Monday, September 20, 2021

अध्याय – 8 (अ) : खिलजी वंश का चरमोत्कर्ष एवं अलाउद्दीन खिलजी

अलाउद्दीन खिलजी का प्रारम्भिक जीवन

अलाउद्दीन खिलजी का पिता शिहाबुद्दीन मसउद खिलजी, सुल्तान जलालुद्दीन फीरोजशाह खिलजी का भाई था। शिहाबुद्दीन के चार पुत्र थे जिनमें से अलाउद्दीन सबसे बड़ा था। अलाउद्दीन का जन्म 1266-67 ई. में हुआ था। जलालुद्दीन के तख्त पर बैठने से काफी पहले ही शिहाबुद्दीन की मृत्यु हो चुकी थी। इसलिये अलाउद्दीन का पालन पोषण जलालुद्दीन ने ही किया। अलाउद्दीन को नियमित रूप से लिखने-पढ़ने की सुविधा प्राप्त नहीं हो सकी। उसके वयस्क होने पर जलालुद्दीन ने अपनी पुत्री का विवाह अपने भतीजे अलाउद्दीन से कर दिया। इस प्रकार अलाउद्दीन खिलजी, जलालुद्दीन खिलजी का भतीजा तथा दामाद था। उसने घुड़सवारी, खेलकूद तथा युद्ध विद्या सीख ली। पढ़ाई-लिखाई में रुचि नहीं होने से वह नितांत निरक्षर बना रहा। जब जलालुद्दीन खिलजी सुल्तान बना तो उसने अपने भतीजे अलाउद्दीन को अमीर-ए-तुजुक का पद दिया।

अलाउद्दीन का वैवाहिक जीवन

अलाउद्दीन का वैवाहिक जीवन बहुत नीरस था। उसकी सास मलिका जहान तथा पत्नी, दोनों मिलकर उलाउद्दीन को बात-बात पर ताने देती थीं। इसलिये उसने महरू नामक एक प्रेमिका तलाश कर ली। अलाउद्दीन की पत्नी को इस बात का पता चल गया इसलिये उसने एक दिन अलाउद्दीन के सामने ही महरू की पिटाई कर दी। इससे अलाउद्दीन का मन दिल्ली से उखड़ गया।

कड़ा-मानिकपुर की सूबेदारी

अलाउद्दीन के सौभाग्य से 1291 ई. में कड़ा के गवर्नर मलिक छज्जू ने सुल्तान जलालुद्दीन खिलजी के विरुद्ध विद्रोह कर दिया। इस विद्रोह को दबाने में अलाउद्दीन ने भारी वीरता का परिचय दिया। सुल्तान के बड़े पुत्र अर्कली खाँ ने सुल्तान के समक्ष अलाउद्दीन की प्रशंसा की। इस पर सुल्तान ने अलाउद्दीन को कड़ा-मानिकपुर का सूबेदार नियुक्त कर दिया। अलाउद्दीन दिल्ली से कड़ा चला गया। उसकी पत्नी ने कड़ा चलने से मना कर दिया। इस पर अलाउद्दीन अपनी प्रेमिका महरू को अपने साथ कड़ा ले गया।

महत्वाकांक्षाओं का विस्तार

कड़ा का वातावरण अलाउद्दीन के अनुकूल था। सुल्तान और उसके परिवार की छत्रछाया से दूर अलाउद्दीन को स्वतंत्र जीवन जीने का अवसर मिला। इससे उसकी महत्वाकांक्षाओं ने जन्म लिया और उसने दिल्ली के तख्त पर आँख गढ़ाई। तख्त प्राप्त करने के लिए उसने सैनिक संगठन, धन संग्रह तथा साथियों की परीक्षा करना आरम्भ किया। 1292 ई. में सुल्तान की आज्ञा से अलाउद्दीन ने भिलसा पर आक्रमण किया। भिलसा पर उसे बड़ी सरलता से विजय प्राप्त हो गई और उसने लूट का बहुत माल लेकर सुल्तान को समर्पित कर दिया। सुल्तान ने प्रसन्न होकर उसे आरिजे मुमालिक अर्थात सैन्य-मंत्री के पद पर नियुक्त कर दिया और कड़ा के साथ-साथ अवध का भी गवर्नर नियुक्त कर दिया। 1294 ई. में अलाउद्दीन ने देवगिरी पर आक्रमण किया और वहाँ से लूट की अपार सम्पत्ति लेकर कड़ा वापस लौट आया।

जलालुद्दीन की हत्या

देवगिरि की अकूत सम्पदा प्राप्त करके अलाउद्दीन मदान्ध हो गया। अब उसने दिल्ली का तख्त प्राप्त करने का निश्चय कर लिया। उसने कई तरह के बहाने करके अपने श्वसुर तथा ताऊ सुल्तान जलालुद्दीन खिलजी को कड़ा बुलाया। सरल हृदय सुल्तान अपने भतीजे तथा दामाद पर भरोसा रखकर कड़ा आया जहाँ अलाउद्दीन ने 19 जुलाई 1296 को मानिकपुर के निकट सुल्तान के साथ विश्वासघात करके उसकी हत्या करवा दी और स्वयं दिल्ली का तख्त हथियाने का उपाय ढूंढने लगा।

दिल्ली के तख्त की प्राप्ति

सुल्तान जलालुद्दीन खिलजी की बेगम को जैसे ही सुल्तान की कड़ा में हत्या होने का समाचार मिला, उसने अपने छोटे पुत्र कद्र खाँ को रुकुनुद्दीन इब्राहीम के नाम से दिल्ली के तख्त पर बैठा दिया क्योंकि बड़ा पुत्र अर्कली खाँ मुल्तान का गवर्नर होने के कारण मुल्तान में था। जब अर्कली खाँ ने सुना कि माँ ने छोटे पुत्र कद्र खाँ को दिल्ली के तख्त पर बैठा दिया तो वह अपने परिवार से नाराज हो गया तथा उसने अपने परिवार की सहायता करने के लिये दिल्ली जाना उचित नहीं समझा। जब अलाउद्दीन को सुल्तान के परिवार में फूट पड़ने के समाचार मिले तो अलाउद्दीन ने दिल्ली जाने का निर्णय किया। उसने मार्ग में नये सैनिकों की भी भर्ती की। जब वह दिल्ली पहुँचा तो उसके पास 56 हजार घुड़सवार तथा 70 हजार पैदल सिपाही थे। जब दिल्ली की सेना ने उसका मार्ग रोका तो अलाउद्दीन ने मुँह मांगा पैसा देकर अमीरों को अपनी ओर कर लिया। अमीरों की गद्दारी देखकर मलिका-ए-जहाँ ने अपने बड़े पुत्र अर्कली खाँ को दिल्ली आने तथा परिवार की सहायता करने के लिये संदेश भिजवाये किंतु अर्कली खाँ ने उन संदेशों पर ध्यान नहीं दिया। इससे मलिका-ए-जहाँ दिल्ली में अकेली पड़ गई। जब सुल्तान कद्र खाँ ने अलाउद्दीन का सामना करने का विचार किया तो रहे-सहे अमीर भी अपने सैनिक लेकर अलाउद्दीन की तरफ जा मिले। इससे मलिका-ए-जहाँ अपने परिवार को लेकर अपने बड़े बेटे के पास मुल्तान भाग गई। इस प्रकार बिना लड़े ही अलाउद्दीन का दिल्ली के तख्त पर अधिकार हो गया।

अलाउद्दीन की समस्याएँ

अलाउद्दीन को दिल्ली के तख्त पर बैठते ही अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। उसकी प्रमुख समस्याएँ निम्नलिखित थीं-

(1) अलोकप्रियता की समस्या: अलाउद्दीन राज्य का अपहर्ता तथा अपराधी समझा जाता था, क्योंकि उसने ऐसे व्यक्ति की हत्या करवाई थी जो उसका अत्यन्त निकट सम्बन्धी तथा बहुत बड़ा शुभचिन्तक था। जलालुद्दीन का अलाउद्दीन पर बहुत बड़ा स्नेह था और वह उस पर अत्यधिक विश्वास करता था। उसी ने अलाउद्दीन का पालन-पोषण किया था और उसे ऊँचे-ऊँचे पद दिये थे। अलाउद्दीन, सुल्तान जलालुद्दीन का दामाद तथा भतीजा दोनों था। अतः जलालुदद्ीन का वध बड़ा ही नृशंस तथा घृणित कार्य समझा गया।

(2) शासन में अराजकता की समस्या: केन्द्रीय शासन लम्बे समय से आंतरिक संघर्षों में फंसा हुआ था। इस कारण स्थानीय अधिकारी स्वेच्छाचारी हो गये थे। केन्द्र सरकार के प्रति उत्तरदाई अधिकारियों के अभाव में, स्थानीय तथा केन्द्रीय शासन में सम्पर्क बहुत कम रह गया था। स्थानीय अधिकारियों को केन्द्रीय सत्ता के अधीन करना तथा राज्य के प्रति विश्वस्त बनाना एक बड़ी समस्या थी।

(3) जलालुद्दीन के उत्तराधिकारियों की समस्या: यद्यपि दिल्ली का तख्त अलाउद्दीन को प्राप्त हो गया था परन्तु जलालुद्दीन के उत्तराधिकारियों का विनाश अभी नहीं हुआ था। जलालुद्दनी की बेगम मलिका-ए-जहान, बड़ा पुत्र अर्कली खाँ, दूसरा पुत्र कद्र खाँ (रुकुनुद्दीन इब्राहीम) और जलालुद्दीन का मंगोल दामाद उलूग खाँ अभी जीवित थे। उनके झण्डे के नीचे अब भी विशाल सेनाएँ संगठित हो सकती थीं।

(4) जलाली अमीरों की समस्या: जलाली अमीर अपने आश्रयदाता की हत्या करने वाले को कभी क्षमा करने के लिए उद्यत नहीं थे। जलालुद्दीन के इन स्वामिभक्त सेवकों में अहमद चप का नाम प्रमुख है। वह बड़ा ही निर्भीक तथा साहसी तुर्की अमीर था और जलालुद्दीन तथा उसके उत्तराधिकारियों में उसकी अटल भक्ति थी। जलाली अमीरों से अलाउद्दीन को बड़ा भय था क्योंकि ये बड़े कुचक्री होते थे किंतु अहमद चप को मुल्तान में बंदी बनाकर हांसी में उसे अंधा करके जेल में डाल दिया गया। इससे अन्य जलाली अमीर भी सहम कर शांत हो गये।

(5) सीमा सुरक्षा की समस्या: मंगोल आक्रमणकारी प्रायः भारत के पश्चिमोत्तर सीमान्त प्रदेशों पर आक्रमण करते थे। एक से अधिक अवसरों पर वे दिल्ली तक आ पहुँचे थे। उनकी गिद्ध-दृष्टि सदैव भारत पर ही लगी रहती थी। उनसे अपने राज्य को सुरक्षित करना, एक बड़ी समस्या थी। दिल्ली के निकट मंगोलपुरी बस जाने से मंगोलों को दिल्ली में आधार भी प्राप्त हो गया था।

(6) राज्य-विस्तार की समस्या: बलबन के कमजोर उत्तराधिकारियों एवं जलालुद्दीन खिलजी की उदार नीति के कारण अनेक हिन्दू-सामन्तों तथा राजाओं ने अपने राज्य वापस अपने अधिकार में कर लिये थे। अलाउद्दीन के तख्त पर बैठने के समय उत्तरी भारत का अधिकांश भाग तथा सम्पूर्ण दक्षिण भारत दिल्ली सल्तनत के बाहर था। इन खोये हुए प्रदेशों को अपने अधिकार में करना बड़ी समस्या थी।

समस्याओं का निवारण

यद्यपि अलाउद्दीन की समस्याएँ बड़ी तथा जटिल थीं किंतु उसे चार योग्य अमीरों- उलूग खाँ, नसरत खाँ, जफर खाँ तथा अल्प खाँ की सेवाएँ प्राप्त हो गईं। यद्यपि सुल्तान निरक्षर तथा हठधर्मी था परन्तु उसे काजी अलाउल्मुल्क का सानिध्य प्राप्त हो गया। काजी अलाउल्मुल्क ने अपने परामर्श से सुल्तान अलाउद्दीन की बड़ी सेवा की और उसे कई बार अनुचित कार्य करने से रोका। अलाउद्दीन अपनी बौद्धिक सीमाओं को जानता था इसलिये अपने शुभचिन्तकों के परामर्श को मान लेता था। इस कारण वह अपनी समस्याओं पर विजय प्राप्त करने में सफल रहा।

(1) अमीरों के विश्वास की प्राप्ति: सुल्तान बनने के बाद अलाउद्दीन ने अमीरों का विश्वास अर्जित करने के लिये देवगिरी से लाई हुई सोने-चाँदी की मुद्राओं का मुक्त हस्त से वितरण किया। उसने सैनिकों को छः मास का वेतन पारितोषिक के रूप में दिलवाया। शेखों तथा आलिमों को दिल खोलकर धन एवं धरती से पुरस्कृत किया। उसने दीन-दुखियों में अन्न वितरित करवाया। इस कारण लोग सुल्तान के विश्वासघात तथा उसके घृणित कार्य को भूलकर उसकी उदारता की प्रशंसा करने लगे। प्रायः समस्त बड़े अमीर अलाउद्दीन के समर्थक बन गये।

(2) शासन पर पकड़ बनाने हेतु पदों का वितरण: अपनी स्थिति के सुदृढ़ीकरण के ध्येय से अलाउद्दीन खिलजी ने कुछ ऊँचे पदाधिकारियों को पूर्ववत् उनके पदों पर बने रहने दिया और शेष पदों पर अपने सहायकों तथा सेवकों को नियुक्त कर दिया। इससे अलाउद्दीन की स्थिति बड़ी दृढ़ हो गई। उसने शासन में कई महत्वपूर्ण सुधार किये।

(3) जलालुद्दीन के उत्तराधिकारियों का दमन: अलाउद्दीन ने राजधानी में स्थिति को सुदृढ़ कर लेने के उपरान्त जलालुद्दीन के उत्तराधिकारियों का दमन करना  आरम्भ किया। उसने अपने दो सेनानायकों उलूग खाँ और जफरखां को एक सेना देकर मुल्तान पर आक्रमण करने भेजा। अलाउद्दीन के सेनापतियों ने मलिका-ए-जहान, अर्कली खाँ, कद्र खाँ, अहमद चप और मंगोल उलूग खाँ को बंदी बनाकर दिल्ली रवाना कर दिया। हांसी के निकट अर्कली खाँ, कद्र खां, अहमद चप और उलूग खाँ को अंधा करके परिवार के सदस्यों से अलग कर दिया गया। बाद में अर्कली खाँ तथा कद्र खाँ को उनके पुत्रों सहित मौत के घाट उतार दिया गया। मलिका-ए-जहान को दिल्ली लाकर नजरबंद कर दिया गया।

(4) जलाली अमीरों का दमन: जलालुद्दीन के उत्तराधिकारियों का दमन करने के बाद अलाउद्दीन ने जलाली अमीरों के दमन का कार्य नसरत खाँ को सौंपा। नसरत खाँ ने जलाली अमीरों की सम्पत्ति छीनकर राजकोष में जमा करवाई। कुछ अमीर अन्धे कर दिये गये तथा कुछ कारगार में डाल दिये गए। कुछ जलाली अमीरों को तलवार के घाट उतार दिया गया। उनकी भूमियां तथा जागीरें छीन ली गईं। जलाली अमीरों से शाही खजाने में लगभग एक करोड़ रुपया प्राप्त हुआ।

(5) सीमा की सुरक्षा की व्यवस्था: अलाउद्दीन ने मंगोलों के आक्रमणों को रोकने एवं उनका सामना करने के लिये सीमान्त प्रदेश की नाकेबन्दी करके वहाँ पर सेनायें रखीं। मंगोलों ने अलाउद्दीन के समय में भारत पर चार-पांच बार आक्रमण किये परन्तु अलाउद्दीन ने धैर्य के साथ उनका सामना किया।

(6) साम्राज्य विस्तार का कार्य: अलाउद्दीन महत्वाकांक्षी तथा साम्राज्य विस्तारवादी सुल्तान था। वह सम्पूर्ण भारत का सुल्तान बनना चाहता था। इसलिये उसने एक विजय-योजना तैयार की और उत्तर तथा दक्षिण दोनों ही दिशाओं में विजय अभियान चलाये।

अलाउद्दीन के उद्देश्य तथा उसकी महत्वाकांक्षाएँ

अलाउद्दीन को आरम्भ में ही बड़ी सफलतायें मिल गई थीं, इससे उसका उत्साह बढ़ता चला गया। सौभाग्य से उसके पास एक विशाल सेना तथा अपार कोष इकट्ठा हो गया। फलतः उसकी आकाक्षायें और बढ़ गईं। उसने अपने जीवन के दो लक्ष्य बनाये। उसका पहला उद्देश्य था एक नये धर्म की स्थापना करना और उसका दूसरा उद्देश्य था विश्व-विजय करना। उसके मन में यह विचार उत्पन्न हुआ कि जिस प्रकार हजरत मुहम्मद के चार साथी, अर्थात पहले चार खलीफा थे, उसी प्रकार उलूग खाँ, जफर खाँ, नसरत खाँ तथा अल्प खाँ उसके भी चार साथी हैं जो बड़े ही वीर तथा साहसी हैं। अतः पैगम्बर की भाँति वह भी नये धर्म की स्थापना करके और सिकन्दर महान् की भाँति विश्व विजय करके अपना नाम अमर कर सकता है।

काजी अलाउल्मुल्क का परामर्श

जब अलाउद्दीन खिलजी ने अपने योजनाओं के सम्बन्ध में काजी अलाउल्मुल्क से परामर्श किया तब काजी ने उसे परामर्श दिया कि नबी बनना अथवा नया धर्म चलाना सुल्तानों का काम नहीं है। यह काम पैगम्बरों का होता है जो अल्लाह द्वारा भेजे जाते हैं। सुल्तान की विश्व-विजय की आकंाक्षा के सम्बन्ध में काजी ने सुल्तान से कहा कि यद्यपि विश्व-विजय की कामना करना सुल्तान का कर्त्तव्य है किंतु न तो विश्व में सिकन्दर कालीन परिस्थितियाँ विद्यमान हैं और न सुल्तान के पास अरस्तू के समान बुद्धिमान तथा दूरदर्शी गुरु उपलब्ध है। काजी ने सुल्तान को परामर्श दिया कि दिल्ली सल्तनत की सीमाओं पर रणथम्भौर, चितौड़, मालवा, धार, उज्जैन आदि स्वतन्त्र राज्य हैं जिनके कारण सल्तनत पर चारों ओर से आक्रमणों के बादल मँडरा रहे हैं। अतः परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए सुल्तान के दो उद्देश्य होने चाहिये- (1.) सम्पूर्ण भारत पर विजय प्राप्त करना तथा (2.) मंगोलों के आक्रमणों को रोकना। इन दोनों उद्देश्यों की पूर्ति के लिए देश में शान्ति तथा सुव्यवस्था स्थापित रखना नितान्त आवश्यक था। काजी ने सुल्तान को यह परामर्श भी दिया कि जब तक वह मदिरा पीना तथा आमोद-प्रमोद करना नहीं छोड़ेगा तब तक उसके उद्देश्यों की पूर्ति नहीं हो सकेगी। अलाउद्दीन को काजी का यह परामर्श बहुत पसन्द आया और उसने काजी के परामर्श को स्वीकार कर लिया।

अलाउद्दीन खिलजी के प्रधान लक्ष्य

अलाउद्दीन खिलजी ने काजी अलाउल्मुल्क से परामर्श करके अपने तीन प्रधान लक्ष्य निर्धारित किये-

1. बाह्य आक्रमण से देश की रक्षा करना,

2. साम्राज्य में शान्ति तथा सुव्यवस्था स्थापित करना तथा

3. साम्राज्य को विस्तृत करना।

अलाउद्दीन खिलजी का साम्राज्य विस्तार

उत्तरी भारत की विजय (1299-1305 ई.)

लक्ष्य निश्चित कर लेने के उपरान्त अलाउद्दीन ने साम्राज्य विस्तार का कार्य आरम्भ किया। सर्वप्रथम उसने उत्तरी भारत को जीतने की योजना बनाई।

(1.) गुजरात पर विजय: सर्वप्रथम अलाउद्दीन की दृष्टि गुजरात के अत्यन्त धन-सम्पन्न राज्य पर पड़ी। इन दिनों गुजरात में बघेला राजा कर्ण शासन कर रहा था। उसकी राजधानी अन्हिलवाड़ा थी। अलाउद्दीन ने 1299 ई. में उलूग खाँ तथा नुसरत खाँ को कर्ण बघेला पर आक्रमण करने भेजा। इन सेनापतियों ने गुजरात की राजधानी अन्हिलवाड़ा को घेर लिया। कर्ण भयभीत होकर भाग खड़ा हुआ। मुसलमानों ने गुजरात को खूब लूटा और लूट की अपार सम्पत्ति दिल्ली लाई गई। कर्ण बघेला ने अपनी पुत्री देवल देवी के साथ देवगिरी के राजा रामचन्द्र के यहाँ शरण ली। कर्ण की रानी कमला देवी तथा मलिक काफूर नामक एक सुंदर युवक, दिल्ली की सेना के हाथ लगे। उन दोनों को सुल्तान के पास दिल्ली भेज दिया गया। अलाउद्दीन ने कमला देवी को अपने हरम में डाल लिया तथा मलिक काफूर को अप्राकृतिक संसर्ग के लिये रख लिया। जब शाही सेना गुजरात से लूट का माल लेकर दिल्ली लौट रही थी तो कुछ नव-मुसलमानांे ने इस खजाने को लूट लिया तथा तथा नुसरत खाँ के एक भाई और अलाउद्दीन के भतीजे को मारकर भाग गये। विद्रोही मंगोलों ने रणथंभौर के दुर्ग में शरण ली। शाही सेना ने बर्बरता से विद्रोहियों का दमन किया। दिल्ली में रह रहे उनके परिवारों को भी नृशंसता पूर्वक मारा गया। उनकी स्त्रियों का सतीत्व लूट लिया गया तथा बच्चों को उनकी माताओं के सामने ही टुकड़े करके फैंक दिया गया। बरनी ने अलाउद्दीन की इस क्रूरता की निंदा की है।

(2.) रणथम्भौर पर विजय: गुजरात पर अधिकार कर लेने के उपरान्त अलाउद्दीन खिलजी ने रणथम्भौर पर आक्रमण करने का निश्चय किया। इन दिनों रणथम्भौर में पृथ्वीराज चौहान का वंशज हम्मीर शासन कर रहा था। उसने जालोर से शाही खजाना लूटकर भागे नव-मुस्लिमों को अपने यहाँ शरण दी थी। अलाउद्दीन खिलजी ने 1299 ई. में उलूग खाँ तथा नसरत खाँ को रणथम्भौर पर आक्रमण करने के लिए भेजा। हम्मीर ने दुर्ग के अन्दर से रक्षात्मक युद्ध करने का निश्चय किया। अलाउद्दीन के सेनापतियों ने दुर्ग का घेरा डाल दिया। घेरे का निरीक्षण करते समय अचानक नसरत खाँ को एक पत्थर लगा और उसकी मृत्यु हो गई। राजपूतों ने बड़ी वीरता के साथ युद्ध करके तुर्कों के पीछे धकेल दिया। जब सुल्तान को इसकी सूचना मिली तो उसने स्वयं रणथम्भौर के लिए प्रस्थान किया। वह लगभग एक वर्ष तक दुर्ग का घेरा डाले रहा। हम्मीर देव के दो मंत्रियों रणमल तथा रतनपाल ने हम्मीरदेव के साथ विश्वासघात किया जिसके काराण मुसलमान सैनिक किले की दीवारों पर चढ़ने में सफल हो गये और अभेद्य दुर्ग पर विजय प्राप्त कर ली। हम्मीरदेव वीरगति को प्राप्त हुआ तथा उसकी स्त्रियों ने जौहर किया। अलाउद्दीन खिलजी उलूग खाँ को रणथम्भौर सौंप कर दिल्ली लौट आया। थोड़े ही दिनों बाद उलूग खाँ बीमार पड़ा और उसकी मृत्यु हो गई।

(3.) मेवाड़ पर विजय: दिल्ली सल्तनत के किसी भी सुल्तान को अब तक मेवाड़ पर आक्रमण करने का साहस नहीं हुआ था। इन दिनों रावल रत्नसिंह मेवाड़़ में शासन कर रहा था। 1303 ई. में अलाउद्दीन एक विशाल सेना लेकर चित्तौड़ पर आक्रमण करने चल दिया। अलाउद्दीन को चित्तौड़ दुर्ग पर अधिकार करने में पांच माह लगे। अगस्त 1303 में अलाउद्दीन का दुर्ग पर अधिकार हो गया। इसके बाद अलाउद्दीन ने दुर्ग में कत्ले आम का आदेश दिया। इस कत्ले आम में लगभग 30 हजार लोग मारे गये। अलाउद्दीन ने चित्तौड़ दुर्ग का नाम बदल कर खिजा्रबाद कर दिया तथा उसे अपने पुत्र खिज्र खाँ को देकर स्वयं पुनः दिल्ली चला गया।

पद्मिनी की कथा: मलिक मुहम्मद जायसी के ग्रंथ पद्मावत में इस आक्रमण का काव्यात्मक विवरण दिया गया है। इस विवरण के अनुसार रत्नसिंह की रानी पद्मिनी अपने सौन्दर्य के लिये दूर-दूर तक प्रसिद्ध थी। अलाउद्दीन ने पद्मिनी का अपहरण करने और मेवाड़ पर विजय प्राप्त करने का निश्चय किया। चितौड़ का दुर्ग एक पहाड़ी पर स्थित था तथा अजेय समझा जाता था। अलाउद्दीन ने रत्नसिंह के समक्ष शर्त रखी कि यदि वह दर्पण में रानी पद्मिनी की छवि दिखा दे तो अलाउद्दीन दिल्ली लौट जायेगा। रत्नसिंह अपने सैनिकों के रक्तपात को रोकने के लिये अलाउद्दीन खिलजी को रानी पद्मिनी की छवि शीशे में दिखाने के लिये तैयार हो गया। जब सुल्तान पद्मिनी को देखकर लौटने लगा तब राजा रत्नसिंह उसे पहुँचाने के लिये दुर्ग से बाहर आया। पहले से ही तैयार अलाउद्दीन खिलजी के सैनिकों ने राजा को कैद कर लिया। अब सुल्तान ने पद्मिनी के पास यह सूचना भेजी कि जब तक वह उसके निवास में नहीं आ जायेगी तब तक वह रत्नसिंह को मुक्त नहीं करेगा। राजपूतों के लिये यह बड़े अपमान की बात थी परन्तु पद्मिनी ने बुद्धि से काम लिया और सुल्तान के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया। वह सात सौ डोलियों में वीर राजपूत सैनिकों को बैठाकर दिल्ली की ओर चल पड़ी। अवसर पाकर राजपूत सैनिकों ने रावल रत्नसिंह को मुक्त करा लिया। इस अवसर पर हुए युद्ध में गोरा मारा गया। राजपूत सैनिक अपने राजा तथा रानी को लेकर चित्तौड़ आ गये। इसके बाद अलाउद्दीन के पुत्र खिज्र खाँ के नेतृत्व में चित्तौड़ दुर्ग पर आक्रमण हुआ। जब राजपूतों को अपनी पराजय निश्चित लगने लगी तो राजपूत स्त्रियों ने जौहर का आयोजन किया। पद्मिनी, राजपूत स्त्रियों के साथ चिता में बैठकर भस्म हो गई और राजपूत, शत्रु से लड़कर वीर गति को प्राप्त हुए। चितौड़ के दुर्ग पर मुसलमानों का अधिकार हो गया। गौरीशंकर हीराचंद ओझा तथा के. एस. लाल आदि कई इतिहासकार पद्मावत के विवरण को सही नहीं मानते। वे पद्मिनी की कथा को काल्पनिक मानते हैं। तत्कालीन इतिहासकारों इसामी, अमीर खुसरो, इब्नबतूता आदि ने इन घटनाओं का उल्लेख नहीं किया है जबकि परवर्ती फारसी इतिहासकारों अबुल फजल, हाजीउद्वीर तथा फरिश्ता ने इसे सत्य माना है।

(4.) मालवा पर विजय: चितौड़ पर विजय प्राप्त करने के उपरान्त अलाउद्दीन ने 1305 ई. में ऐनुल्मुल्क मुल्तानी को मालवा अभियान का दायित्व सौंपा। इन दिनों मालवा में मलहकदेव शासन कर रहा था। राजपूतों ने बड़ी वीरता से शत्रु का सामना किया परन्तु अन्त में मलहकदेव परास्त हुआ तथा युद्ध क्षेत्र में मारा गया। मालवा पर मुसलमानों का अधिकार हो गया।

(5.) उत्तरी भारत की अन्य विजयें: सुल्तान ने 1305 ई. में मालवा पर विजय प्राप्त की। इसके थोड़े ही दिन बाद उसने मांडू, उज्जैन, धारानगरी तथा चन्देरी आदि नगरों को जीत लिया। इस प्रकार 1305 ई. तक उत्तर भारत के अधिकांश राज्य अलाउद्दीन के अधीन हो चुके थे। केवल मारवाड़ अब तक अछूता था। 1306 ई. में अलाउद्दीन ने दक्षिण भारत का विजय अभियान आरम्भ किया।

(6.) सिवाना पर विजय: अभी तक मारवाड़ प्रदेश के किसी भी शासक ने तुर्कों की सत्ता को स्वीकार नहीं किया था। 1308 ई. में अलाउद्दीन खिलजी ने मलिक कमालुद्दीन गुर्ग के नेतृत्व में सिवाना पर अभियान किया। सिवाना पर उन दिनों सातलदेव का शासन था जो जालोर के चौहान शासक कान्हड़देव का भतीजा था तथा उसी की ओर से सिवाना दुर्ग पर नियुक्त था। अलाउद्दीन की सेना ने दो साल तक सिवाना दुर्ग पर घेरा डाले रखा। 1310 ई. में अलाउद्दीन स्वयं सिवाना आया। उसके द्वारा किये गये निर्णायक हमले में सातलदेव सम्मुख युद्ध में मारा गया। उसका राज्य दिल्ली के अमीरों में बाँट दिया गया।

(7.) जालौर पर विजय: जालौर पर चौहान शासक कान्हड़देव शासन कर रहा था। उसने अलाउद्दीन खिलजी की सेना को सोमनाथ आक्रमण के समय अपने राज्य से होकर गुजरने की अनुमति नहीं दी थी। इसलिये अलाउद्दीन खिलजी ने कमालुद्दीन गुर्ग के नेतृत्व में जालोर के विरुद्ध सेना भेजी। 1314 ई. में कान्हड़देव परास्त हो गया और जालौर पर अलाउद्दीन खिलजी का अधिकार हो गया। कुछ इतिहासकार 1311 ई. में अलाउद्दीन का जालोर पर अधिकार होना मानते हैं।

उत्तर भारत पर विजय के परिणाम

उत्तर भारत पर अधिकार स्थापित कर लेने के उपरान्त अलाउद्दीन ने दक्षिण भारत पर अभियान आरम्भ किया परन्तु उत्तरी भारत की विजय स्थायी सिद्ध न हुई। उसके जीवन के अन्तिम भाग में राजपूताना में विद्रोह की अग्नि प्रज्वलित हो उठी और अनेक स्थानों में राजपूतों ने अपनी खोई हुई स्वतन्त्रता को पुनः प्राप्त कर लिया परन्तु राजपूत पूर्ववत् असंगठित ही बने रहे। वे तुर्की सल्तनत को उन्मूलित न कर सके।

दक्षिण की विजय (1306-1313 ई.)

अलाउद्दीन का उद्देश्य सम्पूर्ण भारत पर अपना एक-छत्र प्रभुत्व स्थापित करना था। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिये उत्तर भारत पर विजय के बाद, दक्षिण भारत पर विजय प्राप्त करना आवश्यक था। दक्षिण की विपुल सम्पत्ति भी अलाउद्दीन को आकृष्ट करती थी। उत्तर भारत के अभियानों के कारण सेना तथा शासन का व्यय बहुत बढ़ गया था। उत्तर भारत को जीतने में हुए इस व्यय के मुकाबले उसे धन की प्राप्ति बहुत कम हुई थी। इसकी पूर्ति दक्षिण के धन से हो सकती थी। अलाउद्दीन यह भी चाहता था कि उसकी सेना किसी न किसी अभियान में संलग्न रहे ताकि सुल्तान के विरुद्ध विद्रोह न कर सके। इन सब कारणों से उसने दक्षिण भारत के विरुद्ध अभियान आरम्भ किया। दक्षिण की भौगोलिक असुविधाओं तथा उत्तरी भारत से दूरी के कारण अब तक कोई अन्य सुल्तान दक्षिण भारत पर अभियान करने का साहस नहीं कर सका था। 1305 ई. तक मारवाड़ को छोड़कर लगभग शेष उत्तरी भारत के राज्यों को जीत लिया गया था। इसलिये 1306 ई. में दक्षिण विजय का अभियान आरम्भ किया गया। अलाउद्दीन खिलजी ने दक्षिण विजय का कार्य अपने गुलाम मलिक काफूर को सौंपा जिसे नसरत खाँ खम्भात से लाया था। अलाउद्दीन ने मलिक काफूर को दक्षिण अभियान के लियेएक विशाल सेना प्रदान की।

इस समय दक्षिण भारत में चार प्रमुख हिन्दू राज्य थे- (1.) देवगिरी राज्य जिस पर यादवों का शासन था, इसकी राजधानी देवगिरि (दौलताबाद) थी। (2.) तेलंगाना राज्य जहाँ काकतीय वंश का शासन था, इसकी राजधानी वारंगल थी। (3.) होयसल राज्य जहाँ होयसल वंश का शासन था, इसकी राजधानी द्वारसमुद्र थी। (4.) मदुरा का राज्य जहाँ पांड्य वंश का शासन था, इसकी राजधानी मदुरा थी।

(1.) वारंगल पर पहला आक्रमण (1302 ई.): वारंगल, तेलंगाना की राजधानी थी जहाँ काकतीय वंश का राजा प्रताप रुद्रदेव (द्वितीय) शासन करता था। मुसलमान इतिहासकारों ने उसे लदर देव के नाम से पुकारा है। अलाउद्दीन वारंगल को अपने राज्य में सम्मिलित नहीं करना चाहता था। उसका लक्ष्य केवल धन प्राप्त करना था। वारंगल पर पहला आक्रमण अलाउद्दीन के आदेश से 1302 ई. में नुसरत खाँ के भतीजे छज्जू तथा फखरुद्दीन जूना (जो बाद में मुहम्मद तुगलक कहलाया) के नेतृत्व में किया गया। इस युद्ध में राजा प्रताप रुद्रदेव ने शाही सेना को परास्त कर दिया। मुस्लिम इतिहासकारों ने इस युद्ध का उल्लेख तक नहीं किया है।

(2.) देवगिरी पर पहला आक्रमण (1306 ई.): कड़ा का गवर्नर रहते हुए अलाउद्दीन देवगिरि को जीतकर लूट चुका था। सुल्तान बनने के बाद अलाउद्दीन ने मलिक काफूर को फिर से देवगिरि के विरुद्ध अभियान पर भेजा। इसके दो प्रमुख कारण थे। पहला तो यह कि देवगिरि के राजा रामचन्द्र ने पूर्व में दिये गये अपने वचन के अनुसार दिल्ली को कर नहीं भेजा था और दूसरा यह कि रामचन्द्र ने गुजरात के राजा राय कर्ण तथा उसकी पुत्री देवलदेवी को अपने यहाँ शरण दी थी। अलाउद्दीन खिलजी देवलदेवी को प्राप्त करना और देवगिरि पर फिर से अपनी सत्ता स्थापित करना चाहता था। मलिक काफूर तथा अल्प खाँ की संयुक्त सेनाओं ने देवगिरि पर आक्रमण कर दिया। राय कर्ण दो महीने तक बड़ी वीरता के साथ मुसलमानों का सामना करता रहा परन्तु मुसलमानों की विशाल सेना के समक्ष उसके पैर उखड़ गये। देवलदेवी की रक्षा नहीं हो सकी। वह अल्प खाँ के हाथ पड़ी और दिल्ली के रनिवास में भेज दी गई। कुछ दिन बाद शहजादे खिज्र खाँ से उसका विवाह कर दिया गया। मलिक काफूर ने सम्पूर्ण देश को उजाड़ दिया। विवश होकर राजा रामचन्द्र को सन्धि करनी पड़ी। काफूर ने रामचन्द्र को दिल्ली भेज दिया। सुल्तान ने उसके साथ अच्छा व्यवहार किया तथा उसे राय रय्यन की उपाधि दी। इस उदार व्यवहार के कारण रामचन्द्र ने फिर कभी अलाउद्दीन के विरुद्ध विद्रोह नहीं किया।

(3.) वारंगल पर दूसरा आक्रमण (1310 ई.): इसके बाद 1310 ई. में अलाउद्दीन खिलजी ने मलिक काफूर को वारंगल पर आक्रमण करने भेजा। अलाउद्दीन ने काफूर को आदेश दिया कि यदि प्रताप रुद्रदेव सुल्तान की अधीनता स्वीकार कर ले और अपना कोष, घोड़े तथा हाथी देने को कहे तो उससे सन्धि कर ली जाये और उसका राज्य न छीना जाये। काफूर ने एक विशाल सेना के साथ दक्षिण के लिए प्रस्थान किया। सबसे पहले वह देवगिरि गया। राजा रामचन्द्र ने उसकी बड़ी सहायता की। देवगिरि से काफूर ने वारगंल के लिये प्रस्थान किया और वारगंल के दुर्ग पर घेरा डाल दिया। यह घेरा कई महीने तक चलता रहा। इस दौरान बड़ी संख्या में हिन्दुओं को मारा गया तथा उनकी सम्पत्ति का विनाश किया गया। जब प्रताप रुद्रदेव को यह ज्ञात हुआ कि तुर्क केवल धन प्राप्त करने के लिए ऐसा विध्वंस मचा रहे हैं तब वह उन्हें धन देकर शांति स्थापित करने के लिये तैयार हो गया। बरनी के कथनानुसार प्रताप रुद्रदेव ने तुर्कों को 100 हाथी, 700 घोड़े, बहुत सा सोना-चाँदी तथा अनेक अमूल्य रत्न दिये। सम्भवतः कोहीनूर हीरा भी काफूर को यहीं से मिला था। प्रताप रुद्रदेव ने सुल्तान को वार्षिक कर देना भी स्वीकार कर लिया। काफूर 1310 ई. में देवगिरि तथा धारा होते हुए दिल्ली लौट गया।

(4.) द्वारसमुद्र पर आक्रमण (1311 ई.): वारंगल विजय के बाद अलाउद्दीन ने द्वारसमुद्र पर आक्रमण की योजना बनाई। इन दिनों द्वारसमुद्र में होयसल राजा वीर वल्लभ (तृतीय) शासन कर रहा था उसे बल्लाल (तृतीय) भी कहते हैं। वह योग्य तथा प्रतापी शासक था। दुर्भाग्य से इन दिनों होयसल तथा यादव राजाओं में घातक प्रतिद्वन्द्विता चल रही थी और दोनों एक दूसरे को उन्मूलित करने का प्रयत्न कर रहे थे। अलाउद्दीन ने इस स्थिति से लाभ उठाने के लिये 1311 ई. में मलिक काफूर को द्वारसमुद्र पर आक्रमण करने भेजा। बल्लाल, मलिक काफूर की विशाल सेना के समक्ष नहीं टिक सका तथा विवश होकर मुसलमानों की अधीनता स्वीकार कर ली। काफूर ने द्वारसमुद्र के मन्दिरों की अपार सम्पत्ति को जी भर कर लूटा। इस अपार सम्पत्ति के साथ मलिक काफूर दिल्ली लौट गया।

(5.) मदुरा पर आक्रमण (1311 ई.): द्वारसमुद्र विजय के उपरान्त अलाउद्दीन ने मदुरा पर आक्रमण की योजना बनाई। इन दिनों मदुरा में पांड्य-वंश शासन कर रहा था। दुर्भाग्यवश इन दिनों सुन्दर पांड्य तथा वीर पांड्य भाइयों में घोर संघर्ष चल रहा था। वीर पांड्य ने सुन्दर पांड्य को मार भगाया और स्वयं मदुरा का शासक बन गया। निराश होकर सुन्दर पांड्य ने दिल्ली के सुल्तान से सहायता मांगी। सुल्तान ऐसे अवसर की खोज में था। 1311 ई. में मलिक काफूर मदुरा पहुँच गया। काफूर ने आने की सूचना पाकर वीर पांड्य राजधानी छोड़कर भाग गया। काफूर ने मदुरा के मन्दिरों को खूब लूटा और मूर्तियों को तोड़ा। 1311 ई. में वह अपार सम्पत्ति लेकर दिल्ली लौट गया।

(6.) देवगिरि पर दूसरा आक्रमण (1312 ई.): रामचन्द्र की मृत्यु के उपरान्त उसका पुत्र शंकर देव देवगिरि का राजा हुआ। उसने दिल्ली के सुल्तान को कर देना बन्द कर दिया। शंकरदेव ने होयसल राजा के विरुद्ध भी मुसलमानों की सहायता करने से इन्कार कर दिया। इस पर अलाउद्दीन ने मलिक काफूर की अध्यक्षता में एक सेना शंकरदेव के विरुद्ध भेजी। युद्ध में शंकरदेव पराजित हो गया और वीरगति को प्राप्त हुआ। 1315 ई. में हरपाल देव को देवगिरि का शासन सौंपकर मलिक काफूर दिल्ली लौट गया।

दक्षिण में अलाउद्दीन की सफलता के कारण

अलाउद्दीन की सेना मलिक काफूर के नेतृत्व में दक्षिण भारत में विजय पताका फहराने में पूर्ण रूप से सफल रही। इस सफलता के कई कारण थे-

(1) दक्षिण के राज्यों का पारस्परिक संघर्ष: जिस समय मलिक काफूर ने दक्षिण अभियान आरम्भ किया, उस समय दक्षिण के राज्यों में परस्पर वैमनस्य अपने चरम पर था और वे एक दूसरे से संघर्ष करके शक्ति नष्ट कर रहे थे। वे संगठित होकर शत्रु का सामना करने के स्थान पर, अपने पड़ोसियों के विरुद्ध शत्रु की ही सहायता करने लगते थे।

(2) अलाउद्दीन की सेना की योग्यता: अलाउद्दीन के सैनिक सुधारों के कारण उसकी सेना में उत्साह था। सेना के पास पर्याप्त संसाधन थे तथा उसे अच्छा वेतन दिया जा रहा था।

(3) अलाउद्दीन के साम्राज्य विस्तृत नहीं करने की नीति: अलाउद्दीन विन्ध्य-पर्वत के दक्षिण में अपने राज्य का विस्तार नहीं चाहता था। उसकी सेना धन लूटने तथा हिन्दुओं के धार्मिक स्थल नष्ट करने के उद्देश्य से दक्षिण अभियान कर रही थी।

अलाउद्दीन खिलजी की दक्षिण नीति

अलाउद्दीन ने उत्तरी भारत में जिस नीति का अनुसरण किया था, दक्षिण भारत में उससे भिन्न नीति का अनुसरण किया। उसकी दक्षिण नीति की प्रमुख बातें इस प्रकार थीं-

(1.) दक्षिण की सम्पत्ति लूटने की नीति: दक्षिण भारत में अलाउद्दीन का एक मात्र लक्ष्य दक्षिण की विपुल सम्पत्ति को लूटना था। ताकि वह अपनी विशाल सेना का व्यय चला सके और अपने शासन को सुव्यवस्थित रख सके।

(2.) आधिपत्य स्वीकार कराने की नीति: अलाउद्दीन यह जानता था कि सुदूर दक्षिण पर दिल्ली से शासन करना असंभव था। अतः उसने देवगिरि, तेलंगाना, द्वारसमुद्र तथा मदुरा पर विजय तो प्राप्त की परन्तु उन्हें अपने साम्राज्य में मिलाने का प्रयत्न नहीं किया। जब पराजित राज्यों के शासक उसका आधिपत्य स्वीकार करने को तैयार हो जाते थे तो वह उनके राज्य लौटा देता था और पराजित राजा को अथवा पराजित राजा के वंश के अन्य व्यक्ति को राज्य दे देता था।

(3.) विजित राजाओं से उदारता की नीति: यद्यपि अलाउद्दीन स्वभाव से क्रूर तथा निर्दयी था और अपने शत्रुओं तथा विरोधियों के साथ बुरा व्यवहार करता था परन्तु दक्षिण के राजाओं के साथ उसने उदारता का व्यवहार किया। इसी कारण देवगिरि के राजा रामचन्द्र तथा होयलस के राजा बल्लाल (तृतीय) ने दक्षिण विजय में अलाउद्दीन की बड़ी सहायता की।

(4.) सेनापतियों के माध्यम से विजय की नीति: अलाउद्दीन खिलजी दिल्ली से अनुपस्थित रहने के दुष्परिणामों से परिचित था। उसे अमीरों के विद्रोहों तथा मंगोलों के आक्रमण का सदैव भय लगा रहता था। इसलिये उसने राजधानी को कभी असुरक्षित नहीं छोड़ा तथा दक्षिण-विजय का कार्य अपने सेनापतियों को दिया।

(5.) सेनापतियों पर नियंत्रण रखने की नीति: यद्यपि सुल्तान अलाउद्दीन, मलिक काफूर पर विश्वास करता था और उसी को प्रत्येक बार प्रधान सेनापति बना कर भेजा करता था परन्तु वह उस पर अपना पूरा नियन्त्रण रखने का प्रयास करता था। वह उसके साथ अल्प खाँ आदि अन्य सरदारों को भी भेजता था जिससे काफूर को विश्वासघात करने का अवसर न मिल सके। सुल्तान जब काफूर को दक्षिण भारत के अभियान पर भेजता था, तब वह उसे विस्तृत आदेश देता था। काफूर के लिये उन आदेशों की पालना करना अनिवार्य था।

अलाउद्दीन की दक्षिण नीति की समीक्षा

कुछ इतिहासकार अलाउद्दीन की दक्षिण नीति को असफल मानते हैं। उनके अनुसार वह दक्षिण भारत को अपने अधीन बनाये रखने में विफल रहा। देवगिरि तथा होयसल राज्यों ने तो पराजय स्वीकार करके अलाउद्दीन से सहयोग किया किंतु तेलंगाना ने कभी सहयोग तो कभी विरोध किया। पाण्ड्य राज्य ने तो अधीनता ही स्वीकार नहीं की। रामचंद्र देव के कारण शंकर देव का भी व्यवहार बदल गया और मलिक काफूर को पुनः दक्षिण राज्यों के विरुद्ध अभियान पर भेजना पड़ा। कुछ इतिहासकारों के अनुसार अलाउद्दीन की दक्षिण नीति सफल रही क्योंकि वह दक्षिण भारत को अपने प्रत्यक्ष शासन में नहीं रखना चाहता था, वह उन राज्यों से धन लूटने तथा उन्हें करद राज्य बनाकर उनसे कर वसूलना चाहता था। अपने इस उद्देश्य में वह पूरी तरह सफल रहा।

अलाउद्दीन के साम्राज्य की सीमाएं

अलाउद्दीन का उद्देश्य सम्पूर्ण भारत पर अपना एकछत्र साम्राज्य स्थापित करना था। उसे इस उदे्श्य में पूर्ण सफलता प्राप्त हुई। अपने सेनापतियों की सहायता से उसने उत्तरी तथा दक्षिणी भारत पर विजय प्राप्त करके लगभग सम्पूर्ण देश पर अपना आधिपत्य स्थापित किया। उसका साम्राज्य उत्तर में मुल्तान, लाहौर तथा दिल्ली से लेकर दक्षिण में द्वारसमुद्र तथा मदुरा तक, पूर्व में लखनौती तथा सौनार गाँव से लेकर पश्चिम में थट्टा तथा गुजरात तक विस्तृत हो गया था।

अलाउद्दीन के समय में मंगोलों के आक्रमण

अलाउद्दीन खिलजी 1296 ई. में दिल्ली के तख्त पर बैठा था। उसके तख्त पर बैठने से पहले भी मंगोल कई बार भारत पर आक्रमण कर चुके थे। यहाँ तक कि जलालुद्दीन खिलजी मंगोलों को दिल्ली के बाहर मंगोलपुरी बसाकर रहने की अनुमति दे चुका था। अलाउद्दीन खिलजी के दिल्ली तख्त पर बैठने के कुछ माह बाद मंगोलों का पहला आक्रमण हुआ तथा 1307 ई. तक वे अलाउद्दीन खिलजी के राज्य पर आक्रमण करते रहे। अलाउद्दीन खिलजी ने 1316 ई. तक शासन किया था। इस प्रकार उसके शासन के अंतिम नौ वर्ष का समय मंगोलों के आक्रमण से मुक्त रहा।

(1.) कादर का आक्रमण: मंगोलों का पहला आक्रमण 1296 ई. में कादर के नेतृत्व में हुआ। उस समय अलाउद्दीन को गद्दी पर बैठे कुछ महीने ही हुए थे। अलाउद्दीन ने अपने मित्र जफर खाँ को उनके विरुद्ध भेजा। जफरखाँ ने मंगेालों को जालंधर के निकट परास्त किया। तथा उनका भीषण संहार किया।

(2.) देवा तथा साल्दी का आक्रमण: मंगोलों ने 1297 ई. में देवा तथा साल्दी के नेतृत्व में अलाउद्दीन खिलजी के राज्य पर दूसरा आक्रमण किया। उनका ध्येय पंजाब, मुल्तान तथा सिन्ध को जीत कर अपने राज्य में मिलाना था। उन्होंने सीरी के दुर्ग पर अधिकार कर लिया। अलाउद्दीन ने अपने दो सेनापतियों उलूग खाँ तथा जफर खाँ को मंगोलों का सामना करने के लिए भेजा। उन्होंने सीरी का दुर्ग मंगालों से पुनः छीन लिया तथा साल्दी को 2000 मंगोलों सहित बंदी बनाकर दिल्ली भेज दिया। इस विजय के बाद अलाउद्दीन तथा उसके भाई उलूग खाँ को जफर खाँ से ईर्ष्या उत्पन्न हो गई क्योंकि मंगोलों पर लगातार दो विजयों से सेना में जफर खाँ की लोकप्रियता बहुत बढ़ गई थी।

(3.) कुतलुग ख्वाजा का आक्रमण: मंगोलों का सबसे अधिक भयानक आक्रमण 1299 ई. में दाऊद के पुत्र कुतुलुग ख्वाजा के नेतृत्व में हुआ। उसने दो लाख मंगोलों के साथ बड़े वेग से आक्रमण किया। उसकी सेना तेजी से बढ़ती हुई दिल्ली के निकट पहुँच गई। उनका निश्चय दिल्ली पर अधिकार करने का था। इस बीच मंगोलों के भय से हजारों लोग दिल्ली में आकर शरण ले चुके थे। इससे दिल्ली में अव्यवस्था फैल गई। मंगोलों द्वारा दिल्ली की घेराबंदी कर लिये जाने के बाद तो स्थिति और भी खराब हो गई। इस पर भी अलाउद्दीन ने साहस नहीं छोड़ा। जफर खाँ को मंगोलों से लड़ने का अनुभव था इसलिये उसे अग्रिम पंक्ति में रखकर शाही सेना ने मंगोलों का सामना किया। जफर खाँ तथा उसकी सेना ने हजारों मंगोलों का वध किया तथा वे लोग मंगोलों को काटते हुए काफी आगे निकल गये। मंगोलों ने घात लगाकर जफर खाँ को मार डाला। उस समय अलाउद्दीन तथा उसका भाई उलूग खाँ पास में ही युद्ध कर रहे थे किंतु उन्होंने जफर खाँ को बचाने का कोई प्रयास नहीं किया। रात होने पर मंगोल अंधेरे का लाभ उठाकर भाग गये। इतिहासकार के. एस. लाल के अनुसार इस युद्ध से अलाउद्दीन को दोहरा लाभ हुआ। पहला लाभ मंगोलों पर विजय के उपलक्ष्य में और दूसरा लाभ जफर खाँ की मृत्यु के रूप में। बरनी लिखता है कि मंगोल सैनिकों पर जफर खाँ की वीरता का इतना गहरा प्रभाव पड़ा कि जब उनके घोड़े पानी नहीं पीते थे तो वे घोड़ों से कहते थे कि क्या तुमने जफर खाँ को देख लिया है जो तुम पानी नहीं पीते ?

(4.) तुर्गी का आक्रमण: 1302 ई. में मंगोल सरदार तुर्गी ने एक लाख बीस हजार सैनिकों के साथ भारत पर आक्रमण किया और दिल्ली के पास यमुना के तट पर आ डटा। इन दिनों अलाउद्दीन चितौड़ अभियान पूरा करके दिल्ली लौटा ही था। वह दिल्ली छोड़कर सीरी के दुर्ग में चला गया। इस कारण राजधानी असुरक्षित हो गई। मंगोलों ने दिल्ली की गलियों तक धावे मारे किंतु तीन महीने बाद वे वापस चले गये।

(5.) अलीबेग का आक्रमण: 1305 ई. में 50 हजार मंगोलों ने अलीबेग की अध्यक्षता में दिल्ली सल्तनत पर आक्रमण किया। मंगोलों की सेना अमरोहा तक पहुँच गई। गाजी तुगलक उन दिनों दिपालपुर में था। उसने मंगोलों से भीषण युद्ध किया और उन्हें बड़ी क्षति पहुँचाई। असंख्य मंगोलों का संहार हुआ और वे भारत की सीमा के बाहर खदेड़ दिये गये। अलबेग तथा तार्तक को कैद करके दिल्ली लाया गया जहां उनका कत्ल कर दिया गया और उनके सिरों को सीरी के दुर्ग की दीवार में चिनवा दिया गया।

(6.) इकबाल मन्दा का आक्रमण: 1307 ई. में मंगोल सरदार इकबाल मन्दा ने विशाल सेना के साथ भारत पर आक्रमण किया। अलाउद्दीन खिलजी ने इस विपत्ति का सामना करने के लिए मलिक काफूर तथा गाजी मलिक तुगलक के नेतृत्व में विशाल सेना भेजी। मलिक काफूर ने रावी नदी के तट पर कबक को परास्त करके उसे बीस हजार मंगोलों सहित कैद कर लिया। इन्हें दिल्ली लाकर हाथियों के पैरों तले कुचलवाया गया। बदायूं दरवाजे पर उनके सिरों की एक मीनार बनाकर इससे वे इतने आतंकित हो गये कि अलाउद्दीन खिलजी के शासन काल में उन्हें फिर कभी भारत पर आक्रमण करने का साहस नहीं हुआ।

मंगोलों की असफलता के कारण

उपरोक्त विवरण से स्पष्ट है कि अलाउद्दीन खिलजी के शासन काल में मंगोलों को समस्त आक्रमणों में असफल होना पड़ा। उनकी पराजय के कई कारण थे-

(1.) इस समय मंगोल कई शाखाओं में विभक्त होकर पारस्परिक संघर्षों में व्यस्त थे। इस कारण वे संगठित होकर पूरी शक्ति के साथ भारत पर आक्रमण नहीं कर सके।

(2.) मंगोल अपने साथ स्त्रियों, बच्चों तथा वृद्धों को भी लाते थे जो युद्ध क्षेत्र में सेना के लिए भार बन जाते थे।

(3.) दाऊद की मृत्यु के बाद मंगोल अस्त-व्यस्त हो गये थे। दिल्ली सल्तनत पर लगातार आक्रमणों के कारण उनकी सैन्य शक्ति काफी छीज गई थी।

(4.) अलाउद्दीन के सैनिक गुण तथा उसकी संगठन प्रतिभा ने मंगोलों को जीतने नहीं दिया।

मंगोलों के आक्रमण का प्रभाव

मंगोलों के आक्रमण का भारत पर बहुत बड़ा प्रभाव पड़ा-

(1.) मंगोलों के आक्रमणों में सहस्रों व्यक्तियों के प्राण गये और उनकी सम्पत्ति लूटी गई।

(2.) मंगोलों से भयभीत रहने के कारण जनता राज्य के संरक्षक तथा अवलम्ब की ओर झुक गई और उसमें राज-भक्ति की भावना प्रबल हो गई। इससे सुल्तान की शक्ति में बड़ी वृद्धि हो गई।

(3.) मंगोलों के आक्रमण की निरन्तर सम्भावना बनी रहने के कारण सुल्तान को अत्यन्त विशाल सेना की व्यवस्था करनी पड़ी। इसका प्रभाव शासन व्यवस्था पर भी पड़ा। शासन का स्वरूप सैनिक हो गया और सेना की स्वेच्छाचरिता तथा निरंकुशता में वृद्धि हो गई।

(4.) मंगोलों का सफलता पूर्वक सामना करने के लिए सुल्तान को बड़े सैनिक तथा प्रशासकीय सुधार करने पड़े।

अलाउद्दीन की सीमा नीति

अलाउद्दीन खिलजी ने अपने राज्य को मंगोलों के आक्रमण से सुरक्षित रखने के लिए बलबन की सीमा नीति का अनुसरण किया। उसने इसके निम्नलिखित उपाय किये-

(1.) अलाउद्दीन खिलजी ने पुराने दुर्गों की मरम्मत करवाई तथा पंजाब, मुल्तान एवं सिंध में नये दुर्गों का निर्माण करवाया

(2.) सीमा प्रदेश के दुर्गों में योग्य तथा अनुभवी सेनापतियों के नेतृत्व में विशाल सेनायें रक्खी गईं।

(3.) समाना तथा दिपालपुर की किलेबन्दी की गई।

(4.) सेना की संख्या में वृद्धि की गई और हथियार बनाने के कारखाने खोले गये।

(5.) राजधानी की सुरक्षा की पूर्ण व्यवस्था की गई और दिल्ली के दुर्ग का जीर्णोद्धार कराया गया।

(6.) सीरी में एक नये दुर्ग का निर्माण करवाया गया ।

(7.) सेना की रणनीति में परिवर्तन किया गया। सेना की सुरक्षा के लिए खाइयाँ खुदवाई गईं, लकड़ी की दीवारें बनवाई गईं तथा हाथियों के दस्तों की व्यवस्था की गई।

(8.) आक्रमणकारियों की वास्तविक शक्ति से अवगत होने के लिए गुप्तचर विभाग की व्यवस्था की गई।

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