कामरान से अपनी सुरक्षा की प्रतिज्ञा करवाकर दिल्ली से बाहर आया तथा उसने कामरान से भेंट की। मीर फुक्रअली ने कामरान से कहा कि मिर्जा यादगार नासिर अपने स्वार्थ में डूबा हुआ है। इसलिए वह आपसे भेंट नहीं करना चाहता। मीर फुक्रअली ने कामरान को सलाह दी कि वह दिल्ली में अपना समय खराब न करे अपितु मिर्जा हिंदाल को बंदी बना ले और हुमायूँ के आगरा पहुंचने से पहले ही आगरा पहुंचकर आगरा का बादशाह बन जाए। मिर्जा कामरान (Mirza Kamran) को मीर फुक्रअली की सलाह पसंद आई। उसने मीर फुक्रअली को ही दिल्ली सौंप दी तथा स्वयं मिर्जा हिंदाल को अपने साथ लेकर आगरा आ गया। आगरा आकर कामरान ने बाबर के मकबरे के दर्शन किए। उस समय तक बाबर का शव काबुल नहीं ले जाया जा सका था और आगरा में ही एक मजार में दफ्न था।

कामरान (Mirza Kamran) ने आगरा में अपनी माता-बहिनों से भेंट की तथा गुलअफशां बाग में डेरा डाल दिया। पाठकों की सुविधा के लिए बता देना समीचीन होगा कि हुमायूँ का तीसरा भाई मिर्जा अस्करी इस समय हुमायूँ के साथ था और वह भी चौसा के युद्ध में जीवित बचकर हुमायूँ के साथ ही आगरा आ रहा था। उसके मन में भी बादशाह बनने की चाहत थी किंतु वह जानता था कि इस समय परिस्थितियाँ बगावत करने के लिए अनुकूल नहीं हैं।

कुछ दिन बाद नूरबेग आगरा आया और उसने बाबर के बेटे कामरान तथा हिंदाल को बताया कि बादशाह हुमायूँ (Humayun) आगरा पहुंचने वाले हैं। यह सुनकर बाबर के बेटे कामरान तथा मिर्जा हिंदाल दोनों ही हक्के-बक्के रह गए। उन्हें लगता था कि हुमायूँ चौसा से आगरा तक के मार्ग को निरापद रूप से पार नहीं कर सकेगा और शेर खाँ मार्ग में ही हुमायूँ का काम तमाम कर देगा किंतु कामरान तथा हिंदाल की आशा के विपरीत हुमायूँ न केवल जीवित था अपितु सकुशल आगरा पहुंचने वाला था।

यह सुनकर मिर्जा हिंदाल (Mirza Hindal) भयभीत होकर अपने राज्य अर्थात् मेवात को लौट गया। जब हुमायूँ आगरा पहुंचा तो उसी रात परिवार के सदस्यों के साथ मिर्जा कामरान ने भी हुमायूँ से भेंट की तथा कई दिनों तक हुमायूँ की हाजरी में रहकर उसकी सेवा करता रहा।

जब गुलबदन बेगम (Gul Badan Begum) ने हुमायूँ से भेंट की तो हुमायूँ (Humayun) गुलबदन बेगम को पहचान नहीं सका। इस पर हुमायूँ को बताया गया कि यह तुम्हारी बहिन गुलबदन है।

हुमायूँ ने कहा- ‘मैं हर समय तुम्हें याद करता था और अफसोस करता था कि तुम्हें बंगाल अभियान में अपने साथ नहीं ले गया किंतु जब चौसा की दुर्घटना हुई तो मुझे इस बात पर बड़ा संतोष हुआ कि तुम मेरे साथ नहीं थीं अन्यथा तुम्हारे साथ भी जाने क्या होता?आज मुझे अकीकः के लिए दुःख होता है कि क्यों मैं उसे अपने साथ ले गया। कौन जाने उस पर क्या बीत रही होगी? जब मैं जब बंगाल की यात्रा पर गया था तो तुम टोपी लगाया करती थीं किंतु अब तुम्हारा विवाह हो गया है और तुम टोपी की जगह घूंघट लगाती हो, इसलिए मैं तुम्हें नहीं पहचान सका।’

– डॉ. मोहनलाल गुप्ता

गुलबदन को बलपूर्वक लाहौर ले गया मिर्जा कामरान (57)

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गुलबदन को बलपूर्वक लाहौर ले गया मिर्जा कामरान

बाबर की एक स्त्री का नाम दिलदार बेगम था जिसकी कोख से गुलबदन तथा हिन्दाल का जन्म हुआ था। इन दोनों बच्चों को हुमायूँ की माता माहम सुल्ताना ने पाला था किंतु जब बाबर के दूसरे नम्बर के पुत्र मिर्जा कामरान ने अपने सौतेले भाई हुमायूँ से बगावत की तब मिर्जा हिन्दाल भी इस बगावत में शामिल हो गया। मिर्जा हिन्दाल की माता दिलदार बेगम तथा हिन्दाल की बहिन गुलबदन बेगम अब भी हुमायूँ के हरम में रहते थे।

हुमायूं चौसा के युद्ध से जीवित बच कर आगरा लौट आया था किंतु उसके भाइयों ने उसकी अनुपस्थिति में जो कुछ हरकतें की थीं, उनके कारण शाही परिवार में एक-दूसरे के प्रति अविश्वास का वातावरण बन चुका था। हुमायूँ ने इस अविश्वास को समाप्त करने का प्रयास किया।

गुलबदन बेगम ने लिखा है- ‘एक दिन बादशाह हुमायूँ अपने हाथ में कुरान लेकर दिलदार बेगम (हिंदाल तथा गुलबदन की माता) से मिलने आया। हरम की तमाम बेगमें भी वहीं पर आ जुटीं। बादशाह ने दासियों को वहाँ से हटा दिया और कुरान अपने निकट रखकर दिलदार बेगम से बोला, हिंदाल मेरा बल और स्तम्भ है। यहाँ तक कि मेरी आंखों का तेज, भुजा का बल, प्रेम और स्नेह का पात्र है। शेख बहलोल को मारने के बारे में हिंदाल से क्या कहूँ। जो भाग्य में लिखा था सो हुआ। अब मेरे हृदय में हिंदाल के लिए कुछ भी मालिन्य नहीं है और यदि आप सत्य न मानें, इतना कहकर हुमायूँ ने फिर से कुरान अपने हाथ में ले लिया, इस पर दिलदार बेगम ने हुमायूँ के हाथ से कुरान ले ली और हुमायूँ से कहा कि आप ऐसा क्यों करते हैं।’

इस पर हुमायूँ ने कहा- ‘ठीक है, गुलबदन बेगम जाकर हिंदाल मिर्जा को लिवा लाए।’

इस पर दिलदार बेगम ने कहा- ‘यह लड़की अभी छोटी है। इसने कभी अकेले यात्रा नहीं की है। यदि आज्ञा हो तो मैं जाऊं?’

हुमायूँ ने कहा- ‘आप हमारी माता हैं, मैं आपसे कैसे कहूं किंतु यदि आप जाएं तो हम सब पर बड़ी कृपा होगी।’

हुमायूँ की अनुमति मिलने पर मिर्जा हिंदाल की माता दिलदार बेगम स्वयं अलवर गई और हिंदाल को आगरा लिवा लाई।

जब हिंदाल बादशाह हुमायूँ की सेवा में उपस्थित हुआ तो बादशाह से क्षमा मांगते हुए बोला- ‘शेख बहलोल शेर खाँ को हथियार भिजवाता था, इसलिए मैंने उसे मार डाला।’

हुमायूँ ने हिंदाल को क्षमा कर दिया। हुमायूँ चाहता था कि चारों भाई मिलकर बाबर द्वारा स्थापित मुगलिया सल्तनत की रक्षा करें किंतु हुमायूँ के तीनों भाई हुमायूँ पर विश्वास नहीं करते थे और उनमें से प्रत्येक भाई स्वयं बादशाह बनने का स्वप्न देख रहा था। इसलिए हुमायूँ के किसी भी भाई ने हुमायूँ का साथ नहीं दिया।

गुलबदन बेगम ने लिखा है- ‘जब बादशाह हुमायूँ चौसा से निकलकर नदी पार कर रहा था तब वह एक भंवर में फंस गया। इस पर एक मसकची ने हुमायूँ के प्राण बचाए तथा उसे नदी पार करवाई। इसलिए बादशाह उसे अपने साथ आगरा ले आया तथा उसे अपना विश्वस्त अनुचर बना लिया। बादशाह ने एक दिन सब अमीरों को बुलाकर उनके सामने मसकची अर्थात् भिश्ती को अपने तख्त पर बैठाया और उसे दो दिन की बादशाही प्रदान की। हुमायूँ ने अपने अमीरों को आज्ञा दी कि वे मसकची को बादशाह समझकर सलाम करें तथा दो दिनों में वह जो भी आज्ञा दे उसका पालन करें।’

मसकची ने दो दिन तक बादशाही की तथा अपनी मर्जी के अनुसार अपने लोगों को जागीरें तथा मनसब प्रदान किए।

गुलबदन बेगम ने लिखा है- ‘मिर्जा हिंदाल तथा मिर्जा कामरान दोनों ही उस दरबार में नहीं आए। मिर्जा हिंदाल तो वापस अलवर चला गया और मिर्जा कामरान ने बीमारी का बहाना करके कहलवाया कि गुलाम को कुछ और पुरस्कार देना चाहिए था। उसे तख्त पर बैठाना कितना उचित है जबकि शेर खाँ पास पहुंचने वाला है। आप ऐसा काम क्यों करते हैं?

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गुलबदन बेगम ने लिखा है कि कामरान सचमुच बीमार था और इतना निर्बल एवं अशक्त हो गया था कि उसका मुँह भी नहीं पहचाना जा सकता था। कामरान को संदेह था कि बादशाह हुमायूँ की सम्मति से ही किसी माता ने कामरान को जहर दे दिया था। जब कामरान के संदेह की बात हुमायूँ तक पहुंची तो हुमायूँ स्वयं कामरान से मिलने उसके महल में गया तथा उसने शपथ खाकर कहा कि मेरे मन में यह विचार कभी नहीं आया और न ही मैंने ऐसा किसी से कहा है। हुमायूँ के सौगंध खाने पर भी कामरान के मन का संदेह दूर नहीं हुआ। उसका रोग दिन पर दिन बढ़ने लगा। यहाँ तक कि वह बोलने में भी असमर्थ हो गया। कुछ ही दिनों बाद हुमायूँ को समाचार मिले कि शेर खाँ लखनऊ होते हुए आगरा की ओर बढ़ रहा है तो हुमायूँ ने भी एक सेना लेकर कन्नौज के लिए प्रस्थान किया। कुछ इतिहासकारों ने लिखा है कि इस समय कामरान के पास बीस हजार सैनिक थे। हुमायूँ ने कामरान से कहा कि वह अपनी सेना को मेरे साथ कन्नौज भेज दे किंतु कामरान ने मना कर दिया। इसी प्रकार मिर्जा हिंदाल बिना कुछ कहे-सुने अलवर चला गया। हुमायूँ ने मिर्जा अस्करी से सहायता मांगी किंतु मिर्जा अस्करी ने भी हुमायूँ को निकम्मा समझ कर उसकी सहायता करने से मना कर दिया।

आशीर्वादी लाल श्रीवास्तव ने लिखा है- ‘मूर्ख कामरान को लगता था कि यदि शेर खाँ ने आगरा पर अधिकार कर लिया तो वह कामरान को पंजाब एवं हिसार फिरोजा पर शांति से शासन करने देगा।’

हुमायूँ इस समय मुसीबत में था और शेर खाँ जैसा प्रबल शत्रु आगरा की ओर बढ़ा चला आ रहा था इसलिए हुमायूँ ने अपने भाइयों से कुछ नहीं कहा और स्वयं ही एक सेना लेकर कन्नौज चला गया। इस समय तक चौसा से भागे हुए मुगल सैनिक आगरा पहुंच चुके थे तथा नए सैनिकों की भर्ती की जा चुकी थी। इस कारण हुमायूँ के पास 90 हजार सैनिक हो गए थे।

जब हुमायूँ गंगाजी के पार चला गया तो कामरान ने भी आगरा छोड़ दिया तथा लाहौर की तरफ चल दिया। कामरान ने हुमायूँ को पत्र लिखकर सूचित किया कि मेरा स्वास्थ्य बहुत खराब है इसलिए मैं आगरा से लाहौर जा रहा हूँ। यदि आप गुलबदन बेगम को भी मेरे साथ जाने की आज्ञा दें तो आपकी बड़ी कृपा होगी। क्योंकि वह मेरी सेवा अच्छी तरह कर सकती है।

हुमायूँ ने गुलबदन बेगम को कामरान के साथ लाहौर जाने की आज्ञा दे दी किंतु गुलबदन की माता दिलदार बेगम ने कामरान से कहा कि यह छोटी है तथा इसने कभी भी हम लोगों के बिना यात्रा नहीं की है, इसलिए इसे मत ले जाओ। इस पर कामरान ने दिलदार बेगम से कहा कि आप भी इसके साथ चलिए। गुलबदन भी कामरान के साथ नहीं जाना चाहती थी किंतु कामरान ने पांच सौ सैनिक, बहुत सी दासियों एवं धाय माताओं को आदेश दिए कि वे गुलबदन को ले आएं।

गुलबदन ने लिखा है- ‘अंत में बहुत रोने-पीटने पर भी मैं अपनी माता, बहिनों और विमाताओं से बलात् अलग की गई। मैंने बादशाह हुमायूँ को पत्र लिखा कि मुझे आपसे ऐसी आशा नहीं थी कि आप मुझे अपनी सेवा से अलग करके कामरान को दे देंगे।’

इस पर हुमायूँ ने गुलबदन बेगम को सलामनामा भेजकर सूचित किया- ‘मैं तुम्हें कामरान को नहीं देना चाहता था किंतु मिर्जा कामरान ने बहुत हठ और विनय किया इसलिए मेरे लिए आवश्यक हो गया कि मैं तुम्हें कामरान को सौंप दूं। क्योंकि अभी हम एक भारी काम में लगे हुए हैं। जब यह काम निबट जाएगा, तब तुम्हें वापस बुलवाउंगा।’

गुलबदन के वर्णन से यह स्पष्ट नहीं होता कि मिर्जा कामरान अपनी इस सौतेली बहिन को किस उद्देश्य से बलपूर्वक अपने साथ लाहौर ले गया और गुलबदन उसके साथ क्यों नहीं जाना चाहती थी!

जब मिर्जा कामरान आगरा से लाहौर जाने लगा तो आगरा के बहुत से अमीरों और व्यापारियों ने अपने बाल-बच्चों को कामरान के काफिले के साथ लाहौर भेज दिया। संभवतः उन्हें आशंका थी कि शेर खाँ इस बार भी हुमायूँ को आसानी से परास्त कर देगा। यदि ऐसा हुआ तो किसी भी मुगल अमीर एवं व्यापारी का परिवार आगरा में सुरक्षित नहीं बचेगा। इसी आशंका से भयभीत होकर लोग अपने परिवारों को आगरा से लाहौर भेज रहे थे।              

– डॉ. मोहनलाल गुप्ता

बिलग्राम का युद्ध बिना गोली चलाए हार गया हुमायूँ! (58)

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बिलग्राम का युद्ध बिना गोली चलाए हार गया हुमायूँ

जिस तरह चौसा का युद्ध कोई वास्तविक युद्ध नहीं था, उसी प्रकार बिलग्राम का युद्ध कोई वास्तविक युद्ध नहीं था। इन दोनों युद्धों में न तो शेर खाँ सूरी ने एक भी गोली चलाई और न हुमायूँ की तरफ से कोई गोली चली। फिर भी इन दोनों युद्धों में हुमायूँ की करारी हार हुई तथा शेर खाँ के लिए हिन्दुस्तान का तख्त खाली हो गया।

चौसा का युद्ध विजय करने के बाद शेर खाँ ने स्वयं को बनारस में स्वतन्त्र शासक घोषित कर दिया और सुल्तान-ए-आदिल की उपाधि धारण की। अफगान सेना ने बंगाल को फिर से जीत लिया और वहाँ के मुगल गवर्नर जहाँगीर कुली खाँ की हत्या कर दी। अब शेर खाँ ने भारत विजय की योजना बनाई। उसने अपने पुत्र कुत्ब खाँ को यमुना नदी के किनारे-किनारे आगरा की ओर बढ़ने का आदेश दिया और स्वयं एक सेना के साथ कन्नौज के लिए चल पड़ा।

13 मार्च 1540 को हुमायूँ 90 हजार सैनिक लेकर कन्नौज के लिए रवाना हुआ। कालपी के निकट मुगल सेना का कुत्ब खाँ से भीषण संघर्ष हुआ जिसमें कुत्ब खाँ परास्त हुआ और मारा गया। हुमायूँ ने गंगा नदी पार करके उसके किनारे पड़ाव डाल दिया। अब वह शेर खाँ की गतिविधियों पर बारीकी से दृष्टि रखने लगा।

शेर खाँ अपने सेनापति खवास खाँ की प्रतीक्षा कर रहा था जिसे बंगाल-विजय के लिए भेजा गया था। जब खवास खाँ कन्नौज आ गया तब शेर खाँ युद्ध करने के लिए तैयार हो गया।

यह हुमायूँ की अदूरदर्शिता थी कि उसने खवास खाँ के आने से पहले ही शेर खाँ पर हमला नहीं किया। यदि हुमायूँ ऐसा कर सकता तो उसे शेर खाँ की आधी सेना से ही लड़ना पड़ता किंतु हुमायूँ में दूरदृष्टि का अभाव था और वह रणनीति बनाने के मामले में बिल्कुल ही अनाड़ी सिद्ध हुआ।

गंगाजी के एक ओर शेर खाँ का शिविर था और गंगाजी के दूसरी ओर मुगलों का शिविर था। दोनों शिविरों के बीच 23 मील की दूरी थी। अप्रैल के महीने में हुमायूँ की सेना ने गंगाजी को पार करके गंगाजी से तीन मील दूर बिलग्राम के निकट अपना शिविर स्थापित किया। मुगलों की सेना, अफगान सेना की अपेक्षा कुछ निचले स्थान में थी। 15 मई 1540 को बड़ी भारी वर्षा हुई जिसके कारण हुमायूँ का शिविर वर्षा के पानी से भर गया।

हुमायूँ ने चौसा के युद्ध से सबक लेते हुए अपनी सेना को ऊंचे स्थान पर ले जाने का प्रयत्न किया किंतु यही वह क्षण था जिसकी प्रतीक्षा शेर खाँ को थी। जब मुगल सेना अपना शिविर-स्थल बदलने में व्यस्त थी तब शेर खाँ मुगल सेना के दोनों पक्षों अर्थात् दाएं और बाएं तरफ से टूट पड़ा। इस कारण इस बार भी हुमायूँ को अपनी तोपें तथा बंदूकें चलाने का अवसर नहीं मिल सका।

हुमायूँ और उसके सेनापति मिर्जा हैदर ने आनन-फानन में मोर्चा संभाला तथा अपने सैनिकों को युद्ध करने के आदेश दिए किंतु तब तक ऐसी अफरा-तफरी मच गई थी कि मुगल सेना कुछ करने की स्थिति में नहीं आ सकी। मिर्जा हैदर ने लिखा है- ‘एक गोली तक नहीं चलाई गई। गोला बारूद का कतई काम नहीं पड़ा।’

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अफगानों का आक्रमण ऐसा भयंकर था कि मुगलों के छक्के छूट गए और वे युद्ध-स्थल से भाग निकले। भगदड़ के कारण शिविर के असैनिक कर्मचारी भेड़िया-धसान के समान सैनिकों के सामने आ गए जिससे मुगल सैनिकों को रोके रखने के हुमायूँ के सारे प्रयत्न निष्फल हो गए। हुमायूँ को भी लाचार होकर आगरा की तरफ भागना पड़ा। बड़ी कठिनाई से वह नदी पार कर सका। उसके बहुत से आदमी नदी में डूब गए और बहुत कम लोग हुमायूँ के साथ रह गए। रास्ते में मैनपुरी जिले में भोगांव के लोगों ने हुमायूँ के दल पर आक्रमण कर दिया जिसके कारण हुमायूँ के प्राण संकट में पड़ गए किंतु हुमायूँ वहाँ से भी जीवित बच निकलने में सफल रहा। भारत के इतिहास में इस युद्ध को कन्नौज का युद्ध अथवा बिलग्राम का युद्ध कहते हैं। बाबर ने तोपों और बंदूकों के बल पर सिंधु नदी से लेकर गंगाजी के अंतिम छोर तक का भारत जीता था किंतु हुमायूँ ने बिना कोई तोप और बंदूक चलाए इस विशाल क्षेत्र की बादशाहत गंवा दी। हुमायूँ एक कुशल योद्धा एवं अनुभवी सेनापति था। ग्यारह साल की आयु से ही उसने युद्धों में भाग लेना तथा युद्धों का नेतृत्व करना आरम्भ कर दिया था, फिर भी हुमायूँ एक अदने से जागीरदार के बेटे शेर खाँ से कैसे परास्त हो गया, इस बात पर विचार किया जाना आवश्यक है।

हुमायूँ ने शेर खाँ के हाथों जिस तरह चौसा का युद्ध हारा था, उसी तरह बिलग्राम का युद्ध भी हारा। कोई भी अनुभवी बादशाह ऐसी मूर्खताएं नहीं करता, जैसी मूर्खताएं हुमायूँ ने कीं।

इतिहासकारों ने हुमायूँ की विफलता के कई कारण बताए हैं। उसकी विफलता का सबसे बड़ा कारण उसके भाइयों की गद्दारी को माना जा सकता है। जब भी हुमायूँ किसी युद्ध पर जाता था, तभी उसका कोई न कोई भाई सल्तनत के किसी न किसी हिस्से को दबाने का प्रयास करता था। इस कारण पंजाब हुमायूँ के हाथ से निकल गया और हुमायूँ पंजाब से मिलने वाले राजस्व एवं सैनिकों से वंचित हो गया।

मुहम्मद जमां मिर्जा, मुहम्मद सुल्तान मिर्जा, मेंहदी ख्वाजा आदि तैमूर-वंशीय मिर्जा, बाबर के सहयोगी रहे थे तथा स्वयं को बाबर के समान ही मंगोलों के तख्त का अधिकारी समझते थे। उन्होंने भी हुमायूँ के साथ गद्दारी की तथा गुजरात के शासक बहादुरशाह से जाकर मिल गए। इस कारण हुमायूँ की सल्तनत की शक्ति का वास्तविक आधार खिसक गया था।

हुमायूँ को एक साथ ही बहादुरशाह और शेर खाँ से युद्ध लड़ने पड़े। इस कारण हुमायूँ को अपनी शक्ति को एक स्थान पर केन्द्रित करने की बजाय दो स्थानों में बांटना पड़ा। हुमायूँ स्वयं भी कुछ विलासी हो गया था जिसके कारण वह प्रायः समय पर कार्यवाही नहीं कर पाता था और न दूरदृष्टि रखते हुए अपनी ओर से कोई रणनीति बना पाता था।

हुमायूँ की धर्मांधता भी उसके डूबने का बहुत बड़ा कारण थी। जब मेवाड़ की राजमाता ने हुमायूँ को राखी भेजकर मित्रता का हाथ बढ़ाया था, तब हुमायूँ बहादुरशाह द्वारा गढ़ी गई जेहाद की राजनीति में फंसकर रह गया और उसने शक्तिशाली मेवाड़ियों की मित्रता का अवसर हाथ से खो दिया। यदि उसने मेवाड़ियों को अपना मित्र बनाया होता तो संभव है कि हुमायूँ को मेवाड़ियों की वैसी ही सहायता मिली होती जैसी सहायता उसे राजा वीरभान बघेला से मिली थी और उसके प्राण बचे थे।

बिलग्राम के युद्ध में विजयी होने के बाद शेर खाँ ने शेरशाह की उपाधि धारण की, अपने नाम का खुतबा पढ़वाया और अपने नाम की मुद्राएँ चलवाईं। यही कारण है कि इतिहास की पुस्तकों में शेर खाँ को शेरशाह सूरी कहा जाता है।

– डॉ. मोहनलाल गुप्ता

हरम की औरतें मार डालना चहता था हुमायूँ (59)

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हरम की औरतें मार डालना चहता था हुमायूँ

शेर खाँ के हमलों से हुमायूँ इतना भयभीत हो गया कि वह अपने हरम की औरतें मार डालना चाहता था ताकि वे शेर खाँ के सैनिकों के हाथों में न पड़ सकें तथा उनके साथ अफगान सैनिक बलात्कार न कर सकें।

कन्नौज अथवा बिलग्राम के युद्ध में परास्त होने के बाद हुमायूँ बड़ी कठिनाई से अपने प्राण बचा सका और किसी तरह नदी पार करके आगरा की तरफ चल दिया। उसके बहुत से सैनिक अफगानों द्वारा मार डाले गए और बहुत से सैनिक गंगाजी पार करते समय डूब कर मर गए। इस कारण हुमायूँ के पास बहुत कम सैनिक रह गए।

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हुमायूँ बड़ी कठिनाई से आगरा तक पहुंच सका किंतु शेरशाह ने हुमायूँ का पीछा नहीं छोड़ा। गुलबदन बेगम ने लिखा है कि हमारे लाहौर पहुंचने के कुछ दिन बाद हमें कन्नौज में शाही सेना के परास्त होने तथा बादशाह हुमायूँ के जीवित बचकर आगरा की तरफ जाने के समाचार मिले। पाठकों को स्मरण होगा कि जब हुमायूँ कन्नौज की लड़ाई के लिए जा रहा था तब कामरान बलपूर्वक अपनी सौतेली बहिन गुलबदन को अपने साथ लाहौर ले गया था। अब शेरशाह हुमायूँ को संभलने का अवसर नहीं देना चाहता था। इसलिए शेरशाह ने एक सेना सम्भल की ओर तथा दूसरी सेना आगरा की ओर भेजी। हुमायूँ अत्यन्त भयभीत हो गया। वह केवल एक रात आगरा में रहा तथा दूसरे दिन अपने हरम की औरतें तथा खजाना लेकर दिल्ली के लिए रवाना हो गया। हुमायूँ के पास कोई सेना नहीं थी, इसलिए वह जानता था कि दिल्ली में रुकना व्यर्थ है। अतः उसने अपने भाई मिर्जा हिंदाल के पास अलवर जाने का निश्चय किया। हुमायूँ अपने हरम तथा खजाने के साथ अलवर पहुंचा किंतु वहाँ पहुंचकर हुमायूँ को लगा कि अलवर में रुकने से भी कोई लाभ नहीं है क्योंकि मिर्जा हिंदाल के पास भी इतनी सेना नहीं है कि वह शेर खाँ की सेना से लड़ सके।

अतः हुमायूँ और हिंदाल ने अजमेर होते हुए लाहौर जाने का मार्ग पकड़ा ताकि हरम की औरतें कामरान के पास सुरक्षित पहुंचाई जा सकें।

गुलबदन बेगम ने लिखा है- ‘बादशाह हुमायूँ ने हिंदाल से कहा कि चौसा की दुर्घटना के समय अकीकः बीबी खो गई थी, इस कारण मैं बहुत दुःखी रहता हूँ कि मैंने उसे युद्ध से पहले ही क्यों नहीं मार डाला। अब भी स्त्रियों का हमारे साथ सुरक्षित स्थान पर पहुंचना कठिन है। अतः क्यों न क्यों न हरम की औरतें मार डाली जाएं?’

इस पर मिर्जा हिंदाल ने बादशाह से प्रार्थना की कि- ‘माता और बहिनों को मारना कैसा पाप है सो आप पर स्वयं प्रकट है परन्तु जब तक मेरे शरीर में प्राण हैं तब तक मैं उनकी सेवा में अथक परिश्रम करता हूँ और आशा करता हूँ कि अल्लाह की कृपा से मैं माता और बहिनों के चरणों में अपने प्राण न्यौछावर करूंगा!’

गुलबदन बेगम ने इस सम्बन्ध में आगे कुछ नहीं लिखा है किंतु इतिहास में इस बात का कोई प्रमाण नहीं मिलता कि हुमायूँ ने मुगल हरम की औरतें शत्रुओं के हाथों में पड़ने के भय से मारी हों। अतः अनुमान लगाया जा सकता है कि हिंदाल की बात सुनकर हुमायूँ ने अपना विचार बदल दिया। संभवतः हुमायूँ ने हरम की औरतें मिर्जा हिंदाल के संरक्षण में दे दीं।

गुलबदन बेगम ने लिखा है- ‘मिर्जा हिंदाल अपनी माता दिलदार बेगम, बहिन गुलचेहर बेगम, बेगम अफगानी आगाचः, गुलनार आगाचः, नाजगुल आगाचः और अमीरों की स्त्रियों को आगे करके चले। मार्ग में एक स्थान पर गंवारों ने उन पर आक्रमण किया। मिर्जा हिंदाल के सैनिकों ने बड़ी कठिनाई से उन गंवारों पर नियंत्रण पाया और बाबर के खानदान की औरतों की रक्षा की।’

यह घटना किस स्थान की है और आक्रमणकारी गंवार कौन थे, इसके बारे में कोई जानकारी नहीं मिलती है।

बिहार की तरह पंजाब में भी रोहतास नामक एक दुर्ग है। यह अब भी हुमायूँ के अधीन था। हुमायूँ और हिंदाल अपने परिवारों को लेकर रोहतास पहुंचे किंतु यहाँ रुकने से भी कोई लाभ नहीं होने वाला था क्योंकि जब हुमायूँ और हिंदाल के पास सेना ही नहीं थी तो दुर्ग की रक्षा कौन करता!

अब दोनों भाइयों ने लाहौर के लिए प्रस्थान किया। उनके सामने सबसे बड़ी समस्या अपने परिवार को सुरक्षित बनाने की थी। उन्हें लगता था कि कामरान अवश्य ही बाबर के खानदान की औरतों एवं बच्चों को संरक्षण प्रदान करेगा क्योंकि कामरान के पास पर्याप्त बड़ी सेना थी।

कुछ समय में ये दोनों भाई अपनी योजना के अनुसार लाहौर पहुंच गए। हालांकि हुमायूँ और कामरान के बीच विश्वास का वातावरण नहीं था किंतु इस समय हुमायूँ के पास कामरान से सहायता प्राप्त करने के अतिरिक्त और कोई सहारा नहीं था।

गुलबदन बेगम ने लिखा है कि लाहौर में बीबी हाजताज के पास ख्वाजः गाजी का बाग है। बादशाह का काफिला वहीं पर आकर ठहरा। बादशाह तीन महीने तक लाहौर में रहा। लाहौर में हुमायूँ को सूचना मिली कि शेरशाह ने आगरा तथा दिल्ली पर बिना किसी लड़ाई के ही अधिकार कर लिया है तथा अब वह पंजाब की ओर बढ़ रहा है। शेरशाह प्रतिदिन दो-तीन कोस बढ़ता हुआ सरहिंद पहुंच गया।

कामरान तो लाहौर में था ही, कुछ ही दिनों बाद मिर्जा अस्करी भी उनसे आ मिला। चारों भाइयों ने मिलकर बाबर के खानदान पर आई इस विपत्ति पर विचार किया परन्तु उन्हें शेर खाँ से लोहा लेना असम्भव प्रतीत हुआ।

हुमायूँ ने मुजफ्फर बेग तुर्कमान नामक अमीर को काजी अब्दुल्ला के साथ शेरशाह के पास भेजकर कहलवाया- ‘यह क्या न्याय है? कुल देश हिंदुस्तान को तुम्हारे लिए छोड़ दिया है, एक लाहौर बचा है। हमारे और तुम्हारे मध्य में सरहिंद सीमा रहे।’

शेरशाह ने हुमायूँ को जवाब भिजवाया- ‘तुम्हारे लिए काबुल छोड़ दिया है, तुम वहाँ जाकर रहो।’

गुलबदन ने लिखा है- ‘शेरशाह का उत्तर लेकर मुजफ्फर बेग उसी समय सरहिंद से लाहौर के लिए रवाना हो गया। उसने हुमायूँ से कहा कि तुरंत कूच करना चाहिए। समाचार सुनते ही बादशाह हुमायूँ ने लाहौर से रवानगी की। वह दिन मानो प्रलय का दिन था कि सजे हुए सामानों और सब स्थानों को वैसे ही छोड़ दिया गया केवल सिक्के साथ लिए गए। अल्लाह को धन्यवाद है कि लाहौर की नदी का उतार मिल गया जिससे सब मनुष्य नदी के पार उतर गए। हुमायूँ भी रावी नदी को पार करके दूसरी तरफ चला गया।’

– डॉ. मोहनलाल गुप्ता

दर-दर के भिखारी हो गए बाबर के बेटे (60)

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दर-दर के भिखारी हो गए बाबर के बेटे

सल्तनत के लालची बाबर के बेटे आपसी कलह, हुमायूँ की अयोग्यता एवं शेर खाँ सूरी की महत्वाकांक्षाओं के कारण दर-दर के भिखारी होकर भारत की भूमि से भाग जाने की तैयारी करने लगे। ऐसे समय में भी मिर्जा कामरान ने दुष्टता नहीं छोड़ी।

इस समय तक शेर खाँ ने आगरा तथा दिल्ली पर अधिकार कर लिया था और अपनी ताजपोशी करवाकर स्वयं को भारत का सुल्तान घोषित कर चुका था। अब उसने अपना नाम शेर खाँ के स्थान पर शेरशाह सूरी रख लिया था!

जब हुमायूँ ने भयभीत होकर लाहौर छोड़ दिया तथा वह रावी नदी पार करके उसके पश्चिमी तट पर चला गया तब कुछ दिन बाद शेर खाँ का सूरी का दूत हुमायूँ से मिलने आया। इस समय तक बाबर के बेटे भले ही दर-दर के भिखारी हो गए थे किंतु अब भी वे बादशाहों की तरह दरबार लगाने के मंसूबे पाले हुए थे।

हुमायूँ ने कहा- ‘अगले दिन सुबह उसे मेरे दरबार में हाजिर किया जाए।’

मिर्जा कामरान ने हुमायूँ से कहा- ‘कल मजलिस होगा और शेर खाँ का एलची आएगा। उस समय यदि मैं आपके गलीचे के कौने पर बैठूं तो शेर खाँ के दूत के सामने मेरी प्रतिष्ठा होगी।’

हुमायूँ ने कामरान की इस बात का क्या उत्तर दिया, इसकी तो जानकारी नहीं मिलती किंतु इतना अनुमान लगाया जा सकता है कि हुमायूँ अवश्य ही कामरान की दुष्टता को समझ गया होगा कि अब कामरान स्वयं को बादशाह के बराबर मानने लगा है।

गुलबदन बेगम ने लिखा है- ‘यह बात सुनकर बादशाह का हृदय सुस्त हो गया जिससे उसे निद्रा सी आ गई। उसने स्वप्न में देखा कि सिर से पांव तक हरा कपड़ा पहने हुए और हाथ में छड़ी लिए हुए एक पुरुष आया है जो कहता है कि धैर्य रखो, शोक मत करो। उसने अपनी छड़ी बादशाह के हाथ में देकर कहा कि अल्लाह तुम्हें एक पुत्र देगा जिसका नाम जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर होगा। बादशाह ने पूछा कि आपका क्या नाम है? इस पर उस पुरुष ने उत्तर दिया- जिंदाफील अहमद जाम। उस पुरुष ने यह भी कहा कि तुम्हारा वह पुत्र मेरे अंश से होगा।’

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दर-दर के भिखारी हुमायूँ की बेगम बीबी गौनूर उस समय गर्भवती थी। बादशाह द्वारा दिन में देखे गए सपने के आधार पर सबने अनुमान लगाया कि बीबी गौनूर को पुत्र होगा। कुछ दिनों बाद बीबी गौनूर ने एक पुत्री को जन्म दिया जिसका नाम बख्शीबानू बेगम रखा गया। गुलबदन बेगम ने कामरान की इस मांग पर कि मुझे बादशाह के गलीचे के कौने पर बैठने की अनुमति दी जाए, हुमायूँ को नींद आने तथा दिन में ही स्वप्न देखकर जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर के जन्म की भविष्यवाणी सुनने की बात  लिखकर इस पूरे प्रकरण का पटाक्षेप कर दिया है तथा संकेतों में ही यह कहने का प्रयास किया है कि कामरान की दुष्टता से हुमायूँ घबरा गया किंतु फरिश्तों ने हुमायूँ को हिम्मत न हारने का ढाढ़स दिलाया। मिर्जा हैदर ने हुमायूँ को सलाह दी कि हुमायूँ को काश्मीर चले जाना चाहिए तथा वहीं से पुनः भारत विजय का आयोजन करना चाहिए। दूसरी ओर मिर्जा हिंदाल तथा यादगार मिर्जा की राय थी कि हुमायूँ को सिंध होते हुए गुजरात जाना चाहिए तथा वहाँ से भारत विजय की प्राप्ति का प्रयास करना चाहिए।

अभी ये वार्ताएं चल ही रही थीं कि हुमायूँ को ज्ञात हुआ कि कामरान तथा शेरशाह सूरी के बीच गुप्त पत्र-व्यवहार चल रहा है। कामरान ने इस शर्त पर शेरशाह को सहयोग देने का वचन दिया है कि शेरशाह पंजाब और काबुल कामरान के अधिकार में छोड़ दे।

इस पर हुमायूँ समझ गया कि कामरान दगा करेगा, उस पर भरोसा करके लाहौर में रुकना स्वयं ही मौत के फंदे में फंसने जैसा है। इसलिए दर-दर के भिखारी हुमायूँ ने मिर्जा हैदर की सलाह मानते हुए काश्मीर के लिए प्रस्थान किया। इस पर मिर्जा हिंदाल हुमायूँ से नाराज होकर सिंध की तरफ चला गया। जब हुमायूँ ने काश्मीर के लिए प्रस्थान करने का विचार किया तब हुमायूँ को सूचना मिली कि कामरान ने एक सेना भेजकर काश्मीर का मार्ग अवरुद्ध कर दिया है ताकि हुमायूँ काश्मीर नहीं जा सके।

इस पर हुमायूँ ने अपना मार्ग बदलकर बदख्शां की तरफ जाने का विचार किया जो अब तक हुमायूँ के अपने अधिकार में था तथा जिसका रास्ता काबुल से होकर जाता था किंतु कामरान ने हुमायूँ से कहा- ‘बादशाह बाबर ने मेरी माता गुलरुख बेगम को काबुल दिया था, इसलिए अब बादशाह हुमायूँ का वहाँ जाना उचित नहीं है।’

इस पर हुमायूँ ने कामरान से कहा- ‘बादशाह बाबर अक्सर कहा करते थे कि हम काबुल किसी को नहीं देंगे, यहाँ तक कि मेरे पुत्र भी काबुल का लोभ न करें क्योंकि जब से काबुल मेरे अधिकार में आया है, तब से मुझे हर युद्ध में विजय प्राप्त हुई है। हुमायूँ ने कहा कि बादशाह बाबर इसलिए भी काबुल किसी को नहीं देते थे क्योंकि उनके अधिकांश पुत्र काबुल में ही पैदा हुए थे।’

इस पर भी कामरान ने हुमायूँ के काबुल जाने के विचार का प्रतिवाद किया तो हुमायूँ ने कहा- ‘मैंने जीवन भर तुझ पर भ्रातृोचित व्यवहार किया है तथा सदैव तुझ पर कृपा की है, उस सब का क्या हुआ?’

गुलबदन बेगम ने लिखा है कि हुमायूँ के यह कहने पर भी कामरान ने अपनी जिद नहीं छोड़ी तो बादशाह हुमायूँ ने विचार किया कि इस समय मेरे पास सेना नहीं है और कामरान के पास सेना है, अतः मुझे कामरान की बात मान लेनी चाहिए। अतः बादशाह हुमायूँ ने काबुल जाने का विचार त्यागकर मुल्तान होते हुए सिंध जाने का निश्चय किया।

कामरान ने हुमायूँ को बदख्शां जाने से इसलिए रोक दिया था क्योंकि कामरान को भय था कि यदि हुमायूँ बदख्शां पहुंच गया तो वह काबुल, कांधार और गजनी के वे समस्त प्रदेश छीन लेगा जो बाबर के समय से कामरान के अधीन थे।

गुलबदन बेगम ने लिखा है कि हुमायूँ मुल्तान के दुर्ग में केवल एक दिन ठहरा। उस साल अनाज बहुत कम हुआ था। इसलिए दुर्ग में अनाज की बहुत कमी थी। हुमायूँ ने वह समस्त अनाज मनुष्यों में बांट दिया तथा अगले दिन उस स्थान पर आ गया जहाँ सात नदियां आकर मिलती थीं।

गुलबदन ने सात नदियों का उल्लेख गलत किया है, मुल्तान पांच नदियों के संगमों के निकट स्थित एक मोड़ पर बसा हुआ है इनमें से सतलज एवं रावी नदियां प्रमुख हैं।

हुमायूँ ने देखा कि नदी का पाट बहुत चौड़ा है तथा उसे पार करने के लिए एक भी नाव उपलब्ध नहीं है। वहीं पर हुमायूँ को समाचार मिला कि शेर खाँ का सेनापति खवास खाँ एक सेना लेकर हुमायूँ के पीछे आ रहा है। इस पर दर-दर के भिखारी हुमायूँ ने बख्शू बिलोच के पास अपना संदेशवाहक भेज कर उससे सहायता उपलब्ध कराने का अनुरोध किया। इस पर बख्शू बिलोच ने बादशाह की सेवा में अन्न से भरी हुई एक सौ नावें भिजवाईं। हुमायूँ ने वह अन्न सैनिकों में बंटवा दिया और अपने सैनिकों सहित उन्हीं नावों में बैठकर रवाना हो गया।              

              – डॉ. मोहनलाल गुप्ता

हमीदा बानू बेगम ने कहा हुमायूँ से विवाह कैसे करूं (61)

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हमीदा बानू बेगम ने कहा हुमायूँ से विवाह कैसे करूं

हुमायूँ को बताया गया कि यह मीर बाबा दोस्त की पुत्री हमीदा बानू बेगम है। दूसरे दिन मिर्जा हिंदाल के निवास पर फिर मजलिस हुई जिसमें बादशाह हुमायूँ उपस्थित हुआ। हमीदा बानू बेगम प्रायः मिर्जा हिंदाल के हरम के साथ ही रहती थी। इसलिए हुमायूँ को वह दूसरे दिन भी दिखाई दी।

दिसम्बर 1540 में जब कामरान ने हुमायूँ को लाहौर से न तो काश्मीर की तरफ जाने दिया और न बदख्शां जाने दिया तो हुमायूँ ने मुल्तान जाने वाला रास्ता पकड़ा। यहाँ पहुंचकर हुमायूँ ने बख्शू बिलोच नामक एक स्थानीय सरदार से सहायता मांगी। बख्शू बिलोच ने हुमायूँ को अनाज से भरी हुई एक सौ नावें प्रदान कीं।

गुलबदन बेगम ने लिखा है कि हुमायूँ नावों में बैठकर मुल्तान से बक्खर की ओर रवाना हुआ किंतु यह बात सही नहीं है। हुमायूँ ने मुल्तान से काबुल जाने वाला मार्ग पकड़ा तथा खुशाब पहुंच गया। यहाँ से एक तंग दर्रा काबुल की ओर जाता था। जैसे ही हुमायूँ ने इस दर्रे को जाने वाला मार्ग पकड़ा, वैसे ही कामरान की सेना ने तीसरी बार हुमायूँ का मार्ग रोक लिया जिससे उन दोनों के बीच संघर्ष की परिस्थितियाँ उत्पन्न हो गईं।

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जब एक दरवेश को ज्ञात हुआ कि अफगानिस्तान के जिस बादशाह बाबर ने हिंदुस्तान मुल्क फतह किया था, उसी बादशाह के बेटे आपस में लड़ने जा रहे हैं तो उस दरवेश ने हुमायूँ तथा कामरान दोनों से बात करके इस संघर्ष को रुकवाया। वस्तुतः इस समय तक बाबर के बेटे दर-दर के भिखारी हो चुके थे किंतु अपने दुर्भाग्य के कारण इस कठिन समय में भी वे आपस में लड़ रहे थे। हुमायूँ ने कामरान की तरफ से मन खट्टा करके, काबुल जाने का विचार छोड़ दिया तथा सिंध क्षेत्र में स्थित बक्खर जाने वाला मार्ग पकड़ा। हिंदाल पहले ही सिंध जा चुका था। हुमायूँ के मुल्तान से निकल जाने के बाद मिर्जा कामरान और मिर्जा अस्करी काबुल के लिए रवाना हो गए। गुलबदन बेगम भी कामरान के साथ काबुल ले जाई गई। बख्शू बिलोच से मिली नावों को लेकर हुमायूँ बक्खर दुर्ग की तरफ रवाना हुआ जो सिंधु नदी के बीच एक टापू पर स्थित था। गुलबदन बेगम ने इसे बक्खर नदी लिखा है किंतु वास्तव में यह सिंधु नदी का मुख्य प्रवाह था। बक्खर का दुर्ग बहुत मजबूत था और वहाँ का किलेदार सुल्तान महमूद दुर्ग बंद करके बैठा था। इस दुर्ग के पास ही मिर्जा शाह हुसैन का बनवाया हुआ एक बाग था।

बादशाह हुमायूँ ने उसी बाग में डेरा डाला तथा अपने दूत मीर समंदर को ठट्टा के शासक मिर्जा हुसैन शाह के पास अपना दूत भेजकर कहलवाया- ‘हम आवश्यकता पड़ने पर तुम्हारे देश में आए हैं। तुम्हारा देश तुम्हारे पास बना रहे, हम उस पर अधिकार नहीं करना चाहते। अच्छा होता कि तुम स्वयं आकर हमसे भेंट करो तथा आवश्यकतानुसार हमारी सेवा करो। हम गुजरात जाना चाहते हैं।’

मिर्जा शाह हुसैन हुमायूँ के समक्ष उपस्थित नहीं होना चाहता था। उसने अब आता हूँ, तब आता हूँ कहकर तथा तरह-तरह के बहाने बनाकर पांच महीने निकाल दिए और पांच महीने बाद हुमायूँ को सूचित किया कि- ‘मेरी पुत्री का विवाह है। उसका कार्य सम्पन्न करके मैं आपकी सेवा में उपस्थित होउंगा।’

एक दिन हुमायूँ को सूचना मिली कि मिर्जा हिंदाल ने सिंधु नदी पार कर ली है और वह कांधार जा रहा है। पाठकों को स्मरण होगा कि मिर्जा हिंदाल भी लाहौर से सिंध आ गया था और सिंध में ही प्रवास कर रहा था। इस पर हुमायूँ ने अपने दूत भेजकर हिंदाल से पुछवाया कि हमने सुना है कि तुम कांधार जा रहे हो! हिंदाल ने कहलवाया कि यह बात गलत है कि मैं कांधार जा रहा हूँ।

इस पर हुमायूँ अपनी विमाता दिलदार बेगम से मिलने के लिए हिंदाल के प्रवास-स्थल पर गया। मिर्जा हिंदाल ने हुमायूँ की बड़ी आवभगत की। उसी दौरान हुमायूँ ने हमीदा बानू नामक एक लड़की को देखा। हुमायूँ ने उसके प्रति आकर्षण का अनुभव करके पूछा कि यह लड़की कौन है?

इस पर हुमायूँ को बताया गया कि यह मीर बाबा दोस्त की पुत्री हमीदा बानू बेगम है। दूसरे दिन मिर्जा हिंदाल के निवास पर फिर मजलिस हुई जिसमें बादशाह हुमायूँ उपस्थित हुआ। हमीदा बानू बेगम प्रायः मिर्जा हिंदाल के हरम के साथ ही रहती थी। इसलिए हुमायूँ को वह दूसरे दिन भी दिखाई दी।

हुमायूँ ने दिलदार बेगम से कहा कि आप इस लड़की का निकाह मेरे साथ करवा दें। इस पर मिर्जा हिंदाल ने हुमायूँ से कहा कि मैं इस लड़की को अपनी बहिन और पुत्री की तरह देखता हूँ। आप बादशाह हैं, अतः संभव है कि आपका इस लड़की के प्रति प्रेम स्थाई नहीं रहे। तब मुझे दुःख होगा।

हिंदाल की यह बात सुनकर हुमायूँ कुपित होकर उठ खड़ा हुआ और अपने डेरे पर चला गया। दिलदार बेगम ने बात बिगड़ती हुई देखकर हुमायूँ को एक पत्र लिखकर सूचित किया कि आप बिना कारण ही नाराज होकर चले गए। लड़की की माँ तो मुझसे पहले ही कह चुकी थी कि आप इस लड़की का निकाह बादशाह से करवा दें।

हुमायूँ ने इस पत्र के जवाब में दिलदार बेगम को लिखा कि हम आपका रास्ता देख रहे हैं। इस पर दिलदार बेगम स्वयं हुमायूँ के डेरे पर गई और हुमायूँ को हरम के भीतर ले आई। जब मजलिस हुई तो हुमायूँ को हमीदा बानू बेगम दिखाई नहीं दी। इस पर हुमायूँ ने दिलदार बेगम से कहा कि हमीदा को बुलवाइए।

दिलदार बेगम ने अपनी दासी को हमीदा बानू के पास भेजा किंतु हमीदा बानू नहीं आई। उसने कहलवाया कि यदि बादशाह मुझे भेंट करने को बुलाते हैं तो मैं पहले ही दिन बादशाह के सम्मुख उपस्थित होकर उनकी सेवा करने की प्रतिष्ठा प्राप्त कर चुकी हूँ। अब क्यों आऊं?

इस पर बादशाह ने सुभान कुली को मिर्जा हिंदाल के पास भेजकर कहलवाया कि वह हमीदा बानू बेगम को भेज दे। मिर्जा हिंदाल ने सुभान कुली को जवाब दिया कि मैंने बहुत कहा किंतु यह जाती ही नहीं, तुम स्वयं जाकर कहो। जब सुभान कुली ने स्वयं हमीदा से अनुरोध किया कि बादशाह बुलाते हैं तो हमीदा ने कहा कि बादशाहों से भेंट करना एक बार ही नीतियुक्त है। दूसरी बार ठीक नहीं है। मैं नहीं जाउंगी। सुभान कुली ने वहाँ से लौटकर हुमायूँ को सारी बात बता दी।

बादशाह ने तीसरे दिन फिर अपना संदेशवाहक हमीदा बानू के पास भेजा किंतु हमीदा बानू हुमायूँ से मिलने के लिए नहीं आई। इस प्रकार चालीस दिन तक हुमायूँ हमीदा बानू के पास प्रेम-भरा निमंत्रण भेजता रहा किंतु हमीदा बानू बादशाह से मिलने नहीं आई। अंत में दिलदार बेगम स्वयं हमीदा बानू को मनाने के लिए गई।

दिलदार बेगम ने हमीदा बानू बेगम को समझाया- ‘किसी न किसी से तो विवाह करना ही होगा! अच्छा होता कि तुम्हारा विवाह बादशाह से होवे!’

इस पर हमीदा बानू बेगम ने कहा- ‘मेरा विवाह अवश्य ही ऐसे मनुष्य से होना चाहिए जिसकी गर्दन तक मेरा हाथ पहुंच सके न कि ऐसे व्यक्ति से जिसके दामन को भी मैं न छू सकूं।’

– डॉ. मोहनलाल गुप्ता

हुमायूँ के किले नौकरों ने छीन लिए (62)

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हुमायूँ के किले - www.bharatkaitihas.com
हुमायूँ के किले नौकरों ने छीन लिए

जब मनुष्य का बुरा समय आता है तब दुर्भाग्य उसे हर ओर से घेर लेता है। उसके अपने ही उसके दुश्मन हो जाते हैं, यहाँ तक कि नौकर भी पीछे नहीं रहते। हुमायूँ के बुरे दिन आए देखकर हुमायूँ के किले उसके नौकरों ने ही छीन लिए!

हुमायूँ चालीस दिन तक हमीदा बानूं बेगम के पास पास अपना दूत भेजकर उससे अनुरोध करता रहा कि वह बादशाह से मिलने के लिए आए किंतु हमीदा बानू हुमायूँ से मिलने के लिए नहीं आई। उसने हठ पकड़ लिया कि वह इतनी बड़ी आयु के पुरुष से विवाह नहीं करेगी। इस समय हुमायूँ की आयु 33 वर्ष तथा हमीदा की आयु 14 वर्ष थी।

हुमायूँ ने अपनी विमाता दिलदार बेगम से कहा कि वह स्वयं जाकर हमीदा बानू को समझाए। इस पर दिलदार बेगम हमीदा बानू के पास गई। उसने दुनियादारी की बहुत सी बातें समझा कर हमीदा बानू को हुमायूँ से विवाह करने के लिए सहमत कर लिया। जब हमीदा बानू विवाह के लिए तैयार हो गई तो दिलदार बेगम ने मीर अबुलबका को बुलाकर अगस्त 1541 में हुमायूँ तथा हमीदा बेगम का निकाह पढ़वा दिया।

गुलबदन बेगम ने लिखा है कि निकाह पढ़ने के लिए मीर अबुलबका को दो लाख रुपए दिए गए। यह राशि अविश्वसनीय लगती है। संकट से भरे दिनों में हुमायूँ कभी भी काजी को दो लाख रुपए देने की हिम्मत नहीं जुटा सकता था। गुलबदन बेगम ने इस तरह की और भी कई अविश्वसनीय बातें लिखी हैं। इस विवाह के बाद तीन दिन तक हुमायूँ हिंदाल के डेरे में रुका रहा और पुनः नाव में बैठकर बक्खर चला गया।

हिंदाल नहीं चाहता था कि हुमायूँ का विवाह हिन्दाल के धर्मगुरु मीर बाबा दोस्त की पुत्री हमीदा बानू से हो किंतु वह हुमायूँ को रोकने में असमर्थ रहा। इसलिए हिंदाल ने नाराज होकर सिंध छोड़ दिया तथा वह कांधार चला गया। गुलबदन बेगम ने लिखा है कि मिर्जा हिंदाल को कांधार जाने की छुट्टी दे दी गई। गुलबदन बेगम ने यह बात भी झूठ लिखी है। इस समय हुमायूँ का अपने भाइयों पर इतना नियंत्रण नहीं रह गया था कि मिर्जा हिंदाल को हुमायूँ से कांधार जाने के लिए छुट्टी लेनी पड़े।

हुमायूँ को अब तक बक्खर में आए हुए आठ माह बीत चुके थे किंतु ठट्टा का शासक मिर्जा शाह हुसैन हुमायूँ की सेवा में नहीं आया। इस पर हुमायूँ ने अपने दूत शेख अब्दुल गफूर को मिर्जा हुसैन शाह के पास भेजा तथा उससे पूछा कि किसलिए देरी हो रही है और आने में क्या रुकावट है?

इस पर मिर्जा शाह हुसैन ने उत्तर भेजा कि मेरी पुत्री का विवाह मिर्जा कामरान से हुआ है, इसलिए हमारा आपसे मिलना कठिन है। हम आपकी सेवा नहीं कर सकते। इस पर हुमायूँ के सैनिकों ने बक्खर का किला घेर लिया। यह घेरा इतना लम्बा चला कि हुमायूं के सैनिकों के पास खाने के लिए कुछ नहीं बचा। वे निकटवर्ती गांवों में जाकर किसी तरह अनाज जुटाते थे।

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कभी-कभी अनाज नहीं मिलने से भूखे ही रहना पड़ता था। यहाँ तक कि सैनिकों ने घोड़ों और ऊँटों को मारकर खा लिया। संभवतः बड़ी कठिनाई से बक्खर के दुर्ग पर हुमायूँ का अधिकार हो पाया। उसके बाद हुमायूँ यादगार नासिर मिर्जा को बक्खर दुर्ग का किलेदार बनाकर सेहवन दुर्ग की तरफ चल दिया जो ठट्ठा के निकट स्थित है।  सेहवन का किलेदार मीर अलैकः हुमायूँ के अधीन था किंतु वह हुमायूँ के दुर्दिन देखकर मोर्चाबंदी करके बैठ गया। उसने तोपों से गोले बरसाकर हुमायूँ के सैनिकों को किले में नहीं घुसने दिया। मीर अलैकः को ठट्ठा के शासक शाह हुसैन का समर्थन एवं सहायता प्राप्त हो गई थी। इस पर हुमायूँ ने अपना दूत सेहवन के किले में भेजा तथा मीर अलैकः को समझाने का प्रयास किया कि संकट के काल में मालिक से गद्दारी करना उचित नहीं है किंतु मीर अलैकः नहीं माना। गुलबदन बेगम ने लिखा है कि हुमायूँ छः-सात महीने वहाँ रहा। इस बीच मिर्जा शाह हुसैन हुमायूँ के सैनिकों को पकड़कर समुद्र में डलवाता रहा। शाह हुसैन के सैनिक हुमायूँ की तरफ के तीन-चार सौ मनुष्यों को एकत्रित करके एक नाव में बैठाकर समुद्र में छोड़ देते थे। इस प्रकार दस हजार मनुष्य मारे गए।

गुलबदन बेगम द्वारा बताई गई यह संख्या भी असंभव जान पड़ती है। हुमायूँ के पास इस समय दस हजार सैनिक होने की संभावना ही नहीं थी। वह अनाज से भरी हुई सौ नावों में अपने सिपाही बैठाकर मुल्तान से बक्खर आया था। यदि अनाज से भरी हुई एक नाव में बीस-तीस सैनिक भी बैठाए गए हों तो हुमायूँ के पास कठिनाई से दो-तीन हजार सैनिक रहे होंगे।

गुलबदन बेगम ने लिखा है कि जब हुमायूँ के पास बहुत थोड़े आदमी बच गए तब शाह हुसैन मिर्जा कुछ नावों में तोपें एवं बंदूकें भरवाकर स्वयं लड़ने आया। मीर अलैकः हुमायूँ की नावों को सामान सहित पकड़ कर ले गया तथा उसने हुमायूँ से कहलवाया कि पुराने नमक का विचार करके आपको सलाह देता हूँ कि आप यहाँ से तुरंत चले जाइए। इस पर हुमायूँ ने सेहवन से बक्खर के लिए प्रस्थान किया।

जब शाह हुसैन मिर्जा को ज्ञात हुआ कि हुमायूँ सेहवन का घेरा उठाकर बक्खर जा रहा है तो शाह हुसैन ने बक्खर के किलेदार यादगार नासिर मिर्जा को पत्र लिखकर सूचित किया कि मैं तुम्हें अपनी पुत्री देने का वायदा करता हूँ, यदि बादशाह हुमायूँ बक्खर की तरफ आए तो तुम उसे बक्खर दुर्ग में मत घुसने देना। मिर्जा यादगार नासिर, शाह हुसैन मिर्जा की बातों में आ गया तथा उसने हुमायूँ को छल से पकड़ने का प्रयास किया।

इस पर हुमायूँ ने मिर्जा यादगार नासिर को पत्र लिखा कि बाबा तुम हमारे पुत्र के समान हो। हम तुम्हें अपना प्रतिनिधि बनाकर बक्खर से गए थे और यह समझते थे कि यदि हम पर संकट आएगा तो तुम हमारे सहायक होओगे किंतु अब तुम नौकरों की बातों में आकर हमारे साथ ऐसा बर्ताव कर रहे हो। जो नौकर मेरे न हुए, वे तुम्हारे क्या होंगे? हम बक्खर का किला तुम पर छोड़कर मारवाड़ के राजा मालदेव के पास जा रहे हैं किंतु याद रखना शाह हुसैन और मीर अलैकः तुम्हारे साथ भी गद्दारी करेंगे।

इस प्रकार सिंध से निराश होकर हुमायूँ मारवाड़ की तरफ चल दिया। वह सिंध आना भी नहीं चाहता था किंतु कामरान ने हुमायूँ के लिए ऐसी परिस्थितियाँ उत्पन्न की दी थीं कि हुमायूँ को सिंध की तरफ आना पड़ा। अन्यथा हुमायूँ को अपने नौकरों से अपमानित होने का दिन न देखना पड़ता। नौकर ही हुमायूँ के किले दबाए बैठे थे।

अंततः हुमायूँ ने सिंध छोड़ दिया और वह जैसलमेर होते हुए मारवाड़ की तरफ बढ़ने लगा। यह विकट रेगिस्तानी क्षेत्र था। मार्ग में कहीं पर भी दाना, पानी और घास का तिनका तक नहीं मिला। किसी तरह हुमायूँ देवरावल दुर्ग तक पहुंच गया। इस दुर्ग में हुमायूँ दो दिन तक ठहरा। जैसलमेर के राजा ने हुमायूँ का रास्ता रोकने के लिए सेना भेजी। दोनों पक्षों में युद्ध हुआ जिसमें हुमायूँ के कुछ सैनिक मारे गए किंतु हुमायूँ के सैनिकों ने जैसलमेर के सैनिकों को भगा दिया।

गुलबदन बेगम ने लिखा है कि बादशाह ने तुरंत वह इलाका छोड़ दिया और 60 कोस चलकर एक तालाब पर पहुंचा। वहाँ से हुमायूँ सातलमेर पहुंचा। यहाँ भी स्थानीय लोगों ने हुमायूँ के काफिले पर हमला कर दिया। इस पर बादशाह को फलौदी की तरफ जाना पड़ा। वर्तमान समय में सातलमेर तथा फलौदी राजस्थान में स्थित हैं। गुलबदन बेगम ने लिखा है कि मालदेव ने हुमायूँ को एक कवच तथा एक ऊंट पर लादकर अशर्फियां भिजवाईं और यह संदेश भिजवाया कि मैं आपको बीकानेर देता हूँ।

– डॉ. मोहनलाल गुप्ता

तार्दी बेग ने हमीदा बेगम को घोड़ा नहीं दिया (63)

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तार्दी बेग ने हमीदा बेगम को घोड़ा नहीं दिया

हुमायूँ ने तार्दी बेग खाँ से कहा कि वह अपना घोड़ा हमीदा बानू बेगम को दे दे किंतु तार्दी बेग ने घोड़ा देने से मना कर दिया। इस पर हुमायूँ ने कहा कि मेरे लिए जौहर आफ्ताबची का ऊंट तैयार करो, बेगम मेरे घोड़े पर सवारी करेंगी। नादिम बेग ने अपनी माता को उस ऊंट पर चढ़ा दिया तथा माता का घोड़ा हमीदा बानो को दे दिया।

हुमायूँ सिंध से निकलकर जैसलमेर राज्य के रास्ते मारवाड़ राज्य (जोधपुर राज्य) में पहुंचा। गुलबदन बेगम ने लिखा है कि मालदेव ने हुमायूँ को ऊंट पर लादकर अशर्फियां भिजवाईं और यह संदेश भिजवाया कि मैं आपको बीकानेर देता हूँ। गुलबदन बेगम यहाँ भी पूरी तरह झूठी है। बीकानेर अलग राज्य था और राव जैतसिंह वहाँ का शासक था जो कि मारवाड़ के राजा मालदेव के अधीन नहीं था। अतः मालदेव हुमायूँ को बीकानेर कैसे दे सकता था!

वस्तुतः गुलबदन बेगम इस समय कामरान के साथ काबुल या कांधार में थी किंतु उसने अपने संस्मरणों को इस तरह लिखा है जैसे कि वह सब-कुछ अपनी आंखों से देख रही थी। अवश्य ही उसने यह विवरण कई सालों बाद किसी के मुँह से सुनकर लिखा होगा। विवरण सुनाने वाले ने भी सुनी-सुनाई बातों के आधार पर ये बातें गुलबदन को बताई होंगी!

हुमायूँ ने शम्सुद्दीन मुहम्मद गजनवी को अपना दूत बनाकर राव मालदेव के पास भेजा किंतु उस दूत के जोधपुर पहुंचने से पहले ही मुल्ला सुर्ख नामक एक व्यक्ति ने जोधपुर से हुमायूँ को पत्र लिखकर आगाह किया कि कभी सपने में भी जोधपुर आने की मत सोचना। मालदेव के पास शेर खाँ का दूत आया था और मालदेव ने शेर खाँ से संधि कर ली है।

शेर खाँ ने मालदेव को नागौर अथवा अलवर देने का वचन दिया है तथा इसके बदले में मालदेव ने आपको पकड़कर शेर खाँ के हवाले करने का वचन दिया है। नागौर देने की बात भी गलत लगती है, क्योंकि उस समय नागौर राव मालदेव के अधिकार में ही था।

हुमायूँ के दूत अतगा खाँ ने भी हुमायूँ को सूचित किया कि ठहरने का समय नहीं है, तुरंत कूच करिए। इस पर हुमायूँ ने दूसरी नमाज के बाद कूच कर दिया। जिस समय बादशाह घोड़े पर चढ़ रहा था, उस समय शत्रुपक्ष के दो गुप्तचरों को पकड़कर हुमायूँ के समक्ष प्रस्तुत किया गया।

उनसे पूछताछ हो ही रही थी कि उन्होंने अचानक ही स्वयं को छुड़ा लिया। उन्होंने हुमायूँ के सैनिकों की कमर से तलवारें निकालकर कुछ सैनिकों को घायल कर दिया तथा हुमायूँ की ओर झपटे। इस कारण हुमायूँ का घोड़ा मर गया किंतु हुमायूँ बच गया। उन गुप्तचरों को भी उसी स्थान पर मार डाला गया।

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गुलबदन बेगम ने लिखा है कि उसी समय शोर मचा कि मालदेव आ पहुंचा। इस पर हुमायूँ के सैनिक सिर पर पैर रखकर भागने लगे किंतु उसी समय ज्ञात हुआ कि हमीदा बानू की सवारी के योग्य कोई घोड़ा उपलब्ध नहीं है। इसलिए हुमायूँ ने अपने अमीर तार्दी बेग खाँ से कहा कि वह अपना घोड़ा हमीदा बानू बेगम को दे दे किंतु तार्दी बेग ने अपना घोड़ा देने से मना कर दिया। इस पर हुमायूँ ने तार्दी बेग से कुछ नहीं कहा तथा अपने सेवक को आदेश दिया कि मेरे लिए जौहर आफ्ताबची का ऊंट तैयार करो और बेगम मेरे घोड़े पर सवारी करेंगी। नादिम बेग नामक एक अमीर ने अपनी माता को उस ऊंट पर चढ़ा दिया तथा अपनी माता का घोड़ा हमीदा बानो बेगम को दे दिया। गुलबदन बेगम ने लिखा है कि यहाँ से सब लोग अमरकोट के लिए रवाना हुए। हवा बड़ी गर्म थी और घोड़े तथा चौपाए घुटनों तक बालू में धंस जाते थे। खाने-पीने को कुछ नहीं बचा था, इसलिए सब लोग भूखे-प्यासे ही चलते रहे। बहुत सारे स्त्री और पुरुष तो इस समय पैदल ही थे। कुछ देर बाद मालदेव की सेना निकट आ गई। इस पर हुमायूँ ने ईसन तैमूर सुलतान, मुनइम खाँ और कुछ अन्य अमीरों को आज्ञा दी कि वे मालदेव की सेना को रोकें, तब तक हम कुछ आगे निकल जाएंगे।

उन लोगों ने तुरंत बादशाह की आज्ञा का पालन किया। बादशाह के अमीर और बेग पीछे रुक गए तथा हुमायूँ का काफिला आगे बढ़ गया। दिन ढल गया, रात हो गई, रात भी ढल गई, पौ फट गई किंतु यह काफिला भूखा-प्यास आगे बढ़ता ही रहा।

सुबह होते ही इन लोगों को एक तालाब दिखाई दिया। घोड़ों को तीन दिन से पानी नहीं मिला था। हुमायूँ घोड़े से उतरा ही था कि कुछ मनुष्य दौड़ते हुए आए और बोले कि हिंदुओं की बहुत बड़ी घुड़सवार तथा ऊंटसवार सेना आ पहुंची है। इस पर हुमायूँ ने शेख अली बेग आदि कुछ अमीरों को आदेश दिया कि वे आगे बढ़कर काफिरों का मार्ग रोकें, हम आगे चलते हैं।

शेख अली बेग ने तीर चलाया जिससे राजपूतों का सरदार मारा गया और काफिर भाग गए। इस समय हुमायूँ अत्यंत भयभीत था। इसलिए वह हमीदा बानू तथा कुछ अंगरक्षकों के साथ बहुत तेज गति से भागा जा रहा था। इस पर शेख अली बेग ने कुछ आदमी बादशाह के पीछे दौड़ाकर संदेश दिया कि बादशाह सलामत थोड़ा धीरे चलें, हमारी फतह हुई है तथा चिंता की कोई बात नहीं है। इस पर हुमायूँ घोड़े से उतर कर फिर से तालाब के पास आया।

थोड़ी ही देर में शेख अली बेग तथा उसके साथी भी वहीं आ गए। अभी इन लोगों ने पानी पिया ही था कि कुछ दूरी से पुनः धूल उड़ती हुई दिखाई दी। इन लोगों को लगा कि राजपूत लौट आए हैं, इसलिए सब लोग तलवारें सूंत कर खड़े हो गए किंतु जब वे लोग निकट आए तो ज्ञात हुआ कि वे तो ईसन तैमूर सुलतान तथा मुनइम खाँ आदि थे जिन्हें बादशाह ने मालदेव की सेना का रास्ता रोकने के लिए भेजा था और वे रात्रि में मार्ग भटक जाने के कारण हुमायूँ के काफिले से बिछुड़ गए थे।

जब समस्त पशुओं और मनुष्यों ने जल पी लिया तब सभी लोग पुनः रवाना हुए। इसके बाद तीन दिन तक चलते रहे किंतु कहीं भी पानी नहीं मिला। वे लोग ऐसे क्षेत्र में पहुंच गए थे जहाँ कुएं बहुत गहरे थे और उनका जल बहुत लाल था। एक कुएं पर बादशाह, दूसरे पर तर्दीबेग खाँ, तीसरे पर मुनइम खाँ और नदीम कोका तथा चौथे कुएं पर ईसन तैमूर सुल्तान, ख्वाजः गाजी और रौशन कोका ठहरे।

गुलबदन बेगम ने लिखा है कि कुएं में से निकलने वाला हर एक डोल जब कुएं की जगत के निकट पहुंचता था तब सैनिक उस डोल में स्वयं को गिरा देते थे जिससे रस्सी टूट जाती थी और उसी के साथ पांच-छः मनुष्य कुएं में गिर पड़ते थे। जब हुमायूँ ने देखा कि सैनिक तथा अन्य कर्मचारी प्यास के कारण कुएं में गिर पड़ते हैं तब उसने अपनी सुराही में से पानी निकालकर सबको पिलाया। जब सब मनुष्य एवं पशु पेट भर कर पानी पी चुके तब दोपहर की नमाज के बाद बादशाह ने कूच किया।

गुलबदन की तरह फरिश्ता ने भी अपनी पुस्तक में बादशाह हुमायूँ एवं उसके साथियों के कष्टों का चित्र खींचा है। उसने लिखा है-

‘हुमायूँ और उसके साथी सिंध के रेगिस्तान में स्थित एक कुएं पर पहुंचे। जिस देश में से होकर वे भागे वह सम्पूर्ण मरुस्थल था। मुगल पानी की महान् विपत्ति में पड़ गए।

कुछ पागल हो गए थे और कुछ ने दम तोड़ दिया। पूरे तीन दिनों तक पानी नहीं मिला। चौथे दिन वे एक कुएं के पास आए जो इतना गहरा था कि बाल्टी सतह तक नहीं पहुंच पाई। आसपास हल चलाने वाले लोगों से सहायता लेने के लिए ढोल बजाया गया।

जब पानी खींचा गया तब बाल्टी जगत तक भी नहीं आ पाई थी कि कुछ अभागे लोग उस पर टूट पड़े और कुएं में गिर गए। दूसरे दिन वे एक छोटे से जल-स्रोत के पास पहुंचे और वहाँ कई दिनों से प्यासे ऊँटों को पानी पिलाया गया। कई ऊँटों ने आवश्यकता से अधिक पानी पी लिया और उनकी मृत्यु हो गई।’

– डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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