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सोमनाथ शिवलिंग के टुकड़े गजनी की जामा मस्जिद में चिनवा दिए महमूद ने (22)

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सोमनाथ शिवलिंग के टुकड़े गजनी की जामा मस्जिद में चिनवा दिए महमूद ने

कुछ साम्यवादी लेखकों ने अत्यंत बेशर्मी के साथ लिखा है कि चूंकि अरब की देवी मनात (Goddess Manat of Arab) और भारत के सोमनाथ एक जैसे शब्द हैं इसलिए महमूद ने सोमनाथ शिवलिंग के टुकड़े (Pieces of Somnath Shivalinga) गजनी की जामा मस्जिद (Jama Masjid, Ghazni) में चिनवा दिए!

महमूद गजनवी (Mahmud of Ghazni) सोमनाथ महालय को भंग करके सोमनाथ शिवलिंग (Somnath Shivlinga) के टुकड़े एवं मंदिर से प्राप्त टनों सोने एवं हीरे-जवाहर लेकर गजनी लौट गया। अकेले सोमनाथ मंदिर (Somnath Temple) से उसे अब तक की समस्त लूटों से अधिक धन मिला था।

तारीख ए फरीश्ता़ में लिखा है कि गजनी पहुंचकर महमूद ने सोमनाथ शिवलिंग (Somnath Shivlinga) के टुकड़े गजनी की जामा मस्जिद की सीढ़ियों में चुनवा दिए। महमूद गजनवी सोमनाथ महालय के द्वार पर लगे चंदन के दो कपाट उतरवाकर अपने साथ गजनी ले गया था। उन कपाटों को गजनी के दुर्ग (Fort of Ghazni) में लगा दिया गया।

कुछ संदर्भों के अनुसार महमूद गजनवी (Mahmud of Ghazni) ने सोमनाथ शिवलिंग के टुकड़े चक्रस्वामिन् की कांस्य प्रतिमा के साथ गजनी के चौक में फिंकवा दिए जिसे महमूद कुछ साल पहले थानेश्वर से उठाकर ले गया था। कहा जाता है कि सोमनाथ के शिवलिंग (Somnath Shivlinga) का एक टुकड़ा आज भी गजनी की मस्जिद (Mosq of Ghazni) के दरवाजे पर पड़ा है। कहा नहीं जा सकता कि इस बात में कितनी सच्चाई है!

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महमूद गजनवी के आक्रमणों के आँखों-देखे विवरण जिन लेखकों ने लिपिबद्ध किए, उनमें महमूद अल उतबी, बुरिहाँ, अलबरूनी और इस्लाम वैराकी प्रमुख हैं। इनमें से अलबरूनी तथा इस्लाम वैराकी के विवरण पक्षपात रहित माने जाते हैं जबकि उतबी के विवरण झूठ के पुलिंदे हैं। इन्हीं ग्रंथों को आधार बनाकर भारत में महमूद के अभियानों का इतिहास तैयार किया गया है।

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कुछ वामपंथी लेखकों ने महमूद गजनवी (Mahmud of Ghazni) को निर्दोष सिद्ध करने के लिए तरह-तरह के विचित्र तर्क गढ़े हैं। उन सबकी चर्चा करना संभव नहीं है किंतु उनके तर्कों के खोखलेपन को दर्शाने के लिए हम केवल दो तर्कों की चर्चा कर रहे हैं। एक लेखक ने लिखा है कि इस्लाम के उदय से पहले अरब के मंदिरों में जिन देवियों की पूजा की जाती थी उनके नाम लात (Al-Lāt, Manāt, Hubal and Al-‘Uzzā ), मनात और उज्जा थे। चूंकि सोमनाथ शब्द के अंतिम तीन अक्षर मनात से मेल खाते थे इसलिए महमूद ने सोमनाथ के मंदिर को मनात का मंदिर (Temple of Manat) समझा और उसे तोड़कर नष्ट कर दिया। यह सही है कि अरबों की प्राचीन देवी मनात के पास भी उसी तरह का सिंह दिखाया जाता था जिस प्रकार का सिंह भगवान शिव की पत्नी पार्वती की अवतार दुर्गा देवी के पास दिखाया जाता है। फिर भी यह कहना कि महमूद ने सोमनाथ को केवल इसलिए तोड़ दिया कि उसे सोमनाथ और मनात एक जैसे प्रतीत हुए, गलत प्रतीत होता है। साम्यवादी मानसिकता के एक अन्य लेखक ने लिखा है कि चूंकि सोमनाथ के मंदिर में देवदासियों पर अत्याचार होते थे इसलिए महमूद गजनवी ने उन औरतों को अत्याचारों से मुक्त करवाने के लिए सोमनाथ के मंदिर (Somnath Temple) पर आक्रमण किया। यह तथ्य भी पूरी तरह खोखला है।

बिना किसी संदेह के यह कहा जा सकता है कि महमूद गजनवी (Mahmud of Ghazni) ने सोमनाथ मंदिर (Somnath Temple) को भी उन्हीं कारणों से तोड़ा जिन कारणों से उसने मुल्तान का मार्तण्ड मंदिर, नगरकोट का बज्रेश्वरी मंदिर, मथुरा का श्रीकृष्ण जन्मभूमि मंदिर तथा भारत के अन्य मंदिर तोड़े थे। सोमनाथ शिवलिंग के टुकड़े आज भी गजनी के मुसलमानों द्वारा पैरों में रौंदे जा रहे हैं।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

महमूद गजनवी की मृत्यु टुबरकुलोसिस तथा मलेरिया से हुई (23)

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महमूद गजनवी की मृत्यु टुबरकुलोसिस तथा मलेरिया से हुई

महमूद गजनवी (Mahmud of Ghazni) की मृत्यु टुबरकुलोसिस तथा मलेरिया से हुई! इन्हीं बीमारियों के कारण 30 अप्रेल 1030 को महमूद गजनवी इस असार संसार से कूच कर गया। भारत से लूटी गई अपार दौलत उसके कुछ काम नहीं आई।

जब महमूद गजनवी (Mahmud of Ghazni) सोमनाथ महालय (Somnath Temple) को भंग करके गजनी लौट रहा था तो उसे सिंध तथा पंजाब के क्षेत्र में जाटों एवं भाटियों ने लूट लिया था। उस समय तो महमूद को रेगिस्तान से बाहर निकलने की शीघ्रता थी क्योंकि गर्मियां आरम्भ होने वाली थीं।

यदि महमूद गजनवी (Mahmud of Ghazni) विलम्ब करता तो उसके लिए रेगिस्तान से बाहर निकल पाना असंभव हो जाता किंतु अगली सर्दियों में अर्थात् 1027 में महमूद फिर से रेगिस्तान में लौट कर आया।  उसने जाटों एवं भाटियों को भलीभांति दण्डित करके उनका धन लूट लिया और फिर से गजनी लौट गया।

गजनी में महमूद सुख से नहीं जी सका। इस समय तक वह 56 साल का प्रौढ़ हो चुका था तथा असमय ही वृद्धावस्था की ओर ढल चुका था। जीवन भर युद्ध के मैदानों में तलवार चलाने के कारण (Mahmud of Ghazni) के अंग शिथिल हो चले थे तथा उसके शरीर को कई रोगों ने आकर घेर लिया था। इस समय तक महमूद गजनवी (Mahmud of Ghazni) का साम्राज्य ईरान से लेकर भारत में लाहौर (Lahore) तक फैल चुका था। इसका क्षेत्रफल बगदाद के खलीफा (Khalifa of Baghdad) के साम्राज्य से भी अधिक बड़ा था।

उनसठ वर्ष की आयु में महमूद को मलेरिया और राजयक्ष्मा एक साथ हो गए।

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इन्हीं बीमारियों के कारण 30 अप्रेल 1030 को महमूद गजनवी (Mahmud of Ghazni) इस असार संसार से कूच कर गया। भारत से लूटी गई अपार दौलत उसके कुछ काम नहीं आई। उसके वंशज लगभग 150 वर्षों तक गजनी पर शासन करते रहे और आपस में लड़ते रहे। महमूद के शव को गजनी के दुर्ग (Fort of Ghazni) में ही दफनाया दिया गया तथा एक मजार बना दी गई। महमूद गजनवी सोमनाथ महालय (Somnath Temple) से चंदन के जो कपाट उतरवाकर लाया था, उन कपाटों को इस मजार पर लगवा दिया गया।


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ई.1839 से 1842 के बीच ईस्ट इण्डिया कम्पनी की सरकार ने प्रथम अफगान युद्ध लड़ा। इस लड़ाई में कम्पनी की तरफ से जाट लाईट इन्फैन्टरी बटालियन को गजनी भेजा गया। उसी दौरान इन्फेण्टरी के जवानों को सोमनाथ महालय (Somnath Temple) के कपाटों के बारे में जानकारी मिली। 6 सितम्बर 1842 को कम्पनी की सेना द्वारा गजनी फोर्ट (Fort of Ghazni) पर हमला किया गया। कमाण्डर एलनबोर्गाेस के आदेश पर महमूद के मकबरे (Tomb of Mahmud Ghazni) से चंदन के दरवाजे उखाड़ लिए गए। दिसम्बर 1842 में ये कपाट भारत लाये गये। इन्हें आगरा के किले (Red Fort of Agra) में रखवाया गया। कई वर्षों बाद भारतीय वैज्ञानिकों से इन कपाटों में लगी लकड़ी की जांच करवाई गई। इस जाँच में पाया गया कि ये कपाट साधारण अफगानी देवदार की लकड़ी से बने हुए हैं और सोमनाथ के दरवाजों की नकल मात्र हैं। कहा जा सकता है कि सोमनाथ से ले जाए गए चंदन के कपाटों के नष्ट हो जाने के बाद उनके जैसे दिखने वाले दूसरे कपाट बनवाकर गजनी की मजार पर लगाए गए होंगे। महमूद गजनवी ने भारत में किसी बड़े साम्राज्य की स्थापना नहीं की किंतु उसने अपने दामाद ख्वाजा हसन मंहदी को सिंध तथा मुल्तान का गवर्नर बना दिया। ख्वाजा हसन की मृत्यु के बाद उसके वंशज भारत की पश्चिमी सीमा पर छोटे-छोटे राज्यों पर शासन करते रहे।

महमूद गजनवी (Mahmud of Ghazni) तो काल के गाल में समा गया किंतु उसके द्वारा भारत को दिए गए घाव स्थाई सिद्ध हुए। कुछ इतिहासकारों का कहना है कि महमूद ने भारत में किसी बड़े राज्य की स्थापना नहीं की इसलिए उसके द्वारा किए गए आक्रमणों का भारत पर कोई स्थाई प्रभाव नहीं हुआ किंतु इन इतिहासकारों का ऐसा सोचना गलत है।

महमूद गजनवी (Mahmud of Ghazni) द्वारा किए गए हमलों से पंजाब का प्रबल हिन्दूशाही राज्य समाप्त हो गया जिससे हिन्दूकुश पर्वत के पूर्व की ओर स्थित भारत की रक्षापंक्ति सदा के लिए नष्ट हो गई। अब कोई भी अफगान, तुर्क, मंगोल अथवा मध्यएशियाई आक्रांता भारत में थोड़े से प्रयासों से ही घुस सकता था और दिल्ली तक भी पहुंच सकता था। हिन्दूकुश पर्वत से लेकर मुल्तान, पंजाब तथा सिंध के क्षेत्र स्थाई रूप से मुस्लिम गवर्नरों के अधीन चले गए जो अफगानिस्तान और मध्यएशिया से आने वाले आक्रांताओं को आधार प्रदान करने लगे।

यद्यपि ई.1030 में महमूद गजनवी (Mahmud of Ghazni) की मृत्यु से लेकर ई.1192 में मुहम्मद गौरी द्वारा दिल्ली पर अधिकार किए जाने के बीच 162 वर्ष का अंतराल था तथापि महमूद गजनवी द्वारा दिल्ली सल्तनत की स्थापना के लिए इतनी गहरी नींव बनाई जा चुकी थीं जिन्हें इस लम्बे अंतराल में भी भरा नहीं जा सका।

इस नींव के दर्शन भारतीयों के मन में जड़ें जमा चुके भय और पराजय के भाव में किए जा सकते थे। यह अलग बात है कि महमूद के आक्रमणों और भारतीय पराजयों से भारतवासियों ने कोई शिक्षा नहीं ली। वे पूर्ववत् अपना जीवन जीते रहे तथा महमूद को भूल गए। दूसरी ओर महमूद गजनवी (Mahmud of Ghazni) के वंशज कभी भी भारत को नहीं भूले। उनके भारत-अभियान चलते रहे और तब तक चलते रहे जब तक कि भारत में दिल्ली सल्तनत की स्थापना नहीं हो गई।    

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

पवित्र सुल्तान महमूद गजनवी (24)

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पवित्र सुल्तान महमूद गजनवी

उतबी ने महमूद को जेहादी लिखा है जबकि प्रोफेसर हबीब ने उसे पवित्र सुल्तान महमूद गजनवी (Holy Sultan Mahmud of Ghazni) सिद्ध करने का दुष्प्रयास किया है। डॉ. आशीर्वादी लाल श्रीवास्तव ने लिखा है कि उस युग के भारतीय महमूद गजनवी को शैतान का अवतार मानते थे। उनकी दृष्ट में वह एक डाकू, लालची लुटेरा तथा कला का निर्दयी नाशक था। क्योंकि उसने हमारे दर्जनों समृद्धशाली नगरों को लूटा तथा अनेक मंदिरों को जो कला के आश्चर्यजनक आदर्श थेए धूल में मिला दिया। वह सहस्रों निर्दोष स्त्रियों और बच्चों को दास बना कर ले गया।

महमूद के दरबारी लेखक उतबी ने लिखा है- ‘महमूद ने पहले साजिस्तान पर आक्रमण करने का विचार किया किंतु बाद में उसने हिन्दुस्तान के विरुद्ध जेहाद करना ही अधिक उचित समझा।’

उतबी से उलट, अलीगढ़ विश्वविद्यालय के प्रोफेसर हबीब ने लिखा है- ‘जीवन के प्रति महमूद का दृष्टिकोण पूर्णतः सांसारिक था और अंधभक्तिपूर्ण मुस्लिम उलेमाओं की आज्ञाओं का पालन करने के लिए तैयार नहीं होता था। महूमद धर्मान्ध नहीं था किंतु इस्लाम में उसकी श्रद्धा थी और वह यह भी समझता था कि अकारण ही भारतीय काफिरों पर आक्रमण करके मैं इस्लाम की सेवा कर रहा हूँ।’

अर्थात् हबीब एक ही सांस में दो तरह की बात कर रहे हैं एक तरफ तो कह रहे हैं कि वह धर्मान्ध नहीं था और दूसरी तो लिखते हैं कि भारत के काफिरों को नष्ट करके वह इस्लाम की सेवा कर रहा था।

कोई प्रोफेसर हबीब से पूछे कि धर्मान्ध होना फिर और क्या होता है! महमूद ने जीवन भर जो कुछ भी किया, क्या वह उसकी धर्मान्धता का परिचायक नहीं है!

प्रोफेसर हबीब ने लिखा है- ‘महमूद का उद्देश्य भारत में इस्लाम का प्रसार करना था तथा इस्लाम लूट और आततायीपन का समर्थन नहीं करता है। महमूद एक पवित्र शासक था जो अपने धर्म के नियमों का सावधानी पूर्वक पालन करता था।’

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कोई प्रोफेसर हबीब से पूछे कि इस पवित्र शासक ने भारत में बर्बरता के अतिरिक्त और क्या किया था!

प्रोफेसर हबीब ने लिखा है- ‘उस काल के सभी मुस्लिम शासक महमूद को अपना आदर्श मानत थे तथा इस विषय पर एकमत थे कि भारत पर आक्रमण करके महमूद ने इस्लाम की सेवा ही नहीं की थी अपितु उसके गौरव को बहुत बढ़ाया था।’

कोई प्रोफेसर हबीब से पूछे कि चूंकि इस्लाम लूट और आततायीपन का समर्थन नहीं करता तो फिर महमूद ने भारत में लूट और आततायीपन करके इस्लाम का सम्मान कैसे किया था!

आगे चलकर प्रोफेसर हबीब स्वयं ही लिखते हैं- ‘ऐसा करके महमूद ने इस्लाम का अपकार किया था!’

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वस्तुतः जब तथ्य कुछ और कह रहे हों तथा निष्कर्ष कुछ और निकाले जा रहे हों तो इतिहासकार वैसी ही कलाबाजियां खाता है, जैसी प्रोफेसर हबीब ने खाई हैं। दुर्भाग्य से हिन्दू इतिहासकारों ने अरबी और फारसी का अध्ययन नहीं किया, इस कारण मध्यकालीन भारत का इतिहास उन मुस्लिम इतिहासकारों द्वारा तैयार किया गया जिन्हें अरबी और फारसी आती थी। ऐसे इतिहासकारों ने भारत के प्रति सहानुभूति न रखकर महमूद के प्रति हमदर्दी दिखाई जिसके कारण सच-झूठ सब एक-मेव हो गया। वर्तमान समय में अरबी एवं फारसी लेखकों की पुस्तकों के अंग्रेजी अनुवाद सामने आए जिनसे सच्चाइयां उजागर हुई हैं। अब उन्हीं अंग्रेजी अनुवादों से हिन्दी अनुवाद तैयार किए जा रहे हैं। हबीब जैसे कुछ लेखकों ने लिखा है कि महमूद का दरबारी लेखक उतबी प्रसिद्ध विद्वान था तथा महमूद और उसके युद्ध की ऐतिहासिक जानकारी के लिए हम उसकी योग्यता के ऋणी हैं। जबकि तथ्यों के आधार पर कहा जा सकता है कि उतबी का लेखन झूठ के पुलिंदे के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। उसकी अपेक्षा अलबरूनी तथा इस्लाम वैराकी के वर्णन अधिक निष्पक्ष हैं जिन्हें पढ़कर ही यह सिद्ध हो जाता है कि महमूद गजनवी ने ई.1001 से लेकर पूरे 27 वर्ष तक भारत में हिंसा, लूट, बलात्कार, रक्तपात और विध्वंस का नंगा नाच किया।

भारत के कुछ इतिहासकार लिखते हैं कि महमूद स्वयं सुसंस्कृत था और विद्वानों तथा कलाकारों का संरक्षक था। वह विद्वान् था और कविता में भी उसकी रुचि थी। गजनी को उसने सुंदर महलों, मस्जिदों, विद्यालयों और समाधियों से सुशोभित किया। उसने गजनी में एक विश्वविद्यालय की स्थापना की।

कहा जाता है कि महमूद गजनवी के दरबार में फिरदौसी (Abū al-Qāsem Ferdowsi Tusi) नामक फारसी लेखक रहता था। महमूद ने फिरदौसी से कहा कि वह शाहनामा (Shahnameh) लिखे जिसके लिए फिरदौसी को प्रत्येक रुबाई के लिए एक स्वर्ण मुद्रा दी जाएगी किंतु जब यह ग्रंथ पूरा हो गया तो पवित्र सुल्तान महमूद गजनवी (Holy Sultan Mahmud of Ghazni) ने फिरदौसी को स्वर्ण-मुद्राएं देने से इन्कार कर दिया।

इस पर फिरदौसी ने महमूद को अपमानित करने वाली कुछ पंक्तियां लिखीं। इन पंक्तियों में महमूद की माता के लिए कुछ अपमानजनक बातें कही गई थीं। जब महमूद को यह बात ज्ञात हुई तो उसने फिरदौसी (Ferdowsi) को स्वर्ण मुद्राएं भिजवाईं किंतु तब तक फिरदौसी मर चुका था और उसकी बेटी ने महमूद की स्वर्ण मुद्राएं लेने से मना कर दिया।

प्रसिद्ध इतिहासकार डॉ. आशीर्वादीलाल श्रीवास्तव ने लिखा है- ‘उस युग के भारतीय महमूद गजनवी को शैतान का अवतार मानते थे। उनकी दृष्ट में वह एक साहसी डाकू, लालची लुटेरा तथा कला का निर्दयी नाशक था। क्योंकि उसने हमारे दर्जनों समृद्धशाली नगरों को लूटा तथा अनेक मंदिरों को जो कला के आश्चर्यजनक आदर्श थे, धूल में मिला दिया। वह सहस्रों निर्दोष स्त्रियों और बच्चों को दास बना कर ले गया।

डॉ. आशीर्वादीलाल श्रीवास्तव ने यह भी लिखा है- ‘महमूद जहाँ भी गया, उसने अत्यंत निर्दयतापूर्वक हत्याकाण्ड किए तथा हमारे हजारों देशवासियों को उनकी इच्छा के विरुद्ध मुसलमान बनाया। जो विजेता अपने पीछे उजड़े हुए नगरों, गांवों तथा निर्दोष मनुष्यों की लाशें छोड़ जाता है उसे भावी पीढ़ियां केवल आततायी राक्षस समझकर ही याद रख सकती हैं, अन्य किसी प्रकार से नहीं। शासक की हैसियत से भारत के इतिहास में महमूद का कोई स्थान नहीं है।

प्रोफेसर हबीब जैसे मुसलमान लेखक उसे भले ही पवित्र सुल्तान महमूद गजनवी (Holy Sultan Mahmud of Ghazni) सिद्ध करने का प्रयास करें किंतु महमूद वहशी हत्यारा और दुर्दान्त लुटेरा था, इनके अतिरिक्त और कुछ नहीं था।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

सिंध के जाट नियाल्तगीन का सिर काट देते हैं (25)

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सिंध के जाट - www.bharatkaitihas.com
सिंध के जाट नियाल्तगीन का सिर काट देते हैं

सिंध के जाट (Jats of Sindh) सदियों से सिंध क्षेत्र में रहते आए थे। ये लोग कृषि एवं पशुपालन करते थे किंतु जब से अफगानिस्तान की तरफ से सिंध पर मुसलमानों के आक्रमण आरम्भ हुए तब से सिंध के जाट भी लड़ाका जाति में बदलने लगे थे।

ई.1030 में महमूद गजनवी का निधन (Death of Mahmud of Ghazni) हो गया। मृत्यु से पहले उसने अपने साम्राज्य के दो टुकड़े कर दिए। एक टुकड़ा अपने पुत्र मसूद को तथा दूसरा टुकड़ा दूसरे पुत्र मुहम्मद को दे दिया। जैसे ही महमूद ने आखिरी सांस ली, उसके दोनों पुत्रों में पूरे राज्य पर अधिकार करने के लिए युद्ध आरम्भ हो गया।

अंत में महमूद के छोटे पुत्र मसूद ने अपने बड़े भाई मुहम्मद को कैद करके अंधा करवा दिया तथा स्वयं गजनी के तख्त पर बैठ गया। खलीफा ने मसूद को सुल्तान की उपाधि प्रदान की। मसूद ने नियाल्तगीन (Ahmad Niyaltigin) नामक एक अफगान सरदार को लाहौर का सूबेदार एवं काजी शिराज को लाहौर प्रांत का राजस्व संग्राहक अर्थात् कर वसूली अधिकारी नियुक्त किया।

मसूद चाहता था कि नियाल्तगीन (Ahmad Niyaltigin) और शिराज काजी (Shiraz Qazi) मिलकर भारत में गजनी राज्य की सीमाओं का विस्तार करें तथा भारत से अधिक से अधिक धन गजनी को भिजवाएं किंतु गजनी के दुर्भाग्य से सेनापति नियाल्तगीन और काजी शिराज आपस में ही लड़ने लगे।

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दोनों ने एक दूसरे के अधिकारों को चुनौतियां देते हुए एक दूसरे के विरुद्ध सुल्तान को चिट्ठियां लिखीं। इस पर मुहम्मद ने उन्हें सूचित किया कि सैनिक मामलों में नियाल्तगीन को समस्त अधिकार हैं जबकि करवसूली की सारी जिम्मेदारी शिराज काजी की है। सुल्तान के इस आदेश से शिराज जल-भुन गया जबकि नियाल्तगीन (Ahmad Niyaltigin) की आकांक्षाएं और अधिक बढ़ गईं।

नियाल्तगीन एक महत्त्वाकांक्षी योद्धा था। उसने ई.1033 में गंगा नदी के पश्चिमी तट पर चलते हुए बनारस तक अभियान किया। उसे लगता था कि चूंकि महमूद गजनवी ने बनारस को नहीं लूटा था इसलिए नियाल्तगीन को बनारस से उतना ही धन मिल सकता था जितना महमूद को सोमनाथ से मिला था। बनारस पर मुसलमानों का यह पहला आक्रमण था।

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बैहाकी नामक एक समकालीन लेखक ने लिखा है कि इस अभियान को सोमनाथ अभियान के जितना ही महत्त्वपूर्ण समझा जाना चाहिए। इस अभियान में लाहौर की सेनाएं तोमरों, प्रतिहारों एवं गाहड़वालों के राज्यों से होकर गुजरीं किंतु किसी ने भी लाहौर की सेनाओं का मार्ग नहीं रोका। बनारस पर इस समय कलचुरी वंश का राजा गांगेयदेव विक्रमादित्य शासन करता था। उसने ई.1026 में बंगाल के पाल शासक महीपाल से बनारस छीना था। उसका राजधानी त्रिपुरा में थी। इस कारण गांगेयदेव को बनारस पर आक्रमण होने की सूचना नहीं मिल सकी और नियाल्तगीन की सेना ने बनारस को लूट लिया। नियाल्तगीन केवल एक दिन बनारस में ठहरा। उसे भय था कि कोई हिन्दू राजा बनारस को बचाने के लिए आएगा। इसलिए वह एक दिन में जितनी लूट हो सकती थी, उतनी करके बनारस से निकल गया किंतु पूरे अभियान में किसी हिन्दू राजा ने उसका रास्ता नहीं रोका और वह सुरक्षित रूप से पुनः लाहौर पहुंच गया। निश्चित रूप से नियाल्तगीन को इस लूट में काफी धन मिला तथा उसे इस बात की भी जानकारी हो गई कि मध्य गंगा क्षेत्र के हिन्दू राजाओं का मनोबल इतना टूट चुका है कि अब वे मुस्लिम सेनाओं का प्रतिरोध नहीं करेंगे।

नियाल्तगीन (Ahmad Niyaltigin) का दुर्भाग्य यह था कि उसे गजनी से किसी तरह की सहायता नहीं मिल रही थी और लाहौर का काजी शिराज, नियाल्तगीन की बढ़ती हुई शक्ति से बहुत नाराज था। इसलिए काजी शिराज ने गजनी के शासक मसूद को नियाल्तगीन के विरुद्ध बहुत सारी शिकायतें लिख भेजीं तथा मन्धाकुर दुर्ग के दरवाजे बंद करके बैठ गया।

जब लूट का धन लेकर नियाल्तगीन (Ahmad Niyaltigin) लाहौर के पास पहुंचा तो उसे काजी की कार्यवाहियों की जानकारी मिली। इसलिए नियाल्तगीन ने मिन्धाकुर के किले पर आक्रमण करके काजी को मार दिया। जब नियाल्तगीन द्वारा की गई इस कार्यवाही की सूचना गजनी में बैठे सुल्तान मसूद को मिली तो उसने अपने एक सेनापति को नियाल्तगीन के विरुद्ध चढ़ाई करने के लिए भेजा।

यह एक हिन्दू सेनापति था तथा इसका नाम तिलक था। उसकी सेना में लगभग सभी सिपाही हिन्दू थे। तिलक तेजी से चलता हुआ लाहौर आया और उसने नियाल्तगीन के समर्थकों को पकड़कर उनके हाथ कटवा लिए। तिलक के आगमन की बात सुनकर नियाल्तगीन मन्सूरा की तरफ भाग गया जो कि सिंध के रेगिस्तान में स्थित था।

इस पर तिलक ने घोषणा की कि जो कोई भी व्यक्ति नियाल्तगीन का सिर काटकर लाएगा, उसे पांच लाख रुपए इनाम में दिए जाएंगे। नियाल्तगीन की सेना नियाल्तगीन का साथ छोड़कर भाग गई तथा नियाल्तगीन (Ahmad Niyaltigin) के पास केवल 200 सैनिक रह गए। जब नियाल्तगीन सिंध क्षेत्र में रहने वाले जाटों के क्षेत्र में पहुंचा तो जाटों (Jats of Sindh) ने उसे घेर लिया। जब तिलक को ज्ञात हुआ कि जाटों ने नियाल्तगीन को घेर रखा है तब वह भी सिंध की तरफ रवाना हुआ।

जब तिलक अपनी सेना लेकर सिंध में पहुंचाए तब तक सिंध के जाट (Jats of Sindh) नियाल्तगीन (Ahmad Niyaltigin) का सिर काट चुके थे। सिंध के जाटों ने नियाल्तगीत के पुत्र को भी बंदी बना लिया था। सिंध के जाट नियाल्तगीन का कटा हुआ सिर लेकर तिलक के पास पहुंचे तथा उससे पांच लाख रुपए मांगे। इस पर तिलक अपने वायदे से मुकर गया।

उसने जाटों को केवल एक लाख रुपए दिए तथा कहा कि अब तो तुम्हारे हाथ नियाल्तगीन का खजाना लग गया है, इसलिए तुम्हें धन की क्या आवश्यकता है! तिलक नियाल्तगीन (Ahmad Niyaltigin) के कटे हुए सिर को लेकर गजनी के लिए रवाना हो गया। अक्टूबर 1034 में तिलक ने नियाल्तगीन का कटा हुआ सिर सुल्तान को भेंट किया। मसूद ने तिलक के लौट आने पर अपने पुत्र महदूद को पंजाब का सूबेदार नियुक्त किया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

हिन्दू राजाओं का संघ गजनी वालों से भारतीय दुर्ग खाली करवाने में सफल रहा (26)

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हिन्दू राजाओं का संघ गजनी वालों से भारतीय दुर्ग खाली करवाने में सफल रहा

पंजाब से लेकर हिन्दुकुश पर्वत (Punjab to Hindu Kush) तक के क्षेत्र में गजनी के गवर्नर शासन करने लगे ई.1043 में दिल्ली के तोमर शासक कुमारपाल देव (Tomar Raja Kumar Pal Dev) ने हिन्दू राजाओं का संघ बनाया ताकि इस क्षेत्र को गजनी वालों से मुक्त करवाया जा सके।

अब तक गजनी (Ghazni) के शासकों को यह ज्ञात हो चुका था कि उन्हें गजनी के इंसानों के लिए आवश्यक धन, वस्त्र, पशु, गुलाम तथा अन्न प्राप्त करने के लिए भारत के अतिरिक्त कहीं और जाने की आवश्यकता नहीं है। भारत उनके लिए अक्षय कोष बन चुका था, जिसमें घुसकर वह सब-कुछ लूटा जा सकता था जिसकी गजनी को आवश्यकता थी। इसलिए ई.1037 में महमूद गजनवी (Mahmud of Ghazni) के पुत्र मसूद (Masud of Ghazni) ने हांसी पर अभियान किया। हांसी दुर्ग (Hansi Fort) दिल्ली के तोमरों के अधीन था। तोमर शासक कुमारपाल देव की सेना ने दुर्ग भीतर से बंद कर लिया।

इस पर मसूद (Masud of Ghazni)) ने दुर्ग की दीवारों में पांच स्थानों पर सुरंगें लगाकर दुर्ग की प्राचीर गिरा दी। हांसी के दुर्ग (Hansi Fort) ने इससे पहले कभी भी पराजय का मुख नहीं देखा था। 10 जनवरी 1038 को मसूद की सेना ने दुर्ग में प्रवेश करके समस्त पुरुषों को मौत के घाट उतार दिया तथा स्त्री एवं बच्चों को रस्सियों से बांधकर अपने साथ ले लिया। इस दुर्ग से मसूद की सेना को विपुल सम्पत्ति प्राप्त की।

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तारीखे सुबुक्तगीन (Tarikh-e-Subuktigīn) के अनुसार 10 फरवरी 1038 को मसूद (Masud of Ghazni) अपनी राजधानी गजनी पहुंच गया। इससे ज्ञात होता है कि उस काल में घोड़ों की पीठ पर बैठी हुई तुर्क सेना एक माह में गजनी से हांसी तक की यात्रा पूरी कर लेती थी। कुछ समय बाद मसूद ने काश्मीर की घाटी (Kashmir Valley) में स्थित सरसूति दुर्ग (Sarsuti Fort) एवं सोनीपत (Sonipat) पर आक्रमण किए तथा वहाँ से धन लूटा। इस प्रकार मसूद रावी नदी के पूर्वी क्षेत्र में स्थित कुछ क्षेत्रों पर अधिकार करने में सफल हो गया। इस काल में भारत की पश्चिमी सीमा हिन्दुकुश पर्वत की बजाय रावी नदी तक खिसक आई थी।

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ई.1040 में गजनी पर पूर्व की ओर से सेल्जुक तुर्कों (Seljuk Turks) ने आक्रमण किया। उनसे बचने के लिए मसूद अपनी सारी सम्पत्ति लेकर लाहौर की ओर भागा किंतु मार्ग में मारीगला दर्रे के समीप उसके तुर्की एवं हिन्दू अमीरों ने विद्रोह कर दिया तथा मसूद को गौर के किले में कैद करके उसके अंधे भाई मुहम्मद को फिर से गजनी का सुल्तान घोषित कर दिया। मुहम्मद ने अपने छोटे भाई मसूद की हत्या करवा दी तथा स्वयं सुल्तान बन गया। कुछ ही दिन बाद मसूद के पुत्र मौमूद ने गजनी पर अधिकार जमा लिया। इसी बीच मसूद के दूसरे पुत्र मजदूद ने गजनी से विद्रोह कर दिया। वह इन दिनों पंजाब का सूबेदार था। उसने सिंधु नदी के पूर्व में स्थित हांसी आदि दुर्गों पर अधिकार कर लिया। इस पर मौदूद ने पंजाब पर आक्रमण करके अपने भाई मजदूद को अपदस्थ कर दिया। इस प्रकार इस काल में पंजाब से लेकर हिन्दुकुश पर्वत तक के क्षेत्र में हिन्दू राजाओं का अधिकार लगभग समाप्त हो गया तथा गजनी के शहजादे इस विशाल क्षेत्र पर राज्य करते रहे। ई.1043 में दिल्ली के तोमर शासक कुमारपाल देव ने कुछ हिन्दू राजाओं से बात करके उन्हें अपने साथ मिला लिया तथा हिन्दू राजाओं का संघ बनाया। हिन्दू राजाओं का संघ हांसी के दुर्ग को मुक्त करवाने में सफल रहा।

इसके बाद इन हिन्दू राजाओं का संघ कांगड़ा दुर्ग (Kangra Fort) पर घेरा डालकर बैठ गया। चार महीने की घेराबंदी के बाद हिन्दू सेना ने गजनी के अधिकारियों से कांगड़ा दुर्ग खाली करवा लिया।

हिन्दू राजाओं का संघ कांगड़ा दुर्ग में घुसकर वहाँ हिन्दू देवी-देवताओं की स्थापना करने में सफल रहा। दिल्ली के शासक की इस सफलता से उत्साहित होकर उत्तर भारत के कुछ अन्य राजा भी उसके अभियान में सम्मिलित हो गए।

डी. सी. गांगुली के अनुसार परमार राजा भोज (Parmar Raja Bhoj), कल्चुरी राजा कर्ण (Kalchuri Raja Karn) और चौहान राजा अन्हिल्ल (Chauhan Raja Anhill) ने तोमर राजा कुमारपाल (Tomar Raja Kumar Pal Dev) का साथ दिया। अशोक कुमार मजूमदार के अनुसार चौहान शासक दुर्लभराज (तृतीय) (Chauhan Raja Durlabh Raj Third) भी इस अभियान में सम्मिलित हुआ।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

लाहौर से आगरा तक गजनी के सांप लहराने लगे (27)

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लाहौर से आगरा तक गजनी के सांप लहराने लगे

हालांकि दिल्ली के तोमर शासक कुमारपाल देव के नेतृत्व में हिन्दू राजाओं का संघ हांसी, कांगड़ा एवं कुछ अन्य दुर्ग गजनी के गवर्नरों से मुक्त करवाने में सफल रहा किंतु कुछ ही समय पश्चात् लाहौर से आगरा तक गजनी के सांप लहराने लगे!

जब गजनी के गर्वनर हांसी, कांगड़ा तथा लाहौर आदि दुर्गों पर अधिकार जमाकर बैठ गए और रावी नदी तक का क्षेत्र स्थाई रूप से गजनी के अधिकार में चला गया तो भारतीय राजाओं ने गजनी के गवर्नरों के विरुद्ध एक संघ बनाया। दिल्ली के तोमर राजा कुमारपाल देव ने इस संघ के लिए पहल की तथा परमार राजा भोज, कल्चुरी राजा कर्ण, चौहान राजा अन्हिल्ल तथा अजमेर के चौहान शासक दुर्लभराज (तृतीय) ने तोमर राजा कुमारपाल का साथ दिया।

इस कारण हिन्दुओं की सेना में 10 हजार घुड़सवार तथा 72 हजार पैदल सैनिक हो गए। इस सेना ने लाहौर से आगरा तक के किले गजनी के गवर्नरों से मुक्त करवाने का निश्चय किया। उन्होंने सबसे पहले लाहौर दुर्ग को मुस्लिम नियंत्रण से मुक्त करवाने के लिए अभियान किया।

हिन्दूशाही वंश का राजकुमार संदपाल भी इस अभियान में सम्मिलित हो गया। उसे तकेश्वर पर घेरा डालने का काम दिया गया। तकेश्वर को मुसलमान तकीशाह कहते थे। संदपाल ने पंजाब में कालानूर नामक स्थान के पास मुसलमानों की एक सेना को बुरी तरह से पराजित किया।

जब युद्ध समाप्त होने ही वाला था तब एक तीर संदपाल के शरीर में आकर लगा जिससे संदपाल की मृत्यु हो गई। इस प्रकार हिन्दूशाही वंश के राजाओं जयपाल, आनंदपाल, भीमपाल, त्रिलोचनपाल तथा संदपाल ने अपनी कई पीढ़ियां खपा दीं किंतु वे गजनी के आक्रांताओं से अपना राज्य मुक्त नहीं करवा सके।

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उधर दिल्ली के राजा कुमारपाल देव के साथ कई हिन्दू राजा, सात महीने तक लाहौर पर घेरा डाले रहे। उन्होंने लाहौर नगर का परकोटा तोड़ दिया तथा नगर में घुस गए। दोनों पक्षों की सेनाएं नगर के भीतर घमासान करने लगीं। लाहौर नगर की ऐसी कोई गली नहीं थी जिसमें तलवारें न चली हों, रक्त न बहा हो तथा भारतीयाों ने अपना देश आजाद करवाने के लिए अपने शरीर न्यौछावर न किए हों। भीषण लड़ाई के बाद गजनी की सेना के पैर उखड़ गए और वह भागकर लाहौर के किले में बंद हो गई।

हिन्दू वीरों ने किले के बाहर मोर्चा संभाला। कई महीनों के प्रयासों के बाद दुर्ग बुरी तरह क्षतिग्रस्त कर दिया गया तथा किले की कुछ दीवारें भी नष्ट कर दी गईं। फिर भी हिन्दू किले में नहीं घुस सके क्योंकि गजनी के सैनिक किले की प्राचीरों पर से तेल में भीगे हुए कपड़े, गर्म तेल, पत्थर और तीर बरसा रहे थे। कई दिनों तक यही स्थिति बनी रही। अंत में एक दिन गजनी से विशाल सेना आ पहुंची और उन्होंने लाहौर किले के बाहर पड़ी हुई हिन्दू सेना पर धावा बोल दिया।

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अब तो हिन्दू सैनिक चक्की के दो पाटों की तरह बीच में पिस गए। हिन्दू राजा अपनी बची हुई सेनाओं को समेट कर अपने-अपने राज्यों के लिए चले गए। लाहौर विजय का सपना अधूरा रह गया। हिन्दू राजा हार गए तथा गजनी के तुर्कों को भारत से निकालने का सपना पूरा नहीं हो सका। फिर भी हिन्दू राजा इतना संतोष अवश्य कर सकते थे कि हांसी और नगरकोट (कांगड़ा) के दुर्ग हिन्दुओं के पास बने रहे। ई.1051 में महमूद गजनवी का छठा पुत्र अब्दुर्रशीद गजनी का शासक हुआ। उसने नुशतुगीन हाजिब नामक एक अमीर को पंजाब का सूबेदार बनाया। नुशतुगीन ने कांगड़ा दुर्ग पर घेरा डाला। दिल्ली का तोमर शासक कभी नहीं चाहता था कि नगरकोट का दुर्ग फिर से गजनी के तुर्कों के हाथों में जाए। इसलिए उसने कांगड़ा के दुर्ग को बचाने के लिए जी-जान दोनों झौंक दिए। अंत में वह स्वयं भी इस युद्ध में काम आया। छः दिन की घेराबंदी के बाद गजनी की सेना ने कांगड़ा दुर्ग की एक दीवार तोड़ ली और उन्होंने दुर्ग पर अधिकार कर लिया। इस दुर्ग पर अधिकार होते ही एक बार फिर से रावी नदी तक का क्षेत्र गजनी के अधिकार में चला गया। भारत की पश्चिमी सीमा एक बार फिर से रावी नदी तक सीमित होकर रह गई।

ई.1059 में मसूद का पुत्र इब्राहीम गजनी का सुल्तान हुआ। वह ई.1099 तक गजनी पर शासन करता रहा। उसने पंजाब के तबरहिंद, बुरिया, धंगान, जालंधर, अजूधन रूपदाल और देरा आदि क्षेत्रों को जीत लिया। तबरहिंद का वास्तविक नाम सरहिंद था, वर्तमान समय में इसे सिरसागढ़ के नाम से जाना जाता है। बुरिया वर्तमान हरियाणा में अम्बाला के निकट स्थित था। रूदपाल को रूपाल या नूरपाल भी कहा जाता था।

ई.1075 में गजनी के सुल्तान इब्राहीम ने अपने पुत्र महमूद को पंजाब का सूबेदार नियुक्त किया। महमूद ने 40 हजार घुड़सवारों को अपने साथ लेकर आगरा के किले पर घेरा डाला। आगरा का हिन्दू किलेदार चहता था कि महमूद उससे संधि कर ले किंतु महमूद चाहता था कि किलेदार बिना किसी शर्त के किला खाली कर दे। इसलिए घेरा लम्बा चलता रहा। हिन्दू सैनिक किले की प्राचीर से तीर, पत्थर एवं जले हुए कपड़े फैंकते रहे किंतु अंत में महमूद की सेना ने आगरा का किला तोड़ लिया। महमूद ने आगरा के किले से मिली सम्पत्ति को लूट लिया तथा कन्नौज, मालवा एवं कालिंजर की तरफ धावे मारकर वापस लाहौर आ गया। 

इस प्रकार लाहौर से आगरा तक गजनी के सांप लहराने लगे।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

राजा सुहेलदेव ने सालार मसूद गाजी को मार डाला (28)

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राजा सुहेलदेव ने सालार मसूद गाजी को मार डाला

फारसी ग्रंथ मिरात-ए-मसूदी में राजा सुहेलदेव तथा गजनी के सेनापति सालार मसूद के बीच हुए युद्ध का उल्लेख किया गया है। यह ग्रंथ सत्रहवीं शताब्दी ईस्वी में मुगल बादशाह जहांगीर के समय अब्दुर्रहमान चिश्ती नामक एक दरबारी लेखक ने लिखा था।

अर्थात् राजा सुहेलदेव तथा सालार मसूद के बीच हुए युद्ध के छः सौ साल बाद इस घटना का उल्लेख पहली बार हुआ। इसके अतिरिक्त आज तक कोई ऐसा समकालीन अथवा मध्यकालीन ग्रंथ नहीं मिला है जिसमें राजा सुहेलदेव तथा सालार मसूद के बीच हुए युद्ध का उल्लेख हुआ हो।

बहराइच क्षेत्र में लोक-मान्यता है कि बहराइच के राजा सुहेलदेव ने 11वीं शताब्दी के आरम्भ में बहराइच में हुए युद्ध में गजनवी के सेनापति सैयद सालार मसूद गाजी को मार डाला था। कहा नहीं जा सकता कि यह मान्यता विगत तीन सौ सालों में 17वीं सदी के ग्रंथ मिरात-ए-मसूदी के आधार पर बनी है अथवा यह पहले से ही प्रचलित है!

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मिरात-ए-मसूदी के लेखक अब्दुर्रहमान चिश्ती के अनुसार ग्यारहवीं शताब्दी के आरम्भिक वर्षों में महमूद गजनवी का एक सेनापति जिसका नाम सैयद सालार साहू गाजी था, अपने 16 वर्षीय पुत्र सालार मसूद गाजी के साथ भारत पर आक्रमण करने आया। सैयद सालार साहू गाजी, गजनी के मरहूम शासक महमूद गजनवी का साला था। वह सिंधु नदी को पार करके मुल्तान, दिल्ली तथा मेरठ पर विजय प्राप्त करते हुए सतरिख पहुंचा। उसने सतरिख को भी जीत लिया जसे अब बाराबंकी कहा जाता है।

सैयद सालार साहू गाजी ने अपने पुत्र सालार मसूद गाजी को सतरिख में छोड़ा तथा स्वयं एक सेना लेकर बहराइच पर आक्रमण करने के लिए गया। सैयद सैफुद्दीन और मियाँ राजब को भी उसने अपने साथ लिया।

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बहराइच के राजा सुहेलदेव ने कुछ निकटवर्ती हिंदू राजाओं के साथ एक संघ बनाया ताकि मसूद की सेना का सामना किया जा सके। गजनी की सेना ने सैयद सालार साहू गाजी के नेतृत्व में हिन्दू सेना के संघ पर आक्रमण किया किंतु हिन्दुओं का संघ गजनी की सेना पर भारी पड़ गया तथा गजनी की सेना संकट में आ गई। इस पर सतरिख में रखी हुई मुस्लिम सेना को भी बुलाया गया। सैयद सालार साहू गाजी का 16 वर्षीय पुत्र सालार मसूद गाजी भी इस सेना के साथ था। ई.1034 में राजा सुहेलदेव और गजनी की सेना में एक बार फिर भयानक संघर्ष हुआ जिसमें सैयद सालार साहू गाजी का पुत्र सालार मसूद गाजी मारा गया तथा उसकी सेना काट डाली गई। मसूद को बहराइच में दफना दिया गया। जब ई.1351 में फ़िरोज़ शाह तुग़लक़ दिल्ली सल्तनत का स्वामी हुआ तो उसके समय में बहराइच में सालार मसूद गाजी की दरगाह बनाई गई। कुछ विद्वानों का कहना है कि जिस स्थान पर दरगाह बनाई गई, उस स्थान पर पहले बालार्क ऋषि का आश्रम था। वर्तमान समय में ग्यारहवीं, बारहवीं तथा तेरहवीं शताब्दी का एक भी हिन्दू अथवा मुस्लिम ग्रंथ नहीं मिलता है जिसमें बहराइच के इस युद्ध का उल्लेख हो।

फिर भी 14वीं शताब्दी ईस्वी में फिरोज शाह तुगलक द्वारा बहराइच में मसूद की दरगाह बनवाए जाने से यह स्पष्ट हो जाता है कि उस काल में कोई पुस्तक उपलब्ध थी जिसमें बहराइच के इस युद्ध का तथा मसूद के मारे जाने का उल्लेख हुआ होगा।

चूंकि इस युद्ध में गजनी की सेना की हार हुई थी, इसलिए संभवतः उस काल के मुस्लिम लेखकों ने इस घटना का उल्लेख नहीं किया है। हिन्दू ग्रंथों में यदि इस घटना का उल्लेख हुआ होगा, तो वे ग्रंथ किसी काल में नष्ट हो गए होंगे। 

कुछ इतिहासकारों का मानना है कि राजा सुहेलदेव का इतिहास एक अर्द्ध-पौराणिक कथा है। अर्थात् इस कथा में ऐतिहासिक तथ्यों के साथ एक प्राचीन पौराणिक कथा का मिश्रण किया गया है। पुराणों में श्रावस्ती के राजा सुहिृद देव का उल्लेख हुआ है। संभवतः इसी पौराणिक कथा को आधार बनाकर अब्दुर्रहमान चिश्ती ने राजा सुहेल देव का इतिहास लिखा। 

जब भारत में ब्रिटिश शासन हुआ तब अंग्रेज अधिकारियों द्वारा विभिन्न क्षेत्रों के गजेटियर तैयार किए गए। एक ब्रिटिश गजेटियर में सुहेलदेव का उल्लेख हुआ है तथा उसे राजपूत राजा बताया गया है जिसने 21 राजाओं का संघ बनाकर मुस्लिम बादशाहों के खिलाफ लड़ाई लड़ी।

जब हम ई.1034 में गजनी के भारतीय अभियानों का अवलोकन करते हैं तो हम पाते हैं कि उस काल में गजनी के शासक का नाम भी मसूद था। ई.1034 के आसपास मसूद के सेनापति नियाल्तगीन ने बनारस पर अभियान किया था। अतः संभव है कि उसी दौरान एक मुस्लिम सेना बहराइच भी भेजी गई हो जिसे हिन्दुओं ने नष्ट कर दिया हो तथा सालार मसूद गाजी तथा उसका पुत्र मसूद भी उसी युद्ध में मारे गए हों।

ई.1940 में, बहराइच के एक स्थानीय स्कूली शिक्षक ने एक लंबी कविता की रचना की जिसमें राजा सुहेलदेव को जैन राजा और हिंदू संस्कृति के उद्धारक के रूप में चित्रित किया गया। संयोगवश यह कविता बहराइच अंचल बहुत लोकप्रिय हो गई।

आर्य समाज, राम राज्य परिषद और हिंदू महासभा ने सुहेलदेव को हिंदूनायक के रूप में प्रदर्शित किया तथा अप्रैल 1950 में इन संगठनों ने राजा सुहेलदेव के सम्मान में एक मेला लगाने की योजना बनाई। इस पर सालार मसूद गाजी दरगाह समिति ने सरकार से मेले पर प्रतिबंध लगाने की अपील की। सरकार ने इस मेले पर प्रतिबंध लगा दिया किंतु हिन्दुओं द्वारा राजा सुहेलदेव के पक्ष में व्यापक आंदोलन चलाए जाने पर सरकार ने मेला लगाने की अनुमति दे दी।

हिन्दुओं ने बहराइच में 500 बीघा भूमि पर राजा सुहेलदेव का एक मंदिर बनाया। ई.1950 और 1960 के दशक में कुछ लोगों ने सुहेलदेव को पासी राजा बताना आरम्भ किया। पासी एक दलित समुदाय है। इसके बाद बहुत सी जातियां राजा सुहेल देव को अपनी-अपनी जाति का बताने लगीं।

वर्तमान समय में बहराइच क्षेत्र में विभिन्न जातीय-समूहों ने राजा सुहेलदेव को अपनी जाति का बताने के लिए आंदोलन चला रखे हैं। मिरात-ए-मसूदी के अनुसार सुहेलदेव ‘भर थारू’ जाति का राजा था। आधुनिक काल के भारतीय लेखकों ने उसे ‘भर राजपूत’, राजभर, थारू और जैन राजपूत के रूप में वर्णित किया है।

काल के प्रवाह में बह चुके राजा सुहेलदेव के वास्तविक इतिहास को ढूंढा जाना तो अब संभव नहीं है किंतु उपलब्ध तथ्यों के आधार पर इतना अवश्य कहा जा सकता है कि राजा सुहेलदेव ने अवश्य ही कुछ राजाओं का संघ बनाकर गजनी की सेनाओं का मुकाबला किया तथा युद्ध में सफलता प्राप्त की। ऐसे राष्ट्रनायक के इतिहास को किसी जातीय विवाद में घसीटकर उलझाने की बजाय उनके उज्जवल चरित्र को इतिहास में सम्मानजनक स्थान दिया जाना चाहिए।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

गजनी के गवर्नर डेढ़ सौ साल तक भारत को खोखला करते रहे (29)

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गजनी के गवर्नर डेढ़ सौ साल तक भारत को खोखला करते रहे

महमूद गजनवी के समय में मुल्तान से लेकर लाहौर तक के क्षेत्र में गजनी के गवर्नर किलों पर अधिकार करके अपनी सत्ता जमाना आरम्भ कर चुके थे। लगभग डेड़ सौ साल तक गजनी के गवर्नर भारत को खोखला करते रहे।

गजनी द्वारा पंजाब में नियुक्त गवर्नरों द्वारा भारत के विभिन्न क्षेत्रों में बारबार किए गए अभियानों के कारण वे उत्तरी भारत के चप्पे-चप्पे से परिचित हो गए। अब वह दिन दूर नहीं था जब वे पंजाब की तरह भारत के किसी अन्य भाग में अपनी सल्तनत की स्थापना कर सकें। फिर भी हिन्दू राजाओं का मनोबल पूरी तरह भंग नहीं हुआ था। वे गजनी के इन अमीरों और गवर्नरों से लड़ते रहे और किसी ने किसी रूप में अपना अस्तित्व बनाए रहे।

‘पृथ्वीराज विजय’ नामक ग्रंथ में लिखा है कि शाकम्भरी नरेश चौहान दुर्लभराज (तृतीय) मतंगों से हुए युद्ध में मारा गया। वस्तुतः ये मतंग गजनी के सुल्तान इब्राहीम के सैनिक थे। उस काल के एक ताम्रपत्र में लिखा गया है कि आसराज ने तुरुष्कों से घिरे अपने भाई पृृथ्वीपाल को बचाया था। एक अन्य ताम्रपत्र के अनुसार आसराज के साले हरिपाल ने तुरुष्कों के प्यासे घोड़ों को पानी नहीं पीने दिया। डॉ. दशरथ शर्मा का अनुमान है कि ये दोनों ताम्रपत्र इब्राहीम की सेना से हुई लड़ाई से सम्बन्धित हैं।

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परमार राजा लक्ष्मणदेव ई.1086 से 1094 तक मालवा का शासक रहा। उसने भी इब्रहाहीम की सेनाओं को परास्त किया। उसके शिलालेखों में भी इब्राहीम की सेना को तुरुष्कों की सेना कहा गया।

इन अभिलेखों से ज्ञात होता है कि उस काल के भारतीय लेखों में गजनी के मुसलमानों को मतंग, तुरुष्क, कीरा तथा म्लेच्छ कहा जाता था जबकि मुस्लिम अमीरों को हम्मीर लिखा गया है।

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ई.1099 में गजनी के शासक इब्राहीम की मृत्यु के बाद उसका पुत्र मसूद (तृतीय) गजनी का सुल्तान हुआ। उसने उज्दुद्दौलावाद्दीन को पंजाब का सूबेदार बनाया तथा तुगातिगीन को भारत के विभिन्न राज्यों पर आक्रमण करने के निर्देश दिए। तुगातिगीन ने गंगा-पार के क्षेत्रों तक धावे किए। मिनहाज उस् सिराज ने लिखा है कि तुगातिगीन उस स्थान तक पहुंचने में सफल हो गया जहाँ तक महमूद के अतिरिक्त और कोई नहीं पहुंच सका था। तुगातिगीन ने कन्नौज के गाहड़वाल शासक मदनचंद्र को पकड़ लिया तथा उसे अपने साथ लाहौर ले गया। मदनचंद्र के पुत्र गोविंदचंद्र गाहड़वाल ने लाहौर के मुसलमानों को पराजित करके अपने पिता को मुक्त करवाया। इस युद्ध में मदनपाल राठौड़ ने गोविंदचंद्र की बहुत सहायता की जो कि गोविंदचंद्र के अधीन बदायूं का सामंत था। श्रीधर कवि की रचना पार्श्वनाथ चरित में लिखा है कि ई.1132 में दिल्ली के तोमर शासक अनंगपाल ने हम्मीर को पराजित किया। वस्तुतः लाहौर के किसी अमीर को ही इस कविता में ‘हम्मीर’ लिखा गया है। इस काल में गजनी के सूबेदार पंजाब के तबरहिंद तथा रूपाल तक शासन करते थे जो दिल्ली से बहुत अधिक दूर नहीं थे।

इस प्रकार गजनी के सुल्तान तथा लाहौर में नियुक्त उनके अमीर भारतीय राजाओं पर निरंतर हमले करके उनकी सैनिक शक्ति का ह्रास करते रहे तथा भारत में अपने पैर मजबूत करते रहे। अब वे किसी भी दिन दिल्ली पर अधिकार करके भारत के सुल्तान होने का दावा कर सकते थे किंतु इस कार्य में सबसे बड़ी बाधा शाकम्भरी के चौहान थे जो अजमेर तथा दिल्ली पर शासन करते थे।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

चौहान रूपी चट्टान को तोड़ना आवश्यक हो गया गजनवियों के लिए (30)

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चौहान रूपी चट्टान को तोड़ना आवश्यक हो गया गजनवियों के लिए

गजनी के सुल्तान एवं अमीर अब भारत में अपनी स्थाई सत्ता स्थापित करना चाहते थे किंतु उनके लिए चौहान रूपी चट्टान को तोड़ना आवश्यक हो गया! शक्तिशाली चौहानों के रहते वे भारत में अपनी सत्ता स्थापित नहीं कर सकते थे!

गजनी के सुल्तानों, अमीरों एवं गजनी के गवर्नरों को भारत पर आक्रमण करते हुए लगभग डेढ़ सौ साल हो गए थे। इस बीच रावी नदी के पूर्वी किनारों तक का पंजाब पूरी तरह गजनी के अधीन हो चुका था और गजनी के सेनापति पंजाब की नदियों को पार करके, यमुना नदी के मैदानों से लेकर मध्य-गंगा के मैदानों तक धावे मार रहे थे। फिर भी वे भारत में सिंध एवं पंजाब के अतिरिक्त अन्य क्षेत्रों में अपने पैर स्थाई रूप से नहीं टिका पा रहे थे।

शाकम्भरी नरेश अर्थात् अजमेर के चौहान शासक गजनी के आक्रांताओं में किसी अजेय चट्टान की तरह डट गए थे। चौहान रूपी चट्टान को तोड़ पाना गजनवियों के लिए अभी तक संभव नहीं हो पाया था। ई.724 के लगभग खलीफा वली अब्दुल मलिक की सेना व्यापारियों के वेष में सिंध के मार्ग से अजमेर तक चढ़ आई।

उस समय दुर्लभराज (प्रथम) अजमेर का शासक था। खलीफा की सेना ने अजमेर दुर्ग पर अधिकार कर लिया किंतु कुछ ही समय पश्चात् दुर्लभराज के पुत्र गूवक ने अजमेर का दुर्ग वापस छीन लिया। तभी से चौहान-शक्ति खलीफा की आँखों की किरकिरी बनी हुई थी।

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अजमेर के शासक गोविंदराज (द्वितीय) तथा वीर्यराम ने महमूद गजनवी को दो बार परास्त किया। वीर्यराम का उत्तराधिकारी चामुण्डराज हुआ। उसने शक मुसलमानों के स्वामी हेजामुद्दीन को पकड़ लिया। चामुण्डराज के बाद ई.1075 में दुर्लभराज (तृतीय) उत्तराधिकारी हुआ। उसने मुसलमान सेनापति शहाबुद्दीन को परास्त किया।

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दुर्लभराज (तृतीय) के बाद विग्रहराज (तृतीय) अजमेर का शासक हुआ। उसने दिल्ली के तोमर शासक के साथ मिलकर मुस्लिम आक्रांताओं के विरुद्ध एक संघ बनाया तथा हांसी, थाणेश्वर और नगरकोट से मुस्लिम गवर्नरों को मार भगाया। इस विजय के बाद दिल्ली में एक स्तम्भ लेख लगावाया गया जिसमें कहा गया है कि विन्ध्याचल से हिमालय तक के क्षेत्र से म्लेच्छों को निकाल बाहर किया गया जिससे आयावर्त एक बार फिर से पुण्यभूमि बन गया। अजमेर के चौहान शासक पृथ्वीराज (प्रथम) का भी गजनी के तुर्कों से युद्ध हुआ। इस युद्ध में पृथ्वीराज (प्रथम) ने गजनी के सेनापति तुगातिगीन को परास्त करके भगा दिया। पृथ्वीराज (प्रथम) के बाद ई.1113 के लगभग अजयदेव अजमेर का राजा हुआ। ई.1115 में बहरामशाह गजनी का शासक हुआ। उसने 6 दिसम्बर 1118 को मुहम्मद बाहलीम को अपने हिन्दुस्तानी प्रान्तों का प्रान्तपति नियुक्त किया। ई.1119 में बाहलीम ने सुल्तान बहराम से विद्रोह करके स्वयं को स्वतंत्र शासक घोषित कर दिया। बाहलीम ने दक्षिण की ओर बढ़कर नागौर पर आक्रमण किया। उस समय नागौर, अजमेर के चौहान शासक अजयराज के अधीन था। राजा अजयराज चौहान को अपने कई क्षेत्र गजनी के शासक बहराम तथा उसके गवर्नर बाहलीम के हाथों खोने पड़े।

बाहलीम ने नागौर दुर्ग में कुछ निर्माण करवाए तथा अपना खजाना और सेना नागौर में केन्द्रित कर लिए। इस प्रकार भारत में सिंध तथा पंजाब से बाहर गजनी के मुसलमानों का यह पहला राज्य स्थापित हो गया। हालांकि कुछ ही समय बाद बाहलीम ने गजनी से विद्रोह कर दिया इसलिए गजनी के सुल्तान बहराम शाह ने बाहलीम पर चढ़ाई करके उसे मार डाला।

बाहलीम से छुटकारा पाकर बहरामशाह ने इब्राहीम अलवी के पुत्र सालार हुसैन को अपने हिन्दुस्तानी प्रांतों का गवर्नर बनाया। इन प्रांतों में नागौर भी सम्मिलित था। राजा अजयदेव ने ई.1123 में अजमेर पर चढ़कर आए मुस्लिम आक्रांताओं को परास्त कर दिया तथा उनका बड़ी संख्या में संहार किया। चौहान रूपी चट्टान एक बार फिर अजेय सिद्ध हुई।

ई.1133 के आसपास अजयदेव का पुत्र अर्णोराज, अजयदेव का उत्तराधिकारी हुआ। अर्णोराज को आनाजी भी कहते हैं। उसने गजनी के गवर्नर सालार हुसैन को परास्त करके नागौर दुर्ग फिर से अपने अधीन कर लिया। वह ई.1155 तक शासन करता रहा।

अजमेर संग्रहालय की खण्ड प्रशस्ति से विदित होता है कि आनाजी ने उन तुर्कों को पराजित किया जो मरुस्थल को पार करके अजमेर तक आ पहुँचे थे। इस आक्रमण की तिथि ई.1135 होनी चाहिए। गजनी की सेना हिन्दुओं के प्रसिद्ध तीर्थ पुष्कर को नष्ट करके अजमेर नगर के बाहर तक आ पहुँची। अर्णोराज ने उन पर विजय प्राप्त करके उनका संहार किया।

जिस स्थल पर यवनों का रक्त गिरा था उस स्थल को शुद्ध करने के लिए वहाँ उसने एक हवन किया तथा उस स्थान पर आनासागर झील बनवाई। आज भी आनासागर झील चौहान रूपी चट्टान की अजेयता का बखान करती है।

अजमेर के प्रतापी शासक विग्रहराज (चतुर्थ) को बीसलदेव भी कहा जाता है। वह ई.1152-63 तक अजमेर का राजा रहा। उसका शासन न केवल अजमेर के इतिहास के लिए अपितु सम्पूर्ण भारत के इतिहास के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। उसने गजनी के मुसलमानों से अनेक युद्ध लड़े। वीसलदेव के समय गजनी के मुसलमानों की सेना वव्वेरा गांव तक पहुंच गई जो अब राजस्थान के शेखावाटी अंचल में स्थित है।

राजा वीसलदेव उस सेना को परास्त करके गजनी के मुसलमानों को आर्यावर्त्त से बाहर निकालने के लिए उत्तर की तरफ बढ़ा।

दिल्ली से अशोक का एक स्तंभ-लेख मिला है जिस पर वीसलदेव के समय में एक और लेख उत्कीर्ण किया गया। यह लेख 9 अप्रेल 1163 का है तथा इसे शिवालिक स्तंभ-लेख कहते हैं। इस शिलालेख के अनुसार वीसलदेव ने देश से मुसलमानों का सफाया कर दिया तथा अपने उत्तराधिकारियों को निर्देश दिया कि वे मुसलमानों को अटक नदी के उस पार तक सीमित रखें। अर्थात् ईस्वी 1163 तक चौहान रूपी चट्टान मुसलमानों के मार्ग में मजबूती से डटी हुई थी।

वीसलदेव के राज्य की सीमाएं शिवालिक पहाड़ी, सहारनपुर तथा उत्तर प्रदेश तक प्रसारित थीं। चौहान-शिलालेखों के अनुसार जयपुर और उदयपुर जिले के कुछ भाग वीसलदेव चौहान के राज्य के अंतर्गत थे। इसमें कोई संदेह नहीं कि अपनी शक्ति और बल से विग्रहराज ने म्लेच्छों का दमन करके आर्यावर्त्त को वास्तव में आर्यभूमि बना दिया था। जिस मुस्लिम शासक हम्मीर को परास्त करने का उल्लेख ‘ललितविग्रह’ नाटक में किया गया है, वह गजनी का अमीर खुशरूशाह था।

शिवालिक लेख के अनुसार वीसलदेव के राज्य की सीमाएं हिमालय से लेकर विंध्याचल पर्वत तक विस्तृत थीं। इस पूरे क्षेत्र से उसने मुस्लिम गवर्नरों को परास्त करके अटक के उस पार तक मार भगाया था। प्रबन्धकोष उसे तुरुष्कों का विजेता बताता है। इस काल में दिल्ली केवल ठिकाणा बन कर रह गई जिसकी राजधानी अजमेर थी। इतिहास की पुस्तकों में उसे भारत का प्रथम चौहान सम्राट कहा गया है। उसकी विशाल सेना में एक हजार हाथी, एक लाख घुड़सवार तथा उससे भी अधिक संख्या में पैदल सिपाही थे।

इस प्रकार अजमेर के चौहान गजनी के सुल्तानों के लिए एक अलंघ्य चट्टान बन गए थे। चौहान रूपी चट्टान को चूर-चूर किए बिना गजनी के सुल्तानों का भारत में साम्राज्य की स्थापना का सपना कभी पूरा नहीं हो सकता था।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

गजनी में सत्ता परिवर्तन ने भारत में तुर्की साम्राज्य का मार्ग खोल दिया (31)

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गजनी में सत्ता परिवर्तन ने भारत में तुर्की साम्राज्य का मार्ग खोल दिया

ई.1173 में गजनी के राजनीतिक परिदृश्य में बड़ा उलट-फेर हुआ। गजनी में सत्ता परिवर्तन ने भारत में तुर्की साम्राज्य का मार्ग खोल दिया

महमूद गजनवी के वंशज ई.999 से लेकर ई.1173 तक गजनी पर शासन करते रहे। महमूद के वंशजों ने भारत में अपने साम्राज्य की स्थापना के लिए बहुत प्रयास किए किंतु लगभग डेढ़ सौ साल तक भारत के राजाओं ने गजनवियों को रावी नदी से आगे पैर नहीं जमाने दिए।

ई.1173 में गजनी के राजनीतिक परिदृश्य में बड़ा उलट-फेर हुआ। उन दिनों गजनी साम्राज्य के अंतर्गत गौर नामक एक छोटा सा उपेक्षित कस्बा हुआ करता था। यह कस्बा साम्राज्य की राजधानी गजनी से लगभग 200 मील पश्चिम में था। इस नगर पर गयासुद्दीन गौरी नामक एक अमीर शासन करता था।

ई.1173 में गयासुद्दीन गौरी ने गजनी के सुल्तान खुसरव मलिक की कमजोरी का लाभ उठाते हुए गजनी पर अधिकार कर लिया और अपने छोटे भाई शहाबुद्दीन को गजनी का शासक नियुक्त किया। यही शहाबुद्दीन आगे चलकर मुहम्मद गौरी के नाम से जाना गया। गजनी में सत्ता परिवर्तन ने भारत में तुर्की साम्राज्य का मार्ग खोल दिया! आगे बढ़ने से पहले हमें ‘गोर’ अथवा ‘गौर’ प्रदेश की प्राचीन संस्कृति पर कुछ चर्चा करनी चाहिए।

वर्तमान समय में गौर का पहाड़ी क्षेत्र अफगानिस्तान के केन्द्रीय भाग में स्थित है तथा गजनी और हिरात के बीच में बसा हुआ है। गौर प्रदेश के निवासी भारत में गौरी एवं गौरान कहे जाते हैं। यह एक निर्धन पहाड़ी क्षेत्र था। संस्कृत भाषा का शब्द ‘गिरि’ ही फारसी भाषा के प्रभाव से ‘गोर’ बन गया था।

गौर क्षेत्र में स्थित ‘हरि’ नामक नदी के दक्षिणी तट पर ‘चगचरण’ नामक शहर की पुरातात्विक खुदाई में ईसा से लगभग पांच हजार साल पुरानी सभ्यता के अवशेष प्राप्त हुए हैं जिनमें नगर की दीवार तथा दुर्गनुमा रचनाएं भी पाई गई हैं। ये बस्तियां निश्चित रूप से भारत की वैदिक एवं सिंधु नदी घाटी सभ्यताओं की समकालीन थीं। ‘हेरात’ नामक नगर का नामकरण ‘हरि’ नदी के नाम पर ठीक उसी प्रकार हुआ है, जिस प्रकार भारत में ‘हरि’ शब्द से ‘हरिद्वार’ नामक नगर का नामकरण हुआ है।

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जब बौद्ध सम्राट अशोक ने अफगानिस्तान में बौद्धधर्म का प्रचार किया, तब गौर क्षेत्र में संस्कृत-भाषी हिन्दू रहा करते थे जिनकी सभ्यता ईसा से लगभग पांच हजार साल पुरानी थी। अशोक के प्रयासों से इस क्षेत्र में बौद्धधर्म का प्रचार हआ तथा लगभग एक हजार साल तक इस क्षेत्र में बौद्धधर्म फलता-फूलता रहा। इस क्षेत्र की पहाड़ियां बौद्ध भिक्षुओं के आकर्षण का केन्द्र थीं जिनमें रहकर वे भगवान बुद्ध की उपासना किया करते थे। जब दसवीं शताब्दी ईस्वी के मध्य में गौर क्षेत्र में इस्लाम का प्रवेश हुआ तब गौर क्षेत्र में बौद्ध बस्तियों के साथ-साथ हिन्दू, पारसी एवं यहूदी बस्तियां भी हुआ करती थीं। भारत के यदुवंशी भाटियों ने भी गजनी और गौर के बीच अपने दुर्ग बना रखे थे। गौर की जनता अरब की ओर से आने वाले तुर्की आक्रांताओं से अपनी रक्षा नहीं कर सकी तथा अपने प्राचीन धर्मों से हाथ धो बैठीं। ग्यारहवीं शताब्दी ईस्वी में गजनी के शासक महमूद गजनवी ने सम्पूर्ण गौर क्षेत्र को अपने अधीन कर लिया तथा इस क्षेत्र में, बची-खुची हिन्दू, बौद्ध, पारसी एवं यहूदी बस्तियों को नष्ट कर दिया। बहुत से लोगों ने गजनवी के सैनिकों के हाथों प्राण जाने के भय से इस्लाम स्वीकार कर लिया।

महमूद गजनवी की मृत्यु के बाद गौर प्रदेश में एक नए राजवंश का उदय हुआ जो गौर शहर के नाम पर गौरी कहलाया। इस वंश के शासक मुसलमान बनने से पहले बौद्ध हुआ करते थे। जब ई.1173 में गौर वंश के शासक गयासुद्दीन गौरी ने गजनी के शासक खुसरव मलिक से गजनी छीनकर अपने छोटे भाई शहाबुद्दीन गौरी को दे दिया तो खुसरव मलिक, गजनी से भागकर पंजाब आ गया तथा पंजाब के एक छोटे से क्षेत्र पर शासन करने लगा। इस प्रकार गजनी से महमूद वंश का राज्य पूर्णतः समाप्त हो गया।

लगभग पौने दो सौ साल तक गजनी विशाल साम्राज्य की राजधानी रहा था। इसलिए जब शहाबुद्दीन गौरी गजनी का शासक बना तो उसकी आकांक्षाओं को नए पंख मिल गए। उसने भी गजनी के सबसे प्रबल सुल्तान महमूद गजनवी की भांति भारत पर आक्रमण करके भारत की सम्पदा लूटने तथा अपने राज्य का विस्तार करने का निर्णय लिया। इस प्रकार गजनी में सत्ता परिवर्तन ने भारत के लिए एक बार फिर से बड़ा खतरा उत्पन्न कर दिया।

शहाबुद्दीन गौरी को भारत के इतिहास में मुहम्मद गौरी के नाम से जाना जाता है। महमूद गजनवी ने भारत पर पूरे 26 साल तक आक्रमण किए थे किंतु मुहम्मद गौरी ई.1175 से ई.1206 तक अर्थात् पूरे इकत्तीस साल तक भारत पर आक्रमण करता रहा। ई.1186 में मुहम्मद गौरी ने गजनी के अपदस्थ सुल्तान खुसरव मलिक को जान से मरवा दिया।

इस समय तक गजनी का पुराना शासक वंश अर्थात् महमूद गजनवी का वंश पूरी तरह कमजोर पड़ चुका था तथा उसमें इतनी शक्ति शेष नहीं बची थी कि वह पंजाब से बाहर निकलकर भारत के अन्य क्षेत्रों पर अधिकार कर सके किंतु गजनी का नया शक्ति-सम्पन्न शासक वंश भारत में अपने क्षेत्रों के विस्तार के लिए उत्सुक था। इस प्रकार गजनी में सत्ता परिवर्तन से भारत में तुर्की स्थापना का मार्ग खुल गया।

मुहम्मद गौरी के कोई औलाद नहीं थी, इसलिए वह अपने गुलामों को अपनी औलाद मानता था। इस कारण मुहम्मद गौरी जो भी नया प्रदेश जीतता था, अपने किसी विश्वसनीय गुलाम को उस प्रदेश का शासक बना देता था। भारत में भी उसने यही पद्धति अपनाई।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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