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काश्मीर का मुसलमानीकरण (169)

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काश्मीर का मुसलमानीकरण

काश्मीर का मुसलमानीकरण करने में जितना हाथ मुस्लिम आक्रांताओं का रहा, उससे भी अधिक हाथ सूफियों का रहा। सबसे पहले सूफियों ने काश्मीर में जाकर मुसलमानों की जनसंख्या का निर्माण करना आरम्भ किया।

यद्यपि सुल्तान इब्राहीम लोदी की मृत्यु के साथ ही दिल्ली सल्तनत तथा उसका इतिहास समाप्त हो जाते हैं तथापि उस काल में उत्तर भारत के कुछ प्रबल राज्यों तथा दिल्ली सल्तनत के राजनीतिक सम्बन्धों पर चर्चा किए बिना यह इतिहास पूरा नहीं होता।

बाबर ने अपने आत्मचरित ‘तुजुक-ए-बाबरी’ अर्थात् बाबरनामा में लिखा है-

‘उन दिनों जब मैंने हिन्दुस्तान पर विजय प्राप्त की, तब यहाँ पर पाँच मुसलमान और दो काफिर बादशाह शासन करते थे। वे एक-दूसरे के साथ कोई सम्बन्ध नहीं रखते थे। इस देश में उनके सिवा और भी बहुत से छोटे-छोटे राजा थे। वे राव और राजा के नाम से विख्यात थे।

उनकी संख्या बहुत अधिक थी और वे थोड़े-थोड़े स्थानों के अधिकारी थे। इन छोटे राजाओं में से अधिकांश पहाड़ियों पर रहा करते थे। पाँच मुसलमान बादशाहों में पहला था अफगान सुल्तान जिसकी राजधानी दिल्ली थी, दूसरा गुजरात में सुल्तान मुजफ्फर था, तीसरा मुस्लिम राज्य दक्षिण में बहमनी राज्य था, चौथी मुस्लिम बादशाहत मालवा में थी, पाँचवाँ बादशाह बंगाल में नुसरतशाह था।

हिन्दुस्तान के काफिर राज्यों में विस्तार एवं सेना की अधिकता की दृष्टि से सबसे बड़ा विजयनगर का राजा है तथा दूसरा राणा सांगा है।’

बाबर ने प्रान्तीय राज्यों की पूरी सूची नहीं दी है। उस समय भारत में काश्मीर, मुल्तान, पंजाब, सिन्ध, गुजरात, बंगाल, आसाम, मालवा, खानदेश, मेवाड़, मारवाड़, उड़ीसा आदि प्रमुख प्रांतीय राज्य थे। इनमें से काश्मीर, मुल्तान, पंजाब, सिन्ध, गुजरात, बंगाल, मालवा तथा खानदेश मुस्लिम राज्य हो चुके थे जबकि आसाम, मेवाड़, मारवाड़, उड़ीसा तथा विजयनगर प्रमुख हिन्दू राज्य थे। इनके अतिरिक्त और भी छोटे-छोटे हिन्दू राज्य पूरे देश में फैल हुए थे।

दक्षिण में विजयनगर और बहमनी राज्यों का दिल्ली सल्तनत से कोई राजनीतिक सम्पर्क नहीं था। बाबर के भारत आगमन के समय भारत के समस्त छोटे-बड़े हिन्दू एवं मुस्लिम राज्य अपनी-अपनी सीमाओं को बढ़ाने के लिए पड़ौसी राज्यों से लड़ते रहते थे। इस कारण उनकी सीमाएँ निरन्तर घटती-बढ़ती रहती थीं।

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पाठकों को स्मरण होगा कि मुहम्मद बिन तुगलक के समय से ही प्रांतपतियों पर केन्द्रीय शक्ति की पकड़ ढीली पड़ने लगी थी और कई प्रांतपति स्वयं को पूरी तरह स्वतंत्र करने में सफल रहे थे। फीरोज तुगलक के समय यद्यपि सल्तनत के अधीन बचे हुए प्रांतपतियों ने विद्रोह नहीं किये किंतु उन पर केन्द्रीय शक्ति का भय लगभग समाप्त ही हो गया था।

ई.1398-99 में तैमूर लंग के भारत अभियान के बाद भारत की केन्द्रीय शक्ति का पराभव हो गया। इस कारण भारत में अनेक प्रान्तीय राज्यों का उद्भव हुआ तथा सम्पूर्ण देश अनेक छोटे प्रांतीय राज्यों में विभक्त हो गया। इन राज्यों के कभी न खत्म होने वाले युद्धों, लूटमार तथा विध्वंसात्मक कार्यवाहियों से देश में अशान्ति एवं अव्यवस्था व्याप्त हो गई जिससे देश के आर्थिक एवं सांस्कृतिक विकास को गहरा आघात लगा।

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भारत के उत्तर में स्थित काश्मीर अनादि काल से हिन्दू संस्कृति का मुख्य केन्द्र था। इस कारण इस क्षेत्र में वैदिक संस्कृति के काल से ही हिन्दू राजा शासन करते आए थे। काश्मीर में महाभारत कालीन मंदिरों के अवशेष प्राप्त हुए हैं जिनमें गणपतयार तथा खीरभवानी का मंदिर प्रमुख हैं। मौर्य सम्राट अशोक के शासनकाल में काश्मीर में बौद्धधर्म का प्रचार हुआ। जब काश्मीर पर कुषाणों का अधिकार हुआ, तब भी उनके संरक्षण में बौद्धधर्म फलता-फूलता रहा किंतु जब छठी शताब्दी ईस्वी में उज्जैन में महाराज विक्रमादित्य का शासन हुआ तब काश्मीर में हिन्दूधर्म पूरे उत्साह के साथ फिर से लौट आया। महाराजा ललितादित्य के समय में काश्मीर में हिन्दू संस्कृति का विशेष रूप से प्रसार हुआ। दिल्ली सल्तनत की स्थापना के साथ ही काश्मीर का मुसलमानीकरण आरम्भ हुआ। सबसे पहले काश्मीर में कुछ सूफियों ने आकर बसना आरम्भ किया। तब से काश्मीर में मुस्लिम जनसंख्या की बसावट होने लगी। कोटरानी काश्मीर की अंतिम हिन्दू शासक थी जिसने ई.1334 से ई.1339 तक काश्मीर पर शासन किया। उसके बाद ई.1399 में रामचंद्र काश्मीर का शासक हुआ। उसने शाह मिर्जा नामक एक व्यक्ति को अपना मंत्री बनाया जो ई.1320 से काश्मीर राज्य की सेना में नौकरी कर रहा था।

अभी राजा रामचंद्र कुछ दिन ही शासन कर सका था कि मन्त्री शाह मिर्जा ने छल से राजा रामचंद्र की हत्या कर दी और स्वयं काश्मीर का स्वतंत्र शासक बन बैठा। इसके बाद काश्मीर का मुसलमानीकरण तेजी से आरम्भ हुआ।

इस काल में भारत में दिल्ली सल्तनत अपने चरम पर थी और हिन्दू राजा अपने-अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहे थे इसलिए काश्मीर के हिन्दू राजवंश को कहीं से भी सहायता नहीं मिल सकी और वह इतिहास के नेपथ्य में चला गया।

शाह मिर्जा के वंश को काश्मीर के इतिहास में शाह मीर वंश कहा जाता है। इस वंश के शासक हिन्दुओं के प्रति अत्यंत कठोर रवैया रखते थे। उन्होंने हिन्दू प्रजा पर जजिया लगा दिया तथा शरीयत के अनुसार शासन करने लगे। इस कारण केवल मुसलमानों को ही राज्य के उच्च पदों पर रखा जाने लगा।

मिर्जा वंश के शासकों ने ई.1339 से ई.1585 तक काश्मीर पर शासन किया। शाह मीर वंश के लम्बे शासन काल में काश्मीर का मुसलमानीकरण बड़ी तेजी से हुआ। काश्मीर में मुस्लिम जनसंख्या का तेजी से प्रसार हुआ।

ई.1420 में शाह मिर्जा के वंश में जैनुलओबेदीन नामक शासक हुआ जो अपने पूर्ववर्ती शासकों की अपेक्षा उदार और सहिष्णु था। जैनुलओबेदीन ने भारत के अनेक हिन्दू एवं मुस्लिम राज्यों से अच्छे सम्बन्ध स्थापित किए। उसने अपने राज्य में हिन्दू जनता पर से जजिया हटा दिया तथा गौ-वध का निषेध कर दिया।

तत्कालीन इतिहासकारों के अनुसार जैनुलओबेदीन काश्मीरी, फारसी, हिन्दी और तिब्बती भाषाओं का विद्वान था। उसने महाभारत तथा राजतरंगिणी नामक संस्कृत ग्रंथों का फारसी भाषा में अनुवाद करवाया तथा अनेक फारसी ग्रन्थों का हिन्दी में अनुवाद करवाया। उसने अपने राज्य में शान्ति स्थापित की तथा जनता पर करों का बोझ कम किया। उसके शासन में काश्मीर की उन्नति हुई। ई.1470 में सुल्तान जैनुलओबेदीन की मृत्यु हो गई।

जैनुलओबेदीन के बाद उसका पुत्र हैदरशाह काश्मीर का सुल्तान बना। उसने अपने पिता की धर्मसहिष्णु नीतियों को जारी रखा। हैदरशाह के उत्तराधिकारी निर्बल तथा अयोग्य निकले। परिणामस्वरूप काश्मीर में अराजकता फैल गई और मुस्लिम सरदार अनेक गुटों में बँट गए। सुल्तान इन सरदारों के हाथ की कठपुतली बन कर रह गया।

दिल्ली से बहुत दूर स्थित होने और आन्तरिक अवस्था बिगड़ी हुई होने के कारण दिल्ली सल्तनत के काल में काश्मीर उत्तरी भारत की राजनीति में कोई विशेष भूमिका नहीं निभा पाया। दिल्ली सल्तनत के सुल्तानों ने भी कभी काश्मीर पर अधिकार करने का प्रयास नहीं किया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

जौनपुर तथा खानदेश दिल्ली सल्तनत से अलग हो गए (170)

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जौनपुर तथा खानदेश दिल्ली सल्तनत के काल में प्रांतीय मुस्लिम राज्य थे। जौनपुर तथा खानपुर दोनों के शासक दिल्ली के सुल्तान द्वारा नियुक्त किए जाते थे।

जौनपुर

जौनपुर उत्तर प्रदेश में गोमती नदी के तट पर स्थित है। कहा जाता है कि इस नगर की स्थापना दिल्ली के सुल्तान फीरोजशाह तुगलक ने ई.1359-60 में की थी। गोमती नदी पर स्थित यह नगर शीघ्र ही उन्नति को पहुँच गया और कुछ समय के लिए तो दिल्ली के बराबर स्तर पर आ गया।

जौनपुर के स्वतंत्र राज्य का संस्थापक मलिक सरवर, फीरोज तुगलक के पुत्र सुल्तान मुहम्मद का गुलाम था जो अपनी योग्यता से ई.1389 में दिल्ली सल्तनत का वजीर बना। सुल्तान महमूद ने उसे ‘मलिक-उस-शर्क’ अर्थात् ‘पूर्व का स्वामी’ की उपाधि से विभूषित किया। ई.1394 में मलिक सरवर को दो-आब का विद्रोह दबाने के लिए भेजा गया। उसने उस विद्रोह को ही नहीं दबाया अपितु अलीगढ़ से लेकर बिहार में तिरहुत तक के सम्पूर्ण प्रदेश पर अधिकार कर लिया।

मलिक सरवर ने इस क्षेत्र में शान्ति एवं व्यवस्था स्थापित की तथा अपनी शक्ति को सुदृढ़ बनाया। यद्यपि उसने स्वयं को कभी सुल्तान घोषित नहीं किया तथापि वह एक स्वतंत्र शासक की भाँति व्यवहार करने लगा। तैमूर लंग के भारत-आक्रमण के समय मलिक सरवर ने अपने स्वामी सुल्तान महमूद को कोई सहायता नहीं भेजी। ई.1399 में मलिक सरवर की मृत्यु हो गई। उसके पीछे उसका वंश शर्की-वंश कहलाया।

मलिक सरवर की मृत्यु के बाद उसका पुत्र मुबारकशाह जौनपुर के तख्त पर बैठा। उसने स्वयं को सुल्तान घोषित किया और अपने नाम का खुतबा भी पढ़वाया। सुल्तान महमूद के वजीर मल्लू इकबाल खाँ ने जौनपुर को जीतने का प्रयास किया परन्तु उसे सफलता नहीं मिली। ई.1402 में मुबारकशाह की मृत्यु हो गई।

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मुबारकशाह का उत्तराधिकारी इब्राहीम शाह, शर्की वंश का योग्यतम शासक हुआ। उसने 35 वर्ष राज्य किया। उसके समय में दिल्ली और जौनपुर के सम्बन्धों में कटुता आ गई। दिल्ली के सैय्यद सुल्तानों के साथ उसके सम्बन्ध खराब रहे। इसका मुख्य कारण दोनों राज्यों की विस्तारवादी नीति थी।

इब्राहीम शाह शर्की ने बंगाल को जीतने का प्रयास किया परन्तु उसे कोई सफलता नहीं मिली। इब्राहीमशाह शर्की ने जौनपुर में मुस्लिम संस्कृति की उन्नति के लिए अनेक उपाय किए। उसके समय में जौनपुर उत्तर भारत में मुस्लिम संस्कृति का एक प्रमुख केन्द्र बन गया।

इब्राहीम शाह शर्की ने मुस्लिम विद्वानों को उदारतापूर्वक आश्रय प्रदान किया जिन्होंने अनेक ग्रन्थों की रचना की। इब्राहीमशाह ने जौनपुर में अनेक भव्य भवनों का निर्माण करवाया। ई.1440 में उसकी मृत्यु हो गई।

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इब्राहीमशाह शर्की की मृत्यु के बाद उसका पुत्र महमूदशाह शर्की जौनपुर का सुल्तान बना। उसे चुनार का दुर्ग जीतने में सफलता मिली परन्तु वह कालपी दुर्ग को जीतने में असफल रहा। महमूदशाह शर्की ने दिल्ली पर भी आक्रमण किया परन्तु बहलोल लोदी ने उसे परास्त करके खदेड़ दिया। महमूदशाह के इस कृत्य से दिल्ली और जौनपुर की प्रतिद्वन्द्विता और भी अधिक तीव्र हो गई। महमूदशाह के बाद उसका पुत्र मुहम्मद शाह शर्की जौनपुर का सुल्तान बना। उसके समय में भी दिल्ली और जौनपुर का संघर्ष जारी रहा। कुछ समय बाद मुहम्मदशाह शर्की के भाई ने सुल्तान मुहम्मदशाह शर्की की हत्या करवा दी और स्वयं हुसैनशाह के नाम से तख्त पर बैठ गया। उसके समय में बहलोल लोदी ने जौनपुर पर भीषण आक्रमण किया। ई.1479 में हुसैनशाह शर्की बुरी तरह परास्त होकर बिहार की ओर भाग गया। बहलोल लोदी ने जौनपुर को दिल्ली सल्तनत में मिला लिया। इस प्रकार दिल्ली सल्तनत से अलग होने के 75 वर्ष बाद जौनपुर पुनः दिल्ली सल्तनत का सूबा बना। दिल्ली के सुल्तान बहलोल लोदी ने जौनपुर का भाग अपने बड़े पुत्र बारबकशाह को सौंप दिया। बहलोल लोदी की मृत्यु के बाद उसका तीसरा पुत्र निजाम खाँ ‘सिकन्दरशाह लोदी’ के नाम से दिल्ली के तख्त पर बैठा।

जौनपुर के गवर्नर बारबकशाह ने दिल्ली की अधीनता मानने से मना कर दिया परन्तु सिकन्दर लोदी ने उसे पराजित करके दिल्ली के अधीन किया।

बारबकशाह अयोग्य निकला और जौनपुर में विद्रोह उठ खड़ा हुआ। अन्त में सिकन्दर लोदी ने विद्रोह का दमन किया और जौनपुर में एक नये सूबेदार को नियुक्त किया। सिकंदर लोदी ने अपने बड़े भाई बारबकशाह को जेल में डाल दिया गया।

सिकन्दर लोदी की मृत्यु के बाद उसका बड़ा पुत्र इब्राहीम लोदी दिल्ली के तख्त पर बैठा। इस अवसर पर इब्राहीम के भाई जलाल खाँ ने स्वयं को कालपी का सुल्तान घोषित कर दिया। इस पर इब्राहीम ने जलाल खाँ को जौनपुर का स्वतंत्र शासक बना दिया किंतु जब जलाल खाँ ने इस पर भी इब्राहीम लोदी का विरोध करना नहीं छोड़ा तो इब्राहीम लोदी ने उसकी हत्या करवा दी। इसके बाद जौनपुर कभी भी स्वतंत्र राज्य नहीं रहा।

खानदेश

जौनपुर तथा खानदेश दोनों ही दिल्ली सल्तनत के अधीन प्रांतीय मुस्लिम राज्य थे तथा दोनों के ही शासक दिल्ली के सुल्तान के विरुद्ध बगावत का झण्डा उठाए रहते थे। खानदेश भी दिल्ली सल्तनत का अंग था किंतु स्वतंत्र राज्य के रूप में विकसित होने में सफल रहा। खानदेश मध्य भारत में ताप्ती नदी की घाटी में स्थित था।

दिल्ली के सुल्तान फिरोजशाह तुगलक ने मलिक राजा फारूकी को खानदेश का सूबेदार नियुक्त किया था। फीरोजशाह की मृत्यु के बाद केन्द्रीय सत्ता के कमजोर पड़ते ही फारूकी ने दिल्ली से सम्बन्ध विच्छेद कर लिए तथा स्वयं को खानदेश का स्वतन्त्र शासक घोषित कर दिया। कुछ समय बाद ही उसे गुजरात के सुल्तान मुजफ्फरशाह (प्रथम) से युद्ध करना पड़ा जिसमें खानदेश का सुल्तान राजा फारूकी परास्त हुआ। ई.1399 में उसकी मृत्यु हो गई।

मलिक राजा फारूकी के बाद उसका पुत्र मलिक नासिर खानदेश का सुल्तान बना। उसने असीरगढ़ को जीता किन्तु उसे गुजरात के सुल्तान अहमदशाह से परास्त होकर उसकी प्रभुसत्ता स्वीकार करनी पड़ी। बहमनी सुल्तान के हाथों भी उसे पराजय का स्वाद चखना पड़ा। ई.1438 में उसकी मृत्यु हो गई। उसके दो उत्तराधिकारी अयोग्य निकले।

ई.1457 में आदिल खाँ (द्वितीय) खानदेश का सुल्तान हुआ। उसने एक तरफ तो गोंडवाना को जीतकर अपने राज्य की सीमाओं का विस्तार किया और दूसरी तरफ प्रशासनिक सुधारों को लागू करके शासन व्यवस्था को सुदृढ़ बनाने का प्रयास किया।

ई.1501 में आदिल खाँ (द्वितीय) की मृत्यु के बाद उसका भाई दाऊद खाँ खानदेश का सुल्तान बना परन्तु ई.1508 में उसका देहान्त हो गया और उसका पुत्र गाजी खाँ खानदेश का सुल्तान हुआ परन्तु एक सप्ताह बाद ही उसे जहर देकर मार दिया गया।

दाऊद की मृत्यु के बाद खानदेश के तख्त के दो दावेदार उठ खड़े हुए। एक दावेदार का पक्ष अहमदनगर के सुल्तान ने लिया तो दूसरे दावेदार का समर्थन गुजरात के सुल्तान ने किया। अन्त में गुजरात के सुल्तान महमूद बेगड़ा द्वारा समर्थित दावेदार शहजादा, आदिल खाँ (तृतीय) के नाम से खानदेश का शासक हुआ। उसे गुजरात के करद शासक की भाँति शासन करना पड़ा।

ई.1520 में आदिल खाँ (तृतीय) की मृत्यु हो गई तथा उसके बाद उसका पुत्र महमूद (प्रथम) खानदेश का सुल्तान बना। वह भी गुजरात की अधीनता में रहा। उसमें न तो शक्ति थी और न योग्यता।

डॉ. आशीर्वादीलाल श्रीवास्तव ने लिखा है- ‘दिल्ली से दूर होने तथा इसकी आन्तरिक स्थिति ठीक नहीं होने के कारण उस युग की राजनीति में खानदेश का कोई महत्त्वपूर्ण स्थान नहीं रहा।’

यदि जौनपुर तथा खानदेश दोनों की तुलना की जाए तो जौनपुर की तुलना में खानदेश दिल्ली के सुल्तान के लिए अधिक संकट खड़ा करता था।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

दिल्ली सल्तनत में बंगाल की स्थिति (171)

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दिल्ली सल्तनत में बंगाल की स्थिति

दिल्ली सल्तनत में बंगाल की स्थिति कभी स्वतंत्र, कभी अर्द्धस्वतंत्र तो कभी पूर्णतः अधीनस्थ राज्य की रहती थी। दिल्ली से दूर होने के कारण दिल्ली के सुल्तान अधिक समय के लिए बंगाल को अपने अधीन नहीं रख पाते थे।

भारत के अन्य प्रांतों की तरह बंगाल पर भी अनादि काल से हिन्दू राजाओं का शासन रहा। जिस समय सिकंदर ने भारत पर आक्रमण किया था, उस समय बंगाल में गंगारिदयी नामक राजवंश का शासन करता था। यहाँ के लोग आरम्भ से ही स्वातंत्र्य प्रकृति के रहे हैं, इस कारण यह क्षेत्र पाटलिपुत्र के मौर्यों के प्रभाव से मुक्त रहा।

सातवीं शताब्दी ईस्वी में शशांक ने बंगाल में गौड़ राज्य की स्थापना की जिसने कन्नौज के मौखरी राजा ग्रहवर्मन को मारा था जो कि थानेश्वर के राजा राज्यवर्द्धन का बहनोई था। जब शशांक ने राज्यवर्द्धन को भी मार डाला तो हर्षवर्द्धन थानेश्वर का राजा हुआ और उसने शशांक को मारकर अपने बहनोई तथा बड़े भाई की हत्या का बदला लिया।

चूंकि शशांक का राजवंश हिन्दू था इसलिए उस काल के बौद्धधर्म से प्रभावित बिहार एवं बंगाल के राजाओं ने मिलकर शशांक को मार दिया तथा बंगाल में एक नवीन राजवंश की स्थापना हुई जो गौड़ राजवंश कहलाता था। गौड़ राजवंश ने बंगाल में बौद्धधर्म का प्रसार किया। गौड़ों के बांद बंगाल में पालवंश तथा पालवंश के बाद सेनवंश ने दीर्घकाल तक शासन किया।

उस काल में बंगाल की जनसंख्या इतनी अधिक नहीं थी जितनी कि आज है। तब का बंगाल भारत के अत्यधिक समृद्ध प्रदेशों में से एक था। ई.1205 में इख्तियारूद्दीन मुहम्मद बिन बख्तियार खिलजी ने बंगाल को जीतकर दिल्ली सल्तनत में सम्मिलित किया था। यद्यपि वह कुतुबुद्दीन ऐबक के अधीन नहीं था तथापि उसने स्वयं को कुतुबुद्दीन के प्रति विश्वसनीय बनाए रखा। उसके बाद बंगाल पर फिर कभी हिन्दुओं का शासन नहीं हो सका।

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दिल्ली से अत्यधिक दूर होने के कारण बंगाल के अधिकांश सूबेदारों ने केन्द्रीय सत्ता से सम्बन्ध विच्छेद करके अपनी स्वतन्त्र सत्ता की स्थापना के प्रयास किये। बंगाल के किसी भी सूबेदार के निर्बल होने की स्थिति में अन्य कोई भी शक्तिशाली व्यक्ति उसे पदच्युत करके बंगाल की सत्ता हथिया लेता था।

बाबर ने अपनी आत्मकथा में लिखा है-

‘बंगाल की यह बड़ी विचित्र प्रथा है कि राज्य वंशागत अधिकार से बहुत कम प्राप्त होता है। बादशाह का अर्थ उसके राजतख्त से समझा जाता है। बंगाल वाले केवल तख्त तथा पद का सम्मान करते हैं …… जो कोई भी योद्धा, बंगाल के शासक की हत्या करके तख्त हथिया लेता है, वही बंगाल का बादशाह हो जाता है। बंगाल वालों का कथन है कि हम राजतख्त के भक्त हैं। जो कोई राजतख्त पर आरूढ़ होता है, हम उसके आज्ञाकारी बन जाते हैं।’

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इख्तियारूद्दीन खिलजी की मृत्यु के उपरान्त बंगाल तथा बिहार ने दिल्ली से सम्बन्ध विच्छेद करने का प्रयत्न किया। अलीमर्दा खाँ ने लखनौती में स्वतंत्रता पूर्वक शासन करना आरम्भ कर दिया परन्तु स्थानीय खिलजी सरदारों ने उसे कैद करके कारागार में डाल दिया और उसके स्थान पर मुहम्मद शेख को शासक बना दिया। अलीमर्दा खाँ कारगार से निकल भागा और दिल्ली पहुँच गया। उसने दिल्ली के सुल्तान कुतुबुद्दीन ऐबक से, बंगाल में हस्तक्षेप करने के लिए कहा। कुतुबुद्दीन ऐबक ने बंगाल पहुंचकर विद्रोहियों को मार डाला तथा अलीमर्दा खाँ को बंगाल का गवर्नर बना दिया। अलीमर्दा खाँ ने कुतुबुद्दीन ऐबक की अधीनता स्वीकार कर ली और उसे वार्षिक कर देने को तैयार हो गया। अलीमर्दा खाँ ने बंगाल पर बड़ी निर्दयता तथा निरंकुशता से शासन किया और कुतुबुद्दीन ऐबक के मरते ही अल्लाउद्दीन का विरुद धारण करके बंगाल का स्वतन्त्र सुल्तान बन गया। दिल्ली के सुल्तान इल्तुतमिश के समय में हिसामुद्दीन इवाज, सुल्तान गयासुद्दीन खिलजी की उपाधि धारण करके बंगाल में शासन कर रहा था। ई.1225 में इल्तुतमिश ने बंगाल पर आक्रमण किया। गयासुद्दीन ने इल्तुतमिश का आधिपत्य स्वीकार कर लिया और बिहार पर अपने अधिकार को त्याग दिया।

इल्तुतमिश संतुष्ट होकर लौट गया परन्तु उसके दिल्ली पहुँचते ही गयासुद्दीन ने पुनः स्वयं को बंगाल का स्वतन्त्र शासक घोषित कर दिया और बिहार पर अधिकार कर लिया।

इस पर इल्तुतमिश ने ई.1226 में अपने पुत्र नासिरुद्दीन महमूद को जो उन दिनों अवध का गवर्नर था, बंगाल पर आक्रमण करने भेजा। नासिरुद्दीन ने लखनौती पर अधिकार स्थापित करके गयासुद्दीन को मरवा डाला। इल्तुतमिश ने नासिरुद्दीन महमूद को बंगाल का गवर्नर नियुक्त कर दिया। नासिरुद्दीन ने बंगाल में शान्ति तथा व्यवस्था स्थापित करने का काफी प्रयास किया किंतु जब नासिरुद्दीन दिल्ली चला आया तो बंगाल में पुनः अशांति फैल गई।

इल्तुतमिश ने ई.1230 में पुनः बंगाल पर आक्रमण किया और फिर से बंगाल पर अधिकार करके अल्लाउद्दीन जैनी को वहाँ का गवर्नर नियुक्त किया। आगे चलकर जब नासिरुद्दीन महमूद दिल्ली के तख्त पर बैठा तो उसके पूरे शासन काल में लखनौती में गड़बड़ी व्याप्त रही। उसके बीस वर्षीय शासन में लखनौती में सात-आठ शासक हुए। सुल्तान नासिरुद्दीन दिल्ली की समस्याओं में उलझे रहने से बंगाल में फिर से अपना शासन स्थापित नहीं कर सका।

ई.1243 में जाजनगर के हिन्दू राय ने बंगाल पर आक्रमण कर दिया। उसने बंगाल पर अधिकार करके उसे दिल्ली से स्वतंत्र कर लिया। कुछ समय बाद बंगाल फिर से दिल्ली के अधीन हो गया।

जब तुगरिल खाँ बंगाल का सूबेदार बना तो उसने दिल्ली से सम्बन्ध विच्छेद करके अवध पर आक्रमण कर दिया। इस पर जाजनगर के हिन्दू राजा ने तुगरिल खाँ को परास्त कर दिया। तुगरिल खाँ ने दिल्ली के सुल्तान बलबन से सहायता मांगी। बलबन ने तुगरिल खाँ पर आक्रमण करके उससे युद्ध का हरजाना मांगा।

तुगरिल खाँ ने अवध की जागीर युद्ध के हर्जाने के रूप में बलबन को दे दी तथा स्वयं दिल्ली के अधीन हो गया। ई.1279 में बलबन बीमार पड़ा। इससे प्रेरित होकर तुगरिल खाँ ने स्वयं को पुनः स्वतन्त्र शासक घोषित कर दिया और सुल्तान मुगसुद्दीन की उपाधि धारण कर ली। उसने अपने नाम की मुद्राएं चलाईं और अपने नाम से खुतबा भी पढ़वाया।

तुगरिल खाँ के इस व्यवहार से बलबन को बड़ी चिन्ता हुई, उसने तुगरिल खाँ के विरुद्ध कई बार सेनाएँ भेजीं परन्तु सफलता प्राप्त नहीं हुई। अन्त में बलबन अपने पुत्र बुगरा खाँ को साथ लेकर एक विशाल सेना के साथ बंगाल के लिए चल दिया। तुगरिल खाँ भयभीत होकर अपने कुछ साथियों के साथ जाजनगर के जंगलों में भाग गया।

लखनौती पर बलबन का अधिकार स्थापित हो गया। बड़ी खोज के बाद तुगरिल खाँ पकड़ा गया। उसका सिर काटकर नदी में फेंक दिया गया और स्त्रियों तथा बच्चों को कैद कर लिया गया। सुल्तान ने तुगरिल खाँ के साथियों तथा सम्बन्धियों को भी कठोर दण्ड दिया। लखनौती में तीन दिन तक हत्याकाण्ड चलता रहा।

विद्रोहियों का दमन करने के उपरान्त बलबन ने बंगाल का शासन प्रबन्ध अपने पुत्र बुगरा खाँ को सौंप दिया। उसने शहजादे को चेतावनी दी कि यदि वह दुष्टों के कहने में आकर विद्रोह करेगा तो उसकी वही दशा होगी जो तुगरिल खाँ की हुई थी। इस प्रकार दिल्ली सल्तनत में बंगाल कभी स्वतंत्र, कभी अर्द्धस्वतंत्र तो कभी पूर्णतः अधीनस्थ रहा।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

बंगाल में मुस्लिम जनसंख्या का प्रसार हो गया (172)

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बंगाल में मुस्लिम जनसंख्या का प्रसार हो गया

बंगाल में अनादि काल से हिन्दू संस्कृति फल-फूल रही थी किंतु दिल्ली सल्तनत के काल में बंगाल में मुस्लिम जनसंख्या का प्रसार हो गया तथा बंगाल की जनसंख्या को तलवार के बल पर इस्लाम के अधीन ले जाया गया।

बलबन ने बंगाल के सुल्तान तुगरिल खाँ को मारकर अपने पुत्र बुगरा खाँ को बंगाल का गवर्नर बनाया किंतु ई.1282 में बलबन की मृत्यु के बाद बुगरा खाँ ने बंगाल में एक अगल राज्य की स्थापना की जो दिल्ली से स्वतंत्र होकर शासन करता रहा। खिलजियों के समय में बंगाल स्वतंत्र राज्य बना रहा। इस काल में बंगाल में मुस्लिम जनसंख्या का तेजी से प्रसार हुआ। अल्लाउद्दीन खलजी ने बंगाल पर कोई चढ़ाई नहीं की।

गयासुद्दीन तुगलक के समय में बंगाल में शम्सुद्दीन के तीन पुत्रों- शिहाबुद्दीन, गयासुद्दीन बहादुर तथा नासिरूद्दीन में उत्तराधिकार का युद्ध हुआ। इस झगड़े में गयासुद्दीन बहादुर को सफलता प्राप्त हुई। उसने अपने भाइयों शिहाबुद्दीन तथा नासिरूद्दीन को लखनौती से मार भगाया और स्वयं को बंगाल का सुल्तान घोषित कर दिया।

शिहाबुद्दीन तथा नासिरूद्दीन ने सुल्तान गयासुद्दीन तुगलक से हस्तक्षेप करने का अनुरोध किया। गयासुद्दीन ने उनका अनुरोध स्वीकार करके बंगाल पर आक्रमण किया। बंगाल के सुल्तान गयासुद्दीन बहादुर ने दिल्ली के सुल्तान गयासुद्दीन तुगलक का सामना किया परन्तु परास्त हो गया और कैद कर लिया गया। गयासुद्दीन तुगलक ने नासिरूद्दीन को लखनौती का शासक बना दिया। इस प्रकार बंगाल पर फिर से दिल्ली सल्तनत का अधिकार स्थापित हो गया। बंगाल में मुस्लिम जनसंख्या एक बार फिर तेजी से बढ़ने लगी।

दिल्ली के सुल्तान मुहम्मद बिन तुगलक के समय पूर्वी बंगाल में बहराम खाँ शासन कर रहा था। उसके अंगरक्षक फखरूद्दीन ने ई.1337 में उसकी हत्या कर दी और स्वयं पूर्वी बंगाल का शासक बन गया। दिल्ली साम्राज्य की दशा को देखकर उसने स्वयं को बंगाल का स्वतन्त्र शासक घोषित कर दिया और अपने नाम की मुद्राएँ चलाने लगा। मुहम्मद बिन तुगलक की असमर्थता के कारण बंगाल स्वतंत्र हो गया।

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ई.1345 में हाजी इलियास ‘शम्सुद्दीन इलियास’ के नाम से बंगाल का शासक बना। उसके काल में फीरोजशाह तुगलक ने बंगाल को पुनः अधीन करने का प्रयास किया किन्तु वह बंगाल को जीतने के बाद मुस्लिम स्त्रियों का करुण क्रंदन सुनकर बंगाल पर अपना अधिकार किये बिना ही दिल्ली लौट गया। इस घटना से स्पष्ट हो जाता है कि इस समय तक बंगाल में मुस्लिम जनसंख्या का काफी प्रसार हो चुका था।

ई.1357 में इलियास की मृत्यु के बाद उसका पुत्र सिकन्दरशाह बंगाल का सुल्तान बना। उसके समय में भी फीरोजशाह तुगलक ने बंगाल पर आक्रमण किया परन्तु इस बार भी फिरोज को निराश होकर वापस दिल्ली लौटना पड़ा। सिकन्दरशाह ने अपनी नई राजधानी पंडुवा में अनेक भव्य भवनों का निर्माण करवाया।

सिकन्दरशाह के बाद गियासुद्दीन आजम बंगाल का सुल्तान बना। वह एक योग्य शासक था। तैमूर लंग के भारत-आक्रमण के समय यही गियासुद्दीन आजम बंगाल का सुल्तान था। ई.1410 में उसकी मृत्यु के बाद सैफुद्दीन इम्जाशाह सुल्तान बना। वह एक निर्बल शासक सिद्ध हुआ।

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पंद्रहवीं शताब्दी के आरम्भ में हिन्दू राजा गणेश ने बंगाल के तख्त पर अधिकार कर लिया। गणेश के पुत्र जादू ने इस्लाम स्वीकार करके जलालुद्दीन मुहम्मदशाह की उपाधि धारण की। उसने ई.1431 तक शासन किया। उसके बाद तीन-चार निर्बल शासकों ने बंगाल पर शासन किया। गणेश के निर्बल वंशजों के बाद नसिरूद्दीन नामक एक तेज-तर्रार योद्धा बंगाल का स्वतंत्र सुल्तान बना जिसने 17 वर्षों तक बंगाल पर शासन किया। ई.1460 में उसकी मृत्यु के बाद बारबकशाह सुल्तान बना। बारबकशाह के बाद शम्मसुद्दीन युसुफशाह ने ई.1481 तक बंगाल पर शासन किया। शम्मसुद्दीन युसुफशाह के उत्तराधिकारी सिकन्दर (द्वितीय) को पदच्युत करके जलाजुद्दीन फतेहशाह नया सुल्तान बना परन्तु ई.1486 में उसके हब्शी गुलामों के नेता बारबकशाह ने उसे मौत के घाट उतार कर तख्त पर कब्जा कर लिया। इसी प्रकार, ई.1490 में एक अन्य हब्शी सिद्दी बद्र ने सुल्तान महमूदशाह (द्वितीय) को मौत के घाट उतार कर बंगाल के तख्त पर अधिकार कर लिया। ई.1493 में अल्लाउद्दीन हुसैनशाह बंगाल का सुल्तान बना। उसके वंशजों ने लगभग 50 वर्ष तक बंगाल पर शासन किया।

ई.1494 में अल्लाउद्दीन ने जौनपुर के भगोड़े शासक हुसैन को अपने यहाँ आश्रय प्रदान किया। इस कारण उसका दिल्ली के सुल्तान सिकन्दर लोदी से संघर्ष हो गया परन्तु अंत में दोनों पक्षों के मध्य सन्धि हो गई जिसके अनुसार बिहार की पूर्वी सीमा दिल्ली सल्तनत तथा बंगाल सल्तनत के बीच, सीमा निश्चित कर दी गई।

अल्लाउद्दीन हुसैनशाह ने उड़ीसा तक अपने राज्य की सीमाओं का विस्तार किया। उसने मगध तथा कूच बिहार में स्थित कामतपुर पर आक्रमण करके उसे जीत लिया। उसके काल में बंगाल में मुस्लिम जनसंख्या तेजी से बढ़ी, साथ ही आसपास के क्षेत्रों में भी मुसलमानों को बसाया गया।

ई.1518 में अल्लाउद्दीन हुसैनशाह की मृत्यु के उपरान्त उसका पुत्र नासिरूद्दीन नुसरतशाह के नाम से तख्त पर बैठा। वह भी अपने पिता की भाँति भला तथा सफल शासक हुआ। उसने तिरहुत राज्य को जीतकर अपने राज्य में सम्मिलित कर लिया। नुसरतशाह को बंगला साहित्य और भवन-निर्माण में गहरी रुचि थी। उसने बड़ी सोना मस्जिद और जामा मस्जिद का निर्माण करवाया और महाभारत का बंगला भाषा में अनुवाद करवाया।

बाबरनामा के अनुसार बंगाल का यह मुसलमानी राज्य तत्कालीन हिन्दुस्तान में बड़ा शक्तिशाली और सम्मानित गिना जाता था।

वी. ए. स्मिथ ने लिखा है- ‘नुसरतशाह नाम अब भी समस्त बंगाल में सुपरिचित है। उसके चौबीस वर्ष के शासनकाल में कोई विद्रोह अथवा उपद्रव नहीं हुआ। उसका शासन शान्तिपूर्ण तथा सुखमय रहा, प्रजा उससे प्रेम करती थी तथा पड़ौसी उसका सम्मान करते थे।’

बाबर के आक्रमण के समय यही नुसरतशाह बंगाल का सुल्तान था। इस प्रकार ई.1205 में इख्तियारुद्दीन के बंगाल पर अधिकार करने से लेकर ई.1526 में बाबर के दिल्ली का शासक बनने तक तीन सौ इक्कीस साल की अवधि में बंगाली सुल्तानों की छत्रच्छाया में बंगाल में इस्लाम का जोरों से प्रचार हुआ तथा बंगाल में लाखों व्यक्तियों को हिन्दू धर्म छोड़कर मुसलमान हो जाना पड़ा।

– डॉ. मोहनलाल गुप्ता

गुजरात में मुस्लिम जनसंख्या का प्रसार (173)

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गुजरात में मुस्लिम जनसंख्या का प्रसार

भारत के अन्य प्रदेशों की तरह गुजरात में भी अनादि काल से हिन्दू सभ्यता एवं संस्कृति विकसित थी किंतु जब दिल्ली सल्तनत के सुल्तानों ने गुजरात को अपने अधीन किया तब गुजरात में मुस्लिम जनसंख्या का प्रसार होने लगा।

पाठकों को स्मरण होगा कि महमूद गजनवी ने सोमनाथ के मन्दिर को लूटकर अथाह सम्पत्ति प्राप्त की थी। तब से प्रत्येक मुसलमान शासक एवं विदेशी आक्रांता गुजरात को लूटने के लिए लालायित रहता था।

मुहम्मद गौरी, इल्तुतमिश, बलबन तथा अल्लाउद्दीन खिलजी आदि द्वारा गुजरात पर कई आक्रमण किये गए किंतु मुहम्मद गौरी, इल्तुतमिश एवं बलबन द्वारा किए गए आक्रमण गुजरात के चौलुक्य शासकों द्वारा विफल कर दिए गए। इन्हें इतिहास में सोलंकी भी कहा जाता है। जालौर, जैसलमेर तथा चित्तौड़ के राजपूतों ने भी इस अवधि में गुजरात के लिए रक्षापंक्ति का कार्य किया।

ई.1297 में अल्लाउद्दीन खिलजी की सेनाओं को गुजरात में पहली बार सफलता प्राप्त हुई। उस समय गुजरात में बघेला राज्य कर रहे थे। अल्लाउद्दीन खिलजी ने गुजरात को दल्ली सल्तनत में मिला लिया। उसने गुजरात की सम्पदा को लूटने में महमूद गजनवी से भी अधिक सफलता प्राप्त की। इसके बाद एक शताब्दी तक गुजरात दिल्ली सल्तनत के अधीन बना रहा।

दिल्ली के सुल्तानों समस्या यह थी कि यदि वे गुजरात के मुस्लिम प्रांतपति को मजबूत बनाने का प्रयास करते थे तो वह प्रांतपति स्वतंत्र होकर अलग सल्तनत की स्थापना का प्रयास करने लगते थे और यदि दिल्ली के सुल्तान गुजरात के प्रांतपति को कमजोर बनाए रखने का प्रयास करते थे तो उस क्षेत्र की हिन्दू शक्तियां इन प्रांतों में अपने खोए हुए राज्य की पुनर्स्थापना के लिए प्रयास करने लगती थीं।

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इस दुविधा के कारण गुजरात जब तक दिल्ली सल्तनत के अधीन रहा, गुजरात के मुस्लिम सूबेदार गुजरात पर अपनी पकड़ मजबूत नहीं कर सके। इस काल में गुजरात में मुस्लिम जनसंख्या एवं मुस्लिम संस्कृति का प्रसार तो हुआ किंतु वह अधिक जोर नहीं पकड़ सका।

ई.1391 में दिल्ली के सुल्तान नासिरुद्दीन मुहम्मद तुगलक ने जफर खाँ नामक एक अमीर को गुजरात का सूबेदार नियुक्त किया। तैमूर के आक्रमण के समय जफर खाँ ने स्वयं को दिल्ली के प्रभुत्व से मुक्त कर लिया तथा मुजफ्फरशाह के नाम से गुजरात का स्वतंत्र शासक बन बैठा। मध्ययुगीन हिन्दू राजवंशों की भाँति गुजरात के नये मुस्लिम राजवंश का इतिहास भी पड़ौसी राज्यों के विरुद्ध हिंसा एवं संघर्षों से भरा पड़ा है।

मालवा एवं गुजरात में स्वतंत्र मुस्लिम राज्यों की स्थापना के बाद राजपूताने का प्रबल मेवाड़ राज्य तीन ओर से मुस्लिम राज्यों से घिर गया- उत्तर में दिल्ली सल्तनत, पश्चिम में गुजरात तथा दक्षिण में मालवा। ये तीनों मुस्लिम शक्तियां, मेवाड़ के जगमगाते हुए हिन्दू राज्य पर झपटने के लिये लालायित रहती थीं।

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ई.1411 में मुजफ्फरशाह के नाती अहमदशाह ने अपने नाना मुजफ्फरशाह को विष देकर मार डाला और स्वयं गुजरात का सुल्तान बन गया। उसने ई.1442 तक गुजरात पर शासन किया। अहमदशाह ने मालवा, असीरगढ़, राजपूताना तथा अन्य पड़ौसी राज्यों के विरुद्ध कई युद्ध लड़े और अपने राज्य की सीमाओं का विस्तार किया। इतिहासकारों ने लिखा है कि अहमदशाह ने अहमदाबाद नामक प्रसिद्ध नगर की नींव डाली किंतु यह बात सही नहीं है। इस स्थान पर अत्यंत प्राचीन काल से भीलों का राज्य था जिसे अशवाल कहा जाता था। चौलुक्य राजा कर्णदेव (प्रथम) ने अशवाल के स्थान पर कर्णावती नामक नगर बसाया। अहमदशाह ने कर्णावती का नाम बदलकर अहमदाबाद कर दिया। गुजरात में स्वतंत्र मुस्लिम राज्य की स्थापना होने पर गुजरात में मुस्लिम जनसंख्या तेजी से बढ़ने लगी तथा मुस्लिम संस्कृति का भी विस्तार होने लगा। बड़ी संख्या में गुजरात के हिन्दू मुसलमान बनने लगे। जिन मंदिरों की रक्षा के लिए गुजरात के लोग अपने प्राणों की आहुति दिया करते थे, अब वे मुसलमान बनकर उन्हीं मंदिरों को तोड़ने लगे। मुसलमान बनने वाले गुजरातियों को गुजरात के सुल्तान अपनी सेना में बड़े पदों पर नियुक्त करते थे।

कुछ इतिहासकारों ने लिखा है कि गुजरात के सुल्तान अहमदशाह ने अपने सम्पूर्ण राज्यकाल में कभी हार नहीं खाई किंतु यह बात गलत है। मेवाड़ के महाराणा मोकल ने अहमदशाह को युद्ध में करारी मात दी जिसके कारण अहमदशाह को युद्ध का मैदान छोड़कर भाग जाना पड़ा। महाराणा मोकल की तरफ से इस युद्ध का नेतृत्व मारवाड़ का राजा रणमल्ल कर रहा था।

महाराणा मोकल के बाद महाराणा कुंभा मेवाड़ का स्वामी हुआ। उसके शिलालेखों के अनुसार महाराणा कुंभा के प्रबल पराक्रम के कारण दिल्ली और गुजरात के मुस्लिम शासकों ने महाराणा को छत्र भेंट करके उसे ‘हिन्दुसुरत्राण’ का विरुद प्रदान किया था। उस समय दिल्ली पर सैय्यद मुहम्मदशाह का तथा गुजरात पर अहमदशाह का शासन था। इस घटना के सम्बन्ध में अधिक विवरण प्राप्त नहीं होता।

डॉ. आशीर्वादी लाल श्रीवास्तव अहमदशाह की गणना गुजरात के महानतम शासकों में करते हैं किंतु यह बात सही नहीं है। अहमदशाह एक धर्मान्ध शासक था और अपनी गैर-मुस्लिम प्रजा के साथ उसका व्यवहार असहिष्णुतापूर्ण था। हिन्दुओं के धार्मिक स्थलों एवं मूर्तियों को नष्ट करना अहमदशाह के लिए सामान्य बात थी। उसकी मृत्यु के बाद गुजरात में तीन-चार निर्बल सुल्तान हुए।

ई.1456 में मेवाड़ के शासक महाराणा कुंभा ने नागौर पर अभियान किया। महाराणा के भय से नागौर के मुस्लिम सुल्तान शम्स खाँ ने गुजरात के सुल्तान कुतुबुद्दीन से अपनी पुत्री का विवाह करके गुजरात की सेना प्राप्त कर ली। गुजरात की सेना नागौर दुर्ग के चारों ओर सुरक्षा-घेरा बनाकर बैठ गई।

महाराणा कुंभकर्ण ने गुजरात के सुल्तान का उपहास करते हुए नागौर पर अधिकार कर लिया तथा नागौर में फीरोज द्वारा निर्मित ऊँची मस्जिद को जलाकर राख कर दिया। महाराणा की सेना ने नागौर दुर्ग को तोड़ डाला तथा उसके चारों ओर बनी खाई को मिट्टी से भर दिया। महाराणा ने गुजरात तथा नागौर की सेनाओं के हाथियों को छीन लिया, असंख्य यवनों को दण्ड दिया तथा उनकी यवनियों को कैद कर लिया।

इस अपमानजनक पराजय से तिलमिला कर गुजरात के सुल्तान कुतुबुद्दीन ने महाराणा के अधिकार वाले कुम्भलगढ़ तथा आबू पर आक्रमण किया। दोनों ही स्थानों पर गुजरात की सेनाओं की करारी पराजय हुई और सुल्तान कुतुबुद्दीन महाराणा कुंभा से संधि करके गुजरात लौट गया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

महमूद बेगड़ा जहर खाकर जिंदा रहता था (174)

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महमूद बेगड़ा जहर खाकर जिंदा रहता था

गुजरात के सुल्तान महमूद बेगड़ा को डर था कि उसे छल से विष देकर मारा जा सकता है, इसलिए वह स्वयं ही प्रतिदिन थोड़ा सा जहर खाता था ताकि उसका शरीर जहर सेवन का आदी हो जाए।

तैमूर लंग के आक्रमण के बाद दिल्ली सल्तन का शिकंजा ढीला पड़ गया तथा गुजरात, मालवा एवं नागौर में मुसलमानों के स्वतंत्र राज्यों की स्थापना हो गई। इन राज्यों के सुल्तान वैसे तो आपस में लड़ते रहते थे किंतु मेवाड़ के हिन्दू राज्य को निगलने के लिए एक हो जाया करते थे। उन्होंने महाराणा कुंभा पर बार-बार आक्रमण किए किंतु महाराणा कुंभा इन सब पर भारी पड़ता था और उनमें कसकर मार लगाता था।

ई.1460 में माण्डू के सुल्तान महमूद खिलजी ने तथा गुजरात के सुल्तान कुतुबुद्दीन ने एकराय होकर दो तरफ से मेवाड़ राज्य पर आक्रमण किया। महाराणा कुंभा के शिलालेखों में कहा गया है कि कुंभा ने गुजरात और मालवा के सुलतानों के सैन्य-समुद्र का मथन किया।

सुप्रसिद्ध इतिहासकार गौरीशंकर हीराचंद ओझा ने लिखा है कि नागौर के मुसलमानों ने हिन्दुओं को पीड़ा पहुंचाने के लिए नागौर में गौवध करना आरम्भ किया। महाराणा कुंभा ने नागौर के मुसलमानों द्वारा किए जा रहे इस अनाचार का समाचार प्राप्त होने पर पचास हजार घुड़सवार लेकर नागौर पर चढ़ाई की और नागौर दुर्ग पर अधिकार कर लिया। इस अभियान में नागौर के हजारों मुसलमान मारे गये।

महाराणा कुंभा के शिलालेखों में लिखा है कि कुंभा ने नागौर में काटने के लिए बांधी गई हजारों गौओं को छुड़ा लिया। कुंभा ने नागौर नगर को नष्ट करके वहाँ पशुओं के लिए गोचर बना दिया। महाराणा ने नागौर शहर को मस्जिदों सहित जला दिया और शम्स खाँ के खजाने से विपुल रत्न-संचय छीन लिया। उस काल की हिन्दू पुस्तकों में उल्लेख मिलता है कि नागौर में एक गाय को कष्ट में देखकर महाराणा इतना विचलित हो गया कि उसे पागलपन के दौरे पड़ने लगे।

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ई.1458 में गुजरात के सुल्तान अहमदशाह का एक पौत्र अब्दुल फतेह खाँ ‘महमूदशाह’ की उपाधि धारण करके गुजरात के तख्त पर बैठा। इतिहास में उसे ‘महमूद बेगड़ा’ के नाम से जाना जाता है। वह 12 वर्ष की आयु में सुल्तान बना तथा 65 वर्ष की आयु तक जीवित रहा। उसने 53 वर्ष की दीर्घ अवधि तक गुजरात पर शासन किया और चम्पानेर, बड़ौदा, जूनागढ़, कच्छ आदि अनेक हिन्दू राज्यों पर अधिकार जमा लिया।

कहा जाता है कि महमूदशाह ने अपने जीवन में दो दुर्ग जीते थे- जूनागढ़ तथा चाम्पानेर। इसलिए उसे दो दुर्गों का स्वामी कहा गया। गुजराती भाषा में उसे बे-गढ़ा कहा गया जिसका अर्थ ‘दो दुर्ग वाला’ होता है। यही बे-गढ़ा आगे चलकर बेगड़ा हो गया। जूनागढ़ का वास्तविक नाम गिरिनार है।

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महमूद बेगड़ा ने ई.1454 में चम्पानेर दुर्ग पर आक्रमण किया। जब चाम्पानेर के हिन्दू राजा को अपनी पराजय निश्चित जान पड़ने लगी तो दुर्ग में रह रही औरतों ने जौहर किया तथा हिन्दू वीरों ने अंतिम व्यक्ति के जीवित रहने तक युद्ध किया। महमूद ने चम्पानेर के निकट मुहम्मदाबाद नामक शहर बसाया। अपने शासन के अंतिम वर्षों में महमूद बेगड़ा ने हिन्दुओं के प्रसिद्ध तीर्थ द्वारिका पर आक्रमण किया तथा वहाँ के कई प्रसिद्ध हिन्दू मन्दिरों को गिरा दिया। महमूद ने द्वारिका के निकट लूटपाट करने वाले समुद्री समूहों का भी दमन किया जो भारत से मक्का जाने वाले हजयात्रियों को लूटते थे। महमूदशाह बेगड़ा के काल में भारत में पुर्तगालियों की गतिविधियां आरम्भ हो गई थीं। महमूद बेगड़ा ने उनकी बढ़ती हुई शक्ति को रोकने के लिए एक नौसेना का निर्माण किया तथा कालीकट के हिन्दू राजा के साथ मिलकर ई.1507 में चौल बन्दरगाह के निकट पुर्तगालियों को पराजित किया। ई.1509 में पुर्तगालियों ने ड्यू अथवा दीव के निकट गुजरात और कालीकट की संयुक्त सेनाओं को परास्त करके भारतीय समुद्र पर पुनः प्रभाव स्थापित कर लिया। उसी वर्ष अर्थात् ई.1509 में महमूद बेगड़ा की मृत्यु हो गई।

एक मुस्लिम इतिहासकार ने लिखा है- ‘महमूद बेगड़ा ने गुजरात राज्य के प्रताप तथा ऐश्वर्य की वृद्धि की, वह अपने से पहले और बाद के समस्त सुल्तानों में श्रेष्ठ है।’

महमूद बेगड़ा के बारे में कही गई यह बात सही प्रतीत नहीं होती। वास्तविकता यह है कि महमूद बेगड़ा ने गुजरात की नहीं, अपितु अपने ऐश्वर्य की वृद्धि की, इसमें श्रेष्ठता जैसी कोई बात नहीं है। वह एक धर्मांध शासक था तथा उसने हिन्दू प्रजा की उन्नति पर कोई ध्यान नहीं दिया।

महमूद बेगड़ा को डर था कि उसे छल से विष देकर मारा जा सकता है, इसलिए वह स्वयं ही प्रतिदिन थोड़ा सा जहर खाता था ताकि उसका शरीर जहर सेवन का आदी हो जाए। इस जहर के कुप्रभाव को रोकने के लिए महमूद को प्रतिदिन बहुत सारा भोजन करना पड़ता था जिसमें शहद और केले प्रमुख थे। उस काल के पुर्तगालियों ने अपनी पुस्तकों में महमूद बेगड़ा के भोजन का रोचक वर्णन किया है। उनके वर्णन अतिरंजना से भरे पड़े हैं। उन्होंने लिखा है कि महमूद बेगड़ा का व्यक्तित्व आकर्षक था। उसकी दाढ़ी कमर तक पहुँचती थी और मूंछें इतनी लम्बी थीं कि वह उन्हें सिर के ऊपर बाँधता था।

एक विदेशी यात्री ‘बरबोसा’ के अनुसार महमूद बेगड़ा को बचपन से ही किसी ज़हर का सेवन कराया गया था। अतः उसके हाथ पर यदि कोई मक्खी बैठ जाती थी, तो वह फूलकर तुरन्त मर जाती थी। महमूद पेटू के रूप में भी प्रसिद्ध था। कहा जाता है कि वह नाश्ते में एक कटोरा शहद, एक कटोरा मक्खन और सौ से डेढ़ सौ केले खाता था। वह दिन भर में 10 से 15 किलो भोजन खाता था। रात के समय उसके तकिए के दोनों ओर मांस के समोसों से भरी तश्तरियाँ रखी जाती थीं, ताकि भूख लगने पर वह तुरन्त खा सके।

महमूद बेगड़ा के विषय में गुजरात में तरह-तरह की कपोल कथाएँ प्रचलित थीं। एक इतालवी यात्री ‘लुडोविको डी वारदेमा’ महमूद बेगड़ा के राज्य में आया था, उसने भी इन कथाओं का उल्लेख किया है। महमूद बेगड़ा की मृत्यु के बाद उसका पुत्र मुजफ्फरशाह (द्वितीय) गुजरात का सुल्तान बना। उसने मालवा के हिन्दू शासक मेदिनीराय को परास्त करके महमूद खलजी को मालवा के तख्त पर बैठाया। इसलिए मुजफ्फरशाह को मेवाड़ के महाराणा संग्रामसिंह से युद्ध करना पड़ा जिसे इतिहास में सांगा के नाम से जाना जाता है। राणा सांगा से हुए युद्ध में मुजफ्फरशाह परास्त हुआ। अप्रैल 1526 में मुजफ्फरशाह की मृत्यु हो गई।

मुजफ्फरशाह (द्वितीय) के बाद सिकन्दर तथा सिकंदर के बाद महमूद (द्वितीय) गुजरात के शासक हुए जो अयोग्य एवं निर्बल थे। वे बहुत कम समय के लिए गुजरात के तख्त पर बैठ सके। जुलाई 1526 में मुजफ्फरशाह (द्वितीय) का एक पुत्र बहादुरशाह गुजरात का सुल्तान बना। वह योग्य तथा महत्त्वाकांक्षी शासक था। उसने गुजरात के मुस्लिम राज्य को फिर से ताकतवर बनाया तथा देश की तत्कालीन राजनीति में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

उसी वर्ष अर्थात् ई.1526 में समरकंद के पदच्युत मुगल शासक बाबर ने भारत पर आक्रमण करके दिल्ली सल्तनत पर अधिकार कर लिया। बाबर के भारत-आक्रमण के समय यही बहादुरशाह गुजरात पर शासन कर रहा था। गुजरात के सुल्तानों के समय में गुजरात के हिन्दुओं को मुसलमान बनाने की जो प्रक्रिया आरम्भ हुई वह सैंकड़ों साल तक चलती रही। एक उदाहरण से इस बात को समझा जा सकता है कि पाकिस्तान के जनक मुहम्मद अली जिन्ना का दादा गुजराती हिन्दू था। उसने भारत की आजादी से कुछ दशक पहले ही इस्लाम अंगीकार किया था।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मालवा में मुस्लिम जनसंख्या

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मालवा में मुस्लिम जनसंख्या

गोरियों एवं खिलजियों ने मालवा में मुस्लिम जनसंख्या का प्रसार किया!

मालवा अत्यंत प्राचीन काल से मालव गण द्वारा शासित हिन्दू क्षेत्र था। मालव वीरों ने सिकंदर से भी युद्ध किया था। जब इस क्षेत्र पर मुसलमानों का शासन हो गया तब गोरियों एवं खिलजियों ने मालवा में मुस्लिम जनसंख्या का प्रसार किया!

मालवा भारत का एक समृद्ध एवं हरा-भरा प्रदेश है। ई.1310 में अल्लाउद्दीन खिलजी ने मालवा को जीतकर दिल्ली सल्तनत में सम्मिलित किया था। तैमूर लंग के आक्रमण के समय यह प्रदेश दिल्ली सल्तनत से स्वतन्त्र हो गया और मालवा का सूबेदार दिलावर खाँ गौरी मालवा का स्वतन्त्र शासक बन गया।

दिलावर खाँ गौरी तथा उसके वंशजों ने ई.1401 से ई.1436 तक मालवा पर शासन किया। उसका वंश गौरी वंश कहलाता है। ई.1406 में दिलावर खाँ की मृत्यु के बाद उसका पुत्र अलपखाँ, हुसंगशाह के नाम से मालवा का सुल्तान बना। उसने उड़ीसा, दिल्ली, गुजरात, जौनपुर तथा बहमनी राज्यों के विरुद्ध युद्ध किये परन्तु इन युद्धों से मालवा को विशेष लाभ नहीं हुआ।

हुसंगशाह ने माण्डू को अपनी राजधानी बनाया। माण्डू दुर्ग-रक्षित नगर था एवं एक ऊँची पहाड़ी पर बना हुआ था। अब उसके केवल भग्नावशेष ही बचे हैं, जो जामी मस्जिद, हिंडोला महल, जहाज महल, हुसंग का मकबरा, बाजबहादुर तथा रूपमती के महल एवं अन्य भवनों के लिए विख्यात हैं।

ई.1435 में हुसंगशाह की मृत्यु के बाद उसका पुत्र गाजी खाँ ‘महमूदशाह’ के नाम से मालवा का सुल्तान हुआ। वह एक अयोग्य शासक था। उसमें अपने प्रतिद्वंद्वियों का सामना करने की शक्ति नहीं थी। ई.1436 में सुल्तान महमूदशाह गौरी को उसके वजीर महमूद खाँ खिलजी ने जहर देकर मार डाला और मालवा के तख्त पर अधिकार कर लिया।

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महमूद खाँ खिलजी ने 33 वर्ष तक शासन किया। उसका वंश खिलजी वंश कहलाता है। उसके वंशज ई.1531 तक मालवा पर शासन करने में सफल रहे। महमूद खाँ खिलजी का अधिकांश समय गुजरात, दिल्ली, बहमनी और मेवाड़ के शासकों से लड़ने में व्यतीत हुआ।

इतिहासकार श्रीराम शर्मा ने लिखा है- ‘शायद ही कोई ऐसा वर्ष बीता हो जब महमूद खाँ खिलजी युद्धक्षेत्र में न उतरा हो। इसलिए उसका शिविर उसका घर तथा युद्धभूमि उसका विश्रामगृह बन गई।’

इन युद्धों के परिणामस्वरूप महमूद खाँ खिलजी के राज्य की सीमाएँ दक्षिण में सतपुड़ा तक, पश्चिम में गुजरात की सीमाओं तक, पूर्व में बुन्देलखण्ड तक और उत्तर में मेवाड़ तथा बून्दी राज्य की सीमाओं तक जा पहुँची। तत्कालीन मुस्लिम इतिहासकारों ने लिखा है कि सुल्तान महमूद विनम्र, वीर, न्यायप्रिय तथा विद्वान शासक था। उसके शासनकाल में हिन्दू तथा मुसलमान समस्त जनता सुखी थी और एक-दूसरे के साथ मित्रतापूर्ण व्यवहार करती थी।

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मुस्लिम लेखकों ने महमूद खाँ की प्रशंसा तो की है किंतु महमूद खाँ खिलजी की उदारता एवं प्रजावत्सलता के कार्यों का कोई उल्लेख नहीं किया है। उन्होंने महमूद खाँ खिलजी की इतनी प्रशंसा संभवतः इसलिए की क्योंकि उसके बाद के तीन सुल्तान अत्यंत क्रूर एवं प्रजापीड़क सिद्ध हुए। ई.1469 में सुल्तान महमूद की मृत्यु के बाद उसका पुत्र गियासुद्दीन के नाम से मालवा के तख्त पर बैठा। वह अत्यधिक भोग-विलासी था। उसके हरम में लगभग 15,000 स्त्रियाँ थी। ई.1500 में गियासुद्दीन के पुत्र नासिरूद्दीन ने उसे जहर देकर मार डाला और तख्त पर अधिकार कर लिया। नासिरूद्दीन भी अपने पिता की तरह व्याभिचारी तथा प्रजा-पीड़क था। ई.1510 में एक दिन मदिरा के नशे में एक झील में गिर जाने से उसकी मृत्यु हो गई। उसके बाद उसका पुत्र महमूद (द्वितीय) मालवा का सुल्तान बना। उसके समय में मालवा शीघ्रता से पतन की ओर अग्रसर हुआ। महमूद (द्वितीय) ने एक योग्य हिन्दू सरदार को मालवा राज्य का प्रधानमंत्री बनाया किंतु मालवा के मुस्लिम अमीरों को सुल्तान का यह कार्य अच्छा नहीं लगा तथा अमीरों ने षड़यंत्र करके हिन्दू प्रधानमंत्री को मार डाला।

इस पर महमूद (द्वितीय) ने मुहाफिज खाँ को प्रधानमंत्री बनाया जो खाण्डू का सूबेदार भी था। मुहाफिज खाँ अत्यंत अत्याचारी व्यक्ति था। इस कारण सल्तनत में चारों ओर से विद्रोह फूट पड़े। शीघ्र ही मालवा में तीन सुल्तान हो गए जिन्होंने एक-दूसरे को चुनौती दी।

अन्त में, चन्देरी के शासक मेदिनीराय की सहायता से महमूद (द्वितीय) को अपने प्रतिद्वन्द्वियों को मार भगाने में सफलता मिली परन्तु महमूद (द्वितीय) को इसका भारी मूल्य चुकाना पड़ा। अब शासन पर मेदिनीराय का अधिकार हो गया। मेदिनीराय ने राज्य के महत्त्वपूर्ण पदों पर अपने विश्वस्त हिन्दुओं को नियुक्त किया जिसके कारण मालवा के मुस्लिम सरदारों में जबरदस्त असंतोष उत्पन्न हुआ।

उन्होंने गुजरात के मुस्लिम सुलतान से साँठ-गाँठ करके मेदिनीराय को उखाड़ फेंकने का निश्चय किया परन्तु मेदिनीराय ने मेवाड़ के महाराणा सांगा से सहयोग लेकर गुजरात एवं मालवा के विद्रोही मुस्लिम सरदारों की सेनाओं को परास्त कर दिया।

महाराणा सांगा द्वारा मालवा का सुल्तान बन्दी बना लिया गया किंतु महाराणा सांगा ने उदारता दिखाते हुए कुछ दिनों बाद सुल्तान महमूद (द्वितीय) को रिहा कर दिया तथा उसका राज्य भी उसे वापस लौटा दिया। ई.1531 में गुजरात के सुल्तान बहादुरशाह ने मालवा को जीतकर अपने राज्य में मिला लिया।

बहादुरशाह ने मालवा के पूर्व सुल्तान महमूद (द्वितीय) तथा उसके पुत्रों को चम्पानेर के दुर्ग में बंदी बनाकर रखने का आदेश दिया गया परन्तु मार्ग में ही उनकी हत्या कर दी गई। इस प्रकार मालवा की स्वतंत्र सत्ता का अंत हो गया और वह गुजरात राज्य का हिस्सा बन गया।

गुजरात और मालवा की सल्तनतें अब कुछ ही दिनों तक जीवित रहने वाली थीं क्योंकि समरकंद के मुगलों का विजय-रथ काबुल और पानीपत से होकर दिल्ली एवं आगरा तक पहुंच चुका था। इस काल तक मालवा में मुस्लिम जनसंख्या का बेतहाशा प्रसार हो चुका था।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

बुढ़िया का चश्मा (हिन्दी लघु नाटक)

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बुढ़िया का चश्मा

प्रस्तावना बुढ़िया का चश्मा

बुढ़िया का चश्मा डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित भारतीय राजनीति तथा भारत में फैले भ्रष्टाचार पर एक करारा व्यंग्य है जो लघुनाटक के रूप में लिखा गया है। हिन्दी साहित्य में व्यंग्य नाटक लिखे जाने की परम्परा बहुत पुरानी है।

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद लोगों की आकांक्षाएं जिस प्रकार बढ़ी हैं, संवेदनाएं भी उतनी ही तेजी से मरी हैं। लोग गांधी का नाम लेकर अपना उल्लू सीधा करने में तनिक भी नहीं हिचकिचाते। धर्म के नाम पर पापाचार का बोलबाला हो गया। शिक्षा के नाम पर दुकानें खुल गईं और न्यायालयों में मुकदमों के ढेर लग गये। भारत का आम आदमी आजादी के बाद स्वयं को ठगा सा महसूस करता है। साक्ष्यों के अपराध में बड़े-बड़े अपराधी छूट रहे हैं और आम आदमी न्याय के लिये दर-दर भटक रहा है।

अपराधियों के हौंसले इस कदर बढ़े हुए हैं कि पशुओं की चर्बी को घी में मिलाकर बेचा जा रह है। लोगों की किडनियां निकालकर बेची जा रही हैं। लाखों की संख्या में कन्या भू्रण हत्याएं हुई हैं। आधुनिकता के नाम पर अमीरों में पब और मॉल संस्कृति पनप गई है तो गरीब जनता को दो समय का चूल्हा जलाना भी कठिन है।

देश की जनता के मन में यह सवाल रह-रहकर उठना स्वाभाविक है कि क्या यही आजादी है? क्या इसी आजादी की प्राप्ति के लिये लाखों लोगों ने लाठी, गोली, जेल और मौत की यातनाएं झेलीं? इस नाटक में बुढ़िया दो भूमिकाओं में है। एक ओर वह अपने ही पुत्रों द्वारा छली गई भारत माता का प्रतीक है तो दूसरी ओर भ्रष्टाचार और निर्धनता के जबड़े में पिस रही आम जनता के रूप में भी है।

विरोध का स्वर मुखर करने वालों को विद्रोही समझा जाता है। इससे बड़ी विदू्रपता और क्या होगी कि गांधी के नाम पर लोगों को ठगने वाले दिन रात तरक्की कर रहे हैं और उन ठगों का विरोध करने वाले गांधी के दुश्मन ठहरा दिये जाते हैं।

यह लघु नाटिका इक्कसवीं सदी में प्रवेश कर चुके भारत की वास्तविक तस्वीर है जो किसी भी संवेदनशील व्यक्ति को भीतर तक झकझोर देने के लिये पर्याप्त है।

इस कुहासे के बीच आशा की एक किरण शेष है। वह है इस देश का शिक्षक। यदि शिक्षक चाहे तो इस देश को फिर से उसी ऊँचाई पर ले जा सकता है जिस ऊँचाई के लिये यह देश सदियों से विख्यात है। रामबाबू उसी शिक्षक की भूमिका में हैं।

पात्र परिचय

बुढ़िया, रामबाबू, कन्हैया, ढोंगी बाबा, अन्य पात्र।

समय

अभी सुबह के दस नहीं बजे हैं।

स्थान

बीच बाजार से गुजरने वाली सड़क।

मंच सज्जा

परदा उठता है। मंच पर पूरी तरह उजाला है।  सड़क पर कुछ लोग आ-जा रहे हैं। हर कोई अपने काम-धंधे पर जाने की शीघ्रता में है। मंच पर एक ओर पान की छोटी सी थड़ी है जिस पर बैठा कन्हैया पान लगा रहा है। थड़ी पर जल रही धूपबत्तियों से धुंआ उठ रहा है। पास रखे टेपरिकॉर्डर से गीत बज रहा है- तेरे द्वार खड़ा भगवान भगत भर दे रे झोली।

मंच पर एक तरफ एक बुढ़िया बैठी हुई है। उसके कपड़े फटे हुए हैं और हाथ में भीख मांगने का कटोरा है। कुछ लोग पान की थड़ी पर पान खाने रुकते हैं और कुछ लोग बुढ़िया पर सरसरी दृष्टि डालकर आगे बढ़ जाते हैं। बुढ़िया की आँखों पर चश्मा लगा हुआ है। वह बार-बार चश्मा ठीक करके आते-जाते लोगों को देखती है।

बुढ़िया का चश्मा

रामबाबू तेजी से कदम बढ़ाते हुए मंच पर प्रवेश करते हैं। उन्होंने सफेद पैण्ट-शर्ट पहन रखी है। शर्ट की जेब में दो पैन रखे हुए हैं तथा आँखों पर मोटा सा चश्मा लगा है। रामबाबू पान की थड़ी के पास खड़े लोगों पर उड़ती हुई दृष्टि डालते हैं और सधे हुए कदमों से चलते हुए बुढ़िया के सामने से होकर आगे निकल जाते हैं। बुढ़िया अपने हाथ का कटोरा ऊँचा करके उन्हें आवाज लगाती है। जब बुढ़िया आवाज लगाती है तो कन्हैया टेपरिकॉर्डर बंद कर देता है।

बुढ़िया  :  बाबूजी, ओ ऽ ऽ ऽ बाबूजी! बच कर कहाँ जा रहे हैं ? इस बुढ़िया को कुछ देते जाइये।

रामबाबू  : (झुंझलाकर पीछे की ओर मुड़ते हैं) ओफ्फओह! क्या मुसीबत है। जाने क्यों तू इतने सारे लोगों को छोड़कर केवल मुझी से पैसे मांगती है! यहाँ सड़क पर इतने सारे लोग आते-जाते हैं, किसी और से भी तो कुछ मांगा कर। जो लोग यहाँ पान खाने रुकते हैं, उन्हीं से कुछ मांग लिया कर। जब देखो तब (मुँह बिगाड़कर) बाबूजी, ओ ऽ ऽ ऽ बाबूजी! इस बुढ़िया को कुछ देते जाइये।

बुढ़िया : (हैरान होकर) कमाल करता है बेटा, तुझसे नहीं मांगूं तो और किससे मांगूं ?

रामबाबू : पहले तो तू सबसे पैसे मांगती थी!

बुढ़िया :  हाँ मांगती थी किंतु अब केवल तुझसे ही मांगती हूँ और आगे भी तुझसे ही मांगूंगी।

रामबाबू : (खीझकर) मुझसे ही क्यों, क्या मैं तुझे करोड़पति दिखाई देता हूँ ?

बुढ़िया : (स्नेह से) करोड़पतियों के रुपये नहीं चाहिये रे, मुझे तो केवल तेरे रुपये चाहिये।

रामबाबू : (रुष्ट होकर) केवल मेरे रुपये चाहिये! क्यों? तू मेरे ही रुपयों की दुश्मन क्यों है? क्या मेरे रुपये हराम के हैं?

बुढ़िया : तेरे रुपये हराम के क्यों होंगे बेटा, तू ही तो एक इन्सान है जो इस सड़क से होकर निकलता है।

रामबाबू : तो क्या इस सड़क पर मैं अकेला ही इंसान हूँ ? बाकी के सब लोग क्या जानवर हैं ?

बुढ़िया : (हैरान होकर)  बाकी के सब लोग ?

रामबाबू : (और भी अधिक हैरानी से) क्यों क्या हुआ ? यहाँ आदमी दिखाई नहीं दे रहे तुझे ?

बुढ़िया : होना क्या है, बात क्यों बढ़ाता है, मुझे कुछ पैसे दे और अपना रास्ता नाप।

रामबाबू : (स्वगत) बुढ़िया कुछ रहस्यमयी लगती है। (प्रकट में) मैंने क्या बात बढ़ाई तुझसे ?

बुढ़िया : (रुष्ट होकर) मैंने कहा ना, बात मत बढ़ा, रहस्यों पर पर्दा पड़ा रहने दे, मुझे कुछ पैसे दे और आगे बढ़ जा।

रामबाबू : (चारों ओर देखकर) क्या बात है, कौनसे रहस्य की बात कर रही है तू ?

बुढ़िया : कोई रहस्य नहीं है बेटा, मेरा चश्मा, (आँखों पर से चश्मा उतार कर हाथ में ले लेती है) यह सारा चक्कर इसी का चलाया हुआ है।

रामबाबू : चश्मे का चक्कर चलाया हुआ है ! क्या चक्कर चलाया हुआ है इस चश्मे ने ? देखूं तो !

बुढ़िया : इंसान का दिमाग खराब हो जाता है इस चश्मे को लगाकर, इसलिये तू न ही देखे तो अच्छा। मैं ही इस चश्मे के चक्कर में पड़कर भुगत रही हूँ ……. भूखी मर रही हूँ।

रामबाबू : तेरी अटपटी बातें मेरी समझ में नहीं आतीं। दिखा तो अपना चश्मा।

बुढ़िया : यही तो ऽ ऽ ऽ……, यही तो डर था मुझे। मांग लिया ना तूने चश्मा ! अब देखना तेरा भी दिमाग खराब हो जायेगा।

रामबाबू : जल्दी कर मुझे देर हो रही है, यदि चश्मा नहीं दिखाया तो मैं तुझे पैसे दिया बिना ही यहाँ से चला जाउंगा।

बुढ़िया : देख बेटा! मैं तुझे इस चश्मे के बारे में बताना तो नहीं चाहती थी किंतु तूने ज़िद ही पकड़ ली है तो मुझे बताना पड़ेगा। (चश्मा रामबाबू को देती है) जिसने मुझे यह चश्मा दिया था, उसने कहा था कि इस चश्मे के बारे में किसी को मत बताना किंतु तू ज़िद करता है तो ले यह, लगा कर देख।

रामबाबू : (बुढ़िया से चश्मा लेकर आँखों पर रखते हैं और फिर पूरा जोर लगाकर चीख पड़ते हैं) यह मुझे क्या दिखाई दे रहा है ?

बुढ़िया : (नाराज होकर) मैंने मना किया था न तुझे, किंतु तू मानता कहाँ है ? अब भुगत।

रामबाबू : (चश्मा उतारकर चारों तरफ देखते हैं) वो सारे जानवर कहाँ गये?

बुढ़िया : (उत्सुकता से) कौन-कौन से जानवर देखे तूने ?

रामबाबू : (उत्तेजित स्वर में) मैंने उस चौराहे पर बहुत से घड़ियाल, मगरमच्छ और गैण्डे देखे जो शोर मचाते हुए भागे चले जा रहे थे। यहाँ ठीक मेरे पास से एक बंदर बहुत तेजी से साइकिल चलाता हुआ भागा। थोड़ी दूरी पर कुछ चिम्पैंजी कार चला रहे थे। उनमें से कई चिम्पैंजियों के कानों पर मोबाइल लगा हुआ था और वे तेजी से चौराहे पर मुड़ रहे थे। उन्हें इस बात की परवाह नहीं थी कि उनकी कार के नीचे आकर कोई कुचला जा सकता है। यहाँ पान की थड़ी पर कुछ भेड़िये, लक्कड़बग्घे और लोमड़े पान खा रहे थे। हे भगवान! (सिर पकड़ लेते हैं।) यह कैसा जादू है ! (बुढ़िया के पास धरती पर बैठ जाते हैं और हाथ जोड़कर गिड़गिड़ाते हैं) सच बता तू कौन है ?

बुढ़िया : मैं तो वही रोज वाली बुढ़िया हूँ बेटा जो केवल तुझसे पैसे मांगती हूँ। (शिकायत के स्वर में) तू भी तो मुझे रोज पैसे नहीं देता, आजकल मुझे भूखे ही सोना पड़ता है।

रामबाबू : (मुलायम स्वर में) मैं तुझे खूब सारे पैसे दूंगा। मेरी जेब में जितने पैसे हैं, सारे दे दूंगा। पहले बता तू कौन है ? कोई चमत्कारी साधवी है ? योगिनी है ? महान आत्मा है या बुढ़िया के वेश में कोई देवी है ? जादूगरनी है तू ?

बुढ़िया : पड़ गया न तू फालतू के सवालों में ! इसी से कहती थी बात मत बढ़ा, पैसे दे और आगे चल।

रामबाबू : (जेब से दो रुपये निकालकर बुढ़िया को देते हैं) ऐ माई बता ना, कौन है तू और तूने मुझे यह कौन सा चमत्कार दिखाया?

बुढ़िया : मैंने नहीं रे! जो कुछ दिखाया इस चश्मे ने दिखाया।

रामबाबू : चश्मे ने! (फिर से चश्मा आँखों पर रखते हैं और उत्तेजित होकर चीख पड़ते हैं) हाँ-हाँ मुझे फिर से कुछ भालू मोटर साइकिल चलाते हुए दिखाई दे रहे हैं जिन्होंने एक लोमड़े को टक्कर मारकर सड़क पर गिरा दिया है। सड़क पर गिरे लोमड़े के सिर से खून बह रहा है। जो भेड़िये और लक्कड़बग्घे यहाँ पान की थड़ी पर लोमड़े के साथ खड़े हुए पान खा रहे थे, वे उस घायल लोमड़े की सहायता करने की बजाय उस पर हँस रहे हैं।

बुढ़िया : (तेज आवाज में) उतार दे, उतार दे, यह चश्मा अपनी आँखों से उतार दे, नहीं तो पागल हो जायेगा।

रामबाबू : (चश्मा उतारकर) कहाँ से मिला तुझे यह चश्मा ?

बुढ़िया :  (फुसफुसा कर) एक साधु बाबा ने दिया था।

रामबाबू : क्यों दिया था ?

बुढ़िया : अरे कुछ दिन पहले की बात है। मैं यहाँ बैठकर भीख मांग रही थी। मैंने एक सूट-बूट और चश्मा पहने हुए आदमी से पैसे मांगे तो उसने मुझे पैसे देने की बजाय कसकर लात मारी।

कन्हैया : (पान लगाना छोड़कर) पूरी बात बता माई। (पास खड़े आदमी को एक ओर हटाता है) ऐ ऽ ऽ ऽ………. साइड में हट।

बुढ़िया : तू बता दे ना, मुझे तो समझ में नहीं आया कि उसने क्या कहा ? अंग्रेजी में गिटर-पिटर कर रहा था।

कन्हैया : मास्टरजी ! उसने माई से कहा कि इण्डिया के हर सिटी में बैगर्स की क्यू लगी हुई है। इनके कारण देश कितना अगली दिखाई देता है। फोरेनर्स इनकी फोटो खींचते हैं, इनकी फिल्में उतारकर अपने देशों में दिखाते हैं जिससे इण्डिया डीफे़म होती है। इन्हें तो एक साथ हैंग कर देना चाहिये।

रामबाबू : (हैरानी से) आगे क्या हुआ ?

बुढ़िया : आगे क्या होना था, उसने मुझे कसकर लात मारी तो मैं गिर पड़ी और घबराकर जोर-जोर से रोने लगी।

रामबाबू : (सहानुभूति दिखाते हुए) वो आदमी था कि कसाई !

बुढ़िया : मैं तो उसे आदमी ही समझी थी किंतु वह तो गैण्डा था।

रामबाबू : (हैरान होकर) गैण्डा था ! तुझे कैसे पता चला!

बुढ़िया : जैसे ही मैं घबराकर चीखी, एक साधु महात्मा यहाँ से निकले। मुझे रोते हुए देखा तो उन्हें मुझ पर बड़ी दया आई। वे बोले चुप हो जा माई। गलती तेरी ही है। मैंने पूछा मेरी क्या गलती है ? मेरे दो हट्टे-कट्टे और खाते-पीते बेटे हैं जिन्होंने अपनी बहुओं के कहने पर मुझे घर से धक्के मारकर निकाल दिया। अब मैं भीख मांगकर गुजारा करती हूँ तो इसमें मेरी क्या गलती है ? (रुककर) मैं फिर से रोने लगी तो साधु बाबा ने मुझे यह चश्मा दिया और बोले, रो मत माई! यह चश्मा लगाकर देख, तुझे अपनी गलती समझ में आ जायेगी। मैंने यह चश्मा लगाकर देखा तो मुझे सूट-बूट पहनकर खड़े हुए आदमी के स्थान पर एक गैण्डा दिखाई दिया। साधु बाबा बोले, अब समझ में आया कि इसने तुझे लात क्यों मारी!

रामबाबू : क्या मतलब ?

कन्हैया : मतलब साफ है। वह आदमी की देह में गैण्डा था। उसकी चमड़ी बहुत मोटी थी। वह यह तो सोचता था कि भिखारियों के कारण देश बदसूरत दिखाई देता है किंतु यह नहीं सोचता था कि लोग आखिर भिखारी क्यों बनते हैं ? न यह सोचता था कि भिखारी भी इंसान हैं, उन्हें लात नहीं मारनी चाहिये।

बुढ़िया : उसी दिन मुझे मालूम हुआ कि उस आदमी की तरह बहुत से लोग दिखने में तो आदमी होते हैं किंतु वास्तव में वे आदमी नहीं होते, वे तो गैण्डे, भेड़िये, बंदर और चिम्पैंजी होते हैं। उनके भीतर दूसरों के लिये कोई संवदेना नहीं होती। इसलिये वे मुझे पैसे देने के स्थान पर गालियां देते हैं, कुछ लोग धक्का देते हैं और कुछ लोग तो लात भी मार देते हैं।

रामबाबू : (हैरानी से) अच्छा, ऐसा क्या ! (फिर से खड़े होकर चश्मा लगाते हैं) अरे ऽ ऽ ऽ …..। सच कह रही है तू (इधर-उधर देखकर) मुझे फिर से कोट पैण्ट पहने हुए बंदर, भालू चिम्पैंजी और गैण्डे दिखाई दे रहे हैं। कुछ घड़ियाल भी हैं। (अचानक चश्मा उतारकर) लेकिन इस चश्मे से यह कैसे मालूम पड़ा कि तू मुझसे ही पैसे मांगे ? (आवेश में आकरं) मुझे बेवकूफ बनाती है ?

बुढ़िया : (हँसकर) मैं जानती थी, तू यही कहेगा। अरे भोले मानुस, जब मुझे यह चश्मा मिला तो मैं इसे पहनकर भीख मांगने लगी ताकि मैं किसी जानवर से भीख न मांग बैठूं, केवल इंसान से ही भीख मांगूं और मुझे गालियां, धक्के या लात नहीं खाने पड़ें लेकिन क्या करूं (उदास होकर) मैं कई दिनों से चश्मा लगाकर देख रही हूँ किंतु पूरी सड़क पर एक तू ही मुझे इंसान के रूप में दिखाई देता है। तेरे अतिरिक्त और कोई इंसान इस सड़क से होकर नहीं गुजरता।

रामबाबू : (हैरानी से)  यह क्या कह रही है तू ? मैं तो एक साधारण स्कूल मास्टर हूँ। दिन में स्कूल के बच्चों को पढ़ाता हूँ और रात में पेटभर खाकर सो जाता हूँ। मैंने तो आज तक कोई पुण्य का काम भी नहीं किया। इस सड़क से होकर नित्य ही बहुत से ज्ञानी-ध्यानी, धनी-मानी, त्यागी और तपस्वी लोग निकलते होंगे। वे समाज के जाने-माने लोग हैं, लाखों रुपये का दान पुण्य करते हैं। नेत्रहीनों, विधवाओं और विकलांगों की संस्थाओं को चंदा देते हैं। मैं उनका मुकाबला थोड़े ही कर सकता हूँ।

बुढ़िया : पहले मैं भी तेरी तरह सोचती थी। (सड़क की ओर संकेत करके) लोगों की चमचमाती गाड़ियां, इस्तरी करे हुए सूट, माथे पर लगे हुए तिलक और कंधों पर पड़े हुए दुशाले देखकर मेरे मन में उनके त्यागी-तपस्वी और धर्मात्मा होने के बारे में विश्वास जगता था और मैं उनसे भीख मांगती थी। उनमें से बहुत से लोग मुझे भीख भी देते थे किंतु अब मैं उन लोगों को इस चश्मे से देखती हूँ तो मुझे इंसान की जगह तरह-तरह के जानवर दिखाई देते हैं।

रामबाबू : (आवेश में आकर जोर से चिल्लाते हैं) लेकिन इस देश में इतने सारे जानवर कहाँ से आये ? यह देश तो ऋषियों-मुनियों का देश है। इस धरती पर वेद प्रकट हुए, इसी धरती पर भगवान श्रीकृष्ण ने गीता के उपदेश दिये। इस धरती पर गौतम बुद्ध ने विहार किया और इसी धरती पर भगवान महावीर ने तपस्या करके इन्द्रियों को जीतने का मार्ग सुझाया। इस देश को नानक और कबीर ने सच्चाई का मार्ग दिखाया। सूर, तुलसी, रहीम और रसखान के पद आज भी इस देश की हवाओं में घुले हुए हैं। गंगा और यमुना आज भी इस देश में बहती हैं। फिर इस देश में आदमियों के स्थान पर इतने सारे जानवर कहाँ से आये? (सुबकने लगते हैं।)

कन्हैया : गांधीजी को तो भूल गये मास्टरजी !

रामबाबू : हाँ, मैं गांधी को भूल गया। मैं क्या पूरा देश गांधी को भूल गया। और भी अच्छा होता कि यह देश गांधी को आज से साठ साल पहले भूल गया होता। कम से कम इस देश के सफेद पोश लुटेरे, गांधी का नाम ले-लेकर इस देश को लूट तो न पाते।

कन्हैया : वो कैसे मास्टरजी ?

रामबाबू : तुमने एक कहावत सुनी होगी, मुँह में राम, बगल में छुरी। मैं कहता हूँ अब उस कहावत को ऐसे कर देना चाहिये, मुंह में गांधी, बगल में छुरी। आज हर सरकारी कार्यालय में गांधी का चित्र लगा हुआ है और लोग उसके नीचे बैठकर घूस खा रहे हैं, काम चोरी कर रहे हैं, लोगों के साथ बुरा व्यवहार कर रहे हैं और उनका हिस्सा मार रहे हैं।

बुढ़िया : दुखी मत हो मेरे लाल।

रामबाबू  : (कमीज की आस्तीन से आँखें पौंछते हैं) पहले तो तू मुझे दुखी करती है और फिर…….।

          बात अधूरी रह जाती है। कन्हैया पान की थड़ी पर रखे टेपरिकॉर्डर को ऑन कर देता है। तेज आवाज में गीत बजने लगता है- दे दी हमें आजादी बिना खड्ग बिना ढाल, साबरमती के संत तूने कर दिया कमाल।

रामबाबू : (जोर से चीखकर) गलत बात है यह ! (कन्हैया टेपरिकॉर्डर बंद कर देता है) बिना खड्ग और बिना ढाल के कभी आजादी नहीं मिलती। यदि खड्ग और ढाल इतनी बुरी चीजें हैं तो इस देश में झांसी की रानी लक्ष्मी बाई, चंद्र शेखर आजाद, सुभाषचंद्र बोस और भगतसिंह के गीत गाने का क्या मतलब है ? बच्चों की किताबों में महाराणा प्रताप के होने का क्या मतलब है ? उन्नीस सौ बांसठ, पैंसठ और इकहत्तर की लड़ाइयाँ जीतने का क्या मतलब है ?

कन्हैया : (हँसकर) आज तो गांधी बाबा के खिलाफ बोल रहे हो मास्टरजी।

रामबाबू : (आवेश में) गांधी के खिलाफ नहीं बोल रहा मैं। मैं तो उन लोगों के खिलाफ बोल रहा हूँ जिन्होंने गांधी के नाम को भुनाने के लिये इस देश में कितनी तरह के भ्रम फैला दिये। क्या गांधी ने करो या मरो का नारा नहीं दिया ? क्या गांधी ने अंग्रजों भारत छोड़ो का नारा नहीं दिया ? क्या गांधी ने अंग्रेजों को उनके अपने देश में जाकर, भारत खाली करने के लिये नहीं ललकारा। और तुम कह रहे हो कि मैं गांधी के खिलाफ बोल रहा हूँ !

कन्हैया फिर से टेपरिकॉर्डर चलाता है। तेज आवाज में गीत बजता है- सारे जहां से अच्छा, हिन्दुस्तां हमारा, हम बुलबुलें हैं इसकी……।

रामबाबू : (कन्हैया की ओर देखकर चिल्लाते हैं) अबे बंद कर इस गाने को।

कन्हैया : (टेपरिकॉर्डर बंद करके) ये लो बाबूजी। बंद कर दिया, चिल्लाते क्यों  हो ?

रामबाबू : (गुस्से में कांपते हुए) सारे जहां से अच्छा है यह देश ? सारे जहां से ? अरे इस देश के नगर-नगर में नकली घी बनाने के कारखाने हैं। कहीं पशुओं की चर्बी निकालकर घी में मिलाई जा रही है तो कहीं आदमियों की हड्डियों में से चर्बी निकाली जा रही है। अस्पतालों में लोगों को आदमी के स्थान पर जानवरों का खून चढ़ाया जा रहा है। कचरे के ढेरों में कन्याओं के भू्रण पड़े हैं। लोगों की किडनियां चुराई जा रही हैं। निठारी के नाले मासूम बच्चों के शवों से भरे पड़े हैं और सारा देश गीत गाते नहीं थकता (व्यंग्य से) सारे जहां से अच्छा, हिन्दुस्तां हमारा, हम बुलबुलें हैं इसकी………..। अरे हम वो बुलबुलें हैं जो इस देश का दाना तो खाती हैं किंतु इस देश को अपनी बीटों से गंदा भी करती हैं।

बुढ़िया : इस चश्मे में यही बुराई है। जो भी इसे लगाता है, पागल हो जाता है।

रामबाबू : (दर्शकों की ओर देखकर चिल्लाते हैं) ये बुढ़िया कहती है कि मैं पागल हो गया हूँ ? अरे ऽ ऽ ऽ ! मैं कहता हूँ कि इस देश के हालात को देखकर जो लोग पागल नहीं होते, वे पागल हो गये हैं। जिस देश के लोगों ने अपने ही देश के पच्चीस लाख करोड़ रुपये चुराकर स्विस बैंकों में छिपा दिये हों, जिस देश में एक लाख सत्तर हजार करोड़ रुपये की नकली मुद्रा चलती हो, जिस देश में खेलों के आयोजन पर चालीस लाख करोड़ रुपये का घोटाला होता हो, जिस देश में एक कर्णधार पौने दो लाख करोड़ रुपये डकारने के जुर्म में जेल में बंद हो, जिस देश के एक प्रदेश का मुखिया चार हजार करोड़ रुपये ठोकने के जुर्म में जेल में पड़ा हो, उस देश में भी यदि लोग पागल नहीं होते तो……….पागल नहीं होते तो……….। (बोलते-बोलते हांफ जाते हैं आगे कुछ सूझता नहीं है।)

कन्हैया : अच्छा मास्टरजी! आप पागल मत बनो। अरे जिन्होंने चोरी की है, वे जेल में पड़े हैं ना ! कौनसा सुख भोग रहे हैं! आप तो ये दूसरा गीत सुनो !

कन्हैया फिर से टेपरिकॉर्डर चला देता है। टेप से गीत बजता है- जो जिससे मिला सीखा हमने। गैरों को भी अपनाया हमने। मतलब के लिये अंधे होकर रोटी को नहीं पूजा हमने। दो लाइन बजाकर टेपरिकॉर्डर बंद कर देता है।

रामबाबू : (व्यंग्य से) बहुत ठीक सुना रहे हो! जो जिससे मिला सीखा हमने! इस देश के लोगों ने दूसरों से इतना सीखा कि देश के लोगों की भाषा बदल गई। इतना सीखा कि देश के लोगों की वेषभूषा बदल गई। खानपान बदल गया, चिंतन बदल गया, जीवन शैली बदल गई। हमने दूसरों से इतना सीखा कि इस देश की औरतें माताजी और बहिनजी से मैडम हो गईं तथा आदमी काका और भाईसाहब से सर हो गये।

कन्हैया : (खीझकर) तो फिर कौनसा गीत सुनाऊं आपको ! लो ये वाला सुनो।

कन्हैया फिर से टेपरिकॉर्डर चलाता है- ये देश है वीर जवानों का, अलबेलों का मस्तानों का, इस देश का यारों क्या कहना, ये देश है दुनिया का गहना।

रामबाबू : (और भी ज्यादा भड़क जाते हैं) सचमुच ये देश वीर जवानों का है। तभी तो इस देश में रात को कोई अकेली लड़की घर से नहीं निकल सकती। सफेद पोश लोग लड़कियों को तंदूर में झौंक देते हैं। चलती हुई रेलगाड़ियों और सड़क पर दौड़ती हुई कारों में बलात्कार होते हैं। अरे दूर क्यों जाते हो, इस देश में प्रशासकों के अपहरण होते हैं और आंदोलनकारी जनता, पुलिस वालों के हाथ पैर काटकर सड़कों पर डाल देती है।

कन्हैया : ओफ्फोह! ये भी नहीं ! तो फिर ये सुनो, ये गाना आपको जरूर पसंद आयेगा।

कन्हैया फिर से टेप रिकॉर्डर चालू करता है। गीत बजता है- जहाँ सत्य अहिंसा और धर्म का पग-पग लगता डेरा, वो भारत देश है मेरा। रामबाबू कन्हैया को घूर कर देखते हैं, कन्हैया सहम कर टेपरिकॉर्डर बंद कर देता है।

रामबाबू : बजाओ-बजाओ, बंद क्यों कर दिया। शायद पग-पग पर धर्म, अहिंसा और धर्म के डेरे देखने वालों को दिखाई नहीं देता कि इस देश के कितने पबों में बैठी लड़कियां शराब पी रही हैं। स्कूल-कॉलेजों में पढ़ने वाले लड़के-लड़कियां एक दूसरे की कमर में हाथ डालकर मॉल और रेलवे स्टेशनों पर घूम रहे हैं। देश में किशोरियों के गर्भपातों की संख्या नित नये रिकॉर्ड बना रही है।

कन्हैया रामबाबू की बात अनसुनी करके फिर से टेपरिकॉर्डर चालू कर देता है। गीत बजता है- मेरा रंग दे बसंती चोला, माँ ए ऽ रंग दे बसंती चोला।

रामबाबू : बंद कर, बंद कर। भगवान के लिये अब तू कोई और गीत न बजा। इन गीतों को सुनकर मेरा मन अशांत होता है।

लम्बी दाढ़ी और सफेद धोती-कुर्ते वाला ढोंगी बाबा प्रवेश करता है। गले में मोटे-मोटे रुद्राक्षों की मालायें लटक रही हैं।

ढोंगी बाबा : क्यों अशांत हो पुत्र! यदि शांति चाहते हो तो मेरे आश्रम में आओ। एक हजार एकड़ में फैले मेरे दिव्य आश्रम की बहिनें तुम्हें सहज शांति की प्राप्ति के लिये मार्ग बतायेंगी। तुम्हंे प्रेम और शांति की बांसुरी सुनायेंगी।

रामबाबू : (चौंककर) अरे बाबा, आप कब आये ?

ढोंगी बाबा : जहाँ मेरी आवश्यकता होती है, वहाँ मैं कभी भी पहुँच जाता हूँ पुत्र। बताओ तुम्हारा चित्त क्यों अशांत है ?

रामबाबू : मेरा चित्त इस कन्हैया ने अशांत कर दिया है। नहीं-नहीं कन्हैया ने नहीं, इस माई ने अशांत कर दिया है ? (बाबा के पैरों में गिरकर) मुझे शांति दो बाबा।

ढोंगी बाबा : (हँसकर) इस फरेबी बुढ़िया के फेर में मत पड़ो पुत्र। तुम कुछ दिन मेरे आश्रम में ज्ञान और अध्यात्म की प्राप्ति करो। बड़े-बड़े सरकारी अफसर, नेता, बिजनिस टाइकून, मंत्री और मीडिया के लोग मेरे आश्रम में आते हैं। उन्हें बहुत लाभ हुआ है।

रामबाबू क्षण भर के लिये कुछ सोचते हैं और फिर अपनी आँखों पर चश्मा रखकर ढोंगी बाबा की ओर देखते हैं।

रामबाबू : (चीखकर) अरे हरामखोर तू ! तू तो वही है न जिसके आश्रम में वेश्यावृत्ति का अड्डा चलता है। धर्म के नाम पर भोली-भाली लड़कियों को फंसाकर तू उन्हें समाज के शक्तिशाली सफेदपोशों को सप्लाई करता है। यही है तेरा शांति का मार्ग? नीच ! ढोंगी ! पाखण्डी !

          ढोंगी बाबा अपनी नकली दाढ़ी मूंछ निकाल कर फैंक देता है।

ढोंगी बाबा : (हैरान होकर) कमाल है। आज तक मुझे किसी ने नहीं पहचाना। तू पहला व्यक्ति है जिसने बिना कोई समय गंवाये मेरा सारा धंधा उजागर कर दिया।

रामबाबू : (क्रोध से) हरामखोर पाखण्डी ! तेरे जैसे लोगों के कारण इस देश में साधु महात्मा बदनाम हो गये, लोगों का धर्माचरण से विश्वास उठ गया। भाग जा यहाँ से वरना……..।

ढोंगी बाबा : वरना क्या ?

रामबाबू : यदि तू नहीं गया तो मैं तुझे जान से मार डालूंगा।

ढोंगी बाबा : (हैरान होकर) इतना समझदार होकर भी गैर कानूनी काम करेगा !

रामबाबू : (दुखी होकर) यही तो, यही तो दुख है। इस देश की कानूनी व्यवस्था का लाभ तुझ जैसे अपराधी उठा रहे हैं।

ढोंगी बाबा : (हँसकर) देश की कानूनी व्यवस्था पर अंगुली उठाना अपराध है बच्चा। अदालत की मानहानि के जुर्म में पकड़ लिये जाओगे।

रामबाबू : मानहानि ! कैसी मानहानि ! यदि तुम लोग पाप से कमाये हुए पैसे के बल पर महंगे से महंगे वकीलों की फौज खड़ी करके कोर्ट में तथ्यों को बदल डालते हो, गवाहों को खरीद लेते हो, मुकदमों का फैसला होने नहीं देते, तारीखें पर तारीखें डलवाते हो तो इसमें अदालतें क्या करें ! यदि तुम लोग जांच ऐजेंसियों का मुँह बंद करके सच को सामने आने ही नहीं देते तो इसमें अदालतें क्या करें ! (हांफने लगते हैं।)

ढोंगी बाबा : क्या हुआ बच्चा ! रुक क्यों गया ?

रामबाबू : यदि देश के उच्च न्यायालयों में जजों के आठ सौ बारह में से दो सौ अस्सी पद खाली पड़े हैं और पाँच सौ बत्तीस जजों के सामने बयालीस लाख मुकदमों का ढेर पड़े हैं तो इसमें अदालतें क्या करें ! मैंने यदि देश की कानून व्यवस्था पर प्रश्न उठाया तो मैंने किसी अदालत की मानहानि नहीं की। तू मुझे फंसाने की कोशिश क्यों कर रहा है ?

ढोंगी बाबा : (व्यंग्य से) तो क्या देश की इस कानून व्यवस्था में मेरा कोई दोष है ?

रामबाबू : नहीं दोष किसी एक या कुछ लोगों का नहीं, दोष तो पूरे देश का है। इस देश की प्राथमिकताएं बदल गई हैं। न्याय पाना अब इस देश के लोगों की प्राथमिकताओं में नहीं रहा।

ढोंगी बाबा : तुझे तो इस देश में हर जगह बुराई दिखाई देती है, इतने सारे लोग बुरे नहीं सकते। अवश्य ही तू स्वयं बुरा है। कबीरदासजी ने कहा है- बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय। जो मन खोजा आपना, मुझसा बुरा न कोय। तू बुरा है, इसीलिये तू इतना दुखी भी है। लोगों की ओर देख, लोग कितने सुखी हैं !

रामबाबू : हाँ-हाँ मैं बुरा हूँ और इसीलिये दुखी भी हूँ किंतु तू भी सुन ले, कबीरदासजी ने यह भी कहा है, सुखिया सब संसार है, खावै और सोवै, दुखिया दास कबीर है, जागै और रोवै। कबीर भी दुखी थे, इसलिये तेरे हिसाब से वे भी अवश्य ही बुरे थे !

ढोंगी बाबा : मैं तुझसे बहस नहीं करता, तू तो स्कूल मास्टर है। मास्टर लोग बहस बहुत करते हैं।

रामबाबू : (दर्शकों की तरफ देखकर) ठीक कह रहा है ये। क्योंकि ये जानता है कि जिस दिन इस देश का स्कूल-मास्टर, बहस करनी बंद कर देगा, उस दिन इसके जैसे धूर्त लोग अपने उद्देश्यों में पूरी तरह सफल हो जायेंगे और इस देश को जल्दी ही लूट खसोट कर पूरी तरह बर्बाद कर देंगे। ले माई ! अपना चश्मा ले, कितनी देर हो गई। ये दो रुपये और ले। (जेब से निकाल कर दो रुपये और देते हैं।) माई तूने मुझे यह चश्मा दिखाकर अच्छा नहीं किया। दिल का दर्द दिल में ही छुपा रहता तो अच्छा था।

मंच पर प्रकाश कम होने लगता है। कन्हैया फिर से टेप रिकॉर्डर चालू कर देता है। गीत बजता है- पिंजरे के पंछी रे ऽ ऽ ऽ। तेरा दरद न जाने कोय। बाहर से तो खामोश रहे तू, भीतर-भीतर रोय। तेरा दरद न जाने कोय।

परदा गिरता है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता, 63, सरदार क्लब योजना, वायुसेना क्षेत्र, जोधपुर

चन्द्रमा

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चन्द्रमा ने देवगुरु बृहस्पति की पत्नी का हरण कर लिया!

भगवान श्रीहरि विष्णु के नाभि-सरोवर के कमल से प्रजापति ब्रह्मा की उत्पत्ति हुई। विष्णु पुराण तथा हरिवंश पुराण सहित अनेक ग्रंथों में आई एक कथा के अनुसार ब्रह्मा के पुत्र हुए अत्रि और अत्रि के पुत्र हुए चंद्रमा। उन्हीं अत्रि के नेत्रों से अमृतमय चन्द्रमा का जन्म हुआ।

प्रजापति ब्रह्मा ने चन्द्रमा को ब्राह्मण, औषधि और नक्षत्रों का अधिपति बना दिया। एक बार चंद्रमा ने राजसूय यज्ञ का आयोजन किया। इस यज्ञ के पूर्ण हो जाने से चन्द्रमा की कीर्ति चारों दिशाओं में फैल गई। इसस चंद्रमा पर राजमद छा गया।

राजमद से युक्त चन्द्रमा ने देवगुरु बृहस्पति की पत्नी तारा का हरण कर लिया। देवगुरु ने चंद्रमा से, अपनी पत्नी को लौटा देने के लिये बार-बार याचना की परन्तु चंद्रमा ने देवगुरु की बात नहीं मानी। दानवों के गुरु शुक्राचार्य ने चन्द्रमा का पक्ष लिया। इस कारण जम्भ तथा कुंभ नामक अनेक दैत्य भी चंद्रमा के पक्ष में आ गए।

देवगुरु बृहस्पति को अकेला देखकर भवगान शिव एवं समस्त देवता देवगुरु बृहस्पति के पक्ष में आ गए। विष्णु पुराण के अनुसार देवगुरु बृहस्पति अंगिरा के पुत्र हैं तथा भगवान शिव ने अंगिरा से शिक्षा प्राप्त की थी। इसलिए भगवान शिव ने बृहस्पति का पक्ष लिया। भगवान शिव ने आजगव नामक धनुष लेकर ब्रह्मशिर नामक श्रेष्ठ शर दैत्यों को लक्ष्य करके छोड़ दिया। इससे दैत्यों का समस्त यश समाप्त हो गया।

इस प्रकार देव एवं दानव एक बार पुनः एक दूसरे के समक्ष आ खड़े हुए और देखते ही देखते घनघोर संग्राम छिड़ गया। चूंकि यह युद्ध देवगुरु बृहस्पति तारा को लेकर हुआ, इसलिए इस युद्ध को तारकामय संग्राम कहा गया।

इस रोचक कथा का वीडियो देखें-

इस संग्राम के कारण समस्त संसार क्षुब्ध होने लगा। इस पर तुषितगण आदि देव, प्रजापति ब्रह्मा की शरण में पहुंचे। ब्रह्माजी ने शुक्राचार्य एवं शिवजी को समझा कर देवताओं एवं दानवों को युद्ध से निवृत्त कर दिया तथा देवगुरु बृहस्पति को उनकी पत्नी तारा पुनः दिलवा दी। जब तारा बृहस्पति के पास आई तो उन्होंने देखा कि तारा गर्भवती है।

बृहस्पति ने तारा से पूछा- ‘यह बालक किसका है?’

जब तारा ने बृहस्पति के प्रश्न का उत्तर नहीं दिया तो बृहस्पति ने कहा- ‘डर मत, तू स्त्री है, इसलिए मैं तुझे दण्डित नहीं करूंगा। देवी होने के कारण तू निर्दाेष भी है। अतः बता कि यह पुत्र किसका है।’

अपने पति की बात सुनकर तारा अत्यन्त लज्जित हुई किंतु उसने कोई उत्तर नहीं दिया। इस पर देवगुरु बृहस्पति ने कहा- ‘मेरे क्षेत्र में किसी दूसरे का पुत्र धारण करना उचित नहीं है। इसे दूर कर, अधिक धृष्टता करना उचित नहीं है।’

बृहस्पति के ऐसा कहने पर पतिव्रता तारा ने वह गर्भ ‘इषीकास्तम्ब’ अर्थात् सींक की झाड़ी में रख दिया। कुछ समय के पश्चात् उस तेजस्वी गर्भ से एक अत्यंत तेजस्वी बालक उत्पन्न हुआ जिसने अपने तेज से समस्त देवताओं का तेज भी मलिन कर दिया।

बालक की सुंदरता को देखकर बृहस्पति और चंद्रमा दोनों ही उस बालक को लेने के लिए उत्सुक हुए। इस पर देवताओं ने तारा से पूछा- ‘यह बालक किसका है?’

देवताओं के बार-बार पूछे जाने पर भी लज्जावती तारा ने लज्जावश कुछ भी उत्तर नहीं दिया। वह बालक भी यह सारा वार्तालाप सुन रहा था तथा अपनी माँ के आचरण को देखकर क्रोधित हो रहा था।

उस बालक ने अत्यंत क्रुद्ध होकर कहा- ‘अरी दुष्टा माँ! तू मेरे पिता का नाम क्यों नहीं बताती! तुझ व्यर्थ लज्जावती की मैं ऐसी दुर्गति करूंगा जिससे तू बोलना ही भू जाएगी!’

देवताओं के बीच मचे इस कलह को देखकर पितामह ब्रह्मा ने तारा को अपने पास बुलाया और उससे पूछा- ‘पुत्री! ठीक-ठीक बता यह पुत्र किसका है, बृहस्पति का या चंद्रमा का?’

इस पर तारा ने अत्यंत लज्जित होकर उत्तर दिया- ‘चंद्रमा का।’

इस पर नक्षत्रपति भगवान चंद्रमा ने उस बालक को हृदय से लगाकर कहा- ‘बहुत ठीक बेटा, बहुत ठीक। तुम बड़े बुद्धिमान हो, इसलिए मैं तुम्हारा नाम बुध रखता हूँ।’

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विष्णु पुराण के साथ-साथ यह कथा अन्य पुराणों में भी थोड़े-बहुत अंतर के साथ मिलती है। वस्तुतः इस कथा में आए पात्रों के नामों से ही यह अनुमान हो जाता है कि यह किसी खगोलीय घटना का मानवीकरण करके रूपक खड़ा किया गया है। बृहस्पति, चंद्रमा, तारा एवं बुध आदि नामों से आज भी खगोलीय पिण्ड स्थित हैं। इस कथा को पढ़ने से आभास होता है कि बृहस्पति एवं चंद्रमा नामक दो नक्षत्रों का गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र अथवा चुम्बकीय प्रभाव किसी तारे पर था। इस गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र अथवा चुम्बकीय प्रभाव के कारण उस तारे से कुछ पदार्थ अलग हुआ जिससे एक अन्य खगोलीय पिण्ड की उत्पत्ति हुई और उसे बुध नाम दिया गया।

चूंकि जिस तारे से बुध उत्पन्न हुआ, उस तारे पर बृहस्पति एवं चंद्रमा दोनों का ही प्रभाव था, इसलिए यह संदेह उत्पन्न हुआ कि बुध का जन्म किस खगोलीय पिण्ड के प्रभाव के कारण हुआ है। इसलिए बृहस्पति एवं चंद्रमा के बीच विवाद की एवं उसके कारण हुए देवासुर संग्राम की कल्पना की गई। अंत में सृष्टि बनाने वाले ब्रह्माजी ने ही देवताओं को बताया कि इस नए नक्षत्र का जन्म चंद्रमा के प्रभाव से हुआ है।

यहाँ हम पाठकों से कहना चाहेंगे कि वे चन्द्रमा के नाम से यह न समझें कि इस समय जो चंद्रमा धरती का उपग्रह है, उस काल में यह चंद्रमा इसी स्थिति में रहा होगा। पर्याप्त संभव है कि चंद्रमा की स्थिति आज की स्थिति से भिन्न रही हो तथा कालांतर में नक्षत्रों की स्थितियों में आए परिवर्तनों के कारण चंद्रमा किसी और स्थान से खिसक कर वर्तमान स्थिति में पहुंचा हो!

पुराणों के अनुसार इसी बुध के द्वारा इला के गर्भ से पुरूरवा का जन्म हुआ। हम जानते हैं कि इला धरती को कहते हैं। अतः बुध द्वारा इला के गर्भ से पुरूरवा को उत्पन्न करने का आख्यान पुनः एक खगोलीय घटना की ओर संकेत करता है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

राजा इल

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राजा इल ने इला बनकर बुध मुनि से विवाह किया!

वाल्मीकि रामायण के उत्तरकाण्ड में राजा इल की अद्भुत एवं विस्मयकारी कथा मिलती है। इस कथा का उल्लेख अन्य पुराणों में भी किया गया है। इस कथा के अनुसार प्रजापति कर्दम के पुत्र इल बाल्हिक देश के राजा थे। वे बड़े धर्मात्मा नरेश थे तथा अपनी प्रजा का पालन पुत्र की भांति करते थे। देव, दानव, नाग, राक्षस, गंधर्व और महामनस्वी यक्ष राजा इल की स्तुति किया करते थे।

एक बार राजा इल अपनी सेना को लेकर एक सुंदर वन में शिकार खेलने के लिए गए। राजा ने उस वन में दस हजार हिंसक जंतुओं का वध किया। तत्पश्चात् वे उस प्रदेश में गए जहाँ महासेन स्वामि कार्तिकेय का जन्म हुआ था। उस वन में भगवान् शिव अपने सेवकों के सथ रहकर गिरिराजकुमारी उमा का मनोरंजन करते थे।

जिस समय राजा इल उस वन में पहुंचा, उस समय भगवान शिव स्त्री रूप धरकर उमा के साथ विचरण कर रहे थे। उन्होंने उमा का मनोरंजन करने के लिए उस वन में समस्त पुरुष वाचक संज्ञाओं को स्त्री-वाचक संज्ञाओं में बदल दिया था। इसलिए राजा इल एवं उनकी सेना के समस्त सिपाही भी अपने आप स्त्री बन गए।

जिस समय राजा इल उस वन में पहुंचा, उस समय भगवान शिव स्त्री रूप धरकर उमा के साथ विचरण कर रहे थे। उन्होंने उमा का मनोरंजन करने के लिए उस वन में समस्त पुरुष वाचक संज्ञाओं को स्त्री-वाचक संज्ञाओं में बदल दिया था। इसलिए राजा इल एवं उनकी सेना के समस्त सिपाही भी अपने आप स्त्री बन गए।

पूरे आलेख के लिए देखें, यह वी-ब्लाॅग-

राजा इल तथा उनके सैनिकों ने देखा कि वन में विचरण कर रहे समस्त पशु, पक्षी, सर्प एवं मनुष्य स्त्री रूप में परिवर्तित हो गए हैं। उन्होंने स्वयं को तथा अपने सैनिकों को स्त्री रूप में देखकर अत्यंत दुख का अनुभव किया। वनवासी लोगों ने राजा को बताया कि ऐसा भगवान महेश्वर की इच्छा से हुआ है। यह जानकर राजा इल भगवान महेश्वर को ढूंढते हुए उनकी शरण में पहुंचे।

राजा ने एक स्थान पर महेश्वर को पार्वती के साथ विराजमान देखा। उन्होंने राजा को देखते ही हंसकर कहा कि हे राजन् पुरुषत्व के अतिरिक्त और जो चाहे मांग लो। भगवान की यह बात सुनकर राजा बड़ा दुखी हुआ किंतु उसने भगवान शिव से कुछ नहीं मांगा और वे माता पार्वती की शरण में गए।

राजा ने कहा कि माता आपके दर्शन कभी निष्फल नहीं होते! आप समस्त लोकों को वर देने वाली हैं। अतः आप अपनी सौम्य दृष्टि से मुझ पर अनुग्रह कीजिए!

माता पार्वती ने महान् शोक से ग्रस्त राजा इल को करुणा भरी दृष्टि से देखकर कहा कि हे राजन् आप पुरुषत्व-प्राप्ति का जो वर चाहते हैं, उसके आधे भाग के दाता तो महादेव हैं और आधा वर मैं दे सकती हूँ। अतः आप अपने जीवन के शेष बचे हुए भाग में से आधा भाग स्त्री के रूप में तथा आधा भाग पुरुष के रूप में प्राप्त कर सकते हैं। आप सोचकर बताएं कि आप आधा जीवन पुरुष के रूप में किस प्रकार प्राप्त करना चाहेंगे!

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इस पर राजा ने कहा कि माता मुझे एक माह के लिए अत्यंत वीरव्रती पुरुष के रूप में और एक माह के लिए अत्यंत रूपवती स्त्री के रूप में जीवन प्रदान करें। माता पार्वती ने राजा को उसकी इच्छा पूरी होने का वरदान दे दिया किंतु साथ ही यह भी कहा कि जब आप पुरुष रूप में हांेगे तो आपको अपने स्त्री-जीवन की कोई बात स्मरण नहीं रहेगी। इसी प्रकार जब आप स्त्री रूप में रहेंगे तो आपको अपने पुरुष-जीवन की कोई बात स्मरण नहीं रहेगी। इस वर को पाकर राजा बड़ा प्रसन्न हुआ तथा भगवान शिव एवं पार्वती को प्रणाम करके वहाँ से चल दिया। राजा को अब एक मास तक स्त्री रूप में ही रहना था, इसलिए उसने वह अवधि वन में ही व्यतीत करने का निश्चय किया तथा वह अपने स्त्री रूपी सैनिकों के साथ वन में विहार करने लगी। उसने अपना नाम इला रख लिया।

एक दिन जब इला पर्वतामालाओं के मध्य में स्थित एक वन में विहार कर रही थी, तब उसने एक सुंदर सरोवर देखा। उस सरोवर में चंद्रमा का पुत्र राजा बुध मुनि रूप में तपस्या कर रहा था। तपस्या के कारण बुध की देह अत्यंत कांतिमय होकर प्रकाशित हो रही थी। इस कारण इला मुनि बुध की तरफ सम्मोहित हुई और उनके निकट चली गई।

चूंकि यह सरोवर उस वन की सीमा से बाहर था जिस वन में भगवान शिव ने समस्त पुरुष वाचक संज्ञाओं को स्त्री-वाचक बना दिया था, इसलिए राजा बुध स्त्री बनने से बच गया था। वह तपस्या में इतना लीन था कि उसे कुछ ज्ञात ही नहीं था कि उसके आसपास क्या हो रहा है।

इला ने अपनी सखियों सहित उस सरोवर में उतरकर उस सरोवर का जल क्षुब्ध कर दिया। इससे इला का ध्यान भंग हुआ और उसने अत्यंत रूपवती स्त्री इला को देखा। इला को देखते ही राजा को तन-मन की सुधि नहीं रही और वह इला में आसक्त हो गया। वह सोचने लगा कि अप्सराओं से भी सुंदर यह स्त्री कौन है! न देववनिताओं में, न नागवधुओं में, न असुरनारियों में और न अप्सराओं में ही मैंने इससे पहले कभी कोई ऐसे मनोहर रूप से सुशोभित होने वाली स्त्री देखी है। यदि यह किसी और को न ब्याही गई हेा तो यह मेरी पत्नी बनने योग्य है।

ऐसा विचार करके राजा बुध जल से बाहर आ गया और सरोवर के तट पर बने आश्रम में चला गया। उसने उन समस्त स्त्रियों को अपने आश्रम में बुलाकर पूछा कि यह त्रिलोकसुंदरी नारी किसकी पत्नी है और किसलिए यहाँ आई है?

इस पर इला की सखियों ने उत्तर दिया कि यह सुंदरी हमारी सदा की स्वामिनी है। इसका कोई पति नहीं है। यह हम लोगों के साथ अपनी इच्छा से वनप्रांतर में विचरण करती है।

उन स्त्रियों का उत्तर सुनकर राजा बुध ने पुण्यमयी आवर्तनी विद्या का स्मरण किया तथा उसने इला के सम्बन्ध में समस्त बातें जान लीं। बुध ने उन सभी स्त्रियों से कहा कि तुम सब किंपुरुष अर्थात् किन्नरी होकर पर्वत  के किनारे पर निवास करो और अपने लिए वहीं निवास बना लो।

तुम्हें पत्र और फल-फूल से ही अपना निर्वाह करना होगा। कुछ समय बाद तुम सब किंपुरुष नामक पतियों को प्राप्त कर लोगी। बुध की बात सुनकर समस्त इला की समस्त सखियां उस पर्वत के किनारे पर चली गईं। इस प्रकार संसार में किन्नर जाति अस्तित्व में आई। अगली कथा में देखिए- ऋषियों ने राजा इल को भगवान शिव से पुरुषत्व दिलवाया!

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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